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Hindi Family Story: बदनाम गली – क्या थी उस गली की कहानी

Hindi Family Story: ‘‘हर माल 10 रुपए… हर माल की कीमत 10 रुपए… ले लो… ले लो… बिंदी, काजल, पाउडर, नेल पौलिश, लिपस्टिक…’ जोर से आवाज लगाते हुए राजू अपने ठेले को धकेल कर एक गली में घुमा दिया और आगे बढ़ने लगा. वह एक बदनाम गली थी. कई लड़कियां व औरतें खिड़की, दरवाजों और बालकनी में सजसंवर कर खड़ी थीं. कुछ लड़कियां खिलखिलाते हुए राजू के पास आईं और ठेले में रखे सामान को उलटपुलट कर देखने लगीं.

‘वह वाली बिंदी निकालो…

यह कौन से रंग की लिपस्टिक है…

बड़ी डब्बी वाला पाउडर नहीं है क्या…’

एकसाथ कई सवाल होने लगे. राजू जल्दीजल्दी उन सब की फरमाइशों के मुताबिक सामान दिखाने लगा.

जब राजू कोई सामान निकाल कर उन्हें देता तो वे सब उसे आंख मार देतीं और कहतीं, ‘पैसा भी चाहिए क्या?’ ‘‘बिना पैसे के कोई सामान नहीं मिलता,’’ राजू जवाब देता.

‘‘तू पैसा ही ले लेना. और कुछ चाहिए तो वह भी तुझे दे दूंगी,’’ तभी किसी लड़की ने ऐसा कहा तो बाकी सब लड़कियां भी खिलखिला कर हंस पड़ीं. राजू ने उन लड़कियों के ग्रुप के

पीछे थोड़ी दूरी पर एक दरवाजे पर खड़ी एक लड़की को देखा. घनी काली जुल्फें, दमकता हुआ गोरा रंग, पतली आकर्षक देह. राजू को लगा कि उस ने कहीं इस लड़की को देखा है.

राजू सामान बेचता रहा, पर लगातार उस लड़की के बारे में सोचता रहा. वह बारबार उसे अच्छी तरह देखने की कोशिश करता रहा, लेकिन सामान खरीदने वाली लड़कियों के सामने रहने की वजह से अच्छी तरह देख नहीं पा रहा था. तभी राजू ने देखा कि एक बड़ीबड़ी मूंछों वाला अधेड़ आदमी आया और उस लड़की को ले कर मकान के अंदर चला गया. शायद वह आदमी ग्राहक था.

थोड़ी देर बाद राजू सामान बेच कर आगे बढ़ गया, लेकिन वह लड़की उस के ध्यान से हट ही नहीं रही थी. धीरेधीरे शाम होने को आई. जब वह घर के करीब एक दुकान के पास से गुजरा तो उस ने देखा कि दुकान पर रामू चाचा के बजाय उन की 10 साला बेटी काजल बैठी थी और ग्राहकों को सामान दे रही थी. यह देख उसे कुछ याद आया.

आधी रात हो गई थी. राजू अब फिर उस बदनाम गली में था. उस की आंखें उसी लड़की को ढूंढ़ रही थीं. वहां कई लड़कियां सजसंवर कर ग्राहकों के आने का इंतजार कर रही थीं. राजू को देख कर वे उस से नैनमटक्का करने लगीं. ‘‘क्या रे, तू फिर आ गया… रात को भी सामान बेचेगा क्या?’’ एक लड़की मुसकरा कर बोली.

‘‘नहीं, अब मैं ग्राहक बन कर आया हूं,’’ राजू ने कहा.

‘‘अच्छा तो यह बात है. फिर बता, तुझे कौन सी वाली पसंद है?’’ एक लड़की ने पूछा.

राजू ने जवाब दिया, ‘‘मुझे तो सब पसंद हैं, लेकिन…’’ ‘‘लेकिन क्या…? चल मेरे साथ.

मुझे सब रंगीली बुलाते हैं,’’ एक लड़की ने आगे आ कर राजू का हाथ पकड़ लिया.

‘‘आज रहने दे रंगीली. मुझे तो वह पसंद है…’’

राजू ने अपना हाथ छुड़ाते हुए दिन में जिस लड़की को देखा था, उस के बारे में पूछा. ‘‘बहुत पूछ रहा है उसे. नई है न…’’

रंगीली बोली, ‘‘एक आशिक उसे ले कर कमरे में गया है. वह उस का रोज का ग्राहक है. खूब पसंद करता है उसे. तुझे चाहिए तो थोड़ी देर ठहर. वह उसे निबटा कर आ जाएगी यहीं.’’

राजू बेचैनी से उस लड़की के बाहर आने का इंतजार करने लगा. तकरीबन आधा घंटे बाद एक ग्राहक कमरे से बाहर निकल कर एक तरफ चला गया.

कुछ देर बाद उस कमरे से एक लड़की बाहर आई और दरवाजे पर खड़ी हो गई. राजू ने उसे देखा तो पहचान गया. वह वही लड़की थी, जिस की तलाश में वह आया था.

‘‘जा मस्ती कर. तेरी महबूबा आ गई,’’ रंगीली ने कहा. राजू उस लड़की के पास जा कर बोला, ‘‘जब से तुम्हें देखा है, तब से मैं तुम्हारा दीवाना हो गया हूं इसीलिए अभी आया हूं.’’

‘‘तो चलो,’’ वह लड़की राजू का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाने लगी. ‘पुलिस… पुलिस… भागो… भागो…’ तभी जोरदार शोर हुआ और चारों तरफ भगदड़ मच गई. सभी लड़कियां, ग्राहक और दलाल इधरउधर भाग कर छिपने की कोशिश करने लगे.

थोड़ी देर में ही पुलिस ने कोठेवाली, दलाल और कई ग्राहकों को गिरफ्तार कर लिया और थाने ले गई. कई लड़कियों को पुलिस ने आजाद करा कर नारी निकेतन भेज दिया. राजू को भी पुलिस ने उस लड़की के साथ गिरफ्तार कर लिया था, पर उस लड़की को नारी निकेतन नहीं भेजा गया. वह डर से थरथर कांप रही थी.

‘‘डरो नहीं खुशबू, अब तुम आजाद हो,’’ थाने पहुंच कर राजू ने उस लड़की से कहा. ‘‘तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?’’ उस लड़की ने चौंक कर पूछा.

‘‘खुशबू, मेरी बेटी. कहां थी तू अब तक,’’ राजू के कुछ कहने से पहले वहां एक अधेड़ औरत आई और उस लड़की को अपने गले से लगा कर फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘मां, मुझे बचा लो. मैं उस नरक में अब नहीं जाऊंगी,’’ खुशबू भी उस औरत से लिपट कर रोने लगी और अपनी आपबीती सुनाने लगी कि कैसे 6 महीने पहले कुछ गुंडों ने उस की दुकान के आगे से रात 9 बजे उठा लिया था और कुछ दिन उस की इज्जत से खेलने के बाद चकलाघर में बेच दिया था.

‘‘अब आप के साथ कुछ गलत नहीं होगा. सारे बदमाशों को गिरफ्तार कर मैं ने जेल भेज दिया है…’’ तभी थानेदार ने कहा, ‘‘बस आप लोगों को कोर्ट आना होगा मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए.’’ ‘‘मैं कोर्ट जाऊंगी. उन सभी बदमाशों को सजा दिलवा कर रहूंगी जिन्होंने मेरी बेटी की जिंदगी खराब की है…’’ वह औरत आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘अब मेरी बेटी से कौन ब्याह करेगा?’’ खुशबू की मां ने कहा. ‘‘अब आप लोग घर जा सकते हैं. जाने से पहले इन कागजात पर दस्तखत कर दें,’’ थानेदार ने कहा तो खुशबू, उस की मां और राजू ने दस्तखत कर दिए.

‘‘पर, आप लोगों को मेरे बारे में कैसे पता चला?’’ थाने से बाहर निकल कर खुशबू ने पूछा. ‘‘यह सब राजू के चलते मुमकिन हुआ. इसी ने मुझे बताया कि तुम्हें एक कोठे पर देखा है…

‘‘फिर मैं राजू के साथ पुलिस स्टेशन गई. जहां तुझे छुड़ाने की योजना बनी,’’ खुशबू की मां बोली. ‘‘राजू मुझे कैसे जानता है?’’ खुशबू ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम्हारी मां की परचून की दुकान पर मैं अकसर सौदा लेने जाता था वहीं तुम्हें देखा था. तब से ही मैं तुम्हें पहचानता था. जब तुम गायब हो गईं तो तुम्हारी मां दुकान पर हमेशा रोती रहती थीं. कहती थीं कि तुम्हारे बाबा जिंदा होते तो तुम्हें ढूंढ़ लाते. लेकिन वह अकेली कहां ढूंढ़ती फिरेंगी. ‘‘आज जब मैं अपना ठेला ले कर सामान बेचने गया तो कोठे पर तुम्हें देख कर तुम्हारी मां को सब बता दिया,’’ राजू बोल पड़ा.

‘‘आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी,’’ खुशबू ने रुंधे गले से शुक्रिया अदा करते हुए कहा. तभी राजू झिझकते हुए खुशबू की मां से बोला, ‘‘आप एक एहसान मुझ पर भी कर दीजिए.’’

‘‘कहो बेटा, मैं क्या कर सकती हूं तुम्हारे लिए?’’ खुशबू की मां ने पूछा. ‘‘मुझे खुशबू का हाथ दे दीजिए,’’ राजू अटकअटक कर बोला.

राजू की मांग सुन कर दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू आ गए. खुशबू ने आगे बढ़ कर राजू के पैर छू लिए. ‘‘तेरे जैसा बेटा पा कर मैं धन्य हो गई. पर यह तो बता कि तुझे जातपांत का वहम तो नहीं.’’

‘‘नहीं जी, हम गरीबों की क्या जाति. हमें तो दूसरों के लिए हड्डी तोड़नी ही है. फिर यह जाति का दंभ क्यों पालें. खुशबू जो भी हो, मुझे पसंद है,’’ राजू तमक कर बोला. नई सुबह के इंतजार में उन तीनों के कदम घर की ओर तेजी से बढ़ने लगे. Hindi Family Story

Story In Hindi: खुशामद का कलाकंद – क्या आप में है ये हुनर

Story In Hindi: जीवन जीना अपनेआप में एक कला है. जिसे यह कलाकारी नहीं आती वह बेचारा कुछ इस तरह से जीता है कि उसे देख कर कोई भी कह सकता है, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू.’ सफलतापूर्वक जीवन जीने वाले नंबर एक के कलाकार होते हैं. उन के सामने हर बड़े से बड़ा कलाकार पानी भरता नजर आता है. चमचागीरी या खुशामद करना शाश्वत कला है और जिस ने इस कला में स्वर्ण पदक प्राप्त कर लिया या फिर जिसे ‘पासिंग मार्क’ भी मिल गया, तो उस की जिंदगी आराम से गुजर जाती है.

खुशामद इस वक्त राष्ट्र की मुख्य धारा में है. इस धारा में बहने वाले के हिस्से की सुखसुविधाएं खुदबखुद दौड़ी चली आती हैं. हमारे मित्र छदामीजी कहां से कहां पहुंच गए. साइकिल पर चलते थे, आज कार में चलते हैं. यह खुशामद का ही चमत्कार है. खुशामद की कला के विशेषज्ञ हर कहीं पाए जाते हैं. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक खुशामद करने वालों की भरमार है.

दरअसल, जीवन की हर सांस खुशामद की कर्जदार है. खुशामद और चमचागीरी में बड़ा बारीक सा अंतर है. चमचागीरी बदनामशुदा शब्द है, खुशामद अभी उतना बदनाम नहीं हुआ है, इसलिए लोग चमचागीरी तो करते हैं, लेकिन सफाई देते हैं कि भई थोड़ी सी खुशामद कर दी तो क्या बिगड़ गया. खुशामद कामधेनु गाय है, जिस की पूंछ पकड़ क र जाने कितने गधे घोड़े बन कर दौड़ रहे हैं. पद, पैसा या सुख आदि पाने की ललक में लोग खुशामद जैसे सात्विक हथियार का सहारा लेते हैं.

खुशामद एक तरह का अहिंसक हथियार है. सोचता हूं कि खुशामद की कला का इस्तेमाल कर के अगर कोई कुछ प्राप्त कर ले तो क्या बुराई है? यह तो जीवन जीने की कला है. इस के बिना आप जहां हैं, वहीं पड़े रह जाएंगे. जो लोग सड़ना नहीं चाहते हैं, वे कुछ करने के लिए खुशामद का सहारा ले कर आगे बढ़ते हैं.

इस के लिए पावरफुल लोगों का सम्मान करो, अकारण दाएंबाएं होते रहो, अभिनंदन करो और ऐश करो.  पिछले दिनों ऐसे ही एक सज्जन के बारे में पता चला. जब देखो वह आयोजनों में भिड़े रहते थे. मुझे लगा, बड़े महान प्राणी हैं. बड़े बिजी रहते हैं. देश और समाज की चिंता में निरंतर मोटे भी होते जा रहे हैं. यह देख कर मैं उन के नागरिक अभिनंदन के ‘मूड’ में आ गया. मैं उन से टाइम लेने जा रहा था कि रास्ते में एक महोदय मिल गए. पूछा, ‘‘कहां चल दिए?’’

मैं ने कहा, ‘‘फलानेजी का सम्मान करना चाहता हूं.’’ मेरी बात को सुन कर महोदय हंस पड़े तो मैं चौंका. मैं ने कहा, ‘‘हंसने की क्या बात है? फलानेजी समाजसेवी हैं. चौबीसों घंटे कुछ न कुछ करते रहते हैं. ऐसे लोगों का अभिनंदन तो होना ही चाहिए.’’ महोदय बोले, ‘‘चलिए, मैं सज्जन की पोल खोलता हूं, तब भी आप को लगे कि उन का अभिनंदन होना चाहिए तो ठीक है.’’ मेरे कान खड़े हो गए. महोदय बताने लगे कि इन्होंने पिछले साल मजदूरों का एक सम्मेलन करवाया था.

खूब चंदा एकत्र किया. एक मंत्री को बुलवा कर भाषण भी करवा दिया. सम्मेलन के बाद उन्हें 2 फायदे हुए, मंत्रीजी ने उन्हें एक समिति का सदस्य बनवा दिया और उन के घर पर दूसरी मंजिल भी तन गई. यह सज्जन हर दूसरे दिन किसी मंत्री का, किसी विधायक का या किसी अफसर का अभिनंदन करते रहते हैं. ऐसा करने से लोगों में धाक जमती चली जाती है.

पावरफुल आत्माओं से निकटता बढ़ती है तो सुविधाओं की गंगा अपनेआप बहने लगती है. देखते ही देखते कंगाल भी मालामाल हो जाता है. महोदय की बातें सुन कर मेरा माथा घूम गया और मैं ने अभिनंदन वाला आइडिया ड्राप कर दिया. अब यह और बात है कि सज्जन अपना अभिनंदन कराने के लिए मेरी खुशामद पर आमादा हैं तो भाई साहब, खुशामद के एक से एक रूप हैं, जुआ की तरह.

हम और आप कर रहे होते हैं और हमें पता नहीं चलता कि खुशामद कर रहे हैं, इसलिए कदम फूंकफूंक कर रखिए, वरना कब खुशामद की कीचड़ आप के मुंह पर लग जाए, कहना कठिन है. खुशामद की कला को अब तो सामाजिक स्वीकृति भी मिल गई है. इसे क्या कहें जो खुशामद के जरिए घरपरिवार को खुश रखता है.

उस की आमद भी सब को खुश कर देती है, लेकिन जो खुशामद से दूर रहता है, उस की आमद घर वालों को नागवार गुजरने लगती है. हर कोई मुंह बनाते हुए बड़बड़ाता है, ‘आ गया आदर्शवादी, हुंह.’ तो साहबान, खुशामद ही जीवन का सार है. घरबाहर अगर इज्जत चाहिए तो खुशामदखोरों की बिरादारी में शामिल हो जाइए. खुशामद की कला में माहिर आदमी का बी.ए. पास होना भी जरूरी नहीं. आप खुशामद पास हैं तो कहीं भी टिक सकते हैं.

समाजवाद, पूंजीवाद, अध्यात्मवाद और बाजारवाद, न जाने कितने तो वाद हैं. सब का अपनाअपना महत्त्व है, लेकिन आजकल के जमाने में ‘खुशामदवाद’ तो वादों का वाद है. सारे वाद बारबार खुशामदवाद एक बार. एक बार जो खुशामद की सुरंग में घुसा, वह मालामाल हो कर ही लौटा. यह और बात है कि आत्मा पर थोड़ी कालिख पुत जाती है, लेकिन उस को क्या देखना? जिस ने की शरम, उस के फूटे करम. आत्मा के चक्कर में न जाने कितने महात्माओं ने आत्महत्याएं कर लीं, इसलिए आत्मा को घर के पिछवाड़े में कहीं दफन कर के खुशामदवाद का सहारा लो.

इस दिशा में जिस ने भी कदम बढ़ाए हैं, वह जीवन भर सुखी रहा है, इसीलिए तो धीरेधीरे खुशामद लोकप्रिय कला बनती जा रही है और जब कला बन रही है या बन चुकी है तो इस का पाठ्यक्रम भी तैयार कर दिया जाना चाहिए. किसी की प्रशस्ति में गीत, कविता लिखना, चालीसा लिखना, क्या है? मतलब यह कि साहित्य में खुशामद कला ने घुसपैठ कर ली है. आजकल विश्वविद्यालयों में नएनए पाठ्यक्रमों की पढ़ाई शुरू हो रही है.

फलाना मैनेजमेंट, ढिकाना मैनेजमेंट तो खुशामद मैनेजमेंट का नया कोर्स भी शुरू हो जाए. इस का बाकायदा ‘पाठ्यक्रम’ तैयार हो. सुव्यवस्थित तरीके से यह कोर्स लांच हो. इस के पढ़ाने वाले सैकड़ों इस शहर में मिल जाएंगे. ऐसे लोगों की तलाश की जाए जो ‘खुशामद वाचस्पति’ हों, ‘खुशामदश्री’ खुशामद कला में पीएच.डी. की उपाधि भी दी जा सकती है और यह मानद भी हो सकती है.

आप के शहर में ऐसी प्रतिभाओं की कमी नहीं होगी. इधर तो खुशामद की प्रतिभा से लबालब लोगों की ऐसी नस्लें लहलहा रही हैं कि मत पूछिए. इसलिए समय के साथ दौड़ने वालों को इस सुझाव पर विचार करना चाहिए, क्योंकि यह सदी खुशामद को कला बनाने पर उतारू होने की सदी है, जो कोई खुशामद के विरोध में खड़ा हो, वह धकिया दिया जाएगा. वक्त के साथ चलो, खुशामद के साथ चलो.

छदामीजी हर दूसरे दिन अभिनंदन करते हैं. अभिनंदन प्रतिभाशाली लोगों का हो तो कोई बात नहीं, लेकिन अब ऐसे लोगों का अभिनंदन करता ही कौन है? अभिनंदन होता है मंत्री, नेता या अफसरों का या फिर ऐसे व्यक्ति का जिस के सहारे सुविधाओं के टुकड़े प्राप्त हो जाएं.

अभिनंदन करना भी खुशामद का ही एक तरीका है. कुछ लोग जीवन भर इसी को पवित्र काम मान कर दिनरात भिड़े रहते हैं. अभिनंदन करना और अभिनंदन कराना ऐसा शौक है कि मत पूछिए. जिसे इस का चस्का लगा, वह गया काम से. अभिनंदन के बगैर वह ठीक उसी तरह तड़पता है, जिस तरह मछली पानी के बगैर. खुशामद करना और खुशामदपसंद होना सब के बस की बात भी तो नहीं है.

खुशामदपसंद आदमी की चमड़ी मोटी होनी चाहिए और जेब भी हर वक्त ‘भरी’ रहे. जब तक जेब भरी रहेगी, अभिनंदन या सम्मान की झड़ी रहेगी. खुशामद करने वाला कंगाल हो तो चलेगा, लेकिन खुशामदपसंद का मालामाल होना जरूरी है. ऐसी जब 2 आत्माएं मिलती हैं, तब यही गीत बजना चाहिए, ‘दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात.’ सोचिए, खुशामद कितनी बड़ी चीज है कि इस नाचीज को इस पर कागज काले करने पड़ रहे हैं, लेकिन हालत यह है कि मर्ज बढ़ता गया ज्योंज्यों दवा की. खुशामद को ले कर आप लाख नाराजगी जाहिर करें, यह खत्म होने से रही.

यह तो द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती जा रही है, और क्यों न बढ़े साहब? जब हर दूसरातीसरा शख्स इस कला में हाथ आजमा रहा है, तब आप क्या कर लेंगे? आप को इस कला से प्रेम नहीं है तो न सही, और दूसरे लोग तो हैं, जिन की गाड़ी खुशामद के भरोसे ही चलती है. सत्ता के गलियारों में जा कर देखिए, खुशामद करने वाले कीड़ेमकोड़े की तरह बिलबिलाते हुए मिल जाएंगे.

वक्त की मार केवल मूर्तियों या स्मारकों पर ही नहीं पड़ती, शब्दों पर भी पड़ती है. ‘खुशआमद’ ऐसा बदनाम हो गया है कि शब्द का प्रयोग करते हुए डर लगता है. किसी को ‘नेताजी’ कह दो, ‘गुरु’ कह दो तो लगता है, व्यंग्य किया जा रहा है. खुशामद शब्द का यही हाल है लेकिन हाल है तो है. अब तो इसे लोग कला बनाने पर तुले हुए हैं.

वक्तवक्त की बात है, इसलिए साहेबान, मेहरबान, कद्रदान, वक्त की धड़कन को सुनो और इस नई कला को गुनो. सफल होना है तो खुशामद ही अंतिम चारा है. बिना खुशामद के हर कोई बेचारा है. यह और बात है कि जो इस जीवन को संघर्षों के बीच ही जीने के आदी हैं, जिन को मुसीबत झेलने में ही मजा आता है, जो सूखी रोटी खा कर, ठंडा पानी पी कर भी खुश रहते हैं, उन के लिए खुशामद कला विषकन्या के समान त्याज्य है, लेकिन जिन को ऐसेवैसे कैसे भी चाहिए सुविधा सम्मान और पैसे, वे खुशामद के बिना एक कदम नहीं चल सकते.

ऐसे लोग ही प्रचारित कर रहे हैं कि खुशामद एक कला है. इस की मार्केटिंग कर रहे हैं, नएनए आकर्षक रैपरों में. हर सीधासादा आदमी खुशामद के चक्कर में फंस जाता है, लेकिन खुशामद एक ऐसा भंवर है, जिस में कोई एक बार फंसा तो निकलना मुश्किल हो जाता है.  इस कला में बला का स्वाद है. जिस ने एक बार भी इस का स्वाद चख लिया, वह दीवाना हो गया.

नैतिकता से बेगाना हो गया. पता नहीं, आप ने खुशामद की कला का आनंद लिया है या नहीं, न लिया हो तो कोई बात नहीं, अगर इच्छा हो तो अपने ही शहर के किसी नेतानुमा प्राणी से मिल लीजिएगा या फिर ऐसे शख्स से, जिसे लोग ‘मिठलबरा’ (ऐसा व्यक्ति जो बड़ी ही मधुरता के साथ झूठा व्यवहार करता है) के नाम से जानते हों. ये लोग आप को बताएंगे कि खुशामद रूपी कलाकंद खाने का आनंद कैसे मनाएं?

बहरहाल, खुशामद को अगर कला का दर्जा मिल जाए तो कोई बुराई नहीं. कुछ लोग तो जेब काटने तक को कला मानते हैं. कला हमेशा भला काम ही कराए जरूरी नहीं. क्या कहा, आप खुशामद को कला नहीं, बला मानते हैं? तो भई, आप जैसे लोगों के कारण ही गलतसलत परंपराएं अपना स्थान नहीं बना पातीं.

आज कदमकदम पर खुशामदखोर मिल जाएंगे, चलतेपुर्जे, अपना काम निकालने में माहिर. आप अगर अब तक हम लोगों से कुछ नहीं सीख पाए हैं तो ठीक है, पड़े रहिए अपनी जगह. सारे लोग आप से आगे निकल जाएंगे तो फिर मत कहिएगा कि हम पीछे रह गए. आगे बढ़ना है तो शर्म छोडि़ए और खुशामदखोरी में भिड़ जाइए. शरमाइए मत, उलटे कहिए, ‘खुश-आमद-दीन’. Story In Hindi

Hindi Story: झूठी शान – शौर्टकट काम की वारंटी वाकई काफी शौर्ट होती है!

Hindi Story: सवेरेसवेरे किचन में नाश्ता बना रही निर्मला के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘भई, आजकल तो लड़कियां क्या लड़के भी महफूज नहीं हैं. एक महीने में अपने शहर से 350 बच्चे गायब…’’ आवाज हाल में बैठ कर समाचार देख रहे निर्मला के पति परेश की थी.

निर्मला परेश को नाश्ता दे कर बाहर की ओर बढ़ गई. परेश को मालूम था कि उसे बच्चों की स्कूल की फीस जमा करवाने के लिए जाना है, फिर भी एक बार फर्ज के तौर पर ध्यान से जाने की हिदायत देते हुए नाश्ता करने में जुट गए.

इस पर निर्मला ने भी आमतौर पर दिए जाने वाला ही जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी हां…’’ और बाहर का गरम मौसम देख कर बिना छाता लिए ही घर से निकल गई.

निर्मला आमतौर पर रिकशे से ही सफर किया करती, क्योंकि उस के पास और कोई साधन भी न था. स्कूल में सारे पेरेंट्स तहजीब से खुद ही सार्वजनिक दूरी बनाए अपनीअपनी कुरसियों पर बैठे अपना नंबर आने का इंतजार कर रहे थे.

निर्मला का नंबर सब से आखिर में था. उस के अकेलेपन की बोरियत को मिटाने के लिए न जाने कहां से उस की पुरानी सहेली मेनका भी उसी वक्त अपने बेटे की फीस जमा कराने वहां आ टपकी.

चेहरे पर मास्क की वजह से निर्मला ने उसे पहचाना नहीं, पर मेनका ने उस के पहनावे और शरीर की बनावट से उसे झट से पहचान लिया और दोनों में सामान्य हायहैलो के बाद लंबी बातचीत शुरू हो गई. दोनों सहेली एकदूसरे से दोबारा पूरे 5 महीने बाद मिल रही थीं.

यों तो दोनों का आपस में एकदूसरे से दूरदूर तक कोई संबंध नहीं था, पर दोनों के बच्चे एक ही जमात में पढ़ते थे. घर पास होने की वजह से निर्मला और मेनका की मुलाकात कई बार रास्ते में एकदूसरे से हो जाया करती.

धीरेधीरे बच्चों की दोस्ती निर्मला और मेनका तक आ गई. दोनों ही अकसर छुट्टी के समय अपने बच्चों को लेने आते, तब उन की भी मुलाकात हो जाया करती. दोनों एक ही रिकशा शेयरिंग पर लेते, जिस पर उन के बच्चे पीछे बैठ जाया करते.

निर्मला ने मेनका को देख कर खुशी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे, ये मास्क भी न, मैं तो बिलकुल ही पहचान ही नहीं पाई तुम्हें.’’

पर, असलियत तो यह थी कि वह उस के पहनावे से धोखा खा गई थी, क्योंकि जिस मेनका के लिबास पुराने से दिखने वाले और कई दिनों तक एक ही जैसे रहते. वह आज एक महंगी सी नई साड़ी और कई साजोसिंगार के सामान से लदी हुई थी. इस के चलते उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यह मेनका हो सकती?है.

निर्मला ने उस की महंगी साड़ी को हाथ से छूने की चाह से जैसे ही उस की तरफ हाथ बढ़ाया, मेनका ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘अरे भाभी, ये क्या कर रही हो? हाथ मत लगाओ.’’

भले ही मेनका ने सार्वजनिक दूरी को जेहन में रख कर यह बात कही हो, पर उस के शब्द थोड़े कठोर थे, जिस का निर्मला ने यह मतलब निकाला कि ‘तुम्हारी औकात नहीं इस साड़ी को छूने की, इसलिए दूर ही रहो’.

निर्मला ने उस से चिढ़ते हुए पूछा, ‘‘यह साड़ी कहां से…? मेरा मतलब, इतनी महंगी साड़ी पहन कर स्कूल में आने की कोई वजह…?’’

‘‘महंगी… यह तुम्हें महंगी दिखती है. अरे, ऐसी साडि़यां तो मैं ने रोज पहनने के लिए ले रखी हैं,’’ मेनका ने बड़े घमंड में कहा.

निर्मला अंदर ही अंदर कुढ़ने लगी. उसे विश्वास नहीं हुआ कि ये वही मेनका हैं, जो अकसर मेरे कपड़ों की तारीफ करती रहती थी और खुद के ऊपर दूसरे लोगों से हमदर्दी की भावना रखती थी. ये तो कुछ महीनों पहले उम्र से ज्यादा बूढ़ी और बेकार दिखती थी, पर आज अचानक ही इस के चेहरे पर इतनी चमक और रौनक के पीछे क्या वजह है?

पहले तो अपने पति के कुछ काम न करने की मुझ से शिकायत करती थी, पर आज यह अचानक से चमकधमक कैसे? हां, हो सकता है कि विजेंदर भाई को कोई नौकरी मिल गई हो. हो सकता?है कि उन्होंने कोई धंधा शुरू किया हो, जिस में उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ हो या कोई लौटरी लग गई हो तो क्या…?

मैं इतना क्यों सोचने लगी? अब हर किसी की किस्मत एक बार जरूर चमकती है, उस में मुझे इतनी जलन क्यों हो रही है?

जिन के पास पहले पैसा नहीं, जरूरी थोड़े ही न है कि उन के पास कभी पैसा आएगा भी नहीं. भूतकाल की अपनी ही उधेड़बुन में कोई निर्मला को मेनका उस के मुंह के सामने एक चुटकी बजा कर वर्तमान में ले कर आई और कहा, ‘‘अरे भई, कहां खो गईं तुम. लाइन तो आगे भी निकल गई.’’

निर्मला और मेनका दोनों एकएक कुरसी आगे बढ़ गए.

‘‘वैसे, एक बात पूछूं मेनका, तुम्हारी कोई लौटरी वगैरह लगी है क्या?’’ निर्मला ने बड़े ही सवालिया अंदाज में पूछा, जिस का मेनका ने बड़े ही उलटे किस्म का जवाब दिया, ‘‘क्यों, लौटरी वाले ही ज्यादा पैसा कमाते हैं क्या? अब उन्होंने मेहनत के साथसाथ दिमाग लगाया है, तो पैसा तो आएगा ही न?

‘‘अब परेश भाई को ही देख लो, दिनभर अपने साहब के कहने पर कलम घिसते हैं, ऊपर से उन की खरीखोटी सुनते हैं, पूरे दिन खच्चरों की तरह दफ्तर में खटते हैं, फिर भी रहेंगे तो हमेशा कर्मचारी ही.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मेहनत के नाम पर ये कौन सा पहाड़ तोड़ते हैं सिर्फ दिनभर पंखे के नीचे बैठ कर लिखापढ़ी का काम ही तो करना होता है. इस से ज्यादा आराम और इज्जत की नौकरी और किस की होगी.’’

निर्मला ने मेनका को और नीचा दिखाने की चाह में उस से कहा, ‘‘पढ़ेलिखे हैं. आराम की नौकरी करते हैं. यों धंधे में कितनी भी दौलत कमा लो, पर समाज में सिर्फ पढ़ेलिखे और नौकरी वाले इनसान की ही इज्जत होती?है, बाकियों को तो सब अनपढ़ और गंवार ही समझते हैं.’’

इस पर मेनका अकड़ गई और अपने पास अभीअभी आए चार पैसों की गरमी का ढिंढोरा निर्मला के आगे पीटने लगी.

काउंटर पर निर्मला का नंबर आया. काउंटर पर बैठी रिसैप्शनिस्ट ने फीस  की लंबीचौड़ी रसीद, जिस में दुनियाभर के चार्जेज जोड़ दिए गए थे, निर्मला  को पकड़ाई.

निर्मला ने घर पर पैसे जोड़ कर जो हिसाब लगाया था, उस से कहीं ज्यादा की रसीद देख कर उन की आंखों से धुआं निकल आया. इतने पैसे तो उस के पर्स में भी न थे, पर इस बात को वह सब के सामने जताना नहीं चाहती थी, खासकर उस मेनका के सामने तो बिलकुल नहीं.

मेनका ने कहा, ‘‘मैडम, आप सिर्फ 3 महीने की ही फीस जमा कीजिए, बाकी मैं बाद में दूंगी.’’

तभी निर्मला के हाथ से परची लेते हुए मेनका ने निर्मला पर एहसान करने की चाह से अपने पर्स से एक चैकबुक निकाल अपने और उस के बच्चे की फीस खुद ही जमा कर दी.

निर्मला को यह बलताव ठीक न लगा, जिस के चलते उस ने उसे बहुत मना भी किया.

इस पर मेनका ने कहा, ‘‘अरे, भाईसाहब को जब पैसे मिल जाएं, तब आराम से दे देना. मैं पैनेल्टी नहीं लूंगी,’’ और वह हंसते हुए बाहर की ओर निकल गई.

स्कूल के बाहर निकल कर देखा, तो मालूम हुआ कि छाता न ले कर बहुत बड़ी गलती हुई. गरम मौसम की जगह तेज बारिश ने ले ली. इतनी तेज बारिश में कोई भी रिकशे वाला कहीं जाने को राजी न था.

निर्मला स्कूल के दरवाजे पर खड़ी बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी, पर मन में यह भी डर था कि आखिर अभी तुरंत मेरे आगे निकली मेनका कहां गायब हो गई? वह भी इतनी तेज बारिश में.

‘चलो, अच्छा है, चली गई, कौन सुनता उस की ये बातें? चार पैसे क्या आ गए, अपनेआप को कहीं की महारानी समझने लगी. सारे पैसे खर्च हो जाएंगे, तब फिर वही एक रिकशा भी मेरे साथ शेयरिंग पर ले कर चला करेगी.

मन ही मन खुद को झूठी तसल्ली देती निर्मला के आगे रास्ते पर जमा पानी को चीरते हुए एक शानदार काले रंग की कार आ कर रुकी.

गाड़ी का दरवाजा खुला. अंदर बैठी मेनका ने बाहर निर्मला को देखते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में बैठो निर्मला. इस बारिश में कोई रिकशे वाला नहीं मिलेगा.’’

निर्मला को न चाहते हुए भी गाड़ी में बैठना पड़ा, पर उस का मन अभी भी यकीन करने को तैयार नहीं था कि यह वही मेनका है, जो पैसे न होने के चलते एक रिकशा भी मुझ से शेयरिंग पर लिया करती थी?

‘‘सीट बैल्ट लगा लो निर्मला,’’ मेनका ने ऐक्सीलेटर पर पैर जमाते हुए कहा.

निर्मला ने सीट बैल्ट लगाते हुए पूछा, ‘‘कब ली? कैसे…? मेरा मतलब कितने की…?’’

‘‘कैसे ली का क्या मतलब? खरीदी है, वह भी पूरे 40 लाख रुपए की,’’ मेनका ने बड़े बनावटी लहजे में कहा.

निर्मला के अंदर ईष्या का भी अंकुर फूट पड़ा. आखिर कैसे इस ने इतनी जल्दी इतने पैसे कमाए, आखिर ऐसा कैसा दिमाग लगाया, विजेंदर भाई ने कि इतनी जल्दी इतने पैसे कमा लिए. और एक परेश हैं कि रोज 13-13 घंटे काम करने के बावजूद मुट्ठीभर पैसे ही ले कर आते हैं, वह भी जब घर के सारे खर्चे सिर पर सवार हों. एक इसी के साथ तो मेरी बनती थी, क्योंकि एक यही तो थी मुझ से नीचे. अब तो सिर्फ मैं ही रह गई, जो रिकशे से आयाजाया करूंगी. इस का भी तो कहना ठीक ही है कि किसी काम में दिमाग लगाए बिना सिर्फ मेहनत करने से जिस तरह गधे के हाथ कभी भी गाजर नहीं आती, उसी तरह हर क्षेत्र में मेहनत से ज्यादा दिमाग लगाना पड़ता है.

विजेंदर भाई ने दिमाग लगाया तो पैसा भी कमाया, वहीं परेश की जिंदगी तो सिर्फ खाने में ही निकल जाएगी, आज ये बना लेना कल वो बना लेना.

अपना घर नजदीक आता देख निर्मला ने सीट बैल्ट खोल दी और उतरने के लिए जैसे ही उस ने दरवाजा खोलना चाहा, उस से उस महंगी गाड़ी का दरवाजा न खुला. इस पर मेनका ने हंसते हुए अपने ही वहां से किसी बटन से दरवाजा अनलौक करते हुए निर्मला को अलविदा किया.

दरवाजा न खुलने वाली बात पर निर्मला को खूब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था.

घर पहुंचते ही परेश ने एक पत्रिका में छपी डिश की तसवीर सामने रखते हुए वही डिश बनाने का आदेश दे डाला, जिस पर निर्मला ने परेश पर बिफरते हुए कहा, ‘‘पूरी जिंदगी तुम ने और किया ही क्या है, पूरे दिन गधों की तरह मेहनत करते हो और ऊपर से दफ्तर में बैठेबैठे फरमाइश और कर डालते हो कि आज यह बनाना और कल यह…

‘‘खाने के अलावा कभी सोचा है कि बाकी लोग तुम से कम मेहनत करते हैं, फिर भी किस चीज की कमी है उन्हें. घूमने को फोरव्हीलर हैं, पहनने को ब्रांडेड कपड़े हैं, कुछ नहीं तो कम से कम बच्चों की फीस का तो खयाल रखना चाहिए.

‘‘आज अगर मेनका न होती, तो फीस भी आधी ही जमा करानी पड़ती और बारिश में भीग कर आना पड़ता  सो अलग.’’

परेश समझ गया कि यह सारी भड़ास उस मेनका को देख कर निकाली जा रही है. परेश ने बात को और आगे न बढ़ाना चाहा, जिस के चलते उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा.

दोपहर को गुस्से के कारण निर्मला ने कुछ खास न बनाया, सिर्फ खिचड़ी बना कर परेश और बेटे पारस के आगे रख दी.

परेश चुपचाप जो मिला, खा कर रह गया. उस ने कुछ बोलना लाजिमी न समझा.

रात तक निर्मला ने परेश से कोई बात नहीं की. उस के मन में तो सिर्फ मेनका और उस के ठाटबाट के नजारे ही रहरह कर याद आ जाया करते और परेश की काबिलीयत पर उंगली उठा जाते.

डिनर का वक्त हुआ. परेश ने न तो खाना मांगा और न ही निर्मला ने पूछा. देर तक दोनों के अंदर गुस्से का जो गुबार पनपता रहा, मानो सिर्फ इंतजार कर रहा हो कि सामने वाला कुछ बोले और मैं फट पडं़ू.

दोनों को ज्यादा इंतजार न कराते  हुए ठीक उसी वक्त भूख से बेहाल  बेटा पारस निर्मला से खाने की मांग करने लगा.

पारस को डिनर के रूप में हलका नाश्ता दे कर निर्मला ने परेश पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘बेटा, आज घर में कुछ था ही नहीं बनाने को, इसीलिए कुछ नहीं बनाया. तू आज यही खा ले, कल देखती हूं कुछ.’’

परेश ने हैरानी से पूछा, ‘‘घर में कुछ था नहीं और तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं? आखिर किस बात पर तुम ने दोपहर से अपना मुंह सिल रखा है और सुबह क्या देखोगी तुम?’’

‘‘मैं ने नहीं बताया और तुम ने क्या सिर्फ खाने का ठेका ले रखा है? सब से ज्यादा जीभ तुम्हारी ही चलती है, तो इंतजाम देखना भी तो तुम्हारा ही फर्ज बनता है न? और वैसे भी मालूम नहीं हर महीने राशन आता है, तो इस महीने कौन लाएगा?’’

परेश बेइज्जती के ये शब्द बरदाश्त न कर सका. इस वजह से वह उस रात भूखा ही सोया रहा मगर निर्मला से कुछ बोला नहीं.

सवेरे होते ही राशन के सामान से भरा हुआ एक थैला जमीन पर पटक कर उस में से जरूरी सामान निकाल कर परेश खुद ही अपने और बेटे पारस के लिए चायनाश्ता बनाने में जुट गया.

रसोई के कामों से फारिग हो कर दोनों बापबेटे सोफे पर बैठ कर नाश्ता करने में मगन हो गए.

परेश रोज की तरह समाचार चैनल लगा कर बैठ गया. आज सब से बड़ी खबर की हैडलाइन देख कर उस के होश उड़ गए और उस से भी ज्यादा उस के पीछे से गुजर रही निर्मला के.

सब से बड़ी खबर की हैडलाइन में लिखा था, ‘शहर में पिछले महीनों से गायब हो रहे बच्चों के केस का आरोपी शिकंजे में, जिस का नाम विजेंदर बताया जा रहा है. कल ही चौक से एक बच्चे को बहला कर अगुआ करते हुए वह पकड़ा गया.’

मुंह काले कपड़े से ढका हुआ था, पर इतनी पुरानी पहचान के चलते परेश और निर्मला को आरोपी को पहचानते देर न लगी.

निर्मला को अपनी गलती का एहसास हो चुका था. वह जान चुकी थी कि जल्दी से जल्दी ज्यादा ऐशोआराम पाने के चक्कर में लोगों को कोई शौर्टकट ही अपनाना पड़ता है, जिस काम की वारंटी वाकई में काफी शौर्ट होती है.

आज अपनी मरजी से ही निर्मला ने दोपहर का खाना परेश की पसंद का बनाया था, जिस की उसे कल तसवीर दिखाई गई थी. Hindi Story

Story In Hindi: अफसोस – बाबा के चंगुल में शादीशुदा सायरा

Story In Hindi: सायरा की शादी अब्दुल से  5 साल पहले हुई थी. अब्दुल की उम्र उस समय 30 साल थी और सायरा की उम्र सिर्फ 20 साल. अब्दुल देखने में सीधासादा, सांवले रंग का था, पर एक अच्छीखासी जायदाद का मालिक भी था. यही वजह थी कि सायरा और उस की मां ने अब्दुल को पसंद किया था.

शादी से पहले ही सायरा ने अब्दुल को अच्छी तरह देखभाल लिया था, जबकि सायरा के बाप और भाई इस शादी के खिलाफ थे. लेकिन सायरा और उस की मां की जिद के आगे उन की एक न चली और जल्द ही वे दोनों शादी के रिश्ते में बंध गए.सायरा जैसी बीवी पा कर अब्दुल की खुशी का ठिकाना न रहा. हो भी क्यों न… सायरा थी ही बला की खूबसूरत. उस के सुर्ख गुलाबी होंठ ऐसे लगते थे मानो गुलाब की पंखुड़ी खिलने के लिए बेताब हो.

जब सायरा हंसती थी तो उस सफेद दांत ऐसे लगते थे मानो मुंह से मोती बिखर रहे हों. लंबे, काले और घने बालों ने तो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे. उस की पतली कमर और गदराए बदन का तो कहना ही क्या था.शादी को अभी 4 साल ही गुजरे थे कि उन के घर में 3 बच्चों की किलकारियां गूंज चुकी थीं. सायरा की मां भी अपनी बेटी के साथ मुंबई में रहने के लिए आ गई थी.अब्दुल की दुकान भी बढि़या चल रही थी. घर में किसी बात की कोई कमी न थी.

अभी भी अब्दुल सायरा के साथ किराए के घर में रह रहा था, क्योंकि मुंबई में घर खरीदना इतना आसान न था. पर अब्दुल की कमाई इतनी थी कि बच्चों की अच्छी परवरिश और अच्छा खानपान आसानी से हो रहा था.पर एक बात बड़ी अजीब थी.

अब्दुल को देख कर कभी सायरा की दोस्त तो कभी सायरा के रिश्तेदार उसे यह तंज कसते रहते थे कि ‘तुम ने अब्दुल में क्या देख कर शादी की… कहां वह सांवला और बदसूरत, इतनी बड़ी उम्र का और कहां तुम बिलकुल हीरोइन सी खूबसूरत’.शुरूशुरू में तो सायरा उन सब की बातों को नजरअंदाज करती रही, लेकिन बारबार सब से यही बातें सुनसुन कर उस के भी दिल में भी अब्दुल के लिए नफरत जागने लगी. अब वह अब्दुल से कटीकटी सी रहने लगी.

एक दिन सायरा की मां ने उसे मशवरा दिया कि अब्दुल अपने गांव की सारी जमीन बेच दे और यहां मुंबई में अपना बड़ा फ्लैट खरीद ले. सायरा ने जैसे ही यह बात अब्दुल के सामने रखी, वह तुरंत तैयार हो गया और गांव जा कर अपने अब्बा और भाइयों से अपने हिस्से को बेचने की बात कही.

अब्दुल के अब्बा और भाइयों ने उसे काफी समझाया, पर उस ने किसी की न सुनी और अपनी बात पर अटल रहा. जल्द ही उस के अब्बा को उस के आगे झुकना पड़ा और अपना बाग, खेत और उस के हिस्से की दुकान बेचनी पड़ी. इस जल्दबाजी के सौदे में अब्दुल के भाई को काफी नुकसान उठाना पड़ा.

अब्दुल ने वापस आ कर मुंबई में  2 कमरों का फ्लैट खरीद लिया. कुछ महीनों तक तो सबकुछ सही चला, पर अब सायरा के दोस्तों की तादाद बढ़ चुकी थी. सायरा की मां भी ब्यूटीपार्लर जा कर स्मार्ट बन कर रहने लगी. अब आएदिन घर पर कोई न कोई इन दोनों की दोस्त आती रहती थीं और अब्दुल को देख कर उस पर तंज कसती रहती थीं.

अब तो खुद सायरा और उस की मां भी अब्दुल का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं रहती थीं. अब्दुल इतना ज्यादा बेवकूफ था कि उस ने सायरा को तो पूरी आजादी दे रखी थी और खुद दिनरात काम में इतना बिजी रहता था कि उसे अपने हुलिए को सुधारने का भी खयाल नहीं आता था.

यही वजह थी कि सायरा धीरेधीरे उस से दूर होती जा रही थी. वह चाहती थी कि अब्दुल उस के नाम घर कर दे, पर अब्दुल तैयार न हुआ. सायरा ने अब्दुल से बातचीत बंद कर दी.सायरा की मां और उस की दोस्तों ने सायरा को एक बाबा का पता बताया और कहा कि बाबा ऐसा तावीज देंगे कि अब्दुल तुम्हारी उंगलियों पर नाचेगा.

अगले दिन सायरा और उस की मां बाबा के पास पहुंच गईं और सारी बात बताई. बाबा उन की बातों को सुन कर समझ चुका था कि ये लालची लोग हैं, इन्हें लूटा जाए. बाबा ने कहा, ‘‘काम तो हो जाएगा, लेकिन इस में एक महीना लगेगा और तकरीबन 5 लाख रुपए का खर्च आएगा. धीरेधीरे अब्दुल के दिमाग को काबू में करना पड़ेगा, जिस से वह तुम्हारी हर बात मान ले. इस में 7 बकरों की कुरबानी देनी पड़ेगी.

‘‘कुछ तावीज अब्दुल के तकिए के नीचे सावधानी से रखने होंगे. उसे पता न चले. कुछ तावीज तुम्हें पहनने होंगे, जो जाफरान से बनाए जाएंगे. पहले 2 लाख रुपए एडवांस और 3 लाख रुपए एक हफ्ते बाद देने पड़ेंगे.’’सायरा और उस की मां तैयार हो गईं.

अगले दिन सायरा ने उस ढोंगी बाबा को पैसे दिए और बाबा ने उसे 3 तावीज अब्दुल के तकिए के भीतर रखने के लिए दे दिए और 7 तावीज सायरा को देते हुए बोला, ‘‘ये तावीज पानी में डाल कर एकएक कर के 7 दिन तक पी लेना और हां, जब तक काम पूरा न हो जाए, तुम अपने शौहर के पास बिलकुल मत सोना.’’अब सायरा और उस की मां को पूरा भरोसा हो गया था कि अब्दुल उन का कहना मानेगा और वह घर हमारे नाम कर देगा.सायरा ने अब्दुल से बात करना बंद कर दिया. अब्दुल जब भी सायरा से बात करने की कोशिश करता, तो वह एक ही जवाब देती कि ‘पहले यह घर मेरे नाम करो. जब तक तुम मेरी बात नहीं मानोगे, मेरे साथ बात मत करना और न ही मेरे पास आना’.

अब्दुल ने सायरा को समझाने की पूरी कोशिश की, ‘‘हमारे इस झगड़े में बच्चों पर गलत असर पड़ रहा है. मेहरबानी कर के यह झगड़ा बंद कर दो.’’पर सायरा उस की एक भी बात सुनने को तैयार न थी. इस झगड़े से अब्दुल का कारोबार भी दिन ब दिन बिखरता जा रहा था.अब्दुल ने सोचा, ‘क्यों न सायरा के नाम वसीयत कर दूं… वह भी खुश हो जाएगी…’ और उस ने अगले दिन सायरा से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे नाम वसीयत कर देता हूं. इस के बाद तो तुम खुश हो जाओगी न?’’

यह सुन कर सायरा बोली, ‘‘ठीक है, मैं कल वकील को बुला लेती हूं. तुम मेरे नाम वसीयत कर दो.’’अब्दुल यह सुन कर खुश हो गया कि अब झगड़ा खत्म हो जाएगा और उस ने मुहब्बत भरी नजरों से सायरा को देखा और अपनी बांहों में भर लिया.सायरा एक ही झटके में अब्दुल से अलग होते हुए बोली, ‘‘पहले वसीयत तो करो, उस के बाद मेरे पास आना.’’अब्दुल खुश था कि एक ही दिन की तो बात है. कल वह सायरा के नाम वसीयत कर देगा, तो फिर उस से ढेर सारा प्यार करेगा.

पर अब्दुल इस बात से अनजान था कि कल क्या ड्रामा होने वाला है. सायरा ने जब अपनी मां से इस बात का जिक्र किया, तो वह झट से बोली, ‘‘बाबाजी के तावीज का असर हो रहा है. इस बारे में पहले बाबाजी से बात करते हैं, उस के बाद कोई फैसला लेना. जब वह वसीयत के लिए तैयार हो गया है तो जल्द ही तुम्हारे नाम घर करने के लिए भी तैयार हो जाएगा, बस तुम थोड़ा सब्र करो.’’

उन्होंने जब बाबा से इस बारे में बात की, तो उन्होंने यही बोला, ‘‘एक हफ्ते में इतना असर हो गया है, तुम बाकी रकम ले कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें कल और तावीज देता हूं. 7 बकरों की कुरबानी भी देनी है, फिर देखना कि तुम जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा.’’अगले दिन सायरा ने अपनी बांहें अब्दुल के गले में डालते हुए कहा, ‘‘वकील कल आएगा जानू. तुम अभी काम पर जाओ.

रात में बात करते हैं.’’अब्दुल के जाते ही दोनों मांबेटी ने अब्दुल के रखे हुए पैसों में से बाकी के पैसे भी उठा लिए और उस ढोंगी बाबा के पास पहुंच गईं. बाबा ने उन से पैसे लिए और तावीज देते हुए कहा, ‘‘अभी 7 दिन का और  इंतजार करो. उसे अपने पास बिलकुल मत आने देना. इस बीच अगर वह तुम्हारा कहना मान ले, तो जल्दी उस काम को अंजाम दे देना, उस के बाद ही अपनेआप को छूने देना.’’

शाम को जब अब्दुल घर आया, तो मौका देख कर उस ने सायरा को अपनी बांहों में जकड़ लिया. सायरा झल्लाते हुए फौरन अलग हो गई. उस की आवाज सुन कर मां भी वहां आ गईं और अब्दुल को बुराभला कहते हुए बोलीं, ‘‘क्यों मेरी लड़की को परेशान करता रहता है? जब इस ने मना कर दिया है, तो क्यों इस के कमरे में आता है?’’

अब्दुल यह सब देख कर हैरान था, पर वह कुछ न बोल सका और चुपचाप अपने कमरे में चला गया.अगले दिन वकील आया, तो सायरा ने अब्दुल को फोन कर के घर बुला लिया. अब्दुल ने वकील से कहा, ‘‘मुझे अपनी बीवी सायरा के नाम वसीयत बनानी है कि मेरे मरने के बाद यह घर मेरी बीवी को मिले.’’इस पर सायरा और उस की मां बिफर गईं. सायरा बोली, ‘‘कोई वसीयत नहीं… क्या पता कि तुम बाद में बदल जाओ. घर मेरे नाम पर करो.’’अब्दुल इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ.

अब्दुल ने सायरा को काफी समझाया. उस के हाथ जोड़े, पैर पकड़े. अपने मासूम बच्चों का वास्ता दिया, लेकिन सायरा अपनी जिद पर कायम रही और उस ने अब्दुल की एक न सुनी, क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि बाबाजी उस का दिमाग जरूर बदलेंगे और यह घर उस का हो जाएगा.इसी बीच सायरा की मुलाकात अपने पहले आशिक से हो गई, जो शादी से पहले उस से प्यार करता था.

सायरा अपनी मां की मौजूदगी में ही उस से मिलने जाने लगी, क्योंकि वह आशिक उस की मां की दूर की बहन का बेटा था. उस की मां भी उसे पसंद करती थी, मगर गरीब होने की वजह से इन दोनों की शादी न हो पाई थी. अब्दुल इस बात से अनजान था. वह इसी उम्मीद में था कि एक न एक दिन सायरा को अपनी गलती का अहसास होगा.लेकिन अब्दुल का ऐसा सोचना गलत था. सायरा अपने उस आशिक के साथ खुश थी, जो उस का ही हमउम्र और खूबसूरत था.

अब तो सायरा अब्दुल की सूरत भी देखना पसंद नहीं करती थी. वह तो इस ताक में थी कि किसी तरह यह घर मिल जाए, फिर इसे बेच कर जिंदगी की नई शुरुआत करे.अब्दुल काफी हताश हो चुका था. आखिर वह दिन भी आ गया, जब अब्दुल ने अपना घर सायरा के नाम कर दिया.

घर नाम होते ही सायरा और उस की मां की खुशी का ठिकाना न रहा. अब तो सायरा का आशिक खुलेआम उस के घर पर आने लगा. अब्दुल कुछ बोलता तो मांबेटी उसे धमका देती थीं.अब्दुल अपना दिमागी संतुलन खो रहा था. वह तो सायरा की याद में गुम रहता, लेकिन सायरा उसे कोई भाव न देती. आखिर सायरा और उस की मां ने अब एक नया दांव चला.

उन्हें किसी भी कीमत पर अब्दुल से छुटकारा चाहिए था. जब आसपड़ोस के लोग सायरा को समझाते तो वह उन से बोलती कि अब्दुल नामर्द है. अब्दुल इन सब बातों से अनजान पागलों की तरह जिंदगी गुजार रहा था. उस की इस हालत के बारे में जब अब्दुल के भाइयों को पता चला, तो वे उसे लेने मुंबई आ गए. उन्होंने सायरा से बात की, तो वह तपाक से बोली, ‘‘मैं एक नामर्द के साथ जिंदगी नहीं गुजार सकती. मुझे इस से तलाक चाहिए.’’

अब्दुल ने जब यह सुना, तो वह दंग रह गया. कुछ ही दिनों में अब्दुल और सायरा का तलाक हो गया. अब्दुल के भाई उसे और उस के बच्चों को गांव ले गए. धीरेधीरे अब्दुल की तबीयत में सुधार आने लगा. अब उसे अपने बच्चों की फिक्र थी. वह उन के लिए कुछ करना चाहता था. एक दिन अब्दुल के पार्टनर का फोन आया और उस ने उस से वापस मुंबई आने को कहा. अब्दुल वापस मुंबई आ गया. उस के पार्टनर ने उस की दुकान और बचत उसे दी और काम संभालने को कहा.

इधर सायरा वह घर बेच कर कहीं और चली गई थी. उस का कुछ पता न था. वैसे, उड़तीउड़ती खबर अब्दुल को भी मिलती रहती थी. अब्दुल के दोस्तों ने मिल कर उस की दूसरी शादी एक बेवा औरत से करवा दी, जिस के 2 मासूम बच्चे थे और कुछ ही दिनों में अब्दुल अपने बच्चों को भी ले आया.अब्दुल ने कड़ी मेहनत की और एक छोटी सी खोली खरीद ली.

वह अपने बीवीबच्चों के साथ बेहतर जिंदगी गुजरने लगा और दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा.उधर सायरा के आशिक ने सब पैसे घूमनेफिरने में उड़ा दिए और जब सब पैसे खत्म हो गए तो वह सायरा और उस की मां को छोड़ कर चला गया, क्योंकि उस ने सायरा से शादी नहीं की थी. वह तो केवल दौलत के लालच में उस के साथ रह रहा था.

सायरा और उस की मां को अब खाने के भी लाले पड़ने लगे और मजबूर हो कर दोनों मांबेटी को दूसरों के घरों में साफसफाई का काम करना पड़ रहा था.फिर एक दिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सायरा को अपाहिज बना दिया. उसे लकवा मार गया था.

सायरा अब बिस्तर पर पड़ी सोचती रहती है कि अगर वह उस ढोंगी बाबा और अपनी मां के चक्कर में न पड़ती तो यह हालत न होती.सायरा की मां ने एक दिन अब्दुल को फोन किया और सारी बातें बताईं. अब्दुल उन के बताए हुए पते पर सायरा से मिलने गया. वहां का नजारा देख कर अब्दुल का दिल रो पड़ा. सायरा सूख कर कांटा हो चुकी थी. वह एक जिंदा लाश बन कर पलंग पर पड़ी थी. उस की एक गलती ने हंसताखेलता परिवार बरबाद कर दिया था. Story In Hindi

Hindi Romantic Story: इंतजार तो किया होता – आरिफ की मासूम बेवफाई

Hindi Romantic Story: कालेज का पहला दिन था, इसलिए शब्बी कुछ जल्दी ही आ गई थी. वह बहुत ही सुंदर और शर्मीली लड़की थी. उसे कम बोलना पसंद था.

धीरेधीरे कालेज में शब्बी की जानपहचान बढ़ती गई. लड़के तो उस की तारीफ करते न थकते, पर शब्बी किसी भी लड़के की तरफ अपनी नजर नहीं उठाती थी.

एक दिन आसमान पर बादल घिर आए थे. बिजली चमक रही थी. शब्बी तेज कदम बढ़ाते हुए अपने घर की तरफ जा रही थी. अचानक बूंदाबांदी शुरू हो गई, तो वह एक घर के बरामदे में जा कर खड़ी हो गई.

अचानक शब्बी की नजर एक खूबसूरत लड़के आरिफ पर पड़ी. वह उसे देख कर घबरा गई. तभी आरिफ ने मुसकान फेंकते हुए कहा, ‘‘शब्बीजी, आप अंदर आइए न… बाहर क्यों खड़ी हैं?’’

शब्बी यह बात सुन कर शरमा गई और बारिश में ही अपने घर की तरफ चलने लगी. आरिफ ने बांह पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘बुरा मान गई. मैं कोई पराया थोड़े ही हूं…’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ शब्बी ने झेंपते हुए कहा. बारिश धीरेधीरे कम होती जा रही थी. जल्दी ही शब्बी अपने घर की तरफ चल पड़ी.

शब्बी सारी रात करवटें बदलती रही. उस की आंखें आरिफ को खोज रही थीं. उस का बड़े ही प्यार से ‘शब्बीजी’ कहना उसे बहुत पसंद आया था. आरिफ भी उसी कालेज में पढ़ता था. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान बढ़ी और फिर मुलाकातें होने लगीं.

एक दिन आरिफ ने कहा, ‘‘शब्बी, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं, अब एक पल की भी जुदाई मुझ से सहन नहीं होती… मैं तुम्हारे घर वालों से तुम्हें मांग लूंगा और दुलहन बना कर अपने घर ले आऊंगा.’’

उस दिन शब्बी ज्यों ही घर पहुंची, उस की नजर कुछ अनजानी औरतों पर पड़ी. पर वह नजरअंदाज करते हुए अपने कमरे की तरफ चली गई.

तभी उस की मां मिठाई का एक डब्बा लिए उस के कमरे में आईं, तो शब्बी झट पूछ बैठी, ‘‘मां, आज मिठाई किस खुशी में लाई हो?’’

सायरा बेगम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘बेटी, बहुत बड़ी खुशखबरी है. पहले मिठाई खाओ, फिर मैं बताऊंगी.’’

‘‘अच्छा, अब बताइए,’’ शब्बी ने मिठाई खाते हुए पूछा.

‘‘बेटी, खुशी की बात यह है कि तुम्हारा रिश्ता पक्का हो गया है.’’

मां की यह बात सुन कर शब्बी का दिल जोर से धड़कने लगा. उस की नजरों में आरिफ का मासमू चेहरा घूमने लगा. वह बेकरार हो उठी और आरिफ के घर की ओर चल पड़ी.

आरिफ उस वक्त कोई गीत गुनगुना रहा था. शब्बी को इस कदर परेशान और दुखी देख कर वह चौंक उठा, ‘‘क्या हुआ शब्बी? तुम इस तरह परेशान क्यों हो?

‘‘आरिफ…’’ शब्बी कांपते हुए बोली, ‘‘मां ने मेरी शादी पक्की कर दी है. मैं अब तुम्हारे बिन एक पल भी…’’

‘‘छोड़ो भी यह फिल्मी अंदाज…’’ आरिफ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ठीक है, शादी कर लो… आखिर कब तक कुंआरी बैठी रहोगी. तुम अपनी मां की बात नहीं मानोगी क्या?’’

आरिफ की यह बात सुन कर शब्बी की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कांपती आवाज में बोली, ‘‘आरिफ, मैं नहीं जानती थी कि तुम इस कदर बेवफा हो,’’ इतना कह कर शब्बी ने खिड़की के रास्ते नीचे छलांग लगा दी.

यह देख कर आरिफ चीख पड़ा. वह दौड़ता हुआ लहूलुहान शब्बी के पास पहुंचा. ‘‘शब्बी, यह तू ने क्या कर लिया… देखो शब्बी, मैं हूं… हां, मैं… तुम्हारा आरिफ… तुम्हारा हमराज… आंखें खोलो… कुछ पल तो इंतजार किया होता.

‘‘वह तो मैं ने ही अपनी मां को तुम्हारे घर भेजा था तुम्हें अपनी दुलहन बनाने के लिए. उठो शब्बी, मेरी दुलहन.’’

आरिफ दीवानों की तरह चिल्लाए जा रहा था, लेकिन शब्बी तो अब इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: तपस्या – शादी को लेकर शैली का प्रयास

Best Hindi Story: शैली उस दिन बाजार से लौट रही थी कि वंदना उसे रास्ते में ही मिल गई.

‘‘तू कैसी है, शैली? बहुत दिनों से दिखाई नहीं दी. आ, चल, सामने रेस्तरां में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

वंदना शैली को घसीट ही ले गई थी. जाते ही उस ने 2 कप कौफी का आर्डर दिया.

‘‘और सुना, क्या हालचाल है? कोई पत्र आया शिखर का?’’

‘‘नहीं,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे कर शैली का मन उदास  हो गया था.

‘‘सच शैली कभी तेरे बारे में सोचती हूं तो बड़ा दुख होेता है. आखिर ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी तेरे पिताजी को जो तेरी शादी कर दी? ठहर कर, समझबूझ कर करते. शादीब्याह कोई गुड्डे-गुडि़या का खेल तो है नहीं.’’

इस बीच बैरा मेज पर कौफी रख गया और वंदना ने बातचीत का रुख दूसरी ओर मोड़ना चाहा.

‘‘खैर, जाने दे. मैं ने तुझे और उदास कर दिया. चल, कौफी पी. और सुना, क्याक्या खरीदारी कर डाली?’’

पर शैली की उदासी कहां दूर हो पाई थी. वापस लौटते समय वह देर तक शिखर के बारे में ही सोचती रही थी. सच कह रही थी वंदना. शादीब्याह कोई गुड्डे – गुडि़या का खेल थोड़े ही होता है. पर उस के साथ क्यों हुआ यह खेल? क्यों?

वह घर लौटी तो मांजी अभी भी सो ही रही थीं. उस ने सोचा था, घर पहुंचते ही चाय बनाएगी. मांजी को सारा सामान संभलवा देगी और फिर थोड़ी देर बैठ कर अपनी पढ़ाई करेगी. पर अब कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था. वंदना उस की पुरानी सहेली थी. इसी शहर में ब्याही थी. वह जब भी मिलती थी तो बड़े प्यार से. सहसा शैली का मन और उदास हो गया था. कितना फर्क आ गया था वंदना की जिंदगी में और उस की  अपनी जिंदगी में. वंदना हमेशा खुश, चहचहाती दिखती थी. वह अपने पति के साथ  सुखी जिंदगी बिता रही थी. और वह…अतीत की यादों में खो गई.

शायद उस के पिता भी गलत नहीं होंगे. आखिर उन्होंने शैली के लिए सुखी जिंदगी की ही तो कामना की थी. उन के बचपन के मित्र सुखनंदन का बेटा था शिखर. जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तभी  उन्होंने  यह रिश्ता तय कर दिया था. सुखनंदन ने खुद ही तो हाथ मांग कर यह रिश्ता तय किया था. कितना चाहते थे वह उसे. जब भी मिलने आते, कुछ न कुछ उपहार अवश्य लाते थे. वह भी तो उन्हें चाचाजी कहा करती थी.

‘‘वीरेंद्र, तुम्हारी यह बेटी शुरू से ही मां के अभाव में पली है न, इसलिए बचपन में ही सयानी हो गई है,’ जब वह दौड़ कर उन की खातिर में लग जाती तो वह हंस कर उस के पिता से कहते.

फिर जब शिखर इंजीनियर बन गया तो शैली के पिता जल्दी शादी कर देने के लिए दबाव डालने लगे थे. वह जल्दी ही रिटायर होने वाले थे और उस से पहले ही यह दायित्व पूरा कर लेना चाहते थे. पर जब सुखनंदन का जवाब आया कि शिखर शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा है तो वह चौंक पड़े थे. यह कैसे संभव है? इतने दिनों का बड़ों द्वारा तय किया रिश्ता…और फिर जब सगाई हुई थी तब तो शिखर ने कोई विरोध नहीं किया था…अब क्या हो गया?

शैली के पिता ने खुद भी 2-1 पत्र लिखे थे शिखर को, जिन का कोई जवाब नहीं आया था. फिर वह खुद ही जा कर शिखर के बौस से मिले थे. उन से कह कर शायद जोर डलवाया था उस पर. इस पर शिखर का बहुत ही बौखलाहट भरा पत्र आया था. वह उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं, यह तक लिखा था उस ने. कितना रोई थी तब वह और पिताजी से भी कितना कहा था, ‘क्यों नाहक जिद कर रहे हैं? जब वे लोग नहीं चाहते तो क्यों पीछे पड़े हैं?’

‘ठीक है बेटी, अगर सुखनंदन भी यही कहेगा तो फिर मैं अब कभी जोर नहीं दूंगा,’ पिताजी का स्वर निराशा में डूबा हुआ था.

तभी अचानक शिखर के पिता को दिल का दौरा पड़ा था और उन्होंने अपने बेटे को सख्ती से कहा था कि वह अपने जीतेजी अपने मित्र को दिया गया वचन निभा देना चाहते हैं, उस के बाद ही वह शिखर को विदेश जाने की इजाजत देंगे. इसी दबाव में आ कर शिखर  शादी के लिए तैयार हो गया था. वह तो कुछ समझ ही नहीं पाई थी.  उस के पिता जरूर बेहद खुश थे और उन्होंने कहा था, ‘मैं न कहता था, आखिर सुखनंदन मेरा बचपन का मित्र है.’

‘पर, पिताजी…’ शैली का हृदय  अभी  भी अनचाही आशंका से धड़क रहा था.

‘तू चिंता मत कर बेटी. आखिरकार तू अपने रूप, गुण, समझदारी से सब का  दिल जीत लेगी.’

फिर गुड्डेगुडि़या की तरह ही तो आननफानन में उस की शादी की सभी रस्में अदा हो गई थीं. शादी के समय भी शिखर का तना सा चेहरा देख कर वह पल दो पल के लिए आशंकाओं से घिर गई थी. फिर सखीसहेलियों की चुहलबाजी में सबकुछ भूल गई थी.

शादी के बाद वह ससुराल आ गई थी. शादी की पहली रात मन धड़कता रहा था. आशा, उमंगें, बेचैनी और भय सब के मिलेजुले भाव थे. क्या होगा? पर शिखर आते ही एक कोने में पड़ रहा था, उस ने न कोई बातचीत की थी, न उस की ओर निहार कर देखा था.

वह कुछ समझ ही नहीं सकी थी. क्या गलती थी उस की? सुबह अंधेरे ही वह अपना सामान बांधने लगा था.

‘यह क्या, लालाजी, हनीमून पर जाने की तैयारियां भी शुरू हो गईं क्या?’ रिश्ते की किसी भाभी ने छेड़ा था.

‘नहीं, भाभी, नौकरी पर लौटना है. फिर अमरीका जाने के लिए पासपोर्ट वगैरह भी बनवाना है.’

तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया था वह. दूसरे कमरे में बैठी शैली ने सबकुछ सुना था. फिर दिनभर खुसरफुसर भी चलती रही थी. शायद सास ने कहा था, ‘अमरीका जाओ तो फिर बहू को भी लेते जाना.’

‘ले जाऊंगा, बाद में, पहले मुझे तो पहुंचने दो. शादी के लिए पीछे पड़े थे, हो गई शादी. अब तो चैन से बैठो.’

न चाहते हुए भी सबकुछ सुना था शैली ने. मन हुआ था कि जोर से सिसक पड़े. आखिर किस बात के लिए दंडित किया जा रहा था उसे? क्या कुसूर था उस का?

पिताजी कहा करते थे कि धीरेधीरे सब का मन जीत लेगी वह. सब सहज हो जाएगा. पर जिस का मन जीतना था वह तो दूसरे ही दिन चला गया था. एक हफ्ते बाद ही फिर दिल्ली से अमेरिका भी.

पहुंच कर पत्र भी आया था तो घर वालों के नाम. उस का कहीं कोई जिक्र नहीं था. रोती आंखों से वह देर तक घंटों पता नहीं क्याक्या सोचती रहती थी. घर में बूढ़े सासससुर थे. बड़ी शादीशुदा ननद शोभा अपने बच्चों के साथ शादी पर आई थी और अभी वहीं थी. सभी उस का ध्यान रखते थे. वे अकसर उसे घूमने भेज देते, कहते, ‘फिल्म देख आओ, बहू, किसी के साथ,’ पर पति से अपनेआप को अपमानित महसूस करती वह कहां कभी संतुष्ट हो पाती थी.

शोभा जीजी को भी अपनी ससुराल लौटना था. घर में फिर वह, मांजी और बाबूजी ही रह गए थे. महीने भर के अंदर ही उस के ससुर को दूसरा दिल का दौरा पड़ा था. सबकुछ अस्तव्यस्त हो गया. बड़ी कठिनाई से हफ्ते भर की छुट्टी ले कर शिखर भी अमेरिका से लौटा था, भागादौड़ी में ही दिन बीते थे. घर नातेरिश्तेदारों से भरा था और इस बार भी बिना उस से कुछ बोले ही वह लौट गया था.

‘मां, तुम अकेली हो, तुम्हें बहू की जरूरत है,’ यह जरूर कहा था उस ने.

शैली जब सोचने लगती है तो उसे लगता है जैसे किसी सिनेमा की रील की तरह ही सबकुछ घटित हो गया था उस के साथ. हर क्षण, हर पल वह जिस के बारे में सोचती रहती है उसे तो शायद कभी अवकाश ही नहीं था अपनी पत्नी के बारे में सोचने का या शायद उस ने उसे पत्नी रूप में स्वीकारा ही नहीं.

इधर सास का उस से स्नेह बढ़ता जा रहा था. वह उसे बेटी की तरह दुलराने लगी थीं. हर छोटीमोटी जरूरत के लिए वह उस पर आश्रित होती जा रही थीं. पति की मृत्यु तो उन्हें और बूढ़ा कर गई थी, गठिया का दर्द अब फिर बढ़ गया था. कईर् बार शैली की इच्छा होती, वापस पिता के पास लौट जाए. आगे पढ़ कर नौकरी करे. आखिर कब तक दबीघुटी जिंदगी जिएगी वह? पर सास की ममता ही उस का रास्ता रोक लेती थी.

‘‘बहूरानी, क्या लौट आई हो? मेरी दवाई मिली, बेटी? जोड़ों का दर्द फिर बढ़ गया है.’’

मां का स्वर सुन कर तंद्रा सी टूटी शैली की. शायद वह जाग गई थीं और उसे आवाज दे रही थीं.

‘‘अभी आती हूं, मांजी. आप के लिए चाय भी बना कर लाती हूं,’’ हाथमुंह धो कर सहज होने का प्रयास करने लगी थी शैली.

चाय ले कर कमरे में आई ही थी कि बाहर फाटक पर रिकशे से उतरती शोभा जीजी को देखते ही वह चौंक गई.

‘‘जीजी, आप इस तरह बिना खबर दिए. सब खैरियत तो है न? अकेले ही कैसे आईं?’’

बरामदे में ही शोभा ने उसे गले से लिपटा लिया था. अपनी आंखों को वह बारबार रूमाल से पोंछती जा रही थी.

‘‘अंदर तो चल.’’

और कमरे में आते ही उस की रुलाई फूट पड़ी थी. शोभा ने बताया कि अचानक ही जीजाजी की आंखों की रोशनी चली गई है, उन्हें अस्पताल में दाखिल करा कर वह सीधी आ रही है. डाक्टर ने कहा है कि फौरन आपरेशन होगा. कम से कम 10 हजार रुपए लगेंगे और अगर अभी आपरेशन नहीं हुआ तो आंख की रोशनी को बचाया न जा सकेगा.

‘‘अब मैं क्या करूं? कहां से इंतजाम करूं रुपयों का? तू ही शिखर को खबर कर दे, शैली. मेरे तो जेवर भी मकान के मुकदमे में गिरवी  पड़े  हुए हैं,’’ शोभा की रुलाई नहीं थम रही थी.

जीजाजी की आंखों की रोशनी… उन के नन्हे बच्चे…सब का भविष्य एकसाथ ही शैली के  आगे घूम गया था.

‘‘आप ऐसा करिए, जीजी, अभी तो ये मेरे जेवर हैं, इन्हें ले जाइए. इन्हें खबर भी करूंगी तो इतनी जल्दी  कहां पहुंच पाएंगे रुपए?’’

और शैली ने अलमारी से निकाल कर अपनी चूडि़यां और जंजीर  आगे रख दी थीं.

‘‘नहीं, शैली, नहीं…’’ शोभा स्तंभित थी.

फिर कहनेसुनने के बाद ही वह जेवर लेने के लिए तैयार हो पाई थी. मां की रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘बहू, तू तो हीरा है.’’

‘‘पता नहीं शिखर कब इस हीरे का मोल समझ पाएगा,’’ शोभा की आंखों में फिर खुशी के आंसू छलक पड़े थे.

पर शैली को अनोखा संतोष  मिला था. उस के मन ने कहा, उस का नहीं तो किसी और का परिवार तो बनासंवरा रहे. जेवरों का शौक तो उसे वैसे ही नहीं था. और अब जेवर पहने भी तो किस की खातिर? मन की उसांस को उस ने दबा  दिया था.

8 दिन के बाद खबर मिली थी, आपरेशन सफल रहा. शिखर को भी अब सूचना मिल गई थी, और वह आ रहा था. पर इस बार शैली ने अपनी सारी उत्कंठा को दबा लिया था. अब वह किसी तरह का उत्साह  प्रदर्शित नहीं कर  पा रही थी. सिर्फ तटस्थ भाव से रहना चाहती थी वह.

‘‘मां, कैसी हो? सुना है, बहुत बीमार रही हो तुम. यह क्या हालत बना रखी है? जीजाजी को क्या हुआ था अचानक?’’ शिखर ने पहुंचते ही मां से प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘मेरी  तो तबीयत तू देख ही रहा है, बेटे. बीच में तो और भी बिगड़ गई थी. बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. बेचारी बहू ने ही सब संभाला. तेरे जीजाजी  की तो आंखों की रोशनी ही चली गई थी. उसी समय आपरेशन नहीं होता तो पता नहीं क्या होता. आपरेशन के लिए पैसों का भी सवाल था, लेकिन उसी समय बहू ने अपने जेवर दे कर तेरे जीजाजी  की आंखों की रोशनी वापस ला दी.’’

‘‘जेवर दे दिए…’’ शिखर हतप्रभ था.

‘‘हां, क्या करती शोभा? कह रही थी कि तुझे खबर कर के रुपए मंगवाए तो आतेआते भी तो समय लग जाएगा.’’

मां बहुत कुछ कहती जा रही थीं पर शिखर के सामने सबकुछ गड्डमड्ड हो गया था. शैली चुपचाप आ कर नाश्ता रख गई थी. वह नजर उठा कर  सिर ढके शैली को देखता रहा था.

‘‘मांजी, खाना क्या बनेगा?’’ शैली ने धीरे से मां से पूछा था.

‘‘तू चल. मैं भी अभी आती हूं रसोई में,’’ बेटे के आगमन से ही मां उत्साहित हो उठी थीं. देर तक उस का हालचाल पूछती रही थीं. अपने  दुखदर्द  सुनाती रही थीं.

‘‘अब बहू भी एम.ए. की पढ़ाई कर रही है. चाहती है, नौकरी कर ले.’’

‘‘नौकरी,’’ पहली बार कुछ चुभा शिखर के मन में. इतने रुपए हर महीने  भेजता हूं, क्या काफी नहीं होते?

तभी उस की मां बोलीं, ‘‘अच्छा है. मन तो लगेगा उस का.’’

वह सुन कर चुप रह गया था. पहली बार उसे ध्यान आया, इतनी बातों के बीच इस बार मां ने एक बार भी नहीं कहा कि तू बहू को अपने साथ ले जा. वैसे तो हर चिट्ठी में उन की यही रट रहती थी. शायद अब अभ्यस्त हो गई हैं  या जान गई हैं कि वह नहीं ले जाना चाहेगा. हाथमुंह धो कर वह अपने किसी दोस्त से मिलने के लिए घर से निकला  पर मन ही नहीं हुआ जाने का.

शैली ने शोभा को अपने जेवर दे  दिए, एक यही बात उस  के मन में गूंज रही थी. वह तो शैली और उस के पिता  दोनों को ही बेहद स्वार्थी समझता रहा था जो सिर्फ अपना मतलब हल करना जानते हों. जब से शैली के पिता ने उस के बौस से कह कर उस पर शादी के लिए दबाव डलवाया था तभी से उस का मन इस परिवार के लिए नफरत से भर गया था और उस ने सोच लिया था कि मौका पड़ने पर वह भी इन लोगों से बदला ले कर रहेगा. उस की तो अभी 2-4 साल शादी करने की इच्छा नहीं थी, पर इन लोगों ने चतुराई से उस के भोलेभाले पिता को फांस लिया. यही सोचता था वह अब तक.

फिर शैली का हर समय चुप रहना उसे खल जाता. कभी अपनेआप पत्र भी तो नहीं लिखा था उस ने. ठीक है, दिखाती रहो अपना घमंड. लौट आया तो  मां ने उस का खाना परोस दिया था. पास ही बैठी बड़े चाव से खिलाती रही थीं. शैली रसोई में ही थी. उसे लग रहा था कि  शैली जानबूझ कर ही उस  के सामने आने से कतरा रही है.

खाना खा कर उस ने कोई पत्रिका उठा ली थी. मां और शैली ने भी खाना खा लिया था. फिर मां को दवाई  दे कर शैली मां  के कमरे से जुड़े अपने छोटे से कमरे में चली गई और कमरे की बत्ती जला दी थी.

देर तक नींद नहीं आई थी शिखर को. 2-3 बार बीच में पानी पीने के बहाने  वह उठा भी था. फिर याद आया था पानी का जग  तो शैली  कमरे में ही  रख गई थी. कई बार इच्छा हुई थी चुपचाप उठ कर शैली को  आवाज देने की. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज  पहली बार उसे क्या हो रहा है. मन ही मन वह अपने परिवार के बारे में सोचता रहा था. वह सगा बेटा हो कर भी घरपरिवार का इतना ध्यान नहीं रख पा रहा था. फिर शैली तो दूसरे घर की है. इसे क्या जरूरत है सब के लिए मरनेखपने की, जबकि उस का पति ही उस की खोजखबर नहीं ले रहा हो?

पूरी रात वह सो नहीं सका था. दूसरा दिन मां को डाक्टर के यहां दिखाने के लिए ले जाने, सारे परीक्षण फिर से करवाने में बीता था.

सारी दौड़धूप में शाम तक काफी थक चुका था वह. शैली अकेली कैसे कर पाती होगी? दिनभर वह भी तो मां के साथ ही उन्हें सहारा दे कर चलती रही थी. फिर थकान के  बावजूद रात को मां से पूछ कर उस की पसंद के कई व्यंजन  खाने  में बना लिए थे.

‘‘मां, तुम लोग भी साथ ही खा लो न,’’ शैली की तरफ देखते हुए उस ने कहा था.

‘‘नहीं, बेटे, तू पहले गरमगरम खा ले,’’ मां का स्वर लाड़ में भीगा हुआ था.

कमरे में आज अखबार पढ़ते हुए शिखर का मन जैसे उधर ही उलझा रहा था. मां ने शायद खाना खा लिया था, ‘‘बहू, मैं तो थक गईर् हूं्. दवाई दे कर बत्ती बुझा दे,’’ उन की आवाज आ रही थी. उधर शैली रसोईघर में सब सामान समेट रही थी.

‘‘एक प्याला कौफी मिल सकेगी क्या?’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े हो कर उस ने कहा था.

शैली ने नजर उठा कर देखा भर था. क्या था उन नजरों में, शिखर जैसे सामना ही नहीं कर पा रहा था.

शैली कौफी का कप मेज पर रख कर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिखर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आओ, बैठो.’’

उस के कदम ठिठक से गए थे. दूर की कुरसी की तरफ बैठने को उस के कदम बढ़े ही थे कि शिखर ने धीरे से हाथ खींच कर उसे अपने पास पलंग पर बिठा लिया था.

लज्जा से सिमटी वह कुछ बोल भी नहीं पाई थी.

‘‘मां की तबीयत अब तो काफी ठीक जान पड़ रही है,’’ दो क्षण रुक कर शिखर ने बात शुरू करने का प्रयास किया था.

‘‘हां, 2 दिन से घर में खूब चलफिर रही हैं,’’ शैली ने जवाब में कहा था. फिर जैसे उसे कुछ याद हो आया था और वह बोली थी, ‘‘आप शोभा जीजी से भी मिलने जाएंगे न?’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘मांजी को भी साथ ले जाइएगा. थोड़ा परिवर्तन हो जाएगा तो उन का मन बदल जाएगा. वैसे….घर से जा भी कहां पाती हैं.’’

शिखर चुपचाप शैली की तरफ देखता भर रहा था.

‘‘मां को ही क्यों, मैं तुम्हें भी साथ ले चलूंगा, सदा के लिए अपने साथ.’’

धीरे से शैली को उस ने अपने पास खींच लिया था. उस के कंधों से लगी शैली का मन जैसे उन सुमधुर क्षणों में सदा के लिए डूब जाना चाह रहा था. Best Hindi Story

Hindi Family Story: शौर्टकट – क्या था सविता के मालामाल होने का राज

Hindi Family Story: सविता के तकिए के नीचे एक महंगा मोबाइल फोन देख कर उस के पति श्यामलाल का माथा ठनक गया. उसे समझ में नहीं आया कि 6,000 रुपए महीना कमाने वाली उस की पत्नी के पास 50,000 रुपए का मोबाइल फोन कहां से आया.

सविता दूसरे घरों में झाड़ूपोंछे का काम करती थी, जबकि श्यामलाल दिहाड़ी मजदूर था. पत्नी के पास इतना महंगा मोबाइल देख कर उस के दिमाग में कई तरह के सवाल आने लगे.

इस सब के बावजूद श्यामलाल ने अपने दिल को मनाया तो जरूर, लेकिन रातभर उसे नींद नहीं आई. वह मन ही मन सोच रहा था, ‘इस के पास इतना महंगा फोन कहां से आया? इसे जगा कर पूछ लेता हूं. नहीं, अभी सोने देता हूं, बेचारी थकी होगी. कल सुबह पूछ लूंगा.’

‘‘सविता, यह किस का मोबाइल है और तेरे पास कहां से आया? यह तो काफी महंगा है,’’ अगले दिन श्यामलाल ने पूछा.

पति के हाथ में अपना मोबाइल फोन देख कर सविता के चेहरे का रंग पीला पड़ गया. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले, क्या न बोले.

‘‘मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया सविता? यह फोन है किस का?’’ श्यामलाल ने जोर दे कर पूछा.

‘‘अरे, मालकिन का है. इस में कुछ दिक्कत आ रही थी, सो उन्होंने कहा था कि इसे ठीक करवा लाओ. यह अब ठीक हो गया है तो आज उन्हें दे दूंगी,’’ यह कह कर सविता ने मोबाइल अपने हाथ में लिया और काम पर निकल गई.

लेकिन उस दिन के बाद से सविता का पति कभी उस के पास नए सोने के झुमके देखता, तो कभी पायल, कभी महंगी साड़ी, तो कभी कुछ और. एक दिन वह बड़ा और महंगा टीवी ले कर घर आई तो श्यामलाल की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने टोकते हुए कहा, ‘‘क्या है यह सब?’’

‘‘टीवी है… दिख नहीं रहा है क्या?’’

‘‘वह तो दिख रहा है मुझे, लेकिन यह आया कहां से?’’

‘‘दुकान से आया है और कहां से आएगा.’’

‘‘देखो, ज्यादा बात को घुमाओ मत और सीधेसीधे बताओ कि इतना महंगा टीवी कहां से आया? तुम्हारी कोई लौटरी लगी है क्या? ये झुमके, पायल, साड़ी और टीवी, सब कहां से आ रहे हैं?’’

श्यामलाल की बातों को सुन कर सविता ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘यह सब मेरी नई मालकिन ने दिया है. वे मेरे काम से बहुत खुश हैं. वे मुझे गिफ्ट देती हैं.’’

‘‘कोई भी मालकिन इतना महंगा गिफ्ट नहीं देती है और वह भी अपने घर काम करने वाली को.’’

‘‘आप मुझ पर शक कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं, जो बात सच है, वही बता रहा हूं. हम दोनों जितना कमाते हैं, उस से ये सारी चीजें इस जनम में तो नहीं ही ली जा सकती हैं.’’

‘‘अब अगर कोई मुझे दे रहा है, तो आप को क्यों खुजली लग रही है? देखिए जी, मैं कोई गलत काम नहीं कर रही. आप चाहें तो मेरी मालकिन से जा कर पूछ सकते हैं,’’ श्यामलाल की बातों को सविता ने अपनी गोलमोल बातों में उलझा दिया.

श्यामलाल ने सविता की बातों को सुना तो जरूर, लेकिन वह चाह कर भी उस की बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा था.

उधर सविता का अचानक बदला रंगढंग सभी के लिए चर्चा की बात बन गया था. उस के महल्ले वालों ने अब पीठ पीछे बातें बनानी शुरू कर दी थीं.

‘‘विमला, यह सविता ने घर पर नोट छापने की मशीन लगा रखी है क्या? कल ही नया टीवी लाई थी वह. आज देखा कि वशिंग मशीन भी. आएदिन उस के घर में एक नया सामान आ रहा है.’’

‘‘जानती हो, वे जो कान में नए झुमके पहनी थी, वे भी सोने के हैं.’’

‘‘वह तो लोगों को यही बता रही है कि उस की मालकिन उस पर मेहरबान है. भला इस तरह मालकिन लोग कब से मेहरबान होने लगी हैं हम लोगों पर? मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा है.’’

‘‘तुम ने तो मेरी मुंह की बात छीन ली. जरूर वह कोई गलत काम कर रही है.’’

सविता के साथ की काम करने वाली सहेलियां आपस में कानाफूसी कर रही थीं.

लोगों की बातें श्यामलाल के कानों तक भी जाती थीं. वह जब सविता से लोगों की बातें कहता, तो वह बोलती, ‘‘जलने दो. अरे, जलन नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं. उन की मालकिन उन के एक दिन न जाने पर पैसे काट लेती है और मेरी मालकिन मुझे गिफ्ट पर गिफ्ट दिए जा रही है. जब ऐसा होगा तो उन्हें नींद आएगी कभी? नहीं आएगी तो और वे कुछ न कुछ बातें बनाएंगी.

‘‘देखिए, अगर आप दूसरों की बातों पर भरोसा कीजिएगा, तो कभी खुश नहीं रह पाएंगे, इसीलिए कान में तेल डालिए और जिंदगी के मजे लीजिए.’’

जिस तरह से सविता ने अपने पति को यह बात कही, उसे बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी. शक तो उसे भी अपनी पत्नी पर हो रहा था कि वह जरूर कोई गलत राह पर है, लेकिन जब तक वह उसे रंगे हाथों पकड़ नहीं लेता तो उसे क्या कहता.

‘जो मैं सोच रहा हूं, वैसा बिलकुल भी न हो. और जैसा सविता कह रही है, वैसा ही हो,’ श्यामलाल मन ही मन सोच रहा था.

एक दिन की बात है. रात के 9 बज गए थे. सविता अभी तक काम से लौटी नहीं थी. श्यामलाल उस के लिए बहुत परेशान हो रहा था.

श्यामलाल उसी समय राज अपार्टमैंट्स की तरफ निकल गया, जहां सविता काम करती थी. वह तेज चाल से अपार्टमैंट्स की ओर चला जा रहा था कि तभी उस की नजर एक पुलिस की जीप पर गई. उस ने देखा कि सविता उस जीप में बैठी हुई थी.

सविता को पुलिस जीप में बैठा देख कर श्यामलाल का दिमाग चक्कर खाने लगा. पुलिस सविता को कहां ले कर जा रही है?

‘‘सविता, सविता,’’ उस ने आवाज लगाई, लेकिन पुलिस की गाड़ी तेज रफ्तार में वहां से निकल गई.

श्यामलाल पुलिस की गाड़ी के पीछे भागने लगा. भागते हुए वह पुलिस स्टेशन पहुंचा तो देखा, सविता हवालात में थी.

‘‘क्या किया तू ने? पुलिस वाले तुझे यहां क्यों ले कर आए हैं? बता, क्या किया तू ने?’’

सविता खामोश थी. उस का चेहरा पीला पड़ा हुआ था.

तभी इंस्पैक्टर उस के पास आया और पूछा, ‘‘हां भाई, तुम इस के पति हो?’’

‘‘जी साहब, मैं इस का पति हूं.’’

‘‘क्या किया है इस ने? ऐसे पूछ रहा है, जैसे तुम को कुछ पता ही नहीं. जरूर तुम लोग मिल कर रैकेट चलाते हो. अभी रुक, तेरे को भी जेल में बंद करता हूं.’’

‘‘कौन सा रैकेट साहब? आप क्या कह रहे हैं?’’

सविता का मन हमेशा से अमीर बनने का था. वह बड़े साहब लोगों के यहां काम करती. उन की लाइफ स्टाइल को देखती. उन के कपड़ों और गाडि़यों को देखती तो उस के मन में हमेशा यही आता है कि उसे भी इन महंगी गाडि़यों में बैठना है. वह भी महंगे कपड़े पहने और इन के जैसी जिंदगी जिए. लेकिन दूसरों के यहां झाड़ूपोंछा कर के महंगे शौक पूरा करना मुमकिन नहीं था, इसलिए उस ने शौर्टकट रास्ता अपनाने का सोचा.

सविता देखने में खूबसूरत थी. उस ने सोचा, ‘मेरी खूबसूरती अगर मुझे अमीर नहीं बना सकी तो फिर यह किस काम की…’

लिहाजा, सविता जहांजहां काम करने जाती थी, उस घर के मालिक को अपनी अदा से घायल करने की कोशिश करती. लेकिन कोई भी उस के झांसे में नहीं आता था.

लेकिन एक बार विवेक नाम का एक शादीशुदा शख्स उस के जाल में फंस ही गया. हुआ यों कि विवेक की पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके गई हुई थी. उस के जाने के अगले दिन की बात है.

‘‘अरे, कोई टैंशन नहीं है मेरे भाई. आज की रात एक बार फिर से जीते हैं बैचलर वाली लाइफ. पूरी रात मौजमस्ती होगी,’’ विवेक ने अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने का प्लान बनाया था. उस रोज उन सब ने जबरदस्त पार्टी की. जब विवेक घर लौटा, तो उस के पैर लड़खड़ा रहे थे.

विवेक ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी. बस, घर पहुंच कर वह तुरंत बिस्तर पर जा कर सो गया. विवेक को घर पहुंचे अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि दरवाजे की डोरबैल बजी. सविता खड़ी थी.

‘‘साहब, मेमसाब ने कहा था कि आप के लिए रात की रोटी बना दिया करूं,’’ सविता कमरे के अंदर आते हुए बोली.

‘‘रोटी… नहीं… तुम जाओ… मैं खा कर आया हूं.’’

‘‘नहीं साहब, ऐसे कैसे चली जाऊं… मेमसाब गुस्सा होंगी मेरे ऊपर,’’ यह कह कर सविता किचन में चली गई.

विवेक सविता को रोकता रहा, लेकिन वह मानी नहीं. वैसे भी उस रोज नशा विवेक पर इतना हावी था कि वह क्या कह रहा था उसे खुद भी पता नहीं चल रहा था.

विवेक की यही हालत सविता के लिए लौटरी का टिकट बन गई. जब वह नशे की हालत में सोया था, तो वह उस के बगल में जा कर लेट गई और उस के साथ कुछ फोटो अपने मोबाइल पर खींच लिए. अगले दिन सवेरे ही सविता कहने लगी, ‘‘साहब, आप ने तो कल रात मेरी इज्जत लूट ली. मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. मोबाइल की तसवीर तो झूठ नहीं बोलेगी न.

‘‘अरे, मैं तो वापस जा रही थी, लेकिन आप ने मुझे खींच कर अंदर बुला लिया और फिर मेरे साथ वह सब किया कि मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही.’’

‘‘सविता, यह तुम क्या कह रही हो… यह माना कि मैं नशे में था, लेकिन मैं ने ऐसा तो कुछ नहीं किया,’’ विवेक ने कहा..

फिर विवेक के आसपास सविता ने ऐसा जाल बुना कि वह उस में फंस गया. सविता उसे ब्लैकमेल करने लगी और पैसे ऐंठना शुरू कर दिया. इन्हीं पैसों से वह रईसी करने लगी. यह सिलसिला चलता रहा,

लेकिन एक दिन विवेक की पत्नी शालिनी ने बैंक की पासबुक में देखा कि विवेक हर दूसरे दिन एक मोटी रकम खाते से निकाल रहा है, तो उसे कुछ शक हुआ. उस ने उस से पूछा, तो वह टालमटोल करने लगा. लेकिन जब उस ने अपने सिर की कसम दी, तो उस ने शालिनी को सारी बात बता दी.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई. तेरे जाने के बाद एक दिन,’’ विवेक ने सारी कहानी शालिनी को बताई. लेकिन उस के लाख कहने पर भी उसे इस बात पर यकीन नहीं हुआ कि उस के पति ने उस रोज कोई बदतमीजी सविता के साथ की होगी.

एक दिन जब फिर से सविता ने 50,000 रुपए विवेक से मांगे, तो विवेक और शालिनी ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस को सामने देख सविता के चेहरे का रंग उड़ गया.

पुलिस ने जब अपने तरीके से सविता से पूछताछ की, तो उस ने सबकुछ उगल दिया.

‘‘साहब, गलती हो गई मुझ से. विवेक साहब बेकुसूर हैं. यह वीडियो तो मैं ने उन के नशे में होने का फायदा उठा कर बनाया था.’’

फिर क्या था, सविता पर मुकदमा चला. उसे 3 साल की सजा हो गई. जिंदगी में जल्दी कामयाब होने का शौर्टकट उस पर भारी पड़ गया. Hindi Family Story

Hindi Kahani: ढाल – रमजानी से हो गई थी कैसी भूल

Hindi Kahani: अभी पहला पीरियड ही शुरू हुआ था कि चपरासिन आ गई. उस ने एक परची दी, जिसे पढ़ने के बाद अध्यापिकाजी ने एक छात्रा से कहा, ‘‘सलमा, खड़ी हो जाओ, तुम्हें मुख्याध्यापिकाजी से उन के कार्यालय में अभी मिलना है. तुम जा सकती हो.’’

सलमा का दिल धड़क उठा, ‘मुख्याध्यापिका ने मुझे क्यों बुलाया है? बहुत सख्त औरत है वह. लड़कियों के प्रति कभी भी नरम नहीं रही. बड़ी नकचढ़ी और मुंहफट है. जरूर कोई गंभीर बात है. वह जिसे तलब करती है, उस की शामत आई ही समझो.’

‘तब? कल दोपहर बाद मैं क्लास में नहीं थी, क्या उसे पता लग गया? कक्षाध्यापिका ने शिकायत कर दी होगी. मगर वह भी तो कल आकस्मिक छुट्टी पर थीं. फिर?’

सामने खड़ी सलमा को मुख्या- ध्यापिका ने गरदन उठा कर देखा. फिर चश्मा उतार कर उसे साड़ी के पल्लू से पोंछा और मेज पर बिछे शीशे पर रख दिया.

‘‘हूं, तुम कल कहां थीं? मेरा मतलब है कल दोपहर के बाद?’’ इस सवाल के साथ ही मुख्याध्यापिका का चेहरा तमतमा गया. बिना चश्मे के हमेशा लाल रहने वाली आंखें और लाल हो गईं. वह चश्मा लगा कर फिर से गुर्राईं, ‘‘बोलो, कहां थीं?’’

‘‘जी,’’ सलमा की घिग्घी बंध गई. वह चाह कर भी बोल न सकी.

‘‘तुम एक लड़के के साथ सिनेमा देखने गई थीं. कितने दिन हो गए

तुम्हें हमारी आंखों में यों धूल झोंकते हुए?’’

मुख्याध्यापिका ने कुरसी पर पहलू बदल कर जो डांट पिलाई तो सलमा की आंखों में आंसू भर आए. उस का सिर झुक गया. उसे लगा कि उस की टांगें बुरी तरह कांप रही हैं.

बेशक वह सिनेमा देखने गई थी. हबीब उसे बहका कर ले गया था, वरना वह कभी इधरउधर नहीं जाती थी. अम्मी से बिना पूछे वह जो भी काम करती है, उलटा हो जाता है. उन से सलाह कर के चली जाती तो क्या बिगड़ जाता? महीने, 2 महीने में वह फिल्म देख आए तो अम्मी इनकार नहीं करतीं. पर उस ने तो हबीब को अपना हमदर्द माना. अब हो रही है न छीछालेदर, गधा कहीं का. खुद तो इस वक्त अपनी कक्षा में आराम से पढ़ रहा होगा, जबकि उस की खिंचाई हो रही है. तौबा, अब आगे यह जाने क्या करेगी.

चलो, दोचार चांटे मार ले. मगर मारेगी नहीं. यह हर काम लिखित में करती है. हर गलती पर अभिभावकों को शिकायत भेज देती है. और अगर अब्बा को कुछ भेज दिया तो उस की पढ़ाई ही छूटी समझो. अब्बा का गुस्सा इस मुख्याध्यापिका से उन्नीस नहीं इक्कीस ही है.

‘‘तुम्हारी कक्षाध्यापिका ने तुम्हें कल सिनेमाघर में एक लड़के के साथ देखा था. इस छोटी सी उम्र में भी क्या कारनामे हैं तुम्हारे. मैं कतई माफ नहीं करूंगी. यह लो, ‘गोपनीय पत्र’ है. खोलना नहीं. अपने वालिद साहब को दे देना. जाओ,’’ मुख्याध्यापिका ने उसे लिफाफा थमा दिया.

सलमा के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने उमड़ आए आंसुओं को पोंछा. फिर संभलते हुए उस गोपनीय पत्र को अपनी कापी में दबा जैसेतैसे बाहर निकल आई.

पूरे रास्ते सलमा के दिल में हलचल मची रही. यदि किसी लड़के के साथ सिनेमा जाना इतना बड़ा गुनाह है तो हबीब उसे ले कर ही क्यों गया? ये लड़के कैसे घुन्ने होते हैं, जो भावुक लड़कियों को मुसीबत में डाल देते हैं.

अब अब्बा जरूर तेजतेज बोलेंगे और कबीले वाली बड़ीबूढि़यां सुनेंगी तो तिल का ताड़ बनाएंगी. उन्हें किसी लड़की का ऊंची पढ़ाई पढ़ना कब गवारा है. बात फिर मसजिद तक भी जाएगी और फिर मौलवी खफा होगा.

जब उस ने हाईस्कूल में दाखिला लिया था तो उसी बूढ़े मौलवी ने अब्बा पर ताने कसे थे. वह तो भला हो अम्मी का, जो बात संभाल ली थी. लेकिन अब अम्मी भी क्या करेंगी?

सलमा पछताने लगी कि अम्मी हर बार उस की गलती को संभालती हैं, जबकि वह फिर कोई न कोई भूल कर बैठती है. वह मांबेटी का व्यवहार निभने वाली बात तो नहीं है. सहयोग तो दोनों ओर से समान होना चाहिए. उसे अपने साथ बीती घटनाएं याद आने लगी थीं.

2 साल पहले एक दिन अब्बा ने छूटते ही कहा था, ‘सुनो, सल्लो अब 13 की हो गई, इस पर परदा लाजिम है.’

‘हां, हां, मैं ने इस के लिए नकाब बनवा लिया है,’ अम्मी ने एक बुरका ला कर अब्बा की गोद में डाल दिया था, ‘और सुनो, अब तो हमारी सल्लो नमाज भी पढ़ने लगी है.’

‘वाह भई, एकसाथ 2-2 बंदिशें हमारी बेटी पर न लादो,’ अब्बा बहुत खुश हो रहे थे.

‘देख लीजिए. फिर एक बंदिश रखनी है तो क्या रखें, क्या छोड़ें?’

‘नमाज, यह जरूरी है. परदा तो आंख का होता है?’

और अम्मी की चाल कामयाब रही थी. नमाज तो ‘दीनदार’ होने और दकियानूसी समाज में निभाने के लिए वैसे भी पढ़नी ही थी. उस का काम बन गया.

फिर उस का हाईस्कूल में आराम से दाखिला हो गया था. बातें बनाने वालियां देखती ही रह गई थीं. अब्बा ने किसी की कोई परवा नहीं की थी.

सलमा को दूसरी घटना याद आई. वह बड़ी ही खराब बात थी. एक लड़के ने उस के नाम पत्र भेज दिया था. यह एक प्रेमपत्र था. अम्मी की हिदायत थी, ‘हर बात मुझ से सलाह ले कर करना. मैं तुम्हारी हमदर्द हूं. बेशक बेटी का किरदार मां की शख्सियत से जुड़ा होता है.’

मैं ने खत को देखा तो पसीने छूटने लगे. फिर हिम्मत कर के वह पत्र मैं ने अम्मी के सामने रख दिया. अम्मी ने दिल खोल कर बातें कीं. मेरा दिल टटोला और फिर खत लिखने वाले महमूद को घर बुला कर वह खबर ली कि उसे तौबा करते ही बनी.

मां ने उस घटना के बाद कहा, ‘सलमा, मुसलिम समाज बड़ा तंगदिल और दकियानूसी है. पढ़ने वाली लड़की को खूब खबरदार रहना होता है.’

सलमा ने पूछा, ‘इतना खबरदार किस वास्ते, अम्मी?’

वह हंस दी थीं, ‘केवल इस वास्ते कि कठमुल्लाओं को कोई मौका न मिले. कहीं जरा भी कोई ऐसीवैसी अफवाह उड़ गई तो वे अफवाह उदाहरण देदे कर दूसरी तरक्की पसंद, जहीन और जरूरतमंद लड़कियों की राहों में रोड़े अटका सकते हैं.’

‘आप ठीक कहती हैं, अम्मी,’ और सलमा ने पहली बार महसूस किया कि उस पर कितनी जिम्मेदारियां हैं.

पर 2-3 साल बाद ही उस से वह भूल हो गई. अब उस अम्मी को, जो उस की परम सहेली भी थीं, वह क्या मुंह दिखाएगी? फिर अब्बा को तो समझाना ही मुश्किल होगा. इस बार किसी तरह अम्मी बात संभाल भी लेंगी तो वह आइंदा पूरी तरह सतर्क रहेगी.

सलमा ने अपनी अम्मी रमजानी को पूरी बात बता दी थी. सुन कर वह बहुत बिगड़ीं, ‘‘सुना, इस गोपनीय पत्र में क्या लिखा है?’’

सलमा ने लिफाफा खोल कर पढ़ सुनाया.

रमजानी बहुत बिगड़ीं, ‘‘अब तेरी आगे की पढ़ाई गई भाड़ में. तू ने खता की है, इस की तुझे सजा मिलेगी. जा, कोने में बैठ जा.’’

शाम हुई. अब्बा आए, कपड़े बदल कर उन्होंने चाय मांगी, फिर चौंक उठे, ‘‘यह इस वक्त सल्लो, यहां कोने में कैसे बैठी है?’’

‘‘यह मेरा हुक्म है. उस के लिए सजा तजवीज की है मैं ने.’’

‘‘बेटी के लिए सजा?’’

‘‘हां, हां, यह देखो…खर्रा,’’ सलमा की अम्मी गोपनीय पत्र देतेदेते रुक गईं, ‘‘लेकिन नहीं. इसे गोपनीय रहने दो. मैं ही बता देती हूं.’’

और सलमा का कलेजा गले में आ अटका था.

‘‘…वह बात यह है कि अपनी सल्लो की मुख्याध्यापिका नीम पागल औरत है,’’ अम्मी ने कहा था.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि मसजिद के मौलवी से भी अधिक दकियानूसी और वहमी औरत.’’

‘‘बात क्या हो गई?’’

‘‘…वह बात यह है कि मैं ने सल्लो से कहा था, अच्छी फिल्म लगी है, जा कर दिन को देख आना. अकेली नहीं, हबीब को साथ ले जाना. उसे बड़ी मुश्किल से भेजा. और बेचारी गई तो उस की कक्षाध्यापिका ने, जो खुद वहां फिल्म देख रही थी, इस की शिकायत मुख्याध्यापिका से कर दी कि एक लड़के के साथ सलमा स्कूल के वक्त फिल्म देख रही थी.’’

‘‘लड़का? कौन लड़का?’’ अब्बा का पारा चढ़ने लगा.

रमजानी बेहद होशियार थीं. झट बात संभाल ली, ‘‘लड़का कैसा, वह मेरी खाला है न, उस का बेटा हबीब. गाजीपुर वाली खाला को आप नहीं जानते. मुझ पर बड़ी मेहरबान हैं,’’ अम्मी सरासर झूठ बोल रही थीं.

‘‘अच्छा, अच्छा, अब मर्द किस- किस को जानें,’’ अब्बा ने हथियार डाल दिए.

बात बनती दिखाई दी तो अम्मी, अब्बा पर हावी हो गईं, ‘‘अच्छा क्या खाक? उस फूहड़ ने हमारी सल्लो को गलत समझ कर यह ‘गोपनीय पत्र’ भेज दिया. बेचारी कितनी परेशान है. आप इसे पढ़ेंगे?’’

‘शाबाश, वाह मेरी अम्मी,’ सलमा सुखद आश्चर्य से झूम उठी. अम्मी बिगड़ी बात यों बना लेंगी, उसे सपने में भी उम्मीद न थी, ‘बहुत प्यारी हैं, अम्मी.’

सलमा ने मन ही मन अम्मी की प्रशंसा की, कमाल का भेजा पाया है अम्मी ने. खैर, अब आगे जो भी होगा, ठीक ही होगा. अम्मी ढाल बन कर जो खड़ी रहती हैं अपनी बेटी के लिए.

शायद अब्बा ने खत पढ़ना ही नहीं चाहा. बोले, ‘‘रमजानी, वह औरत सनकी नहीं है. दरअसल, मैं ने ही उन मास्टरनियों को कह रखा है कि सलमा का खयाल रखें. वैसे कल मैं उन से मिल लूंगा.’’

‘‘तौबा है. आप भी वहमी हैं, कैसे दकियानूसी. बेचारी सल्लो…’’

‘‘छोड़ो भी, उसे बुलाओ, चाय तो बने.’’

‘‘वह तो बहुत दुखी है. आई है जब से कोने में बैठी रो रही है. आप खुद ही जा कर मनाओ. कह रही थी, मुख्याध्यापिका ने शक ही क्यों किया?’’

‘‘मैं मनाता हूं.’’

और शेर मुहम्मद ने अपनी सयानी बेटी को उस दिन जिस स्नेह और दुलार से मनाया, उसे देख कर सलमा अम्मी की व्यवहारकुशलता की तारीफ करती हुई मन ही मन सोच रही थी, ‘आइंदा फिर कभी ऐसी भूल नहीं होनी चाहिए.’

और सलमा यों अपने चारों ओर फैली दकियानूसी रिवायतों की धुंध से जूझती आगे बढ़ी तो अब वह कालिज की एक छात्रा है. उस के इर्दगिर्द उठी आंधियां, मांबेटी के व्यवहार के तालमेल के आगे कभी की शांत हो गईं. Hindi Kahani

Short Hindi Story: मौडर्न मिलन – कलुवा की बेलिहाज पत्नी विद्योत्तमा

Short Hindi Story: यह कुदरती और वाकई अनोखी बात थी कि रूढि़वादी और धार्मिक मांबाप ने अपनी जिस लाड़ली बेटी का नाम विद्योत्तमा रखा था, उस के मंगेतर का नाम एक पुरोहित ने नामकरण के दिन कलुवा रख दिया था. लेकिन विद्योत्तमा के रिश्ते की बात जब कलुवा से चली तो उस चालाक पुरोहित ने मंगनी के समय झट कलुवा का नाम बदल कर उसे कालिदास बना दिया. विद्योत्तमा और कालिदास का विवाह भी कर दिया गया.

सुहागरात में प्रथम भेंट पर कालिदास को अपनी दुलहन का घूंघट उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ी. कशिश से भरी, बड़ीबड़ी मोहक अंखियों और तीखे नयननक्श वाली, बेजोड़ खूबसूरती की मलिका विद्योत्तमा ने मुसकराते हुए अपने मांग टीके पर अटके नाममात्र के घूंघट को खुद ही उलट कर अपनी गरदन पर लपेट लिया. फिर उस के एक छोर को अपने दाएं हाथ की पहली उंगली में फंसाए शरारती अदा के साथ अपने लाल रसीले होंठों और चमकदार दंतुलियों से जैसे काट खाया. फिर कालिदास के सीने से अपनी पीठ को सटाते उस ने गरदन घुमा कर तिरछी नजरें अपने दूल्हे राजा के हैरतअंगेज चेहरे पर चुभाईं. तब बोली, ‘‘हाय, डियर क्यूट. आई लव यू सो वैरी मच.’’

कालिदास के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं. प्रथम मिलन का ऐसा बेलिहाज नजारा तो शायद उस के बाप के बाप तक ने कभी सपने में भी नहीं देखा होगा. तभी लगभग हकलाता हुआ सा कलुआ बोल पड़ा, ‘‘जरा संभल कर ठीक से बैठो, प्रिये. चलो, कुछ देर प्यारभरी मीठीमीठी बातें हो जाएं. यह हमारे मधुर मिलन की पहली इकलौती घड़ी है, प्राणप्यारी.’’

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‘‘मीठीमीठी बातें? ह्वाट नौनसेंस,’’ कहते हुए दुलहन बिदक कर दूर छिटक गई और बोली, ‘‘तुम्हें तो मुझ को देखते ही भूखे भेडि़ए की तरह झपटचिपट कर मेरे तनबदन को बेशुमार किसेज (चुंबनों) की झड़ी लगाते निहाल कर देना चाहिए था. अभी इतनी देर तक लबरलबर तो खूब करते रहे. क्या तुम मुझ को लव नहीं करते. डोंट यू लाइक मी? जो अभी भी मुझे अपनी बांहों में जकड़ने से हिचकते घबरा रहे हो.’’

बेचारा कालिदास सचमुच काफी घबरा गया था, लेकिन अब जल्दी ही वह अपने को हिम्मत के साथ संभालता हुआ बोला, ‘‘सुनो, मेरी प्यारी हंसिनी, मुझ को तो तुम अपने सामने एक बगले जैसा ही समझो क्योंकि मैं तो सिर्फ हाईस्कूल थर्ड डिविजन से पास हूं, जबकि तुम अंगरेजी साहित्य में फर्स्ट क्लास एम.ए. पास. मुझे ताज्जुब हो रहा है कि तुम ने मुझ जैसे चपरगट्टू भौंतर छोरे से शादी करने की बात भला कैसे मंजूर कर ली जबकि असल में मैं तुम्हारे काबिल और माफिक दूल्हा हूं ही नहीं. मैं…मैं…मैं तो…’’

दुलहन हंस पड़ी और बोली, ‘‘ओह, स्टौप आल दिस मैं मैं मिमियाना. अजी हुजूरेआला, तुम तो इन आल रिस्पेक्ट्स, हर हाल में मेरे ही काबिल हो. मैं आज भी उन ‘अधभरी गगरी’ जैसी छलकती छोकरियों में से नहीं हूं जो तितलियों की मानिंद इतराती अपने कालेज जाने में ही ऐसी अकड़ दिखाती हैं मानो वे पहले से ही डिगरीशुदा हों और अब सीधे कनवोकेशन में गाउन व हुड धारण करने की फौरमैलिटी निभाने जा रही हों. और जो आंखलड़ाऊ लव मैरिज के बाद अपने हसबैंड को लड़ाईझगड़े में सर्वेंट तक बोलने से नहीं चूकतीं.

‘‘डियर, मैं तो पहले से ही मान चुकी थी कि हम ‘मेड फौर ईच अदर’ यानी ‘इक दूजे के लिए ही बने’ हैं. तुम कम पढ़ेलिखे हो तो क्या, तुम नेक, खूबसूरत, तंदुरुस्त और उम्दा स्वभाव के नौजवान हो. फिर आजकल के योग्य लड़के तो भारीभरकम दहेज लिए बिना शादी को तैयार ही नहीं होते हैं जबकि तुम ने दहेज जैसे अशुभ नाम को अपनी जबान पर आने तक नहीं दिया. मैं तुम को उन दहेज के लालची लीचड़ों से सौगुना ज्यादा धनी मानती हूं.

‘‘तुम अपने हुनर में एक माहिर मोटर मेकैनिक हो और मुझ को पूरा यकीन है तुम बिगड़ती मोटरगाडि़यों की तरह अपने घरपरिवार रूपी गाड़ी की मेंटिनेंस में भी उस के ढीले पेचपुर्जों को सुधार कर उसे जिंदगी की खुशहाल राह पर कामयाबी के साथ दौड़ा सकते हो. तुम्हारे अंदर कोई बुरा व्यसन भी नहीं है, तो फिर यह नर्वसनेस क्यों? इनसान किताबें पढ़ कर और डिगरियां हासिल करने मात्र से विद्वान नहीं बन जाता. पढ़नेलिखने के साथ अगर इनसान उस से मिली नसीहतों को अपने जीवन में नहीं अपनाता तो वह किताबों के बोझ से लदे एक गधे जैसा ही होता है.’’

विद्योत्तमा के मुख से ऐसी बातें सुन कर कालिदास के मन में घिरे शकसंदेहों की सारी धुंध उड़नछू हो गई. वह बोला, ‘‘ओह डार्लिंग, मैं तो इस वजह से डरा हुआ था कि तुम्हारा नाम विद्योत्तमा और मेरा नाम भी कालिदास है तो कहीं तुम भी मुझे…’’

‘‘रिजेक्ट कर देती और लताड़ के साथ भगा देती. यही न?’’ खिलखिलाते हुए विद्योत्तमा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘माई डियर साजन, तुम यह क्यों भूल गए कि वह पुराने जमाने की अपने ज्ञान के घमंड में चूर विद्योत्तमा थी लेकिन मैं तो 21वीं सदी की मौडर्न नवयुवती हूं. यानी मैं वह विद्योत्तमा हूं जो अपने पति को पति होने के नाते अपना दास, मतलब जोरू का गुलाम बना कर भले ही रख दूं, पर गुजरे वक्त की वह विद्योत्तमा कतई नहीं हूं कि हनीमून में ही अपने पति को बेइज्जत कर के घर से खदेड़ कर खुद को बगैर मर्द की (विधवा) औरत बना कर रख दूं और तब उस के लंबे अरसे के बाद अधेड़ विद्वान कालिदास हो कर लौट आने तक पलपल घुटतीसिसकती रहूं.

‘‘जब तक वह कालिदास बन कर आएगा तब तक उस की जवानी का जोशीला पोटाश तो संस्कृत के श्लोकों को पढ़नेरटने में ही खत्म हो चुका होगा. आने के बाद भी वह बजाय लंबी जुदाई से बढ़ी बेताबी के तहत रातों को मुझ से चिपट पड़ने के, ग्रंथ लिखने की खातिर कलम घिसने में मशगूल हो जाएगा और मैं अपने चेहरे पर पड़ती झुर्रियों को दर्पण में निहारती, कभी ऊंघती तो कभी उस कवि लेखक के लिए चाय बनाती बाकी बची उम्र को काटतीगुजारती रहूं.

‘‘फिर नाम में क्या रखा है, डियर. आंख के अंधे नाम नयनसुख की तरह भिखारियों में क्या कई लक्ष्मियां और धनपति नाम के औरतमर्द नहीं होते? छोड़ो इन यूजलेस बातों को अब. लम्हालम्हा गहराती मदमाती रात के साथ अब क्यों न हम भी अपने प्यार के समंदर की गहराइयों में खो जाएं? सो कम औन माइ लव, माइ स्वीट लाइफपार्टनर,’’ कहते हुए विद्योत्तमा ने कालिदास को अपनी सुडौल गोरी बांहों में बांध लिया. तब कालिदास ने भी उमड़ते प्रेम आनंद के एहसास के साथ उसे अपने दिल से सटा दिया. लग रहा था, कवि कालिदास के मेघदूतम वाले बेदखल किए गए, इश्क में तड़पते, यक्ष का भी अपनी प्यारी दिलरुबा से एक बार फिर मौडर्न मिलन हो रहा हो. Short Hindi Story

Story In Hindi: अबोध – गौरा का खतरनाक कदम

Story In Hindi: माधव कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे, 50 साल की उम्र. सफेद दाढ़ी. उस पर भी बीमारी के बाद की कमजोर हालत. यह सब देख कर घर के लोगों ने माधव को बेटी की शादी कर देने की सलाह दे दी. कहते थे कि अपने जीतेजी लड़की की शादी कर जाओ.

माधव ने अपने छोटे भाई से कह कर अपनी लड़की के लिए एक लड़का दिखवा लिया.

माधव की लड़की गौरा 15 साल की थी. दिनभर एक छोटी सी फ्रौक पहने सहेलियों के साथ घूमती रहती, गोटी खेलती, गांव के बाहर लगे आम के पेड़ पर चढ़ कर गिल्ली फेंकने का खेल भी खेलती.

जैसे ही गौरा की शादी के लिए लड़का मिला, वैसे ही उस का घर से निकलना कम कर दिया गया.

अब गौरा घर पर ही रहती थी. महल्ले की लड़कियां उस के पास आती तो थीं, लेकिन पहले जैसा माहौल नहीं था. गौरा की शादी की खबर जब उन लड़कियों को लगी, तो गौरा को देखने का उन का नजरिया ही बदल गया था.

माधव ने फटाफट गौरा की शादी उस लड़के से तय कर दी. माधव की माली हालत तो ठीक नहीं थी, लेकिन जितना भी कर सकते थे, करने में लग गए.

शादी की तारीख आई. लड़के वाले बरात ले कर माधव के घर आ गए. लड़का गौरा से बड़ा था. वह 20-22 साल का था.

गौरा को इन बातों से ज्यादा मतलब तो नहीं था, लेकिन इस वक्त उसे अपना घर छोड़ कर जाना कतई अच्छा नहीं लग रहा था. शादी के बाद गौरा अपनी ससुराल चली गई, लेकिन रोते हुए.

गौरा की शादी के कुछ दिन बाद ही माधव की बीमारी ठीक होने लगी, फिर कुछ ही दिनों में वे पूरी तरह से ठीक भी हो गए, मानो उस मासूम गौरा की शादी करने के लिए ही वे बीमार पड़े थे.

उधर गौरा ससुराल पहुंची तो देखा कि वहां घर जैसा कुछ भी नहीं था. न साथ खेलने के लिए सहेलियां थीं और न ही अपने घर जैसा प्यार करने वाला कोई.

गौरा की सास दिनभर मुंह ऐंठे रहती थीं. ऐसे देखतीं कि गौरा को बिना अपराध किए ही अपराधी होने का अहसास होने लगता.

जिस दिन गौरा अपने घर से विदा हो कर ससुराल पहुंची, उस के दूसरे दिन से ही उस से घर के सारे काम कराए जाने लगे. गौरा को चाय बनाना तो आता था, लेकिन सब्जी छोंकना, गोलगोल रोटी बनाना नहीं आता था.

जब ये बातें उस की सास को पता चलीं, तो वे गौरा को खरीखोटी सुनाने लगीं, ‘‘बहू, तेरी मां ने तु?ो कुछ नहीं सिखाया. न तो दहेज दिया और न ही ढंग की लड़की. कम से कम लड़की ही ऐसी होती कि खाना तो बना लेती…’’

गौरा चुपचाप सास की खरीखोटी सुनती रहती और जब भी अकेली होती, तो घर और मां की याद कर के खूब रोती. दिनभर घर के कामों में लगे रहना और सास भी जानबू?ा कर उस से ज्यादा काम कराती थीं.

बेचारी गौरा, जो सास कहतीं, वही करती. शाम को पति के हाथों का खिलौना बन जाती. वह तो ठीक से दो मीठी बातें भी उस से नहीं करता था. दिनभर यारदोस्तों के साथ घूमता और रात होते ही घर में आता, खाना खाता और गौरा को बेहाल कर चैन से सो जाता.

एक दिन गौरा का बहुत मन हुआ कि घर जा कर अपने मांबाप से मिल ले. मां से तो लिपट कर रोने का मन करता था.

मौका देख कर गौरा अपनी सास से बोली, ‘‘माताजी, मैं अपने घर जाना चाहती हूं. मुझे घर की याद आती है.’’

सास तेज आवाज में बोलीं, ‘‘घर जाएगी तो यहां क्या जंगल में रह रही है? यहां कौन सा तुझ पर आरा चल रहा है… घर के बच्चों से ज्यादा तेरी खातिर होती है यहां, फिर भी तू इसे अपना घर नहीं समझाती.’’

गौरा घबरा कर रह गई, लेकिन घर की याद अब और ज्यादा आ रही थी.

दिन यों ही गुजर रहे थे कि एक दिन माधव गौरा की ससुराल आ पहुंचे.

अपने पिता को देख गौरा जी उठी थी. भरे घर में अपने पिता से लिपट गई और खूब सिसकसिसक कर रोई.

माधव का दिल भी पत्थर से मोम हो गया. वे खुद रोए तो नहीं, लेकिन आंखें कई बार भीग गईं. उसी दिन शाम को वे गौरा को अपने साथ ले आए.

घर आ कर गौरा फिर उसी मनभावन तिलिस्म में खो गई. वही गलियां, वही रास्ता, वैसे ही घर, वही आबोहवा, वैसी ही खुशबू. इतने में मां सामने आ गईं. गौरा की हिचकी बंध गई, दोनों मांबेटी लिपट कर खूब रोईं.

घर में आई गौरा ने मां को ससुराल की सारी हालत बता दी और बोली, ‘‘मां, मैं वहां नहीं जाना चाहती. मु?ो अब तेरे ही पास रहना है.’’

मां गौरा को समझाते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, अब तेरी शादी हो चुकी है. तेरा घर अब वही है. हम चाह कर भी तुझे इस घर में नहीं रख सकते.

‘‘हर लड़की को एक न एक दिन अपनी ससुराल जाना ही होता है. मैं इस घर आई और तू उस घर में गई. इसी तरह अगर तेरी लड़की हुई, तो वह भी किसी और के घर जाएगी. इस तरह तो कोई हमेशा अपने घर नहीं रुक सकता.’’

गौरा चुप हो गई. मां से अब और क्या कहती. जो सास कहती थीं, वही मां भी कहती हैं.

रात को गौरा नींद भर सोई, दूसरी सुबह उठी तो साथ की लड़कियां घर आ पहुंचीं. अभी तक सब की सब कुंआरी थीं, जबकि गौरा शादीशुदा थी. वे सब सलवारसूट पहने घूम रहीं थीं, जबकि गौरा साड़ी पहने हुए थी.

आज गौरा सारी सहेलियों से खुद को अलग पाती थी, उन से बात करने और मिलने में उसे शर्म आती थी. मन करता था कि घर से उठ कर कहीं दूर भाग जाए, जिस से न तो ससुराल जाना पड़े और न ही किसी से शर्म आए.

सुबह के 10 बजने को थे. गौरा ने घर में रखा पुराना सलवारसूट पहना, जिसे वह शादी से पहले पहना करती थी और मां के पास जा कर बड़े प्यार से बोली, ‘‘मां, तुम कहो तो मैं थोड़ी देर बाहर घूम आऊं?’’

गौरा बोलीं, ‘‘हां बेटी, घूम आ, लेकिन जल्दी घर आ जाना. अब तू छोटी बच्ची नहीं है.’’

गौरा मुसकराते हुए घर से निकल गई. उस की नजर गांव के बाहर लगे आम के पेड़ के पास गई. मन खिल उठा. लगा, जैसे वह पेड़ उस का अपना है, कदम बरबस ही गांव से बाहर की ओर बढ़ गए.

हवा के हलके ?ोंके और खेतोंपेड़ों का सूनापन, चारों तरफ शांत सा माहौल और बेचैन मन, मानो फिर से लौट पड़ा हो गौरा का बचपन. हवा में पैर फेंकती सीधी आम के पेड़ के नीचे जा पहुंची.

यह वही आम का पेड़ था, जिस के ऊपर चढ़ कर गिल्ली फेंकने वाले खेल खेले जाते थे, जहां सहेलियों के साथ बचपन के सुख भरे दिन गुजारे थे.

गौरा दौड़ कर आम के पेड़ से लिपट गई. उस मौन खड़े पेड़ से रोरो कर अपने दिल का हाल कह दिया. पेड़ भी जैसे उस का साथी था. उस ने गौरा के मन को बहुत तसल्ली दी.

थोड़ी देर तक गौरा पेड़ से लिपटी बचपन के दिनों को याद करती रही, बचपन तो अब भी था, लेकिन कोई उसे छोटी लड़की मानने को तैयार न था. सब कहते कि वह बड़ी हो गई है, लेकिन खुद गौरा और उस का दिल नहीं मानता था कि वह इतनी बड़ी हो गई है कि घर से बाहर किसी और के साथ रहने लगे. बड़ी औरतों की तरह काम करने लगे, सास की खरीखोटी सुनने लगे.

गौरा बैठी सोचती रही, मन में गुबार की आंधी चलती थी, फिर न जाने क्या सोच कर अपना दुपट्टा उतारा और आम के पेड़ पर चढ़ कर छोर को उस की डाली से कस कर बांध दिया. फिर आम के पेड़ से उतर कर दूसरा छोर अपने गले में बांध लिया.

अभी तक गौरा ठीकठाक थी. खड़ीखड़ी थोड़ी देर तक वह अपने गांव को देखती रही, फिर एकदम से पैरों को हवा में उठा लिया, शरीर का सारा भार गले में पड़े दुपट्टे पर आ गया, दुपट्टा गले को कसता चला गया, आंखें बाहर निकली पड़ी थीं, मुंह लाल पड़ गया था.

थोड़ी ही देर में गौरा की मौत हो गई. अब उसे ससुराल नहीं जाना था और न ही कोई परेशानी सहनी थी. कांटों पर चल रही मासूम सी जिंदगी का अंत हो गया था.

जिस बच्ची के खेलने की उम्र थी, उस उम्र में उसे न जाने क्याक्या देखना पड़ा था. उस की दिमागी हालत का अंदाजा सिर्फ वही लगा सकती थी.

एक भी ऐसा शख्स नहीं था, जो उस अबोध बच्ची को समझाता, लेकिन आज सब खत्म हो गया था, उस की सारी समस्याएं और उस की जिंदगी. Story In Hindi

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