Story in Hindi
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दिनभर तहसील के चक्कर काटतेकाटते सुगनी की नसनस बोल गई थी. वह मजबूत कदकाठी की थी. उसे हैरानी होती थी कि दुबलापतला दुलाल चश्मे के शीशे पोंछतापोंछता दिनभर तहसील के चक्कर काट कर भी थकता नहीं, बल्कि तरोताजा नजर आता.
वैसे, यह ताजापन कुछ गांव वालों के काम कराने के एवज में दुलाल की जेब में आए नोटों की गरमी का नतीजा होता था. मगर सुगनी को तब और हैरानी होती, जब वह देखती कि गांव में कलक्टर जैसा रोब जमाने वाला लेखपाल बरामदे में टाट बिछा कर बस्ता खोले दुलाल से हंसहंस कर बातें करता. उस का कानूनगो कुरसी पर बैठा हुक्म मारता और जमीन पर बैठा लेखपाल उस की डांट पर ‘जी साहब’ कहता.
सुगनी को लगता कि यह कितना निरीह इनसान है. पर बाद में दुलाल ने उसे बताया था कि लेखपाल का लिखा राजपाल भी नहीं काट पाता.समय की मार खाई सुगनी को बाद में यह बात माननी पड़ी थी.
सालभर पहले पति की मौत के बाद सुगनी को पट्टे के खेत का कब्जा पाने के लिए चूल्हेचौके से निकल कर तहसीलकचहरी करनी पड़ी, वरना 22 साल की उम्र ऐसी नहीं होती कि देखनेसुनने में भली लगने वाली औरत को छलछंदों की इस दुनिया से रूबरू होने का शौक चर्राए.
अकेली गरीब विधवा समझ कर लोगों ने सुगनी पर लालच का चारा डालना चाहा, पर शिकारी से चौकस चिडि़या की तरह उसे जाल के ऊपर से उड़ जाना आता था.
सुगनी धौंकल सिंह के कहने में रहती तो खुश रहती, मगर उस ने तो बंशी के बाग के पास अकेले में हाथ पकड़ने वाले धौंकल सिंह के मुंह पर थप्पड़ मारते हुए कहा था, ‘जाओ ठाकुर, खैर मनाओ. आज इतने पर ही छोड़ दिया आगे से ऐसा कुछ सोचा भी तो सारी मर्दानगी काट कर फेंक दूंगी.’
सुगनी के हाथ में लहराती दरांती देख कर धौंकल सिंह की घिग्घी बंध गई थी. उस की ऊपरनीचे होती तोंद थरथरा रही थी कि सुगनी कहीं उसी पर न फट पड़े.
वे चले भी जाते और मामला ठंडा भी पड़ जाता, लेकिन पीछे से आते भरोसे ने इस बात को पूरे गांव में फैला दिया और बात चर्चा में आ गई.
बस, इसी की रंजिश में ठाकुर ने अपने चक के पड़ोस की सुगनी के पट्टे की जमीन पर ट्रैक्टर चलवा कर उसे अपने खेत में मिला लिया.
खेत जुतने वाले दिन सही माने में सुगनी को लगा कि वह विधवा हो गई है. पूरे गांव में एक से एक मूंछ वाला आदमी, मगर एक गरीब विधवा के लिए धौंकल सिंह से दुश्मनी कौन मोल ले?
सुगनी का मर्द मौजूद होता, तो क्या ऐसा हो पाता?
खैर, जो हुआ सो हुआ. जो सुगनी के वश में है, करेगी और ठाकुर के जूते को गरदन झांका कर नहीं पहनेगी.
दूसरे दिन वह तहसील गई. जिस लेखपाल ने पट्टा दिया है, अभी मर नहीं गया है. वही फिर नापेगा. आखिर इंसाफ भी कोई चीज है.
पति के साथ बिताए 3 साल के समय के सुनहरे सपनों की दुनिया में भटकी सुगनी जान ही न सकी, कब बबुराडीह की पुलिया आ गई, जहां से तांगा मिलता है.
सुगनी तांगे की ओर न जा कर पुलिया के एक ओर ठिठक गई. तांगे पर बैठे दुलाल ने आंखें मिचमिचा कर कहा, ‘‘भाभी, जल्दी आ जाओ, तांगा चलने वाला है.’’
सुगनी ने तांगे की ओर नजर डाली. सवारी के नाम पर दुलाल ही बैठा था.
तांगा चलने के साथ ही बातचीत चली. जब दुलाल को सुगनी के इरादे का पता चला, तो उस के मन में बताशे फूटने लगे. पर वह अंदरूनी खुशी छिपा कर बोला, ‘‘भाभी, है तो काम खतरे का, पर मैं तुम्हारी मदद करूंगा.
‘‘मेरी यही तो मजबूरी है, गरीब पर होते जुल्म देख नहीं पाता हूं. बाकी, भाभी क्या कहूं, मुल्क ही भ्रष्ट हो गया है. अहलकार ठाकुर के पैसे के गुलाम जरूर हैं, पर तुम्हारा देवर भी कम नहीं है. ऊपर शिकायत करने की एक धौंस से इन के होश फाख्ता कर देता हूं, पर फिर भी जमाने की हवा देख कर कुछ न कुछ खर्च करना ही पड़ता है.
‘‘ऊपर तक खाते हैं, ये भी क्या करें? हां, यह जरूरी है. औरों के 10 का काम तुम्हारे एक रुपए से चलेगा, नहीं तो मैं गरदन पर सवार हो जाऊंगा और काम करवा कर ही चैन लूंगा.’’
सुगनी को लगा, डूबते को सहारा मिल गया है.
सुगनी बोली, ‘‘मैं इन चक्करों से अनजान हूं. तुम मदद कर दोगे, तो मेरी शान रह जाएगी. बात जमीन की नहीं है, यह तुम्हारे भैया की इज्जत की बात है.
‘‘मेरे पास हजार 5 सौ रुपए हैं, जहां कहोगे, खर्च कर दूंगी. अब तुम्हीं चाहे तारो, चाहे बारो.’’
दुलाल ने कहा, ‘‘अब जब तुम से कह दिया है, तो सम?ो कि इज्जत दांव पर लगा दी है. अव्वल तो तुम्हारा पैसा खर्च नहीं होने दूंगा और खर्च हुआ भी, तो इतना तो बहुत है.’’
उस दिन जब दुलाल सुगनी की बात लेखपाल से कराने गया, तो कैंटीन की चकाचकी और दुलाल की जानपहचान से सुगनी हैरत में आ गई. नाश्ते की मेज पर बैठे दुलाल की दुआसलाम वाले ?ाका?ाक कपड़ों वाले 2 बाबू जैसे लोग तो उस के साथ ही बैठ गए.
दुलाल के साथ सब ने नाश्ता किया, चाय पी और पैसे देने के लिए जब दुलाल ने सौ का नोट निकाला, तो वह उसे परोपकार के लिए निछावर होने वाला लगा.
उस ने सोचा, ‘आज तो उसी के काम के सिलसिले में चायनाश्ता हुआ है, खर्चा दुलाल क्यों ?ोले? यह तो सरासर गलत है. फिर जिन्हें दुलाल ‘बाबूबाबू’ कह रहा है, यह भी तहसील के कारिंदे होंगे और क्या पता, किस घाट पर इन पंडों की जरूरत पड़ जाए. पैसे उसे ही देने चाहिए.’
सौ के नोट में बाकी बचे रुपए पानपुडि़या की भेंट चढ़ने के बाद सुगनी को अपना पेट खालीखाली लगने लगा था. मगर पेट की टूटन के बावजूद वह खुश थी. लेखपाल ने भरोसा दिया था कि आज उसे जरूरी काम से तहसीलदार के पास ही रहना है, कल मामले पर नजर डाल दी जाएगी.
दूसरे दिन कानूनगो की मीटिंग थी. काम नहीं चला, मगर 10-20 रुपए खर्च हो ही गए.
तीसरे दिन छुट्टी थी. चौथे दिन बस्ता खुला, तो बोहनी के नाम पर कुछ देना ही था. 20 का नोट हालांकि हैसियत से कम था, पर दुलाल के रसूख के चलते लेखपाल ने उसे माथे से लगा कर कहा, ‘‘अब सब से थोड़े ही कहसुन कर मिलता है.’’
पता चला, खेत तो सुगनी के मर्द के नाम है, मगर नक्शा मालखाने में है. वहां पड़ते तो 2 सौ हैं, मगर सौ रुपए में काम चल जाएगा.
सुगनी को जमीन हिलती सी नजर आई, मगर उस ने कलेजा कड़ा कर के नोट दुलाल के जरीए लेखपाल के हवाले किया.
शाम को लौटते समय वह दुलाल से बोली, ‘‘तुम्हें कब तक काम हो जाने की उम्मीद है?’’
‘‘जल्दी से जल्दी. सरकारी काम में कभीकभार देर हो भी जाती है, पर तुम्हारे मामले में ऐसा नहीं हो पाएगा. मैं जो हूं, इन अहलकारों के सीने पर सवार होने के लिए,’’ दुलाल ने सीना ठोंक कर कहा.
अगले दिन तहसील में हड़ताल थी. संगठन से गद्दारी कोई अच्छी बात है? हां, घर पर यह काम हो सकता है. वहां 5 सौ रुपए ले कर पैमाइश की दरख्वास्त लिखवा दी गई, जिसे पास कराना दुलाल का काम था.
रुपए खर्च होते, तो काम भी होता. मगर दुलाल ने सुगनी को 2-4 दिन की मुहलत देने को कह कर और काम निबटाए. सुगनी के पूछने पर बताया, वह काम उन्हीं रुपयों में लेखपाल के जिम्मे कर दिया था, कल देखेंगे.
अब सुगनी न रह सकी. उसे दुलाल पर भरोसा था, लेकिन लेखपाल उसे हीलाहवाला करता दिखा. नतीजतन, वह अगले दिन तहसील गई. रास्ते में उस ने देखा कि दुलाल की नजर में उस के लिए सराहना के भाव हैं.
वह कुछ कहना चाहता है, पर संकोच उसे चुप किए है. वह मन ही मन भीग गई. दुलाल के घर में भी कोई दीया जलाने वाला नहीं है. कहीं यही भाव उस के मन में भी तो नहीं है.
दुलाल का चेहरा देख कर उसे लगा, उस का सोचना कतई गलत भी नहीं है. पर सुगनी ने अपने चेहरे पर कोमलता को जगह नहीं दी. उस के चेहरे पर सख्ती ही उस की ताकत है. पर मन में कहीं न कहीं बदलाव हो रहा था. अपनेपन में यह दुख कब तक टिक पाएगा?
तहसील में दुलाल और लेखपाल मिले, तो लेखपाल के चेहरे पर रूखापन था. आज वह किसी मोटे आसामी की जुगाड़ में था. दुलाल ने उस के कान में कुछ कहा, तो वह झाझला उठा.
दुलाल ने चिरौरी की, तो बड़ी मुश्किल से पास के खोखे तक जाने को तैयार हुआ.
सुगनी को बड़ा दुख हुआ कि उस के चलते बेचारा दुलाल खिड़की खा रहा है और काम बिगड़ने के डर से बोल भी नहीं रहा है.
खोखे पर पान खाने के बाद गुमटी के पीछे बतियाते इन दोनों को देख कर सुगनी का मन हुआ, वह भी सुने कि दुलाल उस के लिए क्याक्या चिरौरी करता है. सामने जाना ठीक नहीं रहेगा, यह सोच कर वह खोखे के दूसरी ओर खड़ी हो गई.
सुगनी की मौजूदगी से बेखबर लेखपाल कह रहा था, ‘‘यह हम से नहीं होगा. माल मारो तुम और बदनामी हम उठाएं. या तो उस के रुपए लौटा दो या मुझे दे दो, तो काम हो जाएगा, वरना आइंदा मुफ्तखोरी करने मेरे पास न आना.’’
सुगनी दिनभर की दौड़ की हारीथकी थी, किंतु इतनी टूटन उसे तब तक नहीं आई थी. जिस पर भरोसा किया, जिस के लिए जाने क्याक्या सोचा, वह ऐसा निकलेगा, कौन जानता था. वह वहीं बैठ गई. लेखपाल अपने काम में लगा रहा.
इधरउधर घूम कर दुलाल ने सुगनी से कहा, ‘‘ठीक है भाभी, बात हो गई है. तुम फिक्र न करो. मैं गरदन दबा कर काम करा लूंगा. मेरे पास अकेले में गिड़गिड़ाने लगा, तब मैं ने 2 दिन की मुहलत और दे दी है.’’
शांत बैठी सुगनी का निराश चेहरा एकबारगी सुर्ख हो गया. वह बोली, ‘‘तुम ने समय रहते अपनी असलियत खोल दी. मैं तो तुम्हारे ऊपर इतना भरोसा किए थी कि अपने मर्द की खिलाई कसम पूरी करने वाली थी.
‘‘मरतेमरते उस ने कहा था, ‘सुगनी, जिंदगी में तुम्हें कोई सुख न दे सका, मगर असहाय किए जा रहा हूं. तुम्हारी हालत देख कर मेरा मरना बिगड़ रहा है. वचन दो कि कोई भरोसे लायक आदमी मिले, तो घर बसा लोगी?’’’
सुगनी बोलतेबोलते रुक गई. इतनी खूबसूरत सुगनी के मन में क्या था, दुलाल जान ही न सका था. उस ने कागज के चंद टुकड़ों के लिए सुगनी के भरोसे को ठेस पहुंचा कर अपने घर में खुद आगे लगा ली थी. वह सुगनी की ओर दयनीय नजर से देखने लगा.
सुगनी ने उसे देख कर कहा, ‘‘और तुम मुझे वही भरोसे के आदमी लगे थे.’’
‘‘क्या यह सच है?’’ दुलाल सुगनी के सामने हाथ फैला कर जमीन पर बैठ गया.
‘‘नहीं, अब नहीं है, कुछ देर पहले तक था.
‘‘अब मैं अपनी जंग खुद लड़ूंगी और अपने मर्द के भरोसे को टूटने नहीं दूंगी,’’ कह कर सुगनी एक ओर चल दी.
दुलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह किधर जाए.
नमस्ते मांजी, चरण स्पर्श.
आप के ‘जवाबी खत’ ने मेरे भटके हुए मन को एकदम सही रास्ता दिखाया है. दिल्ली से तबादला होने पर मैं कश्मीर आया. यहां मुझे आतंकवादियों से निबटने के लिए तैयार किए जा रहे ‘विशेष दल’ के लिए चुना गया.
यहां की रोजमर्रा की जिंदगी में आतंकवाद की काली छाया छाई हुई है. वैसे, मेरी ड्यूटी भारतपाक बौर्डर से सटे एक कसबे में लगी है. यहां बौर्डर पर आएदिन छिटपुट गोलीबारी होती रहती है.
मेरे यहां आने के अगले ही दिन की यह घटना है… शाम को हमें खबर मिली कि कश्मीर में कुछ आतंकवादियों ने शहर के बीच गोलीबारी की है. हम लोग फौरन उस जगह पर पहुंचे. वहां मैं ने देखा कि सड़क के बीच खून से लथपथ कुछ लाशें पड़ी थीं. मशीनगन की गोलियों से छलनी लाशें देख कर मैं भी एक पल के लिए कांप गया.
वहीं एक लाश के पास एक जख्मी औरत बेबस सी बैठी थी. उस की आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे. वह लाश उस के पति की थी. पूछने पर उस ने बताया, ‘मेरे पति पर गोलियां दागने के बाद दहशतगर्द मेरी जवान लड़की को जबरदस्ती उठा कर मोटरसाइकिल पर ले गए.’
उस औरत की कहानी सुन कर मैं बहुत दुखी हो गया. मैं ने उसे धीरज बंधाया, लेकिन मन ही मन मैं बेहद डर गया था. सड़क पर मौत का नंगा खेल देख कर मैं इतना डर गया था कि जब अपने कैंप में पहुंचा, तो बिस्तर पर लेटेलेटे सोचने लगा कि जो हादसा मैं ने इन आंखों से देखा है, अगर उस में उस आदमी की जगह आतंकवादियों ने मुझे मार डाला होता, तो आप पर क्या गुजरती? आप की बहू भरी जवानी में विधवा हो जाती.
फिर मैं सोचने लगा कि फौज में भरती होने से बेहतर तो यह होता कि मैं किसी आश्रम में चला जाता. आश्रम की जिंदगी में भागमभाग नहीं होती, कोई किसी का दुश्मन नहीं होता, न ही वहां कोई गलाकाट होड़ ही होती है. आश्रम आमतौर पर कुदरत की गोद में होते हैं, उन के आसपास पहाड़ियां होती हैं. वहां पर ऐसी हरियाली छाई रहती है, मानो कुदरत ने मखमल से धरती का सिंगार किया हो.
आश्रम की हवाओं में आतंकवाद की बू नहीं होती. वहां शांति होती है, सिर्फ शांति. तन की शांति, मन की शांति. जो सुकून आश्रमों में होता है, वह कहीं दूसरी जगह देखनेसुनने को भी नहीं मिलता.
मांजी, दरअसल, आतंकवादियों की इस खूनी कार्यवाही से मैं बेहद डर गया था और उसी डर के बीच मैं ने आप को खत में लिख दिया कि फौज की जिंदगी से तो आश्रम की जिंदगी बहुत सुकून भरी होती है. तब मेरा दिल करने लगा था कि फौज की नौकरी छोड़ कर किसी आश्रम में चला जाऊं.
मांजी, आप का जवाबी खत पढ़ा, तो लगा कि मैं कितना गलत था. मेरे खयालात कितने घटिया और सड़ेगले थे. आप की बातों ने मेरी आंखें खोल दी हैं.
आप ने खत में एकदम सही लिखा था, ‘दुनिया में ऐसा कौन सा आश्रम है, जहां उम्रभर के लिए सुकून मिल सके? दरअसल, तुम्हें अपनी जिंदगी से कुछ ज्यादा ही प्यार हो गया है और तुम मौत से डरने लगे हो, इसीलिए तुम्हें आश्रम की जिंदगी में शांति नजर आ रही है.
‘दरअसल, पहले कुछ दिनों तक हर नई जगह पर अच्छा लगता है, लेकिन उस के बाद वहां से भी मन ऊबने लगता है. मैं भगोड़े या डरपोक फौजी की मां कहलाने के बजाय लड़ाई में मारे गए फौजी की मां कहलाने में अपनेआप को धन्य समझूंगी.
‘अगर तू आतंकवादियों से लड़ते हुए अपनी जान भी गंवा बैठा, तो शहीद कहलाएगा. तब मेरा सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. मैं शहीद की मां कहलाऊंगी.’
मांजी, आप का खत पढ़ कर मुझे एक नई रोशनी मिली है. कुछ देर के लिए मैं खुदगर्ज हो गया था, डर गया था, लेकिन अब मेरे दिल से डर कोसों मील दूर चला गया है.
आप का खत पढ़ कर ही तो मैं समझ पाया हूं कि आश्रम की जिस शांति की बात मैं ने मन ही मन सोची थी, वही शांति तो मुझे अपने देश में और खासकर कश्मीर में लानी है.
मांजी, यहां आएदिन आतंकवादियों से हमारी झड़पें हुआ करती हैं. हम लोग जान की बाजी लगा कर उन का मुकाबला करते हैं. नतीजतन, उन को उलटे पैर भागना पड़ता है.
आप को यह जान कर खुशी होगी कि अब कश्मीर में हालात बदल रहे हैं, अमनचैन लौटने लगा है. हम फौजी यहां के लोगों के दिलों में आतंकवादियों का खौफ कम करने में कामयाब हो रहे हैं.
यहां के लोग भी यह बात अच्छी तरह से समझ गए हैं कि आतंकवादियों से डरने से काम नहीं चलेगा, इसीलिए अब वे भी हमारा साथ दे रहे हैं.
मांजी, यहां के लोगों की मदद मिलने के चलते ही कुछ आतंकवादियों ने ‘आत्मसमर्पण’ करना भी शुरू कर दिया है.
अगर हमें इसी तरह इन लोगों का साथ मिलता रहा, तो यकीन करो कि हम कश्मीर की जमीन से आतंकवाद के काले निशान को मिटा कर रख देंगे.
बाकी अगले खत में…
आप का बेटा,
रणवीर सिंह.
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अखबार में बड़ेबड़े अक्षरों में छपा था, ‘एक टीचर ने नंगा कर के एक लड़का और लड़की की पिटाई की. टीचर और प्रिंसिपल को हटाने की मांग.’
इस खबर से जिला शिक्षा के अफसर हरकत में आ गए और जीप भर कर स्कूल में जा पहुंचे.
सरकारी अफसर के पहुंचते ही गांव भी उमड़ आया. नए टीचर और पुराने हैडमास्टर को अब नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.
अफसर ने वहां पहुंचते ही दोपहर का खाना चखा. इस में स्कूल को बेदाग पाया गया. इस के बाद असली सवाल आया कि वह कौन टीचर है, जिस ने बच्चों को नंगा कर के मारा? ऊपर से उंगली तक लगाने की मनाही है और उस ने नंगा कर के पीटा.
गांव के सरपंच के साथ पीडि़त बच्चों के मांबाप ने एक दुबलेपतले टीचर की ओर इशारा किया.
वह टीचर हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नंगा करने की बात झूठ है. मैं ने जो देखा, उस के लिए फटकारा.’’
गांव वाले चिल्लाचिल्ला कर बोलने लगे, ‘इन्हें सस्पैंड करो. हमें नहीं चाहिए ऐसे टीचर, जो बच्चों को कुत्तेबिल्ली समझ कर मारते हैं. दोपहर का खाना कच्चापक्का देते हैं. हैडमास्टर बरसों से यहीं जमे हैं. इन्हें भी बदलो.’
शिक्षा अफसर बोले, ‘‘आप लोग चुप रहें. जो कुछ कहना है, लिखित में दे दें. हम लोग इसी मामले की जांच करने के लिए आए हैं.’’
इस के बाद वे हैडमास्टर से बोले, ‘‘आप तो पुराने हैं. तजरबेकार हैं. आप ने इस मामले में क्या किया?’’
हैडमास्टर बोले, ‘‘ये जितने लोग चिल्ला रहे हैं, मैं ने सब को पढ़ाया है. जहां तक इन टीचर महाशय की बात है, तो मैं थोड़े दिनों में इन्हें जान गया हूं. ये बहुत ही मेहनती हैं.
‘‘आप को सच का पता लगाना ही है, तो लड़के और लड़की को बुलाएं. उन के मातापिता को बुलाएं. वहां दफ्तर में बैठ कर मैं पूछताछ करता हूं. अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.
‘‘सारे गांव के सामने तमाशा करने की जरूरत नहीं है. आप अपना फैसला फिर सारे गांव के सामने सुना देना.’’
शिक्षा अफसर इस बात पर सहमत हो गए. चौकीदार ने घंटेभर के लिए सब को वहां से हटा दिया.
हैडमास्टर ने लड़की से पूछा, ‘‘क्यों बेटी, किसी ने तुम्हारे कपड़े उतारे थे?’’
लड़की बोली, ‘‘नहीं, ड्रैस ढीली है. बांह से निकल जाती है.’’
हैडमास्टर ने लड़के से पूछा, ‘‘बेटा, सचसच बताना कि तुम वहां दूसरे कमरे में मरजी से गए थे या टीचर ले गए थे?’’
लड़का बोला, ‘‘मरजी से.’’
हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘वहां लड़की और तुम थे. तुम दोनों ने क्या किया?’’
लड़का बोला, ‘‘मैं उसे लिटा कर उस के ऊपर लेट गया.’’
हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘क्या वहां तुम्हारे टीचर भी थे?’’
लड़का बोला, ‘‘नहीं, बाद में देख कर उन्होंने जोर से डांटा. हम रोने लगे.’’
हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा. एक बात और बताओ. टीचर ने ऐसा करने को कहा था या तुम ने अपने मन से किया?’’
लड़का बोला, ‘‘मन से किया.’’
हैडमास्टर ने पूछा, ‘‘ऐसा कहां देखा, जो नकल करने लगे?’’
बच्चे ने झोंपते हुए कहा, ‘‘रात में पापा को मां के ऊपर ऐसा करते देखा था. हम ने भी वही खेल खेला.’’
हैडमास्टर ने शिक्षा अफसर और मांबाप की ओर देख कर कहा, ‘‘बच्चे की पहली पाठशाला परिवार है. जो देखेगा वही करेगा. परिवार में 2 बच्चे नहीं संभलते, हम 2 सौ बच्चों को संभालते हैं. उन्हें खिलातेसिखाते हैं. ऐसे लांछन लगाना क्या ठीक है?’’
यह सुन कर मांबाप उन के पैरों में गिर गए. वे बच्चे भी लिपट कर टीचर को जैसे बदली कराने से रोक रहे थे. शिक्षा अफसर ने गांव वालों से जाने को कहा.
हैडमास्टर ने सब से हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘भाइयो, आप को कष्ट दिया. आप घर जाएं. गांव के दूसरे भाइयों को समझाएं. अब अफसर जो करेंगे, वह स्वीकार होगा.’’
कुछ लोग जातेजाते बोले, ‘साहब, इन्हें माफी दे दें. ये टीचर यहां से कहीं नहीं जाएं. इन्हें सजा नहीं इनाम मिलना चाहिए. आप भले ही हमें सजा दे दें.’’
तब तक बाबू कागज पर मामला तैयार कर चुके थे. पढ़ कर सुनाया. लोगों से दस्तखत कराए. टीचरों से भी और खुद शिक्षा अफसर ने भी दस्तखत किए.
शिक्षा अफसर बोले, ‘‘आपस में मिल कर गलतफहमियां दूर हो जाती हैं. बच्चों के साथ टीचर और गांव का भविष्य भी दांव पर लगता है. अब मामला ठंडा हो गया है.’’
अगले दिन अखबार में खबर छपी, ‘मामले की जांच की, तो वह झूठा निकला. अफवाह फैलाने वालों को पुलिस ढूंढ़ेगी और उन से सख्ती से निबटेगी.’
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राम सिंह फौजी के घर से चिट्ठी आई थी. इतनी दूर रहते हुए आदमी के लिए चिट्ठी या खबर ही तो केवल एक सहारा होती है. ये चिट्ठियां भी अजीब होती हैं, कभी खुशी देती हैं, तो कभी दुख भी बढ़ा देती हैं.
राम सिंह फौजी के घर वालों की यह चिट्ठी भी अलग तरह की थी. उस में एक फौजी के घर वालों की सभी दिक्कतें लिखी थीं. बेटे ने लिखा था, ‘पापा, आप कैसे हैं? घर की दीवार गिरने लगी है और दादा भी आजकल बीमार रहते हैं. कोने वाली कोठरी की छत कभी भी गिर सकती है. परसों हुई मूसलाधार बारिश से उस में से बहुत पानी चू रहा था.
‘मां की हालत ठीक है. मैं अब रोजाना स्कूल जाता हूं. मेरी ड्रैस पुरानी हो गई है. पैंट भी मेरी घुटनों पर से फट गई है.
‘पापा, इस बार घर आते समय आप मेरी नई पैंट लेते आना. चप्पल जरूर लाना. छोटू के लिए आप खिलौने वाली टैंक और बंदूक लेते आना. आप जल्दी घर आना पापा.
‘आप का बेटा, राजू.’
राम सिंह सोचने लगा, ‘यह राजू भी होशियार हो गया है. केवल 10 साल का है, लेकिन चिट्ठी भी लिख लेता है. इस बार पैंट और चप्पल जरूर लेता जाऊंगा. छोटू के लिए खिलौने वाला टैंक और बंदूक भी लेता जाऊंगा. मैं इस बार जरूर छुट्टी लूंगा.’
‘‘राम सिंह, खाना खा लिया क्या?’’ पास ही से आवाज आई.
‘‘नहीं यार, खाया नहीं है. अभी थोड़ी देर में खा लूंगा.’’
‘‘कब खा लेगा? 8 बजे आपरेशन पर जाना है और साढ़े 7 बज चुके हैं,’’ राम सिंह का साथी फौजी रंजीत सिंह उस से बोला.
राम सिंह उठ कर भोजन की तरफ बढ़ गया. ‘आजकल यहां के हालात काफी खराब हो चुके हैं. आएदिन गोलीबारी होती रहती है. रोज दोनों तरफ के लोग मारे जाते हैं. न रात को आराम, न दिन को चैन. पता नहीं क्या करने पर उतारू हैं ये लोग. शांति से क्यों नहीं रहते,’ ऐसा सोचते हुए राम सिंह ने बड़े बेमन से खाना खाया.
आज राम सिंह को घर के खाने की बहुत याद आई. दूर राजस्थान के रेतीले इलाके में बसे अपने छोटे से गांव की याद ताजा हो गई. घर से चिट्ठी आते ही हर बार उस का यही हाल हो जाता है. पता नहीं, क्यों?
‘‘राम सिंह, जल्दी से तैयार हो जाओ,’’ मेजर सौरभ घोष की आवाज कानों से टकराते ही राम सिंह ने अपनी राइफल, पट्टा, टौर्च वगैरह उठा ली.
‘‘आज हमें चौकी नंबर 2 पर जाना है. वहां हमला हो सकता है. वह चौकी बहुत खास है. वह हमें हर हाल में बचानी होगी,’’ मेजर सौरभ घोष सभी सिपाहियों से कह रहे थे.
सभी सिपाहियों और अफसरों की टुकड़ी वहां से चौकी नंबर 2 की तरफ बढ़ गई. ‘तड़तड़’ की आवाजों के साथ 1-2 फौजी शहीद हो गए, देश की हिफाजत की खातिर उन्होंने अपनी जान दे दी. देर तक गोलीबारी होती रही. अब कुछ ही लोग बाकी रह गए थे.
राम सिंह के साथ 5 जवान और थे. दुश्मन की एक गोली राम सिंह के पास ही खड़े रंजीत सिंह को आ कर लगी, जिस से उस ने दम तोड़ दिया. अपने दोस्त रंजीत सिंह को मरते देख राम सिंह को अपने शरीर का एक अंग जुदा होता महसूस हुआ.
अचानक राम सिंह ने जोश में आ कर अपनी जान की परवाह न करते हुए दौड़ कर फायरिंग की. दुश्मन के 3 फौजी मारे गए. अब केवल दुश्मन का एक फौजी बचा था. वह चट्टान की आड़ से गोलियां चला रहा था.
राम सिंह ने पेड़ की आड़ से उस पर 3-4 फायर झोंक दिए थे, जो निशाने पर लगे थे और वह दुश्मन भी तड़प कर शांत हो गया.
राम सिंह ने 3-4 पल उसे देखा और बेफिक्र हो कर उस के करीब गया. चेहरामोहरा उलटपलट कर देखा और फिर बुदबुदाया, ‘उम्र तो मेरे बराबर की ही लग रही है.’
राम सिंह ने उस की तलाशी ली. उस के परिचयपत्र को टौर्च की रोशनी में पढ़ा. उस पर लिखा था, रफीक अशरफ, सिपाही, 36 लाइट इंफैंटरी.
राम सिंह ने उस की पैंट की पिछली जेब टटोली, तो वह चौंका और बोला, ‘‘अरे, यह क्या? शायद इस की चिट्ठी है. चलो, देखते हैं,’’ कहते हुए राम सिंह ने अपने पास खड़े एक साथी को टौर्च पकड़ाई.
राम सिंह को थोड़ीबहुत उर्दू पढ़नी आती थी, जो कि उस ने गांव के मौलवी से बचपन में सीखी थी.
राम सिंह ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की:
‘अब्बूजान, अस्सलाम अलैकुम. आप कैसे हैं? हम सब अम्मी, सलीम, दादी अम्मां, दादू सब खैर से हैं. मेरा स्कूल लगना शुरू हो गया है.
‘मैं 8वीं जमात में हो गई हूं. सलीम भी चौथी जमात में आ गया है. मास्टरजी ने हम से नई ड्रैस सिलवाने को कहा है. मेरी फ्रौक पुरानी हो गई?है. सलीम भी नई ड्रैस मांग रहा है.
‘अब्बू, हमारे पास जूते भी नहीं हैं. दादू बोलते हैं कि बेटा इस बार तुम्हारे अब्बू ढेर सारी ड्रैस, जूते और चीजें ले कर आएंगे.
‘दादू का कुरता भी फट गया है. पर उन्हें मास्टरजी तो नहीं डांटते न. अम्मी और दादी अम्मां दोनों बहुत उदास रहती हैं. उन के बुरके भी पुराने और तारतार हो गए हैं. आप सालभर हम से दूर क्यों रहते हैं अब्बू?
‘पिछली ईद पर आप नहीं आए थे, सो हम ने उस दिन सेंवइयां भी नहीं बनाई थीं. सलीम बहुत रोया था उस दिन. इस बार आप जरूर आना.
‘घर पर पैसे खत्म हो गए हैं. पैसे के लिए हम ने अपनी एक बकरी बेची थी. असलम दुकान वाले ने अब उधार देना भी बंद कर दिया है. वह कहता है कि पहले वाले पूरे पैसे दो, उस के बाद सामान दूंगा.
‘आप आ जाइए अब्बू. आते समय आप मेरे लिए फ्रौक, सलीम के लिए ड्रैस, जूते, दादू के लिए कुरता, दादी अम्मां और अम्मी के लिए नए बुरके जरूर लाना.
‘अब्बू, यहां आने पर एक बकरी भी खरीदेंगे, सलीम बहुत जिद करता है न.
‘आप की बेटी, सोफिया.’
राम सिंह ने भरे गले से पूरी चिट्ठी पढ़ी. टौर्च की रोशनी में उसे लगा कि मानो उस का और अशरफ का घर एक ही हो. उसे कोई फर्क नहीं लगा. उसे अपने घर की दीवारें और छत गिरती नजर आईं.
काश, वह इस फौजी के लिए सारी चीजें पहुंचा सकता और असलम दुकान वाले का उधार भी चुका सकता.
दूसरे दिन अखबारों में खबर छपी थी कि राजपूताना राइफल्स के जवान राम सिंह ने अनोखी वीरता दिखाई. नीचे उस की बहादुरी का पूरा ब्योरा छपा था.
पूरा देश राम सिंह की बहादुरी से खुश था, पर इधर राम सिंह खुद को हत्यारा समझ रहा था.
आदमी को मारने के अपराध में कानून सजा देता है. वह खुद को सजा के लायक मान रहा था, पर उस ने ‘आम आदमी’ नहीं मारे थे. वे मरने वाले ‘आम आदमी’ नहीं थे. उन्हें मारने पर उसे राष्ट्रपति से ‘सर्वोच्च वीरता पुरस्कार’ देने का ऐलान हुआ.
15 अगस्त को सम्मान समारोह में कुरसी पर बैठा राम सिंह दोनों देशों के नेताओं, हुक्मरानों के बारे में सोच रहा था, ‘ये लोग शांति क्यों नहीं चाहते हैं? रोज सरहद पर बेगुनाह जवान मारे जाते हैं और ये एयरकंडीशनर लगे कमरों में आराम से बैठे उन जवानों को ‘शहीद’ का खिताब देते हैं. क्या बिगाड़ा है इन बेगुनाह जवानों ने इन नेताओं का?
‘दुनिया के सभी देश शांति से रह कर तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं और इधर ये दोनों बेवकूफ देश लड़ कर जनता के अरमानों को काला धुआं बना रहे हैं.’
राम सिंह यही सोच रहा था कि तभी मंच से उस का नाम पुकारा गया.
राम सिंह ने वह पुरस्कार और पदक लिया तो जरूर, पर उन्हें लेते समय वह मन ही मन में बड़बड़ा रहा था, ‘मुझे पुरस्कार क्यों दिया जा रहा है. मुझे सजा दो. मैं ने हत्याएं की हैं. मुझे पुरस्कार मत दो.’
इतिहास केवल जलियांवाला बाग की खूनी होली का ही हाल बताता है, उस के हत्यारे का अंत नहीं लिखता. मगर जो ‘शहीद उधम सिंह’ नाम से परिचित हैं उन के खून में यह नाम सुनते ही एक गरमी का उबाल सा पैदा हो जाता है. लुधियाना शहर में शहीद उधम सिंह नगर कसबे में घूमते हुए पहली बार इसी तरह का रोमांच मुझे भी हो आया था. मेरे सामने वह चेहरा उभर आया, बिलकुल उसी तरह का, जो कभी मेरे दादाजी ने अपनी आपबीती के छोटे से हिस्से में चित्रित किया था. उन की यह आपबीती इस प्रकार थी…
1938 की बात है. उन दिनों मैं और मेरे 2 साथी लंदन में थे. गुरुद्वारा हमारा अस्थायी घर था. लंदन आने वाला करीब हर भारतीय वहां आ कर कुछ दिन ठहरता था. एक दिन सुबह हम ने वहां एक नए भारतीय को देखा. उस की नजरें भी हम पर पड़ीं, लेकिन हमें काम पर जाने की जल्दी थी इसलिए हम ने शाम को उस से मिलने का फैसला किया. शाम को वह खुद ही कमरे के बाहर हमारी प्रतीक्षा कर रहा था. हमें देख कर वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ कर बोला, ‘सत श्री अकाल.’
उस की आवाज में अजीब तरह का खिंचाव था. अभिवादन का जवाब दे कर हम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा. कमीज और तहमत, सिर पर सफेद साफा और पीछे लटकता हुआ तुर्रा. यही उस का पहनावा था. उस के सिर पर केश नहीं थे पर आवाज उस की खास कड़क थी, जो उसे सिख जमींदार घराने का दर्शाती थी. यों पहली नजर में हमें गुंडा लगा था.
‘‘मेरा नाम उधमसिंह है,’’ उस ने बताया. शिष्टाचारवश हम ने बढ़ कर उस से हाथ मिलाया और अपना परिचय दिया.
‘‘कौन सा गांव है, भाई साहब, आप का?’’ मैं ने पूछा.
‘‘सनाम, बरनाले के पास. आप का?’’
‘‘गिल्लां गांव है, लुधियाने के पास.’’ उस के चेहरे पर उभरी रौनक और गहरी हो गई. वह बोला, ‘‘गिल्लां? नहर के पास वाला न? तब तो हम आसपास के ही हैं,’’ और उस ने बढ़ कर मुझे मजबूत आलिंगन में कस लिया. वतन से दूर एक बेगाने देश में कोई हमवतन और वह भी अपने ही गांव के पास का मिल जाए तो इस प्रकार की अलौकिक खुशी होती है. यह हमारी उस से पहली मुलाकात थी. इस के बाद वह हमारे बहुत करीब आता गया पर हम सदा उस से दूर रहने की कोशिश करते. हम सुबह काम पर चले जाते और शाम को वापस आते. वह भी इसी तरह करता, पर हम ने उस से कभी उस के धंधे के बारे में पूछने की कोशिश नहीं की. न ही उस ने कभी बताने की इच्छा जाहिर की. हमारा खयाल था कि वह चार सौ बीसी का धंधा करता होगा. उस के अंदर कोई दिलेर दिल भी होगा, इस की कभी हम ने कल्पना भी नहीं की थी.
वह समय निकाल कर शाम को हमारे पास आ बैठता और घंटों इधरउधर की हांकता रहता. उस की बातें अधिकतर गोरों के प्रति रोष से भरी होती थीं. हर समय वह गोरों को भारत से निकालने के स्वप्न देखता रहता. खासतौर पर 2 गोरे उस की आंखों में बहुत खटकते थे. पहला जनरल डायर और दूसरा ओडवायर. उन्हें मारने की कसमें वह कई बार खा चुका था.एक दिन मैं ने उस से पूछा, ‘‘उधमसिंह, भई, अगर तुम्हें गोरे इतने नापसंद हैं, तो तुम यहां आखिर करने क्या आए हो?’’
‘‘अपना असली मकसद पूरा करने.’’
‘‘कौन सा?’’ हम सब ने एकसाथ पूछा.
‘‘शादी,’’ वह छूटते ही तपाक से बोला.
दिन बीतते गए और उस के साथ हमारे संबंध घनिष्ठ होते गए. इतने घनिष्ठ कि जब हम ने कमरे किराए पर लिए तो उसी मकान में एक कमरा उस ने भी जबरदस्ती किराए पर ले लिया. उस ने इस का कारण बताया, ‘‘तुम से जुदा हो कर मैं रह ही नहीं सकता.’’ अभी भी हम उस के कामधंधे के बारे में अनभिज्ञ थे. एक दिन आखिर मैं ने इस बारे में पूछ ही लिया. तो वह बोला, ‘‘मेरा काम, इनकलाब.’’
मैं हंस पड़ा और बोला, ‘‘वह तो तुम्हारी बातों और कारनामों से ही लगता है. अच्छा भई इनकलाबी, तेरा गुरु कौन है?’’
‘‘उस ने बताया भगत सिंह.’’ जैसेजैसे समय बीतता गया हम उस के प्रति अधिकाधिक शक्की होते गए. यह बात निराली होती जा रही थी. उस समय 1939 चल रहा था. एक दिन सिरदर्द के कारण मैं औफिस से जल्दी घर लौट आया. आ कर चाय बनाई और पीने ही लगा था कि तभी खटखट सीढि़यां चढ़ता हुआ वह अंदर आ गया.
‘‘आ, उधमा, चाय पी,’’ मैं ने कहा तो वह बोला ‘‘नहीं, नहीं, बस पी. मैं कुछ दिन पहले यहां रखी एक चीज लेने आया हूं. ले सकता हूं?’’
‘‘जरूर भई, अगर तेरी कोई चीज है तो जरूर ले सकता है.’’ मेरे कमरे में एक आला था जो न जाने कब से कीलें ठोंक कर बंद किया हुआ था. मैं ने कभी उस पर ध्यान भी नहीं दिया था. उस ने जेब से एक पेचकश निकाला और फट्टियों के पेच खोल दिए. फिर बीच में से एक रिवाल्वर निकाल कर जेब में डाला और फट्टियों को उसी तरह ठोंक कर वह मेरे सामने आ खड़ा हुआ. फिर उस ने चाय की मांग की. मैं ने उस के लिए चाय बनाई और खुद इस उधेड़बुन में लग गया कि कैसा खतरनाक आदमी है यह. अगर पुलिस यहां आ कर रिवाल्वर ढूंढ़ लेती तो मुझे बेकार में मुसीबत उठानी पड़ती.
मैं ने पूछा, ‘‘कब रख गया था भई, तू इसे यहां?’’
‘‘यार, सद्दा, अब तुम से क्या छिपाना. गोरी सरकार न जाने क्यों मुझ से डरती है? मेरा नाम पुलिस ने दस नंबरियों की लिस्ट में लिख रखा है. इसीलिए मुझे वापस अपने मुल्क जाने की भी इजाजत नहीं है. पिछले कुछ दिनों से तो पुलिस की मुझ पर खास नजर है. इसीलिए मैं इसे यहां रख गया था.’’ फिर उस की आवाज में वही कड़क पैदा हो गई, ‘‘क्या तुम बहादुर हिंदुस्तानी नहीं हो? क्या तुम उस देश की औलाद नहीं हो, जहां भगत सिंह पैदा हुआ?’’
‘‘जानते हो एक बार जब वह छोटा था तो उस से किसी ने पूछा था, ‘तुम ने अपने खेत में क्या बोया है, भागू?’ वह नन्हा सा बालक बड़े जोश में बोला था, ‘बंदूकें,’ तुम भी उसी धरती के बेटे हो. देश के लिए अपनी कुरबानी से डरते हो? और क्या तुम्हें मुझ पर अब जरा भी विश्वास नहीं? अगर यही बात है तो, जाओ, तुम्हें मैं कुछ नहीं कहूंगा. जाओ, तुम्हें इजाजत है. जा कर पुलिस को बता दो कि मेरे पास हथियार है. वह आ कर मुझे पकड़ लेगी. सद्दा, मैं तुम से मुहब्बत करता हूं. अगर तुम्हें इस से खुशी होगी तो मैं उमरकैद भी झेल लूंगा.’’ इतना कह कर वह चुप हो गया और मुझ पर होने वाली प्रतिक्रिया देखने लगा. मगर मैं आंखें झुकाए बुत बना बैठा रहा. थोड़ी देर बाद वह उठा और तेजी से बाहर चला गया. उस दिन पहली बार मैं ने जाना कि उस में देश के प्रति प्रेम कितना कूटकूट कर भरा हुआ था. अब मेरे दिल में उस के लिए प्यार और श्रद्धा थी. बातों ही बातों में मैं ने एक दिन उस से कहा, ‘‘उधमसिंह, तुम अगर देश को आजाद करवाना चाहते हो तो तुम्हें भारत में रह कर ही कुछ करना चाहिए. यहां तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ सकता.’’
मेरी बात सुन कर उस के चेहरे पर गम की तसवीर उभर आई, ‘‘हां,’’ वह लंबी सांस छोड़ता हुआ बोला, ‘‘मेरे देश के हजारों निहत्थे भाइयों को डायर और ओडवायर ने जलियांवाला बाग में गोलियों से भुनवा दिया था. उन में मेरा भाई और बापू भी…’’ उस की आंखें भर आईं और गला रुंध गया.
फिर धीरेधीरे उस ने अपने बचपन की वह घटना सुनाई जिस से उसे उन की मौत का पता चला था. 13 अप्रैल, 1919 यानी बैसाखी का दिन था. जलियांवाला बाग में अनजान, निहत्थे, परवाने इकट्ठे हो कर सभा कर रहे थे. गुलामी की दास्तां सुनने के लिए बूढ़े, बच्चे और स्त्रियां वहां इकट्ठी हुई थीं. ब्रिटिश सरकार इस अहिंसक सभा की ताकत देख चुकी थी. एक गांधी के साथ हजारों गांधी बनते देख वह बौखला उठी. उस की चालाक राजनीति भी कांप गई. इसलिए इस से निबटने का अधिकार सरकार ने फौजी जनरलों को दिया और उन जनरलों को ताकत के घमंड में इस बला से निबटने का एक ही तरीका सूझा, वह था गोलियां चलाने का. उन के हुक्म से ही मशीनगनों का घेरा बाग के चारों तरफ लगा दिया गया. इन घेरा डालने वालों में वे नमकहराम भी थे जो अपनी नौकरी के लिए देश को आजाद होता नहीं देखना चाहते थे. इस के बाद की खूनी होली की कहानी इतिहास के कई पन्नों पर काली स्याही से लिखी हुई है. यह कहानी कुछ ही दिनों में बड़ेबड़े शहरों से दूरदराज के गांवों में जा पहुंची. लाशों को पहचान कर अपने पतियों, भाइयों, बहनों और बेटों को जान लेने वाले तो थोड़े ही थे. अधिकांश लोगों ने तो जो घर नहीं पहुंचे उन्हें भी मारा गया समझ लिया.
संगरूर जिले का एक गांव है सनाम. एक घर में गांव के वृद्धवृद्धाओं का रोना सुनाईर् दे रहा था. उस का पति और बेटा भी जलियांवाला बाग में गए थे और आज उन्हें गए तीसरा दिन था. तभी एक छोटा सा बालक भागता हुआ आ कर अपनी मां की गोद में दुबक गया. मां और इतने लोगों को रोता देख बालक चाहे कुछ नहीं समझा था, पर इतना जरूर समझ गया कि लोग ऐसे किसी के मरने पर ही रोते हैं. अबोध बालक कुछ बड़ा हुआ और स्कूल जाने लगा. एक दिन सुबह बच्चों की एक टोली तख्तीबस्ता संभाले, बातें करती, उछलतीकूदती स्कूल जा रही थी. उस में यह बालक भी था. जलियांवाला बाग की खूनी होली को 3 वर्ष बीत चुके थे. मौत के गम धुंधले पड़ चुके थे. तभी एक बालक ने उस से पूछा, ‘‘उधमा, तेरा बापू और वीर कहां गए हैं?’’
बालक बिना सोचे ही बोला, ‘‘परदेश को.’’
‘‘तुझे किस ने कहा, ओए?’’
‘‘मां ने. क्यों?’’
‘‘मेरी मां तो रात बापू से कह रही थी, ‘बेचारे उधम के बापू और वीर को मरे 3 साल हो गए. गोरे बड़े बुरे हैं. जब उधम जवान होगा तो वह जरूर उन की मौत का बदला लेगा.’ तेरे बापू और वीर को, उधमा, गोरों ने ही मार दिया है. है न?’’
छोटे से उधम की आंखों के आगे बचपन का वह दिन नाच उठा जो उस ने मां की गोद में दुबक कर देखा था. उसे थोड़ाथोड़ा विश्वास हो गया कि राणा ठीक ही कह रहा होगा. अपने बाप और भाई की मौत की कहानी सुनते ही वह ताव खा गया. उसने सोचा कि वह मां से सचाई जानेगा और अगर यह सच है तो वह अंगरेजों से बदला लेगा. वह लगभग दौड़ता हुआ घर पहुंचा और एक ही सांस में मां से कई सवाल पूछ गया, ‘‘मां, बापू और वीर को गोरों ने मार दिया था क्या? तू तो कहती थी परदेश गए हैं. आज राणा ने मुझे सबकुछ बता दिया.’’
मां अपने बेटे को लौटता देख पहले ही हैरान थी. अब दबी हुई बात उस के मुंह से सुन सकते की हालत में आ गई. पति और जवान बेटे की याद कर पुराना घाव फूट निकला. उस की आंखों में आंसू चमक आए. काम छोड़ उस ने अपने बेटे को छाती से लगा लिया और फफकफफक कर रोने लगी. ‘‘मां, तू रो मत. मैं ला कर उन गोरों को अपने खेत की क्यारियों में गाड़ दूंगा. तू बता, वे कौन थे.’’ ‘कौन’ के बारे में बूढ़ी ने लोगों से यही सुना था कि वह ‘डैर’ था, कोईर् बड़ा अफसर और एक उस का साथी था. यही उस ने उधम को भी बता दिया. उधम ने भी सोच लिया कि वह बड़ा हो कर जरूर बदला लेगा.
जलियांवाला बाग की घटना से सारे देश में रोष की लहर फैल गई थी. ठाकुर बाबू ने ‘सर’ की उपाधि त्याग दी. बड़ेबड़े नेताओं के भाषण आग में घी का काम करने लगे. ये सब देख कर गोरी सरकार डर गई. लोगों को शांत करने के लिए उस ने जनरल डायर और ओडवायर को उन के पदों से हटा कर इंगलैंड भेज दिया. अपनी कहानी के अंत में उधम सिंह ने बताया कि वह गदर पार्टी का मैंबर बन गया था. उसी के सहारे वह अमेरिका गया और फिर यहां आ गया. एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे. वह भी साथ था. प्याला खाली कर के वह मेज पर रखता हुआ बोला, ‘‘अच्छा दोस्तो, आज शायद यह तुम लोगों के साथ मेरी आखिरी चाय है. यदि कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना,’’ फिर उस ने जेब से बटुआ निकाला और मेरे एक साथी को कुछ पैसे दिए. शायद कभी उधार लिए होंगे, पर मेरा ध्यान उस के नाम कार्ड पर गया. उस पर लिखा था, ‘एमएसए.’ मैं बड़ा हैरान हुआ.
‘‘यह क्या, भाई, उधम?’’ मैं ने कार्ड की तरफ इशारा किया.
‘‘मोहम्मद सिंह ‘आजाद’,’’ वह बोला और जोर से हंस दिया. उसी दिन शाम को हमारा प्रोग्राम कैंस्टन हौल जाने का बन गया. उस दिन वहां भारत में उठ रहे आजादी के इनकलाब के बारे में मीटिंग होनी थी. हम अपनी सीटों पर बैठे थे. मीटिंग अभी शुरू भी नहीं हुईर् थी कि तभी मेरे साथी ने इशारा किया. सामने की 2 पंक्तियां छोड़ कर एक किनारे पर ‘वह’ बैठा था.
‘‘अरे, यह तो कहीं जा रहा था,’’ साथी बोला.
‘‘इसे कहां जाना है. इस की बातों और सच में बड़ा फर्क है,’’ दूसरे साथी ने कहा और दोनों हंस दिए. मीटिंग शुरू हो चुकी थी. सामने मंच पर कई लोगों के बीच जनरल डायर बैठा था. उसी के साथ उस के दाईं ओर ओडवायर बैठा था. ये दोनों ही उधम के असली शिकार थे. वह कहता था कि इन्होंने हजारों निहत्थों… जलियांवाला बाग… मेरा खून गरम हो कर तेजी से नाडि़यों में चक्कर काटने लगा. तभी वह उठा और बाहर चला गया. कुछ देर बाद फिर वह अंदर आ गया और धीमी चाल चलता हुआ मंच की ओर चढ़ चला. उस समय डायर बोल रहा था, ‘‘दंगे करने वाले हिंदुस्तानी बिलकुल पागल हैं…’’
सब एकटक भाषण सुन रहे थे. तभी फुरती से उधम ने अपनी जेब से हाथ निकाला. मैं इतना ही देख पाया कि उस के हाथ में वही रिवाल्वर था. इस के बाद ‘ठांय…ठांय…ठांय…’ 3 गोलियों की आवाज हुई. सारा हौल कांप उठा. मंच पर बैठे डायर का सिर छाती पर आ गिरा. ओडवायर भी एक ओर लुढ़क गया.
‘‘तो उस ने अपना काम पूरा कर दिया. अपने बाप और भाई की मौत का बदला, हजारों निहत्थों की मौत का बदला…’ कुछ ही क्षण में उस के साथ बिताए सारे क्षण मेरे सामने उभरते चले गए. गोली मार कर वह भागा नहीं, रिवाल्वर थामे उसी प्रकार खड़ा रहा. थोड़ी देर में ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और हौल का घेरा डाल लिया. सुबह अखबारों में छपा था, ‘एक भारतीय युवक मोहम्मद सिंह ‘आजाद’ ने जनरल डायर और ओडवायर पर गोलियां चलाईं. उस समय वे कैंग्सटन हौल में भारत में उभरी स्थिति पर भाषण दे रही थे. जनरल डायर की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई. ओडवायर गोलियों से हताहत हो गए हैं.’ उस पर मुकदमा चला और उसे सजा ए मौत मिली.
मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ था. काली रात और भी स्याह होती जा रही थी. तभी उस में एक रोशनी उभर आई और एक चेहरे में बदल गई. वह था उधम का चेहरा… देश का बेटा या गुंडा, इनकलाबी या चारसौबीस… उस की याद के कई पन्ने मेरे सामने पलटने लगे. मगर उस का चेहरा मुसकरा रहा था. अदालत के कटघरे में खड़ा वह अपनी वकालत कर रहा था.
‘‘तुम ने गोली क्यों चलाई?’’ जज ने पूछा.
वह कड़क कर बोला, ‘‘हजारों बेगुनाहों और निहत्थों से भी क्या किसी ने ऐसे पूछा था?’’
‘‘जानते हो तुम्हारे जुर्म की सजा फांसी होगी?’’
‘‘हां, बहुत अच्छी तरह जानता हूं,’’ तुम्हारी अदालत में एक अंगरेज को मारने की सजा मौत है और हजारों हिंदुस्तानियों को मारने का इनाम शाबाशी.’’
‘‘उन्होंने सरकार का हुक्म पूरा किया था, यह उन का कर्तव्य था. हमारी अदालत तुम्हें फांसी की सजा देगी.’’
‘‘मौत का डरावा मुझे मत दीजिए, जजसाहब. आप जो चाहें कर सकते हैं. मैं ने भी अपने देश का एक काम पूरा किया है जो मेरा कर्तव्य था. मेरी पार्टी की अदालत ने भी उन्हें गोलियों की सजा दी थी. सजा देने का यह काम मुझे सौंपा गया था. मगर मुझे दुख है कि ओडवायर छूट गया. फिर भी कोई बात नहीं. मेरा कोईर् और भाई उसे भी पार लगा देगा. उस से कहना कि तैयार रहे.’’ जज ने कलम उठा कर सजा का फौर्म भरा और मेज पर कलम मार कर निब तोड़ दी. तभी मैं ने उसे सींखचों में खड़ा देखा. मैं उस से बात कर रहा था.
‘‘यह तुम ने क्या किया, उधमा?’’
‘‘मैं ने अपने देशवासियों की निर्मम मौत का बदला लिया है.’’
‘‘मगर तुम तो यहां शादी करने आए थे?’’
वह जोर से हंसा, ‘‘तुम्हें बरात में नहीं बुलाया, सद्दा, इसलिए. तुम्हें पता नहीं मेरी शादी तो हो गई, अब तो कुछ दिन में मेरी सुहागरात आने वाली है. तुम्हें शादी में बुला नहीं सका.’’ मेरी आंखों में आंसू उभर आए. तभी समय पूरा होने की घंटी खनखना गई. अपने आंसू छिपाने के लिए मैं लौट पड़ा. वह बोला, ‘‘अच्छा, अलविदा, सद्दा. देखो, मेरे लिए रोना नहीं,’’ और वह लय के साथ कुछ गुनगुनाने लगा.
आज उस लय को याद करता हूं तो लगता है, बिलकुल इन शब्दों की तान थीं, ‘मेरा रंग दे बसंती चोला…’
देखतेदेखते कालोनी के सारे प्लौट बिक गए. सब तरफ नएनए डिजाइन और स्टाइल की कोठियां बन गईं. छोटेमोटे कामधंधे करने वालों को भी नई कालोनी में रोजगार के नएनए मौके मिलने लगे. शाम को घूमतेफिरते मुंह का जायका या टेस्ट देने वाले कई स्टौल, छोटीमोटी दुकानें जैसे गोलगप्पे वाला, टिक्कीभल्ले वाला, मलाई कुलफी वाला, छोलेभटूरे व कुलचे बेचने वाला, शिकंजी वाला, मैंगो शेक बनाने वाला भी अपनाअपना ठिकाना बना कर वहां जम गया था.
जयकिशन 24 साल का था. तमाम उस्तादों की शागिर्दी में वह कई काम सीख चुका था और कई नौकरियां भी कर चुका था. अब वह खुद का धंधा शुरू कर के अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था.
जयकिशन ने इरादा किया कि बर्गर, डोसा वगैरह का धंधा शुरू किया जाए. मगर इस नई पौश कालोनी में कहीं भी कोई छोटी दुकान खाली नहीं थी. अब वह कहां से काम शुरू करे?
उस ने सोचा कि पहले एक रेहड़ी पर धंधा शुरू किया जाए. जब काम जम जाएगा, तब अपना ठिकाना बना लेगा.
मगर रेहड़ी कहां लगाए? कहां खड़ी करे? ऐसे सवाल जयकिशन के जेहन में घूम रहे थे. तभी उस को पता चला कि गोलगप्पे, चाटपापड़ी, जूस वगैरह की रेहडि़यां लगाने वाले कई लोग किसी खाली प्लौट के मालिक को रोजाना या महीने पर पैसे चुका कर अपना धंधा चला रहे थे.
जयकिशन को भी ऐसी कोई जगह मिल सकती थी. उस ने कई दिन पैदल, मोटरसाइकिल पर सारी कालोनी के चक्कर काटे. एक कोठी के बाहर चारदीवारी के साथ एक पक्का चबूतरा था. वहां रेहड़ी लग सकती थी. लिहाजा, कोठी के मालिक से सब तय हो गया.
अगले दिन से जयकिशन की रेहड़ी लग गई. माल की क्वालिटी और स्वाद काफी अच्छा था, इसलिए थोड़े ही दिनों में जयकिशन मशहूर हो गया. सारी कालोनी के अलावा दूरदूर से भी लड़केलड़कियां मोटरसाइकिल, स्कूटर या स्कूटी पर सारा दिन, खासकर शाम के समय उस के पास आने लगे.
जयकिशन और उस के साथ काम करने वाले लोग सारा दिन बर्गर, डोसा वगैरह बनाते रहते थे.
ग्राहकों में शरारती नौजवान ज्यादा थे, जिन का काम शाम के समय नईनई मोटरसाइकिलों पर अपने दोस्तों के साथ मटरगश्ती करना था.
उस पौश कालोनी में अनेक परिवार आ गए थे, जिन के यहां जवान बेटियां या बहनें थीं. इन लड़कियों को ताकने के लिए ऐसे लड़के मंडराते रहते थे.
जिस कोठी के बाहर जयकिशन की रेहड़ी लगी थी, उस के साथ वाली कोठी कालेज के एक प्रोफैसर मल्होत्रा साहब की थी. उन की 2 जवान बेटियां थीं. उन लड़कियों का घर से बाहर निकलना, आनाजाना लगा रहता था.
वे सुबह 8 बजे कालेज जाती थीं और दोपहर को लौटती थीं. जब तक जयकिशन की रेहड़ी नहीं लगी थी, तब तक कोई दिक्कत नहीं थी. मगर अब घर में घुसने पर रेहड़ी के आसपास खड़े आवारा अमीरजादों की निगाहों का उन्हें सामना करना पड़ता.
अब देर शाम तक इस तरह की निगाहें कोठी की तरफ लगी रहती थीं. अब उन लड़कियों का घर से बाहर निकलना, छत पर खड़े होना भी मुश्किल हो गया था.
धीरेधीरे यह समस्या बेटियों के बिना बताए प्रोफैसर साहब और उन की पत्नी की निगाहों में भी आ गई.
प्रोफैसर साहब तजरबेकार थे. वे जानते थे कि बिगड़ैल अमीरजादों से निबटना आसान न था. उन से उल?ाना महंगा पड़ सकता था. अब क्या करें?
जहां तक कोठी के मालिक की बात थी, तो उस से बात करना बेकार था. वह नयानया पैसे वाला था. गांव में उस की कई एकड़ जमीन थी, जिस की कीमत बहुत बढ़ जाने से एक हिस्सा बेच कर उस ने वह कोठी बनाई थी.
करोड़पति बन जाने पर भी उस आदमी की सोच ओछी ही थी. 5-6 हजार की आमदनी महज कोठी के बाहर रेहड़ी खड़ी करने के एवज में मिलना उस के लिए बहुत बड़ी बात थी. इस से आसपड़ोस की बहूबेटियों को क्या परेशानी होती थी, उस को यह सम?ाना बेकार था.
मल्होत्रा साहब सोच में थे. समस्या थी तो समाधान भी होना चाहिए. मगर क्या समाधान था? यारदोस्तों, दूसरे प्रोफैसरों से सलाह की. किसी की सलाह थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दो. किसी ने कहा कि कलक्टर को अर्जी दे दो या फिर सैनिटरी अफसरों को जयकिशन के सामान का सैंपल या नमूना भरवा दो.
कुछ ने सु?ाव दिया कि गुंडेबदमाशों को पैसे दे कर इसे पिटवा कर यहां से भगा दो या किसी नेताजी को कह कर इस को हटाने का आदेश करवा दो.
एक रेहड़ी वाले को हटाना था, मगर इतनी परेशानी? पुराना जमाना होता, तो वह यहां रेहड़ी लगाता ही नहीं. लेकिन अब क्या करें?
एक प्रोफैसर की थाने के एसएचओ से जानपहचान थी. एसएचओ ने तसल्ली से समस्या सुनी और कहा, ‘‘मल्होत्रा साहब, आप जैसी समस्या अब हर किसी की समस्या है. हमारी समस्या है कि अब जमाना बहुत बदल गया है. पहले एक सिपाही का भी रोब पड़ता था, पर अब एसएचओ तो क्या एसपी को भी कोई नहीं मानता.
‘‘फिर बिना कोई सुबूत हासिल किए कुछ नहीं होता. जब तक आप किसी के खिलाफ छेड़खानी या बदमाशी करने का मामला नहीं दर्ज कराते, तब तक हम कुछ नहीं कर सकते.’’
मल्होत्रा साहब चुपचाप वहां से चले आए. एसएचओ ने एक सिपाही को वहां तैनात कर दिया, खुद भी जीप में आ कर हालात का जायजा लिया. गैरकानूनी तौर पर कुछ नहीं था, ताकने या घूरने की समस्या हर जगह थी.
थोड़े दिनों के बाद एक और प्रोफैसर की एसडीएम से जानपहचान निकल आई. मगर शांति भंग करने में घूरना या ताकना नहीं आता था, इसलिए कुछ खास न हुआ.
स्वास्थ्य विभाग में जानपहचान निकाल कर नमूना यानी सैंपल दिया गया, मगर जयकिशन भी पूरा चालू था. उस ने अफसरों की मुट्ठी गरम कर नमूना पास करवा लिया. प्रोफैसर साहब की यह चाल भी बेकार गई.
अब क्या करें? क्या गुंडेबदमाशों से पिटवाएं? यह तरीका खतरनाक था. गुंडेबदमाश अगर आने के पैसे लेते थे, तो जाने के पैसे भी लेते थे और फिर न आने के भी पैसे लेते थे. साथ में, पता नहीं और क्याक्या लेते. 2 बेटियों के शरीफ चश्माधारी बाप के लिए यह उपाय भी बेकार था.
अब आखिरी उपाय यही था कि किसी नेताजी की शरण में जाएं. प्रोफैसर साहब किसी नेताजी में और किसी बदमाश में कोई फर्क नहीं सम?ाते थे. अब वे क्या करें? वे चुपचाप अपने कमरे में बैठे सोच में डूबे थे.
घर पर बरतन मांजने के लिए महरी और ?ाड़ूपोंछा लगाने के लिए एक जमादारनी भी आती थी. वे दोनों ही
बूढ़ी थीं. यह समस्या उन दोनों को भी पता चली.
‘‘बहूजी, आप चिंता न करें. 2-4 दिनों में यह रेहड़ी यहां से हट जाएगी,’’ जमादारनी ने प्रोफैसर की पत्नी से मजबूती से कहा.
अगले दिन की दोपहर को नगरनिगम की ट्रैक्टरट्रौली, जो सारे शहर से कूड़ाकरकट उठाती थी, जयकिशन की रेहड़ी के सामने रुकी.
4 जमादारों ने ढेर सारा बदबू मारता कूड़ा रेहड़ी के सामने डाल दिया. नतीजतन, सारे ग्राहक बदबू से परेशान हो गए. सुबह जमादार कूड़ा उठा ले गया, लेकिन शाम को वे फिर डाल गए. यह सिलसिला 4-5 दिनों तक चला.
जयकिशन कमेटी में शिकायत करने गया. सैनिटरी इंस्पैक्टर को जमादारनी ने बहूबेटियों का वास्ता दे कर सब सम?ा दिया था. लिहाजा, उस इंस्पैक्टर ने जयकिशन को भगा दिया.
बदबू में खानेपीने कौन आता? जयकिशन का धंधा चौपट हो गया. वह रेहड़ी हटा कर चला गया.
जो समस्या किसी बड़े साहब के हुक्म से न सुल?ा पाई, उसे एक जमादारनी ने हल कर दिया.
पोस्ट मास्टर ने डाकिए रामजी पांडे को बुलाया और कहा, ‘‘आज से आप को इलाका नंबर 25 में चिट्ठियां बांटनी होंगी. उस इलाके का डाकिया जयदीप छुट्टी पर गया है.’’
इलाका नंबर 25 का नाम सुनते ही डाकिए रामजी पांडे को झटका लगा, क्योंकि उस पूरे इलाके में कोठेवालियां रहती हैं.
रामजी पांडे बेमन से अपने इलाके में जाने के लिए चिट्ठियों को थैले में रखने लगा. इस के बाद वह उस इलाके की तरफ चल पड़ा.
वह महल्ला कच्चेपक्के मकानों का था. पतली और संकरी गलियां थीं. नुक्कड़ पर पान की दुकान थी, जहां रसिक लोग पान खाते नजर आते थे.
रामजी पांडे गली में एक मकान के पास रुका. मकान पर नामपट्टी लगी थी, ‘रंजूबाई’.
रामजी पांडे ने पुकारा, ‘‘रंजूबाई, आप की चिट्ठी आई है.’’
थोड़ी देर बाद एक खूबसूरत तवायफ ने दरवाजा खोला, ‘‘अरे, डाक बाबू… मेरी चिट्ठी है? कहां से आई है?’’
‘‘शेरपुर से,’’ रामजी पांडे ने कहा.
‘‘अंदर आ जाओ और पढ़ कर सुना दो,’’ रंजूबाई ने कहा.
रामजी पांडे ने भीतर जा कर उस तवायफ को चिट्ठी पढ़ कर सुना दी.
‘‘एक चिट्ठी थी… इसे आप अपने साथ ले जाएं,’’ रंजूबाई ने कहा.
रामजी पांडे ने वह चिट्ठी डाकघर में छोड़ने के लिए ले ली.
यह काम अकसर डाकियों को करना होता था. वजह, तवायफें कोठे से बाहर जो नहीं निकलती थीं.
उस तवायफ के कमरे में फर्श पर दरी बिछी थी. कोने में हारमोनियम और तबला रखा था. दीवार पर 2-3 जोड़ी घुंघरुओं वाली पाजेब टंगी थीं. दरवाजे और खिड़कियों पर रेशमी परदे हवा के ?ोंके से ?ाल रहे थे.
तभी रंजूबाई ने शरबत का गिलास रामजी पांडे के हाथों में थमा दिया.
रंजूबाई की खूबसूरती ने रामजी पांडे को एकटक निहारने पर मजबूर कर दिया.
‘‘ये 2 हजार रुपए इस पते पर भेज दीजिएगा,’’ रंजूबाई ने कहा.
‘‘जी, मैं भेज दूंगा,’’ कह कर रामजी पांडे वहां से चला गया.
धीरेधीरे रामजी पांडे रंजूबाई के हुस्न का मुरीद बन गया.
‘‘रंजूबाई, यह मनीऔर्डर की रसीद रख लो,’’ रामजी पांडे ने कहा.
‘‘डाक बाबू, आज तो तुम बड़े छैलछबीले लग रहे हो,’’ रंजूबाई बोली.
‘‘तुम्हारे हुस्न के आगे मैं कुछ भी नहीं,’’ रामजी पांडे ने प्यार जताया.
‘‘जाओ डाक बाबू, यह भी कोई बात हुई,’’ रंजूबाई ने इठला कर कहा.
‘‘बिलकुल सच, मेरे दिल में ?ांक कर तो देख लो,’’ रामजी पांडे ने कहा.
यह सुन कर रंजूबाई के होंठों पर प्यार भरी मुसकान खिल उठी.
‘‘डाक बाबू, कल लिफाफा लेते आना. एक चिट्ठी भेजनी है.’’
‘‘ठीक है,’’ कह कर रामजी पांडे कोठे से बाहर निकल गया.
दूसरे दिन तेज हवाएं चल रही थीं. दरवाजे पर रामजी पांडे ने आवाज लगाई, ‘‘रंजूबाई, यह लो लिफाफा.’’
‘‘डाक बाबू अंदर आ जाओ. बाहर तेज हवाएं चल रही हैं,’’ रंजूबाई बोली.
रामजी पांडे मौसम का लुत्फ उठाता हुआ बोला, ‘‘रंजूबाई, कुदरत ने तुम्हें बेपनाह हुस्न से नवाजा है.’’
‘‘यह हुस्न तो आप की चाहत का दीवाना है,’’ रंजूबाई ने कहा.
इतना सुन कर रामजी पांडे रंजूबाई का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘मेरा दिल तुम्हें पाने को बेकरार है.’’
इतना कह कर उस ने रंजूबाई के नाजुक होंठों को चूम लिया. वह भी रामजी पांडे की बांहों में सिमट गई.
इस के बाद तो जैसे रंजूबाई की जिंदगी में बहार आ गई थी, क्योंकि सालों से उसे जिस हमसफर की तलाश थी, वह उसे मिल गया था.
रामजी पांडे एक ब्राह्मण का बेटा था और रंजूबाई एक तवायफ थी. लेकिन उस ने दकियानूसी समाज को धता बता कर मुहब्बत की खिलाफत में उठने वाली सारी ऊंचीऊंची दीवारें गिरा दी थीं.
प्यार का सिलसिला चल निकला. अब रामजी पांडे को हरदम रंजूबाई का खयाल रहने लगा. वह डाकघर का काम खत्म कर के उस के कोठे पर जाना नहीं भूलता था.
‘‘रंजूबाई, आज बहुत खूबसूरत लग रही हो. मु?ो सरेआम लूटने का इरादा है क्या?’’ रामजी पांडे ने उसे बांहों में भरते हुए कहा.
वह उस की बांहों में कसमसाती हुई बोली, ‘‘रामजी, मु?ो जीने का मकसद मिल गया है. मेरे जिस्म में प्यार की प्यास भड़क उठी है.’’
इस के बाद दोनों जवानी की हद पार करते हुए दो जिस्म एक जान हो गए थे.
एक दिन डाकघर का काम खत्म करने के बाद रामजी पांडे शाम को रंजूबाई के कोठे पर आया. रंजूबाई ने आज गजब का मेकअप किया था. जब उस ने देखा, तो देखता ही रह गया.
‘‘रंजूबाई, आज तो तुम्हारे साथ कोठे से बाहर घूमने का इरादा है,’’ रामजी पांडे ने अपने मन की बात कह दी.
‘‘चलो, चलते हैं कहीं,’’ रंजूबाई ने कहा.
वे दोनों बातें करते हुए बाजार में घूम रहे थे कि अचानक रंजूबाई का हाथ एक शख्स ने पकड़ लिया.
रंजूबाई चौंक उठी, ‘‘अरे, यह तो राजू है. इस शहर का नामी बदमाश.’’
‘‘कोठे पर तो बहुत नाच ली. अब चल मेरे साथ. आज की रात मैं तेरे संग रंगीन कर लूं,’’ राजू ने बेशर्मी से कहा.
तभी रामजी पांडे ने राजू की बांह पकड़ कर एक जोर का ?ाटका दिया.
‘‘रास्ता चलते मेरी बीवी को छेड़ता है,’’ रामजी पांडे ने कहा.
रंजूबाई का हाथ ?ाटके से छूट गया. राजू गुर्राया, ‘‘अच्छा, एक तवायफ तेरी बीवी हो गई. खबरदार, आज के बाद कभी इस के साथ दिखा, तो मैं तु?ो जान से मार दूंगा.’’
राजू धमकी दे कर चला गया. रामजी पांडे खून का घूंट पी कर रह गया. रंजूबाई बेहद डर गई.
‘‘रामजी, यह गुंडा इस शहर में हम लोगों को जीने नहीं देगा. मु?ो किसी दूसरे शहर में ले चलो,’’ रंजूबाई ने घबराई हुई आवाज में कहा.
दोनों एकदूसरे का हाथ थामे एक मंदिर में आ गए थे. मंदिर में रामजी पांडे ने रंजूबाई की मांग एक चुटकी सिंदूर से भर दी थी. उस ने एक ही पल में जमाने की सारी दीवारें गिरा दी थीं.
कुछ ही दिनों में रामजी पांडे ने अपना तबादला दूसरे शहर में करा लिया और वह रंजूबाई को वहां ले गया.