⚲

Story In Hindi: खुशामद का कलाकंद – क्या आप में है ये हुनर

Story In Hindi: जीवन जीना अपनेआप में एक कला है. जिसे यह कलाकारी नहीं आती वह बेचारा कुछ इस तरह से जीता है कि उसे देख कर कोई भी कह सकता है, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू.’ सफलतापूर्वक जीवन जीने वाले नंबर एक के कलाकार होते हैं. उन के सामने हर बड़े से बड़ा कलाकार पानी भरता नजर आता है. चमचागीरी या खुशामद करना शाश्वत कला है और जिस ने इस कला में स्वर्ण पदक प्राप्त कर लिया या फिर जिसे ‘पासिंग मार्क’ भी मिल गया, तो उस की जिंदगी आराम से गुजर जाती है.

खुशामद इस वक्त राष्ट्र की मुख्य धारा में है. इस धारा में बहने वाले के हिस्से की सुखसुविधाएं खुदबखुद दौड़ी चली आती हैं. हमारे मित्र छदामीजी कहां से कहां पहुंच गए. साइकिल पर चलते थे, आज कार में चलते हैं. यह खुशामद का ही चमत्कार है. खुशामद की कला के विशेषज्ञ हर कहीं पाए जाते हैं. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक खुशामद करने वालों की भरमार है.

दरअसल, जीवन की हर सांस खुशामद की कर्जदार है. खुशामद और चमचागीरी में बड़ा बारीक सा अंतर है. चमचागीरी बदनामशुदा शब्द है, खुशामद अभी उतना बदनाम नहीं हुआ है, इसलिए लोग चमचागीरी तो करते हैं, लेकिन सफाई देते हैं कि भई थोड़ी सी खुशामद कर दी तो क्या बिगड़ गया. खुशामद कामधेनु गाय है, जिस की पूंछ पकड़ क र जाने कितने गधे घोड़े बन कर दौड़ रहे हैं. पद, पैसा या सुख आदि पाने की ललक में लोग खुशामद जैसे सात्विक हथियार का सहारा लेते हैं.

खुशामद एक तरह का अहिंसक हथियार है. सोचता हूं कि खुशामद की कला का इस्तेमाल कर के अगर कोई कुछ प्राप्त कर ले तो क्या बुराई है? यह तो जीवन जीने की कला है. इस के बिना आप जहां हैं, वहीं पड़े रह जाएंगे. जो लोग सड़ना नहीं चाहते हैं, वे कुछ करने के लिए खुशामद का सहारा ले कर आगे बढ़ते हैं.

इस के लिए पावरफुल लोगों का सम्मान करो, अकारण दाएंबाएं होते रहो, अभिनंदन करो और ऐश करो.  पिछले दिनों ऐसे ही एक सज्जन के बारे में पता चला. जब देखो वह आयोजनों में भिड़े रहते थे. मुझे लगा, बड़े महान प्राणी हैं. बड़े बिजी रहते हैं. देश और समाज की चिंता में निरंतर मोटे भी होते जा रहे हैं. यह देख कर मैं उन के नागरिक अभिनंदन के ‘मूड’ में आ गया. मैं उन से टाइम लेने जा रहा था कि रास्ते में एक महोदय मिल गए. पूछा, ‘‘कहां चल दिए?’’

मैं ने कहा, ‘‘फलानेजी का सम्मान करना चाहता हूं.’’ मेरी बात को सुन कर महोदय हंस पड़े तो मैं चौंका. मैं ने कहा, ‘‘हंसने की क्या बात है? फलानेजी समाजसेवी हैं. चौबीसों घंटे कुछ न कुछ करते रहते हैं. ऐसे लोगों का अभिनंदन तो होना ही चाहिए.’’ महोदय बोले, ‘‘चलिए, मैं सज्जन की पोल खोलता हूं, तब भी आप को लगे कि उन का अभिनंदन होना चाहिए तो ठीक है.’’ मेरे कान खड़े हो गए. महोदय बताने लगे कि इन्होंने पिछले साल मजदूरों का एक सम्मेलन करवाया था.

खूब चंदा एकत्र किया. एक मंत्री को बुलवा कर भाषण भी करवा दिया. सम्मेलन के बाद उन्हें 2 फायदे हुए, मंत्रीजी ने उन्हें एक समिति का सदस्य बनवा दिया और उन के घर पर दूसरी मंजिल भी तन गई. यह सज्जन हर दूसरे दिन किसी मंत्री का, किसी विधायक का या किसी अफसर का अभिनंदन करते रहते हैं. ऐसा करने से लोगों में धाक जमती चली जाती है.

पावरफुल आत्माओं से निकटता बढ़ती है तो सुविधाओं की गंगा अपनेआप बहने लगती है. देखते ही देखते कंगाल भी मालामाल हो जाता है. महोदय की बातें सुन कर मेरा माथा घूम गया और मैं ने अभिनंदन वाला आइडिया ड्राप कर दिया. अब यह और बात है कि सज्जन अपना अभिनंदन कराने के लिए मेरी खुशामद पर आमादा हैं तो भाई साहब, खुशामद के एक से एक रूप हैं, जुआ की तरह.

हम और आप कर रहे होते हैं और हमें पता नहीं चलता कि खुशामद कर रहे हैं, इसलिए कदम फूंकफूंक कर रखिए, वरना कब खुशामद की कीचड़ आप के मुंह पर लग जाए, कहना कठिन है. खुशामद की कला को अब तो सामाजिक स्वीकृति भी मिल गई है. इसे क्या कहें जो खुशामद के जरिए घरपरिवार को खुश रखता है.

उस की आमद भी सब को खुश कर देती है, लेकिन जो खुशामद से दूर रहता है, उस की आमद घर वालों को नागवार गुजरने लगती है. हर कोई मुंह बनाते हुए बड़बड़ाता है, ‘आ गया आदर्शवादी, हुंह.’ तो साहबान, खुशामद ही जीवन का सार है. घरबाहर अगर इज्जत चाहिए तो खुशामदखोरों की बिरादारी में शामिल हो जाइए. खुशामद की कला में माहिर आदमी का बी.ए. पास होना भी जरूरी नहीं. आप खुशामद पास हैं तो कहीं भी टिक सकते हैं.

समाजवाद, पूंजीवाद, अध्यात्मवाद और बाजारवाद, न जाने कितने तो वाद हैं. सब का अपनाअपना महत्त्व है, लेकिन आजकल के जमाने में ‘खुशामदवाद’ तो वादों का वाद है. सारे वाद बारबार खुशामदवाद एक बार. एक बार जो खुशामद की सुरंग में घुसा, वह मालामाल हो कर ही लौटा. यह और बात है कि आत्मा पर थोड़ी कालिख पुत जाती है, लेकिन उस को क्या देखना? जिस ने की शरम, उस के फूटे करम. आत्मा के चक्कर में न जाने कितने महात्माओं ने आत्महत्याएं कर लीं, इसलिए आत्मा को घर के पिछवाड़े में कहीं दफन कर के खुशामदवाद का सहारा लो.

इस दिशा में जिस ने भी कदम बढ़ाए हैं, वह जीवन भर सुखी रहा है, इसीलिए तो धीरेधीरे खुशामद लोकप्रिय कला बनती जा रही है और जब कला बन रही है या बन चुकी है तो इस का पाठ्यक्रम भी तैयार कर दिया जाना चाहिए. किसी की प्रशस्ति में गीत, कविता लिखना, चालीसा लिखना, क्या है? मतलब यह कि साहित्य में खुशामद कला ने घुसपैठ कर ली है. आजकल विश्वविद्यालयों में नएनए पाठ्यक्रमों की पढ़ाई शुरू हो रही है.

फलाना मैनेजमेंट, ढिकाना मैनेजमेंट तो खुशामद मैनेजमेंट का नया कोर्स भी शुरू हो जाए. इस का बाकायदा ‘पाठ्यक्रम’ तैयार हो. सुव्यवस्थित तरीके से यह कोर्स लांच हो. इस के पढ़ाने वाले सैकड़ों इस शहर में मिल जाएंगे. ऐसे लोगों की तलाश की जाए जो ‘खुशामद वाचस्पति’ हों, ‘खुशामदश्री’ खुशामद कला में पीएच.डी. की उपाधि भी दी जा सकती है और यह मानद भी हो सकती है.

आप के शहर में ऐसी प्रतिभाओं की कमी नहीं होगी. इधर तो खुशामद की प्रतिभा से लबालब लोगों की ऐसी नस्लें लहलहा रही हैं कि मत पूछिए. इसलिए समय के साथ दौड़ने वालों को इस सुझाव पर विचार करना चाहिए, क्योंकि यह सदी खुशामद को कला बनाने पर उतारू होने की सदी है, जो कोई खुशामद के विरोध में खड़ा हो, वह धकिया दिया जाएगा. वक्त के साथ चलो, खुशामद के साथ चलो.

छदामीजी हर दूसरे दिन अभिनंदन करते हैं. अभिनंदन प्रतिभाशाली लोगों का हो तो कोई बात नहीं, लेकिन अब ऐसे लोगों का अभिनंदन करता ही कौन है? अभिनंदन होता है मंत्री, नेता या अफसरों का या फिर ऐसे व्यक्ति का जिस के सहारे सुविधाओं के टुकड़े प्राप्त हो जाएं.

अभिनंदन करना भी खुशामद का ही एक तरीका है. कुछ लोग जीवन भर इसी को पवित्र काम मान कर दिनरात भिड़े रहते हैं. अभिनंदन करना और अभिनंदन कराना ऐसा शौक है कि मत पूछिए. जिसे इस का चस्का लगा, वह गया काम से. अभिनंदन के बगैर वह ठीक उसी तरह तड़पता है, जिस तरह मछली पानी के बगैर. खुशामद करना और खुशामदपसंद होना सब के बस की बात भी तो नहीं है.

खुशामदपसंद आदमी की चमड़ी मोटी होनी चाहिए और जेब भी हर वक्त ‘भरी’ रहे. जब तक जेब भरी रहेगी, अभिनंदन या सम्मान की झड़ी रहेगी. खुशामद करने वाला कंगाल हो तो चलेगा, लेकिन खुशामदपसंद का मालामाल होना जरूरी है. ऐसी जब 2 आत्माएं मिलती हैं, तब यही गीत बजना चाहिए, ‘दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात.’ सोचिए, खुशामद कितनी बड़ी चीज है कि इस नाचीज को इस पर कागज काले करने पड़ रहे हैं, लेकिन हालत यह है कि मर्ज बढ़ता गया ज्योंज्यों दवा की. खुशामद को ले कर आप लाख नाराजगी जाहिर करें, यह खत्म होने से रही.

यह तो द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती जा रही है, और क्यों न बढ़े साहब? जब हर दूसरातीसरा शख्स इस कला में हाथ आजमा रहा है, तब आप क्या कर लेंगे? आप को इस कला से प्रेम नहीं है तो न सही, और दूसरे लोग तो हैं, जिन की गाड़ी खुशामद के भरोसे ही चलती है. सत्ता के गलियारों में जा कर देखिए, खुशामद करने वाले कीड़ेमकोड़े की तरह बिलबिलाते हुए मिल जाएंगे.

वक्त की मार केवल मूर्तियों या स्मारकों पर ही नहीं पड़ती, शब्दों पर भी पड़ती है. ‘खुशआमद’ ऐसा बदनाम हो गया है कि शब्द का प्रयोग करते हुए डर लगता है. किसी को ‘नेताजी’ कह दो, ‘गुरु’ कह दो तो लगता है, व्यंग्य किया जा रहा है. खुशामद शब्द का यही हाल है लेकिन हाल है तो है. अब तो इसे लोग कला बनाने पर तुले हुए हैं.

वक्तवक्त की बात है, इसलिए साहेबान, मेहरबान, कद्रदान, वक्त की धड़कन को सुनो और इस नई कला को गुनो. सफल होना है तो खुशामद ही अंतिम चारा है. बिना खुशामद के हर कोई बेचारा है. यह और बात है कि जो इस जीवन को संघर्षों के बीच ही जीने के आदी हैं, जिन को मुसीबत झेलने में ही मजा आता है, जो सूखी रोटी खा कर, ठंडा पानी पी कर भी खुश रहते हैं, उन के लिए खुशामद कला विषकन्या के समान त्याज्य है, लेकिन जिन को ऐसेवैसे कैसे भी चाहिए सुविधा सम्मान और पैसे, वे खुशामद के बिना एक कदम नहीं चल सकते.

ऐसे लोग ही प्रचारित कर रहे हैं कि खुशामद एक कला है. इस की मार्केटिंग कर रहे हैं, नएनए आकर्षक रैपरों में. हर सीधासादा आदमी खुशामद के चक्कर में फंस जाता है, लेकिन खुशामद एक ऐसा भंवर है, जिस में कोई एक बार फंसा तो निकलना मुश्किल हो जाता है.  इस कला में बला का स्वाद है. जिस ने एक बार भी इस का स्वाद चख लिया, वह दीवाना हो गया.

नैतिकता से बेगाना हो गया. पता नहीं, आप ने खुशामद की कला का आनंद लिया है या नहीं, न लिया हो तो कोई बात नहीं, अगर इच्छा हो तो अपने ही शहर के किसी नेतानुमा प्राणी से मिल लीजिएगा या फिर ऐसे शख्स से, जिसे लोग ‘मिठलबरा’ (ऐसा व्यक्ति जो बड़ी ही मधुरता के साथ झूठा व्यवहार करता है) के नाम से जानते हों. ये लोग आप को बताएंगे कि खुशामद रूपी कलाकंद खाने का आनंद कैसे मनाएं?

बहरहाल, खुशामद को अगर कला का दर्जा मिल जाए तो कोई बुराई नहीं. कुछ लोग तो जेब काटने तक को कला मानते हैं. कला हमेशा भला काम ही कराए जरूरी नहीं. क्या कहा, आप खुशामद को कला नहीं, बला मानते हैं? तो भई, आप जैसे लोगों के कारण ही गलतसलत परंपराएं अपना स्थान नहीं बना पातीं.

आज कदमकदम पर खुशामदखोर मिल जाएंगे, चलतेपुर्जे, अपना काम निकालने में माहिर. आप अगर अब तक हम लोगों से कुछ नहीं सीख पाए हैं तो ठीक है, पड़े रहिए अपनी जगह. सारे लोग आप से आगे निकल जाएंगे तो फिर मत कहिएगा कि हम पीछे रह गए. आगे बढ़ना है तो शर्म छोडि़ए और खुशामदखोरी में भिड़ जाइए. शरमाइए मत, उलटे कहिए, ‘खुश-आमद-दीन’. Story In Hindi

Hindi Story: झूठी शान – शौर्टकट काम की वारंटी वाकई काफी शौर्ट होती है!

Hindi Story: सवेरेसवेरे किचन में नाश्ता बना रही निर्मला के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘भई, आजकल तो लड़कियां क्या लड़के भी महफूज नहीं हैं. एक महीने में अपने शहर से 350 बच्चे गायब…’’ आवाज हाल में बैठ कर समाचार देख रहे निर्मला के पति परेश की थी.

निर्मला परेश को नाश्ता दे कर बाहर की ओर बढ़ गई. परेश को मालूम था कि उसे बच्चों की स्कूल की फीस जमा करवाने के लिए जाना है, फिर भी एक बार फर्ज के तौर पर ध्यान से जाने की हिदायत देते हुए नाश्ता करने में जुट गए.

इस पर निर्मला ने भी आमतौर पर दिए जाने वाला ही जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी हां…’’ और बाहर का गरम मौसम देख कर बिना छाता लिए ही घर से निकल गई.

निर्मला आमतौर पर रिकशे से ही सफर किया करती, क्योंकि उस के पास और कोई साधन भी न था. स्कूल में सारे पेरेंट्स तहजीब से खुद ही सार्वजनिक दूरी बनाए अपनीअपनी कुरसियों पर बैठे अपना नंबर आने का इंतजार कर रहे थे.

निर्मला का नंबर सब से आखिर में था. उस के अकेलेपन की बोरियत को मिटाने के लिए न जाने कहां से उस की पुरानी सहेली मेनका भी उसी वक्त अपने बेटे की फीस जमा कराने वहां आ टपकी.

चेहरे पर मास्क की वजह से निर्मला ने उसे पहचाना नहीं, पर मेनका ने उस के पहनावे और शरीर की बनावट से उसे झट से पहचान लिया और दोनों में सामान्य हायहैलो के बाद लंबी बातचीत शुरू हो गई. दोनों सहेली एकदूसरे से दोबारा पूरे 5 महीने बाद मिल रही थीं.

यों तो दोनों का आपस में एकदूसरे से दूरदूर तक कोई संबंध नहीं था, पर दोनों के बच्चे एक ही जमात में पढ़ते थे. घर पास होने की वजह से निर्मला और मेनका की मुलाकात कई बार रास्ते में एकदूसरे से हो जाया करती.

धीरेधीरे बच्चों की दोस्ती निर्मला और मेनका तक आ गई. दोनों ही अकसर छुट्टी के समय अपने बच्चों को लेने आते, तब उन की भी मुलाकात हो जाया करती. दोनों एक ही रिकशा शेयरिंग पर लेते, जिस पर उन के बच्चे पीछे बैठ जाया करते.

निर्मला ने मेनका को देख कर खुशी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे, ये मास्क भी न, मैं तो बिलकुल ही पहचान ही नहीं पाई तुम्हें.’’

पर, असलियत तो यह थी कि वह उस के पहनावे से धोखा खा गई थी, क्योंकि जिस मेनका के लिबास पुराने से दिखने वाले और कई दिनों तक एक ही जैसे रहते. वह आज एक महंगी सी नई साड़ी और कई साजोसिंगार के सामान से लदी हुई थी. इस के चलते उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यह मेनका हो सकती?है.

निर्मला ने उस की महंगी साड़ी को हाथ से छूने की चाह से जैसे ही उस की तरफ हाथ बढ़ाया, मेनका ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘अरे भाभी, ये क्या कर रही हो? हाथ मत लगाओ.’’

भले ही मेनका ने सार्वजनिक दूरी को जेहन में रख कर यह बात कही हो, पर उस के शब्द थोड़े कठोर थे, जिस का निर्मला ने यह मतलब निकाला कि ‘तुम्हारी औकात नहीं इस साड़ी को छूने की, इसलिए दूर ही रहो’.

निर्मला ने उस से चिढ़ते हुए पूछा, ‘‘यह साड़ी कहां से…? मेरा मतलब, इतनी महंगी साड़ी पहन कर स्कूल में आने की कोई वजह…?’’

‘‘महंगी… यह तुम्हें महंगी दिखती है. अरे, ऐसी साडि़यां तो मैं ने रोज पहनने के लिए ले रखी हैं,’’ मेनका ने बड़े घमंड में कहा.

निर्मला अंदर ही अंदर कुढ़ने लगी. उसे विश्वास नहीं हुआ कि ये वही मेनका हैं, जो अकसर मेरे कपड़ों की तारीफ करती रहती थी और खुद के ऊपर दूसरे लोगों से हमदर्दी की भावना रखती थी. ये तो कुछ महीनों पहले उम्र से ज्यादा बूढ़ी और बेकार दिखती थी, पर आज अचानक ही इस के चेहरे पर इतनी चमक और रौनक के पीछे क्या वजह है?

पहले तो अपने पति के कुछ काम न करने की मुझ से शिकायत करती थी, पर आज यह अचानक से चमकधमक कैसे? हां, हो सकता है कि विजेंदर भाई को कोई नौकरी मिल गई हो. हो सकता?है कि उन्होंने कोई धंधा शुरू किया हो, जिस में उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ हो या कोई लौटरी लग गई हो तो क्या…?

मैं इतना क्यों सोचने लगी? अब हर किसी की किस्मत एक बार जरूर चमकती है, उस में मुझे इतनी जलन क्यों हो रही है?

जिन के पास पहले पैसा नहीं, जरूरी थोड़े ही न है कि उन के पास कभी पैसा आएगा भी नहीं. भूतकाल की अपनी ही उधेड़बुन में कोई निर्मला को मेनका उस के मुंह के सामने एक चुटकी बजा कर वर्तमान में ले कर आई और कहा, ‘‘अरे भई, कहां खो गईं तुम. लाइन तो आगे भी निकल गई.’’

निर्मला और मेनका दोनों एकएक कुरसी आगे बढ़ गए.

‘‘वैसे, एक बात पूछूं मेनका, तुम्हारी कोई लौटरी वगैरह लगी है क्या?’’ निर्मला ने बड़े ही सवालिया अंदाज में पूछा, जिस का मेनका ने बड़े ही उलटे किस्म का जवाब दिया, ‘‘क्यों, लौटरी वाले ही ज्यादा पैसा कमाते हैं क्या? अब उन्होंने मेहनत के साथसाथ दिमाग लगाया है, तो पैसा तो आएगा ही न?

‘‘अब परेश भाई को ही देख लो, दिनभर अपने साहब के कहने पर कलम घिसते हैं, ऊपर से उन की खरीखोटी सुनते हैं, पूरे दिन खच्चरों की तरह दफ्तर में खटते हैं, फिर भी रहेंगे तो हमेशा कर्मचारी ही.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मेहनत के नाम पर ये कौन सा पहाड़ तोड़ते हैं सिर्फ दिनभर पंखे के नीचे बैठ कर लिखापढ़ी का काम ही तो करना होता है. इस से ज्यादा आराम और इज्जत की नौकरी और किस की होगी.’’

निर्मला ने मेनका को और नीचा दिखाने की चाह में उस से कहा, ‘‘पढ़ेलिखे हैं. आराम की नौकरी करते हैं. यों धंधे में कितनी भी दौलत कमा लो, पर समाज में सिर्फ पढ़ेलिखे और नौकरी वाले इनसान की ही इज्जत होती?है, बाकियों को तो सब अनपढ़ और गंवार ही समझते हैं.’’

इस पर मेनका अकड़ गई और अपने पास अभीअभी आए चार पैसों की गरमी का ढिंढोरा निर्मला के आगे पीटने लगी.

काउंटर पर निर्मला का नंबर आया. काउंटर पर बैठी रिसैप्शनिस्ट ने फीस  की लंबीचौड़ी रसीद, जिस में दुनियाभर के चार्जेज जोड़ दिए गए थे, निर्मला  को पकड़ाई.

निर्मला ने घर पर पैसे जोड़ कर जो हिसाब लगाया था, उस से कहीं ज्यादा की रसीद देख कर उन की आंखों से धुआं निकल आया. इतने पैसे तो उस के पर्स में भी न थे, पर इस बात को वह सब के सामने जताना नहीं चाहती थी, खासकर उस मेनका के सामने तो बिलकुल नहीं.

मेनका ने कहा, ‘‘मैडम, आप सिर्फ 3 महीने की ही फीस जमा कीजिए, बाकी मैं बाद में दूंगी.’’

तभी निर्मला के हाथ से परची लेते हुए मेनका ने निर्मला पर एहसान करने की चाह से अपने पर्स से एक चैकबुक निकाल अपने और उस के बच्चे की फीस खुद ही जमा कर दी.

निर्मला को यह बलताव ठीक न लगा, जिस के चलते उस ने उसे बहुत मना भी किया.

इस पर मेनका ने कहा, ‘‘अरे, भाईसाहब को जब पैसे मिल जाएं, तब आराम से दे देना. मैं पैनेल्टी नहीं लूंगी,’’ और वह हंसते हुए बाहर की ओर निकल गई.

स्कूल के बाहर निकल कर देखा, तो मालूम हुआ कि छाता न ले कर बहुत बड़ी गलती हुई. गरम मौसम की जगह तेज बारिश ने ले ली. इतनी तेज बारिश में कोई भी रिकशे वाला कहीं जाने को राजी न था.

निर्मला स्कूल के दरवाजे पर खड़ी बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी, पर मन में यह भी डर था कि आखिर अभी तुरंत मेरे आगे निकली मेनका कहां गायब हो गई? वह भी इतनी तेज बारिश में.

‘चलो, अच्छा है, चली गई, कौन सुनता उस की ये बातें? चार पैसे क्या आ गए, अपनेआप को कहीं की महारानी समझने लगी. सारे पैसे खर्च हो जाएंगे, तब फिर वही एक रिकशा भी मेरे साथ शेयरिंग पर ले कर चला करेगी.

मन ही मन खुद को झूठी तसल्ली देती निर्मला के आगे रास्ते पर जमा पानी को चीरते हुए एक शानदार काले रंग की कार आ कर रुकी.

गाड़ी का दरवाजा खुला. अंदर बैठी मेनका ने बाहर निर्मला को देखते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में बैठो निर्मला. इस बारिश में कोई रिकशे वाला नहीं मिलेगा.’’

निर्मला को न चाहते हुए भी गाड़ी में बैठना पड़ा, पर उस का मन अभी भी यकीन करने को तैयार नहीं था कि यह वही मेनका है, जो पैसे न होने के चलते एक रिकशा भी मुझ से शेयरिंग पर लिया करती थी?

‘‘सीट बैल्ट लगा लो निर्मला,’’ मेनका ने ऐक्सीलेटर पर पैर जमाते हुए कहा.

निर्मला ने सीट बैल्ट लगाते हुए पूछा, ‘‘कब ली? कैसे…? मेरा मतलब कितने की…?’’

‘‘कैसे ली का क्या मतलब? खरीदी है, वह भी पूरे 40 लाख रुपए की,’’ मेनका ने बड़े बनावटी लहजे में कहा.

निर्मला के अंदर ईष्या का भी अंकुर फूट पड़ा. आखिर कैसे इस ने इतनी जल्दी इतने पैसे कमाए, आखिर ऐसा कैसा दिमाग लगाया, विजेंदर भाई ने कि इतनी जल्दी इतने पैसे कमा लिए. और एक परेश हैं कि रोज 13-13 घंटे काम करने के बावजूद मुट्ठीभर पैसे ही ले कर आते हैं, वह भी जब घर के सारे खर्चे सिर पर सवार हों. एक इसी के साथ तो मेरी बनती थी, क्योंकि एक यही तो थी मुझ से नीचे. अब तो सिर्फ मैं ही रह गई, जो रिकशे से आयाजाया करूंगी. इस का भी तो कहना ठीक ही है कि किसी काम में दिमाग लगाए बिना सिर्फ मेहनत करने से जिस तरह गधे के हाथ कभी भी गाजर नहीं आती, उसी तरह हर क्षेत्र में मेहनत से ज्यादा दिमाग लगाना पड़ता है.

विजेंदर भाई ने दिमाग लगाया तो पैसा भी कमाया, वहीं परेश की जिंदगी तो सिर्फ खाने में ही निकल जाएगी, आज ये बना लेना कल वो बना लेना.

अपना घर नजदीक आता देख निर्मला ने सीट बैल्ट खोल दी और उतरने के लिए जैसे ही उस ने दरवाजा खोलना चाहा, उस से उस महंगी गाड़ी का दरवाजा न खुला. इस पर मेनका ने हंसते हुए अपने ही वहां से किसी बटन से दरवाजा अनलौक करते हुए निर्मला को अलविदा किया.

दरवाजा न खुलने वाली बात पर निर्मला को खूब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था.

घर पहुंचते ही परेश ने एक पत्रिका में छपी डिश की तसवीर सामने रखते हुए वही डिश बनाने का आदेश दे डाला, जिस पर निर्मला ने परेश पर बिफरते हुए कहा, ‘‘पूरी जिंदगी तुम ने और किया ही क्या है, पूरे दिन गधों की तरह मेहनत करते हो और ऊपर से दफ्तर में बैठेबैठे फरमाइश और कर डालते हो कि आज यह बनाना और कल यह…

‘‘खाने के अलावा कभी सोचा है कि बाकी लोग तुम से कम मेहनत करते हैं, फिर भी किस चीज की कमी है उन्हें. घूमने को फोरव्हीलर हैं, पहनने को ब्रांडेड कपड़े हैं, कुछ नहीं तो कम से कम बच्चों की फीस का तो खयाल रखना चाहिए.

‘‘आज अगर मेनका न होती, तो फीस भी आधी ही जमा करानी पड़ती और बारिश में भीग कर आना पड़ता  सो अलग.’’

परेश समझ गया कि यह सारी भड़ास उस मेनका को देख कर निकाली जा रही है. परेश ने बात को और आगे न बढ़ाना चाहा, जिस के चलते उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा.

दोपहर को गुस्से के कारण निर्मला ने कुछ खास न बनाया, सिर्फ खिचड़ी बना कर परेश और बेटे पारस के आगे रख दी.

परेश चुपचाप जो मिला, खा कर रह गया. उस ने कुछ बोलना लाजिमी न समझा.

रात तक निर्मला ने परेश से कोई बात नहीं की. उस के मन में तो सिर्फ मेनका और उस के ठाटबाट के नजारे ही रहरह कर याद आ जाया करते और परेश की काबिलीयत पर उंगली उठा जाते.

डिनर का वक्त हुआ. परेश ने न तो खाना मांगा और न ही निर्मला ने पूछा. देर तक दोनों के अंदर गुस्से का जो गुबार पनपता रहा, मानो सिर्फ इंतजार कर रहा हो कि सामने वाला कुछ बोले और मैं फट पडं़ू.

दोनों को ज्यादा इंतजार न कराते  हुए ठीक उसी वक्त भूख से बेहाल  बेटा पारस निर्मला से खाने की मांग करने लगा.

पारस को डिनर के रूप में हलका नाश्ता दे कर निर्मला ने परेश पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘बेटा, आज घर में कुछ था ही नहीं बनाने को, इसीलिए कुछ नहीं बनाया. तू आज यही खा ले, कल देखती हूं कुछ.’’

परेश ने हैरानी से पूछा, ‘‘घर में कुछ था नहीं और तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं? आखिर किस बात पर तुम ने दोपहर से अपना मुंह सिल रखा है और सुबह क्या देखोगी तुम?’’

‘‘मैं ने नहीं बताया और तुम ने क्या सिर्फ खाने का ठेका ले रखा है? सब से ज्यादा जीभ तुम्हारी ही चलती है, तो इंतजाम देखना भी तो तुम्हारा ही फर्ज बनता है न? और वैसे भी मालूम नहीं हर महीने राशन आता है, तो इस महीने कौन लाएगा?’’

परेश बेइज्जती के ये शब्द बरदाश्त न कर सका. इस वजह से वह उस रात भूखा ही सोया रहा मगर निर्मला से कुछ बोला नहीं.

सवेरे होते ही राशन के सामान से भरा हुआ एक थैला जमीन पर पटक कर उस में से जरूरी सामान निकाल कर परेश खुद ही अपने और बेटे पारस के लिए चायनाश्ता बनाने में जुट गया.

रसोई के कामों से फारिग हो कर दोनों बापबेटे सोफे पर बैठ कर नाश्ता करने में मगन हो गए.

परेश रोज की तरह समाचार चैनल लगा कर बैठ गया. आज सब से बड़ी खबर की हैडलाइन देख कर उस के होश उड़ गए और उस से भी ज्यादा उस के पीछे से गुजर रही निर्मला के.

सब से बड़ी खबर की हैडलाइन में लिखा था, ‘शहर में पिछले महीनों से गायब हो रहे बच्चों के केस का आरोपी शिकंजे में, जिस का नाम विजेंदर बताया जा रहा है. कल ही चौक से एक बच्चे को बहला कर अगुआ करते हुए वह पकड़ा गया.’

मुंह काले कपड़े से ढका हुआ था, पर इतनी पुरानी पहचान के चलते परेश और निर्मला को आरोपी को पहचानते देर न लगी.

निर्मला को अपनी गलती का एहसास हो चुका था. वह जान चुकी थी कि जल्दी से जल्दी ज्यादा ऐशोआराम पाने के चक्कर में लोगों को कोई शौर्टकट ही अपनाना पड़ता है, जिस काम की वारंटी वाकई में काफी शौर्ट होती है.

आज अपनी मरजी से ही निर्मला ने दोपहर का खाना परेश की पसंद का बनाया था, जिस की उसे कल तसवीर दिखाई गई थी. Hindi Story

Family Story In Hindi: घर का सादा खाना – प्रिया की उलझन

Family Story In Hindi: अनिल और बच्चे शुभम व शुभी औफिस चले गए तो प्रिया कुछ देर बैठ कर पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. अचानक नजर नई रैसिपी पर पड़ी. पढ़ते ही मुंह में पानी आ गया. सामग्री देखी. सारी घर में थी. प्रिया को नईनई चीजें ट्राई करने का शौक था.

खानेपीने का शौक था तो ऐक्सरसाइज कर के अपने वेट पर भी पूरी नजर रखती थी. एकदम बढि़या फिगर थी. कोई शारीरिक परेशानी भी नहीं थी. वह अपनी लाइफ से पूरी तरह संतुष्ट थी. बस आजकल अनिल और बच्चों पर घर का सादा खाना खाने का भूत सवार था.

प्रिया अचानक अपने परिवार के बारे में सोचने लगी. अनिल हमेशा से बिग फूडी रहे हैं पर अब अचानक अपनी उम्र की, अपनी सेहत की कुछ ज्यादा ही सनक रहने लगी है. हैल्दी रहने का शौक तो पूरे परिवार को है पर यह कोई बात थोड़े ही है कि इंसान एकदम उबली सब्जियों पर ही जिंदा रहे और वह भी तब जब कोई तकलीफ भी न हो. उस पर मजेदार बात यह हो कि औफिस में सब चटरपटर खा लें पर घर पर कुछ टेस्टी बन जाए तो सब की नजर तेल, मसाले, कैलोरीज पर रहे.

अब टेस्टी चीजें कैलोरीज वाली होती हैं तो प्रिया की क्या गलती है. उस के पीछे पड़ जाते हैं सब कि कितना हैवी खाना बना दिया है. आप को पता नहीं कि हैल्दी खाना चाहिए. भई, मुझे तो यह भी पता है कि कभीकभी खा भी लेना चाहिए. इस बात पर आजकल प्रिया का मूड खराब हो जाता है. भई, तुम लोग इतने हैल्थ कौंशस हो तो औफिस में भी उबला खाओ.

शाम को कभी किसी से पूछ लो कि आज औफिस में क्या खाया तो ऐसीऐसी चीजें बताई जाती हैं कि प्रिया की नजरों के सामने घूम जाती हैं और उस के मुंह में पानी आ जाता है.

मन में दुख होता है कि मैं जब मूंग की दाल और लौकी की सब्जी खा रही थी, तो ये लोग पिज्जा और बिरयानी खा रहे थे और अनिल का यह ड्रामा रहता है कि टिफिन घर से ही ले कर जाना है, उन्हें घर का सादा खाना ही खाना है.

वह सुबह उठ कर 3-3 हैल्दी टिफिन तेयार करती है और शाम को पता चलता है कि लजीज व्यंजन उड़ाए गए हैं. खून जल जाता है प्रिया का. यह उस की गलती है न कि वह एक हाउसवाइफ है, घर में रहती है, रोज बाहर जा कर कभी कुछ डिफरैंट नहीं खा पाती. उसे तो वही खाना है न जो टिफिन के लिए बना हो. वह कहां जा कर अपना टेस्ट बदले.

किट्टी पार्टी एक दिन होती है, अच्छा लगता है. आजकल तो कभी जब वीकैंड में बाहर खाना खाने जाते हैं, तो प्रिया मेनू कार्ड देखते हुए मन ही मन एक से एक बढि़या नई डिशेज देख ही रही होती है कि अनिल फरमाते हैं कि सूप और सलाद खाते हैं. प्रिया को तेज झटका लगता है. सूप तो पसंद है उसे पर सलाद? यह क्या है, क्यों हो रहा है उस के साथ ऐसा?

पास्ता, वैज कबाब, कौर्न टिक्की और दही कबाब, जो उस की जान हैं, इन में आजकल अनिल को ऐक्स्ट्रा तेल नजर आ रहा है. भई, जब वह अब तक अपने परिवार की हैल्थ का ध्यान रखती आई है तो फिर कभीकभी तो ये सब खाया जा सकता है न? सलाद खाने तो वह नहीं आई है न 20 दिन बाद बाहर?

बच्चों ने भी जब अनिल की हां में हां मिलाई तो प्रिया सुलग गई और सूप व सलाद खाती रही. मन में तो यही चल रहा था कि ढोंगी लोग हैं ये. यह शुभम अभी 2 दिन पहले अपने फ्रैंड्स के साथ बारबेक्यू नेशन में माल उड़ा कर आया है और यह शुभी की बच्ची औफिस में तरहतरह की चीजें खा कर आती है.

शाम को घर आ कर कहती है कि मौम, डिनर हलका दिया करो, स्नैक्स हैवी हो जाते हैं. अरे भई, मेरी भी तो सोचो तुम लोग, घर का सादा खाना खाने का गाना मुझे क्यों सुनाते हो… मेरी जीभ रो रही है… अब क्या टेस्टी, मजेदार खाना खाने के लिए तुम लोगों को सचमुच रो कर दिखाऊं… अगर अच्छीअच्छी चीजें खाने के लिए सचमुच किसी दिन रोना आ गया न मुझे तो पता है मुझे, सारी उम्र मेरा मजाक उड़ाया जाएगा.

अभी अनिल की 5 दिन की मीटिंग थी. रोज शानदार लंच था. सुबह ही बता जाते कि शाम को कुछ खिचड़ी टाइप चीज बना कर रखना. कुछ दिन लंच बहुत हैवी रहेगा. मेरी आंखों में आंसू आतेआते रुके. शुभम और शुभी वीकैंड में अपने दोस्तों के साथ बाहर ही लाइफ ऐंजौय कर लेते हैं. बचा कौन? मैं ही न?

अब खाने के लिए रोना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा है पर क्या करे, मन तो होता है न कभीकभी कुछ बाहर टेस्टी खाने का… कभीकभी अनहैल्दी भी चलता है न… यहां तक कि इन तीनों ने चाट खाना भी बंद कर दिया है, क्योंकि तीनों का औफिस में कुछ न कुछ बाहर का खाना हो ही जाता है.

अब बताइए, 6 महीनों में कभी छोलों के साथ भठूरे नहीं बन सकते? पर नहीं, रात में जैसे ही छोले भिगोती हूं, तीनों में से कोई भी शुरू हो जाता है कि भठूरे मत बनाना, बस रोटी या राइस… मन होता है छोलों का पतीला बोलने वाले के सिर पर पलट दूं… यह जरूरी क्यों हो कि घर में बस सादा ही खाना बने?

घर में भी तो कभी टेस्ट चेंज किया जा सकता है न?

पता नहीं तीनों कौन से प्लैनेट के निवासी बनते जा रहे हैं. यही फलसफा बना लिया है कि घर में खाएंगे तो सादा ही (बाकी माल तो बाहर उड़ा ही लेंगे.

पिछली किट्टी पार्टी में अगर अंजलि के घर खाने में पूरियां न होतीं, तो पूरियां खाए उसे साल हो जाता. बताओ जरा, उत्तर भारतीय महिला को अगर पूरियां खाए साल हो रहा हो तो यह कहां का न्याय है? अब कभी रसेदार आलू की सब्जी या पेठे की सब्जी, रायते के साथ पूरी नहीं खा सकते क्या? अहा, मन तृप्त हो जाता था खा कर. अब ये ढोंगी लोग कहते हैं कि हमारे लिए तो रोटी ही बना देना. अब अपने लिए 2-3 पूरियों के लिए कड़ाही चढ़ाती अच्छी लगूंगी क्या?

बस अब प्रिया के हाथ में था गृहशोभा का सितंबर, द्वितीय अंक और रैसिपी थी सामने गोभी पकौड़ा और अचारी मिर्च पकौड़ा. 2-3 बार दोनों रैसिपीज पढ़ीं. मुंह पानी से भर गया. पढ़ कर ही इतना खुश हुआ दिल… खा कर कितना मजा आएगा… बहुत हो गया घर का सादा खाना और सब से अच्छी बात यह है कि गोभी, समोसे बेक करने का भी औप्शन था तो वह बेक कर लेगी. तीनों कम रोएंगे, थोड़ा पुलाव भी बना लेगी, परफैक्ट, बस डन.

तीनों लगभग 8 बजे आए. आज प्रिया का चेहरा डिनर के बारे में सोच कर ही चमक रहा था. वैसे तो बनातेबनाते भी 2-3 समोसे खा चुकी थी… मजा आ गया था. पेट और जीभ बेचारे थैंक्स ही बोलते रहे थे जैसे तरसे हुए थे दोनों मुद्दतों से…

चारों इकट्ठा हुए तो प्रिया ने ‘आज फिर जीने की तमन्ना है…’ गाना गाते हुए खाना लगाया तो तीनों ने टेबल पर नजर दौड़ाई. अनिल के माथे पर त्योरियां पड़ गईं, ‘‘फ्राइड समोसे डिनर में? प्रिया, क्यों तुम सब की हैल्थ के लिए केयरलैस हो रही हो?’’

‘‘अरे, समोसे बेक्ड हैं, डौंट वरी.’’

‘‘पर मैदे के तो हैं न?’’

प्रिया का मन हुआ बोले कि कल जो पिज्जा उड़ाया था वह किस चीज का बना था? पर लड़ाईझगड़ा उस की फितरत में नहीं था. इसलिए चुप रही.

शुभम ने कहा, ‘‘मां, पकौड़े तो फ्राइड हैं न? मैं सिर्फ पुलाव खाऊंगा.’’

प्रिया ने शुभी को देखा, तो वह बोली, ‘‘मौम, आज औफिस में रिया ने बहुत भुजिया खिला दी… अब भी खाऊंगी तो बहुत फ्राइड हो जाएगा… मैं पुलाव ही खाऊंगी.’’

डिनर टाइम था. सब सुबह के गए अब एकसाथ थे. शांत रहने की भरसक कोशिश करते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम लोग सिर्फ पुलाव खा लो,’’

अनिल ने एक समोसा उस का मूड देखते हुए चख लिया, बच्चों ने पुलाव लिया. प्रिया ने जब खाना शुरू किया, सारा तनाव भूल उस का मन खिल उठा. जीभ स्वाद ले कर जैसे लहलहा उठी. आंसू भर आए, इतना स्वादिष्ठ घर का खाना. वाह, कितने दिन हो

गए, वह खुद रोज कौन सा तलाभुना खाना चाहती है, पर घर में भी कभी कुछ स्वादिष्ठ बन सकता है न… महीने में एक बार ही सही, पर यहां तो हद ही हो गई थी. वह जितनी देर खाती रही, स्वाद में डूबी रही. उस ने ध्यान ही नहीं दिया कौन क्या खा रहा है. उस का तनमन संतुष्ट हो गया था.

सब आम बातें करते रहे, फिर अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए. उस दिन जब प्रिया सोने के लिए लेटी, वह मन ही मन बहुत कुछ सोच चुकी थी कि नहीं करेगी वह सब के लिए इतनी चीजों में मेहनत, उसे कभीकभी अकेले ही खाना है न, ठीक है, उस का भी जब मन होगा, खा लेगी. बस एक फोन करने की ही देर है. अपने लिए और्डर कर लिया करेगी… यह बैस्ट रहेगा. उसे कौन सा कैलोरीज वाला खाना रोज चाहिए… कभीकभी ही तो मन करता है न… बस प्रौब्लम खत्म.

उस के बाद प्रिया यही करने लगी. कभी महीने में एक बार अपने लिए पास्ता और्डर कर लिया, कभी सिर्फ स्टार्टर्स और घर में सब खुश थे कि घर में अब सादा खाना बन रहा है. प्रिया तो बहुत ही खुश थी.

उस का जब जो मन होता, खा लेती थी. अपने प्यारे, ढोंगी से लगते अपनों के बारे में सोच कर उसे कभी हंसी आती थी, तो कभी प्यार, क्योंकि उन के निर्देश तो अब भी यही होते थे कि बाहर हैवी हो जाता है, घर में सादा ही बनाना. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: चीनी कम – जो आज की सोचे, जीत उसी की!

Hindi Family Story: ‘‘ढेर सारे पकवान बनाए हैं मैं ने, बहुतकुछ बाजार से भी मंगवा रखा है. तुम्हारा दोस्त निराश नहीं होगा. विकेश तुम्हारा दोस्त है, तो मेरे लिए भी कुछ है न.’’

‘‘कुछ…’’ बृजेश के कान खड़े हो गए, ‘‘तुम उसे पहले से जानती हो क्या?’’

‘‘अरे नहीं जी, मैं तो उसे पहली बार देखूंगी. तुम बेकार की बकवास सोचने लगे,’’ सरला हंसते हुए बृजेश को रसोईघर में ले गई. वहां दहीबड़े, समोसे, रसगुल्ले और गुलाबजामुन से ले कर छोलेभटूरे तक का इंतजाम था. कई तरह की नमकीन, पापड़ और मिठाइयां भी थीं. आखिर बड़े लोगों की किट्टी पार्टी जो ठहरी. सरला घर बैठे ही चिटफंड वगैरह चला कर अच्छी कमाई भी कर लेती है, फिर एक दिन सब को बढि़या खिलानेपिलाने में हर्ज किस बात का था.

अब यह इत्तिफाक की बात थी कि बृजेश का दोस्त विकेश शाम को 4 बजे आने वाला था. किट्टी पार्टी तो 6 बजे से थी. तब तक तो वह आराम से उसे खिलापिला कर विदा कर सकती थी.

तय समय पर बृजेश अपने दोस्त विकेश के साथ आया, तो सरला ने उस का भरपूर स्वागत किया. बृजेश फ्रैश होने के लिए बाथरूम चला गया.

नमस्ते करने के बाद सरला सीधे अपने मतलब पर आ गई, ‘‘अरे भाई साहब, आप इतनी बड़ी एयरलाइंस कंपनी में पायलट हैं. आप को तो अच्छी तनख्वाह मिलती होगी. तो आप को अपनी आमदनी का एक हिस्सा बचत के लिए भी इंवैस्ट करना चाहिए.

‘‘देखिए, मैं एक इंश्योरैंस सर्विस की एजेंट हूं और चाहती हूं कि आप अपनी बचत को मेरी इस कंपनी में लगाएं.’’

‘‘अरे भाभीजी, ऐसा कुछ नहीं है…’’ विकेश हंसते हुए बोला, ‘‘मेरी कंपनी दिवालिया हो चुकी है और मुझे 6 महीने से तनख्वाह भी नहीं मिली है. इस से आप मेरी हालत का अंदाजा लगा सकती हैं. मैं तो आप के शहर में एक इंटरव्यू के सिलसिले में आया हूं. बृजेश मेरा बचपन का दोस्त है. उस ने इतना कहा, इसलिए मैं मिलने चला आया.’’

विकेश की इस बात से सरला के भाव एकदम से बदल गए थे. वह सपाट चेहरा लिए वहां से उठी और अपने कमरे में चली गई.

उधर ड्राइंगरूम में दोनों दोस्त दुनियाजहान की बातें करते रहे.

अचानक बृजेश को कुछ खयाल आया. वह उठ कर सरला के पास आ कर बोला, ‘‘अरे, मेरा दोस्त बैठा है. कुछ चायपानी तो दो.’’

सरला उठी. चाय बना कर ट्रे में कुछ बिसकुट के साथ ड्राइंगरूम में रख आई.

चाय पीते हुए विकेश बोला, ‘‘चाय में चीनी कम है. तुम्हें ब्लड शुगर तो नहीं, जो चीनी कम लेते हो?’’

बृजेश ने चाय का घूंट भरा, तो उसे महसूस हुआ कि चाय फीकी लग रही है. वह हंसते हुए बोला, ‘‘दरअसल, सरला तुम्हें बढि़या मिठाई खिलाना चाहती है, इसलिए उस ने चाय में कम चीनी डाली है. रुको, मैं उसे चीनी लाने को कहता हूं.’’

‘‘अरे छोड़ो यार, चीनीवीनी…’’ विकेश हंसते हुए बाला, ‘‘मैं तो बस ऐसे ही मजाक कर रहा था.’’

चाय के दौर में पहले एक घंटा हुआ, फिर दूसरा घंटा भी बीत रहा था. मगर सरला का कहीं पता नहीं था. बृजेश इस बीच 1-2 बार टहल कर देख चुका था कि सरला शायद अब कुछ खाने को लाएगी. मगर वह जब भी बैडरूम में गया, वह अपने मोबाइल फोन में मसरूफ थी.

‘‘अब मैं चलूंगा यार…’’ विकेश अपनी घड़ी देखते हुए बोला, ‘‘2 घंटे कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला.’’

बृजेश विकेश से हाथ मिला कर उसे बाहर तक छोड़ने आया. जब वह अंदर आया तो सरला से पूछ बैठा, ‘‘अरे, इतने सारे पकवान बनाए थे तुम ने, कुछ ला कर दिया क्यों नहीं? क्या सोचता होगा वह. चाय में चीनी भी कम थी…’’ बृजेश नाराजगी जताते हुए बोला, ‘‘वह मेरा बचपन का दोस्त है. उस के घर में जब भी मैं जाता था, तो उस की मां मुझे बिना खाना खिलाए वापस नहीं आने देती थीं.’’

‘‘तो क्या हुआ…’’ सरला मुंह बना कर बोली, ‘‘बचपन की बात और होती है.’’

‘‘क्या हुआ…’’ बृजेश गुस्से में बोला, ‘‘अरे, वह मेरे बारे में क्या सोचता होगा.’’

‘‘सोचेगा क्या…’’ सरला बोली, ‘‘मैं समझती थी कि इतनी बढि़या नौकरी करने वाला शख्स है, तो मेरी कंपनी की कोई पौलिसी वगैरह लेगा. लेकिन उस को तो खुद खाने के लाले पड़े हैं. ऐसे आदमी को क्या खिलानापिलाना?’’

बृजेश यह सुन एकदम से सन्न रह गया. अपनी आवाज में कठोरता लाते हुए वह बोला, ‘‘ओहो, तो तुम ऐसा सोचती हो, मगर मैं तो कंगाल नहीं हुआ था,

जो तुम ने जानबूझ कर उसे कुछ खिलायापिलाया नहीं. चाय में चीनी कम डाल कर बेइज्जत करने की कोशिश भी की. क्या सोच रहा होगा वह?’’

‘‘अब जो सोचे…’’ सरला मुंह बना कर उठते हुए बोली, ‘‘मुझे रसोईघर में बहुत काम है. मेरी सहेलियां आती ही होंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है…’’ बृजेश बोला, ‘‘अगर मेरी नौकरी चली गई होती और कोई मेरे साथ ऐसा बरताव करता, तो तुम्हें कैसा लगता?’’

सरला बोली, ‘‘फिर की फिर देखेंगे. जो आज की सोचता है, जीत उसी की होती है. मैं फालतू लोगों पर समय और पैसा नहीं खर्च कर सकती. यह सामान तो उन सहेलियों के लिए है, जो मेरी चिटफंड और इंश्योरैंस पौलिसी में पैसा देती हैं. मेरे लिए हर बार नया आसामी लाती हैं.’’ Hindi Family Story

Romantic Story In Hindi: मेरे हिस्से की वफा – कायनात और अंबर का प्यार

Romantic Story In Hindi: कायनात और अंबर एक ही कालेज में साथ पढ़ते थे, बस सब्जैक्ट दोनों के अलगअलग थे. कायनात उर्दू साहित्य की छात्रा और अंबर कंप्यूटर साइंस का छात्र.

दोनों की क्लासें एक ही फ्लोर पर होने से अकसर वे एकदूसरे से टकरा जाते थे. शुरुआती बातचीत के बाद दोनों पढ़ाई की बातें करतेकरते पहले पारिवारिक और फिर निजी बातें करने लगे थे और फिर हंसीमजाक तक करने लगे थे.

दिन, हफ्ते, महीने ऐसे ही हंसतेखिलखिलाते बीत रहे थे. कायनात के लिए अंबर के दिल में अब एक खास जगह बनने लगी थी, लेकिन वह कह नहीं पाया था.

अगले हफ्ते अंबर का जन्मदिन आने वाला था, जिस में उस ने कायनात को भी बुलाया, पर वह आने को मना करती रही.

अंबर उसे मना ही रहा था कि उस के पहले ही कायनात का फोन बज उठा. उस की मम्मी का फोन था…. जो उसे घर जल्दी आने को कहते हुए बता रही थीं कि शाम को 4 बजे कुछ लोग उस की बड़ी बहन को देखने आने वाले हैं.

‘‘ठीक है अम्मी,’’ कहते हुए कायनात ने फोन काट दिया.

कायनात अंबर से बोली, ‘‘सौरी, आज मैं जल्दी घर जाऊंगी… आखिरी क्लास अटैंड किए बिना.’’

‘‘अच्छा ठीक है, चली जाना, लेकिन यह तो बताओ कि इस शनिवार को मेरे जन्मदिन पर आ रही हो न?’’

‘‘अंबर, बिना अम्मीअब्बू की इजाजत के मैं घर से कहीं नहीं आतीजाती हूं. और अगर कहीं जाती भी हूं तो भाई साथ होते हैं.’’

यह सुन कर अंबर का चेहरा उतर गया. यह देख कायनात झट से बोली, ‘‘अरे बाबा, उदास मत हो. मम्मी को राजी करने की कोशिश करूंगी. अब मुसकराओ… ये देवदास वाली सूरत अच्छी नहीं लग रही है…’’ उस के कहने के अंदाज से दोनों खिलखिला उठे.

घर पहुंचते ही अम्मी की नसीहतें शुरू हो गईं, ‘‘जरा सलीके से कपड़े पहनना. दुपट्टा सिर पर रखना. तेज मत बोलना… अपनी आपा के साथ ही रहना…’’

‘‘जी अम्मी, कुछ और बचा हो तो परची बना कर दे दो… मैं आधे घंटे में रट लूंगी.’’

‘‘तेरी इन्हीं बचकानी हरकतों की वजह से समझाना पड़ता है,’’ अम्मी कह कर काम में लग गईं.

मेहमान आ चुके थे. चायपानी का दौर शुरू हुआ. निखत उन लोगों को पसंद आई, साथ में उन्होंने कायनात को भी अपने दूर के भतीजे के लिए पसंद कर लिया, जिस के लिए कायनात के अम्मीअब्बू ने 2 साल का समय मांग लिया. वे हंसीखुशी राजी हो गए.

कायनात कुछ कह न सकी, लेकिन न जाने क्यों उस के दिमाग में अंबर की तसवीर घूम गई. वह समझ भी नहीं पा रही थी कि इस समय उसे अंबर का खयाल क्यों आया.

इधर अंबर के दिल में कायनात के लिए अहसास और जवां हो रहे थे, उधर कायनात इस बात से बेखबर अंबर को केवल एक दोस्त की हैसियत से देखती थी. निखत की शादी हो गई. उस के बाद कायनात की पढ़ाई भी पूरी हो गई.

2 साल बीतने को आ रहे थे. निखत की ससुराल वालों ने कायनात के रिश्ते की याद दिलाने का संदेशा भेजा.

कायनात अब तक अंबर के प्यार को समझ चुकी थी और खुद भी अहसास कर चुकी थी कि उस का दिल भी अंबर का नाम लेता है.

‘‘कायनात, मैं तुम से मुहब्बत करता हूं,’’ एक दिन अंबर ने दिल की बात कही.

‘‘मगर, मेरा रिश्ता तय हो चुका है. मैं अम्मीअब्बू से बगावत नहीं कर सकती… उन का भरोसा कैसे तोड़ दूं… मैं बागी का कलंक ले कर जी नहीं पाऊंगी.’’

‘‘और हमारा प्यार… अपने दिल पर हाथ रख कर बताओ कि तुम मुझ से प्यार नहीं करती?’’

‘‘अंबर, ऐसा सवाल न पूछो, जिस का जवाब मैं न दे सकूं.’’

‘‘जिस सवाल का जवाब तुम जानती हो, फिर उस से क्यों भागती हो?’’

‘‘मैं मजबूर हूं.’’

‘‘मगर, मैं नहीं… मैं बात करूंगा तुम्हारे अब्बू से.’’

‘‘अंबर, शादी तो मैं अब्बू के कहने पर उन की इज्जत के लिए कर रही हूं, मगर मैं शादी से पहले कुंआरी विधवा की जिंदगी नहीं जी सकती.’’

‘‘मैं समझ गया. तुम अपनी वफा का हक अदा करो, मेरे हिस्से की वफा भी तुम्हारी…’’ इतना कहते ही अंबर की आंखें छलछला गईं और वह आगे कुछ न कह सका. Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: इंतजार तो किया होता – आरिफ की मासूम बेवफाई

Hindi Romantic Story: कालेज का पहला दिन था, इसलिए शब्बी कुछ जल्दी ही आ गई थी. वह बहुत ही सुंदर और शर्मीली लड़की थी. उसे कम बोलना पसंद था.

धीरेधीरे कालेज में शब्बी की जानपहचान बढ़ती गई. लड़के तो उस की तारीफ करते न थकते, पर शब्बी किसी भी लड़के की तरफ अपनी नजर नहीं उठाती थी.

एक दिन आसमान पर बादल घिर आए थे. बिजली चमक रही थी. शब्बी तेज कदम बढ़ाते हुए अपने घर की तरफ जा रही थी. अचानक बूंदाबांदी शुरू हो गई, तो वह एक घर के बरामदे में जा कर खड़ी हो गई.

अचानक शब्बी की नजर एक खूबसूरत लड़के आरिफ पर पड़ी. वह उसे देख कर घबरा गई. तभी आरिफ ने मुसकान फेंकते हुए कहा, ‘‘शब्बीजी, आप अंदर आइए न… बाहर क्यों खड़ी हैं?’’

शब्बी यह बात सुन कर शरमा गई और बारिश में ही अपने घर की तरफ चलने लगी. आरिफ ने बांह पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘बुरा मान गई. मैं कोई पराया थोड़े ही हूं…’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ शब्बी ने झेंपते हुए कहा. बारिश धीरेधीरे कम होती जा रही थी. जल्दी ही शब्बी अपने घर की तरफ चल पड़ी.

शब्बी सारी रात करवटें बदलती रही. उस की आंखें आरिफ को खोज रही थीं. उस का बड़े ही प्यार से ‘शब्बीजी’ कहना उसे बहुत पसंद आया था. आरिफ भी उसी कालेज में पढ़ता था. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान बढ़ी और फिर मुलाकातें होने लगीं.

एक दिन आरिफ ने कहा, ‘‘शब्बी, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं, अब एक पल की भी जुदाई मुझ से सहन नहीं होती… मैं तुम्हारे घर वालों से तुम्हें मांग लूंगा और दुलहन बना कर अपने घर ले आऊंगा.’’

उस दिन शब्बी ज्यों ही घर पहुंची, उस की नजर कुछ अनजानी औरतों पर पड़ी. पर वह नजरअंदाज करते हुए अपने कमरे की तरफ चली गई.

तभी उस की मां मिठाई का एक डब्बा लिए उस के कमरे में आईं, तो शब्बी झट पूछ बैठी, ‘‘मां, आज मिठाई किस खुशी में लाई हो?’’

सायरा बेगम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘बेटी, बहुत बड़ी खुशखबरी है. पहले मिठाई खाओ, फिर मैं बताऊंगी.’’

‘‘अच्छा, अब बताइए,’’ शब्बी ने मिठाई खाते हुए पूछा.

‘‘बेटी, खुशी की बात यह है कि तुम्हारा रिश्ता पक्का हो गया है.’’

मां की यह बात सुन कर शब्बी का दिल जोर से धड़कने लगा. उस की नजरों में आरिफ का मासमू चेहरा घूमने लगा. वह बेकरार हो उठी और आरिफ के घर की ओर चल पड़ी.

आरिफ उस वक्त कोई गीत गुनगुना रहा था. शब्बी को इस कदर परेशान और दुखी देख कर वह चौंक उठा, ‘‘क्या हुआ शब्बी? तुम इस तरह परेशान क्यों हो?

‘‘आरिफ…’’ शब्बी कांपते हुए बोली, ‘‘मां ने मेरी शादी पक्की कर दी है. मैं अब तुम्हारे बिन एक पल भी…’’

‘‘छोड़ो भी यह फिल्मी अंदाज…’’ आरिफ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ठीक है, शादी कर लो… आखिर कब तक कुंआरी बैठी रहोगी. तुम अपनी मां की बात नहीं मानोगी क्या?’’

आरिफ की यह बात सुन कर शब्बी की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कांपती आवाज में बोली, ‘‘आरिफ, मैं नहीं जानती थी कि तुम इस कदर बेवफा हो,’’ इतना कह कर शब्बी ने खिड़की के रास्ते नीचे छलांग लगा दी.

यह देख कर आरिफ चीख पड़ा. वह दौड़ता हुआ लहूलुहान शब्बी के पास पहुंचा. ‘‘शब्बी, यह तू ने क्या कर लिया… देखो शब्बी, मैं हूं… हां, मैं… तुम्हारा आरिफ… तुम्हारा हमराज… आंखें खोलो… कुछ पल तो इंतजार किया होता.

‘‘वह तो मैं ने ही अपनी मां को तुम्हारे घर भेजा था तुम्हें अपनी दुलहन बनाने के लिए. उठो शब्बी, मेरी दुलहन.’’

आरिफ दीवानों की तरह चिल्लाए जा रहा था, लेकिन शब्बी तो अब इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी. Hindi Romantic Story

Hindi News Story: क्रीमी लेयर पर सियासी जंग

Hindi News Story: एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण हो रहा था, दूसरी तरफ दिल्ली और एनसीआर मास्क लगा कर जहरीली हवा से जूझ रहा था. दिसंबर का महीना आने वाला था और यह साल भी अपना वजूद खोने जा रहा था.

इस बीच अनामिका ने एक दिन विजय को फोन किया, ‘‘यार, कल सुबह तुम मेरे साथ बैंक चलना. एक छोटा सा काम है, फिर हम दोनों ट्रेड फेयर देखने चलेंगे. ज्यादा दिन नहीं बचे हैं.’’

‘‘बैंक तो मैं चल लूंगा, पर ट्रेड फेयर जाने के नाम पर मेरी टांगें कांपने लगती हैं. बहुत भीड़ होती है और खर्च होता है, सो अलग,’’ विजय बोला.

‘‘तुम न बड़े बोरिंग इनसान हो. अभी बोल दूं कि किसी होटल में एक रात बिताते हैं, तो तुम्हारी बांछें खिल जाएंगी. पर अगर मुझे कहीं घूमने जाना हो, तो तुम बहाने बनाने लगते हो. यह गलत बात है,’’ अनामिका ने रूठते हुए कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, पहले बैंक का काम निबटाएंगे, फिर देखते हैं कि ट्रेड फेयर जाने का समय बचता भी है या नहीं,’’ विजय बोला.

अगले दिन विजय और अनामिका सुबह 10 बजे ही बैंक चले गए थे. बैंक सरकारी था. अनामिका को अपना केवाईसी अपडेट कराना था. चूंकि बैंक की वैबसाइट में दिक्कत थी, तो उन्हें थोड़ा समय लग रहा था.

वैसे, केवाईसी अपडेट के लिए आप को पहचान और पते के प्रमाण के लिए जिन दस्तावेज की जरूरत होती है, उन में पैनकार्ड और आधारकार्ड सब से खास हैं, साथ ही पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, या ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेज की जरूरत हो सकती है.

इस के अलावा, आप को एक हालिया पासपोर्ट साइज की तसवीर और हाल का उपयोगिता बिल (जैसे बिजली या गैस बिल) या बैंक स्टेटमैंट जैसे पते के प्रमाण की भी जरूरत हो सकती है.

बैंक में एक चपरासी और गार्ड के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. वे दोनों कौन्ट्रैक्ट पर वहां लगे थे. चपरासी ऊंची जाति का था, जबकि गार्ड एससी तबके से था.

गार्ड ने चपरासी को कोई काम करने को कहा था, जबकि चपरासी उसे भाव नहीं दे रहा था. मुद्दा बस इतना था कि चपरासी को एक कागज पर मैनेजर के दस्तखत और मुहर लगवानी थी. चूंकि बैंक में भीड़ ज्यादा थी तो गार्ड अपनी सीट नहीं छोड़ सकता था.

इसी बात पर चौकीदार चिढ़ गया था. वह बोला, ‘‘अब इन्हें भी सीट पर ही काम चाहिए. रिजर्वेशन से सब हड़प रहे हैं और अब काम भी हम से ही कराना चाहते हैं. जिस दिन रिजर्वेशन हट गया न, तब देखना.

मुफ्त की मलाई नहीं मिलेगी, तो आटेदाल का भाव पता चल जाएगा.’’

‘‘तो इस में क्या गलत है. तुम लोगों ने सदियों से हमें दबाया है. हमें हमारा हक मिलना चाहिए,’’ गार्ड ने भी ऊंची आवाज में कहा.

‘‘चिंता मत करो. नई सरकार क्रीमी लेयर वाले मामले पर कुछ धमाका करने वाली है. बहुत फायदा उठा लिया तुम लोगों ने रिजर्वेशन का. थोड़े दिनों के बाद सब बराबर हो जाएंगे,’’ चपरासी ने भड़ास निकालते हुए कहा.

‘‘क्यों अफवाह फैला रहे हो. बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुम से सीखे. मैं लंच टाइम में अपना काम करा लूंगा,’’ इतना कह कर वह गार्ड मेन गेट के बाहर जा कर अपनी सीट पर बैठ गया.

तब तक अनामिका का काम हो चुका था. अभी 12 बज रहे थे. वह और विजय ट्रेड फेयर की तरफ चल दिए.

चूंकि 1-2 दिन में मेला खत्म होने वाला था, तो भीड़ ज्यादा थी. वे दोनों अंदर जा कर सब से पहले एक रैस्टोरैंट में गए. उन्हें चाय पीने की तलब थी.

इसी बीच अनामिका बोली, ‘‘उस चपरासी ने कितनी आसानी से कह दिया कि अब देश से रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा. उसे क्या पता कि क्रीमी लेयर क्या होता है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्रीमी लेयर बला क्या है?’’ विजय ने अनामिका को कुरेदते हुए पूछा.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘मैं ने बीबीसी के एक लेख में पढ़ा था और वहां इसे अच्छे से समझाया गया था कि ‘क्रीमी लेयर’ की सोच इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पेश की गई थी, जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में भी जाना जाता है.

‘‘अदालत ने फैसला सुनाया कि ओबीसी में उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ का दावा नहीं करना चाहिए, लेकिन इस वर्ग के वास्तव में जरूरतमंद लोगों को यह लाभ मिलना चाहिए.

‘‘इस के मुताबिक, 8 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों को क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. यह आमदनी सीमा सरकार की ओर से समयसमय पर बदली जाती है. इस के अलावा, ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवाओं में ऊंचे पद के अफसरों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में शामिल हैं.

‘‘डाक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे अमीर पेशेवरों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. इस के अलावा बड़े पैमाने पर खेतीबारी की जमीन के मालिक परिवारों को भी क्रीमी लेयर में शामिल किया गया है.

‘‘क्रीमी लेयर के सदस्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों समेत ओबीसी के लिए आरक्षित लाभों के लिए पात्र नहीं हैं.

‘‘वर्तमान में क्रीमी लेयर की सोच एससी और एसटी पर लागू नहीं होती है. एससी और एसटी के तकरीबन सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता है. लेकिन अब कोर्ट की इस ऐतिहासिक सिफारिश के बाद इस में बदलाव की संभावना है.’’

‘‘तो फिर अब इसे क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हें हाल की एक खबर बताती हूं. रिटायरमैंट से ठीक पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने क्रीमी लेयर नौकरियों के कोटे को ले कर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि एससीएसटी समुदायों में सामाजिक और मालीतौर पर अमीर लोग जाति को हथियार बना कर नौकरियों में आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथिया रहे हैं.

‘‘एक बड़े अखबार से बातचीत में चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि केंद्र और राज्यों को एससीएसटी समुदायों को उपवर्गीकृत करने का समय आ गया है, ताकि इन समुदायों में वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बने हुए हैं, सरकारी नौकरियों में कोटे के लाभ उठा सकें.

‘‘चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बैंच ने राज्यों को एससी समुदायों के भीतर जातियों को सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन व सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर उपवर्गीकृत करने की इजाजत दी, यह पक्का करते हुए कि कोटे का बड़ा हिस्सा सब से पिछड़े लोगों को जाए.

‘‘इस बारे में चीफ जस्टिस ने कहा कि अपने ही समुदाय से आलोचना के बावजूद, वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि एससीएसटी समुदायों में क्रीमी लेयर को इन समुदायों में वंचितों के लिए जगह देनी चाहिए.’’

‘‘इस में गलत क्या है? जब क्रीमी लेयर वालों ने पहले ही आरक्षण का फायदा ले लिया है, तो उन की अगली पीढ़ी को खुद ही इस सब का फायदा नहीं लेना चाहिए, तभी तो गरीब एससीएसटी को आरक्षण का असली हक मिल पाएगा,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मामले की गहराई नहीं समझ रहे हो. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार इन समुदायों के आरक्षण सीमा के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है.

‘‘तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 7 जजों की बैंच के 6 जस्टिस ने एससीएसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि एक जस्टिस ने इस का विरोध किया.

‘‘फैसला सुनाते समय यह सिफारिश भी की गई कि एससी और एसटी के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए और यह ओबीसी वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए.

‘‘इस फैसले को ले कर कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान गया है कि क्या एससी और एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर देने की जरूरत है?’’

‘‘पर मैं इस फैसले को ऐतिहासिक मानता हूं. तुम इस तरह से यह बात समझो. अगर एक छात्र दिल्ली के किसी बड़े और नामचीन या किसी और बड़े शहर के बढि़या कालेज में पढ़ रहा है और एक छात्र गांवदेहात के किसी साधारण स्कूल या कालेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों छात्रों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले कर आगे बढ़ी है, तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए,’’ विजय ने अपना पक्ष रखा.

‘‘ओह, तो यह बात है. पर तुम इस मुद्दे को बड़ा हलके में ले रहे हो. ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इस फैसले का विरोध किया है. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एससी के तहत पिछड़ेपन को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों पर चुप है.

‘‘प्रकाश अंबेडकर ने आगे कहा कि आरक्षण से न केवल एससी, एसटी और ओबीसी को लाभ होता है, बल्कि सामान्य श्रेणियों को भी लाभ होता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

‘‘और तो और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुनाए फैसले के बारे में बौम्बे हाईकोर्ट के वकील संघराज रूपवते ने कहा कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने एक बार फिर अदालत की आड़ में वही किया है, जो वे चाहते थे. यह एक ऐसा फैसला है जो हमें जातिविहीन समाज से दूर ले जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उपवर्गीकरण की अनुमति देना 6 जस्टिस की एक बड़ी गलती है.

‘‘वैसे भी एससी और ओबीसी के क्रीमी लेयर अलग होते हैं. इस बारे में ‘नैशनल कौन्फेडरेशन औफ दलित और्गनाइजेशन’ के अध्यक्ष अशोक कुमार भारती इस बारे में कहते हैं कि एससीएसटी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, इन्हें समाज से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया था. इन के खिलाफ अन्याय का भाव अब भी समाज में बरकरार है, जबकि ओबीसी के बारे में ऐसा नहीं है. उन के पास भूमि है, साधन हैं. हालांकि, शिक्षा के मामले में वे भी वंचित हैं.’’

‘‘तो तुम यह मानती हो कि यह सरकार की साजिश है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘एक तरह से कह सकते हैं. जनरल कैटेगरी में जज का बच्चा जज बन सकता है, डाक्टर का बच्चा डाक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है, पर वंचितों में क्रीमी लेयर की फांस लगा कर उन्हें ऐसा करने से रोक दो कि आप की एक पीढ़ी ने आरक्षण का फायदा ले लिया है, अब अगली पीढ़ी को अपने दम पर यह मुकाम हासिल करना होगा.

‘‘यहां पर एक सामाजिक पहलू भी है. जिस एससीएसटी और ओबीसी के बच्चे अपने मांबाप की बड़ी सरकारी नौकरी की वजह से अब पढ़ाईलिखाई में बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं, यह उन्हें मानसिक रूप से दबाने की भी कोशिश है.

‘‘लेकिन टीना डाबी जैसे होनहार जनरल कैटेगरी को टक्कर दे रहे हैं. वे आईएएस टौपर तो थीं ही, उन्हें कथिततौर पर 12वीं जमात के बोर्ड इम्तिहान में 93 फीसदी अंक मिले थे, जिस में राजनीति विज्ञान और इतिहास दोनों में 100 अंक शामिल हैं. सोशल मीडिया पर उन की मार्कशीट वायरल हुई थी,’’ अनामिका बोली.

‘‘मान ली तुम्हारी बात, पर सोशल मीडिया पर कही बात जरूरी नहीं कि सही हो,’’ विजय ने शक जाहिर किया.

‘‘उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालय, मिर्जापुर की 25 छात्राओं में से 12 ने इस साल देश की सब से मुश्किल मैडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट पास की थी. ये सभी छात्राएं एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों से आती हैं.

‘‘तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि इन तबकों के बच्चे होनहार नहीं हैं. वे अब पढ़ाईलिखाई की कीमत समझ रहे हैं. अगर उन्हें सही सीख मिले तो वे खुद को साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं,’’ अनामिका बोले जा रही थी.

‘‘ठीक है, ठीक है, पहले तुम पानी पी लो. मान ली तुम्हारी बात. सरकार को एकदम से कोई कड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी बात रखी है और उस पर बहस की जा सकती है.

‘‘देश में अभी जाति के नाम की समानता बनाने में समय लगेगा. यह कोई ऐसा फैसला नहीं है कि आज लागू हुआ और कल से देश में बदलाव की बयार बहने लगेगी. यहां बात किसी वंचित समुदाय के मालीतौर पर मजबूत होने की नहीं है, बल्कि उन्हें साथ खड़ा रहने की हिम्मत भी देनी होगी.

‘‘जिन बच्चों के मांबाप ने आरक्षण से खुद को ऊंचा उठाया है, उन बच्चों में थोड़ा आत्मविश्वास आया है, पर अभी दूर तक जाना है और सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले हर पहलू पर गौर करना होगा,’’

विजय ने अनामिका की बात को बैलेंस देते हुए कहा.

‘‘यही आज की जरूरत है. राजनीति और जातिवाद दोनों अलगअलग बातें हैं. अगर कोई सरकार ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने की पहल करती है, तो उसे वाकई सब को साथ ले कर चलना होगा, तभी देश में तरक्की दिखाई देगी,’’ अनामिका ने अपनी बात खत्म की.

इस के बाद विजय ने लंच का बिल दिया और वे दोनों उस रैस्टोरैंट से बाहर निकल गए. अभी मेला देखना जो बाकी था. Hindi News Story

Story In Hindi: मजबूरी – क्या रिहान कर पाया तबस्सुम से शादी?

Story In Hindi: आज भी बहुत तेज बारिश हो रही थी. बारिश में भीगने से बचने के लिए रिहान एक घर के नीचे खड़ा हो गया था.

बारिश रुकने के बाद रिहान अपने घर की ओर चल दिया. घर पहुंच कर उस ने अपने हाथपैर धो कर कपड़े बदले और खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद वह छत पर चला गया और अपनी महबूबा को एक मैसेज किया और उस के जवाब का इंतजार करने लगा.

छत पर चल रही ठंडी हवा ने रिहान को अपने आगोश में ले लिया और वह किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया. वह अपने प्यार के भविष्य के बारे में सोचने लगा. रिहान तबस्सुम से बहुत प्यार करता था और उसी से शादी करना चाहता था. तबस्सुम के अलावा वह किसी और के बारे में सोचता भी नहीं था. जब कभी घर में उस के रिश्ते की बात होती थी तो वह शादी करने से साफ मना कर देता था.

रिहान के घर वाले तबस्सुम के बारे में नहीं जानते थे. वे सोचते थे कि अभी यह पढ़ाई कर रहा है इसलिए शादी से मना कर रहा है. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह मान जाएगा.

तभी अचानक रिहान के मोबाइल फोन पर तबस्सुम का मैसेज आया. उस का दिल खुशी से झूम उठा. उस ने मैसेज पढ़ा और उस का जवाब दिया. बातें करतेकरते दोनों एकदूसरे में खो गए.

तबस्सुम भी रिहान को बहुत प्यार करती थी और शादी करना चाहती थी. अभी तक उस ने भी अपने घर पर अपने प्यार के बारे में नहीं बताया था. वह रिहान की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रही थी.

ऐसा नहीं था कि दोनों में सिर्फ प्यार भरी बातें ही होती थीं, बल्कि दोनों में लड़ाइयां भी होती थीं. कभीकभी तो कईकई दिनों तक बातें बंद हो जाती थीं. लड़ाई के बाद भी वे दोनों एकदूसरे को बहुत याद करते थे और कभी किसी बात पर चिढ़ाने के लिए मैसेज कर देते थे. मसलन, तुम्हारी फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर बहुत बेकार लग रही है. बंदर लग रहे हो तुम. तुम तो बहुत खूबसूरत हो न बंदरिया. और लड़तेलड़ते फिर से बातें शुरू हो जाती थीं.

पिछले 3 सालों से वे दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे और अब जा कर शादी करना चाहते थे. रिहान ने सोच लिया था कि इस साल पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई अच्छी सी नौकरी कर वह अपने घर वालों को तबस्सुम के बारे में बता देगा. अगर घर वाले मानते हैं तो ठीक, नहीं तो उन की मरजी के खिलाफ शादी कर लेगा. वह किसी भी हाल में तबस्सुम को खोना नहीं चाहता था.

एक दिन रिहान की अम्मी बोलीं, ‘‘तेरे मौसा का फोन आया था. उन्होंने तुझे बुलाया है.’’

‘‘मुझे क्यों बुलाया है? मुझ से क्या काम पड़ गया उन्हें?’’ रिहान ने पूछा.

‘‘अरे, मुझे क्या पता कि क्यों बुलाया है. वह तो हमें वहीं जा कर पता चलेगा,’’ उस की अम्मी ने कहा.

कुछ देर बाद वे दोनों मोटरसाइकिल से मौसा के घर की तरफ चल दिए. रिहान के मौसा पास के शहर में ही रहते थे. एक घंटे में वे दोनों वहां पहुंच गए. वहां पहुंच कर रिहान ने देखा कि घर में बहुत लोग जमा थे. उन में उस के पापा, उस की शादीशुदा बहन और बहनोई भी थे.

यह सब देख कर रिहान ने अपनी अम्मी से पूछा, ‘‘इतने सारे रिश्तेदार क्यों जमा हैं यहां? और पापा यहां क्या कर रहे हैं? वे तो सुबह दुकान पर गए थे?’’

अम्मी बोलीं, ‘‘तू अंदर तो चल. सब पता चल जाएगा.’’ रिहान और उस की अम्मी अंदर गए. वहां सब को सलाम किया और बैठ कर बातें करने लगे.

तभी रिहान के मौसा चिंतित होते हुए बोले, ‘‘आसिफ की हालत बहुत खराब है. वह मरने से पहले अपनी बेटी की शादी करना चाहता है.’’

आसिफ रिहान के मामा का नाम था. कुछ दिन पहले हुई तेज बारिश में उन का घर गिर गया था. घर के नीचे दब कर मामा के 2 बच्चों और मामी की मौत हो गई थी. मामा भी घर के नीचे दब गए थे, लेकिन किसी तरह उन्हें निकाल कर अस्पताल में भरती करा दिया गया था. वहां डाक्टर ने कहा था कि वे सिर्फ कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. उन का बचना नामुमकिन है.

‘‘फिर क्या किया जाए?’’ रिहान की अम्मी बोलीं.

‘‘आसिफ मरने से पहले अपनी बेटी की शादी रिहान के साथ करा देना चाहता है. यह आसिफ की आखिरी ख्वाहिश है और हमें इसे पूरा करना चाहिए,’’ मौसा की यह बात सुन कर रिहान एकदम चौंक गया. उस के दिल में इतना तेज दर्द हुआ मानो किसी ने उस के दिल पर हजारों तीर एकसाथ छोड़ दिए हों. उस का दिमाग सुन्न हो गया.

‘‘ठीक है, हम आसिफ के सामने इन दोनों की शादी करवा देते हैं,’’ रिहान की अम्मी ने कहा.

रिहान मना करना चाहता था, लेकिन वह मजबूर था. उसी दिन शादी की तैयारी होने लगी और आसिफ को भी अस्पताल से मौसा के घर ले आया गया. शाम को दोनों का निकाह करवा दिया गया.

शादी के बाद रिहान अपनी बीवी और मांबाप के साथ घर आ गया. पूरे रास्ते वह चुप रहा. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस के साथ हुआ क्या है.

घर पहुंच कर रिहान कपड़े बदल कर छत पर चला गया. उस ने तबस्सुम को एक मैसेज किया. थोड़ी देर बाद तबस्सुम का फोन आया. रिहान के फोन उठाते ही तबस्सुम गुस्से में बोली, ‘‘कहां थे आज पूरा दिन? एक मैसेज भी नहीं किया तुम ने.’’

तबस्सुम नाराज थी और वह रिहान को डांटने लगी. रिहान चुपचाप सुनता रहा. जब काफी देर तक वह कुछ नहीं बोला तो तबस्सुम बोली, ‘‘अब कुछ बोलोगे भी या चुप ही बैठे रहोगे?’’

‘‘मेरी शादी हो गई है आज,’’ रिहान धीमी आवाज में बोला.

तबस्सुम बोली, ‘‘मैं सुबह से नाराज हूं और तुम मुझे चिढ़ा रहे हो.’’

‘‘नहीं यार, सच में आज मेरी शादी हो गई है. उसी में बिजी था इसलिए मैं बात नहीं कर पाया तुम से.’’

‘‘क्या सच में तुम्हारी शादी हो गई है?’’ तबस्सुम ने रोंआसी आवाज में पूछा.

‘‘हां, सच में मेरी शादी हो गई है,’’ रिहान ने दबी जबान में कहा. उस की आवाज में उस के टूटे हुए दिल और उस की बेबसी साफ झलक रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह जीना ही नहीं चाहता था.

‘‘तुम ने मुझे धोखा दिया है रिहान,’’ तबस्सुम ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं कर सकता था, मेरी मजबूरी थी,’’ यह कह कर रिहान भी रोने लगा.

‘‘तुम धोखेबाज हो. तुम झूठे हो. आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना,’’ कह कर तबस्सुम ने फोन काट दिया. फोन रख कर रिहान रोने लगा. वहां तबस्सुम भी रो रही थी. Story In Hindi

Hindi Funny Story: गर्व से कहो हम भ्रष्ट हैं

Hindi Funny Story, लेखक – जे. शर्मा

बस कंडक्टर की रोचक बातों ने मेरा दिल जीत लिया था. मैं जब भी अपना 500 रुपए का कड़क नोट उस की तरफ बढ़ाता, वह बारबार मेरी अनदेखी करते हुए आगे निकल जाता और दूसरी सवारियों की टिकटें काटने लगता.

मेरा माथा ठनका कि आज कुछ न कुछ गलत हो कर रहेगा. यह 500 का नोट कई बार बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है.

खैर, सब की टिकटें काटने के बाद वह बस कंडक्टर मुसकराता हुआ मेरे पास आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप को पहले भी इस रूट पर देखा है. आप फूड सप्लाई महकमे में काम करते हैं न?’’

मैं ने सोचा कि शायद इस गलतफहमी में मैं टिकट लेने से बच जाऊंगा. लिहाजा, मैं ने हामी भर दी.

कंडक्टर ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बाबूजी, हमारे चाचा के साले का लड़का भी आप के महकमे में है.

संपत दलाल… नाम सुना होगा आप ने… बहुत ऊंची पोस्ट पर है. राजधानी में एक बड़ी सी कोठी है उस की.

‘‘वैसे, एक बात है बाबूजी कि आप के महकमे में पैसा बहुत है. राइस मिल या फ्लोर मिल वालों को जरा सा इशारा कर दो, बोरी भर कर नोट आप के आंगन में फेंक जाएंगे. आप रातभर बैठे गिनते रहो, सुबह हो जाएगी…’’

वह थोड़ी सांस ले कर आगे बोला, ‘‘मेरा तो यही मानना है कि मुझे अगले जनम में फूड सप्लाई की नौकरी मिले, चाहे चपरासी ही क्यों न बनना पड़े…

‘‘और एक बात सुनो… हमारे पड़ोस में मोहनलाल की कोठी है. वह कस्टम महकमे में चपरासी है. क्या शान है उस की. गाड़ी है, घर में एयरकंडीशनर लगा है. वह हर समय मोबाइल फोन पर बातें करता रहता है और उस के घर के लोग काजूकिशमिश ऐसे चबाते हैं, जैसे मूंगफली के दाने चबा रहे हों. यह सब देख कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगते हैं…’’

लेकिन कुछ देर बाद वह थोड़े उदास लहजे में बोला, ‘‘और एक हम सरकारी बसों के कंडक्टर हैं कि सारी उम्र रुपए 10 रुपए का टांका लगालगा कर ही बूढ़े हो जाते हैं. पता नहीं, हमारा अच्छा समय कब आएगा.

‘‘मैं ने 2 लाख रुपए की रिश्वत दे कर अपने छोटे बेटे को म्यूनिसिपल के दफ्तर में चपरासी लगवा दिया है, लेकिन वह ससुरा तो मुफ्त में लोगों के काम करवाता फिरता है. मैं उस से कहता हूं कि 2 लाख रुपए जमा करने में मेरी कमर टेढ़ी हो गई है, वे तो वसूल कर के ला.

‘‘मैं ने भी उसे बोल दिया है कि बेटा, जल्दी ही तेरी शादी कर के तुझे अलग कर दूंगा. जब तेरे बच्चे होंगे और खर्च बढ़ेगा, तब तू खुद ही हाथपैर मारेगा. सारे उसूल धरे के धरे रह जाएंगे.

‘‘अच्छा बाबूजी, आप से हुई बातें बहुत मजे की रहीं. रास्ता कट गया. आप वह 500 रुपए का नोट दिखा रहे थे न… लाओ, मैं आप का टिकट बना देता हूं.

‘‘आजकल टिकट चैकर भी बहुत दुखी करते हैं. महीना तो बंधा है, मगर फिर भी उन की नीयत खराब रहती है. सोचते हैं कि पता नहीं कंडक्टर कितनी लूट मचाते हैं.’’

मीठीमीठी बातें करता हुआ वह कंडक्टर 35 रुपए अपनी जेब में रख लेता है और टिकट नहीं बनाता.

बाकी रुपए वापस करते हुए वह कहता है कि आप जहां कहोगे, हम वहीं उतार देंगे.

मैं भी सोचता हूं कि चलो इसी बहाने मेरे ईरिकशा के 20 रुपए बच जाएंगे. Hindi Funny Story

Best Family Story: फर्ज

Best Family Story: उस ने बाइक एक ओर खड़ी की और सामने महाराज के होटल पर जा कर कोने में पड़ी बैंच पर बैठ गया. सुनील ने उस से नमस्ते की, लेकिन वह खामोश ही रहा.

‘‘सब अपने बाप का नौकर ही समझते हैं,’’ थोड़ी देर के बाद वह बड़बड़ाया. अनायास ही उस का स्वर कुछ तेज हो गया था.

‘‘क्या हुआ दीवानजी, क्या किसी से झगड़ा हो गया?’’ सुनील ने उस से पूछा.

‘‘झगड़ा क्या होगा. इस नए थाना प्रभारी की घरवाली तो ऐसा और्डर मारती है, जैसे मैं सिपाही नहीं इस के बाप का नौकर हूं.

‘‘अगर कुछ कहो तो बस… जिसे देखो वही हम जैसे छोटे लोगों पर ही रोब दिखाता है,’’ अंदर घुमड़ रहा गुस्सा अनायास ही उस के शब्दों को गंदा कर रहा था.

‘‘आज काफी गुस्से में लग रहे हैं दीवान चाचा,’’ उस ने देखा कि मुकेश उस की बैंच पर आ कर बैठ गया था वहीं और उस से पूछ रहा था.

मुकेश उसे ‘चाचा’ ही कहता है. मुकेश वैसे तो फलों का ठेला लगाता है, लेकिन असलियत में पहले वह एक चोर था, जो अकसर छोटीमोटी चोरियां किया करता था. उस पर चोरी के 1-2 मुकदमे भी दर्ज थे. लेकिन जब से उस ने मुकेश को समझाया था, तब से मुकेश चोरी का धंधा छोड़ कर फलों का ठेला लगाने लगा था.

मुकेश की एक बहन रजनी उसे ‘बाबूजी’ कहती है. वह अकसर गश्त करतेकरते मुकेश के घर चला जाता. मुकेश की बहन अकसर कह देती कि उन के होने से उन्हें लगता ही नहीं है कि वे लोग अनाथ हैं. उसे भी न जाने क्यों उन दोनों से लगाव सा हो गया था.

वह शहर के बहुत से लोगों को जानता है, जो कोतवाली में खर्चापानी देते रहते हैं. वैसे गैरकानूनी काम करने वाले सभी पुलिस को हफ्ता देते हैं.

उसे भी कई लोगों ने खर्चा देना चाहा, लेकिन उस ने साफतौर पर लेने से मना कर दिया. पहले चोरउचक्के, गिरहकट उस के नाम से कांपते थे, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी वरदी का रोब डाल कर कुछ ऐंठने की कोशिश नहीं की, बल्कि वह ऐसे लोगों को गिरफ्तार करता, लेकिन साहब लोगों की मेहरबानी से वे शाम तक ही बाहर आ जाते.

और तो और उस को जम कर फटकार भी लगाई गई कि उस ने उन को गिरफ्तार ही क्यों किया. तब से उस ने फर्ज को भूल कर ऐसी भूल दोबारा नहीं की. वह जानता था कि सोने का अंडा देने वाली मुरगी को कौन हलाल करना चाहेगा.

तभी सचिन उस के आगे 2 कप चाय और प्लेट में नमकीन रख गया. वह समझ गया कि अंदर आते समय मुकेश ने चाय के लिए बोल दिया होगा.

पहले तो उस का मन नहीं हुआ कि वह चाय पिए. अभी वह एक पैग लगा आया था. नाइट ड्यूटी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी वरना वह अकसर रात में दारू पीता है, लेकिन फिर भी वह बिना कुछ बोले चाय का गिलास उठा कर चाय पीने लगा, जिस से उसे कुछ राहत महसूस हुई.

‘‘क्या हुआ दीवान चाचा, आज काफी गुस्से में लग रहे हैं?’’ मुकेश ने दोबारा उस से पूछा.

‘‘रिटायरमैंट के 2 साल रह गए हैं. सोचता हूं कि सुकून से कट जाएं, लेकिन ये सब… सुबह विवेक साहब की बीवी ने कुछ सामान लाने को कहा था और दारोगा ने एक आदमी को लाने के लिए भेज दिया था, जिस से सामान ला कर देने में कुछ देर हो गई, बस वह बिगड़ पड़ी जैसे मैं सिपाही नहीं, बल्कि उस का घरेलू नौकर हूं,’’ वह बोला.

‘‘आजकल संजय सिपाही तो बहुत लूट रहा है,’’ मुकेश बोला.

‘‘आजकल लूट कौन नहीं रहा है. मैं तो समझता था कि नए लड़केडिपार्टमैंट के मुंह पर लगी कालिख को साफ कर कुछ नया करेंगे, लेकिन ये तो और ज्यादा खाऊ निकले.

‘‘पहले तो कभीकभी कोई फंस जाता था, उसे ही हलाल किया जाता था, लेकिन ये नए लड़के तो शिकार की तलाश में ही घूमते रहते हैं,’’ वह गहरी सांस लेते हुए बोला.

चाय का गिलास खाली हो गया था. उस ने गिलास मेज पर रख दिया. तभी बाहर कुछ शोर सुनाई दिया.

शोर सुन कर उस का ध्यान होटल से बाहर गया. उस ने देखा कि सामने 2 लड़कों में किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था, जो गालीगलौज के बाद हाथापाई पर उतर आये थे, जिस से वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी.

तभी वहां बाइक से सिपाही सुधीर और संजय आ गए. वह सम?ा गया कि किसी ने उन को फोन कर दिया है. बाइक से उतरते ही वे उन दोनों लड़कों को डांटडपट कर बाइक पर बिठा कर चौकी की ओर ले गए.

यह देख कर वह समझ गया कि अब दोनों से अच्छीखासी रकम वसूल कर सुलह करवा दी जाएगी.

‘‘दीवान चाचा, आज तो दोनों की मोटी कमाई हो जाएगी. दोनों पार्टी मोटी हैं,’’ मुसकराते हुए मुकेश ने उस से कहा.

मुकेश की बात सुन कर वह कुछ नहीं बोला.

आज इतने साल ड्यूटी के बीत गए थे, लेकिन उस ने वरदी पर रिश्वत जैसा दाग लगने नहीं दिया था और न ही वह कभी अपने फर्ज से पीछे हटा, जिस का उसे इनाम भी मिला था.

एसपी साहब ने उस की बेहतर कार्यशैली के चलते उसे स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सिपाही से दीवान बना दिया था, जिस से उस को लगा था कि चलो ईमानदारी से ड्यूटी करने का उसे कुछ तो फायदा मिला.

लेकिन यह खुशी भी उस के लिए कुछ दिन की ही थी.

उस दिन वह नाइट ड्यूटी कर के घर लौट रहा था, तभी रास्ते में उस ने अनुज को देखा जो नशीले पदार्थों की तस्करी किया करता था. वह काफी दिनों से उस की रडार पर था.

आज उस ने स्मैक बेचते रंगे हाथ अनुज को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान 2-4 हाथ भी उस ने उसे मार दिए और उसे थाने ले आया. उस ने यह भी नहीं सोचा कि वह साहब का खास आदमी है और फिर विवेक साहब ने उस को मिली पट्टियां उतरवा दीं और वह फिर दीवान से सिपाही बन गया था.

‘‘आराम नहीं है आप की नौकरी में,’’ मुकेश बोला.

‘‘आराम और वह भी इस नौकरी में… सत्तर खसम होते हैं इस नौकरी में, एसपी साहब आए या फिर आईजी डीआईजी सब की बस जेबें गरम होनी चाहिए… कहीं से ला कर दो इन को, पर इन का पेट पहले भरो, फिर कहा जाता है कि ईमानदारी से नौकरी करो, ड्यूटी पर फर्ज निभाओ…

‘‘कर तो रहा हूं ईमानदारी से… आधी तनख्वाह तो साहब लोगों को मुरगाबकरा खिलाने में चली जाती है और आधी से घर चलाओ.

‘‘2 बार सिपाही से दीवान बना, लेकिन इस विवेक सिंह ने वह भी छीन लिया, लेकिन फिर भी दीवान भानु प्रताप ही रहूंगा… देखता हूं कौन रोकेगा मुझे,’’ वह कुछ तेज स्वर में बोला.

‘‘दीवान चाचा, आप ने लगाई हुई है शायद. आप को चढ़ गई है. ऐसा कीजिए कि आप अब घर चले जाइए. मैं भी अपने ठेले पर जाता हूं. कहीं किसी ने आप की वीडियो वगैरह बना ली तो…’’ मुकेश घबरा कर इधरउधर देखते हुए बोला और तुरंत उठ कर होटल से बाहर चला गया.

उसे भी अपनी गलती का एहसास हो गया. वह भी जानता है कि आजकल वैसे भी लोग पुलिस को अपना दुश्मन ही समझते हैं.

पता नहीं कौन मौके का फायदा उठा ले और उस की इस तरह की बेवजह की बातें मोबाइल में रिकौर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दे और वह सफाई देता घूमता रहे.

आज कितने बरस हो गए पुलिस की नौकरी करते हुए, लेकिन आज भी हालात उस के जस के तस हैं. जितनी तनख्वाह मिलती है, उस से वह ढंग से परिवार भी नहीं चल पाता.

2 बेटियां हैं. एक की तो जैसेतैसे कर्ज ले कर शादी कर दी, लेकिन दूसरी कुंआरी घर में बैठी है. अभी तक उस के हाथ पीले नहीं कर पाया.

एक बेटा है वह भी ग्रेजुएशन करने के बाद बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो गया है. लड़की की शादी के बाद उस पर कर्ज भी काफी हो गया है. सभी सम?ाते हैं कि पुलिस में है, तो उस के पास बहुतकुछ होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते कि उस जैसे सिपाही कमाई नहीं कर पाते और हराम का पैसा लेना उस की फितरत में नहीं.

वैसे भी सभी को पता है कि हराम का पैसा जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है. कभीकभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ खानेपीने की इच्छा होती है, लेकिन मन मारना पड़ जाता है.

‘‘अरे भानु, तुम यहां बैठे हो और मैं तुम्हें कब से ढूंढ़ रहा हूं. तुम्हारा नंबर भी बंद बता रहा है,’’ तभी उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि सामने दीपक खड़ा हुआ था. वही उस से पूछ रहा था.

‘‘कहीं नहीं, नाइट ड्यूटी है बस इसीलिए चाय पीने चला आया था. शायद मोबाइल चार्ज नहीं किया था, इसीलिए स्विचऔफ हो गया होगा,’’ उस ने दीपक से कहा.

दीपक भी सिपाही की पोस्ट पर था, लेकिन उस का रहनसहन किसी अफसर से कम नहीं था. दीपक अलग से कमाता भी खूब था और साहब लोगों पर खर्च भी करता था, इसलिए साहब लोग उस से खुश भी रहते थे.

दीपक ने कई बार उसे समझाया था कि अलग से कुछ कमा लिया करो. कम से कम तनख्वाह तो बच जाएगी और घरपरिवार तो सही से चला सकोगे.

दीपक ने उसे कमाने के मौके भी दिए. एक बार वह दीपक के साथ चौकी पर बैठा हुआ था, तभी जमीनी विवाद का मामला आ गया.

दीपक ने 25,000 रुपए में मामला सैट कर दिया. उस ने मामले को निबटाने के लिए कहा और खुद एक बड़े मामले को निबटाने चला गया.

उस ने विवाद को बहुत ही सूझबूझ से निबटा दिया, लेकिन वह रुपए लेने की हिम्मत न कर सका. जब यह बात दीपक को पता चली, तो उस ने उसे बहुत सुना दिया था.

वह भी क्या करे, उस का जमीर यह कभी गवारा नहीं कर पाया कि वह किसी से हराम का पैसा ले.

‘‘कहां खो गए जनाब…’’ तभी एक बार फिर दीपक ने उस से कहा.

‘‘बस, ऐसे ही. और बताओ कैसे आना हुआ?’’ यादों के भंवर से वापस आ कर उस ने दीपक से पूछा.

‘‘मैं यह कह रहा था कि भतीजे को पुलिस में भरती क्यों नहीं करवा देते… फार्म वगैरह भरवा दो, भरती निकली है. मैं ने ऊपर साहब लोगों से 2 लाख में बात भी तय कर ली है. बस, यही तुम को बताना था,’’ दीपक ने उसे धीरे से बताया.

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ उस ने दीपक से कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं. ड्यूटी का टाइम है,’’ दीपक बोला और वहां से चला गया. वह भी उठ कर होटल से बाहर आ गया और कमरे की ओर चल दिया. सामने से निकल रहे आटोरिकशा को रोक कर उस में बैठ गया.

उसे पता बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि वह अकसर आटोरिकशा या फिर रिकशा से ही आताजाता है.

पता नहीं क्यों आज उसे एहसास हो रहा था कि अगर उस ने भी और लोगों की तरह रिश्वत ली होती तो वह
अपनी जिंदगी ऐशोआराम से जीता. वह जानता है कि उस ने जिंदगी जी नहीं बल्कि ढोई है.

ग्रेजुएशन पूरी होने के बाद रोहन ने नौकरी के लिए बहुत हाथपैर मारे, इंटरव्यू भी दिए, लेकिन बिना रिश्वत के वह नौकरी न पा सका.

उस की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह लाख 2 लाख का इंतजाम कर सके. छोटीमोटी नौकरी वह करना नहीं चाहता, जिस के चलते रोहन आवारागर्दी करने लगा और उस के नाम पर लोगों से वसूली करने लगा, जिस की वजह भी वह खुद को समझता है.

अब तो उसे घर से मतलब ही नहीं रह गया था. उसे फिक्र थी कि रिटायरमैंट करीब है और उस के बाद मामूली सी पैंशन मिलनी है, तब कैसे गुजारा हो पाएगा.

‘‘साहब, आप का घर आ गया,’’ तभी आटोरिकशा वाले की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर धरातल पर आ गया.

उस ने 10 रुपए निकाल कर आटो रिकशा वाले को दे दिए. वह जानता है कि अगर वह रुपए नहीं देगा तो भी वह रुपए नहीं मांगेगा, लेकिन वह कभी किसी गरीब का हक नहीं मारता.

कमरे पर पहुंच कर उस ने मोबाइल निकाल कर चार्जिंग पर लगा दिया और उस का स्विच औन कर दिया. फिर वह सामने रखी कुरसी पर बैठ गया. उस ने अपनी आंखें बद कर लीं.

तभी किसी ने दरवाजे को खटखटाया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने होमगार्ड विनोद था.

‘‘साहब ने आप को तुंरत बुलाया है. आप का मोबाइल बंद था, इसलिए साहब ने आप को लेने के लिए भेजा है,’’ विनोद ने उस से कहा.

किसी अनहोनी के डर से उस का दिल घबराने लगा. वह सम?ा गया कि मैडम ने ही साहब को बताया होगा.

सुबह उस ने मैडम से गुस्से में आ कर कह दिया था, ‘‘मेमसाहब, आप अपना सामान किसी और से मंगा लिया करें, मैं आप का कोई नौकर नहीं हूं.’’

वह जानता है कि विवेक साहब उसे किसी लफड़े में डाल कर लाइन हाजिर भी करवा सकते हैं. वह पछता रहा था कि बेकार में ही वह ताव खा गया. इतने साल कट गए थे, ये 2 साल भी काट लेता. घर के हालात, कुंआरी बेटी का बोझ और बेरोजगार बेटा सब उसे भयानक सपने की तरह डराने लगे थे. उस का दिल अनायास ही धड़कने लगा था.

वह कोतवाली पहुंचा. सामने ही विवेक साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. उन्हें देख कर उस के माथे पर पसीना आ गया था. वह सोच रहा था कि वह साहब और मेमसाहब से माफी मांग लेगा कि गलती हो गई, ज्यादा होगा तो पैरों पर गिड़गिड़ा कर माफी मांग लेगा. कम से कम नौकरी तो बच जाएगी. अनायास ही वह सोच गया.

आज उसे ऐसा लग रहा था कि वह बेवजह ही दावा करता था कि अपराधी उस से डरते हैं, जबकि आज उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह गलत का विरोध कर सके.

‘‘जय हिंद सर,’’ उस ने साहब को देख कर एक जोरदार सैल्यूट किया.

‘‘क्यों भानु प्रताप, आजकल यह मुकेश कुछ नहीं दे रहा है?’’ उसे देख कर विवेक साहब बोले.

वह समझ गया कि यह सारा मामला पैसों का है.

‘‘साहब, वह मुकेश अब फलों का ठेला लगा रहा है. उस ने चोरी करनी छोड़ दी है,’’ उस ने बताया.

‘‘यह नौटंकी तो ये सब करते हैं.’’

‘‘नहीं सर, मुकेश ने सचममुच गलत धंधा छोड़ दिया है.’’

‘‘इसीलिए इस को 5 लाख रुपयों की लूट में धर दिया. कल सुबह खुलासा करना है. 2 को पकड़ लिया है, एक फरार है. अब इस को भी उठवाया है.

‘‘एक घंटे में मुठभेड़ भी दिखानी है और तुम भी साथ में रहोगे,’’ विवेक साहब उसे घूरते हुए बोले.

‘‘लेकिन सर…’’ वह बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि आजकल तुम्हारी तुम्हारी मुकेश से कुछ ज्यादा ही छन रही है. क्यों रिटायरमैंट पर अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हो…’’ साहब कुछ तीखे स्वर में बोले.

डकैती और मुठभेड़ का नाम सुन कर वह समझ गया कि मुकेश के साथ नाइंसाफी हो रही है. न वह उस से चोरी छुड़वाता और न वह उस से इतना लगाव रखता, तो शायद आज मुकेश को यह दिन नहीं देखने पड़ते. वह भी क्या करे, ड्यूटी तो करनी ही थी.

‘‘जय हिंद साहब,’’ तभी किसी की आवाज पर वह चौंक गया. सामने सुधीर खड़ा था, जो साहब को ‘नमस्ते’ कह कर बता रहा था.

बाहर आ कर उस ने देखा कि मुकेश के हाथों में हथकड़ी थी और उसे जेल में बंद कर दिया गया था. अंदर 2 लोग और थे जो असलियत में लुटेरे थे.

कुछ ही देर में तीनों को गाड़ी में बिठा दिया गया. साहब आगे गाड़ी में बैठ गए और वह भी 3 सिपाहियों के साथ गाड़ी में बैठ गया.

मुकेश उसे देख रहा था, लेकिन उस की मुकेश से नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

कुछ समय बाद गाड़ी रुकी. उस ने देखा कि वे लोग जंगल के किनारे आ गए थे. विवेक साहब ने मुकेश को गाड़ी से बाहर निकलवाया और एक पिस्टल उसे पकड़ा दी.

मुकेश बुरी तरह से डर कर कांप रहा था. वह डर कर भागा. साहब ने उसे इशारा किया और उस ने मुकेश के पैर पर निशाना साध कर फायर कर दिया.

एक धमाका हुआ और मुकेश वहीं गिर गया और वह भी ‘धम’ से वहीं बैठ गया. Best Family Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें