एक रिश्ता किताब का: भाग 1

‘‘बीमार हो तुम, इलाज कराओ अपना. तुम तो इनसान ही नहीं लगते हो मुझे…’’

‘‘तो क्या मैं जानवर हूं?’’

‘‘शायद जानवर भी नहीं हो. जानवर को भी अपने मालिक पर कम से कम भरोसा तो होता है…उसे पता होता है कि उस का मालिक उस से प्यार करता है तभी तो खाना देने में देरसवेर हो जाए तो उसे काटने को नहीं दौड़ता, जैसे तुम दौड़ते हो.’’

‘‘मैं काटने को दौड़ता हूं तुम्हें? अरे, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं.’’

‘‘मत करो मुझ से प्यार…मुझे ऐसा प्यार नहीं चाहिए जिसे निभाने में मेरा दम ही घुट जाए. मेरी एकएक सांस पर तुम ने पहरा लगा रखा है. क्या मैं बेजान गुडि़या हूं जिस की अपनी कोई पसंदनापसंद नहीं. तुम हंसो तो मैं हंसू, तुम नाचो तो मैं नाचूं…हद होती है हर चीज की…तुम सामान्य नहीं हो सोमेश, तुम बीमार हो, कृपा कर के तुम किसी समझदार मनोचिकित्सक को दिखाओ.’’

ये भी पढ़ें- एक तीर दो शिकार: भाग 2

ऐसा लग रहा था मुझे जैसे मेरे पूरे शरीर का रक्त मेरी कनपटियों में समा कर उन्हें फाड़ने जा रहा है. आवेश में मेरे हाथपैर कांपने लगे. मैं जो कह रही थी वह मेरी सहनशक्ति समाप्त हो जाने का ही नतीजा था. कोई इस सीमा तक भी स्वार्थी और आधिपत्य जताने वाला हो सकता है मेरी कल्पना से भी परे था. ऐसा क्या हो गया जो सोमेश ने मेरी पसंद की उस किताब को आग ही लगा दी. वह किताब जिसे मैं पिछले 1 साल से ढूंढ़ रही थी. आज सुबह ही मुझे सोमेश ने बताया था कि शाम 4 बजे वह मुझ से मिलने आएगा. 4 से 5 तक मैं उस का इंतजार करती रही, हार कर पास वाली किताबों की दुकान में चली गई.

समय का पाबंद सोमेश कभी नहीं होता और अपनी जरूरत और इच्छा के अनुसार फैसला बदल लेना या देरसवेर करना उस की आदत है, जिसे पिछले 4 महीने से मैं महसूस भी कर रही हूं और मन ही मन परेशान भी हो रही हूं यह सोच कर कि कैसे इस उलझे हुए व्यक्ति के साथ पूरी उम्र गुजार पाऊंगी.

कुछ समय बीत गया दुकान में और सहसा मुझे वह किताब नजर आ गई जिसे मैं बहुत समय से ढूंढ़ रही थी. किताब खरीद कर मैं बाहर चली आई और उसी कोने में सोमेश को भुनभुनाते हुए पाया. इस से पहले कि मैं किताब मिल जाने की खुशी उस पर जाहिर करूं उस ने किताब मेरे हाथ से छीन ली और जेब से लाइटर निकाल यह कहते हुए उसे आग लगा दी, ‘‘इसी की वजह से मुझे यहां इंतजार करना पड़ा न.’’

10 मिनट इंतजार नहीं कर पाया सोमेश और मैं जो पूरे घंटे भर से यहां खड़ी थी जिसे हर आताजाता घूर रहा था. अपनी वजह से मुझे परेशान करना जो अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और अपनी जरा सी परेशानी का यह आलम कि उस वजह को आग ही लगा दी.

अवाक् रह गया सोमेश मुझे चीखते देख कर जिसे पुन: हर आताजाता रुक कर देख भी रहा था और सुन भी रहा था. मेरा तमाशा बनाने वाला अपना भी तमाशा बनना सह नहीं पाया और झट से मेरी बांह पकड़ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ने का प्रयास करने लगा.

ये भी पढ़ें- ऐसी मांगने वालियों से तोबा: भाग 2

‘‘बस, सोमेश, अब और नहीं,’’ इतना कह कर मैं ने अपना हाथ खींच लिया और मैं ने सामने खड़े रिकशा को इशारा किया.

रिकशा पर बैठ गई मैं. सोमेश के चेहरे के उड़ते रंग और उस के पैरों के पास पड़ी धूधू कर जलती मेरी प्रिय किताब इतना संकेत अवश्य दे गई मुझे कि सोमेश सामान्य नहीं है. उस के साथ नहीं जी पाऊंगी मैं.

पापा के दोस्त का बेटा है सोमेश और उसे मैं इतनी पसंद आ गई थी कि सोमेश के पिता ने हाथ पसार कर मुझे मांग लिया था जबकि सचाई यह थी कि सोमेश की हैसियत हम से कहीं ज्यादा थी. लाखों का दहेज मिल सकता था उसे जो शायद यहां नहीं मिलता क्योंकि मैं हर महीने इतना कमा रही थी कि हर महीने किस्त दर किस्त दहेज उस घर में जाता.

मैं ही दहेज के विरुद्ध थी जिस पर उस के पिता भारी मन से ही राजी हुए थे. बेटे की जिद थी जिस पर उन का लाखों का नुकसान होने वाला था.

‘‘मेरे बेटे में यही तो कमी है, यह जिद्दी बहुत है…और मेरी सब से बड़ी कमजोरी है मेरा बेटा. आज तक इस ने जिस भी चीज पर हाथ रखा मैं ने इनकार नहीं किया…बड़े नाजों से पाला है मैं ने इसे बेटी. तुम इस रिश्ते से इनकार मत करो.’’

दिमाग भन्ना गया मेरा. मैं ने बारीबारी से अपने मांबाप का चेहरा देखा. वे भी परेशान थे मेरे इस निर्णय पर. शादी की सारी तैयारी हो चुकी थी.

‘‘मैं तुम्हारे लिए वे सारी किताबें लाऊंगा शुभा बेटी जो तुम चाहोगी…’’ हाथ जोड़ता हूं मैं. शादी से इनकार हो गया तो मेरा बेटा पागल हो जाएगा.’’

‘‘आप का बेटा पागल ही है चाचाजी, आप समझते क्यों नहीं? सवाल किताबों का नहीं, किताबें तो मैं भी खरीद सकती हूं, सवाल इस बात का है कि सोमेश ने ऐसा किया ही क्यों? क्या उस ने मुझे भी कोई खिलौना ही मान लिया था कि उस ने मांगा और आप ने लाखों का दहेज ठुकरा कर भी मेरा हाथ मांग लिया…सच तो यही है कि उस की हर जायजनाजायज मांग मानमान कर ही आप ने उस की मनोवृत्ति ऐसी स्वार्थी बना दी है कि अपनी खुशी के सामने उसे सब की खुशी बेतुकी लगती है. बेजान चीजें बच्चे की झोली में डाल देना अलग बात है, आज टूट गई कल नई भी आ सकती है. लेकिन माफ कीजिए, मैं बेजान खिलौना नहीं जो आप के बच्चे के लिए शहीद हो जाऊं.

ये भी पढ़ें- मां का साहस: भाग 2

‘‘हाथ क्यों जोड़ते हैं मेरे सामने. क्यों अपने बेटे के जुनून को हवा दे रहे हैं. आप रोकिए उसे और अपनेआप को भी. सोमेश का दिमाग संतुलित नहीं है. कृपया आप इस सत्य को समझने की कोशिश कीजिए…’’

‘‘मैं कुछ भी समझना नहीं चाहता. मुझे तो बस मेरे बच्चे की खुशी चाहिए और तुम ने शादी से इनकार कर दिया तो वह पागल हो जाएगा. वह बहुत प्यार करता है तुम से.’’

मन कांप रहा था मेरा. क्या कहूं मैं इस पिता समान इनसान से? अपनी संतान के मोह में वह इतना अंधा हो चुका है कि पराई संतान का सुखदुख भी उसे नजर नहीं आ रहा.

‘‘अगर शुभा ऐसा चाहती है तो तुम ही क्यों नहीं मान जाते?’’ पापा ने सवाल किया जिस पर सोमेश के पिता तिलमिला से गए.

‘‘तुम भी अपनी बेटी की बोली बोलने लगे हो.’’

‘‘मैं ने भी अपनी बच्ची बड़े लाड़प्यार से पाली है, जगदीश. माना मेरे पास तुम्हारी तरह करोड़ों की विरासत नहीं है, लेकिन इतना भूखा भी नहीं हूं जो अपनी बच्ची को पालपोस कर कुएं में धकेल दूं. शादी की तैयारी में मेरा भी तो लाखों खर्च हो चुका है. अब मैं खर्च का हिसाब तो नहीं करूंगा न…जब बेटी का भविष्य ही प्रश्नचिह्न बन सामने खड़ा होगा…चलो, मैं साथ चलता हूं. सोमेश को किसी मनोचिकित्सक को दिखा लेते हैं.’’

सोमेश के पिता माने नहीं और दनदनाते हुए चले गए.

‘‘कहीं हमारे हाथों किसी का दिल तो नहीं टूट रहा, शुभा? कहीं कोई अन्याय तो नहीं हो रहा?’’ मां ने धीरे से पूछा, ‘‘सोमेश बहुत प्यार करता है तुम से.’’

ये भी पढ़ें- मां का साहस: भाग 1

‘‘मां, पहली नजर में ही उसे मुझ से प्यार हो गया, समझ नहीं पाई थी मैं. न पहले देखा था कभी और न ही मेरे बारे में कुछ जानता था…चलो, माना… हो गया. अब क्या वह मेरी सोच का भी मालिक हो गया? मां, इतना समय मैं चुप रही तो इसलिए कि मैं भी यही मानती रही, यह उस का प्यार ही है जो कोई मुझे देख रहा हो तो उसे सहन ही नहीं होता. एक दिन रेस्तरां में मेरे एक सहयोगी मिल गए तो उन्हीं के बारे में हजार सवाल करने लगा और फिर न मुझे खाने दिया न खुद खाया. वजह सिर्फ यह कि उन्होंने मुझ से बात ही क्यों की. उस में समझदारी नाम की कोई चीज ही नहीं है मां. अपनी जरा सी इच्छा का मान रखने के लिए वह मुझे चरित्रहीन भी समझने लगता है…मेरी नजरों पर पहरा, मैं ने उधर क्यों देखा, मैं ने पीछे क्यों देखा, कभीकभी तो मुझे अपने बारे में भी शक होने लगता है कि क्या सच में मैं अच्छी लड़की नहीं हूं…’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

ऐसी मांगने वालियों से तोबा: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- ऐसी मांगने वालियों से तौबा: भाग 1

लेखिका- विभावरी सिन्हा

मैं ठंडी पड़ गई, ‘‘हांहां, क्यों नहीं?’’

थोड़े से मालपुए बचे थे. कुछ निकाल कर मैं ने उन्हें दिए.

‘‘नहीं, नीराजी, मैं तो बस थोड़ा सा चख लूंगी,’’ यह कह कर उन्होंने पूरा खाना खाया. फिर बोलीं, ‘‘वाह, बहुत स्वादिष्ठ हैं. अभी मैं बच्चों को बुला कर लाती हूं. वे भी थोड़ा चख लेंगे. फिर रात को पूरा खाना खाने हम लोग आएंगे’’

मेरी आंखों के आगे तो पूरी पृथ्वी घूम गई. अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाई थी कि वह सपरिवार चहकते हुए आ पहुंचीं. साथ में फफूंदी लगा आम का मरियल सा अचार एक छोटी कटोरी में था. पति व बिटिया मेहमानों को छोड़ने बस अड्डे गए थे. सोचा, आज हमारा उपवास ही सही. किसी तरह लड़खड़ाते कदमों से रसोई की ओर बढ़ी.

पर उस से पहले मधुरिमा ने कहा, ‘‘आप बैठिए, नीराजी. थक गई होंगी. मैं निकाल लेती हूं.’’

मेरे मना करतेकरते उन्होंने सारी बचीखुची रसद निकाल कर बाहर की और सब लोग चखने बैठ गए.

मेरे हाथ में अचार की कटोरी थी और मैं मन ही मन सुलग रही थी. सोचा, कटोरी कूड़ेदान में फेंक दूं. खैर, सब लोग रात में खाना खाने का वादा कर के जल्दी ही मेरे पुए चख कर चले गए. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचा था.

ये भी पढ़ें- मां का साहस: भाग 1

पति के आने पर मैं ने सारी बातें कहीं. वह भी बहुत दिनों से इसी समस्या पर विचार कर रहे थे. पहले तो उन्होंने मेरी बेवकूफी पर मेरी ख्ंिचाई की. फिर होटल से ला कर खाना खाया. शाम तक वह कुछ विचार करते रहे और फिर रात में खुश हो कर मधुरिमा के आने से पहले ही हमें सैर कराने ले गए. बाहर ही हम ने खाना खा लिया. उन्होंने 10 दिन की छुट्टी ली. मैं ने कारण पूछा तो बोले कि समय पर सब जान जाओगी. मैं मूक- दर्शक बन कर अगली खतरे की घंटी का इंतजार करने लगी.

दूसरे दिन सुबह ही मधुरिमा अपनी चिरपरिचित मुद्रा में खड़ी हो गईं. मैं तो पहले ही अंदर छिप चुकी थी. आज मेरे पति ने मोरचा संभाला था.

‘‘अरे, भाई साहब, आप? नीराजी किधर गईं?’’

‘‘वह तो अपनी सहेली के घर गई हैं. मुझ से कह गई हैं कि आप के आने पर जो कुछ भी चाहिए आप को मैं दे दूं. बोलिए, क्या चाहती हैं आप?’’

मधुरिमा सकपका गईं. अपने जीवन में शायद पहली बार उन को इस तरह की बातों का सामना करना पड़ रहा था. वह रुकरुक कर बोलीं, ‘‘बात यह है, भाई साहब कि आज पिंकू के सिर में दर्द है. मैं तो खुद बाजार नहीं जा सकती. मिट्टी का तेल भी खत्म हो गया है. सोचा, आप से मांग लूं. मैं कनस्तर ले कर आई हूं. 4 लिटर दे दीजिए.’’

‘‘देखिए, मधुरिमाजी, मैं अभी बाजार जा रहा हूं. आप पैसे दे दें. मैं अभी तेल ले आता हूं. मेरा भी खत्म हो चुका है,’’ मेरे पति ने हंस कर कहा.

अब तो मधुरिमा को काटो तो खून नहीं. मरियल आवाज में बोलीं, ‘‘रहने दीजिए, फिर कभी मंगवा लूंगी. अभी तो मुझे कहीं जाना है,’’ यह कह कर वह तेजी से चली गईं. मैं छिप कर देख रही थी और हंसहंस कर लोटपोट हो रही थी.

3-4 दिन चैन से गुजरे. मेरे वे 200 रुपए तो कभी लौटे नहीं. लेकिन खैर, एक घटना के बाद मुझे हमेशा के लिए शांति मिल गई. एक दिन सुबहसुबह फिर वह मुझे खोजती हुई सीधे मेरे कमरे में पहुंचीं. पर मैं तो पहले ही खतरे की घंटी सुन कर भंडारगृह में छिप गई थी. वह निराश हो कर वहीं बैठ गईं. मेरे पति ने अंदर आ कर उन को नमस्ते की और आने का कारण पूछा.

मधुरिमा ने सकपका कर कहा, ‘‘भाई साहब, नीराजी को बुला दीजिए. यह बात उन्हीं से कहनी थी.’’

ये भी पढ़ें- एक तीर दो शिकार: भाग 1

‘‘मधुरिमाजी, आप को मालूम नहीं, नीरा की बहन को लड़का हुआ है. इसलिए वह तड़के ही उठ कर शाहदरा अपनी बहन के पास गई हैं. अब तो कल ही लौटेंगी आप मुझ से ही अपनी समस्या कहिए.’’

पहले तो वह घबराईं. फिर कुछ सहज हो कर कहा, ‘‘भाई साहब, मेरे पति आप की बहुत तारीफ कर रहे थे. सचमुच आप जैसा पड़ोसी मिलना मुश्किल है.’’

‘‘यह तो आप का बड़प्पन है.’’

‘‘नहींनहीं, सचमुच नीराजी भी बहुत अच्छी हैं. मेरे घर में तो सभी उन से बहुत प्रभावित हैं. इतना अच्छा स्वभाव तो कम ही देखनेसुनने को मिलता है.’’

मेरे पति आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे और सोच रहे थे कि क्या यही बात इन को कहनी थी.

फिर मधुरिमा ने वाणी में मिठास घोल कर कहा, ‘‘भाई साहब, जब तक नीराजी नहीं आती हैं, मैं आप का खाना बना दिया करूंगी.’’

‘‘जी शुक्रिया, खाना तो मैं खुद भी बना लेता हूं.’’

इस के बाद 1 घंटे तक वह भूमिका बांधती रहीं. पर असली बात बोलने का साहस ही नहीं कर पा रही थीं. अंत में उन्होंने मेरे पति से विदा मांगी. पर जैसे ही पति ने दरवाजा बंद करना चाहा, वह अचानक बोल पड़ीं, ‘‘भाई साहब, 50 रुपए यदि खुले हों तो दे दीजिए.’’

‘‘अच्छा तो रुपए चाहिए थे. आप को पहले कहना चाहिए था. मैं आप को 50 के बदले 100 रुपए दे देता. पर आप ने मेरा समय क्यों बरबाद किया? खैर, कोई बात नहीं,’’ मेरे पति ने जल्दी से पर्स खोल कर 150 रुपए निकाले और कहा, ‘‘मैं आप को 150 रुपए दे रहा हं. मुझे वापस भी नहीं चाहिए. पर कृपया, हमारा समय बरबाद न किया करें.’’

मधुरिमा खिसियानी बिल्ली की तरह दरवाजे की लकड़ी को टटोलने लगीं.

‘‘भाई साहब, इतने रुपए देने की क्या जरूरत थी. मुझे तो बस…’’

‘‘नहींनहीं, मधुरिमाजी, आप सब ले जाइए. मैं खुशी से दे रहा हूं. हां, कल मैं आप के घर खाना खाने आ रहा हूं. नीरा ने कहा था कल आप छोले बनाने वाली हैं. सचमुच आप बहुत स्वादिष्ठ छोले बनाती हैं. यहां से प्याज, अदरक आप खुशी से ले जा सकती हैं.’’

ये भी पढ़ें- बुद्धि का इस्तेमाल: भाग 2

‘‘नहीं, भाई साहब, ऐसी कोई बात नहीं. कल ही तो स्वादिष्ठ खीर बनाई थी, पर बच्चों ने सारी खत्म कर दी. सोचा था, आप को जरूर खिलाऊंगी,’’ मेरे पति ने आश्चर्य से मुंह फैला कर कहा, ‘‘अच्छा फिर दूध, चावल और पतीला किस के घर से लिया था आप ने?’’

अब तो मधुरिमा का रुकना मुश्किल था, ‘‘अच्छा, भाई साहब, चलती हूं,’’ कहती हुई और बेचारगी से मुंह बना कर वह तेजी से घर की ओर भागीं.

उस दिन के बाद मधुरिमा ने मांगने की आदत छोड़ दी. इस घटना का जिक्र भी उन्होंने किसी से नहीं किया क्योंकि इस में उन की ही बेइज्जती का डर था. मेरे परिवार से नाराज भी नहीं हो सकीं क्योंकि इस से बात खुलने का डर था. फलस्वरूप उन से हमारे संबंध भी ठीक हैं और हम शांति से गुजरबसर कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- छींक: भाग 2

ऐसी मांगने वालियों से तोबा: भाग 1

लेखिका- विभावरी सिन्हा

अभी मेरी नींद खुली ही थी कि मधुरिमा की मधुर आवाज सुनाई दी. वास्तव में यह खतरे की घंटी थी. मैं अपना मोरचा संभालती, इस से पहले ही स्थूल शरीर की वह स्वामिनी अंदर पहुंच चुकी थी. मैं अपने प्रिय प्रधानमंत्री की मुद्रा में न चाहते हुए भी मुसकरा कर खड़ी हो गई.

वह आते ही शुरू हो गईं, ‘‘अरे, नीराजी, आप सो कर उठी हैं? आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही. अभी मैं सिरदर्द की दवा भेज देती हूं. और हां, भाई साहब और छोटी बिटिया नहीं दिख रहे?’’

मैं जबरदस्ती मुलायमियत ला कर बोल पड़ी, ‘‘यह तो अभी स्नानघर में हैं और बिटिया सोई है.’’

‘‘आप की बिटिया तो कमाल की है. बड़ी होशियार निकलेगी. और हां, खाना तो बनाना शुरू नहीं किया होगा.’’

ये भी पढ़ें- बुद्धि का इस्तेमाल: भाग 2

मैं उन की भूमिका का अभिप्राय जल्दी जानना चाह रही थी. सारा काम पड़ा था और यह तो रोज की बात थी. ‘‘नहीं, शुरू तो नहीं किया, पर लगता है आप के सारे काम हो गए.’’

‘‘ओह हो,’’ मधुरिमा हंस कर बोलीं, ‘‘नहीं, मैं तो रोज दाल बनाती हूं न.’’

मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘‘दाल तो मैं भी रोज बनाती हूं.’’

‘‘पर मैं तो दाल में जीरे का छौंक लगाती हूं.’’

‘‘वह तो मैं भी करती हं, इस में नई बात क्या है?’’

‘‘वह क्या है, नीराजी कि आज दाल बनाने के बाद डब्बा खोला तो जीरा खत्म हो गया था. सोचा, आप ही से मांग लूं,’’ मधुरिमा ने अधिकार से कहा. फिर बड़ी आत्मीयता से मेरी पत्रिकाएं उलटने लगीं.

मैं ने तो सिर पकड़ लिया. थोड़ा सा जीरा मांगने में इतनी भूमिका? खैर, यह तो रोज का धंधा था. मुझे तो आदत सी पड़ गई थी. यह मेरे घर के पास रहती हैं और मेरी सभी चीजों पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार जताती हैं. इस अधिकार का प्रयोग इन्होंने दूसरों के घरों पर भी किया था, पर वहां इन की दाल नहीं गली. और फिर संकोचवश कुछ न कहने के कारण मैं बलि का बकरा बना दी गई.

ये भी पढ़ें- सुबह की किरण: भाग 4

अब तो यह हालत है कि मेरी चीजें जैसे इस्तिरी, टोस्टर वगैरह इन्हीं के पास रहते हैं. जब मुझे जरूरत पड़ती है तो कुछ देर के लिए उन के घर से मंगवा कर फिर उन्हीं को वापस भी कर देती हूं क्योंकि जानती हूं कुछ ही क्षणों के बाद फिर मधुर आवाज में खतरे की घंटी बजेगी. भूमिका में कुछ समय बरबाद होगा और मेरा टोस्टर फिर से उन के घर की शोभा बढ़ाएगा.

पूरे महल्ले में लोग इन की आदतों से परिचित हैं. और घर में इन के प्रवेश से ही सावधान हो जाते हैं. यह निश्चित है कि यह कोई न कोई वस्तु अपना अधिकार समझ कर ले जाएंगी. फिर शायद ही वह सामान वापस मिले. सुबह होते ही यह स्टील की एक कटोरी ले कर किसी न किसी घर में या यों कहिए कि अकसर मेरे ही घर में प्रवेश करती हैं. मैं न चाहते हुए भी शहीद हो जाती हूं.

यह बात नहीं कि इन की आर्थिक स्थिति खराब है या इन में बजट बनाने की या गृहस्थी चलाने की निपुणता नहीं है. यह हर तरह से कुशल गृहिणी हैं. हर माह सामान एवं पैसों की बचत भी कर लेती हैं. पति का अच्छा व्यवसाय है. 2 बेटे अच्छा कमाते भी हैं. बेटी पढ़ रही है. खाना एवं कपड़े भी शानदार पहनती हैं. फिर भी न जाने क्यों इन्हें मांगने की आदत पड़ चुकी है. जब तक कुछ मांग नहीं लेतीं तब तक इन के हाथ में खुजली सी होती रहती है.

ये भी पढ़ें- छींक: भाग 2

इन की महानता भी है कि जब आप को किसी चीज की अचानक जरूरत आ पड़े और इन से कुछ मांग बैठें तो सीधे इनकार नहीं करेंगी. अपनी आवाज में बड़ी चतुराई से मिठास घोल कर आप को टाल देंगी और आप को महसूस भी नहीं होने देंगी. पहले तो आप का व परिवार का हालचाल पूछती हुई जबरदस्ती बैठक में बैठा लेंगी. फिर चाय की पत्ती में आत्मीयता घोल कर आप को जबरन चाय पिला देंगी. आप रो भी नहीं सकतीं और हंस भी नहीं सकतीं. असमंजस में पड़ कर उन की मिठास को मापती हुई घर लौट जाएंगी.

इधर कुछ दिनों से मैं इन की आदतों से बहुत परेशान हो गई थी. मेरे पास चीनी कम भी होती तो उन के मांगने पर देनी ही पड़ती. इस से मेरी दिक्कतें बढ़ जातीं. दूध कम पड़ने पर भी वह बड़े अधिकार से ले जातीं. पहले तो मेरे घर पर न होने पर वह मेरे नौकर से कुछ न कुछ मांग ले जाती थीं. अब खुद रसोई में जा कर अपनी आवश्यकता के अनुसार, हलदी, तेल वगैरह अपनी कटोरी में निकाल लेती हैं.

इस बीच अगर मैं लौट आई तो मुझ पर मधुर मुसकान फेंकती हुई आगे बढ़ जाती हैं. अदा ऐसी, मानो कोई एहसान किया हो मुझ पर. मैं तो बिलकुल आज की पुलिस की तरह हाथ बांध कर अपनी चीजों का ‘सती’ होना देखती रहती. उन के चले जाने पर पति से इस की चर्चा जरूर करती पर झुंझलाती खुद पर ही. मेरा बजट भी गड़बड़ाने लगा, सामान भी जल्दी खत्म होने लगा.

होली के दिन तो गजब ही हो गया. मैं जल्दीजल्दी पुए, पूरियां, मिठाई वगैरह बना कर मेज पर सजा रही थी. मेहमान आने ही वाले थे. इधर मेहमान आने शुरू हुए उधर मधुरिमा खतरे की घंटी बजाती हुई आ पहुंचीं. दृढ़ निश्चय कर के मैं अपना मोरचा संभालती कि उन्होंने एक प्यारी सी मुसकान मुझ पर थोप दी और मेरी मदद करने लगीं. मैं भीतर ही भीतर मुलायम पड़ने लगी.

सोचा, आज होली का दिन है, शायद आज कुछ नहीं मांगेंगी. पर थोड़ी भूमिका के बाद उन्होंने भेद भरे स्वर में मुझे अलग कमरे में बुलाया. मैं शंकित मन से उधर गई. उन्होंने अधिकारपूर्वक मुझ से कहा, ‘‘नीराजी, आज तो पिंकू के पिताजी बैंक नहीं जा सकते. कुछ रुपए, यही करीब 200 तक मुझे दे दो. मैं कल ही लौटा दूंगी.’’

मेरे ऊपर तो वज्र गिर पड़ा. मैं इनकार करती, इस के पहले ही वह बोल पड़ीं, ‘‘नीरा बहन, तुम तो दे ही दोगी. मैं जानती थी.’’

ये भी पढ़ें- दर्द

मैं असमंजस में थी. वह फिर बोलीं, ‘‘देखो, जल्दी करना. तुम रुपए निकालो, तब तक मैं रसोई से 1 किलो चीनी ले आती हूं. थैली मेरे पास है. आज मेवों की गुझिया बनाने की सोच रही हूं. तुम लोगों को भी चखने को दे जाऊंगी.’’

मैं अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि और भी मेहमान आ पहुंचे. मैं ने जल्दी से पर्स से 200 रुपए निकाले. सोचा, आगे देखा जाएगा. मधुरिमा ने जल्दी से रुपए लपक लिए और रसोई की ओर चली गईं. मैं इधर मेहमानों में फंस गई.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक शाम थाने के नाम

मजाक-

एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

ये भी पढ़ें- अनोखा बदला: भाग 1

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

ये भी पढ़ें- औरों से आगे: भाग 1

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

ये भी पढ़ें- अग्निपरीक्षा: भाग 1

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’

ये भी पढ़ें- अनोखा बदला: भाग 2

कातिल

लेखक- भीमराव रामटेके ‘अनीश’

‘‘कुछ नहीं सर, वह कल वाला फिटनैस सर्टिफिकेट देने का हिसाब देना था. ये जीनियस स्कूल की 10 बसों के 5 लाख रुपए हैं. 50,000 के हिसाब से, 60,000 के लिए वे नहीं माने. कह रहे थे कि साहब का बच्चा पढ़ता है हमारे स्कूल में, तो इतनी छूट तो मिलनी ही चाहिए, तो मैं ने भी ले लिए,’’ कहते हुए मुकेश ने एक बड़ा सा लिफाफा अपने बैग से निकाल कर सुनील के हाथ में दे दिया.

‘‘यार, फिर तुम एजेंट किस काम के हो… जब पहले ही बात हो गई थी तो पूरे ही लेने थे न… चलो, ठीक है.

‘‘अच्छा, आज मैं 3 बजे निकल जाऊंगा. मेरे बेटे का बर्थडे है… तो कल मुलाकात होगी,’’ सुनील लिफाफा सूटकेस में रखते हुए बोला और अपने काम में लग गया.

3 बजे सुनील अपनी कार से घर के लिए चल दिया. जैसे ही उस ने हाईवे पर मोड़ काटा, तो थोड़ी ही दूरी पर उसे जीनियस स्कूल की बस नजर आई.

‘अरे… 18 नंबर… यह तो चंकी की बस है…’ सुनील सोच ही रहा था कि बस को रुकवा कर उसे अपने साथ ले जाए कि अचानक बस लहराती हुई दूसरी तरफ उछली और सामने से आने वाले ट्रक से उस की जोरदार टक्कर हो गई. बच्चों की चीखों से आसमान जैसे गूंज उठा.

ये भी पढ़ें- अनोखा बदला: भाग 2

सुनील का कलेजा कांप उठा. वह गाड़ी को ब्रेक लगा कर रुका और जल्दी से बस के अंदर घुसा.

अंदर का सीन देख कर सुनील के होश उड़ गए. बुरी तरह से जख्मी बच्चों की चीखें उस के कलेजे पर हथौड़े की तरह लग रही थीं. जैसे उस से कह रही हों कि तुम्हीं ने हमें मारा है. उस की नजरें तलाशती हुई जैसे ही चंकी पर पड़ीं, उस के तो मानो हाथपैर ठंडे पड़ गए.

चंकी के सिर और हाथों से खून बह रहा था. उस की सारी यूनीफौर्म खून से लथपथ हो चुकी थी और वह सिर पकड़ कर तड़पता हुआ जोरजोर से ‘मम्मीमम्मी’ चिल्ला रहा था.

सुनील ने तुरंत अपनी शर्ट उतार कर उस के सिर पर बांधी और उसे गोद में ले कर कार की तरफ दौड़ लगा दी. उसे कार में बिठा कर पास के ही अस्पताल की ओर तेजी कार से बढ़ा दी.

अस्पताल पहुंचते ही चंकी को स्ट्रैचर पर लिटा कर इमर्जैंसी में ले जाया गया.

सुनील ने कांपते होंठों से डाक्टर को हादसे की जानकारी दी… तुरंत ही इलाज शुरू हो गया.

ये भी पढ़ें- औरों से आगे: भाग 2

सुनील जरूरी कार्यवाही पूरी कर के बैठा ही था कि 2 एंबुलैंस आ कर रुकीं और उन में से ड्राइवर, कंडक्टर और कुछ बच्चों को निकाल कर स्टै्रचर पर लिटा कर अस्पताल के मुलाजिम उन्हें अंदर ले आए.अस्पताल में अफरातफरी का माहौल हो गया. नर्स ने बताया कि 8 बच्चों सहित ड्राइवर की मौत हो गई है. यह सुन कर सुनील पसीने से तरबतर

हो गया.‘तेरी रुपयों की हवस ने ही इन्हें मारा है… अगर तू उन खराब बसों को फिटनैस सर्टिफिकेट नहीं देता तो यह हादसा नहीं होता… तू ने ही अपने बेटे को जख्मी कर मौत के हवाले कर दिया है. तू ही कातिल है इन सब मासूम बच्चों का…’सुनील की पैसे की हवस जैसे पिघल कर उस की आंखों से बह रही थी.

मुख्यमंत्री रोहरानंद चले विदेश!

कहानी-हास्य

दोस्तों! तकदीर सबकी यूं ही नहीं खुलती,अब देखो आप और मैं, हम में कितना अंतर है .आप आम आदमी हैं, मैं भाग्य से मुख्यमंत्री हूं.आपने व्होट दिया, आप अगर वोट न देते,तो मैं मुख्यमंत्री भला कैसे बनता ? मगर, आप प्रदेश की तरक्की में अपनी भूमिका निभाईये मैं रोहरानंद मुख्यमंत्री, आपके व्होट की बदौलत दुनिया जहान के सुख भोग रहा हूं… मैं अमेरिका जा रहा हूं .हे! मतदाताओं…!! मैं आपको बताकर, अधिकारपूर्वक विदेश जा रहा हूं. आपने अपना कर्तव्य, ईमानदारी से निभाया है. आपने अपने बहुमूल्य मत का उपयोग किया, विधायक चुने, फिर विधायकों ( माफ करिए आलाकमान, पार्टी ) ने मुझे अपना वफादार सेवक माना और मैं मुख्यमंत्री बन गया. प्रदेश का मुखिया बनने के पश्चात, हालांकि आपकी और हमारे बीच की दूरियां बढ़ गई हैं. यह स्वभाविक है. यही लोकतंत्र है, जैसे ही मैं मुख्यमंत्री बना मेरी अंतरात्मा ने करवट बदली… मैं विशिष्ट बन गया .अब मैं आपसे दूर दूर रहता हूं. आप मुझसे सीधे नहीं मिल सकते.

दोस्तों…! यह सच है, कि मैंने कभी स्वपन में भी कल्पना नहीं की थी, कि मैं कभी मुख्यमंत्री बन जाऊंगा. मैं साफगोई से स्वीकार करता हूं कि मेरी तो लॉटरी ही निकल आईं है.मेरे इस सत्य स्वीकारोक्ति का प्लीज बतंगड़ मत बनाना. मैं स्पष्ट शब्दों में साहस के साथ कहना चाहूंगा कि मैं मुख्यमंत्री बनते ही, आप लोगों से बहुत बहुत दूर हो गया हूं. रूपक स्वरूप इस तरह समझे जैसे मनुष्य से चांद दूर है,जैसे आम आदमी से अमेरिका दूर है. मगर मैं ईमानदार इंसान हूं. राजनीतिज्ञ की बात में नहीं करता . राजनीतिज्ञ के रूप से मेरे चेहरे पर अनेकानेक मुखोटे लगे हुए हैं.

ये भी पढ़ें- लैटर बौक्स: प्यार और यौवन का खत

हे मतदाताओं..!में यह कहने में कोई गुरेज नहीं करता कि आप भी जब मुख्यमंत्री बन जाएं तब मेरी ही तरह खूब सुख भोगना. जैसे मेरी फितरत देख रहे हो न… वैसी करना. कुर्सी की सौगंध मैं एक बार भी कुछ नहीं बोलूंगा. मैं बुरा भी नहीं मानूंगा.आप मेरी ही तरह जनता जनार्दन से दूर दूर रहना और पद की गरिमा को मेंटेन करना, तब मैं आम आदमी रहूगां, मगर मैं बुरा नहीं मानूंगा. आज जैसे आपके साथ मैं व्यवहार कर रहा हूं आप करना सच में बुरा नहीं मानूंगा .मैं मिलने आऊंगा, आप के चरण स्पर्श करूंगा तब मेरी और देखना भी मत. बस…

दोस्तों! मुख्यमंत्री बनने के बाद यह रोहरानंद परिपक्व हुआ है .बहुतेरी बातों को मैंने समझा है , जिसको आपसे शेयर करने में मुझे कोई संकोच नहीं है .मैं जान गया हूं यह परम सत्य है कि जैसे यह जीवन भाग्य से मिलता है, वैसे ही लोकतंत्र में भाग्य से मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं. और जब भाग्य ने साथ दिया है तो क्यों न मैं जीवन का हर सुख भोग लूं. फिर पता नहीं मौका मिले या न मिले. मैं यह सत्य जान गया हूं कि मेरे कई सीनियर टापते रह गए . मेरे कई जूनियर इंतजार कर रहे हैं कि छींका कब टूटे.

हे मतदाताओं … इस जीवन दर्शन के पश्चात मै अमेरिका जा रहा हूं. मैं मुख्यमंत्री रहते रहते चीन, ब्रिटेन, रूस, जापान, जर्मनी अर्थात दुनिया के संपूर्ण 189 देशों को घूम लेना चाहता हूं . यही नहीं स्वीटजरलैंड मैं अवश्य जाऊंगा, बारंबार जाऊंगा क्योंकि इस देश से मैं कुछ ज्यादा ही प्रेम करता हूं. क्योंकि यहां एक से एक बैंक है. यहां मैं खाता भी खुलवाना चाहूंगा.क्योंकि हम उच्च श्रेणी के मुख्यमंत्रियों के मध्य अक्सर यह शिगुफा चलता है कि जिस मुख्यमंत्री का स्विजरलैंड में बैंक अकाउंट नहीं है, भला वह भी कोई मुख्यमंत्री है .तो मैं इसे ठीक करूगा. क्योंकि इज्जत का सवाल तो आपका है न. लोग क्या कहेंगे, कैसे लोग हैं इनके मुख्यमंत्री का एक अदद खाता भी स्विजरलैंड में नहीं है.

दोस्तों… मैं मुख्यमंत्री बनकर खुद तो दुनिया घूम ही रहा हूं,मुझे यह बताते काफी हर्ष हो रहा है कि मैं परिवार, धर्म पत्नी और बच्चों को भी घुमा रहा हूं. अगर मेरे मन में चोर होता तो यह सच्चाई में कदापि नहीं बताता. छुपकर सपरिवार चला जाता,आप ( तुम ) क्या कर लेते ? मगर मैं एक साफ दिल मुख्यमंत्री हूं अतः जो भी करता हूं आप सभी को स्पष्ट बता कर करता हूं. क्योकि मैं जानता हूं बताऊंगा तो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि संवैधानिक रूप से मैं मुख्यमंत्री हूं ।और मुझे आपके हित में कोई भी निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार है. वह इस तरह, कि मैं जिस परंपरा का पालन कर रहा हूं वह पूर्ववर्ती है,और आप के भले के लिए है, कल आप भी सपरिवार जा सकेंगे.

ये भी पढ़ें- गुलाबी कागज: हरा भरा जीवन हुआ बदरंग

हे मतदाताओं! में अमेरिका जा रहा हूं… मैं अपना जन्मदिन अबकी वही मनाऊंगा. देखो, यहां मनाता तो क्या आनंद आता ? जिंदगी भर तो यही धूल धक्कड़ खाता रहा हूं .समय मिला है, उसका भरपूर लाभ उठाना ही बुद्धिमत्ता है .यहां रखा क्या है ? अमेरिका में जीवन है, सुख है ऐश्वर्य है. मैं तो कहता हूं जिसने अमेरिका में जन्म दिवस नहीं मनाया वह जन्मा ही नहीं है.

दोस्तों ! बतौर मुख्यमंत्री, मैं अमेरिका जा रहा हूं….मैं जा रहा हूं …अर्थात प्रदेश का हर नागरिक जा रहा है.आखिरकार में प्रत्येक नागरिक का प्रतिनिधित्व ही हूं. मै आनंद उठाऊंगा,मैं समझूंगा मेरे प्रदेश के प्रत्येक नागरिक ने सदुपयोग किया. मैं मुख्यमंत्री के रूप में बेशकीमती सुख, सुविधाओं का उपयोग करूंगा समझूंगा मेरे मतदाता भी मेरे साथ आनंद उठा रहे हैं.देखिए मेरा हृदय कितना विशाल है. हे मतदाताओं… में बड़ा ही सहृदय मुख्यमंत्री हूं. आशा है आप भी सहृदयता का परिचय देंगे. जब दूरदर्शन, टीवी और समाचार पत्रों में मेरे अमेरिका दौरे की खबर पढेंगे, तो उसे सकारात्मक दृष्टि से लेंगे.

शेष फिर ( तुम्हारा ) रोहरानंद.

ये भी पढ़ें- सवाल अपने बेटे की अंग्रेजी तालीम का

ठोको ताली: शिल्पा ने कैसे सिखाया अनूप और सीमा को सबक?

लेखिका- मधु जैन 

“शिल्पा आज अनूप का फोन आया था.”

“ओफ्फो!! फिर से…”

“अरे! परेशान होने की बात नहीं मैंने कह दिया हम दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.”

“हम इस तरह कब तक मुंह चुराएंगे, कुछ ऐसा करना पड़ेगा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.”
अनूप शिल्पा के छोटे भाई का दोस्त है. इसीलिए शिल्पा से पहले से परिचित भी है. नई शादी और उसके ही शहर में रहने के कारण शिल्पा जब भी कुछ नया बनाती उन दोनों को बुला लेती. वह नहीं जानती थी कि वह आ बैल मुझे मार वाला काम कर रही है.

वैसे भी शिल्पा को खाना बनाना और खिलाना दोनों में ही मजा आता था. पर अब तो अनूप और उसकी पत्नी सीमा कभी भी किसी समय आ धमकते और खाने की फरमाइश कर देते.

शिल्पा ने तो उन्हें अंगुली पकड़वाई थी पर वह तो पौंचा ही पकड़ बैठे. उस दिन शिल्पा खाने से फुरसत ही हुई थी कि ये दोनों आ गये.

“शिल्पा दी आज तो आपके हाथ की कढ़ी चावल खाने का बहुत मन हो रहा है.”
“दी, कढ़ी बनाती भी तो इतनी अच्छी है.” मस्का लगाते हुए सीमा बोली.
“दी, वो पकौड़े वाली कढ़ी बनाना और थोड़े पकौड़े ज्यादा बना लेना सूखे खाने के लिए.”

शिल्पा के तो तन बदन में आग सी लग गयी थी फिर भी बनावटी मुस्कान ओढ़कर खाना बनाया. शिल्पा ने अब इन्हें सबक सिखाने का मनसूबा बना लिया था.

शर्मा जी के बेटे की बर्थडे पार्टी से लौटने के बाद शिल्पा काफी थकावट महसूस कर रही थी और बर्तन वाली न आने से बर्तन भी पड़े थे. थोड़ी देर आराम करने की सोच कर लेट गई. तभी उसे अनूप की आवाज सुनाई दी “जीजा जी आज हमारा मन आलू के पराठें खाने का हो रहा था और दीदी के हाथ के पराठों का तो जवाब ही नहीं. बाजार में भी इतने अच्छे नहीं मिलते.”

ये भी पढ़ें- उस के लाइक्स मेरे लाइक्स से ज्यादा कैसे

शिल्पा ने एक चुन्नी सिर पर बांधी और बाहर आकर बोली “मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है अच्छा हुआ सीमा तुम आ गयीं पहले तो सबके लिए चाय बना लाओ.”

पति को चुप रहने का इशारा करती हुई “और हां कुकर धोकर आलू उबलने रख देना, बाई नहीं आई न. आज मैं तुम्हें आलू के पराठें बनाना सिखाऊंगी. आखिर तुम्हें भी तो अनूप की पसंद सीखना होगी.”

प्यार से “तुम तो अपनी हो, तो तुमसे कहने में क्या संकोच मेरी तो तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें ही चारों के लिए पराठें बनाना होगें.”

चाय से ज्यादा तो सीमा का मन उबल रहा था.”क्या मैं नौकरानी हूं? जो बर्तन भी साफ करूं और सबके लिए पराठें भी बनाऊं.” अनूप से भी बात नहीं कर पा रही थी.

उसने अनूप को व्हाट्सएप पर सारी परेशानी बताई. और साथ ही उपाय भी.

चाय पीने के बाद कप रखने के बहाने अंदर जाकर सीमा ने अनूप को फोन लगाया .

फोन उठाते ही अनूप बोला. जी सर अभी घर पहुंच रहा हूं

“किसका फोन था?” शिल्पा ने पूछा.

“वो दीदी बौस का फोन है घर पर आ रहे हैं तो हमें निकलना पड़ेगा.”

“कोई बात नहीं फिर कभी, जब भी आओगे हम सीमा के हाथ के पराठें खा लेगें.”

अब तो अनूप और सीमा ऐसे नौ दो ग्यारह हुए कि शिल्पा के घर का रास्ता ही भूल गये.

ये भी पढ़ें- हल: आखिर क्यों पति से अलग होना चाहती थी इरा?

बदला नजरिया

कोठी तक पहुंचने में उसे करीब 15 मिनट लगे. अंदर घुसते ही उस की सास सुमित्रा ने उसे आवाज दे कर अपने कमरे में बुला लिया.

‘‘शिवानी, तुम कहां चली गई थीं?’’ सुमित्रा नाराज और परेशान नजर आईं.

‘‘मम्मीजी, केमिस्ट से बैंडएड लाने गई थी,’’ शिवानी डरीसहमी बोली, ‘‘सेब काटते हुए चाकू से उंगली कट गई थी.’’

‘‘देखो, सेब काट कर देने का काम कमला का है. हमारी सेवा करने की वह पगार लेती है. उस का काम खुद करने की आदत तुम्हें छोड़नी चाहिए.’’

‘‘जी,’’ सास की कही बातों के समर्थन में शिवानी के मुंह से इतना ही निकला.

‘‘बैंडएड लाने इतनी दूर तुम पैदल क्यों गईं? क्या ड्राइवर रामसिंह ने कार से चलने की बात तुम से नहीं कही थी?’’

‘‘कही थी, पर दवा की दुकान है ही कितनी दूर, मैं ने सोचा कार से जाने की अपेक्षा पैदल जा कर जल्दी लौट आऊंगी,’’ शिवानी ने सफाई दी.

‘‘इस घर की बहू हो तुम, शिवानी.  किसी काम से बाहर निकलो तो कार से जाओ. वैसे खुद काम करने की आदत अब छोड़ दो.

‘‘जी,’’ शिवानी और कुछ न बोल सकी.

‘‘मैं समझती हूं कि तुम्हें मेरी इन बातों में खास वजन नजर नहीं आता क्योंकि तुम्हारे मायके में कोई इस तरह से व्यवहार नहीं करता. लेकिन अब तुम मेरे कहे अनुसार चलना सीखो. हर काम हमारे ऊंचे स्तर के अनुसार करने की आदत डालो, और सुनो, नेहा के साथ डा. गुप्ता के क्लीनिक पर जा कर अपनी उंगली दिखा लेना.’’

‘‘मम्मीजी, जख्म ज्यादा गहरा… ठीक है, मैं चली जाऊंगी,’’ अपनी सास की पैनी नजरों से घबरा कर शिवानी ने उन की हां में हां मिलाना ही ठीक समझा.

‘‘जाओ, नाश्ता कर लो और सारा काम कमला से ही कराना.’’

अपनी सास के कमरे से बाहर आ कर शिवानी कमला को सिर्फ चाय लाने का आदेश दे कर अपने शयनकक्ष में चली आई.

समीर की अनुपस्थिति उसे बड़ी शिद्दत से महसूस हो रही थी. वह  सामने होता तो रोझगड़ कर अपने मन की बेचैनी जरूर कम कर लेती.

इन्हीं विचारों की उधेड़बुन में वह अतीत की यादों में खो गई.

समीर के साथ उस का प्रेम विवाह करीब 3 महीने पहले हुआ था. एक साधारण से घर में पलीबढ़ी शिवानी एक बेहद अमीर परिवार की बहू बन कर आ गई.

समीर और शिवानी एम.बी.ए. की पढ़ाई के दौरान मिले थे. दोनों की दोस्ती कब प्रेम में बदल गई उन्हें पता भी न चला पर कालिज के वे दिन बेहद रोमांटिक और मौजमस्ती से भरे थे. शिवानी को समीर की अमीरी का एहसास था पर अमीर घर की बहू बन कर उसे इस तरह घुटन व अपमान का सामना करना पड़ेगा, इस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

शिवानी चाह कर भी ऐसे मौकों पर अपने मन की प्रतिक्रियाओं को नियंत्रण में न रख पाती. वह अजीब सी कुंठा का शिकार होती और बेवजह खुद की नजरों में अपने को गिरा समझती. ऐसा था नहीं पर उसे लगता कि सासससुर व ननद, तीनों ही मन ही मन उस का मजाक उड़ाते हैं. सच तो यह है कि उसे बहू के रूप में अपना कर भी उन्होंने नहीं अपनाया है.

हर 2-4 दिन बाद कोई न कोई ऐसी घटना जरूर हो जाती है जो शिवानी के मन का सुखचैन खंडित कर देती.

वह दहेज में जो साडि़यां लाई थी उन की खरीदारी उस ने बडे़ चाव से की थी. उस के मातापिता ने उन पर अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया था. पर यहां आ कर सिर्फ 2 साडि़यां पहनने की इजाजत उसे अपनी सास से मिली. बाकी सब को उन्होंने रिजेक्ट कर दिया.

‘बहू, साडि़यों में कोई बुराई नहीं है, पर इन की कम कीमत का अंदाजा मेरी परिचित हर औरत आसानी से लगा लेगी. तब मैं उन की मखौल उड़ाती नजरों व तानों का सामना नहीं कर सकूंगी. प्लीज, तुम इन्हें मत पहनना… या कभी मायके जाओ तो वहां जी भर कर पहन लेना.’

अपनी सास की सलाह सुन कर शिवानी मन ही मन बहुत दुखी हुई थी.

बाद में शिवानी ने गुस्से से भर कर समीर से पूछा था, ‘दूसरों की नजरों में ऊंचा बने रहने को क्या हमें अपनी खुशी व शौक दांव पर लगाने चाहिए?’

‘डार्लिंग, क्यों बेकार की टेंशन ले रही हो,’ समीर ने बड़े सहज भाव से उसे समझाया, ‘मां तुम्हें एक से एक बढि़या साडि़यां दिला रही हैं न? उन की खुशी की खातिर तुम ऐसी छोटीमोटी बातों को दिल से लगाना छोड़ दो.’

शादी के बाद समीर के प्रेम में जरा भी अंतर नहीं आया था. इसी बात का उसे सब से बड़ा सहारा था, वरना वह अपनी ससुराल वालों की अमीरी की दिखावट के कारण अपना बहुत ज्यादा खून फूंकती.

उस के ससुर रामनाथजी ने भी उस की इच्छाओं व भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं किया.

शिवानी समीर के बराबर की योग्यता रखती थी. दोनों ने एम.बी.ए. साथसाथ किया था. पढ़लिख कर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा सदा ही उस के मन में रही थी.

समीर ने अपने खानदानी व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू किया. शिवानी भी वैसा ही करना चाहती थी और समीर को इस पर कोई एतराज न था. पर उस के ससुर रामनाथजी ने उस की बिजनेस में सहयोग देने की इच्छा जान कर अपना एकतरफा निर्णय पल भर में सुना दिया.

‘अपनी भाभी या बड़ी बहन की तरह से काम पर जाने की उसे न तो जरूरत है और न ही ऐसा करने की इजाजत मैं उसे दूंगा. अब वह मेरे घर की बहू है और उसे सिर्फ ठाटबाट व रुतबे के साथ जीने की कला सीखने पर अपना ध्यान लगाना चाहिए.’

एक बार फिर समीर उसे प्यार से समझाबुझा कर निराशा व उदासी के कोहरे से बाहर निकाल लाया था. अपने पति की गैरमौजूदगी में ससुराल की आलीशान कोठी में शिवानी लगभग हर समय घुटन व बेचैनी अनुभव करती. यद्यपि कभी किसी ने उस के साथ बदसलूकी या उस का अनादर नहीं किया था, फिर भी शिवानी को हमेशा लगता कि वह शादी कर के सोने के पिंजरे में कैद हो गई है.

कमला ने चाय की टे्र ले कर कमरे में प्रवेश किया तो शिवानी अतीत की यादों से उबर आई. उस के आदेश पर कमला चाय की टे्र मेज पर रख कर बाहर चली गई.

खराब मूड के चलते शिवानी ने कमरे में रखे स्टील के गिलास में चाय बनाई क्योंकि ठंडे मौसम में स्टील के गिलास में चाय पीने का उस का शौक वर्षों पुराना था.

पहली दफा उस की सास ने उसे स्टील के गिलास में चाय पीते देख कर फौरन टोका था, ‘‘बहू, वैसे तो चाय गिलास में भी पी जा सकती है… अपने मायके में तुम ऐसा करती ही रही हो, पर यहां की बात और है. अच्छा रहेगा कि कमला चाय की टे्र सजा कर लाए और तुम हमेशा कपप्लेट में ही चाय पीने की आदत बना लो.’’

आज बैंडएड वाली घटना के कारण शिवानी के मन में विद्रोह के भाव थे. तभी उस ने चाय गिलास में तैयार की और ऐसा करते हुए उसे अजीब सी शांति महसूस हो रही थी.

समीर फैक्टरी के काम से 3 दिन के लिए मुंबई गया था. उस की गैरमौजूदगी में शिवानी की व्यस्तता बहुत कम हो गई. चाय पीने के बाद उस ने कुछ देर आराम किया. फिर उठने के बाद वह अपने भैया के घर जन्मदिन पार्टी में शामिल होने गाजियाबाद जाने की तैयारी में लग गई.

सुमित्रा को जब पता चला कि बहू गाजियाबाद जाने की तैयारी कर रही है तो यह सोच कर वह भी पति रामनाथ सहित बहू के साथ हो लीं कि रास्ते में अपनी बहन सीमा से मिल लेंगी. मम्मी, पापा और भाभी को जाता देख कर नेहा भी उन के साथ हो ली.

सुमित्रा की बड़ी बहन सीमा की कोठी ऐसे इलाके में थी जहां का विकास अभी अच्छी तरह से नहीं हुआ था. रास्ता काफी खराब था. सड़क पर प्रकाश की उचित व्यवस्था भी नहीं थी. ड्राइवर रामसिंह को कार चलाने में काफी कठिनाई हो रही थी.

सुमित्रा जब अपनी बहन के घर पहुंचीं तो पता चला कि उन का लगभग पूरा परिवार एक विवाह समारोह में भाग लेने मेरठ गया हुआ था. घर में सीमा की छोटी बेटी अंकिता और नौकर मोहन मौजूद थे.

अंकिता ने जिद कर के उन्हें चाय पीने को रोक लिया. उन्हें वहां पहुंचे अभी 10 मिनट भी नहीं बीते थे कि अचानक हवा बहुत तेजी से चलने लगी और बिजली चली गई.

‘‘मैं मोमबत्तियां लाती हूं,’’ कहते हुए अंकिता रसोई की तरफ चली गई.

‘‘लगता है बहुत जोर से बारिश आएगी,’’ रामनाथजी की आवाज चिंता से भर उठी.

मौसम का जायजा लेने के इरादे से रामनाथजी उठ कर बाहर बरामदे की दिशा में चले. कमरे में घुप अंधेरा था, सो वह टटोलतेटटोलते आगे बढे़.

तभी एक चुहिया उन के पैर के ऊपर से गुजरी. वह घबरा कर उछल पड़े. उन का पैर मेज के पाए से उलझा और अंधेरे कमरे में कई तरह की आवाजें एक साथ उभरीं. मेज पर रखा शीशे का गुलदान छनाक की आवाज के साथ फर्श पर गिर कर टूट गया. रामनाथजी का सिर सोफे के हत्थे से टकराया. चोट लगने की आवाज के  साथ उन की पीड़ा भरी हाय पूरे घर में गूंज गई.

ये भी पढ़ें- अंतर्दाह

‘‘क्या हुआ जी?’’ सुमित्रा की चीख में  नेहा और शिवानी की चिंतित आवाजें दब गईं.

रामनाथजी किसी सवाल का जवाब देने की स्थिति में ही नहीं रहे थे. उन की खामोशी ने सुमित्रा को बुरी तरह से घबरा दिया. वह किसी पागल की तरह चिल्ला कर अंकिता से जल्दी मोमबत्ती लाने को शोर मचाने लगीं.

अंकिता जलती मोमबत्ती ले भागती सी बैठक में आई. उस के प्रकाश में फर्श पर गिरे रामनाथजी को देख सुमित्रा और नेहा जोरजोर से रोने लगीं.

अपने ससुर के औंधे मुंह पड़े शरीर को शिवानी ने ताकत लगा कर सीधा किया. उन के सिर से बहते खून पर सब की नजर एकसाथ पड़ी.

‘‘पापा…पापा,’’ नेहा के हाथपांव की शक्ति जाती रही और वह सोफे पर निढाल सी पसर गई.

शिवानी के आदेश पर अंकिता ने मोमबत्ती सुमित्रा को पकड़ा दी.

मोहन भी घटनास्थल पर आ गया. शिवानी ने मोहन और अंकिता की सहायता से मूर्छित रामनाथजी को किसी तरह उठा कर सोफे पर लिटाया.

‘‘पापा को डाक्टर के पास ले जाना पड़ेगा,’’ शिवानी घाव की गहराई को देखते हुए बोली, ‘‘अंकिता, तुम बाहर खडे़ रामसिंह ड्राइवर को बुला लाओ.’’

सुमित्रा अपने पति को होश में लाने की कोशिश रोतेरोते कर रही थी और नेहा भयभीत हो अश्रुपूरित आंखों से अधलेटी सी पूरे दृश्य को देखे जा रही थी. अंकिता बाहर से आ कर बोली, ‘‘भाभी, आप का ड्राइवर रामसिंह गाड़ी के पास नहीं है. मैं ने तो आवाज भी लगाई, लेकिन उस का मुझे कोई जवाब नहीं मिला.’’

‘‘मैं देखती हूं. मम्मी, आप हथेली से घाव को दबा कर रखिए.’’

सुमित्रा की हथेली घाव पर रखवा कर शिवानी मेन गेट की तरफ बढ़ गई. अंकिता भी उस के पीछेपीछे हो ली.

‘‘पापा को डाक्टर के  पास ले जाना जरूरी है, अंकिता. यहां पड़ोस में कोई डाक्टर है?’’

‘‘नहीं भाभी,’’ अंकिता ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘नजदीकी अस्पताल कहां है?’’

‘‘बाहर निकल कर मुख्य सड़क पर.’’

‘‘टैक्सी या थ्री व्हीलर कहां मिलेगा?’’

‘‘मेन रोड पर.’’

‘‘चल मेरे साथ.’’

‘‘कहां, भाभी?’’

‘‘टैक्सी या थ्री व्हीलर लाने. उसी में पापा को अस्पताल ले चलेंगे.’’

अंधेरे में डूबी गली में दोनों तेज चाल से मुख्य सड़क की तरफ चल पड़ीं. तभी बादल जोर से गरजे और तेज बारिश पड़ने लगी.

सड़क के गड्ढों से बचतीबचाती दोनों करीब 10 मिनट में मुख्य सड़क पर पहुंचीं. बारिश ने दोनों को बुरी तरह से भिगो दिया था.

एक तरफ उन्हें थ्री व्हीलर खड़े नजर  आए तो वे उस ओर चल दीं.

शिवानी ने थ्री व्हीलर के अंदर बैठते हुए ड्राइवर से कहा, ‘‘भैया, अंदर कालोनी में चलो. एक मरीज को अस्पताल तक ले जाना है.’’

‘‘कौन से अस्पताल?’’ ड्राइवर ने रूखे स्वर में पूछा.

‘‘किसी भी पास के सरकारी अस्पताल में ले चलना है. अब जरा जल्दी चलो.’’

‘‘अंदर सड़क बड़ी खराब है, मैडम.’’

‘‘स्कूटर निकल जाएगा.’’

‘‘किसी और को ले जाओ, मैडम. मौसम बेहद खराब है.’’

‘‘बहनजी, आप मेरे स्कूटर में बैठें,’’ एक सरदार ड्राइवर ने उन की बातचीत में हस्तक्षेप करते हुए कहा.

‘‘धन्यवाद, भैया,’’ शिवानी ने अंकिता के साथ स्कूटर में बैठते हुए कहा.

सरदारजी सावधानी से स्कूटर चलाने के साथसाथ उन दोनों का हौसला भी अपनी बातों से बढ़ाते रहे. घर पहुंचने के बाद वह उन दोनों के पीछेपीछे बैठक में भी चले आए.

‘‘मम्मी, मैं थ्री व्हीलर ले आई हूं. पापा को अस्पताल ले चलते हैं,’’ शिवानी की आवाज में जरा भी कंपन नहीं था.

रामनाथजी होश में आ चुके थे पर अपने अंदर बैठने या बोलने की शक्ति महसूस नहीं कर रहे थे. चिंतित नजरों से सब की तरफ देखने के बाद उन की  आंखें भर आईं.

‘‘इन से चला नहीं जाएगा. पंजे में मोच आई है और दर्द बहुत तेज है,’’ घाव को दबा कर बैठी सुमित्रा ने रोंआसे स्वर में उसे जानकारी दी.

‘‘ड्राइवर भैया, आप पापाजी को बाहर तक ले चलने में हमारी मदद करेंगे,’’ शिवानी ने मदद मांगने वाली नजरों से सरदारजी की तरफ देखा.

‘‘जरूर बहनजी, फिक्र की कोई बात नहीं,’’ हट्टेकट्टे सरदारजी आगे बढ़े और उन्होंने अकेले ही रामनाथजी को अपनी गोद में उठा लिया.

थ्री व्हीलर में पहले सुमित्रा और  फिर शिवानी बैठीं. उन्होंने रामनाथजी को अपनी गोद में लिटा सा लिया.

सरदारजी ने अंकिता और नेहा को पास के सरकारी अस्पताल का रास्ता समझाया और रामसिंह के लौटने पर कार अस्पताल लाने की हिदायत दे कर स्कूटर अस्पताल की तरफ मोड़ दिया. बिजली की कौंध व बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश थमी नहीं थी.

मुख्य सड़क के किनारे बने छोटे से सरकारी अस्पताल में व्याप्त बदइंतजामी का सामना उन्हें पहुंचते ही करना पड़ा. वहां के कर्मचारियों ने खस्ताहाल स्ट्रेचर सरदारजी को मरीज लाने के लिए थमा दिया.

अंदर आपातकालीन कमरे में डाक्टर का काम 2 कंपाउंडर कर रहे थे. डाक्टर साहब अपने बंद कमरे में आराम फरमा रहे थे.

डाक्टर को बुलाने की शिवानी की  प्रार्थना का कंपाउंडरों पर कोई असर नहीं पड़ा तो वह एकदम से चिल्ला पड़ी.

‘‘डाक्टर यहां सोने आते हैं या मरीजों को देखने? मैं उठाती हूं उन्हें,’’ और इसी के साथ शिवानी डाक्टर के कमरे की तरफ चल पड़ी.

एक कंपाउंडर ने शिवानी का रास्ता रोकने की कोशिश की तो सरदारजी उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘बादशाहो, इन बहनजी से उलझे तो जेल की हवा खानी पड़ेगी. यह पुलिस कमिश्नर की रिश्तेदार हैं. इनसान की पर्सनैलिटी देख कर उन की हैसियत का अंदाजा लगाना सीखो और अपनी नौकरी को खतरे में डालने से बचाओ.’’

एक ने भाग कर शिवानी के पहुंचने से पहले ही डाक्टर के कमरे का दरवाजा खटखटाया. डाक्टर ने नाराजगी भरे अंदाज में दरवाजा खोला. कंपाउंडर ने उन्हें अंदर ले जा कर जो समझाया, उस के प्रभाव में आ कर डाक्टर की नींद हवा हो गई और वह रामनाथजी को देखने चुस्ती से कमरे से बाहर निकल आया.

डाक्टर को जख्म सिलने में आधे घंटे से ज्यादा का समय लगा. रामनाथजी  के पैर में एक कंपाउंडर ने कै्रप बैंडेज बड़ी कुशलता से बांध दिया. दूसरे ने दर्द कम करने का इंजेक्शन लगा दिया.

ये भी पढ़ें- अंतर्दाह

‘‘मुझे लगता नहीं कि हड्डी टूटी है पर कल इन के पैर का एक्स-रे करा लेना. दवाइयां मैं ने परचे पर लिख दी हैं, इन्हें 5 दिन तक खिला देना. अगर हड्डी टूटी निकली तो प्लास्टर चढे़गा. माथे के घाव की पट्टी 2 दिन बाद बदलवा लीजिएगा,’’ डाक्टर ने बड़े अदब के साथ सारी बात समझाई.

तभी रामसिंह, अंकिता और नेहा वहां आ पहुंचे. नेहा अपने पिता की छाती से लग कर रोने लगी.

रामसिंह ने सुमित्रा को सफाई दी, ‘‘साहब ने कहा था कि घंटे भर बाद चलेंगे. मैं सिगरेट लाने को दुकान ढूंढ़ने निकला तो जोर से बारिश आ गई. मुझ से गलती हुई. मुझे कार से दूर नहीं जाना चाहिए था.’’

स्टे्रचर पर लिटा कर दोनों कंपाउंडर रामनाथजी को कार तक लाए. शिवानी ने उन्हें इनाम के तौर पर 50 रुपए सुमित्रा से दिलवाए.

सरदारजी तो किराए के पैसे ले ही नहीं रहे थे. ‘‘अपनी इस छोटी बहन की तरफ से उस के भतीजेभतीजियों को मिठाई खिलवाना, भैया,’’ शिवानी के ऐसा कहने पर ही भावुक स्वभाव वाले सरदारजी ने बड़ी मुश्किल से 100 रुपए का नोट पकड़ा.

विदा लेने के समय तक सरदारजी ने शिवानी के हौसले व समझदारी की प्रशंसा करना जारी रखा.

इसी तरह का काम लौटते समय अंकिता भी करती रही. वह इस बात से बहुत प्रभावित थी कि अंधेरे और बारिश की चिंता न कर शिवानी भाभी निडर भाव से थ्री व्हीलर लाने निकल पड़ी थीं.

अंकिता को उस के घर छोड़ वह सब वापस लौट पड़े. सभी के कपड़े खराब हो चुके थे. रामनाथजी को आराम करने की जरूरत भी थी.

उस रात सोने जाने से पहले सुमित्रा और नेहा शिवानी से मिलने उस के कमरे में आईं, ‘‘बहू, आज तुम्हारी हिम्मत और समझबूझ ने बड़ा साथ दिया. हमारे तो उन की खराब हालत देख कर हाथपैर ही फूल गए थे. तुम न होतीं तो न जाने क्या होता?’’ शिवानी को छाती से लगा कर सुमित्रा ने एक तरह से उसे धन्यवाद दिया.

‘‘भाभी, मुझे भी अपनी जैसी साहसी बना दो. अपने ढीलेपन पर मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही है,’’ नेहा ने कहा.

‘‘बहू, तुम्हारे सीधेसादे व्यक्तित्व की खूबियां हमें आज देखने को मिलीं. मुसीबत के समय हम मांबेटी की सतही चमकदमक फीकी पड़ गई. हम बेकार तुम में कमियां निकालते थे. जीवन की चुनौतियों व संघर्षों का सामना करने का आत्मविश्वास तुम्हीं में ज्यादा है. तुम्हारा इस घर की बहू बनना हम सब के लिए सौभाग्य की बात है,’’ भावुक नजर आ रही सुमित्रा ने एक तरह से अपने अतीत के रूखे व्यवहार के लिए शिवानी से माफी मांगी.

ये भी पढ़ें- कबूतरों का घर

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें