‘‘शायद बेटे की चाह या कहें औरत की लत पड़ जाने की वजह से मेरे पिता का मन अर्चना से भी दूर होता चला गया. उन की नजर अब एक विधवा पर थी जिस के पहले से 2 बच्चे थे. एक बेटा और एक बेटी. रूपरंग में वह विधवा सुंदर थी, उस की सुंदरता पर मेरे पिता रीझ उठे और उस से तीसरा विवाह कर लिया.
‘‘3 कमरों के छोटे से घर में वह 3 प्राणी और आ गए. मौसी और उस औरत में खूब लड़ाई होती थी. उस लड़ाई में मैं और मेरी छोटी बहन बिलकुल दब कर रह गईं. उस समय मेरी उम्र कोई 12 साल की रही होगी. मैं अकसर रोतीरोती अपनी मां की तसवीरें बनाती रहती थी. नतीजा यह निकला कि मैं चित्रकला में निपुण होती चली गई.
‘‘उस कच्ची उम्र में मुझे पता चला कि मेरी तीसरी मां, जिस का नाम किरण था, ने बच्चे बंद होने का आपरेशन पहले से ही करवा रखा था. किरण के कई पुरुषों से शारीरिक संबंध रह चुके थे और इसी बात को ले कर वह अकसर मेरे पिता से पिट जाया करती थी.
‘‘कुछ समय बाद ही मेरे पिता का तबादला जयपुर हो गया. जयपुर जाते समय वह बहुत खुश थे…शायद अर्चना और किरण भी. किरण को अपनी आजादी प्रिय थी और अर्चना को अपने पति से अकसर पिटने का डर था. पिता तो चले गए पर जाते समय उन्होंने एक नजर भी हमारी ओर नहीं देखा.
‘‘हम दोनों बहनें फिर से अकेली हो गईं. अर्चना मौसी कभीकभी हमें कोसतीं, कभीकभी प्यार करतीं. बस, यों ही समय बीतता गया. पिता का मन जयपुर में लग गया था, क्योंकि उन्हें वहां एक और औरत मिल गई थी. वह उन्हीं के आफिस में कार्यरत थी और उन से वरिष्ठ थी.
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‘‘पापा ने उस औरत को अपने मोहजाल में फंसाया और उस से विवाह रचा लिया. वह औरत मेरे पापा के प्यार में ऐसी पागल हुई कि अपना मकान भी उन के नाम कर दिया.
‘‘तब से ले कर अब तक वह जयपुर में हैं. सुना है, वहां पापा के 3 बच्चे हैं, 2 लड़के और 1 लड़की…’’
‘‘क्या तुम्हें कभी उन की कमी महसूस नहीं होती?’’ अनिरुद्ध ने बीच में टोकते हुए कहा.
‘‘सर…’’
वह उस की बात का जवाब देने वाली थी कि अनिरुद्ध बोल पड़ा, ‘‘तुम ने मुझे फिर सर कहा.’’
‘‘जब तक हम दोनों किसी रिश्ते में नहीं बंध जाते तब तक आप मेरे लिए सर ही रहेंगे.’’
‘‘तो तुम भी मेरे साथ बंधना चाहती हो?’’ उस ने आरुषी की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.
‘‘कोई जबरदस्ती नहीं है, सर. मैं जिस परिवार से हूं, उस परिवार के किसी भी सदस्य से समाज का कोई व्यक्ति संबंध बनाना तो दूर, साथ खड़ा होना पसंद नहीं करता. जिस लड़की के बाप ने 4 शादियां कर रखी हों उस लड़की को लोग देखना तक पसंद नहीं करते पर उस का इस्तेमाल जरूर कर लेते हैं.’’
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अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हुए आरुषी बोली, ‘‘हमारी मौसी ने भले ही हमें मन से पसंद न किया हो पर हमें संभाल कर रखा. इस उम्र में आ कर समझ में आता है कि उन का दबाव, रौब ठीक ही था. उन्हें एक बात का दुख जरूर रहता है कि वह हमारी शादी नहीं कर पाईं. पैसे की कमी अच्छेअच्छों को तोड़ देती है. शुरूशुरू में तो पिताजी पैसे भेजते थे, पर कुछ समय बाद उन्होंने पैसे भेजना एकदम बंद कर दिया. सुनने में आया था कि मेरी तीसरी मां किरण ने पापा को खर्चे के लिए नोटिस भेजा था, पापा ने हम तीनों का खर्चा बंद कर के उन तीनों का शुरू कर दिया.
‘‘पहले तो मौसी घर से दूर एक कालोनी के कुछ घरों में काम करती थीं, पर जब यह बात महल्ले में फैल गई तो उन्होंने वह काम बंद कर के कपड़े सिलना शुरू कर दिया. तब तक हम दोनों बहनें भी बड़ी हो गई थीं. हम ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया.
‘‘मेरा मन शायद चित्रकार बनने का इंतजार कर रहा था, इस में मेरी मदद की, मेरी मौसी, बहन और मेरे जनून ने. नतीजा तुम्हारे सामने है. पर अब लगता है मेरी उम्र कुछ ज्यादा ही हो गई. मेरे साथ की लड़कियों के बच्चे भी 15-16 साल के हो गए हैं. एक मैं हूं, अभी भी वहीं हूं जहां 20 साल पहले थी.
‘‘आज मेरे पास सभी कुछ है. एक मां सौतेली ही सही, छोटा सा अपना घर, पर नहीं है तो प्यार. छोटी बहन ने भी कोर्ट मैरिज कर के अपना घर बसा लिया और खुशी से रह रही है. मौसी ने मेरा घर बसाने की कोशिश तो की पर मेरी फोटो से पहले मेरे पापा के कारनामे वहां पहुंच जाते थे.
‘‘लड़कों की देखादेखी में मेरी उम्र 30 से ऊपर की हो चली थी. मैं ने मौसी को शादी करने से साफ इनकार कर दिया था. मौसी मुझ से पूछती थीं कि आरुषी, सारी जिंदगी अकेली कैसे गुजारोगी तो मेरा जवाब होता था कि मौसी, तुम तो शादी कर के भी अकेली रह रही हो, मैं बिना शादी के रह लूंगी. कम से कम इतनी तसल्ली तो है कि मुझे कोई धोखा नहीं दे रहा. बेचारी मौसी भी निरुत्तर हो जाया करती थीं.’’
‘‘आरुषी, तुम ने अपने पापा को वापस बुलाने के लिए या खर्चे के लिए कोर्ट का सहारा नहीं लिया?’’
‘‘जिस औरत के पास हमारी किताबों के पैसे तक नहीं होते थे वह वकील के पैसे कहां से लाती,’’ आरुषी ने लाचारी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सर, आप को मैं ने अपनी जिंदगी के बारे में सबकुछ सचसच बता दिया है. मेरे जीवन का एकएक पन्ना आप के सामने खुल गया है. आप जो भी फैसला करेंगे मुझे खुशीखुशी मंजूर होगा.’’
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‘‘आरुषी, तुम ने तो अपने पन्ने मेरे सामने खोल कर रख दिए पर मेरा भी एक पन्ना है, जो किसी के भी सामने नहीं खुला है. मैं तुम्हें पहले ही बता दूं कि तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं है, तुम्हारी जिंदगी है और तुम अपनी जिंदगी की स्वयं मालिक हो. बस, इतनी सी प्रार्थना है कि मुझ से दोस्ती कभी मत तोड़ना,’’ इतना कहते हुए अनिरुद्ध की आंखों में पानी आ गया.
चाह कर भी अभिषेक जिया के व्यवहार में जो बदलाव आया है उसे समझ नहीं पा रहा था. वह रात को भी घंटों लैपटौप पर बैठ कर न जाने क्या करती रहती. अभिषेक जैसे ही उसे आवाज देता, वह घबरा कर लैपटौप बंद कर देती. अभिषेक जितना उस के करीब जाने की कोशिश करता वह उतना ही उस से दूर जा रही थी.
न जाने वह क्या था जिस के पीछे जिया पागल हो रही थी. जिया के भाई ने भी उस दिन अभिषेक को फोन पर कहा, ‘‘आजकल जिया घर पर फोन ही नहीं करती. सब ठीक है न?’’
अभिषेक ने कहा, ‘‘नहीं आजकल औफिस में बहुत काम है.’’
देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब अभिषेक और जिया दोनों के मातापिता की इच्छा थी कि वे अपने परिवार को आगे बढ़ाएं.
आज फिर से उन की शादी की सालगिरह का जश्न था पर आज लीला ने खुद दावत रखी थी. जिया ने एक बहुत ही खूबसूरत प्याजी रंग की स्कर्ट और कुरती पहनी हुई थी. अभिषेक की नजरें उस से हट ही नहीं रही थी. सब लोग उन्हें छेड़ रहे थे कि वे खुशखबरी कब दे रहे हैं.
रात को एकांत में जब अभिषेक ने जिया से कहा कि जिया मेरा भी मन है, तो जिया ने अनमने ढंग से कहा कि वह तैयार नहीं है.
रात में भी अभिषेक को ऐसा लगा जैसे उस के पास बस जिया का शरीर है. अभिषेक रातभर सो नहीं पाया.
आज वह हर हाल में जिया से बात करना चाहता था, पर जब वह सुबह उठा, जिया औफिस के लिए निकल चुकी थी. अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. ऐसा लगता था, जिया उस के साथ हो कर भी उस के साथ नहीं है, वह हर हफ्ते उस के साथ कोई न कोई प्लान बनाता पर जिया को तो रविवार में भी कोई न कोई औफिस का काम हो जाता था. उन दोनों के बीच एक मौन था, जिसे वह चाह कर भी नहीं तोड़ पा रहा था. अभिषेक को अपनी वह पुरानी जिया चाहिए थी पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.
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देखते ही देखते फिर दीवाली आ गई. पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा था. आज अभिषेक को बहुत दिनों बाद जिया का चेहरा रोशनी से खिला दिखा.
जिया ने अभिषेक से कहा, ‘‘अभिषेक, आज मुझे तुम से कुछ कहना है और कुछ दिखाना भी है.’’
अभिषेक उस की तरफ प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘जिया, कुछ भी बोलना बस यह मत बोलना तुम्हें मुझ से प्यार नहीं है.’’
जिया खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर बोली, ‘‘तुम पागल हो क्या, तुम ने ऐसा सोचा भी कैसे?’’
अभिषेक मुसकरा दिया. बोला, ‘‘लेकिन तुम मुझे पिछले 1 साल से नैगलैक्ट कर रही हो, हम एकसाथ कहीं भी नहीं गए.’’
जिया बोली, ‘‘पता नहीं तुम्हें समझ आएगा या नहीं पर मैं पिछले 1 साल से अपनी पहचान और अपने वजूद, अपनी जड़ें ढूंढ़ रही थी?’’
अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. जिया ने गुलाबी और नारंगी चंदेरी सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी. साथ में कुंदन का मेल खाता सैट, हीरे के कड़े और ढेर सारी चूडि़यां. आज उस के चेहरे पर ऐसी आभा थी कि सब लोग उस के आगे फीके लग रहे थे. रंगोली बनाने के बाद जिया ने अभिषेक को उस के साथ चलने को कहा, तो अभिषेक कार की चाबी उठा चल पड़ा.
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जिया हंस कर बोली, ‘‘आज मैं तुम्हें अपने साथ अपनी कार में ले कर चलना चाहती हूं.’’
अभिषेक चल पड़ा. थोड़ी ही देर में कार हवा से बातें करने लगी और कुछ देर बाद कार नई बस्ती की तरफ चलने लगी. कार ड्राइव करते हुए जिया बोली, ‘‘अभिषेक, आज मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम ने हमेशा हर तरह से मेरा खयाल रखा पर बचपन से मेरा एक सपना था जो मेरी आंखों में पलता रहा. मांपापा ने कहा कि तुम्हारा घर वह होगा, जहां तुम जा कर एक घर बनाओगी. तुम मिले, तो लगा मेरा सपना पूरा हो गया, पर अभिषेक कुछ दिनों बाद समझ आ गया कि कुछ सपने होते हैं जो साझा नहीं होते. शादी का मतलब यह नहीं कि तुम्हारे सपनों का बोझ तुम्हारा जीवनसाथी भी उठाए. मुझे तुम से या किसी से भी कोई शिकायत नहीं है. पर अभिषेक आज मेरा एक सपना पूरा हुआ है,’’ यह कह उस ने एक नई बनी सोसाइटी के सामने कार रोक दी. अभिषेक चुपचाप उस के पीछे चल पड़ा. एक नए फ्लैट के दरवाजे पर उस के नाम की नेमप्लेट लगी थी.
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अभिषेक हैरानी से देख रहा था. छोटा पर बेहद खूबसूरती से सजा हुआ प्लैट. तभी हवा का झोंका आया तो चंदेरी के फीरोजी परदे जिया के अपने घर में लहराने लगे, जहां पर उस का अधिकार घर पर ही नहीं वरन उस की आबोहवा पर भी था.
सपनों के साये तले रात और दिन बीतते रहे. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. पर उस के दिमाग में रहरह कर यही सवाल कौंधता कि कौनकौन होगा उस के घर में… सोचती… पूछूं या नहीं?
परएक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘रचित, हम एकदूसरे के इतने करीब आ गए हैं, पर अभी तक मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानती. अपने परिवार के बारे में कुछ बताओ न?’’
‘‘क्या जानना चाहती हो? यही न कि मैं शादीशुदा हूं या नहीं, बच्चे हैं या नहीं…? हां बच्चे हैं. पर शादीशुदा होते हुए भी मैं अकेला हूं, क्योंकि पत्नी अब इस दुनिया में नहीं है. मेरे साथ मेरी मां और मेरा बेटा रहता है.’’
रूपा ने आंखें बंद कर लीं. यह सुख का क्षण था. सपने अभी जिंदा हैं… कुछ देर की मौन के बाद रचित ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’
‘‘क्या तुम्हें पता है कि मेरी भी एक बेटी है? मैं एक तलाकशुदा हूं. क्या तुम्हारी फैमिली मुझे और मेरी बेटी को स्वीकार करेगी? सपनों की दुनिया बहुत कोमल होती है रचित. पर वास्तविकता का धरातल बहुत कठोर. अच्छी तरह सोच लो. फिर कोई निर्णय लेना,’’ इतना कहती गई, पर मन के किसी कोने में कुछ नया जन्म लेती महसूस कर रही थी रूपा.
कुछ तेरी कहानी है, कुछ मेरी कहानी है
हर बात खयाली है, हर बात रूहानी है
मिल जाए कभी जो हम, तो हर बात सुहानी है…
रूपा के गोरे से मुखड़े पर अठखेलियां करती लटों को हाथों हटाते हुए रचित ने उस के गालों को अपनी हथेलियों में समेट लिया और उस की मदभरी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मैं अब तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता रूपा. मैं सब ठीक कर दूंगा. बस तुम हां कर दो.’’
महीनों से चल रही मुलाकातों की फुहारें रूपा को आश्वासन की मधुर चासनी में सराबोर कर चुकी थीं. वह अपनेआप से अजनबी होती जा रही थी. कभी तो मन मचलता कि बारिश की बूंदों को अपनी हथेली में समेट ले. और कभी समंदर की लहरों के साथ विलीन हो जाने की विकलता. भावनाएं तूफान की तरह प्रचंड, उद्वेलित अंतर्मन की छटपटाहट ने आंखों में पानी का उबाल ला दिया. सामान्य गति से बीतते वक्त की चाल बहुत धीमी लग रही थी रूपा को, और सांसें धौंकनी की तरह तेज.
सांसों में बसे हो तुम
आंखों में बसे हो तुम
छूओ तो मुझे एकबार
धड़कन में बसे हो तुम…
समय गुजरते देर नहीं लगती. दोनों ने शादी कर ली. हालांकि रचित की मां बहुत मानमनुहार के बाद राजी हुई थीं और इस शर्त पर कि रूपा की बेटी कभी इस घर में नहीं आएगी. रूपा को बहुत बड़ा झटका लगा था. एक बार फिर से पुराने घावों का दर्द हरा हो गया था.
अचानक ही आए इस झंझावात ने रूपा के सपनों को चकनाचूर कर दिया. विचलित सी वह सन्न रह गई. पर रचित ने यह समझा कर शांत कर दिया कि वक्त के साथ सब बदल जाते हैं. मां को हम दोनों मिल कर मना लेंगे. रूपा ने गहरी सांस ली. उस ने बड़ी मुश्किल से दिल को समझाया, होस्टल से तो बच्ची महफूज है ही. जब मन करेगा जा कर उस से मिल लूंगी. सुखद भविष्य की कामना लिए रूपा को क्या पता था कि नियति क्याक्या रंग दिखाने वाली है.
डूबता हुआ सुर्ख लाल सूरज उसे माथे की बिंदिया सी लग रही थी. एक बार फिर से सब भूल कर उस ने रचित के प्यार भरोसा कर लिया. सुख की अनुभूतियां वक्त का पता ही नहीं चलने देती. सपनों के हिंडोले में झूलते 10 दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला.
‘‘कल घर लौटने का दिन है रूपा,’’ रचित ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.
‘‘प्यार ने हम दोनों को बांध रखा है, वरना हम तो नदी के दो किनारे थे.’’
रूपा आसमान की ओर देखती हुई बुदबुदाई. रचित उस की आंखों में देखता कुछ पढ़ने की कोशिश करता रहा. फिर उस ने मन में अंदर चल रहे द्वंद्व को परे झटक कर रूपा की खूबसूरती को निहारने लगा. पलभर के लिए तो लगा कि काश, यह वक्त यही ठहर जाता. पर वक्त भी कभी ठहरता है भला.
साथ तुम्हारे चल कर यह अहसास हुआ
दरमियां हमारे सिर्फ प्यार, और कुछ नहीं…
अंधेरा चढ़ता गया और दोनों महकते एहसास के साथ सपनों सरीखे पलों की नशीली मादकता में विलीन. थकान से चूर कब दोनों की आगोश में समा गए, महसूस भी न हुआ. सुबह का सूरज नया दिन ले कर हाजिर हो गया. जल्दीजल्दी तैयार हो कर दोनों गाड़ी में बैठ गए और चल दिए घर की ओर.
घर पहुंचते ही सब से पहला सामना रचित के बेटे प्रथम से हुआ. उस की नजरें क्रोध और हिकारत से भरी हुई थीं. दोनों को देखते ही वह अंदर के कमरे में चला गया. रूपा के चेहरे पर सोच की लकीरें उभर आईं. तो क्या प्रथम की रजामंदी के बगैर शादी हुई है? जबकि मैं ने तो अपनी बेटी को बताया था कि रचित की मम्मी शादी के लिए तैयार हैं, पर शर्त रखी है कि तुम मेरे साथ उन लोगों के साथ नहीं रहोगी. ये सुन कर भी मेरी बेटी ने तो नाराजगी नहीं जताई. बल्कि उम्मीद से कहीं आगे बढ़ कर बोली, ‘‘मां, अभी भी तो हम साथ नहीं रहते. तुम मुझ से मिलने होस्टल तो वैसे भी आती रहती हो.’’
बच्ची को याद कर के रूपा की आंखें भर आईं. धीरेधीरे खुद को सामान्य कर सास के पास गई. लेकिन सास की बेरुखी ने तो दिल ही बैठा दिया. एक बार फिर से रूपा ने दिल को बहलाया. कोई बात नहीं. रचित तो समझता है न मुझे. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.
रूपा एक सपना देख रही है. वह है, उस की बच्ची है, रचित और प्रथम है. एक बहुत ही प्यारा सा, रंगीन सा प्रथम और बच्ची गोद में सोई है. रचित और मां उस के बगल में बैठे हैं. सभी बहुत खुश हैं.
अचानक नींद से जग जाती है रूपा. चारों तरफ देखती है…
ऐसा सपना, जिस का जाग्रत अवस्था से कोई संबंध नहीं. लेकिन सपने की खुशी उस के चेहरे पर झलक आती है. कभी न कभी यह सपना भी सच होगा, जरूर होगा.
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लेखिका- कात्यायनी सिंह
रहरहकर उस का दिल धड़क रहा था. मन में उठते कई सवाल उस के सिर पर हथौड़े की तरह चोट कर रहे थे. यह क्या हो गया? भूल किस से हुई? या भूल हुई भी तो क्यों हुई? मन में उभरते इन सवालों का दंश झेल पाना मुश्किल हो रहा था. अभी बेटी के होस्टल में पहुंचने में तकरीबन 3 घंटे का समय था. बस का झेलाऊ सफर और उस पर होस्टल से किया गया फोन कि आप की बेटी ने आत्महत्या करने की कोशिश की है…
अपने अंदर झांकने की हिम्मत नहीं हुई. स्मृति पटल पर जमी कई परतें, परत दर परत सामने आने और ओझल होने लगीं. दिल बैठा जा रहा था. अवसाद गहरा होता जा रहा था. तन का बोझ भी सहना मुश्किल और आंखों से बहती अविरल धारा…
वह खिड़की के सहारे आंखें मूंदे, दिल और दिमाग को शांत करने की कोशिश करने लगी. पर एकएक स्मृति आंखों में चहलकदमी करती हुई सजीव होने लगी. वह घबरा कर खिड़की से बाहर देखने लगी. आंखों की कोरों पर बांधा गया बांध एकाएक टूट कर प्रचंड धारा बन गया. यों तो जिंदगी करवट लेती है, पर इस तरह की उस का पूरा वजूद दूसरी शादी के नाम पर स्वाह हो जाए. क्योंकि उस ने दूसरी शादी? क्या मिला उसे? स्वतंत्र वजूद की चाहत भी तो अस्तित्वहीन हो गई?
पर समाज का तो एक अलग ही नजरिया होता है. तलाकशुदा स्त्री को देख लोगों की आंखों में हिकारत का कांटा चुभ सा जाता है. और उस कांटे को निकालने के लिए ही तो रूपा ने दूसरी शादी की.
पहली शादी और तलाक को याद कर मन कसैला नहीं करना चाहती अब. पर न चाहने से क्या होता है. तलाक के 10 साल पहले ही बेटी उस की गोद में आ चुकी थी. शादी के 2 दिन बाद ही सपने बिखरने की आहट सुनाई देने लगी थी. सुनहरे दिन और सपनों में नहाई रात, सब इतनी भयावह कैसे हो गई? वह आज तक समझ नहीं पाई.
हर रोज की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना उसे जिंदगी से बेजार करने लगी थी और उस के नीचे कराहता उमंगों भरा मन. पहलेपहल भरपूर विरोध किया रूपा ने. पर दिन, महीने और 7 साल बीतते चले गए और उस का धैर्य क्षीण होता रहा. पर एक दिन… उसी विरोध के महीन परतों के नीचे ज्वालामुखी के असंख्य कण फूट पड़े. और अंतत: उसे तलाक की पहल भी करनी पड़ गई…
2 साल लगे इस अनचाही पीड़ादायी परिस्थिति से नजात पाने में. तलाक के बाद बेटी को साथ ले कर वो एक अनजान सफर पर निकल गई. मंजिल उस को पता नहीं थी. इस असमंजस की स्थिति के बावजूद वह तनावमुक्त महसूस कर रही थी खुद को. आखिर 2 सालों के संघर्ष ने नारकीय जीवन से मुक्ति जो दिलाई थी. कुदरत ने मेहरबानी दिखाई और 1 हफ्ते में ही रेडियो स्टेशन में नौकरी लग जाने के कारण उसे कोई आर्थिक तंगी का एहसास नहीं हुआ. और फिर मायके का सहारा भी संबल बना.
उगते सूरज की लालिमा उस के गालों पर उतरने लगती थी, जब रेडियो स्टेशन में उसे एक पुरुष प्यार से देखता था. अच्छा लगता था उसे यों किसी का देखना. 2 वर्ष का अकेलापन ही था, जो अनजान पुरुष को देख कर पिघलने लगा.
पिछली यादों में तड़पता उस का मन कहता कि मुझे इस सुख की आशा नहीं करनी चाहिए अब. मेरे हिस्से में कहां है सुख… और अजीब सी उदासी मन को उद्वेलित करने लगती.
उफ्फ, यह अचानक आज मुझे क्या हो रहा है? 2 सालों के अकेलेपन में कभी भी इस तरह का खयाल नहीं आया. अकेलापन, उदासी, सबकुछ अपनी बेटी की मुसकान तले दब चुकी थी. फिर आज क्यों? जबकि उस ने तलाक के बाद किसी भी पुरुष को अपने दायरे के बाहर ही रखा. अंदर आने की इजाजत नहीं दी किसी को. पर आज इस पुरुष को देख कर क्यों तपते रेगिस्तान में बारिश की बूंदों जैसा महसूस हो रहा है.
‘क्या ये कोई स्वप्न है या फिर पिछले जन्म का साथ. क्यों मेरी नजरें बारबार उस की ओर उठ रही हैं? क्यों वह उसे अनदेखा नहीं कर पा रही है? मन में एक सवाल- क्या कुदरत को कुछ और खेल खेलना है? इसी उधेड़बुन में शाम हो गई,’ उस ने अपने बैग को कंधे पर लटकाया और बाहर निकल आई.
पूस की सर्दी में भी उस के माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिला रही थीं. चेहरे पर शर्म भरी मुसकराहट खिल उठी. तो क्या उसे प्यार हो गया है? एकाएक उस की मुद्रा ने गंभीरता का आवरण ओढ़ लिया. सोचने लगी, ‘उस का मकसद तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी का भविष्य बनाना है. नहींनहीं, वह इन फालतू के बातों में नहीं पड़ेगी.’
तभी उसे एक आवाज ने चौंका दिया, ‘‘चलिए मैं आप को घर छोड़ देता हूं. कब तक यहां खड़ी रह कर रिकशे का इंतजार करेंगी. अंधेरा भी तो गहरा रहा है.’’
पलट कर देखा तो वही पुरुष था, जो उस के दिलोदिमाग पर छाया हुआ था. वैसे अंधेरे की आशंका तो उस के मन में भी थी. वह बिना कुछ जवाब दिए उस की कार में बैठ गई. मध्यम स्वर में गाना बज रहा था-
धीरेधीरे से मेरी जिंदगी में आना
धीरेधीरे से दिल को चुराना…
वह चुपचाप बैठ बाहर के अंधेरे में झांकने की असफल कोशिश रही थी. तभी उस ने हंस कर पूछा, ‘‘अंधेरे से लड़ रही हैं या मुझे अनदेखा कर रही हैं?’’
वह भी मुसकरा दी, ‘‘अपने वजूद को तलाश रही हूं. आप घुसपैठिए की तरह
जबरदस्ती घुस आए हैं, इसी समस्या के निवारण में जुटी हूं.’’
खिलखिला कर हंस पड़ा वह. लगा जैसे चारों तरफ हरियाली बिखर गई हो. इन्हीं बातों के दरमियान घर आ गया और वह बिना कुछ कहे गाड़ी से उतर कर जाने लगी. तभी उस ने विनती भरे स्वर में उस का मोबाइल नंबर मांगा. पहले तो वह झिझकी, लेकिन फिर कुछ सोच कर नंबर दे दिया.
दिन बीतने के साथ बातों का और फिर मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. वह नहीं चाहती थी कि रचित हर शाम उस से मिलने आए. क्योंकि एक तो बदनामी का डर और दूसरी तरफ बेटी जिस की नजरों का सामना करना मुश्किल होता. मन की आशंकाएं उसे परेशान करती कि उस के जानने के बाद, क्या वह बेझिझक उस के सामने जा पाएगी? पर दफ्तर के बाद का खाली समय उसे काटने दौड़ता. झिझक और असमंजस के बीच वह मिलने का समय होते ही उस के आने की राह भी देखती.
तेरे वादों पर हम एतबार कर बैठे
ये क्या कर बैठे, हाय क्या कर बैठे
एक बार मुसकरा कर देख क्या लिए
सारी जिंदगी हम तेरे नाम कर बैठे…
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देखती है पलट कर रचित को. नींद में बच्चों सा मासूम, प्यार से अपने गुलाबी होंठ उस के माथे पर टिका देती है. रचित के माथे पर भावनाओं का गुलाबी अंकन देख कर खुद शरमा भी जाती है रूपा. फिर उठ कर चल देती है किचन की ओर. नजदीक पहुंचते ही बरतनों की आवाज सुन कर चौंक गई. अंदर घुसते ही देखती है कि रचित की मां नाश्ता बना रही हैं.
‘‘मां, मैं बना देती हूं न…’’ सुनते ही सास किचन से बाहर निकल गई. सब समझते हुए भी रूपा ने खुद को संयत रख कर बाकी काम निबटाया और नाश्ता ले कर प्रथम के कमरे में दाखिल हुई. बेखबर सो रहे प्रथम को कुछ देर अपलक देखती रही. फिर बड़े प्यार से धीरेधीरे बाल सहलाते हुए बोली, ‘‘उठो प्रथम बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या आज?’’ रूपा की आवाज कानों में पड़ते ही वह घबरा कर जाग गया और अजीब सी नजरों से घूरने लगा. पता नहीं क्यों इतना असहज कर रहा था उस का इस तरह घूरना? नफरत ऐसी कि आंखों में अंगारे दहक रहे हों.
‘‘आप फिर से मेरे कमरे में आ गईं? एक बात हमेशा याद रखिए कि आप सिर्फ पापा की पत्नी हैं, मेरी मम्मी नहीं. मेरी मम्मी की जगह कोई नहीं ले सकता. कोई भी नहीं.’’
स्तब्ध रह गई थी रूपा. रात का सुनहरा सपना ताश के पत्तों की तरह बिखरता नजर आ रहा था उसे. लगभग दौड़ती हुई वह कमरे से बाहर निकल गई.
ऊपर से सब कुछ सामान्य दिख रहा था, पर समय के साथ रचित में भी बदलाव आने लगा. दिनभर औफिस और घर के काम से थक कर चूर हो जाने के बावजूद रात में बिस्तर पर नींद का नामोनिशान तक नहीं. रचित से भी वो अब कुछ नहीं कहती. बस अपनी एक बात उसे अचंभित कर जाती थी. जिस घुटन और प्रताड़ना के विरुद्ध वह महीनों लड़ी, वह घुटन और प्रताड़ना अब उसे उतना विचलित नहीं करती थी. समय और उम्र समझौता करना सिखा देता है शायद.
आज सुबह से मन उद्विग्न हो रहा था बारबार. रहरह कर दिल में एक अजीब सी टीस महसूस हो रही थी. जैसेतैसे काम खत्म कर के चाय पीने बैठी ही थी कि दीया के होस्टल से फोन आ गया. चकोर को चांद मिल जाने खुशी मिल गई हो जैसे.
लेकिन यह क्या, मोबाइल से बात करते हुए उस के चेहरे पर दर्द का प्रहार महसूस कर सकता था कोई भी. कुछ देर के लिए तो वह मोबाइल लिए हतप्रभ सी बैठी रही. फिर अचानक बदहवास सी उठी और निकल गई बस स्टैंड की ओर.
होस्टल के गेट पर पहुंची तो काफी भीड़ दिखी. अनहोनी की आशंका उस के दिलोदिमाग को आतंकित करने लगी. अंदर जा कर देखा तो बेटी को जमीन पर लिटाया गया था. बेसब्री के साथ पास में बैठ गई और बड़े प्यार से पुकारी,
‘‘दीया बेटे.’’
कोई जवाब नहीं…
शरीर पकड़ कर हिलाया.
रूपा को तो जैसे करंट लग गया हो. इतना ठंडा और अकड़ा हुआ क्यों लग रहा है दीया का बदन. तो क्या?
नहीं…
ऐसा कैसे हो सकता है?
क्यों…?
किंतु अशांत धड़कता दिल आश्वस्त नहीं हो पा रहा था. वह निर्निमेष भाव से अपनी प्यारी परी को देखे जा रही थी. वही मोहक चेहरा…
तभी किसी ने उस के हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया. यह कह कर कि आप की बेटी ने आप के नाम पत्र लिखा है.
डबडबाई आंखों से पत्र पढ़ने लगी-
‘दुनिया की सब से प्यारी ममा…’
आप को खूब सारा प्यार
आप को खूब सारी खुशियां मिले. सौरी ममा, मैं आप से मिले बगैर जा रही हूं. ये दुनिया बहुत खराब है ममा. तुम्हारे तलाक और शादी को ले कर बहुत गंदीगंदी बातें करते थे स्कूल के स्टूडैंट्स. कहते थे तेरी मां… छोड़ न मां.
मैं जानती हूं तुम्हारे बारे में. लेकिन मां, मैं तंग आ गई थी उन के तानों से.
तुझ से नहीं बताया कि तू इतनी खुश है, परेशान हो जाओगी ये सब जान कर. मां, अब मुझे कोई परेशान नहीं करेगा. और तुम भी शांति से रह पाओगी.
हमेशा खुश रहना मां.
‘-तुम्हारी परी दीया.’
वह अपनेआप को रोक नहीं पाई. अचेत हो कर लुढ़क गई रूपा. पर उस अर्ध चेतनावस्था में भी वह मंदमंद मुसकरा रही थी.
वह अचानक उठ कर बैठ गई और खूब जोर से हंस पड़ी. उसे लगा वह तो न नए पति और उस के बच्चे की बन पाई न ही अपनी वाली को संभाल पाई. मां बनने की इतनी बड़ी कीमत देनी होगी इस का अंदाजा नहीं था.
दिल चिथड़े कर डालने वाली हंसी…
अगला दिन…
दुनिया के लिए एक सामान्य दिन जैसा ही सवेरा था.
सिवाय रूपा के…
अगर शीला कभी दबी जबान से कह देती, ‘‘माताजी, आप को ध्यान नहीं रहा है. घी आप ने पिछले महीने दिया था, कल तो तेल निकाला था. बाबूजी परसों बाजार से नमक लाए थे, शक्कर तो वे 15 दिन पहले लाए थे,’’ तो रमेश की मां पैतरा बदल कर गरजतीं, ‘‘हांहां, मैं तो सठिया गईर् हूं. मु?ो कुछ याद थोड़े ही रहता है. देखो तो… मु?ा से जबान लड़ाती है. तेरे बाप के घर में हराम की कमाई आती होगी. सो, तेरी मां फूहड़पन से लुटाती होगी. यहां तो बीस नाखूनों की कमाई खाते हैं. अगर आंख खोल कर न चलें, तो रोटी मिलना भी मुश्किल हो जाए. अभी तो मेरा खसम ही सारे घर को कमा कर खिला रहा है. जिस दिन रमेश कमाने लगेगा, उस दिन तो तू बोलने भी नहीं देगी.’’
शीला के सब्र ने रमेश की मां को पागल सा बना दिया था. वे चाहती थीं कि बहू उन से लड़े, जिस से उन्हें बात आगे बढ़ाने का मौका मिले. पर रमेश की मां के तीखे वचन शीला की चुप्पी में इस तरह घुल जाते, जैसे पानी में अंगारा बु?ा जाता है.
कहने का कोई खास असर न देख कर सास ने और तरीका शुरू किया. वे ढके हुए दूध, घी, चीनी, आटे को खोल कर रख देतीं और सब को दिखादिखा कर शीला को ‘लापरवाह’, ‘फूहड़’ कहतीं. आंख बचा कर दालसाग में नमक डाल देतीं और घर वालों द्वारा ज्यादा नमक की शिकायत करने पर बरस पड़तीं, ‘‘इसे घर का काम कुछ आता ही नहीं है. आए भी कहां से? कल तक तो पढ़ने के बहाने शहर में घूमती फिरी है. अब भला घर में इस का मन लगेगा?’’
शीला ने एकाध बार रमेश से इस बारे में शिकायत की, तो उस ने मां का पक्ष लेते हुए शीला को ही फटकार दिया, ‘‘मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो पत्नी का मुंह देखते ही मांबाप को भूल जाते हैं. आगे से मेरे मांबाप के खिलाफ अगर तुम ने एक बात भी कही, तो अच्छा नहीं होगा.
‘‘कान खोल कर सुन लो, तुम्हारी हैसियत इस घर में एक नौकरानी से ज्यादा नहीं है. ठीक से काम करोगी तो यहां रह सकती हो, नहीं तो तुम्हारे मांबाप के पास पहुंचा दिया जाएगा. मैं औरत को पैर की जूती से ज्यादा नहीं सम?ाता. अगर जूती पैर में काटती है, तो फौरन उसे फेंक कर दूसरी पहन लेनी चाहिए.’’
चक्रव्यूह में घिरे अभिमन्यु के समान शीला सब के वार से बच रही थी. सब के ताने सहन कर रही थी. उस के वार करने का तो सवाल ही नहीं था. अभिमन्यु के साथ उस के शस्त्र व सारथी तो थे. शीला बेचारी अकेली अपना समय किसी तरह बिता रही थी. जो सताया जा रहा था, वह चुप था और जो सता रहा था, वह उलटे हल्ला मचा रहा था.
एक दिन शीला चूल्हे पर दूध गरम कर रही थी कि स्नानघर से रमेश की मां ने पुकारा, ‘‘बहू, ओ बहू. अरे, सुनती हो, जरा मेरी पीठ मल देना.’’
दूध में उबाल आने ही वाला था, इसलिए शीला ने जवाब दिया, ‘‘एक मिनट रुकिए मांजी, अभी आती हूं.’’
इतना सुनते ही रमेश की मां का पारा चढ़ गया, ‘‘मैं यहां गीले कपड़ों में बैठी रहूं? बूढ़ा शरीर है, बुखार आ गया तो कोई पानी भी नहीं देगा. पहले तो कहने से उलटासीधा काम कर भी देती थी. अब यह ‘एक मिनट’ न जाने कहां से सीख गई है. मैं जानती हूं, पढ़ेलिखों का एक मिनट कितना बड़ा होता है.’’
इतने पर भी शीला नहीं आई और उस की आवाज ही सुनाई दी, ‘‘मांजी, दूध में उबाल आने वाला है. छोड़ आऊं तो सारा दूध चूल्हे में चला जाएगा. अगर उतार कर नीचे रख दूं, तो पिताजी घर में हल्ला करेंगे कि अभी तक दूध भी गरम नहीं हुआ.’’
इतना सुनना था कि रमेश की मां कपड़े कूटने वाली लकड़ी हाथ में ले कर गीली धोती पहने ही चौके की ओर ?ापटीं. वे गुस्से में कहती जा रही थीं, ‘‘बेहया, अपने आलस को तो देखती नहीं, जो जवानी में ही हिलनेडुलने को मन नहीं होता, ऊपर से दुनियाभर के बहाने बनाती है.’’
शीला कुछ सम?ा पाए कि उस से पहले ही रमेश की मां ने उस की पीठ पर लकड़ी जोर से दे मारी.
शीला इस के लिए पहले से तैयार थी. उस ने लकड़ी को हाथ से पकड़ते हुए कहा, ‘‘मांजी, मारने से पहले मेरा दोष तो देख लिया होता. मैं सबकुछ चुपचाप सह रही हूं, तो इस का मतलब यह नहीं है कि मैं इनसान नहीं हूं. मेरा भी शरीर है, मु?ो भी तकलीफ होती है.’’
रमेश की मां बहुत दिनों से जिस मौके की तलाश में थी, वह उसे आज मिल गया. उस ने अपने सिर के बाल नोचने शुरू कर दिए और रोतेचिल्लाते सारा घर सिर पर उठा लिया, ‘‘हाय रे, यह दिन देखना भी मेरी तकदीर में लिखा था. अभी तो मेरे हाथपैर चलते हैं. इतने पर भी मु?ो मारने के लिए लकड़ी ले कर खड़ी हो गई. अगर मेरे हाथपैर टूट गए, तो यह न जाने क्या हालत करेगी.
‘‘मैं तो पहले ही कहती थी कि पढ़ीलिखी बहू घर में मत लाओ, पर मेरी सुनता कौन है? जिसे पिटना हो, वह रहे इस घर में. मैं तो गंगा के किनारे या किसी तीर्थ में जा पड़ूंगी. कहीं भी
दो रोटी तो मिल ही जाएगी.’’
शीला यह नाटक देख कर सहम गई. उस ने सिर ?ाका कर सब के सामने सच्ची बात कह दी कि मांजी ने उसे लकड़ी से बेबात मारा, तो उस ने लकड़ी पकड़ ली.
घर के ज्यादातर लोगों को विश्वास हो गया कि शीला ने सास को मारने के लिए ही लकड़ी उठाई होगी. यह स्वाभाविक है कि हर अपराधी अपना अपराध दूसरे पर थोपता है. वह भी ऐसा ही कर रही होगी.
रमेश ने न तो अपने पिता की सुनी और न ही गांव वालों के सम?ाने पर ध्यान दिया. शीला की बात का तो उस पर असर ही क्या होता? उस ने शीला को उस के पिता के यहां पहुंचा दिया और घोषणा कर दी कि वह अब उन के किसी काम की नहीं रही.
शीला के पिता ने बहुत सम?ाया. उस की मां ने भी बहुत कहा, पर रमेश के पास सब का एक ही जवाब था, ‘‘अगर जूती काटने लगे, तब आप उसे उतार कर दूसरी जूती पहनेंगे या उसी को लटकाए रहेंगे?’’
रमेश की मां को विश्वास था कि पहले तो शीला का बाप ही हजार बार माथा रगड़ेगा और माफी मांगेगा. वे उसे अपने दरवाजे से भगाएंगी और वह हाथ जोड़ेगा. अगर अकड़ा भी रहा, तो रमेश की दूसरी शादी होते देर नहीं लगेगी.
पर, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. शीला के पिता ने रमेश के दरवाजे पर माथा रगड़ने के बजाय शीला को कालेज में दाखिला दिलाना अच्छा सम?ा. रमेश की मां ने शीला को बेवजह जितना सताया था, वह सब भी महल्लापड़ोस और रिश्तेदारों से नहीं छिपा था. सब को यह भी डर था कि रमेश की दूसरी शादी होने पर शीला का पिता कोर्टकचहरी जाएगा. 498ए का केस कर देगा. इन बातों ने ऐसा माहौल बनाया कि 2 बरस तक रमेश के लिए रिश्ता तो ले कर कोई नहीं आया, उलटे सारे गांव में रमेश की भी बेइज्जती हो गई.
रमेश के मांबाप ने बहुत कोशिश की, पर सब बेकार रहा. कोई बिरादरी वाला रुपया ले कर भी रमेश की शादी करने को तैयार नहीं हुआ.
मजबूर हो कर रमेश अनाथालय से एक लड़की भगा ले आया. गांव में
2-4 गरीब ठाकुर अनाथालय से लड़कियां ला कर शादी कर चुके थे, इसलिए किसी ने कुछ नहीं कहा. पर वे कागजी पढ़ीलिखी थीं.
गांव के लोग खुश थे कि रमेश की मां का दिमाग ठिकाने आ गया है. वे बातबात पर अपने ऊंचे खानदान की दुहाई देती थीं. अब वे उन्हीं के समान साधारण बन गईर् थीं. अब वे कभी भी बड़ी बात नहीं कहेंगी.
उधर रमेश को डर रहता कि कहीं शीला की वजह से यह लड़की भाग न जाए. उसे इस लड़की के बारे में पता था कि वह कई मर्दों के साथ सो चुकी है, जो उस के धंधे का हिस्सा था. और कोई नहीं मिला, इसलिए एक जानकार की मारफत उसे लाया था.
रमेश की मां को इतना बड़ा धक्का लगा, पर उन्होंने इस से कोई सीख नहीं ली. उन्होंने अनाथालय से लाई आवारा लड़की शांता को भी उसी तरह सताना शुरू कर दिया, जिस तरह वे शीला
को सताया करती थीं. शांता बिलकुल सहनशील नहीं थी. वह तो पहले दिन ही रमेश की मां का सामना करने लगी.