महंगाई ने निकाला दम, कैसे मनाएं दिवाली हम

आमतौर पर त्योहार एक दिन का होता है, दीवाली अकेला ऐसा त्योहार है, जो 5 दिनों का होता है. इस की शुरुआत धनतेरस से होती है. उस के बाद छोटी दीवाली और बड़ी दीवाली आती है. चौथा दिन गोवर्धन पूजा और सब से आखिर में भैयादूज का होता है.

एक त्योहार के 5 दिन में अलगअलग आयोजन होने से महंगाई का असर ज्यादा होता है. धनतेरस में नई चीजें खरीदने का रिवाज होता है. ऐसे में कुछ न कुछ खरीदना ही पड़ता है. छोटी और बड़ी दीवाली घर की साफसफाई, सजावट, झालर लगाने जैसे तमाम काम होते हैं. इसी दिन लोग मिलने भी आते हैं. गोवर्धन पूजा को ‘अन्नकूट’ भी कहते हैं. भैयादूज का दिन रक्षाबंधन की तरह भाईबहन के बीच का होता है. अब इस में लेनदेन और दिखावा भी होने लगा है.

पर महंगाई के दौर में दीवाली का त्योहार कैसे मनाएं, इस बात को समझने की जरूरत है. त्योहार साल में एक बार आता है. ऐसे में इस को हंसीखुशी से मनाने की जरूरत है.

त्योहार का मतलब यह होता है कि अपनी जानपहचान और करीबी लोगों के साथ इस की खुशियां मनाएं. पर अगर महंगाई है, तो उस का मुकाबला करने के लिए कुछ उपाय कर सकते हैं. गांवकसबों में बहुत सारी उपहार में दी जाने वाली चीजें कम पैसों में मिलती हैं.

ये चीजें दें उपहार में

हाथ से बने सामान को बड़ेबड़े बाजारों में हस्तशिल्प के नाम से जाना जाता है. उपहार देने के लिए इन की खरीदारी करने से कम पैसों में अच्छी चीजें मिल जाती हैं. दीवाली में मिट्टी के दीए, घर को सजाने के लिए कपड़ों से बने बंदनवार, हस्तशिल्प और लकड़ी के सामान मिलते हैं. मिट्टी से बने खिलौने केवल खेलने के ही काम नहीं आते हैं, बल्कि अब इन का इस्तेमाल घर को सजाने में भी किया जाने लगा है.

बचपन में एक बूढ़ा सिर हिलाते हुए हर खिलौने की दुकान पर दिखता था. आज भी मिट्टी के बने खिलौनों में वह सब से ज्यादा पसंद किया जाता है. अब यह लोगों के ड्राइंगरूम या बच्चों के कमरे में सजावटी सामान की तरह से रखा मिलता है. इसी तरह से मिट्टी से बनी बैलगाड़ी भी मिल जाती है.

अपने दोस्तों और परिवार के लिए महंगे उपहार खरीदने के बजाय इस तरह के सस्ते सामान उपहार में दे सकते हैं. इस के अलावा घर में बनी मिठाइयां, पापड़ और नमकीन, हाथ से बनी पेंटिंग या शिल्पकला जैसे सामान को अपने बजट में रहते हुए उपहार में दे सकते हैं.

इन उपहारों की न केवल कीमत कम होती है, बल्कि ये दिल से दिए उपहार लगते हैं. इस के अलावा गांव और कसबों के लोगों को रोजगार भी दिया जा सकता है. इस से उन की भी दीवाली खुशियों वाली होगी.

जितनी जरूरत उतना खर्च

त्योहार के शुरू होते ही औनलाइन से ले कर औफलाइन तक छूट और औफर की भरमार दिखने लगती है. इस के चक्कर में लोग अपनी जरूरत से ज्यादा का सामान ले कर अपना बजट बिगाड़ लेते हैं.

दुकानदार बड़ी होशियारी से वह सामान बेच लेते हैं, जो पहले बिक नहीं रहा होता है. ज्यादा वजन वाली चीजें कम बिकती हैं. जैसे 100 ग्राम वाला टूथपेस्ट ज्यादा बिकता है. अब दुकानदार इस पर कोई छूट और औफर नहीं देता. 250 ग्राम वाला टूथपेस्ट नहीं बिकता. ऐसे में इस पर 20 फीसदी छूट का औफर रख दिया जाता है. अब अगर औफर के चक्कर में आ कर ज्यादा वजन वाला पैकेट ले लिया, तो इस से बजट बिगड़ जाता है.

जरूरत से ज्यादा का सामान लेने पर ज्यादा बजट लगा, जिस ने त्योहार के खर्च को बढ़ा दिया. ऐसे में खरीदारी करते समय ध्यान रखें कि जितनी जरूरत हो उतनी ही खरीदारी करें.

औनलाइन खरीदारी करने की जगह पर अपने पड़ोस वाली दुकान से खरीदारी करें. इस से आप अपने आसपास वाले की ही मदद करते हैं और उस के साथ निजी संबंध भी बनाते हैं. ये लोग औफर और छूट का झांसा कम देते हैं.

ऐसे में आप उतनी ही चीजें खरीदते हो जितनी जरूरत होती है. इस के अलावा यह आप का हालचाल पूछ कर आप को अहसास दिलाता है कि हम आप के अपने है. कभी कोई शिकायत हो, तो सुन लेता है.

नकद खर्च का अहसास

कुछ पैसे कमज्यादा भी हो गए, तो बाद में दे सकते हैं. इस तरह की सुविधा भी होती है. क्या किसी मौल या औनलाइन दुकान से बिना पैसा दिए चीजें ले सकते हो? नहीं. पर पड़ोस वाली दुकान से बिना पैसे दिए भी ले सकते हो, जिस का पैसा बाद में दे सकते हैं.

औनलाइन खरीदारी करते समय भुगतान क्रेडिट कार्ड और ईवौलेट जैसे माध्यमों से होता है, जिस से खर्च करते समय पता नहीं चलता कि कितना खर्च हो गया. इसलिए बजट बढ़ जाता है, जबकि जेब में रखे पैसे खर्च होते हैं, तो खर्च का अहसास होता है. ऐसे में ज्यादा खर्च नहीं हो पाता है.

औनलाइन खरीदारी में खर्च ज्यादा हो जाता है. ऐसे में फैस्टिवल का बजट बिगड़ जाता है. बजट बनाए रखने के लिए नकद खरीदारी करनी जरूरी है, क्योंकि जो क्रेडिट कार्ड से पैसा खर्च होता है, वह भी देना तो पड़ता ही है.

औनलाइन खरीदारी से केवल एक महीने का ही नहीं, बल्कि कई महीने तक का बजट बिगड़ सकता है. ऐसे में उधार की जगह नकद पर भरोसा करें. यह पैसा जैसे ही ज्यादा खर्च होगा, समझ आने लगता है. ऐसे में हम खर्च करने की हद के अंदर ही रहते हैं.

त्योहार के दिन करें सफर

दीवाली के 3 महीने पहले ही अखबारों में यह खबर देखने को मिलती है कि दीवाली के समय सारी ट्रेन और बस के टिकट बुक हो गए हैं. गांवकसबों में रहने वाले ज्यादातर लोग दिल्ली, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में रहते हैं. दीवाली में गांवघर आना जरूरी होता है. पहले से टिकट बुक नहीं हो पाया है, तो महंगी कीमत में टिकट लेने से अच्छा है कि त्योहार के दिन सफर कीजिए.

त्योहार के एक दिन पहले ज्यादा तादाद में लोग सफर करते हैं. त्योहार के दिन भीड़ कम होती है. वापसी भी 1-2 दिन बाद करेंगे, तो टिकट मिलने में दिक्कत नहीं होगी. आराम से कम बजट में सफर कर सकेंगे.

दीए जलाएं

दीवाली रोशनी का त्योहार है और घर को रोशन करना रिवाज का हिस्सा है. पहले के समय में घर में रूई से बाती बनाई जाती थी. तेल में एक दिन पहले से भिगो कर रख दिया जाता था, जिस से बाती ठीक से तेल में तर हो जाती थी.

मिट्टी के दीए भी एक दिन पहले धो कर रखे जाते थे, जिस से उन का पानी सूख जाता था. ऐसे में जब उन में तेल डाला जाता था, तब वह कम तेल सोखते थे. पहले से तेल में डूबी रूई की बाती देर तक जलती थी. तेल कम लगता था. खर्च कम होता था.

आज भी सरसों का तेल 150 रुपए लिटर तक का होता है. एक लिटर तेल में पूरे घर में दिए जल जाते हैं. दीए भी झालर के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं. दीए से रोशनी करना सस्ता और पारंपरिक है. इस से असली त्योहार की फीलिंग आती है.

बनाएं त्योहारी बजट

त्योहार में कितना खर्च करना है, पहले से ही यह सोच कर इस का बजट बना लें. बजट के मुताबिक ही खर्चा करने से ज्यादा खर्च नहीं होगा. उस के खर्च का इंतजाम भी पहले से कर सकेंगे. इस के लिए सभी मदों की सूची बनाएं और हर मद के लिए उन्हें मिलने वाली प्राथमिकता के मुताबिक पैसा अलग करें. इस से आप को ज्यादा खर्च करने से बचने में मदद मिलेगी. त्योहार खत्म होने के बाद इस बात का अफसोस नहीं होगा कि खर्च ज्यादा हो गया है. इस से दीवाली के त्योहार का भरपूर मजा आएगा.

 दीवाली पर सस्ते में घर रोशन

दीवाली पर रोशनी को ले कर ‘न्यू आर्क स्टूडियोज’ की आर्किटैक्ट नेहा चोपड़ा ने बताया, ‘‘बहुत से लोग तो यही सोचते रहते हैं कि हम ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे, पर कर नहीं पाते. कभी पैसे की कमी, तो कभी समय न होने के चलते लोगों को यह तरीका ही नहीं सूझता है कि दीवाली पर अपने घर को रोशन कैसे करना है. पर घबराइए नहीं, क्योंकि इस समस्या का हल कुछ इस तरह से किया जा सकता है :

-हर शादीशुदा औरत के पास कोई फटीपुरानी चमकदार साड़ी या जूट का रंगबिरंगा कपड़ा रखा ही होता है. 2 लोहे के छल्ले ले कर उस पर साड़ी का एक हिस्सा या रंगबिरंगा जूट कस कर लपेट दें और एक एलईडी बल्ब बीच में जला कर कमरे में सजा दें. अगर बल्ब नहीं है, तो बड़ा सा दीया भी जला कर रखा जा सकता है. दीया रखते समय सावधानी बरतें कि कपड़ा आग न पकड़ ले.

-अगर कपड़ा नहीं है, तो किसी गत्ते के डब्बे को डिजाइन में काट कर उस के चारों तरफ मजबूत रंगीन कागज चिपका दें और अंदर बल्ब जला दें या दीया रख दें. कटे गत्ते के डिजाइन से बाहर निकलती रोशनी खूबसूरत लगेगी.

-अगर किसी के घर की भीतरी छत खराब दिख रही है, तो दीवाली पर मिलने वाली इलैक्ट्रिकल लडि़यों को करीने से छत पर लगा दें. उस के बाद किसी साड़ी की मदद से उन लडि़यों को ढक दें. रात को जब वे लडि़यां जगमगाएंगी, तो छत भी खराब नहीं दिखेगी और साड़ी में से निकलती लाइट से घर का माहौल ही बदल जाएगा.

-आप घर में ही कागज से कंदील बना सकते हैं. उस में बल्ब लगा कर कम रोशनी वाली जगह को रोशन कर सकते हैं.

-अलगअलग रंगों या फूलों की रंगोली बना कर बीच में बड़ा सा दीया रख कर भी घर की रोशनी बढ़ाई जा सकती है.

-आजकल सस्ती इलैक्ट्रिक लडि़यां भी बाजार में मिल जाती हैं. किसी लड़ी को कांच की खाली बोतल वगैरह में भर कर रोशन करने से भी घर की रौनक बढ़ जाती है.

-घर को जगमग करने में मोमबत्ती भी अच्छाखासा रोल निभाती हैं. ये ज्यादा महंगी भी नहीं होती हैं.

सैक्स में और्गेज्म है बहुत जरूरी, पर कैसे पाएं मंजिल?

सैक्स की सफलता और्गेज्म पर टिकी होती है. अत: पतिपत्नी दोनों को ही और्गेज्म तक पहुंच सैक्स का आनंद लेना चाहिए. यदि सहवास के दौरान पतिपत्नी दोनों लगन के साथ सैक्स क्रिया का लुत्फ लेते हैं, तो और्गेज्म तक पहुंचना दोनों के लिए आसान हो जाता है. यदि और्गेज्म तक नहीं पहुंचते हैं तो दोनों में तनाव रहता है, झगड़े होने लगते हैं.

दिलीप जब पत्नी रूपा के साथ संबंध बनाते हैं तो फोरप्ले पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, जबकि उन की पत्नी फोरप्ले के साथ तन्मयता से सैक्स करना चाहती हैं. दिलीप के ऐसा न करने से रूपा और्गेज्म तक नहीं पहुंच पाती. अकसर दोनों में इस बात को ले कर झगड़ा होता है.

क्या है और्गेज्म

और्गेज्म सैक्स संबंध की मजबूत कड़ी है. मैडिकल साइंस के अनुसार सहवास के समय शरीर में होने वाले विभिन्न बदलावों और चरमसुख को ही और्गेज्म कहा जाता है. नईनई शादी होने पर सैक्स करने पर महिलाएं और्गेज्म का लुत्फ नहीं उठा पातीं. पर कुछ समय बाद लगातार सैक्स संबंध बनाने पर और्गेज्म पर पहुंच पाती हैं. सर्वे के अनुसार महिलाओं में फर्स्ट और्गेज्म के लिए सही उम्र 18 साल ही है.

गहरीगहरी सांसें लें:

और्गेज्म के लिए पतिपत्नी के मन में दृढ़शक्ति और जिज्ञासा होनी जरूरी है. इस का आनंद पूरा शरीर उठाता है. इस की शुरुआत सांसों से होती है. सैक्स संबंध के समय सांसों पर ध्यान दें. और्गेज्म के समीप पहुंचने पर गहरी सांसें लें और छोड़े. औक्सीजन शरीर में रक्त प्रवाह को तेज करती है. जितनी औक्सीजन लेते हैं सैक्स सुख उतना ही मजेदार बन जाता है.

सैक्स खिलौना:

सैक्स टौयज की मदद से बिलकुल अलग तरह का आनंद अनुभव होता है. यह और्गेज्म तक पहुंचने का सब से आसान उपाय है. सैक्ससुख को अनुभव करने के लिए सैक्स टौयज की जरूरत नहीं होती है, लेकिन यह सहवास में उत्तेजना बढ़ाने में सहायक होता है.

कल्पनाओं का सहारा लें:

सैक्सी सपने देख कर भी चरमसुख की प्राप्ति होती है. यह सहवास क्रिया को मजेदार और उत्तेजक बनाने में सहायक होता है. यदि पार्टनर के साथ उत्तेजना महसूस नहीं हो रही हो तो ऐसी स्थिति में कल्पना और्गेज्म तक पहुंचाती है.

कामोत्तेजक अंगों से खेलें:

सहवास के दौरान अपने शरीर को ऐक्टिव रखें. ज्यादातर महिलाएं शरीर को कड़ा कर लेती हैं, जो गलत है. और्गेज्म के लिए शरीर का भरपूर इस्तेमाल करें.

अलगअलग आसन अपनाएं:

सहवास करते वक्त केवल साधारण और आसान तरीके से सैक्स न करें पार्टनर के साथ अलगअलग सैक्स आसन अपना कर सहवास करें. ऐसा करने से और्गेज्म तक पहुंचना आसान हो जाता है.

सैक्स क्रिया में शरीर को लिप्त करें:

रिलैक्स रहने की कोशिश करें. संबंध बनाते समय शरीर के 1-1 पार्ट को लिप्त करने की कोशिश करें. कामोत्तेजना के कारण मांसपेशियां सिकुड़ रही हैं तो रिलैक्स रहने की कोशिश करें. फ्रैश मूड से सहवास कर और्गेज्म तक पहुंचें.

फोरप्ले को जगह दें:

सैक्स से पहले चुंबन, स्पर्श, सहलाना, आलिंगन क्रिया करें, क्योंकि इस से कामवासना जाग्रत होती है. डा. चंद्रकिशोर के मुताबिक पुरुषों की सैक्स इच्छा केवल शरीर तक ही सीमित होती है, जबकि महिलाएं सहवास को भावना से जोड़ती हैं. अत: फोरप्ले से और्गेज्म तक पहुंच कर इंटरकोर्स का सही आनंद लें.

हैल्थ चैकअप कराएं: 

यदि ये सब कर के भी सहवास में संतुष्टि नहीं मिल रही है, और्गेज्म तक नहीं पहुंच पा रही हैं, तो तुरंत डाक्टर से चैकअप करवाएं. कई बार ज्यादा दवा का सेवन भी और्गेज्म तक नहीं पहुंचने देता है. और्गेज्म तक न पहुंचने से आपसी रिश्ते खोखले होने लगते हैं. आपस में झगड़े होने लगते हैं, मानसिक तनाव होता है, यहां तक कि मैरिड लाइफ खतरे में पड़ जाती है. इसलिए पतिपत्नी दोनों ऐसे संबंध बनाएं कि दोनों ही चरमोत्कर्ष तक पहुंचें. सैक्स दांपत्य जीवन का अहम हिस्सा है. इसे नजरअंदाज न करें. पतिपत्नी के संबंध को जिस तरह आपसी व्यवहार व सहयोग मधुरता देता है, ठीक उसी तरह सुखी सैक्स भी संबंध को और प्रगाढ़ बनाता है.

सजा के बाद सजा : भाग 3

जज साहब ने विनय को अपनी बेटी की नाबालिग सहेली के साथ बलात्कार करने के लिए 10 साल की सजा सुना दी. वे खुद को बेगुनाह बताते रहे, पर किसी ने उन पर विश्वास नहीं किया. जेल में भी उन के साथ गलत बरताव हुआ. उन्होंने हवलदार के खिलाफ मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करा दी, पर उस के हाथ जोड़ने पर वे पिघल गए. इसी बीच विनय ने अपने घर पर कई चिट्ठियां लिखीं, पर कोई जवाब नहीं आया.

‘विनय को जेल में 10 साल पूरे होने में कुछ समय ही रह गया था. कभीकभी वे सोचते रहते कि 50 साल के उस विनय में ऐसा क्या था कि उन की बेटी की सहेली, जो 17 साल की होगी, उन पर रीझ गई? प्यार था, खिंचाव था या बेहूदा फिल्में?

अगर विनय ‘हां’ कर देते, तो शायद यह नौबत नहीं आती. लेकिन उम्रदराज आदमी आगे की सोचता है और इसी सोच के चलते उन्होंने उसे अपनी बच्ची समझ कर समझाया, लेकिन वह बच्ची नहीं थी. उस में तो जवानी का उफान था. उन्होंने जो किया, ठीक किया. लेकिन उन के मना करते ही वह लड़की घायल नागिन की तरह बिफर गई थी.

उस लड़की ने जा कर सीधे थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. एक अच्छीखासी कहानी बना कर. उस लड़की ने रिपोर्ट में लिखवाया था कि हमेशा की तरह वह अपनी सहेली से मिलने उस के घर गई. सहेली और उस की मां व भाई अचानक अपने मामा के यहां गए थे. घर में अकेले अंकल थे. उन्होंने उसे बिठाया, बताया और जूस पिलाया. जूस में न जाने क्या मिलाया था कि वह बेहोश हो गई. जब होश आया, तो वह लुट चुकी थी.

यह तो ठीक है कि उस दिन विनय की पत्नी और बच्चे मामा के घर गए थे. वह लड़की आई भी थी. उसे जूस भी पिलाया था, लेकिन यह बलात्कार कहां से आ गया. फिर उस के घर वालों के मुताबिक वह रातभर घर नहीं आई थी, तो कहां गई होगी? क्या अपनी सैक्स की आग बुझाने के लिए अपने किसी यार के साथ रातभर रही और सुबह घर पहुंची? तभी तो मैडिकल रिपोर्ट में वीर्य होने की पुष्टि पाई गई थी. लेकिन वह वीर्य किस का था, यह तो साफ नहीं हुआ था.

जज ने भी माना कि एक नाबालिग लड़की क्यों झूठ बोलेगी? वह 50 साल के बूढ़े को क्यों फंसाना चाहेगी? उस लड़की के मातापिता ने कहा था कि उन की लड़की अपनी सहेली के घर हमेशा पढ़ने जाती थी. आसपड़ोस का मामला था. लड़की अकसर रात में सहेली के घर रुक भी जाती थी. वह उस दिन भी बोल कर गई थी कि सहेली के घर जा रही है, फिर अकेली लड़की और कहीं रात में कैसे जा सकती है और क्यों?

यह भी साबित हो गया था कि उस रात विनय का परिवार घर पर नहीं था. वे अकेले थे. साफ था कि बलात्कार करने वाले वही थे. विनय ने बताया कि लड़की सैक्स करना चाहती थी और उन्होंने मना कर दिया, तो गुस्से में लड़की यह आरोप लगा रही है. उन्होंने तो उसी समय उसे अपने घर से बाहर कर दिया था.

ये बातें सुन कर विपक्ष का वकील क्या, मजिस्ट्रेट, खुद विनय का वकील भी हंसने लगा था. उन का सच कितना खोखला साबित हुआ था. अच्छे चालचलन के चलते विनय की रिहाई समय से पहले ही आ गई. शायद साढ़े 9 साल के बाद विनय जब जेल के बड़े दरवाजे से बाहर निकलने लगे, तो वही हवलदार मिला, जो कभी उन्हें गालियां दे कर बेइज्जत करता था. वह अब सबइंस्पैक्टर की पोस्ट पर था.

उस ने हंस कर कहा, ‘‘रिहाई की बधाई हो भाई.’’ ‘‘जी सर, पर आप से एक बात कहूं. अब तो मैं ने पूरी सजा भी काट ली, लेकिन मैं ने कोई बलात्कार नहीं किया था. वह मेरी बेटी की सहेली थी. मैं ने उस से कभी उस की जाति भी नहीं पूछी थी,’’ यह बात विनय ने इतनी पीड़ा भरी आवाज में कही कि उस हवलदार बने इंस्पैक्टर की भी आंखें भर आईं.

उस ने कहा, ‘‘मुझे आप की बात पर पूरा भरोसा है. मैं ने आप की जो बेइज्जती की थी, वह गुस्से में आ कर की थी. बाकी कुछ भी न सोचा. जब मेरे साथ गुजरी, तो समझ आया कि धर्म और जाति से ऊपर सब से बड़ी जाति एक ही है, औरत जाति और मर्द जाति. मुझे माफ कर देना.’’ विनय बाहर आ कर अपनी ससुराल गए, तो पहला धक्का उन्हें तब लगा, जब पता चला कि उन की पत्नी को गुजरे काफी समय हो गया है. उन्होंने पूछा, ‘‘मुझे क्यों नहीं बताया गया? क्यों नहीं बुलाया गया?’’

उन के साले ने शांत लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें बुलाने के लिए कोर्ट की इजाजत लेनी पड़ती, फिर कोई सिपाही तुम्हें हथकड़ी में बांध कर लाता. फिर नए सिरे से बहस और बातें शुरू हो जातीं.’’ ‘‘मेरी बेटी कहां है?’’ विनय ने रो कर पूछा.

साले ने कहा, ‘‘उस का कहीं भी रिश्ता नहीं हो पा रहा था. हम जहां रिश्ता ले कर जाते, आप की बदनामी पहले पहुंच जाती. आखिर में हम ने यह कहना शुरू कर दिया कि इस का बाप मर गया है. दहेज देने को था नहीं. आखिरकार सब ने मिल कर तय किया और उस की शादी एक विधुर से करा दी, जिस का पहले से एक बच्चा था. ‘‘आप से निवेदन है कि अगर अपनी बेटी की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहते, तो उस से मिलने की कोशिश भी मत करना.’’

विनय की आंखों में आंसू आ गए. किस गुनाह की सजा मिल रही है उन्हें? क्या उन की सजा अभी खत्म नहीं हुई है? क्या वे 6 महीने पहले छूट जाने का हर्जाना भर रहे हैं? विनय ने अपने बेटे के बारे में पूछा, तो उन्हें बेटे का पता दे दिया गया. लेकिन कोई उन के साथ जाने को तैयार नहीं हुआ.

विनय पता ले कर बेटे के घर की तरफ निकल पड़े. उन्हें अपने साले से ही पता चला कि बेटा एक अच्छी सरकारी नौकरी में है. उस की शादी भी हो चुकी है. वह एक बेटी का पिता भी है. उन्होंने दरवाजे पर खड़े दरबान से कहा, ‘‘साहब से कहो कि उन के पिताजी आए हैं.’’

दरबान ने यह बात भीतर जा कर कही, तो बेटे ने दरबान से कहा, ‘‘उन्हें मेरे दफ्तर का पता दे कर वहीं मिलने को कहो.’’ जब दरबान ने विनय से यह बात कही, तो उन्हें तगड़ा झटका लगा. वे वहीं गश खा कर गिरतेगिरते बचे. वे समझ गए कि बेटा उन से बच रहा है.

विनय ने सोचा भी कि बेटा उन से नहीं मिलना चाहता, तो वे क्यों उस के दफ्तर जाएं. लेकिन उन के पास न रुपएपैसे थे और न कोई ठिकाना. फिर पिता का दिल था. वे चाहते थे कि एक बार अपने बेटे की शक्ल तो देख लें. विनय बेटे के दफ्तर पहुंचे. पिता को देख कर उस ने उन्हें अपने केबिन में बुलाया और बेमन से पैर छूने की कोशिश की.

यह देख कर विनय की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने बेटे को गले लगाने की सोची कि इतने में वह अपनी कुरसी पर बैठ गया. उस ने घंटी बजा कर चपरासी को चाय लाने के लिए कहा. पिताबेटे की आपस में आंखें मिलीं. बेटे ने पूछा, ‘‘आप कब छूटे?’’

‘‘कल ही.’’ ‘‘मेरा पता किस ने दिया?’’ बेटे के पूछने से साफ जाहिर हो रहा था कि वह नहीं चाहता था कि पिता को उस का पता भी लगे.

‘‘तुम्हारे मामा ने,’’ पिता ने कहा. ‘‘ओह, मामाजी भी…’’ कुछ बुदबुदाते हुए बेटे ने कहा.

‘‘क्या…?’’ विनय ने पूछा. ‘‘जी, कुछ नहीं,’’ बेटे ने कहा.

कुछ देर की चुप्पी के बाद बेटे ने कहा, ‘‘देखिए, मैं एक अच्छी नौकरी पर हूं. घर में एक बेटी है, मेरी पत्नी है. हम ने सब को यही बताया है कि मेरे पिता नहीं हैं. अब आप के बारे में पता चलेगा, तो मेरे ससुराल वाले क्या कहेंगे. लोग गड़े मुरदे उखाड़ेंगे, फिर तमाशा होगा. मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक

नहीं रहूंगा.’’ ‘‘लेकिन बेटा, तुम तो जानते हो कि मैं बेकुसूर हूं,’’ विनय ने अपनी सफाई

में कहा. ‘‘मेरे जानने या मानने से क्या होता है? पुलिस ने आप को मुलजिम बनाया. अदालत ने आप को मुजरिम. आप सजा काट कर आए हैं. प्रैस, मीडिया, समाज, रिश्तेदार आप किसकिस को सफाई देंगे. फिर उस रात हम लोग घर पर नहीं थे. क्या हुआ था, हमें क्या पता?’’

बेटे के मुंह से आखिरी शब्द सुन कर विनय की आंखों में आंसू आ गए. विनय उठने लगे, तो बेटे ने कहा, ‘‘आप किसी वृद्धाश्रम में रह लें. मैं सारा बंदोबस्त कर दूंगा. लेकिन आप किसी को बताना नहीं कि आप से मेरा क्या रिश्ता है और न ही अपने गुनाह के बारे में बताना.’’

विनय कुरसी से उठने लगे और बोले, ‘‘कौन सा गुनाह? वह गुनाह, जो मैं ने किया ही नहीं. वृद्धाश्रम में ही रहना है, तो किसी भी शहर में रह लूंगा. जब अपना खून ही भरोसा नहीं कर रहा, तो फिर किसी को क्या सफाई देनी…’’ विनय ने जाते हुए पूछा, ‘‘क्या तुम उस लड़की का पता बता सकते हो, जिस ने मुझे जेल भिजवाया था?’’

बेटे ने विनय के हाथ में कुछ रुपए थमा कर कहा, ‘‘उस लड़की ने अपने किसी प्रेमी को धोखा देने पर उसे फंसाने के लिए पूरे घर के सामने मिट्टी का तेल डाल कर खुद को जलाने का नाटक किया था, लेकिन वह जल कर अस्पताल में भरती हो गई.’’

‘‘मरतेमरते वह यह बयान दे कर मरी कि प्रेमी से तंग आ कर उस ने आत्महत्या की कोशिश की. पुलिस ने धारा 302 के आरोप में लड़के को जेल भिजवा दिया.’’ विनय बाहर आ कर सोच रहे थे, ‘मेरी तो जिंदगी बरबाद कर ही दी, मरतेमरते उस ने दूसरे को भी जेल भिजवा दिया.’

ऐसे लोगों का अंत ऐसा ही होता है. अदालतों को इस बात पर गौर करना चाहिए. मरने वाले के बयान भी झूठे हो सकते हैं, क्योंकि मरता हुआ शख्स, जिसे कानून मरने वाले का आखिरी बयान मानती है, झूठ बोल सकता है. क्योंकि जब वह बयान देता है, तो जिंदा होता है. तो फिर वह मरने वाले का सच्चा बयान कैसे हुआ? कानून को यह भी सोचना चाहिए कि अगर कोई नाबालिग लड़की बलात्कार की झूठी कहानी नहीं गढ़ सकती, तो घरपरिवार, नौकरी वाला

50 साल की उम्र का क्यों और कैसे बलात्कार कर सकता है, जबकि इस उम्र में न वह जोश होता है,

न जुनून. फिर विनय ने ऐसे केस भी तो देखे हैं कि लड़की ने अपनी मरजी से लड़के के साथ रात गुजारी, फिर शादी का दबाव बनाने लगी. शादी के लिए मना किया, तो लड़के को बलात्कारी बना दिया.

लड़की के अंग में लड़के का वीर्य पाए जाने का मतलब यह तो नहीं कि उस ने बलात्कार किया हो. अपनी मरजी से रात गुजारी, फिर बलात्कार का आरोप लगा दिया. ऐसे मामलों में न जाने कितने लड़के जेल में पड़े हैं. वही लड़की फिर बयान से मुकरने के लिए लाखों रुपए मांग रही है. समय बदल गया है. सोच बदल गई है. बालिग होने की उम्र भी बदलनी चाहिए. कानून के नुमाइंदों को हर पहलू पर सोच कर धाराएं लगानी चाहिए. एससी और एसटी ऐक्ट लगाने से, मीडिया की जातिगत टिप्पणी से समाज में गुस्सा फैलने लगता है. अगड़ेपिछड़ों में तनाव बढ़ता है.

विनय ने तो उस लड़की को कभी अपने घर पर आने से भी नहीं रोका. उसे केवल अपनी बेटी की सहेली माना और कानून ने उन पर एससी, एसटी ऐक्ट लगा दिया. विनय को लगा कि उन की असली सजा तो अब शुरू हुई है. समाज की सजा. अकेले भटकने की सजा. अपनों द्वारा मुंह मोड़ने की सजा और ये सजाएं तो उन की सब से बड़ी सजाएं थीं, जो तन से ज्यादा मन भोग रहा था. यह कभी न खत्म होने वाली सजा थी.

इतना सोचतेसोचते विनय को पता भी नहीं चला कि कब वे एक ट्रक की चपेट में आ गए. उन का बूढ़ा जिस्म अब लाश में बदल चुका था.

बोया पेड़ बबूल का : मांबेटी का द्वंद्व- भाग 3

एक दिन पिताजी ने दुखी हो कर कहा था, ‘संगीता, जिन संबंधों को बना नहीं सकते उन्हें ढोने से क्या फायदा. इस से बेहतर है कि कानूनी तौर पर अलग हो जाओ.’ इस बात का मां और भैया ने जम कर विरोध किया.

मां का कहना था कि यदि मेरी बेटी सुखी नहीं रह सकती तो मैं उसे भी सुखी नहीं रहने दूंगी. तलाक देने का मतलब है वह जहां चाहे रहे और ऐसा मैं होने नहीं दूंगी.

मुझे भी लगा यही ठीक निर्णय है. पिताजी इसी गम में दुनिया से ही चले गए और साल बीततेबीतते मां भी नहीं रहीं. मैं ने कभी सोचा भी न था कि मैं भी कभी अकेली हो जाऊंगी.

मैं ने अब तक अपनेआप को इस घर में व्यवस्थित कर लिया था. सुबह भाभी के साथ नाश्ता बनाने के बाद कालिज चली जाती. शाम को मेरे आने के बाद वह बच्चों में व्यस्त हो जातीं. मैं मन मार कर अपने कमरे में चली जाती. भैया के आने के बाद ही हम लोग पूरे दिन की दिनचर्या डायनिंग टेबल पर करते. मेरा उन से मिलना बस, यहीं तक सिमट चुका था.

जयपुर के निकट एक गांव में पति द्वारा पत्नी पर किए गए अत्याचारों की घटना की उस दिन बारबार टीवी पर चर्चा हो रही थी. खाना खाते हुए भैया बोले, ‘ऐसे व्यक्तियों को तो पेड़ पर लटका कर गोली मार देनी चाहिए.’

‘तुम अपना खाना खाओ,’ भाभी बोलीं, ‘यह काम सरकार का है, उसे ही करने दो.’

‘सरकार कुछ नहीं करती. औरतों को ही जागरूक होना चाहिए. अपनी संगीता को ही देख लो, संदीप को ऐसा सबक सिखाया है कि उम्र भर याद रखेगा. तलाक लेना चाहता था ताकि अपनी जिंदगी मनमाने ढंग से बिता सके. हम उसे भी सुख से नहीं रहने देंगे,’ भैया ने तेज स्वर में मेरी ओर देखते हुए कहा, ‘क्यों संगीता.’

‘तुम यह क्यों भूलते हो कि उसे तलाक न देने से खुद संगीता भी कभी अपना घर नहीं बसा सकती. मैं ने तो पहले ही इसे कहा था कि इस खाई को और न बढ़ाओ. तब मेरी सुनी ही किस ने थी. वह तो फिर भी पुरुष है, कोई न कोई रास्ता तो निकाल ही लेगा. वह अकेला रह सकता है पर संगीता नहीं.’

‘मैं क्यों नहीं घर बसा सकती,’ मैं ने प्रश्नवाचक निगाहें भाभी पर टिका दीं.

‘क्योंकि कानूनी तौर पर बिना उस से अलग हुए तुम्हारा संबंध अवैध है.’

भाभी की बातों में कितना कठोर सत्य छिपा हुआ था यह मैं ने उस दिन जाना. मुझे तो जैसे काठ मार गया हो.

उस रात नींद आंखों से दूर ही रही. मैं यथार्थ की दुनिया में आ गिरी. कहने के लिए यहां अपना कुछ भी नहीं था. मैं अब अपने ही बनाए हुए मकड़जाल में पूरी तरह फंस चुकी थी.

इस तनाव से मुक्ति पाने के लिए मैं ने एक रास्ता खोजा और वहां से दूर रहने लायक एक ठिकाना ढूंढ़ा. किसी का कुछ नहीं बिगड़ा और मैं रास्ते में अकेली खड़ी रह गई.

मेरी जिंदगी की दूसरी पारी शुरू हो चुकी थी. जाने वह कैसी मनहूस घड़ी थी जब मां की बातों में आ कर मैं ने अपना बसाबसाया घर उजाड़ लिया था. फिर से जिंदगी जीने की जंग शुरू हो गई. मैं ने संदीप को ढूंढ़ने का निर्णय लिया. जितना उसे ढूंढ़ती उतना ही गम के काले सायों में घिरती चली गई.

उस के आफिस के एक पुराने कुलीग से मुझे पता चला कि उस दिन जो युवती संदीप से मिलने घर आई थी वह उस के विभाग की नई हेड थी. संदीप चाहता था कि उसे अपना घर दिखा सके ताकि कंपनी द्वारा दी गई सुविधाओं को वह भी देख सके. किंतु उस दिन की घटना के बाद मैं ने फोन से जो कीचड़ उछाला था वह संदीप की तरक्की के मार्ग को बंद कर गया. वह अपनी बदनामी का सामना नहीं कर पाया और चुपचाप त्यागपत्र दे दिया. यह उस का मुझ से विवाह करने का इनाम था.

फिर तो मैं ने उसे ढूंढ़ने के सारे यत्न किए, पर सब बेकार साबित हुए. मैं चाहती थी एक बार मुझे संदीप मिल जाए तो मैं उस के चरणों में माथा रगड़ूं, अपनी गलती के लिए क्षमा मांगूं, लेकिन मेरी यह इच्छा भी पूरी नहीं हुई. न जाने किस सुख के प्रलोभन के लिए मैं उस से अलग हुई. न खुद ही जी पाई और न उस के जीने के लिए कोई कोना छोड़ा.

अब जब जीवन की शाम ढलने लगी है मैं भीतर तक पूरी तरह टूट चुकी हूं. उस के एक परिचित से पता चला था कि वह तमिलनाडु के सेलम शहर में है और आज इस पत्र के आते ही मेरा रहासहा उत्साह भी ठंडा हो गया.

कोई किसी की पीड़ा को नहीं बांट सकता. अपने हिस्से की पीड़ा मुझे खुद ही भोगनी पड़ेगी. मन के किसी कोने में छिपी हीन भावना से मैं कभी छुटकारा नहीं पा सकती.

पहली बार महसूस किया कि मैं ने वह वस्तु हमेशा के लिए खो दी है जो मेरे जीवन की सब से महत्त्वपूर्ण निधि थी. काश, संदीप कहीं से आ जाए तो मैं उस से क्षमादान मांगूं. वही मुझे अनिश्चितताओं के इस अंधेरे से बचा सकता है.

प्यार अपने से: जब प्यार ने तोड़ी मर्यादा- भाग 3

संध्या ने कोई जवाब नहीं दिया. इसी बीच एक बार सोमेन के दोस्त ने उन्हें खबर दी कि उस ने रिया और गोपाल को एकसाथ सिनेमाघर से निकलते देखा है.

इस के कुछ ही दिनों बाद संध्या के रिश्ते के एक भाई ने बताया कि उस ने गोपाल और रिया को रैस्टौरैंट में लंच करते देखा है.

सोमेन ने अपनी पत्नी संध्या से कहा, ‘‘रिया और गोपाल दोनों को कई बार सिनेमाघर या होटल में साथ देखा गया है. उसे समझाओ कि उस के लिए अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं. सिर्फ उस के हां कहने की देरी है.’’

संध्या बोली, ‘‘रिया ने मुझे बताया था कि वह गोपाल से प्यार करती है.’’

सोमेन चौंक पड़े और बोले, ‘‘क्या? रिया और गोपाल? यह तो बिलकुल भी नहीं हो सकता.’’

अगले दिन सोमेन ने रिया से कहा, ‘‘बेटी, तेरे रिश्ते के लिए काफी अच्छे औफर हैं. तू जिस से बोलेगी, हम आगे बात करेंगे’’

रिया ने कहा, ‘‘पापा, मैं बहुत दिनों से सोच रही थी कि आप को बताऊं कि मैं और गोपाल एकदूसरे को चाहते हैं. मैं ने मम्मी को बताया भी था कि पीजी पूरा कर के मैं शादी करूंगी.’’

‘‘बेटी, कहां गोपाल और कहां तुम? उस से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, उसे भूल जाओ. अपनी जाति के अच्छे रिश्ते तुम्हारे सामने हैं.’’

‘‘पापा, हम दोनों पिछले 5 सालों से एकदूसरे को चाहते हैं. आखिर उस में क्या कमी है?’’

‘‘वह एक आदिवासी है और हम ऊंची जाति के शहरी लोग हैं.’’

‘‘पापा, आजकल यह जातपांत, ऊंचनीच नहीं देखते. गोपाल भी एक अच्छा डाक्टर है और उस से भी पहले बहुत नेक इनसान है.’’

सोमेन ने गरज कर कहा, ‘‘मैं बारबार तुम्हें मना कर रहा हूं… तुम समझती क्यों नहीं हो?’’

‘‘पापा, मैं ने भी गोपाल को वचन दिया है कि मैं शादी उसी से करूंगी.’’

उसी समय संध्या भी वहां आ गई और बोली, ‘‘अगर रिया गोपाल को इतना ही चाहती है, तो उस से शादी करने में क्या दिक्कत है? मुझे तो गोपाल में कोई कमी नहीं दिखती है.’’

सोमेन चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे जीतेजी यह शादी नहीं हो सकती. मैं तो कहूंगा कि मेरे मरने के बाद भी ऐसा नहीं करना. तुम लोगों को मेरी कसम.’’

रिया बोली, ‘‘ठीक है, मैं शादी ही नहीं करूंगी. तब तो आप खुश हो जाएंगे.’’

सोमेन बोले, ‘‘नहीं बेटी, तुझे शादीशुदा देख कर मुझे बेहद खुशी होगी. पर तू गोपाल से शादी करने की जिद छोड़ दे.’’

‘‘पापा, मैं ने आप की एक बात मान ली. मैं गोपाल को भूल जाऊंगी. परंतु आप भी मेरी एक बात मान लें, मुझे किसी और से शादी करने के लिए मजबूर नहीं करेंगे.’’

ये बातें फिलहाल यहीं रुक गईं. रात में संध्या ने पति सोमेन से पूछा, ‘‘क्या आप बेटी को खुश नहीं देखना चाहते हैं? आखिर गोपाल में क्या कमी है?’’

सोमेन ने कहा, ‘‘गोपाल में कोई कमी नहीं है. उस के आदिवासी होने पर भी मुझे कोई एतराज नहीं है. वह सभी तरह से अच्छा लड़का है, फिर भी…’’

रिया को नींद नहीं आ रही थी. वह भी बगल के कमरे में उन की बातें सुन रही थी. वह अपने कमरे से बाहर आई और पापा से बोली, ‘‘फिर भी क्या…? जब गोपाल में कोई कमी नहीं है, फिर आप की यह जिद बेमानी है.’’

सोमेन बोले, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तेरी शादी गोपाल से हो.’’

‘‘नहीं पापा, आखिर आप के न चाहने की कोई तो ठोस वजह होनी चाहिए. आप प्लीज मुझे बताएं, आप को मेरी कसम. अगर कोई ऐसी वजह है, तो मैं खुद ही पीछे हट जाऊंगी. प्लीज, मुझे बताएं.’’

सोमेन बहुत घबरा उठे. उन को पसीना छूटने लगा. पसीना पोंछ कर अपनेआप को संभालते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह शादी इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि…’’

वे बोल नहीं पा रहे थे, तो संध्या ने उन की पीठ सहलाते हुए उन को हिम्मत दी और कहा, ‘‘हां बोलिए आप, क्योंकि… क्या?’’

सोमेन बोले, ‘‘तो लो सुनो. यह शादी नहीं हो सकती है, क्योंकि गोपाल रिया का छोटा भाई है.

‘‘जब मैं हजारीबाग में अकेला रहता था, तब मुझ से यह भूल हो गई थी.’’

रिया और संध्या को काटो तो खून नहीं. दोनों हैरानी से सोमेन को देख रही थीं. रिया की आंखों से आंसू गिरने लगे. कुछ देर बाद वह सहज हुई और अपने कमरे में चली गई.

रात में ही उस ने गोपाल को फोन कर के कहा, ‘‘गोपाल, क्या तुम मुझ से सच्चा प्यार करते हो?’’

गोपाल बोला, ‘क्या इतनी रात गए यही पूछने के लिए फोन किया है?’

‘‘तुम ने सुना होगा कि प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं है, इस में कभी खोना भी पड़ता है.’’

गोपाल ने कहा, ‘हां, सुना तो है.’’

‘‘अगर यह सही है, तो तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी. बोलो मानोगे?’’ रिया बोली.

गोपाल बोला, ‘यह कैसी बात कर रही हो आज? तुम्हारी हर जायज बात मैं मानूंगा.’

‘‘तो सुनो. बात बिलकुल जायज है, पर मैं इस की कोई वजह नहीं बता सकती हूं और न ही तुम पूछोगे. ठीक है?’’

‘ठीक है, नहीं पूछूंगा. अब बताओ तो सही.’

रिया बोली, ‘‘हम दोनों की शादी नहीं हो सकती. यह बिलकुल भी मुमकिन नहीं है. वजह जायज है और जैसा कि मैं ने पहले ही कहा है कि वजह न मैं बता सकती हूं, न तुम पूछना कभी.’’

गोपाल ने पूछा, ‘तो क्या हमारा प्यार झूठा था?’

रिया बोली, ‘‘प्यार सच्चा है, पर याद करो, हम ने तय किया था कि शादी नहीं होने तक हमारा प्यार ‘अधूरा प्यार’ रहेगा. बस, यही समझ लो.

‘‘अब तुम कहीं भी शादी कर लो, पर मेरातुम्हारा साथ बना रहेगा और तुम चाहोगे भी तो भी मैं कभी भी तुम्हारे घर आ धमकूंगी,’’ इतना कह कर रिया ने फोन रख दिया.

सच्ची श्रद्धांजलि: विधवा निर्मला ने क्यों की थी दूसरी शादी?- भाग 3

राजेश ने मेरे कंधों पर हाथ रखते हुए बड़े धैर्य से जवाब दिया, ‘‘यदि नहीं मिलना चाहेंगे या हमारा अपमान करेंगे, हम तुरंत लौट आएंगे और फिर दोबारा उन के पास नहीं जाएंगे. हम यही समझ लेंगे कि मम्मी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं और पापा से अब हमारा कोई संबंध नहीं है.’’

मैं चुपचाप राजेश की बातें सुन रही थी.

‘‘तुम्हें मुझ से वादा करना होगा कि तुम उस के बाद पापा की चिंता करना छोड़ दोगी,’’ उन्होंने बड़े प्यार से कहा, ‘‘मुझ से मेरी बीवी उदास और बुझीबुझी देखी नहीं जाती इसलिए एक बार तो यह रिस्क लेना ही होगा. एक बार चल कर देखना ही होगा.’’

हम जब पापा के पास पहुंचे उस समय सुबह के लगभग 8 बज रहे थे. पापा बागबानी में लगे हुए थे. हमें देखते ही गेट तक आए और बोले, ‘‘अरे, तुम लोग बिना खबर दिए आए, खबर करते तो मैं स्टेशन आ जाता.’’

राजेश ने धीरे से मुझ से कहा, ‘‘रिया, गुस्से को जब्त रखना और अपनी तरफ से कुछ भी अपमानजनक नहीं करना,’’ राजेश ने टैक्सी से निकलते हुए कहा, ‘‘अचानक ही प्रोग्राम बन गया इसलिए चले आए,’’ मैं अपने क्रोध को किसी तरह रोकने की कोशिश कर रही थी, फिर भी मुंह से निकल ही गया, ‘‘हमें लगा, आप को फुरसत कहां होगी, फिर हमें लाने की आप को अनुमति मिले न मिले.’’

पापा कुछ भी न बोले. हमें अंदर लिवा लाए और बोले, ‘‘निम्मो, देखो कौन आया है?’’

पापा के मुंह से निम्मो सुन मैं अंदर ही अंदर तिलमिला गई. निर्मला आंटी तुरंत हाथ पोंछती हुई हमारे पास आ गईं, शायद किचन में थीं. आते ही बोलीं, ‘‘अरे बेटी रिया, कैसी हो? राजेश, रिंकू तुम सभी को देख कर बहुत खुशी हो रही है,’’ फिर रिंकू को दुलारते हुए बोलीं, ‘‘तुम लोग फ्रैश हो लो, मैं नाश्ते की तैयारी करती हूं. हम सभी साथ ही नाश्ता करेंगे.’’

मैं ने कुछ भी नहीं कहा. अपना मायका आज मुझे अपना सा लग ही नहीं रहा था. चुपचाप हम ने थोड़ाथोड़ा नाश्ता कर लिया. निर्मला आंटी ने राजेश के पसंद के आलू के परांठे बनाए थे तथा रिंकू की पसंद की गाढ़ी सेंवइयां भी बनाई थीं.

पापा का बैडरूम वैसा ही था जैसा मम्मी के समय रहता था. घर की साजसज्जा भी वैसी ही थी, जैसी मम्मी के समय रहती थी. परदे, चादरें सब मम्मी की पसंद के ही लगे हुए थे. बैडरूम में मम्मी की बड़ी सी तसवीर लगी हुई, उस पर सुंदर सी माला पड़ी हुई थी. मुझे मायके आए हुए 2 दिन हो चुके थे. निर्मला आंटी से मैं ने कोई बात नहीं की थी. पापा से भी कुछ खास बात नहीं हुई थी. शाम को पापा रिंकू को ले कर घूमने निकले थे, मैं और राजेश टैरेस पर गुमसुम बैठे हुए थे, तभी निर्मला आंटी आईं और मेरे हाथ में एक कागज थमाते हुए बोलीं, ‘‘बेटी रिया, इसे पढ़ लो. मैं खाना बनाने जा रही हूं. क्या खाना पसंद करोगी, बता देतीं तो अच्छा रहता.’’

मैं ने बेरुखी से कहा, ‘‘जो आप की इच्छा, हम लोगों को खास भूख नहीं है.’’

वे चली गईं. तब मैं ने कटाक्ष करते हुए राजेश से कहा, ‘‘खाना हमारी पसंद से बनेगा और शादी के समय हमारी पसंद कहां गई थी? हुंह, बात बनाना भी कोई इन से सीखे. कितनी बेशर्मी से नाटक जारी है,’’ कहते हुए मैं ने बेमन से कागज खोला, यह तो मम्मी का पत्र था :

प्यारी प्यारी निम्मो,

आज मैं तुझ से अपनी हेमेश की कसम तोड़ने की इजाजत लेते हुए पुनर्विवाह की बात कर रही हूं. आशा करती हूं, मेरी अंतिम इच्छा पूरी करने से ‘न’ नहीं करेगी. मेरी तो विदाई की वेला आ गई है. तुझ से, हेमेश से, बेटी रिया, राजेश, रिंकू सभी से इच्छा न होते हुए भी विदा तो मुझे होना ही पड़ेगा.

एक दिन मैं ने हेमेश और डाक्टर की बातें सुन ली थीं. मुझे अपनी बीमारी का हाल मिल गया था. मैं अच्छी तरह समझ चुकी थी कि मैं चंद दिनों की मेहमान हूं. मैं ने सब से नजर बचा कर यह पत्र लिखा क्योंकि अपनी अंतिम इच्छा बताना जरूरी था. मन की बात तुम लोगों को बताए बिना भी तो मेरी आत्मा को शांति न मिल सकेगी.

मेरे बाद हेमेश एकदम अकेले हो जाएंगे. तू भी अब रिटायर होने वाली है. मेरे हेमेश को अपना लेना. दोनों एकदूसरे का सहारा बन जाना. हेमेश को तो जानती ही है, अपनी सेहत के प्रति कितने लापरवाह रहते हैं, तू रहेगी तो उन्हें वक्त पर हर चीज मिलेगी. प्यारी निम्मो, हेमेश की साली साहिबा से बीवी साहिबा बन जाना.

रिया बेटी मेरे जाने से बहुत दुखी होगी. फिर धीरेधीरे रियाराजेश अपनी जिंदगी, अपनी गृहस्थी में मन लगा लेंगे. उन की आंटी से उन की मम्मी बन जाना. मेरी बेटी का मायका पूर्ववत बना रहेगा.

थक गई हूं, अब लिखा नहीं जा रहा है. बोल देती हूं, तुम दोनों की शादी ही तुम दोनों की तरफ से मेरे लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

तेरी,

हेमू

पत्र पढ़ कर मेरी आंखों से आंसू गिरने लगे. राजेश ने भी मेरे साथ ही पत्र पढ़ लिया था. उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और बोले, ‘‘चलो, सारी गलतफहमियां दूर हो गईं. चल कर देखें मम्मी क्या कर रही हैं?’’

हम लोग किचन में गए. देखा, निर्मला आंटी खाना बनाने में व्यस्त थीं. पापा भी किचन में ही थे. वे सलाद काट रहे थे. मैं निर्मला आंटी के पास गई तथा बोली, ‘‘क्या बना रही हैं, मम्मी?’’

निर्मला आंटी की आंखें डबडबा आईं. उन्होंने प्यार से मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया फिर धीरे से कहा, ‘‘हेमेश और मेरा शादी करने का एकदम मन नहीं था. हम ने कभी एकदूसरे को इस नजर से देखा ही नहीं था लेकिन हेमू की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए शादी करनी पड़ी. मंदिर में तुम्हारे बूआ, फूफा की उपस्थिति में हम ने एकदूसरे को माला पहनाई, हेमेश ने मेरी सूनी मांग में सिंदूर भर दिया, हो गई शादी. तुम्हारी नीता बूआ ने मिठाई खिला हमारा मुंह मीठा कराया.’’

मैं चुपचाप उन्हें देखे जा रही थी.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘तुम्हें बताने की हिम्मत मुझ में और हेमेश में न थी.

तुम्हें बताने की जिम्मेदारी नीता ने ली, उस ने तुम्हें सारी बातें बताने की कोशिश की, लेकिन तुम ने उस के फोन काट दिए, बात नहीं सुनी उस की. वैसे बेटा, तुम ने भी वही किया जो एक बेटी अपनी मम्मी को खोने के बाद इस तरह की खबर सुन कर करेगी, हमें तुम से…’’

मैं ने बीच में ही निर्मला आंटी की बात काटते हुए कहा, ‘‘आप लोगों से माफी मांगने लायक तो नहीं हूं, लेकिन फिर भी हो सके तो मुझे माफ कर दीजिए. सौरी मम्मी, सौरी पापा.’’

मम्मीपापा दोनों ने आगे बढ़ कर मुझे गले से लगा लिया. मैं ने देखा राजेश, रिंकू को गोद में लिए पूरी तरह संतुष्ट नजर आ रहे थे. वे भी मुझ से नजर मिलते ही मुसकरा दिए. इस दौरान एक विचार दिल और दिमाग को लगातार मथ रहा था कि दो उदास और तन्हा प्राणियों को एक कर जीने का मौका देना क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता है? इस विचार के आते ही मम्मी के प्रति श्रद्धा से सिर झुक गया.

रफू की हुई ओढ़नी : घूमर वाली मेघा – भाग 3

“तुम्हें भी शहर की हवा लग गई लगती है,” एक रोज मेघा ने सिगरेट के छल्ले उड़ाते विनोद से पूछा.

“जैसा देस, वैसा भेष,” विनोद ने एक हिंदी फिल्म का नाम लिया और हंस दिया.

“बिना भेष बदले क्या उस देस में रहने नहीं दिया जाता?” मेघा ने फिर पूछा जिस का जवाब विनोद को नहीं सूझा. वह चुपचाप नाक से धुआं खींचता मुंह से निकालता रहा.

मेघा चाह तो रही थी कि उस के हाथ से सिगरेट खींच ले लेकिन किस अधिकार से? बेशक विनोद के प्रति उस की कोमल भावनाएं हैं लेकिन इकतरफा भावनाओं की क्या अहमियत. मेघा पराजित सी खड़ी थी.

कुछ खास मौके ऐसे होते हैं जो महानगरों में बड़े शोरशराबे के साथ मनाए जाते हैं, वही छोटे शहर के लोग इन्हें हसरत के साथ ताका करते हैं. वैलेंटाइन डे भी ऐसा ही खास दिन है जिस का युवा दिलों को सालभर से इंतजार रहता है. मेघा भी बहुत उत्साहित थी कि उसे भी यह सुनहरा मौका मिला है जब वह प्रत्यक्ष रूप से इस अवसर की साक्षी बनने वाली है. अन्य लड़कियों की तरह वह गुलाब इकट्ठे करने वाली भीड़ का हिस्सा तो नहीं बन रही थी लेकिन एक गुलाब की प्रतीक्षा तो उसे भी थी ही.

प्रेम दिवस पर पूरे कालेज में गहमागहमी थी. लड़कियां बड़े मनोयोग से सजीसंवरी थी तो लड़के भी कुछ कम नहीं थे. किसी के हाथ में गुलाब तो किसी के पास चौकलेट, कोई टैडीबीयर हाथ में थामे था तो कोई मंदमंद मुसकान के साथ कार्ड में लिखे जज्बात पढ़ रहा था.

कोई जोड़ा कहीं किसी कैंटीन में सटा बैठा था तो कोई किसी कार की पिछली सीट पर प्रेमालाप में मगन था. कुछ जोड़े मोटरसाइकिल पर ऐसे चिपक कर घूम रहे थे कि मेघा को झुरझुरी सी हो आई. मेघा की आंखें ये नजारे देखदेख कर चकाचौंध हुई जा रही थी.

सुबह से दोपहर होने को आई लेकिन विनोद का कहीं अतापता नहीं था.

‘मेरे लिए गुलाब या गिफ्ट लेने गया होगा,’ से ले कर ‘पता नहीं कहां चला गया’ तक के भाव आ कर चले गए. लेकिन नहीं आया तो केवल विनोद.

‘क्यों न चल कर मैं ही मिल लूं,” सोचते हुए मेघा ने कालेज के बाहर अस्थाई रूप से लगी फूलों की दुकान से पीला गुलाब खरीदा और विनोद की तलाश में डिपार्टमैंट की तरफ चल दी.

“अभीअभी विनय के साथ निकला है,” किसी ने बताया.

विनय उन दोनों का कौमन फ्रैंड है. असाइनमैंट बनाने के चक्कर में तीनों कई बार विनय के कमरे पर मिल चुके हैं. मेघा सोच में पड़ गई.

‘क्या किया जाए, इंतजार या फिर विनय के कमरे पर धावा…’ आखिर मेघा ने विनोद को सरप्राइज देना तय किया और विनय के रूम पर जाने के लिए औटो में बैठ गई.

दिल उछल कर बाहर आने की कोशिश में था. औटो की खड़खड़ भी धड़कनों के शोर को दबा नहीं पा रही थी. पीला गुलाब उस ने बहुत सावधानी के साथ पकड़ा हुआ था. कहीं हवा के झोंके से पंखुड़ियां क्षतिग्रस्त न हो जाएं. आज वह जो करने जा रही है वह उस ने कभी सोचा तक नहीं था.

‘पता नहीं मुझे यह करना चाहिए या नहीं. कहीं विनोद इसे गलत न समझ ले. मेरा यह अतिआधुनिक रूप कहीं विनोद को ना भाया तो?’ ऐसे कितने ही प्रश्न थे जो मेघा को 2 कदम आगे और 4 कदम पीछे धकेल रहे थे.

ऊहापोह में घिरी मेघा के हाथ कमरे के बाहर लगी घंटी के बटन की तरफ बढ़ गए. तभी अचानक भीतर से आ रही आवाजों ने उसे ठिठकने को मजबूर कर दिया.

“अरे यार, आज तूने किसी को कोई लाल गुलाब नहीं दिया,” विनय के प्रश्न का जवाब सुनने के लिए मेघा अधीर हुई जा रही थी. अपने नाम का जिक्र सुनने की प्रतीक्षा उस की आंखों में लाली सी उतर आई. उस ने कान दरवाजे से सटा दिए.

“कोई जमी ही नहीं. सानिया पर दिल आया था लेकिन उसे तो कोई और ले उड़ा,” विनोद का जवाब सुन कर मेघा को यकीन नहीं हुआ.

“सानिया? वह तो तेरेमेरे जैसों को घास भी ना डाले,” विनोद ने ठहाका लगाया.

“मैं तो मेघा के बारे में बात कर रहा था. तुम दोनों की तो खूब घुटती थी ना, इसीलिए मैंने अंदाजा लगाया,” विनय ने आगे कहा.

उस के मुंह से अपना जिक्र सुन कर मेघा फिर से उत्सुक हुई.

“कौन? वह गांवड़ी? अरे नहीं यार, यहां आ कर भी अपने लिए कोई गांवड़ी ही ढूंढ़ी तो फिर क्या खाक तीर मारा,” विनोद ने लापरवाही से कहा तो मेघा के कान सुन्न से हो गए. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो उस ने सुना वह सच है.

उस ने एक निगाह अपने हाथ में सहेजे पीले गुलाब पर डाली. फूल भी उसे अपने किरदार सा बेरौनक लगा. मेघा वापस मुड़ गई.

‘दिल टूटा क्या?’ कोई भीतर से कुनमुनाया.

‘ना रे, बिलकुल भी नहीं. मेरा दिल इतना कमजोर थोड़ी है. वैसे भी मैं यहां दिल तोड़ने या जोड़ने नहीं आई हूं,’ अपने भीतर को जवाब दे कर वह जोर से खिलखिलाई और फिर अपना दुपट्टा हवा में लहरा दिया.

मेघा हंसतेहंसते बुदबुदा रही थी, ‘गांवड़ी.’

औटो में बैठी मेघा ने 1-2 बार पीले गुलाब को खुद ही सूंघा और फिर उसे औटो में ही छोड़ कर नीचे उतर गई. फटी ओढ़नी बहुत नफासत के साथ रफू हो गई थी.

नन्हा सा मन: कैसे बदल गई पिंकी की हंसतीखेलती दुनिया – भाग 3

थोड़े दिनों तक सब ठीक रहा. फिर वही झगड़ा शुरू हो गया. पिंकी सोचती, ‘उफ, ये मम्मीपापा तो कभी नहीं सुधरेंगे, हमेशा झगड़ा करते रहेंगे. वह इस घर को छोड़ कर कहीं दूर चली जाएगी. तब पता चलेगा दोनों को कि पिंकी भी कुछ है. अभी तो उस की कोई कद्र ही नहीं है.’

वह सामने के घर में रहने वाला भोलू घर छोड़ कर चला गया था तब उस के मम्मीपापा जगहजगह ढूंढ़ते फिर रहे थे. वह भी ऐसा करेगी, पर वह जाएगी कहां? जब वह छोटी थी तो शारदा आंटी बताती थीं कि बच्चों को कभी एकदम अकेले घर से बाहर नहीं जाना चाहिए. बाहर बच्चों को पकड़ने वाले बाबा घूमते रहते हैं जो बच्चों को झोले में डाल कर ले जाते हैं, उन के हाथपांव काट कर भीख मंगवाते हैं. ना बाबा ना, वह घर छोड़ कर नहीं जाएगी. फिर वह क्या करे?

पिंकी अब गुमसुम रहने लगी थी. वह किसी से बात नहीं करती थी. अब वह मम्मी व पापा से किसी खिलौने की भी मांग नहीं करती. हां, कभीकभी उस का मन करता है तो वह अकेली बैठी खूब रोती है. वह अब सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार नहीं करती. स्कूल में किसी की कौपी फाड़ देती, किसी का बस्ता पटक देती. उस की क्लासटीचर ने उस की मम्मी को फोन कर के उस की शिकायत की थी.

एक दिन उस ने अपने सारे खिलौने तोड़ दिए थे. तब मम्मी ने उसे खूब डांटा था, ‘न पढ़ने में मन लगता है तेरा और न ही खेलने में. शारदा बता रही थी कि तुम उस का कहना भी नहीं मानतीं. स्कूल में भी उत्पात मचा रखा है. मैं पूछती हूं, आखिर तुम्हें हो क्या गया है?’

वह कुछ नहीं बोली. बस, एकटक नीचे जमीन की ओर देख रही थी. उसे अब सपने भी ऐसे आते कि मम्मीपापा आपस में लड़ रहे हैं. वह किसी गहरी खाई में गिर गई है और बचाओबचाओ चिल्ला रही है. पर मम्मीपापा में से कोईर् उसे बचाने नहीं आता और वह सपने में भी खुद को बेहद उदास, मजबूर पाती. वह किसी को समझ नहीं सकती, न मम्मी को, न पापा को.

वह अपनी मम्मी से यह नहीं कह सकती कि खुशबू आंटी को ले कर पापा से मत झगड़ा किया करो. क्या हुआ अगर पापा ने उन्हें कार में बिठा लिया या उन्हें शौपिंग करा दी. और न ही वह पापा से कह सकती है कि जब मम्मी को बुरा लगता है तो खुशबू आंटी को घुमाने क्यों ले जाते हो. वह जानती है कि वह कुछ भी कहेगी तो उस की बात कोई नहीं सुनेगा. उलटे, उस को दोचार थप्पड़ जरूर पड़ जाएंगे. मम्मी अकसर कहती हैं कि बड़ों की बातों में अपनी टांग मत अड़ाया करो.

पिंकी के मन में भय बैठता जा रहा था. वह भयावह यंत्रणा झेल रही थी. धीरेधीरे पिंकी का स्वास्थ्य गिरने लगा. वह अकसर बीमार रहने लगी. मम्मी और पापा दोनों उसे डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने खूब सारे टैस्ट किए जिन की रिपोर्ट नौर्मल निकली. डाक्टर ने उस से कई सवाल पूछे, पर पिंकी एकदम चुप रही. उन्होंने कुछ दवाइयां लिख दीं, फिर पापा से बोले, ‘लगता है इसे किसी बात की टैंशन है या किसी बात से डरी हुई है. आप इसे किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाएं जिस से इस की परेशानी का पता चल सके.’

पिंकी को उस के मम्मीपापा दूसरे डाक्टर के पास ले गए. करीब एक सप्ताह तक वे पिंकी को मनोचिकित्सक के पास ले जाते रहे. वे डाक्टर आंटी बहुत अच्छी थीं, उस से खूब बातें करती थीं. शुरूशुरू में तो पिंकी ने गुस्से में उन का हाथ झटक दिया था, उन की मेज पर रखा गिलास भी तोड़ दिया था. पर वे कुछ नहीं बोलीं, जरा भी नाराज नहीं हुईं.

वे डाक्टर आंटी उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरतीं, उसे दुलार करतीं और उस के गालों पर किस्सी दे कर उसे चौकलेट देतीं. फिर कहतीं, ‘बेटा, अपने मन की बात बताओ. तुम बताओगी नहीं, तो मैं कैसे तुम्हारी परेशानी दूर कर पाऊंगी?’ उन्होंने पिंकी को आश्वासन दिया कि वे उस की परेशानी दूर कर देंगी. नन्हा सा मन आश्वस्त हो कर सबकुछ बोल उठा.

रोतेरोते पिंकी ने डाक्टर आंटी को बता दिया कि वह मम्मीपापा दोनों के बिना नहीं रह सकती. जब मम्मीपापा लड़ते हैं तो वह बहुत भयभीत हो उठती है, एक डर उस के दिल में घर कर लेता है जिस से वह उबर नहीं पाती. उस का दिल मम्मीपापा दोनों के लिए धड़कता है. दोनों के बिना वह जी नहीं सकती. उस दिन वह खूब रोई थी और डाक्टर आंटी ने उसे अपने सीने से चिपका कर खूब प्यार किया था.

बाहर आ कर उन्होंने पिंकी के मम्मीपापा को खूब फटकारा था. आप दोनों के झगड़ों ने बच्ची को असामान्य बना दिया है. अगर बच्ची को खुश देखना चाहते हैं तो आपस के झगड़े बंद करें, उसे अच्छा माहौल दें, वरना बच्ची मानसिक रूप से अस्वस्थ होती चली जाएगी और आप अपनी बच्ची की बीमारी के जिम्मेदार खुद होंगे.

उस दिन पिंकी ने सोचा था कि आज उस ने डाक्टर आंटी को जो कुछ बताया है, उस बात को ले कर घर जा कर उसे मम्मी और पापा दोनों खूब डांटेंगे, खूब चिल्लाएंगे. वह डरी हुई थी, सहमी हुई थी. पर उस के मम्मीपापा ने उसे एक शब्द नहीं कहा. डाक्टर आंटी के फटकारने का एक फायदा तो हुआ कि उस के मम्मी और पापा दोनों बिलकुल नहीं झगड़े, लेकिन आपस में बोलते भी नहीं थे.

उस ने जो सारे खिलौने तोड़ दिए थे, उन की जगह उस के पापा नए खिलौने ले आए थे. मम्मी उस का बहुत ध्यान रखने लगी थीं. रोज रात उसे अपने से चिपका कर थपकी दे कर सुलातीं. पापा भी उस पर जबतब अपना दुलार बरसाते. पर पिंकी भयभीत और सहमीसहमी रहती. वह कभीकभी खूब रोती. तब उस के मम्मीपापा दोनों उसे चुप कराने की हर कोशिश करते.

एक रात पिंकी को हलकी सी नींद आई थी कि पापा की आवाज सुनाई दी. वे मम्मी से भर्राए स्वर में कह रहे थे, ‘तुम मुझे माफ कर दो. मैं भटक गया था. भूल गया था कि मेरा घर, मेरी गृहस्थी है और एक प्यारी सी बच्ची भी है. पिंकी की यह हालत मुझ से देखी नहीं जाती. इस का जिम्मेदार मैं हूं, सिर्फ मैं.’ पापा यह कह कर रोने लगे थे. उस ने पहली बार अपने पापा को रोते हुए देखा था. उस की मम्मी एकदम पिघल गईं, ‘आप रोइए मत, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है. पिंकी भी हम दोनों के प्यार से ठीक हो जाएगी. अपने झगड़े में हम ने इस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया.’

थोड़ी देर वातावरण में गहरी चुप्पी छाई रही. फिर मम्मी बोलीं, ‘अपनी नौकरी के चक्कर में मैं ने आप पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया. औफिस का काम भी घर ले आती थी. आप एकदम अकेले पड़ गए थे, इसीलिए खुशबू…’ इस से आगे उन के शब्द गले में ही अटक कर रह गए थे.

‘नहींनहीं, मैं ही गलत था. अब मैं पिंकी की कसम खा कर कहता हूं कि मैं खुशबू से कोई संबंध नहीं रखूंगा. मेरी पिंकी एकदम अच्छी हो जाए और तुम खुश रहो, इस के अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए.’ पापा धीरेधीरे मम्मी के बालों में उंगलियां फेर रहे थे और मम्मी की सिसकियां वातावरण में गूंज रही थीं.

पिंकी मन ही मन कह रही थी, ‘मम्मी मत रो, देखो न, पापा अपनी गलती मान रहे हैं. पापा, आप दुनिया के सब से अच्छे पापा हो, आई लव यू पापा. और मम्मी आप भी बहुत अच्छी हैं. मैं आप को भी बहुत प्यार करती हूं, आई लव यू मौम.’

पिंकी की आंखें भर आई थीं पर ये खुशी के आंसू थे. अब उसे किसी अलादीन के चिराग की जरूरत नहीं थी. उस के नन्हे से मन में दुनिया की सारी खुशियां सिमट कर समाहित हो गई थीं. आज उस का मन खेलना चाहता है. दौड़ना चाहता है, और इन सब से बढ़ कर दूर बहुत दूर आकाश में उड़ना चाहता है.

शिकार: किसने उजाड़ी मीना की दुनिया – भाग 3

‘‘श्याम मेरे भाई, हमारा प्लान तो यही था कि उसे कार में इधरउधर घुमाते रहेंगे और अपना मतलब साध लेंगे. पर मांगी हुई कार ससुरी बीच रास्ते में टें बोल गई और लाचारी में हमें टैक्सी करनी पड़ी. अब टैक्सी में तो ये सब संभव नहीं था. लिहाजा हमें मीरा को अपने घर लाना पड़ा.’’

‘‘अब मैं मीरा को कैसे मनाऊं, कैसे समझाऊं. वह भरी बैठी है, पुलिस में जाने पर तुली है. अगर उसने थाने में रपट लिखाई तो पुलिस फौरन यहां आ धमकेगी और तुम सब को हथकड़ी लग जाएगी.’’

‘‘पुलिस?’’ वे घबरा कर बोले, ‘‘अरे यार इतना अंधेर तो न कर. अगर पुलिस ने हमें धर लिया तो हम सब बेमौत मर जाएंगे. हमारी जिंदगी तबाह हो जाएगी, नौकरी चली जाएगी, जेल में सड़ना पड़ेगा. और बदनामी होगी अलग से. हम तेरे पैर पकड़ते हैं. हमें इतनी बड़ी सजा न दिलवा. किसी भी तरह हमें पुलिस से बचा ले.’’

‘‘मैं भरसक कोशिश करूंगा कि वह पुलिस में न जाए पर पता नहीं वह मेरी बात मानेगी या नहीं. वह भोलीभाली गांव की गोरी तो है नहीं, जो रोधो कर, इस सब को अपनी किस्मत का खेल मान कर चुप हो जाएगी. खैर, मैं जरा जल्दी में हूं. तुम लोग जल्दी से मेरे पैसे निकालो.’’

‘‘ले भाई,’’ उन्होंने उस के हाथ में कुछ नोट थमा दिए.

‘‘ये क्या,’’ वह आग बबूला हुआ, ‘‘सिर्फ 4 हजार? मेरे तो 4 लाख रुपए बनते हैं. तुम सब ने 1-1 लाख देने का वादा किया था.’’

‘‘श्याम मेरे भाई, हम पर रहम कर. एक लाख बहुत बड़़ी रकम होती है. हमारे पास एक लाख न कभी हुए थे और न होंगे. हम सब छोटीमोटी नौकरी वाले हैं, रोज कुंआ खोदना और रोज पानी पीना.’’

‘‘तुम लोग पैदाइशी कमीने हो,’’ श्याम ने दांत पीस कर कहा, ‘‘जब देने की औकात नहीं थी तो वादा क्यों किया? बेकार में ये सब ड्रामा करना पड़ा. मेरी फजीहत करवाई. अगर मेरी पत्नी को असलियत मालूम हो गई तो वह मुझे कभी माफ नहीं करेगी. उम्र भर मुझे कोसती रहेगी. मुझे तो माया मिली न राम. और हां, तुम लोग अपनी खैरियत चाहते हो तो कुछ दिनों के लिए इधरउधर कहीं खिसक जाओ. मीरा गुस्से से उबल रही है. अगर उस ने पुलिस में जाने की जिद की तो मैं कुछ नहीं कर सकूंगा.’’

‘‘लेकिन यार सारा कुसूर हमारा थोड़े ही न है. हम ने तुझ से करार लिया था कि हम चारों एक बार तेरी पत्नी से सहवास करेंगे और इस के एवज में हर एक तुझे एकएक लाख रुपए देगा. ये सब तेरी मरजी से ही तो हुआ है. तुझ से इजाजत न मिलती तो क्या हम ऐसा कदम उठाने की जुर्रत करते? इस मामले में तू भी उतना ही दोषी है, जितना कि हम.’’

श्याम का चेहरा उतर गया. वह उस शाम की याद कर के मन ही मन तिलमिला उठा. श्याम अतीत में खो गया. नाम श्याम पर काम किया उस ने विनाश का शादी की शाम वह अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था. सब के सब सुरूर में थे, नशे में झूम रहे थे.

‘‘मान गए यार श्याम,’’ उस के दोस्त बोले, ‘‘तेरी ससुराल वाले बड़े दरियादिल हैं. हम बारातियों की क्या खातिरदारी की है उन्होंने. तबीयत बागबाग हो गई.’’

‘‘ऊंह, कोरी खातिरदारी अपने किस काम की,’’ श्याम ने मुंह बना कर कहा, ‘‘मेरे पिताजी ने मुझसे कहा था कि वे मेरे ससुर से बात कर चुके हैं, उन्होंने मुझे शादी में कार देने का वादा किया है. लेकिन ससुर जी ने शादी में दिया ठेंगा, कहने लगे कि इतना पैसा खर्च करने की उन की सामर्थ्य नहीं है. वे मुझे एक स्कूटर दे कर टरकाना चाहते थे, पर मैं ने मना कर दिया. मुझे तो इतना गुस्सा आया कि उन से कह दूं, अपनी बेटी को भी अपने ही पास सहेज कर रखें.’’

‘‘पागल न बन यार. तेरी पत्नी तो रूप की खान है. वह एक बेशकीमती हीरा है, जिसे पा कर कोई भी अपना भाग सराहेगा. हम ने तो जब से उसे देखा है, तब से तेरी खुशकिस्मती पर रश्क कर रहे हैं. आहें भर रहे हैं कि हमें ऐसी परी क्यों नहीं मिली.’’

‘‘परी है सो ठीक है. लेकिन मुझे कार न मिलने का बहुत मलाल है.’’ श्याम कुढ़ कर बोला, ‘‘मैं ने तो मौडल और रंग भी पसंद कर रखा था. सोच रहा था कि शादी के बाद शान से कार चलाता हुआ घर पहुंचूंगा तो मोहल्ले वालों पर धाक जम जाएगी. अपने दिन तो तंगी और फाकामस्ती में गुजरते हैं. कार खरीदने की सामर्थ्य अपने में नहीं है.’’

‘‘मेरे दिमाग में एक बात आई है,’’ अनंत बोला, ‘‘अगर तू बुरा न माने तो कहूं.’’

‘‘बोल न. बेधड़क बोल.’’

‘‘एक तरीका है, जिस से तू कार के दाम हासिल कर सकता है. बाप ने न दिया न सही, उस की बेटी से वसूल ले.’’

‘‘क्या मतलब.’’

फिर नशे में धुत सब ने वह विनाशकारी प्लान बनाया था. अपने ही बुने जाल में फंस गया . श्याम उल्टे पांव घर लौटा. रास्ते भर वह अपने आप को धिक्कारता रहा. कैसी भयानक भूल कर दी थी उस ने. कैसा बचकाना काम किया था. अब वह अपने ही बुने जाल में कैसे निकलेगा? बिगड़ी बात कैसे बनाएगा? उसेबारबार अपनीपत्नी का आंसुओं से भीगा चेहरा याद आ रहा था.

उसे पश्चाताप हो रहा था कि क्या मीरा अपने इस कटु अनुभव से कभी उबर  सकेगी या उन दोनों के विवाहित जीवन को ग्रहण लग जाएगा?

उस ने खुद अपने सुखी संसार में आग लगा दी थी. अपने विवाहित जीवन में जहर घोल दिया था. उस का लालच उसे ले डूबा. अब वह कैसे इस भूल का सुधार करेगा. क्या मीरा उसे क्षमा कर देगी?

घर पहुंच कर उस ने मोटरसाइकिल पार्क की. उसे देख कर चौकीदार दौड़ा आया, ‘‘साहब, मेमसाहब बाहर गई हैं. बोलीं कि साहब आएं तो बता देना.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘वे बोलीं कि साहब से कह देना, पुलिस स्टेशन गई हैं.’’

श्याम को काटो तो खून नहीं. वह वहीं जमीन पर धम से बैठ गया.

मुकेश अंबानी के इवैंट में रणवीर ने दीपिका को किया किस, लोगों ने किया ट्रोल

बौलीवुड की जानीमानी जोड़ी रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण के चर्चे हर जगह हैं. वे जिस भी इवैंट में साथ पहुंचते हैं वहां लाइमलाइट में आ जाते हैं. ऐसा ही कुछ हाल के इवैंट में हुआ, लेकिन लोगों को उन का यह अंदाज खासा पसंद नहीं आया.


रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण मुकेश अंबानी के जियो वर्ल्ड सिनेमा इवैंट में पहुंचे थे, जहां बौलीवुड सितारों का जमावड़ा लगा हुआ था. वहां इन दोनों स्टार ने मीडिया की लाइमलाइट चुरा ली. उन का एक वीडियो धड़ल्ले से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिस में रणवीर सिंह दीपिका को किस करते हुए नजर आ रहे हैं. पर लोगों ने यह वीडियो देख कर उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया है. दोनों के इस वीडियो पर लोग तरहतरह के कमैंट करते हुए दिख रहे हैं.

आप को बता दें कि इस क्लिप में पहले तो रणवीर और दीपिका नीता अंबानी से बातचीत करते हैं, बाद में रणवीर दीपिका के गालों पर किस कर देते हैं. रणवीर सिंह का यह अंदाज बहुत से फैंस को काफी पसंद आ रहा है. हालांकि कुछ लोग इसे फेक बता रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘बस इमेज सुधार रहा है’. दूसरे ने लिखा, ‘नकली लोग’.

 

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बताते चलें कि रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण ने साल 2018 में शादी की थी. इस से पहले दोनों ने एकदूसरे को काफी समय तक डेट किया था. रणवीर से पहले दीपिका का नाम कई लोगों के साथ जुड़ा था. इस इवैंट से पहले रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण करण जौहर के शो ‘कौफी विद करण’ में नजर आए थे. इस दौरान रणवीरदीपिका ने एक से बढ़ कर एक खुलासे किए थे. इस शो पर दीपिका ने ‘कैजुअल रिलेशनशिप’ पर स्टेटमैंट दिया था, जिस के बाद लोग उन पर काफी भड़क गए थे.

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