यह कैसा प्यार – भाग 2 : मर्यादा की दहलीज

रमा की तरफ से उसे कोई जवाब नहीं मिला. विजय समझ गया कि वशीकरण, तंत्रमंत्र जैसा कुछ नहीं, सब बेवकूफ बनाते हैं. लेकिन रमा की तरफ विजय का लगाव निरंतर बढ़ता जा रहा था. फिर वह सोचने लगा कि शायद मुझ से ही कोई चूक हो गई हो. सब तो गलत नहीं हो सकते. क्यों न अब की बार प्रयोग तांत्रिक से ही करवाया जाए.

विजय ने बंगाली बाबा नाम के व्यक्ति को फोन लगाया. बाबा ने कहा, ‘‘मैं सौ टके तुम्हारा काम कर दूंगा. लेकिन तुम्हें श्मशान की राख, उल्लू का जिगर, किसी मुर्दे की हड्डी लानी पड़ेगी. यदि नहीं ला सकते तो हम सामान की अलग से फीस लेंगे. साथ में, हमारी फीस. जिस का वशीकरण करना है उस की पूरी जानकारी नाम, पता, फोटो, मोबाइल सब हमारे मेल पर भेजना होगा. और अपना विवरण भी. फीस हमारे बताए अकाउंट में जमा करनी होगी.’’

विजय जानतेसमझाते हुए भी बेवफूफ बन गया. रमा की फोटो कालेज फंक्शन के गु्रप में उस के पास थी. उस ने उस फोटो की एक और फोटो निकाल कर पोस्टकार्ड साइज में रमा की फोटो स्टूडियो से बनवा ली. सारी सामग्री बाबा को मेल कर दी. फीस अकाउंट में जमा कर दी. लेकिन कई दिन बीतने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ. विजय समझ गया कि तंत्रमंत्र का बाजार झाठ और धोखे पर आधारित है.

रमा के पिता ने विजय को घर बुला कर कहा, ‘‘तुम घर के लड़के हो. रमा के लिए लड़के वाले देखने आए थे. उन्होंने रमा को पसंद कर लिया है. मैं चाहता हूं तुम मेरे साथ चलो. हम भी उन का घरपरिवार देख आएं.’’

विजय चाह कर भी मना न कर सका. लड़के वालों ने अच्छा स्वागतसत्कार किया. रमा के पिता ने विवाह की स्वीकृति दे दी.

विजय ने बातोंबातों में लड़के का मोबाइल नंबर ले लिया. साथ ही, घर का पता दिमाग में नोट कर लिया. विजय भलीभांति जानता था कि वह जो कर रहा है और करने वाला है, वह गलत है. लेकिन उस ने स्वयं को समझाया कि रास्ता गलत है, पर मकसद तो अपने प्यार को पाना है. विजय ने रमा के चरित्रहनन की झठी कहानी बना कर लड़के के पते पर भेजी. साथ ही, रमा को पढ़ाने वाले प्रोफैसर, उस की सहेलियों को भी रमा के विषय में लिख भेजा.

एकदो पत्र तो उस ने महल्ले के लड़कों के नाम, एक अधेड़ प्रोफैसर के नाम इस तरह भेजे मानो रमा अपने प्रेम का इजहार कर रही हो. बात तेजी से फैली. कुछ लोगों ने रमा को पत्र का जवाब लिखा. कुछ लोगों ने उस के पिता को पत्र दिखाया. न जाने कितने प्रकार के अश्लील पत्र रमा की तरफ से विजय ने भेजे.

कालेज, महल्ले में तमाशा खड़ा हो गया. रमा को समझ ही नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है. जितनी सफाई रमा और उस का परिवार देता, मामला उतना ही उछलता. लड़कियों को ले कर भारतीय समाज संवेदनहीन है. सब मजे लेले कर एकदूसरे को किस्से सुना रहे थे.

हालांकि समझने वाले समझ गए थे कि किसी ने शरारत की है लेकिन सम?ाने के बाद भी लोग अश्लील पत्रों का आनंद ले कर एकदूसरे को सुना रहे थे. प्रोफैसर ने तो अपने कक्ष में बुला कर रमा को अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं.’’ जब रमा ने थप्पड़ जमाया तब प्रोफैसर को समझ आया कि वे धोखा खा गए.

लड़के के मोबाइल पर अज्ञात नंबर से रमा का प्रेमी बन कर विजय ने यह कहते हुए जान से मारने की धमकी दी कि रमा और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं पर घर वाले उस की जबरदस्ती शादी कर रहे हैं. यदि तुम ने शादी की तो मार दिए जाओगे.

लड़के वालों के परिवार ने रिश्ता तोड़ दिया. अच्छीभली लड़की का पूरे महल्ले में तमाशा बन गया. बेगुनाह होते हुए भी रमा और उस का परिवार किसी से नजर नहीं मिला पा रहे थे.

विजय को अनोखा आनंद आ रहा था. उस के मातापिता का उजाड़ चेहरा देख कर उसे लग रहा था कि मंजिल अब करीब है.

रमा के पिता तो शहर छोड़ने का मन मना चुके थे. पुलिस में रिपोर्ट करने पर पुलिस अधिकारी ने उलटा उन्हें ही सम?ा दिया, ‘‘लड़की का मामला है, आप लोगों की खामोशी ही सब से बढि़या उत्तर है. जितनी आप सफाई देंगे, जांच करवाएंगे, आप की ही मुसीबत बढ़ेगी.’’

विजय को फोन कर के रमा के पिता ने अपने घर बुलाया. रमा की मां का रोरो कर बुरा हाल था. रमा के पिता ने उदास स्वर में विजय से कहा, ‘‘पता नहीं मेरी बेटी से किस की क्या दुश्मनी है कि उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया. उस की शादी टूट गई. हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. बेटा, तुम तो जानते हो रमा को अच्छी तरह से.’’

विजय ने अपनी खुशी को छिपाते हुए गंभीर स्वर में कहा, ‘‘जी अकंलजी, मैं तो बचपन से देख रहा हूं. रमा पाकपवित्र लड़की है. मैं तो आंख बंद कर के विश्वास करता हूं रमा पर.’’

‘‘बेटा, तुम रमा से शादी कर लो,’’ रमा के पिता ने हाथ जोड़ते हुए विजय से कहा, ‘‘मैं तुम्हारा जीवनभर ऋणी रहूंगा. अन्यथा हम तो शहर छोड़ कर जाने की सोच रहे हैं.’’ रमा दरवाजे के पास छिप कर सुन रही थी और देख रही थी अपने दबंग पिता को नतमस्तक होते हुए.

गांठ खुल गई – भाग 2 : हैसियत का खेल

अस्पताल में गौतम को 5 माह रहना पड़ा. वे 5 माह 5 युगों से भी लंबे थे. कैलेंडर की तारीखें एकएक कर के उस के सपनों के टूटने का पैगाम लाती रही थीं.

उसे कालेज से निकाल दिया गया तो दोस्तों ने भी किनारा कर लिया. महल्ले में भी वह बुरी तरह बदनाम हो चुका था. कोई उसे देखना नहीं चाहता था.

श्रेया के आरोप पर किसी को विश्वास नहीं हुआ तो वह थी इषिता. वह उसी कालेज में पढ़ती थी और गौतम की दोस्त थी. वह अस्पताल में उस से मिलने बराबर आती रही. उसे हर तरह से हौसला देती रही.

गौतम घर आ गया तो भी इषिता उस से मिलने घर आती रही. शरीर के घाव तो कुछ दिनों में भर गए पर आत्मसम्मान के कुचले जाने से उस का आत्मविश्वास टूट चुका था.

मन और आत्मविश्वास के घावों पर कोई औषधि काम नहीं कर रही थी. गौतम ने फैसला किया कि अब आगे नहीं पढ़ेगा.

परिजनों तथा शुभचिंतकों ने बहुत सम?ाया लेकिन वह फैसले से टस से मस नहीं हुआ.

इस मामले में उस ने इषिता की भी नहीं सुनी. इषिता ने कहा था, ‘‘ पढ़ना नहीं चाहते हो तो कोई बात नहीं. क्रिकेट में ही कैरियर बनाओ.’’

‘‘मेरा आत्मविश्वास टूट चुका है. कुछ नहीं कर सकता. इसलिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो,’’ उस ने दोटूक जवाब दिया था.

वह दिनभर चुपचाप घर में पड़ा रहता था. घर के लोगों से भी ठीक से बात नहीं करता था. किसी रिश्तेदार या दोस्त के घर भी नहीं जाता था. हर समय चिंता में डूबा रहता.

पहले छुट्टियों में पिता की दुकान संभालता था. अब पिता के कहने पर भी दुकान पर नहीं जाता था. उसे लगता था कि दुकान पर जाएगा तो महल्ले की लड़कियां उस पर छींटाकशी करेंगी तो वह बरदाश्त नहीं कर पाएगा.

इसी तरह घटना को 2 वर्ष बीत गए. इषिता ने ग्रैजुएशन कर ली. जौब की तलाश की, तो वह भी मिल गई. बैक में जौब मिली थी. पोस्टिंग मालदह में हुई थी.

जाते समय इषिता ने उस से कहा, कोलकाता से जाने की इच्छा तो नहीं है पर सवाल जिंदगी का है. जौब तो करनी ही पड़ेगी, पर 6-7 महीने में ट्रांसफर करा कर आ जाऊंगी. विश्वास है कि तब तक श्रेया को दिल से निकाल फेंकने में सफल हो जाओगे.

इषिता मालदह चली गई तो गौतम पहले से अधिक अवसाद में आ गया. तब उस के मातापिता ने उस की शादी करने का विचार किया.

मौका देख कर मां ने उस से कहा, ‘‘जानती हूं कि इषिता सिर्फ तुम्हारी दोस्त है. इस के बावजूद यह जानना चाहती हूं कि यदि वह तुम्हें पसंद है तो बोलो, उस से शादी की बात करूं?’’

‘‘वह सिर्फ मेरी दोस्त है. हमेशा दोस्त ही रहेगी. रही शादी की बात, तो कभी किसी से भी शादी नहीं करूंगा. यदि किसी ने मुझ पर दबाव डाला तो घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’’

गौतम ने अपना फैसला बता दिया तो मां और पापा ने उस से फिर कभी शादी के लिए नहीं कहा. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

लेकिन एक दोस्त ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘श्रेया से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, यह अच्छी तरह जानते हो. फिर जिंदगी बरबाद क्यों कर रहे हो? किसी से विवाह कर लोगे तो पत्नी का प्यार पा कर अवश्य ही उसे भूल जाओगे.’’

‘‘जानता हूं कि तुम मेरे अच्छे दोस्त हो. इसलिए मेरे भविष्य की चिंता है. परंतु सचाई यह है कि श्रेया को भूल पाना मेरे वश की बात नहीं है.’’

दोस्त ने तरहतरह से समझाया. पर वह किसी से भी शादी करने के लिए राजी नहीं हुआ.

इषिता गौतम को सप्ताह में 2-3 दिन फोन अवश्य करती थी. वह उसे बताता था कि जल्दी ही श्रेया को भूल जाऊंगा. जबकि हकीकत कुछ और ही थी.

हकीकत यह थी कि इषिता के जाने के बाद उस ने कई बार श्रेया को फोन लगाया था. पर लगा नहीं था. घटना के बाद शायद उस ने अपना नंबर बदल लिया था.

न जाने क्यों उस से मिलने के लिए वह बहुत बेचैन था. समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले. अंजाम की परवा किए बिना उस के घर जा कर मिलने को वह सोचने लगा था.

तभी एक दिन श्रेया का ही फोन आ गया. बहुत देर तक विश्वास नहीं हुआ कि उस का फोन है.

विश्वास हुआ, तो पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘तुम से मिल कर अपना हाल बताना चाहती हूं. आज शाम के 7 बजे साल्ट लेक मौल में आ सकते हो?’’ उधर से श्रेया ने कहा.

खुशी से लबालब हो कर गौतम समय से पहले ही मौल पहुंच गया. श्रेया समय पर आई. वह पहले से अधिक सुंदर दिखाई पड़ रही थी.

उस ने पूछा, ‘‘मेरी याद कभी आई थी?’’

‘‘तुम दिल से गई ही कब थीं जो याद आतीं. तुम तो मेरी धड़कन हो. कई बार फोन किया था, लगा नहीं था. लगता भी कैसे, तुम ने नंबर जो बदल लिया था.’’

उस का हाथ अपने हाथ में ले कर श्रेया बोली, ‘‘पहले तो उस दिन की घटना के लिए माफी चाहती हूं. मुझे इस का अनुमान नहीं था कि मेरे झठ को पापा और भैया सच मान कर तुम्हारी पिटाई करा देंगे.

‘‘फिर कोई लफड़ा न हो जाए, इस डर से पापा ने मेरा मोबाइल ले लिया. अकेले घर से बाहर जाना बंद कर दिया गया.

‘‘मुंबई से तुम्हें फोन करने की कोशिश की, परंतु तुम्हारा नंबर याद नहीं आया. याद आता तो कैसे? घटना के कारण सदमे में जो थी. उन्होंने सोर्ससिफारिश की तो श्रेया के पिता ने मामला वापस ले लिया.

पापा के लिए- भाग 2: सौतेली बेटी का त्याग

पूरे 16 साल हो गए इस घर में आए, बचपन की दहलीज को पार कर जवानी भी आ गई, लेकिन नहीं आई तो वह घड़ी, जिस को आंखों में सजाए मैं इतनी बड़ी हो गई. इस बीच अमन और श्रेया तो मुझे थोड़ाबहुत अपना समझने लगे थे लेकिन पापा… हर वक्त उन के बारे में सोचते रहने के कारण मुझ में उन का प्यार पाने की चाह बजाय कम होने के बढ़ती ही जा रही थी. मैं हर वक्त पापा के लिए, अपने छोटे भाईबहन के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहती.

बचपन में कितनी ही बार अमन और श्रेया का होमवर्क पूरा करवाने के चक्कर में मेरा खुद का होमवर्क, पढ़ाई छूट जाते थे. मुझे स्कूल में टीचर की डांट खानी पड़ती और घर में मम्मी की. वे मुझ पर इस बात को ले कर गुस्सा होती थीं कि मैं उन लोगों के लिए क्यों अपना नुकसान कर रही हूं, जिन्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं. जिन्होंने अब तक मुझे थोड़ी सी भी जगह नहीं दी अपने दिल में.

जब 12 साल की थी तो मुझे अच्छी तरह याद है कि एक दिन श्रेया की तबीयत बहुत खराब हो गई थी. मम्मीपापा कंपनी के किसी काम से बाहर गए थे, दादी के साथ हम तीनों बच्चे ही थे. दादी को तो वैसे ही घुटनों के दर्द की प्रौब्लम रहती थी, इसलिए वे तो ज्यादा चलतीफिरती ही नहीं थी. पापामम्मी ने अमन को कभी कुछ करने की आदत डाली ही नहीं थी, उस का हर काम लाड़प्यार में वे खुद ही जो कर देते थे. मुझे ही सब लोगों के तिरस्कार और वक्त ने समय से पहले ही बहुत सयानी बना दिया था. तब मैं ने डाक्टर को फोन कर के बुलाया, फिर उन के कहे अनुसार सारी रात जाग कर उसे दवा देती रही, उस के माथे पर ठंडी पट्टियां रखती रही.

अगले दिन जब मम्मीपापा आए श्रेया काफी ठीक हो गई थी. उस ने पापा के सामने जब मेरी तारीफ की कि कैसे मैं ने रात भर जाग कर उस की देखभाल की है, तो उन कुछ

पलों में लगा कि पापा की नजरें मेरे लिए प्यार भरी थीं, जिन के बारे में मैं हमेशा सपने देखा करती थी.

उस के बाद एक दिन वे मेरे लिए एक सुंदर सी फ्राक भी लाए. शायद अब तक का पहला और आखिरी तोहफा. मुझे लगा कि अब मुझे भी मेरे पापा मिल गए. अब मैं भी श्रेया की तरह उन से जिद कर सकूंगी, उन से रूठ सकूंगी, उन के संग घूमनेफिरने जा सकूंगी, लेकिन वह केवल मेरा भ्रम था.

2-4 दिन ही रही स्नेह की वह तपिश, पापा फिर मेरे लिए अजनबी बन गए. उन का वह तोहफा, जिसे देख कर मैं फूली नहीं समा रही थी, उन की लाडली बेटी की देखभाल का एक इनाम भर था. लेकिन अब मेरा सूना मन उन के स्नेह के स्पर्श से भीग चुका था. मैं पापा को खुश करने के लिए अब हर वह काम करने की फिराक में रहती थी, जिस से उन का ध्यान मेरी तरफ जाए. अब बरसों बाद मुझे उन के लिए कुछ करने का मौका मिला है, तो मैं पीछे क्यों हटूं? मम्मी की बात क्यों सुनूं? वह क्यों नहीं समझतीं कि पापा का प्यार पाने के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं.

पापा की तबीयत इधर कई महीनों से खराब चल रही थी. बुखार बना रहता था हरदम. तमाम दवाएं खा चुके लेकिन कोई फायदा ही नहीं. अभी पिछले हफ्ते ही पापा बाथरूम में चक्कर खा कर गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल में ऐडमिट करना पड़ा. सारे चैकअप होने के बाद डाक्टर ने साफ कह दिया कि पापा की दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं. अगर हम उन्हें बचाना चाहते हैं तो तुरंत ही एक किडनी का इंतजाम करना होगा. घर का कोई भी स्वस्थ सदस्य अपनी एक किडनी दे सकता है. एक किडनी से भी बिना किसी परेशानी के पूरा जीवन जिया जा सकता है, कुछ लोग हौस्पिटल में मजबूरीवश अपनी किडनी बेच देते हैं, लेकिन फिलहाल तो हौस्पिटल में ऐसा कोई आया नहीं. पापा को तो जल्दी से जल्दी किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत थी. उन की हालत बिगड़ती ही जा रही थी. पापा की हालत देखदेख मेरा मन रोता रहता था. समझ ही नहीं आता था कि क्या करूं अपने पापा के लिए?

हफ्ते भर से पापा अस्पताल में ही ऐडमिट हैं. अभी तक किडनी का इंतजाम नहीं हो पाया है. दादी, श्रेया, मैं, अमन, मम्मी सभी अस्पताल में थे इस वक्त. दादी की किडनी के लिए तो डाक्टर ने ही मना कर दिया था कि इस उम्र में पता नहीं उन की बौडी यह औपरेशन झेल पाएगी या नहीं. दादी के चेहरे पर साफ राहत के भाव दिखे मुझे.

पापा की अनुपस्थिति में मम्मी पर ही पूरी कंपनी की जिम्मेदारी थी, इसलिए वे आगे बढ़ने से हिचक रही थीं, वैसे ही तबीयत खराब होने की वजह से पापा बहुत दिनों से कंपनी की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहे थे. कंपनी के बिगड़ते रिजल्ट इस के गवाह थे. मम्मी भी क्याक्या करतीं. श्रेया तो थी ही अभी बहुत छोटी, उसे तो अस्पताल, इंजैक्शन, डाक्टर सभी से डर लगता था. और अमन, उसे तो दोस्तों के साथ घूमनेफिरने और आवारागर्दी से ही फुरसत नहीं है. पापामम्मी के ज्यादा लाड़प्यार और देखभाल ने उसे निरंकुश बना दिया था. मेरे साथ उस ने भी इस साल ग्रैजुएशन किया है, लेकिन जिम्मेदारी की, समझदारी की कोई बात नहीं. पता नहीं, सब से आंख बचा कर कब वह बाहर निकल गया, हमें पता ही नहीं चला. तब मम्मी ही आगे बढ़ कर बोलीं, ‘‘डाक्टर, अब देर मत करिए, मेरी एक किडनी मेरे पति को लगा दीजिए.’’

लाइव शो के दौरान भोजपुरी सिंगर को लगी गोली, अस्पताल में हुई भर्ती

इन दिनों भोजपुरी स्टार को लेकर एक बुरी खबर सामने आई है. इस बुरी खबर में सिंर के साथ एक घटना घटी है जिसके बाद उनके फैंस हैरान है जी हां, हम बात कर रहे है भोजपुरी सिंगर निशा उपाध्याय की बात जो, अक्सर अपने लाइव पर्फोमेंस देती रहती है लेकिन इस बार उनके साथ कुछ हादसा हो गया है जो कि अब अस्पताल में भर्ती है. बता दें, निशा उपाध्याय के पैर में गोली लग गई है.

 

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आपको बता दें, कि निशा उपाध्याय भोजपुरी सिंगर है जो कि अपने लाइव पर्फोमेंस देती रहती है लेकिन इस बार उनको परफोम करना भारी पड़ गया है गनीमत है कि उनका जान को खतरा  नहीं हुआ है. निशा उपाध्याय बिहार के सारण जिले में परफोम कर रही थी. जहां वो हर बार की तरह स्टेज पर गाना गा रही है औऱ हर बार की तरह उन्हे देखने लोगों की भीड़ उमड़ रखी थी,ऐसे में किसी फैन ने हवा में फाइरिंग शुरु कर दी. जिसके बाद य गोली निशा उपाध्याय के पैर में जा लगी. जिसके बाद उन्हे पटना के अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालांकि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है कि गोली किसे चली.

 

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निशा उपाध्याय की हेल्थ को लेकर अपडेट भी सामने आया है.बताया जा रहा है अस्पताल में डॉक्टर्स ने निशा उपाध्याय के पैर का ऑपरेशन करके गोली को बाहर निकाल दिया है. अब निशा उपाध्याय पहले से बेहतर हालत में हैं और अपने करीबियों से मुलाकात भी कर रही हैं. बताते चलें कि भोजपुरी स्टार्स के साथ ये इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है. इससे पहले खेसारी लाल यादव, पवन सिंह, अक्षरा सिंह सहित तमाम भोजपुरी स्टार्स को फैंस की एक्साइटमेंट का खामियाजा भुगतना पड़ा है.

‘1920- पार्ट 3’ का ट्रेलर रिलीज, भूत बनीं ‘बालिका वधू’ की अविका गौर

हॉरर फिल्म की बात करें तो 1920 सबसे हिट फिल्मों में से एक रही है जिसे शायद ही कोई भूल पाया होगा. जिसमें अदा शर्मा की एक्टिंग को लोगों ने खूब पसंद किया था. जिसका दूसरा पार्ट 1920 Evil return  भी हिट रही थी. अब इसका तीसरा पार्ट आ चुका है जिसे देख लोगों के रोंगटें खड़े हो जाएंगे. इस फिल्म का ट्रेलर इतना डरवाना है जिसक देख कोई भी डर से कापने लग जाएगा. इस फिल्म का नाम दिया है 1920 Horror of  the Heart जिसमें एक्ट्रेल अविका गौर भूत बनीं दिखाई देंगी.

आपको बता दें, कि 1920 के तीसरे पार्ट का ट्रेलर रीलिज हो चुका है जिसे देख लोग की एक्साइटमेंट ओर ज्यादा बड़ गई है. इस बार फिल्म में अविका गौर लीड रोल में हैं. वही अविका गौर, जो बचपन में ‘बालिका वधू’ में आनंदी के किरदार से घर-घर मशहूर हो गई थीं. 1920 Horrors of the Heart में बड़े ही खौफनाक और डरावने सीन हैं, जिन्हें देखकर किसी की भी रूह कांप जाएगी. ट्रेलर में दिखाया गया है कि नदी किनारे एक आलीशान बंगला बना हुआ है. अचानक ही पार्क में लगा झूला हिलता है.तभी अविका गौर की आवाज आती है, ‘मैं बदला लेना चाहती हूं. अपने बचपन का और अपने बाबा की मौत का. अपनी मां और उसके खुशहाल परिवार को बर्बाद करना चाहती हूं.’

लोगों ने दिए ऐसे रिएक्शन

1920 हॉरर्स ऑफ द हार्ट’ में राहुल देव, बरखा बिष्ट, अमित बहल और अवतार गिल नजर आएंगे. फिल्म के ट्रेलर को मिक्स्ड रिस्पॉन्स मिला है. कुछ का कहना है कि पूरी कहानी ही ट्रेलर में दिखा दी है, तो वहीं कुछ ने इसके हॉरर एलिमेंट्स की तारीफ की है. एक यूजर ने लिखा है, ‘कोई 1920 को टक्कर नहीं दे सकता. उसे देखकर तो मुझे हनुमान चालीसा याद आ गई थी.’ एक और यूजर ने लिखा है, ‘1920 मेरी फेवरेट हॉरर फिल्मों में से एक रही है.’ कुछ यूजर्स का कहना है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रहेगी. ये सारे कमेंट्स यूट्यूब पर आए हैं.

 

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कब होगी मूवी रिलीज

1920 Horrors of the Heart को कृष्णा भट्ट ने डायरेक्ट किया है और यह 23 जून को थिएटर्स में रिलीज होगी. फिल्म को हिंदी के अलावा तमिल और तेलुगू में रिलीज किया जाएगा. यह फिल्म साउथ में अच्छा कमा सकती है क्योंकि अविका गौर ने वहां खूब फिल्में की हैं, और काफी पॉपुलर हैं.

Father’s Day Special -हमारी अमृता- भाग 2: क्या अमृता को पापा का प्यार मिला?

वीना ने यह देखा तो खुशी से फूली न समाईं. अमर भी सोचने लगे कि यह विक्षिप्त लड़की कभीकभी इतनी समझ-दार कैसे लगने लगती है.

अमृता ने जब से किशोरावस्था में प्रवेश किया था वीना उसे ले कर बहुत चिंतित रहती थीं. अब उन का घर से बाहर  आनाजाना बहुत कम हो गया था. नौकरों के भरोसे उसे छोड़ कर कहीं जाने का दिल नहीं करता. न जाने क्यों, आजकल उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि अमृता को भी कुछ सिखाना चाहिए. थोड़ा व्यस्त रहने से उस में कुछ सुधार आएगा.

एक दिन घर के लिए जरूरी सामान लाना था. उस दिन कविता कालिज नहीं गई थी. वीना ने कविता को अमृता का खयाल रखने के लिए कहा और खुद बाजार चली गईं.

परदे एवं कुशन खरीद कर जब वह बिल का भुगतान करने लगीं तो पीछे से किसी ने उन के कंधे पर हाथ रख कर आवाज दी, ‘‘वीना…’’ वीना ने पलट कर देखा, कालिज के समय की सहेली ऋतु खड़ी थी. उसे देख कर वह खुशी से पागल हो गईं. भुगतान करना भूल कर बोलीं, ‘‘अरे ऋतु, तू यहां कैसे?’’

‘‘अभी 2 महीने पहले मुझे यहां नौकरी मिली है इसलिए मैं इस शहर में आई हूं. तू भी यहीं है, मुझे मालूम ही न था.’’

‘‘चल ऋतु, किसी रेस्टोरेंट में बैठ कर चाय पीते हैं और पुराने दिनों की याद फिर से ताजा करते हैं.’’

‘‘वीना, क्या तू मुझे अपने घर बुलाना नहीं चाहती? चाय तो पिएंगे पर रेस्टोरेंट में नहीं तेरे घर में. अरे हां, पहले तू बिल का भुगतान तो कर दे,’’ ऋतु बोली.

वीना बिल का भुगतान करने के बाद ऋतु को ले कर घर आ गईं. कविता अमृता को ले कर ड्राइंगरूम में बैठी थी. वह उसे टीवी दिखा कर कुछ समझाने का प्रयास कर रही थी. अपनी बेटियों का परिचय उस ने ऋतु से कराया. कविता ने दोनों हाथ जोड़ कर ऋतु को नमस्ते की किंतु अमृता अजीब सा चेहरा बना कर अंदर भाग गई. ऋतु की अनुभवी आंखों से उस की मानसिक अपंगता छिपी नहीं रही. फिर भी हलकेफुलके अंदाज में बोली, ‘‘वीना, तेरी 2 बेटियां हैं.’’

वीना बोली, ‘‘2 नहीं 3 हैं. मझली बेटी वनिता कालिज गई है,’’ वीना ने बताया.

इस पर ऋतु तारीफ के अंदाज में बोली, ‘‘तेरी दोनों बेटियां तो बहुत सुंदर हैं, तीसरी कैसी है वह तो उस के आने पर ही पता चलेगा.’’

बच्चों की चर्चा छिड़ी तो मानो वीना की दुखती रग पर किसी ने हाथ रख दिया हो. वह बोलीं, ‘‘सिर्फ खूबसूरती से क्या होता है, कुदरत ने मेरी अमृता को अधूरा बना कर भेजा है.’’

‘‘तू दुखी मत हो, सिर्फ तेरे ही नहीं, ऐसे और भी कई बच्चे हैं. मैं मतिमंद बच्चों की ही टीचर हूं और यहां मतिमंद बच्चों के स्कूल में मुझे नौकरी मिली है. तू कल से ही अमृता को वहां भेज दे. उस का भी मन लग जाएगा और तेरी चिंता भी कम होगी.’’

वीना को तो मानो बिन मांगे मोती मिल गया. वह भी कई दिनों से अमृता के लिए ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थी. ऋतु के कहने पर दूसरे ही दिन अमृता का एडमिशन वहां करवा दिया. जब वह एडमिशन के लिए स्कूल पहुंची तो वीना ने कई बच्चों को अमृता से भी खराब स्थिति में देखा, तब उन्हें लगा कि मेरी बच्ची अमृता काफी अच्छी है.

अब वीना की रोज की दिनचर्या में परिवर्तन आ गया. अमृता को स्कूल छोड़ने और वहां से लाने का काम जो बढ़ गया था. थोड़े दिन तक अमृता स्कूल में रोती थी, सामान फेंकने लगती थी, पर धीरेधीरे वह वहां ठीक से बैठने लगी. ऋतु उस का पूरा ध्यान रखती थी.

इस विद्यालय में बच्चों की योग्यता- नुसार उन से काम करवाया जाता था. हर बच्चा मतिमंद होने पर भी कुछ न कुछ सीखने का प्रयास जरूर करता है और यदि उस में लगन हुई तो कुछ अच्छा कर के भी दिखाता है.

ऋतु ने देखा अमृता चित्र बनाने का प्रयास कर लेती है. उस ने वीना को चित्रकला का सामान लाने को कहा. ऋतु ने उसे समझाया कि अमृता को बंद कमरों में न रख कर कभीकभी खुली हवा में बगीचों में घुमाया जाए. झील के किनारे, पर्वतों के पास, रंगबिरंगे फूलों के करीब ले जाया जाए ताकि उस के अंदर की प्रतिभा सामने आए. प्रकृति से प्रेरणा ले कर वह कुछ बनाने का प्रयास करेगी.

वह समय ऐसा था कि वीना ने अमृता को अपनी दुनिया बना लिया. हर समय वह उस के साथ रहतीं, मानो वह अमृता को उस के जीवन के इतने निरर्थक वर्ष लौटाने का प्रयास कर रही थीं. उन की मेहनत रंग लाई. कागज पर अमृता द्वारा बनाए गए पर्वत, झील और फूल सजीव लगते थे. रंगों का संयोजन एवं आकृति की सुदृढ़ता न होने पर भी चित्रों में अद्भुत जीवंतता दिखाई पड़ती थी.

एक से बढ़कर एक- भाग 2: दामाद सुदेश ने कैसे बदली ससुरजी की सोच

‘‘सासूमां अकसर कहतीं कि आप ने जो पैंट पहनी है, वह हम ने दी थी. वही है न? हां, क्या कभी अपनी पत्नी को कोई साड़ी दिलाई या जो हम ने दी थी उसी से काम चलाते हो?

‘‘फिर अपनी बेटी से पूछतीं कि बेटी क्या कोई नया गहना बनवाया या नहीं या गहने भी हमारे दिए हुए ही हैं. गले में अभी तक मामूली मंगलसूत्र ही है. क्या मैं दूं अपने गले का निकाल कर? मैं देख रही थी कि तेरे ससुराल वाले कुछ करते भी हैं या नहीं.

‘‘मेरी सास हमारे घर में आती तब भी वही ढाक के तीन पात. यह थाली हमारी दी हुई है न. यह सैट इतनी जल्दी क्यों निकाला है.

‘‘वह दूरदूर के रिश्तेदारों को हमारा घर दिखाने लातीं और बतातीं कि बेटी की गृहस्थी के लिए हम ने सबकुछ दिया है.

‘‘सुबह होते ही सास का फोन आता कि क्या तुम अभी तक उठी नहीं हो. आज खाने में क्या बना रही हो? खाना बनाने के लिए नौकरानी क्यों नहीं रख लेती. तुम अपनी सास से कह दो कि मैं ने कभी खाना बनाया नहीं है और मेरी मां को भी इस की आदत नहीं है. अगर तुम नौकरानी नहीं रख सकती तो मु झे बताओ, मैं एक नौकरानी तुम्हारे लिए भेज दूंगी, जो तुम्हारे सारे काम कर लेगी?

‘‘हमारी नईनई शादी हुई थी. सो अकसर फिल्म देखने जाते, तो फिर बाहर होटल में ही खाना खा लेते. तो कभी शौपिंग के लिए निकल पड़ते. शुरूशुरू में यह बात मु झे चुभी नहीं. मेरे मातापिता, भैयाभाभी कौन हमें सम झाता? मां तो मेरी बिलकुल सीधीसादी. उस ने देखा कि उस का बेटा यानी मैं तो हूं पूरा गोबर गणेश, फिर अपनी बीवी को क्या सम झाऊंगा. घर में होने वाली कलह से बचने के लिए उस ने मेरी अलग गृहस्थी बसाई. हम दोनों को उस पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन इस से मेरी आंखें पूरी तरह खुल गईं.

‘‘सिर्फ मीठीमीठी बातें और अच्छे शानदार कपड़े पहनने से पेट तो नहीं भरता. मेरी पत्नी को तो दालचावल भी बनाना नहीं आता था. पहले जब मैं ससुराल जाता तो मेरी सास बतातीं कि यह पूरनपूरी नीतू ने ही बनाई है. आज का सारा खाना उसी ने बनाया है. आप को गुलाबजामुन पसंद हैं न, वे भी उसी ने बनाए हैं.

‘‘मेरे घर में मां और भाभी होने के कारण मेरी पत्नी को क्याक्या बनाना आता है, इस का पता ही नहीं चला. उसे पूरनपूरी तो क्या सादी चपाती भी बनाना नहीं आता था. अगर अपनी मां से पूछ कर कुछ बनाना है तो पूछे कैसे? हमारे घर में फोन ही नहीं था. सबकुछ मुश्किल.

‘‘हमारे यहां फोन नहीं था तो उस के मांबाप हमेशा घर में आते कहते कि हमेशा बाहर की चीजें ला कर खाते रहते. मेरी नाराजगी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. जब तक हमारी गृहस्थी अलग नहीं थी, तब सारा खर्च पिताजी और भाईसाहब उठाते थे.

‘‘इसलिए यह बो झ मेरे सिर पर कभी नहीं आया. पैसा कैसे खर्च किया जाए, मितव्ययित कैसे की जाए, मु झे इस का बिलकुल ज्ञान नहीं था. होटल में खाना, घूमना, मौजमस्ती तथा शौपिंग में ही मेरी सारी कमाई खर्च हो जाती थी. पिताजी से पैसा मांगना भी मु झे अच्छा नहीं लगता था. मां मेरी इस मजबूरी को सम झती थीं, इसलिए वे अपने साथसाथ मेरे घर के लिए भी राशन का इंतजाम कर देती थीं.

‘‘अब मु झे जीवन की असलियत का पता चलने लगा था. नईनई शादी की मौजमस्ती अब खत्म हो चली थी. इस से उबरने के लिए अब हमें अपना रास्ता खोज निकालना था और यही सोच कर मैं ने नीतू को सब बातें ठीक से सम झाने का फैसला कर लिया.

‘‘उसी समय शहर से जरा दूर पिताजी का एक प्लाट था. वे उसे मुझे देने वाले हैं यह बात उन्होंने मेरे ससुर को बताई तो उन्होंने घर बनाने के लिए रुपया दिया. हम सब से जरा दूर रहने के लिए गए, इसलिए बहुत से सवाल अपनेआप हल हो जाएंगे. अत: बंगला बनने तक मैं खामोश रहा.

‘‘नए घर में रहने के लिए जाने के बाद मैं ने अपनी पत्नी को सम झाया कि अब मेरी कमाई में ही घर का सारा खर्च चलाना है. उस ने मितव्ययिता शुरू कर दी. हमारा बाहर घूमनाफिरना बंद हो गया. शुरुआत में उसे घर के काम करने में बड़ी दिक्कत आती. इसलिए मैं भी उसे सहायता करता था. धीरेधीरे उस ने खाना बनाना सीख लिया. शहर से जरा दूर होने से अब मेरे सासससुर का आनाजाना जरा कम हो गया था. लेकिन सास जब कभी हमारे घर आतीं, तो फिर शुरू हो जाती कि नीतू तुम कैसे अपनी गृहस्थी चलाती हो. तुम्हारे घर में यह चीज नहीं है, वह चीज नहीं है.

‘‘इस पर नीतू अपनी मां को जवाब देती कि मां तुम्हारी गृहस्थी को कितने साल हो गए? मैं तुम्हारी उम्र की हो जाऊंगी तो मेरे पास भी वे सारी चीजें हो जाएंगी.

‘‘मुझे न बता कर मेरी सास हमारे लिए कोई चीज ले कर आती और कहतीं कि सुदेश बेटा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूं. तुम्हारे पास यह चीज नहीं थी, इसलिए ले आई हूं. यह इंपौर्टेड माल है. मुझे तो इंडियन चीजें जरा भी पसंद नहीं आतीं.

‘‘मैं भी नहले पर दहला मारता कि हां, लेकिन मुझे भी दूसरों की दी हुई चीजें पसंद नहीं आती.

‘‘मेरी पत्नी नीता न मु झ से कुछ कह पाती और न अपनी मां से. लेकिन मेरी नाराजगी की वजह अब वह सम झने लगी थी. वह अब घर के सारे काम खुद करने लगी और मेरे प्यार के कारण अब उस में आत्मविश्वास जागने लगा था. अत: अब उस में धीरेधीरे परिवर्तन होने लगा. अब वह अपनी मां से सीधे कह देती कि मां, अब तुम मेरे लिए कुछ न लाया करो. सुदेश को भी तुम्हारा बरताव पसंद नहीं आता और इस से हम दोनों के बीच मनमुटाव होता है और  झगड़ा होने लगता है.

‘‘दूसरों की भावनाओं को सम झना मेरी सास ने कभी सीखा ही नहीं था और शान दिखाने की आदत कैसे छूटती? अब मु झे अपनी आमदनी बढ़ा कर इन सब से छुटकारा पाना था.

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 2

‘तो मैं क्या करूं? मुझे भी तो घूमने के कभीकभी ही अवसर मिलते हैं,’ शांता का रोषपूर्ण स्वर था.

और अधिक सुनने का साहस न था दीनानाथजी में. सो, कमरे का दरवाजा बंद कर हाथ की किताब रख दी और बत्ती बुझा कर सोने की चेष्टा करने लगे. किंतु कहां थी नींद आंखों में? बंद भीगी पलकों में वे सुनहरे छायाचित्र तैर रहे थे, जो पत्नी के साथ बिताए 40 वर्षों की देन थे.

अपना एकाकीपन आज उन्हें बुरी तरह झकझोर गया. फिर भी स्वाभिमान के धनी थे. इसलिए सुबह होते ही सुकांत से अपने वापस जाने की इच्छा प्रकट की. किंतु सुकांत अटल था अपने निश्चय पर कि बाबूजी यहीं रहेंगे. सो, वे वहीं रहे. सुकांत अकेला ही जरमनी गया. सुकांत के बिना वह पूरा 1 महीना दीनानाथजी ने लगभग मौनव्रत रख कर ही काटा.

और फिर एक दिन उन के दांत में बेहद दर्र्द होने लगा. सारा दिन दर्द से तड़पते रहे. अपने देश में तो दंतचिकित्सक था, जो एक फोन करते ही उन्हें आ कर देख जाता था. दवा तक खरीदने जाना नहीं पड़ता था. वही खरीद कर भिजवा देता था. किंतु यहां? यहां तो वे असहाय से मफलर से मुंह लपेटे दफ्तर से सुकांत के घर लौटने का इंतजार करते रहे. यहां न तो वे गाड़ी चला सकते थे और न ही उन्हें किसी डाक्टर का पता मालूम था.

शाम को सुकांत लौटा तो बाबूजी का सूजा हुआ गाल देख कर सब समझ गया. पिता को गाड़ी में बिठा कर तुरंत दंतचिकित्सक के पास ले गया. 80 डौलर ले कर डाक्टर ने उन्हें देखा और फिर आगे के स्थायी इलाज के लिए लगभग 3,000 डौलर का खर्चा सुना दिया. दवा आदि ले कर जब सुकांत बाबूजी के साथ घर लौटा तो उस का चेहरा खिलाखिला सा था कि बाबूजी को अब आराम आ जाएगा.

किंतु रात को खाने की मेज पर बैठे दलिया खा रहे दीनानाथजी से शांता कह ही उठी, ‘बाबूजी, आप को भारत से स्वास्थ्य संबंधी बीमा पौलिसी ले कर ही आना चाहिए था. अब देखिए न, अभी तो डाक्टर ने 80 डौलर सिर्फजांच करने के ही ले लिए, इलाज में कितना खर्च होगा, कुछ पता नहीं.’

‘बस करो शांता,’ सुकांत कड़े स्वर में बोला, ‘यह मत भूलो कि बाबूजी अपना टिकट खुद खरीद कर आए हैं, तुम से नहीं मांगा है…’

‘तुम भी यह मत भूलो सुकांत कि जो पैसा बाबूजी पर खर्च हो रहा है, वह आखिरकार हमारा है,’ तलवार की धार जैसे इस एक ही वाक्य से दीनानाथजी का सीना चीर कर बहू उठ खड़ी हुई और अपने कमरे में जा कर झटके से दरवाजा बंद कर लिया.

सुकांत स्तब्ध रह गया. शांता के इस लज्जाजनक व्यवहार की तो उस ने कभी कल्पना भी न की थी. दीनानाथजी खामोश, मुंह झुकाए अपमानित से बैठे रहे. बात का रुख यह मोड़ लेगा, उन्हें उम्मीद न थी.

दूसरे दिन सुकांत को अकेला पा कर दीनानाथजी ने उस से अपने वापस लौटने की इच्छा जाहिर की. न चाहते हुए भी सुकांत को उन के निश्चय के आगे झुकना पड़ा. सो, भारत जा रहे अपने एक मित्र के साथ उन के वापस लौटने का प्रबंध कर दिया.

70 वर्ष की आयु में दीनानाथजी ने अपने इस एकाकी जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया. घर में सबकुछ यथास्थान था. पत्नी घर को सदा ही सुव्यवस्थित रखती थी. बैंक में पैसा था और पैंशन भी आती थी. फिर किसी बात की दिक्कत क्यों होगी भला?

यही सब सोचते हुए उन्होंने यारदोस्तों से एक छोटे नौकर के लिए भी कह छोड़ा. किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था.

6 महीने भी न निकल पाए, वे अकेले टूट से गए थे. बहुत सालता था यह एकाकी जीवन. पढ़नेलिखने के शौकीन थे, सो, किताबें पढ़ कर कुछ समय कट जाता था. किंतु आखिर कोई बोलने वाला भी तो होना चाहिए घर में. आखिरकार उन्होंने डायरी लिखनी शुरू की और डायरी के पहले पन्ने पर लिखा, ‘सुकांत व शांता के नाम.’

अंत्येष्टि के सारे कामों से फुरसत पाने के बाद सुकांत को ध्यान आया कि बैंक व घर के कागजों को भी संभालना है. सभी चीजें बड़ी वाली अलमारी में बंद होंगी, वह जानता था. सारे कागज संभालना मां की जिम्मेदारी थी और बाबूजी उन के द्वारा रखी चीजों की जगह को कभी नहीं बदलते थे, यह भी वह जानता था. अलमारी की चाबी उसे पहले की ही तरह एक कागज के लिफाफे में लिपटी मिली. ‘कुछ भी तो नहीं बदला यहां,’ सुकांत सोचता रहा कि सबकुछ वैसा ही है. उस की मां नहीं बदली, बाबूजी नहीं बदले. बदल गया तो केवल वह खुद. और अब पहली बार सुकांत अकेले में फूटफूट कर रोया. घर की सूनी दीवारों ने मानो उसे अपने सीने में समेट लिया.

दूसरे दिन सुबह शांता का फोन आ गया, ‘‘कैसे हो? सब ठीक तो है न? फोन भी नहीं किया तुम ने?’’

‘‘सब ठीक है,’’ सुकांत का दोटूक जवाब था.

‘‘अरे, बोल कैसे रहे हो?’’ आदत के मुताबिक झल्ला उठी शांता, ‘‘हुआ क्या है तुम्हें?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ सुकांत अपनेआप पर नियंत्रण रखे था.

‘‘तो फिर,’’ शांता के स्वर में बेचैनी थी, ‘‘जल्दी ही सब काम निबटा कर वापस आने की कोशिश करो. बैंक के खाते और मकान के कागज तुम्हारे नाम हुए कि नहीं? बाबूजी की वसीयत तो होगी?’’

सुकांत ने बिना उत्तर दिए फोन रखदिया. विरक्ति से भर उठा वह. उस का हृदय मानो हाहाकार कर रहा था कि कैसी है यह स्त्री, जिसे पैसे के सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं देता और क्यों वह स्वयं इतना कमजोर बन गया कि उस ने कभी शांता के इन विचारों पर अंकुश नहीं लगाया. इस भयावह स्थिति का जिम्मेदार वह खुद को मान रहा था.

सुकांत का सिर दर्द से फट रहा था. रिश्तेदार सब अपनेअपने घर चले गए थे, बल्कि सच तो यह था कि सुकांत ने ही हाथ जोड़ कर उन से विनती की थी कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए. कुछ को बुरा भी लगा, किंतु विरोध नहीं किया किसी ने भी. विदेश में बसे लोगों की मानसिकता कुछ भिन्न हो जाती है और यदि साफ शब्दों में कहें तो कुछ ऐसा कि उन का खून सफेद हो जाता है, यही मान कर चुपचाप चले गए सब.

जातेजाते चाची ने खाने के लिए भी पूछा, किंतु सुकांत ने मना कर दिया. पर अब एक प्याला चाय या कौफी चाहिए थी उसे, सो रसोई में चला गया. कौफी तो थी ही नहीं, क्योंकि मांबाबूजी चाय ही पीते थे. चीनी व चाय की पत्ती 2 डब्बों में मिल गई. दूध नहीं था. सो, बिना दूध की चाय ही बना ली. फिर रसोई में पड़े स्टूल पर बैठ गया.

उसे अच्छी तरह याद था कि मां रसोई में काम करती रहती थीं और बाबूजी इसी स्टूल पर बैठे उन से बातें करते हुए उन का हाथ बंटाने की कोशिश करते रहते. एक हूक सी उठी सुकांत के हृदय में… कितने अच्छे थे वे दिन…अपनेआप में परिपूर्ण और जीवंत. उसे लगा कि अब वह एक बनावटी जिंदगी जी रहा है.

चाय पी कर सुकांत का मन कुछ हलका हुआ तो उस ने यह सोच कर अलमारी खोली कि आखिर कागजों का काम तो निबटाना ही होगा. बड़ीबड़ी 2 फाइलों में बाबूजी ने सारे कागज सिलसिलेवार लगा रखे थे. उन्हीं कागजों में उन की वसीयत भी थी. वैसे वसीयत की कोई खास आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि सुकांत अपने मातापिता की अकेली संतान था. किंतु दीनानाथजी की आदत हर काम को पक्के तौर पर करने की थी. आगेपीछे बहुत रिश्तेदार थे और सुकांत उतनी दूर विदेश में…किसी का क्या भरोसा?

Father’s Day Special- मौहूम सा परदा: भाग 2

राबिया बेगम की इंगलैंड जाने की पेशकश सुन कर उन के दिमाग में 2 दिनों पहले बहू का बेहूदा डायलौग, ‘और लोगों की नजरों पर मोहूम सा परदा भी पड़ा रहेगा,’ और उस के बाद उस की बेहया हंसी की याद उन्हें करंट का सा झटका दे गई. वे समझ गए कि बात राबिया बेगम तक पहुंच गई है, और उन्हें गहरे चुभ गई है. सोच कर वे बेहद मायूस हो गए. मगर बोले, ‘‘बेगम, अपने पासपोर्ट पता नहीं कब से रिन्यू नहीं हुए, शायद नए ही बनवाने पड़ें. अब इस उम्र में यह सब झंझट कहां होगा.’’

‘‘अरे, ऐसे कौन से बूढ़े हो गए हैं आप. और ये पासपोर्ट सिर्फ एक टर्म ही तो रिन्यू नहीं हुए हैं. ब्रिटिश एंबैसी के कल्चरल सैंटर में मेरी एक शार्गिद है, शायद वह कुछ मदद कर सके. कोशिश कर के देखते हैं, कह कर राबिया बेगम ने दोनों पासपोर्ट उन के आगे रख दिए और एक गहरी सांस ले कर बेबस निगाहों से डा. जाकिर की तरफ देखा तो वे फैसला करने को मजबूर हो गए.’’

जाकिर साहब की जानपहचान और व्यवहारकुशलता से एक महीने में दोनों के पासपोर्ट बन गए. अभी तक घर में उन्होंने इस बारे में खुल कर किसी से बात नहीं की थी. अब जब उन्होंने अपने दोनों के लंदन जाने की बात कही तो अजीब सी प्रतिक्रिया मिली. राबिया बेगम के लंदन जाने पर किसी को एतराज नहीं था. पर लड़के और बहुएं जाकिर साहब को जाने नहीं देना चाहते थे. राबिया बेगम से सिर्फ उन के पोते आमिर और समद ने नहीं जाने की मनुहार की थी. बहरहाल, कुछ समझाइश के बाद दोनों लंदन रवाना हो गए.

3 महीने बीत गए. एक दिन शाहिद ने उन को फोन किया और बोला, ‘‘अब्बू, आमों के बाग को ठेके पर देने का मौसम आ गया है,आप हिंदुस्तान कब आ रहे हैं, बहुत दिन हो गए, आ जाइए न.’’

फोन सुन कर उन्होंने संक्षिप्त सा जवाब दिया, ‘‘साहबजादे, अगर आमों के बाग का ठेका देने के लिए ही मुझे आना है तो बेहतर है कि तुम अभी से इन सभी कामों को और दुनियादारी को समझ लो. भई, आगे भी तुम्हें ही सबकुछ देखना है.’’

‘‘अरे नहीं, अब्बू. बात यह है कि हम सब आप को बहुत याद कर रहे हैं,’’ अब की बहू की आवाज थी, ‘‘अब्बू, आमिर और समद भी आप को बहुत याद करते हैं.’’

‘‘वे सिर्फ  मुझे ही याद कर रहे हैं या…’’

‘‘अरे नहीं अब्बू, याद तो अम्मी को भी करते हैं, मगरवह क्या है कि वे तो अपनी संगीत की महफिलों वगैरा में व्यस्त रहती होंगी. इसलिए… इसलिए,’’ कहते हुए बहू अपनी बात जारी रखने के लिए शब्द नहीं मिलने से हकलाने लगी तो, ‘‘देखता हूं, 1-2 हफ्ते  बाद आने की कोशिश करूंगा,’’ कह कर जाकिर साहब ने फोन काट दिया.

कुछ दिनों बाद वे लौट आए तो देखा कि राबिया बेगम के सब से प्यारे सितार को कागज के कफन में लपेट कर कमरे के ताख पर रख दिया गया था. उन की गैर मौजूदगी में दोनों के कमरों का इस्तेमाल किया गया था. मगर उन की किताबों और राबिया बेगम के साजों की देखभाल कतई नहीं की गई थी. यह मंजर देख कर उन का मन खिन्न हो गया.

उस दिन रात को डाइनिंग टेबल पर उन्होंने शाहिद से कहा कि वह कल उन के साथ गांव चल कर आम के बाग को ठेके पर देने के संबंध में सारी बातें समझ ले. 3-4 रोज में वे लंदन वापस लौट जाएंगे तो शाहिद बोला, ‘‘अब्बू, आप वहां जा कर क्या करेंगे. अम्मी तो अपनी महफिलों में व्यस्त रहती होंगी, आप अकेले के अकेले…’’ बात अधूरी छोड़ कर वह पता नहीं क्यों रुक गया.

शाहिद की बात सुन कर आज पहली दफा उन को लगा कि उन के बेटे जवान और समझदार ही नहीं, दुनियादार भी हो गए हैं. अब उन की नजरों में राबिया बेगम का दरजा उन की मां का नहीं, बल्कि शायद अपने बाप की दूसरी बीवी का हो गया है. मगर उन की रगों में नवाबी खानदान का खून तथा तबीयत में अदब बसा हुआ था. इसलिए गुस्से को पी कर बोले, ‘‘शाहिद, अदब से बात करो, वे तुम्हारी मां हैं. उन्होंने तुम लोगों की परवरिश के लिए अपने कैरियर को ही कुरबान नहीं किया, एक इतनी बड़ी कुरबानी दी है जिसे तुम लोग जानते भी नहीं हो और न ही उस की अहमियत को समझते हो. जानना चाहोगे?’’ उन्होंने शाहिद को घूर कर देखते हुए कहा.

‘‘चलिए, उस कुरबानी को भी आज बता ही दीजिए,’’ शाहिद की आवाज में अब भी तल्खी थी.

‘‘शाहिद, हर औरत में मां बनने की अहम ख्वाहिश होती है. उस की जिंदगी का यह एक अहम मकसद होता है. मगर राबिया बेगम ने हम से निकाह के वक्त वादा किया था कि वह तुम दोनों को ही अपनी औलाद मान कर पालेगी. अपना वचन निभाने के लिए उस ने बिना कोई अपनी औलाद पैदा किए स्टर्लाइजेशन करा लिया, जिस से उस की अपनी औलाद पैदा होने की सूरत ही न बने. यह कोई मामूली बात नहीं है और तुम, तुम…’’ कहतेकहते दबाए गुस्से के कारण उन की आवाज कांप गई.

‘‘अब्बू, मैं आप की बहुत इज्जत करता हूं. मगर कुछ बातों पर मोहूम सा परदा ही रहे तो बेहतर है. वैसे, खुदकुशी को कुरबानी का दरजा दिया जाना भी सही नहीं है,’’ शाहिद की जबान में अब भी तल्खी कायम थी.

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, साफसाफ बोलो,’’ वे बोले तो उन की आवाज में अब की बार सख्ती थी.

‘‘बात यह है अब्बू, सभी चीजें उतनी खुशगवार और बेहतर नहीं थीं जितनी आप समझते रहे हैं. आप से निकाह करते वक्त मोहतरमा राबिया बेगम की नजरों में इस महानगर में एक बड़ी जमीन में बने हमारे इस आलीशान मकान और हमारी खानदानी जमीनजायदाद का खयाल बिलकुल नहीं था, यह बात कहना बिलकुल लफ्फाजी होगी. आप से निकाह के वक्त वे तलाकशुदा थीं तो उन्हें भी एक महफूज पनाह की जरूरत थी. रही बात स्टर्लाइजेशन कराने की, तो इस की वजह कोई पेचीदा जनाना मर्ज और यह खयाल भी हो सकता है कि इस निकाह का अंजाम भी अगर तलाक हुआ तो उस हाल में उन की अपनी औलाद उन की परेशानी की वजह बन सकती है. रही हमारी परवरिश की बात, वह तो आप अगर एक आया भी रख लेते तो यह काम तो वह भी करती ही. मगर उस हालत में आप की जिंदगी तनहा कटती.’’

शाहिद का संवाद और उस के मुंह से राबिया बेगम का नाम सुन कर जाकिर अली सन्न रह गए. यह वही शाहिद है जो डाइनिंग टेबल पर आने से पहले यह पूछता था कि अम्मी ने आज क्या पकाया है. 8वें दरजे में आने तक वह रात को अकसर अपने कमरे में से निकल आता और अपनी इसी अम्मी के पास सोने की जिद करता तो राबिया उसे अपने साथ सुला लेती थीं तो उसे मेहमानखाने में रात बितानी पड़ती थी.

उस समय शाहिद अपनी इन्हीं अम्मी के ही बेहद करीब था. आईआईटी में ऐडमिशन हो जाने पर वह अपनी इन्हीं अम्मी के गले में बांहें डाल कर लिपट कर रोया था-‘अम्मी आप साथ चलो, प्लीज अम्मी, कुछ दिनों के लिए चलो. आप नहीं चलोगी तो मैं भी नहीं जाऊंगा.’ और वह तभी गया था जब राबिया बेगम उस के साथ गई थीं और उस के पास से कुछ दिनों बाद नहीं, पूरे 3 महीने बाद अपना 4 किलो वजन खो कर लौटी थीं.

शाहिद की जिद सुन कर इन्हीं अम्मी के मां की मुहब्बत से लबरेज दिल और अनुभवी आंखों ने ताड़ लिया कि वह आईआईटी में नए लड़कों की रैगिंग की बातें सुन कर बेहद घबराया हुआ है और अगर वे साथ नहीं गईं तो कुछ अप्रिय हो सकता है. वे एक बड़ी यूनिवर्सिटी से छात्र और अध्यापक दोनों रूप से लंबे अरसे तक जुड़ी रही थीं. सो वे यह बात जानती थीं कि यह रैगिंग जैसा परपीड़न का घिनौना आपराधिक काम करने वाले चंद वे स्टूडैंट होते हैं जो मांबाप की प्यारभरी तवज्जुह न मिलने से उपजे आक्रोश के साथ किसी न किसी तरह के अन्य मानसिक तनाव का शिकार होते हैं.

बहुत सोचसमझ कर राबिया बेगम ने एक योजना बनाई. जिस के तहत आईआईटी में पहुंच कर वे वहां के कोऔडिनेटर से मिलीं. उन्हें अपना पूरा परिचय दिया और आने का मकसद बताया तो वे अपने स्तर पर उन्हें हर संभव सहयोग देने के लिए तैयार हो गए.

राबिया बेगम ने सब से पहले उन से उन संभावित लड़कों की जानकारी प्राप्त की जो उस साल के नवागंतुकों की रैगिंग करना अपना अधिकार समझते थे. फिर उन्होंने उन लड़कों से अलगअलग मुलाकात की. उन लड़कों से राबिया बेगम की ममताभरी लंबी बातचीत में यह बात निकल कर आई कि उन्हें कभी भी मांबाप की निकटता, उन की प्यारभरी देखभाल, स्नेहभरी डांटफटकार मिली ही नहीं थी. ज्यादातर लड़कों को तो यह भी याद नहीं था कि उन्हें मां ने कभी अपने हाथ से परोस कर खाना खिलाया था. वे तो मां के उस स्वरूप से परिचित ही नहीं थे जो गुस्सा होने पर बच्चे को मार तो देती है, मगर बाद में उस के रोने पर उस के साथ खुद भी रो लेती है.

पिता के बारे में उन का परिचय सिर्फ जरूरत पर पैसे मांगने पर पैसे देते हुए यह घुड़की, ‘अभी उस दिन तो इतने पैसे दिए थे. तुम्हारे खर्चे दिनपरदिन बढ़ते जा रहे हैं,’ देने वाले व्यक्ति के रूप में था. बच्चे इस बात से भी आक्रोशित थे कि उन के मांबाप उन पर जो खर्चा करते हैं उस का ढिंढोरा भी खूब पीटते हैं. इस के साथ, ये लड़के रैगिंग की पीड़ा झेलने के दमित आक्रोश का भी शिकार थे.

जब राबिया ने पहली बार उन15-12 लड़कों को अपने घर पर खाने को कहा तो वे भौचक्के रह गए. मगर राबिया बेगम का ममताभरा अनुरोध टाल भी नहीं सके. उन के आ जाने पर राबिया बेगम ने अपने हाथ से बना खाना परोस कर मां की तरह मनुहार कर के खिलाया तो खाना खत्म होने पर एक लड़का गुनगुनाने लगा, ‘तू प्यार का सागर है…’ लड़के की आवाज में सोज था मगर उसे आरोह और अवरोह का सही ज्ञान नहीं था. यह समझते हुए राबिया ने उसे गाने को प्रोत्साहित किया और बड़ी सावधानी से थोड़ी सी समझाइश के साथ उस से पूरा गाना गवाया.

लड़के समझ गए कि उन्हें संगीत की अच्छी जानकारी है और वे बच्चों की तरह उन से गाना सुनाने की जिद करने लगे तो उन्होंने, ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी…’ गजल सुनाई. राबिया बेगम की सुरीली आवाज में पेश की गई गजल जब खत्म हुई तो संगीत की जानकारी रखने वाले ही नहीं, सभी लड़के बेहद भावुक हो गए और एक तो उन से ‘हाय अम्मी, आप इतना अच्छा गा भी सकती हो,’ कह कर उन से बच्चे की तरह लिपट गया.

इस के बाद तो राबिया बेगम ने अपना प्रोग्राम तय कर लिया था. वे रोज उन लड़कों को घर पर बुला लेती थीं, बल्कि कुछ दिन बीतते तो ज्यादातर लड़के उन्हें शरारती बच्चों की तरह घेरे रहने लगे थे. अब इन्हीं दमित आक्रोश के शिकार लड़कों ने घर की सफाई वगैरा से ले कर खाना बनाने और बरतन साफ करने तक में सामूहिक सहयोग करना शुरू कर दिया था. सब मिल कर खाना बनाते, फिर सहभोज होता था.

राबिया बेगम की ममता और व्यवहारमाधुर्य ने उन्हें रिश्तों की अहमियत सिखा दी थी. शुरू में जब लड़कों ने उन्हें मैडम कहा तो वे बोली थीं, ‘भई, मैं तुम्हारी टीचर थोड़े ही हूं.’ तब कुछ लड़कों ने उन्हें ‘आंटी’ कहा तो वे बोलीं, ‘यह आंटी कौन सा रिश्ता होता है. हमारी समझ में नहीं आया और अपन तो पूरी तरह देसी लोग हैं न. तो भई, हम किसी की आंटी तो नहीं बनेंगे.’ फिर लड़कों की दुविधा भांपते हुए उन्होंने कहा था, ‘देखो भई, मेरी उम्र तुम्हारी मां के बराबर है. मगर मां तो मां ही होती है.’ परिवार में मां के बाद काकी, ताई, मौसी का भी मां जैसा ही रिश्ता होता है, इसलिए मेरी उम्र के लिहाज से तुम मुझे काकी, ताई, मौसी वगैरा में से जो भी अच्छा लगे, कह सकते हो. वरना मेरा नाम राबिया है, इस नाम से भी बुला सकते हो, मगर आंटी मत कहना. पता नहीं क्यों यह आंटी मुझे अजीब लिजलिजी सी लगती है, जिस में न जाने कौनकौन छिपी बैठी हैं.’ उन की बात सुन कर लड़के एक बार तो हंस पड़े, फिर कुछ लड़कों ने उन्हें जिद कर के अम्मी, मम्मी कहना शुरू कर दिया और बाकी काकी, मौसी वगैरा कहने लगे थे तो उन्हें अम्मी कहने वाले लड़कों से शाहिद के मुंह से बेअख्तियार निकल गया, ‘जनाब, आप हमारी अम्मी के प्यार में हमारे रकीब बन रहे हैं.’ यह सारा वाकेआ पहली छुट्टियों में घर आने पर इसी शाहिद ने खुद अपने मुंह से सुनाया था.

राबिया बेगम के व्यवहार से लड़कों की संख्या में रोज इजाफा हो जाता था. अब ज्यादातर नवागंतुक भी सीनियर्स का सामीप्य राबिया बेगम की देखभाल में पाने के लिए आने लगे थे. राबिया बेगम तो सभी को अपने बच्चों के बड़े कुटुंब में शामिल कर लेती थीं, मगर 2 महीने लगातार इतने सारे लड़कों के बनाए परिवार के लिए खाने की व्यवस्था कराने, सब को एकजुट बनाए रख कर शाहिद की सुरक्षा के लिए रैगिंग विरोधी अभियान चलाए रखने की कोशिश में रातदिन मेहनत करने से राबिया बेगम का स्वास्थ्य काफी गिर गया. फिर भी उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि इस अवधि में उन्होंने शाहिद के लिए जो दोस्ताना माहौल बना दिया है उस से शाहिद अब इस संस्थान से डिगरी लेने तक रैगिंग वगैरा से महफूज रहेगा.

इस तरह 8-10 सप्ताह बीत गए. वह दिन आ गया जब नए छात्रों को पुरानों के साथ सामंजस्य बिठाने वाला फ्रैशर्स डे मनाया जाता है. पुराने यानी सीनियर्स और जूनियर्स का सहभोज होता है और रैगिंग पर घोषित विराम लग जाता है. अब की बार फ्रैशर्स डे राबिया बेगम ने इस तरह आयोजित किया कि वह मात्र मस्तीभरा सहभोज न रह कर एक विराट सांस्कृतिक कार्यक्रम बन गया. फ्रैशर्स डे के इस जबरदस्त कारनामे का पता संस्थान के प्रिंसिपल के पत्र से हुआ, जिस में उन्हें बधाई और धन्यवाद देते हुए लिखा था कि यह साल उन के संस्थान के पिछले कई दशकों के इतिहास में यादगार बन गया है क्योंकि इस साल इस संस्थान में रैगिंग की कोई घटना नहीं हुई और फ्रैशर्स डे के अभूतपूर्व सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए राबियाजी को आगे भी आना होगा.

उन दिनों के शाहिद और आज के शाहिद की तुलना करते हुए जाकिर साहब डाइनिंग टेबल पर खामोश बैठे थे, सभी इंतजार में थे कि वे खाना शुरू करें तो खाना खाएं. मगर जाकिर साहब यह कह कर उठ गए, ‘‘शुक्रिया साहबजादे, आज आप ने हमें खुदकुशी और कुरबानी में फर्क का इल्म करा दिया.’’ और उन्होंने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. काफी सोचविचार कर उन्होंने एक फैसला कर लिया.

घर के लोगों ने सुबह उठ कर देखा कि जाकिर साहब और राबिया बेगम के कमरों के दरवाजों पर ताला लगा हुआ है और जाकिर साहब घर में नहीं हैं. ऐसा तो कभी नहीं हुआ. जाकिर साहब और राबिया बेगम घर के बाहर भी जाते थे तब भी कमरों के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. एक दफा जाकिर साहब ने बेगम से कहा था, ‘बेगम, कम से कम दरवाजा बंद कर के कुंडी तो लगा दिया करो’ तो राबिया बेगम ने जवाब दिया था, ‘हमारे कमरों में ऐसा क्या रखा है जिसे अपने ही बच्चों की नजरों से परदा कराया जाए.’

Father’s Day Special: जिंदगी जीने का हक- भाग 2

‘‘फिर सब का अलगअलग कार्यक्रम रहता है,’’ केशव ने अभिनव की बात काटी, ‘‘यह सिलसिला कई साल से चल रहा है और अब भी चलेगा, फर्क सिर्फ इतना होगा कि अब मैं भी छुट्टी का दिन अपनी मर्जी से गुजारा करूंगा. पहले यह सोच कर खाने के समय पर घर पर रहता था कि तुम में से जो बाहर नहीं गया है वह क्या खाएगा लेकिन अब यह देखने को सब की बीवियां हैं, सो मैं भी अब छुट्टी के रोज अपनी उमर वालों के साथ मौजमस्ती और लंचडिनर बाहर किया करूंगा.’’

‘‘बिलकुल, पापा, बहुत जी लिए… आप हमारे लिए. अब अपनी पसंद की जिंदगी जीने का आप को पूरा हक है,’’ प्रणव बोला.

‘‘लेकिन इस का यह मतलब नहीं है कि पापा बाहर लंचडिनर कर के अपनी सेहत खराब करें,’’ प्रभव ने कहा, ‘‘हम में से कोई तो घर पर रहा करेगा ताकि पापा जब घर आएं तो उन्हें घर खाली न मिले.’’

‘‘हम इस बात का खयाल रखेंगे,’’ जूही बोली, ‘‘वैसे भी हर सप्ताह सारा दिन बाहर कौन रहेगा?’’

‘‘और कोई रहे न रहे मैं तो रहा करूंगा भई,’’ केशव हंसे.

‘‘यह तो बताएंगे न पापा कि जाएंगे कहां?’’ प्रणव ने पूछा.

‘‘कहीं भी जाऊं, मोबाइल ले कर जाऊंगा, तुझे अगर मेरी उंगली की जरूरत पड़े तो फोन कर लेना,’’ केशव प्रिया की ओर मुड़े, ‘‘प्रिया बेटी, इसे अब अपना पल्लू थमा ताकि मेरी उंगली छोड़े.’’

लेकिन कुछ रोज बाद प्रिया ने खुद ही उन की उंगली थाम ली. एक रोज जब रात के खाने के बाद वह घूमने जा रहे थे तो प्रिया भागती हुई आई बोली, ‘‘पापाजी, मैं भी आप के साथ घूमने चलूंगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि आप सड़क पर अकेले घूमते हैं और मैं छत पर तो क्यों न हम दोनों साथ ही टहलें?’’ प्रिया ने उन के साथ चलते हुए कहा.

‘‘मगर तुम छत पर अकेली क्यों घूमती हो?’’

‘‘और क्या करूं पापाजी? प्रणव को तो 2-3 घंटे पढ़ाई करनी होती है और मुझे रोशनी में नींद नहीं आती, सो जब तक टहलतेटहलते थक नहीं जाती तब तक छत पर घूमती रहती हूं.’’

‘‘टीवी क्यों नहीं देखतीं?’’

‘‘अकेले क्या देखूं, पापाजी? सब लोग 1-2 सीरियल देखने तक रुकते हैं फिर अपनेअपने कमरों में चले जाते हैं.’’

‘‘अब तो बस कुछ ही महीने रह गए हैं प्रणव की परीक्षा में,’’ केशव ने दिलासे के स्वर में कहा, ‘‘तुम चाहो तो इस दौरान मायके हो आओ.’’

‘‘नहीं, पापाजी, उस की जरूरत नहीं है. बस, रात को यह थोड़ा सा वक्त अकेले गुजारना मुश्किल हो जाता है लेकिन अब इस समय आप के साथ घूमा करूंगी, गपें मारते हुए.’’

‘‘मैं बहुत तेज चलता हूं. थक जाओगी.’’

‘‘चलिए, देखते हैं.’’

कुछ दूर जाने के बाद, एक कौटेज में से एक प्रौढ़ महिला निकलती हुई दिखाई दीं. प्रिया पहचान गई. मालिनी नामबियार थीं, जो उस की शादी की दावत में आई थीं तब पापाजी ने बताया था कि ये सब भाई आज जो कुछ भी हैं मालिनीजी की कृपा से हैं. यह इन की गणित की अध्यापिका और स्कूल की प्राचार्या हैं, बहुत मेहनत की है इन्होंने इन सब पर.

मगर पापाजी ने जिस कृतज्ञता से आभार प्रकट किया था, किसी भी भाई ने मालिनीजी की खातिर में उतनी रुचि नहीं दिखाई थी.

‘‘मगर कौफी यहां कहां मिलेगी?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘मेरे घर पर.’’

प्रिया ने केशव की ओर देखा, वह बगैर कुछ कहे मालिनी के पीछे उस के घर में चले गए. जब मालिनीजी कौफी लाने अंदर गईं तो प्रिया ने पूछा, ‘‘आप पहले भी यहां आ चुके हैं, पापा?’’

केशव सकपकाए.

‘‘बच्चों की पढ़ाई के सिलसिले में आना पड़ता था. इसी तरह जानपहचान हो गई तो आनाजाना बना हुआ है.’’

‘‘आंटी ने शादी नहीं की?’’

‘‘अभी तक तो नहीं.’’

प्रिया ने कहना चाहा कि अब इस उम्र में क्या करेंगी लेकिन तब तक मालिनीजी कौफी की ट्रौली धकेलती हुई आ गईं. जितनी जल्दी वह कौफी लाई थीं उस से लगता था कि तैयारी पहले से थी. प्रिया को कच्चे केले के चिप्स बहुत पसंद आए.

‘‘किसी छुट्टी के दिन आ जाना, बनाना सिखा दूंगी,’’ मालिनी ने कहा.

‘‘तरीका बता देने से भी चलेगा, आंटी. अब तो रोज घूमते हुए आप से मुलाकात हुआ करेगी सो किसी रोज पूछ लूंगी,’’ प्रिया ने चिप्स खाते हुए कहा.

मालिनी ने चौंक कर उस की ओर देखा.

‘‘तुम रोज सैर करने आया करोगी?’’

‘‘हां, आंटी?’’

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