Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 1

जैसलमेर रियासत के मंत्री महबूब खान की बेटी रेशमा ठाकुर विजय सिंह से इतनी प्रभावित हुई कि उस ने उन से शादी करने का फैसला कर लिया. लेकिन महबूब खान ने रेशमा से शादी के लिए सैनिक पठान खान और ठाकुर विजय सिंह के बीच युद्ध कराने की ऐसी शर्त रखी कि…

उन दिनों रेगिस्तान में पानी कुंओं से निकाल कर पीया जाता था. उसी पानी से पशुधन के साथ गांव, कस्बों एवं

नगरों के लोगों की भी प्यास बुझती थी. युवतियां एवं बहुएं कुएं से पानी भर कर घर ले जाती थीं. दिनरात लोग पानी के जुगाड़ में रहते थे.

शाहगढ़ के कुंए के पनघट पर बारात रुकी थी. बारात दीनगढ़ के जागीरदार ठाकुर मोहन सिंह की थी. मोहन सिंह 500 बारातियों के साथ शाहगढ़ के ठाकुर खेतसिंह की बेटी दरियाकंवर से ब्याह रचाने आए थे.

जानी डेरा (बारात के रुकने का स्थान) कुंए के पनघट के पास था. पनघट पर गांव की महिलाएं सिर पर मटके रख कर पानी ले जा रही थीं. बारात में तमाम गांवों के ठाकुर, जागीरदार आए हुए थे. इस बारात में जैसलमेर रियासत के तमाम गांवों के ठाकुर शामिल हुए थे. ठाकुर मोहन सिंह ने अपनी शादी में तिजौरियों के मुंह खोल दिए थे.

दीनगढ़ में 7 दिन तक लगातार खुला रसोड़ा चला. गलीगली में खातिरदारी हुई. सारा दीनगढ़ नाचगाना, रागरंग में डूब गया था. प्रभावशाली और अत्यधिक धनी व्यक्ति ऐसे अवसर पर धन बहाने में अपनी शानोशौकत समझता है. मोहनसिंह ने भी यही किया था. दीनगढ़ दुर्ग से बारात शाहगढ़ के लिए रवाना हुई. सोने की मोहरे उछाली गईं. मार्ग के दोनों ओर भीड उमड़ पड़ी.

सब से आगे रियासत के नामीगिरामी मांग ठाहार शहनाई नौबत बाजे बजाते निकले. फिर मंगल कलश ले कर बालिकाएं. पीछे मंगल गीत गाती महिलाएं. उन के बाद सजेधजे घोड़ों पर राज्य के हाकिम, ठाकुर, अमीर उमराव चल रहे थे. उन के पीछे तमाम बाराती ऊंटों पर सवार थे.

बारात के पड़ावों की जगह पहले से तय थीं. वहीं खानेपीने और रागरंग का पूरा इंतजाम था. सारे रास्ते बाराती हो या कोई और सब के लिए रसोड़ा खुला था. रास्ते के गांवों में जबरदस्त हलचल थी. दूरदूर से लोग बारात देखने आ रहे थे.

दोपहर बाद बारात शाहगढ़ पहुंची तो उस का भव्य स्वागत हुआ. बारातियों, घोड़ों और ऊंटों को पानी की परेशानी न हो इसलिए उसे पनघट के पास ठहराया गया. खानेपीने की अच्छी व्यवस्था थी. ऊंटघोड़ों के लिए कोठाखेली भर दी गई थीं. जितना पानी कम पड़ता उतना ही कुएं से खींच कर भर दिया जाता था.

दिन अस्त होने को था. बारात में हमीरगढ़ के ठाकुर विजय सिंह भी पधारे थे. विजय सिंह की उम्र यही कोई 22-23 बरस थी. विजय सिंह के पिता सुल्तान सिंह का थोड़े समय पूर्व निधन हो चुका था.

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पिता के निधन के बाद विजय सिंह को हमीरगढ़ का ठाकुर घोषित किया गया था. गौर वर्ण विजय सिंह का बलिष्ठ सुंदर साहसी युवक था. वह अस्त्रशस्त्र चलाने के साथ मल्लयुद्ध में भी निपुण था. हमीरगढ़ के आसपास बीस कोस में विजय सिंह जैसा कोई योद्धा नहीं था. ऐसा योद्धा बारात में हो और उस की चर्चा न हो यह संभव नहीं था.

विजय सिंह की वीरता और ताकत की जो बातें शाहगढ़ के जानी डेरे में हो रही थीं. वह शाहगढ़ के लोगों ने भी सुनी. उन्होंने यह बातें अपने घर जा कर भी सुनाई. तब बलिष्ठ ठाकुर विजय सिंह की शाहगढ़ में भी चर्चा होने लगी. यह चर्चा रेशमा ने भी सुनी. रेशमा शाहगढ़ के ठाकुर खेतसिंह की पुत्री दरियाकंवर की सहेली थी.

रेशमा के पिता महबूब खान जैसलमेर रियासत में मंत्री थे. महबूब खान भी दिलेर व ताकतवर व्यक्ति थे. वह शाहगढ़ के रहने वाले थे और रियासत के उन गिनेचुने व्यक्तियों में थे, जो राजा के करीबी थे.

रेशमा और दरियाकंवर हमउम्र थीं, साथ ही खास सहेलियां भी. दोनों अलगअलग जातिधर्म की जरूर थीं मगर दोनों धर्म से ऊपर इंसान को महत्त्व देती थीं.

रेशमा मानती थी कि जब जीव जन्म लेता है, उस समय वह किसी धर्म का नहीं होता. जीव का जन्म जिस घर में होता है उसे उसी धर्म से जोड़ दिया जाता है. राजपूत के घर पैदा हुआ तो राजपूत कहलाता है, मुसलमान के घर पैदा हुआ तो मुसलिम कहलाएगा.

रेशमा ने ठाकुर विजय सिंह की बहादुरी के चर्चे सुने तो उस का मन उन्हें देखने को व्याकुल हो उठा. रेशमा का घर ‘जानी डेरे’ के पास ही था. उस के दिलोदिमाग पर विजय सिंह से मिलने का भूत सवार हो गया. वह अपनी 2-3 सहेलियों के साथ दरियाकंवर के घर से अपने घर आ गई. वहां रेशमा और उस की सखियों के अलावा कोई नहीं था.

रेशमा ने अपने छोटे भाई के हाथ एक पत्र विजय सिंह के पास भेजा. विजय सिंह ने पत्र पढ़ा और जानी डेरे से बाहर आ कर पास वाले घर की ओर देखा, तो उन्हें झरोखे में एक खूबसूरत नवयौवना बैठी दिखाई दी. वह बला की खूबसूरत थी. गोरी अप्सरा सी सुंदरी, पीली चुनर ओढे़ केशर की बेटी जैसी. अस्त होते सूरज की किरणों ने उस पर अपनी आभा बिखेर कर पीला रंग चढ़ा दिया था.

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ठाकुरसा ने आंखें मलीं. फिर देखा. सच! एकदम सच! ठाकुर विजय सिंह की आंखों से रेशमा की आंखें चार हुईं, तो दोनों का निगाहें हटाने का मन नहीं हो रहा था. विजय सिंह के रूपयौवन एवं बलिष्ठ शरीर पर रेशमा पहली नजर में ही मर मिटी. रेशमा ने मन ही मन तय कर लिया कि यही उस के सपनों का राजकुमार है. शादी करूंगी तो इसी से वरना ताउम्र कुंवारी रह लूंगी. किसी और से ब्याह नहीं करूंगी. रेशमा ने हाथ से इशारा किया तो ठाकुरसा उस के आकर्षण में बंधे उस के पास चले आए. रेशमा की सखियां दूसरे कक्ष में छिप गई थीं.

रेशमा ने विजय सिंह को बिठाया. दोनों आमनेसामने बैठे थे. मगर बोल किसी के मुंह से फूट नहीं रहे थे. काफी देर तक दोनों अपलक एकदूसरे को निहारते रहे. फिर हिम्मत कर के रेशमा के मुंह से कोयल सी मीठी वाणी निकली, ‘‘आप का स्वागत है, हुकुम.’’

‘‘जी, धन्यवाद.’’ विजय सिंह ने कहा.

‘‘आज शाहगढ़ में तो आप के ही चर्चे हैं. दोपहर में जब से बारात आई है, तब से सब के मुंह पर आप की वीरता के ही किस्से हैं. ऐसे में मैं भी आप से मिलने को व्याकुल हो गई. तभी छोटे भाई के साथ संदेश भिजवाया था मिलने को?’’ रेशमा बोली.

‘‘आप ने बुलाया और हम चले आए. अब बताएं क्या कुछ कहना है?’’ ठाकुर सा ने कहा.

‘‘मेरी बचपन से एक ही तमन्ना है कि मैं अपना जीवनसाथी स्वयं चुनूं. मैं आप से ब्याह करना चाहती हूं…’’ एक ही सांस में कह गई रेशमा. विजय सिंह उसे देखते रह गए. उन से कुछ कहते नहीं बन रहा था. तभी रेशमा बोली, ‘‘आप राजपूत हैं और मैं मुसलमान. मगर प्यार करने वाले जातिधर्म नहीं देखते. मैं ने मन से आप को पति मान लिया है. अब आप को जो फैसला लेना हो लीजिए. मगर इतना जरूर ध्यान रखना कि मैं शादी करूंगी तो सिर्फ आप से. वरना जीवनभर कुंवारी रहना पसंद करूंगी. दुनिया के बाकी सब मर्द आज से मेरे भाई बंधु?’’ रेशमा ने लरजते होठों से कहा.

Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 2

रेशमा की बात सुन कर विजय सिंह अजमंजस में पड़ गए. वह तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या जवाब दें रेशमा को. वह तो मन से उन्हें पति मान चुकी है. मृगनयनी रेशमा की सुंदरता पर वह भी मर मिटे थे. ऐसी सुंदरी उन्होंने अब तक नहीं देखी थी.

ठाकुर सा चकित थे, इस छोटे से गांव शाहगढ़ में इतनी सुंदर लड़की. वह भी सब से अलग. इस में कुछ तो है. यह मुसलमान और मैं राजपूत ठाकुर. धर्म की दीवार आड़े आ रही थी. इस कारण ठाकुर सा ने अगली सुबह तक जवाब देने को कहा और विदा ले कर जानी डेरे पर आ गए.

विजय सिंह के जानी डेरे लौटते ही रेशमा की सहेलियां रेशमा के पास आ गईं. वह उदास सी थी. सोच रही थी कि अगर विजय सिंह ने उस का प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया तो वह कैसे जिएगी उन के बिना.

रेशमा की यह हालत उस की सहेलियों ने देखी तो धापू बोली, ‘‘रेशमा तुम्हारा हंसता चेहरा ही अच्छा लगता है. तुम्हारे चेहरे पर यह उदासी अच्छी नहीं लगती. भरोसा रखो. सब ठीक ही होगा.’’

‘‘धापू, तुम्हें बता नहीं सकती दिल खोल कर कि मैं आज एक पहर में ही कैसे ठाकुरसा के प्यार में पगला गई. अगर ठाकुर सा ने प्यार स्वीकार न किया तो कल इस समय तक मैं शायद जिंदा नहीं रहूंगी. मैं उन से इतनी मोहब्बत करने लगी हूं कि शायद किसी ने कभी किसी से नहीं की होगी?’’

रेशमा ने दिल की बात कही. तब धापू और अगर सहेलियों ने रेशमा को दिलासा दी कि सब ठीक होगा. उसे उस का सच्चा प्यार जरूर मिलेगा. इस के बाद सहेलियां रेशमा को दिलासा देती हुई शादी वाले घर ले गईं.

दूल्हे मोहनसिंह की शादी दरियाकंवर से हो गई. चंवरी में खूब चांदी के सिक्के और सोने की मोहरें उछाली गईं. शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. दरियाकंवर को प्रियतम के रूप में मोहन मिल गया. वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी. वहीं रेशमा बीतती हर घड़ी के साथ उदास होती जा रही थी. उसे यह सवाल परेशान कर रहा था कि ठाकुर सा विजय सिंह उसे क्या जवाब देंगे. अगर ठाकुर सा ने उस का प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया तो… रेशमा सारी रात इसी उधेड़बुन में रही.

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सुबह का सूरज निकला. रेशमा नहाधो कर तैयार हुई. नहाने के बाद रेशमा का रूप सौंदर्य निखर उठा. वह ताजे गुलाब सा खिल रही थी. सब लोग बारात की विदाई में जुट गए. उधर विजय सिंह ने अपने कुछ खास ठाकुरों से रेशमा के प्रेम प्रस्ताव के बारे में बात की.

विजय सिंह ने उन्हें बताया कि वह बहुत सुंदर हैं. उस की सुंदरता पर मैं भी मर मिटा हूं. मगर दोनों के मिलन में बांधा है दोनों का धर्म. वह मुसलिम है.

विजय सिंह को ठाकुरों ने कहा कि प्यार करने वाले जा%E

Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 3

एक तरफ बेटी का प्यार. वहीं दूसरी तरफ उन का स्वयं का दिया पठान को वचन. वह रात भर सोच कर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके.

सुबह उन्होंने अपनी बेगम और बेटी रेशमा को एकांत कक्ष में बुला कर बात की. महबूब खान ने रेशमा से कहा, ‘‘बेटी, मेरे कई बार प्राण जातेजाते बचे थे. जानती हो, प्राण मेरे अंगरक्षक सैनिक पठान ने अपनी जान पर खेल कर बचाए.

‘‘मैं ने उस के इन वीरता भरे कदमों से खुश हो कर उसे वचन दिया है कि रेशमा से उस का विवाह करूंगा. अब मेरी इज्जत तुम्हारे हाथ में है. तुम चाहो तो मेरा वचन कायम रह सकता है. अगर मैं वचन नहीं निभा सका तो मैं प्राण दे दूंगा?’’ कहतेकहते महबूब खान की आंखें भर आईं.

रेशमा कहे भी तो क्या. वह तो मन से विजय सिंह को अपना सर्वस्व मान चुकी थी. ऐसे में वह अपने पिता के वचन का मान कैसे रखती. अगर पिता के वचन का मान रखती तो उस का प्यार विजय सिंह उसे धोखेबाज ही कहता. रेशमा ने विजय सिंह के सामने उन की प्रशंसा सुन कर प्रेम प्रस्ताव रखा था. उस के प्रेम प्रस्ताव को विजय सिंह ने स्वीकार भी कर लिया था और उस से शादी का वादा किया था.

अब यदि वह पिता के वचन को निभाते हुए पठान से ब्याह करती है तो विजय सिंह के दिल पर क्या गुजरेगी. वह गुमसुम बैठी सोचती रही. वह कुछ नहीं बोली. तब महबूब खान ने कहा, ‘‘कुछ तो बोल बेटी. इस धर्मसंकट से निकलना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं विजय सिंह को अपने मन से पति मान चुकी हूं. वह भी मुझ से प्रेम करते हैं और मुझ से विवाह करना चाहते हैं. विजय सिंह के अलावा इस धरती पर जितने मनुष्य हैं वह सब मेरे भाईबंधु हैं. अब आप ही फैसला करें कि बेटी की विजय से शादी करेंगे या उस का मरा मुंह देखेंगे?’’ रोते हुए रेशमा एक ही सांस में कह गई.

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महबूब खान अपनी पुत्री रेशमा की जिद से भलीभांति वाकिफ थे. वह समझ गए कि रेशमा ने जो मन में ठान लिया, वही करेगी. वह किसी की नहीं सुनेगी. ऐसे में महबूब खान ने बेटी से कहा, ‘‘बेटी, विजय सिंह और पठान में मल्लयुद्ध और अस्त्रशस्त्र से लड़ाई होगी. इस में जो जीतेगा उस से तुझे विवाह करना पड़ेगा.’’

‘‘अब्बू, मैं आप से कह चुकी हूं कि मैं ने अपना प्रियतम चुन लिया है. ऐसे में अब आप क्यों शर्त रख रहे हैं कि मल्लयुद्ध और तलवार से लड़ाई में जो जीतेगा उस से विवाह करना होगा. मैं मन से ठाकुर सा को पति मान चुकी हूं. इस जन्म में तो वहीं मेरे पति होंगे.’’

बेटी की बात सुन कर महबूब खान के तनबदन में आग लग गई. वह गुस्से से आंखें निकालते हुए बोले, ‘‘तेरी बकवास बहुत सुन चुका. तू जानती नहीं कि तू एक खान की बेटी है और अपने इसलाम धर्म में ही शादी कर सकती है. मेरे लाड़प्यार ने तुझे बिगाड़ दिया है. इसलिए तू एक राजपूत से शादी करने पर अड़ी है. अगर तेरा प्रियतम ठाकुर मेरे सैनिक पठान से जीतेगा तभी उस से शादी करूंगा. वरना कभी नहीं…समझी.’’

रेशमा ने अपने अब्बा का गुस्सा आज पहली बार देखा था. वह समझ गई कि अब तो अपनी सच्ची चाहत के बूते ही वह अपने प्रियतम को पा सकती है.

महबूब खान ने ऊंट सवार हमीरगढ़ भेज कर ठाकुर विजय सिंह को समाचार भिजवाया कि अगर रेशमा को चाहते हो और शादी करनी है तो अस्त्रशस्त्र ले कर कजली तीज के रोज शाहगढ़ पहुंच जाना. खुले मैदान में पठान खान से मल्लयुद्ध व तलवारबाजी का युद्ध करना होगा.

इस युद्ध में अगर तुम जीते तो रेशमा तुम्हारी और अगर पठान जीता तो रेशमा उस की होगी. समय पर शाहगढ़ पहुंच जाना. अगर नहीं आए तो रेशमा का पठान से विवाह कर दिया जाएगा.

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विजय सिंह समाचार मिलते ही अस्त्रशस्त्र से लैस हो कर अपने 2 राजपूत साथियों के साथ शाहगढ़ के लिए रवाना हो गए. कजली तीज में 4 दिन का समय बाकी था. ठाकुर सा घोड़े पर सवार हो कर अपने साथियों के साथ शाहगढ़ की राह चल पड़े. कजली तीज से एक रोज पहले ही वह शाहगढ़ पहुंच गए.

महबूब खान ने उन्हें एक तंबू में रोका. पठान भी शाहगढ़ आ गया था. महबूब खान ने विजय सिंह और पठान को मिलाया. दोनों एकदूसरे से इक्कीस थे. रेशमा को जैसे ही पता चला कि ठाकुर सा विजय सिंह आ गए हैं, तो उस ने अम्मी से कहा कि वह एक बार ठाकुर सा से मिलना चाहती है.

रेशमा को उस की अम्मी ने ठाकुरसा से एकांत में मिलवाया. विजय सिंह को देखते ही रेशमा उन के सीने से जा लिपटी और कस कर बांहों में भर कर सुबकते हुए बोली, ‘‘अब्बा हमारे प्यार की यह कैसी परीक्षा ले रहे हैं. अब क्या होगा?’’

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‘‘तुम चिंता मत करो रेशमा. अगर हमारा प्यार सच्चा है तो जीत हमारी ही होगी. प्रेमियों को हमेशा से ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ा है?’’ विजय सिंह ने रेशमा को दिलासा दी.

रेशमा बोली, ‘‘आप नहीं मिले तो मैं मर जाऊंगी?’’

‘‘रेशमा, ऐसा न कहो. सब ठीक होगा. मुझ पर विश्वास रखो.’’ ठाकुरसा ने कहा. इस के बाद थोड़ी देर तक दोनों प्रेमालाप करते रहे, फिर अलग हो गए.

Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 4

रेशमा की आंखें आंसुओं से तर थीं. उस की हिचकियां बंधी थीं. अम्मी ने उसे संभाला और कक्ष में ले गईं. विजय सिंह को पता चल गया था कि पठान ने महबूब खान की कई बार जान बचाई थी. इस कारण उन्होंने पठान को बचन दिया था कि वे उस से अपनी बेटी रेशमा का विवाह कर के एहसानों का बदला चुकाएंगे.

रात में जब रेशमा और विजय सिंह के बीच बातें हो रही थी, तब पास के तंबू में सो रहे पठान ने सारी बातें सुन ली थीं. पठान को नींद नहीं आई. खड़का होने पर पठान ने देखा कि रेशमा अपनी अम्मा के साथ विजय सिंह से मिलने आई और उन के बीच का वार्तालाप भी सुन लिया था.

पठान की सब समझ में आ गया. वह जान गया कि रेशमा उस से नहीं ठाकुर सा विजय सिंह से प्रेम करती है. बस, पठान ने मन ही मन एक निर्णय कर लिया कि उसे रेशमा का दिल जीतने के लिए क्या करना है.

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अगले दिन कजली तीज का त्यौहार था. गांव की सुहागिनें एवं युवतियां सोलह शृंगार कर के झूले पर जाने से पहले उस मैदान में पहुंच गईं. जहां रेशमा को पाने के लिए 2 वीरों के बीच युद्ध होना था. तय समय पर शाहगढ़ के तमाम नरनारी उस मैदान में आ जमे थे. विजय सिंह ने केसरिया वस्त्र धारण किए और कुलदेवी को प्रणाम करने के बाद युद्ध मैदान में कूद गए.

पठान खान भी मैदान में आ गए. नगाड़े पर डंका बजते ही दोनों योद्धा आपस में भिड़ गए. मल्ल युद्ध में दोनों एकदूजे को परास्त करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाने लगे. मगर ताकत में दोनों बराबर थे. तय समय तक दोनों बराबरी पर छूटे.

तब महबूब खान ने कहा कि अब फैसला तलवार करेगी कि कौन रेशमा के लायक है, दोनों ने तलवारें और ढाल उठा लीं. रेशमा दिल थाम कर देख रही थी. तलवारबाजी शुरू होने से पहले दोनों वीरों ने रेशमा की तरफ देखा. रेशमा एकटक ठाकुरसा की तरफ ही देख रही थी. यह पठान से छिप न सका.

तलवारबाजी शुरू हुए थोड़ा समय ही गुजरा था कि पठान पस्त होने लगा. महबूब खान की समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है. तभी ठाकुर विजय सिंह की तलवार ने पठान का सीना चीर दिया. पठान गिर पड़ा.

महबूब खान के आदेश पर युद्ध रोक दिया गया. महबूब खान भाग कर रेशमा वगैरह के साथ युद्धस्थल पर रक्त रंजित पड़े पठान खान के पास पहुंचे. पठान ने कहा कि रेशमा के लायक विजय सिंह है.

महबूब खान ने पूछा, ‘‘ऐसा तुम क्यों कह रहे हो?’’

तब खून से लथपथ पड़े पठान ने कहा, ‘‘रेशमा और विजय सिंह एकदूसरे से प्रेम करते हैं. यह मैं ने कल रात में जाना. जब यह दोनों थोड़ी देर के लिए मिले. मैं ने इन की बातें सुनीं तो मुझे अहसास हुआ कि रेशमा मेरे साथ कभी खुश नहीं रह सकेगी. क्योंकि वह तो सिर्फ विजय सिंह से प्यार करती है.

अगर इस युद्ध में विजय सिंह की हार होती तो रेशमा जी नहीं पाती. मैं ने कल रात इन की बातें सुनने के बाद प्रण कर लिया था कि मुझे युद्ध में क्या करना है. मल्लयुद्ध में आप ने देखा कि हम दोनों ताकत में बराबर हैं, तो तलवारबाजी में भी हम बराबर ही रहते. मगर मुझे रेशमा की खुशी के लिए ठाकुरसा से यह युद्ध हारना जरूरी लगा.

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इसीलिए मैं ने ठाकुर सा पर प्राणघातक वार नहीं किया और उन्होंने मुझे कमजोर मान कर तलवार का वार सीने पर कर के मुझे घायल कर दिया. मुझे खुशी है कि ठाकुरसा को रेशमा जैसी प्यार करने वाली जीवनसाथी मिलेगी, जो मेरे नसीब में नहीं है. यदि मैं युद्ध में जीत भी जाता तो रेशमा का दिल कभी नहीं जीत पाता. इसलिए मैं युद्ध में हार गया.’’

इतना सुन कर ठाकुर विजय सिंह, रेशमा और महबूब खान व अन्य लोग एकदूसरे की तरफ देखते रह गए.

महबूब खान ने वैद्य को बुला कर पठान का ईलाज करने को कहा. वैद्य ने ईलाज शुरू किया, मगर तलवार ने सीने पर गहरा जख्म किया था. पठान ने मरतेमरते रेशमा के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘तुम मेरी बहन हो. इस भाई को भी इतना प्यार करना जितना विजय सिंह से करती हो. मेरा मरना सार्थक हो जाएगा?’’

कह कर पठान ने जोर की हिचकी ली और प्राण त्याग दिए. रेशमा ही नहीं विजय सिंह और वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं. रेशमा के प्यार के लिए पठान ने कुरबानी दे कर साबित कर दिया कि वह ठाकुर सा विजय सिंह से किसी भी तरह कम नहीं थे.

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पठान खान को वहीं पर कब्र बना कर दफना दिया गया. बाद में दोनों पठान की कब्र पर गए और फूल चढ़ा कर नवजीवन के लिए हमीरगढ़ प्रस्थान कर गए. रेशमा जब भी शाहगढ़ आती थी, पठान की कब्र पर जरूर जाती थी. फिर एक वक्त वह भी आया

जब रेशमा और ठाकुर सा भी अनंत सफर पर चले गए.

Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 3

‘‘हाउसिंग बोर्ड का मकान कर्ज पर लिया है. राजवैद्य चक्रपाणिजी के आयुर्वेदिक उपचार से मुझे स्वास्थ्य लाभ हुआ है. चुनाव में भी लोगों को मेरे चरित्र पर विश्वास था. मैं समझता हूं कि इस चुनाव में किसी का कुछ खर्च नहीं हुआ. क्या प्रमाण है आप के पास? क्या खर्च किया है आप ने?’’

‘‘छि:छि:, उग्र होने से स्वास्थ्य बिगड़ता है, मेरे भाई. सुनो, जिन लोगों को चुनाव से पहले वारुणी की बोतलें वितरित कीं, उन की रसीदें चाहिए क्या? 3 महल्लों में हैंडपंप लगवाए हैं, उन की रसीद चाहिए क्या? 3 हजार कंबल खरीद कर बांटे गए, उन की रसीद चाहिए क्या? कैसी बच्चों जैसी बातें करते हो? बिना खर्चपानी के कोई चुनाव नहीं जीतता. एक प्राइमरी स्कूल के मास्टर की इतनी हस्ती नहीं होती कि वह विधान सभा का चुनाव जीत ले. क्या तुम्हारी सात पुश्तों में भी किसी ने ऐसा सम्मान प्राप्त किया था?

‘‘भाई मेरे, अब तुम सरकार हो, कानून हो, शहर के मालिक हो. तुम किसी को भी जेल में बंद करा सकते हो. किसी को भी जेल से छुड़वा सकते हो. शहर के जुए के अड्डे, रंडियों के कोठे, शराब की भट्ठियां सब तुम्हारी मरजी से चलती हैं.

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‘‘मुगल शासनकाल में बादशाह विभिन्न प्रांतों के लिए अलगअलग सूबेदार नियुक्त करता था. वह सूबेदार अपने इलाके का राजा होता था. तुम भी अपने इलाके के राजा हो. किसी का भी तबादला करा सकते हो, नियुक्ति करा सकते हो, निलंबित करा सकते हो. तुम्हारे एक इशारे पर कोई भी पिट सकता है, हवालात में बंद हो सकता है या भगाया जा सकता है. क्या मदरसे की मास्टरी में तुम्हारा यही रोब था?’’

‘‘लेकिन चौधरी साहब, पेट बड़ा हो जाने से खुराक भी ज्यादा हो जाती है. आप ने हमारा पेट बड़ा किया है तो हमें खुराक भी बड़ी चाहिए.’’

‘‘पुलिस विभाग आप के लिए छोड़ दिया है. खाओ और खाने दो. शहर के गुंडेबदमाशों का दोहन करो, लाटरी, जुआ, शराब, चिट आदि की सदाबहार खेती को संभालो.’’

‘‘फिर भी आप को हम सब का हिस्सा तो देना ही होगा. आप जबरदस्ती हमारा हिस्सा हजम नहीं कर सकते.’’

‘‘फिर ठीक है, समझ लो, मैं ने सब कुछ हजम कर लिया. अब आप को जो करना है कर लेना.’’

‘‘समझ लीजिए, चौधरी साहब. आप को यह सौदा महंगा पड़ेगा.’’

‘‘जाओ, मास्टर. राजनीति में ऐसी धमकियां तो हमारा नाश्तापानी हैं. हां, लेकिन हाथपैर संभाल कर वार करना.’’

सभी लोग उत्तेजित से निकल गए. नेताजी ने चपरासी से कहा, ‘‘अंदर कोई नहीं आए. जरा रामदुलारी को भेज देना. कंठ बड़ा चटक रहा है.’’

दूसरे दिन तहसील में होहल्ला मचा हुआ था. वकील सुरेंद्रनाथ, नेता ज्वालाप्रसाद और नरेंद्र का कत्ल हो गया था. रात में 8-10 डाकू आए थे गांव में.

सब से पहले गल्ला फकीर मरा. वह पागल था. पुराने कुएं की जगत पर सोया था. होहल्ला सुन कर डाकुओं के सामने सीना तान कर खड़ा हो गया. एक घोड़े की लगाम भी पकड़ ली. तभी आग के एक शोले ने उसे जमीन पर लिटा दिया. एक ही चीख में ठंडा हो गया वह पागल. उस की कहीं चर्चा भी नहीं हुई.

फिर डाकुओं ने ढूंढ़ढूंढ़ कर तीनों व्यक्तियों को मारा. संयोगवश मास्टर ज्ञानेंद्र किसी काम से शहर गए थे. सरपंच होतीलाल को पेचिश लग गई थी. वह सरकारी अस्पताल का लाल पानी पीने के लिए गांव से बाहर ही थे. शायद इसीलिए शहीद होतेहोते बच गए.

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सरकारी टेलीफोन की घंटियां घनघना उठीं. नेता, अभिनेता, पत्रकार, फोटोग्राफर आदि की लाइनें लगने लगीं. पुलिस हरकत में आ गई.

दूरदूर तक डाकुओं का पीछा किया गया. उन की धूल भी हाथ न लगी, लेकिन पुलिस को तो कुछ न कुछ करना ही था. 30 आदमियों को गिरफ्तार किया गया. गांवतहसील में कुछ नारेबाजियां हुईं. फिर सबकुछ शांत हो गया.

दूसरे दिन शाम को मास्टर ज्ञानेंद्र चुपचाप आए डरेसहमे से. चौधरी साहब ने उन का स्वागत किया. अंदर के निजी कक्ष में कुछ भेद की बातें हुईं. कुछ देर बाद मास्टर ज्ञानेंद्र कुछ संतुष्ट से, कुछ खुश से बाहर निकले.

ज्ञानेंद्र ने गांव संभाल लिया था. अब उन के मकान की दूसरी मंजिल का काम संगमरमर से हो रहा था. कुछ नई शक्लसूरतें गांव में दिखाई दे रही थीं.

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फिर एक दिन चौधरी साहब गांव में आए. सब को आश्वस्त किया. लोग उन से सहमे हुए थे, डरे हुए थे. और तो सब ठीकठाक था. सब जगह शांति थी. लोग अपनेअपने कामों में लग गए थे.

और तो सब ठीकठाक है : कैसे थे चौधरी जगत नारायण

Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 2

हरदयाल अपनी योजना और भी विस्तार में समझाता, लेकिन तभी चौधरी साहब ने उसे टोक कर मुख्य मुद्दे पर बात करना जरूरी समझा.

आने वालों में अध्यापक ज्ञानेंद्र, वकील सुरेंद्रनाथ, सरपंच मोतीलाल, नेता ज्वालाप्रसाद और रमन उपस्थित थे. हरदयाल एक दूसरे सिलसिले में वहां आया था.

बात रमन ने ही शुरू की, ‘‘चौधरी साहब, अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा है. हम ने पूरे जिले की नाका चुंगियों का ठेका लिया है. ट्रैफिक से चुंगी वसूल करते हैं. 10 प्रतिशत पार्टी के दफ्तर को देते हैं…’’

‘‘रुकिए, सारी बातें समझदारी के साथ स्पष्ट करनी चाहिए. ऐसा करते हैं, हरदयालजी, आप सब 11 तारीख को हम से मिलना, जो भी उचित होगा, तय कर लेंगे,’’ चौधरी साहब ने रमन की बात बीच में ही काट दी.

हरदयाल चुपचाप उठ कर बाहर चला गया.

‘‘अरे भाई, तुम लोगों में इतनी भी बुद्धि नहीं है कि कोई अन्य बाहरी आदमी बैठा है. ठीक है, आगे कहो.’’

‘‘आगे क्या कहें? 20 प्रतिशत आप के खाते में डाल देते हैं. 20 प्रतिशत सरकारी कामकाज के लिए, खानेपिलाने के लिए रख छोड़ते हैं. बकाया 50 प्रतिशत में हम 4 लोग भागीदार हैं.’’

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‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? वह ज्ञानीशंकर का लड़का नर्मदा अकड़ रहा है. 100-50 लड़के इकट्ठे कर लिए हैं और लड़नेमरने को आमादा है.’’

‘‘ठीक है, ठीक है, कुछ फूल उसे भी भेंट कर दो.’’

‘‘नहीं, चौधरी साहब, वह हरिश्चंद्र की औलाद बनता है. ऐसे लेनेदेने से तो नहीं टूटेगा. और भी जलील करेगा सब के आगे.’’

‘‘चांदी का जूता बहुत भारी होता है, नरेंद्रजी.’’

‘‘चौधरी साहब, नर्मदा अक्खड़- मिजाज और सनकी नौजवान है. उस ने अपना बहुमत बना लिया है. तब तो एक ही उपाय है. उसे साफ कर दिया जाए.’’

‘‘छि:छि:, कैसी छोटी बातें करते हो. ऐसे सनकी और जिद्दी आदमियों की हमें बहुत जरूरत है. मैं कल तहसील आऊंगा खुद नर्मदा से बातें करूंगा. और कुछ?’’

अध्यापक ज्ञानेंद्र ने अपनी बात कही, ‘‘चौधरी साहब, हम ने जिले के परमिट आप की राय के अनुसार ही वितरित किए थे. सेठ भगवानदास को सीमेंट का परमिट दिया गया. मुंशी प्यारेलाल भजनलाल फर्म को मिट्टी का तेल, गोवर्धनप्रसाद को सौफ्ट कोक, अली मुहम्मद को गैस आदि के ठेके दिए गए. हम ने वसूली के लिए चक्कर भी लगाए, लेकिन अधिकांश ने कहा कि उन्होंने अपना धन आप को दे दिया है. यदि ऐसा है तो हमारा हिस्सा दिलवा दीजिए.’’

‘‘देखो, मास्टर ज्ञानेंद्रजी. जब तुम एक निजी पाठशाला में मास्टरी करते थे तो चेहरे पर झुर्रियां थीं, आंखों में गड्ढे थे और कुरतापाजामा में पैबंद लगे थे. तुम्हारी पत्नी क्षयरोग की मरीज लगती थी और बच्चे ऐसे लगते थे जैसे सीधे अनाथाश्रम से आए हों.

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‘‘तुम 350 रुपए और मुट्ठीभर इज्जत ले कर बीमार जिंदगी से लड़ रहे थे. मैं ने तुम्हें सड़क से उठा कर  मकान में रखा, मकान में दुकान लगवाई, दुकान में चक्की लगवाई, चक्की की कमाई से तुम्हारी रोटियां चल रही हैं.

‘‘चुनाव में तुम्हें विधान सभा का सदस्य बनाने के लिए 1 लाख रुपए खर्च किए हमारे 2 आदमी किशन और रमेश चुनाव युद्ध में काम आ गए. हम ने उन्हें तालाब में फिंकवा कर मामला रफादफा कर दिया. तुम अच्छे वोटों से जीते, तुम्हारा नाम भी हुआ.

‘‘अब रही हिसाबकिताब की बात. भाई मास्टर, पहले मुझे अपने 1 लाख रुपए निकालने हैं. 20-20 हजार  रुपए मृत व्यक्तियों के रिश्तेदारों को देने हैं. अभी तो सिर्फ 80 हजार ही वसूल हुए हैं. आप लोग 60 हजार रुपए का प्रबंध कर के मुझे दिलवा दो. फिर चाहो तो मेरा हिस्सा भी तुम खा जाना.

‘‘गांधी, नेहरू जैसे बड़े नेता भी तो चुपचाप सब देखते थे. हिस्सेपट्टे से दूर रहते थे. मेरे पास तो ईमानदारी की कमाई ही बहुत है,’’ चौधरी साहब ने पैर सोफे से नीचे लटका दिए.

‘‘चौधरी साहब, यह तो ठीक है कि अब मेरा पक्का मकान है, लोगबाग इज्जत से देखते हैं, सेहत सुधर गई है, लेकिन राजनीति से इस का कुछ लेनादेना नहीं है.

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Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 1

चौधरी जगत नारायण राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी थे. सामने वाले को कैसे पटखनी देनी है और कैसे अपना उल्लू सीधा करना है, वह भलीभांति जानते थे. इसीलिए तो वह भ्रष्टाचार में लिप्त हो कर हजारों डकार जाते, किसी को खबर तक न होती.

दरबार जमा हुआ था. सबकुछ निश्चित कर लिया गया था. अब किसी को कोई परेशानी नहीं थी. पंडित गिरधारीलाल की समस्या का समाधान हो चुका था. रजब मियां के चेहरे पर भी संतुष्टि के भाव थे.

हां, कल्लू का मिजाज अभी ठीक नहीं हुआ था. उस ने भरे दरबार में चौधरी साहब की शान में गुस्ताखी की थी. नरेंद्र तो आपे से बाहर भी हो गया था, किंतु चौधरी साहब ने सब संभाल लिया था.

चौधरी जगतनारायण खेलेखाए घाघ आदमी थे. जानते थे कि वक्त पर खोटा सिक्का भी काम आ जाता है. फिर दूध देने वाली गाय की तो लात भी सही जाती है. उन्होंने बड़ी मीठी धमकी देते हुए कल्लू को समझाया था, ‘‘कल्लू भाई, थूक दो गुस्सा. धंधे में क्रोध से काम नहीं चलता. हम तो तुम्हारे ग्राहक हैं. ग्राहक से गुस्सा करना तो व्यवसाय के नियमों में नहीं आता.’’

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‘‘लेकिन चौधरी साहब, मैं अपने इलाके का शेर हूं, कुत्ता नहीं. कोई दूसरा गीदड़ मेरी हद में आ कर मेरा हक छीने, यह मुझे बरदाश्त नहीं होगा. वह रशीद का बच्चा, उस का तो मैं पोस्टमार्टम कर ही दूंगा.’’

‘‘कल्लू के मुंह से कौर छीनना इतना आसान तो नहीं है, जितना आप लोगों ने समझ लिया है. आज का फैसला आप के हाथ में है. लेकिन आगे का फैसला मैं अपनी मरजी से लिखूंगा. और हां, यह भी आप लोगों को बता दूं कि अपना आदमी जब बागी हो जाता है तो कहीं का नहीं छोड़ता.’’

‘‘तू क्या कर लेगा? तीन कौड़ी का आदमी. जानता नहीं जुम्मन की लंबी जबान काट कर फेंक दी थी. हरिशंकर आज भी जेल की चक्की पीस रहा है. कृपाराम मतवाला कुत्ते की मौत मरा था. आखिर, तू समझता क्या है अपनेआप को? चिड़ीमार कहीं का.

‘‘दोचार चूहे इधरउधर मार लिए तो बड़ा भेडि़या समझने लगा है अपनेआप को. सुन, हम राजनीति करते हैं. कोई भाड़ नहीं झोेंकते. तुझ जैसे तीन सौ पैंसठ घूमते हैं झाडू लगाते हुए. चल फूट यहां से,’’ नरेंद्र ने एक फूहड़ सी गाली बकी.

चौधरी साहब ने उसे रोक दिया, ‘‘नहीं नरेंद्र, कहने दो उसे, जो वह कहना चाहता है. उसे भी अपनी बात कहने का हक है. भई, देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र के तहत किसी को उचितअनुचित कुछ भी कहने से रोका नहीं जा सकता. बोलने दो इसे. यह समाजवाद का जमाना है. इसे कुछ गलत लगा है. इसे अपने दर्द को कहने का पूरापूरा हक है. फिर यह हमारा आदमी है. यह हमारे लिए कुछ भी सोचे, हम इस का बुरा नहीं सोच सकते.’’

‘‘हां, हरीश. तुम ध्यान रखना कल्लू भाई का. इसे जब भी कोई जरूरत हो तो उसे पूरी करना. इस समय इसे गुस्सा है. जब यह शांत हो जाएगा तो समझ जाएगा कि कौन अपना है, कौन पराया,’’ चौधरी साहब गांधीवादी मुद्रा में बुद्धआसन लगाए हुए थे.

लेकिन कल्लू एकदम चिकना घड़ा था. वह अपनी हैसियत जानता था. वह यह भी जानता था कि चौधरी साहब के बिना उस का गुजारा नहीं और यह भी मानता था कि अपनेआप को अधिक सस्ता और सुगम बनाने से इनसान की औकात घटती है.

अब चौधरी साहब का दबदबा था. जिस का दबदबा हो उसी के साथ रहने में लाभ था. फिर कल्लू तेजी से घूम कर बाहर निकल गया.

इधर नरेंद्र चौधरी साहब को राजनीति समझा रहा था, ‘‘आप ने बहुत मुंह लगा रखा है उस घटिया आदमी को. उसे न तो बोलने का शऊर है, न ही उठनेबैठने की तमीज. उस दिन धर्मदास को ही दरवाजे पर धक्का मार दिया और फिर पिस्तौल भी निकाल ली. वह तो अच्छा हुआ कि मनोहरलालजी आ गए और बात संभल गई. नहीं तो गजब हो जाता.’’

‘‘अरे, कुछ भी गजब नहीं होता. इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई तो मारने वालों पर कौन सा गजब टूट पड़ा? वही अदालत- कचहरी के चक्कर, वकीलों की तहरीरें, न्यायविदों की दलीलें. मुलजिम आनंद करते रहे. उन की रक्षा और देखभाल पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जाता रहा. अब उच्चतम न्यायालय ने उन में से एक को बरी भी कर दिया है. बाकी को फांसी पर लटका दिया जाएगा. इस से क्या होगा? क्या पंजाब में अब शांति है.

‘‘जुलियस रिबेरो को पद्मश्री से अलंकृत कर दिया गया तो क्या उन की राइफलों में नई गोलियां आ गईं? पंजाब सरकार बरखास्त हो गई तो क्या आतंकवाद दब गया. सबकुछ वैसा ही चल रहा है.

‘‘राजनीति की शतरंज की चालें चली जाती रहेंगी और घाघ मुहरों के घर बदलते रहेंगे, पर मुहरे वही रहेंगे. धर्मनिरपेक्ष समाजवाद, लोकतंत्रीय संविधान, बीस सूत्री कार्यक्रम सब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम भी अपनी जगह ठीक हैं.

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‘‘कल्लू भाई की अपनी राजनीति है, अपना पैंतरा है, लेकिन वह हमारे लिए काम का आदमी है. बड़ा जीवट वाला आदमी है. देखो, उस दिन कालीप्रसाद को बुलाने भेजा तो उसे गिरेबान पकड़ कर घसीटता हुआ ले आया. कालीप्रसाद जैसे धाकड़ और झगड़ालू आदमी के गिरेबान पर हाथ डालना कोई हंसीखेल नहीं है, नरेंद्र.’’

चौधरी साहब आ गए नेताओं वाली भाषण मुद्रा में. लेकिन तभी चपरासी बुद्धा अंदर आया. बोला, ‘‘साहब, दिल्लीपुरा के ठाकुर लोग आए हैं.’’

चौधरी साहब ने उन्हें अंदर भेजने का संकेत किया. कीमती खादी के कपड़ों में झकाझक तड़कभड़क के साथ 5 विशिष्ट व्यक्तियों ने प्रवेश किया.

चौधरी साहब का इशारा समझ कर सभी साथी बाहर खिसक गए. कुछ देर तक कुशलक्षेम चलता रहा.

‘‘साहब, वह आप का पुलिसिया कुत्ता था, अब वह कैसा है?’’

‘‘अरे भाई, किस पुलिसिए कुत्ते की बात कर रहे हो. उस के बाद तो मैं 7 कुत्ते बदल चुका.’’

अभ्यागतों में रमन नामक सदस्य भी था. वह सोचने लगा, ‘कुत्ते नहीं हुए, चप्पलें हो गईं. 1 साल में 7 कुत्ते बदल डाले.’

उधर चौधरी साहब पूछताछ करने लगे, ‘‘हरदयालजी, वह आप के भतीजे की बहू का कुछ चक्कर था… मामला सिमट गया कि नहीं?’’

‘‘नहीं, साहब. उस में कुछ गड़बड़ हो गई. हम समझे थे कि बलात्कार का मामला दर्ज कराएंगे. बहू पढ़ीलिखी है. साहस के साथ कह देगी कि दुर्गा ने उस के साथ जबरदस्ती की.

‘‘लेकिन बहू पहले दिन ही अदालत में घबरा गई और रोने लगी. वकीलों ने जिरह कर उसे और भी बौखला दिया. फिर बाद में कुछ मामला बना भी तो गवाह बिक चुके थे.

‘‘मुरली बाबू ने कुछ टुकड़े फेंक कर उन्हें खरीद लिया, लेकिन चौधरी साहब, एक बाजी जिच भी हो गई तो क्या अगली मात तो हम ही देंगे.’’

‘‘वह कैसे?’’ चौधरी साहब ने दोनों पैर सोफे पर खींच लिए. तभी अवधनारायण ने उठ कर उन की धोती ठीक कर दी.

हरदयाल अपना नक्शा समझाने लगे, ‘‘ ‘अपनी धरती’ अखबार का संपादक है न, शंभूप्रसाद. वह अपना यार है. कुछ मामला उस से बना है. उसी के आदमियों ने कुछ तसवीरें खींची हैं. गुलजार रेस्तरां में शराब पीते हुए, मालतीमाधवी के साथ रंगरलियां मनाते हुए, मार्क्सवादी नेता अर्जुनकुमार के साथ शतरंज खेलते हुए. बस, उन्हीं सब तसवीरों के आधार पर एक कहानी बन गई. यही फिल्म उस की असलियत खोल कर रख देगी.’’

Serial Story- रिश्तों से परे: भाग 2

सलिल ने बड़ी प्रसन्नता से बांड पर हस्ताक्षर कर के कम से कम 4 वर्ष तो वहीं रुकने का इंतजाम कर लिया था. शिक्षा के क्षेत्र में होने के कारण उन की इच्छा थी कि उन की पत्नी विनीता यानी विनी भी शिक्षा में ही रहे. काम तो करना ही था फिर इधरउधर भटकते हुए स्टोर, मौल अथवा किसी और जगह क्यों…. क्यों नहीं शिक्षा के क्षेत्र में? विनी ने न जाने कैसेकैसे स्कूल में एक साल पूरा किया…हरेक सांस में वह अपने स्वतंत्र होने की बात सोचती पर सलिल उस के निर्णय से बिलकुल खुश नहीं थे. वह कहते, ‘‘सीढ़ी पर चढ़ने के लिए पहला कदम ही मुश्किल होता है. जैसे एक साल गुजरा, 2-4 साल में तो आदी हो जाओगी इस वातावरण की.’’

विनी का दिल धड़क उठा. पति की नाराजगी उस से बहुत कुछ कह गई. वह कमजोर बन गई और चाहते हुए भी त्यागपत्र न दे सकी. छुट्टियों में भारत आ कर जब वह मां के गले मिली तो मानो उस की हिचकियों का बांध टूट कर मां के दिल में समा गया. मां भी क्या कर सकती थीं… इंगलैंड लौटने पर सलिल ने उसे खुशखबरी दी.

‘‘डोरिथी मेरे काम से इतनी खुश है कि उस ने मुझे प्रमोट करने का प्रस्ताव रखा है और अब हम अपना घर खरीदने जा रहे हैं.’’ इतनी जल्दी घर? यह सवाल मन में कौंधा पर वह कुछ बोली नहीं. प्रसन्नता और सफलता में डूबे पति का चेहरा निहारती रही. उस की अपनी क्या कीमत है? उस ने सोचा, सभी फैसले सलिल के ही तो होेते हैं. वह तो बस, कठपुतली या मशीन की भांति वही सब करती है जो सलिल चाहते हैं.

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बेमन से विनी बच्चों और सलिल के साथ घर देखने गई. डोरिथी ने ‘रिकमेंड’ किया था, वह बौस थी सलिल की और उसे अपने पास ही रखना चाहती थी. जल्दी ही वह पूरे परिवार सहित अपने घर में ‘शिफ्ट’ हो गई. घर सुंदर था, पूरे साजोसामान सहित बड़े ही कम ‘इंस्टालमेंट’ पर घर मिल गया था, जो सलिल की तनख्वाह से ही हर माह कटता रहेगा. अब तो उस के लिए अधिक कमाना और भी आवश्यक हो गया था. घर में आने के अगले दिन जैसे ही विनी ने सो कर उठने के बाद बेडरू म की खिड़की का परदा उठाया, उसे चक्कर आ गया. घर के ठीक सामने जेड खड़ी थी, किसी लड़के से चिपट कर. 2 मिनट वह सुन्न सी खड़ी देखती रही फिर लड़के के साथ जब जेड सामने वाले घर के अंदर चली गई तब वह टूटे हुए पैरों से घिसट कर पलंग पर आ पड़ी.

शनिवार छुट्टी का दिन था व अगले दिन रविवार…2 दिन की छुट्टियों में वह आसपास घूमफिर कर देखना चाहती थी. कार्नर शौप, शौपिंग मौल्स, लाइबे्ररी, सब के बारे में पता करना चाहती थी पर उस के तो पैर ही मानो बर्फ के हो गए थे. उस ने एक नजर सलिल पर डाली, जो चैन की नींद, प्रसन्नवदन सो रहे थे. धीरे से उठ कर उस ने स्वयं को संभालने की चेष्टा की. शीघ्र ही विनी को पता चला कि जेड उसी घर में रहती है, अपनी मां व अपनी 2 सौतेली छोटी बहनों के साथ. उस की मां का बौयफें्रड जब भी आता है, दोनों छोटी बहनों और उस की मां को अपने साथ बाहर ले जाता है. एक दिन विनी ने सुना, उस की मां का बौयफ्रेंड जेड को सब के साथ चलने के लिए कह रहा था और वह चिल्ला रही थी :

‘नहीं, तुम मेरे पिता नहीं हो, मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती.’ कुछ देर बाद ही गाड़ी जेड के सिवा सब को ले कर फर्राटे से निकल गई और जेड का दोस्त उसे ले कर अपने से चिपटाते हुए घर में घुस गया.

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विनी का धैर्य जवाब देने लगा. अपने बच्चों को कैसे इस वातावरण में रख सकेगी? अब तो जेड ने यहां पर भी बदतमीजी शुरू कर दी थी. वह उस की बेटी को चिल्लाचिल्ला कर ‘बिच’ बोलती, गालियां बकती, ‘गो बैक टू योर इंडिया…’ और न जाने क्याक्या.

विनी व सलिल बच्चों को समझाते रहते थे. भारत से सलिल के मातापिता भी बच्चों की देखभाल के लिए वहीं आ गए थे. 4 बेडरूम वाले इस घर में जगह ठीकठाक ही थी अत: इस जेड नामक अशांति के अलावा सब ठीक ही चल रहा था. अब कभीकभी जेड अपने बौयफें्रड के साथ निकल कर दरवाजे की घंटी दबा जाती, कभी उस के बेटे कुणाल को साइकिल चलाते हुए देख कर जूता मार देती, फिर दोनों खिलखिला कर मजाक करते, गालियां देते निकल जाते. अब तो यह रोज का कार्यक्रम बन गया था और अनमनी सी विनी बच्चों के लिए हर क्षण भयभीत बनी रहती. जेड की बदतमीजी हद से अधिक बढ़ जाने से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. अब स्कूल में शांति थी परंतु घर में तो वही अशांति बन कर उस के समक्ष रहती थी. वह कपड़ों की तरह लड़के बदलती और उन के साथ घूमती रहती.

Serial Story- रिश्तों से परे: भाग 3

विनी को उस की मां पर आश्चर्य होता, मानो कोई सरोकार ही नहीं. साल दर साल गुजरते रहे और सबकुछ उसी प्रकार चलता रहा. जेड और परिपक्व दिखाई देने लगी थी. हर साल छुट्टियों में विनी अपने पूरे परिवार सहित मुंबई आती. इस साल सलिल के मातापिता ने बच्चों को अपने साथ दिल्ली ले जाने और उन की बूआ के पास कुछ दिन ठहरने का प्रस्ताव रखा. सलिल को भी उस की बहन बारबार बुलाती थीं, सो सलिल, बच्चे एवं उस के मातापिता दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे जबकि विनी को 2 दिन बाद की टिकट मिली थी. वह मुंबई हवाई अड्डे पर उतरी तो वहां जेड को देख कर आश्चर्य से उस का मुंह खुला रह गया. हवाई जहाज से उतरते समय जेड का पैर न जाने कैसे फिसल गया था और वह किसी चीज से उलझ कर औंधेमुंह जा गिरी थी. खून से लथपथ उस को देखते ही विनी उस के पास जा पहुंची. अचानक ही ढेरों सवाल उस के जेहन में कुलबुलाने लगे. उस के साथ कोई नहीं था, कैसे और क्यों वह यहां अकेले आई थी?

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भारत और भारतीयों के लिए मन मेें ढेरों कटुता भरे हुए वह यहां आखिर करने क्या आई थी? इस सवाल को मन में रख कर विनी ने हवाई अड्डे के प्रबंधकों से जेड के साथ स्वयं भी अस्पताल चलने का आग्रह किया. विनी के भाईभाभी उसे लेने पहुंचे हुए थे, वह भी विनी के साथ अस्पताल पहुंचे. जेड का काफी खून निकल गया और उसे खून की जरूरत थी. जब विनी को पता चला कि जेड का ब्लड ग्रुप ‘बी पौजिटिव’ है तो उस ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे उस का खून ले लें क्योंकि उस का भी वही ग्रुप था. देखते ही देखते विनी का खून जेड की नसों में दौड़ने लगा. जेड अब भी बेहोश थी. विनी ने अस्पताल में अपना टेलीफोन नंबर लिखवा कर प्रार्थना की कि कृपया घायल की स्थिति से उसे अवगत कराया जाए. अस्पताल में बहुत सी औप- चारिकताएं पूरी करनी थीं, सो विनी को बताना पड़ा कि वह उसे किस प्रकार जानती है और फार्म पर अपने हस्ताक्षर भी किए.

दूसरे दिन जब जेड को होश आया तब विनी उस के सामने ही थी. अब जेड के आश्चर्य का ठिकाना न था. उस के आंसुओं के आवेग को विनी ने बहुत मुश्किल से बंद कराया, फिर जो जेड ने बताया वह और भी चौंका देने वाला था.

जेड को अभी कुछ दिन पहले ही पता चला था कि वह एक भारतीय पिता की बेटी है और उस के पिता कहीं मुंबई में ही थे. उन का पता ले कर अपनी मां की सहायता से जेड भारत आई थी. पिता से मिलने की उत्सुकता ने मानो उस में पंख लगा दिए थे. अस्पताल के अधिकारी उस के पिता को सूचित कर चुके थे. जेड, विनी का हाथ पकड़े पश्चात्ताप के आंसुओं से अपना मुख भिगोती रही और विनी शब्दहीन रह कर उसे सांत्वना देती रही. जेड के पिता बेटी से मिलने विनी की मौजूदगी में ही आए थे. साथ उन की पत्नी और 2 बच्चे भी थे. भावावेश में आ कर उन्होंने जेड को अपने सीने से चिपटा लिया पर जेड की तेज तर्रार आंखों ने उन की पत्नी की उदासीनता को भांप लिया.

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‘‘आई जस्ट वांटेड टू सी यू डैड,’’ जेड हिचकियों के बीच बोली. वह जानती थी कि उस परिवार में उस का मन से स्वागत नहीं किया जाएगा. पिता के जाने के बाद उस ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि विनी पर डाली. विनी ने उस का हाथ थपथपा कर सांत्वना दी. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह उसे अपने घर ले गई, जहां जेड के पिता उस से मिलने कई बार आए.

अतीत के गलियारों में भटकना छोड़ कर जेड अब विनी के बेहद करीब आ गई थी, इतनी कि विनी के गले से चिपट गई. ‘‘आई वांट टू बी लाइक यू…. मैम,’’ पश्चात्ताप के आंसुओं ने जेड के दिलोदिमाग में अविश्वसनीय परिवर्तन भर दिया था.

कंठ अवरुद्ध होने के कारण जेड ने घूम कर विनी की ओर अपनी पीठ कर ली और तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली.

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