Hindi Romantic Story: ईंट का जवाब पत्थर से – नंदन की हवस का अनोखा नतीजा

Hindi Romantic Story: चित्रा सोने की चिड़िया थी. मातापिता की एकलौती लाड़ली. उस के पिता लाखों रुपए कमाने वाले एक वकील थे. मां पूजापाठ के लिए मंदिरों के चक्कर लगाती रहती थीं.

चित्रा पर किसी का कंट्रोल नहीं था. उस की मनमानी चलती थी.

चित्रा कालेज में बीए के फर्स्ट ईयर में पढ़ रही थी. वह बहुत खूबसूरत थी. उस के एकएक अंग से जवानी फूटती थी. वह अपने जिस्म को ढकने के बजाय दिखाने में ज्यादा यकीन करती थी.

चित्रा का बैग रुपयों से भरा रहता था, इसलिए उस की सहेलियां गुड़ की मक्खी की तरह उस से चिपकी रहती थीं. लड़के उस की जवानी का मजा लेने के लिए पीछे पड़े रहते थे.

इसी बात का फायदा उठा कर चित्रा कालेज में ग्रुप लीडर बन गई. इस से वह और भी ज्यादा घमंडी हो गई.

चित्रा के कालेज में सैकंड ईयर में नंदन नाम का एक लड़का पढ़ता था. वह उस इलाके के सांसद का बेटा था. रोजाना नई कार से कालेज आना उस का शौक था.

सच तो यह था कि नंदन कालेज नाम के लिए आता था. लड़कियों को अपने इश्क के जाल में फंसा कर उन से मन बहलाना उस का शौक था. वह एक नंबर का जुआरी था. शराब पीना उस का रोजमर्रा का काम था.

एक दिन नंदन की नजर चित्रा पर पड़ी. दरअसल, उस ने कालेज के इलैक्शन में हिस्सा लिया था. चित्रा भी उन्हीं के ग्रुप में शामिल थी. दोनों ने खूब प्रचार किया. नंदन ने पानी की तरह पैसा बहाया और जीत गया.

इसी जीत की खुशी में नंदन ने अपने फार्महाउस में शानदार पार्टी दी थी. चित्रा और उस के दोस्त भी वहां पहुंच गए थे. रातभर शराब पार्टी चली. सब ने खूब मौजमस्ती की.

तभी से नंदन और चित्रा ने क्लबों में घूमना शुरू कर दिया. फिर वे दोनों नंदन के फार्महाउस में मिलने लगे और उन्होंने हमबिस्तरी भी की. इसी तरह एक साल बीत गया. वे दोनों हवस के सागर में गोते लगाते रहे.

अचानक ही चित्रा को एहसास हुआ कि पिछले 3 महीने से उसे माहवारी नहीं आई है. वह डाक्टर के पास गई. डाक्टर ने बताया कि वह 3 महीने के पेट से है. यह सुन कर चित्रा मानो मस्ती के आसमान से नीचे गिर पड़ी.

चित्रा ने नंदन से इस बारे में बात की और उस पर शादी करने का दबाव डाला. नंदन लड़कियों के साथ हमबिस्तरी तो करता था, पर चित्रा से शादी करने की उस ने कभी नहीं सोची थी. अपने नेता पिता की तरह वह लड़कियों से प्यार के वादे तो करता था, पर उन्हें निभाता नहीं था.

नंदन चित्रा की बात सुन कर सतर्क हो गया. उस ने चित्रा से मिलनाजुलना बंद कर दिया. जब वह फोन पर उस से बात करना चाहती, तो टाल देता.

लेकिन एक दिन चित्रा ने नंदन को पकड़ ही लिया. बहुत दिनों तक बातचीत न होने से नंदन भी थोड़ा नरम पड़ गया था. बातें करतेकरते वे दोनों नंदन के फार्महाउस जा पहुंचे.

वह फार्महाउस दोमंजिला था. वे दोनों दूसरी मंजिल पर गए. वहां एक खूबसूरत बैडरूम था. वे दोनों एक सोफे पर जा कर बैठ गए.

चित्रा बहुत खूबसूरत लग रही थी. उसे देख कर नंदन की हवस जाग गई. वह बोला, ‘‘डार्लिंग, शुरू हो जाएं क्या?’’ इतना कह कर उस ने चित्रा की कमर पर अपना हाथ रख दिया.

चित्रा ने नंदन के रंगढंग देख कर कहा, ‘‘नंदन, पहले मु झे तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं, बाकी काम बाद में,’’ इतना कह कर चित्रा ने नंदन का हाथ अपनी कमर से हटा दिया.

‘‘अच्छा कहो, क्या कहना चाहती हो तुम?’’ नंदन ने पूछा.

‘‘वही बात. शादी के बारे में क्या सोचा है तुम ने? मेरा पेट दिन ब दिन फूल रहा है. घर में पता चल गया, तो पता नहीं मेरा क्या होगा. मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. ऊपर से तुम भी मु झ से बात नहीं करते हो,’’ कहते हुए चित्रा रोने लगी.

‘‘रोती क्यों हो… मेरे पापा विदेश गए हुए हैं. उन के आते ही हम शादी कर लेंगे,’’ नंदन ने इतना कह कर चित्रा को अपनी बांहों में भरना चाहा.

लेकिन चित्रा छिटक कर दूर हो गई और बोली, ‘‘नंदन, आज मु झे यह सब करने का मन नहीं है. पहले हमारी शादी का फैसला होना चाहिए. हम किसी मंदिर में जा कर शादी कर लेते हैं. हमारे घर चलते हैं. मेरे पापा बुरा नहीं मानेंगे. वे बहुत अमीर हैं. हम शानोशौकत में जीएंगे. हम कोई नया कामधंधा भी शुरू कर लेंगे.’’

‘‘डियर चित्रा, यों चोरीछिपे मंदिर में शादी करना मु झे पसंद नहीं है. हम सब के सामने शान से शादी करेंगे. मेरे पापा इस इलाके के सांसद हैं. हम उन की हैसियत की शादी करेंगे.

‘‘सब से पहले तो तुम यह बच्चा गिरवा लो. इतनी जल्दी बच्चे की क्या जरूरत है. अभी तो हम पढ़ रहे हैं. मैं पूरा इंतजाम करा दूंगा. थोड़े दिनों के बाद हम फिर से मस्ती मारेंगे.’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ यह सुन कर चित्रा ने गुस्से में पूछा.

‘‘मतलब यह है कि अभी से शादी और बच्चे की बातें क्यों? अभी तो हमारे मस्ती के दिन हैं.’’

‘‘नंदन, शादी करने के बाद हम खुलेआम मस्ती करेंगे.’’

‘‘लेकिन, अभी मु झे शादी नहीं करनी है.’’

‘‘क्यों?’’ चित्रा ने जोर दे कर सख्ती से पूछा.

‘‘सच कहूं, तो मेरे पापा ने अपने एक सांसद दोस्त की बेटी से मेरी शादी तय कर रखी है.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो? इतने दिनों तक मेरे तन के साथ खेल कर अब दूर जाना चाहते हो?’’

‘‘नहीं, हम पहले की तरह प्यार करते रहेंगे, पर शादी नहीं. वैसे भी मैं अकेला कुसूरवार नहीं हूं. तुम भी तो मेरा जिस्म पाना चाहती थी. हम ने एकदूसरे की जरूरत पूरी की. लेकिन अब तुम नहीं चाहती, तो मैं अपने रास्ते और तुम अपने रास्ते,’’ नंदन ने दोटूक कह दिया.

‘‘दिखा दी न अपनी औकात. लेकिन, मैं दूसरी लड़कियों की तरह नहीं हूं. हमारी शादी तो हो कर ही रहेगी, नहीं तो…’’

‘‘नहीं तो क्या… चुपचाप यहां से चली जाओ. तुम्हारी कुछ अश्लील वीडियो क्लिप मेरे पास हैं. मैं उन को मोबाइल फोन पर अपलोड कर के अपने दोस्तों में भेज दूंगा. तुम्हारी इज्जत को सरेआम नीलाम कर दूंगा.’’

‘‘तो यह है तुम्हारा असली चेहरा. लड़कियों को फूलों की तरह मसलना तुम्हारा शौक है. लेकिन अगर तुम मेरे पेट में पल रहे बच्चे के बाप नहीं बने, तो मैं तुम्हारी जिंदगी बेहाल कर दूंगी,’’ इतना कह कर चित्रा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और नंदन के मुंह पर फेंक दिया.

‘‘यह सब क्या ड्रामा है?’’ नंदन ने बौखलाहट में पूछा.

‘‘खुद देख लो,’’ चित्रा बोली.

नंदन ने लिफाफा खोला, तो उस में से निकल कर कुछ तसवीरें जमीन पर जा गिरीं. उन तसवीरों में नंदन और चित्रा हवस का खेल खेल रहे थे.

नंदन गुस्से से भर उठा और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘ये तसवीरें तुम्हारे पास कहां से आईं?’’

‘‘चिल्लाओ मत. अकेले तुम ही शातिर नहीं हो. अगर तुम मेरी बेहूदा वीडियो क्लिप बना सकते हो, तो मैं भी तुम्हारी ऐसी तसवीरें खींच सकती हूं.’’

यह सुन कर नंदन भड़क गया और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘बाजारू लड़की, मैं तुम्हारा रेप कर के यहीं बगीचे में जिंदा गाड़ दूंगा,’’ कह कर उस ने चित्रा को पकड़ना चाहा.

चित्रा उस की पकड़ में नहीं आई और गरजी, ‘‘अक्ल से काम लो और मेरे साथ शादी कर लो, नहीं तो मैं तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर दूंगी. तुम्हारे पापा भी तुम्हें बचा नहीं पाएंगे. मु झे ऐसीवैसी मत सम झना. मैं एक वकील की बेटी हूं.’’

‘‘वकील की बेटी हो, तो तुम मेरा क्या कर लोगी. मैं अभी तुम्हारा गला दबा कर इस कहानी को यहीं खत्म कर देता हूं,’’ इतना कह कर नंदन चित्रा पर  झपट पड़ा.

लेकिन चित्रा तेजी से खिड़की के पास चली गई और बोली, ‘‘जरा यहां से नीचे तो देखना.’’

झल्लाया नंदन खिड़की के पास गया और बाहर झांका. नीचे मेन गेट पर पुलिस की गाड़ी खड़ी थी. एक सबइंस्पैक्टर अपने 4 सिपाहियों के साथ ऊपर ही देख रहा था.

‘‘देख लिया… अगर मुझ पर हाथ डाला, तो तुम भी नहीं बचोगे. मैं यहां आने से पहले ही सारा इंतजाम कर के आई थी.

‘‘अब तुम ज्यादा मत सोचो और जल्दी से मेरे साथ शादी के दफ्तर में पहुंचो. मेरे पापा वहीं पर तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं,’’ इतना कह कर चित्रा अपना बैग और वे तसवीरें ले कर बाहर चली गई.

नंदन भीगी बिल्ली बना चित्रा के साथ शादी के दफ्तर पहुंच गया. Hindi Romantic Story

Hindi Romantic Story: कैसी दूरी – बिस्तर पर शीला की मजबूरी

Hindi Romantic Story: आधी रात का गहरा सन्नाटा. दूर कहीं थोड़ीथोड़ी देर में कुत्तों के भूंकने की आवाजें उस सन्नाटे को चीर रही थीं. ऐसे में भी सभी लोग नींद के आगोश में बेसुध सो रहे थे.

अगर कोई जाग रहा था, तो वह शीला थी. उसे चाह कर भी नींद नहीं आ रही थी. पास में ही रवि सो रहे थे.

शीला को रहरह कर रवि पर गुस्सा आ रहा था. वह जाग रही थी, मगर वे चादर तान कर सो रहे थे.

रवि के साथ शीला की शादी के 15 साल गुजर गए थे. वह एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी.

शादी के शुरुआती दिन भी क्या दिन थे. वे सर्द रातों में एक ही रजाई में एकदूसरे से चिपक कर सोते थे. न किसी का डर था, न कोई कहने वाला. सच, उस समय तो नौजवान दिलों में खिंचाव हुआ करता था.

शीला ने तब रवि के बारे में सुना था कि जब वे कुंआरे थे, तब आधीआधी रात तक दोस्तों के साथ गपशप किया करते थे.

तब रवि की मां हर रोज दरवाजा खोल कर डांटते हुए कहती थीं, ‘रोजरोज देर से आ कर सोने भी नहीं देता. अब शादी कर ले, फिर तेरी घरवाली ही दरवाजा खोलेगी.’

रवि जवाब देने के बजाय हंस कर मां को चिढ़ाया करते थे.

जैसे ही रवि के साथ शीला की शादी हुई, दोस्तों से दोस्ती टूट गई. जैसे ही रात होती, रवि चले आते उस के पास और उस के शरीर के गुलाम बन जाते. भंवरे की तरह उस पर टूट पड़ते. उन दिनों वह भी तो फूल थी. मगर शादी के सालभर बाद जब बेटा हो गया, तब खिंचाव कम जरूर पड़ गया.

धीरेधीरे शरीर का यह खिंचाव खत्म तो नहीं हुआ, मगर मन में एक अजीब सा डर समाया रहता था कि कहीं पास सोए बच्चे जाग न जाएं. बच्चे जब बड़े हो गए, तब वे अपनी दादी के पास सोने लगे.

अब भी बच्चे दादी के पास ही सो रहे हैं, फिर भी रवि का शीला के प्रति वह खिंचाव नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था. माना कि रवि उम्र के ढलते पायदान पर है, लेकिन आदमी की उम्र जब 40 साल की हो जाती है, तो वह बूढ़ा तो नहीं कहलाता है.

बिस्तर पर पड़ेपड़े शीला सोच रही थी, ‘इस रात में हम दोनों के बीच में कोई भी तो नहीं है, फिर भी इन की तरफ से हलचल क्यों नहीं होती है? मैं बिस्तर पर लेटीलेटी छटपटा रही हूं, मगर ये जनाब तो मेरी इच्छा को समझ ही नहीं पा रहे हैं.

‘उन दिनों जब मेरी इच्छा नहीं होती थी, तब ये जबरदस्ती किया करते थे. आज तो हम पतिपत्नी के बीच कोई दीवार नहीं है, फिर भी क्यों नहीं पास आते हैं?’

शीला ने सुन ही नहीं रखा है, बल्कि ऐसे भी तमाम उदाहरण देखे हैं कि जिस आदमी से औरत की ख्वाहिश पूरी नहीं होती है, तब वह औरत दूसरे मर्द के ऊपर डोरे डालती है और अपने खूबसूरत अंगों से उन्हें पिघला देती है. फिर रवि के भीतर का मर्द क्यों मर गया है?

मगर शीला भी उन के पास जाने की हिम्मत क्यों नहीं कर पा रही है? वह क्यों उन की चादर में घुस नहीं जाती है? उन के बीच ऐसा कौन सा परदा है, जिस के पार वह नहीं जा सकती है?

तभी शीला ने कुछ ठाना और वह रवि की चादर में जबरदस्ती घुस गई. थोड़ी देर में उसे गरमाहट जरूर आ गई, मगर रवि अभी भी बेफिक्र हो कर सो रहे थे. वे इतनी गहरी नींद में हैं कि कोई चिंता ही नहीं.

शीला ने धीरे से रवि को हिलाया. अधकचरी नींद में रवि बोले, ‘‘शीला, प्लीज सोने दो.’’

‘‘मुझे नींद नहीं आ रही है,’’ शीला शिकायत करते हुए बोली.

‘‘मुझे तो सोने दो. तुम सोने की कोशिश करो. नींद आ जाएगी तुम्हें,’’ रवि नींद में ही बड़बड़ाते हुए बोले और करवट बदल कर फिर सो गए.

शीला ने उन्हें जगाने की कोशिश की, मगर वे नहीं जागे. फिर शीला गुस्से में अपनी चादर में आ कर लेट गई, मगर नींद उस की आंखों से कोसों दूर जा चुकी थी.

सुबह जब सूरज ऊपर चढ़ चुका था, तब तक शीला सो कर नहीं उठी थी. उस की सास भी घबरा गईं. सब से ज्यादा घबराए रवि.

मां रवि के पास आ कर बोलीं, ‘‘देख रवि, बहू अभी तक सो कर नहीं उठी. कहीं उस की तबीयत तो खराब नहीं हो गई?’’

रवि बैडरूम की तरफ लपके. देखा कि शीला बेसुध सो रही थी. वे उसे झक झोरते हुए बोले, ‘‘शीला उठो.’’

‘‘सोने दो न, क्यों परेशान करते हो?’’ शीला नींद में ही बड़बड़ाई.

रवि को गुस्सा आ गया और उन्होंने पानी का एक गिलास भर कर उस के मुंह पर डाल दिया.

शीला घबराते हुए उठी और गुस्से से बोली, ‘‘सोने क्यों नहीं दिया मुझे? रातभर नींद नहीं आई. सुबह होते ही नींद आई और आप ने उठा दिया.’’

‘‘देखो कितनी सुबह हो गई?’’ रवि चिल्ला कर बोले, तब आंखें मसल कर उठते हुए शीला बोली, ‘‘खुद तो ऐसे सोते हो कि रात को उठाया तो भी न उठे और मु  झे उठा दिया,’’ इतना कह कर वह बाथरूम में घुस गई.

यह एक रात की बात नहीं थी. तकरीबन हर रात की बात थी.

मगर रवि में पहले जैसा खिंचाव क्यों नहीं रहा? या उस से उन का मन भर गया? ऐसा सुना भी है कि जिस मर्द का अपनी औरत से मन भर जाता है, फिर उस का खिंचाव दूसरी तरफ हो जाता है. कहीं रवि भी… नहीं उन के रवि ऐसे नहीं हैं.

सुना है कि महल्ले के ही जमना प्रसाद की पत्नी माधुरी का चक्कर उन के ही पड़ोसी अरुण के साथ चल रहा है. यह बात पूरे महल्ले में फैल चुकी थी. जमना प्रसाद को भी पता थी, मगर वे चुप रहा करते थे.

रात का सन्नाटा पसर चुका था. रवि और शीला बिस्तर में थे. उन्होंने चादर ओढ़ रखी थी.

रवि बोले, ‘‘आज मुझे थोड़ी ठंड सी लग रही है.’’

‘‘मगर, इस ठंड में भी आप तो घोडे़ बेच कर सोते रहते हो, मैं कितनी बार आप को जगाती हूं, फिर भी कहां जागते हो. ऐसे में कोई चोर भी घुस जाए तो पता नहीं चले. इतनी गहरी नींद क्यों आती है आप को?’’

‘‘अब बुढ़ापा आ रहा है शीला.’’

‘‘बुढ़ापा आ रहा है या मु  झ से अब आप का मन भर गया है?’’

‘‘कैसी बात करती हो?’’

‘‘ठीक कहती हूं. आजकल आप को न जाने क्या हो गया,’’ यह कहते हुए शीला की आंखों में वासना दिख रही थी.

रवि जवाब न दे कर शीला का मुंह ताकते रहे.

शीला बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो? कभी देखा नहीं है क्या?’’

‘‘अरे, जब से शादी हुई है, तब से देख रहा हूं. मगर आज मेरी शीला कुछ अलग ही दिख रही है,’’ शरारत करते हुए रवि बोले.

‘‘कैसी दिख रही हूं? मैं तो वैसी ही हूं, जैसी तुम ब्याह कर लाए थे,’’ कह कर शीला ने ब्लाउज के बटन खोल दिए, ‘‘हां, आप अब वैसे नहीं रहे, जैसे पहले थे.’’

‘‘क्यों भला मुझ में बदलाव कैसे आ गया?’’ अचरज से रवि बोले.

‘‘मेरा इशारा अब भी नहीं समझ रहे हो. कहीं ऐसा न हो कि मैं भी जमना प्रसाद की पत्नी माधुरी बन जाऊं.’’

‘‘अरे शीला, जमना प्रसाद तो ढीले हैं, मगर मैं नहीं हूं,’’ कह कर रवि ने शीला को अपनी बांहों में भर कर उस के कई चुंबन ले लिए.

शीला ने कुछ ठाना और वह रवि की चादर में जबरदस्ती घुस गई. थोड़ी देर में उसे गरमाहट जरूर आ गई, मगर रवि अभी भी बेफिक्र हो कर सो रहे थे. Hindi Romantic Story

Romantic Story In Hindi: दुविधा – क्या संगिता और सौमिल की जोड़ी बेमेल थी?

Romantic Story In Hindi: देवकुमार सुबह से ही काफी खुश नजर आ रहे थे. उन की बेटी संगीता को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे. घर की पूरी साफसफाई तो उन्होंने कल ही कर डाली थी. फ्रूट्स, ड्राइफ्रूट्स तथा अच्छी क्वालिटी की मिठाई आज ले आए थे. लड़का रेलवे में इंजीनियर है, अच्छी तनख्वाह पाता है. लड़के के साथ उस के भाईभाभी व मातापिता भी आ रहे थे.

वैसे, लड़के के मातापिता ने तो संगीता को पहले ही देख लिया था और पसंद भी कर लिया था. पसंद आती भी क्यों न? संगीता सुंदर तो है ही, बहुत व्यवहारकुशल भी है. उस ने भी इंजीनियरिंग की है तथा बैंक में काम कर रही है.

देवकुमार सरकारी मुलाजिम थे और उन की पत्नी अंजना सरकारी विद्यालय में शिक्षिका. इकलौती बेटी होने से उन दोनों की इच्छा थी कि जानेपहचाने परिवार में रिश्ता हो जाए, तो बहुत अच्छा होगा. लड़के वाले पास ही के शहर के थे और उन के दूर के रिश्तेदार, जिन के माध्यम से शादी की बात शुरू हुई थी, देवकुमारजी के भी दूर के रिश्ते में लगते थे. देवकुमार ने अपनी बहन व बहनोई को भी बुला लिया था ताकि उन की राय भी मिल सके.

ठीक समय पर घर के सामने एक कार आ कर रुकी. देवकुमार और उन के बहनोई ने दौड़ कर उन का स्वागत किया. ड्राइंगरूम में आ कर सभी सोफे पर बैठ गए. लड़का थोड़ा दुबला लगा लेकिन स्मार्ट, चैक वाली हाफशर्ट तथा जींस पहने हुए, छोटी फ्रैंचकट दाढ़ी. बड़े भाई का एक छोटा सा बच्चा भी था, वे उसे खिलाने में ही व्यस्त रहे.

लड़के के पिता बैंक मैनेजर थे. उन्हें सेवानिवृत्त होने में एक वर्ष बचा था. काफी बातूनी लगे. बच्चों के जन्म से ले कर उन की पढ़ाई और फिर नौकरी तक की बातें बता डालीं. संगीता भी इसी बीच आ चुकी थी. लड़के की मां व भाभी उस से पूछताछ करती रहीं.

लड़के की मां ने सुझाव दिया कि एक अलग कमरे में सौमिल और संगीता को बैठा दें ताकि वे एकदूसरे को सम झ सकें. संगीता की मां दोनों को बगल के कमरे में छोड़ कर आईं. इधर नाश्ते के साथसाथ मैनेजर साहब की बातों में पता ही न चला कि कब एक घंटा बीत गया. तब तक संगीता और सौमिल भी वापस आ चुके थे.

मैनेजर साहब और उन का परिवार आवभगत से संतुष्ट नजर आए. चलते समय देवकुमार के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘हम लोगों को दोतीन दिनों का वक्त दीजिए ताकि घर में सब बैठ कर चर्चा कर सकें और आप को निर्णय बता सकें.’’

उन्हें आत्मीयता से विदा कर देवकुमार का परिवार फिर ड्राइंगरूम में बैठ कर सौमिल और उस के परिवार का विश्लेषण करने लगे. सभी की राय एकमत थी कि परिवार अच्छा व संभ्रांत है. लड़का थोड़ा दुबला है लेकिन सुंदर और स्मार्ट है. उस की सोच व विचार कैसे हैं, यह तो संगीता ही बता पाएगी कि उस से क्या बातें हुईं.

संगीता ने अपनी मां को जो बताया उसे लगा कि उस के विचार सौमिल के विचारों से मेल नहीं खाते. संगीता को घूमनेफिरने, मस्ती करने, डांस करने, पार्टियों में जाना तथा फैशनेबल कपड़े पहनना पसंद है. सौमिल को शांत वातावरण, एकांत, साधारण रहनसहन एवं पुस्तकें पढ़ना पसंद है.

लड़के की मां को ऐसी बहू चाहिए जो अच्छा खाना बनाना जानती हो, गृहस्थी के कार्यों में कुशल हो. उन्हें बहू से नौकरी नहीं करानी. उन्होंने संगीता से कम से कम 4-5 बार पूछा कि क्या वह खाना बना लेती है? क्याक्या बना लेती है?

लड़के के विचार संगीता को पसंद नहीं आए, यह सुन कर देवकुमार चिंता में पड़ गए. अभी तक वे बहुत खुश थे कि बिना इधरउधर भटके अच्छा घर तथा अच्छा वर मिल रहा है.

थोड़ी देर के लिए शांति छा गई, फिर अंजना ने कहा कि अब यदि उन का फोन आता है तो उन्हें क्या जवाब देना है? सभी ने निर्णय संगीता पर ही छोड़ने को तय किया. आखिर उसे पूरी जिंदगी निर्वाह करना है. 3 दिन बीत जाने पर भी जब कोई फोन नहीं आया तो सभी अपनेअपने अनुमान लगाने लगे.

संगीता के फूफाजी बोले, ‘‘मुझे लगता है कि लड़के के बड़े भाई और भाभी को संगीता पसंद नहीं आई, वे दोनों एकदूसरे से आंखोंआंखों के इशारों से पसंद आने न आने का पूछ रहे थे. मैं ने देखा कि बड़े भाई ने नकारात्मक इशारा किया था. आप लोगों ने नोटिस किया होगा, बड़ा भाई एक शब्द भी नहीं बोला पूरे समय, अपने बच्चे को खिलाने में ही लगा रहा था.’’

संगीता की मां बोली, ‘‘हमारी लड़की के सामने तो लड़का कुछ भी नहीं. गोरे रंग और सुंदरता में तो हमारी संगीता इक्कीस ही ठहरती है.’’

संगीता हंसती हुई बोली, ‘‘हम दोनों की जिस तरह से बातें हुई हैं, वह घबरा गया होगा, कभी हामी नहीं भरेगा.’’

संगीता के उठ कर चले जाने के बाद देवकुमार बोले, ‘‘यदि उन की तरफ से रिश्ता स्वीकार नहीं होता है तो हमारी संगीता के मन पर चोट पड़ेगी. पहली बार ही उस को दिखाया है और उन के मना कर देने पर मनोवैज्ञानिक असर तो पड़ेगा ही, उसे सदमा भी लगेगा.’’

संगीता की बूआजी बोली, ‘‘देखो,  2 लोगों के एकजैसे विचार हों, यह तो संभव ही नहीं. जब 2 सगे भाईबहनों के विचार नहीं मिलते, तो ये तो दूसरे परिवार का मामला है. विवाह तो समन्वय बनाने की कला है, प्रेम और त्याग का रिश्ता है. और यह तो सदियों से होता चला आ रहा है कि लड़की को ही निभाना पड़ता है. हमारी संगीता सब कर लेगी. शांत मन से मैं कल उस से बात करूंगी.’’

देवकुमार को पूरी रात नींद नहीं आई. उन्हें संगीता की बूआजी की बातें तर्कसंगत लगीं. वे सोचने लगे कि संगीता को एडजस्ट करना ही होगा. यदि कल शाम तक बैंक मैनेजर साहब का फोन नहीं आता है तो मैं स्वयं फोन लगा कर बात करूंगा.

दूसरे दिन बुआजी ने संगीता को सम झाने की कोशिश की किंतु व्यर्थ.

संगीता बोली, ‘‘बूआजी, उन्हें सिर्फ खाना बनाने वाली बाई चाहिए तो शादी क्यों कर रहे हैं? एक नौकरानी रख लें. एडजस्टमैंट एक तरफ से संभव नहीं, दोनों तरफ से होना चाहिए. यह 21वीं सदी का दौर है. जमाना बदल गया है. उन की मम्मीजी ने कम से कम दस बार यही पूछा, ‘खाना बना लेती हो, क्याक्या बना लेती हो? हमारा लड़का खाने का बहुत शौकीन है, अभी होटल का खाना खाखा कर 3-4 किलो वजन कम हो गया है उस का.’’

देवकुमार शाम को बाजार से घर पहुंचे ही थे कि मैनेजर साहब का फोन आ गया. बड़े ही साफ शब्दों में उन्होंने पूरी बात बताई कि संगीता सभी को अच्छी लगी है. सौमिल का कहना है कि उन दोनों की सोच और विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर भी यदि संगीता को एडजस्ट करने में कोई दिक्कत न हो तो उसे कोई आपत्ति नहीं है.

‘‘आप सब सोचसम झ कर जो भी फैसला लें, मुझे 6-7 दिनों में बता दीजिएगा,’’ मैनेजर साहब ने बड़ी विनम्रता से अपनी बात समाप्त की.

अब गेंद देवकुमार के पाले में आ गई थी. कल रात कैसेकैसे खयाल आते रहे थे. बेटी के मन पर सदमे का सोचसोच कर परेशान थे. मैनेजर साहब कितने सुलझे हुए और स्पष्टवादी हैं. संगीता को समझना होगा. एक अच्छी और स्ट्रेट फौरवर्ड फैमिली है.

रात में खाना खाते समय मन में एक ही बात घूमफिर कर बारबार आ रही थी कि कैसे संगीता को अपने मन की बात समझाऊं. मैं ने और अंजना ने जो चाहा था, सब मिल रहा है. लड़का अच्छा पढ़ालिखा, अच्छी नौकरी वाला, सुंदर और स्मार्ट है. जानापहचाना परिवार है. और सब से बड़ी बात, पास के शहर में रहेगी तो कभी भी बुला लो या जा कर मिल आओ. वे बारबार संगीता को देखते, उस के मन में क्या चल रहा होगा, फिर सोचते, नहीं अपने स्वार्थ के लिए उस की इच्छा पर अपनी इच्छा नहीं लाद सकते.

खाने के बाद सब ड्राइंगरूम में बैठे. देवकुमार ने मैनेजर साहब के जवाब से संगीता को अवगत कराते हुए कहा, ‘‘बेटे, अब हम लोग बड़ी दुविधा में हैं, सबकुछ हम लोगों के मनमाफिक है पर अंतिम निर्णय तो तुम्हारी इच्छा से ही होगा. तुम चाहो तो सौमिल से मोबाइल पर और बात कर सकती हो.’’

संगीता पापा से कहना चाहती थी कि आज 4 दिन हो गए, यदि सचमुच मैं पसंद हूं उन्हें तो क्या सौमिल को नहीं चाहिए था कि वह मुझ से बात करता? इस में भी उस का ईगो है? मोबाइल पर बात करने की शुरुआत करने में भी मुझे ही एडजस्ट करना है? लेकिन उस ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई. देवकुमार चुपचाप उसे जाते देखते रहे. Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: कूरियर बौय, विधवा रुखसार और वह रात

Hindi Romantic Story: मुंबई में जुलाई का मौसम. रुखसार सुबह उठ कर रसोईघर में चाय बना ही रही थी कि हलकी बारिश होने लगी. उस ने चाय के साथसाथ गरमागरम पकौड़े भी तल दिए. इस के बाद तौलिया और नहाने के बाद पहनने वाले अंदरूनी कपड़े बाथरूम में रख दिए. बैडरूम में टैलीविजन पर कोई म्यूजिक चैनल चल रहा था.

पकौड़े तलने के बाद रुखसार ने खिड़की बंद कर दी और टैलीविजन की आवाज तेज कर दी. वह डांस करने लगी और मस्ती में खुद को दीवार पर लगे बड़े आईने में देखने लगी.

रुखसार ने काले रंग की नाइटी पहनी हुई थी. 35 साल की विधवा होते हुए भी उस ने अपने बदन को काफी मेंटेन किया हुआ था.

रुखसार मस्ती में डांस कर ही रही थी कि तभी दरवाजे की बैल बजी. उस ने टीवी की आवाज कम कर दी और एक दुपट्टा सिर पर रख लिया.

रुखसार ने दरवाजा खोला. बाहर कूरियर वाला था. 25 साल का जवान लड़का. वह कहने लगा, ‘‘कूरियर है… रुखसार खान के नाम से.’’

रुखसार को याद आया कि उस ने औनलाइन शौपिंग साइट से अपने लिए एक मोबाइल फोन बुक किया था. वह बोली, ‘‘मेरा ही नाम रुखसार है.’’

लड़के ने दस्तखत करने के लिए उसे पैन दिया. पैन देते समय उस के हाथ रुखसार की उंगलियों को छू गए थे. रुखसार ने एक नजर उस की ओर देखा और दस्तखत कर दिए.

रुखसार ने 52 सौ रुपए दिए तो लड़के ने 2 सौ रुपए वापस कर दिए और बोला, ‘‘2 सौ रुपए डिस्काउंट चल रहा है.’’

रुखसार ने उस लड़के को ध्यान से देखा, जिस ने आज के बेईमानी के जमाने में भी ईमानदारी से सच कहा और 2 सौ रुपए वापस कर दिए.

थोड़ी देर बाद वह लड़का बोला, ‘‘थोड़ा पानी मिलेगा?’’

रुखसार ने पूरा दरवाजा खोला और बोली, ‘‘तुम तो काफी भीग भी गए हो. अंदर आ जाओ.’’

रुखसार ने मोबाइल वाला डब्बा अलमारी में रखा और रसोईघर में पानी लेने चली गई. उस ने अपनी छाती से दुपट्टे को अलग कर दिया था.

कुछ देर बाद रुखसार ने लड़के को पानी दिया. पानी देते समय जैसे ही वह थोड़ा झुकी, लड़के की नजर उस के उभारों पर जा टिकी. उस की आंखें बड़ीबड़ी हो गईं.

पानी पीतेपीते वह लड़का नजर बचा कर रुखसार के उभारों को देख रहा था कि अचानक उस ने छींक दिया.

रुखसार बोली, ‘‘तुम्हें तो सर्दी लग गई है. अभी बारिश भी तेज है. तुम चाहो तो थोड़ी देर यहां रुक सकते हो.

‘‘तुम्हारे कपड़े भी काफी भीग गए हैं. चाहो तो बाथरूम में जा कर फ्रैश हो सकते हो.’’

वह लड़का बाथरूम में चला गया. दरवाजा बंद कर के लाइट जलाई. वहां रुखसार ने नहाने के लिए तौलिया और अंदरूनी कपड़े पहले से ही रखे हुए थे.

लड़के ने कमीज निकाल कर उस तौलिए को पहले चूमा, फिर उसी से अपने बदन को पोंछा. उस ने रुखसार के ब्रा को अपने हाथ में लिया ही था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने ब्रा को वहीं पर रख दिया और थोड़ा सा दरवाजा खोला.

रुखसार ने उस को काले रंग का कुरता दिया और बोली, ‘‘यह लो, इसे पहन लेना.’’

लड़के ने वह कुरता पहन लिया और अपनी कमीज सूखने के लिए डाल दी.

वह बैडरूम में जा कर टैलीविजन देखने लगा. रुखसार रसोईघर से चाय और पकौड़े ले आई और उस से पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

लड़का बोला, ‘‘जुनैद.’’

‘‘कहां के रहने वाले हो तुम?’’

‘‘आजमगढ़.’’

‘‘मैं भी आजमगढ़ की रहने वाली हूं. आजमगढ़ में कहां से हो तुम?’’

‘‘लालगंज तहसील.’’

‘‘मैं निजामाबाद की रहने वाली हूं. लालगंज में हमारे काफी रिश्तेदार रहते हैं. अम्मीं की भी वहां की पैदाइश है.

‘‘और कौनकौन रहता है आप के साथ?’’

‘‘सिर्फ मैं.’’

‘‘और आप के शौहर?’’

‘‘उन की मौत हो गई है.’’

‘‘माफ करना, पर कैसे?’’

रुखसार ने बताया कि साल 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे में उस के शौहर के साथ ससुराल के सभी लोग मारे गए थे.

यह बताते हुए रुखसार की आंखें नम हो गईं. जुनैद ने उस का दुख बांटने की कोशिश की और अपने बारे में बताया कि उस ने आजमगढ़ से बीटैक की पढ़ाई की है और वह मालवणी में अपने चाचा के साथ पिछले एक साल से रह रहा है. जब उसे अपनी फील्ड मेकैनिकल इंजीनियरिंग में कोई नौकरी नहीं मिली, तो उस ने कूरियर कंपनी में नौकरी शुरू कर दी.

उन दोनों को बातें करतेकरते एक घंटा हो गया था. रुखसार जुनैद को अपने निकाह की तसवीरें दिखाने लगी. जुनैद बोला, ‘‘तब आप किसी खूबसूरत अप्सरा से कम नहीं थीं.’’

रुखसार ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा…’’ और वह खाली प्लेट और कप ले कर रसोईघर में चली गई. अब वह नहाने की तैयारी कर रही थी.

जुनैद उस समय की खूबसूरती को निहार रहा था. वह नहाने के लिए जा ही रही थी कि तभी वापस बैडरूम में गई. जुनैद हैरान रह गया.

रुखसार ने पूछा, ‘‘कैसे लगी निकाह की अलबम?’’

जुनैद बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत,’’

वह रुखसार के गले के नीचे देख रहा था, ‘‘वैसे अभी भी आप कुछ कम नहीं हैं.’’

यह सुन कर रुखसार एक खास अदा में मुसकरा दी.

रुखसार नहाने चली गई. कुछ देर बाद बाथरूम से आवाज आई, ‘‘मैं अपना तौलिया लेना भूल गई हूं. दे दो मुझे.’’

जुनैद ने रुखसार को तौलिया दे दिया. कुछ देर बाद पानी की आवाज आने लगी.

जुनैद ने सोचा कि रुखसार अब नहाने लगी है. वह अपने खूबसूरत बदन पर साबुन लगा रही होगी.

कुछ देर बाद पानी की आवाज धीमी हो कर बंद हो गई. रुखसार नहा कर बाहर आई. उस ने काले रंग का लहंगा और काले रंग की चोली पहनी थी. छाती पर दुपट्टा था और सिर पर तौलिया बंधा हुआ था.

जुनैद रुखसार को देख कर भी अनजान बना टीवी देख रहा था. रुखसार आईने के सामने खड़ी थी. उस ने अपने पूरे बाल खोल दिए थे. खुले हुए लंबे बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे.

जुनैद के मन में आया कि वह चुपके से उठ कर रुखसार की कमर पकड़ कर उसे पूरी तरह दबा दे. तभी रुखसार ने जुनैद की तरफ देखा. इस से जुनैद घबरा गया और अपनी चोर नजरों को टीवी पर लगा दिया.

कुछ देर बाद रुखसार ने अलमारी से वह मोबाइल निकाला, जो जुनैद ले कर आया था. वह उस के फीचर के बारे में जुनैद से पूछने लगी और उस के पास आ कर बैठ गई.

जुनैद ने रुखसार को वह फोन चलाना सिखाया. वह अपनी उंगलियों से उस की मुलायम उंगलियों को पकड़ कर मोबाइल के अलगअलग फीचर बताने लगा.

बीचीबीच में जुनैद का हाथ रुखसार के हाथ को छू भी जाता था, पर रुखसार ने बुरा नहीं माना.

इस से जुनैद हिम्मत की बढ़ गई. अब वह जानबूझ कर उस के हाथ को छूने लगा. धीरेधीरे उस की नजरें मोबाइल से हट कर रुखसार के गले के निचले हिस्से की तरफ गईं.

इसी तरह दोपहर के 2 बज गए. बारिश धीमी हो गई थी. वे दोनों खाना खाने लगे.

जुनैद ने पूछा, ‘‘आप दोबारा निकाह क्यों नहीं कर लेतीं?’’

रुखसार बोली, ‘‘तुम ने क्यों नहीं किया अभी तक निकाह?’’

‘‘अम्मी तो कई बार जिद करती रहती हैं निकाह के लिए, पर मैं ही टाल देता हूं कि अभी तक कोई लड़की पसंद नहीं आई. जब पसंद आएगी, तो कर लूंगा.’’

‘‘तो कैसी लड़की पसंद है तुम्हें?’’ रुखसार ने पूछा.

‘‘वही जो आप की तरह समझदार हो. घरेलू काम जानती हो. जो मुझे रोज गरमागरम चाय और बिलकुल आप जैसे पकौड़े बना कर खिला सके.’’

रुखसार उस का भाव समझते हुए बोली, ‘‘मैं तो तुम से 10 साल बड़ी हूं और विधवा भी हूं.’’

जुनैद बोला, ‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘पर क्या तुम्हारे अब्बू और अम्मी मानेंगे?’’

‘‘अरे, निकाह मुझे करना है या अम्मीअब्बू को. तुम ने वह कहावत नहीं सुनी कि जब मियांबीवी राजी, तो क्या करेगा काजी…’’

शाम के 5 बज चुके थे. तभी जुनैद का फोन आया. उस की अम्मी ने फोन किया था. वह बात करने के लिए रसोईघर में चला गया.

रुखसार दीवार से कान लगाए जुनैद की बातें सुन रही थी. जुनैद ने भांप लिया था कि रुखसार पास ही है.

तभी जुनैद बोला, ‘‘नहीं अम्मी, अब लड़की देखने की जरूरत नहीं है. मुझे एक लड़की पसंद है.’’

यह सुन कर रुखसार शरमा गई और नजरें बचा कर जुनैद को देखने लगी.

इस के बाद जुनैद ने फोन काट दिया. रुखसार पीछे से आ कर उस से लिपट गई. जुनैद ने उसे अपनी बांहों में भर लिया.

रुखसार बोली, ‘‘तुम ने तो अपनी अम्मी से बात कर ली है, मुझे भी अपने अम्मीअब्बू से बात करनी होगी. अच्छा, तुम्हें घर नहीं जाना क्या? रात के 7 बज चुके हैं.’’

जुनैद ने बताया, ‘‘चाचा किसी काम से आज ही बाहर गए हैं. घर में कोई नहीं है. खाना भी बाहर ही खाना होगा.’’

तभी बारिश दोबारा शुरू हो गई. रुखसार ने जुनैद को रोका. वह बोली, ‘‘अगर बुरा न मानो, तो आज यहीं रुक जाओ.’’

जुनैद का भी मन कर रहा था उस के साथ पूरी रात रुकने का.

रुखसार ने खीर, पूरी और तरकारी बनाई थी. शायद इसी खुशी में कि उसे जुनैद जैसा जीवनसाथी मिला था.

जुनैद ने खाना खाते हुए कहा, ‘‘रुखसार, तुम खाना बहुत अच्छा बनाती हो, बिलकुल मेरी अम्मी की तरह.’’

रुखसार ने जुनैद के मुंह से पहली बार अपना नाम सुना. उसे बहुत अच्छा लगा.

थोड़ी देर बाद रुखसार अपने अब्बू से फोन पर बात करने बाहर चली गई.

जब वह वापस आई, तो जुनैद बोला, ‘‘क्या कहा उन्होंने?’’

‘‘उन्होंने कहा कि अगर लड़का हमारी बिरादरी का है, नेक है और अपने पैरों पर खड़ा है, तो उन्हें कोई एतराज नहीं,’’ इतना कह कर रुखसार के चेहरे पर शर्म वाली मुसकराहट आ गई.

रात के 10 बजे रुखसार बोली, ‘‘मैं रसोईघर में सो जाती हूं, तुम यहीं बैडरूम में सो जाओ.’’

‘‘नहीं, मैं वहां सो जाऊंगा. और तुम बैडरूम में सोना, क्योंकि यह घर तो तुम्हारा है.’’

‘‘पर निकाह के बाद तो तुम्हारा भी हो जाएगा,’’ रुखसार के मुंह से निकल गया.

यह सुन कर जुनैद ने उसे गले से लगा लिया और उस के गालों पर एक जोरदार चुंबन जड़ दिया. उस ने उस की छाती से दुपट्टा अलग कर दिया.

रुखसार भी जुनैद से पूरी तरह लिपट गई. जुनैद ने अपने होंठ उस के गुलाबी होंठों पर रख दिए. रुखसार की आंखें बंद हो गईं. उस के बाद जुनैद ने कमरे की लाइट बंद कर दी. Hindi Romantic Story

Romantic Story In Hindi: विसाल ए यार – इश्क की अंगड़ाई

Romantic Story In Hindi: दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद किसी बीमारी के चलते आयशा की मां चल बसी थीं. पिता ने दोनों को बड़े लाड़प्यार से पाला था.

आयशा बेशक अमीर लड़की थी, पर उसे पैसे का घमंड छू तक नहीं गया था. लेकिन हां, जिद की पक्की थी वह. जो कह दिया या सोच लिया वह तो कर के ही रहना है, फिर चाहे उस में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं.

आयशा की इसी जिंदादिली पर रोहित मरमिटा था, मगर वह यह नहीं जानता था कि आयशा इतने बड़े घराने से है. आखिरकार दोनों का इश्क अंगड़ाई लेने लगा.

‘‘आयशा, हमारा ग्रेजुएशन का यह आखिरी साल है. तुम ने आगे के बारे में क्या सोचा है? क्या तुम आगे पढ़ोगी या कुछ और?’’

‘‘रोहित, मैं तो अभी आगे पढ़ने की सोच रही हूं, मगर मैं तुम्हारे सिवा किसी और को अपना लाइफ पार्टनर नहीं बना सकती. अगर तुम्हें शादी की जल्दी हो तो मैं अपना प्लान बदल भी सकती हूं. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं, मगर तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. तुम न मिले तो मैं मर जाऊंगी.’’

‘‘आयशा, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा, लेकिन अभी मैं इस लायक भी नहीं कि अपने परिवार का बोझ उठा सकूं. मुझे अभी आगे और पढ़ना है, ताकि मैं किसी अच्छी पोस्ट पर जौब कर सकूं और तुम्हें और अपने परिवार को हर वह खुशी दे सकूं, जिस के तुम सब हकदार हो. तुम्हें इंतजार करना होगा.’’

‘‘मैं मरते दम तक भी इंतजार करूंगी, लेकिन एक बार तुम्हें मेरे पापा से मिल लेना चाहिए. तब तक मेरी भी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, फिर हम दोनों मिल कर अपना परिवार संभाल लेंगे.’’

‘‘ठीक है. मैं कल ही तुम्हारे पापा से मिलता हूं.’’

अगले दिन रोहित आयशा के पापा से मिलने गया, तो आयशा के पापा ने उस से कहा, ‘‘अरे रोहित, आओ बेटा. मुझे तुम्हारे बारे में आयशा ने सब बता दिया है. बेटा, तुम ने बहुत सही फैसला लिया कि एक बार सैट हो कर ही शादी के बारे में सोचना है.’’

‘‘जी हां अंकल, पहले इनसान को परिवार पालने लायक बनना चाहिए, उस के बाद ही परिवार को आगे बढ़ाने का सोचना चाहिए. आप से मुझे यही उम्मीद थी. आयशा… अब मेरी अमानत है आप के पास. ठीक है तो मैं चलता हूं.’’

जैसे ही रोहित जाने के लिए उठा, आयशा के पापा ने उस के हाथ पर

50 लाख रुपए का चैक रख दिया, जिसे रोहित हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘अंकल, यह सब क्या है?’’

‘‘बेटा, यह मेरी तरफ से एक छोटी सी मदद है, जो तुम्हारा भविष्य बनाने में काम आएगी. और अब मेरी बेटी को भूलने की कोशिश करो, ताकि मैं उस की शादी किसी अच्छे और ऊंचे घराने में कर सकूं.’’

‘‘अंकल, आप मेरी मदद कर रहे हैं या मेरे प्यार का सौदा?’’

‘‘कुछ भी समझ लो. अभी मैं तुम्हें प्यार से समझा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो कि मुझे सख्ती से काम लेना पड़े.’’

रोहित चैक ठुकरा कर चला गया और जातेजाते कह गया, ‘‘अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो कोई भी हमें मिलने से नहीं रोक सकता.’’

‘‘पहले इस लायक बन कर दिखाओ,’’ आयशा के पापा को भी अब गुस्सा आने लगा.

आयशा ने लाख कहा कि वह रोहित के बिना जिंदा नहीं रह सकती, पर उस के पापा ने उस की एक न सुनी और फरमान सुना दिया कि अगले महीने आयशा की शादी उन के दोस्त के बेटे आशीष से कर दी जाएगी.

अगले महीने आयशा की शादी बिजनैस टायकून सुरेश मेहता के बेटे आशीष मेहता से करा दी गई. लेकिन जब आयशा विदा होने लगी, तब उस ने पापा को एक नजर देख कर कहा, ‘‘पापा, अब तक मैं आप के साए तले थी, आप का हर हुक्म मानने को मजबूर थी, लेकिन अब मैं अपना हर फैसला लेने के लिए आजाद हूं.’’

‘‘आशीष, मैं किसी और से प्यार करती हूं, इसलिए मैं आप के साथ पत्नी धर्म नहीं निभा सकती,’’ आयशा ने सुहागरात पर ही अपने पति से साफ लफ्जों में कह दिया.

‘‘अगर ऐसा है, तो तुम ने अपने पापा से क्यों नहीं कहा? अब मुझे कहने से क्या फायदा? अब कानूनन तुम मेरी पत्नी हो और तुम पर मेरा हक है.’’

‘‘मगर, किसी की मरजी के खिलाफ उस का शरीर पाना भी कानूनन जुर्म है, यह तो आप जानते ही होंगे, इसलिए आप मुझे तलाक दे दें, ताकि मैं भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकूं और आप भी.’’

‘‘मैं तुम्हें तलाक नहीं दे सकता. यह सब तुम्हें पहले सोचना था. हमारी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएंगी… क्या कहेंगे लोग कि बिजनैस टायकून मेहता का बेटा बीवी को नहीं संभाल सका. मैं तुम्हें किसी कीमत पर तलाक नहीं दूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, इस के जिम्मेदार आप खुद होंगे, मैं उसे नहीं छोड़ सकती.’’

और वही हुआ, जो एक पत्नी को नहीं करना चाहिए था. आयशा अकसर रोहित से मिलती, उस पर अपने हुस्न का जाल बिछाती, मगर रोहित खुद पर काबू पा लेता.

आग भला घी से कितना दूर रहेगी. जब घी और आग पासपास होंगे, तो आग बढ़ेगी भी, भड़केगी भी. एक दिन रोहित भी बहक गया और दोनों के जिस्मानी संबंध बन गए.

अब आयशा रोहित को कहती कि वह उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखे, ताकि किसी तरह उस का पति उसे तलाक दे दे. अगर रोहित कहता कि ऐसा करना गलत है, तो आयशा बीमार होने का नाटक करती. एक बार उस ने कार से जानबूझ कर अपना ऐक्सिडैंट भी किया, ताकि रोहित की हमदर्दी उसे मिल सके… और उधर अपने पति आशीष से भी कुछ न छिपाती, ताकि वह परेशान हो कर उसे तलाक दे दे.

लेकिन आयशा का पति अपने खानदान और अपने स्टेटस की वजह से उसे तलाक नहीं देना चाहता था. उस ने आयशा को बहुत समझाया कि वह गलत काम न करे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, रोहित को भी आयशा के जिस्म का चसका लगता गया. साथ ही, आयशा के पति के पैसे पर ऐश करने का भी वह आदी हो गया था. वह अब आयशा को किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता था, यहां तक कि उस की पढ़ाई का खर्च भी आयशा ही उठाती थी.

अचानक रोहित के पिता की मौत हो गई और इधर आयशा के पति ने भी आयशा के सारे बैंक अकाउंट सील करवा दिए. आयशा का घर से निकलना भी बंद कर दिया.

अब न तो आयशा के पास पैसा था और न ही रोहित के पापा की कमाई. सारी जिम्मेदारी रोहित पर आ गई. रोहित और आयशा का मिलना बंद हो गया.

इत्तिफाक से एक अच्छेखासे परिवार की एकलौती लड़की का रिश्ता रोहित के लिए आया और मां के समझाने पर रोहित ने शादी कर ली और ससुर का सारा बिजनैस संभालने लगा, जिस से रोहित का परिवार सैटल हो गया.

कुछ समय तक तो आयशा चुप रही, मगर उसे तन की भूख जब हद से बढ़ कर सताने लगी और रोहित से मिलने भी न दिया गया, तो उस ने खुदकुशी करने की कोशिश की.

आयशा के खुदकुशी करने वाले मुद्दे पर भी ससुराल वालों के लिए ही मुसीबत खड़ी होगी, इसलिए उस के पति आशीष ने अब अपने मातापिता से कुछ भी छिपाना ठीक नहीं समझा.

सारी बात जान कर आशीष के मातापिता ने आशीष को आयशा से तलाक के लिए राजी कर लिया.

इधर आयशा का तलाक हुआ और जैसे ही खुशीखुशी वह रोहित से मिलने उस के घर गई, सामने ही रोहित अपनी पत्नी के साथ नजर आया.

‘‘अरे आयशा, आओ… बड़े अच्छे मौके पर आई हो. आज मेरे बेटे का नामकरण है. आओ, तुम भी मेरे बेटे को आशीर्वाद दो.’’

आयशा हैरान सी खड़ी कभी रोहित को देखती, तो कभी उस के साथ खड़ी उस की पत्नी को, जिस की गोद में प्यारा सा बच्चा था. दूर कहीं से ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म का सुरैया का गाना चल रहा था… ‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता…’ Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: गुनाहों का रिश्ता – सुदीप का किरण के लिए प्यार

Hindi Romantic Story: ‘‘किरण, क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर तुम ने मुझसे अचानक बोलना क्यों बंद कर दिया?’’

‘‘यों ही.’’

‘‘मुझ से कोई गलती हो गई हो, तो बताओ… मैं माफी मांग लूंगा.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है सुदीप. अब मैं सयानी हो गई हूं न, इसलिए लोगों को मुझ पर शक होने लगा है कि कहीं मैं गलत रास्ता न पकड़ लूं,’’ किरण ने उदास मन से कहा.

‘‘जब से तुम ने मुझे अपने से अलग किया है, तब से मेरा मन बेचैन रहने लगा है.’’

सुदीप की बातें सुन कर किरण बोली, ‘‘अभी तक हम दोनों में लड़कपन था, बढ़ती उम्र में जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं. दूसरों के कहने पर यह सब समझ में आया.’’

‘‘तुम ने कभी मेरे बारे में सोचा है कि मैं कितना बेचैन रहता हूं?’’

‘‘घर का काम निबटा कर जब मैं अकेले में बैठती हूं, तो दूसरे दोस्तों की यादों के साथसाथ तुम्हारी भी याद आती है. हम दोनों बचपन के साथी हैं. अब बड़े हो कर भी लगता है कि हम एकदूसरे के हमजोली बने रहेंगे.’’

‘‘तो दूरियां मत बनाए रखो किरण,’’ सुदीप ने कहा.

यह सुन कर किरण चुप हो गई.

जब सुदीप ने अपने दिल की बात कही, तो किरण का खिंचाव उस की ओर ज्यादा बढ़ने लगा.

दोनों अपने शुरुआती प्यार को दुनिया की नजरों से छिपाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जब दोनों के मिलने की खबर किरण की मां रामदुलारी को लगी, तो उस ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपनी हद में ही रहे.

उसी दिन से सुदीप का किरण के घर आनाजाना बंद हो गया.

लेकिन मौका पा कर सुदीप किरण के घर पहुंच गया. किरण ने बहुत कहा कि वह यहां से चला जाए, लेकिन सुदीप नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम से दिल लगाया, तुम डरती क्यों हो? मैं  तुम से शादी करूंगा, मु?ा पर भरोसा करो.’’

‘‘सुदीप, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन… जैसे अमीर और गरीब का रिश्ता नहीं होता, इसी तरह से ब्राह्मण और नीची जाति का रिश्ता भी मुमकिन नहीं, इसलिए हम दोनों दूर ही रहें तो अच्छा होगा.’’

सुदीप पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा.

वह आगे बढ़ा और किरण को बांहों में भर कर चूमने लगा. पहले तो किरण को अच्छा लगा, लेकिन जब सुदीप हद से ज्यादा बढ़ने लगा, तो वह छिटक कर अलग हो गई.

‘‘बस सुदीप, बस. ऐसी हरकतें जब बढ़ती हैं, तो अनर्थ होते देर नहीं लगती. अब तुम यहां से चले जाओ,’’ नाखुश होते हुए किरण बोली.

‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है किरण, प्यार में यही सब तो होता है.’’

‘‘होता होगा. तुम ने इतनी जल्दी कैसे सम?ा लिया कि मैं इस के लिए राजी हो जाऊंगी?’’

‘‘बस, एक बार मेरी प्यास बुझ दो. मैं दोबारा नहीं कहूंगा. शादी से पहले ऐसा सबकुछ होता है.’’

‘‘नहीं सुदीप, कभी नहीं.’’

इस तरह सुदीप ने किरण से कई बार छेड़खानी की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली.

कुछ दिन बाद किरण के मातापिता  दूसरे गांव में एक शादी में जातेजाते किरण को कह गए थे कि वह घर से बाहर नहीं निकलेगी और न ही किसी को घर में आने देगी.

उस दिन अकेली पा कर सुदीप चुपके से किरण के घर में घुसा और अंदर

से किवाड़ बंद कर किरण को बांहों में कस लिया.

अपने होंठ किरण के होंठों पर रख कर वह देर तक जबरदस्ती करता रहा, जिस से दोनों के जिस्म में सिहरन पैदा हो गई, दोनों मदहोश होने लगे.

किरण के पूरे बदन को धीरेधीरे सहलाते हुए सुदीप उस की साड़ी ढीली कर के तन से अलग करने की कोशिश करने लगा.

किरण का ध्यान टूटा, तो उस ने जोर से धक्का दे कर सुदीप को चारपाई से अलग किया और अपनी साड़ी ठीक करते हुए गरजी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की. चले जाओ यहां से.’’

‘‘चला तो जाऊंगा, लेकिन याद रखना कि तुम ने आज मेरी इच्छा पूरी नहीं होने दी,’’ सुदीप गुस्से में चला गया.

उस के जाने के बाद किरण की आंखों से आंसू निकल आए.

मां के लौटने पर किरण ने सारी सचाई बता दी. रामदुलारी ने उसे चुप रहने को कहा.

किरण के पिता सुंदर लाल से रामदुलारी ने कहा, ‘‘लड़की सयानी हो गई है, कुछ तो फिक्र करो.’’

‘‘तुम इसे मामूली बात सम?ाती हो? आजकल लड़की निबटाने के लिए गांठ भरी न हो, तो कोई बात नहीं करेगा. भले ही उस लड़के वाले के घर में कुछ न हो.’’

‘‘तो क्या यही सोच कर हाथ पर हाथ धर बैठे रहोगे?’’

‘‘भरोसा रखो. वह कोई गलत काम नहीं करेगी.’’

सुंदर लाल की दौड़धूप रंग लाई और एक जगह किरण का रिश्ता पक्का हो गया.

किरण की शादी की बात जब सुदीप के कानों में पहुंची, तो वह तड़प उठा.

एक रात किरण अपने 8 साला भाई के साथ मकान की छत पर सोई थी. उस के बदन पर महज एक साड़ी थी.

किरण और सुदीप के मकानों के बीच दूसरे पड़ोसी का मकान था, जिसे पार करता हुआ सुदीप उस की छत पर चला गया.

सुदीप किरण की बगल में जा कर लेट गया. किरण की नींद खुल गई. देखा कि वह सुदीप की बांहों में थी. पहले तो उस ने सपना सम?ा, पर कुछ देर में ही चेतना लौटी. वह सबकुछ सम?ा गई. उस ने सुदीप की बेजा हरकतों पर ललकारा.

‘‘चुप रहो किरण. शोर करोगी, तो सब को पता चल जाएगा. बदनामी तुम्हारी होगी. मैं तो कह दूंगा कि तुम ने रात में मु?ो मिलने के लिए बुलाया था,’’ कहते हुए सुदीप ने किरण का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

इस के बाद सुदीप किरण के साथ जोरजबरदस्ती करता रहा और वह चुपचाप लेटी रही.

किरण की आंखें डबडबा गईं. उस ने कहा, ‘‘सुदीप, आज तुम ने मेरी सारी उम्मीदों को खाक में मिला दिया. आज तुम ने मेरे अरमानों पर गहरी चोट पहुंचाई है. मैं तुम से प्यार करती हूं, करती रहूंगी, लेकिन अब मेरी नजरों से दूर हो जाओ,’’ कह कर वह रोने लगी.

उसी समय पास में सोए किरण के छोटे भाई की नींद खुली.

‘मांमां’ का शोर करते हुए वह छत से नीचे चला गया और वहां का देखा हाल मां को  सुनाया. सुंदर लाल भी जाग गया. दोनों चिल्लाते हुए सीढ़ी से छत की ओर भागे. उन की आवाज सुन कर सुदीप किरण को छोड़ कर भाग गया.

दोनों ने ऊपर पहुंच कर जो नजारा देखा, तो दोनों के रोंगटे खड़े हो गए. मां ने बेटी को संभाला. बाप छत पर से सुदीप को गालियां देता रहा.

दूसरे दिन पंचायत बैठाने के लिए किरण के पिता सुंदर लाल ने ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद से गुजारिश करते हुए पूरा मामला बतलाया और पूछा, ‘‘हम लोग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं. आप हमारे साथ चलेंगे, तो पुलिस कार्यवाही करेगी, वरना हमें टाल दिया जाएगा.’’

‘‘सुंदर लाल, मैं थाने चलने के लिए तैयार हूं, लेकिन सोचो, क्या इस से तुम्हारी बेटी की गई इज्जत वापस लौट आएगी?’’

‘‘फिर हम क्या करें प्रधानजी?’’

‘‘तुम चाहो, तो मैं पंचायत बैठवा दूं. मुमकिन है, कोई रास्ता दिखाई पड़े.’’

‘‘आप जैसा ठीक सम?ों वैसा करें,’’ कहते हुए सुंदर लाल रोने लगा.

दूसरे दिन गांव की पंचायत बैठी.

गांव के कुछ लोग ब्राह्मणों के पक्ष में थे, तो कुछ दलितों के पक्ष में.

कुछ लोगों ने सुदीप को जेल भिजवाने की बात कही, तो कुछ ने सुदीप से किरण की शादी पर जोर डाला.

शादी की बात पर सुदीप के पिता बिफर पड़े, ‘‘कैसी बातें कहते हो?

कहीं हम ब्राह्मणों के यहां दलित

ब्याही जाएगी.’’

कुछ नौजवान शोर मचाने लगे, ‘जब तुम्हारे बेटे ने दलित से बलात्कार किया, तब तुम्हारा धर्म कहां था?’

‘‘ऐसा नहीं होगा. पहली बात तो यह कि सुदीप ने ऐसा किया ही नहीं. अगर गलती से किया होगा, तो धर्म नहीं बदल जाता,’’ सुदीप की मां बोली.

‘‘तो मुखियाजी, आप सुदीप को जेल भिजवा दें, वहीं फैसला होगा,’’ किरण की मां रामदुलारी ने कहा.

ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद ने पंचों की राय जानी, तो बोले, ‘पंचों की राय है कि सुदीप ने जब गलत काम किया है, तो अपनी लाज बचाने के लिए किरण से शादी कर ले, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहे.’

यह सुन कर ब्राह्मण परिवार सन्न रह गया.

पंचायत ने किरण की इच्छा जानने की कोशिश की. किरण ने भरी पंचायत में कहा, ‘‘मेरी इज्जत सुदीप ने लूटी है. इस वजह से अब मु?ो उसी के पास अपनी जिंदगी महफूज नजर आती है.

‘‘गंदे बरताव की वजह से मैं सुदीप से शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब मैं मजबूर हूं, क्योंकि इस घटना को जानने के बाद अब मु?ा से कोई शादी नहीं करना चाहेगा.’’

सुदीप के पिता ने दुखी मन से कहा, ‘‘मेरी इच्छा तो किरण की शादी वहशी दरिंदे सुदीप के साथ करने की नहीं थी, फिर भी मैं किरण की शादी सुदीप से करने को तैयार हूं.’’

किरण व सुदीप के घरपरिवार में शादी पर रजामंदी हो जाने पर पंचायत ने भी यह गुनाहों का रिश्ता मान लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: कुछ ऐसे बंधन होते हैं – दोस्ती का मतलब

Hindi Family Story: ‘‘दोस्ती वह इमारत है जो विश्वास की नींव पर खड़ी होती है… यह नदी के किनारों को जोड़ने वाला वह पुल है, जिस में यह माने नहीं रखता कि किनारे स्त्री है या पुरुष,’’ व्हाट्सऐप पर आया मैसेज प्रेरणा ने जरा ऊंचे स्वर में पति सोमेश को सुनाते हुए पढ़ा.

‘‘एक स्त्री और पुरुष आपस में कभी दोस्त नहीं हो सकते… यह सिर्फ और सिर्फ अपनी वासना को शराफत का खोल पहनाने की गंदी मानसिकता से ज्यादा कुछ नहीं…’’ सुनते ही हमेशा की तरह सोमेश उस दिन भी बिदक गया.

प्रेरणा का मुंह उतर गया. उस ने फोन चार्जर में लगाया और बाथरूम की तरफ बढ़ गई.

प्रेरणा और सोमेश की शादी को 5 वर्ष होने को आए थे. देह के फासले जरूर उन के बीच पहली रात को ही खत्म हो गए थे, लेकिन दिलों के बीच की दूरी आज तक तय नहीं हो सकी थी. यों तो दोनों के बीच खास मतभेद नहीं थे, लेकिन स्त्रीपुरुष के बीच संबंधों को ले कर सोमेश के खयालात आज भी सामंती युग वाले ही थे. जब भी प्रेरणा स्त्रीपुरुष के बीच खालिस दोस्ती की पैरवी करती, सोमेश इसी तरह भड़क जाता था.

दोनों अलगअलग मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते थे. सुबह का वक्त दोनों के लिए ही भागमभाग वाला होता था और शाम को घर लौटने में अकसर दोनों को ही रात हो जाती थी. सप्ताहांत पर जरूर उन्हें कुछ लमहे फुरसत के मिलते, लेकिन वे भी सप्ताहभर के छूटे हुए कामों की भेंट चढ़ जाते. ऐसे में सोमेश को तो कोई खास परेशानी नहीं होती थी, क्योंकि वह तो शुरू से ही अंतर्मुखी स्वभाव का रहा है, लेकिन मनमीत के अभाव में प्रेरणा अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने के लिए तड़प उठती थी.

प्रेरणा को हमेशा एक ऐसे पुरुष मित्र की तलाश थी जो दिल के बेहद करीब हो… जिस से हर राज शेयर किया जा सके… हर मुश्किल वक्त में सलाह ली जा सके… जिस के साथ बिंदास खिलखिलाया जा सके और दुख की घड़ी में जिस के कंधे पर सिर टिका कर रोया भी जा सके.

ऐसे दोस्त की कल्पना जब प्रेरणा सोमेश के साथ साझा करती थी, तो वह आगबबूला हो उठता था.

‘‘पति है न… सुखदुख में साथ निभाने के लिए… फिर अलग से पुरुष की क्या जरूरत हो सकती है और फिर मित्र भी हो तो कोई स्त्री क्यों नहीं? मां या बहन से अच्छी कोई सहेली नहीं हो सकती?’’ कह कर सोमेश उसे चुप करा दिया करता.

‘‘पति कभी दोस्त नहीं हो सकता, क्योंकि उस के प्रेम में अधिकार की भावना होती है… पत्नी को ले कर स्वामित्व का भाव होता है… और स्त्री उस में तो स्वाभाविक ईर्ष्या होती ही है… फिर चाहे बहन ही क्यों न हो… रही बात मां की तो उन की बातें तो हमेशा नैतिकता का जामा पहने होती हैं… वे दिल की नहीं दिमाग की बातें करती हैं… मुझे ऐसा मित्र चाहिए जिस के साथ बंधन में भी आजादी का एहसास हो…’’

प्रेरणा लाख कोशिश कर के भी सोमेश को समझा नहीं सकती थी कि किसी भी महिला के लिए पुरुष मित्र शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक जरूरत है.

इन्हीं दिनों रवीश ने प्रेरणा की जिंदगी में दस्तक दी. मार्केटिंग विभाग में ट्रेनी के रूप में जौइन करने वाला रवीश दिखने में जितना आकर्षक था व्यवहार में भी उतना ही शालीन और हंसमुख था. उसे देख प्रेरणा को लगता जैसे वह अपने आधे संवाद तो अपनी आंखों और मुसकराहट से ही कर लेता है.

धीरेधीरे रवीश पूरे औफिस का चहेता बन गया था और फिर कब वह प्रेरणा के दिल के बंद दरवाजे पर दस्तक देने लगा था खुद प्रेरणा भी कहां जान पाई थी. हां, रवीश की इस हिमाकत पर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ था. सोमेश के स्वभाव से भलीभांति परिचित प्रेरणा ने रवीश के लिए अपने दिल का दरवाजा कस कर बंद कर लिया था, लेकिन रवीश कोई फूल नहीं था जिसे रोका जा सके… वह तो खुशबू था और खुशबू कभी रोकने से रुकी है भला?

और फिर शुरुआत हुई स्त्रीपुरुष के बीच उस खालिस दोस्ती के रिश्ते की जिसे जीने के लिए प्रेरणा ने न जाने कितनी बार अपने मन को मारा था… जिस के कोमल एहसास को महसूस करने के लिए न जाने कितनी ही बार सोमेश के तानों से अपनेआप को छलनी किया था…

प्रेरणा अपने जीवन की किताब के अनछुए पन्ने को पढ़ने लगी. कितना सुंदर था यह बंद पन्ना… इंद्रधनुषी रंगों में ढला… खुशबुओं से तरबतर… पंखों से हलका… सूर्य की किरण सा सुनहरा… बर्फ सा शीतल… और मिस्री सा मीठा… रवीश का साथ जैसे पिता का वात्सल्य… मां की ममता… भाई सा प्रेम… बहन सा स्नेह और प्रेमी सा नाज उठाने वाला… प्रेम का हर रूप उस में समाया था… नहीं था तो बस एकाधिकार का भाव… आधिपत्य की भावना…

प्रेरणा रवीश की आदी होने लगी थी. उस से बात किए बिना तो उस के दिन की शुरुआत ही नहीं होती थी. हर काम में रवीश की सलाह प्रेरणा के लिए जरूरी हो जाती थी. वह रवीश के साथ फिल्मों से ले कर खेल… सामाजिक से ले कर राजनीति और व्यक्तिगत से ले कर सार्वजनिक तक हर विषय पर खुल कर बात करती थी.

उन के बीच स्त्री और पुरुष होने का भेद कहीं दिखाई नहीं देता था. अब वे मात्र 2 इंसान थे जो एक पवित्र रिश्ते को जी रहे थे. जब दोनों फोन पर होते थे तो मिनट कब घंटों में बदल जाते थे दोनों को ही खबर नहीं होती थी. सोशल मीडिया पर भी दोनों के बीच संदेशों का आदानप्रदान अनवरत होता था. लेकिन दोनों ही अपनीअपनी मर्यादा में बंधे होते थे. उन की बातचीत या संदेशों में अश्लीलता का अंशमात्र भी नहीं होता था.

बेशक यह मित्रता पूरी तरह 2 इंसानों के बीच थी, लेकिन सोमेश का स्वभाव भला प्रेरणा कैसे भूल सकती थी. कहा जाता है कि सभ्य कहलाने के लिए व्यक्ति अपनी आदतें बदल सकता है, मगर अपने मूल स्वभाव को बदलना उस के लिए संभव नहीं. सोमेश के बारे में सोचते ही रवीश की दोस्ती को खोने का डर प्रेरणा को सताने लगता था. इसीलिए वह अब तक रवीश के साथ अपनी दोस्ती को सोमेश से छिपाए हुए थी.

रात देर तक लैपटौप पर काम निबटाती प्रेरणा की आंख सुबह देर से खुली. फटाफट चायनाश्ता और दोनों का टिफिन पैक कर के वह भागती सी बाथरूम में घुस गई. फिर किसी तरह 2 ब्रैड पीस चाय के साथ निगल कर अपना पर्स संभालने लगी.

‘‘उफ, कहीं देर न हो जाए…’’ हड़बड़ाती प्रेरणा सोमेश को बाय कहती हुए घर से निकल गई.

सोमेश आज थोड़ी देर से औफिस जाने वाला था, इसलिए आराम से नाश्ता कर रहा था.

मोड़ पर ही औटो मिल गया तो प्रेरणा ने राहत की सांस ली. फिर बोली, ‘‘भैया, जरा तेज चलाओ न… मेरी ट्रेन न मिस हो जाए… मेरा प्रेजैंटेशन है… अगर टाइम पर औफिस न पहुंची तो बौस बहुत नाराज होंगे…’’

पता नहीं प्रेरणा औटो वाले से कह रही थी या अपनेआप से, लेकिन उस की बड़बड़ाहट सुन कर औटो वाले ने स्पीड जरा बढ़ा दी. मैट्रो स्टेशन पहुंचते ही उसे ट्रेन मिल गई और उस में सीट भी.

तसल्ली से बैठते ही प्रेरणा को रवीश की याद आ गई. उस ने मुसकराते हुए मोबाइल निकालने के लिए पर्स में हाथ डाला. पूरा पर्स खंगाल लिया, मगर मोबाइल हाथ में नहीं आया. अपनी तसल्ली के लिए उस ने एक बार फिर से पर्स को अच्छी तरह खंगाला, मगर मोबाइल उस में होता तो उसे मिलता न…

‘उफ, यह क्या हो गया… मोबाइल तो चार्जर में लगा हुआ ही छोड़ आई… इतनी बड़ी भूल मैं कैसे कर सकती हूं?’ सोच प्रेरणा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं…

‘अब क्या करूं? यदि सोमेश ने उत्सुकतावश मेरा फोन चैक कर लिया तो? रवीश के मैसेज पढ़ लिए तो? तो… तो… क्या? यह तो मानव स्वभाव है कि हर छिपी हुई चीज उसे आकर्षित करती है… सोमेश भी अवश्य उस का मोबाइल चैक करेगा… काश, उस ने अपने मोबाइल की स्क्रीन को अनलौक करने का पैटर्न सोमेश से साझा न किया होता…’

‘क्या करूं… क्या वापस जा कर अपना फोन ले कर आऊं? लेकिन अब तक तो उस ने फोन देख ही लिया होगा… यदि उस ने रवीश के मैसेज पढ़ लिए होंगे तो वह उस का सामना कैसे कर पाएगी…’

प्रेरणा कुछ भी तय नहीं कर पा रही थी. हार कर उस ने आने वाली स्थिति को वक्त के हवाले कर दिया और खुद को उस का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने लगी.

‘रवीश भी टूर पर गया है. वह अवश्य उसे फोन करेगा… बस, फटाफट औफिस पहुंच कर उसे मोबाइल भूलने की सूचना दे दूं ताकि वह कौल न करे…’ प्रेरणा का दिमाग बिजली की सी तेज गति से दौड़ रहा था.

‘अब जो भी होगा देखा जाएगा… यदि उस की निजता का सम्मान करते हुए सोमेश ने उस का मोबाइल चैक नहीं किया होगा तब तो कोई फिक्र ही नहीं और यदि उस ने मोबाइल चैक कर भी लिया और रवीश को ले कर सवालजवाब किए तो उसे हिम्मत दिखानी होगी… वह रवीश के साथ अपनी दोस्ती कुबूल कर लेगी, परिणाम चाहे जो हो. लेकिन रवीश का साथ नहीं छोड़ेगी…’ प्रेरणा ने मन ही मन निश्चय कर लिया था. अब वह काफी हलका महसूस कर रही थी.

लाख हिम्मत बनाए रखने के बावजूद घर में पसरे अंधेरे ने प्रेरणा के हौसला पस्त कर दिया. आखिर वही हुआ जिस का डर था.

‘‘कब से चल रहा है ये सब… उस दो टके के इंसान की हिम्मत कैसे हुई तुम्हें इस तरह के व्यक्तिगत मैसेज भेजने की… जरूर तुम ने ही उसे बढ़ावा दिया होगा… जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरे को दोष कैसे दिया जा सकता है…’’ सोमेश के स्वर में क्षोभ, नफरत, गुस्से और निराशा के मिलेजुले भाव थे.

‘‘हमारे बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं है जिस पर तुम उंगली उठा रहे हो… रवीश मेरा दोस्त है… अंतरंग मित्र… लेकिन छोड़ो… दोस्ती के माने तुम नहीं समझोगे…’’ प्रेरणा ने बहस को विराम देने की मंशा से कहा.

लेकिन इतना बड़ा मुद्दा इतनी आसानी से कहां सुलझ सकता है. प्रेरणा की स्वीकारोक्ति ने आग में घी का काम किया. सोमेश के पुरुषोचित अहम को ठेस लगी. वह लगातार जहर उगलता रहा और प्रेरणा उसे अपने भीतर उतारती रही. दोनों के बीच एक शून्य पसर गया. उस रात खाना नहीं बना.

इस घटना के बाद हालांकि सोमेश ने उस से अपने व्यवहार के लिए माफी मांग ली थी, लेकिन प्रेरणा ने खुद को खुद में समेट लिया. वह जितनी देर घर में सोमेश के साथ रहती, एक मशीन की तरह अपने सारे काम निबटाती… खानापीना हो या पहननाओढ़ना, घूमनाफिरना हो या किसी से मिलनाजुलना… यहां तक कि बिस्तर में भी वह न अपनी कोई इच्छा जाहिर करती और न ही किसी बात पर प्रतिवाद करती. बस, चुपचाप अपने हिस्से के कर्तव्य निभाती रहती.

हर सुबह वह घर से औफिस के लिए इस तरह निकलती मानो कोई पंछी कैद से छूट कर खुले आकाश में आया हो… और शाम को घर वापस लौटते ही फिर से कछुए की तरह अपनेआप में सिमट जाती.

सोमेश के साथ रिश्ते में ठंडापन आने से प्रेरणा के मन की घुटन और भी अधिक बढ़ने लगी थी. उस के अंदर ऐसा बहुत कुछ उमड़ताघुमड़ता रहता था जिसे अभिव्यक्ति की चाह होती… उसे बहुत बेचैनी होती थी जब वह ये सब रवीश के साथ बांटना चाहती और रवीश उपलब्ध नहीं होता.

वह रवीश की मजबूरी समझती थी… आखिर उस की अपनी जिंदगी… अपनी प्राथमिकताएं हैं… लेकिन दिल का क्या करे? उसे तो हर समय एक साथी चाहिए जो बिना किसी शर्त के उसे उपलब्ध हो… कई बार सोमेश की तरफ भी हाथ बढ़े, लेकिन हर बार स्वाभिमान पांवों में बेडि़यां डाल देता. रवीश और सोमेश के बीच झूलती प्रेरणा की निराशा अवसाद में बदलती जा रही थी.

देर रात तक जागती प्रेरणा आज सुबह उठी तो सिर में भारीपन था. उठने की कोशिश में गिर पड़ी. सोमेश लपक कर पास आया, लेकिन फिर न जाने क्या सोच कर रुक गया. पे्ररणा ने फिर से उठने की कोशिश की, लेकिन इस बार भी कामयाब नहीं हुई तो उस ने निरीहता से सोमेश की तरफ देखा. सोमेश ने बिना एक पल गंवाए उसे बांहों में थाम लिया.

‘अरे, तुम्हें तो तेज बुखार है,’ सोमेश की फिक्र उसे अच्छी लगी.

‘काश, इस वक्त रवीश मेरे पास होता,’ सोच प्रेरणा ने आह भरी. अब तक सोमेश उस के लिए उस की मनपसंद गरमगरम अदरक वाली चाय बना लाया था. प्रेरणा ने कृतज्ञता से उस की ओर देखा.  सोमेश ने फोन कर डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने उसे आवश्यक दवा और आराम करने की सलाह दी.

सोमेश ने प्रेरणा के औफिस फोन कर उस के लिए 1 सप्ताह की छुट्टी मांग ली और खुद भी औफिस से छुट्टी ले ली. सोमेश प्रेरणा का एक छोटे बच्चे की तरह खयाल रख रहा था. लेकिन प्रेरणा को रहरह कर रवीश की अनुपस्थिति अखर रही थी… उस का ध्यान बारबार अपने मोबाइल की तरफ जा रहा था. उसे रवीश के फोन का इंतजार था.

फिर सोचने लगी कि शायद रवीश सोच रहा हो कि सोमेश उस के पास है, इसलिए फोन नहीं कर रहा… लेकिन व्हाट्सऐप पर मैसेज तो कर ही सकता है…

प्रेरणा बारबार मोबाइल चैक करती और हर बार उस की निराशा कुछ और बढ़ जाती… दोपहर होतेहोते उसे रवीश की बुजदिली पर गुस्सा आने लगा कि क्या उन का रिश्ता इतना कमजोर है? जब हमारा रिश्ता पाकसाफ है तो फिर यह डर कैसा? ऐसे रिश्ते का क्या फायदा जो जरूरत पड़ने पर साथ न निभा सके? तो क्या उन का रिश्ता सिर्फ सतही था? उस में कोई गहराई नहीं थी? क्या यह सिर्फ टाइमपास था? प्रेरणा ऐसे अनेक प्रश्नों के जाल में उलझ कर कसमसा उठी.

फिर अचानक उस के सोचने की दिशा बदल गई कि सोमेश जब साथ होता है तो वह कितने आत्मविश्वास से भरी होती हूं जबकि रवीश के साथ खालिस दोस्ती का रिश्ता होते हुए भी एक अनजाना डर मन को घेरे रहता है कि कहीं कोई देख न ले… किसकिस को सफाई देती रहेगी… सोमेश उस की हर जरूरत के समय साथ खड़ा रहता जबकि रवीश चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाता… आखिर सामाजिक मजबूरियां भी एक तरह का बंधन ही तो हैं…

फिर प्रेरणा अनजाने ही दोनों के साथ अपने रिश्ते की तुलना करने लगी. हर बार उसे सोमेश का पलड़ा ही भारी लगा.

अब सोचने लगी कि सैक्स और साथ के अलावा भी विवाह में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता. रवीश उस की मानसिक जरूरत है, लेकिन उस के साथ उस के रिश्ते को सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती तो क्या वह रवीश से रिश्ता खत्म कर ले? क्या अपने मन की हत्या कर दे? फिर जीएगी कैसे?

प्रेरणा का मानसिक द्वंद्व खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

तभी सोमेश कमरे में आया. पूछा, ‘‘कैसा लग रहा है अब? सूप बना कर लाया हूं… गरमगरम पी लो. तुम्हें अच्छा लगेगा,’’ और फिर उसे सहारा दे कर उठाया.

प्रेरणा ने गौर से उस की आंखों में देखा. कहीं कोई छलकपट या दिखावा नहीं था… खुद के लिए परवाह और प्यार देख कर वह पुलक उठी. लेकिन इस परवाह के पीछे से अब भी स्वामित्व का भाव झलक रहा था.

‘मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रेम… रवीश से उतना ही रिश्ता रखूंगी जितना हम दोनों के बीच की झिर्री को भरने के लिए पर्याप्त हो… हमारा रिश्ता शाश्वत सत्य है, लेकिन हरेक रिश्ता जरूरी होता है… दोस्ती का भी… इस रिश्ते में तुम्हारे अधिकारों का अतिक्रमण कभी नहीं होगा, यह मेरा वादा है तुम से… तुम भी मुझे समझने की कोशिश करोगे न,’ मन ही मन निश्चय करते हुए प्रेरणा ने सोमेश के कंधे पर सिर टिका लिया.

‘‘मैं ने शायद प्रेम के बंधन जरा ज्यादा ही कस लिए थे… तुम घुटने लगी थी… मैं अपने पाश को ढीला करता हूं… मुझे माफ कर सकोगी न…’’ कह सोमेश ने उसे बांहों में कस लिया. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: सागर से मुझ को मिलना नहीं है – कहानी अल्हड़ गंगा की

Hindi Romantic Story: गंगा गांव की एक भोलीभाली और बेहद खूबसूरत लड़की थी. उस की मासूम खूबसूरती को वैसे तो शब्दों में ढालना बहुत ही मुश्किल है, पर यह समझ लीजिए कि गंगा को देख कर ऐसा लगता था, जैसे खेतों की हरियाली उसी पर छाई हुई है…

अल्हड़, मस्त गंगा पूरे गांव में घूमतीफिरती… कभी गन्ना चूसते हुए, तो कभी बकरी के बच्चे को पकड़ने के लिए… गांवभर के मुस्टंडे आंखें

भरभर कर उसे देखा करते और ठंडी आहें भरते थे, पर गंगा किसी को घास नहीं डालती थी.

गांव के सरपंच के बेटे की शादी का मौका था… सरपंच के घर खूब रौनक थी… दूरदराज के गांवों से भी ढेरों मेहमान आए थे.

गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह और सरपंच में गहरी दोस्ती थी, सो गंगा का पूरा परिवार उस शादी में घराती के रोल में बिजी था. कई सारे इंतजाम लक्ष्मण सिंह के ही जिम्मे थे…

गंगा की मां पार्वती घर के कामों को निबटाने में सरपंच की पत्नी का हाथ बंटा रही थी. गंगा के लिए तो यह शादी जैसे कोई त्योहार, कोई उत्सव जैसी थी… नएनए कपड़े पहनना, सजनासंवरना और नाचगाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना…

‘‘अरी ओ गंगा… कुछ काम भी कर लिया कर… सारा दिन यहां से वहां मटकती फिरती है…’’ पार्वती ने कहा.

‘‘अरी अम्मां, काम करने के लिए तू तो है… अभी तो मेरी खेलनेकूदने की उम्र है,’’ गंगा खिलखिलाते हुए बोली.

‘‘देख तो… ताड़ जैसी हो गई है… कल हाथ पीले हो गए, तो अपनी ससुराल में खिलाएगी… पत्थर…’’ पार्वती गुस्सा दिखाते हुए बोली.

‘‘अम्मां… तू फिक्र मत कर… मेरी ससुराल में नौकरचाकर होंगे… मैं नहीं करूंगी कोई कामधाम,’’ गंगा ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘तेरे मुंह में गुड़ की डली मेरी लाडो… तेरी खातिर ऐसी ही ससुराल देखेंगे…’’ बीच में गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह बोले.

‘‘यह लो… सेर को सवा सेर. समझाने के बजाय उस की हां में हां मिला रहे हो… ओ गंगा के बापू… क्यों इतना सिर चढ़ा रहे हो… लड़की जात है… दोचार गुण सीख लेगी तो ससुराल में काम आएंगे…’’ गंगा की मां तुनक कर बोली.

‘‘क्यों इस के पीछे पड़ी रहती हो… जब ब्याह होएगा… तो सब अपनेआप सीख जाएगी…’’ लक्ष्मण सिंह ने कहा.

‘‘बापू… यह देखो… यह घाघरा और चोली सिलवाई है… अम्मां की बनारसी साड़ी से… कैसी है बापू?’’ गंगा ने पिता से पूछा.

‘‘बहुत बढि़या है… मेरी लाडो एकदम रानी लगती है रानी…’’ लक्ष्मण सिंह खुश होते हुए बोले.

गंगा लहंगाचोली को अपने तन से लगा कर हिलहिल कर खुद को निहार रही थी.

शाम को सरपंच के यहां से बरात निकलनी थी. गंगा के मांबापू पहले ही वहां पहुंच चुके थे. गंगा सजसंवर कर जब वहां पहुंची, तो सब के मुंह खुले के खुले रह गए…

हर कोई गंगा को ही देख रहा था… सब को अपनी तरफ देखते हुए देख कर गंगा शरमा गई. शर्म के मारे उस के गाल और गुलाबी हो गए…

दूसरे गांवों के सरपंच भी वहां आए हुए थे. सीमन गांव के सरपंच और उन का बेटा निहाल भी इस शादी में आए थे… निहाल बांका जवान था. गठा हुआ शरीर और रोबदार चेहरामोहरा… झबरीली मूंछें और गुलाबी होंठ.

गंगा और निहाल ने एकसाथ एकदूजे को देखा. निहाल से नजरें मिलते ही गंगा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और निहाल तो बस एकटक गंगा को ही देखे जा रहा था… मानो उस की आंखें गंगा के सिवा कुछ देखना ही नहीं चाहती हों.

‘‘चलो चलो… जल्दी करो… वर निकासी का समय हो गया,’’ किसी ने कहा.

गंगा और निहाल की तंद्रा टूटी. बरात गई और बरात वापस भी आ गई… लेकिन गंगा और निहाल तो जैसे एकदूसरे में ठहर गए थे… प्यार का बीज फूट चुका था.

‘‘गंगा…’’ किसी ने धीरे से गंगा को पुकारा.

गंगा ने देखा कि एक कोने में निहाल खड़ा था… उस ने गंगा को इशारा किया कि घर के पीछे आ जाओ.

गंगा का दिल जोर से धड़क रहा था, पर निहाल से मिलने की बेताबी भी थी… सब से नजरें बचा कर गंगा घर के पिछवाड़े में पहुंच गई, जहां निहाल बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘गंगा…’’ निहाल ने गंगा के कान

में कहा.

गंगा का पूरा शरीर सिहर गया… मानो निहाल की सांसें, खून के साथ उस की धमनियों में बहने लगी हों.

‘‘हम आज अपने गांव वापस जा रहे हैं,’’ निहाल ने गंगा से कहा.

यह सुन कर गंगा की आंखों में आंसू आ गए और उस ने पलकें उठा कर निहाल को देखा.

‘‘अरी पगली, रोती क्यों हो… अब मैं तुम्हें ब्याह कर हमेशा के लिए साथ ले जाऊंगा,’’ निहाल ने गंगा के आंसू पोंछते हुए कहा.

गंगा थरथर कांप रही थी. निहाल ने उस का माथा चूम लिया. गंगा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. वह लता की तरह निहाल से लिपट गई.

निहाल उसे उठा कर पिछवाड़े में मवेशियों के लिए बनी कोठरी में ले गया. गंगा सुधबुध खो बैठी थी और निहाल बेताब था. उस अंधेरी कोठरी में अचानक बिजलियां चमकीं… कई सारे जुगनू टिमटिमाने लगे… जज्बातों की बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी… बांध टूट गए…

कुछ ही पलों में सबकुछ शांत था, मानो एक भयंकर तूफान आया और

फिर थम गया, जो छोड़ गया कुछ निशानियां… जिन्हें अब गंगा समेट

रही थी.

‘‘गंगा, मैं जल्दी ही आऊंगा और तुम्हें अपनी दुलहन बना कर ले जाऊंगा,’’ निहाल बोला.

गंगा शांत थी. उसे कुछ कहनेसुनने का समय ही न मिला. निहाल फुरती से कोठरी से बाहर निकल गया.

गंगा पिघली जा रही थी. निहाल के प्यार और इस अनोखे एहसास से घिरी गंगा कोठरी से बाहर निकली. निहाल अपने पिता के साथ वापस गांव के लिए निकल चुका था.

गंगा नहीं जानती थी कि जिस पर उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया है, वह कौन है, किस गांव का है और उसे लेने कब आएगा.

मदमस्त लहराती चंचल गंगा एकाएक शांत और गंभीर हो गई थी. रातदिन आहट रहती कि अब निहाल आए या उस की कोई खबर ही आ जाए… कई महीने बीत गए, पर निहाल नहीं आया.

पार्वती और लक्ष्मण सिंह समझ नहीं पा रहे थे कि खिलीखिली सी उन की बेटी क्यों पलपल मुरझा रही है.

नदी किनारे बैठ आंसू बहाती गंगा हताश हो गई… उस का धीरज अब जवाब दे चुका था. अम्मांबापू का ब्याह के लिए जोर देना… जैसे गंगा को भीतर ही भीतर मार रहा था.

एक दिन नदी की आतीजाती लहरों को देखतेदेखते जाने कौन सा तूफान गंगा के दिल में उठा कि उस ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा डूबने लगी. उस का दम घुटने लगा. सांसें उखड़ने लगीं. एकाएक हाथपैर मारती गंगा के हाथ में लकड़ी का एक भारी लट्ठा आ गया. गंगा उस के सहारे तैर कर नदी के किनारे आ गई.

पानी में कूदने, डूबने और मौत का सामना कर लौटी गंगा के मन में एक ही विचार बारबार कौंध रहा था कि जानबूझ कर पानी में कूदने या अनजाने में पानी में गिरने पर इनसान कितना छटपटाता होगा… कितनी तकलीफदेह मौत होती होगी… उस समय उसे अगर एक लकड़ी मिल जाए… तो कितनों की जान बच सकती है… बस, उस ने कुछ सोच कर जंगल से लकडि़यां तोड़ीं और उन से एक नाव तैयार की और उतार दी नदी में.

अब गंगा ने तय किया कि उस की जिंदगी का एक यही मकसद होगा… वह इस नाव से सब को पार लगाएगी और डूबतों के प्राण बचाएगी…

गंगा अब ‘नाव वाली गंगा’ कहलाने लगी. गरीब जरूरतमंदों को नदी पार कराने वाली गंगा… डूबतों की जान बचाने वाली गंगा…

अम्मांबापू की उस के आगे एक न चली. गंगा ने शादी करने से साफ मना कर दिया. कह दिया कि ब्याह की बात की तो वह नदी में कूद कर अपनी जान दे देगी. अम्मांबापू ने हार मान ली.

महीने बीते… साल गुजरे… नाव वाली गंगा नहीं बदली. वह डटी रही नदी किनारे… पार करवाती रही नदी… न जाने कितनी जानें बचाईं उस की नाव ने.

इस बार बारिश बहुत हुई. कई गांव के खेतखलिहान, घरजमीन सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए. गंगा के गांव में भी बाढ़ ने तहलका मचाया, लेकिन गंगा औरों की तरह गांव छोड़ कर भागी नहीं, बल्कि बाढ़ में डूबे लोगों को बचा कर उन की देखरेख करती रही.

बाढ़ का पानी अब उतार पर था. गंगा अपनी नाव के साथ नदी किनारे बैठी थी कि तभी किसी ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा ने लपक कर अपनी नाव उस तरफ चला दी. उस ने देखा कि एक नौजवान डूब रहा था, घबरा कर हाथपैर मार रहा था.

गंगा ने पास पहुंच कर उसे बड़ी मुश्किल से अपनी नाव पर चढ़ा लिया और उस की पीठ दबा कर पानी निकाला.

‘‘क्यों कूदे…?’’ गंगा ने औंधे पड़े उस नौजवान से पूछा.

‘‘मेरा तो सबकुछ लूट गया है. खेतखलिहान, घरजायदाद सब बरबाद हो गया और परिवार भी… सब बह गए. अब मैं

जी कर भी

क्या करूंगा… क्यों बचाया तुम ने?’’ उस  नौजवान ने उलटा लेटे हुए ही जवाब दिया.

‘‘तूफान तो आते हैं और चले जाते हैं… पर इस का यह मतलब तो नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गई. एक तूफान से क्या घबराना. हिम्मत करो और फिर जीना शुरू करो. हो सकता?है कि कुछ बहुत अच्छा हो जाए…’’ गंगा ने कहा.

इतना सुन कर वह नौजवान पलटा. गंगा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘निहाल…’’ गंगा बुदबुदाई.

‘‘गंगा…’’ निहाल गंगा को देख कर हैरान रह गया.

‘‘मैं ने तुम्हें धोखा दिया. उसी

की सजा मुझे मिली है,’’ निहाल रोते

हुए बोला.

गंगा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे.

‘‘गंगा, क्या तुम मुझे एक मौका और नहीं दोगी?’’ निहाल ने गंगा की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

गंगा अवाक थी. उस ने निहाल पर एक तीक्ष्ण निगाह डाली और बोली, ‘‘तुम ने पश्चाताप कर लिया. इस से तुम्हारे तनमन का मैल धुल गया है, लेकिन तुम्हारा और मेरा मेल मुमकिन नहीं है. आओ, तुम्हें नदी किनारे लगा दूं, क्योंकि बीच मंझधार में छोड़ना मेरी फितरत नहीं है.’’

निहाल को नदी किनारे पर उतार कर गंगा की नाव चल पड़ी. निहाल देखता रहा दूर तक, उथली लहरों पर गंगा को चप्पू चलाते हुए.

नदी की कलकल से मानो यही आवाज सुनाई दे रही थी :

‘सागर से मुझ को मिलना नहीं है,

सागर से मिल कर मैं खारी हो जाऊंगी.’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: आखिरी झूठ – जब सपना ने किया अपने झूठ का खुलासा

Story In Hindi: दिल्ली रेलवे स्टेशन से नंगलडैम शहर के लिए जैसे ही राहुल रेलगाड़ी के कंपार्टमैंट में चढ़ा, उस ने नजर खाली बर्थ की तरफ दौड़ाई, लेकिन स्लीपिंग कंपार्टमैंट में अधिकतर सीटें खाली पड़ी थीं. उस ने अपना सामान एक बर्थ पर रख कर देखा तो एक युवती खिड़की के पास वाली लंबी बर्थ पर अकेली बैठी थी. उस की उम्र यही कोई 22-23 के आसपास की रही होगी. वह गुलाबी रंग के सूट में थी. दिसंबर का महीना था. वह आकर्षण और रूपलावण्य से भरपूर इतनी सुंदर लग रही थी मानो जैसे कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो.

टिकट चैकर के पास जा कर राहुल ने उस लड़की के पास वाली सीट अपने लिए बुक करवा ली. राहुल एक कंपनी में जौइन करने के लिए नंगल जा रहा था. असिस्टैंट मैनेजर का पद था. गाड़ी रात को 10 बजे चल कर नंगल सवेरे 5 बजे पहुंचती थी. वह खुश था, ‘काफी समय के लिए यात्रा में इतनी सुंदर युवती का साथ रहेगा,’ ऐसा वह मन ही मन सोचने लगा.

राहुल लगभग 25 वर्ष के आसपास था. एक क्षण के लिए उस ने सोचा, ‘क्यों न वह अपना परिचय देते हुए, उस युवती के पास बैठ कर उस से नजदीकी बढ़ाए.’

‘‘मेरा नाम राहुल है. मैं नंगल जौब जौइन करने जा रहा हूं. आप का क्या नाम है? आप कहां जा रही हैं?’’ पूछते हुए उस की बेसब्री जाहिर थी. वह उस के चेहरे को गौर से देख रहा था.

‘‘हम दोनों हमउम्र हैं, पहले तो मैं यह कहूंगी कि आप की जगह तुम शब्द का इस्तेमाल कीजिए. मेरा नाम सपना है. मैं नंगल डैम शहर में सिविल अस्पताल में इंटर्नशिप के लिए जा रही हूं. 3 महीने मैं नंगल शहर में ही रहूंगी.’’

राहुल को सपना का अनौपचारिक होना अच्छा लगा. उसे भी लड़कियों को तुम कह कर संबोधित करना अच्छा लगता था. सपना की सीट पर बैठ कर उस से बातें करना उसे बहुत अच्छा लगा. सपना ने बताया उस का परिवार दिल्ली में रहता है. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने परिवार के बारे में विस्तार से बताते हुए बातचीत शुरू की. दोनों के ही परिवार दिल्ली में रहते थे.

राहुल के पिता पुस्तक प्रकाशक थे, उन का अच्छाखासा व्यापार था. मां हाउसवाइफ थीं. सपना के पिता तलाकशुदा थे, मां झगड़ालू और क्लेश करने वाली थीं इसलिए मां और पिता का तलाक कई वर्ष पहले ही हो चुका था. बचपन से यौवनावस्था तक सपना का जीवन संघर्षमय रहा था. वह पिता के साथ दिल्ली में रहती थी. डाक्टरी की पढ़ाई भी उस ने दिल्ली में ही की और अब इंटर्नशिप के लिए नंगल जा रही थी.

यह सब सुन कर राहुल का मन सपना के लिए सहानुभूति से भर उठा और भावविभोर हो कर उस ने कहा, ‘‘सपना, मुझे तुम्हारे संघर्षमय जीवन के बारे में जान कर बहुत दुख हुआ है. तुम बहुत बहादुर और सैल्फमेड लड़की हो. मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि तुम कैरियर बनाने के प्रति जागरूक और प्रयत्नशील हो. नंगल पहुंच कर अपनी इंटर्नशिप शुरू करो. मुझे तुम कभी भी किसी भी प्रकार की सहायता के लिए बगैर हिचकिचाहट के कह सकती हो. हम अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे देते हैं,’’ राहुल ने जेब से एक कागज निकाल कर उस पर अपना मोबाइल नंबर लिखा और सपना को दे दिया, ‘‘फील फ्री टू कौंटैक्ट मी.’’

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सपना ‘थैंक्स’ कहते समय बहुत खुश दिखाई दी. सोने से पहले कानों में हैडफोन लगा कर उस ने अपना मनपसंद संगीत सुना. राहुल ने देखा सपना उनींदी आंखों से उस की ओर मुसकरा कर निहार रही थी. मधुर आवाज में ‘गुडनाइट’ कहते हुए उस ने कंबल ओढ़ लिया.

यों तो एमबीए की पढ़ाई के दौरान कई युवतियों के संपर्क में रहने वाला राहुल आश्चर्यचकित था कि इतनी सुंदर युवती उस के जीवन में अब तक नहीं आई थी. अपनी बर्थ पर लेटे हुए टकटकी लगाए वह सपना को देख कर खुश हो रहा था. उसे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि 3 महीने नंगल में सपना का साथ मिलेगा. भविष्य के विषय में सोचते हुए कब उसे नींद आ गई पता ही नहीं चला.

सवेरे 4 बजे गाड़ी आनंदपुर साहब स्टेशन पर 15 मिनट के लिए रुकी. सपना अभी सो ही रही थी. राहुल 2 कप चाय ले आया. सपना गहरी नींद में थी. राहुल ने उस के गाल पर हलके स्पर्श के साथ उसे जगाया. सपना को अच्छा लगा. ‘‘गुडमौर्निंग,’’ कहते हुए सपना ने चाय का गिलास राहुल से ले लिया. राहुल का बरसों के इंतजार के बाद इतनी सुंदर युवती से जो सामना हुआ था. उस ने मन में सोचा, ‘पापा को फोन पर बताएगा कि उन के लिए बहू तलाश ली है,’ दूसरी तरफ मन में यह बात भी आई कि अभी बहुत जल्दी होगी. सब्र करना ठीक होगा. अभी एकदूसरे को जानना बाकी है.

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नंगल स्टेशन पर पहुंचने के बाद राहुल कंपनी के गैस्ट हाउस की ओर चला गया.

‘‘सपना, तुम अपने वूमन होस्टल पहुंच कर फोन करना,’’ राहुल ने कहा.

‘‘ठीक है, लैटअस विश ईच अदर बैस्ट औफ लक’’ सपना ने मुसकराते हुए कहा और अस्पताल से आई हुई वैन में बैठ गई.

दोनों ने अपनीअपनी जौब जौइन कर ली. राहुल और सपना दोनों के लिए नए शहर में रहना एक अद्भुत अनुभव था. एकदूसरे से मिलना और साथसाथ समय बिताना उन्हें अच्छा लगने लगा. नंगल डैम पर एक रेस्तरां था. वहां से चारों ओर का बहुत ही सुहावना दृश्य दिखता था. रविवार के दिन इसी रेस्तरां में वे दोनों घंटों साथसाथ समय बिताते थे. लंच यहीं पर करते थे. कभीकभी सपना राहुल के साथ उस के गैस्ट हाउस में भी घंटों बैठी रहती थी. ज्योंज्यों नजदीकियां बढ़ रही थीं त्योंत्यों उन का रिश्ता स्वाभाविक रूप से गहरा होता जा रहा था.

एक दिन राहुल ने सपना से कहा, ‘‘तुम अपने पापा का पूरा पता मुझे दे दो ताकि मैं दिल्ली जा कर उन से मिल सकूं या फिर मैं अपने मातापिता को तुम्हारे पापा के पास भेज कर उन की जानपहचान करवा सकूं.’’

सपना बोली, ‘‘अभी पापा से मिलवाना या तुम्हारा दिल्ली जा कर उन से मिलना जल्दबाजी होगी. मैं अभी पता नहीं देना चाहती.’’

राहुल की समझ में नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो वह अपने पापा का पता उसे नहीं दे रही है.

समयसमय पर जब कभी मौका मिलता, राहुल अपना प्रेम व्यक्त करता रहता. वह सपना से कहा करता कि जब हम दोनों एकदूसरे के इतने नजदीक आ चुके हैं, तो समझ में नहीं आता कि क्यों तुम उन बातों से परहेज करती हो जो इस उम्र में नौजवान युवकयुवतियां करते हैं. राहुल ने अपनी जेब से सोने की एक अंगूठी निकाली और सपना को पहनाते हुए कहा, ‘‘यह मेरा तुम्हारे लिए पहला गिफ्ट है. मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तुम से प्यार करने लगा. मेरे जीवन में यह पहला अनुभव है,’’ उस ने भावुक हो कर सपना को गले लगाना चाहा, लेकिन सपना ने उसे मना करते हुए अनुरोध किया, ‘‘नहीं, राहुल अभी ऐसा कुछ मैं स्वीकार नहीं करूंगी. जब कभी हम विवाह के बंधन में बंध जाएंगे तो मैं प्रौमिस करती हूं कि तुम्हें जी भर कर प्यार करूंगी. अभी बस इतने से ही काम चलाना होगा,’’ कहते हुए उस ने राहुल का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाया और चूम लिया, ‘‘इन हाथों ने मुझे अंगूठी पहनानी चाही इसलिए इन्हें चूम कर मैं अपने प्यार का इजहार कर रही हूं.’’

एक दिन दोनों गैस्ट हाउस के लौन में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे. दोनों एकदूसरे को अपने कालेज के दिनों के बारे में विस्तार से बता रहे थे. सपना ने बताया कि कैसे लड़के उस के करीब आने का प्रयत्न करते थे, लेकिन वह किसी के प्रति आकर्षित नहीं होती थी. अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर के अपना टौप करने का उद्देश्य वह पूरा करना चाहती है.

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‘‘सपना, मैं एक बार फिर तुम से कह रहा हूं कि मुझे अपने डैडी का ऐड्रैस और मोबाइल नंबर दे दो. जैसा तुम ने बताया था कि डैडी बिलकुल अकेले हैं, तुम्हारी मां उन्हें छोड़ कर जा चुकी हैं. मेरा उन से मिलना जरूरी है, कहीं ऐसा न हो कि वे कोई और लड़का तुम्हारे लिए देख लें,’’ राहुल ने सपना को समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे भी पापा की चिंता है कि कैसे वे मेरी अनुपस्थिति में समय गुजारते होंगे. उन्हें खाना भी बाहर से मंगाना पड़ता होगा. पहली बार उन से दूर आ कर मैं यहां रह रही हूं,’’ सपना ने कहा.

राहुल बोला, ‘‘मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. मैं जानता हूं कि मां के बिना तुम्हारा जीवन कितना कष्टमय रहा होगा. सपना, मैं तो यही कामना करता हूं कि तुम्हारी मां वापस तुम्हारे घर आ जाए. तुम्हारी शादी का इंतजाम वे संभाल लें.’’

सपना का उदास चेहरा राहुल से देखा नहीं जाता था. अपना प्यार, अपने हावभाव उस पर उडे़लता हुआ वह यही कहता था, ‘‘मैं तुम्हारे जीवन को खुशियों से भर दूंगा. यह मेरी दिली तमन्ना है.’’

सपना की इंटर्नशिप का 2 महीने का समय बीत चुका था और वह 2-3 दिन की छुट्टी ले कर दिल्ली अपने पापा के पास जा रही थी. राहुल ने जोर दे कर सपना को बताया कि वह भी उस के साथ दिल्ली जाएगा. बेशक सपना ने आनाकानी की लेकिन वह नहीं माना और दोनों ने टिकट बुक करा लिए.

राहुल यह नहीं समझ पा रहा था कि हर बार सपना इस बात पर हिचकिचाती क्यों है कि राहुल उस के पापा से दिल्ली जा कर न मिलें. राहुल के दृढ़निश्चय का परिणाम यह हुआ कि दोनों दिल्ली सपना के पापा के पास पहुंच गए.

राहुल को इस बात का अनुमान था कि सपना अपने साथ राहुल को दिल्ली लाने के बारे में अपने पापा को फोन पर बता चुकी होगी. उस के घर पहुंचने पर राहुल आश्चर्यचकित था. सपना के पापा के साथ उस की मम्मी भी घर पर मौजूद थीं.

राहुल ने प्रश्न किया, ‘‘सपना, तुम ने तो बताया था कि तुम्हारे मम्मीपापा का तलाक हो चुका है. मम्मी साथ नहीं रहती हैं.’’

सपना ने कहा, ‘‘मुझे भी सरप्राइज हुआ था जब पापा ने फोन पर बताया था कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन का मम्मी से समझौता हो गया है और वे खुशीखुशी उन के साथ रहने के लिए चली आई हैं. मैं इस बात से बहुत खुश हूं,’’ वह अपनी मां के गले लग कर बहुत रोई. सपना के पापा की आंखें भी आंसुओं से भर आई थीं.

सब ने मिलबैठ कर एकसाथ नाश्ता किया. चाय पी कर माहौल को अनुकूल देख कर सपना ने शरारत भरी मुसकराहट के साथ राहुल से कहा, ‘‘मेरी पूरी बात धैर्य से सुन लो. प्रतिक्रिया बाद में देना. मम्मीपापा में कभी कोई मतभेद या तलाक हुआ ही नहीं था. मैं ने तुम से झूठ बोला था. तुम से सहानुभूति प्राप्त करने और प्यार पाने के लिए मैं ने ऐसा किया था. तुम से मिलते ही पहली नजर में ही मैं ने तुम्हें चुन लिया था. दुनिया में तुम से बेहतर जीवन साथी तो हो ही नहीं सकता,’’ क्षण भर को वह रुकी, फिर राहुल से पूछा, ‘‘क्या तुम मुझे माफ कर सकोगे. मेरा तरीका गलत हो सकता है पर मेरा मकसद अपने लिए योग्यप्रेमी को पाना था. यह मेरा आखिरी झूठ था. भविष्य में कभी झूठ का सहारा नहीं लूंगी.’’ सपना के मातापिता हक्केबक्के हो कर अपनी पुत्री को निहार रहे थे. सपना ने कहा, ‘‘पापा, आई एम सौरी.’’

राहुल की खुशी उस के चेहरे पर झलक रही थी. ‘‘तुम्हारे अब तक के मधुर व्यवहार और प्रगाढ़ प्रेम को देखते हुए यह गलती माफ करने योग्य है,’’ अपनी स्वीकृति व्यक्त करते हुए उस ने सपना के मातापिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. Story In Hindi

Hindi Kahani: अधूरे जवाब – क्या अपने प्यार के बारे में बता पाएगी आकांक्षा?

Hindi Kahani, लेखक – संदीप कुमरावत

कैफे की गैलरी में एक कोने में बैठे अभय का मन उदास था. उस के भीतर विचारों का चक्रवात उठ रहा था. वह खुद की बनाई कैद से आजाद होना चाहता था. इसी कैद से मुक्ति के लिए वह किसी का इंतजार कर रहा था. मगर क्या हो यदि जिस का अभय इंतजार कर रहा था वह आए ही न? उस ने वादा तो किया था वह आएगी. वह वादे तोड़ती नहीं है…

3 साल पहले आकांक्षा और अभय एक ही इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते थे. आकांक्षा भी अभय के साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी, और यह बात असाधारण न हो कर भी असाधारण इसलिए थी क्योंकि वह उस बैच में इकलौती लड़की थी. हालांकि, अभय और आकांक्षा की आपस में कभी हायहैलो से ज्यादा बात नहीं हुई लेकिन अभय बात बढ़ाना चाहता था, बस, कभी हिम्मत नहीं कर पाया.

एक दिन किसी कार्यक्रम में औडिटोरियम में संयोगवश दोनों पासपास वाली चेयर पर बैठे. मानो कोई षड्यंत्र हो प्रकृति का, जो दोनों की उस मुलाकात को यादगार बनाने में लगी हो. दोनों ने आपस में कुछ देर बात की, थोड़ी क्लास के बारे में तो थोड़ी कालेज और कालेज के लोगों के बारे में.

फिर दोनों की मुलाकात सामान्य रूप से होने लगी थी. दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई थी. मगर फिर भी आकांक्षा की अपनी पढ़ाई को ले कर हमेशा चिंतित रहने और सिलेबस कम्पलीट करने के लिए हमेशा किताबों में घुसे रहने के चलते अभय को उस से मिलने के लिए समय निकालने या परिस्थितियां तैयार करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी. पर वह उस से थोड़ीबहुत बात कर के भी खुश था.

दोस्ती होते वक्त नारी सौंदर्य के प्रखर तेज पर अभय की दृष्टि ने भले गौर न किया हो पर अब आकांक्षा का सौंदर्य उसे दिखने लगा था. कैसी सुंदरसुंदर बड़ीबड़ी आंखें, सघन घुंघराले बाल और दिल लुभाती मुसकान थी उस की. वह उस पर मोहित होने लगा था.

शुरुआत में आकांक्षा की तारीफ करने में अभय को हिचक होती थी. उसे तारीफ करना ही नहीं आता था. मगर एक दिन बातों के दौरान उसे पता चला कि आकांक्षा स्वयं को सुंदर नहीं मानती. तब उसे आकांक्षा की तारीफ करने में कोई हिचक, डर नहीं रह गया.

आकांक्षा अकसर व्यस्त रहती, कभी किताबों में तो कभी लैब में पड़ी मशीनों में. हर समय कहीं न कहीं उलझी रहती थी. कभीकभी तो उसे उस के व्यवहार में ऐसी नजरअंदाजगी का भाव दिखता था कि अभय अपमानित सा महसूस करने लगता था. वह बातें भी ज्यादा नहीं करती थी, केवल सवालों के जवाब देती थी.

अपनी पढ़ाई के प्रति आकांक्षा की निष्ठा, समर्पण और प्रतिबद्धता देख कर अभय को उस पर गर्व होता था, पर वह यह भी चाहता था कि इस तकनीकी दुनिया से थोड़ा सा अवकाश ले कर प्रेम और सौहार्द के झरोखे में वह सुस्ता ले, तो दुनिया उस के लिए और सुंदर हो जाए. बहुत कम ऐसे मौके आए जब अभय को आकांक्षा में स्त्री चंचलता दिखी हो. वह स्त्रीसुलभ सब बातों, इठलाने, इतराने से कोसों दूर रहा करती थी. आकांक्षा कहती थी उसे मोह, प्रेम या आकर्षण जैसी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं. उसे बस अपने काम से प्यार है, वह शादी भी नहीं करेगी.

अचानक ही अभय अपनी खयालों की दुनिया से बाहर निकला. अपनेआप में खोया अभय इस बात पर गौर ही नहीं कर पाया कि आसपास ठहाकों और बातचीतों का शोर कैफे में अब कम हो गया है.

अभय ने घड़ी की ओर नजर घुमाई तो देखा उस के आने का समय तो कब का निकल चुका है, मगर वह नहीं आई. अभय अपनी कुरसी से उठ कैफे की सीढि़यां उतर कर नीचे जाने लगा. जैसे ही अभय दरवाजे की ओर तेज कदमों से बढ़ने लगा, उस की नजर पास वाली टेबल पर पड़ी. सामने एक कपल बैठा था. इस कपल की हंसीठिठोलियां अभय ने ऊपर गैलरी से भी देखी थीं, लेकिन चेहरा नहीं देख पाया था.

लड़कालड़की एकदूसरे के काफी करीब बैठे थे. दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा था. लड़की ने आंखें बंद कर रखी थीं मानो अपने मधुरस लिप्त होंठों को लड़के के होंठों की शुष्कता मिटा वहां मधुस्त्रोत प्रतिष्ठित करने की स्वीकृति दे रही हो.

अभय यह नजारा देख स्तब्ध रह गया. उसे काटो तो खून नहीं, जैसे उस के मस्तिष्क ने शून्य ओढ़ लिया हो. उसे ध्यान नहीं रहा कब वह पास वाली अलमारी से टकरा गया और उस पर करीने से सजे कुछ बेशकीमती कांच के मर्तबान टूट कर बिखर गए.

इस जोर की आवाज से वह कपल चौंक गया. वह लड़की जो उस लड़के के साथ थी कोई और नहीं बल्कि आकांक्षा ही थी. आकांक्षा ने अभय को देखा तो अचानक सकते में आ गई. एकदम खड़ी हो गई. उसे अभय के यहां होने की बिलकुल उम्मीद नहीं थी. उसे समझ नहीं आया क्या करे. सारी समझ बेवक्त की बारिश में मिट्टी की तरह बह गई. बहुत मुश्किलों से उस के मुंह से सिर्फ एक अधमरा सा हैलो ही निकल पाया.

अभय ने जवाब नहीं दिया. वह जवाब दे ही नहीं सका. माहौल की असहजता मिटाने के आशय से आकांक्षा ने उस लड़के से अभय का परिचय करवाने की कोशिश की. ‘‘साहिल, यह अभय है, मेरा कालेज फ्रैंड और अभय, यह साहिल है, मेरा… बौयफ्रैंड.’’ उस ने अंतिम शब्द इतनी धीमी आवाज में कहा कि स्वयं उस के कान अपनी श्रवण क्षमता पर शंका करने लगे.  अभय ने क्रोधभरी आंखें आकांक्षा से फेर लीं और तेजी से दरवाजे से बाहर निकल गया.

आकांक्षा को कुछ समझ नहीं आया. उस ने भौचक्के से बैठे साहिल को देखा. फिर दरवाजे से निकलते अभय को देखा और अगले ही पल साहिल से बिना कुछ बोले दरवाजे की ओर दौड़ गई. बाहर आ कर अभय को आवाज लगाई. अभय न चाह कर भी पता नहीं क्यों रुक गया.

आधी रात को शहर की सुनसान सड़क पर हो रहे इस तमाशे के साक्षी सितारे थे. अभय पीछे मुड़ा और आकांक्षा के बोलने से पहले उस पर बरस पड़ा, ‘‘मैं ने हर पल तुम्हारी खुशियां चाहीं, आकांक्षा. दिनरात सिर्फ यही सोचता था कि क्या करूं कि तुम्हें हंसा सकूं. तमाम कोशिशें कीं कि गंभीरता, कठोरता, जिद्दीपन को कम कर के तुम्हारी जिंदगी में थोड़ी शरारतभरी मासूमियत के लिए जगह बना सकूं. तुम्हें मझधार के थपेड़ों से बचाने के लिए मैं खुद तुम्हारे लिए किनारा चाहता था. मगर, मैं हार गया. तुम दूसरों के साथ हंसती, खिलखिलाती हो, बातें करती हो, फिर मेरे साथ यह भेदभाव क्यों? तकलीफ तो इस बात की है कि जब तुम्हें किनारा मिल गया तो मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा तुम ने. क्यों आकांक्षा?’’

आकांक्षा अपराधी भाव से कहने लगी, ‘‘मैं तुम्हें सब बताने वाली थी. तुम्हें ढेर सारा थैंक्यू कहना चाहती थी. तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में कई सारे सकारात्मक बदलावों की शुरुआत हुई. तुम मुझे कितने अजीज हो, कैसे बताऊं तुम्हें. तुम तो जानते ही हो कि मैं ऐसी ही हूं.’’

आकांक्षा का बोलना जारी था, ‘‘तुम ने कहा, मैं दूसरों के साथ हंसती, खिलखिलाती हूं. खूब बातें करती हूं. मतलब, छिप कर मेरी जासूसी बड़ी देर से चल रही है. हां, बदलाव हुआ है. दरअसल, कई बदलाव हुए हैं. अब मैं पहले की तरह खड़ ूस नहीं रही. जिंदगी के हर पल को मुसकरा कर जीना सीख लिया है मैं ने. तुम्हारा बढ़ा हाथ है इस में, थैंक्यू फौर दैट. और तुम भी यह महसूस करोगे मुझ से अब बात कर के, अगर मूड ठीक हो गया हो तो.’’ अब वह मुसकराने लगी.

अभय बिलकुल शांत खड़ा था. कुछ नहीं बोला. अभय को कुछ न कहते देख आकांक्षा गंभीर हो गई. कहने लगी, ‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए. तुम मेरे नीरस जीवन में प्यार की मिठास घोलना चाहते थे तो अपनी ही इच्छा पूरी होने पर इतने परेशान क्यों हो गए? मुझे साहिल के साथ देख कर इतना असहज क्यों हो गए? मेरे खिलाफ खुद ही बेवजह की बेतुकी बातें बना लीं और मुझ से झगड़ रहे हो. कहीं…’’ आकांक्षा बोलतेबोलते चुप हो गई.

इतना सुन कर भी अभय चुप ही रहा. आकांक्षा ने अभय को चुप देख कर एक लंबी सांस लेते हुए कहा, ‘‘तुम ने बहुत देर कर दी, अभय.’’

यह सुन कर उस के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई. हृदय एक अजीब परंतु परिपूर्ण आनंद से भर गया. उस का मस्तिष्क सारे विपरीत खयालों की सफाई कर बिलकुल हलका हो गया. ‘तुम ने बहुत देर कर दी, अभय,’ इस बात से अब वह उम्मीद टूट चुकी थी जिसे उस ने कब से बांधे रखा था. लेकिन, जो आकांक्षा ने कहा वह सच भी तो था. वह न कभी कुछ साफसाफ बोल पाया न वह समझ पाई और अब जब उसे जो चाहिए था मिल ही गया है तो वह क्यों उस की खुशी के आड़े आए.

अभय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘कम से कम मुझ से समय से मिलने तो आ जातीं.’’ यह सुन कर आकांक्षा हंसने लगी और बोली, ‘‘बुद्धू, हम कल मिलने वाले थे, आज नहीं.’’ अभय ने जल्दी से आकांक्षा का मैसेज देखा और खुद पर ही जोरजोर से हंसने लगा.

एक झटके में सबकुछ साफ हो गया और रह गया दोस्ती का विस्तृत खूबसूरत मैदान. आकांक्षा को वह जितना समझता है वह उतनी ही संपूर्ण और सुंदर है उस के लिए. उसे अब आज शाम से ले कर अब तक की सारी नादानियों और बेवकूफीभरे विचारों पर हंसी आने लगी. उतावलापन देखिए, वह एक दिन पहले ही उस रैस्टोरैंट में पहुंच गया था जबकि उन का मिलना अगले दिन के लिए तय था.

अभय ने कुछ मिनट लिए और फिर मुसकरा कर कहा, ‘‘जानबूझ कर मैं एक दिन पहले आया था, माहौल जानने के लिए आकांक्षा, यू डिजर्व बैटर.’’ Hindi Kahani

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