Family Story in Hind: मौत और फैसला- लक्ष्मी, श्रीनिवास और बम धमाका

Family Story in Hindi: लक्ष्मी और श्रीनिवास ने लवमैरिज की थी. पर कुछ समय के बाद ही श्रीनिवास बदल गया था. लक्ष्मी अपने पति को गलत रास्ते पर जाने से न रोक सकी, लेकिन वह अपने सपनों को भी नहीं मरने देना चाहती थी. क्या थे उस के सपने और क्या लक्ष्मी का पति सही रास्ते पर आ पाया? लक्ष्मी अपने हाथ में एक खुला खत लिए हुए खड़ी थी और थरथर कांप रही थी. उस ने घबराते हुए टिकटिक करती हुई घड़ी की तरफ नजर फेंकी. 5 बजने में 35 मिनट बाकी थे. वह फिर से खत देखने लगी. लक्ष्मी देख रही थी कि टेढ़ेमेढ़े अक्षरों में क्या लिखा है, क्या वह इस समय भी पहुंच सकती है? हां, अभी समय है. वह मौके पर पहुंच सकती है. उस ने झपट कर सोफे पर पड़ा हुआ हैंडबैग उठाया और तेजी से बाहर निकली.

घर के सामने ही लक्ष्मी की स्कूटी खड़ी थी. उस ने तेजी से स्कूटी स्टार्ट की और गुलाब बाग की ओर चल पड़ी. उसे रास्ते की भीड़ पर गुस्सा आ रहा था.

फिर भी लक्ष्मी की स्कूटी सनसनाती हुई भीड़भाड़ से भरी सड़कों से गुजरने लगी. लक्ष्मी बारबार घड़ी देख रही थी. समय बड़ी तेजी से निकल रहा था. साढ़े 4 हुए, फिर पौने 5 और अब 4 बज कर 50 मिनट. बस, 10 मिनट और… गुलाब बाग थोड़ी दूर है. ट्रैफिक भी कितना है कि वह कैसी मरी चाल से चला पा रही है स्कूटी को.

4 बज कर 55 मिनट पर लक्ष्मी गुलाब बाग के बड़े दरवाजे पर पहुंची. वहां एक मीटिंग हो रही थी. चारों तरफ नीले झंडे लगे हुए थे.

लक्ष्मी ने स्कूटी खड़ी की और भीड़ की तरफ दौड़ी. भीड़ में घुस पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन वह पलभर में ही बीचोंबीच पहुंच गई.

मंच पर फूलमालाओं से लदा हुआ, सफेद कपड़े और नीली टोपी पहने हुए एक आदमी जोरदार भाषण दे रहा था. उस की आवाज लाउडस्पीकरों के जरीए चारों तरफ फैल रही थी.

लक्ष्मी ने न तो उस आदमी की तरफ देखा और न उस के भाषण का एक भी शब्द सुनने की कोशिश की. उस की आंखें श्रीनिवास को ढूंढ़ रही थीं.

आखिरकार लक्ष्मी ने श्रीनिवास को ढूंढ़ ही लिया. वह मंच के नीचे तीसरी लाइन में बैठा था, लेकिन इस समय 5 बजने में सिर्फ कुछ ही सैकंड बाकी थे.

लक्ष्मी जल्दी से जल्दी श्रीनिवास के पास पहुंचने के लिए भीड़ में से रास्ता बनाने की कोशिश कर रही थी. अचानक उस ने देखा कि श्रीनिवास ने अपनी जेब से एक पिस्तौल निकाली. लक्ष्मी को यह होश नहीं रहा कि पहले पिस्तौल छूटी या उस के मुंह से चीख निकल पड़ी.

फूलमालाओं से लदा हुआ आदमी कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़ा. उस के सीने से सुर्ख खून की धार बह चली. भीड़ में इस हादसे से खलबली मच गई. हर आदमी चीख रहा था.

लक्ष्मी भीड़ के बीच फंस गई थी. वह कुचली जा रही थी, लेकिन फिर भी श्रीनिवास के पास पहुंचने की कोशिश कर रही थी.

अचानक लक्ष्मी को श्रीनिवास के चारों तरफ पुलिस की खाकी वरदियां दिखाई दीं. वह समझ गई कि पुलिस ने उसे पकड़ लिया है.

इस के बाद पुलिस की गाड़ी आ गई. उसे श्रीनिवास की झलक भर मिली थी कि सिपाहियों ने उसे गाड़ी में बंद कर दिया. गाड़ी धूल का गुबार उड़ाती हुई चली गई. लक्ष्मी उस गुबार को देखती रह गई.

लक्ष्मी ने पता लगाने की कोशिश की कि श्रीनिवास को किस जेल में भेजा गया है, मगर कुछ भी पता न लग सका. वह उसी जगह घूमती रही. जब अंधेरा हो गया और वह थक कर चूर हो गई, तो घर लौट आई.

अपने कमरे में आते ही लक्ष्मी एक आरामकुरसी पर गिर पड़ी. उस ने कमरे की बत्ती तक नहीं जलाई. खुली खिड़की से आती हुई रोशनी की पट्टी एक नौजवान के फोटो पर पड़ रही थी.

लक्ष्मी उस फोटो की तरफ एकटक देख रही थी. उस नौजवान के चेहरे पर शांत मुसकराहट खेल रही थी. लक्ष्मी समझ नहीं पा रही थी कि उस की मासूम निगाहों के पीछे आतंक की आग कहां छिपी थी. उसे 5 साल पहले की बातें याद आने लगीं…

उस समय वे दोनों कालेज में पढ़ते थे. वह यानी श्रीनिवास कट्टर राष्ट्रीय विचारों का था. लक्ष्मी उस के विचारों से प्रभावित हो कर उस की तरफ खिंच गई थी. श्रीनिवास के विचार कभीकभी उसे बहुत खतरनाक मालूम पड़ते थे, लेकिन वह फिर भी उस की ओर खिंचती ही चली गई.

लक्ष्मी श्रीनिवास के नजदीक आने की कोशिश करने लगी और उस के एक दोस्त ने श्रीनिवास से उस का परिचय करा दिया. श्रीनिवास भी उस की तरफ खिंच गया था, इसलिए उन की दोस्ती बढ़ने लगी. बिलकुल उसी तरह, जैसे हवा लगने से आग बढ़ती है. हालांकि उन के विचार कभीकभी टकरा जाते थे. लक्ष्मी उदारवादी थी, सब को बराबर समझाने वाली. लेकिन वह मोह बंधन तोड़ न सकी और उस ने श्रीनिवास के साथ ब्याह कर लिया.

कुछ समय तक वे दोनों बहुत सुखी रहे. श्रीनिवास एक आदर्श पति की तरह लक्ष्मी को सुखी रखने की कोशिश करता रहा. लक्ष्मी यह देख कर खुश होने लगी कि उस ने अपने पति की विचित्र सोच को बदल दिया है.

एक साल सपनों और कल्पनाओं में निकल गया. इस के बाद श्रीनिवास ऊबने लगा और रात को देर तक बहस करने लगा. वह अब अकसर ही कहने लगता था, ‘‘लक्ष्मी, मैं तो तुम्हें अपनी पत्नी समझता हूं, लेकिन तुम मुझे अपना पति नहीं समझती हो.’’

लक्ष्मी ने श्रीनिवास को अपनी तरफ से समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह उसे जरा भी न समझ पाई. श्रीनिवास इतना जिद्दी था कि अपने सामने किसी की नहीं सुनता था. बस अपने दल के कट्टर नेताओं की ही बात वह मानता था. उन की पार्टी की सरकार थी, पर उसे इस में भी कमी नजर आती थी. वह चाहता था कि जो भी काम हो रहा है, उस का जल्दी से जल्दी नतीजा सामने आए.

एक दिन शाम को श्रीनिवास ने लक्ष्मी के सामने ऐलान कर दिया कि वह इस दल के आंतकवादियों के दस्ते में शामिल हो गया है. उस का विचार था कि केवल हिंसा द्वारा ही देश की संस्कृति को बचाया जा सकता है.

लक्ष्मी को इस फैसले से बहुत दुख हुआ. उस ने खुद अपने और होने वाले बच्चे की खातिर श्रीनिवास को समझाने की कोशिश की. वह प्रेम और फर्ज की जद्दोजेहद में फंसा रहा. न तो वह लक्ष्मी के प्यार को कुचल सकता था और न ही फर्ज से मुंह मोड़ना चाहता था.

आखिर में जब श्रीनिवास को आतंकवादी संगठन द्वारा एक विपक्षी नेता को खत्म करने का काम सौंपा गया, तो उस ने फर्ज के सामने लक्ष्मी के प्यार की परवाह नहीं की. वह लक्ष्मी और अपने मासूम बच्चे को तकलीफ नहीं देना चाहता था, फिर भी वह अपने आदर्शों के सामने निजी बातों को नहीं आने देना चाहता था. अगर वह इस काम से हट गया, तो कभी अपनेआप को माफ नहीं कर सकेगा.

श्रीनिवास ने ये सब बातें लक्ष्मी को अपने आखिरी खत में समझा कर माफी मांग ली थी. ह्वाट्सएप इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की कि कहीं वह पकड़ा न जाए. लक्ष्मी ने उसे इस जुर्म से बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब वह वहां पहुंची, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अगले दिन सुबह लक्ष्मी सैंट्रल पुलिस स्टेशन जाने वाली बस में बैठ गई. उस के पास ही एक आदमी अखबार पढ़ रहा था. उस अखबार में मोटे अक्षरों में कल शाम की हत्या की खबर छपी थी.

लक्ष्मी उस की तरफ देखे बिना न रह सकी. कुछ लोग श्रीनिवास को हत्यारा और जानवर कह रहे थे, तो कुछ उसे देशभक्त बता रहे थे. लक्ष्मी का दिल पीड़ा से कराह रहा था.

लक्ष्मी का गुस्सा भी बढ़ रहा था. इन लोगों के हिसाब से श्रीनिवास जानवर है. ये अजनबी लोग क्या जानें कि बहादुर होते हुए भी श्रीनिवास का ब्रेनवाश किया जा चुका है. ये क्या जानें कि श्रीनिवास ने कितनी बेवकूफी से सपनों की वेदी पर अपने प्रेम की बलि दी है.

नहीं, कोई भी श्रीनिवास को नहीं समझता. उसे बचाने की कोशिश की जा रही थी. उसे सही बताने की कि एक को मार कर उस आवाज को बदला नहीं जा सकता. उसे समझाने की किसी ने कोशिश नहीं की. सिर्फ वही उस के विचारों को समझ सकी थी. उस ने अपने प्यार से उसे गलत रास्ते पर चलने से रोकने की कोशिश भी की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. जब उस ने कोशिश करने में जरा भी कसर नहीं रखी, तो वह कैसे अपनेआप को दोष दे.

पुलिस स्टेशन के सामने बस रुक गई, तो लक्ष्मी उतर गई. काफी परेशानी के बाद उसे श्रीनिवास से मिलने की इजाजत मिली.

श्रीनिवास एक आरामदेह कमरे में था. लक्ष्मी ने देखा कि वह हमेशा की तरह शांत है. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरी लक्ष्मी, मुझे दुख है कि मैं ने तुम्हें तकलीफ पहुंचाई है. चिंता मत करो, कुछ ही दिनों में मैं छूट जाऊंगा.’’

‘‘क्या तुम्हें इस बात का दुख नहीं है कि तुम ने एक आदमी की जान ली है?’’ लक्ष्मी ने पूछा.

‘‘हां, एक इनसान के नाते मुझे दुख है, लेकिन वह आदमी संस्कृति की रक्षा में बाधक था.’’

‘‘तुम अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. हो सकता है कि वह अपने नजरिए से समाज के एक हिस्से के लिए कुछ करने की कोशिश कर रहा हो.’’

‘‘बिलकुल हो सकता है, लेकिन वह हमारे सपनों के देश को बनाने में रोड़ा बन रहा था.’’

‘‘ओह श्रीनिवास, तुम सिर्फ अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. मैं तुम्हारा नजरिया समझती हूं. तकलीफ मुझे इस पर होती है कि मैं तुम्हारे किसी काम न आ सकी,’’ लक्ष्मी की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मेरी अच्छी लक्ष्मी, तुम गलत कहती हो. तुम हमेशा से मेरी प्रेरणा रही हो. दुखदर्द में तुम ने मुझे बहुत सहारा दिया है. लेकिन लक्ष्मी, तुम्हारा प्रेम और त्याग भी मेरे आदर्शों की भूख न मिटा सके. मैं इतना जिद्दी न होता और मेरे विचार दूसरी ही दिशा में मुड़ जाते. तुम चिंता न करो, मैं जल्दी ही छोड़ दिया जाऊंगा.

‘‘कुछ भी हो लक्ष्मी, अपने बच्चे को अब उसी रास्ते पर ले जाना है. उसे अपनेआप को समझने में मदद देनी है. यह याद रखना कि मैं ने हमेशा तुम्हारे प्रेम और त्याग की कद्र की है. आज भी मेरे साथ तुम्हारी मीठी यादें हैं, मेरे साथ वे पल हैं, जिन में मुझे रोशनी मिली थी, इसलिए कभी हिम्मत मत खोना.’’

लक्ष्मी सब्र के साथ कानून के फैसले का इंतजार करती रही. श्रीनिवास के खिलाफ गवाह नहीं मिले.

फैसला होने का दिन नजदीक आ रहा था. लक्ष्मी के गर्भ के दिन भी पूरे हो रहे थे. जिस दिन सुबह श्रीनिवास का फांसी पर फैसला आने वाला था, ठीक उसी समय, उसी दिन, लक्ष्मी ने एक बेटे को जन्म दिया. वह उस के नन्हे से मुख की तरफ एकटक देखती रही. उस की आंखों में भी उसे वही आग नजर आई, जो श्रीनिवास की आंखों में जला करती है. उसे लगा कि यह भी श्रीनिवास बनेगा.

तभी खबर आई कि कोर्ट ने गवाहों की कमी के आधार पर श्रीनिवास को बरी कर दिया था, पर जब वह बाहर आ रहा था, तब एक आदमी ने उसे माला पहनाई और तभी एक बम धमाका हुआ. वह आदमी और श्रीनिवास दोनों वहीं मारे गए.

लक्ष्मी ने अपने बेटे की तरफ देखा और सोचा कि उस का श्रीनिवास तो फिर से उस के पास आया है, पर उस ने ठान लिया कि वह जिंदगी को नए सिरे से नई दिशा की ओर मोड़ देगी और इस श्रीनिवास को संस्कृति के बहके नारों की ओर नहीं जाने देगी.

Social Story: अनोखा संबंध- क्या विधवा औरत दूसरी शादी नहीं कर सकती?

Social Story : ‘‘इस औरत को देख रही हो… जिस की गोद में बच्चा है?’’

‘‘हांहां, देख रही हूं… कौन है यह?’’

‘‘अरे, इस को नहीं जानती तू?’’ पहली वाली औरत बोली.

‘‘हांहां, नहीं जानती,’’ दूसरी वाली औरत इनकार करते हुए बोली.

‘‘यह पवन सेठ की दूसरी औरत है. पहली औरत गुजर गई, तब उस ने इस औरत से शादी कर ली.’’

‘‘हाय, कहां पवन सेठ और कहां यह औरत…’’ हैरानी से दूसरी औरत बोली, ‘‘इस की गोद में जो लड़का है, वह पवन सेठ का नहीं है.’’

‘‘तब, फिर किस का है?’’

‘‘पवन सेठ के नौकर रामलाल का,’’ पहली वाली औरत ने जवाब दिया.

‘‘अरे, पवन सेठ की उम्र देखो, मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं…’’ दूसरी वाली औरत ने ताना मारते हुए कहा, ‘‘दोनों में उम्र का कितना फर्क है. इस औरत ने कैसे कर ली शादी?’’

‘‘सुना है, यह औरत विधवा थी,’’ पहली वाली औरत ने कहा.

‘‘विधवा थी तो क्या हुआ? अरे, उम्र देख कर तो शादी करती.’’

‘‘अरे, इस ने पवन सेठ को देख कर शादी नहीं की.’’

‘‘फिर क्या देख कर शादी की?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘उस की ढेर सारी दौलत देख कर.’’

आगे की बात निर्मला न सुन सकी. जिस दुकान पर जाने के लिए वह सीढि़यां चढ़ रही थी, तभी ये दोनों औरतें सीढि़यां उतर रही थीं. उसे देख कर यह बात कही, तब वह रुक गई. उन दोनों औरतों की बातें सुनने के बाद दुकान के भीतर न जाते हुए वह उलटे पैर लौट कर फिर कार में बैठ गई.

ड्राइवर ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘मेम साहब, आप दुकान के भीतर क्यों नहीं गईं?’’

‘‘जल्दी चलो बंगले पर,’’ निर्मला ने अनसुना करते हुए आदेश दिया.

आगे ड्राइवर कुछ न बोल सका. उस ने चुपचाप गाड़ी स्टार्ट कर दी.

निर्मला की गोद में एक साल का बच्चा नींद में बेसुध था. मगर कार में बैठने के बाद भी उस का मन उन दोनों औरतों के तानों पर लगा रहा. उन औरतों ने जोकुछ कहा था, सच ही कहा था. निर्मला उदास हो गई.

निर्मला पवन सेठ की दूसरी ब्याहता है. पहली पत्नी आज से 3 साल पहले गुजर गई थी. यह भी सही है कि उस की गोद में जो लड़का है, वह रामलाल का है. रामलाल जवान और खूबसूरत है.

जब निर्मला ब्याह कर के पवन सेठ के घर में आई थी, तब पहली बार उस की नजर रामलाल पर पड़ी थी. तभी से उस का आकर्षण रामलाल के प्रति हो गया था. मगर वह तो पवन सेठ की ब्याहता थी, इसलिए उस के खूंटे से बंध गई थी.

यह भी सही है कि निर्मला विधवा है. अभी उस की उम्र का 34वां पड़ाव चल रहा है. जब वह 20 साल की थी, तब उस की शादी राजेश से कर दी गई थी. वह बेरोजगार था. नौकरी की तलाश जारी थी. मगर वह इधरउधर ट्यूशन कर के अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहा था.

निर्मला की सास झगड़ालू थी. हरदम वह उस पर अपना सासपना जताने की कोशिश करती, छोटीछोटी गलतियों पर बेवजह चिल्लाना उस का स्वभाव बना हुआ था. मगर वह दिन काल बन कर उस पर टूट पड़ा, जब एक कार वाला राजेश को रौंद कर चला गया. अभी उन की शादी हुए 7 महीने भी नहीं बीते थे और वह विधवा हो गई. समाज की जरूरी रस्मों के बाद निर्मला की सास ने उसे डायन बता दिया. यह कह कर उसे घर से निकाल दिया कि आते ही मेरे बेटे को खा गई.

ससुराल से जब विधवा निकाली जाती है, तब वह अपने मायके में आती है. निर्मला भी अपने मायके में चली आई और मांबाबूजी और भाई के लिए बो झ बन गई. बाद में एक प्राइवेट स्कूल में टीचर बन गई. तब उसे विधवा जिंदगी जीते हुए 14 साल से ऊपर हो गए.

समाज के पोंगापंथ के मुताबिक, विधवा की दोबारा शादी भी नहीं हो सकती है. उसे तो अब जिंदगीभर विधवा की जिंदगी जीनी है. ऐसे में वह कई बार सोचती है कि अभी मांबाप जिंदा हैं लेकिन कल वे नहीं रहेंगे, तब भाई कैसे रख पाएगा? यही दर्द उसे हरदम कचोटता रहता था.

निर्मला कई बार यह सोचती थी कि वह मांबाप से अलग रहे, मगर एक विधवा का अकेले रहना बड़ा मुश्किल होगा. मर्दों के दबदबे वाले समाज में कई भेडि़ए उसे नोचने को तैयार बैठे हैं. कई वहशी मर्दों की निगाहें अब भी उस पर गड़ी रहती हैं. मां और बाबूजी भी उसे देख कर चिंतित हैं. ऐसी कोई बात नहीं है कि सिर्फ  वही अपने बारे में सोचती है.

मां और बाबूजी भी सोचते हैं कि निर्मला की जिंदगी कैसे कटेगी? वे खुद भी चाहते थे कि निर्मला की दोबारा शादी हो जाए, मगर समाज की बेडि़यों से वे भी बंधे हुए थे.

इसी कशमकश में समाज के कुछ ठेकेदार पवन सेठ का रिश्ता ले कर निर्मला के बाबूजी के पास आ गए.

बाबूजी को मालूम था कि पवन सेठ बहुत पैसे वाला है. उस का बड़ा भाई मनोहर सेठ के नाम से मशहूर है. मगर दोनों भाइयों के बीच 30 साल पहले ही घर की जायदाद को ले कर रिश्ता खत्म हो गया था. आज तक दोनों के बीच बोलचाल बंद है.

बाबूजी यह भी जानते थे कि पवन सेठ 64 साल के ऊपर है. यह बेमेल गठबंधन कैसे होगा? तब समाज के ठेकेदारों ने एक ही बात बाबूजी को सम झाने की कोशिश की थी कि यह निर्मला की जिंदगी का सवाल है. पवन सेठ के साथ वह खुश रहेगी.

तब बाबूजी ने सवाल उठाया था कि पवन सेठ नदी किनारे खड़ा वह ठूंठ है कि कब बहाव में बह जाए. फिर निर्मला विधवा की विधवा रह जाएगी. तब समाज के ठेकेदारों ने बाबूजी को सम झाया कि देखो, वह विधवा जरूर हो जाएगी, मगर सेठ की जायदाद की मालकिन बन कर रहेगी.

तब बाबूजी ने निर्मला से पूछा था, ‘निर्मला तुम्हारे लिए रिश्ता आया है.’

वह सम झते हुए भी अनजान बनते हुए बोली, ‘रिश्ता और मेरे लिए?’

‘हां निर्मला, तुम्हारे लिए रिश्ता.’

‘मगर बाबूजी, मैं एक विधवा हूं और विधवा की दोबारा शादी नहीं हो सकती,’ अपने पिता को सम झाते हुए निर्मला बोली थी.

‘हां, नहीं हो सकती है, मैं जानता हूं. मगर जब सोचता हूं कि तुम यह लंबी उम्र कैसे काटोगी, तो डर जाता हूं.’

‘जैसे, कोई दूसरी विधवा काटती है, वैसे ही काटूंगी बाबूजी,’ निर्मला ने जब यह बात कही, तब बाबूजी सोचविचार में पड़ गए थे.

तब निर्मला खुद ही बोली थी, ‘मगर बाबूजी, मैं आप की भावनाओं को भी अच्छी तरह सम झती हूं. आप बूढ़े पवन सेठ के साथ मेरा ब्याह करना चाहते हैं.’

‘हां बेटी, वहां तेरी जिंदगी अच्छी तरह कट जाएगी और विधवा की जिंदगी से छुटकारा भी मिल जाएगा,’ बोल कर बाबूजी ने अपने मन की सारी बात कह डाली थी. तब वह भी सहमति देते हुए बोली थी, ‘बाबूजी, आप किसी तरह की चिंता मत करें. मैं यह शादी करने के लिए तैयार हूं.’

यह सुन कर बाबूजी का चेहरा खिल गया था. फिर पवन सेठ के साथ निर्मला की बेमेल शादी हो गई.

निर्मला पवन सेठ के बंगले में आ गई थी. दुकान के नौकर अलग, घर के नौकर अलग थे. घर का नौकर रामलाल 20 साल का गबरू जवान था. बाकी तो वहां अधेड़ औरतें थीं.

जब पवन सेठ के साथ निर्मला हमबिस्तर होती थी, वह बहुत जल्दी ठंडा पड़ जाता था. राजेश के साथ जो रातें गुजारी थीं, पवन सेठ के साथ वैसा मजा नहीं मिलता था.

पवन सेठ ने कई बार उस से कहा था, ‘निर्मला, तुम मेरी दूसरी पत्नी हो. उम्र में बेटी के बराबर हो. अगर मेरी पहली पत्नी से कोई औलाद होती, तब वह तुम्हारी उम्र के बराबर होती. मैं तु झ से औलाद की आस रखता हूं. तुम मु झे एक औलाद दे दो.’

‘औलाद देना मेरे अकेले के हाथ में नहीं है,’ निर्मला अपनी बात रखते हुए बोली, ‘मगर, मैं देख रही हूं…’

‘क्या देख रही हो?’ उसे रुकते देख पवन सेठ ने पूछा.

‘हमारी शादी के 6 महीने हो गए हैं, मगर जितना जोश पैदा होता, वह पलभर में खत्म हो जाता है.’

‘अब मैं उम्र की ढलान पर हूं, फिर भी औलाद चाहता हूं,’ पवन सेठ की आंखों का इशारा वह सम झ गई. तब उस ने नौकर रामलाल से बातचीत करना शुरू किया.

निर्मला उसे बारबार किसी बहाने अपने कमरे में बुलाती, आंखों में हवस लाती. कभी वह अपना आंचल गिराती, कभी ब्लाउज का ऊपरी बटन खोल देती, तो कभी पेटीकोट जांघों तक चढ़ा लेती. मर्द कैसा भी पत्थरदिल हो, आखिर एक दिन पिघल ही जाता है.

रामलाल ने कहा, ‘मेम साहब, आप का मु झे देख कर बारबार आंचल गिराना मु झे अच्छा नहीं लगता. आप क्यों ऐसा करती हैं?’

‘अरे बुद्धू, इतना भी नहीं समझता है,’ निर्मला मुसकरा कर बोली और उस के गाल को चूम लिया.

‘सम झता तो मैं सबकुछ हूं, मगर मालिक…’

‘मालिक कुछ भी नहीं कहेंगे,’ बीच में ही उस की बात काट कर निर्मला बोली, ‘मालिक से क्यों घबराता है?’

यह सुन कर रामलाल पहले तो हैरान हुआ, फिर धीरे से मुसकरा दिया. उस ने आव न देखा न ताव निर्मला को दबोच लिया और उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

निर्मला ने कुछ नहीं कहा. फिर क्या था, निर्मला की शह पा कर जब भी मौका मिलता, वे दोनों हमबिस्तर हो जाते. इस का फायदा यह हुआ कि निर्मला का जोश शांत होने लगा था और एक दिन वह पेट से हो गई.

पवन सेठ बहुत खुश हुआ और जब पहला ही लड़का पैदा हुआ, तब पवन सेठ की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा.

निर्मला और बच्चे की देखरेख के लिए एक आया रख ली गई. जब भी बाजार या कहीं दूसरी जगह जाना होता, निर्मला अपने बच्चे को आया के पास छोड़ जाती है. मगर आज उस की ममता जाग गई थी, इसलिए साथ ले गई थी.

‘‘मेम साहब, बंगला आ गया,’’ जब ड्राइवर ने यह कहा, तब निर्मला पुरानी यादों से लौटी. जब वह कार से उतरने लगी, तब ड्राइवर ने पूछा, ‘‘मेम साहब, जिस दुकान पर आप खरीदारी करने पहुंची थीं, वहां से बिना खरीदारी किए क्यों लौट आईं?’’

‘‘मेरा मूड बदल गया,’’ निर्मला ने जवाब दिया.

‘‘मूड तो नहीं बदला मेम साहब, मगर मैं सब समझ गया,’’ कह कर ड्राइवर मुसकराया.

‘‘क्या सम झे मानमल?’’ गुस्से से निर्मला बोली.

‘‘इस बच्चे को ले कर उन औरतों ने…’’

‘‘देखो मानमल, तुम अपनी औकात में रहो,’’ बीच में ही बात काट कर निर्मला बोली.

‘‘हां मेम साहब, मैं भूल गया था कि मैं आप का ड्राइवर हूं,’’ माफी मांगते हुए मानमल बोला, ‘‘मगर, सच बात तो होंठों पर आ ही जाती है.’’

‘‘क्या सच बात होंठों पर आ जाती है?’’ निर्मला ने पूछा.

‘‘यही मेम साहब कि उन दोनों औरतों ने बच्चे को देख कर कहा होगा कि यह बच्चा सेठजी का खून नहीं है, बल्कि उन के नौकर रामलाल का है,’’ मानमल ने साफसाफ कह दिया.

तब निर्मला गुस्से से बोली, ‘‘देखो मानमल, तुम हमारे नौकर हो और अपनी हद में रहो. औरों की तरह हमारे संबंधों को ले कर बात करने की जरूरत नहीं है,’’ कह कर निर्मला कार से उतर गई.

अभी निर्मला दालान पार कर रही थी कि आया ने आ कर बच्चे को उस से ले लिया. मानमल फिर मुसकरा दिया.

Family story in Hindi: धरतीपुत्र – इंजीनियर बना किसान

Family story in Hindi: मोहन और सुरेश 2 भाई थे. मोहन बड़ा, सुरेश छोटा था. उन के बचपन में ही पिता का देहांत हो गया था. दोनों की मां ने बहुत मुश्किल से उन का पालनपोषण किया था. मां की तकलीफ देखते हुए मोहन छोटी उम्र से ही काम करने लगा था. दोनों मांबेटा मिल कर छोटे से खेत में सब्जियां उगाते, उन्हें बाजार में बेचते, साथ ही दूसरे के खेतों में मजदूरी भी करते थे. एक बार मां ने मोहन से कहा था, ‘‘बेटा, तू भी पढ़ाई कर ले. मैं सब संभाल लूंगी. भले ही अच्छा खाना नहीं दे सकूंगी, रोटी का जुगाड़ तो हो ही जाएगा.’’मोहन ने कहा, ‘‘मां, अगर हम दोनों भाई पढ़ेंगे, तो किसी की पढ़ाई भी सही ढंग से नहीं होगी. अगर मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूंगा, तो छोटा भाई अच्छी तरह पढ़ाई कर लेगा. मैं शाम को मास्टरजी से पढ़ लिया करूंगा और वे इम्तिहान भी दिलवा देंगे.’’

सुरेश पढ़ाई में बहुत तेज था. बड़े भाई और मां की उम्मीदों पर खरा उतरता हुआ वह कामयाबी के रास्ते पर आगे बढ़ता रहा.

मोहन भी पास के हाईस्कूल के एक मास्टरजी की मदद से रात में पढ़ाई करता और उन्हीं की सलाह से फार्म भर कर उस ने मैट्रिक और इंटर का इम्तिहान पास किया था. इस के बाद पत्राचार से बीए करते हुए उस ने नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से कई तरह की ट्रेनिंग ले कर खेतीबारी से जुड़ी नई से नई तकनीक की जानकारी हासिल कर ली थी.

सुरेश का जिस दिन अपने ही राज्य के इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला हुआ, मोहन ने पूरे गांव को मिठाई खिलाई थी.

सुरेश जब कालेज में पढ़ रहा था, उसी समय उस के बड़े भाई मोहन का ब्याह हो गया. उस की भाभी बहुत प्यारी और सब का ध्यान रखने वाली थीं. भाभी के आने से घर में रौनक हो गई और सुरेश की पढ़ाई पूरी होने से पहले घर में गुडि़या सी भतीजी भी आ गई.

सुरेश अपनी भतीजी को बहुत स्नेह करता था. उस की इच्छा थी कि वह भतीजी को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाए और उसे हर वह खुशी दे, जो बचपन में इन दोनों भाइयों को नहीं मिल पाई थी.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन की इच्छा थी कि सुरेश एमबीए में दाखिला ले ले, पर पढ़ाई खत्म करते ही सुरेश की नौकरी एक बड़ी विदेशी कंपनी में लग गई, जिस का दफ्तर मुंबई में था.

सुरेश की तनख्वाह भी बहुत ज्यादा थी. इस वजह से सुरेश ने पत्राचार कोर्स से एमबीए करने का फैसला किया. उस ने अपने भाई और मां को भी समझ कर नौकरी करने के पक्ष में तैयार कर लिया.

नौकरी लगने के बाद सुरेश ने मोहन और मां से अपने साथ ही मुंबई चलने के लिए कहा, पर मोहन ने मुंबई जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘देख भाई, तू वहां नौकरी कर और यहां हमारी खेती भी है, उसे मैं संभालूंगा.

‘‘हम ने तो धीरेधीरे कर के कुछ और खेत भी ले लिए हैं. हमारी जो बंजर जमीन पड़ी थी, उस में भी सरकार की ओर से आम के बाग लगाने का प्रस्ताव मिला है, इसलिए हमें यहीं रहने दे.

‘‘हम मुंबई जरूर घूमने आएंगे. अभी तू अकेले जा कर नौकरी कर ले. जब हम तुम्हारी शादी करेंगे, तब तुम अपनी पत्नी को भी ले जाना. और जब तुम्हारी भतीजी स्कूल में पढ़ने लायक होगी, तब उसे भी अपने साथ रखना.’’

सुरेश बोला, ‘‘क्या भैया, अभीअभी तो मेरी नौकरी लगी है और आप शादी की बात कर रहे हैं. पहले एक अच्छा मकान बना लें, उस के बाद मेरी शादी की सोचना.

‘‘हमारा मकान बहुत छोटा और पुराना है. आप की सारी आमदनी तो मुझे पढ़ाने में लग गई. जो थोड़ीबहुत बचत होती थी, उस से आप ने और खेत ही बढ़ाए हैं.

‘‘मकान की मरम्मत भी नहीं हुई. मेरी भाभी और नन्ही भतीजी को इस मकान में कितनी परेशानी होती है, इसलिए पहले मकान, उस के बाद आगे की कुछ बात आप सोचना.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू तो पूरा पागल है. अरे, हम दोनों काम एकसाथ कर सकते हैं.’’

कुछ दिनों के बाद सुरेश मुंबई चला गया. वह तनख्वाह मिलते ही अपना खर्च निकाल कर हर महीने मोहन भैया को एक अच्छीखासी रकम भेज देता था.

एक दिन सुरेश ने फोन पर भैया से कहा, ‘‘भैया, मैं नए घर का नक्शा भिजवा रहा हूं, आप घर बनवाना शुरू कर दें.’’

मोहन ने वह नक्शा देख कर कहा, ‘‘पर, इतना बड़ा मकान बनाने के लिए तो कई लाख रुपए लगेंगे…’’

सुरेश बोला, ‘‘तो क्या हुआ भैया. मैं बैंक से कर्ज ले लूंगा. मेरी तनख्वाह से कर्ज चुकता होता रहेगा.’’

मोहन ने पहले तो कर्ज लेने के लिए बहुत मना किया, पर सुरेश की जिद पर मान गया. सुरेश ने बैंक से कर्ज ले लिया.

सुरेश की शादी के लिए भी बहुत से प्रस्ताव आ रहे थे. एक अच्छी लड़की देख कर मां और भैयाभाभी ने उस का ब्याह करा दिया.

मोहन जब अपनी पत्नी को ले कर मुंबई जा रहा था, तब वह अपने साथ अपनी भतीजी को भी ले जाना चाह रहा था, लेकिन मां ने समझाया, ‘‘इसे अभी मत ले जाओ, यह छोटी है. थोड़ी और बड़ी हो जाने दो, फिर ले जाना पढ़ाने के लिए.

‘‘अभी तुम दोनों जाओ. वैसे भी तुम दोनों का जीवन शुरू ही हुआ है अभी. पूरी जिंदगी पड़ी है जिम्मेदारी निभाने को.’’

सुरेश चला गया और मोहन ने घर बनवाना शुरू किया, पर न जाने उस के दिमाग में क्या बात आई कि बैंक से कर्ज लिए गए रुपए जैसेजैसे मिलते गए, उन में से आधे पैसों से उस ने खेती लायक कुछ जमीन खरीद ली और उस पर और्गैनिक खेती करने लगा.

मोहन ने आधे पैसे से साधारण सा मकान बना लिया, जिस में सुविधाएं तो सब थीं, पर जो मौडर्न डिजाइन सुरेश ने भेजा था, वह नहीं था.

सुरेश जब भी फोन पर मोहन को मकान के फोटो भेजने के लिए कहता, तो मोहन हंस कर बोलता, ‘‘कुछ राज भी तो रहने दे, जब पूरा मकान बन जाएगा तब देख लेना.’’

पूरा परिवार हंसीखुशी गांव और शहर दोनों जगह पर अपना समय बिता रहा था कि अचानक कोरोना वायरस का कहर शुरू हो गया.

कोरोना काल में हुई मंदी के चलते कई बड़ीबड़ी कंपनियों ने अपने मुलाजिमों की छंटनी कर दी थी. उन्हीं में सुरेश भी था. उस ने गांव जाने का फैसला किया.

पत्नी नेहा गांव जाने के लिए तो तैयार हो गई, पर उसे एक अलग ही चिंता सता रही थी, ‘‘गांव में हमारा रहनाखाना तो हो जाएगा, लेकिन बैंक की किस्त कहां से भरेंगे? हर महीने इतनी बड़ी रकम देना बड़ा मुश्किल होगा. ऐसे में तो हमारी गांव की जमीन भी बिक सकती है. भैया ने सही कहा था आप से कि अभी बड़ा घर बनवाने की जरूरत नहीं है.’’

यह सुन कर सुरेश बोला, ‘‘अभी तो गांव में चल कर देखते हैं. कुछ नहीं होगा तो कोई अपना ही काम शुरू करूंगा. कम से कम यह मुसीबत का समय तो निकल जाए.’’

जब नेहा और सुरेश गांव पहुंचे, तो नए घर को देख कर हैरान रह गए. भैया और मां खेत पर गए थे, भाभी घर में थीं.

थोड़े गुस्से और नाराजगी के मिलेजुले भाव से सुरेश ने भाभी से कहा, ‘‘भाभी, यह सब क्या है… यह घर बनवाया है आप ने… इतने सारे रुपयों में इतना साधारण सा मकान क्यों बना है? मैं ने तो भैया को एक बड़ा और मौडर्न मकान बनाने के लिए पैसा दिया था.’’

भाभी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘देवरजी, अभी तो आए हो, पहले नहाधो लो, कुछ खापी कर थोड़ा आराम तो कर लो, फिर अपने रुपयों का भी हिसाब कर लेना.’’

भाभी की बात सुन कर सुरेश थोड़ा सकपका गया, इसलिए वह एकदम से बोला, ‘‘नहींनहीं भाभी, आप बुरा मत मानिए. मैं तो इतना साधारण मकान देख कर यह बोल रहा था.’’

भाभी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं. अच्छा, मैं गरम पानी दे रही हूं. जाओ, पहले नहा कर आओ.’’

कमरे में जाने के बाद सुरेश को नहाने के लिए कपड़े निकाल कर देते हुए नेहा ने कहा, ‘‘आप को आते ही भाभी से ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. शायद उन्हें आप की बात पसंद नहीं आई.’’

सुरेश बोला, ‘‘मैं अपनी गलती मानता हूं, लेकिन मैं भी क्या करता… बैंक से इतना ज्यादा कर्ज लिया था. नौकरी लगने के बाद से ही मैं उन्हें पैसे भेजता रहा, बहुत सोचसमझ कर मैं ने खुद पर खर्च किया है. अपने भविष्य के लिए भी मैं ने कुछ भी नहीं रखा है. जोकुछ बचत हुई, तुम्हारे आने के बाद ही हुई. ऐसे में इतना साधारण मकान देख कर मैं अपने को रोक नहीं पाया.’’

नेहा ने कहा, ‘‘जो हो गया, वह हो गया, लेकिन आगे भैया या मां के सामने इस बारे में आप कुछ भी नहीं बोलेंगे.’’

सुरेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा ठीक है, अब नहाने भी दोगी या यह भाषण ही देती रहोगी…’’

छोटे भाई के गांव आने की खबर सुन कर मोहन और मां भी घर आ गए. नेहा द्वारा मना किए जाने के बाद भी सुरेश ने मां और भैया के सामने भी अपना वही सवाल रख दिया.

मोहन ने कहा, ‘‘पहले यह बताओ कि अचानक बिना सूचना के तुम कैसे आ गए, वह भी कोरोना काल में. अब यहां तुम्हें 15 दिन तक क्वारंटीन रहना होगा.’’

सुरेश बोला, ‘‘हम क्वारंटीन रह लेंगे, क्योंकि शहर में रहते तो कुछ दिन बाद फाके करने की नौबत आ जाती. एक बुरी सूचना है कि मेरी नौकरी छूट गई है. और अब मैं यह सोच रहा हूं कि बैंक से जो कर्ज लिया उस की किस्त कैसे भर पाऊंगा. इतना पैसा भी नहीं है कि कोई नया रोजगार भी कर सकूं. अभी के समय में तो कोई नया धंधा भी नहीं चलेगा. ऐसे में बैंक की किस्त देना मुश्किल लगता है.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू घबरा मत छोटे, कुछ भी मुश्किल नहीं होगा. हमारा धंधा अभी भी चलेगा.’’

सुरेश ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘मैं समझ नहीं भैया, कैसा धंधा?

मोहन ने समझाया, ‘‘तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारे द्वारा हर महीने भेजे गए और तुम्हारे नक्शे के मुताबिक मकान नहीं बना कर बचाए गए रुपए मैं ने कहीं उड़ा दिए क्या? नहीं मेरे भाई. इस साधारण मकान में सुविधाएं तो सारी हैं, बस मौडर्न नहीं है. इस तरह का मकान बनाने से आधी से ज्यादा रकम बच गई थी…’’

‘‘वही तो मैं भी पूछ रहा था कि साधारण मकान बना कर पैसे बचाने की जरूरत क्या आ गई आप को?’’ सुरेश ने मोहन की बात काटते हुए पूछ लिया.

मोहन ने कहा, ‘‘थोड़ा धीरज रख छोटे, वही मैं तुझे बता रहा हूं. उस बची हुई रकम से मैं ने कुछ उपजाऊ जमीन खरीद ली थी और उस पर नए तरीके से खेतीबारी कर रहा हूं.

‘‘इस बार हम ने तरबूज और खरबूजे लगाए थे. इस फसल से खर्च काट कर 3 लाख रुपए की आमदनी हुई है, जिसे मैं ने बैंक में जमा कर दिया है. उस से हम लोग कई महीने तक बैंक की किस्त दे ही सकते हैं. उस के खत्म होने के पहले हमारे आम की फसल की आमदनी आ जाएगी.’’

सुरेश खुश हो कर बोला, ‘‘मान गया भैया आप को. मैं तो महज दिखावे पर ध्यान दे रहा था, पर आप ने घर की माली हालत मजबूत करने पर ध्यान रखा.’’

मोहन ने हंसते हुए कहा, ‘‘आखिर तेरा बड़ा भाई हूं. और हां, तू कहता है तेरा रोजगार खत्म हो गया… कहां खत्म हुआ है. अभी तो और ज्यादा आगे बढ़ने का समय है. मैं अकेले सबकुछ नहीं संभाल पा रहा था, अब तुम मेरी मदद करना.’’

मोहन भैया की सूझबूझ से सुरेश बहुत प्रभावित था. उस ने अपनी पत्नी की ओर देखा और कहा, ‘‘देखा, तुम चिंता करती आ रही थी कि कर्ज कैसे चुकाएंगे. कल तक हम नौकर थे तो परेशानी थी, अब हम अपनी धरती मां के पुत्र बने हैं, अब हमें कोई परेशानी नहीं होगी. बैंक का कर्ज भी चुकता हो जाएगा.

‘‘धरती मां हमें उपज के रूप में अपना इतना स्नेहदुलार देंगी कि हम मालामाल हो जाएंगे. मैं अपने घर में रह कर खेतीबारी करूंगा. हां, मैं धरतीपुत्र किसान हूं.’’

Hindi Story: कुंठा – महेश के मन में आखिर क्या थी कुंठा

Hindi Story. महेश की नौकरी भारतीय वायु सेना में बतौर मैडिकल अटैंडैंट लगी थी. वायु सेना सिलैक्शन सैंटर के कमांडर ने कहा, ‘‘बधाई हो महेश, तुम्हें एक नोबेल ट्रेड मिला है. तुम नौकरी के साथसाथ इनसानियत के लिए भी काम कर सकोगे. किसी लाचार के काम आ सकोगे.’’

जो भी हो, महेश की समझ में तो यही आया कि उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई है बस.

अस्पताल में तकरीबन 3 महीने की ट्रेनिंग चल रही थी. सबकुछ करना था. मरीजों का टैंपरेचर, ब्लडप्रैशर, नाड़ी वगैरह के रिकौर्ड रखने से ले कर उन्हें बिस्तर पर सुलाने तक की जिम्मेदारी थी. हर बिस्तर तक जा कर मरीजों को दवा खिलानी पड़ती थी. लाचार मरीजों को स्पंज बाथ देना पड़ता था.

महेश तो एक पिछड़े इलाके से था, जहां के अस्पताल के नर्स से ले कर कंपाउंडर, डाक्टर तक मरीजों को डांटते रहते थे. एकएक इंजैक्शन लगाने के लिए नर्स फीस लेती थी. डाक्टरों से बात करने में डर लगता था कि कहीं डांटने न लगें. स्पंज बाथ का तो नाम भी नहीं सुना था. कभी कोई सगा अस्पताल में भरती हुआ, तो उसे एकएक रिलीफ के लिए दाम देते देखा था.

पर यहां तो नर्सों का ‘इंटरनैशनल एथिक्स’ हम पर लागू था. हमें पहले ही ताकीद कर दी गई थी कि किसी मरीज से कभी भी चाय मत पीना, वरना कोर्ट मार्शल हो सकता है. पलपल यही खयाल रहता था कि कैसे नौकरी महफूज रखी जाए.

एक दिन जब महेश अपनी शिफ्ट ड्यूटी पर गया, तो उस से पहले काम कर रहे साथी ने बताया, ‘‘एक मरीज भरती हुआ है. उस का आपरेशन होना है और उसे तैयार करना है.’’

यह कह कर वह साथी चला गया. महेश ने देखा, तो वह बवासीर का मरीज था. महेश ने उसे नुसखे के मुताबिक समझा दिया और दवा दे दी. पर एक बात के लिए महेश दुविधा में पड़ गया कि उस मरीज के गुप्त भाग की शेविंग करनी थी.

उस की शेविंग कैसे की जाए? अब महेश को अफसोस होने लगा कि यह कैसी नौकरी में वह फंस गया. ड्यूटी उस की थी. उस से पूछा जाएगा.

महेश ने एक उपाय निकाला. मरीज को बुलाया. रेजर में ब्लेड लगा कर उस से कहा, ‘‘अंदर से दरवाजा बंद कर लो और पूरा समय ले कर शेविंग कर डालो.’’

उस मरीज ने हामी में सिर हिलाया और रेजर ले कर चला गया. महेश ने संतोष की सांस ली.

दूसरे दिन जब उस मरीज को औपरेशन के लिए जाना था, तब महेश ही ड्यूटी पर था. वह सोच रहा था कि सब ठीक हो. उस के सीनियर ने उस से पूछा, ‘‘क्या मरीज का ‘प्रीऔपरेटिव’ केयर फालो हुआ?’’

महेश ने ‘हां’ में सिर हिला दिया.

उस सीनियर ने स्क्रीन पर लगा कर मरीज की जांच की. महेश के पास आ कर वह चिल्लाया, ‘‘यह क्या है? तुम ने तो मरीज का कोई केयर ही नहीं किया है?’’

यह सुन कर महेश के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह बोला, ‘‘सर, मैं ने उसे समझा दिया था.’’

वह सीनियर महेश पर बिगड़ा, ‘‘तुम्हारी समझाने की ड्यूटी नहीं है. तुम्हें खुद करना है और यह तय करना है कि मरीज को तुम्हारी लापरवाही के चलते कोई इंफैक्शन न हो.’’

महेश की बोलती बंद हो गई. अगले ही महीने उसे छुट्टी पर घर जाना था. उसे बड़ी कुंठा होने लगी कि यही सब जा कर घर पर बताऊंगा.

अब वह अपनेआप को बड़ा बेबस महसूस कर रहा था. वह पूरी तरह हार मान कर सीनियर के पास चला गया, ‘‘सर, मुझे तो अपनेआप को नंगा देखने में शर्म आती है और आप मुझ से उस के गुप्त भाग की शेविंग करने को कह रहे हैं.’’

वह सीनियर तुरंत मुड़ा और मरीज को आवाज दी. उस ने शेविंग का सामान उठाया और कमरे में चला गया. थोड़ी देर बाद वे दोनों बाहर आए.

सीनियर ने महेश से कहा, ‘‘मैं ने इस मरीज की शेविंग कर दी है. किसी लाचार की सेवा करना छोटा या घटिया काम नहीं होता. मैडिकल के प्रोफैशन में औरतमर्द या अंगगुप्तांग नहीं होता, बस एक मरीज होता है और उस का शरीर होता है. तो फिर इस शरीर की साफसफाई करने में किस बात की दिक्कत?’’

इतना कह कर सीनियर चला गया. कितनी आसानी से बिना किसी हीनभावना के उस ने सब कर दिया था. यह देख कर महेश को दुख होने लगा कि उस ने पहले ही ये सब क्यों नहीं किया? उस के अंदर कितनी कुंठा है. उस की नौकरी का असली माने तो यही था. यही तो उस का असली काम था, जिसे करने से वह चूक गया था.

Story in Hindi: सही सजा – मठ की जायदाद

Story in Hindi. पुरेनवा गांव में एक पुराना मठ था. जब उस मठ के महंत की मौत हुई, तो एक बहुत बड़ी उलझन खड़ी हो गई. महंत ने ऐसा कोई वारिस नहीं चुना था, जो उन के मरने के बाद मठ की गद्दी संभालता.

मठ के पास खूब जायदाद थी. कहते हैं कि यह जायदाद मठ को पूजापाठ के लिए तब के रजवाड़े द्वारा मिली थी.

मठ के मैनेजर श्रद्धानंद की नजर बहुत दिनों से मठ की जायदाद पर लगी हुई थी, पर महंत की सूझबूझ के चलते उन की दाल नहीं गल रही थी.

महंत की मौत से श्रद्धानंद का चेहरा खिल उठा. वे महंत की गद्दी संभालने के लिए ऐसे आदमी की तलाश में जुट गए, जो उन का कहा माने. नया महंत जितना बेअक्ल होता, भविष्य में उन्हें उतना ही फायदा मिलने वाला था.

उन दिनों महंत के एक दूर के रिश्तेदारी का एक लड़का रामाया गिरि मठ की गायभैंस चराया करता था. वह पढ़ालिखा था, लेकिन घनघोर गरीबी ने उसे मजदूर बना दिया था.

मठ की गद्दी संभालने के लिए श्रद्धानंद को रामाया गिरि सब से सही आदमी लगा. उसे आसानी से उंगलियों पर नचाया जा सकता था. यह सोच कर श्रद्धानंद शतरंज की बिसात बिछाने लगे.

मैनेजर श्रद्धानंद ने गांव के लोगों की मीटिंग बुलाई और नए महंत के लिए रामाया गिरि का नाम सु?ाया. वह महंत का रिश्तेदार था, इसलिए गांव वाले आसानी से मान गए.

रामाया गिरि के महंत बनने से श्रद्धानंद के मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने धीरेधीरे मठ की बाहरी जमीन बेचनी शुरू कर दी. कुछ जमीन उन्होंने तिकड़म लगा कर अपने बेटेबेटियों के नाम करा ली. पहले मठ के खर्च का हिसाब बही पर लिखा जाता था, अब वे मुंहजबानी निबटाने लगे. इस तरह थोड़े दिनों में उन्होंने अपने नाम काफी जायदाद बना ली.

रामाया गिरि सबकुछ जानते हुए भी अनजान बना रहा. वह शुरू में श्रद्धानंद के एहसान तले दबा रहा, पर यह हालत ज्यादा दिन तक नहीं रही.

जब रामाया गिरि को उम्दा भोजन और तन को आराम मिला, तो उस के दिमाग पर छाई धुंध हटने लगी. उस के गाल निकल आए, पेट पर चरबी चढ़ने लगी. वह केसरिया रंग के सिल्क के कपड़े पहनने लगा. जब वह माथे और दोनों बाजुओं पर भारीभरकम त्रिपुंड चंदन लगा कर कहीं बाहर निकलता, तो बिलकुल शंकराचार्य सा दिखता.

गरीबगुरबे लोग रामाया गिरि के पैर छू कर आदर जताने लगे. इज्जत और पैसा पा कर उसे अपनी हैसियत समझ में आने लगी.

रामाया गिरि ने श्रद्धानंद को आदर के साथ बहुत समझाया, लेकिन उलटे वे उसी को धौंस दिखाने लगे.

श्रद्धानंद मठ के मैनेजर थे. उन्हें मठ की बहुत सारी गुप्त बातों की जानकारी थी. उन बातों का खुलासा कर देने की धमकी दे कर वे रामाया गिरि को चुप रहने पर मजबूर कर देते थे. इस से रामाया गिरि परेशान रहने लगा.

एक दिन श्रद्धानंद मठ के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. चाय खत्म हुई कि वे कुरसी से लुढ़क गए. किसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस श्रद्धानंद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहती थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भेद खुलने का डर था, इसलिए रामाया गिरि थानेदार को मठ के अंदर ले गया और लेदे कर मामले को रफादफा करा दिया.

श्रद्धानंद को रास्ते से हटा कर रामाया गिरि बहुत खुश हुआ. यह उस की जिंदगी की पहली जीत थी. उस में हौसला आ चुका था. अब उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं थी.

रामाया गिरि नौजवान था. उस के दिल में भी आम नौजवानों की तरह तमाम तरह की हसरतें भरी पड़ी थीं. खूबसूरत औरतें उसे पसंद थीं. सो, वह पूजापाठ का दिखावा करते हुए औरत पाने का सपना संजोने लगा.

उन दिनों मठ की रसोई बनाने के लिए रामप्यारी नईनई आई थी. उस की एक जवान बेटी कमली भी थी. इस के बावजूद उस की खूबसूरती देखते ही बनती थी. गालों को चूमती जुल्फें, कंटीली आंखें और गदराया बदन.

एक रात रामप्यारी को घर लौटने में देर हो गई. मठ के दूसरे नौकर छुट्टी पर थे, इसलिए कई दिनों से बरतन भी उसे ही साफ करने पड़ रहे थे.

रामाया गिरि खाना खा कर अपने कमरे में सोने चला गया था, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. चारों ओर खामोशी थी. आंगन में बरतन मांजने की आवाज के साथ चूडि़यों की खनक साफसाफ सुनाई दे रही थी.

रामाया गिरि की आंखों में रामप्यारी की मस्त जवानी तैरने लगी. शायद उसे पाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था. उस ने आवाज दी, ‘‘रामप्यारी, जरा इधर आना.’’

रामाया गिरि की आवाज सुन कर रामप्यारी सिहर उठी. वह अनसुनी करते हुए फिर से बरतन मांजने लगी.

रामाया गिरि खीज उठा. उस ने बहाना बनाते हुए फिर उसे पुकारा, ‘‘रामप्यारी, जरा जल्दी आना. दर्द से सिर फटा जा रहा है.’’

अब की बार रामप्यारी अनसुनी नहीं कर पाई. वह हाथ धो कर सकुचाती हुई रामाया गिरि के कमरे में पहुंच गई.

रामाया गिरि बिछावन पर लेटा हुआ था. उस ने रामप्यारी को देख कर अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराई, फिर टेबिल पर रखी बाम की शीशी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘जरा, मेरे माथे पर बाम लगा दो…’’

मजबूरन रामप्यारी बाम ले कर रामाया गिरि के माथे पर मलने लगी. कोमल हाथों की छुअन से रामाया गिरि का पूरा बदन झनझना गया. उस ने सुख से अपनी आंखें बंद कर लीं.

रामाया गिरि को इस तरह पड़ा देख कर रामप्यारी का डर कुछ कम हो चला था. रामाया गिरि उसी का हमउम्र था, सो रामप्यारी को मजाक सूझाने लगा.

वह हंसती हुई बोली, ‘‘जब तुम्हें औरत के हाथों ही बाम लगवानी थी, तो कंठीमाला के झमेले में क्यों फंस गए? डंका बजा कर अपना ब्याह रचाते. अपनी घरवाली लाते, फिर उस से जी भर कर बाम लगवाते रहते…’’

वह उठ बैठा और हंसते हुए कहने लगा, ‘‘रामप्यारी, तू मुझ से मजाक करने लगी? वैसे, सुना है कि तुम्हारे पति को सिक्किम गए 10 साल से ऊपर हो गए. वह आज तक नहीं लौटा. मुझे नहीं समझ आ रहा कि उस के बिना तुम अपनी जवान बेटी की शादी कैसे करोगी?’’

रामाया गिरि की बातों ने रामप्यारी के जख्म हरे कर दिए. उस की आंखें भर उठीं. वह आंचल से आंसू पोंछने लगी.

रामाया गिरि हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, रोने से कुछ नहीं होगा. मेरे पास एक रास्ता है. अगर तुम मान गई, तो हम दोनों की परेशानी हल हो सकती है.’’

‘‘सो कैसे?’’ रामप्यारी पूछ बैठी.

‘‘अगर तुम चाहो, तो मैं तेरे लिए पक्का मकान बनवा दूंगा. तेरी बेटी की शादी मेरे पैसों से होगी. तुझे इतना पैसा दूंगा कि तू राज करेगी…’’

रामप्यारी उतावली हो कर बोली, ‘‘उस के बदले में मुझे क्या करना होगा?’’

रामाया गिरि उस की बांह को थामते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, सचमुच तुम बहुत भोली हो. अरी, तुम्हारे पास अनमोल जवानी है. वह मुझे दे दो. मैं किसी को खबर नहीं लगने दूंगा.’’

रामाया गिरि का इरादा जान कर रामप्यारी का चेहरा फीका पड़ गया. वह उस से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझ से भारी भूल हो गई. मैं सम?ाती थी कि तुम गरीबी में पले हो, इसलिए गरीबों का दुखदर्द समझाते होगे. लेकिन तुम तो जिस्म के सौदागर निकले…’’

इन बातों का रामाया गिरि पर कोई असर नहीं पड़ा. वासना से उस का बदन ऐंठ रहा था. इस समय उसे उपदेश के बदले देह की जरूरत थी.

रामप्यारी कमरे से बाहर निकलने वाली थी कि रामाया गिरि ने झपट कर उस का आंचल पकड़ लिया.

रामप्यारी धक से रह गई. वह गुस्से से पलटी और रामाया गिरि के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया.

रात के सन्नाटे में तमाचे की आवाज गूंज उठी. रामाया गिरि हक्काबक्का हो कर अपना गाल सहलाने लगा.

रामप्यारी बिफरती हुई बोली, ‘‘रामाया, ऐसी गलती फिर कभी किसी गरीब औरत के साथ नहीं करना. वैसे मैं पहले से मठमंदिरों के अंदरूनी किस्से जानती हूं. बेचारी कुसुमी तुम्हारे गुरु महाराज की सेवा करते हुए अचानक गायब हो गई. उस का आज तक पता नहीं चल पाया.

‘‘मैं थूकती हूं तुम्हारी महंती और तुम्हारे पैसों पर. मैं गरीब हूं तो क्या हुआ, मुझे इज्जत के साथ सिर उठा कर जीना आता है.’’

इस घटना को कई महीने बीत गए, लेकिन रामाया गिरि रामप्यारी के चांटे को भूल नहीं पाया.

एक रात उस ने अपने खास आदमी खड्ग सिंह के हाथों रामप्यारी की बेटी कमली को उठवा लिया. कमली नीबू की तरह निचुड़ी हुई लस्तपस्त हालत में सुबह घर पहुंची. कमली से सारा हाल जान कर रामप्यारी ने माथा पीट लिया.

समय के साथ रामाया गिरि की मनमानी बढ़ती गई. उस ने अपने विरोधियों को दबाने के लिए कचहरी में दर्जनों मुकदमे दायर कर दिए. मठ के घंटेघडि़याल बजने बंद हो गए. अब मठ पर थानाकचहरी के लोग जुटने लगे.

रामाया गिरि ने अपनी हिफाजत के लिए बंदूक खरीद ली. उस की दबंगई के चलते इलाके के लोगों से उस का रिश्ता टूटता चला गया.

रामाया गिरि कमली वाली घटना भूल सा गया. लेकिन रामप्यारी और कमली के लिए अपनी इज्जत बहुत माने रखती थी.

एक दिन रामप्यारी और कमली धान की कटाई कर रही थीं, तभी रामप्यारी ने सड़क से रामाया गिरि को मोटरसाइकिल से आते देखा.

बदला चुकाने की आग में जल रही दोनों मांबेटी ने एकदूसरे को इशारा किया. फिर दोनों मांबेटी हाथ में हंसिया लिए रामाया गिरि को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ीं.

रामाया गिरि सारा माजरा समझ गया. उस ने मोटरसाइकिल को और तेज चला कर निकल जाना चाहा, पर हड़बड़ी में मोटरसाइकिल उलट गई.

रामाया गिरि चारों खाने चित गिरा. रामप्यारी के लिए मौका अच्छा था. वह फुरती से रामाया गिरि के सीने पर चढ़ गई. इधर कमली ने उस के पैरों को मजबूती से जकड़ लिया.

रामप्यारी रामाया गिरि के गले पर हंसिया रखती हुई बोली, ‘‘बोल रामाया, तू ने मेरी बेटी की इज्जत क्यों लूटी?’’

इतने में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. रामाया गिरि लोगों की हमदर्दी खो चुका था, सो किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की.

रामाया गिरि का चेहरा पीला पड़ चुका था. जान जाने के खौफ से वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘रामप्यारी… रामप्यारी, मेरा गला मत रेतना.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारा गला नहीं रेतूंगी. गला रेत दिया तो तुम झटके से आजाद हो जाओगे. मैं सिर्फ तुम्हारी गंदी आंखों को निकालूंगी. दूसरों की जिंदगी में अंधेरा फैलाने वालों के लिए यही सही सजा है.’’

रामप्यारी बिलकुल चंडी बन चुकी थी. रामाया गिरि के लाख छटपटाने के बाद भी उस ने नहीं छोड़ा. हंसिया के वार से रामाया गिरि की आंखों से खून का फव्वारा उछल पड़ा.

लौट आओ अपने वतन- विदेशी चकाचौंध में फंसी उर्वशी

लंदन एयरपोर्ट पर ज्यों ही वे तीनों आधी रात उतरे, उर्वशी को छोड़ उस के मम्मीपापा का चेहरा एकाएक उतर गया. आंखें नम हो आईं.

एयरपोर्ट पर हर तरफ जगमगाहट थी. चकाचौंध इतनी थी कि रात होने का आभास ही नहीं हो रहा था.

इस चकाचौंध में भी उर्वशी के मम्मीपापा के चेहरों की उदासी साफ झलक रही थी. उर्वशी का रिश्ता तय करने के लिए वे लंदन उसे लड़के वालों को दिखाने लाए थे, लेकिन उन का मन इतना उदास था कि मानो उसे विदा करने आए हों.

सड़क  के दोनों ओर बड़ीबड़ी स्ट्रीट लाइटें, हर चौराहे पर रैड सिगनल, मुस्तैदी से ड्यूटी निभा रही टै्रफिक

पुलिस, साफसुथरी, चौड़ी सड़कों पर दौड़तीभागती लंबीलंबी चमचमाती कारें, बाइक, साइकिलें और विक्टोरिया (तांगे), पैदल यात्रियों के लिए ईंटों से बने फुटपाथ, अनगिनत दुकानें, मौल वहां की शोभा बढ़ा रहे थे.

उस समय लंदन की ठिठुरन वाली ठंड में भी हाफ जींस, टीशर्ट डाले, हर उम्र के कई जोड़े स्टालों पर कोल्डडिं्रक, आइसक्रीम का मजा उठाते दिखे. कहीं कोई तनाव नहीं. सुकूनभरी जीवनशैली चलती दिख रही थी.

विशाल बहुमंजिला इमारतें और उन पर टंगे बड़ेबड़े ग्लोसाइन. रास्ते में कई छोटेछोटे पार्क और उन की शोभा बढ़ाते फुहारे. हर तरफ एक सिस्टम. उर्वशी तो जैसे दूसरी दुनिया में भ्रमण कर रही थी. उस के चेहरे का उत्साह देखते ही बनता था. मन ही मन अनेक सपने संजोए उस ने. अपने वतन से कोसों दूर लंदन में अपने लिए वर देखने आना उर्वशी का उद्देश्य था. वह भारत में अपनी शादी के लिए किसी से भी बात करने में अपनी तौहीन समझती थी. और तो और अपनी मातृभाषा में बात करना भी उसे पसंद नहीं था. गिनती के लड़केलड़कियों से ही उस की मित्रता थी.

उसे लगता कि हर भारतीय गंदगी, आलस्य और बेचारगी में जीता है. भारतीय कामचोर होते हैं. यहां के बड़ेबड़े घोटाले, किसानों की लाचारी और नेताओं के बड़ेबड़े लच्छेदार भाषण? सारा दोष पब्लिक का ही तो है. यहां की सड़कें तो गायभैंसों के लिए बनी हैं ताकि वे सड़क के बीचोंबीच जुगाली कर सकें, धूलधुएं से भरा वातावरण, चूहोंमच्छरों से अस्तव्यस्त जनजीवन. ऊपर से दौड़तेभागते कुत्तों का झुंड. पान की पीकों से रंगी दीवारें, सड़कें,  बेतरतीबी से बने मकान, सोच कर ही उबकाई आने लगती थी उसे.

जमाने से चला आ रहा ‘ओल्ड फैशंड’ धोतीकुरता, सलवारजंपर, ऊपर से दुपट्टा. एडि़यों से ऊपर उठी सिमटीसिकुड़ी साडि़यां और किलो के भाव से लदे सोनेचांदी के जेवर, भला यह भी कोई पहनावा है? न चेहरे पर कोई क्रीम, न बौडीलोशन लेकिन खुद को फैशनेबल मानने वाली ये औरतें? कहीं कोई मैचिंग नहीं. अगर कपड़े ठीकठाक हों तो भी पैरों में फटी खुली जूतियां, जैसे मुंह चिढ़ा रही हों.

जेन ड्राइव कर रहा था. उर्वशी का ध्यान उस की तरफ नहीं था. उस का नाम जेन नहीं था. लेकिन जयदीप से बदल कर उस ने अपना अंगरेजों वाला नाम रख लिया था. पूरे परिवार में मात्र उर्वशी ही थी, जिस ने अपनी सभ्यता, संस्कृति बिलकुल पीछे छोड़ रखी थी. पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता का अनुसरण कर खुद को अंगरेजों जैसा ही बना डाला था उस ने.

शौर्ट स्कर्ट, पैंसिल हील वाले सैंडल, जींस, ब्रेसलेट यही सब उर्वशी को पसंद था. कंधों तक का स्टाइलिश हेयरकट, इंगलिश फिल्मों और पौप म्यूजिक की शौकीन, कांटेछुरी से खाना, एकदम बोल्ड.

भारत में तो उर्वशी को एक भी लड़का पसंद नहीं आया था. यों कहें कि वह किसी भी लड़के को देखनेमिलने में इच्छुक ही नहीं थी. उस की तो इच्छा ही थी कि उस की शादी इंडिया से बाहर ही हो चाहे वह अमेरिका हो, आस्ट्रेलिया या फिर ब्रिटेन ही क्यों न हो, पर वह भारत में शादी नहीं करेगी. चाहे उसे जिंदगी यों ही क्यों न गुजारनी पड़े.

हरियाणा में रहने वाली उर्वशी की बूआ, जो अब मुंबई में थीं और अपनी पंजाबी बोलना नहीं भूल पाईर् थीं, को उर्वशी की मम्मी सरला ने फोन किया. एक समय था जब बूआजी को उर्वशी की मम्मी से बात करना पसंद नहीं था, लेकिन आज उर्वशी के लिए रिश्ता बताने के लिए उन्होंने फोन किया, ‘‘भाभीजी, तुसी

उर्वशी दे ब्याह दी चिंता न करो. चाहो ते इक फोटो भिजवा देवो, मुंडे दी माताजी नू. इक मुंडा हैगा लंडन विच… काफी साल होए, मां हरियाणा दी रहण वाली सी. मां चाहंदी है कि लड़के दा ब्याह हिंदुस्तानी कुड़ी नाल होवे. इस वास्ते मैं फून कीत्ता…’’ बस, इधर बूआ से फोन पर बात हुई और उधर उर्वशी का परिवार लंदन पहुंचा.

जेन को देखते ही उर्वशी को लगा कि जैसे उस के सपनों का राजकुमार मिल गया हो. उस ने उर्वशी का बैग  पिछली सीट पर डाला और तुरंत डिग्गी खोल दी. तब उर्वशी ने देखा कि उस के मम्मीपापा ने अपनेअपने बैग उठा कर डिग्गी में खुद ही रखे थे. थोड़ा बुरा तो लगा था तब उसे. जेन के कहने पर वह आगे की सीट पर बैठी थी.

जयदीप से जेन तक की कहानी लंबी तो नहीं थी. जेन का परिवार हरियाणा का था. 18 वर्ष से वे लंदन में रचबस गए. होश संभालते ही जयदीप ने सब से पहला और बड़ा काम यही किया कि अपना नाम बदल कर जेन रख लिया. साथ ही अपना तौरतरीका व रहनसहन भी बदल डाला. उसे देख कोई कह ही नहीं सकता था कि वह हिंदुस्तानी है.

उर्वशी को एक नजर में वह भा तो गया, पर अभी ढेर सारी जांचपड़ताल जो करनी थी उसे.

घर कालोनी में था और काफी अच्छा भी था. बड़ा सा मेन गेट और गेट के दोनों तरफ एक कतार में नारियल के कई ऊंचेलंबे वृक्ष मकान की शोभा बढ़ा रहे थे. हर कमरा बड़ी तरतीब से सजा हुआ मिला. पर वहां रहने वाले मात्र 2 प्राणी थे. एक उस की मम्मी और दूसरा खुद वह.

चंद मिनटों में उन के सामने जेन की मम्मी ने हिंदुस्तानी भोजन परोसा, उन की मम्मी आनेजाने वाले हर हिंदुस्तानी को खुद खाना बना कर ऐसे ही खिलाती थीं, फिर देर तक हिंदुस्तान में रह रहे खासमखास लोगों के विषय में पूछती रहीं, बतियाती रहीं. वे बड़ी सलीकेदार थीं, व्यावहारिक थीं. उन के मन में कई बातों की पीड़ा थी, दर्द था जो जबान से फूट पड़ा था.

‘‘अब तो जीनामरना, सबकुछ यहीं होगा. अपने वतन की खूब याद सताती है. फिर इस के डैडी ने तो हम से नाता ही तोड़ रखा है. एक अंगरेजन के साथ रह रहे हैं. वह तो अच्छा है जो यह नौकरी कर रहा है. वरना बड़ी खराब जगह है यह और लोग बड़े गंदे हैं. बस, चमकदमक के अलावा और कुछ भी नहीं है यहां. मन तो नहीं लगता, देखो, लड़का क्या चाहता है?’’

फिर थोड़ा ठहर कर, एक लंबी सांस खींची. जब वे बोलीं तो भीतर की कड़वाहट चेहरे पर साफ झलक रही थी, ‘‘अगर अंगरेजन के चंगुल से इस के डैडी मुक्त हो जाएं तो यकीन मानें, यह देश छोड़ अपने वतन लौट आऊंगी. काश, ऐसा हो जाए.’’

जेन और उर्वशी के बीच बातचीत अधिकतर अंगरेजी में ही होती थी. जेन की फर्राटेदार अंगरेजी कभीकभी उर्वशी समझ नहीं पाती. फिर भी वह संभाल लेती. ऐसा नहीं कि जेन हिंदी नहीं जानता था, पर टूटीफूटी. हिंदी बोलतेबोलते न जाने कब अंगरेजी में घुस जाता…

‘‘चलो, तुम्हें घुमा लाऊं,’’ बात दूसरे दिन की शाम की थी. खुशीखुशी उर्वशी ने मम्मीपापा को भी साथ चलने के लिए कहा. सुनते ही जेन आगबबूला हो गया और बोला, ‘‘हमारे बीच इन बुड्ढों का क्या काम? सारा मजा किरकिरा हो जाएगा. यह तुम्हारा इंडिया नहीं, जहां कहीं भी पूरा परिवार एकसाथ निकल पड़े. यहां का कल्चर, सोसाइटी, कुछ अलग है, तभी तो यह लंदन है.’’

वह अभी और कुछ कहता, तभी सरलाजी उर्वशी को देख कर अपनी आंख हौले से भींचते हुए इशारा कर बोलीं, ‘‘तुम दोनों हो आओ, जयदीप ठीक ही कह रहा है?’’

‘‘मेरा नाम जेन है. जयदीप नहीं. इस घटिया नाम से मुझे फिर न बुलाएं. सो प्लीज, जेन कहा करें,’’ उस ने एतराज जताते हुए कहा.

‘‘ओह, सौरी जेन, आगे से याद रखूंगी,’’ सरलाजी ने सुधार कर उस हिप्पी जेन से क्षमा मांगी. उधर पापाजी  का चेहरा तमतमा उठा. उर्वशी अपनी मम्मी का इशारा समझ जेन के साथ हो ली. तब जेन का व्यवहार उसे जरा भी नहीं भाया था. ऐसा रूखापन?

काफी देर इधरउधर भटकने के बाद वे दोनों डिस्कोथिक गए. आधी रात गए डिस्कोथिक में कईकई जोड़े थिरकते दिखे. कुछ पल वह भी उर्वशी के साथ डांस फ्लोर पर रहा. फिर वह एक अंगरेज युवती के साथ देर तक डांस करता रहा.

उर्वशी जेन को देर तक निहारती रही. उसे समझने का प्रयास करती रही पर विफल रही. अभी वह उस के विषय में सोच ही रही थी कि किसी ने उस के कंधे पर हाथ रखा. वह चौंक पड़ी. सामने एक युवक खड़ा था. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘डांस प्लीज?’’

‘‘वाय नौट,’’ वह उठ खड़ी हुई.

अभी उस ने डांस शुरू किया ही था कि उसे महसूस हुआ कि वह बदतमीजी पर उतर आया है. यही नहीं उस की बदतमीजी लगातार बढ़ती ही जा रही थी. उस ने खुद को  छुड़ाने की कोशिश की, पर अपने को छुड़ा नहीं पाई और जेन से चिल्लाचिल्ला कर मदद मांगने लगी पर जेन ने यह सब देख कर भी अनदेखा कर दिया. जैसेतैसे वह खुद मुक्त हुई और साथ ही उस ने एक जोरदार थप्पड़ उस व्यक्ति के चेहरे पर रसीद कर दिया. अंगरेज थप्पड़ खा कर तिलमिला उठा था.

जोरदार थप्पड़ की झनझनाहट से उस का सिर घूम गया था. वह कुछ भी कर जाता, अगर जेन ने मिन्नतें न की होतीं. काफी देर बाद वह शांत हुआ और जेन को धक्का देते हुए वहां से हट गया. जेन ने इस बात की नाराजगी उर्वशी पर निकाली, ‘‘जानती हो, वह एक गुंडा है. फिर, वह कौन सा निगल रहा था तुम्हें?’’

‘‘तो क्या तुम किसी के साथ हो रहे अन्याय को बस देखते ही रहोगे. विरोध नहीं करोगे उस का? कैसी परवरिश है तुम्हारी?’’ उर्वशी गुस्से में बोली.

‘‘छोड़ो भी, तुम लोगों को जीना आता ही कहां है? हर पल किसी न किसी से उलझते ही रहो बस,’’ जेन बोला.

उर्वशी ने जेन से उलझना उचित नहीं समझा और चुपचाप घर लौट आई. फिर तो रास्तेभर दोनों ने एकदूसरे से बिल्कुल भी बात नहीं की. मम्मीपापा को सोता देख वह भी सोने चली गई.

‘‘कैसा रहा जेन के साथ कल का दिन तुम्हारा?’’ सरलाजी ने उर्वशी से पूछा. उस ने मुंह बिचका दिया. सरलाजी के होंठों पर एक मुसकान तैर गई. एक  शाम को उर्वशी और उस के मम्मीपापा को जेन समुद्र किनारे ले गया.

समुद्रतट पर अंगरेजों का साम्राज्य था. नंगेधड़ंगे, कुछ तो हदें पार कर रहे थे. सरलाजी उर्वशी के साथ थीं इसलिए, बात घुमा कर बोलीं, ‘‘चलो, यहां से… बहुत घूम लिए. फिर मेरी तो सांस भी फूलने लगी है.’’ फिर वे लौटते हुए देर तक न जाने क्याक्या बड़बड़ाती रही थीं. वैसे उर्वशी को समुद्रतट का नजारा जरा भी न भाया था. यहां के लोग सभ्य, सलीके वाले होते हैं, भ्रम टूटने लगा था अब तो.

जेन ने डायनिंग टेबल पर पूछा, ‘‘कैसा लगा हमारा लंदन?’’ उस ने शराब के 2 पैग बना, मम्मीपापाजी को पेश किए. पापाजी के इनकार करने पर उस ने कहा, ‘‘आप इंडिया के लोग शराब नहीं पीते? फिर जीते कैसे हैं?’’ यही वजह है कि भारत हमेशा पीछे रहा है. अब यहां के लोगों को ही देख लें. हर कोई एंजौय करता है. जेन का इतना कहना ही उस के लिए मुसीबत ले आया. अपने को बहुत

देर से दबा कर बैठी उर्वशी अपना आपा खो बैठी जैसे सहस्र बिच्छुओं ने उसे एकसाथ काट खाया हो. ऊंची आवाज में वह कहती रही और जेन स्तब्ध खड़ा बस, सुनता ही रहा.

‘‘मैं ने यहां की तहजीब और तमीज अच्छी तरह महसूस कर ली है. बड़ीबड़ी इमारतों और झूठी चकाचौंध के अलावा और कुछ नहीं पाया. यहां बुजुर्गों का तो जरा भी लिहाज नहीं. नग्नता के अलावा और कुछ भी नहीं. जबरन एंजौय का ढोंग. फिर तुम्हारी मम्मी के होते, तुम्हारे पापा ने कितना घृणित काम किया? यही है यहां का कल्चर. औैर बात इतने में खत्म नहीं होती. तुम बुजदिल हो. तुम में इंसानियत नाम की चीज नहीं है. मेरा भारत महान है, महान ही रहेगा. वहां दिखावा नहीं है. सच्चे, सीधेसादे लोग बसते हैं, हमारे वतन में.’’

वह तैश में थी, थोड़ा ठहर कर, पल भर रुक कर बोली, ‘‘जयदीप, तुम भी अंगरेज नहीं हो. नाम बदल लेने से किसी के संस्कार, संस्कृति नहीं बदलती, समझे मिस्टर जेन. तुम भी हिंदुस्तानी हो. इस देश ने तुम में अहम भर दिया है. इस देश में तुम पूरी जिंदगी क्यों न बिता लो, तब भी तुम्हारी यहां कोई अहमियत नहीं है. मेरी यह बात याद रखना.’’

हक्काबक्का जेन स्तब्ध खड़ा सुन रहा था. जेन की माताजी भी सिर झुकाए, शर्म से गढ़ी खड़ी थीं. मम्मीपापा के साथ उर्वशी ने डायनिंग टेबल छोड़ दी. उर्वशी ने महसूस किया कि उस के मम्मीपापा की आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बह रही थी. वे खुश थे यह जान कर कि उन की बेटी अब इस लायक हो गई है कि वह अच्छेबुरे की पहचान कर सके और वे लोग उसे नासमझ समझते रहे थे.

बेहद दृढ़ स्वर में उर्वशी बोली, ‘‘हम कल लौट रहे हैं अपने वतन, तुम्हारा लंदन तुम्हें ही मुबारक. एक बात और कि तुम हमें छोड़ने नहीं आओगे.’’

उर्वशी का तमतमाया चेहरा देखने की ताकत जेन में थी ही नहीं, उस ने चुपचाप वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी.

लेखक- केशव राम वाड़दे

Hindi Story : नया शौहर

Hindi Story. राजन ने दोपहर का खाना खाया और कुछ देर आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट गया. तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. उस ने देखा कि पत्नी कमला की वीडियो काल थी. उस ने पूछा, ‘‘कमला, कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं, लेकिन…’’ उधर से कमला की आवाज आई. ‘‘लेकिन क्या?’’ ‘‘राजू को चोट लग गई है सिर में.’’  ‘‘चोट लग गई राजू को, पर कैसे?’’

‘‘कुछ देर पहले बाहर टौफी लेने गया था, तभी एक बाइक वाले ने टक्कर मार दी और भाग गया. राजू सड़क पर गिर पड़ा.’’ ‘‘फिर?’’ राजन की आवाज में डर शामिल था.

‘‘कसबे में ही रहने वाले मनोज ने उसे उठाया और डाक्टर के पास ले जा कर पट्टी करा दी.’’ ‘‘ज्यादा चोट तो नहीं लगी राजू को? मुझे आना है क्या?’’

‘‘नहीं, तुम क्या करोगे आ कर. चोट भी मामूली है, माथे पर. अब राजू सो रहा है. मनोज ही राजू को यहां पर छोड़ कर गया है.’’

‘‘बहुत अच्छा आदमी है. जब वह आया तो तुम ने उसे चायवाय भी पिला दी थी न?’’ ‘‘हां, पिला दी थी.’’

‘‘ठीक है…’’ राजन ने कहा, ‘‘और सुना क्या हाल है?’’ ‘‘मुझे बहुत याद आती है तुम्हारी. कभीकभी तो रात को नींद भी नहीं आती अकेले में,’’ कमला ने कहा.

‘‘कमला, मैं सोचता हूं कि तुम्हें और राजू को यहां अपने पास ही लुधियाना बुला लूं. लेकिन यहां महंगाई बहुत है. मैं इतनी दूर यहां फैक्टरी में काम करने आया हूं. अब तो कुछ बचत भी हो रही है, फिर बचेगा ही क्या?  मैं 2 महीने बाद आऊंगा.’’ ‘‘ठीक है,’’ कमला बोली.

‘‘राजू का और अपना ध्यान रखना,’’ राजन ने कहा. ‘‘तुम भी अपनी सेहत का ध्यान रखना,’’ कमला बोली.

‘‘हांहां, क्यों नहीं डार्लिंग.’’ ‘‘ओके माई डियर,’’ कमला ने कहा और हंसते हुए वीडियो काल बंद कर दी.

राजन ने मोबाइल बंद किया और आंखें बंद कर के लेटा रहा.

राजन आगरा के निकट एक कसबे का रहने वाला था. परिवार में मातापिता थे. पिता आगरा के एक कारखाने में मजदूरी करते थे. जब वह जवान हुआ तो उस की शादी कमला से करा दी गई. सांवले रंग की तीखे नैननक्श वाली कमला उस के मन को खूब भा गई थी. एक दिन एक बस दुर्घटना में राजन मां और पिता दोनों की मौत हो गई थी.

2 साल बाद एक बेटे का जन्म हुआ, जिस का नाम राजकुमार रखा, लेकिन प्यार से राजू कहा जाने लगा.

उस कसबे के कुछ नौजवान लुधियाना, पंजाब में हौजरी फैक्टरी में नौकरी करते थे. तनख्वाह भी अच्छी मिलती थी. 2 साथियों ने कहा तो राजन भी लुधियाना चला आया था.

उसे एक फैक्टरी में काम मिल गया था. जब कभी मन करता राजन कमला को काल या वीडियो काल कर लेता. कभी कमला की काल भी आ जाती.

राजन को यहां काम करते हुए 3 साल हो गए थे. 2-3 महीने में वह कमला से मिलने चला जाता था. अब तो राजू 5 साल का हो गया था. स्कूल जाने लगा था… इन विचारों में डूबतेतैरते राजन को नींद आ गई.

एक दिन कमला कुछ जरूरी सामान खरीदने के लिए आगरा गई. साथ में राजू भी था. तभी बाजार में कमला की नजर मनोज पर पड़ी, तो वह मुसकरा उठी.

‘‘कैसे हो राजू बेटे?’’ मनोज ने राजू की तरफ देख कर पूछा. ‘‘मैं ठीक हूं अंकल,’’ राजू बोला. ‘‘तुम आगरा कब आई?’’ मनोज ने कमला से पूछा. ‘‘एक घंटा पहले. कुछ जरूरी सामान खरीदना था.’’

‘‘उस दिन के बाद तुम से और राजू से मुलाकात ही नहीं हुई. समय नहीं मिला. अब कैसा है राजू बेटा?’’ ‘‘बिलकुल ठीक है.’’ ‘‘आओ, किसी ढाबे में चलते हैं. कुछ ठंडा पी लो. राजू से कुछ बातें भी हो जाएंगी,’’ मनोज बोला.

कमला जानती थी कि मनोज राजू से नहीं, बल्कि उस से बात करना चाहता था. मनोज के चेहरे में पता नहीं कौन सा आकर्षण था कि कमला मना नहीं कर पाई.

मनोज उन दोनों को एक ढाबे में ले गया. कुछ देर बाद वे बाहर आए. मनोज ने एक दुकान से राजू को कुछ खिलौने ले कर दे दिए. राजू बहुत खुश हो गया.

कमला मनोज से बात करते हुए जान चुकी थी कि मनोज अकेला रहता है. उस की शादी हुई थी लेकिन पत्नी की पहली डिलीवरी में ही मौत हो गई थी. बच्चा भी नहीं बच पाया था. वह किसी प्राइवेट कंपनी में जौब करता है. वह दिन कमला और राजू के लिए अच्छा बीता.

कुछ दिन वह कमला के फोन की घंटी बजी. देखा तो मनोज का फोन था. वह राजू से मिलने को आने के लिए कह रहा था. कमला मन ही मन मुसकरा कर रह गई. वह जानती थी कि राजू तो एक बहाना है मनोज उस से मिलने आ रहा है. उस ने खुश हो कर हां कर दी.

मनोज कुछ फल व मिठाई ले कर आया था. जब कमला ने टोका तो वह बोल उठा, ‘‘राजू से मिलने क्या खाली हाथ आता?’’

राजू भी खुश हो कर बोला, ‘‘अंकल, आप कितने अच्छे हैं.’’ ‘‘सच में?’’ मनोज ने पूछा. ‘‘हां अंकल, बहुत अच्छे हैं आप.’’ राजू खिलौनों से खेलने लगा और मनोज कमला से बातें करने लगा.

जाते हुए मनोज ने कहा,  ‘‘कमला, तुम किसी तरह की चिंता न करना. कभी कुछ भी जरूरत हो मु?ो बता देना.’’

उस के बाद मनोज कभी आ जाता. दिन हो या रात उस के लिए कमला के दिल के दरवाजे भी खुल गए. रात को रोजाना मैसेंजर पर या व्हाट्सऐप पर चैटिंग करते. काल या वीडियो काल भी करते.

धीरेधीरे कमला ने सारी सीमाएं पार कर मनोज को वह सब दे दिया था, जिस पर केवल राजन का हक था.

कमला को भी लगने लगा था कि वह मनोज के बिना नहीं रह पाएगी. उसे राजन एक पति के रूप में बोझ  सा लगने लगा. वह राजन से छुटकारा पाने के लिए सोचने लगी.

एक दिन मनोज ने कमला से कहा, ‘‘कमला, अब मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता.’’ ‘‘मेरा भी यही हाल है. तुम मेरा कितना ध्यान रखते हो मनोज.’’

‘‘मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपनी बनाना चाहता हूं.’’ ‘‘लेकिन कैसे? राजन हम दोनों के बीच दीवार है.’’

‘‘चिंता न करो. इस दीवार को हटा दें और किसी को पता भी नहीं चले.’’ ‘‘मैं हर तरह से तुम्हारे साथ हूं,’’ कमला का जवाब था.

एक शाम कमला के फोन की घंटी बजी. कमला ने देखा फोन राजन का था.

वह बोली, ‘हैलो, कैसे हो?’’ ‘‘यह मनोज कौन है?’’ उधर से राजन की आवाज सुनाई दी.

‘‘मनोज… यह मनोज तो वही है जिस ने राजू के सिर पर चोट लगने पर पट्टी कराई थी.’’ ‘‘तो क्या अभी तक राजू का इलाज चल रहा है?’’ ‘‘नहीं, अब तो राजू ठीक है.’’

‘‘देख कमला, मुझे सब पता चल चुका है तेरी और उस की हरकतों का. राजू को पट्टी कराने की कीमत वह तुझ  से वसूल कर रहा है.’’

कमला चुप रही. वह समझ  गई कि किसी ने फोन कर के राजन को सब बता दिया है. चलो, कोई बात नहीं, एक न एक दिन तो पता चलना ही था.

‘‘बोल अब चुप क्यों है? मुझे  तुझ  से ऐसी उम्मीद नहीं थी कमला. तू ने मुझे धोखा दिया है. मैं यहां अकेला मेहनतमजदूरी कर रहा हूं और तू अपने यार के साथ रंगरेलियां मना रही है.’’ ‘‘और क्या पता तू भी वहां रंगरेलियां मनाता हो,’’ कमला ने भी पलट कर जवाब दिया.

‘‘मुझ  से जबान लड़ाती है. मैं कल ही आ रहा हूं. तुझे और तेरे उस यार को देखूंगा.’’ ‘‘हां, देख लेना. मेरे और मनोज के बीच में कुछ नहीं है,’’ कमला ने कहा और फोन बंद कर दिया.

अगले दिन राजन के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो.’’ ‘‘मैं मनोज बोल रहा हूं,’’ उधर से मनोज की आवाज सुनाई दी.

‘‘क्या कहना है? मेरी कमला को अपने जाल में फंसा कर मेरा घर बरबाद करने वाले तू क्या चाहता है?’’ ‘‘मैं बस कमला को सहारा दे रहा हूं. मेरा उस से कोई खराब रिश्ता नहीं है. वह तेरी पत्नी है और मेरे किस काम की है.’’

‘‘तू झूठ बोल रहा है. तेरी कमला के साथ आशनाई चल रही है… वहां आ कर मैं पुलिस में रिपोर्ट करूंगा,’’ राजन बोला.

‘‘मेरी बात सुन राजन, पुलिस में तो रिपोर्ट जब करेगा जो तू जिंदा बचेगा. तू ने अखबारों में नहीं पढ़ा क्या? बहुत केस हो रहे हैं, जिन में पत्नी अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने पति को हमेशा के लिए गहरी नींद सुला देती है.’’ ‘‘तुम दोनों मुझे जान से मारोगे?’’

‘‘अगर जरूरत पड़ी तो मारना ही पड़ेगा. देख राजन, कमला किसी भी समय तुझे  बेहोशी की दवा खिला सकती है. बेहोश होने पर गला घोंट कर मैं रात को तेरी लाश यमुना नदी में फेंक दूंगा. यमुना नदी यहां से ज्यादा दूर नहीं है. सुबह तक तेरी लाश पता नहीं कहां पहुंच जाएंगी. यहां कह दिया जाएगा कि तू रात ही वापस चला गया था, इसलिए मैं चाहता हूं कि…’’

‘‘क्या चाहता है?’’ सुन कर सचमुच राजन डर गया.  ‘‘बस, कमला मुझे  दे दे. अगर तू अपनी जिंदगी चाहता है. पहले वह तेरी ही थी लेकिन अब वह मेरी हो गई है. क्या समझे?’’ मनोज का जोरदार स्वर सुनाई पड़ा. फोन बंद हो गया.

राजन के दिल की धड़कन बढ़ गई. गला खुश्क हो गया. वह बुरी तरह घबरा रहा था. उसे लग रहा था कि कहीं सचमुच ही कमला मनोज से मिल कर उस की हत्या न करा दे.

रात को बिस्तर पर लेट कर राजन को नींद नहीं आ रही थी. उसे बारबार लग रहा था कि कमला और मनोज दोनों मिल कर उसे मार डालेंगे. आजकल इस तरह के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. बाद में वे दोनों पकड़े भी गए और उन को सजा भी होगी तो क्या होगा. राजू की जिंदगी भी खराब हो जाएगी. आखिर क्या करना चाहिए उसे? वह सोचता रहा और आखिर में उस ने मन ही मन एक फैसला ले लिया.

अगले दिन राजन ने कमला को फोन पर सूचना दे दी कि आज वह ट्रेन से चल कर कल सुबह आगरा पहुंच जाएगा. उस के बाद घर तक पहुंचने में 2 घंटे लग जाएंगे.

राजन घर पहुंचा तो 11 बज रहे थे. उसे कमला के  चेहरे पर सबकुछ बनावटी लगा. कमला का हंसना व बात करना नकली लग रहा था.

घर से निकलते हुए राजन ने कहा, ‘‘कमला, मैं ने तुम दोनों के बारे में सोच लिया है.’’ ‘‘क्या?’’ कमला ने पूछा. ‘‘कुछ देर बात पता चल जाएगा. मैं अभी आता हूं,’’ राजन ने इतना कहा और बाहर चला गया.

कमला समझ  नहीं पाई कि राजन का अगला कदम क्या होगा? अब वह कहां गया है? उस ने मनोज को फोन मिला कर बता दिया. ‘‘तू फिक्र न कर कमला, मैं तेरे आसपास ही हूं. जो भी होगा मैं देख लूंगा,’’ मनोज ने कमला को कह दिया.

राजन घर से निकल कर सीधा पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. सामने कुरसी पर बैठे इंस्पैक्टर वीरेंद्र सिंह के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘नमस्ते साहबजी, मेरा नाम राजन है. मैं इसी कसबे में रहता हूं. मुझे मरने से बचा लो साहब. मैं मरना नहीं चाहता. आप ही मुझे  बचा सकते हैं. मैं आप के पैर पकड़ता हूं,’’ इतना कह कर राजन ने इंस्पैक्टर वीरेंद्र सिंह के पैर पकड़ लिए.

‘‘अरे उठ, बता मामला क्या है? कौन तुझे मारना चाहता है?’’ इंस्पैक्टर वीरेंद्र सिंह ने राजन को उठाते हुए कहा. ‘‘मेरी घरवाली कमला और उस का यार मुझे  मारना चाहते हैं,’’ राजन ने पूरा मामला बताने के बाद मनोज की बातचीत की रिकौर्डिंग भी सुना दी.

इंस्पैक्टर वीरेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘आजकल जिधर देखो इस तरह के मामले बढ़ते जा रहे हैं. तुम ऐसा करो कि एक कागज पर लिख कर दे दो. एफआईआर दर्ज हो जाएगी, दोनों को जेल भेज दिया जाएगा. जेल जा कर प्यार का भूत उतर जाएगा.’’

राजन ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘नहीं साहब, मैं ऐसा नहीं चाहता.’’ ‘‘फिर कैसा चाहता है? क्या उन दोनों की शादी करा दूं?’’

‘‘बिलकुल ठीक कहा आप ने. मैं भी यहीं चाहता हूं कि उन दोनों की शादी हो जाए. मैं कमला को मनोज के हवाले करना चाहता हूं. कमला अब मेरी नहीं उस की हो गई है. मगर मैं ने ऐसा कर दिया तो मेरी जान बच जाएगी, मेरे बेटे राजू का भविष्य खराब होने से बच जाएगा.’’

‘‘तू तो बहुत समझदारी की बात कर रहा है, लेकिन बिना तलाक के कमला की शादी कैसे हो सकती है?’’

‘‘साहबजी, मैं लिख कर दे दूंगा कि अब मेरा कमला से कोई संबंध नहीं है. बस आप इन दोनों को बुला कर इन की शादी करा दीजिए. आप के सामने यह सब होगा. अब आप के हाथों में मेरी जान और मेरे बेटे का भविष्य है साहबजी.’’

‘‘ठीक है, आज एक नया प्रयोग यह भी कर लेते हैं,’’ इंस्पैक्टर वीरेंद्र सिंह ने कहा.

कुछ देर बाद कमला और मनोज को पुलिस स्टेशन बुला लिया गया. कसबे के कुछ खास लोगों को भी बुलाया गया.

कागजी लिखापढ़ी के बाद कमला और मनोज ने एकदूसरे के गले में माला डाल कर साथ निभाने का  वादा किया. राजन ने अपने हाथों से कमला की विदाई की.

अगले दिन महल्ले में एक ही बात लोगों की जबान पर थी पति ने पत्नी व प्रेमी की शादी कराई पुलिस थाने में. अब यह न कहना कि यह शादी हिंदू मैरिज एक्ट के हिसाब से सही नहीं. मियांबीबी राजी तो क्या करेगा काजी.

2 दिन बाद राजन नया जीवन जीने के लिए राजू को साथ ले कर लुधियाना जा पहुंचा.

शन्नो की हिम्मत: एक बेटी ने कैसे बदली अपने पिता की जिंदगी

Family Story in Hindi: शन्नो थी तो 10 साल की ही, पर उस का बाप फिरोज खान उस से सख्त नफरत करता था. वजह यह थी कि बेटा पैदा न करने के जुर्म में वह शन्नो की मां को अकसर मारतापीटता था, जिस की शन्नो जम कर खिलाफत करती थी. शन्नो की मां अनवरी मजबूरी के चलते पति के सितम चुपचाप सह लेती थी, लेकिन एक दिन शन्नो का सब्र जवाब दे गया और उस ने बाकरपुर थाने जा कर बाप की शिकायत कर डाली. थाना इंचार्ज एसआई पूनम यादव ने सूझबूझ से काम लेते हुए फिरोज खान को हिरासत में ले लिया.

लेकिन जब पुलिस वाले फिरोज खान की कमर पर रस्सा बांधने लगे, तो शन्नो यह देख कर तड़प उठी. वह एसआई पूनम यादव से रोते हुए बोली, ‘‘मैडमजी, पापा को माफ कर दीजिए. आप इन्हें सिर्फ समझा दीजिए कि अब दोबारा कभी अम्मी को नहीं सताएंगे.

‘‘मैं यह नहीं जानती थी कि पापा इतनी बड़ी मुसीबत में फंस जाएंगे. प्लीज, पापा को छोड़ दीजिए,’’ कह कर वह उन से लिपट कर रोने लगी.

‘‘घबराओ नहीं बेटी, तुम्हारे पापा को कुछ नहीं होगा. हम इन्हें समझाबुझा कर जल्दी छोड़ देंगे,’’ एसआई पूनम यादव ने शन्नो को काफी समझाया, लेकिन वह रोतीबिलखती रही.

पापा के बगैर शन्नो थाने से बाहर नहीं आना चाहती थी. बड़ी मुश्किल से उसे घर पहुंचाया गया. इस वाकिए के बाद शन्नो हंसना ही भूल गई. पापा को उस की वजह से जेल जाना पड़ा था. इस बात का उसे बहुत अफसोस था. एसआई पूनम यादव ने फिरोज खान की माली हालत के मद्देनजर उस पर बहुत कम जुर्माना लगाया, जिस से वह एकाध महीने में ही जेल से छूट गया.

एसआई पूनम यादव ने फिरोज खान को जेल से बाहर आने के बाद समझाया, ‘‘देखो फिरोज, तुम ने बेटा पाने की चाहत में बेटियों की जो लाइन लगा रखी है, उस का बोझ तुम्हें अकेले ही उठाना पड़ेगा, इसलिए अब भी वक्त है कि तुम अपनी बेटियों को ही बेटा समझो. उन्हें प्यारदुलार दो.

‘‘अगर तुम्हारे घर बेटा पैदा नहीं हुआ, तो इस की जिम्मेदार तुम्हारी पत्नी नहीं है, बल्कि तुम खुद हो.

‘‘तुम्हारे घर में कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है, बल्कि तुम सब के दुश्मन हो और अपनी जिंदगी के साथ भी दुश्मनी कर रहे हो.

‘‘अब क्या तुम अपनी बेटी शन्नो से इस बात का बदला लोगे कि तुम्हारे द्वारा उस की मां पर ढाए जाने वाले जुल्म से घबरा कर वह थाने चली आई?’’

फिरोज खान सिर झुकाए चुपचाप एसआई पूनम यादव की बातें सुनता रहा.

‘‘खबरदार फिरोज, अब भूल से भी कोई ऐसीवैसी हरकत मत करना.’’

फिरोज खान ने एसआई पूनम यादव की बात को अनसुना कर दिया, क्योंकि उस के मन में शन्नो के लिए बदले की आग सुलग रही थी. घर में कदम रखते ही फिरोज ने शन्नो की पिटाई की.

बेटी को पिटता देख अनवरी बचाने आई, तो फिरोज ने उसे भी खूब मारापीटा, फिर दोनों मांबेटी को घर से निकाल दिया. इस दुखद मंजर को अड़ोसपड़ोस के लोग चुपचाप देखते रहे. किसी के लफड़े में पड़ने की क्या जरूरत है, इस सोच के चलते महल्ले वाले अपनेअपने जमीर को मुरदा बनाए हुए थे. कोई भी यह नहीं सोचना चाहता था कि कल उन के साथ भी ऐसा हो सकता है.

अनवरी शन्नो को साथ ले कर अपने मायके समस्तीपुर चली आई और अपनी बेवा मां से लिपट कर खूब रोई. सारा दुखड़ा सुनाने के बाद अनवरी बोली, ‘‘अम्मां, आज से शन्नो का जीनामरना आप को ही करना होगा.’’

सुबह होते ही अनवरी बस में सवार हो कर ससुराल लौट गई. इस बात को 10 साल बीत गए. शन्नो के ननिहाल वाले गरीब थे, इस के बावजूद मामूमौसी वगैरह ने मिलजुल कर शन्नो की परवरिश की. उसे अच्छी से अच्छी तालीम दे कर कुछ इस तरह निखारा कि अपनेपराए, सभी उस पर नाज करने लगे.

आज शन्नो 18-19 बरस की हो चली थी. इस दौरान फिरोज खान ने उस की कोई खोजखबर नहीं ली, क्योंकि वह उस से बहुत चिढ़ता था. उसी की वजह से उसे जेल जाना पड़ा था. शन्नो की मां अनवरी अकसर मायके आ कर बेटी को देख लेती थी.

इस बार अनवरी मायके आई, तो उस ने मायके के तमाम रिश्तेदारों को इकट्ठा किया और अपनी लाचारी बयान करते हुए शन्नो के हाथ पीले करने की गुहार लगाई. इस पर मायके वालों ने भरपूर हमदर्दी जताई.

शन्नो के बड़े मामू साबिर ने तो मीटिंग के दौरान ही अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराते हुए कहा, ‘‘देखिए, आप लोगों को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं ने शन्नो के लिए एक अच्छा सा लड़का देख रखा है. वह शरीफ है, कम उम्र का है, पढ़ालिखा है और नौकरी भी बहुत अच्छी करता है.’’

लेकिन जब लड़के की असलियत पता की गई, तो मालूम हुआ कि वह किसी भी नजरिए से शन्नो के लायक नहीं था. वह 50 साल से ऊपर का था और 2 बीवियों को तलाक दे चुका था. नौकरी करने के नाम पर वह दिल्ली में रिकशा चलाता था.

साबिर द्वारा पेश किया गया ऐसा बेमेल रिश्ता किसी को पसंद नहीं आया. नतीजतन, उस रिश्ते को नकार दिया गया. इस पर साबिर ने नाराजगी जताई, तो उस की बड़ी बहन नरगिस बानो ने साबिर को तीखा जवाब दिया, ‘‘लड़का जब इतना ही अच्छा है, तो शन्नो को दरकिनार करो और उस से अपनी बेटी को ब्याह दो.’’

नरगिस बानो के इस फिकरे ने साबिर के होश ठिकाने लगा दिए. वह तिलमिला कर फौरन मीटिंग से उठ गया. शन्नो के लिए एक मुनासिब लड़के की तलाश जारी थी और जल्दी ही नरगिस बानो ने एक लायक लड़के को देख लिया, जो सब को पसंद आया. शादी की तारीख एक महीने के अंदर तय की गई. चंद ननिहाली रिश्तेदारों ने माली मदद में पहल की. इस में नरगिस बानो खासतौर से आगे रहीं.

लड़का पेशे से वकील होने के अलावा एक सच्चा समाजसेवी भी था. उस के स्वभाव में करुणा कूटकूट कर भरी थी. उस ने लड़की वालों से किसी चीज की मांग नहीं की थी.

शन्नो की बरात आने में 10 दिन बाकी रह गए थे. इसी बीच एक दिन शन्नो के होने वाले पति रिजवान ने नरगिस बानो को फोन कर शादी से इनकार करने का संकेत दिया. वजह पूछने पर उस ने बताया कि लड़की अपने बाप को जेल की हवा खिलवा चुकी है. इस वजह से कोई भी शरीफ लड़का ऐसी लड़की को अपना हमसफर बनाना पसंद नहीं करेगा.

शन्नो के ननिहाल वालों की आंखों में मायूसी का अंधेरा पसर गया. वे आपस में मिलबैठ कर सोचविचार कर रहे थे कि बिगड़ी बात कैसे बनाई जाए, तभी नरगिस बानो के मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. रिजवान का फोन था.

नरगिस बानो ने झट से फोन रिसीव किया और बोलीं, ‘‘तुम्हारे शुभचिंतकों ने हमारी शन्नो के खिलाफ और जो कुछ भी शिकायतें की हैं, तो वे भी हम से कह कर भड़ास निकाल लो.’’

‘ऐसी बात नहीं है, बल्कि मैं ने तो आप लोगों से माफी मांगने के लिए फोन किया है. मुझे माफ कर दीजिए प्लीज.’

नरगिस बानो ने मोबाइल फोन का स्पीकर औन कर दिया, ताकि लड़के की बात उन के अलावा घर के दूसरे लोग भी सुन सकें.

‘आप के ही कुछ सगेसंबंधी मेरे कान भर कर मुझे गुमराह करने पर तुले थे. लेकिन भला हो एसआई पूनम मैडम का, जिन्होंने आप के रिश्तेदारों द्वारा रची गई झूठी कहानी का परदाफाश कर मेरी आंखें खोल दीं.’

‘‘लेकिन, कौन पूनम मैडम?’’ नरगिस बानो ने चौंक कर पूछा.

‘जी, वे एक पुलिस वाली होने के अलावा समाजसेवी भी हैं. उन से मेरी अच्छी जानपहचान है. मैं ने उन से शन्नो और उस के अब्बू फिरोज खान साहब से संबंधित थानापुलिस वाली बात जब बताई, तो उन्हें वह सारा माजरा याद आ गया. तब उन की पोस्टिंग बाकरपुर थाने में थी. उन्होंने मुझे सबकुछ बता दिया है, जिस से सारी बात साफ हो गई और मेरा दिल साफ हो गया.’

शन्नो के ननिहाल वाले गौर से रिजवान की बातें सुन रहे थे. रिजवान ने आगे कहा, ‘बड़े अफसोस की बात है कि अपने लोग भी कितने दुश्मन होते हैं. ऐसे लोग अगर किसी मजबूर का भला नहीं कर सकते, तो कम से कम बुराई करने से परहेज करें.’

और फिर देखते ही देखते शन्नो की शादी रिजवान के साथ करा दी गई. शादी में एसआई पूनम यादव भी दूल्हे की तरफ से शरीक हुई थीं. विदाई के दौरान शन्नो की रोती हुई आंखें किसी को तलाश रही थीं. एसआई पूनम यादव उस की बेचैनी को समझ रही थीं. वे थोड़ी देर के लिए भीड़ से निकल गईं और जब लौटीं, तो उन के साथ शन्नो के अब्बू फिरोज खान थे. उस के हाथ में एक छोटी सी थैली थी.

अपने अब्बू को देखते ही शन्नो उन से लिपट गई और रोने लगी. फिरोज खान ने थैली शन्नो की तरफ बढ़ा दी. इसी बीच एसआई पूनम यादव शन्नो से मुखातिब हुईं, ‘‘तुम्हारे पापा ने कड़ी मेहनत और अरमान से तुम्हारे लिए ये गहने बनवाए हैं, इस की गवाह मैं हूं. मैं चाहे जहां भी रहूं, लेकिन ये कोई भी काम मुझ से मशवरा ले कर ही करते हैं.

‘‘तुम्हारे पापा अब बेटी को मुसीबत समझने की नासमझी से तोबा कर चुके हैं. तुम्हारी सारी बहनें अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रही हैं और खूब नाम रोशन कर रही हैं.’’

‘‘मैडमजी ठीक बोल रही हैं बेटी,’’ यह शन्नो की मां अनवरी बानो थीं.

एसआई पूनम यादव बोलीं, ‘‘बस यह समझो कि शन्नो बेटी के अच्छे दिन आ गए हैं. मुबारक हो.’’

शन्नो बोली, ‘‘आप की बड़ी मेहरबानी मैडमजी. आप ने मेरे घर वालों को बिखरने से बचा लिया,’’ इतना कह कर वह एसआई पूनम यादव से लिपट कर इस तरह रो पड़ी, जैसे वह बरसों पहले बाकरपुर थाने में उन से लिपट कर रोई थी. Family Story in Hindi

Hindi Romantic Story: अधूरा सा इश्क- क्या था अमन का फैसला

Hindi Romantic Story. यादों के झरोखे पर आज फिर किसी ने दस्तक दी थी. न चाहते हुए भी अमन का मन उस और खींचता चला गया. अपनी बेटी का आंसुओं से भीगा हुआ चेहरा उसे बारबार कचोट रहा था.

“विनय, मुझे माफ कर दो, मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. मैं अपने पापा को धोखा नहीं दे सकती. मैं उन का गुरूर हूं…उन के भरोसे को मैं तोड़ नहीं सकती. हो सके तो मुझे माफ कर देना.”

देर रात श्रेया के कमरे की जलती हुई लाइट को देख अमन के कदम उस ओर बढ़ गए थे. श्रेया की हिचिकियों की आवाजें बाहर तक आ रही थीं. अमन दरवाजे पर कान लगाए खड़ा था. फोन पर उधर किसी ने क्या कहा अमन यह तो नहीं सुन पाया पर श्रेया के शब्द सुन कर उस के पैर कमरे के बाहर ही जम गए. कितना गुस्सा आया था उसे…पिताजी के खिलाफ जा कर उस ने श्रेया का कालेज में दाखिला कराया था और वह…

“आग और भूसे को एकसाथ नहीं रखा जाता. वैसे भी इसे दूसरे घर जाना है. कल कोई ऊंचनीच हो गई तो मुझ से मत कहना.”

अपने बाबा की बात सुन श्रेया संकोच और शर्म से गड़ गई थी. तब अमन ने कितने विश्वास के साथ कहा था,”पिताजी, मुझे श्रेया पर पूरा भरोसा है. वह मेरा सिर कभी झुकने नहीं देगी.”

श्रेया रोतेरोते सो गई. अमन उसे सोता हुआ देख रहा था. उस की छोटी सी गुड़िया कब इतनी बड़ी हो गई… तकिया आंसुओं से गीला हो गया था. बिस्तर के बगल में रखे लैंप की रौशनी में उस का मासूम चेहरा देख अमन का कलेजा मुंह को आ गया. कितना थका सा लग रहा था उस का चेहरा मानों वह मीलों का सफर तय कर के आई हो. कितनी मासूम लग रही थी वह.

उस की श्रेया किसी लड़के के चक्कर में…अभी उस ने दुनिया ही कहां देखी है? आजकल के ये लड़के बाप के पैसों से घुमाएंगेफिराएंगे और फिर छोड़ देंगे. श्रेया के मासूम चेहरे को देख अमन को किसी की याद आ गई. सच मानों तो इतने सालों के बाद भी वह उस चेहरे को भूल नहीं पाया था.

उसे लगा आज किसी ने उसे 25 साल पीछे ला कर खड़ा कर दिया हो. न जाने कितनी ही रातें उस ने उस के खयालों में बिता दी थीं. उस के जाने से कुछ नहीं बदला था, रात भी आई थी…चांद भी आया था पर बस नींद नहीं आई थी.

कितनी बार…हां, न जाने कितनी ही बार वह नींद से जाग कर उठ जाता.तब एक बात दिमाग में आती, जब खयाल और मन में घुमड़ते अनगिनत सवाल और बवाल करने लगे तब तुम आ जाओ. तुम्हारा वह सवाल जनून बन जाएगा और बवाल जीवन का सुकून…आज सोचता हूं तो हंसी आती है. बावरा ही तो था वह…बावरे से मन की यह न जानें कितनी बावरी सी बातें थीं. कोई रात ऐसी नहीं थी जब वह साथ नहीं होती. हां, यह बात अलग थी कि वह साथ हो कर भी साथ नहीं होती. अमन को कभीकभी लगता था कि उस के बिना तो रात में भी रात न होती. शायद इसी को तो इश्क कहते हैं… इतने साल बीत जाने पर भी वह उस को माफ नहीं कर पाया था.

सच कहा है किसी ने मन से ज्यादा उपजाऊ जगह कोई नहीं होती क्योंकि वहां जो कुछ भी बोया जाए उगता जरूर है चाहे वह विचार हो, नफरत हो या प्यार. कुछ ख्वाहिशें बारिश की बूंदों की तरह होती हैं जिन्हें पाने की जीवनभर चाहत होती है. उस चाहत को पाने में हथेलियां तो भीग जाती हैं पर हाथ हमेशा खाली रहता है. उस का प्यार इतना कमजोर था कि वह हिम्मत नहीं कर पाई. बस, कुछ सालों की ही तो बात थी…

“कैसी लग रही हूं मैं..?” खुशी ने मुसकराते हुए अमन से पूछा था. अमन उस के चेहरे में खो सा गया था. लाल सुर्ख जोड़े और मेहंदी लगे हाथों में वस और भी खूबसूरत लग रही थी. वह उसे एकटक देखता रहा और सोचता रहा कि मेरा चांद किसी और की छत पर चमकने को तैयार था.

“तुम हमेशा की तरह खूबसूरत…बहुत खूबसूरत लग रही हो.” “सच में…” “क्या तुम्हें मेरी बात पर भरोसा नहीं, कोई गवाह चाहिए तुम्हें…”

अमन की आंखों में न जाने कितने सवाल तैर रहे थे. ऐसे सवाल जिन का जवाब उस के पास नहीं था. खुशी ने अचकचा कर अपनी आंखें फेर लीं और भरसक हंसने का प्रयास करने लगी. अमन उस मासूम हंसी को कभी नहीं भूल सकता था. न जाने क्या सोच कर वह एकदम से चुप हो गया. उस समय वे दोनों कमरे में अकेले थे. बारात आने वाली थी.सब तैयारी में इधरउधर दौड़भाग रहे थे. कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था.

शायद बारात आ गई थी. भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा और खुशी के चेहरे पर बेचैनी भी…वह तेजी से अपनी उंगलियों में दुपट्टे को लपेटती और फिर ढीला छोड़ देती. कुछ था जो उस के हाथों से छूटने जा रहा था पर….खुशी सोच रही थी कि माथे का सिंदूर रिश्ते की निशानी हो सकती है पर क्या प्यार की भी? तब खुशी ने ही बोलना शुरू किया, “अमन, शायद तुम्हें मुझ से, अपने जीवन से शिकायत हो. शायद तुम्हें लगे कुदरत ने हमारा साथ नहीं दिया पर एक बार खिड़की से बाहर उन चेहरों को देखो जो मेरी खुशी के लिए कितने दिनों से दौड़भाग रहे हैं. मेरे पापा से मिल कर देखो, खुशी उन की आंखों से बारबार छलक रही है और मेरी मां… वह भी कितनी खुश है.

“क्या अगर आज हम ने उन की मरजी के खिलाफ जा कर चुपचाप शादी कर ली होती, इतने लोगों को दुख पहुंचा कर हम नए जीवन की शुरुआत कर पाते? तुम्हें शायद मेरी बातें आज न समझ में आए पर एक न एक दिन तुम्हें लगेगा कि मैं गलत नहीं थी. हो सके तो मुझे भूल जाना…”

“भूल जाना…” आसानी से कह दिया था खुशी ने यह सब पर क्या यह इतना आसान था? अमन मुसकरा कर रह गया. उस की मुसकराहट में खुशी को न पा पाने का गम, अपने बेरोजगार होने की मजबूरी बारबार साल रही थी. आज खुशी जिन लोगों का दिल रखने की कोशिश कर रही थी, क्या किसी ने उस का दिल रखने की कोशिश की? खुशी की बहनें जयमाल के लिए खुशी को ले कर चली गईं. अमन काफी देर तक उस स्थान को देखता रहा जहां खुशी बैठी थी. उस के वजूद की खुशबू वह अभी तक महसूस कर रहा था.

खुशी सिर्फ उस के जीवन से नहीं जा रही थी, उस के साथ उस की खुशियां, उस के होने का मकसद को भी ले कर चली गई थी. वह तेजी से उठा और भीड़ में गुम हो गया.

“अरे अमन, वहां क्यों खड़े हो? यहां आओ न… फोटो तो खिंचवाओ,” खुशी की मां ने हुलस कर कहा और वह झट से दोस्तों के साथ मंच पर चढ़ गया. न जाने क्यों खुशी का चेहरा उतर गया था. एक अजीब सा तनाव और गुस्सा अमन के चेहरे पर था, जैसे किसी बच्चे से उस का पसंदीदा खिलौना छीन लिया गया हो. अमन खुशी के पति के पीछे जा कर खड़ा हो गया, जैसे वह खुद को बहला रहा था. जिस जगह पर आज खुशी का पति बैठा है इस जगह पर तो उसे होना चाहिए था.

आज उस का मन यादों के भंवर में घूम रहा था. याद है, आज भी उसे खुशी से वह पहली मुलाकात… फरवरी की गुलाबी ठंड शीतल हवा के झोंके चेहरे से टकरा कर एक अजीब सी मदहोशी में डुबो रहे थे. बादलों से झांकता सूरज बारबार आंखमिचौली कर रहा था.

तभी सामने से आती एक सुंदर सी लड़की जिस ने पीले सलवारकमीज पर चांदी की चूड़ियां डाल रखी थीं, उस पर नजरें टिक गईं. हाथ की कलाई में बंधी घड़ी को उस ने बेचैनी से देखा. शायद उसे क्लास के लिए आज देर हो गई थी. उस के चेहरे पर बिखरी हुई लटें किसी का भी मन मोह लेने में सक्षम थी, हर पल उस के कदम अमन की ओर बढ़ते जा रहे थे और उस के हर बढ़ते हुए कदम के साथ अमन का दिल जोरजोर से धङकने लगा था. सांसें थम सी गई थीं, चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. शायद यह उम्र का असर था या फिर कुछ और, उस की निगाहों की कशिश उसे अपनी ओर खींचने को मजबूर करती थीं. उसे रोज देखने की आदत न जाने कब मुहब्बत में बदल गई.

वे घंटों एकदूसरे के साथ सीढ़ियों पर बैठे रहते थे, उन के मौन के बीच भी कोई था जो बोलता था. एकदूसरे का साथ उन्हें अच्छा लगता था. आज भी उस रास्ते से जब वह गुजरता तो लगता वह उन सीढ़ियों पर बैठा उस का इंतजार कर रहा है और वह अपनी सहेलियों के बीच घिरी कनखियों से उस के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही है.

यहीं…हां, यहीं तो उस ने अपनी शादी का कार्ड पकड़ाया था. न जाने क्यों उस की बोलती और चमकती आंखों में लाल डोरे उभर आए थे. कुछ खोईखोई सी लग रही थी वह… उस दिन भी तो उस ने उस का पसंदीदा रंग पहन रखा था. यह इत्तिफाक था या फिर कुछ और वह आज तक समझ नहीं पाया…

हाथों में वही चांदी की चूड़ियां… लाल सुर्ख कार्ड को उस ने अपनी झुकी पलकों और कंपकंपाते हाथों के साथ अमन को पकड़ाया. पता नहीं वह भ्रम था या फिर कुछ और… उस के गुलाबी होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाए थे पर…हिरनी सी चंचल आंखों से में एक अजीब सा सूनापन था. खालीपन तो उस की आंखों में भी था…

“आओगे न…” इन 2 शब्दों ने उस के कानों तक आतेआते न जाने कितने मीलों का सफर तय किया था. सच ही तो है, हम सब एक सफर में ही तो हैं. “तुम…तुम सचमुच चाहती हो मैं आऊं?”

आंसू की 2 बूंदें उस कार्ड पर टप से टपक पङे और वह मेरे बिना कोई जवाब दिए दूर बहुत दूर चली गई. कितना गुस्सा आया था उस दिन… एक बार… हां, एक बार भी नहीं सोचा उस ने मेरे बारे में…क्या वह मेरा इंतजार नहीं कर सकती थीं? कितनी शामें मैं ने उस की उस पसंदीदा जगह पर इंतजार किया था पर वह नहीं आई. शायद उसे आना भी नहीं था. खिड़की से झांकता पेड़ मुझ से बारबार पूछता कि क्या वह आएगी? पर नहीं, पार्क में पड़ी लकड़ी की वह बैंच…

आज भी उस बैंच पर गुलमोहर के फूल गिरते हैं, जिन्हें वह अपने नाजुक हाथों में घुमाघुमा अठखेलियां करती थी. बारिश की बूंदें जब उस के चेहरे को छू कर मिट्टी में लोट जाती तब वह उस की सोंधी खुशबू से पागल सी हो जाती. बरगद का वह विशाल पेङ जहां वह अमन के साथ घंटों बैठ कर भविष्य के सपने बुनती, आज भी उस का इंतजार कर रहा था. अपनी नाजुक कलाइयों से वह उस विशाल पेङ को बांधने का निर्रथक प्रयास करती, उस का वह बचपना आज भी अमन को गुदगुदा देता.

अमन सोच रहा था कि शब्द और सोच इंसान की दूरियां बढ़ा देते हैं और कभी हम समझ नहीं पाते और कभी समझा नहीं पाते. कल वह खुशी को समझ नहीं पाया था और आज वह श्रेया को नहीं समझ पा रहा. उस ने तो सिर्फ उतना ही देखा और समझा जितना वह देखना और समझना चाहता था. जिंदगीभर उसे खुशी से शिकायतें रहीं पर एक बार भी उस ने यह सोचा कि खुशी को भी तो उस से शिकायतें हो सकती हैं? वह भी तो उस के पिता से मिल कर उन्हें समझा सकता था? खुशी का दिया जख्म उसे आज तक टीस देता था पर आज श्रेया के प्यार के बारे में जान कर भी वह कुछ नहीं करेगा?

क्या उस नए जख्म को बरदाश्त कर पाएगा? खुशी और श्रेया न जाने क्यों उसे आज एक ही नाव पर सवार लग रहे थे, जो दूसरों का दिल रखने के चक्कर में अपना दिल रखना कब का भूल चुके थे.

सच कहा था उस दिन खुशी ने कि एक दिन मुझे उस की बातें समझ में आएंगी. अमन की आंखें बोझिल हो रही थीं, वह थक गया था अपने विचारों से लड़तेलड़ते…उस की पत्नी नींद के आगोश में थी. अमन खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. बाहर तेज बारिश हो रही थी. हवा के झोंके ने अमन के तन को भिगो दिया. पानी की तेज धार में पत्ते धूल गए थे और कहीं न कहीं अमन की गलतफहमियां भी… वह निश्चय कर चुका था कि बेशक उस की जिंदगी में खुशी नहीं आ पाई थी मगर मेरी श्रेया किसी की नफरत का शिकार नहीं बनेगी…वह कल ही उस से बात करेगा. Hindi Romantic Story

Story in Hindi : फैसला- कैसे थे इंद्रजीत और सुरेखा के संबंध

Story in Hindi . ‘‘अरे, तुम्हारी तबीयत अचानक कैसे खराब हो गई?’’ इंद्रजीत जैसे सुरेखा की हालत देख कर एकदम से घबरा गया, ‘‘बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर हम यहां बुद्ध पार्क में आए थे और तुम्हें एकदम से क्या हो गया? रुको, मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूं.’’

‘‘पता नहीं, बहुत दर्द कर रहा है…’’ सुरेखा बेचैन होते हुए बोली, ‘‘नहीं, मैं आटोरिकशा से चली जाऊंगी. वहां तुम्हें मेरे साथ देख कर मेरे घर वाले पता नहीं क्या सोचें. मैं तुम्हारी बेइज्जती नहीं करा सकती.’’

‘‘समय हमेशा एक सा नहीं रहता. समाज की सोच एक दिन में नहीं बदल सकती. तुम्हारे घर वाले भी कैसे इस बात को मान लें कि एक दलित लड़के के साथ कोई ऊंची जाति की लड़की प्यार करे. बेइज्जती सहने की तो मुझे आदत सी है. तुम्हारे लिए तो मैं कुछ भी सहन कर लूंगा. मगर मुझे लगता है कि तुम्हारी जो हालत है, ऐसे में हमें सीधे डाक्टर के पास जाना चाहिए.’’

इंद्रजीत अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर सुरेखा को शहर की भीड़भाड़ से बचतेबचाते एक प्राइवेट क्लिनिक में ले आया.

डाक्टर ने सुरेखा को देखा और कुछ दर्दनिवारक दवा दे दीं, तो वह कुछ ठीक हुई. आधा घंटे बाद इंद्रजीत उसे घर छोड़ आया.

अगले दिन सुरेखा की तकलीफ और ज्यादा बढ़ गई. घर वाले तत्काल उसे अस्पताल ले गए. वहां उसे दाखिल कराना पड़ गया.

इंद्रजीत को जब पता चला, तो वह भी उसे देखने चला आया. सुरेखा के भाई ने उसे देखा, तो बुरा सा मुंह बना लिया.

‘‘सुरेखाजी को क्या हुआ है?’’ अपनी अनदेखी की परवाह न करते हुए इंद्रजीत ने भाई से पूछा, ‘‘कल तक तो तो वह ठीक ही थी.’’

‘‘अब मुझे क्या पता कि उसे क्या हुआ है. मैं कोई डाक्टर थोड़े ही हूं कि मुझे पता चले,’’ भाई अकड़ कर बोला, ‘‘मगर, तुम उस के पीछे क्यों पड़े हो? जानते नहीं हो कि सुरेखा की शादी तय होने वाली है?’’

‘‘यह तो खुशी की बात है. मगर, एक दोस्त होने के नाते हमें एकदूसरे की मदद करनी ही चाहिए,’’ इंद्रजीत बोला.

‘‘बड़ा आया मदद करने वाला. अरे, वह मेरी बहन है. हमारे रहते किसी की मदद की उसे क्या जरूरत है…’’

‘‘आप कहते तो ठीक हैं, फिर भी जब कभी जरूरत हो, तो आप फोन कर लेना,’’ कह कर इंद्रजीत वापस अपने घर लौट गया. वह अस्पताल में कोई तनाव नहीं पैदा करना चाहता था.

कितनी खुशीखुशी इंद्रजीत गुवाहाटी से घर छुट्टी पर लौटा था. कितनी मुश्किल से वह छुट्टी ले कर आया था. मन में एक आस थी कि उस की अच्छी नौकरी देख कर अब सुरेखा के घर वाले बदल जाएंगे, मगर ये तो उसी पुरानी सोच वाले लोग निकले. पर कोई बात नहीं, उसे भी तो अपना फर्ज पूरा करना चाहिए. इस में सुरेखा का क्या कुसूर है, जो वह उसे अकेला छोड़ दे.

सुरेखा ने कई बार आड़े वक्त में इंद्रजीत की मदद की थी. वह उसे पसंद करती है, यही उस के लिए बहुत है.

सुरेखा को अपने भाई के घटिया बरताव पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. मगर, जब वह खुद लाचार हो और बिस्तर पर पड़ी हो, तो क्या कर सकती है.

अगले 3 दिन तक सुरेखा का डायग्नोस्टिक होता रहा और तमाम डायग्नोस्टिक के बाद जब उसे पता चला कि उस की दोनों किडनी खराब हैं, तो घर वाले हैरान रह गए.

कहां तो सुरेखा की शादी की तैयारी करनी थी, जिस में भारी खर्च होना था और अब यह बड़ी बीमारी लग गई है. कहां से आएगा लाखों का इतना भारी खर्च? एक तो किडनी मिलती नहीं और मिल भी गई, तो उस के लिए ही बहुत सारे पैसे लगेंगे. इस के बाद आगे क्या होगा, कौन जाने.

‘‘ऐसा है मिश्राजी कि अब तो आप कहीं से किडनी का इंतजाम कीजिए, तो ही बेटी की जान बच सकती है…’’ डाक्टर सुरेखा के पापा से कह रहे थे, ‘‘और इस में हम कुछ कर भी नहीं सकते.’’

‘‘बाप रे, कौन देगा हमें अपनी किडनी…’’ सुरेखा के पापा आंखें फाड़ कर बोले, ‘‘यह बाजार में तो मिलती नहीं कि हम किसी तरह पैसे का जुगाड़ कर के खरीद लाएं और आप को उसे लगाने को दे दें.’’

‘‘ढूंढ़ने से ऐसे किडनी देने वाले मिल भी जाते हैं. आप के परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार भी किडनी डोनेट कर सकता है. बाहर से भी इंतजाम हो सकता है.

‘‘बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अपनी गरीबी की वजह से पैसों की खातिर अपनी किडनी डोनेट करते हैं. मैं प्रैक्टिकल बात कह रहा हूं. हालांकि, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मैं एक डाक्टर हूं.’’

‘‘अब आप ही कुछ देख लीजिए,’’ सुरेखा की मां अपने पति से यह कहते हुए फफक पड़ी थीं. उन की बेटी की जान जा रही थी और वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थीं.

मिश्राजी ने अपनी पत्नी को झिड़क दिया और फुसफुसा कर बोले, ‘‘न जाने कहां से यह बीमारी ले कर आ गई है. अब मरती है तो मरने दो. इस के लिए लाखों रुपए खर्च कर के किडनी का इंतजाम हो भी जाए, तो हम कंगाल नहीं हो जाएंगे? फिर इस की शादी के सौ झंझट और हजार खर्चे. इस से अच्छा है कि…’’

‘‘शुभशुभ बोलो…’’ मां बिलखते हुए बोलीं, ‘‘कैसे बाप हो, जो अपनी बेटी के बारे में ऐसा सोचते हो. कोई न कोई तो उसे अपनी किडनी दे ही देगा. अगर न हो, तो मेरी ही किडनी उसे लगा दो.’’

‘‘पागल हो गई हो क्या?’’ मिश्राजी ने उन्हें फिर झिड़क दिया, ‘‘किडनी लगाने के बाद क्या गारंटी है कि सुरेखा बच ही जाएगी? अब जो होना है, वह हो जाए. हम क्या कर सकते हैं.’’

‘‘ऐसा है मैडम कि आप की ज्यादा उम्र हो गई है, इसलिए आप की किडनी उस के लिए ठीक नहीं होगी. आप किसी नई उम्र के डोनेटर से बात कीजिए,’’ डाक्टर सुरेखा की मां को समझ रहे थे.

सुलेखा का भाई अलग सन्न था कि यह अचानक क्या हो गया कि एक अलग भारी खर्च की बात हो रही है.

कुछ महीने पहले ही सुरेखा ने सुना था कि एक बड़े नेता की दोनों किडनी खराब हो गई थीं और उन की बेटी ने अपनी किडनी दे कर उन की जान बचाई थी. मगर एक लड़की को कौन अपनी किडनी दे कर जान जोखिम में डालेगा. रुपयों के लालच में कोई किडनी दे भी दे, तो लाखों रुपए खर्च कौन करेगा. एक लड़की की जान की कीमत ही क्या है.

इंद्रजीत ने सुरेखा के साथ ही पढ़ाई की थी. दोनों ने साथ ही ग्रेजुएशन किया था. फिर इंद्रजीत इलैक्ट्रिकल डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक सरकारी नौकरी में आ गया था और अब गुवाहाटी में पोस्टेड था.

सभी को इंद्रजीत और सुरेखा के संबंध के बारे में पता था, मगर उन्हें इस रिश्ते पर एतराज था. इस छोटे से शहर में जहां जातीय बंधन इतने मुश्किल हों, ऐसा सोचना भी गुनाह ही था. औनर किलिंग तक की वारदात यहां आएदिन हो जाती हैं और इंद्रजीत इस मामले में कोई खतरा उठाना नहीं चाहता था.

3 दिन के इंतजार के बाद इंद्रजीत का मन नहीं माना, तो वह अस्पताल चला आया. वहां वह सुरेखा के परिवार वालों से मिला, मगर किसी ने उसे सही जानकारी नहीं दी. वह सुरेखा से भी कुछ पूछने में झिझक गया, इसलिए सीधा डाक्टर के चैंबर में चला गया.

‘‘पेशेंट की दोनों किडनी खराब हैं…’’ डाक्टर ने रुखाई से कहा, ‘‘पहले इस की किडनी का इंतजाम करो, उस के बाद ही आपरेशन का कोई चक्कर चलेगा न…’’

‘‘अरे, इतनी सी बात है…’’ इंद्रजीत बोला, ‘‘आप मेरी एक किडनी तो उसे लगा ही सकते हैं न. मुझे उस की जिंदगी ज्यादा प्यारी है.’’

‘‘तब ठीक है. मगर, इस के लिए आप को ब्लड प्रैशर, एचआईवी, ब्लड शुगर जैसे कुछ चैकअप कराने होंगे. अगर सबकुछ सही रहा, तभी किडनी के ट्रांसप्लांट का इंतजाम होगा.’’

‘‘मैं इस के लिए तैयार हूं. आप मेरा चैकअप कराएं,’’ इंद्रजीत ने कहा.

सुरेखा के घर वाले इंद्रजीत के इस फैसले पर हैरान थे कि कोई किसी को यों ही अपने शरीर का एक अंग दान में कैसे दे सकता है?

सुरेखा की मां खुशी के मारे रोने लगीं. उन के लिए इंद्रजीत जैसे कोई फरिश्ता बन कर आया था. अब उन की बेटी की जान बच सकती है.

‘‘मैं सुरेखा से जीजान से प्यार करता हूं आंटीजी…’’ इंद्रजीत हंस कर बोला, ‘‘मैं उसे हमेशा खुश देखना चाहता था और आगे भी देखना चाहूंगा.’’

‘‘फिर तुम यह कहोगे कि उस की शादी तुम्हारे साथ कर दी जाए,’’ सुरेखा के पापा अब भी अपनी आन पर अड़े थे, ‘‘मगर, मेरे जीतेजी तो यह मुमकिन नहीं होगा.’’

‘‘तो आप क्या समजाते हैं कि मैं किसी लालच में उसे कुछ दान कर रहा हूं अंकलजी. मैं ने कहा न कि मुझे बस उस की खुशी देखनी है. चाहे आप उस की शादी कहीं दूसरी जगह करा दें, मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. हां, बस वह खुश रहे.’’

और इस प्रकार सारी औपचारिकताएं पूरी हो गई थीं. इंद्रजीत का भी चैकअप हो गया था और डाक्टर ने उसे सेहतमंद होने का सर्टिफिकेट सा देते हुए उस के किडनी ट्रांसप्लांट की रजामंदी दे दी.

मगर, ऐन वक्त पर एक सीनियर डाक्टर ने सुरेखा का एक बार फिर से डायग्नोस्टिक कराया, तो वे दंग रह गए. सुरेखा की दोनों किडनी ठीक थीं. उसे जो तकलीफ थी, वह एपैंडिसाइटिस के शुरुआती लक्षणों के चलते उभरी थी. उन्होंने तुरंत एक छोटा सा आपरेशन किया और अब सुरेखा खतरे से बाहर थी. इंद्रजीत को किडनी डोनेट करने की नौबत ही नहीं आई.

‘‘मैं कहता था न कि सुरेखा ठीक हो जाएगी. यह मेरे पूजापाठ का असर है…’’ सुरेखा के पापा गर्व से बोले, ‘‘मैं ने इस के लिए महामृत्युंजय पाठ जो किया था, उस से यह अच्छी हो गई है.’’

‘‘इस जमाने में आप ऐसी फुजूल की बात क्यों करते हैं. पहले वाले डायग्नोस्टिक में गलत जानकारी मिली थी. मैडिकल चैकअप में ऐसी गलतियां हो जाती हैं…’’ डाक्टर हंस कर बोले, ‘‘मगर, फिर भी आप को इंद्रजीत का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो अपनी

जान की परवाह न करते हुए वह आप की बेटी को किडनी देने के लिए तैयार हो गया. वाकई वह आप की बेटी सुरेखा को अपनी जान से ज्यादा चाहता है.’’

‘‘वह तो ठीक है डाक्टर साहब. हम वाकई उस के शुक्रगुजार हैं. दुनिया में अच्छाई और इनसानियत अभी भी बाकी है, मगर हमारी सामाजिक हैसियत इस की इजाजत नहीं देती कि उसे अपना लें. फिर भी हम उस की इस भलमनसाहत को जिंदगीभर याद रखेंगे. पर अब हमें अपनी बेटी की शादी की तैयारी करनी है,’’ सुरेखा के पापा ने कहा.

सुरेखा अस्पताल से घर आ गई. इंद्रजीत उस से मिलने आया, क्योंकि उस की छुट्टियां खत्म हो रही थीं. अब इस घर में उस के आनेजाने पर पहले जैसी रोकटोक नहीं थी, फिर भी अहं का एक परदा तो था ही.

सुरेखा ने इंद्रजीत को देखा. वह भी उसे ही देख रहा था. तभी सुरेखा की मां एक तसवीर ले कर कमरे के अंदर आईं और इंद्रजीत को दिखा कर बोलीं, ‘‘सुरेखा के लिए यह रिश्ता आया है बेटा. देखो तो इस तसवीर को.’’

सुरेखा उस तसवीर को अपनी मां से झपट कर उस के टुकड़ेटुकड़े करते हुए बोली, ‘‘जब सामने जीताजागता इनसान हो, तो किसी की तसवीर की क्या जरूरत है. मैं जब अस्पताल में जिंदगी और मौत से खेल रही थी, उस समय यह तसवीर वाला लड़का वहां था क्या?

‘‘इंद्रजीत अपनी जान की परवाह न करते हुए मुझे अपनी किडनी डोनेट करने को तैयार हो गया था. भला ऐसे इनसान को छोड़ कर मैं किसी दूसरे के साथ सुखी कैसे रह सकती हूं? अब तो यह जिंदगी इंद्रजीत की अमानत है.

‘‘आप लोगों को अपने सामाजिक रुतबे की चिंता है न, तो कोई बात नहीं. हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे. हमें आज की खर्चीली शादियां पसंद भी नहीं हैं. यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

बाहर सुरेखा के पापा और भाई खड़े थे. उन में हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़ कर वह सुरेखा के इस फैसले की खिलाफत करें. उन के मन में भी इंद्रजीत के लिए इज्जत का भाव तो आया ही था. ठीक है कि ऐनवक्त पर किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ी, फिर भी इंद्रजीत किडनी डोनेट के लिए तैयार तो था ही न.

जब जिद की एक गांठ खुल जाती है, तो उलझे हुए सभी रिश्ते सुलझ जाते हैं. उधर इंद्रजीत के चेहरे पर सुरेखा के इस हिम्मत भरे फैसले से खुशी का भाव था.

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