विस्मृत होता अतीत – भाग 1: शादी से पहले क्या हुआ था विभा के साथ

काफीदिनों के बाद अपना फेसबुक पेज अपडेट कर ही रही थी कि चैंटिंग विंडो पर ‘हाई’ शब्द ब्लिंक हुआ. पहले तो मैं ने ध्यान नहीं दिया, मगर बारबार ब्लिंक होने पर देखा तो कोई महोदय चैट करने को आतुर दिखाई दे रहे थे. निश्चित ही मेरी फ्रैंड्स लिस्ट में से यह कोई व्यक्ति था. उस से बात करने से पहले मैं ने उस का प्रोफाइल टटोला. नाम कौशल था. मैं ने चैट करने से परहेज किया, क्योंकि मैं चैट करने में रुचि नहीं रखती, पर यह तो कोई ढीठ बंदा था.

थोड़ी देर बाद उस ने मैसेज भेजा, ‘हाऊ आर यू मैम…?’ अब मुझे भी लगा कि जवाब न देना शिष्टाचार के विरुद्ध होगा. अत: अनमने ढंग से ‘हाई, फाइन’ लिखा. मेरी कोशिश यही थी कि उसे चैट के लिए हतोत्साहित किया जाए. मैं ने स्वयं को व्यस्त दिखाने की कोशिश की. फिर से मैसेज उभरा, ‘लगता है मैम बिजी हैं…?’ मेरे संक्षिप्त जवाब ‘हां’ से उस ने फिर मैसेज भेजा, ‘ओके… मैम. सम अदर टाइम.’ मैं ने भी ‘ओह’ लिख कर चैन की सांस ली ही थी कि डोरबैल बजी. घड़ी में देखा तो शाम के 6 बज रहे थे. लगता है राजीव औफिस से लौट आए थे.

जैसे ही दरवाजा खोला, ‘‘और क्या चल रहा है मैडम…?’’ राजीव ने कहा. उन्हें जब मुझे चिढ़ाना होता है तो वे इस शब्द का इस्तेमाल

करते हैं. वे जानते हैं कि मैं मैडम शब्द से बहुत चिढ़ती हूं.

‘‘कोई खास बात नहीं, बस नैट पर सर्फिंग कर रही थी…’’ मैं ने थोड़ा चिढ़ कर ही जवाब दिया. राजीव मुसकराए. मैं उन की इसी मुसकराहट पर फिदा थी. मेरा गुस्सा एकदम गायब हो चुका था. राजीव जानते थे कि मेरे गुस्से को कैसे कम किया जा सकता है. इसलिए वे मुझे चिढ़ाने के बाद अकसर अपनी जानलेवा मुसकराहट से काम लिया करते थे.

‘‘अच्छा यार, अदरक वाली चाय तो पिलाओ… और इस रिमझिम बारिश में गरमगरम पकौड़े हो जाएं तो अपना दिन… अरे नहीं शाम बन जाएगी…’’ उन की फ्लर्टिंग पर मुझे हंसी आ गई. बाहर वास्तव में बारिश हो रही थी. घर के अंदर होने से मेरा ध्यान ही नहीं गया था. मैं जल्दी से चाय और पकौड़े बनाने लगी और राजीव फ्रैश होने चले गए. उन्होंने हम दोनों की पसंदीदा जगह यानी बालकनी में चाय पीने की फरमाइश की. चाय पीतेपीते वे बड़े खुशगवार मूड में दिखे.

मुझ से रहा नहीं गया, ‘‘क्या बात है जनाब… बड़े मूड में लग रहे हैं…’’ मैं ने जानना चाहा.

‘‘अरे वाह कैसे जाना…,’’ वे थोड़ा हैरत से बोले.

‘‘आप की बैटरहाफ हूं. 15 सालों में इतना भी नहीं जानूंगी…?’’ थोड़ा इतराते हुए मैं ने कहा.

‘‘हां, बात तो तुम्हारी ठीक है,’’ वे थोड़ा गंभीर हो कर बोले.

कुछ देर हम दोनों चुपचाप चाय और पकौड़े का स्वाद लेते रहे. राजीव थोड़ी देर बाद मेरी ओर देख कर शरारत में मुसकराए और मैं उन का मंतव्य समझ गई.

‘‘कोई शरारत नहीं जनाब…,’’ मैं ने शरमाते हुए कहा. फिर हम घर के इंटीरियर के बारे में बात करने लगे. पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था. इस नए फ्लैट में हम हाल ही में शिफ्ट हुए थे. घर का फाइनल टचअप बाकी था. राजीव और बच्चों में इसी बात को ले कर तकरार चल रही थी कि किस कमरे में कौन सा पेंट करवाया जाए. इसी बीच बेटा शुभांग और बेटी शिवानी भी आ गए. जिन्होंने जिद की तो राजीव उन्हें ले कर बाजार चले गए. मैं ने बहुत रोका कि पानी बरस रहा है पर बच्चों के उत्साह के आगे उन्हें सब फीका लगा. उन्होंने कार गैराज से निकाली और मुझे भी साथ चलने को कहा, पर मैं अस्तव्यस्त पड़े घर को ठीक करने की सोच कर रुक गई.

काम निबटा कर जैसे ही फ्री हुई तो लैपटौप पर निगाह गई तो सोचा कि क्यों न कुछ सर्फिंग हो जाए. अब जब इंटरनैट खोला तो खुद को फेसबुक ओपन करने से रोक नहीं पाई. अभी कुछ टाइप कर ही रही थी कि कौशल महोदय ‘हाई और हैलो’ के साथ हाजिर नजर आए. कुछ खास काम तो था नहीं और सोचा राजीव और बच्चे न जाने कितनी देर में आएंगे, तो इन्हीं कौशलजी से थोड़ी देर चैट कर लिया जाए.

मैं ने भी उसे हैलो किया और चैट करना शुरू किया तो उस ने अचानक मुझ से सवाल किया, ‘क्या आप तितली हैं…?’ मैं असमंजस में पड़ गई कि भला यह क्या सवाल हुआ…? उस ने मेरा ध्यान मेरी प्रोफाइल पिक्चर की ओर दिलवाया. इस बात पर मैं ने कभी ध्यान ही नहीं दिया था. मुझे वह इमेज अच्छी लगी थी तो मैं ने उसे डाल दिया था. जब उस ने इसी बात को एक बार और पूछा तो मैं चिढ़ सी गई और बहाना बना कर लौगआउट कर लिया. मुझे गुस्सा भी आ रहा था कि इस बंदे को अपनी फ्रैंड्स लिस्ट से डिलीट कर दूं. अगली बार ऐसा ही करूंगी सोच कर मैं उठ गई और रात के खाने की तैयारी में जुट गई.

आने वाले कई दिनों तक हम घर की साजसज्जा में लगे रहे. घर के इंटीरियर का काम लगभग पूरा हो चुका था. आज घर पूरी तरह से सज चुका था और अब ऐसा लग रहा था कि मानों कंधों पर से कोई बोझ उतर गया हो. चूंकि बच्चे और राजीव घर पर नहीं थे तो थोड़ा रिलैक्स होने के लिए सोचा क्यों न नैट खोल कर बैठूं. अपना मेल चैक कर रही थी तो कुछ खास नहीं था सिवाय एरमा के मेल के.

उस ने मेल किया था कि उसे उसे नई जौब मिल गई है और वह लौसएंजिल्स शिफ्ट हो रही थी. उस ने बताया कि वह कंपनी की तरफ से बहुत जल्दी इंडिया भी आएगी. मैं ने उसे बधाई दी और उसे अपने घर आ कर ठहरने का न्योता भी दिया. एरमा मेरी फेसबुक फ्रैंड थी. मेल चैक करने के बाद एक बार फिर फेसबुक ओपन किया तो देखा तो मैसेजेस का ढेर लगा पड़ा था. मुझे आज तक इतने मैसेज कभी भी नहीं आए थे. जब खोला 7-8 मैसेज तो कौशल महोदय के थे. ‘हाई, कैसे हैं आप…?’, ‘नाराज हैं क्या…?’, ‘आप फेसबुक पर नहीं आ रहीं…’ इत्यादिइत्यादि. ये सब देख कर मेरा मूड खराब हो गया.

 

Mother’s Day Special- प्रश्नों के घेरे में मां: भाग 1

अरु भाभी और शशांक भैया के चेहरे के उठतेगिरते भावों को पढ़तेपढ़ते मैं सोच रही थी कि बंद मुट्ठी में रेत की तरह जब सबकुछ फिसल जाता है तब क्यों इनसान चेतता है?

बीच में ही बात काटते हुए शशांक बोल पडे़ थे, ‘नहीं डाक्टर अवस्थी, ऐसा नहीं कि हम लोग निधि को प्यार नहीं करते या हमेशा उसे मारतेपीटते ही रहते हैं. समस्या तो यह है कि निधि बहुत गंदी बातें सीख रही है.’

नन्ही निधि का छोटा सा बचपन मेरी आंखों के सामने कौंध उठा. घटनाएं चलचित्र की तरह आंखों के परदे पर आजा रही थीं.

उस दिन तेज बरसात हो रही थी. ओले भी गिर रहे थे. पड़ोस के मकान से जोरजोर से आती आवाजें सुन कर मेरा दिल दहल उठा. शशांक कह रहे थे, ‘बदमिजाज लड़की, साफसाफ बता, क्या चाहती है तू? क्या इस नन्ही सी जान की जान लेना चाहती है. छोटी बहन आई है यह नहीं कि खुद को सीनियर समझ कर उस की देखभाल करे. हर समय मारपीट पर ही उतारू रहती है.’

कमरे में गूंजती बेरहम आवाजें बाहर तक सुनाई पड़ रही थीं. निधि की कराह के साथ पूरे वेग से फूटती रुलाई को साफसाफ सुना जा सकता था.

‘पापा प्लीज, मुझे मत मारो. ऐसा मैं ने किया क्या है?’

‘पूरा का पूरा रोटी का टुकड़ा सीमा के मुंह में ठूंस दिया और पूछती है किया क्या है? देखा नहीं कैसे आंखें फट गई थीं उस बेचारी की?’

‘पापा, मैं ने सोचा सब ने नाश्ता कर लिया है. गुड्डी भूखी होगी,’ रोंआसी आवाज में अंदर की ताकत बटोरते हुए निधि ने सफाई सी दी.

‘एक माह की बच्ची रोटी खाएगी, अरी, अक्ल की दुश्मन, वह तो सिर्फ मां का दूध पीती है,’ आंखें तरेरते हुए शशांक बिफर उठे और एक थप्पड़ निधि के गाल पर जड़ दिया.

उस घर में जब से सीमा का जन्म हुआ था. ऐसा अकसर होने लगा था और वह बेचारी पिट जाती थी.

निधि का आर्तनाद सुन कर मैं सोचती कि ये कैसे मांबाप हैं जो इतना भी नहीं समझ पाते कि ऐसा क्रूर और कठोर व्यवहार बच्चे की कोमल भावनाओं को समाप्त करता चला जाएगा.

निधि बचपन से ही मेरे घर आया करती थी. जिस दिन अरु अस्पताल से सीमा को ले कर घर आई, वह बेहद खुश थी. दादी की मदद ले कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उस ने पूरे कमरे में रंगबिरंगे खिलौने सजा दिए.

सीमा का नामकरण संस्कार संपन्न हुआ. मेहमान अपनेअपने घर चले गए थे. परिवार के लोग बैठक में जमा हो कर गपशप में मशगूल थे. निधि भी सब के बीच बैठी हुई थी. अचानक अपनी गोलगोल आंखें मटका कर बालसुलभ उत्सुकता से उस ने मां की तरफ देख कर पूछ लिया, ‘मां, मेरा भी नामकरण ऐसे ही हुआ था?’

‘ऊं हूं,’ चिढ़ाने के लिए उस ने कहा, ‘तुम्हें तो मैं फुटपाथ से उठा कर लाई थी.’

निधि को विश्वास नहीं हुआ तो दोबारा प्रश्न किया, ‘सच, मम्मी?’

अरु ने निधि की बात को सुनी- अनसुनी कर सीमा के नैपीज और फीडर उठाए और अपने कमरे में चली गई.

अगले दिन 10 बजे तक जब निधि सो कर नहीं उठी, तब अरु का ध्यान बेटी की तरफ गया. उस ने जा कर देखा तो पता चला कि तेज बुखार से निधि का पूरा शरीर तप रहा था. आंखों के डोरे लाल थे. कपोलों पर सूखे आंसुओं की परत जमा थी. अरु ने पुचकार कर पूछा, ‘तबीयत खराब है या किसी ने कुछ कहा है?’

निधि ने मां की किसी भी बात का उत्तर नहीं दिया.

निधि का बुखार तो ठीक हो गया पर अब वह हर समय गुमसुम सी बैठी रहती थी. घर में वह न तो किसी से कुछ कहती, न ज्यादा बात ही करती थी. अपने कमरे में पड़ीपड़ी घंटों किताब के पन्ने पलटती रहती. घर के सभी सदस्य यही समझते कि निधि पहले से ज्यादा मन लगा कर पढ़ने लगी है.

एक दिन सीमा को तेज बुखार चढ़ गया. दादी और शशांक दोनों घर पर नहीं थे. अरु समझ नहीं पा रही थी कि सीमा को ले कर कैसे डाक्टर के पास जाए. तभी निधि स्कूल से आ गई. उसे भी हरारत के साथ खांसीजुकाम था. अरु सीमा को निधि के हवाले कर डाक्टर के पास दवाई लेने चली गई. वापस लौटी तो सीमा के लिए ढेर सारी दवाइयां और टानिक थे पर उस में निधि के लिए कोई दवा नहीं थी.

शाम को शशांक और दादी लौट आए. कोई सीमा की पेशानी पर हाथ रखता, कोई गोदी में ले कर पुचकारता. मां पानी की पट्टियां सीमा के माथे पर रखती जा रही थीं पर किसी ने निधि की ओर ध्यान नहीं दिया.

शाम को सीमा थोड़ी ठीक हुई तो अरु उसे गोद में ले कर बालकनी में आ गई. मैं भी कुछ पड़ोसिनों के साथ अपनी बालकनी में बैठी थी. अचानक निधि ने एक छोटा सा पत्थर उठा कर नीचे फेंक दिया तो प्रतिक्रिया में अरु जोर से चिल्लाई, ‘निधि, चल इधर, वहां क्या देख रही है? छत से पत्थर क्यों फेंका?’

अरु की तेज आवाज सुन कर मेरे साथ बैठी एक पड़ोसिन ने कहा, ‘रहने दीजिए भाभीजी, बच्चा है.’

‘ऐसे ही तो बच्चे बिगड़ते हैं. यदि अभी से नहीं रोका तो सिर पर चढ़ कर बोलेगी,’ अरु की आवाज में चिड़- चिड़ापन साफ झलक रहा था.

मैं निधि के बारे में सोचने लगी थी कि उसे भी तो सीमा की तरह बुखार था. उस का भी तो मन कर रहा होगा कोई उसे पुचकारे, उस की तबीयत के बारे में पूछे. क्योंकि सीमा के जन्म से पहले उस के शरीर पर लगी छोटी सी खरोंच भी पूरे परिवार को चिंता में डाल देती थी. लेकिन इस समय सभी सीमा की तबीयत को ले कर चिंतित थे और निधि को अपने घर वालों की उपेक्षा बरदाश्त नहीं हो पा रही थी.

अम्मा- भाग 1: आखिर अम्मा वृद्धाश्रम में क्यों रहना चाहती थी

सब से बड़ी बात-बड़ों की जिंदगी का अनुभव कितनी समस्याओं को सुलझा देता है. लेकिन आज अम्मां वृद्धाश्रम में थीं. क्या वृद्धाश्रम से वापस घर आना उन्हें मंजूर हुआ? आफिस से फोन कर अजय ने नीरा को बताया कि मैं  आनंदधाम जा रहा हूं, तो उस के मन में विचारों की बाढ़ सी आ गई. आनंदधाम यानी वृद्धाश्रम. शहर के एक कोने में स्थित है यह आश्रम. यहां ऐसे बेसहारा, लाचार वृद्धों को शरण मिलती है जिन की देखभाल करने वाला अपना इस संसार में कोई नहीं होता. रोजमर्रा की सारी सुविधाएं यहां प्रदान तो की जाती हैं पर बदले में मोटी रकम भी वसूली जाती है.

बिना किसी पूर्व सूचना के क्यों जा रहा है अजय आनंदधाम? जरूर कोई गंभीर बात होगी.

यह सोच कर नीरा कार में बैठी और अजय के दफ्तर पहुंच गई. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, सब खैरियत तो है?’’

‘‘नीरा, अम्मां, पिछले 1 साल से आनंदधाम में रह रही हैं. आश्रम से महंतजी का फोन आया था. गुसलखाने में फिसल कर गिर पड़ी हैं.’’

अजय की आवाज के भारीपन से ही नीरा ने अंदाजा लगा लिया था कि अम्मां के अलगाव से मन में दबीढकी भावनाएं इस पल जीवंत हो उठी हैं.

‘‘हम चलते हैं, अजय. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘अच्छा होगा मां को यदि किसी विशेषज्ञ को दिखाएं.’’

‘‘ठीक है, रुपए बैंक से निकलवा कर चलते हैं. पता नहीं कब कितने की जरूरत पड़ जाए,’’ सांत्वना के स्वर में नीरा ने कहा तो अजय को तसल्ली हुई.

‘‘मैं तो इस घटना को सुनने के बाद इतना परेशान हो गया था कि रुपयों का मुझे खयाल ही नहीं आया. प्राइवेट अस्पताल में रुपए की तो जरूरत पड़ेगी ही.’’

कुछ ही समय में नीरा रुपए ले कर आ गई. कार स्टार्ट करते ही पत्नी की बगल में बैठे अजय की यादों में 1 साल पहले का वह दृश्य सजीव हो उठा जब तिर्यक कुटिल दृष्टि से नीरा ने अम्मां को इतना अपमानित किया था कि वह चुपचाप अपना सामान बांध कर घर से चली गई थीं.

जातेजाते भी अम्मां की तीक्ष्ण दृष्टि नीरा पर टिक गई थी.

‘अजय, मेरी जिंदगी बची ही कितनी  है? मेरे लिए तू अपनी गृहस्थी में दरार मत डाल,’ अम्मां की गंभीर आवाज और अभिजात दर्पमंडित व्यक्तित्व की छाप वह आज तक अपने मानसपटल से कहां मिटा पाया था.

‘जाना तो अम्मां सभी को है… और रही दरार की बात, तो वह तो कब की पड़ चुकी है. अब कहीं वह दरार खाई में न बदल जाए. यह सोच लीजिए,’ अम्मां के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई नीरा बोली. वह तो इसी इंतजार में बैठी थी कि कब अम्मां घर छोडे़ं और उसे संपूर्ण सफलता हासिल हो.

कहीं अजय की भावुकता अम्मां के पैरों में पुत्र प्रेम की बेडि़यां डाल कर उन्हें रोक न ले, इस बात का डर था नीरा को इसलिए भी वह और अधिक तल्ख हो गई थी.

अगले ही दिन अजय ने फोन पर कुटिल हंसी की खनक में डूबी और बुलंद आवाज की गहराई में उभरते दंभ की झलक के साथ नीरा को किसी से बात करते सुना:

‘जिंदगी भर अब पास न फटकने देने का इंतजाम कर लिया है. कुशलक्षेम पूछना तो दूर, अजय श्राद्ध तक नहीं करेगा अम्मां का.’

उस दिन पत्नी के शब्दों ने अजय को झकझोर कर रख दिया था. समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो गया. पर जब आंखों से परदा हटा तो उस ने निर्णय लिया कि किसी भी हाल में अम्मां को जाने नहीं देगा. रोया, गिड़गिड़ाया, हाथ जोडे़, पैर छुए, पर अम्मां रुकी नहीं थीं. दयनीय बनना उन की फितरत में नहीं था. स्वाभिमानी शुरू से ही थीं.

अम्मां के जाने के बाद उन के तकिए के नीचे से एक लिफाफा मिला था. लिखा था, ‘इनसान क्यों अपनेआप को परिवार की माला में पिरोता है? इसीलिए न कि परिवार का हर संबंधी एकदूसरे के लिए सुखदुख का साथी बने. लेकिन जब वक्त और रिश्तों के खिंचाव से परिवार की डोर टूटने लगे तो अकेले मोती की तरह इधरउधर डोलने या अपने इर्दगिर्द बने सन्नाटे में दुबक जाने के बजाय वहां से हट जाना बेहतर होता है.

‘हमेशा के लिए नहीं, कुछ समय के लिए ही जा रही हूं पर यह समय, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ सालों का भी हो सकता है. दिल से दिल के तार जुड़े होते हैं और ये तार जब झंकृत होते हैं तो पता चल जाता है कि हमें किसी ने याद किया है. जिस पल हमें ऐसा महसूस होगा, हम जरूर मिलेंगे, अम्मां.’

तेज बारिश हो रही थी. गाड़ी से बाहर देखने की कोशिश में अजय ने अपना चेहरा खिड़की के शीशे से सटा दिया. बाहर खिड़की के कांच पर गिर रही एकएक बूंद धीरेधीरे एकसाथ मिल कर पूरे कांच को ढक देती थी. जरा सा कांच पोंछने पर अजय को हर बार एक चेहरा दिखाई देता था. ढेर सारा वात्सल्य समेटे, झुर्रियों भरा वह चेहरा, जिस ने उसे प्यार दिया, 9 माह अपनी कोख में रखा, अपने रक्तमांस से सींचा, आंचल की छांव दी. उस का स्वास्थ्य, उस की पढ़ाई, उस की खुशी, अम्मां की पूरी दुनिया ही अजय के इर्दगिर्द सिमटी थी.

जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में नीरा और अजय विवाह सूत्र में बंधे थे उन हालात में नीरा को परिवार का अंश बनने के लिए अम्मां को न जाने कितना संघर्ष करना पड़ा था.

लाखों रुपए के दहेज का प्रस्ताव ले कर, कई संपन्न परिवारों से अजय के लिए रिश्ते आए थे, पर अम्मां ने बेटे की पसंद को ही सर्वोपरि माना. अम्मां यही दोहराती रहीं कि गरीब घर की लड़की अधिक संवेदनशील होगी. घर का वातावरण सुखमय बनाएगी, अच्छी पत्नी और सुघड़ बहू साबित होगी.

पासपड़ोस के अनुभवों, किस्से- कहानियों को सुन कर अजय ने यही निष्कर्ष निकाला था कि बहू के आते ही घर का वातावरण बदल जाता है. अजय का मन किसी अज्ञात आशंका से घिरा है, अम्मां यह समझ गई थीं. बड़ी ही समझदारी से उन्होंने अजय को समझाया था :

‘बेटा, लोग हमेशा बहुओं को ही दोषी ठहराते हैं, पर मेरी समझ में ऐसा होता नहीं है. घर में जब भी कोई नया सामान आता है तो पुराने सामान को हटना ही पड़ता है. नया पत्ता तभी शाख पर लगता है जब पुराना उखड़ता है. जब भी किसी पौधे को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह आरोपित किया जाता है तो वह तभी पुष्पित, पल्लवित होता है जब उसे पर्याप्त मात्रा में खादपानी मिलता है. सामंजस्य, समझौता, समर्पण, दोनों ही पक्षों की तरफ से होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता, तो परिवार बिखरता है.’

अजय आश्वस्त हो गया. अम्मां ने नीरा को प्यार और अपनत्व से और नीरा ने उन्हें सम्मान और कर्तव्यनिष्ठा से अपना लिया. बहू में उन की आत्मा बसती थी. उसे सजतेसंवरते देख अम्मां मुग्धभाव से हिलोरें लेतीं. नीरा की कमियों को कोई गिनवाता तो चट से मोर्चा संभाल लेतीं.

‘मेरी अपर्णा को ही क्या आता था. पर धीरेधीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले, सबकुछ सीखती चली गई.’

1 वर्ष बीततेबीतते अजय जुड़वां बेटों का बाप बन गया. अम्मां के चेहरे पर भारी संतोष की आभा झलक उठी. इसी दिन के लिए ही तो वह जैसे जी रही थीं. अस्पताल के कौरीडोर में नर्सों, डाक्टरों से बातचीत करतीं अम्मां को देख कर कौन कह सकता था कि वह घर से बाहर कभी निकली ही नहीं.

लवकुश नाम रखा उन्होंने अपने पोतों का. 40 दिन तक उन्होंने नीरा को बिस्तर से उठने नहीं दिया. अपर्णा को भी बुलवा भेजा. ननदभौजाई गप्पें मारतीं, अम्मां चौका संभालतीं.

‘अब तो महीना होने को आया. मेरी सास तो 21 दिन बाद ही घर की बागडोर मुझे संभालने को कह कर खुद आराम करती हैं,’ अम्मां की भागदौड़ से परेशान अपर्णा ने कहा तो अम्मां ने बुरा सा मुंह बनाया.

‘तेरी ससुराल में होता होगा. थोड़ा-बहुत काम करने से शरीर में जंग नहीं लगता.’

‘थोड़ाबहुत?’ अपर्णा ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में पूछा था.

‘संयुक्त परिवार की यही  तो परिभाषा है. जरूरत पड़ने पर एकदूसरे के काम आओ. कच्चा शरीर है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई तो जिंदगी भर का रोना.’

सवा महीना बीत गया. अपर्णा अपनी ससुराल लौट रही थी. अम्मांबाबूजी हमेशा भरपूर नेग देते थे. और इस बार तो लवकुश भी आ गए थे. अपर्णा ने मनुहार की. ‘2 दिन बाद तो मैं चली जाऊंगी. अम्मां, एक बार बाजार तो मेरे साथ चलो.’

‘ऐसा कर, अजय दफ्तर के लिए निकले तो दोनों ननदभावज उस के साथ ही निकल जाओ. जो जी चाहे, खरीद लो. पेमेंट बाबूजी कर देंगे.’

‘आप के साथ जाने का मन है, अम्मां. एक दिन भाभी संभाल लेंगी,’ अपर्णा ने मचल कर कहा तो अम्मां की आंखें नम हो आई थीं.

‘फिर कभी सही. तेरे जाने की तैयारी भी तो करनी है.’

जुम्मन और अलगू का बदला – भाग 1

आज अलगू की खुशी देखते ही बनती थी. सुबह से चहकाचहका घूम रहा था और सभी मिलने वालों से बड़ी हंसीखुशी से बात कर रहा था. कहां तो बंदे के चेहरे पर हमेशा एक सर्द खामोशी चस्पां रहती थी, पर आज तो वह बेवजह हंसा जा रहा था. उस के खुश रहने की वजह यह थी कि उस का बचपन का दोस्त जुम्मन वापस जो आ रहा था.

जुम्मन और अलगू एकसाथ खेले और बड़े हुए थे, पर तकरीबन 10 साल पहले ही जुम्मन गांव से शहर की ओर कमाने चला गया था. उस समय जुम्मन की उम्र महज 18 साल थी और अब वह 28 साल का हो गया था.

इन सालों में जुम्मन ने शहर में मोटर मेकैनिक का काम किया और एक से एक महंगी गाड़ी को अच्छे ढंग से  बनाना सीखा. अब तो वह किसी भी गाड़ी के मर्ज को मिनटों में भांप लेता था.

‘‘बाकी तो सब बात सही है, पर मुझे यह बताओ कि तुम गांव छोड़ कर चले गए थे और शहर में तुम्हारा रोजगार भी अच्छा चल रहा था, तब वापस क्यों आ गए?’’ अलगू ने जुम्मन से गले मिलते ही पहला सवाल दाग दिया.

जुम्मन ने अलगू को अपने प्लान के बारे में बताया, ‘‘शहर में रह कर मोटर मेकैनिक का काम करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इस लाइन में होड़ बहुत है. हर गलीमहल्ले में एकाध मेकैनिक मिल जाता है.

‘‘यहां गांव के सामने से ही तो शहर की ओर जाती हुई एक चौड़ी सड़क है, एकदम हाईवे टाइप. बस, इसी रोड के किनारे अपनी कार और मोटरसाइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोलूंगा. सड़क पर गाडि़यों की आवाजाही रहेगी तो काम भी खूब मिलेगा. और फिर जब गांव में ही रोजगार मिल रहा है, तो शहर जाने की क्या जरूरत है?’’

जुम्मन ने बेशक गांव वापस आने के पक्ष में ये सारी दलीलें दे डाली थीं, पर अंदर ही अंदर अलगू अच्छी तरह से जानता था कि हकीकत कुछ और ही है और वह हकीकत थी रन्नो से जुम्मन की मुहब्बत.

जुम्मन और रन्नो शादी करना चाहते हैं, पर दिक्कत यह है कि जुम्मन एक मुसलमान परिवार से है और रन्नो हिंदू लड़की है.

कमबख्त जातपांत का लफड़ा तो रास्ते में रोड़ा बन कर आएगा ही, पर एक बार धंधा अच्छी तरह से जम जाए, तब खुद जा कर जुम्मन शान से रन्नो का हाथ मांग लेगा और अगर लड़की के पिता जातिधर्म की दुहाई देंगे तो उन्हें आज के जमाने की हकीकत से रूबरू कराते हुए बता देगा कि पुराना जमाना बदल रहा है, आजकल हिंदूमुसलिम कोई नहीं देखता, बस अपनी लड़की और लड़के की खुशी का ध्यान रखते हैं  मांबाप.

अगर वे लोग इतनी बात से सबकुछ समझ गए तो ठीक है, नहीं तो फिर जुम्मन और भी कच्चाचिट्ठा खोल देगा और यह बताने से बिलकुल नहीं डरेगा कि इस गांव में दूसरे धर्म की लड़की से प्यार करने वाला वह अकेला नहीं है, बल्कि और लोग भी हैं जो अलग धर्म में मुहब्बत करते हैं और शादी भी करना चाहते हैं.

अरे, फिर तो जुम्मन नाम बताने से भी नहीं चूकेगा, भले ही उस का दोस्त अलगू उस से नाराज हो जाए. अलगू, अरे हां भाई, अलगू ही तो है उस का दोस्त और उसे प्यार है एक मुसलिम लड़की से. अब अलगू को सलमा से प्यार है और सलमा भी तो अलगू से मुहब्बत करती है और यह मुहब्बत कोई जानबूझ कर नहीं की जाती, यह तो बस हो जाती है.

पर यह बात बाहुबली जिगलान को समझ आए तब तो. जिगलान इस गांव में रहने वाला खानदानी ठाकुर था. वह 48 साल का था, पर शरीर में जवानों जैसा कसाव और चेहरे पर ताजगी. उस की तलवारकट मूंछ उसे एक रोबीला इनसान बनाती थी.

हालांकि ठाकुर जिगलान को राजनीति में कोई पद तो हासिल नहीं था, पर बड़ेबड़े नेता उस के पैर छूने आते थे. इस की वजह सिर्फ एक थी कि चुनाव में ठाकुर जिगलान सभी गांव वालों के वोट दिलाने की गारंटी लेता था और बदले में नेता उसे पैसे देते थे.

हालांकि इस गांव में हिंदू तकरीबन 60 फीसदी और मुसलिम तकरीबन 40 फीसदी थे, फिर भी ठाकुर जिगलान ने अपनी इमेज एक सैक्युलर की बना रखी थी, जबकि वह गांव के हिंदूमुसलिमों को आपस में लड़ा कर रखता और अपना उल्लू सीधा करता था.

ठाकुर जिगलान जानता था कि अगर गांव के लोगों में एकता हो गई, तो वह अपनी मरजी गांव के लोगों पर नहीं चला पाएगा.

ठाकुर जिगलान के चारों तरफ उस के चमचे रहते थे, जो गांव की जवान होती लड़कियों पर बुरी नजर रखते थे.  गांव के लोग चाह कर भी इस बात का विरोध नहीं कर पाते थे, क्योंकि ठाकुर जिगलान के पास पैसा भी था और लोगों का समूह भी, जो उस के एक इशारे पर कुछ भी करगुजरने को तैयार रहते थे.

ठाकुर जिगलान अपने इर्दगिर्द इकट्ठे जवान लड़कों की कमजोर नस को अच्छी तरह जानता था और वह कमजोर नस थी दारू और मांस. तकरीबन हर दूसरे दिन ही ठाकुर  जिगलान की बगिया के कोने में बने बड़े से चूल्हे पर मांस पकाया जाता और सूरज डूबतेडूबते दारू और मांस खाने वाले इकट्ठे होने लगते थे.

जब कभी ठाकुर जिगलान का मन किसी लड़की पर आ जाता, तो वह उसे उठवा लेता और रेप कर देता था.कभीकभी तो ठाकुर जिगलान के मुंह लगे मुंशी जानकीदास को हैरानी होती कि साहब खुद इतने रसूख वाले हैं, पर कभीकभी इन्हें न जाने क्या हो जाता है.

खेत में पसीने में तर हो कर काम कर रही होती किसी भी औरत, जिस की खुली पीठ और काली रंगत की कमर कहीं से भी आकर्षक नहीं लग रही होती थी, उसे भी उठवा कर वे उस का रेप करने का मजा लेते हैं. अरे, कम से कम अपना रसूख भी तो देखें.

एक दिन जब 25 साल के जानकीदास से रहा नहीं गया, तो वह ठाकुर जिगलान से कह बैठा और उस की बात का ठाकुर ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘अरे जनकिया, ठकुराई हमें विरासत में मिली है. यह सब करना हमारे खून में है और खून का असर जल्दी नहीं जाता.

‘‘हम जानते हैं कि वह लड़की जाति से छोटी है, फिर भी उस का रेप करते हैं, क्योंकि ये लोग हमारी जांघ के नीचे रहने लायक ही हैं.’’

ठाकुर जिगलान की बात जानकीदास की समझ में आई या नहीं, पर उस ने हां की मुद्रा में अपना सिर जरूर हिला दिया.

ठाकुर जिगलान की पत्नी, जो उम्र में महज 30 साल की थी, खामोशी से यह सब देखा करती थी. उस ने कई बार अपने पति को समझाना भी चाहा तो बदले में ठाकुर की डांट ही मिली और खामोश रहने की ताकीद भी.

बेचारी ठकुराइन समझ गई थी कि खामोशी को उसे अपना सिंगार बनाना होगा. उस ने तो जबान ही सिल ली थी.चूंकि गांव वाले ठाकुर जिगलान के रोब से अच्छी तरह वाकिफ थे, इसलिए लड़कियों के रेप के बाद भी कोई चूं तक नहीं करता और ज्यादातर मामलों में तो लड़की के मांबाप ही लड़की को नहलाधुला कर बैठा लेते और लड़की से भी चुप रहने को कह देते.

बयार बदलाव की- भाग 1 : नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

रमन लिफ्ट से बाहर निकला, पार्किंग से गाड़ी निकाली और घर की तरफ चल दिया. वह इस समय काफी उल?ान में था. रात को 8 बजने वाले थे. वह साढ़े 8 बजे तक औफिस से घर पहुंच जाता था. घर पर नीला उस का बेसब्री से इंतजार कर रही होगी. पर उस का इस समय घर जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. कुछ सोच कर उस ने आगे से यूटर्न लिया और कार दूसरी सड़क पर डाल दी. थोड़ी देर बाद उस ने एक खुली जगह पर कार खड़ी की और पैदल ही समुद्र की तरफ चल दिया.

यह समुद्र का थोड़ा सूना सा किनारा था. किनारा बड़े बड़े पत्थरों से अटा पड़ा था. वह एक पत्थर पर बैठ गया और हिलोरें मारते समुद्र को एकटक निहारने लगा. समुद्र की लहरें किनारे तक आतीं और जो कुछ अपने साथ बहा कर लातीं वह सब किनारे पर पटक कर वापस लौट जातीं. वह बहुत देर तक उन मचलती लहरों को देखता रहा.

देखतेदेखते वह अपने ही खयालों में डूबने लगा. वह दुखी हो, ऐसा नहीं था. पर बहुत ही पसोपेश में था. उस के पिता का फोन आया आज औफिस में. उस के मातापिता अगले हफ्ते एक महीने के लिए उस के पास आने वाले थे. मातापिता के आने की उसे खुशी थी. वह हृदय से चाहता था कि उस के मातापिता उस के पास आएं. पर अपने विवाह के एक साल पूरा होने के बावजूद वह एक बार भी उन्हें अपने पास आने के लिए नहीं कह पाया. कारण कुछ खास भी नहीं था. न उस के मातापिता अशिक्षित या गंवार थे. न उस की पत्नी नीला कर्कश या तेज स्वभाव की थी. फिर भी वह सम?ा नहीं पा रहा था कि उस के मातापिता आधुनिकता के रंग में रंगी उस की पत्नी को किस तरह से लेंगे. यह बात सिर्फ नीला की ही नहीं, बल्कि उस की पूरी पीढ़ी की है. नीला दिल्ली में विवाह से पहले नौकरी करती थी. विवाह के बाद नौकरी छोड़ कर उस के साथ मुंबई आ गईर् थी. यहां वह दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कर रही थी.

नीला हर तरह से अच्छी लड़की थी. कोमल स्वभाव, अच्छे विचारों व प्यार करने वाली लड़की थी. उस के मातापिता के आने से वह खुश ही होगी. लेकिन उस के संस्कारी मातापिता, खासकर उस की मम्मी, नीला की आदतों, उस के रहनसहन के तरीकों को किस तरह से लेंगे, वह सम?ा नहीं पा रहा था.

विवाह के बाद वह चंडीगढ़ अपने मातापिता के पास थोड़ेथोड़े दिनों के लिए 2 बार ही गया था. मम्मी और नीला की अधिकतर बातें फोन से ही होती थीं. मम्मी उस के स्वभाव की बहुत तारीफ करती थीं. नीला भी अपनी सास का बहुत आदर करती थी और उन को पसंद करती थी. पर यह एक महीने का सान्निध्य कहीं उन के बीच की आत्मीयता को खत्म न कर दे, वह इसी उधेड़बुन में था.

नीला देर से सो कर उठती थी. उस के औफिस जाने तक भी कभी वह उठ जाती, कभी सोई रहती थी. नाश्ते में वह सिर्फ दूध व कौर्नफ्लैक्स लेता था. इसलिए वह खुद ही खा कर नीला को दरवाजा बंद करने को कह कर औफिस चला जाता था. उसे मालूम था, नीला की नौकरी लगते ही उस की दिनचर्या बदल जाएगी. फिर उसे जल्दी उठना ही पड़ेगा. अभी शादी को समय ही कितना हुआ है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. वह सारे दिन फ्लैट में अकेली रहती है. सुबह से उठ कर क्या करेगी.

खाना बनाना भी उसे बहुत ज्यादा नहीं आता था, मतलब का ही आता था. हालांकि एक साल में वह काफी कुछ सीख गई थी पर अभी तक उन का खाना अकसर बाहर ही होता था. मम्मीपापा के आने से काम भी बढ़ेगा. नीला इतना काम कहां संभाल पाएगी और मम्मी से अपने घर का पूरा काम संभालने की उम्मीद करना गलत था. वे नीला की सहायता करें, यह तो ठीक लगता है पर… फिर कपड़े तो नीला उस के मातापिता के सामने कितने भी शालीन पहनने की कोशिश करे, उस के बावजूद उस के मातापिता को उस का पहनावा नागवार गुजर सकता है.

मम्मी की पीढ़ी ने अपने पति की बहुत देखभाल की है. हाथ में सबकुछ उपलब्ध कराया है. औफिस जाते पति की हर जरूरत के लिए उस के पीछेपीछे घूमती पत्नी की पीढ़ी वाली उस की मम्मी क्या आज की पत्नी का तौरतरीका बरदाश्त कर पाएंगी, वह सम?ा नहीं पा रहा था. नीला से अगर थोड़े दिन अपना रवैया बदलने को कहता है तो नीला उस के मातापिता के बारे में क्या सोचेगी. उन दोनों के रिश्ते औपचारिक हो जाएंगे. यह रिश्ता एकदो दिन का तो है नहीं. उस के मातापिता तो अब उस के पास आतेजाते रहेंगे.

यही सब सोच कर वह अजीब सी उधेड़बुन में था. अंधकार घना हो गया था. समुद्र की लहरें किनारे पर सिर पटकपटक कर उसे उस के विचारों से बाहर लाने का असफल प्रयास कर रही थीं. उस ने घड़ी पर नजर डाली. 10 बजने वाले थे. तभी मोबाइल बज उठा. नीला थी.

‘‘हैलो, कहां हो? अभी औफिस से नहीं निकले क्या? कितनी बार फोन किया, उठा क्यों नहीं रहे थे, ड्राइव कर रहे हो क्या?’’ नीला चिंतित स्वर में कई सवाल कर बैठी. ‘‘हां, ड्राइव कर रहा था. बस, पहुंच ही रहा हूं,’’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और उठ कर कार की तरफ चला गया.

घर पहुंच कर भी वह गुमसुम ही रहा. नीला आदत के अनुसार चुहलबाजी कर रही थी. अपनी भोलीभाली बातों से उसे रि?ाने का प्रयास कर रही थी. पर उस की चुप्पी टूट ही नहीं रही थी. ‘‘क्या बात है रमन, आज कुछ अपसैट हो. सब ठीक तो है न?’’ वह उस के घने बालों में उंगलियां फेरती हुई उस की बगल में बैठ गई. उस ने नीला की तरफ देखा. नीला मीठे स्वभाव की सरल लड़की थी. इसलिए वह उसे बहुत प्यार करता था. उस की आदतों की कोई कमी उसे नहीं अखरती थी. फिर वह देखता कि नीला ही नहीं, उस के हमउम्र दोस्तों की बीवियां भी लगभग नीला जैसी ही हैं. यह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बिलकुल भिन्न है.

वह प्यार से नीला को बांहों में कसता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई खास बात नहीं, बल्कि एक अच्छी बात है, चंडीगढ़ से मम्मीपापा आ रहे हैं एक महीने के लिए हमारे पास.’’

सुन कर नीला खुशी से उछल पड़ी, ‘‘अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी खबर है. एक महीने के लिए मैं भी अकेले रहने की बोरियत से बच जाऊंगी. मम्मीपापा के साथ बहुत मजा आएगा. कब आ  रहे हैं?’’‘‘अगले हफ्ते की फ्लाइट है.’’

‘‘तो इतनी देर बाद क्यों बता रहे हो? आज तो देर हो गई. कल जल्दी आना, बहुत सारी चीजें खरीदनी हैं.’’ ‘‘हां, हां, तुम लिस्ट तैयार रखना. मैं जल्दी आ जाऊंगा. फिर चलेंगे.’’ मम्मीपापा के आने के नाम से नीला खुश व उत्साहित थी. उसे तो मम्मीपापा के साथ चंडीगढ़ वाली मस्ती करनी थी. इस से अधिक वह कुछ नहीं सोच पा रही थी. रमन उस के उत्साह को मुसकराते हुए देख रहा था.

चंडीगढ़ में तो सबकुछ हाथ में मिलता है. मम्मी की तैयारियां पहले से ही अपने बच्चों के लिए इतनी संपूर्ण रहती हैं कि उन्हें बीच में परेशान नहीं होना पड़ता. खानेपीने की चीजों से फ्रिज भर देती हैं. इस के अलावा काम करने वाले भी घर के पुराने नौकर हैं, तो नीला को चम्मच हिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है और न उस से थोड़े दिनों के लिए कोई ऐसी उम्मीद रखता है. उस ने खुद कुछ किया तो किया, नहीं किया तो नहीं किया. अपने प्यारे स्वभाव के कारण वह मम्मीपापा की इतनी लाड़ली है कि वे उसे पलकों पर बिठा कर रखते हैं.

नीला अपनी रौ में ढेर सारी प्लानिंग कर रही थी. रमन कुछ कह कर या उसे कुछ सम?ा कर उस की खुशी में विघ्न नहीं डालना चाहता था. इसलिए उस ने मन ही मन सोचा, जो होगा देखा जाएगा. ‘‘अब बातें ही करती रहोगी या कुछ खाने को भी दोगी. कुछ बनाया भी है या बाहर से और्डर करूं?’’ वह हंसता हुआ नीला को छेड़ता हुआ बोला.

‘‘आज तो मैं ने पास्ता बनाया है.’’ ‘‘पास्ता बनाया है? अरे, कुछ रोटीसब्जी बना देतीं. यह सब रोजरोज मु?ा से नहीं खाया जाता.’’ ‘‘पर मु?ा से रोटी अच्छी नहीं बनती है,’’ नीला मायूसी से बोली. ‘‘कोई बात नहीं,’’ वह उस के गालों को प्यार से सहलाता हुआ बोला, ‘‘अभी बाहर से और्डर कर देता हूं. मम्मी आएंगी तो इस बार तुम रोटी बनाना जरूर सीख लेना.’’

‘‘ठीक है, सीख लूंगी.’’ एक हफ्ते बाद उस के मातापिता आ गए. उन की दिल्ली से फ्लाइट थी. फ्लाइट शाम की थी. वह औफिस से जल्दी नहीं निकल पाया. नीला ही उन्हें एयरपोर्ट लेने चली गई. उस ने औफिस से मम्मीपापा से फोन पर बात कर ली. उस के मातापिता पहली बार उस के पास आए थे, इसलिए वह बहुत संतुष्टि का अनुभव कर रहा था.

शीजान खान की जिंदगी आई ट्रेक पर, खतरों के खिलाड़ी में स्टंट करते दिखेंगे एक्टर

शीजान खान को हाल ही में चार महीने की जेल हुई थी, उनकी को स्टार तुनिषा शर्मा के सुसाइड का उन्हे जिम्मेदार बताते उन्हे जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा था, लेकिन अब उनकी जिंदगी नए ट्रेक पर और जल्द ही उन्हे खतरों के खिलाड़ी के 13 वें सीजन में देखा जाएगा.

आपको बता दें, कि उनकी को-स्टार एक्ट्रेस तुनिषा शर्मा ने 24 दिसंबर 2022 को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी. वो सीरियल के सेट पर एक मेकअप रूम में मृत पाई गई थीं. बाद में एक्ट्रेस की मां ने शीजान पर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने तुनिषा को सुसाइड करने के लिए उकसाया था. इसके बाद एक्टर को अरेस्ट किया गया था. अब चार महीने बाद रिहा होने के बाद स्टार को रोहित शेट्टी के शो खतरों के खिलाड़ी मे देखा जाएगा. बता दें, इससे पहले एक्टर अली बाबा: दास्तान-ए-काबुल में नजर आ चुके है.

 

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Sheezan Khan लगभग चार महीने तक काम से दूर रहने के बाद जल्द ही एक्शन में वापसी करेंगे. वो ‘खतरों के खिलाड़ी’ के 13वें सीजन के लिए चुने जाने वाले लेटेस्ट सेलिब्रिटी हैं. उनके टीवी शो ‘अली बाबा: दास्तान-ए-काबुल’ में रिप्लेस किए जाने के बाद ये टीवी पर उनका पहला काम होगा.स्टंट बेस्ड रिएलिटी शो से जुड़े एक सूत्र ने बताया, ‘हां, शीजान के साथ बातचीत काफी आगे तक पहुंच गई है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि वो इस सीजन का हिस्सा बनेंगे. उन्होंने ट्रैवल और दूसरे डॉक्युमेंट्स को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. मामले की सुनवाई कल होनी है.’ हालांकि, शीजान की तरफ से अभी तक इस पर कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है.

 

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बताते चले कि ‘खतरों के खिलाड़ी 13’ के कंफर्म कंटेस्टेंट्स में शिव ठाकरे, अर्चना गौतम, न्यारा बनर्जी, अंजुम फकीह, रूही चतुर्वेदी, अंजलि आनंद और अर्जित तनेजा को साइन किया गया है.

अनुपम खेर ने ‘द कश्मीर फाइल’ को लेकर किया अजीब पोस्ट, लोगों ने बरसाएं कमेंट

इन दिनों फिल्मफेयर आवार्ड सुर्खियों में है जहां कई फिल्मों को आवार्ड मिले और मिलने थे, लेकिन इसमें से अनुपम खेर की फिल्म द कश्मीर फाइल को बड़ा झटका लगा, पहले 7 फिल्मों में इस फिल्म को नॉमिनेट किया गया लेकिन फिल्म कोई भी आवार्ड पाने में सफल नहीं हो पाई.जिसपर एक्टर अनुपम खेर ने सोशल मीडिया पर अजीब पोस्ट किया जिसे लेकर वह सुर्खियों में बने हुए है.

आपको बता दे, कि 68वें फिल्मफेयर अवार्ड्स का आयोजन 27 अप्रैल की शाम को हुआ था. इसमें आलिया भट्ट और डायरेक्टर संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गंगुबाई’ और राजकुमार राव स्टारर फिल्म ‘बधाई दो’ को बड़ी जीत हासिल हुई. इस अवॉर्ड शो में अनुपम खेर की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को 7 कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया था. इसके डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री को बेस्ट डायरेक्टर की कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला था. लेकिन ये फिल्म कोई भी अवॉर्ड अपने नाम करने में नाकाम साबित हुई. अब एक्टर अनुपम खेर ने एक अजीब पोस्ट शेयर किया है.

फिल्मफेयर के नॉमिनेशन्स की लिस्ट सामने आने के बाद डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ऐलान किया था कि वो एक भी अवॉर्ड नहीं लेंगे. उन्हें इस अनैतिक और भ्रष्ट अवॉर्ड से अपना नाता नहीं जोड़ना है. अब जब फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को एक भी अवॉर्ड नहीं मिला तो अनुपम खेर ने बड़ी बात कह दी है उन्होंने ट्विटर पर एक अजीब पोस्ट शेयर किया है. अनुपम ने लिखा, ‘इज्जत एक महंगा तोहफा है. इसकी उम्मीद सस्ते लोगों से ना रखें.’

अनुपम खेर का इशारा फिल्मफेयर अवॉर्ड की तरफ है. उनके ट्वीट पर कई यूजर्स ने अपने रिएक्शन दिए हैं. कई का कहना है कि उनकी बात एकदम सही है. तो बहुत से ऐसे भी हैं, जो उनकी फिल्म को खराब बता रहे हैं. तो बहुत से ऐसे भी हैं, जो उनकी फिल्म को खराब बता रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘आप अवॉर्ड्स से ऊपर हैं. द कश्मीर फाइल्स में आपकी एक्टिंग को ऑस्कर मिलना चाहिए था. फिल्मफेयर ‘जुबां केसरी’ वाले लोगों के लिए है.’ दूसरे ने लिखा, ‘फिल्मफेयर एक कीमती अवॉर्ड है फिल्मफेयर ‘जुबां केसरी’ वाले लोगों के लिए है.’

बता दें, कि फिल्म द कश्मीर फाइल मार्च 2022 में रीलिज हुई थी.इन 250 करोड़ रुपए कलेक्शन किया गया. विवेक ने अपनी इस फिल्म को ऑस्कर 2023 की रेस में भी भेजा था. लेकिन ये नॉमिनेशन पाने में नाकाम रही थी. अनुपम खेर के साथ मिथुन चक्रवर्ती, मृणाल सेन, पल्लवी जोशी और दर्शन कुमार ने काम किया था.

इस तरह से बनाएं पहले सेक्स को यादगार

अगर आप अपने जीवनसाथी के साथ पहले मिलन को यादगार बनाना चाहती हैं तो आप को न केवल कुछ तैयारी करनी होंगी, बल्कि साथ ही रखना होगा कुछ बातों का भी ध्यान. तभी आप का पहला मिलन आप के जीवन का यादगार लमहा बन पाएगा.

करें खास तैयारी: पहले मिलन पर एकदूसरे को पूरी तरह खुश करने की करें खास तैयारी ताकि एकदूसरे को इंप्रैस किया जा सके.

डैकोरेशन हो खास: वह जगह जहां आप पहली बार एकदूसरे से शारीरिक रूप से मिलने वाले हैं, वहां का माहौल ऐसा होना चाहिए कि आप अपने संबंध को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.

कमरे में विशेष प्रकार के रंग और खुशबू का प्रयोग कीजिए. आप चाहें तो कमरे में ऐरोमैटिक फ्लोरिंग कैंडल्स से रोमानी माहौल बना सकती हैं. इस के अलावा कमरे में दोनों की पसंद का संगीत और धीमी रोशनी भी माहौल को खुशगवार बनाने में मदद करेगी. कमरे को आप रैड हार्टशेप्ड बैलूंस और रैड हार्टशेप्ड कुशंस से सजाएं. चाहें तो कमरे में सैक्सी पैंटिंग भी लगा सकती हैं.

फूलों से भी कमरे को सजा सकती हैं. इस सारी तैयारी से सेक्स हारमोन के स्राव को बढ़ाने में मदद मिलेगी और आप का पहला मिलन हमेशा के लिए आप की यादों में बस जाएगा.

सैल्फ ग्रूमिंग: पहले मिलन का दिन निश्चित हो जाने के बाद आप खुद की ग्रूमिंग पर भी ध्यान दें. खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करें. इस से न केवल आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि आप स्ट्रैस फ्री हो कर बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी. पहले मिलन से पहले पर्सनल हाइजीन को भी महत्त्व दें ताकि आप को संबंध बनाते समय झिझक न हो और आप पहले मिलन को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.

प्यार भरा उपहार: पहले मिलन को यादगार बनाने के लिए आप एकदूसरे के लिए गिफ्ट भी खरीद सकते हैं. जो आप दोनों का पर्सनलाइज्ड फोटो फ्रेम, की रिंग या सैक्सी इनरवियर भी हो सकता है. ऐसा कर के आप माहौल को रोमांटिक और उत्तेजक बना सकती हैं.

खुल कर बात करें: पहले मिलन को रोमांचक और यादगार बनाने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करें. अपने पार्टनर से इस बारे में खुल कर बात करें. अपने मन में उठ रहे सवालों के हल पूछें. एकदूसरे की पसंदनापसंद पूछें. जितना हो सके पौजिटिव रहने की कोशिश करें.

सेक्स सुरक्षा: संबंध बनाने से पहले सैक्सुअल सुरक्षा की पूरी तैयारी कीजिए. सैक्सुअल प्लेजर को ऐंजौय करने से पहले सेक्स प्रीकौशंस पर ध्यान दें. आप का जीवनसाथी कंडोम का प्रयोग कर सकता है. इस से अनचाही प्रैगनैंसी का डर भी नहीं रहेगा और आप यौन रोगों से भी बच जाएंगी.

सेक्स के दौरान

 – सैक्सी पलों की शुरुआत सैक्सी फूड जैसे स्ट्राबैरी, अंगूर या चौकलेट से करें.

– ज्यादा इंतजार न कराएं.

– मिलन के दौरान कोई भी ऐसी बात न करें जो एकदूसरे का मूड खराब करे या एकदूसरे को आहत करे. इस दौरान वर्जिनिटी या पुरानी गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड के बारे में कोई बात न करें.

– संबंध के दौरान कल्पनाओं को एक तरफ रख दें. पोर्न मूवी की तुलना खुद से या पार्टनर से न करें और वास्तविकता के धरातल पर एकदूसरे को खुश करने की कोशिश करें.

– बैडरूम में बैड पर जाने से पहले अगर आप घर में या होटल के रूम में अकेली हों तो थोड़ी सी मस्ती, थोड़ी सी शरारत आप काउच पर भी कर सकती हैं. ऐसी शरारतों से पहले सेक्स का रोमांच और बढ़ जाएगा.

– सेक्स संबंध के दौरान उंगलियों से छेड़खानी करें. पार्टनर के शरीर के उत्तेजित करने वाले अंगों को सहलाएं और मिलन को चरमसीमा पर ले जा कर पहले मिलन को यादगार बनाएं.

– मिलन से पहले फोरप्ले करें. पार्टनर को किस करें. उस के खास अंगों पर आप की प्यार भरी छुअन सेक्स प्लेजर को बढ़ाने में मदद करेगी.

– सेक्स के दौरान सैक्सी टौक करें. चाहें तो सैक्सुअल फैंटेसीज का सहारा ले सकती हैं. ऐसा करने से आप दोनों सेक्स को ज्यादा ऐंजौय कर पाएंगे. लेकिन ध्यान रहे सैक्सुअल फैंटेसीज को पूरा के लिए पार्टनर पर दबाव न डालें.

– संयम रखें. यह पहले मिलन के दौरान सब से ज्यादा ध्यान रखने वाली बात है, क्योंकि पहले मिलन में किसी भी तरह की जल्दबाजी न केवल आप के लिए नुकसानदेह होगी, बल्कि आप की पहली सेक्स नाइट को भी खराब कर सकती है.

सेक्स के दौरान बातें करते हुए सहज रह कर संबंध बनाएं. तभी आप पहले मिलन को यादगार बना पाएंगे. संबंध के दौरान एकदूसरे के साथ आई कौंटैक्ट बनाएं. ऐसा करने से पार्टनर को लगेगा कि आप संबंध को ऐंजौय कर रहे हैं.

अमिताभ सर की वजह से फिल्मों में आई – सुष्मिता चटर्जी

अ निंद्या चटर्जी के डायरैक्शन में बंगला फिल्म ‘प्रेम तम’ से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाली अदाकारा सुष्मिता चटर्जी की अभी तक भले ही ‘पका देखा’ समेत 2-3 फिल्में ही रिलीज हुई हैं, मगर एक गैरफिल्मी परिवार से होते हुए भी उन्हें बंगला में सुपरस्टार प्रसन्नजीत, देवजीत, ममता शंकर और परमब्रता चट्टोपाध्याय जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिल चुका है.

इन दिनों सुष्मिता चटर्जी अपनी नई फिल्म ‘चेंगिज’ को ले कर जोश में हैं. इस की 2 वजहे हैं. पहली वजह यह कि इस में उन्हें सिर्फ पश्चिम बंगाल के ही नहीं, बल्कि बंगलादेश के सुपरस्टार जीत के साथ काम करने का मौका मिला है. दूसरी वजह यह है कि उन की फिल्म ‘चेंगिज’ बंगला के साथसाथ हिंदी में भी बनी है. पेश हैं, सुष्मिता चटर्जी के साथ हुई बातचीत के खास अंश :

आप को ऐक्टिंग का चसका कैसे लगा?

देखिए, मेरा जन्म व परवरिश आसनसोल में हुई है. मेरे मातापिता नौकरीपेशा हैं. हम मिडिल क्लास फैमिली से हैं. मगर मुझे बचपन से हीरोइन बनना था.

दरअसल, मेरे मातापिता को अमिताभ बच्चन की फिल्में देखने का बहुत शौक रहा है. तो मैं भी बचपन से अमिताभ सर की फिल्में देखने जाती थी और हर बार यही सोचती थी कि मुझे भी अमिताभ सर की तरह ही काम करना है. सच कहूं, तो अमिताभ सर ही मेरे प्रेरणास्रोत हैं.

पर, मातापिता की इच्छा का सम्मान करते हुए सब से पहले मैं ने अपनी पढ़ाई पूरी की. उस के बाद साल 2019 में मौडलिंग से शुरुआत की. साथ ही, ऐक्टिंग के क्षेत्र में जद्दोजेहद शुरू की थी.

किस तरह की जद्दोजेहद?

मेरी परवरिश फिल्मी परिवार में तो हुई नहीं है, इसलिए मुझे तो यही नहीं पता था कि फिल्म में काम करने का मौका पाने के लिए किस तरह और किस से मिला जाए. बाद में धीरेधीरे पता चला, तो मैं ने आडिशन देने शुरू किए. काफी रिजैक्शन सहे. उस के बाद मुझे अनिंद्या चटर्जी के डायरैक्शन में पहली बंगला फिल्म ‘प्रेम तम’ में काम करने का मौका मिला. इस के बाद मुझे फिल्म ‘पका देखा’ मिली.

फिल्म ‘चेंगिज’ करने की क्या वजह थी?

फिल्म ‘चेंगिज’ करने की कई वजहें रहीं. उन में से एक वजह पश्चिम बंगाल के सुपरस्टार जीत के साथ काम करने का मौका मिलना भी रही.

जब मुझे फिल्म ‘चेंगिज’ का औफर मिला, तो मेरे दिमाग में भी पहली बात यही आई थी कि मुझे जीत दा के साथ काम करने का मौका मिल रहा है. लेकिन उस के बाद जब मुझे स्क्रिप्ट पढ़ने को मिली, तो वह भी मुझे काफी पसंद आई.

फिल्म ‘चेंगिज’ के अपने किरदार को ले कर क्या कहना चाहेंगी?

मैं ने इस फिल्म में एयर होस्टैस नंदिनी का किरदार निभाया है, जो स्मार्ट है, जबकि चेंगिज ड्रग कारोबारी है. पर वह उस की ईमानदारी की कायल हो कर उस के प्यार में पड़ जाती है.

जीत दा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

मैं एकदम सच कह रही हूं कि जब मुझे इस फिल्म का औफर मिला, तो मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं जीत दा के साथ स्क्रीन साझा करूंगी.

जीत दा बहुत अच्छे और बहुत ही विनम्र इनसान हैं. वे हमेशा सैट पर दूसरों की मदद करते हैं. सब से अच्छी बात यह है कि वे अपनी ऊर्जा और समर्पण से सभी को प्रेरित करते हैं.

इस के अलावा आप नया क्या कर रही हैं?

मैं ने एक फिल्म ‘शिबुपुर’ की है, जिस में मेरे साथ ममता शंकर, परमब्रता चट्टोपाध्याय और स्वास्तिका मुखर्जी हैं.

भविष्य में आप किस तरह के किरदार निभाना चाहती हैं?

मुझे अलगअलग किरदार निभाना है. मैं खुद को भाषा या भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधना चाहती. मुझे हर भाषा की फिल्म में अपनी प्रतिभा दिखानी है. मैं हौलीवुड फिल्में भी करना चाहती हूं. यह तो अभी शुरुआत है, अभी तो बहुतकुछ करना है.

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