Story In Hindi: काली की भेंट – पुजारी का फैलाया भरम

Story In Hindi: शहर के किनारे काली माता का मंदिर बना हुआ था. सालों से वहां कोई पुजारी नहीं रहता था. लोग मंदिर में पूजा तो करने जाते थे, लेकिन उस तरह से नहीं, जिस तरह से पुजारी वाले मंदिर में पूजा की जाती है.

एक दिन एक ब्राह्मण पुजारी काली माता के मंदिर में आए और अपना डेरा वहीं जमा लिया. लोगों ने भी पुजारीजी की जम कर सेवा की. मंदिर में उन की सुखसुविधा का हर सामान ला कर रख दिया.

पहले तो पुजारीजी बहुत नियमधर्म से रहते थे, सत्यअसत्य और धर्मअधर्म का विचार करते थे, लेकिन लोगों द्वारा की गई खातिरदारी ने उन का दिमाग बदल दिया. अब वे लोगों को तरहतरह की बातें बताते, अपनी हर सुखसुविधा की चीजों को खत्म होने से पहले ही मंगवा लेते.

काली माता की पूजा का तरीका भी बदल दिया. पहले पुजारीजी काली माता की सामान्य पूजा कराते थे, लेकिन अब उन्होंने इस तरह की पूजा करानी शुरू कर दी, जिस से उन्हें ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा मिल सके.

धीरेधीरे पुजारीजी ने काली माता पर भेंट चढ़ाने की प्रथा शुरू कर दी. वे पशुओं की बलि काली माता को भेंट करने के नाम पर लोगों से बहुत सारा पैसा ऐंठने लगे. जब कोई किसी काम के लिए काली माता की भेंट बोलता, तो पुजारीजी उस से बकरे की बलि चढ़ाने के नाम पर 5 हजार रुपए ले लेते और बाद में कसाई से बकरे का खून लाते और काली माता को चढ़ा देते.

बकरे के नाम पर लिए हुए 5 हजार रुपए पुजारीजी को बच जाते थे, जबकि बकरे का मुफ्त में मिला खून काली माता की भेंट के रूप में चढ़ जाता था.

धीरेधीरे दूरदूर के लोग भी काली माता के मंदिर में आने शुरू हो गए. पुजारीजी दिनोंदिन पैसों से अपनी जेब भर रहे थे. लोग सब तरह के झंझटों से बचने के लिए पुजारीजी को रुपए देने में ही अपनी भलाई समझते थे.

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे, जो पुजारीजी की इस प्रथा का विरोध करते थे. लेकिन पुजारीजी के समर्थकों की तुलना में ये लोग बहुत कम थे, इसलिए उन्हें ऐसा काम करने से रोक न सके.

जब पुजारीजी के ढोंग की हद बढ़ गई, तो कुछ लोगों ने पुजारी की अक्ल ठिकाने लगाने की ठान ली. शहर में रहने वाले घनश्याम ने इस का बीड़ा उठाया.

घनश्याम सब से पहले पुजारीजी के भक्त बने और 2-4 झूठी समस्याएं उन्हें सुना डालीं. साथ ही बताया कि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, लेकिन इतना पैसा होने के बावजूद भी उन्हें शांति नहीं मिलती. अगर किसी तरह उन्हें शांति मिल जाए, तो वे किसी के कहने पर एक लाख रुपए भी खर्च कर सकते हैं.

एक लाख रुपए की बात सुन कर  पुजारीजी की लार टपक गई. उन्होंने तुरंत घनश्याम को अपनी बातों के जाल में फंसाना शुरू कर दिया.

पुजारी बोला, ‘‘देखो जजमान, अगर तुम इतने ही परेशान हो, तो मैं तुम्हें कुछ उपाय बता सकता हूं.

‘‘अगर तुम ने ये उपाय कर दिए, तो समझो तुम्हें मुंहमांगी मुराद मिल जाएगी. लेकिन इस सब में खर्चा बहुत होगा.’’

घनश्याम ने पुजारीजी को अपनी बातों में फंसते देखा, तो झट से बोल पड़े, ‘‘पुजारीजी, मुझे खर्च की चिंता नहीं है. बस, आप उपाय बताइए.’’

पुजारीजी ने काली माता की पूजा के लिए एक लंबी लिस्ट तैयार कर दी.

घनश्याम पुजारीजी की कही हर बात  मानता गया. पुजारीजी ने काली माता की भेंट के लिए 2 बकरों का पैसा भी घनश्याम से ले लिया. साथ ही, उन्हें घर में एक पूजा कराने को कह दिया.

पुजारीजी की इस बात पर घनश्याम तुरंत तैयार हो गए.

तीसरे दिन घनश्याम के घर पर पूजा की तारीख तय हुई, जबकि भेंट चढ़ाने के लिए पैसे तो पुजारीजी उन से पहले ही ले चुके थे. तीसरे दिन पुजारीजी घनश्याम के घर जा पहुंचे.

पुजारीजी ने अमीर जजमान को देख हर बात में पैसा वसूला और घनश्याम अपनी योजना को कामयाब करने के लिए पुजारी द्वारा की गई हर विधि को मानते गए.

जोरदार पूजा के बाद घनश्याम ने पुजारीजी के लिए स्वादिष्ठ पकवान बनवाए, बाजार से भी बहुत सी स्वादिष्ठ चीजें मंगवाई गईं.

पुजारीजी ने जम कर खाना खाया. उन्होंने आज तक इतना लजीज खाना नहीं खाया था.

जब पुजारीजी खाना खा चुके, तो उन्होंने घनश्याम से पूछा, ‘‘घनश्याम, तुम ने हमें इतना स्वादिष्ठ खाना खिला कर खुश कर दिया. ये कौन सा खाना है और किस ने बनाया है?

पुजारी के पूछने पर घनश्याम ने जवाब दिया, ‘‘पुजारीजी, कुछ खाना तो बाजार से मंगवाया था और कुछ यहीं पकाया था. सारा खाना ही बकरे के मांस से बना हुआ था.’’

घनश्याम ने बकरे के मांस का नाम लिया, तो पुजारीजी की सांसें अटक गईं, लेकिन उन्होंने सोचा कि शायद घनश्याम मजाक कर रहे हैं. वे बोले, ‘‘जजमान, आप मजाक बहुत कर लेते हैं, लेकिन हमारे सामने मांसाहारी चीज का नाम मत लो. हम तो मांसमदिरा को छूते भी नहीं, खाना तो बहुत दूर की बात है.’’

घनश्याम ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं पुजारीजी. आप चाहें तो जिस बावर्ची ने खाना बनाया है, उस से पूछ लें.’’

घनश्याम की बात सुन पुजारीजी का दिल बैठ गया. मन किया कि उलटी कर दें. नफरत से भरे मन में घनश्याम के लिए गुस्सा भी बहुत था.

घनश्याम ने आवाज दे कर बावर्ची को बुला कर कहा, ‘‘जरा पुजारीजी को बताओ तो कि तुम ने क्या बनाया था.’’

बावर्ची अपने बनाए हुए खाने को बताने लग गया. सारा खाना बकरे के मांस से बनाया गया था.

पुजारीजी पैर पटकते हुए गुस्से से भरे घनश्याम के घर से चले गए. घर के बाहर आ कर उन्होंने गले में उंगली डाली और खाए हुए खाने को अपने पेट से खाली कर दिया, लेकिन मन की नफरत इतने से ही शांत नहीं हुई.

पुजारीजी ने बस्ती में हंगामा कर लोगों को जमा कर लिया, जिन में ज्यादातर उन के भक्त थे. उन्होंने घनश्याम द्वारा की गई हरकत सब लोगों को बताई, तो हर आदमी घनश्याम की इस हरकत पर गुस्सा हो उठा.

अब लोग पुजारीजी समेत घनश्याम के घर जा पहुंचे. सब ने घनश्याम को भलाबुरा कहा.

घनश्याम ने सब लोगों की बातें चुपचाप सुनीं, फिर अपना जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मैं किसी भी गलती के लिए माफी मांगने के लिए तैयार हूं, लेकिन आप पहले मेरी बात ध्यान से सुनें,

उस के बाद जो आप कहेंगे, वह मैं करूंगा.’’

सब लोग शांत हो कर घनश्याम की बात सुनने लगे. घनश्याम ने बोलना शुरू किया, ‘‘देखो भाइयो, जब मैं पुजारीजी के पास गया और अपनी परेशानी बताई, तो इन्होंने मुझ से 2 बकरों की भेंट काली माता पर चढ़ाने के लिए रुपए लिए थे. साथ ही, मुझ से यह भी कहा था कि मैं घर में पूजा कराऊं.’’

‘‘मैं ने पुजारीजी के कहे मुताबिक ही पूजा कराई और घर में बकरे के मांस से बना खाना परोसा. पुजारीजी ने मुझ से पूछा नहीं और मैं ने बताया नहीं.’’

भीड़ में से एक आदमी ने लानत भेजते हुए कहा, ‘‘तो भले आदमी, तुम को तो सोचना चाहिए कि पुजारी को मांस खिलाना कितना अधर्म का काम है. क्या तुम यह नहीं जानते थे?’’

घनश्याम ने शांत लहजे में जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मुझे नहीं लगता कि यह कोई अधर्म का काम है. जब ब्राह्मण पुजारी अपनी आराध्य काली माता पर बकरे की बलि चढ़ा सकता है, तो उस बकरे के मांस को खुद क्यों नहीं खा सकता? क्या पुजारी की हैसियत भगवान से भी ज्यादा है या भगवान ब्राह्मण से छोटी जाति के होते हैं?’’

लोगों में सन्नाटा छा गया. घनश्याम की बात पर किसी से कोई जवाब न मिल सका.

पुजारीजी का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने यह बात तो कभी सोची ही नहीं थी. लोग खुद इस बात को सोचे ही बिना काली माता के लिए बकरे की बलि देते रहे थे.

आज पंडितजी की समझ में आया कि भला भगवान किसी जानवर का मांस क्यों खाने लगे? वे तो किसी भी जीव की हत्या को बुरा मानते हैं, वहां मौजूद सभी लोग घनश्याम की बात का समर्थन करने लगे.

भीड़ के लोगों ने पुजारीजी को ही फटकार कर काली माता का मंदिर छोड़ देने की चेतावनी दे दी. उस दिन से काली माता के मंदिर पर पशु बलि की प्रथा बंद हो गई.

पुजारीजी का धर्म भ्रष्ट हो चुका था, ऊपर से लोगों की नजरों में उन की इज्जत न के बराबर हो गई थी. उन्होंने वहां से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी. अब मंदिर वीरान हो गया था. अब वहां जानवर बंधने लगे थे. Story In Hindi

Hindi Family Story: जिम्मेदार कौन – कमला चरित्रहीन क्यों थी?

Hindi Family Story: ‘‘किशोरीलाल ने खुदकुशी कर ली…’’ किसी ने इतना कहा और चौराहे पर लोगों को चर्चा का यह मुद्दा मिल गया.

‘‘मगर क्यों की…?’’  भीड़ में से सवाल उछला.

‘‘अरे, अगर खुदकुशी नहीं करते, तो क्या घुटघुट कर मर जाते?’’ भीड़ में से ही किसी ने एक और सवाल उछाला.

‘‘आप के कहने का मतलब क्या है?’’ तीसरे आदमी ने सवाल पूछा.

‘‘अरे, किशोरीलाल की पत्नी कमला का संबंध मनमोहन से था. दुखी हो कर खुदकुशी न करते तो वे क्या करते?’’

‘‘अरे, ये भाई साहब ठीक कह रहे हैं. कमला किशोरीलाल की ब्याहता पत्नी जरूर थी, मगर उस के संबंध मनमोहन से थे और जब किशोरीलाल उन्हें रोकते, तब भी कमला मानती नहीं थी,’’ भीड़ में से किसी ने कहा.

चौराहे पर जितने लोग थे, उतनी ही बातें हो रही थीं. मगर इतना जरूर था कि किशोरीलाल की पत्नी कमला का चरित्र खराब था. किशोरीलाल भले ही उस के पति थे, मगर वह मनमोहन की रखैल थी. रातभर मनमोहन को अपने पास रखती थी. बेचारे किशोरीलाल अलग कमरे में पड़ेपड़े घुटते रहते थे.

सुबह जब सूरज निकला, तो कमला के रोने की आवाज से आसपास और महल्ले वालों को हैरान कर गया. सब दौड़ेदौड़े घर में पहुंचे, तो देखा कि किशोरीलाल पंखे से लटके हुए थे.

यह बात पूरे शहर में फैल गई, क्योंकि यह मामला खुदकुशी का था या कत्ल का, अभी पता नहीं चला था.

इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस आई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले गई.

यह बात सही थी कि किशोरीलाल और कमला के बीच बनती नहीं थी. कमला किशोरीलाल को दबा कर रखती थी. दोनों के बीच हमेशा झगड़ा होता रहता था. कभीकभी झगड़ा हद पर पहुंच जाता था.

यह मनमोहन कौन है? कमला से कैसे मिला? यह सब जानने के लिए कमला और किशोरीलाल की जिंदगी में झांकना होगा.

जब कमला के साथ किशोरीलाल की शादी हुई थी, उस समय वे सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर थे. किशोरीलाल की कम तनख्वाह से कमला संतुष्ट न थी. उसे अच्छी साडि़यां और अच्छा खाने को चाहिए था. वह उन से नाराज रहा करती थी.

इस तरह शादी के शुरुआती दिनों से ही उन के बीच मनमुटाव होने लगा था. कुछ दिनों के बाद कमला किशोरीलाल से नजरें चुरा कर चोरीछिपे देह धंधा करने लगी. धीरेधीरे उस का यह धंधा चलने लगा.

वैसे, कमला ने लोगों को बताया था कि उस ने अगरबत्ती बनाने का घरेलू धंधा शुरू कर दिया है. इसी बीच उन के 2 बेटे हो गए, इसलिए जरूरतें और बढ़ गईं. मगर चोरीछिपे यह धंधा कब तक चल सकता था. एक दिन किशोरीलाल को इस की भनक लग गई. उन्होंने कमला से पूछा, ‘मैं यह क्या सुन रहा हूं?’

‘क्या सुन रहे हो?’ कमला ने भी अकड़ कर कहा.

‘क्या तुम देह बेचने का धंधा कर रही हो?’ किशोरीलाल ने पूछा.

‘तुम्हारी कम तनख्वाह से घर का खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था, तो मैं ने यह धंधा अपना लिया है. कौन सा गुनाह कर दिया,’ कमला ने भी साफ बात कह कर अपने अपराध को कबूल कर लिया.

यह सुन कर किशोरीलाल को गुस्सा आया. वे कमला को थप्पड़ जड़ते हुए बोले, ‘बेगैरत, देह धंधा करती हो तुम?’

‘तो पैसे कमा कर लाओ, फिर छोड़ दूंगी यह धंधा. अरे, औरत तो ले आया, मगर उस की हर इच्छा को पूरा नहीं करता है. मैं कैसे भी कमा रही हूं, तेरे से तो नहीं मांग रही हूं,’ कमला भी जवाबी हमला करते हुए बोली और एक झटके से बाहर निकल गई.

किशोरीलाल कुछ नहीं कर पाए. इस तरह कई मौकों पर उन दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था.

इसी बीच शिक्षा विभाग से शिक्षकों की भरती हेतु थोक में नौकरियां निकलीं. कमला ने भी फार्म भर दिया. उसे सहायक टीचर के पद पर एक गांव में नौकरी मिल गई.

चूंकि गांव शहर से दूर था और उस समय आनेजाने के इतने साधन न थे, इसलिए मजबूरी में कमला को गांव में ही रहना पड़ा. गांव में रहने के चलते वह और आजाद हो गई.

कमला ने 10-12 साल इसी गांव में गुजारे, फिर एक दिन उस ने अपने शहर के एक स्कूल में ट्रांसफर करवा लिया. मगर उन की लड़ाई अब भी नहीं थमी.

बच्चे अब बड़े हो रहे थे. वे भी मम्मीपापा का झगड़ा देख कर मन ही मन दुखी होते थे, मगर उन के झगड़े के बीच न पड़ते थे.

जिस स्कूल में कमला पढ़ाती थी, वहीं पर मनमोहन भी थे. उन की पत्नी व बच्चे थे, मगर सभी उज्जैन में थे.

मनमोहन यहां अकेले रहा करते थे. कमला और उन के बीच खिंचाव बढ़ा. ज्यादातर जगहों पर वे साथसाथ देखे गए. कई बार वे कमला के घर आते और घंटों बैठे रहते थे.

कमला भी धीरेधीरे मनमोहन के जिस्मानी आकर्षण में बंधती चली गई. ऐसे में किशोरीलाल कमला को कुछ कहते, तो वह अलग होने की धमकी देती, क्योंकि अब वह भी कमाने लगी थी. इसी बात को ले कर उन में झगड़ा बढ़ने लगा.

फिर महल्ले में यह चर्चा चलती रही कि कमला के असली पति किशोरीलाल नहीं मनमोहन हैं. वे किशोरीलाल को समझाते थे कि कमला को रोको. वह कैसा खेल खेल रही है. इस से महल्ले की दूसरी लड़कियों और औरतों पर गलत असर पड़ेगा. मगर वे जितना समझाने की कोशिश करते, कमला उतनी ही शेरनी बनती.

जब भी मनमोहन कमला से मिलने घर पर आते, किशोरीलाल सड़कों पर घूमने निकल जाते और उन के जाने का इंतजार करते थे.

पिछली रात को भी वही हुआ. जब रात के 11 बजे किशोरीलाल घूम कर बैडरूम के पास पहुंचे, तो भीतर से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थीं. वे सुनने के लिए खड़े हो गए. दरवाजे पर उन्होंने झांक कर देखा, तो शर्म के मारे आंखें बंद कर लीं.

सुबह किशोरीलाल की पंखे से टंगी लाश मिली. उन्होंने खुद को ही खत्म कर लिया था. घर के आसपास लोग इकट्ठा हो चुके थे. कमला की अब भी रोने की आवाज आ रही थी.

इस मौत का जिम्मेदार कौन था? अब लाश के आने का इंतजार हो रहा था. शवयात्रा की पूरी तैयारी हो चुकी थी. जैसे ही लाश अस्पताल से आएगी, औपचारिकता पूरी कर के श्मशान की ओर बढ़ेगी. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी – ललचाए देवर चिंटू ने चली गहरी चाल

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी को देख कर मनचलों के दिल में धकधक होने लगती थी. देवर चिंटू भी अपनी भाभी का रसपान करने के लिए उतावला था. एक दिन वह ऐसी दवा लाया कि दिव्या भाभी पर सैक्स का भूत सवार हो गया. क्या चिंटू को अपने प्लान में कामयाबी मिली?

दिव्या भाभी को कौन नहीं जानता. पूरे गांव में चर्चे हैं उस के. यह भी अफवाह है कि गांव में अभी तक उस के जैसी सुंदर बहू नहीं आई है. बिना सिंगार किए भी लुभावनी और आकर्षक लगती है. चालढाल, नैननक्श, शरीर के किसी भी अंग में कोई कमी दिखाई देती ही नहीं.

सुंदर होने के साथ ही दिव्या भाभी बहुत हंसोड़, मजाकिया और गंदी शरारतें करने वाली है, इसलिए गलीमहल्ले का कौन सा लड़का है, जो उस से मिलने को उतावला नहीं रहता. गांव में अफवाह सी फैली हुई है कि लड़के उस की ओर चुंबक के समान खिंचे चले आते हैं.

14-15 साल वाले जिन लड़कों के जवानी के कीटाणु काटने शुरू करते हैं, वे दिन में कम से कम एक बार तो दिव्या भाभी के दरबार में हाजिरी देते ही हैं. नयानया जवान होने वाला कोई किशोर उस के दरबार में अगर एक ही दिन में 2-3 बार हाजिरी दे तो कोई हैरत की बात नहीं.

दिव्या भाभी भी इतनी शरारती है कि ऐसे लड़कों का कभी अंग पकड़ कर हिला देती है तो कभी उन की छातियों में पड़ी हुई गुठलियां भींच देती है. जब लड़के दर्द से कराहते हैं, तो उसे बड़ा मजा आता है.

दिव्या भाभी के देवर चिंटू ने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा है. जवानी के कीटाणुओं ने आजकल उस के अंदर तहलका सा मचाया हुआ है. चिंटू का असली नाम अभिषेक है, लेकिन घर और आसपास के महल्ले वाले उसे चिंटू ही बुलाते हैं. स्कूल में भी उस ने यही नाम लिखवाया है.

10वीं जमात पास करते ही चिंटू ने 11वीं में दाखिला ले लिया है. उस का परिवार भी ज्यादा बड़ा नहीं है. भाईभाभी के अलावा एक दादा हैं, जो घर से दस कदम दूर घेर में पड़े रहते हैं. दादाजी की एक विधवा बहन है, जो अब यहीं रहती हैं. चिंटू और उस का बड़ा भाई मोहन, उसे फुआ के नाम से पुकारते हैं. बड़ेबूढ़ों के रूप में इन दोनों का ही चिंटू और मोहन को आशीर्वाद हासिल है, क्योंकि 2 साल पहले उन के मम्मीपापा की कार हादसे में मौत हो गई थी.

महल्ले के दूसरे लड़कों के समान ही चिंटू भी अपनी भाभी दिव्या के साथ बहुत शरारतें करता है. जब भी मौका मिलता है, उस के साथ छेड़खानी करने से नहीं चूकता. वह नहीं मानता, भाभी ‘मां’ समान होती है. उसे तो अपनी भाभी दोस्त के जैसी दिखाई देती है.

दिव्या भाभी भी जबतब मौका देख कर चिंटू के गाल पर चूंट कर निकल जाती. एक दिन जब चिंटू चारपाई पर बैठा खाना खा रहा था, तो पीछे से आ कर दिव्या ने उस के गाल पर काट भी लिया था. चिंटू के मुंह से चीख सी निकल गई थी.

देवरभाभी में अकसर ऐसी शरारतें और नोकझोंक होती ही रहती है, लेकिन उन दोनों में से बुरा कोई नहीं मानता. कुछ ही समय एकदूसरे से नाराज रहते हैं, फिर मान जाते हैं.

चिंटू अब 17वें साल में है. ऐसा उस की हाईस्कूल की मार्कशीट में लिखी गई जन्मतिथि के अनुसार है. उस का अंदाजा है कि वह 1-2 साल और भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि पापा ने स्कूल में जन्मतिथि कम कर के लिखवाई थी.

चिंटू के अंदर विशेष कीटाणु कई साल पहले बन चुके थे. जिन्हें उस ने अनेकों बार निकाल कर देखा. वह केवल यही देखना चाहता था कि उन का रंग कैसा होता है. क्योंकि उस के किसी दोस्त ने बताया था कि पहले उन का रंग सफेद होता है, फिर पीला हो जाता है, इसलिए इस सिद्धांत पर उस ने कई बार प्रयोग कर के देखा.

जब भाभी चिंटू के साथ गंदी शरारतें करती है, तो कीटाणुओं को बारबार निकालने का मन करता है. मुसकरा कर देखने और मीठीमीठी बातें करने पर तो उस के अंदर कुलबुलाहट सी मच जाती है. एक दिन तो चिंटू को इतना जोश आया कि उस ने मौका तलाश कर भाभी का हाथ पकड़ लिया.

भाभी ने अपना हाथ यह कहते हुए छुड़ाया, ‘‘देवरजी, पहले इस लायक हो तो जाओ.’’

चिंटू नहीं समझ पाया इस का मतलब क्या है? उस ने खुद ही कई बार इस वाक्य का मतलब निकाल कर देखा, लेकिन उस का सही मतलब नहीं समझ पाया. इस वाक्य का मतलब हां है या न, इस बारे में वह बहुत भ्रमित रहा. फिर उस ने खुद ही मतलब निकाला कि प्यार के मामले में लड़कियों की न का मतलब हां ही होता है.

अक्तूबर का महीना था. सर्दियां आने को थीं. बेमौसमी बारिश ने मौसम को ज्यादा ठंडा बना दिया था. चिंटू के भैया आज घर पर नहीं थे. उन्हें जरूरी काम से एक रिश्तेदार के घर रुकना पड़ा था. इस की जानकारी उन्होंने फोन पर दिव्या को दे दी थी. दिन में तेज हवाएं चलने के चलते बिजली गुल थी. तार टूट जाने की वजह से बिजली के आने की भी उम्मीद नहीं थी.

भाभी ने शाम का खाना जल्दी ही बनाया और सब लोगों ने मिल कर खाया. रात के 9 बजे तक सब अपनेअपने कमरों में घुस गए. जिस को जो काम सही लगा, वही करने लगा.

चिंटू को अपना होमवर्क करते हुए अचानक सूझा, ‘भाभी के पास कई सारी कहानियों की किताबें हैं. कोर्स की किताबें तो पढ़ता ही रहता हूं. आज कोई अच्छी कहानी पढ़ूंगा.’’

चिंटू सीधा भाभी के कमरे में पहुंचा. बिना कुछ बोले ही दरवाजे पर खड़ा हो कर भाभी को निहारने लगा. उस समय भाभी बिस्तर पर औंधी लेटी हुई फोन को स्क्रौल कर रही थी. बगल में कोई पत्रिका रखी हुई थी. ऐसी हालत में वह एकदम हीरोइन के समान दिखाई देने लगी.

मोमबत्ती की धीमी रोशनी में उस का हर अंग मन में रोमांच पैदा करने वाला था. कौन सा अंग था भाभी का, जो नागिन के समान लहराता नहीं दिखाई दे रहा था. वाह, क्या नजारा था. उस समय दिव्या भाभी के प्रति होने वाले आकर्षण को चिंटू नहीं रोक पाया.

चिंटू ने अंदर आ कर दिव्या की कमर पर चूंटते हुए कहा, ‘‘भाभी, कोई पत्रिका दे दो. इस महीने कौनकौन सी नई आई हैं? आज कहानी पढ़ने का मन है.’’

‘‘रैक में से ले लो. वहां बहुत सी पत्रिकाएं रखी हुई हैं,’’ भाभी ने भर्राई आवाज में कहा, जैसे नशे में हो.

‘‘तुम ही उठा कर दो, मुझे क्या पता कौन सी मजेदार है,’’ चिंटू ने थोड़ा हक जताते और जिद करते हुए कहा.

नहीं चाहते हुए भी भाभी को उठ कर पत्रिका और किताबों की रैक के पास आना पड़ा. भाभी ने जैसे ही पत्रिका उठाने के लिए हाथ बढ़ाया. चिंटू ने दोनों हाथों से उसे पीछे से अपनी बांहों में कस लिया.

भाभी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो… छोड़ दो, कोई आ जाएगा.’’

चिंटू और कस कर पकड़ते हुए बोला, ‘‘नहीं, आज नहीं. बरदाश्त नहीं हो रहा है. अब नहीं रहा जाता. बस एक बार.’’

छीनाझपटी सी शुरू हो गई. चिंटू कहता, ‘‘आजा.’’

भाभी कहती, ‘‘न… न…’’

तभी किसी के ‘ठपठप’ कदमों की आवाज सुनाई दी. चिंटू ने तुरंत भाभी को छोड़ कर उस का फोन उठाया और कान पर लगाते हुए झूठमूठ किसी से बतियाने का नाटक सा करने लगा, ‘‘हां ठीक है. अभी बात कर लूंगा… मैं 10 बजे तक पहुंच जाऊंगा… भाभी जल्दी ही नाश्ता बना देती है… कालेज में ही आ जाना… नहीं, अभी घर पर ही है, चाहो तो बात कर सकते हो…’’

तभी फुआ अंदर कमरे में आई. चिंटू और भाभी को शक की निगाह से देखा और बिना कुछ बोले ही लौट गई. गुस्से में फोन बिस्तर पर फेंक कर चिंटू भी अपने कमरे में आ कर सो गया.

इस घटना के बाद भाभी ने चिंटू के साथ बातचीत करना छोड़ दिया. जब कभी बोलती भी तो घुड़क कर. देखती तो घूर कर, जैसे अभी काट खाएगी. चिंटू को भाभी के इस बदले हुए बरताव की कुछ वजह पता भी थी और कुछ नहीं भी.

जब चिंटू ने भाभी से इस बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ मजाक कर लेती थी तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं गलत हूं. फुआ देख लेती तो क्या होता? अगर तुम्हारे भाई को पता चल गया तो फिर अंजाम जानते हो कि क्या होगा?’’

चिंटू को भाभी के ये शब्द कांटे के समान चुभे. उसे अपनी बेइज्जती सी महसूस हुई. पहले लुभाया, फिर धमकाया. उस ने सोच लिया, ‘भाभी तुम से तो बदला जरूर लेना है. अब चाहे अंजाम कुछ भी हो.’

चिंटू ने अपना सारा गुनाह अपने एक दोस्त को बताते हुए कहा, ‘‘भाभी का बरताव अब बिलकुल बदल गया है. छोटी सी बात पर वह खीज कर बोलती है. एकदो बार तो बिना किसी बात के ही मुझे घुड़क भी दिया.’’

दोस्त ने सलाह दी, ‘‘यार, तुम ने कच्ची छोड़ दी, पूरा काम हो जाता तो फिर न बोलती, बल्कि और खुश होती. अगर तुम्हें पूरा काम करना है तो इस का तरीका मैं बताता हूं,’’ उस ने चिंटू के कान में फुसफुसाते हुए सारा प्लान समझा दिया.

चिंटू को सुन कर शांति मिली और थोड़ी हैरानी भी हुई, ‘‘ऐसी दवा भी आती है…’’ उस ने खुशी से झूमते हुए कहा.

कालेज की छुट्टी होते ही चिंटू मामचंद बलबीर की दुकान पर पहुंचा और दुकानदार से बोला, ‘‘भैंस गाभिन करने की दवा चाहिए.’’

‘‘भैंस कैसी है?’’ दुकानदार ने कनखियों से उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘खारके की कटिया है. कभीकभार बोलती है, फिर चुप हो जाती है. हरी होने का नाम ही नहीं ले रही. बस गात फुलाए जा रही है.’’

‘‘यह लो एक पुडि़या, आधी शाम को दे देना, आधी सुबह को. रोटी या आटे के गोले में मिला कर देना. खाते ही बोलने लगेगी.’’

चिंटू ने बिल चुकाया और दवा ले कर घर आ गया. वह बहुत खुश था. आज तो होगा ही होगा. दिल में उमंग थी. जब भी भाभी के बारे में सोचता, शरीर में कामुक लहर सी दौड़ती. बारबार मन में यह भावना उठती, ‘सीधी उंगली से कभी घी नहीं निकलता, उसे टेढ़ा करना ही पड़ता है. अब देखता हूं कि भाभी कैसे बचेगी?’

शाम को खाना खाने के बाद जब सोने का समय हुआ, चिंटू ने बड़ी चालाकी से दिव्या भाभी के दूध में दवा की पुडि़या की एकचौथाई मात्रा मिला दी. घर में सोने से पहले दूध पीने का रिवाज था, इसलिए जब दिव्या सब के कमरे में एकएक गिलास दूध देने में बिजी थी, तब चिंटू को दूध में दवा मिलाने का मौका मिल गया था.

सब दूध पी कर सोने की तैयारी करने लगे. आधे घंटे के बाद ही दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया. पहले धीरेधीरे शरीर में कुछ हरारत सी हुई, फिर तेजी के साथ.

दिव्या ने खुद को कई बार रोकना चाहा, लेकिन सहवास की आग जो भड़की, फिर भड़कती ही चली गई.

जब उस का खुद पर से कंट्रोल खत्म हो गया तो उस ने मोहन का गरीबान पकड़ कर उस के ऊपर लेटते हुए जोश में कहा, ‘‘ओ पंडित, आज करता नहीं क्या?’’

मोहन को थोड़ी हैरानी हुई कि आज दिव्या खुद ही कह रही है, जबकि अकसर मोहन को ही बोलना पड़ता था. उस ने बिना कोई पल गंवाए दिव्या को अपनी बांहों में कसते हुए जलती आग में घी डालना शुरू कर दिया.

लेकिन आज उसे घी की नहीं पानी की जरूरत थी. और उस से भी कहीं ज्यादा बर्फ की. उस के ऊपर उन डब्बों को उलटने की जरूरत थी, जिन पर आग लिखा होता है, पर उन में रेत होता है.

मोहन से जब आग पूरी तरह शांत न हुई, तो दिव्या ने उसे अपने नीचे लिटा लिया और खुद ऊपर आ गई. आज खेत में फावड़े का काम करने के चलते मोहन काफी थका हुआ था, इसलिए केवल एक बार संबंध बना सका. वह कुछ ही मिनट में सो गया.

दिव्या सोते हुए मोहन की ओर देखने लगी और गुस्सा होने लगी. उसे अपने अंदर ज्वाला सी दहकती महसूस हो रही थी, इसलिए उस की आंखों में नींद  कहां थी. आंखें बंद करते ही मन में गंदे खयाल आने लगते. उस ने मोहन की ओर ललचाई नजरों से एक बार फिर देखा, लेकिन वह गहरी नींद में था.

जब दिव्या से बरदाश्त न हुआ तो वह धीरे से उठी और चिंटू के कमरे में चली गई. चिंटू आंख बंद किए लेटा हुआ था. लेकिन वह जाग रहा था.

चिंटू को पूरा यकीन था कि भाभी आएगी जरूर, चाहे किसी भी समय आए. दवा का असर खाली नहीं जा सकता. एक छोटी सी पुडि़या की आधी खुराक जब इतनी बड़ी भैंस को हीट पर ला सकती है, तो 50 किलो की औरत क्या चीज है.

आते ही दिव्या ने चिंटू के पास लेटते हुए कहा, ‘‘आज मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूं. आओ, अपनी प्यास बुझा लो.’’

चिंटू तो ये शब्द सुनने के लिए महीनों से बेकरार था. वह लिपट गया. जी भर कर प्यार किया.

दिव्या फिर अपने कमरे में आई. कुछ देर आंखें बंद कर सोने की कोशिश की, लेकिन उसे नींद न आई. उस ने फिर ललचाई नजरों से मोहन की ओर देखा. जोश से भर कर उसे अपनी बांहों में कसना चाहा.

मोहन जाग गया और बोला, ‘‘दिव्या, क्या कर रही हो?’’ नींद टूटने से वह थोड़ा गुस्सा हो गया.

‘‘मैं नहीं जानती कि मुझे क्या हो गया है. मेरे शरीर में कोई ज्वालामुखी फट रहा है. मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है,’’ वह तड़पते हुए बोली.

मोहन ने दिव्या की ओर ध्यान से देखा. उस की हालत वाकई खराब थी. शरीर उघड़ा हुआ और बहुत गरम था. वह बहुत बेचैन थी.

मोहन ने हालात को भांप कर गांव में ही अपने दोस्त डाक्टर प्रशांत को फोन मिलाया, ‘‘यार, तुम्हारी भाभी की हालत बहुत खराब है. जल्द ही आओ.’’

‘इस समय रात के 2 बजे हैं.’

‘‘हां यार, समस्या गंभीर है. आना ही पड़ेगा.’’

डाक्टर प्रशांत आधे घंटे में हाजिर हो गया. उस ने दिव्या को चौंक कर देखा. ‘‘इन्होंने कोई बहुत ज्यादा गरम चीज खाई है. इस से पूरे शरीर पर एलर्जी हो सकती है. मामला कंट्रोल करने की कोशिश करता हूं, वरना तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

इस के बाद डाक्टर ने 2 इंजैक्शन दिव्या को लगाए और कुछ खाने की दवाएं दीं. उसे तुरंत ही शांति मिल गई और वह सो गई.

चिंटू खुश था. उसे लग रहा था कि उस ने अपना बदला ले लिया. भाभी कहां तो सतीसावित्री बनती थी. फिर ऐसा जादू चला कि खुद ही खिंची चली आई.

कुछ दिन बाद देवरभाभी में फिर वही हंसीमजाक, छेड़खानी और शरारतों का सिलसिला शुरू हो गया.

एक दिन भाभी ने चिंटू के साथ कोई गंदी शरारत की तो उस ने भाभी को सबकुछ बता दिया. साथ ही, बाकी बची दवा की पुडि़या भी उस के हाथ में सौंप दी.

दिव्या को पहले तो गुस्सा आया, लेकिन फिर उस की आंखें शर्म से झुक गईं. वह अपने दोनों हाथ मुंह पर रख कर शरमाती हुई तेजी से चल दी. शायद वह चिंटू के सामने पहली बार शरमाई थी.

अब जब भी दिव्या भाभी चिंटू के सामने आ जाती है, थोड़ा सा मुसकराती है और नीची निगाह कर के निकल जाती है. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: पलटती बाजी – बेटी ने बाप को दी अनोखी सौगात

Hindi Family Story: अपने पान के खोखे के भीतर बैठे तेज गरमी से उबलते उमराव का हाथ बारबार बढ़ी हुई दाढ़ी पर जाता, जो बेवजह खुजली कर के गरमी की बेचैनी को और बढ़ा रही थी. अकसर उस के खोखे तक लोग आते तो उन के लिहाज से वह हाथ धोता, मगर वे भी जाने क्यों पास की बड़ेबड़े शीशों वाली नई बनी दुकान की ओर मुड़ जाते. उस दुकान का मालिक सरजू भी एकदम टिपटौप था.

मगर उमराव की निगाह में सरजू कटखना कुत्ता था. उस ने दुकान में हजारों रुपए के तो शीशे लगवाए थे, माल ठसाठस भरा था, पर उमराव का रुपए 2 रुपए का माल भी बिक जाए तो उस की आंख में सूअर का बाल उग आता था. जैसे कमानेधमाने का हक सिर्फ सरजू को ही है. वह 2-4 बार धमकी भी दे चुका था, ‘‘दुकान उठवा कर फिंकवा दूंगा.’’

सरजू की दुकान पर आने वाले नशेड़ी और गुंडे, लफंगे उस की दुकान को न केवल हिकारत की नजर से देखते, बल्कि अबेतबे कह कर उस से पानीवानी भी मांगते यानी पान खाओ सरजू के यहां और बेगारी करे उमराव.

अरे भाई, कभीकभी एकाध बार ही बोहनी करवाओ तो उसे पानी देने में कोई तकलीफ नहीं, मगर खाली रोब कौन झेले, इसीलिए तो वह कभीकभार अपनेआप को आदमी समझने की गलती कर बैठता था और गाली खाने के साथ एकाध बार थप्पड़ भी खा चुका है.

उमराव बेचारा मुश्किल में था. उस की जिंदगी में जैसे रोब ही बदा था. गांव में ठाकुरों का रोब, यहां शोहदों का रोब. गांव में लोगों ने खेत हथियाए तो वह शहर आया. मगर शहर गांव का भी लक्कड़दादा निकला. यहां के सांपों के डसने का तो कोई मंत्र ही नहीं था.

दुकान पर ही जलालत होती तो वह झेल ले जाता, पर यहां तो उस के किराए की खोली भी एक मुसीबत थी, इसलिए नहीं कि वह आरामदेह न हो कर तंग, सीलन भरी और टीन की तपने वाली छत थी, बल्कि इसलिए कि उस की बिटिया बुधिया धीरेधीरे जवानी की डगर पर कदम रख रही थी.

कभीकभी उमराव सोचता कि काश, गरीबों की बेटियां जवान ही न होतीं तो कितना अच्छा होता. फिर तो गली के छिछोरे लफंगे उस की खोली के सामने ठहाके न लगाते और न ही सीटियां बजाते.

पर जिस बात पर बस नहीं है उस का किया ही क्या जाए. उस के बस में केवल इतना था कि वह 2-4 बार दुकान में ताला लगा कर खोली की तरफ चला जाता. कभीकभी तो खोली के सामने ऐसा जमघट होता कि उस का धड़कता दिल एकदम तेज दर्द करने लगता. मगर वह खोली के दरवाजे तक जाने की हिम्मत न कर पाता और उलटे पैर लौट आता.

हालांकि उसे बुधिया पर पूरा यकीन था. वह जानता था कि वह बेचारी बिगड़ी नहीं है और यही खयाल उसे और बेबस कर जाता, काश, उस में इतनी ताकत होती कि खोली के आगे ठहाके लगाने वालों के थप्पड़ रसीद कर सकता.

इस तरह की लाचारी में तो बुधिया को अनचाहे आंसू पीने के सिवा कोई चारा नहीं था और बूढ़े बाप की बेबसी के इस दौर में कुछ भी घट सकता था.

उमराव इन खयालों में बेचैन हो उठा. पड़ोस की दुकान पर सिगरेट पीता एक लड़का मोटरसाइकिल की गद्दी पर बैठा धुआं इस अंदाज से फेंक रहा था कि उमराव को अपना वजूद ही धुआंधुआं नजर आने लगा. उसे महसूस हुआ जैसे वह लड़का अपनी उल्लुओं जैसी आंखों से उसे ही घूर रहा हो.

उमराव ने इस विचार के आते ही अपने सीने में कुछ दबाव महसूस किया और सोचा कि हो सकता है कि खोली का भी यही हाल हो. वह तो फिर भी दुकान बंद कर सकता है, पर बेचारी बुधिया क्या करेगी. इसी खयाल के तहत उस ने खोखे को ताला मारा और गरमी की दोपहर के बावजूद खोली की ओर चल दिया.

रास्ते में लू के थपेड़ों और चुहचुहाते पसीने के बावजूद उमराव कुछ ताजगी महसूस करने लगा. यहां कम से कम उसे घूरने या दुत्कारने वाला तो कोई नहीं था. उस ने ताजा हवा फेफड़ों में भरी और मन को दिलासा दिया कि कहीं कुछ गड़बड़ नहीं होने वाली है. हिम्मत से काम लेने की जरूरत है. ऐसे तो दुनिया का चलन ही गड़बड़ है, पर खुद ठीक हो तो सब ठीक है.

थोड़ी ही देर में उमराव अपनी खोली के दरवाजे पर खड़ा था. वहां सन्नाटा था. दरवाजा भिड़ा हुआ था, पर फिर भी कमरे का काफी हिस्सा बाहर से नजर आ रहा था.

पहले तो उसे बुधिया पर गुस्सा आया कि सांकल चढ़ा लेनी थी, कायदे से. ऐसी लापरवाही को इशारा समझ कर लफंगों की हिम्मत बढ़ती है. मगर दूसरे ही पल उस ने सोचा कि नहीं, वह भी हाड़मांस की बनी है. पूरी खुली दुकान में उसे गरमी लगती है तो यहां भट्ठी सी तपती खोली में बुधिया को भी ताजा हवा न सही, गरमी से राहत की जरूरत महसूस होती होगी.

अपनी गरीबी पर उस का दिल रो उठा. कितने सपनों से इसे पाला था. जब गोद में ही थी, तब मरतेमरते इस की मां ने इसे कभी कोई तकलीफ न होने देने का वचन ले कर उमराव की गोद में अपनी आंखें बंद कर ली थीं. कितने अरमान थे, एकलौती बेटी को ले कर. कहां अब उसे भूखे भेड़ियों से बचाना ही एक टेढ़ा मसला है.

उमराव ने देखा कि भोली हिरनी सी बुधिया अपने बाल संवार रही थी, दरवाजे की ओर पीठ कर के. वह एक पल को सिहर उठा. उसे क्या पता कि मां की कमी महसूस हुई. वह होती तो बेटी की कायदे से देखभाल करती. तब उमराव बेफिक्र हो कर दुकानदारी कर सकता था. मगर अब तो उस का दिल न दुकानदारी में लग पाता और न खोली में.

खोली के दरवाजे पर उस के खांसने से बुधिया ने मुड़ कर देखा. फिर दुपट्टा ठीक करते हुए बापू को बैठने का इशारा करती हुई पानी का गिलास उसे पकड़ाने लगी. पानी पी कर उसे कुछ चैन आया. कितनी समझदार है, बुधिया. काश, उस के सपनों की शान पर यह चढ़ पाती. वह धीरे से मुसकरा दिया.

उमराव की मुसकराहट देख कर बुधिया खिल उठी. बरबस उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘क्यों, क्या बात है बापू, आज बड़े खुश हो?’’

‘‘हां बेटी, एक बात मेरे मन में है, अगर तू माने,’’ वह हंस पड़ा.

‘‘बोलो बापू, क्या सोचा है?’’ कुछ मुसकराते हुए बुधिया ने कहा.

‘‘मुझे हमेशा तेरी चिंता लगी रहती है. मैं सोचता हूं कि अपने खोखे के पास एक बैंच डाल दूं और एक चाय की दुकान खोल दूं. तू चाय बनाना और मैं पान बेचूंगा. तेरे पास चाय पीने वाले मेरे पास पान खाएंगे. इसी तरह अपनी दुकानदारी चल निकलेगी. यहां चाय की कोई दुकान है भी नहीं,’’ उमराव एक ही सांस में कह गया.

‘‘हां, बापू, ठीक है. मेरा दिल भी वहां लगा रहेगा. चार पैसे भी जमा होंगे,’’ बुधिया बहुत खुश हुई.

‘‘हां, पर एक बात का खयाल रहे, कपड़ेलत्ते जरा साफ पहनने होंगे. वहां मातमी सूरत बना कर न बैठना, समझी?’’ पड़ोसी पान वाले की दुकान के चलने का राज समझ कर उमराव ने कहा.

‘‘हांहां, सब समझती हूं. बस एक तिरपाल डलवानी पड़ेगी. 2 मटके पानी और बैंच. कुल्हड़ों का इंतजाम कर लेना, गिलास धोने लगी तो चाय बनाना मुश्किल होगा…’’ बुधिया बोली, ‘‘वह चाय बनाऊंगी कि लोग खिंचे चले आएंगे.’’

उमराव का सोचा वाकई सच निकला. दुकान चल निकली थी. जो मोटरसाइकिलें पहले पड़ोसी की दुकान पर खड़ी होती थीं, वह अब बुधिया की चाय की दुकान पर खड़ी होने लगीं.

वह मुसकरा कर चाय देती. लोग अपने दोस्तों से कहते, ‘‘भई, चाय हो तो ऐसी.’’

ठंडे पानी के साथ बुधिया की तिरछी मुसकान का भी कुछ असर था. कई लोग एक प्याला चाय पीने का इरादा कर के आते और 2-2 पी कर जाते, क्योंकि बैठने, बतियाने के अलावा अखबार भी पढ़ने को मिल जाता. चलते समय वह बापू की दुकान की ओर इशारा कर देती और लोग वहीं से पान, सिगरेट खरीदते.

कल तक सुनसान रहने वाली उमराव की दुकान खूब चलने लगी थी. वह सोचता था कि अब कुछ ही दिनों में वह भी पड़ोसी की तरह अपनी दुकान में नीचे से ऊपर तक शीशे ही शीशे लगवा लेगा. पड़ोसी सरजू को लगता था कि उस की मक्खियां मारने की बारी आ गई है.

अब पैसे के आने के साथ बुधिया के जिस्म और कपड़ों पर भी निखार आ रहा था. उमराव को दुकान में बैठने वाले शोहदों से अब कोई तकलीफ नहीं थी और न ही बुधिया की तिरछी चितवन पर ही उस की छाती में कोई दर्द उठता था. वह कारोबार के गुर जान गया था. वह पड़ोसी की ठप होती दुकानदारी का मजा लेना भी जान गया था.

अभी कल ही पड़ोसी ने उमराव की मुसकान पर गुस्सा हो कर कुछ अंटशंट बका था तो वह तो चुप रहा था, पर बुधिया की दुकान पर चाय के बहाने हर रोज बैठने वाले लाल मोटरसाइकिल वाले हट्टेकट्टे समीर ने सरजू का कौलर पकड़ कर धक्का देते हुए कहा था, ‘‘अबे, बूढ़ा समझ कर उमराव पर टर्राता है. खबरदार, जो आइंदा उस की ओर देखा भी. क्या गरीब को रोटीरोजी का हक ही नहीं है? वह दो पैसे कमाने लगा तो तेरे पेट में मरोड़ होने लगी. अब की बार कुछ कहा तो दुकान की एकएक चीज नाली में पड़ी मिलेगी.’’

सरजू समझ गया था. बुधिया उसे अंगूठा दिखाती हुई हंस रही थी. सरजू तो जरूर जलाभुना होगा, मगर उमराव को उस पल बुधिया में अपना पहरेदार रूप नजर आया. वह सोचने लगा कि सालभर ऐसी ही कमाई हो जाए, तो फिर वह बुधिया के हाथ पीले करने में देर नहीं करेगा. Hindi Family Story

Hindi Kahani: अंधेरी गुफा – जब मासूम बच्चों ने टीचर की लगाई क्लास

Hindi Kahani: मैं अपनी कक्षा के छात्रों से कहता रहता था कि पढ़ने के अलावा और भी अच्छीअच्छी बातें सीखें. मन में कोई सवाल हो पूछ लें, मैं जवाब दे दूंगा.

पहले तो बच्चे झिझके, पर एक दिन उन्होंने मुझ पर ऐसे सवालों की बौछार कर दी कि मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा.

‘‘मास्टरजी, रशीद मेरा दोस्त है. हम दोनों साथसाथ खेलते हैं, साथसाथ स्कूल आते हैं, मेला देखने भी साथसाथ जाते हैं. हम में बहुत प्यार है. ईद पर वह मुझे अपने घर से सेवइयां ला कर खिलाता है और मैं दीवाली पर उसे घर की बनी गुझिया और समोसे खिलाता हूं. क्या बड़े लोग हमारी तरह मिलजुल कर एकसाथ नहीं रह सकते? कल ही एक खबर में पढ़ा था कि 4-5 लोगों ने एक मुसलिम को सरेआम सड़क पर मार डाला.’’

मेरा सिर धरती से लगता जा रहा था. मेरा सारा जोश हवा हो चुका था. लग रहा था कि मैं कुछ जानता ही नहीं. बहुत जानने का गुमान चूरचूर हो गया था. मासूम बच्चों से भरी उस क्लास में सब से गंवार और अनपढ़ मैं खुद था, क्योंकि उन के किसी भी सवाल का सही जवाब मेरे पास नहीं था.

जब मैं स्कूल में नयानया आया था, तब ऐसा सवाल पूछने की हिम्मत किसी भी छात्र में नहीं थी. यह बदलाव मैं ही उन में लाया था.

दरअसल, बीऐड के बाद बहुत हाथपैर मारने के बाद एक देहाती सरकारी स्कूल में नौकरी मिली. उस स्कूल में 12वीं जमात तक की पढ़ाई होती थी.

नईनई नौकरी थी. किसी स्कूल में मास्टर बनने का पहला मौका था. मन में उमंग थी, लगन थी. बच्चों को कुछ नया सिखाने की उमंग थी. उस समय मेरे लिए मास्टरी केवल रोजीरोटी का धंधा भर नहीं थी, बल्कि मेरे मन में बच्चों को पढ़ाने के अलावा उन्हें अच्छीअच्छी बातें सिखाने की चाहत भी हिलोरें मार रही थीं. बच्चों को स्कूली किताबें पढ़ाने के अलावा कुछ जरूरी जानकारियां देना भी मैं अपना फर्ज समझता था.

15 अगस्त का दिन था. स्कूल में तिरंगा झंडा फहराने के बाद छुट्टी हो गई. अगले दिन मैं छठी कक्षा के लड़कों को पढ़ा रहा था. अचानक मैं उन से पूछ बैठा, ‘‘15 अगस्त को तिरंगा झंडा क्यों फहराते हैं?’’ ज्यादातर बच्चे चुप रह गए. 2-4 बच्चों ने जवाब दिए भी तो आधेअधूरे.

‘‘हमारे देश की राजधानी कहां हैं?’’ मेरे इस सवाल पर भी कोई खास हरकत नहीं हुई. मुझे अचरज के साथ अफसोस भी हुआ. छठी में पढ़ने वाले लड़कों को ये बातें तो जरूर मालूम होनी चाहिए. लेकिन कोई भी मास्टर इस बात पर ध्यान नहीं देता था. कोई बच्चा पढ़े, या न पढ़े, किसी को कोई मतलब नहीं था.

पूरी कक्षा में कुछेक बच्चों के पास ही किताबें रहती थीं. बाकी बच्चे ताकझांक कर या मास्टरों के पास अपने घरों से दूध, घी, गुड़ या दूसरी चीजें पहुंचा कर काम चला लिया करते थे. मास्टरजी उन चीजों की वजन परख कर उसी के मुताबिक इम्तिहान में नंबर दे देते थे.

यह तो कभीकभार ही होता था कि कक्षा में मास्टर और बच्चे दोनों मौजूद रहें. जब बच्चे आते तो मास्टर नहीं, और जब मास्टर आते तो बच्चे नहीं. हां, स्कूल के रजिस्टरों से अलबत्ता यह कमी दूर कर दी जाती.

स्कूल में पढ़ाई की यह हालत देख कर मेरा दिल जख्मी हो उठा. जो बच्चे अपने देश की राजधानी तक न बता पाएं, वे आगे चल कर क्या करेंगे? यह सोच कर मैं बहुत चिंतित हो उठा.

स्कूल में ही एक छोटा सा पुस्तकालय भी था, जिस में कुछ छोटीमोटी किताबों के अलावा 2-3 दिन के बासी अखबार भी रहते थे. मैं ने अपने बच्चों को उन अखबारों में छपी छोटीमोटी खबरें व कहानियां पढ़ने के लिए कहा.

मैं ने उन्हें यह भी कहा कि अगर कोई बात समझ में न आए, तो तुम लोग मुझ से उस का मतलब पूछ सकते हो. हालांकि सब के घरों में टैलीविजन नहीं थे, पर ज्यादातर बच्चे कहीं न कहीं जा कर टैलीविजन के कार्यक्रम जरूर देखते थे. मैं ने उन से रेडियो, टैलीविजन पर खबरें सुनते रहने के लिए भी कहा. कुछ के बड़े भाइयों के पास मोबाइल फोन थे. दिन में वे रील्स देखते थे या ह्वाट्सएप पर कुछ पढ़ते थे.

कई दिनों तक बच्चों को खबरें पढ़नेसुनने की सलाह देते रहने के बाद मैं ने बच्चों के रुझान में होने वाले बदलाव का पता लगाने के लिए पूछा, ‘‘तुम में से कितने बच्चे अखबार की खबरें पढ़ते हैं या टैलीविजन पर न्यूज देखते हैं? हाथ उठाओ.’’

मेरे पूछने पर जब उठने वाले हाथों की तादाद बढ़ने लगी, तो मुझे बड़ी खुशी हुई.

एक दिन मुझे लगा कि मेरी क्लास के लड़कों की मासूम आंखों में खबरों के बारे में कुछ छोटे व गंभीर सवाल तैर रहे हैं. मैं ने उन्हें ढांढ़स देते हुए कहा कि वे जो भी पूछना चाहें, पूछ सकते हैं.

कुछ देर के सन्नाटे के बाद पहला सवाल स्प्रिंग की तरह उछल कर सामने आया.

‘‘हत्या किसे कहते हैं? उसे कैसे करते हैं?’’ एक बच्चे ने आगे बढ़ कर पूछा.

‘‘दुश्मनी में लोग एकदूसरे को जान से मार डालते हैं. इसी को हत्या करना कहते हैं, ‘‘बच्चे के सवाल का कुछ सकपकाते हुए मैं ने जवाब दिया.

‘‘जो लोग हत्या करते हैं, वे गंदे लोग होते हैं न मास्टरजी?’’ एक भोली सी सूरत पर फैली मासूम आंखों में नफरत तैर रही थी.

उधर से मैं अपनी गरदन मोड़ भी नहीं पाया था कि एक लड़की ने जानना चाहा, ‘‘जो लोग हत्या करते हैं, उन्हें डर नहीं लगता? वे तो बच्चों की भी हत्या कर देते हैं. उन की बच्चों से क्या लड़ाई होती है?’’

आवाज मेरे गले में अटकने लगी. तभी एक दूसरे लड़के का सवाल चाबुक की मार सा घाव दे गया, ‘‘जो बच्चे मरते हैं, उन की मां तो रोती होंगी न?’’

‘‘मास्टरजी, युवती किसे कहते हैं?’’ एक कोने से आवाज आई.

उस लड़की का सवाल मुझे जवाब देने लायक लगा. मैं ने कहा, ‘‘देखो, जब तुम कुछ और बड़ी हो जाओगी, तब तुम्हें युवती कहेंगे.’’

जब मैं ने उस से पूछा कि उस का सवाल किस घटना से जुड़ता हुआ है, तो टूटेफूटे शब्दों में जोकुछ भी वह समझा पाई, उसे पूरा सुनने से पहले ही मैं ने अपने कानों में उंगली डाल ली.

‘‘रात को 4 बदमाशों ने एक युवती के साथ…’’ इस से आगे वह न तो अपनी बात पूरी कर पाई और न ही मैं सुन पाया.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि इन सवालों की बौछार से बचने के लिए कहां व किस कोने में जा छिपूं. तभी मुझे सबकुछ जानने वाला समझ कर एक दूसरी लड़की ने अपना एक भोलाभाला मासूम सवाल मेरे सामने रख दिया, ‘‘अगले महीने मेरे सुरेश भैया की शादी होगी, तो क्या मेरी मां पर उन की बहू पुलिस का केस कर देगी?’’

‘‘मैं तो कभी शादी नहीं करूंगा,’’ एक दूसरे लड़के की एक जोड़ी आंखें डर से फैल गईं.

मेरा कद बारबार बौना होता जा रहा था. मुझे संभलने का मौका दिए बगैर एक हथगोला सा क्लास की पहली लाइन से आ कर मेरे माथे पर लगा, ‘‘मास्टरजी, लोग दूसरों के घर क्यों जला देते हैं?’’

मेरी बेचैनी बढ़ गई और पसीना पोंछते हुए मैं क्लास से बाहर निकल आया और कैद कर लिया खुद को उन सवालों की अंधेरी गुफा में, जिन का मेरे पास कोई जवाब नहीं था, लेकिन फिर भी चैन नहीं मिला.

सोचने लगा, ‘कब हम इतने समझदार और अच्छे रहनसहन वाले हो पाएंगे? कब हमारी पूरी बिरादरी अपना चालचलन सुधार कर मेलजोल से रहने लगेगी कि ऐसे सवालों से हमारा सिर शर्म से नहीं झुकेगा? वह वक्त कब आएगा, जब बच्चों के हर सवाल का जवाब हमारे पास रहेगा?’ Hindi Kahani

Family Story In Hindi: किराए की कोख – कौए के घोंसले में कोयल के अंडे

Family Story In Hindi: पूरे महल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी.

जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका.

सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी.

रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही.

सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही

उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’

सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे.

एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझे कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’

सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा मत करो.’’

महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’ सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी. तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी,

महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझे वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक सम?ा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए.

सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: मकान मालकिन – क्यों थीं प्रभा देवी आंटी खड़ूस?

Hindi Family Story: ‘‘साहबजी, आप अपने लिए मकान देख रहे हैं?’’ होटल वाला राहुल से पूछ रहा था.

पिछले 2 हफ्ते से राहुल एक धर्मशाला में रह रहा था. दफ्तर से छुट्टी होने के बाद वह मकान ही देख रहा था. उस ने कई लोगों से कह रखा था. होटल वाला भी उन में से एक था.

होटल का मालिक बता रहा था कि वेतन स्वीट्स के पास वाली गली में एक मकान है,

2 कमरे का. बस, एक ही कमी थी… उस की मकान मालकिन.

पर होटल वाले ने इस का एक हल निकाला था कि मकान ले लो और साथ में दूसरा मकान भी देखते रहो. उस मकान में कोई 2 महीने से ज्यादा नहीं रहा है.

‘‘आप मकान बता रहे हो या डरा रहे हो?’’ राहुल बोला, ‘‘मैं उस मकान को देख लूंगा. धर्मशाला से तो बेहतर ही रहेगा.’’

अगले दिन दफ्तर के बाद राहुल अपने एक दोस्त प्रशांत के साथ मकान देखने चला गया. मकान उसे पसंद था, पर मकान मालकिन ने यह कह कर उस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि रात को 10 बजे के बाद गेट नहीं खुलेगा.

राहुल ने सोचा, ‘मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर देर रात हो जाती है…’ वह बोला, ‘‘आंटी, मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर रात को देर हो सकती है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ आंटी बोलीं, ‘‘अगर पसंद न हो, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल कुछ देर खड़ा रहा और बोला, ‘‘आंटी, आप उस हिस्से में एक गेट और लगवा दो. उस की चाबी मैं अपने पास रख लूंगा.’’

आंटी ने अपनी मजबूरी बता दी, ‘‘मेरे पास खर्च करने के लिए एक भी पैसा नहीं है.’’

राहुल ने गेट बनाने का सारा खर्च खुद उठाने की बात की, तो आंटी राजी हो गईं. इस के साथ ही उस ने झगड़े की जड़ पानी और बिजली के कनैक्शन भी अलग करवा लिए. दोनों जगहों के बीच दीवार खड़ी करवा दी. उस में दरवाजा भी बनवा दिया, लेकिन दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ.

सारा काम पूरा हो जाने के बाद राहुल मकान में आ गया. उस ने मकान मालकिन द्वारा कही गई बातों का पालन किया.

राहुल दिन में अपने मकान में कम ही रहता था. खाना भी वह होटल में ही खाता था. हां, रात में वह जरूर अपने कमरे पर आ जाता था. उस के हिस्से में ‘खटखट’ की आवाज से आंटी को पता चल जाता और वे आवाज लगा कर उस के आने की तसल्ली कर लेतीं.

उन आंटी का नाम प्रभा देवी था. वे अकेली रहती थीं. उन की 2 बेटियां थीं. दोनों शादीशुदा थीं.

आंटी के पति की मौत कुछ साल पहले ही हुई थी. उन की मौत के बाद वे दोनों बेटियां उन को अपने साथ रखने को तैयार थीं, पर वे खुद ही नहीं रहना चाहती थीं. जब तक शरीर चल रहा है, तब तक क्यों उन के भरेपूरे परिवार को परेशान करें.

अपनी मां के एक फोन पर वे दोनों बेटियां दौड़ी चली आती थीं. आंटी और उन के पति ने मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पाला था. उन के पास अब केवल यह मकान ही बचा था, जिस को किराए पर उठा कर उस से मिले पैसे से उन का खर्च चल जाता था.

एक हिस्से में आंटी रहती थीं और दूसरे हिस्से को वे किराए पर उठा देती थीं. पर एक मजदूर के  पास मजदूरी से इतना बड़ा मकान नहीं हो सकता. पतिपत्नी दोनों ने खूब मेहनत की और यहां जमीन खरीदी. धीरेधीरे इतना कर लिया कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा कर आमदनी का एक जरीया तैयार कर लिया था.

राहुल अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. नौकरी पर वह यहां आ गया और आंटी का किराएदार बन गया. दोनों ही अकेले थे. धीरेधीरे मांबेटे का रिश्ता बन गया.

घर के दोनों हिस्सों के बीच का दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ. हमेशा खुला रहा. राहुल को कभी ऐसा नहीं लगा कि आंटी गैर हैं.

आंटी के बारे में जैसा सुना था, वैसा उस ने नहीं पाया. कभीकभी उसे लगता कि लोग बेवजह ही आंटी को बदनाम करते रहे हैं या राहुल का अपना स्वभाव अच्छा था, जिस ने कभी न करना नहीं सीखा था. आंटी जो भी कहतीं, उसे वह मान लेता.

आंटी हमेशा खुश रहने की कोशिश करतीं, पर राहुल को उन की खुशी खोखली लगती, जैसे वे जबरदस्ती खुश रहने की कोशिश कर रही हों. उसे लगता कि ऐसी जरूर कोई बात है, जो आंटी को परेशान करती है. उसे वे किसी से बताना भी नहीं चाहती हैं. उन की बेटियां भी अपनी मां की समस्या किसी से नहीं कहती थीं.

वैसे, दोनों बेटियों से भी राहुल का भाईबहन का रिश्ता बन गया था. उन के बच्चे उसे ‘मामामामा’ कहते नहीं थकते थे. फिर भी वह एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं बढ़ता था. लोग हैरान थे कि राहुल अभी तक वहां कैसे टिका हुआ है.

आज रात राहुल जल्दी घर आ गया था. एक बार वह जा कर आंटी से मिल आया था, जो एक नियम सा बन गया था. जब वह देर से घर आता था, तब यह नियम टूटता था. हां, तब आंटी अपने कमरे से ही आवाज लगा देती थीं.

रात के 11 बज रहे थे. राहुल ने सुना कि आंटी चीख रही थीं, ‘मेरा बच्चा… मेरा बच्चा… वह मेरे बच्चे को मुझ से छीन नहीं सकता…’ वे चीख रही थीं और रो भी रही थीं.

पहले तो राहुल ने इसे अनदेखा करने की कोशिश की, पर आंटी की चीखें बढ़ती ही जा रही थीं. इतनी रात को आंटी के पास जाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी, भले ही उन के बीच मांबेटे का अनकहा रिश्ता बन गया था.

राहुल ने अपने दोस्त प्रशांत को फोन किया और कहा, ‘‘भाभी को लेता आ.’’ थोड़ी देर बाद प्रशांत अपनी बीवी को साथ ले कर आ गया.

आंटी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. यह उन के लिए हैरानी की बात थी. तीनों अंदर घुसे. राहुल सब से आगे था. उसे देखते ही पलंग पर लेटी आंटी चीखीं, ‘‘तू आ गया… मुझे पता था कि तू एक दिन जरूर अपनी मां की चीख सुनेगा और आएगा. उन्होंने तुझे छोड़ दिया. आ जा बेटा, आ जा, मेरी गोद में आ जा.’’

राहुल आगे बढ़ा और आंटी के सिर को अपनी गोद में ले कर सहलाने लगा. आंटी को बहुत अच्छा लग रहा था. उन को लग रहा था, जैसे उन का अपना बेटा आ गया. धीरेधीरे वे नौर्मल होने लगीं.

प्रशांत और उस की बीवी भी वहीं आ कर बैठ गए. उन्होंने आंटी से पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने टाल दिया. वे राहुल की गोद में ही सो गईं. उन की नींद को डिस्टर्ब न करने की खातिर राहुल बैठा रहा.

थोड़ी देर बाद प्रशांत और उस की बीवी चले गए. राहुल रातभर वहीं बैठा रहा. सुबह जब आंटी ने राहुल की गोद में अपना सिर देखा, तो राहुल के लिए उन के मन में प्यार हिलोरें मारने लगा. उन्होंने उस को चायनाश्ता किए बिना जाने नहीं दिया.

राहुल ने दफ्तर पहुंच कर आंटी की बड़ी बेटी को फोन किया और रात में जोकुछ घटा, सब बता दिया. फोन सुनते ही बेटी शाम तक घर पहुंच गई. उस बेटी ने बताया, ‘‘जब मेरी छोटी बहन 5 साल की हुई थी, तब हमारा भाई लापता हो गया था. उस की उम्र तब 3 साल की थी. मांबाप दोनों काम पर चले गए थे.

‘‘हम दोनों बहनें अपने भाई के साथ खेलती रहतीं, लेकिन एक दिन वह खेलतेखेलते घर से बाहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया.

‘‘उस समय बच्चों को उठा ले जाने वाले बाबाओं के बारे में हल्ला मचा हुआ था. यही डर था कि उसे कोई बाबा न उठा ले गया हो.

‘‘मां कभीकभी हमारे भाई की याद में बहक जाती हैं. तभी वे परेशानी में अपने बेटे के लिए रोने लगती हैं.’’

आंटी की बड़ी बेटी कुछ दिन वहीं रही. बड़ी बेटी के जाने के बाद छोटी बेटी आ गई. आंटी को फिर कोई दौरा नहीं पड़ा.

2 दिन हो गए आंटी को. राहुल नहीं दिखा. ‘खटखट’ की आवाज से उन को यह तो अंदाजा था कि राहुल यहीं है, लेकिन वह अपनी आंटी से मिलने क्यों नहीं आया, जबकि तकरीबन रोज एक बार जरूर वह उन से मिलने आ जाता था. उस के मिलने आने से ही आंटी को तसल्ली हो जाती थी कि उन के बेटे को उन की फिक्र है. अगर वह बाहर जाता, तो कह कर जाता, पर उस के कमरे की ‘खटखट’ बता रही थी कि वह यहीं है. तो क्या वह बीमार है? यही देखने के लिए आंटी उस के कमरे पर आ गईं.

राहुल बुखार में तप रहा था. आंटी उस से नाराज हो गईं. उन की नाराजगी जायज थी.

उन्होंने उसे डांटा और बोलीं, ‘‘तू ने अपनी आंटी को पराया कर दिया…’’

वे राहुल की तीमारदारी में जुट गईं. उन्होंने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारे मांबाप जब तक आएंगे, तब तक हम ही तेरे अपने हैं.’’

राहुल के ठीक होने तक आंटी ने उसे कोई भी काम करने से मना कर दिया. उसे बाजार का खाना नहीं खाने दिया. वे उस का खाना खुद ही बनाती थीं.

राहुल को वहां रहते तकरीबन 9 महीने हो गए थे. समय का पता ही नहीं चला. वह यह भी भूल गया कि उस का जन्मदिन नजदीक आ रहा है.

उस की मम्मी सविता ने फोन पर बताया था, ‘हम दोनों तेरा जन्मदिन तेरे साथ मनाएंगे. इस बहाने तेरा मकान भी देख लेंगे.’

आज राहुल की मम्मी सविता और पापा रामलाल आ गए. उन को चिंता थी कि राहुल एक अनजान शहर में कैसे रह रहा है. वैसे, राहुल फोन पर अपने और आंटी के बारे में बताता रहता था और कहता था, ‘‘मम्मी, मुझे आप जैसी एक मां और मिल गई हैं.’’

फोन पर ही उस ने अपनी मम्मी को यह भी बताया था, ‘‘मकान किराए पर लेने से पहले लोगों ने मुझे बहुत डराया था कि मकान मालकिन बहुत खड़ूस हैं. ज्यादा दिन नहीं रह पाओगे. लेकिन मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं देखा.’’

तब उस की मम्मी बोली थीं, ‘बेटा, जब खुद अच्छे तो जग अच्छा होता है. हमें जग से अच्छे की उम्मीद करने से पहले खुद को अच्छा करना पड़ेगा. तेरी अच्छाइयों के चलते तेरी आंटी भी बदल गई हैं,’ अपने बेटे के मुंह से आंटी की तारीफ सुन कर वे भी उन से मिलने को बेचैन थीं.

राहुल मां को आंटी के पास बैठा कर अपने दफ्तर चला गया. दोनों के बीच की बातचीत से जो नतीजा सामने आया, वह हैरान कर देने वाला था.

राहुल के लिए तो जो सच सामने आया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था. उस की आंटी जिस बच्चे के लिए तड़प रही थीं, वह खुद राहुल था.

मां ने अपने बेटे को उस की आंटी की सचाई बता दी और बोलीं, ‘‘बेटा, ये ही तेरी मां हैं. हम ने तो तुझे एक बाबा के पास देखा था. तू रो रहा था और बारबार उस के हाथ से भागने की कोशिश कर रहा था. हम ने तुझे उस से छुड़ाया. तेरे मांबाप को खोजने की कोशिश की, पर वे नहीं मिले.

‘‘हमारा खुद का कोई बच्चा नहीं था. हम ने तुझे पाला और पढ़ाया. जिस दिन तू हमें मिला, हम ने उसी दिन को तेरा जन्मदिन मान लिया. अब तू अपने ही घर में है. हमें खुशी है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया.’’

राहुल बोला, ‘‘आप भी मेरी मां हैं. मेरी अब 2-2 मांएं हैं.’’

इस के बाद घर के दोनों हिस्से के बीच की दीवार टूट गई. Hindi Family Story

Hindi Short Story: पेशी – जब डा. राजेश फंसे कोर्ट में

Hindi Short Story: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शिवपुर में डा. राजेश इकलौते चिकित्सक हैं. आज वे बहुत जल्दी में हैं क्योंकि उन्हें सरकारी गवाह के तौर पर गवाही देने के लिए 25 किलोमीटर दूर शाहगांव की अदालत में जाना है.

डा. राजेश ने चिकित्सालय में 2-4 मरीज देखे, फिर सिस्टर को बुला कर कहा, ‘‘सिस्टर, मैं शाहगांव कोर्ट जा रहा हूं, आप मरीजों को दवाएं दे दीजिएगा, कोई अधिक बीमार हो तो रेफर कर दीजिएगा.’’

डा. राजेश बाइक से शाहगांव के लिए चल दिए, वे ठीक 11 बजे न्यायालय पहुंच गए. न्यायालय के बाहर सन्नाटा था. कुछ पक्षी, विपक्षी और निष्पक्षी लोग, चायपान की दुकान में चायपान कर रहे थे.

डा. राजेश ने सोचा कि बयान हो जाए तभी खाना खाऊंगा और 1 बजे तक शिवपुर पहुंच जाऊंगा. इसलिए वे सीधे न्यायालय के कक्ष में चले गए. न्यायालय के कक्ष में 1-2 बाबू और 1 पुलिस वाला फाइलें उलटपलट रहे थे. डा. राजेश ने पुलिस वाले को समन दिखा कर उस को पदोन्नत करते हुए कहा, ‘‘चीफ साहब, मेरा बयान शीघ्र करा दें, अपने अस्पताल में मैं अकेला हूं.’’

‘‘साहब अभी चैंबर में हैं, उन के आने पर बात कर लीजिएगा,’’ पुलिस वाले ने डा. राजेश से कहा.

डा. राजेश कक्ष में पड़ी एक बैंच पर बैठ गए. उन्होंने देखा कि न्यायाधीश की टेबल पर एक लैपटौप रखा है और टेबल के दोनों छोर पर एकएक टाइपिंग मशीन रखी थी. न्यायाधीश महोदय की कुरसी के पीछे की दीवार पर हृष्टपुष्ट और मुसकराते हुए गांधीजी की तसवीर टंगी थी. तसवीर के  गांधीजी अदालत की ओर न देख कर बाहर खिड़की की ओर देख रहे थे. तसवीर पर 4-5 माह पुरानी, सूखी फूलों की एक माला टंगी थी. केवल जज साहब की कुरसी के ऊपर पंखा चल रहा था.

तब डा. राजेश ने न्यायालय के सेवक से कहा, ‘‘भाई, गरमी लग रही है, पंखा चला दो.’’

सेवक तपाक से बोला, ‘‘इन्वर्टर का कनैक्शन केवल साहब के लिए है.’’

कमरे के सारे लोग पसीनापसीना हो रहे थे. पक्षीविपक्षी (वादी, प्रतिवादी) अपने वकीलों के साथ आ कर बाबू से बात कर रहे थे, वे शायद अगली पेशी की सुविधाजनक तारीख ले रहे थे.

बाबू लोग फाइलें व कागज ले कर साहब के कक्ष में आजा रहे थे. फिर जज साहब के कक्ष से डिक्टेशन और टाइपिंग की आवाजें आने लगीं. वे शायद कोई फैसला लिखवा रहे थे. अब तक 1 बज गया था. डा. राजेश गरमी और अनावश्यक बैठने के कारण विचलित हो कर सोचने लगे कि जैसे उन्होंने अपराध किया हो. उन के मन में बचाव पक्ष के वकील के प्रश्नों, तर्कों, वितर्कों का भय और चिंतन भी था. तभी सेवक, साहब की टेबल पर 1 गिलास पानी रख गया.

साहब कुरसी पर आए. उन के चेहरे पर शासन और अभिजात्य की आभा प्रदीप्त थी. उन्होंने दो घूंट पानी पिया, कुछ फाइलें देखीं. तभी लोक अभियोजक, कुछ वकील और कुछ वादीप्रतिवादी आ गए. साहब ने जब तक फैसला सुनाया तब तक भोजनावकाश हो गया था.

भोजनावकाश के बाद जज साहब आए तब डा. राजेश ने विनती की, ‘‘सर, मैं डा. राजेश हूं, मेरा बयान हो जाए तो अच्छा है.’’

न्यायाधीश महोदय ने उन का समन देखा, फाइल देखी. उन्होंने प्रतिवादी को आवाज लगवाई परंतु तब तक प्रतिवादी का वकील नहीं आया था. तब जज साहब ने कहा, ‘‘डाक्टर साहब, थोड़ा और रुकें, आप को प्रमाणपत्र तो पूरे दिन का ही दिया जाएगा.’’

प्रतिवादी ने वकील को बुलवाया, वह करीब 4 बजे आया. वकील ने फाइल देख कर कहा कि डाक्टर ने तो वादी को कोई चोट ही नहीं लिखी, इसलिए बयान की कोई आवश्यकता नहीं है. डाक्टर को कोर्ट आने का प्रमाणपत्र दिया गया. डा. राजेश खिन्न मन से, भुनभुनाते हुए वापस शिवपुर लौट गए.

न्यायाधीश महोदय अवकाश के बाद शाहगांव लौट रहे थे. शिवपुर के पास ही दिन के 3 बजे उन की गाड़ी का ऐक्सीडैंट हो गया. उन के साथी को कई जगह चोट आई और सिर से खून बहने लगा. साथी को ले कर जज साहब शिवपुर अस्पताल आए पर अस्पताल में ताला लगा था. डाक्टर के आवास में भी ताला लगा था. अस्पताल का सेवक दौड़ कर सिस्टर को बुला लाया.

जज साहब ने सिस्टर को डांटते हुए कहा, ‘‘अस्पताल क्यों बंद है, डाक्टर कहां है?’’

सिस्टर ने धीरे से बताया, ‘‘सर, अस्पताल तो 1 बजे बंद हो जाता है और डाक्टर साहब तो पेशी पर गए हैं.’’

जज साहब ने सिस्टर से कहा, ‘‘फोन कर के तुरंत डाक्टर को बुलाओ.’’

सिस्टर ने डाक्टर को फोन लगाया और रिंग जाने पर उस ने फोन जज साहब को दे दिया.

उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो.’’

‘‘मैं, सिविल जज, आप के अस्पताल से बोल रहा हूं. मेरे साथी को काफी चोट लगी है.’’

‘‘सर, मैं अभी आप के कोर्ट में ही हूं, जितनी देर में मैं आऊंगा उतनी देर में तो आप शाहगांव आ जाएंगे, फिर यहां पर सुविधा भी अधिक है,’’ डा. राजेश ने विनयपूर्वक  कहा.

जज साहब जब तक साथी को ले कर शाहगांव आए तब तक काफी खून बह चुका था. 2 यूनिट खून देने के बाद साथी को होश आया.

न्यायालय में आ कर जज साहब ने स्टाफ को निर्देशित किया कि अगर कोई चिकित्सक गवाही को आए तो यथाशीघ्र उस का बयान करा कर उसे जाने दिया जाए क्योंकि अस्पताल में बहुत से मरीज उस की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं. Hindi Short Story

Romantic Story In Hindi: दुविधा – क्या संगिता और सौमिल की जोड़ी बेमेल थी?

Romantic Story In Hindi: देवकुमार सुबह से ही काफी खुश नजर आ रहे थे. उन की बेटी संगीता को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे. घर की पूरी साफसफाई तो उन्होंने कल ही कर डाली थी. फ्रूट्स, ड्राइफ्रूट्स तथा अच्छी क्वालिटी की मिठाई आज ले आए थे. लड़का रेलवे में इंजीनियर है, अच्छी तनख्वाह पाता है. लड़के के साथ उस के भाईभाभी व मातापिता भी आ रहे थे.

वैसे, लड़के के मातापिता ने तो संगीता को पहले ही देख लिया था और पसंद भी कर लिया था. पसंद आती भी क्यों न? संगीता सुंदर तो है ही, बहुत व्यवहारकुशल भी है. उस ने भी इंजीनियरिंग की है तथा बैंक में काम कर रही है.

देवकुमार सरकारी मुलाजिम थे और उन की पत्नी अंजना सरकारी विद्यालय में शिक्षिका. इकलौती बेटी होने से उन दोनों की इच्छा थी कि जानेपहचाने परिवार में रिश्ता हो जाए, तो बहुत अच्छा होगा. लड़के वाले पास ही के शहर के थे और उन के दूर के रिश्तेदार, जिन के माध्यम से शादी की बात शुरू हुई थी, देवकुमारजी के भी दूर के रिश्ते में लगते थे. देवकुमार ने अपनी बहन व बहनोई को भी बुला लिया था ताकि उन की राय भी मिल सके.

ठीक समय पर घर के सामने एक कार आ कर रुकी. देवकुमार और उन के बहनोई ने दौड़ कर उन का स्वागत किया. ड्राइंगरूम में आ कर सभी सोफे पर बैठ गए. लड़का थोड़ा दुबला लगा लेकिन स्मार्ट, चैक वाली हाफशर्ट तथा जींस पहने हुए, छोटी फ्रैंचकट दाढ़ी. बड़े भाई का एक छोटा सा बच्चा भी था, वे उसे खिलाने में ही व्यस्त रहे.

लड़के के पिता बैंक मैनेजर थे. उन्हें सेवानिवृत्त होने में एक वर्ष बचा था. काफी बातूनी लगे. बच्चों के जन्म से ले कर उन की पढ़ाई और फिर नौकरी तक की बातें बता डालीं. संगीता भी इसी बीच आ चुकी थी. लड़के की मां व भाभी उस से पूछताछ करती रहीं.

लड़के की मां ने सुझाव दिया कि एक अलग कमरे में सौमिल और संगीता को बैठा दें ताकि वे एकदूसरे को सम झ सकें. संगीता की मां दोनों को बगल के कमरे में छोड़ कर आईं. इधर नाश्ते के साथसाथ मैनेजर साहब की बातों में पता ही न चला कि कब एक घंटा बीत गया. तब तक संगीता और सौमिल भी वापस आ चुके थे.

मैनेजर साहब और उन का परिवार आवभगत से संतुष्ट नजर आए. चलते समय देवकुमार के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘हम लोगों को दोतीन दिनों का वक्त दीजिए ताकि घर में सब बैठ कर चर्चा कर सकें और आप को निर्णय बता सकें.’’

उन्हें आत्मीयता से विदा कर देवकुमार का परिवार फिर ड्राइंगरूम में बैठ कर सौमिल और उस के परिवार का विश्लेषण करने लगे. सभी की राय एकमत थी कि परिवार अच्छा व संभ्रांत है. लड़का थोड़ा दुबला है लेकिन सुंदर और स्मार्ट है. उस की सोच व विचार कैसे हैं, यह तो संगीता ही बता पाएगी कि उस से क्या बातें हुईं.

संगीता ने अपनी मां को जो बताया उसे लगा कि उस के विचार सौमिल के विचारों से मेल नहीं खाते. संगीता को घूमनेफिरने, मस्ती करने, डांस करने, पार्टियों में जाना तथा फैशनेबल कपड़े पहनना पसंद है. सौमिल को शांत वातावरण, एकांत, साधारण रहनसहन एवं पुस्तकें पढ़ना पसंद है.

लड़के की मां को ऐसी बहू चाहिए जो अच्छा खाना बनाना जानती हो, गृहस्थी के कार्यों में कुशल हो. उन्हें बहू से नौकरी नहीं करानी. उन्होंने संगीता से कम से कम 4-5 बार पूछा कि क्या वह खाना बना लेती है? क्याक्या बना लेती है?

लड़के के विचार संगीता को पसंद नहीं आए, यह सुन कर देवकुमार चिंता में पड़ गए. अभी तक वे बहुत खुश थे कि बिना इधरउधर भटके अच्छा घर तथा अच्छा वर मिल रहा है.

थोड़ी देर के लिए शांति छा गई, फिर अंजना ने कहा कि अब यदि उन का फोन आता है तो उन्हें क्या जवाब देना है? सभी ने निर्णय संगीता पर ही छोड़ने को तय किया. आखिर उसे पूरी जिंदगी निर्वाह करना है. 3 दिन बीत जाने पर भी जब कोई फोन नहीं आया तो सभी अपनेअपने अनुमान लगाने लगे.

संगीता के फूफाजी बोले, ‘‘मुझे लगता है कि लड़के के बड़े भाई और भाभी को संगीता पसंद नहीं आई, वे दोनों एकदूसरे से आंखोंआंखों के इशारों से पसंद आने न आने का पूछ रहे थे. मैं ने देखा कि बड़े भाई ने नकारात्मक इशारा किया था. आप लोगों ने नोटिस किया होगा, बड़ा भाई एक शब्द भी नहीं बोला पूरे समय, अपने बच्चे को खिलाने में ही लगा रहा था.’’

संगीता की मां बोली, ‘‘हमारी लड़की के सामने तो लड़का कुछ भी नहीं. गोरे रंग और सुंदरता में तो हमारी संगीता इक्कीस ही ठहरती है.’’

संगीता हंसती हुई बोली, ‘‘हम दोनों की जिस तरह से बातें हुई हैं, वह घबरा गया होगा, कभी हामी नहीं भरेगा.’’

संगीता के उठ कर चले जाने के बाद देवकुमार बोले, ‘‘यदि उन की तरफ से रिश्ता स्वीकार नहीं होता है तो हमारी संगीता के मन पर चोट पड़ेगी. पहली बार ही उस को दिखाया है और उन के मना कर देने पर मनोवैज्ञानिक असर तो पड़ेगा ही, उसे सदमा भी लगेगा.’’

संगीता की बूआजी बोली, ‘‘देखो,  2 लोगों के एकजैसे विचार हों, यह तो संभव ही नहीं. जब 2 सगे भाईबहनों के विचार नहीं मिलते, तो ये तो दूसरे परिवार का मामला है. विवाह तो समन्वय बनाने की कला है, प्रेम और त्याग का रिश्ता है. और यह तो सदियों से होता चला आ रहा है कि लड़की को ही निभाना पड़ता है. हमारी संगीता सब कर लेगी. शांत मन से मैं कल उस से बात करूंगी.’’

देवकुमार को पूरी रात नींद नहीं आई. उन्हें संगीता की बूआजी की बातें तर्कसंगत लगीं. वे सोचने लगे कि संगीता को एडजस्ट करना ही होगा. यदि कल शाम तक बैंक मैनेजर साहब का फोन नहीं आता है तो मैं स्वयं फोन लगा कर बात करूंगा.

दूसरे दिन बुआजी ने संगीता को सम झाने की कोशिश की किंतु व्यर्थ.

संगीता बोली, ‘‘बूआजी, उन्हें सिर्फ खाना बनाने वाली बाई चाहिए तो शादी क्यों कर रहे हैं? एक नौकरानी रख लें. एडजस्टमैंट एक तरफ से संभव नहीं, दोनों तरफ से होना चाहिए. यह 21वीं सदी का दौर है. जमाना बदल गया है. उन की मम्मीजी ने कम से कम दस बार यही पूछा, ‘खाना बना लेती हो, क्याक्या बना लेती हो? हमारा लड़का खाने का बहुत शौकीन है, अभी होटल का खाना खाखा कर 3-4 किलो वजन कम हो गया है उस का.’’

देवकुमार शाम को बाजार से घर पहुंचे ही थे कि मैनेजर साहब का फोन आ गया. बड़े ही साफ शब्दों में उन्होंने पूरी बात बताई कि संगीता सभी को अच्छी लगी है. सौमिल का कहना है कि उन दोनों की सोच और विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर भी यदि संगीता को एडजस्ट करने में कोई दिक्कत न हो तो उसे कोई आपत्ति नहीं है.

‘‘आप सब सोचसम झ कर जो भी फैसला लें, मुझे 6-7 दिनों में बता दीजिएगा,’’ मैनेजर साहब ने बड़ी विनम्रता से अपनी बात समाप्त की.

अब गेंद देवकुमार के पाले में आ गई थी. कल रात कैसेकैसे खयाल आते रहे थे. बेटी के मन पर सदमे का सोचसोच कर परेशान थे. मैनेजर साहब कितने सुलझे हुए और स्पष्टवादी हैं. संगीता को समझना होगा. एक अच्छी और स्ट्रेट फौरवर्ड फैमिली है.

रात में खाना खाते समय मन में एक ही बात घूमफिर कर बारबार आ रही थी कि कैसे संगीता को अपने मन की बात समझाऊं. मैं ने और अंजना ने जो चाहा था, सब मिल रहा है. लड़का अच्छा पढ़ालिखा, अच्छी नौकरी वाला, सुंदर और स्मार्ट है. जानापहचाना परिवार है. और सब से बड़ी बात, पास के शहर में रहेगी तो कभी भी बुला लो या जा कर मिल आओ. वे बारबार संगीता को देखते, उस के मन में क्या चल रहा होगा, फिर सोचते, नहीं अपने स्वार्थ के लिए उस की इच्छा पर अपनी इच्छा नहीं लाद सकते.

खाने के बाद सब ड्राइंगरूम में बैठे. देवकुमार ने मैनेजर साहब के जवाब से संगीता को अवगत कराते हुए कहा, ‘‘बेटे, अब हम लोग बड़ी दुविधा में हैं, सबकुछ हम लोगों के मनमाफिक है पर अंतिम निर्णय तो तुम्हारी इच्छा से ही होगा. तुम चाहो तो सौमिल से मोबाइल पर और बात कर सकती हो.’’

संगीता पापा से कहना चाहती थी कि आज 4 दिन हो गए, यदि सचमुच मैं पसंद हूं उन्हें तो क्या सौमिल को नहीं चाहिए था कि वह मुझ से बात करता? इस में भी उस का ईगो है? मोबाइल पर बात करने की शुरुआत करने में भी मुझे ही एडजस्ट करना है? लेकिन उस ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई. देवकुमार चुपचाप उसे जाते देखते रहे. Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: कूरियर बौय, विधवा रुखसार और वह रात

Hindi Romantic Story: मुंबई में जुलाई का मौसम. रुखसार सुबह उठ कर रसोईघर में चाय बना ही रही थी कि हलकी बारिश होने लगी. उस ने चाय के साथसाथ गरमागरम पकौड़े भी तल दिए. इस के बाद तौलिया और नहाने के बाद पहनने वाले अंदरूनी कपड़े बाथरूम में रख दिए. बैडरूम में टैलीविजन पर कोई म्यूजिक चैनल चल रहा था.

पकौड़े तलने के बाद रुखसार ने खिड़की बंद कर दी और टैलीविजन की आवाज तेज कर दी. वह डांस करने लगी और मस्ती में खुद को दीवार पर लगे बड़े आईने में देखने लगी.

रुखसार ने काले रंग की नाइटी पहनी हुई थी. 35 साल की विधवा होते हुए भी उस ने अपने बदन को काफी मेंटेन किया हुआ था.

रुखसार मस्ती में डांस कर ही रही थी कि तभी दरवाजे की बैल बजी. उस ने टीवी की आवाज कम कर दी और एक दुपट्टा सिर पर रख लिया.

रुखसार ने दरवाजा खोला. बाहर कूरियर वाला था. 25 साल का जवान लड़का. वह कहने लगा, ‘‘कूरियर है… रुखसार खान के नाम से.’’

रुखसार को याद आया कि उस ने औनलाइन शौपिंग साइट से अपने लिए एक मोबाइल फोन बुक किया था. वह बोली, ‘‘मेरा ही नाम रुखसार है.’’

लड़के ने दस्तखत करने के लिए उसे पैन दिया. पैन देते समय उस के हाथ रुखसार की उंगलियों को छू गए थे. रुखसार ने एक नजर उस की ओर देखा और दस्तखत कर दिए.

रुखसार ने 52 सौ रुपए दिए तो लड़के ने 2 सौ रुपए वापस कर दिए और बोला, ‘‘2 सौ रुपए डिस्काउंट चल रहा है.’’

रुखसार ने उस लड़के को ध्यान से देखा, जिस ने आज के बेईमानी के जमाने में भी ईमानदारी से सच कहा और 2 सौ रुपए वापस कर दिए.

थोड़ी देर बाद वह लड़का बोला, ‘‘थोड़ा पानी मिलेगा?’’

रुखसार ने पूरा दरवाजा खोला और बोली, ‘‘तुम तो काफी भीग भी गए हो. अंदर आ जाओ.’’

रुखसार ने मोबाइल वाला डब्बा अलमारी में रखा और रसोईघर में पानी लेने चली गई. उस ने अपनी छाती से दुपट्टे को अलग कर दिया था.

कुछ देर बाद रुखसार ने लड़के को पानी दिया. पानी देते समय जैसे ही वह थोड़ा झुकी, लड़के की नजर उस के उभारों पर जा टिकी. उस की आंखें बड़ीबड़ी हो गईं.

पानी पीतेपीते वह लड़का नजर बचा कर रुखसार के उभारों को देख रहा था कि अचानक उस ने छींक दिया.

रुखसार बोली, ‘‘तुम्हें तो सर्दी लग गई है. अभी बारिश भी तेज है. तुम चाहो तो थोड़ी देर यहां रुक सकते हो.

‘‘तुम्हारे कपड़े भी काफी भीग गए हैं. चाहो तो बाथरूम में जा कर फ्रैश हो सकते हो.’’

वह लड़का बाथरूम में चला गया. दरवाजा बंद कर के लाइट जलाई. वहां रुखसार ने नहाने के लिए तौलिया और अंदरूनी कपड़े पहले से ही रखे हुए थे.

लड़के ने कमीज निकाल कर उस तौलिए को पहले चूमा, फिर उसी से अपने बदन को पोंछा. उस ने रुखसार के ब्रा को अपने हाथ में लिया ही था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने ब्रा को वहीं पर रख दिया और थोड़ा सा दरवाजा खोला.

रुखसार ने उस को काले रंग का कुरता दिया और बोली, ‘‘यह लो, इसे पहन लेना.’’

लड़के ने वह कुरता पहन लिया और अपनी कमीज सूखने के लिए डाल दी.

वह बैडरूम में जा कर टैलीविजन देखने लगा. रुखसार रसोईघर से चाय और पकौड़े ले आई और उस से पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

लड़का बोला, ‘‘जुनैद.’’

‘‘कहां के रहने वाले हो तुम?’’

‘‘आजमगढ़.’’

‘‘मैं भी आजमगढ़ की रहने वाली हूं. आजमगढ़ में कहां से हो तुम?’’

‘‘लालगंज तहसील.’’

‘‘मैं निजामाबाद की रहने वाली हूं. लालगंज में हमारे काफी रिश्तेदार रहते हैं. अम्मीं की भी वहां की पैदाइश है.

‘‘और कौनकौन रहता है आप के साथ?’’

‘‘सिर्फ मैं.’’

‘‘और आप के शौहर?’’

‘‘उन की मौत हो गई है.’’

‘‘माफ करना, पर कैसे?’’

रुखसार ने बताया कि साल 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे में उस के शौहर के साथ ससुराल के सभी लोग मारे गए थे.

यह बताते हुए रुखसार की आंखें नम हो गईं. जुनैद ने उस का दुख बांटने की कोशिश की और अपने बारे में बताया कि उस ने आजमगढ़ से बीटैक की पढ़ाई की है और वह मालवणी में अपने चाचा के साथ पिछले एक साल से रह रहा है. जब उसे अपनी फील्ड मेकैनिकल इंजीनियरिंग में कोई नौकरी नहीं मिली, तो उस ने कूरियर कंपनी में नौकरी शुरू कर दी.

उन दोनों को बातें करतेकरते एक घंटा हो गया था. रुखसार जुनैद को अपने निकाह की तसवीरें दिखाने लगी. जुनैद बोला, ‘‘तब आप किसी खूबसूरत अप्सरा से कम नहीं थीं.’’

रुखसार ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा…’’ और वह खाली प्लेट और कप ले कर रसोईघर में चली गई. अब वह नहाने की तैयारी कर रही थी.

जुनैद उस समय की खूबसूरती को निहार रहा था. वह नहाने के लिए जा ही रही थी कि तभी वापस बैडरूम में गई. जुनैद हैरान रह गया.

रुखसार ने पूछा, ‘‘कैसे लगी निकाह की अलबम?’’

जुनैद बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत,’’

वह रुखसार के गले के नीचे देख रहा था, ‘‘वैसे अभी भी आप कुछ कम नहीं हैं.’’

यह सुन कर रुखसार एक खास अदा में मुसकरा दी.

रुखसार नहाने चली गई. कुछ देर बाद बाथरूम से आवाज आई, ‘‘मैं अपना तौलिया लेना भूल गई हूं. दे दो मुझे.’’

जुनैद ने रुखसार को तौलिया दे दिया. कुछ देर बाद पानी की आवाज आने लगी.

जुनैद ने सोचा कि रुखसार अब नहाने लगी है. वह अपने खूबसूरत बदन पर साबुन लगा रही होगी.

कुछ देर बाद पानी की आवाज धीमी हो कर बंद हो गई. रुखसार नहा कर बाहर आई. उस ने काले रंग का लहंगा और काले रंग की चोली पहनी थी. छाती पर दुपट्टा था और सिर पर तौलिया बंधा हुआ था.

जुनैद रुखसार को देख कर भी अनजान बना टीवी देख रहा था. रुखसार आईने के सामने खड़ी थी. उस ने अपने पूरे बाल खोल दिए थे. खुले हुए लंबे बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे.

जुनैद के मन में आया कि वह चुपके से उठ कर रुखसार की कमर पकड़ कर उसे पूरी तरह दबा दे. तभी रुखसार ने जुनैद की तरफ देखा. इस से जुनैद घबरा गया और अपनी चोर नजरों को टीवी पर लगा दिया.

कुछ देर बाद रुखसार ने अलमारी से वह मोबाइल निकाला, जो जुनैद ले कर आया था. वह उस के फीचर के बारे में जुनैद से पूछने लगी और उस के पास आ कर बैठ गई.

जुनैद ने रुखसार को वह फोन चलाना सिखाया. वह अपनी उंगलियों से उस की मुलायम उंगलियों को पकड़ कर मोबाइल के अलगअलग फीचर बताने लगा.

बीचीबीच में जुनैद का हाथ रुखसार के हाथ को छू भी जाता था, पर रुखसार ने बुरा नहीं माना.

इस से जुनैद हिम्मत की बढ़ गई. अब वह जानबूझ कर उस के हाथ को छूने लगा. धीरेधीरे उस की नजरें मोबाइल से हट कर रुखसार के गले के निचले हिस्से की तरफ गईं.

इसी तरह दोपहर के 2 बज गए. बारिश धीमी हो गई थी. वे दोनों खाना खाने लगे.

जुनैद ने पूछा, ‘‘आप दोबारा निकाह क्यों नहीं कर लेतीं?’’

रुखसार बोली, ‘‘तुम ने क्यों नहीं किया अभी तक निकाह?’’

‘‘अम्मी तो कई बार जिद करती रहती हैं निकाह के लिए, पर मैं ही टाल देता हूं कि अभी तक कोई लड़की पसंद नहीं आई. जब पसंद आएगी, तो कर लूंगा.’’

‘‘तो कैसी लड़की पसंद है तुम्हें?’’ रुखसार ने पूछा.

‘‘वही जो आप की तरह समझदार हो. घरेलू काम जानती हो. जो मुझे रोज गरमागरम चाय और बिलकुल आप जैसे पकौड़े बना कर खिला सके.’’

रुखसार उस का भाव समझते हुए बोली, ‘‘मैं तो तुम से 10 साल बड़ी हूं और विधवा भी हूं.’’

जुनैद बोला, ‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘पर क्या तुम्हारे अब्बू और अम्मी मानेंगे?’’

‘‘अरे, निकाह मुझे करना है या अम्मीअब्बू को. तुम ने वह कहावत नहीं सुनी कि जब मियांबीवी राजी, तो क्या करेगा काजी…’’

शाम के 5 बज चुके थे. तभी जुनैद का फोन आया. उस की अम्मी ने फोन किया था. वह बात करने के लिए रसोईघर में चला गया.

रुखसार दीवार से कान लगाए जुनैद की बातें सुन रही थी. जुनैद ने भांप लिया था कि रुखसार पास ही है.

तभी जुनैद बोला, ‘‘नहीं अम्मी, अब लड़की देखने की जरूरत नहीं है. मुझे एक लड़की पसंद है.’’

यह सुन कर रुखसार शरमा गई और नजरें बचा कर जुनैद को देखने लगी.

इस के बाद जुनैद ने फोन काट दिया. रुखसार पीछे से आ कर उस से लिपट गई. जुनैद ने उसे अपनी बांहों में भर लिया.

रुखसार बोली, ‘‘तुम ने तो अपनी अम्मी से बात कर ली है, मुझे भी अपने अम्मीअब्बू से बात करनी होगी. अच्छा, तुम्हें घर नहीं जाना क्या? रात के 7 बज चुके हैं.’’

जुनैद ने बताया, ‘‘चाचा किसी काम से आज ही बाहर गए हैं. घर में कोई नहीं है. खाना भी बाहर ही खाना होगा.’’

तभी बारिश दोबारा शुरू हो गई. रुखसार ने जुनैद को रोका. वह बोली, ‘‘अगर बुरा न मानो, तो आज यहीं रुक जाओ.’’

जुनैद का भी मन कर रहा था उस के साथ पूरी रात रुकने का.

रुखसार ने खीर, पूरी और तरकारी बनाई थी. शायद इसी खुशी में कि उसे जुनैद जैसा जीवनसाथी मिला था.

जुनैद ने खाना खाते हुए कहा, ‘‘रुखसार, तुम खाना बहुत अच्छा बनाती हो, बिलकुल मेरी अम्मी की तरह.’’

रुखसार ने जुनैद के मुंह से पहली बार अपना नाम सुना. उसे बहुत अच्छा लगा.

थोड़ी देर बाद रुखसार अपने अब्बू से फोन पर बात करने बाहर चली गई.

जब वह वापस आई, तो जुनैद बोला, ‘‘क्या कहा उन्होंने?’’

‘‘उन्होंने कहा कि अगर लड़का हमारी बिरादरी का है, नेक है और अपने पैरों पर खड़ा है, तो उन्हें कोई एतराज नहीं,’’ इतना कह कर रुखसार के चेहरे पर शर्म वाली मुसकराहट आ गई.

रात के 10 बजे रुखसार बोली, ‘‘मैं रसोईघर में सो जाती हूं, तुम यहीं बैडरूम में सो जाओ.’’

‘‘नहीं, मैं वहां सो जाऊंगा. और तुम बैडरूम में सोना, क्योंकि यह घर तो तुम्हारा है.’’

‘‘पर निकाह के बाद तो तुम्हारा भी हो जाएगा,’’ रुखसार के मुंह से निकल गया.

यह सुन कर जुनैद ने उसे गले से लगा लिया और उस के गालों पर एक जोरदार चुंबन जड़ दिया. उस ने उस की छाती से दुपट्टा अलग कर दिया.

रुखसार भी जुनैद से पूरी तरह लिपट गई. जुनैद ने अपने होंठ उस के गुलाबी होंठों पर रख दिए. रुखसार की आंखें बंद हो गईं. उस के बाद जुनैद ने कमरे की लाइट बंद कर दी. Hindi Romantic Story

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