Hindi Story: नौजवान इंजीनियर और मौत का गड्ढा

Hindi Story: रविवार की सुबह थी. विजय घर पर अकेला था. उस के मातापिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे. आज विजय ने ठान लिया था कि घर के पीछे के आंगन में वह गड्ढा खोद कर ही दम लेगा. दरअसल, उसे एक पूरा का पूरा पेड़ शिफ्ट करना था. चूंकि पेड़ बड़ा था, तो उस ने अंदाजे से 8 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला था.


आप सोच रहे होंगे कि पेड़ को कैसे शिफ्ट करते हैं? अमूमन तो पौधा ही लगाया जाता है, पर पूरा का पूरा पेड़ कैसे जड़ समेत मिट्टी में बोया जाता है? इस तकनीक में किसी पेड़ को उस की वर्तमान जगह से उठाने के लिए खास तरह के उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है या पेशेवरों को बुलाया जाता है. शाखाओं या जड़ों (रूट बौल) को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पेड़ को सावधानी से संभालें. पेड़ को एक मजबूत गाड़ी पर रखें, यह पक्का करते हुए कि पेड़ पूरी यात्रा के दौरान हिलेडुले , उसे किसी तरह का नुकसान हो.


विजय यह एक्सपैरिमैंट कर रहा था. वह गड्ढा खोदने में इतना मशगूल था कि मिट्टी को गीला करने के लिए जो नल उस ने चलाया था, उस में लगा पाइप धीरेधीरे उस गड्ढे को भर रहा था. चूंकि विजय शारीरिक काम कर रहा था, तो उसे गरमी लग रही थी. धूप भी खिली थी. इसी बीच कब वहां अनामिका आई, उसे पता ही नहीं चला. विजय को मिट्टी में सना देख कर अनामिका को एक खुराफात सू?. उसे पता नहीं था कि गड्ढा कितना गहरा है. उसे लगा कि आज मड बाथ लिया जाए. वैसे भी घर पर कोई नहीं है.


अनामिका चुपके से विजय के पीछे गई उसे धक्का दे कर गड्ढे में धकेल दिया. अचानक हुए इस हमले से विजय हैरान रह गया. पर चूंकि अभी गड्ढा सिर्फ 5 फुट तक भरा था, तो उसे ज्यादा महसूस नहीं हुआ.
विजय ने अनामिका को देखा, तो हंस कर बोला, ‘‘इस गड्ढे में मैं अकेला क्या करूंगातुम भी जाओ.’’
अनामिका भी गड्ढे में कूद गई. वे दोनों अब वहां मस्ती करने लगे. अनामिका का मिट्टी से सराबोर बदन विजय को ललचा रहा था. उस ने अनामिका को बांहों में भर लिया और चूमने लगा.


अनामिका भी उस का साथ देने लगी. इसी बीच गड्ढे में पानी अभी भी भर रहा था. जब अनामिका की गरदन से पानी ऊपर हुआ, तो वह थोड़ा सतर्क हो गई और बोली, ‘‘चलो, अब हम बाहर निकलते हैं.’’
पर जैसे ही विजय ने उचक कर बाहर निकलने की कोशिश की, वह फिसल गया. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की, पर नाकाम रहा. अनामिका ने कहा, ‘‘लगता है, ऐसे बाहर नहीं निकला जाएगा. तुम मु? उठाओ. पहले मैं बाहर निकलती हूं.’’


विजय ने ऐसा ही किया. अनामिका तो बाहर चली गई, पर वह जैसे ही विजय को खींचने लगी, तो मिट्टी लगी होने की वजह से दोनों के हाथ बारबार फिसल रहे थे. इस बीच पानी और ज्यादा बढ़ गया था. अनामिका को चिंता हुई. विजय भी थोड़ा घबरा गया था. उस ने कहा, ‘‘दीवार की साइड पर एक सीढ़ी है, जल्दी लाओ.’’ अनामिका ने ऐसा ही किया. जल्दी से गड्ढे में सीढ़ी लगाई और बड़ी मुश्किल से विजय बाहर निकला. विजय की सांसें फूल रही थीं. वह बोला, ‘‘आज तो बालबाल बचे. अगर सीढ़ी होती तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता.’’


फिर वे दोनों बाथरूम में गए और एकसाथ नहाए. विजय ने अनामिका को अपनी बहन के कपड़े दे दिए.
अनामिका अभी भी किसी गहरी सोच में थी. विजय ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘ग्रेटर नोएडा वाला कांड तो तुम ने सुना ही होगा?’’ अनामिका ने अपने बाल सुखाते हुए कहा. ‘‘यार, बस सरसरी तौर पर पढ़ा था. क्या हुआ था?’’ विजय ने पूछा. ‘‘27 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की 16 जनवरी, 2026 की आधी रात के बाद उस समय मौत हो गई थी, जब घने कोहरे में उस की कार फिसल कर एक नाले के पास बन रहे शौपिंग कौंप्लैक्स के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गई थी.


‘‘युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि उन का बेटामेरी मदद करोमेरी मदद करो…’ चीख रहा था. लोग वीडियो बना रहे थे, पर कोई उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहा था. मैं ने उन्हें डांटा, फिर भी कोई कोशिश नहीं की गई. मेरे बेटे की मौत बेवजह हुई. ‘‘लोग राजकुमार मेहता का दर्द कभी नहीं सम? पाएंगे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बेटे युवराज को कार में डूबते हुए देखा. राजकुमार मेहता का कहना था कि हादसे वाली जगह पर 80 कर्मचारी मौजूद थे, पर कोई भी पानी में नहीं उतरा.’’


‘‘यह तो दर्दनाक मौत थी. प्रशासन और सरकार ने क्या किया?’’ विजय ने अफसोस जताते हुए पूछा.
‘‘पुलिस ने युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता की शिकायत पर 2 रियल एस्टेट डेवलपर्स एमजेड विजटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन्स के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिस में उस ने लोकल अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगाया और जवाबदेही की मांग की. विजटाउन प्लानर्स के बड़े अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया.’’


‘‘यह तो बहुत बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गया. क्या विपक्ष ने सरकार को नहीं घेरा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘बिलकुल घेरा. देखने पर यह एक साधारण सी मौत लगती है और सरकार इसे बिल्डरों की लापरवाही मान रही है या इसे भ्रष्टाचार के एंगल से खंगाल रही है, पर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं समाज में जड़ें फैलाती लालच की वह लत भी है, जो भारतीय शासन की जवाबदेही निगल गई है.


‘‘दूसरी ओर राजकुमार मेहता ने कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी से एक बार मिलना चाहेंगे. इस से उन्हें मन की शांति मिलेगी. वैसे, सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें सही दिशा में उचित सहयोग मिलेगा. ‘‘इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को घेरा. उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है.


‘‘उन्होंने आगे कहा कि हादसे वाली जगह पर पहुंचने के बाद भी सरकार और उस के तमाम महकमे इंजीनियर युवराज को बचा नहीं पाए. पानी ठंडा होने की वजह से कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. अखिलेश यादव ने मीडिया को भी नसीहत दी कि मौत के बाद किसी की इमेज खराब करने वाले वीडियो चलाए जाएं. ‘‘ज्यादा दबाव पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी लोकेश एम. को उन के पद से हटा दिया. हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया. मेरठ जोन के एडीजी एसआईटी के अध्यक्ष बनाए गए.


‘‘इधर, पुलिस कमिश्नर (कानून व्यवस्था) डाक्टर राजीव नारायणी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. सूचना मिलते ही दमकल टीम सभी उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और बचाव का काम शुरू किया गया. एसडीआरएफ की मदद से अंतिम बचाव अभियान चलाया गया. उस समय विजिबिलिटी जीरो थी, लेकिन युवराज को बचाया नहीं जा सका.’’ ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बिल्डरों के खिलाफ किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘धारा 105 (अनजाने में हत्या), धारा 106 (1) (किसी व्यक्ति की लापरवाही या असावधानी के कारण हुई मृत्यु) और धारा 125 (मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) एफआईआर दर्ज की गई है,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘यार, यह सुन कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. बड़ा ही दिल दहलाने वाला कांड है,’’ विजय बोला. ‘‘इस पूरे मामले को राजकुमार मेहता ने कुछ इस तरह बताया था… ‘शुक्रवार की आधी रात को 12 बज कर,


20 मिनट पर मेरे पास युवराज का फोन आया. वह घर आने ही वाला था, इसलिए सम? नहीं आया कि वह मु? क्यों फोन कर रहा है. ‘‘‘मैं ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से एक डरी हुई आवाज सुनाई दी. उस ने कहा किपापापापामैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहताप्लीज, मु? बचा लीजिए’.
‘‘‘यह सुन कर मैं उन्हीं कपड़ों में बाहर भागा. सोसाइटी से निकलने से पहले मैं ने एक मैसेज टाइप किया और उसे सोसाइटी के ग्रुप में पोस्ट कर दिया, ताकि मदद मिल सके.


‘‘‘मेरे बेटे ने जिस नाले का जिक्र किया था, वह हमारी सोसाइटी से 200 मीटर दूर था. मैं दौड़ कर उस नाले के पास गया. वहां, मैं घने कोहरे और अंधेरे में 30 मिनट तक अपने बेटे को ढूंढ़ता रहा, आवाज लगाने की कोशिश करता रहा, ताकि कोई जवाब मिले. फिर मु? लगा कि मैं गलत जगह ढूंढ़ रहा हूं.
‘‘‘रात के साढ़े 12 के आसपास वहां वीडियो बना रहे लोगों से मैं ने कहा कि प्लीज, मेरे बेटे को बचा लीजिए. इस के बाद मैं सड़क के किनारे पहुंचा, जहां एक इमारत का निर्माण अधूरा था.
यहां बेसमैंट के लिए एक गड्ढा खोदा गया था.


‘‘‘वहां पहुंच कर मैं चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन कर मेरा बेटा भी चीख उठा… ‘बचाओबचाओमेरी मदद करो…’ की आवाज सुन कर मैं सम? गई कि मेरा बेटा यहां गिर गया है. ‘‘‘मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कोहरे में से देखा कि कार पानी में थी और मेरा बेटा उस की छत पर लेटा हुआ था. वह सड़क से तकरीबन 50 से 60 फुट दूर था. वह धीरेधीरे डूब रहा था. किनारे पर खड़े लोगों को यह बताने के लिए कि वह जिंदा है, अपने मोबाइल फोन की लाइट बारबार जलाबु? रहा था.


‘‘‘मैं ने डायल 112 पर फोन किया. मैं उसे अपनी आंखों के सामने डूबते हुए देख रहा था. वहां और भी लोग थे, लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था. कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, मैं ने उन से कहा कि प्लीज, वीडियो बनाना बंद करें, मेरे बेटे की मदद करें.’’’ इतना बता कर अनामिका चुप हो गई. थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछा, ‘‘बचाव अभियान कब शुरू हुआ?’’ ‘‘खबरों के मुताबिक, रात के तकरीबन पौने 1 बजे पुलिस और फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी डायल 112 के साथ मौके पर पहुंची. तब तक घना कोहरा छा चुका था. सब से पहले, पुलिस और फायर ब्रिगेड ने रस्सी फेंक कर बचाव का काम शुरू किया.


‘‘पर वह रस्सी युवराज तक नहीं पहुंच रही थी. कुछ पुलिस अफसर कह रहे थे कि पानी बहुत ठंडा है और उस में उतरना मुश्किल है. कुछ का कहना था कि हादसे वाली जगह के नीचे लोहे की छड़ें हो सकती हैं.
‘‘इस के बाद क्रेन बुलाई गई, लेकिन क्रेन भी युवराज तक नहीं पहुंच पाई. वह सिर्फ 30-40 फुट तक ही जा पा रही थी. वहां मौजूद कोई भी आदमी पानी में उतरने की कोशिश नहीं कर रहा था. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि गड्ढा शायद 15 से 20 फुट गहरा था, इसलिए अगर गोताखोर वहां होते तो उन के बेटे की जान बच सकती थी.


‘‘एसडीआरएफ की टीम रात के तकरीबन सवा 1 बजे पहुंची. उन लोगों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इसी बीच युवराज की कार पूरी तरह पानी में डूब गई. कार के ऊपर लेटे हुए युवराज भी पानी में समा गए. सब लोग बस यह सब देखते रह गए. ‘‘सर्चलाइट, क्रेन और सीढ़ी की मदद से टीम पानी में उतरी. 2 घंटे की मशक्कत के बाद युवराज की लाश तकरीबन सवा 4 बजे बरामद की गई. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने कहा कि इस घटनास्थल को ले कर पहले भी शिकायतें की गई थीं, पर सब लोग सोते रहे. उन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए नोएडा प्रशासन को दोषी ठहराया.’’


‘‘वे बिलकुल ठीक कह रहे हैं. सरकारें घर उजाड़ने के लिए बुलडोजर तो चला रही हैं, पर इस तरह के मौत के गड्ढे भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है. बिल्डरों पर गाज गिराने से कुछ नहीं होगा. कौन सा बिल्डर चाहेगा कि उस का प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो. पर प्रशासन के नियमकानून इतने पेचीदा बना दिए जाते हैं कि लोग कानून के शिकंजे में फंस कर रह जाते हैं. ‘‘यह हादसा तो एक इंजीनियर के साथ हुआ है और इस कांड के वीडियो भी बन गए, तभी प्रशासन इतना जल्दी कार्रवाई करता दिख रहा है. दूरदराज के इलाकों में जाने कितने युवराज अपनी जिंदगी से खेल रहे हैं, किसे इस बात की चिंता है.’’


‘‘विजय, सवाल यह नहीं है कि कौन गुनाहगार है और उसे सजा मिलेगी या नहीं, पर मुद्दा यह भी है कि क्या एक जवान लड़के की ऐसी मौत देखने के बाद उस के पिता कभी सब्र का घूंट पी सकेंगे…’’ अनामिका बोली. ‘‘कभी नहीं. इस तरह की मौत देश की तरक्की की भी पोल खोलती है, क्योंकि तरक्की का मतलब यह नहीं है कि ऊंचीऊंची इमारतें बना देना, जबकि असली तरक्की का मतलब है लोगों के मन से असुरक्षा का भाव खत्म होना.


‘‘दिल्ली के इतना पास एक पढ़ालिखा नौजवान सिर्फ इसलिए मर गया कि वह रात के अंधेरे में पानी से लबालब ऐसे गड्ढे में जा गिरा, जो वहां होना ही नहीं चाहिए था. यह देश के रहनुमाओं पर एक तरह की लानत है कि वे अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं,’’ विजय ने अपने दिल की भड़ास निकाली. अनामिका चुप थी. वह बाहर आंगन में खोदे गए गड्ढे को देख रही थी, जिस में अब भी गंदला पानी जमा था.  Hindi Story
   

Hindi Story: उद्धार

Hindi Story: ‘‘  री छमिया, री कहां रह गई. चल, जल्दीजल्दी चल. सब से पहले हमें पहुंचना है. तेरे भाई को मैं ने पहले ही भेज दिया, ताकि वह हमारी जगह रोक कर रखे.’’ ‘‘आई भाभी आई, कोई ढंग का कपड़ालत्ता नहीं मिल रिहा था. फटाफट  दर्जी से यह लहंगा बनवाने लग गई थी. इसी खातिर देर हो गई,’’ छमिया ने कहा.


जैसे ही छमिया लहंगा पहन कर झोपड़े से बाहर निकली, उस की मुंहबोली भाभी बस्ती के मांगेलाल की बहू लाजो बिना पलकें ? झपकाए उसे ही देखे जा रही थी. मानो उस ने कोई अजूबा देख लिया हो.
‘‘भाभी, चालो अब, यह मुझे मुझे टुकुरटुकुर क्या देख रही हो?’’ ‘‘वाह छोरी, मैं ने तो पहचाना ही नहीं, एकदम परी लग रही है आज तोध्यान से रहना वहां, कहीं कोई शहरी बाबू दिल दे बैठे .’’


‘‘क्या भाभी, तुम भी …’’ छमिया ने ऐसा कहते हुए शरमा कर नजरें झुका लीं. झॉ दोनों  उस तरफ चल पड़ीं, जिधर आज बहुत बड़ा पंडाल बना हुआ था. मुफ्त में खाना बंटने वाला था. खाने के साथ हर ?  झोपड़पट्टी वाले को 1-1 कंबल मुफ्त में दिया जाएगा. ऐसी घोषणा 2 दिन पहले हुई थी. कोई नेता रहे थे नारी उद्धार का बीड़ा उठाने. इस बस्ती में वे नारी उद्धार कर के रहेंगे. अब कोई नारी किसी भी वजह से दुखी नहीं रहेगी, इसलिए बस्ती के सभी लोगों को उस पंडाल में जमा होने को कहा गया था. सभी अपनीअपनी फरियाद ले कर पहुंचें, सभी की समस्याओं का हल किया जाएगा. ऐसी अनाउंसमैंट हुई थी.


लाजो और छमिया दोनों को जातेजाते रास्ते में और भी औरतें मिली थीं. बहुत ज्यादा बड़ी बस्ती तो थी नहीं, लेदे कर 400-500 घर ही होंगे उस बस्ती में. घर भी क्या ?ांपड़पट्टी ही कहो. सभी औरतें रास्ते में अपनीअपनी समस्याओं का जिक्र करती जा रही थीं. कोई कहती कि बस्ती में पानी की समस्या का समाधान होना चाहिए, तो कोई कहती कि बस्ती में एक भी डाक्टर नहींअगर कोई बीमार पड़ जाए तो दवादारू के लिए उसे शहर जाना पड़ता है. कभी किसी की हालत ज्यादा खराब हो तो शहर तक जातेजाते रास्ते में ही उस का राम नाम सत्य हो जाता है.


1-2 बार ऐसा हुआ भी था. बस्ती के नाई घसीटामल को सांस की तकलीफ थी. एक बार तकलीफ इतनी बढ़ी कि सांस लेना दूभर हो रहा था. बस्ती का ?ालाछाप डाक्टर भी कुछ नहीं कर पा रहा था. जितना वह इलाज करता, सांस लेने में और दिक्कत आती, इसलिए शहर के डाक्टर के पास जाने की सलाह दी गई.
लेकिन शहर जाते समय रास्ते में घसीटामल की सांस हमेशा के लिए बंद हो गई. इसी तरह के और भी कई केस हुए थे.


इसी तरह सभी औरतें अपनीअपनी समस्याओं के बारे में बातें करते हुए पंडाल में जा पहुंची थीं. तरहतरह के खाने की खुशबू से पंडाल महक रहा था. खुशबू इतनी शानदार थी कि सब के मुंह में पानी गया.
‘‘ भाई, ये साहब लोग कब तक आएंगे? मेरा तो खाना खाने का जी कर रहा है. इतना खुशबूदार खाना आज तक नहीं देखा है. पता नहीं आज क्याक्या मिलेगा खाने को.’’ ‘‘थम जा भाई, अभी जाएंगे. पहले साहब लोगों को खाने देना, फिर आप जितना जी चाहे खा लेना.’’ ‘‘रे बावले, यह जो खाना हम गरीब लोगों के लिए बनाया है, वह साहब लोग थोड़ी खाएंगे. साहब लोगों का खाना तो स्पैशल बनेगा…’’


थोड़ी ही देर में एक लंबी सी गाड़ी कर रुकी. उस के पीछेपीछे कुछ गाडि़यां और भी थीं. लंबी गाड़ी में से सफेद कुरताधोती पहने, सिर पर सफेद टोपी लगाए एक सज्जन निकले और दनदनाते हुए सीधे उस टैंट में घुस गए, जो खास उन के लिए शहर से आए लोगों ने बनाया था. उन के पीछेपीछे कुछ बस्ती वाले भी, जो अपना चौधरपना दिखाना चाहते थे, दुमछल्ले के जैसे पीछे लग लिए, जैसे वे इन मंत्री के सगे वाले हों.
लेकिन टैंट के पास आते ही नेताजी के चमचों ने उन्हें बाहर ही रोक लिया, मगर टैंट के अंदर की एकालक तो देखने को मिल ही गई.


एक शानदार सोफा और सैंट्रल टेबल पर ताजा फूलों से महकता हुआ गुलदस्ता सजा हुआ था. साथ में फलों से भरी हुई छोटी सी खूबसूरत टोकरी रखी हुई थी. और भी जाने क्याक्या पीने के सामान रखे थे, ये वे मासूम बस्ती वाले क्या जानेंखैर, थोड़ी ही देर में जो खाना यहां बना हुआ था उस की एक थाली अंदर टैंट में ले जाई गई और उस के बाद अनाउंसमैंट हुई, ‘‘बस्ती वालो, जो खाना आप लोगों के लिए बनवाया गया है, वही खाना नेताजी को भी दिया गया है, क्योंकि हमारे आदर्श नेता आप सब को अपना भाईबंधु मानते हैं, इसलिए वे भी आप के साथ ही बैठ कर खाना खाना चाहते थे.


‘‘मगर तबीयत खराब होने की वजह से उन का खाना अंदर ही दे दिया गया है और अब आप सब भी खाना शुरू करें. उस के बाद नेताजी खुद कर आप सब के उद्धार के बारे में चर्चा करेंगे.’’ सभी लोग यह सुनते ही खाने वाले पंडाल की तरफ टूट पड़े. आज जाने कितने सालों बाद इतने लजीज खाने की खुशबू सूंघी है. जैसे ही जनता खाने वाले स्टौल की तरफ लपकी, नेताजी का एक चमचा दौड़ कर नेताजी की कार में से टिफिन बौक्स निकाल लाया. हां, इस बस्ती में एक बंदा ऐसा था, जो थोड़ाबहुत सुनसुना कर टूटीफूटी इंगलिश ?ाड़ता था. उस ने नेताजी के बाशिंदे को टिफिन ले जाते देख करा झट से उसे दबोच लिया, ‘‘क्यों सरजी, बट इज इट…’’

‘‘नथिंग, नथिंग, जस्ट मैडिसन…’’
‘‘हांजीक्या बोले जी? अरे, हम पूछिंग, बट इज दिस…’’
‘‘ओह, इस टिफिन में साहब की दवाएं हैं. खाने के साथ लेनी होती हैं, इसलिए ले जा रहा हूं.’’
‘‘ओके, ओके, गो, गो…’’


आप समझ सकते हैं सबकुछ कि टिफिन में कौन दवाएं रखता है. अरे, नेताजी भला वह खाना खाएंगे जो आम लोगों के लिए लंगर चलवाया था? खैरभोजनपानी हो गया. सब लोग पंडाल में गए. नेताजी भी दांतों मेंसे कुछ फंसा हुआ चिकन का पीस
माचिस की तीली से निकालते हुए पधार रहे हैं. चमचों ने सब को शांत हो कर बैठने को कह दिया. सब लोग शांति से बैठ गए.


जिन के छोटे बच्चे थे, वे थोड़ा शोरशराबा करने लगे, तो नेताजी के चमचों ने फरमान सुनाया कि इन बच्चों को उन के दादादादी पंडाल के पीछे के हिस्से में खेलने के लिए ले जाएं, ताकि वे जवान लोगों को उन के उद्धार का तरीका अच्छे ढंग से सम? सकें. औरतें आगे और मर्द पीछे बैठ गए. नेताजी कि नजरें उद्धार करने लायक चेहरे खोजने लगीं. अब हुआ नेताजी का भाषण शुरू.


नेताजी ने सब की शिकायतें सुनीं और अपने एक चमचे को हुक्म दिया कि कागज पर सब की शिकायतें नोट कर लें, ताकि किसी की भी कोई समस्या रह जाए, जिस का समाधान हो. अब नेताजी ने सब को आश्वासन दिया कि सत्ता में आते ही सब की समस्या का समाधान किया जाएगा और इस बस्ती का उद्धार नेताजी कर के रहेंगे. नेताजी ने एक और बहुत बड़ी बात कह दी कि चाहे वे सत्ता में आएं या आएं, लेकिन इस बस्ती का उद्धार तो वे आज से करना शुरू करेंगे, क्योंकि यह बस्ती उन्हें अपने परिवार की तरह है.


जी हां, सामने छमिया जैसी कई सुंदरियां उन्हें अपनी ही लग रही थीं, इसलिए भाषण के बाद उन के टैंट में उन सुंदरियों की भीड़ लग गई, जिनजिन के नाम ले कर उद्धार के लिए बुलाया गया था. नेताजी उन सब सुंदरियों को शहर में अच्छी नौकरी, अच्छा रहनसहन, अच्छा खानपान और शहरी सलीका सिखाने के लिए साथ ले गए. 2 साल बाद छमिया जैसी सभी वे लड़कियां जिन का उद्धार करने के लिए ले जाया गया था, बस्ती में आईं. सब ने बेशकीमती कपड़े और गहने पहने हुए थे. हाथों में पान की छोटी सी डिबिया जिन में से वे पान निकाल कर मुंह में ठूंस कर इधरउधर पीक फेंक रही थीं. उन के परिवारजनों के पास छोटेछोटे पक्के मकान थे. बिजलीपानी की सुविधा थी.


दूसरे  झांपड़पट्टी वालों ने उद्धार की गुहार लगाई, तो उन्हें बताया गया कि शहर में केवल सुंदरियों को ही काम पर रखा जाता है. उन के द्वारा ही उन के परिवारों का उद्धार हो सकता है और इसलिए वे उद्धार करने के लिए ही दूसरी सुंदरियों को चुनने आई हैं.  Hindi Story 

लेखक प्रेम बजाज

मजाक: गीले और पीले पाजामे में होली

अपने पसंदीदा ‘नटखट हिंदू विश्वविद्यालय, कठोरगंज, जिला चूमतापुर, नंगा प्रदेश’ के प्रांगण में टहलते हुए मुझे एक डायरी हाथ लगी. खोल कर देखने पर मैं समझ गया कि हो न हो यह किसी शरीर विज्ञान विषय के छात्र की है, क्योंकि उस में ‘गीले और पीले पाजामे में होली’ विषय पर निबंध की तैयारी का मसौदा था. उस ने अपने निबंध में लिखा था :

होली रंगों का त्योहार है और होली पर पाजामा आगे से गीला और पीछे से पीला होना कोई अनोखी बात नहीं है. होली है तो पाजामा तो गीला और पीला होगा ही न. अनोखी और राज वाली बात तो यह है कि आखिर पाजामा कैसे गीला और पीला हुआ?

मेरी रिसर्च में पहले पाजामे के गीले होने का ब्योरा है कि पाजामा गीला होने की 3 वजहें हो सकती हैं. पहली, किसी ने जबरदस्ती होली का गीला रंग डाल दिया हो. दूसरी, पाजामा डर के मारे गीला हुआ हो कि होली है पता नहीं कौन सी सविता टाइप भाभी आ कर पाजामा खींच ले और अंदर तक रंग दे.

वैसे, होली पर बड़ी टाइप की भाभियों की बात भी निराली छटा बिखेरती है. 45-46 की उम्र के बाद तो भाभियों के हर महीने में कुछ लाल होना मुमकिन ही नहीं होता है. झुर्री पड़ी ढीली त्वचा के आपस में चिपकने, रूखे और सूखेपन से निबटने के लिए भी उन्हें चिकनेपन के अहसास के लिए मौश्चराइजिंग क्रीम के भरोसे ही रहना पड़ता है.

सो, फिर से लाललाल होने और लाललाल करने की ख्वाहिश से उन्हें होली का इंतजार रहता ही होगा और वे पकड़ ही लेती होंगी अपने किसी न किसी घर वाले से ज्यादा प्यारे लगने वाले बाहर वाले जवां देवर को.

और तीसरी वजह, रात में पड़ोस वाली भाभी और सगी या पराई साली के साथ होली के गंदे गुप्त स्वप्न देख कर दोष के चलते भी पाजामा गीला हो सकता है. अपने देश में स्वप्नदोष नौजवानों की एक गंभीर समस्या है.

अपने देश में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर एक चीज मिलती है, जिसे आप बिना रोकटोक चुपचाप उठा कर अपने घर ला कर सपत्नी उस का इस्तेमाल कर सकते हैं. ऐसी चीज जो स्वास्थ्य केंद्रों से उठा कर जितनी चाहो उतनी ला सकते हो यानी जितने पैकेट उठा सको और अपनी जेब में भर सको भर कर ले आओ. चोरी का कोई इलजाम नहीं लगेगा, न ही कोई एफआईआर दर्ज करवाई जाएगी.

केंद्रों पर लगे खुफिया कैमरों में अगर आप की तसवीर कैद भी हो गई तो भी कुछ नहीं कहा जाएगा. आप समझ ही गए होंगे उस चीज का नाम. क्या कहा नहीं समझे? तो भैया, जान लो कंडोम यानी निरोध.

बढ़ते परिवार पर कंट्रोल रखने के लिए सरकार ने अब नए खुशबूदार व लुब्रिकैंट वाले कंडोम सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर मुहैया करा दिए हैं. एक पैकेट में पूरी 5 होली के लिए सालभर जमा करो तो सैकड़ों कंडोम.

होली का मौका और ऊपर से हमारी सविता भाभी की उस्तादी कम न थी. सुरक्षित जीवन जीने का आनंद लेना तो उन्हें ही आता था. सालभर इन केंद्रों पर जबजब अपना स्वास्थ्य चैकअप करवाने जातीं तो झोली भरभर कर फ्री के कंडोम के पैकेटों को ले आतीं और अपने बक्से में रख लेतीं.

भैया का पाजामा भले ही गीला हो जाए, मगर वे झंझट बिना सुरक्षित आनंद लेने का अनुभव पाने में ज्यादा यकीन रखती थीं और अब उम्र के 45वें पड़ाव को कामयाबी से पार कर लेने के बाद तो एकदम निश्चिंत थीं.

होली थी. सो, उन्होंने अपने बक्से में रखे हुए सैकड़ों सरकारी कंडोम निकाले और महल्ले के छोटे बच्चों को थमा दिए कि बच्चों इन में भरो रंग और कर दो पूरे महल्ले के मर्दों यानी अपने अंकलों का पाजामा गीला और पीला.

बच्चे भी पहली बार इतने बड़ेबड़े गुब्बारे देख कर खुश और जोश से भरे थे. बस, एक ही दुख था कि वे रंगीन नहीं थे. हलके पीले जरूर थे. खैर, बच्चों का खूब काम चल गया. कुछ ने हवा भर कर उड़ाए व कुछ ने पक्के रंग भर कर दे मारे अंकल के चिकने कूल्हे पर.

सो, उन का सफेद पाजामा फर्र से गीला और पीला हो गया यानी होली पर बच्चों द्वारा फेंके गए पानी भरे सरकारी गुब्बारों का फटना और फाड़ना भी पाजामा गीला और पीला कर देता है जनाब और खासतौर से पाजामा पीछे से पीला तो तभी होता है जब या तो पाजामाधारी ने होली पर बने पकौड़ों का जरूरत से ज्यादा सेवन किया हो या फिर किसी लुगाई ने अपने हाथ पीले कर के होली के मौके का फायदा उठाया हो और जम कर अपनेपराए पाजामाधारी के पीछे पीले रंग से रगड़ाई की हो.

 

होली पर अपनाअपना पाजामा गीला और पीला हुआ देख महल्ले के सभी मर्द जब अपनेअपने घरों में घुसने लगे तो महल्ले की दूसरी बूढ़ी औरतों ने भी मौके का फायदा उठा कर कहा, ‘अरे ओ मर्दो, निकलो बाहर. और आओ हमार संग जरा लट्ठमार होली भी खेल लो. सालभर रोज रात को अपनीअपनी लुगाइयों के साथ बहुत बजा लिया अपनाअपना लट्ठ.

‘बहुत लालपीली कर ली अपनी लुगाई. अब आज होली पर कमजोर काहे पड़ रहे हो. ज्यादा चीनी खा कर मुंह न लटकाओ, करेले का जूस पिया करो जो हमेशा तने रहो और डटे रहो. कुछ नहीं तो बदन पर तेल लगाओ और आ जाओ सामने. हम बिना लट्ठमार पिचकारी के ही रंग दिए तोहे आज. होरी है, पाजामा कस ले और आ जा होरी खेलन.’

मौजमस्ती के त्योहार में अब डर काहे का और काहे की शर्म. वैसे भी होली पर पाजामा गीला हो या लट्ठमार होली हो, आखिर कौन डरता है. सभी मर्द हैं तो भला क्यों डरेंगे.

सभी ने जम कर लट्ठमार होली खेलनी चाही तो बेचारे बूढ़ी औरतों के सामने अपनाअपना पाजामा फटतेफटते किसी तरह सुरक्षित बचा पाए, पर उसे आगे से गीला और पीछे से पीला होने से वे नहीं बचा पाए. बस, यही बोले, ‘पाजामा आगे से गीला और पीछे से पीला है, जरा संभल के हमार भौजी, जोगीरा सारारारा… जोगीरा सारारारा…’

अपने निबंध के आखिर में उस छात्र ने लिखा कि जांचकर्ता महोदय, मैं ने अपने निबंध में मौलिकता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की. वैसे भी आप ने ही सिखाया है कि इम्तिहान में पूछे गए सवालों के जवाबों को लिखने की जरूर कोशिश करनी चाहिए. अपनी उत्तर पुस्तिका कभी खाली छोड़ कर नहीं आनी चाहिए.

जब लिखोगे ही नहीं तो फिर परिचित जांचकर्ता को ऐक्स्ट्रा नंबर देने का मौका ही कहां लगेगा, इसलिए मैं ने जोकुछ भी लिखा है, उस पर आप को नंबर देने ही चाहिए वरना मैं ने पुलिस में भरती होने का मन बना लिया है. वहां से ऐनकाउंटर कर के सामने वाले को मारने की कला सीख कर आप के सामने एक दिन जरूर आऊंगा. फिलहाल होली तो गीले और पीले पाजामे में हो ली है जनाब.

Hindi Story: कमली बदचलन नहीं – फिर एक ब्याहता कैसे फिसली

Hindi Story. कमली ने दरवाजे की दरार से ही झांक लिया था कि बाहर धरमराज खड़ा है, फिर भी दरवाजा खोलने पर वह ऐसे चौंकी, जैसे चोरी करते हुए रंगेहाथ पकड़ ली गई हो.

कमली मुंह पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘हाय, तो तुम हो… मैं इतनी देर से पूछ रही हूं, बोल भी नहीं सकते थे कि मैं हूं.’’

धरमराज ने अंदर आते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है चाची, मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

बोलतेबोलते धरमराज की नजर जब कमली पर पड़ी, तो वह ठगा सा उसे देखता रह गया.

कमली शायद उस समय नहा रही थी और यही वजह थी कि उस ने उस समय साड़ी के नीचे कुछ भी नहीं पहन रखा था.

जिस्म पर चिपके हुए गीले आंचल ने उस समय धरमराज को मदहोश कर दिया. वह फटी आंखों से कमली को देखता ही रह गया.

कमली ने बनावटी गुस्से से कहा, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हो? बड़े बेशर्म हो तुम. बैठो, मैं नहा कर आती हूं…’’

इतना कह कर कमली फिर से नहाने को मुड़ी, लेकिन धरमराज ने उस का हाथ पकड़ कर रोक लिया.

उस समय धरमराज की आंखें लाल सुर्ख हो रही थीं और सारा बदन जोश के मारे कांपा जा रहा था. उस ने आव देखा न ताव तुरंत कमली को अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘जो नहाना था, वह तुम नहा चुकी हो, इसलिए अब तुम्हें मैं नहलाऊंगा…’’

कमली सिकुड़ते हुए बोली, ‘‘बड़े बेशर्म हो जी तुम… हटो, मुझे कपड़े तो पहन लेने दो…’’

‘‘जल्दी क्या है… फिर पहन लेना कपड़े. इतनी गरमी है, थोड़ी देर ऐसे ही बदन ठंडा होने दो. फिर जो नहाना हम कराएंगे, उस में कपड़ों का क्या काम…’’ कहतेकहते धरमराज ने कमली को और जोर से भींच लिया.

कमली भी और दिखावा नहीं कर सकी और चुपचाप बांहों में समा गई. उस की छाती में नाखून धंसाते हुए वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो तुम? अभी कोई आ गया तो… बदनामी होते देर नहीं लगेगी…’’

‘‘आएगा कैसे… मैं ने तो दरवाजे पर पहले ही अंदर से कुंडी लगा दी है.’’

‘‘यानी तुम्हारी नीयत पहले से ही खराब थी…’’

‘‘चाची, मेरी नीयत डिगाने वाली भी तो तुम ही हो…’’

बात सच भी थी. कमली के पति मास्टर विद्याधर दुबे की एक शादी पहले ही हो चुकी थी. उन की पहली पत्नी जानकी देवी के बहुत दिनों तक जब कोई औलाद नहीं हुई, तब वे दूसरी शादी करने का पूरा मन बना चुके थे, लेकिन उन्हीं दिनों शादी के 8 साल बाद अचानक जानकी देवी पेट से हो गई, तो मास्टर साहब के मन की बात मन में ही रह गई.

मास्टर विद्याधर दुबे का बेटा मनोज अभी 10 साल का ही हुआ था कि अचानक जानकी देवी बीमार पड़ी और चल बसी. उस समय घर संभालने की समस्या सामने आ गई.

मास्टर विद्याधर दुबे कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे क्या करें, बेटे मनोज की उम्र भी अभी काफी कम थी. लेकिन अड़ोसीपड़ोसी दूसरी शादी करने की राय देने लगे, तो उन्होंने एक पल भी देर नहीं लगाई और 25 साल की कमली को दुलहन बना कर घर ले आए.

उस समय मास्टर विद्याधर दुबे की उम्र 43 पार कर चुकी थी. हिंदू धर्म ग्रंथों में कन्या के लिए दोगुनी उम्र का वर चल जाता है, लेकिन असल जिंदगी में इस की सचाई तो कोई कमली से पूछे.

दिनभर स्कूल में पढ़ाने के बाद कुछ ट्यूशन भी निबटा कर मास्टर विद्याधर दुबे थकेमांदे घर लौटते हैं, तो जवानी से उमड़ती 25 साला रूपसी पत्नी कमली को देखते ही उन की आंखें चमक उठतीं. कभीकभी तो वे कमली को देखते ही इतने बेताब हो उठते हैं कि खानेपीने तक का भी इंतजार करना उन के लिए मुश्किल हो जाता.

मास्टर विद्याधर दुबे बेचैनी से कमली को अपने पास खींच लेते और भूखे बालक की तरह मचलने लगते. कमली कितना भी मना करती रहे, लेकिन मास्टर विद्याधर दुबे मानमनुहार कर के उस के बदन से एकएक कपड़ा उतार देते और कहते, ‘‘एक बार मुझे जी भर कर देख लेने दो…’’

फिर वे कमली की देह पर उसी तरह से हाथ फेरते, जैसे कोई गाय को दुहने से पहले उस पर हाथ फिराता है.

लेकिन उन्हें उतना सब्र नहीं था, जितना होना चाहिए था. कमली की देह पर हाथ फिरातेफिराते अचानक बेचैन हो कर उस पर टूट पड़ते हैं, लेकिन पलभर बाद ही उन की मर्दानगी रूपसी कमली की जवानी की गरमी के सामने ज्यादा देर नहीं झोल पाती थी. कुछ ही देर की छेड़खानी के बाद वे पस्त हो कर एक ओर लुढ़क जाते. फिर उन्हें जाने कब गहरी नींद घेर लेती.

लेकिन प्यासी इच्छा की आग से तड़पती हुई कमली कभीकभी सारी रात करवटें बदलती रह जाती. हरदम लगता, जैसे बदन पर चींटियां रेंग रही हों.

कमली बदचलन नहीं है, लेकिन मन की तड़प ने तन की भूख मिटाने के लिए उसे रास्ता बदलने को मजबूर कर दिया.

धरमराज मास्टर विद्याधर दुबे का छात्र रह चुका था. उसी वजह से वह अकसर उन से बातें करने आ जाता था और गांव के नाते कमली को ‘चाची’ कह कर बुलाता था. लेकिन कमली ने लुभाना शुरू किया, तो धरमराज को समझाते देर नहीं लगी.

आखिरकार उस दिन मौका मिल ही गया. कमली नहा रही थी, तभी धरमराज आ पहुंचा. कमली ने जानबूझ कर गीले कपड़ों में दरवाजा खोल दिया, फिर तो जो कुछ हुआ, उस में कमली की पूरी तरह रजामंदी थी.

बहुत दिनों तक कमली और धरमराज का यह खेल चलता रहा, पर एक दिन अचानक मनोज ने उन दोनों को गंदी हरकत करते देख लिया. वह बोला, ‘‘तुम यह क्या कर रही हो नई मां? मैं अभी जा कर पिताजी से कहता हूं.’’

मनोज ने स्कूल में जब अपने पिता को सारी बात बताई, तो मास्टर विद्याधर दुबे को एकाएक भरोसा ही नहीं हुआ. फिर वे पैर पटकते हुए घर पहुंचे, तो बाहर दरवाजे पर ताला झेल रहा था.

उन्होंने धरमराज के घर जा कर पूछा, तो पता चला कि वह भी लापता है. शाम होतेहोते पूरे इलाके में यह खबर फैल गई कि मास्टर विद्याधर दुबे की दूसरी पत्नी कमली धरमराज के साथ भाग गई.

लेकिन किसी को ताज्जुब नहीं हुआ. जैसे सब पहले से ही जानते थे कि मास्टरजी ने ढलती उम्र में इतनी जवान लड़की के साथ घर बसाया है, तो एक दिन तो ऐसा होना ही था. Hindi Story

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