Hindi Family Story: खडूस मकान मालकिन – क्या था आंटी का सच

Hindi Family Story: ‘‘साहबजी, आप अपने लिए मकान देख रहे हैं?’’ होटल वाला राहुल से पूछ रहा था. पिछले 2 हफ्ते से राहुल एक धर्मशाला में रह रहा था. दफ्तर से छुट्टी होने के बाद वह मकान ही देख रहा था. उस ने कई लोगों से कह रखा था. होटल वाला भी उन में से एक था. होटल का मालिक बता रहा था कि वेतन स्वीट्स के पास वाली गली में एक मकान है, 2 कमरे का. बस, एक ही कमी थी… उस की मकान मालकिन.

पर होटल वाले ने इस का एक हल निकाला था कि मकान ले लो और साथ में दूसरा मकान भी देखते रहो. उस मकान में कोई 2 महीने से ज्यादा नहीं रहा है.

‘‘आप मकान बता रहे हो या डरा रहे हो?’’ राहुल बोला, ‘‘मैं उस मकान को देख लूंगा. धर्मशाला से तो बेहतर ही रहेगा.’’

अगले दिन दफ्तर के बाद राहुल अपने एक दोस्त प्रशांत के साथ मकान देखने चला गया. मकान उसे पसंद था, पर मकान मालकिन ने यह कह कर उस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि रात को 10 बजे के बाद गेट नहीं खुलेगा.

राहुल ने सोचा, ‘मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर देर रात हो जाती है…’ वह बोला, ‘‘आंटी, मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर रात को देर हो सकती है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ आंटी बोलीं, ‘‘अगर पसंद न हो, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल कुछ देर खड़ा रहा और बोला, ‘‘आंटी, आप उस हिस्से में एक गेट और लगवा दो. उस की चाबी मैं अपने पास रख लूंगा.’’

आंटी ने अपनी मजबूरी बता दी, ‘‘मेरे पास खर्च करने के लिए एक भी पैसा नहीं है.’’

राहुल ने गेट बनाने का सारा खर्च खुद उठाने की बात की, तो आंटी राजी हो गईं. इस के साथ ही उस ने झगड़े की जड़ पानी और बिजली के कनैक्शन भी अलग करवा लिए. दोनों जगहों के बीच दीवार खड़ी करवा दी. उस में दरवाजा भी बनवा दिया, लेकिन दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ.

सारा काम पूरा हो जाने के बाद राहुल मकान में आ गया. उस ने मकान मालकिन द्वारा कही गई बातों का पालन किया. राहुल दिन में अपने मकान में कम ही रहता था. खाना भी वह होटल में ही खाता था. हां, रात में वह जरूर अपने कमरे पर आ जाता था. उस के हिस्से में ‘खटखट’ की आवाज से आंटी को पता चल जाता और वे आवाज लगा कर उस के आने की तसल्ली कर लेतीं.

उन आंटी का नाम प्रभा देवी था. वे अकेली रहती थीं. उन की 2 बेटियां थीं. दोनों शादीशुदा थीं. आंटी के पति की मौत कुछ साल पहले ही हुई थी. उन की मौत के बाद वे दोनों बेटियां उन को अपने साथ रखने को तैयार थीं, पर वे खुद ही नहीं रहना चाहती थीं. जब तक शरीर चल रहा है, तब तक क्यों उन के भरेपूरे परिवार को परेशान करें.

अपनी मां के एक फोन पर वे दोनों बेटियां दौड़ी चली आती थीं. आंटी और उन के पति ने मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पाला था. उन के पास अब केवल यह मकान ही बचा था, जिस को किराए पर उठा कर उस से मिले पैसे से उन का खर्च चल जाता था.

एक हिस्से में आंटी रहती थीं और दूसरे हिस्से को वे किराए पर उठा देती थीं. पर एक मजदूर के पास मजदूरी से इतना बड़ा मकान नहीं हो सकता. पतिपत्नी दोनों ने खूब मेहनत की और यहां जमीन खरीदी. धीरेधीरे इतना कर लिया कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा कर आमदनी का एक जरीया तैयार कर लिया था.

राहुल अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. नौकरी पर वह यहां आ गया और आंटी का किराएदार बन गया. दोनों ही अकेले थे. धीरेधीरे मांबेटे का रिश्ता बन गया.

घर के दोनों हिस्सों के बीच का दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ. हमेशा खुला रहा. राहुल को कभी ऐसा नहीं लगा कि आंटी गैर हैं. आंटी के बारे में जैसा सुना था, वैसा उस ने नहीं पाया. कभीकभी उसे लगता कि लोग बेवजह ही आंटी को बदनाम करते रहे हैं या राहुल का अपना स्वभाव अच्छा था, जिस ने कभी न करना नहीं सीखा था. आंटी जो भी कहतीं, उसे वह मान लेता.

आंटी हमेशा खुश रहने की कोशिश करतीं, पर राहुल को उन की खुशी खोखली लगती, जैसे वे जबरदस्ती खुश रहने की कोशिश कर रही हों. उसे लगता कि ऐसी जरूर कोई बात है, जो आंटी को परेशान करती है. उसे वे किसी से बताना भी नहीं चाहती हैं. उन की बेटियां भी अपनी मां की समस्या किसी से नहीं कहती थीं.

वैसे, दोनों बेटियों से भी राहुल का भाईबहन का रिश्ता बन गया था. उन के बच्चे उसे ‘मामामामा’ कहते नहीं थकते थे. फिर भी वह एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं बढ़ता था. लोग हैरान थे कि राहुल अभी तक वहां कैस टिका हुआ है.

आज रात राहुल जल्दी घर आ गया था. एक बार वह जा कर आंटी से मिल आया था, जो एक नियम सा बन गया था. जब वह देर से घर आता था, तब यह नियम टूटता था. हां, तब आंटी अपने कमरे से ही आवाज लगा देती थीं.

रात के 11 बज रहे थे. राहुल ने सुना कि आंटी चीख रही थीं, ‘मेरा बच्चा… मेरा बच्चा… वह मेरे बच्चे को मुझ से छीन नहीं सकता…’ वे चीख रही थीं और रो भी रही थीं.

पहले तो राहुल ने इसे अनदेखा करने की कोशिश की, पर आंटी की चीखें बढ़ती ही जा रही थीं. इतनी रात को आंटी के पास जाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी, भले ही उन के बीच मांबेटे का अनकहा रिश्ता बन गया था.

राहुल ने अपने दोस्त प्रशांत को फोन किया और कहा, ‘‘भाभी को लेता आ.’’

थोड़ी देर बाद प्रशांत अपनी बीवी को साथ ले कर आ गया. आंटी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. यह उन के लिए हैरानी की बात थी. तीनों अंदर घुसे. राहुल सब से आगे था. उसे देखते ही पलंग पर लेटी आंटी चीखीं, ‘‘तू आ गया… मुझे पता था कि तू एक दिन जरूर अपनी मां की चीख सुनेगा और आएगा. उन्होंने तुझे छोड़ दिया. आ जा बेटा, आ जा, मेरी गोद में आ जा.’’

राहुल आगे बढ़ा और आंटी के सिर को अपनी गोद में ले कर सहलाने लगा. आंटी को बहुत अच्छा लग रहा था. उन को लग रहा था, जैसे उन का अपना बेटा आ गया. धीरेधीरे वे नौर्मल होने लगीं.

प्रशांत और उस की बीवी भी वहीं आ कर बैठ गए. उन्होंने आंटी से पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने टाल दिया. वे राहुल की गोद में ही सो गईं. उन की नींद को डिस्टर्ब न करने की खातिर राहुल बैठा रहा.

थोड़ी देर बाद प्रशांत और उस की बीवी चले गए. राहुल रातभर वहीं बैठा रहा. सुबह जब आंटी ने राहुल की गोद में अपना सिर देखा, तो राहुल के लिए उन के मन में प्यार हिलोरें मारने लगा. उन्होंने उस को चायनाश्ता किए बिना जाने नहीं दिया.

राहुल ने दफ्तर पहुंच कर आंटी की बड़ी बेटी को फोन किया और रात में जोकुछ घटा, सब बता दिया. फोन सुनते ही बेटी शाम तक घर पहुंच गई. उस बेटी ने बताया, ‘‘जब मेरी छोटी बहन 5 साल की हुई थी, तब हमारा भाई लापता हो गया था. उस की उम्र तब 3 साल की थी. मांबाप दोनों काम पर चले गए थे.

‘‘हम दोनों बहनें अपने भाई के साथ खेलती रहतीं, लेकिन एक दिन वह खेलतेखेलते घर से बाहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया. ‘‘उस समय बच्चों को उठा ले जाने वाले बाबाओं के बारे में हल्ला मचा हुआ था. यही डर था कि उसे कोई बाबा न उठा ले गया हो.

‘‘मां कभीकभी हमारे भाई की याद में बहक जाती हैं. तभी वे परेशानी में अपने बेटे के लिए रोने लगती हैं.’’ आंटी की बड़ी बेटी कुछ दिन वहीं रही. बड़ी बेटी के जाने के बाद छोटी बेटी आ गई. आंटी को फिर कोई दौरा नहीं पड़ा.

2 दिन हो गए आंटी को. राहुल नहीं दिखा. ‘खटखट’ की आवाज से उन को यह तो अंदाजा था कि राहुल यहीं है, लेकिन वह अपनी आंटी से मिलने क्यों नहीं आया, जबकि तकरीबन रोज एक बार जरूर वह उन से मिलने आ जाता था. उस के मिलने आने से ही आंटी को तसल्ली हो जाती थी कि उन के बेटे को उन की फिक्र है. अगर वह बाहर जाता, तो कह कर जाता, पर उस के कमरे की ‘खटखट’ बता रही थी कि वह यहीं है. तो क्या वह बीमार है? यही देखने के लिए आंटी उस के कमरे पर आ गईं.

राहुल बुखार में तप रहा था. आंटी उस से नाराज हो गईं. उन की नाराजगी जायज थी. उन्होंने उसे डांटा और बोलीं, ‘‘तू ने अपनी आंटी को पराया कर दिया…’’ वे राहुल की तीमारदारी में जुट गईं. उन्होंने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारे मांबाप जब तक आएंगे, तब तक हम ही तेरे अपने हैं.’’

राहुल के ठीक होने तक आंटी ने उसे कोई भी काम करने से मना कर दिया. उसे बाजार का खाना नहीं खाने दिया. वे उस का खाना खुद ही बनाती थीं.

राहुल को वहां रहते तकरीबन 9 महीने हो गए थे. समय का पता ही नहीं चला. वह यह भी भूल गया कि उस का जन्मदिन नजदीक आ रहा है. उस की मम्मी सविता ने फोन पर बताया था, ‘हम दोनों तेरा जन्मदिन तेरे साथ मनाएंगे. इस बहाने तेरा मकान भी देख लेंगे.’

आज राहुल की मम्मी सविता और पापा रामलाल आ गए. उन को चिंता थी कि राहुल एक अनजान शहर में कैसे रह रहा है. वैसे, राहुल फोन पर अपने और आंटी के बारे में बताता रहता था और कहता था, ‘‘मम्मी, मुझे आप जैसी एक मां और मिल गई हैं.’’

फोन पर ही उस ने अपनी मम्मी को यह भी बताया था, ‘‘मकान किराए पर लेने से पहले लोगों ने मुझे बहुत डराया था कि मकान मालकिन बहुत खड़ूस हैं. ज्यादा दिन नहीं रह पाओगे. लेकिन मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं देखा.’’ तब उस की मम्मी बोली थीं, ‘बेटा, जब खुद अच्छे तो जग अच्छा होता है. हमें जग से अच्छे की उम्मीद करने से पहले खुद को अच्छा करना पड़ेगा. तेरी अच्छाइयों के चलते तेरी आंटी भी बदल गई हैं,’ अपने बेटे के मुंह से आंटी की तारीफ सुन कर वे भी उन से मिलने को बेचैन थीं.

राहुल मां को आंटी के पास बैठा कर अपने दफ्तर चला गया. दोनों के बीच की बातचीत से जो नतीजा सामने आया, वह हैरान कर देने वाला था.

राहुल के लिए तो जो सच सामने आया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था. उस की आंटी जिस बच्चे के लिए तड़प रही थीं, वह खुद राहुल था. मां ने अपने बेटे को उस की आंटी की सचाई बता दी और बोलीं, ‘‘बेटा, ये ही तेरी मां हैं. हम ने तो तुझे एक बाबा के पास देखा था. तू रो रहा था और बारबार उस के हाथ से भागने की कोशिश कर रहा था. हम ने तुझे उस से छुड़ाया. तेरे मांबाप को खोजने की कोशिश की, पर वे नहीं मिले.

‘‘हमारा खुद का कोई बच्चा नहीं था. हम ने तुझे पाला और पढ़ाया. जिस दिन तू हमें मिला, हम ने उसी दिन को तेरा जन्मदिन मान लिया. अब तू अपने ही घर में है. हमें खुशी है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया.’’ राहुल बोला, ‘‘आप भी मेरी मां हैं. मेरी अब 2-2 मांएं हैं.’’ इस के बाद घर के दोनों हिस्से के बीच की दीवार टूट गई. Hindi Family Story

Hindi Story: लाला भाई

Hindi Story: विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई को अपने गांव का सरपंच बनने की सनक थी, पर उन्हें वोट नहीं मिलते थे. इस चक्कर में उन्होंने गांव की हर जाति को साधना चाहा, पर क्या वे कामयाब रहे? टना में बोरिंग रोड पर बने अपने दफ्तर से दोपहर बाद की छुट्टी ले कर जब मैं सड़क पर आटोरिकशा का इंतजार कर रहा था तो वहां अचानक एक बेहद दुबलापतला, गंजा, ठिगना आदमी भगवा कपड़ों में भूरे रंग के देशी कुत्ते के साथ घूमता मिला.

उस ने कुत्ते को मजबूत डोरी से बांध रखा था और बीचबीच में उसे प्यार से सहलाता भी था. उस ने खुद के साथ कुत्ते को भी लाल रंग का लंबा तिलक लगा रखा था.  वह आदमी थोड़ा दिलचस्प लगा. थोड़ा और नजदीक आने पर महसूस हुआ कि शायद इस आदमी से मेरी कहीं मुलाकात हो चुकी है. दिमाग पर थोड़ा जोर लगाया तो याद आया कि यह तो लाला भाई है, जिस से मेरी मुलाकात आज से तकरीबन एक साल पहले सासाराम के तहसीलदार दफ्तर में हुई थी और यह आदमी तो अपने गांव का मुखिया बनना चाहता था. लेकिन पंचायत का इलैक्शन हुए तो 2 महीने हो चुके हैं, फिर यहां यह कैसे घूम रहा है? इस ड्रैस में आने का क्या मतलब है? क्या बुरा हो गया इस के साथ?

मैं यह सब सोच ही रहा था कि उस ने अचानक चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘जनता पर यकीन मत करना, सब दोगले होते हैं…’’ और फिर वह बहुत जोरजोर से हंसने लगा और काफी देर तक पागलों की तरह हंसता ही रहा. लेकिन यह पहले तो ऐसा नहीं था, बल्कि यह तो हुआ इनसान था, कम से कम मु? से हुई मुलाकात के हवाले से तो मैं यह कह ही सकता हूं. लेकिन, इस हालत में यहां कैसे? यादों को ताजा करने की कोशिश की तो सबकुछ परत दर परत याद आने लगा. आज से तकरीबन सालभर पहले, उस दिन अपने तहसीलदार दोस्त से मिलने के लिए मैं सुबह 10 बजे सासाराम में उन के दफ्तर पहुंच गया था.

वे दफ्तर में ही थे और लोगों से मिल कर उन की समस्याएं सुन रहे थे. मैं दफ्तर के बाहर लगी कुरसियों पर बैठ कर उन के खाली होने का इंतजार करने लगा. इस के साथ ही रास्ते में खरीदा गया अखबार उलटने लगा. थोड़ी देर में, मेरी बगल वाली सीट पर तकरीबन 55 साल का एक ठिगना दुबलापतला और गंजा इनसान कर बैठ गया. उसने  पूछा, ‘‘साहब कितनी देर से बैठे हैं?’’ मैं ने कहा, ‘‘काफी देर से.’’
वे सज्जन किसी औरत के खेत तक जाने वाले सरकारी रास्ते की पैमाइश चाहते थे और उस औरत का प्रार्थनापत्र ले कर तहसील आए थे. उन के हाथ में जो आवेदनपत्र था, जिस पर मारफत पूर्व मुखिया उम्मीदवार विजय शंकर लिखा था.

मेरी दिलचस्पी उन में बढ़ गई और मैं ने उन से बातचीत शुरू की. थोड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने अपना पूरा संघर्ष  बयां किया. उन का नाम विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई था. 10वीं जमात तक पढ़े लाला भाई अपनी ग्राम पंचायत खुटहा का यह चौथा इलैक्शन लड़ने की तैयारी कर रहे थे, जो आगामी 10 महीने में होने वाले थे. इस से पहले के 3 पंचायत इलैक्शन वे हार चुके थे, जिन में से 2 मुखिया पद के लिए थे. पहली बार में, जहां वे 7वें नंबर पर थे, वहीं पिछले पंचायत चुनाव में वे तीसरे नंबर पर चुके थे. उन की केवल एक इच्छा थी कि वे अपनी ग्राम पंचायत खुटहा के एक बार मुखिया बन जाएं. इस के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे.

लाला भाई का गांव बिहार के सासाराम जिले में पड़ता था. 5,000 वोटर वाला गांव, जिस में यादव, कुर्मी और दलित ही मुख्य जातियां थीं. लेकिन, गांव में दबदबा कुर्मियों का था, क्योंकि वे पढ़ेलिखे और ज्यादा अमीर थे. यही नहीं, गांव के यादव भी काफी अमीर थे, लेकिन उन के उज्जड़पन, अक्खड़पन के चलते ज्यादातर गांव वाले उन से कम मेलजोल रखते थे. वहीं, गांव के दलित खेती और ईंटभट्ठे पर मजदूरी करते थे और ज्यादातर गांव के कुर्मियों के खेतों से ही अपने घर चलाते थे. वे लोग यादवों के यहां मजदूरी इसलिए नहीं करते थे, क्योंकि यादव लोग उन से ठीक से बात नहीं करते थे और उन के घर की बहूबेटियों पर गंदी नजर थे. लाला भाई की जातबिरादरी के लोग गांव में केवल 4 घर थे. कुल जमा 40 वोट, लेकिन उनका किसी से कोई बैर नहीं था. खेती भी जो थोड़ीबहुत थी, उसे उन लोगों ने दलितों को बंटाई पर दे दिया था.
गांव में इन जातियों के अपनेअपने महल्ले थे.

पंचायत की राजनीति शुरू करने के अपने शुरुआती दिनों में लाला भाई रोज सुबह खापी कर अपनी साइकिल ले कर पूरे गांव एक चक्कर मारते थे. गांव के लोगों से दुआसलाम के बाद, उन का बड़ा काम सरकारी योजनाओं तक गांव के लोगों की पहुंच पक्की करवाना और तहसील, पंचायत, थाना में लोगों की समस्याओं को डील कराना था. वे मानते थे कि इसी तरह वे गांव की जनता के दिल में उतर सकते हैं और उन का वोट ले सकते हैं. उन्होंने कभी इन सुविधाओं तक लोगों की पहुंच के लिए सरकारी महकमे में दिए जाने वाले सुविधा शुल्क को भी गांव के लोगों से नहीं लिया, बल्कि अपने घर से जो पिता के रिटायरमैंट का मिला पैसा था, उसे खर्च कर के मदद की. उन का मानना था कि एक बार मुखिया बनने के बाद, इन सब खर्चों की रिकवरी हो जाएगी. अभी सिर्फ गोल पर फोकस रहने की जरूरत है.

पहले पंचायत चुनाव में भाग लेने तक उन्होंने अपने रिटायर्ड पिता के फंड का आधा पैसा खर्च कर दिया था. फिर बड़े जोरशोर से परचा भी दाखिल किया और बहुत दिव्य और भव्य तरीके से अपना प्रचार किया. हालांकि वे केवल 40 वोट पा कर 7वें नंबर पर पहुंचे. यही हाल दूसरे पंचायत चुनाव में भी रहा. इस चुनाव में उन्हें बहुत कोशिश के बाद केवल 90 वोट हासिल हुए और तीसरे नंबर तक उन की गाड़ी पहुंच सकी.
2 बार की इस हार और बाप के रिटायरमैंट के फंड का 10 लाख रुपए खर्च करने के बाद उन के घर में भयानक कलह हो गई. उन के छोटे भाई ने उन्हें घर का पैसा बरबाद करने का दोषी ठहरा दिया. इस तरह से उन्हें घरपरिवार में अलग कर दिया गया और 2 एकड़ खेत और घर में एक कमरा उन के रहनेखाने के लिए दे दिया गया. इस तरह से उन के घर का बंटवारा हो गया.

2 पंचायत चुनाव हार जाने के बाद, लाख कोशिश के बाद भी यह बात उन्हें में नहीं आई कि जिस जनता के लिए, जिस के सुखदुख में वह चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं, वही उन्हें मुखिया लायक क्यों नहीं है? खैर, अब उन्होंने अपने हार की वजह की खोज शुरू की. उन के शुभचिंतक लोगों ने कहा कि बिना जातबिरादरी को साधे कोई चुनाव नहीं जीत सकता है. पहले कुछ जातियों पर पकड़ बनाओ, फिर वे ही तुम्हारा वोट बैंक बनेंगी. हर दिशा में तीर नहीं मारो. उन्होंने मामले को और गहराई में को ले कर बड़ी माथापच्ची की. ग्रहदशा ठीक करने का अनुष्ठान करवाया. बद्रीनाथ का दर्शन भी किया. इस के लिए उन्हें अपने 2 एकड़ खेत का आधा हिस्सा गिरवी रखना पड़ा. एक दिन एक ज्योतिषी उन के गांव में आया. उन का हाथ देख कर उस ने कहा कि जब तक शादी नहीं करोगे तुम चुनाव नहीं जीत पाओगे.

फिर क्या था. उन्होंने एक महीने के भीतर 55 साल की उम्र में 28 साल की एक ऐसी लड़की से शादी की जिस के मांबाप दोनों नहीं थे और जिस की परिवरिश उस की एक कथित मौसी ने की थी, जिसे उन्हें 30,000 रुपए देने पड़े. वह लड़की एक 4 महीने के बच्चे के साथ ससुराल आई थी. वह ससुराल में 5 महीने रही और बाद में गांव के ही एक दुसाध लड़के के साथ दिल्ली भाग गई, जो वहीं मजदूरी करता था.
खैर, इस घटना के बाद भी वे अपने लक्ष्य पर लगे रहे. चतुर लोगों से राय ली. अब उन्होंने तय किया कि वे यादवों को अपना वोट बैंक बनाएंगे. उन का विश्वास कुर्मियों पर इसलिए नहीं जमा, क्योंकि कुर्मी बहुत ज्यादा दिमाग खर्च करते हैं. वहां थोड़ा कम चांस हैं. फिर यादव समाज में उन्होंने जगह पाने की कोशिश में काफी पैसा खर्च किया. गांव के लोगों ने उन का भरपूर दोहन किया.

वे दलितों पर दांव इसलिए नहीं लगा सकते थे, क्योंकि बिना दारूनकदी के यह बिरादरी वोट नहीं देती. इस पर वे आखिर में दांव लगाते, यही सोच कर उन्हें इग्नोर किया. यादव बिरादरी को मैनेज करने के लिए उन्हें 5 लाख रुपए पर अपना बाकी खेत गिरवी रखना पड़ा. लेकिन, तीसरे चुनाव में उन्हें यह कह कर वोट नहीं दिया गया कि उन की जाति के लोग दब्बू होते हैं. यादव लोग एक दब्बू को अपना वोट नहीं दे सकते. वे फिर से चुनाव हार गए. असल में वे निहायत ही भावुक किस्म के आदर्शवादी इनसान थे. लेकिन गांव में उन की इमेज एक ऐसे बेवकूफ और पागल की थी, जिसे कोई भी गंभीरता से नहीं लेता. यहीं नहीं, गांव में जातीय तनाव के चलते मुखिया का चुनाव वही जीत सकता था जो कम से कम यादव या दलित बिरादरी का एकतरफा समर्थन हासिल करे.

यही नहीं, उस की अपनी जाति का भी एक मजबूत आधार उस के साथ होना चाहिए. लाला भाई का अपने खुद के समाज या बिरादरी का कोई खास वोट गांव में नहीं था. उन की दोस्ती गांव के यादवों से थी जरूर, लेकिन वे लोग मानते थे कि लाला एक डरपोक जाति है. यह आदमी हमारा प्रतिनिधि नहीं हो सकता.
फिर गांव में यादव और कुर्मी कुशवाहा जाति के लोगों में आपसी तनाव रहता था, जिस का फायदा चुनाव में दलित उठाते थे. वे दोनों तरफ से माल खाते थे. दलितों ने लाला भाई का कुछ इस्तेमाल देशी ठर्रे से ले कर विदेशी शराब खरीदवाने तक में किया. चुनाव लड़ने की इस सनक ने उन्हें बड़ा कर्जदार बना दिया था. मैंने उन की कहानी जानने के बाद आगे पूछा, ‘‘आप मुखिया बनना ही क्यों चाहते हैं?’’
खैनी मलते हुए मुसकरा कर वे बोले, ‘‘बस, लोगों की सेवा करना चाहते हैं सर, अपना नाम करना
चाहते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘लेकिन इतनी बार हारने से तो लगता है कि लोग आप से सेवा करवाने के इच्छुक ही नहीं हैं. फिर आप क्यों परेशान हैं?’’ लाला भाई ने कहा, ‘‘हां, लेकिन 6 नंबर से 3 नंबर पर गए हैं तो अगले चुनाव में मुखिया बन ही जाएंगे.’’
मैं ने पूछा, ‘‘गांव में आप की बिरादरी के कितने वोट हैं?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘40 वोट.’’
मैं ने पूछा, ‘‘इतने कम वोट में बिहार जैसे जाति केंद्रित समाज में कैसे बनेंगे मुखिया?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जैसे छठवें नंबर से तीसरे नंबर पर गए, वैसे ही बन भी जाएंगे.’’
मैं ने कहा, ‘‘बड़ा सब्र है भाई आप के पास…’’
फिर उन्होंने मुसकरा कर आगे कहा, ‘‘अभी मु? पर 8 लाख रुपए का कर्ज है, जिसे मैं ने जनता की सेवा के लिए अपना 2 एकड़ खेत एक रुपए सैकड़ा पर ले कर गिरवी रखा है.’’ अचरज हुआ कि कितना
अजीब आदमी है, जो मुखिया बनने के पागलपन में इतना बड़ा कर्जदार हो चुका है.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘5 दिन हुए पिताजी मर गए. घर में होना चाहिए, लेकिन यहां हूं. साहूकारों का दबाव बहुत है कि पैसा लौटाओ नहीं तो खेत की रजिस्ट्री करो. लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा. इस बार किसी भी कीमत पर मुखिया बनना ही है.
‘‘हमारे आदर्श सुभाष चंद्र बोस हैं. संघर्ष में पीछे नहीं हटना है. उन से प्रेरणा मिलती रहती है. दिनरात एक कर दिया है मेहनत में.’’
मैं ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने तो कभी मुखिया का चुनाव नहीं लड़ा था.’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जी, सही
कहा. वे भी हमारी बिरादरी के थे, कायस्थ थे सर. इसीलिए वे हमारे
आदर्श हैं. उन्होंने आखिरी दम तक संघर्ष किया, मैं भी आखिरी सांस तक संघर्ष करूंगा. हम मिट जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे.’’
मैं ने कहा कि अच्छी बात है और फिर लाला भाई की पर मुसकराने लगा. लगा कि इस आदमी की
सोच इतनी गंदी है कि एक महान क्रांतिकारी केवल इसलिए इस का नेता है, क्योंकि वह भी इस की बिरादरी या जात का था
मैं ने कहा, ‘‘आप सही जा रहे हैं. आप एक दिन जरूर मुखिया बनेंगे.’’
उस ने से हाथ जोड़ कर नमस्कार  किया और कमरे में चला गया.
आटोरिकशा ड्राइवर के हौर्न से
मेरा ध्यान टूटा. उस ने पूछा, ‘‘कहां जाना है सर?’’
मैं ने कहा, ‘‘महेश्वरी कालोनी,
डी ब्लौक, बंगला नंबर 2 ले चलो भाई.’’

इस के बाद आटोरिकशा बढ़ चला और लग गया कि जरूर इस चुनाव में भी यह हार गया होगा और साहूकारों ने इस का गिरवी रखा खेत हड़प लिया होगा, जिस के गम में यह पागल हो
गया है. इस आदमी का मुखिया बनने का नशा इसे इस तबाही की हद तक ले आया कि आज यह कुत्ते के साथ घूम रहा है. मैं इस के साथ उस दुखद घटना की कल्पना भर कर सकता था, जो इस के साथ घटी होगी. तकरीबन 10 मिनट के बाद मेरे घर का गेट गया. 20 रुपए ड्राइवर को दे कर दुखी मन से मैं घर के भीतर चला गया. गांव और पंचायत के सियासी दांवपेंच में एक आदमी केवल तबाह हो गया था, बल्कि पागल हो चुका था

हरे राम मिश्र                              

Hindi Story: दामाद – अमित के सामने आई आशा की सच्चाई

Hindi Story: अमित आज शादी के बाद पहली बार अपनी पत्नी को ले कर ससुराल जा रहा था. पढ़ाईलिखाई में अच्छा होने के चलते उसे सरकारी नौकरी मिल गई थी. सरकारी नौकरी लगते ही उसे शादी के रिश्ते आने लगे थे. उस के गरीब मांबाप भी चाहते थे कि अमित की शादी किसी अच्छी जगह हो जाए. अमित के गांव के एक दलाल ने उस का रिश्ता पास के शहर के एक काफी अमीर घर में करवा दिया. अमित तो गांव की ऐसी लड़की चाहता था जो उस के मांबाप की सेवा कर सके लेकिन पता नहीं उस दलाल ने उस के पिता को क्या घुट्टी पिलाई थी कि उन्होंने तुरंत शादी की हां कर दी.

सगाई होते ही लड़की वाले तुरंत शादी करने की कहने लगे थे और अमित के पिताजी ने तुरंत ही शादी की हां भर दी. शादी से पहले अमित को इतना भी मौका नहीं मिला था कि वह अपनी होने वाली पत्नी से बात कर सके. अमित की मां ने उस की बात को भांप लिया था और उन्होंने अमित के पिता से कहा भी कि अमित को अपनी होने वाली पत्नी को देख तो लेने दो, लेकिन उस के पिता ने कहा कि शादी के बाद खूब जीभर के देख लेगा.

खैर, शादी हो गई और अमित को दहेज में बहुतकुछ मिला. लड़की वाले तो अमित को कार भी दे रहे थे लेकिन अमित ने मना कर दिया कि वह दहेज लेने के भी खिलाफ है लेकिन उस के पिताजी के कहने पर वह मान गया. सुहागरात को ही अमित को कुछकुछ समझ में आने लगा था क्योंकि उस की नईनई पत्नी बनी आशा ने न तो उस के मातापिता की ही इज्जत की थी और न ही सुहागरात को उस ने अमित को अपने पास फटकने दिया था.

अमित ने आशा से भी कई बार पूछा भी कि तुम्हारी शादी मुझ से जबरदस्ती तो नहीं की गई है लेकिन आशा ने कोई जवाब नहीं दिया. शादी के तीसरे दिन अमित अपनी मां और पिताजी के कहने पर एक रस्म के मुताबिक आशा को छोड़ने ससुराल चल दिया.

अमित और आशा ट्रेन से उतर कर पैदल ही चल दिए. अमित की ससुराल रेलवे स्टेशन के पास ही थी. रास्ते में आशा अमित से आगे चलने लगी. अमित ने देखा कि 2 लड़के मोटरसाइकिल पर उन की तरफ आ रहे थे. वे आशा को देख कर रुक गए और आशा भी उन को देख कर काफी खुश हुई.

अमित जब तक आशा के पास पहुंचा तब तक वे दोनों लड़के उस की तरफ देखते हुए चले गए. आशा के चेहरे पर असीम खुशी झलक रही थी. अमित के पास आने पर आशा ने अमित को उन लड़कों के बारे में कुछ नहीं बताया और अमित ने भी नहीं पूछा.

अमित अपनी ससुराल पहुंचा. वहां पर सब लोग केवल आशा को देख कर खुश हुए और अमित की तरफ किसी ने ध्यान भी नहीं दिया. आशा की मां उसे ले कर अंदर चली गईं और अमित बाहर बरामदे में खड़ा रहा. अंदर से उस के ससुर और दोनों साले बाहर आए.

अमित के ससुर ने पास ही रखी कुरसी की तरफ इशारा किया और बोले, ‘‘अरे, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ.’’ अमित चुपचाप बैठ गया. उसे वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लग रहा था.

अमित के सालों ने तो उस की तरफ ध्यान भी नहीं दिया था. शाम होने को थी और अंधेरा धीरेधीरे बढ़ रहा था. अमित को फर्स्ट फ्लोर के एक कमरे में ठहरा दिया. अमित थोड़ा लेट गया और उस की आंख लग गई. नीचे से शोर सुन कर अमित की आंख खुली तो उस ने देखा कि अंधेरा हो चुका था और रात के 9 बज चुके थे.

अमित खड़ा हुआ और उस ने मुंह धोया. उस को हैरानी हो रही थी कि किसी ने उस से चाय तक की नहीं पूछी थी. अमित उसे अपना वहम समझ कर भूलने की कोशिश कर रहा था. लेकिन दिमाग तो उस के पास भी था इसलिए वह अपने ही विचारों में खोया हुआ था.

अब नीचे से जोरजोर से हंसने की आवाज आ रही थी. अमित के ससुर शायद किसी से बात कर रहे थे. अमित ने नीचे झांका तो पाया कि उस के ससुर और 2-3 लोग बरामदे में महफिल लगाए शराब पी रहे थे. अमित के ससुर बहुत शराब पी चुके थे इसलिए वे अब होश में नहीं थे.

वे बोले, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल. मैं ने अपनी बिगड़ैल बेटी की शादी कैसे एक गरीब लड़के से करा दी वरना आप लोग तो कह रहे थे कि इस बिगड़ी लड़की से कौन शादी करेगा,’’ इतना कह कर वे जोर से हंसे और बाकी बैठे दोनों लोगों ने भी उन का साथ दिया और उन की इस बात का समर्थन किया. अमित के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई.

तभी अमित की सास आईं और उस के ससुर के कान में कुछ बोलीं जिस को सुन कर वे तुरंत अंदर गए. अब अमित को समझ आ गया था कि उस के ससुर ने ही अपना रोब दिखा कर उस के पिताजी को डराया होगा और उस की शादी आशा से कर दी होगी. तभी उस के पिताजी उस की शादी में उस के सवालों के जवाब नहीं दे रहे थे.

अमित का सिर चकरा रहा था. वह तुरंत नीचे उतरा और अंदर कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. अमित ने अंदर देखा कि आशा एक कोने में नीचे ही बैठी है और उस के ससुर उस के पास खड़े उसे डांट रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब वह किस के साथ अपना मुंह काला करा आई. अमित को तो अब बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था, ऐसा लगता था कि उस की शादी किसी बिगड़ैल लड़की से करा दी गई है और उस का परिवार भी सामाजिक नहीं है. तभी उस की सास ने आशा के बाल पकड़े और उस को मारने लगीं.

आशा बिलकुल चुप थी और वह अपनी पिटाई का भी बिलकुल विरोध नहीं कर रही थी. आशा की मां उसे रोते हुए मारे जा रही थीं. तभी पता नहीं अमित को क्या सूझा कि वह अंदर पहुंचा और अपनी सास से आशा को मारने को मना किया.

अमित को अंदर आया देख सासससुर घबरा गए. ससुर का तो नशा भी उतर गया था. वे समझ चुके थे कि अमित ने सब सुन लिया है. अमित के ससुर अब कुरसी पर बैठ कर रो रहे थे और उस की सास का भी बुरा हाल था. तभी अमित के ससुर एक झटके से उठे और कमरे से अपनी दोनाली बंदूक ले आए और आशा की तरफ तान कर बोले, ‘‘मैं ने इस की हर गलती को माफ किया है. बड़ी मुश्किल से मैं ने इस की शादी कराई है और अब यह मुंह काला करा कर पता नहीं किस का पाप अपने पेट में ले आई है. मैं इसे नहीं छोड़ूंगा.’’

तभी अमित ने उन के हाथों से बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी. वह बोला, ‘‘चलो आशा, मेरे साथ अपने घर.’’ आशा ने झटके से अपना चेहरा ऊपर उठाया. अमित की बात सुन कर उस के सासससुर भी चौंक गए.

अमित के ससुर बोले, ‘‘अमित, तुम आशा की इतनी बड़ी गलती के बावजूद उसे अपने साथ घर ले जाना चाहते हो?’’ अमित बोला, ‘‘आप सब लोगों के लाड़प्यार की गलती आशा ही क्यों भुगते. इस में इस की क्या गलती है. गलती तो आप के परिवार की है जो ऐसे काम को अपनी शान समझते हैं और उस को छिपाने के लिए मुझ जैसे लड़के से उस की शादी करवा दी.’’

अमित थोड़ी देर रुका और फिर बोला, ‘‘आशा की यही सजा है कि उसे मेरे साथ मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा.’’ यह सुन कर उस के ससुर ने उस के पैर पकड़ लिए लेकिन अमित ने उन्हें उठाया और आशा का हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकल गया.

आशा अमित के पीछेपीछे हो ली. अमित के ससुर तो हाथ जोड़े खड़े थे. अमित और आशा पैदल ही जा रहे थे तभी उन्हें वही दोनों लड़के मिले जो उन्हें आते हुए मिले थे. अब की बार वे दोनों पैदल ही थे. आशा को देख उन में से एक बोला, ‘‘चलो आशा डार्लिंग, हम तुम्हारे पेट में पल रहे बच्चे को गिरवा देते हैं और फिर से मजे करेंगे.’’

इतना कह कर वे दोनों बड़ी बेहूदगी से हंसने लगे. उन में से एक ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की तो अमित ने उसे पकड़ कर अच्छीखासी धुनाई कर दी और जब दूसरा लड़का अपने साथी को बचाने आया तो आशा ने उस के बाल पकड़ कर नीचे गिरा दिया और लातों से अधमरा कर दिया. थोड़ी देर में वे दोनों ही वहां से भाग खड़े हुए. आशा का साथ देना अमित को अच्छा लगा था. अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.

घर पहुंच कर अमित ने अपने मां और पिताजी को कुछ नहीं बताया. अब आशा ने अमित के घर को इस तरह से संभाल लिया था कि अमित सबकुछ भूल गया. आशा ने जब उस के पेट में पल रहे बच्चे को गिराने की बात कही तो अमित ने कहा, ‘‘इस में इस मासूम की क्या गलती है…’’ आशा अमित के पैरों में गिर पड़ी और रोने लगी. अमित ने उसे उठाया और गले से लगा लिया. वह बोला, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू ही तुम्हारी पवित्रता हैं.’’

आशा अमित के गले लग कर रोए जा रही थी. दूर शाम का सूरज नई सुबह में दोबारा आने के लिए डूब रहा था. Hindi Story

Hindi Story: ममता की छांव

Hindi Story: मां  को गांव जाने वाली बस में बैठा तो दिया था, पर विजय का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. मां जब बस से उतर कर गांव में अपने घर जाएंगीओहउस ने गलत किया है मां के साथ. उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. 2 महीने पहले विजय मां को गांव से ले कर आया था अपने साथ. मां तो तब भी नहीं आना चाहती थीं, ‘‘अरे, नहीं बेटामेरा तो यह छोटा सा घर ही अच्छा है. यहां तेरे बचपन की यादें हैं. वह देख चबूतरा, तू इस पर बैठ कर कर पढ़ता था.

‘‘और वह साइकिल अब टूट गई रखरखाव में. तू तो इसे छोड़ता तक नहीं था. साइकिल पर बैठ कर ही खाना खाता और कई बार इस की सीट से सिर टिका कर सो भी जाता था.’’ मां पूरे जोश से घर में रखी
1-1 चीज दिखाती जा रही थीं. विजय का मन बिलकुल नहीं था इस सब कबाड़े को देखने का, पर मां का जोश तो देखते ही बनता था.

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‘‘मां, आप मेरे साथ चलो शहर,’’ विजय ने कहा.
‘‘नहीं, मैं तो यहीं अच्छी हूं,’’ मां ने साफ मना कर दिया था.
पर विजय तो कर मां को लेने आया था. उसे तो उन्हें ले कर जाना ही था. तरुणा ने साफसाफ बोला था, ‘‘किसी भी हालत में मां को गांव से ले कर आना है. खाली हाथ नहीं आना.’’
विजय बड़ी कशमकश में था. उसे पुराने दिन याद गए. जब वह शहर में पढ़ने के लिए गया था. पर उस के शहर पढ़ने जाने के ठीक 10 दिन बाद ही पिताजी गुजर गए थे. जब उस ने यह सुना तो धक रह गया कि अब उस की पढ़ाई का क्या होगा? पिताजी ही तो एकलौते कमाने वाले थे.
पिताजी की तेरहवीं के बाद जब सारे मेहमान चले गए तब विजय ने मां से पूछा था, ‘‘मां, मैं क्या करूं? शहर जाऊं या पढ़ाई छोड़ दूं?’’
मां ने भरी नजरों से विजय की ओर देखा, ‘‘तू शहर जा और पढ़ाई कर. अपने पिताजी के सपनों को पूरा कर बेटा.’’

‘‘पर मां, बहुत खर्चा होता है. आप कैसे…’’ विजय बोला था. ‘‘मैं कर लूंगी. कुछ कुछ तो कर ही लूंगी. खर्चा भेजती रहूंगी. तू पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर,’’ मां ने पूरी दबंगता के साथ कहा था. विजय के चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था. विजय शहर गया और अपनी पढ़ाई करने लगा. मां से वह जितने पैसे मांगता, वे उतने पैसे उसे भिजवा देतीं. विजय ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर मां के पास पैसे कहां से रहे हैं, जो उसे वे भेज देती हैं. एक बार विजय ने पूछा भी, पर मां ने कहा, ‘‘तू तो पढ़ाई करपैसा कहां से रहा है, इस की चिंता छोड़ दे.’’
‘‘जी मां, मेरी जब नौकरी लग जाएगी तो 1-1 पैसा वापस कर दूंगा मां,’’ कहते हुए विजय की आवाज भर्रा गई. उस के सामने अपनी मां की तसवीर उभर आई.

ऐसा नहीं था कि मां बूढ़ी थीं, पर उन के संघर्षों ने उन्हें बूढ़ा बना दिया था और सारा संघर्ष विजय के लिए ही तो था. 5 एकड़ की खेती की जमीन और एक मकान इतनी ही पुश्तैनी जायदाद थी. मां खेतों में काम करती थीं और सब्जी वगैरह पैदा करती थीं, पर जब विजय की पैसों की मांग बढ़ी तो मां ने जमीन को ठेके पर दे दिया और एकमुश्त रकम उसे भेज दी. इस से मां के सामने खुद के लिए दो वक्त की रोटी का सवाल खड़ा हो गया, तो उन्होंने बाहर मजदूरी शुरू कर दी. दूसरों के खेतों में जातीं और दिनभर काम करतीं, जो पैसा मिलता उस में से कुछ अपने लिए बचा कर बाकी विजय को भेज देतीं. ‘‘मां, मैं जानता हूं. आप बहुत कष्ट ?ोल रही हैं. मेरी नौकरी लगने दो, फिर आप को महारानी बना कर रखूंगाकुछ दिनों की बात और है,’’ विजय ऐसा सच में ही बोलता था.

जब विजय की नौकरी लगी तो उस ने सब से पहले मां को ही फोन किया था, ‘‘मां, मेरी नौकरी लग गई है.’’
यह खुशखबरी सुन कर मां को लगा था कि अब उन के बुरे दिन खत्म हो गए हैं. विजय का मन गांव जा कर मां से मिलने का था, पर वह नहीं जा पाया. इसी बीच विजय की तरुणा से मुलाकात हुई और उन दोनों ने शादी करने का फैसला लिया. तब भी वह मां का आशीर्वाद लेना चाहता था, पर उस ने केवल फोन पर
ही मां को बताया था, ‘‘मां, मैं शादी कर रहा हूं.’’ यह सुन कर मां चौंक गई थीं, ‘‘शादी…’’
‘‘हां मां, तरुणा मेरे साहब की बेटी हैबहुत अच्छी हैआप को भी पसंद आएगी…’’
‘‘पर मां के होते हुए तू कैसे अपनी ही शादी की बात करेगाअभी मैं जिंदा हूं.’’
‘‘अरे मां, अब समय बदल चुका है. अब तो ऐसे ही शादीब्याह होते हैं.’’
‘‘मां से बगैर पूछेवाह…’’
‘‘पूछ ही तो रहा हूं…’’ विजय को अपनी गलती का अहसास हुआ.
‘‘पूछ कहां रहा है, तू तो बता रहा है,’’ मां ने कहा.

विजय  कि मां को बुरा लगा है, पर लगने दो, शादी तो उसे ही करनी है और उसे ही अपनी पत्नी के साथ जिंदगीभर रहना हैमां के समय की बात और थी, अब तो सब बदल चुका है. विजय ने शादी कर ली थी. मां को नहीं बुलाया था. पर शादी के बाद वह तरुणा को ले कर गांव गया था. उस के ससुर ने ही बोला था कि घर में कुलदेवता की पूजन करना जरूरी है. विजय कार से गांव पहुंचा. मां गुस्सा तो थीं, पर उन्होने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया. तरुणा का वैसे ही स्वागत किया, जैसे नईनवेली दुलहन का किया जाता है. कुलदेवता की पूजा कराई और गांव की औरतों को बुला कर बधाई गीत भी गाए गए. पर जब गांव वालों ने विजय को ताने मारे कि उस ने अपनी मां के बिना ही शादी कर ली, तो उसे गांव में रहना भारी हो गया. वे दोनों अगले दिन ही गांव से चले गए.

फिर विजय गांव नहीं जा पाया था. उस का ट्रांसफर अब पास के ही शहर में हो गया था. अब उसे यहां लंबे समय रहना था. तरुणा ने ही सु?ाव दिया था कि जब हम को यहां रहना ही है, तो हम अपना घर बना ही लेते हैं. पर विजय की नौकरी तो नई है, तो उस के पास इतने पेसे कहां हें कि वह मकान बना सके.
‘‘क्यों हम गांव का घर और जमीन बेच दें…’’ विजय के ही मन में खयाल आया. तरुणा कुछ नहीं बोली.
‘‘पर मां नहीं बेचने देंगीं,’’ जवाब भी विजय ने ही दिया था.
‘‘देखिए, मां की जायदाद पर तो बेटे का ही हक होता है तो आप जमीन और मकान ले लें,’’ तरुणा ने कहा.
‘‘हां, है तो सही. पर अभी मां जिंदा हैं. वे नहीं रहेंगी, तब ही मेरा हक होगा …’’
‘‘तो हम अपना हिस्सा तो ले ही सकते हो…’’
‘‘अभी मां कुछ नहीं देंगी. शादी के समय से ही वे नाराज हैं.’’
‘‘तो एक काम क्यों नहीं करते…’’ फिर उन दोनों में खुसुरफुसुर होती रही. विजय अगले ही दिन गांव की ओर निकल पड़ा.

मां ने जब विजय को देखा तो वे हैरत में पड़ गईं. मां के चेहरे पर गुस्सा अभी भी दिखाई दे रहा था, ‘‘कैसे याद गई मेरी?’’
‘‘अरे, कुछ नहीं मां. बहुत दिनों से आप से मिला नहीं था, तो सोचा मिल आऊं…’’ कहते हुए विजय ने अपनी नजरों को ?ाका लिया था. दरअसल, विजय मां को लेने आया था, पर उन्हें ले जाने के पीछे एक योजना थी, जिस के चलते वह मां से नजरें नहीं मिला पा रहा था. मां विजय को हक भरी नजरों से देख रही थीं, ‘‘घर पर सब ठीक है …’’ वे उसे घूर कर देख रही थीं.
‘‘हांसब ठीक है…’’ विजय धीरे से बोला.
‘‘बहू कैसी है?’’
‘‘एकदम बढि़या है.’’
विजय मां के हर सवाल पर परेशान हो रहा था. कुछ देर तक शांति बनी रही.
‘‘मैं आप को लेने आया हूं.’’
‘‘क्यों?’’ मां का शक गहराता जा रहा था.
‘‘ऐसे ही, आप कहती थीं कि मु? यहां अकेले नहीं रहना.’’
‘‘मैं ने कब कहा?’’

विजय कुछ देर चुप रहा. उसे मां से इतने सवालों की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह सकपका गया था.
‘‘आप की बहू आप को याद कर रही थी. उस ने ही बोला था कि मां को कुछ दिनों के लिए यहां ले आओ.’’
मां कुछ नहीं बोलीं, पर उन के चेहरे से लग रहा था कि वे अभी भी नहीं आना चाहती हैं. पर दूसरे दिन मां तैयार हो गई थीं चलने को, ‘‘कब निकलना है?’’
‘‘दोपहर को,’’ विजय ने कहा.
‘‘ठीक है,’’ मां बोलीं.
‘‘मां, आप जमीन के और मकान के कागजात निकाल लेना.’’
‘‘क्यों?’’ मां को थोड़ा शक हुआ.
‘‘कुछ नहींऐसे सूने घर में किसी ने चुरा लिए तो…’’ विजय कहते हुए अचकचा रहा था.
‘‘अरे, कहां सूना घरमैं पड़ोसी को बोलूंगी. वह सोएगा यहां रात को.’’
‘‘फिर भीकागजात बारबार नहीं बनते मांउन्हें संभाल कर रखना चाहिए.’’
‘‘अच्छे से ही रखे हैं. तू फिक्र कर.’’

विजय कुछ नहीं बोला. दोपहर को मां तैयार हो कर बैठ गई थीं. ‘‘ये ले जमीन और मकान के कागज चाहिए रख लेमेरे बाद तो सारा कुछ तेरा ही है.’’ विजय की आंखों में चमक गई थी. मां उसे बड़े ध्यान से देख रहीं थीं, पर थीं चुप‘‘देख बेटा, जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक यह सारा कुछ मेरा ही है. मैं तेरे साथ कुछ ही दिनों के लिए चल रही हूं, बाकी तो अपनी बाकी जिंदगी यहीं काटनी है,’’ मां की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें गिरीं. विजय चुप रहा.
इधर, तरुणा मां के आने की राह देख रही थी. उस ने मां के लिए अलग कमरा तैयार कर दिया था. और कोई समय होता तो उसे अपनी सास का आना बुरा लगता, पर इस बार तो उस ने योजना बना कर ही उन्हें बुलाया था, तो उन के लिए खास तैयारी कर रही थी. वह जानती थी कि कम से कम 2 महीने तक तो उन को यहां रखना ही है, वे रहना चाहें तो भी.

मां को सामने पा देख कर तरुणा उन के पैरों  गई थी. उस ने दरवाजे पर ही मां की आरती उतारी और उन का हाथ पकड़ कर उन के कमरे तक ले गई.
मां हैरान सी थींवे अपनी बहू से दूसरी बार ही मिल रही थींशादी के बाद वे कुल देवता के पूजन के लिए आए थे, तब बहू का रुख तो अकड़ भरा ही लग रहा थाइसी वजह से ही उन्होंने कभी विजय को साथ में रखने के लिए नहीं बोला थापर आज तरुणा का रुख एकदम बदला हुआ था.
विजय का काम तो एक महीने में ही पूरा हो गया था. उस ने मां को बगैर बताए गांव की अपनी जमीन का सौदा कर लिया था और मकान का भी. अच्छे मोटे दाम उसे मिल गए थे. उस ने कुछ बहाने से मां के हाथ का अंगूठा लगवा लिया था.

अब की बार मां ने कोई शक जाहिर नहीं किया था. वे बेटे और बहू की सेवा से संतुष्ट थीं. जमीन और मकान की रजिस्ट्री होते ही विजय ने मां को गांव वापस लौटने का बोल दिया था.
अब तक मां का मन यहां पूरी तरह लग चुका था, पर अचानक जब विजय ने उन्हें गांव चले जाने को कहा, तो उन्हें बुरा लगा. बहू का रुख भी बदल गया था. उन की  में कुछ नहीं आया था कि अचानक बेटे और बहू का बरताव बदल कैसे गया. अनमने मन से मां ने गांव जाने की बात मान ली थी,
‘‘
तू चल छोड़ने.’’

‘‘मैं नहीं जा पाऊंगा. यहां बहुत काम है.’’
‘‘फिर मैं अकेले कैसे जाऊंगी? मैं तो कुछ जानती ही नहीं हूं…’’ मां के चेहरे पर निराशा छा गई थी.
‘‘मैं आप को बस में बैठा दूंगा.
बस तो सीधे गांव ही जाती है. मैं कंडक्टर को भी बोल दूंगा. वह ध्यान से आप को गांव में उतार देगा,’’ कहते हुए विजय ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.
मां कुछ नहीं बोलीं. आज मां को गांव जाने वाली बस में बैठा दिया गया था.
पहली बार विजय के मन में दुख जागा. गांव में मां कहां रहेंगीवह घर तो उस ने बेच दिया है
अपनी आंखों से निकले आंसुओं को विजय ने जमीन पर नहीं गिरने दिया. वह केवल बस को जाते हुए देख रहा था

कुशलेंद्र श्रीवास्तव

Hindi Story: टुकड़ा

Hindi Story:  जौडर्न एलिना की देह तो भोगता था, पर शायद उस का प्यार मर गया था. एलिना समझ नहीं पाई थी इस बदलाव को. क्या था इस का राज? रीर बदलता है, प्रेम का आकार भी. पर औरत की आत्मा को तौलना किस ने सिखाया मर्दों को?’ बिस्तर से उठते हुए उस ने अपने कपड़ों को समेटा. उस की नजर पहले बिस्तर पर गई, फिर फर्श पर बिखरे कपड़ों पर. एकएक कपड़ा वह धीरे से उठाती,  पहनती गई. जौर्डन ने अब तक उस की ओर देखा भी नहीं था. उस की पीठ उस की तरफ थी. शर्ट के बटन बंद करता हुआ वह तेज कदमों से कमरे से बाहर चला गया.

वह एक पल के लिए ठिठक गई. उस के मन में एक टीस उठी, ‘‘मर्द कपड़े उतारते समय तो साथ होते हैं, पर पहनते समय क्यों नहीं?’’ उस का मुंह उतर गया. उसे लगा जैसे उस के भीतर कोई भारी चीज भर गई हो. एलिना का चेहरा बेहद खूबसूरत था. पतली नाक, नरम होंठ, साफ आंखें. उस की हंसी मासूम और मोहक थी. लेकिन अब उस का वजन बढ़ गया था. वह अब 16 बरस की 47 किलो की लड़की नहीं थीवह अब 55 किलो की 27 साल की औरत थी. अपने पेट और जांघों पर चढ़ आई चरबी से वह अनजान नहीं थी, पर यह चरबी एक दिन शर्म में बदल जाएगी, ऐसा उस ने कभी सोचा नहीं था.

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उस ने कई बार जौर्डन की आंखों में वह पल देखा था जब उस के शरीर को तौलती हुई एक हलकी सी अरुचि चमक जाती थी. फिर भी वह उस से उत्सुकता से संबंध बनाता था. उस के उभारों, उस की स्किन को, उस के निजी अंगों को बड़ी जिज्ञासा से छूता था. लेकिन पेट और जांघों को देखते ही उस की हथेलियां रुक जातीं और वह उन हिस्सों को अनदेखा कर देता. एलिना ने कितनी ही बार चाहा कि वह अपना वजन कम कर ले, पुराने दिनों जैसा शरीर वापस पा ले, ताकि जौर्डन की आंखों में वह खुद के लिए उठती नफरत को देखे. पर लाख कोशिशों के बावजूद वजन वहीं अटका रहा. अकेलेपन और लगातार तनाव ने उसे सिगरेटों की ओर धकेल दिया. दिनभर मीठी चाय, थकान और घुटता डर उसे भीतर ही भीतर खाता गया.
जौर्डन कोई आदर्श शरीर वाला मर्द नहीं था.

उस का अपना वजन 70 किलो था और पेट उभर आया था, पर संबंध बनाते समय एलिना ने कभी उस की ओर ऐसे नहीं देखा था. उसे शर्म आती थी किसी के शरीर को इस तरह देखने में. लेकिन अब वह जौर्डन के शरीर पर गौर करने लगी थी. एक औसत कद का, थोड़ा ठिगना मर्द. उसे अपना वजन कम लगता था और वह कहता था कि वह और वजन बढ़ाना चाहता है. एलिना को उस की आंखों में उस के पेट पर जमी चरबी के लिए कोई शर्म नहीं दिखी, बल्कि वह अपने शरीर के प्रति बहुत सहज था, जैसे कोई समस्या ही हो.
एलिना सोचती, ‘मर्द ऐसे क्यों होते हैं? वे औरत को यह क्यों जता देते हैं कि वह कहां परफैक्ट नहीं है चाहे वे खुद कितने ही भद्दे क्यों हों?’’ औरतों को उन के साथ हमेशा बहुतवेल मैनर्डरहना पड़ता है, क्योंकि जरा सी ऊंचनीच पर वे उन्हें बेइज्जत महसूस करवा देते हैं.

औरतों के सब से बड़े आलोचक अकसर उन के अपने साथी मर्द होते हैं और इस रोल में वे प्रेमी नहीं, बल्कि कठोर समीक्षक बन जाते हैं. साल बीतते गए. एलिना के वजन में कोई तबदीली नहीं आई. जौर्डन का प्रेम भी वहीं अटका रहा, पर उस की चाहत शरीर के कुछ हिस्सों तक सीमित रही. एक दिन फोन पर जौर्डन ने कहा, ‘‘मैंने तुम्हारी पीठ पर कभी भी किस नहीं किया.’’ एलिना ने सोचा कि अच्छा है, कम से कम इसने यह सोचा तो सही. पर तुरंत जौर्डन की अगली बात ने जैसे सब बदल दिया, ‘‘लेकिन तुम्हारी पीठ पसंद नहीं.  बस सामने से मतलब हैतुम्हारे उभार बहुत पसंद हैं.’’ एलिना चुप रही. उस के पास शब्द ही नहीं थे कि वह इस पर क्या कहे.

उस की चुप्पी एक आंतरिक संवाद में बदल गई, ‘क्या मैं सिर्फ उभार और निजी अंग भर हूं? क्या प्रेम में शरीर काआकर्षकरहना हमेशा जरूरी है? क्या पसंद करने वाला मर्द भी अपनी पसंदीदा औरत को ऐसे टुकड़ों में बांट कर देखता है?’ उस ने तो कभी जौर्डन को ऐसे नहीं देखा था. वह तो उस के लिए अब भी वही था, जैसा कालेज के दिनों में था, खास और दिलकश. उस के जेहन में रोजमर्रा की औरतों की यादें उतर आईं. सड़कों पर चलतीं, सिर पर टोकरी उठाए फिरतीं, घर की ओट पर बैठींबेरंगी, बेढंगी साड़ी में लिपटी औरतें. उन का काला, चपटा, उभरा, भद्दा पेट. जो आकर्षक शरीर को भूल चुकी थीं या सोचती भी नहीं थीं. उन का संघर्ष रोटी कमाना, पेट पालना, बच्चे पालना था.

उन की जिंदगी में भी तो होते होंगे निजी पलक्या महसूस करती होंगी वे उन पलों में? क्या उन के साथी
मर्द उन के बेडौल शरीर को प्रेम करते होंगे? मर्द को यादों में रही औरत याद आती होगी? क्या वे याद करते होंगे कि यही औरत सुबह उन के फर्श को साफ कर रही थी? यही औरत बेतरतीब लिपटी साड़ी में बच्चों को स्कूल छोड़ आई? या बस उन्हें दिखती होगी एक बेडौल शरीर की, कमज्यादा कदकाठी वाली औरत? क्या वे करते होंगे उपयोग? क्या वे जानते होंगे कि औरतें कितनी काम की होती हैं? अचानक उसे कालोनी में बाहर दरवाजे पर बैठी औरतें याद आईं. उन की घूरती आंखें और उन की फुसफुसाहट.
ये जवान लड़कियों के पीछे क्यों पड़ी होती हैं? क्या ये नहीं करतीं अपनी जिंदगी में यह सब, जो इतनी नफरत से भरी नजर से देखती हैं एक जवान लड़की को निकलते हुए?’

इन में यह कुंठा कहां से आई होगी? क्या यह कुंठा औरतों में यहीं से आई होगी? क्या वे यह भी नहीं सकीं कि मर्दों का मात्र दैहिक सुख उन की आत्मा को शांति नहीं देता था? कहीं कुछ रह गयावे मात्र दाता तो नहीं थीं. मगर यह सब वे औरतें सोचती भी होंगी? नहींउसे नहीं लगता था. मगर वह इन मन के जालों में गई थी, जैसे कि उसने सारी कडि़यां जोड़ ली हों, मगर उसके पास मात्र एक आह के सिवा कुछ भी नहीं.
वह खुद को अपने मन के आईने में देखतीएकदम सुडौल और आकर्षक शरीर में, काली प्लेन साड़ी पहने और जौर्डन की उस पर टिक गई नजरें.

वह चुप और खोई हुई रहती. सोचती कि कैसे वह पेट और जांघों की चरबी कम करे. कैसे वह जौर्डन की आंखों को अपने लिए चमकता हुआ देखे. कैसे वह आकर्षक रूप से उस के सामने इतराती हुई खड़ी होअब उसे यह दूर की कौड़ी लगती थी. वह निजी पलों में पेट और जांघों को छिपाने लगी थी. अब वे उसे बहुत नफरत महसूस कराने लगे थे. वह चाहती थी उन के बीच संबंध घोर अंधेरे में बनें, ताकि जौर्डन की नजर उस के पेट की चरबी और जांघों पर पड़े. उस का बेडौल शरीर अब खुद उसे पसंद नहीं था. असहजता अब उस के भीतर घर कर चुकी थी.           

राजनंदिनी रावत

Hindi Kahani: ईयरफोन

Hindi Kahani: 20 साल के मजदूर रघु पर ईयरफोन का ऐसा जुनून चढ़ा कि वह हर वक्त उन्हें कान में ठूंसे रहता. बंशी चाचा ने इस के खतरे बताए, पर वह अनजान बना रहा. एक दिन गांव जाते समय रघु हाईवे पर ईयरफोन पर गाने सुन रहा था कि तभीवे सभी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में लगे थे. सुबहसुबह अपने गांव से निकल कर फतुहा से पटना जाने वाली ट्रेन से वे रोजाना वहां पहुंच जाते थे. जैसी कि उम्मीद थी, पूजा के पहले ही बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का यह काम पूरा हो जाना था. ऐसे में उन्हें अपने गांवघर में छुट्टी काटने की उम्मीद थी. मगर कुछ वजह से ऐसा मुमकिन नहीं हो सका था.

रघु के बाबा कहा करते थे, ‘राजा का भी महल तय समय में पूरा नहीं होता…’ तो फिर इस बिल्डिंग का काम कैसे पूरा होता. जो भी हो, मालिक ने कह रखा था कि वह छुट्टियों में काम बंद रखेगा और उन्हें पूरे पैसे देगा. इस बात से वे सभी खुश थे. बीसेक साल के रघु को दूसरे तमाम नौजवानों के समान ही मोबाइल फोन में दिलचस्पी थी. फिर हालात कुछ ऐसे बने कि उसे पढ़ाईलिखाई छोड़ कर काम में लगना पड़ा.
पिछली बाढ़ में रघु के गांवघर की फसल मारी गई थी. ऐसे में कहीं कहीं काम तो करना ही था. सो, वह भी दिहाड़ी मजदूरी में लग गया था. वही क्यों, उस के गांव के दर्जनों लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में पटना में काम पर जाया करते थे. महीने में दसेक दिन भी काम मिल गया, तो महीनेभर का खर्च निकल आता था.
और यहां तो जब बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में काम मिला, तो जैसे सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था. अब आराम से महीनेभर काम मिलेगा, तो अच्छे पैसे भी बनेंगे.

और जब घर में पैसे हों, तो अगली वासंती फसल के लिए बीजखाद और पटवन का भी इंतजाम हो जाएगा. तीजत्योहार भी अच्छे से मनाया जा सकेगा. एक बात तो तय है कि आजकल सभी नौजवानों के पास अपना एंड्रौइड मोबाइल फोन है, जिस से सभी का मनोरंजन होता है. बूढ़े तो अभी भी बस कीपैड वाले पुराने फोन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें एंड्रौइड  मोबाइल चलाना नहीं आता. लेकिन गरीब हैं, तो क्या हुआ. दीनदुनिया की खबर तो यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप से ही पता चल पाती है . इस के अलावा भी इस में कितना सारा कुछ है देखनेसुनने के लिए. कितने सारे फीचर हैं इस में और यहां कोई नौजवान पीछे नहीं रहना चाहता. सभी के अपने दोस्त हैं, गर्लफ्रैंड हैं, तो उन से भी तो बात करनी है. उन पर रोबदाब कायम करना है. इस के लिए मोबाइल फोन से सही और क्या हो सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि हर महीने इसे चार्ज भी तो कराना पड़ता है, जिस में अच्छे पैसे लग जाते हैं, इसलिए तो कहीं कामधंधा करना जरूरी है.

कुछ दिन पहले की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन की साइट पर मालिक का बेटा संतोष आया था. रघु सिर पर ईंट लिए चार मंजिले पर चढ़ रहा था. संतोष मजदूरों को कभी कुछ निर्देश देता, तो अपने कान से ईयरफोन निकाल कर उन्हें कुछ कहता. फिर अपने कान में ईयरफोन तुरंत लगा लेता था. उन लोगों को भी उत्सुकता होती कि आखिर कान में लगा ईयरफोन है कैसा. संतोष रघु का ही हमउम्र होगा. उस की बात पर संतोष ने हंसते हुए बताया, ‘‘अरे, यह मोबाइल फोन के साथ जरूरी है. सारा कुछ साफसाफ सुनाई देता है.’’ ‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा मिलता होगा ?’’ इस बार रामू ने उत्सुकता दिखाई, तो वह बोला, ‘‘हां, यह ईयरफोन ब्रांडेड कंपनी का है, तो महंगा तो है ही. लेकिन इलैक्ट्रौनिक मार्केट में लोकल ईयरफोन सस्ते में मिल जाता है.’’

‘‘सस्ता कितने तक का होता होगा?’’ रघु ने पूछा, तो संतोष बोला, ‘‘50 रुपए में मिल जाता होगा.’’
उस दिन मौका निकाल कर रघु काम के बीच ही में इलैक्ट्रौनिक मार्केट चला गया था और वहां से ईयरफोन खरीद लाया था. अब रघु को जब भी समय मिलता, वह मोबाइल चला कर कान में ईयरफोन खोंस लेता था. दूसरे लोगों ने भी देखादेखी ईयरफोन खरीद लिए थे, मगर रघु की बात ही निराली थी. वह एक तरह से मोबाइल एडिक्टेड सा था, इसलिए उसे अकसर ही डांट खानी पड़ती थी कि ईयरफोन के चलते वह किसी की नहीं सुनता. बंशी चाचा अकसर ही रघु को डांटते, ‘‘अरे, तुम हमेशा कान में यह कनठेपी क्यों घुसाए रहता है? किसी की तुम बात तक नहीं सुनते. ऐसे तो चल चुका तुम्हारा काम. कहीं मालिक ने देख लिया, तो तुम्हें काम से निकाल बाहर करेगा.’’

रघु को भी महसूस होता था कि इस ईयरफोन के वजह से किसी को सुनना मुश्किल होता है. ‘‘जब मालिक का बेटा ही कान में ईयरफोन लगाए इधरउधर घूमता हो, तो गलत तो नहीं ही होना चाहिए,’’ रघु बंशी चाचा की बात को हंसी में उड़ा देता था, ‘‘बुढ़ा गए हैं, तो बोलेंगे ही. उन्हें क्या पता कि हम जेनजी पीढ़ी वाले लोग हैं. पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ, जीना छोड़ दें? थोड़ी मस्ती भी नहीं करें क्या?’’ यह जेनजी शब्द रघु की डिक्शनरी में नयानया शामिल हुआ था, जिस का मतलब यह कि हम नई पीढ़ी और सोच के लोग हैं. ऐसे में उन्हें कुछ अलग करने और सोचने का हक है.
अब इत्तिफाक की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर एक कच्चा चहबच्चा था. वहीं मालिक का बेटा ईयरफोन लगाए घूम रहा था. वहां एक जगह गीली, कच्ची मिट्टी थी.
बंशी चाचा चिल्लाते रह गए, ‘‘अरे सुभाष बाबू, जरा संभल कर. वहां फिसले, तो गहरे पानी में गिरोगे.’’
मगर सुभाष सुन नहीं पाया था और वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. वह फिसल कर उस गहरे गड्ढे में जा गिरा था. गनीमत थी कि वहां लोग मौजूद थे और उसे बाहर निकाल लिया गया. मगर उसे चोटखरोंच तो आई ही थी.

तभी रामू को महसूस हुआ था कि यह ईयरफोन लगाना भी खतरनाक हो सकता हैशाम में तय समय पर उन्हें छुट्टी मिली, तो सभी को चैन आया. अब पूरे एक हफ्ते की छुट्टी है. अब पूजा के बाद ही तो काम शुरू होगा. पैसे भी मिल गए थे, तो सब में एक जोश भी था. पटना से फतुहा वे ट्रेन से गए थे और हाईवे के किनारे अपने गांव जा रहे थे. जब 50 मील दूर पटना से फतुहा मुफ्त में ट्रेन से गए, तो एकाध मील के लिए आटोरिकशा क्या पकड़ना. यह तो रोजरोज की बात है.
तीजत्योहार के दिन हों, तो मन आकाश में उड़ता रहता है. तब और, जब पास में पूरे पैसे हों. आखिर वे घर से बाहर शहरों में इसी दिन के लिए तो धक्के खाते फिरते हैं और कमाई की जुगत भिड़ाते रहते हैं. रामू यही सबकुछ सोचता, मस्ती में अपने ग्रुप के साथ आगे बढ़ता जा रहा था. तभी रघु बोला, ‘‘क्या रामू भाई, जरा यह गाना यूट्यूब पर सुनिए. मजा जाएगा.’’ ‘‘अब घर जा ही रहे हैं, तो वहीं आराम से सुनेंगे. यहां इस हाईवे पर गाडि़यों की तेज रफ्तार और शोर के बीच कोई कुछ क्या सुनेगा…’’

‘‘अरे, शोर को मारिए गोली. कान में ईयरफोन लगाइए और सुनिए. इस ईयरफोन को लगा कर बाहर का कुछ सुनाई कहां देता है. आखिर इसी दिन के लिए ईयरफोन खरीदे हैं.’’ ‘‘उस दिन काम की साइट पर देखे थे कि मालिक का बेटा पानी भरे चहबच्चे में कैसे जा गिरा था,’’ रामू ने रघु को सम?ाना चाहा, ‘‘खतरा उठाने की क्या जरूरत है? आराम से घर जा कर सुनना.’’ इस पर रघु ठठा कर हंस दिया था.
‘‘जब देखो, तब कान में कनठेपी लगाए घूमता रहता है…’’ रामू के कान में बंशी चाचा के कहे शब्द गूंज रहे थे,
‘‘
देख लेना, अभी तो कुछ सुन नहीं रहा. कल को किसी भारी एक्सीडैंट के चपेट में आएगा, तो पता चलेगा.’’
‘‘इस ईयरफोन से आवाज कितनी बढि़या आती हैजैसे स्टेज के सामने खड़े हो कर सुन रहे हों. सिर्फ 50 रुपए में मिल गया. इतना सस्ता में कहां
मिलता है…’’
‘‘लेकिन इस तरह हाईवे पर ईयरफोन लगा कर चलने में कितना खतरा है…’’ रामू बोला.
‘‘अरे, हम सड़क के बीच में नहीं, सड़क किनारे चल रहे हैं…’’ रघु ने कहा.

हाईवे के दोनों तरफ भारी गाडि़यां तेजी से दौड़ रही थीं. अचानक सड़क पर होड़ लगा कर दौड़ते ट्रकों को ओवरटेक करती एक पिकअप वैन को अपनी तरफ आता देख कर रामू चिल्लाया और भागा, ‘‘बचो रघु, यह हमारी तरफ ही रही है.’’
रघु के साथ 2 साथी और थे, जिन्होंने कान में ईयरफोन लगा रखा था, इसलिए उन लोगों ने भी कुछ नहीं सुना, जबकि चाचा बंशी, चाचा सोनू और भैया भानु ने उस की आवाज सुन ली थी. वे चारों हाईवे की ढलान पर भागे. तब तक तो रघु के साथ मनोज और रंजीत उस पिकअप वैन की चपेट में ही चुके थे. पिकअप वैन पलभर को रुकी. उन तीनों को गिरते, सड़क पर छटपटाते देखा, फिर तेज रफ्तार से वहां से चली गई.
वे तीनों सड़क पर पड़े छटपटा रहे थे. सड़क का वह हिस्सा खून से लाल हो रहा था. किसी के सिर में, तो किसी के हाथपैर में चोट लगी थी.

बंशी चाचा अपने गमछे से उन के जख्मी शरीर को बांध रहे थे, ताकि बहता खून रुक जाए. रामू आतीजाती गाडि़यों को रुकने और मदद करने के लिए हाथ हिलाते हुए चिल्ला रहा था, मगर यहां किस को चिंता थी.
यहां हाईवे की भागमभाग में सब को अपनीअपनी ही पड़ी थी. आखिरकार एक आटोरिकशा दिखा, जिसे रामू ने रुकवाया. फिर तीनों घायलों को उस में टांगटूंग कर बैठाया और अस्पताल जाने का इंतजाम किया.
रास्ते में रघु कराहते हुए रामू से कह रहा था, ‘‘तुम ठीक कह रहे थे रामू.

अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’ रास्ते में ही रघु ने दम तोड़ दिया था. दूसरे 2 लोगों में से एक के हाथ, जबकि दूसरे के हाथपैर दोनों टूटे थे. अस्पताल से वापस गांव आने पर रामू बहुत उदास था. रघु के घर का हाहाकार उस के कानों में गूंज रहा था. बारबार उस की आंखों के सामने रघु का चेहरा रहा था. रामू के कानों में घायल रघु की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’  

Hindi Romantic Story: इश्क वाला लव – मिस रुशाली की तिरछी नजर का तीर

Hindi Romantic Story: जब से मिस रुशाली की प्यार भरी नजर मु झ पर पड़ी थी, तब से मानो मैं तो जी उठा था. हमारे दफ्तर के सारे मर्दों में मैं ही तो सिर्फ शादीशुदा था और उस पर एक बच्चे का बाप भी. ऐसे में मिस रुशाली पर मेरा जादू चलना किसी चमत्कार से कम न था. पर अब जब यह चमत्कार हो गया था, तब ऐसे में सभी को आहें भरते देख मैं खुद पर नाज कर बैठा था.

‘‘मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उस विशाल पर मिस रुशाली फिदा होंगी. पता नहीं, उस हसीना को उस ढहते हुए बूढ़े बरगद के पेड़ में न जाने क्या नजर आया, जो उसे अपना दिल दे बैठी?’’ लंच करते वक्त रमेश आहें भरता हुआ सब से कह रहा था.

‘‘हां भाई, अब यह बेचारा दिल ही तो है. अब यह किसी गधे पर आ जाए, तो इस में उस कमसिन मासूम हसीना का क्या कुसूर?’’ राहुल के इस मजाक पर सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

कैंटीन में घुसते वक्त जब मैं ने अपने साथियों की ये बातें सुनीं, तो मैं मन ही मन इतरा उठा और अपना लंच बौक्स उठा कर दोबारा अपनी सीट पर आ कर बैठ गया.

अपने दफ्तर के सारे आशिकों के जलते हुए दिलों से निकलती हुई आहें मेरे मन को ऐसा सुकून दे रही थीं कि मैं खुशी के चलते फिर कुछ खा न पाया.

तब मैं ने चपरासी से कौफी मंगाई और कौफी पी कर फिर से अपने काम में जुट गया. वैसे तो उस समय मैं लैपटौप पर काम कर रहा था, पर मेरा ध्यान तो मिस रुशाली के इर्दगिर्द ही घूम रहा था.

सलीके का पहनावा, तीखे नैननक्श, सुल झे हुए बाल और उस पर मदमस्त चाल. सच में मिस रुशाली एक ऐसा कंपलीट पैकेज है, जिस के लिए जितनी भी कीमत चुकाई जाए, कम है.

अब तो मिस रुशाली के सामने मुझे अपनी पत्नी प्रिया की शख्सीयत बौनी सी लगने लगी थी. वैसे, प्रिया में एक पत्नी के सारे गुण थे और मैं उसे प्यार भी करता था, पर मिस रुशाली से मिलने के बाद मुझे लगने लगा था कि कुछ तो ऐसा है मिस रुशाली में, जो प्रिया में नहीं है.

शायद, मु झे मिस रुशाली से इश्क वाला लव हुआ है, जो शायद उस लव से ज्यादा है, जो मैं अपनी पत्नी प्रिया से करता था, इसलिए तो मिस रुशाली मेरे मन में बसती जा रही थी.

इधर मेरा प्यार परवान चढ़ रहा था, तो उधर मिस रुशाली का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोलने लगा था.

लौंग ड्राइव, पांचसितारा होटल में डिनर, महंगे उपहार पा कर मिस रुशाली मु झ पर फिदा हो गई थी. जब भी मैं उस की बड़ीबड़ी  झील सी आंखों में अपने प्रति उमड़ रहे प्यार को देखता, तब मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगता था.

अब तो सिर्फ इसी बात की इच्छा होती कि न जाने ऐसा वक्त कब आएगा, जब मिस रुशाली की प्यार भरी नजरें मु झ पर मेहरबान होंगी और उस प्यार भरी बारिश में मेरा मन भीग जाएगा.

बस, इसी कल्पना की चाह में मैं फिर से जी उठा था. ऐसा लगता था, मानो मैं उस मंजिल को पा गया हूं, जहां धरती और आसमान एक हो जाते हैं.

पर प्रिया मेरे अंदर आए इस बदलाव से कैसे अछूती रह पाती? अब उस की सवालिया नजरें मु झ पर उठने लगी थीं. पर मैं चुप था, क्योंकि मु झे एक सही मौके की तलाश जो थी.

रात को सोते वक्त जब कभी प्रिया मेरे नजदीक आने की कोशिश करती, तब मैं जानबू झ कर उस की अनदेखी कर देता था.

तब मैं तो मुंह फेर कर सो जाता और वह आंसू बहाती रहती. मु झे उस का रोना अखरता था, पर मैं क्या करता? मैं अपने दिल के हाथों मजबूर जो था.

बीतते समय के साथ मेरी मिस रुशाली को पाने की चाह बढ़ने लगी थी, क्योंकि मिस रुशाली की बड़ीबड़ी आंखों में मेरे प्रति प्यार का सागर तेजी से हिलोरें जो लेने लगा था.

अब मु झे लगने लगा था कि शायद सही वक्त आ गया है, जब मु झे प्रिया से तलाक ले कर मिस रुशाली को अपना बनाना होगा, तभी मेरी इस उमस भरी जिंदगी में खुशियों के फूल खिल पाएंगे.

अभी मैं सही मौके की तलाश में था कि अचानक मेरी किस्मत मु झ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गई. प्रिया के मामाजी के अचानक बीमार होने के चलते वह पूरे 3 दिन के लिए आगरा क्या गई, मु झे तो मानो दबा हुआ चिराग मिल गया.

‘सुनो, मैं आगरा जा रही हूं. तुम्हारा खाना कैसरोल में रखा है,’ प्रिया अपना सामान पैक करते हुए फोन पर मु झ से कह रही थी.

‘‘तुम जल्दी से निकलो. मेरे खाने

की चिंता मत करो, वरना तुम्हारी शाम वाली बस छूट जाएगी,’’ मैं खुशी के मारे हड़बड़ा रहा था.

‘हां जी, वह तो ठीक है. मैं ने श्यामा को बोल दिया है कि वह सुबहशाम आप का मनपसंद खाना बना दिया करेगी,’ प्रिया अभी भी मेरे लिए परेशान थी.

‘‘प्रिया, मैं तो चाह रहा था कि मैं दफ्तर से जल्दी निकल कर तुम्हें बसस्टैंड पर छोड़ आऊं, पर क्या करूं, इतना ज्यादा काम जो है,’’ मैं ने अपनी चालाकी दिखाते हुए कहा.

‘नहीं जी, आप अपना काम करो. मैं चली जाऊंगी,’ इतना कह कर प्रिया ने फोन रख दिया.

प्रिया का इस तरह अचानक चले जाना मु झे एक अनजानी सी खुशी दे गया. मैं बावला सा कभी सोचता कि यहां दफ्तर में ही मिस रुशाली को सबकुछ बता कर अपने घर ले जाऊं.

पर फिर बहुत सोचने के बाद मु झे यही लगा कि मैं अपने घर पहुंच कर फ्रैश होने के बाद ही मिस रुशाली से मिलने जाऊंगा.

जब वह अचानक मु झे देखेगी, तब मु झ पर चुंबनों की बरसात कर देगी और उस प्यारभरी बारिश में भीग कर हम दोनों दो जिस्म एक जान बन जाएंगे.

बस फिर क्या था. मैं तुरंत घर पहुंचा और अच्छी तरह तैयार हो कर मिस रुशाली के पास पहुंच गया.

दरवाजे की घंटी बजाने पर दरवाजा रुशाली ने नहीं, बल्कि एक मोटी सी औरत ने खोला.

‘‘मिस रुशाली…’’

‘‘वह ऊपर रहती है,’’ उस औरत ने बेरुखी से कहा.

फिर मैं ऊपर चढ़ गया. जब मैं रुशाली के कमरे में पहुंचा, तब मैं ने देखा कि वह किसी चालू फिल्मी गाने पर थिरक रही थी. कमरे में चारों तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे और जूठे बरतन यहांवहां लुढ़के पड़े थे.

‘‘अरे तुम, अचानक…’’ मु झे अचानक सामने देख वह हड़बड़ा गई, ‘‘वह क्या है न, आज मेड नहीं आई.’’

रुशाली यहांवहां पड़ा सामान समेटने लगी. फिर उस ने सामने पड़ी कुरसी पर पड़ी धूल साफ की और मु झे बैठने का इशारा किया. फिर वह मेरे लिए पानी लेने चली गई.

रुशाली के जाने के बाद जब मैं ने कमरे में चारों तरफ नजर घुमाई, तो गर्द की जमी मोटी सी परत को पाया.

इतना गंदा कमरा देख मेरा जी मिचलाने लगा. अब धीरेधीरे मु झे अपनी प्रिया की कद्र सम झ आने लगी थी. वह तो सारा घर शीशे की तरह चमका कर रखती है, तब भी मैं उसे टोकता ही रहता हूं, पर यहां तो गंदगी का ऐसा आलम है कि पूछो मत.

‘‘कुछ खाओगे क्या?’’ पानी का गिलास देते हुए रुशाली मु झ से पूछ बैठी.

‘‘हां… भूख तो लगी है.’’

‘‘ये लो टोस्ट और चाय,’’ थोड़ी देर में रुशाली मु झे चाय की ट्रे थमाते हुए बोली.

डिनर में चाय देख कर मेरे सिर पर चढ़ा इश्क का रहासहा भूत भी उतर गया.

‘‘वह क्या  है न… मु झे तो बस यही बनाना आता है, क्योंकि सारा खाना तो मेरी आंटी ही बनाती हैं. पेईंग गैस्ट हूं मैं उन की,’’ रुशाली अपना पसीना पोंछते हुए बोली, तो मैं सम झ गया कि अब तक मैं जो कुछ भी रुशाली के लिए महसूस कर रहा था, वह सिर्फ एक छलावा था. मेरा उखड़ा मूड देख कर तुरंत रुशाली ने अपना अगला पासा फेंका.

वह तुरंत मेरे पास आई और बेशर्मी से अपना गाउन उतारने लगी.

‘‘क्या कर रही हो यह…’’ मैं गुस्से से तमतमा उठा.

‘‘अरे, शरमा क्यों रहे हो? जो करने आए थे, वह करे बिना ही वापस चले जाओगे क्या?’’ इतना कह कर वह मु झ से लिपटने लगी.

उसे इस तरह करते देख मैं हड़बड़ा गया. इस से पहले कि मैं खुद को संभाल पाता, उस ने मु झे यहांवहां चूमना शुरू कर दिया.

तभी अचानक मेरे गले में पड़ा लौकेट उस के हाथ में आ गया, जिस

में मेरी बीवी प्रिया और अंशुल का

फोटो था.

‘‘ओह, तो यह है तुम्हारी देहाती पत्नी… अरे, इसे तलाक दे दो और मेरे नाम अपना फ्लैट कर दो, फिर देखो कि मैं कैसे तुम्हें जन्नत का मजा दिलाती हूं?’’ इतना कह कर वह मु झ से लिपटने की कोशिश करने लगी.

‘‘प्यार बिना शर्त के होता है रुशाली,’’ मैं उस समय सिर्फ इतना ही कह पाया.

‘‘आजकल कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, मिस्टर. हर चीज की कीमत होती है और हर किसी को वो कीमत चुकानी ही पड़ती है,’’ इतना कह कर रुशाली जोर से हंस पड़ी.

रुशाली के प्यार का यह घिनौना रूप देख मैं टूट सा गया और उसे धक्का दे कर बाहर आ गया.

हारी हुई नागिन की तरह रुशाली जोर से चीखते हुए बोली, ‘‘विशाल, मेरा डसा तो पानी भी नहीं मांगता, फिर तुम क्या चीज हो?’’

पर मैं तब तक अपनी कार में बैठ चुका था और मेरे इश्क वाले लव का भूत उतर चुका था. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: अग्निपरीक्षा – जिंदगी के तूफान में फंसी श्रेष्ठा

Best Hindi Kahani: जीवन प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत, मनोरम पहाड़ी रास्ता नहीं है क्या, जहां मानव सुख से अपनों के साथ प्रकृति के दिए उपहारों का आनंद उठाते हुए आगे बढ़ता रहता है.

फिर अचानक किसी घुमावदार मोड़ पर अतीत को जाती कोई संकरी पगडंडी उस की खुशियों को हरने के लिए प्रकट हो जाती है. चिंतित कर, दुविधा में डाल उस की हृदय गति बढ़ाती. उसे बीते हुए कुछ कड़वे अनुभवों को याद करने के लिए मजबूर करती.

श्रेष्ठा भी आज अचानक ऐसी ही एक पगडंडी पर आ खड़ी हुई थी, जहां कोई जबरदस्ती उसे बीते लमहों के अंधेरे में खींचने का प्रयास कर रहा था. जानबूझ कर उस के वर्तमान को उजाड़ने के उद्देश्य से.

श्रेष्ठा एक खूबसूरत नवविवाहिता, जिस ने संयम से विवाह के समय अपने अतीत के दुखदायी पन्ने स्वयं अपने हाथों से जला दिए थे. 6 माह पहले दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे और पूरी निष्ठा से एकदूसरे को समझते हुए, एकदूसरे को सम्मान देते हुए गृहस्थी की गाड़ी उस खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर दौड़ा रहे थे. श्रेष्ठा पूरी ईमानदारी से अपने अतीत से बाहर निकल संयम व उस के मातापिता को अपनाने लगी थी.

जीवन की राह सुखद थी, जिस पर वे दोनों हंसतेमुसकराते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक रविवार की एक शाम आदेश को अपनी ससुराल आया देख उस के हृदय को संदेह के बिच्छु डसने लगे.

श्रेष्ठा के बचपन के मित्र के रूप में अपना परिचय देने के कारण आदेश को घर में प्रवेश व सम्मान तुरंत ही मिल गया, सासससुर ने उसे बड़े ही आदर से बैठक में बैठाया व श्रेष्ठा को चायनाश्ता लाने को कहा.

श्रेष्ठा तुरंत रसोई की ओर चल पड़ी पर उस की आंखों में एक अजीब सा भय तैरने लगा. यों तो श्रेष्ठा और आदेश की दोस्ती काफी पुरानी थी पर अब श्रेष्ठा उस से नफरत करती थी. उस के वश में होता तो वह उसे अपनी ससुराल में प्रवेश ही न करने देती. परंतु वह अपने पति व ससुराल वालों के सामने कोई तमाशा नहीं चाहती थी, इसीलिए चुपचाप चाय बनाने भीतर चली गई. चाय बनाते हुए अतीत के स्मृति चिह्न चलचित्र की भांति मस्तिष्क में पुन: जीवित होने लगे…

वषों पुरानी जानपहचान थी उन की जो न जाने कब आदेश की ओर से एकतरफा प्रेम में बदल गई. दोनों साथ पढ़ते थे, सहपाठी की तरह बातें भी होती थीं और मजाक भी. पर समय के साथ श्रेष्ठा के लिए आदेश के मन में प्यार के अंकुर फूट पड़े, जिस की भनक उस ने श्रेष्ठा को कभी नहीं होने दी.

यों तो लड़कियों को लड़कों मित्रों के व्यवहार व भावनाओं में आए परिवर्तन का आभास तुरंत हो जाता है, परंतु श्रेष्ठा कभी आदेश के मन की थाह न पा सकी या शायद उस ने कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि वह तो किसी और का ही हाथ थामने के सपने देख, उसे अपना जीवनसाथी बनाने का वचन दे चुकी थी.

हरजीत और वह 4 सालों से एकदूजे संग प्रेम की डोर से बंधे थे. दोनों एकदूसरे के प्रति पूर्णतया समर्पित थे और विवाह करने के निश्चय पर अडिग. अलगअलग धर्मों के होने के कारण उन के परिवार इस विवाह के विरुद्घ थे, पर उन्हें राजी करने के लिए दोनों के प्रयास महीनों से जारी थे. बच्चों की जिद और सुखद भविष्य के नाम पर बड़े झुकने तो लगे थे, पर मन की कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी.

किसी तरह दोनों घरों में उठा तूफान शांत होने ही लगा था कि कुदरत ने श्रेष्ठा के मुंह पर करारा तमाचा मार उस के सपनों को छिन्नभिन्न कर डाला.

हरजीत की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. श्रेष्ठा के उजियारे जीवन को दुख के बादलों ने पूरी तरह ढक लिया. लगा कि श्रेष्ठा की जीवननैया भी डूब गई काल के भंवर में. सब तहसनहस हो गया था. उन के भविष्य का घर बसने से पहले ही कुदरत ने उस की नींव उखाड़ दी थी.

इस हादसे से श्रेष्ठा बूरी तरह टूट गई  पर सच कहा गया है समय से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं. हर बीतते दिन और मातापिता के सहयोग, समझ व प्रेमपूर्ण अथक प्रयासों से श्रेष्ठा अपनी दिनचर्या में लौटने लगी.

यह कहना तो उचित न होगा कि उस के जख्म भर गए पर हां, उस ने कुदरत के इस दुखदाई निर्णय पर यह प्रश्न पूछना अवश्य छोड़ दिया था कि उस ने ऐसा अन्याय क्यों किया?

सालभर बाद श्रेष्ठा के लिए संयम का रिश्ता आया तो उस ने मातापिता की इच्छापूर्ति के लिए तथा उन्हें चिंतामुक्त करने के उद्देश्य से बिना किसी उत्साह या भाव के, विवाह के लिए हां कह दी. वैसे भी समय की धारा को रोकना जब वश में न हो तो उस के साथ बहने में ही समझदारी होती है. अत: श्रेष्ठा ने भी बहना ही उचित समझा, उस प्रवाह को रोकने और मोड़ने के प्रयास किए बिना.

विवाह को केवल 5 दिन बचे थे कि अचानक एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई. आदेश जो श्रेष्ठा के लिए कोई माने नहीं रखता था, जिस का श्रेष्ठा के लिए कोई वजूद नहीं था एक शाम घर आया और उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. श्रेष्ठा व उस के पिता ने जब उसे इनकार कर स्थिति समझाने का प्रयत्न किया तो उस का हिंसक रूप देख दंग रह गए.

एकतरफा प्यार में वह सोचने समझने की शक्ति तथा आदरभाव गंवा चुका था. उस ने काफी हंगामा किया. उस की श्रेष्ठा के भावी पति व ससुराल वालों को भड़का कर उस का जीवन बरबाद करने की धमकी सुन श्रेष्ठा के पिता ने पुलिस व रिश्तेदारों की सहायता से किसी तरह मामला संभाला.

काफी देर बाद वातावरण में बढ़ी गरमी शांत हुई थी. विवाह संपन्न होने तक सब के मन में संदेह के नाग अनहोनी की आशंका में डसते रहे थे. परंतु सभी कार्य शांतिपूर्वक पूर्ण हो गए.

बैठक से तेज आवाजें आने के कारण श्रेष्ठा की अतीत यात्रा भंग हुई और वह बाहर की तरफ दौड़ी. बैठक का माहौल गरम था. सासससुर व संयम तीनों के चेहरों पर विस्मय व क्रोध साफ झलक रहा था. श्रेष्ठा चुपचाप दरवाजे पर खड़ी उन की बातें सुनने लगी.

‘‘आंटीजी, मेरा यकीन कीजिए मैं ने जो भी कहा उस में रत्तीभर भी झूठ नहीं है,’’ आदेश तेज व गंभीर आवाज में बोल रहा था. बाकी सब गुस्से से उसे सुन रहे थे.

‘‘मेरे और श्रेष्ठा के संबंध कई वर्ष पुराने हैं. एक समय था जब हम ने साथसाथ जीनेमरने के वादे किए थे. पर जैसे ही मुझे इस के गिरे चरित्र का ज्ञान हुआ मैं ने खुद को इस से दूर कर लिया.’’

आदेश बेखौफ श्रेष्ठा के चरित्र पर कीचड़ फेंक रहा था. उस के शब्द श्रेष्ठा के कानों में पिघलता शीशी उड़ेल रहे थे.

आदेश ने हरजीत के साथ रहे श्रेष्ठा के पवित्र रिश्ते को भी एक नया ही

रूप दे दिया जब उस ने उन के घर से भागने व अनैतिक संबंध रखने की झूठी बात की. साथ ही साथ अन्य पुरुषों से भी संबंध रखने का अपमानजनक लांछन लगाया. वह खुद को सच्चा साबित करने के लिए न जाने उन्हें क्याक्या बता रहा था.

आदेश एक ज्वालामुखी की भांति झूठ का लावा उगल रहा था, जो श्रेष्ठा के वर्तमान को क्षणभर में भस्म करने के लिए पर्याप्त था, क्योंकि हमारे समाज में स्त्री का चरित्र तो एक कोमल पुष्प के समान है, जिसे यदि कोई अकारण ही चाहेअनचाहे मसल दे तो उस की सुंदरता, उस की पवित्रता जीवन भर के लिए समाप्त हो जाती है. फिर कोई भी उसे मस्तक से लगा केशों में सुशोभित नहीं करता है.

श्रेष्ठा की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. क्रोध, भय व चिंता के मिश्रित भावों में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हृदय की धड़कन तेज दौड़तेदौड़ते अचानक रुक जाएगी.

‘‘उफ, मैं क्या करूं?’’

उस पल श्रेष्ठा के क्रोध के भाव 7वें आसमान को कुछ यों छू रहे थे कि यदि कोई उस समय उसे तलवार ला कर दे देता तो वह अवश्य ही आदेश का सिर धड़ से अलग कर देती. परंतु उस की हत्या से अब क्या होगा? वह जिस उद्देश्य से यहां आया था वह तो शायद पूरा हो चुका था.

श्रेष्ठा के चरित्र को ले कर संदेह के बीज तो बोए जा चुके थे. अगले ही पल श्रेष्ठा को लगा कि काश, यह धरती फट जाए और वह इस में समा जाए. इतना बड़ा कलंक, अपमान वह कैसे सह पाएगी?

आदेश ने जो कुछ भी कहा वह कोरा झूठ था. पर वह यह सिद्घ कैसे करेगी? उस की और उस के मातापिता की समाज में प्रतिष्ठा का क्या होगा? संयम ने यदि उस से अग्निपरीक्षा मांगी तो?

कहीं इस पापी की बातों में आ कर उन का विश्वास डोल गया और उन्होंने उसे अपने जीवन से बाहर कर दिया तो वह किसकिस को अपनी पवित्रता की दुहाई देगी और वह भी कैसे? वैसे भी अभी शादी को समय ही कितना हुआ था.

अभी तो वह ससुराल में अपना कोई विशेष स्थान भी नहीं बना पाई थी. विश्वास की डोर इतनी मजबूत नहीं हुई थी अभी, जो इस तूफान के थपेड़े सह जाती. सफेद वस्त्र पर दाग लगाना आसान है, परंतु उस के निशान मिटाना कठिन. कोईर् स्त्री कैसे यह सिद्घ कर सकती है कि वह पवित्र है. उस के दामन में लगे दाग झूठे हैं.

जब श्रेष्ठा ने सब को अपनी ओर देखते हुए पाया तो उस की रूह कांप उठी. उसे लगा सब की क्रोधित आंखें अनेक प्रश्न पूछती हुई उसे जला रही हैं. अश्रुपूर्ण नयनों से उस ने संयम की ओर देखा. उस का चेहरा भी क्रोध से दहक रहा था. उसे आशंका हुई कि शायद आज की शाम उस की इस घर में आखिरी शाम होगी.

अब आदेश के साथ उसे भी धक्के दे घर से बाहर कर दिया जाएगा. वह चीखचीख कर कहना चाहती थी कि ये सब झूठ है. वह पवित्र है. उस के चरित्र में कोई खोट नहीं कि तभी उस के ससुरजी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.

स्थिति अधिक गंभीर थी. सबकुछ समझ और कल्पना से परे. श्रेष्ठा घबरा गई कि अब क्या होगा? क्या आज एक बार फिर उस के सुखों का अंत हो जाएगा? परंतु उस के बाद जो हुआ वह तो वास्तव में ही कल्पना से परे था. श्रेष्ठा ने ऐसा दृश्य न कभी देखा था और न ही सुना.

श्रेष्ठा के ससुरजी गुस्से से तिलमिलाते हुए खड़े हुए और बेकाबू हो उन्होंने आदेश को कस कर गले से पकड़ लिया, बोले, ‘‘खबरदार जो तुमने मेरी बेटी के चरित्र पर लांछन लगाने की कोशिश भी की तो… तुम जैसे मानसिक रोगी से हमें अपनी बेटी का चरित्र प्रमाणपत्र नहीं चाहिए. निकल जाओ यहां से… अगर दोबारा हमारे घर या महल्ले की तरफ मुंह भी किया तो आगे की जिंदगी हवालात में काटोगे.’’

फिर संयम और ससुर ने आदेश को धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया. ससुरजी ने श्रेष्ठा के सिर पर हाथ रख कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेटी. तुम सुरक्षित हो. हमें तुम पर विश्वास है. अगर यह पागल आदमी तुम्हें मिलने या फोन कर परेशान करने की कोशिश करे तो बिना संकोच तुरंत हमें बता देना.’’

सासूमां प्यार से श्रेष्ठा को गले लगा चुप करवाने लगीं. सब गुस्से में थे पर किसी ने एक बार भी श्रेष्ठा से कोई सफाई नहीं मांगी.

घबराई और अचंभित श्रेष्ठा ने संयम की ओर देखा तो उस की आंखें जैसे कह रही थीं कि मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. मेरा विश्वास और प्रेम इतना कमजोर नहीं जो ऐसे किसी झटके से टूट जाए. तुम्हें केवल नाम के लिए ही अर्धांगिनी थोड़े माना है जिसे किसी अनजान के कहने से वनवास दे दूं.

तुम्हें कोई अग्निपरीक्षा देने की आवश्यकता नहीं. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं और रहूंगा. औरत को अग्निपरीक्षा देने की जरूरत नहीं. यह संबंध प्यार का है, इतिहास का नहीं.

श्रेष्ठा घंटों रोती रही और आज इन आंसुओं में अतीत की बचीखुची खुरचन भी बह गई. हरजीत की मृत्यु के समय खड़े हुए प्रश्न कि यह अन्याय क्यों हुआ, का उत्तर मिल गया था उसे.

पति सदासदा के लिए अपना होता है. उस पर भरोसा करा जा सकता है. पहले क्या हुआ पति उस की चिंता नहीं करते उस का जीवन सफल हो गया था.

पुराणों के देवताओं से कहीं ज्यादा श्रेष्ठकर संयम की संगिनी बन कर सासससुर के रूप में उच्च विचारों वाले मातापिता पा कर स्त्री का सम्मान करने वाले कुल की बहू बन कर नहीं, बेटी बन कर उस रात श्रेष्ठा तन से ही नहीं मन से भी संयम की बांहों में सोई. उसे लगा कि उस की असल सुहागरात तो आज है. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: पूंजी – अनसुलझे सवाल से परेशान दुलारी

Hindi Kahani: इश्क और इज्जत में से अगर किसी एक को चुनना पड़े तो ज्यादातर लोग इज्जत को ही चुनेंगे. वहीं अगर यह चुनाव अपनी जान और इज्जत के बीच हो तो…? तब भी क्या इज्जत को ही चुना जाएगा? यह सवाल दुलारी को लगातार परेशान कर रहा था.

महामारी तो पिछले साल से ही कहर बरपा रही है, लेकिन तब के घोषित लौकडाउन और इस साल के अघोषित लौकडाउन में बहुत फर्क है. पिछले साल सरकार और दूसरी स्वयंसेवी संस्थाएं जरूरतमंदों की मदद के लिए खूब आगे आ रही थीं. मालिक भी अपने मुलाजिमों के काम पर न आने के बावजूद उन्हें तनख्वाह दे रहे थे. चाहे वह सामाजिक दबाव के चलते ही रहा होगा, लेकिन भूख से मरने की नौबत तो कम से कम नहीं आई थी. पर इस साल तो जान बचाना ही भारी लग रहा है.

क्या किया जाए? न अंटी में पैसा, न गांठ में धेला. रोज कमानेखाने वालों के पास जमापूंजी भी कहां होती है. सरकार जनधन जैसी योजनाओं की कामयाबी के लाख दावे करे, लेकिन जमीनी हकीकत से तो भुक्तभोगी ही वाकिफ होगा न. बैंक में खाता खोल देनेभर से रुपया जमा नहीं हो जाता.

रोज सुबह एकएक अंगुल खाली होते जा रहे आटे के कनस्तर को देखती दुलारी मन ही मन अंदाजा लगाती जा रही थी कि कितने दिन और वह अपनी जद्दोजेहद को जारी रख सकती है. जिस दिन कनस्तर का पेंदा बोल जाएगा, उस दिन उसे भी सब सोचविचार छोड़ कर वही रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिस पर वह अभी तक विचार करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाई है.

दुलारी के होश संभालते ही मां ने मन की जमीन पर संस्कारों के बीज डालने शुरू कर दिए थे, जो उम्र के साथसाथ अब पेड़ की माफिक अपनी पक्की जड़ें जमा चुके हैं. पेड़ों को जड़ से उखाड़ना आसान है क्या?

‘हम गरीबों के पास यही एक पूंजी है छोरी और वह है हमारी इज्जत. आंखों का पानी खत्म तो सम झ सब खत्म…’ मां के दिए ऐसे संस्कार दुलारी का पीछा ही नहीं छोड़ते. लेकिन बेचारी मां को क्या पता था कि इस तरह की कोई महामारी भी आ सकती है, जिस की आंधी में उस के लगाए संस्कारों के पेड़ सूखे पत्ते से उड़ जाएंगे.

एक तरफ सरकार कहती है कि लौकडाउन लगाना सही नहीं है, वहीं दूसरी तरफ लोगों से गुजारिश भी करती है कि घर में रहो, बाहरी लोगों से कम से कम मेलजोल रखो. यह दोहरी नीति ही तो जान पर भारी पड़ रही है.

पिछली दफा किसी तरह मरतेबचते गांव वापस गए थे, लेकिन वहां भी क्या मिला? वैसे, कुसूर गांवों का भी नहीं. वहां अगर मजदूरी होती तो लोग शहरों की तरफ भागते ही क्यों? शहर कम से कम भूखा तो नहीं सुलाता था.

जल्दी ही गांव का चश्मा दुलारी की आंखों से उतर गया था. उधर वापस जब सब सामान्य होने लगा, तो सब से पहले उसी ने अपना बोरियाबिस्तर बांधा था. कितनी मुश्किल से लोगों को भरोसा दिलाया था कि वह ठीक है. अभी कुछ घरों में नियमित काम मिला ही था कि फिर से वही डर के साए.

जब से साहब लोगों के घरों में फिर से लौकडाउन लगने की सुगबुगाहट सुनी है, तब से दुलारी का जी उठाउठा का जा रहा है. काम करते समय हाथ यहां रसोई में और कान वहां टैलीविजन की खबरों पर लगे हुए हैं.

टैलीविजन पर कैसे लोग चिल्लाचिल्ला कर बहस करते हैं. उस के लिए तो अब ये बातें बिलकुल बेमानी हैं कि इन हालात में आने के लिए कौन जिम्मेदार है. किस की कहां चूक थी या किन लापरवाहियों के चलते हालात इतने बिगड़े हैं. अब वह बड़ी सरकार तो है नहीं कि सरकार के फैसले को चुनौती दे. वह तो भेड़ है, जिसे मालिक की हांक के इशारे पर ही चलना पड़ेगा.

शाम को दुलारी घर आई तो मां की आंखों में भी खौफ दिखा. उन्हें भी शायद किसी ने टैलीविजन की खबरों के बारे में बता दिया होगा. मां ने आंखों में सवाल भर कर उस की तरफ देखा तो वह आंखें बचाती हुई रसोई की तरफ मुड़ गई.

अनजाने डर से घिरी दुलारी ने घर के सारे कोने तलाश कर लिए. बामुश्किल 500 रुपए ही निकले. इतने से क्या होगा. कितने दिन प्राणों को शरीर में रोक पाएगी. और फिर वह अकेली कहां है… उस के साथ 2 प्राणी और भी तो जुड़े हैं. एक बूढ़ी मां और दूसरा अपाहिज छोटा भाई.

रातभर दुलारी के मन में उमड़घुमड़ चलती रही, ‘काश, मेरे पास भी कुछ पूंजी होती तो आज यों परेशानी में जागरण नहीं कर रही होती.’

दुलारी ने करवट बदलते हुए ठंडी सांस भरी. तभी पूंजी के नाम से मां की बात याद आ गई, ‘गरीब के पास यही तो एक पूंजी होती है छोरी…’

अपनी पूंजी का खयाल आते ही दुलारी पसीने से भीग गई. कपूर साहब की आंखें उसे अपने शरीर से चिपकी हुई महसूस होने लगीं. उस ने अपना दुपट्टा कस कर अपने चारों तरफ लपेट लिया.

‘ऐसी ही किसी आपदाविपदा के लिए तो पूंजी बचाई जाती है. किसी के पास रुपयापैसा, किसी के पास जमीनजायदाद, तो किसी के पास गहनाअंगूठी. तेरे पास तो यही पूंजी है,’ मन में छिपे कुमन ने दुलारी को उकसाया.

दुलारी कसमसाई और अपने कुमन को पीछे धकेल दिया. उस की धकेल में शायद ज्यादा ताकत नहीं थी. कुमन बेशर्मी से दांत फाड़े फिर से उठ खड़ा हुआ.

‘अरी, इस में गलत क्या है? मुसीबत में काम न आए वह कैसी पूंजी? तेरे पास कोई दूसरा रास्ता है तो वह कर ले, लेकिन अपनी और अपने परिवार की जान बचाना तेरा फर्ज है कि नहीं? जब जान ही न बचेगी तो मान बचा कर क्या करेगी,’ कुमन ने दुलारी को हकीकत दिखाने की कोशिश की.

‘ठीक ही तो कहता है बैरी. मैं खुदकुशी कर भी लूं, लेकिन इन दोनों की हत्या का पाप कैसे अपने सिर ले सकती हूं…’ मन पर कुमन हावी होने लगा और आखिरकार उस की जीत हुई.

दुलारी ने कपूर साहब के पास अपनी पूंजी गिरवी रखने का फैसला कर लिया. मन किसी फैसले पर पहुंचा तो नींद भी आ गई.

आज सुबह वही हुआ, जिस का डर था. सालभर पहले जहां से चले थे, वापस वहीं आ गए. सरकार ने प्रदेशभर में सख्त कर्फ्यू लगाने के आदेश जारी कर दिए थे. दुलारी के आंखकान फोन पर लगे थे. अभी मेमसाहब लोग के काम पर न आने के फोन आने शुरू हो जाएंगे. वह अनमनी सी अपने दैनिक काम निबटा रही थी.

‘फोन नहीं बजा. कहीं बंद तो नहीं पड़ा…’ दुलारी ने फोन उठा कर देखा. फोन चालू था. समय देखा तो 8 बजने वाले थे. एक भीतरी खुशी हुई कि शायद अपनी पूंजी गिरवी न रखनी पड़े.

‘8 बजे वर्मा साहब के घर पहुंचना होता है…’ सोचते हुए दुलारी ने रात की रखी ठंडी रोटी चाय के साथ निगली और मास्क लगा, दुपट्टे से अपना चेहरा ढकते हुए दरवाजे की तरफ लपकी, पर दरवाजे से निकल कर मेन सड़क तक आतेआते मोबाइल की घंटी बज गई.

‘सुनो, अभी कुछ दिन तुम रहने दो. थोड़ा नौर्मल हो जाएगा, तब मैं खुद तुम्हें फोन करूंगी…’ फोन उठाने के साथ ही मिसेज वर्मा ने कहा और बिना दुलारी की नमस्ते का जवाब दिए ही खट से फोन काट दिया, मानो कोरोना का वायरस मोबाइल फोन से फैल रहा हो.

दुलारी एक फीकी सी हंसी हंस कर वापस मुड़ गई. एक बार फिर से अपनी पूंजी को गिरवी रखने की सलाह कुमन देने लगा था.

‘‘ले, अखबार पढ़ ले. लोग तो अखबार से ऐसे डर रहे हैं मानो उन के घर में साक्षात मौत आ रही हो…’’ अखबार बेचने वाला राजू अपनी साइकिल पर बिना बिके अखबारों का बंडल लटकाए भारी कदमों से धीरेधीरे पैडल मारता दुलारी के पास से निकला, तो 2-3 प्रतियां उस के हाथ में थमा गया.

कर्फ्यू में क्या खुला क्या बंद रहेगा की सूची अखबार के पहले पन्ने पर ही लिखी थी… आखिरी लाइन पर आतेआते उस की नजर ठिठक गई. लिखा था, ‘मजदूरों के पलायन को रोकने की खातिर सरकार ने निर्माण कार्य जारी रखने का फैसला किया है…’

यह पढ़ते ही दुलारी की आंखों की बु झती रोशनी फिर से टिमटिमाने लगी.

‘‘नहीं करना घरघर जा कर कपड़ेबरतन. जब तक शरीर में जान है, ईंटगारा ढो लूंगी. दोनों टाइम सब्जीदाल न सही, 3 प्राणियों को चायरोटी का टोटा तो नहीं पड़ने दूंगी,’’ खुद से कह कर दुलारी ने अखबार समेटा और काख में दबाते हुए मुसकरा दी. आज अचानक ही उसे अपने कंधे बहुत मजबूत महसूस होने लगे थे. Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: अहंकारी – कामना की वासना का खेल

Best Hindi Kahani: अभिजीत 2 दिनों से घर नहीं लौटा था. उस की मां सरला देवी कंपनी में पूछ आई थीं. अभिजीत 2 दिन पहले कंपनी में आया था, यह चपरासी ने सरला देवी को बताया था. अभिजीत 25 साल का अच्छी कदकाठी का नौजवान था. वह सेठ गोपालदास की कंपनी में पिछले 2 साल से बतौर क्लर्क काम कर रहा था. अभिजीत के परिवार में उस की मां सरला देवी के अलावा 2 बहनें थीं. 2 साल पहले अभिजीत के पिता की मौत हो चुकी थी. वे भी सेठ गोपालदास की कंपनी में काम करते थे. उन्हीं की जगह अभिजीत इस कंपनी में काम कर रहा था.

अभिजीत के इस तरह गायब होने से सरला देवी और उन की दोनों बेटियां परेशान थीं. सरला देवी को उम्मीद थी कि सेठ गोपालदास ने उसे कंपनी के किसी काम से बाहर भेजा होगा, पर अब उन के द्वारा इनकार किए जाने पर सरला देवी की परेशानी और बढ़ गई थी.

सरला देवी ने अभिजीत को हर जगह तलाश किया, पर वह कहीं नहीं मिला. आखिर वह गया तो कहां गया, यह बात उस की मां को बेहद परेशान करने लगी. फिर उन्होंने कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड से बात की. पहले तो उस ने इधरउधर की बात की, फिर बता दिया कि उस दिन कंपनी की छुट्टी का समय हो गया था. उस में काम करने वाले लोग जा चुके थे.

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अभिजीत अपने थोड़े बचे काम को तेजी से निबटा रहा था, ताकि समय से घर लौट सके. तभी सेठ गोपालदास की छोटी बेटी कामना कंपनी में आई. वह अभिजीत की टेबल के करीब आई और अपने हाथ टेबल पर टिका कर झुक गई.

उस समय वह जींस और शर्ट पहने हुई थी, जो उस के भरेभरे जिस्म पर यों कसी हुई थीं कि उस के बदन की ऊंचाइयां और गहराइयां साफ दिख रही थीं.

अभिजीत अपने काम में मशगूल था. कामना ने उस का ध्यान खींचने के लिए अपना पैर धीरे से पटका.

आवाज सुन कर अभिजीत ने नजरें उठा कर देखा तो बस देखता ही रह गया. कामना उस की टेबल पर हाथ टिकाए झुकी हुई थी, जिस से उस के भारी और दूधिया उभारों का ऊपरी हिस्सा शर्ट से झांक रहा था.

वह गार्ड नौजवान था, पर समझदार भी था. उस ने सरला देवी को बताया कि उसे कामना का बरताव अजीब लगा था. वह कोने में खड़ा हो कर उन की बातें सुनने लगा. दफ्तर तो पूरा खाली ही था.  उन दोनों की बातचीत इस तरह थी:

‘कहां खो गए?’ कामना धीरे से बोली थी.

‘कहीं नहीं,’ अभिजीत ने बौखला कर अपनी नजरें उस के उभारों से हटा ली थीं. उस की बौखलाहट देख कर कामना के होंठों पर एक मादक मुसकान खिल उठी थी. वह अभिजीत के सजीले रूप को देखते हुए बोली थी, ‘क्यों, आज घर जाने का इरादा नहीं है?’

‘है तो…’ अभिजीत अपनेआप को संभालते हुए बोला था, ‘थोड़ा सा काम बाकी रह गया था, सोचा, पूरा कर लूं तो चलूं.’

‘काम का क्या है, वह तो होता ही रहेगा…’ कामना बोली थी, ‘पर इनसान को कभीकभी घूमनेफिरने का समय भी निकालना चाहिए.’

‘मैं समझा नहीं.’

‘मैं समझाती हूं…’ कामना अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम्हें घर लौटने की जल्दी तो नहीं है न?’

‘कोई खास जल्दी नहीं…’ अभिजीत बोला था.

‘मैं आज मूड में हूं और अगर तुम्हें एतराज न हो, तो तुम मेरे साथ पापा के कमरे में चलो.’

‘पर मैं आप का मुलाजिम हूं और आप मेरे मालिक की बेटी.’

‘मैं इन बातों को नहीं मानती…’ कामना बोली थी, ‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं इनसान हूं और तुम भी. तुम मुझे अच्छे लगते हो. अब मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं या नहीं, तुम जानो.’

‘आप भी मुझे अच्छी लगती हैं…’ अभिजीत पलभर सोचने के बाद बोला था, ‘ठीक है.’

कामना अभिजीत को ले कर एक कमरे में पहुंचे. दफ्तर में अंधेरा था, पर दरवाजे में एक छेद भी था. गार्ड उसी से देखने लगा कि अंदर क्या हो रहा है.

उस गार्ड ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत कामना की इस हरकत से परेशान लग रहा था.

‘अरे, तुम अभी तक खड़े ही हो?’ कामना बोली थी, ‘आराम से सोफे पर बैठो.’

अभिजीत आगे बढ़ कर कमरे में रखे गुदगुदे सोफे पर बैठ गया था. कामना आ कर उस के करीब बैठ गई थी और अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम ने किसी से प्यार किया है?’

गार्ड सब सुन सकता था, क्योंकि पूरे दफ्तर में सन्नाटा था.

‘नहीं…’ अभिजीत बोला था, ‘कभी यह काम करने का मौका ही नहीं मिला.’

‘अगर मिला, तो क्या करोगे?’

अभिजीत चुप रहा था.

‘तुम ने जवाब नहीं दिया?’

‘हां, करूंगा’ वह बोला था.

‘आज मौका है और समय भी.’

‘पर लड़की?’

‘तुम्हारा मेरे बारे में क्या खयाल है?’ कहते हुए कामना ने अपनी शर्ट उतार दी. उस के ऐसा करते ही उस के उभार अभिजीत के सामने आ गए थे. उन को देखते ही अभिजीत के सब्र का बांध टूट गया था. जब कामना उस से लिपट गई, तो पलभर के लिए वह बौखलाया, फिर अपने हाथ कामना की पीठ पर कस दिए.

इस के बाद तो अभिजीत सबकुछ भूल कर कामना की खूबसूरती की गहराइयों में उतरता चला गया.

सरला देवी ने कामना के ड्राइवर से भी पूछताछ की. उसे भी बहुतकुछ मालूम था. उस ने बताया कि पिछली सीट पर अकसर कामना मनमाने ढंग से उस का इस्तेमाल करने लगी थी.

कामना का दिल जिस पर आ जाता, वह उसे अपने प्रेमजाल में फांसती, उस से अपना दिल बहलाती और जब दिल भर जाता, तो उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंकती.

ड्राइवर ने आगे बताया कि एक दिन उन दोनों में झगड़ा हुआ था. कामना का दिल उस से भर गया, तो वह उस से कन्नी काटने लगी. उस के इस रवैए से अभिजीत तिलमिला उठा. वह कामना से सच्चा प्यार करता था.

जब कामना को पता चला तो वह बोली थी, ‘अपनी औकात देखी है तुम ने? तुम हमारी कंपनी में एक छोटे से मुलाजिम हो. मैं ब्राह्मण और तुम यादव. दूसरी जाति की लड़की को तुम प्यार कर पा रहे हो, क्या यह कम है. शादी की तो सोचना भी नहीं.’

‘पर तुम ने इसी मुलाजिम से दिल लगाया था?’

‘दिल नहीं लगाया था, बल्कि दिल बहलाया था. अब मेरा दिल तुम से भर गया है, इसलिए हमारे रास्ते अलग हैं.’

‘नहीं…’ अभिजीत तेज आवाज में बोला था, ‘तुम मुझे यों अपनी जिंदगी से नहीं निकाल सकती.’

‘और अगर निकाला तो?’

‘मैं सारी दुनिया को तुम्हारी हकीकत बता दूंगा.’

अभिजीत की बात सुन कर कामना पलभर को हड़बड़ाई, पर अगले ही पल उस की आंखों से गुस्सा टपकने लगा. वह अभिजीत को घूरते हुए बोली, ‘तुम ऐसा कर नहीं पाओगे. मैं तुम्हें ऐसा हरगिज करने नहीं दूंगी.’

यह बात सारा दफ्तर जानता था कि एक दिन अभिजीत से सेठ गोपालदास ने कठोर आवाज में सब के सामने बोला था, ‘तुम ने हमारी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया और उस की इज्जत पर हाथ डाला. यह बात खुद कामना ने मुझे बताई है.

‘कोई मेरी बेटी के साथ ऐसी हरकत करे, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकता. तुझे इस की सजा मिलेगी,’ इतना कहने के बाद सेठजी ने अपने आदमियों को इशारा किया था.

सेठजी के आदमी अभिजीत को खींचते हुए दफ्तर से बाहर ले गए. इस के बाद अभिजीत को किसी ने नहीं देखा था.

अभिजीत को गायब हुए जब 10 दिन बीत गए, तो सरला देवी समझ गईं कि अभिजीत मार दिया गया है.

सरला देवी ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखवा दी.

सरला देवी अपने बेटे को ले कर यों परेशानी के दौर से गुजर रही थीं कि उन की मुलाकात अभिजीत के एक दोस्त से हुई, जो उसी के साथ काम करता था. उस ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत को मारने में सेठ गोपालदास का हाथ है.

सरला देवी ने अभिजीत के दोस्त को बताया कि कामना को सबक सिखाना है. कामना अपनी ऐयाशियों में डूबी हुई थी. अभिजीत की मौत से बेपरवाह कामना की नजरें एक दूसरे लड़के को ढूंढ़ रही थीं. उस ने रमेश को फांस लिया.

एक शाम जब कामना अपनी कार में लौंग ड्राइव पर निकली थी, तो रमेश उसे सरला देवी के घर ले गया.

सरला देवी को देख कर कामना की घिग्घी बंध गई. वह सबकुछ उगल गई. रमेश ने उसे एक कुरसी से बांध दिया और कई घंटों तक तड़पने के लिए छोड़ दिया. इस के बाद कामना का पूरा बयान रेकौर्ड कर लिया.

रात में जब सरला देवी ने उसे छोड़ा तो कहा, ‘‘जैसे मैं जिंदगीभर अभिजीत को याद करूंगी, वैसे ही तुम भी करना. यह टेप, यह बयान, हर बार तब काम आएंगे, जब तुम शादी करने की कोशिश करोगी.’’

कामना के पास कोई चारा नहीं बचा था. वह पैदल ही घर की ओर चल पड़ी, हारी और लुटी हुई. Best Hindi Kahani

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