Inspirational Story in Hindi : जीत

Inspirational Story in Hindi. अखबार में आई उस खबर को सपना ने 10 बार बड़ी लगन और चाव से पढ़ा. खबर का एकएक शब्द उसे जबानी याद हो गया था. वह खबर पढ़ कर खयालों में खो गई थी.

शहर की एक मशहूर कंपनी की तरफ से उस कंपीटिशन का आयोजन किया गया था. यह कंपनी औरतों और जवान लड़कियों के अंदरूनी कपड़े बनाती थी. हर साइज की ब्रा और पैंटी बनाने में वह कंपनी माहिर थी और उस का शहर में बड़ा नाम और रसूख था.

16 साल से 20 साल तक की 31 लड़कियां उस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं. विजेता को कंपनी की तरफ से एक महीने के लिए पैरिस की मुफ्त सैर और 5 लाख रुपए का नकद इनाम दिया जाने वाला था. हर खूबसूरत लड़की के लिए यह सुनहरा मौका था.

सपना शहर के जानेमाने उद्योगपति की एकलौती औलाद थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही घमंडी और जिद्दी भी. दुनिया का हर सपना पैसे की ताकत से पूरा हो सकता है, यह उस की सोच थी. वह हर हालत में इस शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ बन कर कंपीटिशन जीतने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.

सपना अपनी जिंदगी के 18 साल पार कर चुकी थी. कंपीटिशन के लिए केवल एक महीना बाकी था. इस एक महीने के अंदर उसे हर उस काम को अंजाम देना था, जो उस की जीत के लिए सहायक हो सके.

सपना जीजान से इस के लिए मेहनत कर रही थी. अपने दिमाग में उस ने इस बारे में कुछ योजनाएं और चालें सोची थीं. उन पर अमल कर के वह अपना रास्ता तय करना चाहती थी.

सब से पहले उस ने अपने खास आदमी लगा कर उस कंपीटिशन के लिए कौन और कितने ज्यूरी तय किए गए हैं, उन के बारे में मालूम करने का काम किया था. उसे मिली जानकारी के तहत 3 ज्यूरी बनाए गए थे. उन का फैसला अहम माना जाने वाला था.

60 साला मदनलाल पटेल भी ज्यूरी मेंबर था. वह शहर का माना हुआ बिल्डर था. अच्छी सेहत और रंगीनमिजाज उस के स्वभाव की खासीयत थी.

एक दिन मौका पा कर सपना उस से मिलने उस के दफ्तर पहुंची. उस समय शाम के 6 बज रहे थे और दफ्तर का स्टाफ जा चुका था.

मदनलाल अपने केबिन में कुछ खास फाइलें देख रहा था. सपना ने उसे मिलने का वही समय तय किया. सपना ने उसे अपनी पहचान और उस से मिलने की खास वजह साफ बताई थी.

सपना की खूबसूरती और हिम्मत देख कर मदनलाल प्रभावित हुआ था, मगर ऊपरी तौर पर बनावटी गंभीरता अपने चेहरे पर ला कर वह अपनी सधी, मगर शांत आवाज में कहने लगा, ‘‘सपना, कंपीटिशन के नियम मालूम हो जाने पर भी तुम ने मुझ से मिलने और मुझ पर अपना दबाव डालने की भूल की है. इस के लिए मेरी शिकायत पर तुम्हें कंपीटिशन से बाहर भी जाना पड़ सकता है.’’

‘‘पटेल साहब, कानून और नियम आदमी ही बनाता है और उसे तोड़ने वाला भी आदमी ही होता है. यह कानून तोड़ना आप के लिए फायदेमंद और बहुतकुछ देखने का मौका भी साबित होगा, यह मेरा दावा है.’’

‘‘मेरी समझ में यह बात नहीं बैठ रही है कि कानून तोड़ने के बाद मुझे क्या फायदा होने वाला है. अगर तुम इस बात को जरा सलीके से और साफसाफ कहोगी, तो मैं समझ सकता हूं.’’

‘‘पटेल साहब, आप को तो मालूम ही है कि कंपनी वालों ने यह कंपीटिशन अपना माल ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेचने के लिए कराया है. कंपनी जो ब्रा और पैंटी बनाती है, वह कंपीटिशन में भाग लेने वाली लड़की के जिस्म पर कितनी जंचती है और उस का देखने वालों पर क्या असर पड़ता है, यह मैं आप को यहीं दिखा सकती हूं.’’

सपना की इस खुली दावत को नकारना मदनलाल जैसे रंगीनमिजाज आदमी के लिए बहुत मुश्किल था.

अपनी आवाज को काबू में करते हुए वह सपना की तरफ देख कर बड़ी सहज आवाज में बोला, ‘‘सपना, तुम्हारे इस खूबसूरत बदन पर कंपनी की ब्रा और पैंटी कैसी लगती है, यह मैं जरूर देखूंगा, मगर इस केबिन में नहीं.

‘‘साथ वाला केबिन मेरा आराम का कमरा है. वहां चल कर हम आराम से एकदूसरे की चाहत अच्छी तरह पूरी कर सकते हैं.’’

सपना ने हंसते हुए अपना रुख कमरे की तरफ किया. अगले ही पल में वे दोनों कमरे में थे. सपना ने बिना समय गंवाए बदन से अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मदनलाल उस के बदन को बडे़ चाव से देख रहा था. देखते ही देखते सपना पूरी तरह कपड़ों से बाहर थी. उस का संगमरमर जैसा बदन और उस की मादक अदाएं देख कर मदनलाल पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था.

सपना ने अपनी बांहों का घेरा मदनलाल के बदन पर कसते हुए अपने होंठ उस के होंठों पर रखे थे. मदनलाल के बदन पर से भी देखते ही देखते एकएक कपड़ा दूर होता गया.

सपना मदनलाल के बदन के विभिन्न अंगों को अपने हाथ से सहलाती और होंठों से चूमती रही. उस की मादक हरकतों से वह पूरी तरह बहक गया था.

सपना के बदन को अपना बनाने के लिए वह मरा जा रहा था. सपना उस की बेकाबू हरकतों को देख कर मन ही मन मुसकराती रही.

देखते ही देखते वह दौर भी आया, जब मदनलाल के सब्र का पैमाना छलकने को हुआ. मगर सपना उस पर पूरी तरह हावी हो कर उस की हर हरकत को बड़ी चतुराई से नाकाम करती रही.

बेचारा मदनलाल कब निढाल हो कर लंबीलंबी सांसें भरने लगा, यह उसे भी पता नहीं लगा. आधे घंटे के बाद वह दोनों फ्रेश हो कर बाहर आए. मदनलाल उसे छोड़ने के लिए खुद उस की कार तक आया था. सपना एक बाजी जीत चुकी थी.

2 दिनों के बाद सपना दूसरे ज्यूरी मेंबर इंद्रजीत वर्मा के घर पर थी. रात के 8 बजे थे और इंद्रजीत रोज की तरह आज भी शराब में धुत्त बैठा था. बंगले में वह आज अकेला था. उस की बीवी और बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे.

सपना ने यह मौका अपने मिशन के लिए ठीक समझा था. इंद्रजीत को उस ने अपनी रसीली बातों और कामुक अदाओं से इस तरह जकड़ कर रख दिया कि बेचारा इंद्रजीत उस के जिस्म को चूमनेचाटने और मसलने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सका. अपनी सांसों पर काबू रख पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल काम था.

तीसरा ज्यूरी मेंबर अमरनाथ गुप्ता सपना की समझ से ज्यादा चालाक और शातिर खिलाड़ी साबित हुआ था, मगर सपना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं.

अमरनाथ गुप्ता की बीवी को मरे हुए 10 साल हो गए थे और वह अपनी रातें मनपसंद क्लबों में खूबसूरत औरतों के साथ गुजार कर अपना शौक पूरा करता था.

सपना की लाख कोशिशों के बावजूद वह उस पर इस तरह हावी हुआ था कि उसे अपनी इज्जत बचाना बड़ा मुश्किल लगने लगा था.

अमरनाथ पर आजमाया हुआ हर दांव सपना ने बड़ी चतुराई से नाकाम किया था. सपना के सामने एक पल वह भी आया, जिस समय खुद उसे महसूस होने लगा कि वह अपनी बाजी हारने वाली है, तब पूरी तरह सावधान हो कर उस ने अमरनाथ को अपने बदन से अलग कर दिया था. बेचारा अमरनाथ खुद ही निढाल हो गया था.

इस तरह सपना ने अपने रूप और मायाजाल से उन तीनों ज्यूरी मेंबरों को इस कदर अपना दीवाना बनाया था कि उन तीनों की नजरों में सपना ही इस शहर की एकमात्र ‘ब्यूटी क्वीन’ थी.

सपना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’

का ताज पहनाने के लिए वे तीनों बेताब हुए जा रहे थे. अब सपना का सपना सच होने में ज्यादा देर नहीं थी.

देखते ही देखते वह दिन भी आ गया, जिस का इंतजार सपना और दूसरी लड़कियों और ज्यूरी मेंबरों को था. कंपीटिशन का विरोध करने के लिए शहर के ‘नारी संगठन’ कार्यक्रम में अड़चनें पैदा न करें, इस के लिए संयोजक ने कंपीटिशन के उद्घाटन की जिम्मेदारी शहर के पुलिस कमिश्नर के हाथों में सौंपी थी. इस वजह से वहां पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.

शहर के एक शानदार थिएटर में यह कंपीटिशन होने वाला था. लोग बेताबी से कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. पूरा हाल लोगों से भरा पड़ा था. कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी थी. 10 खूबसूरत लड़कियां इस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं.

3 ज्यूरी मेंबर अपनी सीट पर बैठे थे. देखते ही देखते स्टेज का मखमली खूबसूरत परदा ऊपर गया. लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई. कंपीटिशन के एंकर ने स्टेज संभाल लिया.

सब से पहले 10 लड़कियों ने अपना परिचय लोगों को दिया. दूसरे राउंड में अपने तन पर आकर्षक कपड़े पहन उन्होंने अपनी जवानी और खूबसूरती का जलवा दिखाया. उन के कपड़ों से उन की जवानी और उन के खूबसूरत जिस्म का हर एक अंग जगमगाती रोशनी में लोगों की नींद उड़ा रहा था. सब की आंखों में उन जवान लड़कियों के प्रति तारीफ और वासना तैरती नजर आ रही थी. उन की मादक अदाओं पर लोग तालियां और सीटियां बजा रहे थे और उन्हें उत्साहित कर रहे थे.

आखिरी राउंड शुरू हुआ. हर लड़की कंपनी द्वारा बनाई गई ब्रा और पैंटी पहन कर अपनी मस्तानी चाल से लोगों के दिलों में हलचल मचा रही थी. उन कपड़ों में हर लड़की सैक्सी लग रही थी… लोग रहरह कर अपनी जगह खड़े हो कर उन की तारीफ कर रहे थे.

आखिर में आयोजक द्वारा निकाले गए नामों का ऐलान होने की सूचना दी गई. इस का जोरशोर से स्वागत हुआ.

अगले 5 मिनट में आयोजक द्वारा निकाले गए नाम बताए गए. सपना शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ चुनी गई थी. उस के सिर पर ताज पहनाया गया और उसे 5 लाख रुपए का चैक और पैरिस घूमने का टिकट दिया गया. लोगों ने तालियां बजा कर उस का स्वगात किया.

सपना मन ही मन मुसकराती हुई लोगों का अभिनंदन स्वीकार करती बड़ी शान से स्टेज पर खड़ी रही थी.  Inspirational Story in Hindi

— माधव ना. रानडे

 

Hindi Story : दाढ़ी की आड़ में – क्या मिल पाया शेखू मियां को औलाद का सुख

Hindi Story. शेखू मियां के घर पर ठहरे मौलाना ने बताया कि हर मुसलिम को शौक के साथ दाढ़ी रखना लाजिम है. यह खुदा का नूर है. इस से मोमिन की अलग पहचान होती है.

‘बात हक और सच की है,’ कहते हुए सभी ने हां में हां मिलाई.

मौलाना रोज शरीअत की बातें बताते. धीरेधीरे यह बात फैली और आसपास के लोग इकट्ठा हो कर उन की हर बात ध्यान से सुनते और उन पर अमल करते.

जब भी उन के चाहने वालों ने उन से उन का नामपता जानना चाहा, तो वे बात को टाल देते. खुद शेखू मियां को नहीं मालूम कि वे कहां से आए?

शेखू मियां के औलाद नहीं थी. गांव के आसपास के इलाकों में उन की काफी शोहरत थी. वे नौकरचाकर, खेती को देखते और 5 वक्त की नमाज करते. मौलाना की बातों से वे उन के दीवाने हो गए.

मौलाना ने कहा, ‘‘मेरा दुनिया में कोई नहीं. दो वक्त का खाना और कपड़े, सिर छिपाने के लिए छत और इबादत… इस के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए.’’

मौलाना की बात पर यकीन कर शेखू मियां ने उन्हें मसजिद में रख लिया.

‘‘शादाब बेटा, तुम्हें हम आलिम बनाना चाहते हैं,’’ अब्बू ने कहा. ‘‘ठीक है अब्बू, मैं मदरसे में जाने को तैयार हूं.’’ ‘‘तो ठीक है,’’ अब्बा ने कहा.

2 दिन बाद शादाब के अब्बू शहर के मदरसे में उसे भरती करा आए.

‘‘देखो बेगम, तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने खाने व रहने का बंदोबस्त मदरसे में ही कर दिया है. वहां और भी लड़के हैं, जो तालीम ले रहे हैं,’’ मौलाना ने बीवी को सम?ाया.

उन का बेटा शादाब शहर में तालीम पाने लगा. अभी उस की तालीम पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक सड़क हादसे में उस के अब्बूअम्मी का इंतकाल हो गया. शादाब पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया.

घर पर उस के चाचाचाची, 2 बच्चे थे. शादाब वहीं उन के साथ रहने लगा. शादाब की चाची पढ़ीलिखी, निहायत खूबसूरत, चुस्तचालाक व आजाद खयालों की औरत थी.

वह शादाब से खूब हंसीमजाक करती, उस के आसपास मंडराती रहती. घर पर उस का ही हुक्म चलता.

‘‘सुनो शादाब मियां, जवानी में बु?ाबु?ा सा चेहरा, दाढ़ी अच्छी नहीं लगती. नए जमाने के साथ चलो. अब कौन मदरसे में पढ़ाई कर रहे हो.’’

चाची के कहने पर उस ने दाढ़ी साफ करा ली. नए फैशन के कपड़े पहनना शुरू कर दिया. वह चाची का दिल नहीं तोड़ना चाहता था, बल्कि वह चाची को मन ही मन चाहने लगा था.

चाचा को शादाब की यह हरकत बिलकुल पसंद नहीं थी कि वह उस की बीवी के पास रहे.

तभी एक दिन नौकरानी ने कहा, ‘‘अंदर जा कर देखिए… क्या तमाशा हो रहा है?’’

इधर एक कचरा उड़ कर शादाब की चाची की आंख में चला गया था.

‘‘शादाब देखना… मेरी आंख में कचरा चला गया है, जरा निकाल दो,’’ कह कर वह पलंग पर लेट गई और शादाब ?ाक कर उस की आंख से कचरा निकालने लगा.

शादाब का पूरा जिस्म चाची पर ?ाका देख कर चाचा जोर से चिल्लाया, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंख में कचरा चला गया था. शादाब से निकालने को कहा… और क्या?’’ कह कर वह पलंग से उठ कर खड़ी हो गई.

चाचा शादाब की खोटी नीयत को पहचान गया. उस ने गांव वालों के साथ मिल कर ऐसी चाल चली कि उस की खूबसूरत बीवी शादाब की बुरी नीयत से बच जाए और शादाब की जायदाद भी हड़पी जा सके.

‘‘क्यों मियां, मदरसे में यही तालीम मिली है कि तुम मदरसा छोड़ते ही दाढ़ीमूंछ रखना भूल जाओ? कौन कहेगा तुम्हें आलिमहाफिज?’’

खोटी नीयत, नए पहनावे, बगैर दाढ़ी के पा कर पंचायत ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. पंचायत में मौजूद मुल्लामौलवी ने शादाब को गांव से बाहर रहने का तालिबानी हुक्म सुना दिया.

शादाब भटकता हुआ शेखू मियां के गांव पहुंचा. उस ने सालभर में नमाजियों की तादाद बढ़ा ली. उस के चाहने वालों की तादाद में इजाफा होता गया. इसी बीच उस ने ऐसी शैतानी हरकत की, जिसे सुन कर इनसानियत भी शर्मसार हो गई.

वह शेखू मियां को भाई साहब और उस की बीवी को भाभीजान कहता था.

एक दिन उस ने शेखू मियां से कहा, ‘‘भाभी बीमारी से परेशान हैं. इन्हें दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है. भाभी जल्दी ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है. आदमी ढूंढ़ना पड़ेगा,’’ शेखू ने कहा.

‘‘उस की जरूरत नहीं. मैं जो हूं…’’ शादाब ने कहा, ‘‘आप कहें, तो मैं कल से भाभीजान के लिए तावीज फूंकने का इंतजाम करा दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ शेखू मियां ने कहा.

अगले दिन शादाब ने भाभीजान को तावीज दिया. इस से शेखू की बीवी को आराम लगने लगा. उन्होंने राहत की सांस ली.

अब दवा और दुआ दोनों साथसाथ चलने लगीं.

शेखू मियां की खूबसूरत बीवी के बदन पर सोने के गहने को देख कर शादाब के अंदर का शैतान जाग उठा. वह भूल गया कि मदरसे में बच्चों को तालीम देने के साथसाथ नमाज भी पढ़ता है. नमाजी परहेजी मौलाना है. लोग उस की इज्जत करते हैं.

‘‘मौलाना, आज मेरा पूरा जिस्म दर्द कर रहा है. सीने में जलन हो रही है,’’ शेखू मियां की बीवी ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं राख से ?ाड़ देता हूं,’’

और फिर हाथ में कुछ राख ले कर शादाब बुदबुदाया. फिर राख को ही बेगम की बांहों पर मलने लगा. पराए मर्द के हाथ लगाते ही उसे अजीब सा महसूस हुआ, पर उसे अच्छा लगा शादाब का जिस्म छूना.

और फिर सिलसिला चल पड़ा. दोनों करीब आते गए और उन में जिस्मानी ताल्लुकात बन गए.

दोनों के बीच सालभर रंगरलियां चलीं. धीरेधीरे उन के बीच इतनी मुहब्बत बढ़ गई कि वे दुनिया को भूल बैठे.

यह खबर शेखू मियां तक पहुंची, पर वह मौलाना को नेकनीयत, काबिल इनसान, नमाजीपरहेजी सम?ा कर इसे सिर्फ बदनाम करने की साजिश सम?ा बैठा और जब बात हद से ज्यादा गुजर गई, तो उस ने इस की आजमाइश करनी चाही.

‘‘सुनो बेगम, मैं एक हफ्ते के लिए बाहर जा रहा हूं. तुम घरखेती पर नजर रखना. नौकर भी मेरे साथ जा रहा है. हफ्तेभर की तो बात है,’’ शेखू ने कहा.

‘‘जी, आप बेफिक्र रहें, मैं सब संभाल लूंगी,’’ बेगम ने कहा.

‘‘देखो मौलाना, अब हम एक हफ्ते के लिए बेफिक्र हैं. तुम्हारे भाई साहब एक हफ्ते बाद लौटेंगे, तब तक हम जी भर के मिलेंगे. डर की कोई बात नहीं,’’ बेगम ने मौलाना शादाब से कहा.

अब शेखू की गैरहाजिरी में दिल खोल कर मिलनेजुलने का सिलसिला चला. तीसरे दिन शेखू मियां अचानक रात में घर आ पहुंचे.

अपनी बीवी को मौलाना की गिरफ्त में देख कर शेखू मियां का खून खौल उठा. गवाही के लिए नौकर को भी बुला कर अपनी मालकिन का नजारा दिखा दिया. फिर चुपके से वह खेत के घर में जा कर सो गए.

सुबह गांव की पंचायत शेखू के बुलावे पर जमा हुई. कानाफूसी का दौर चला.

‘‘पंचायत की कार्यवाही शुरू की जाए,’’ एक बुजुर्ग ने कहा.

‘‘अरे भई, मौलाना को तो आने दो,’’ एक सदस्य ने कहा.

‘‘उन की ही तो पंचायत है,’’ एक नौजवान ने कहा.

‘वह कैसे?’ सभी एकसाथ कह उठे.

शेखू मियां ने तफसील से बात पंचों को बताई. लोगों का शक ठीक था.

‘‘बीवी का शौहर रहते हुए पराए मर्द से हमबिस्तरी करना, दाढ़ी की आड़ में एक नमाजी का मसजिदमदरसे में तालीम के नाम पर वहशीपन करना मजहब की आड़ में घिनौनी साजिश है.’’

‘‘अनपढ़ औरतें जल्दी ही मजहब के नाम पर ढोंग, अंधविश्वास, तांत्रिक के बहकावे में तावीज, गंडे, ?ाड़नेफूंकने के नाम पर अपना सबकुछ लुटा देती हैं, इसलिए औरतमर्द का पढ़ालिखा, सम?ादार होना जरूरी है, ताकि वे धर्म के इन ठेकेदारों, शैतानों के बहकावे में न आ सकें,’’ कह कर शेखू चुप हो गए.

तभी एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘दोनों को पंचायत में बुलाया जाए.’’

जमात के कहने पर 2 आदमी मौलाना और शेखू की बीवी को लेने गए.

लौट के आ कर उन्होंने बताया कि मसजिद में न तो मौलाना है और न घर पर शेखू की बेगम Hindi Story

Hindi Family Story : अंत भला तो सब भला – नन्द-भाभी की लड़ाई में कौन जीता

Hindi Family Story. संगीता को यह एहसास था कि आज जो दिन में घटा है, उस के कारण शाम को रवि से झगड़ा होगा और वह इस के लिए मानसिक रूप से तैयार थी. लेकिन जब औफिस से लौटे रवि ने मुसकराते हुए घर में कदम रखा तो वह उलझन में पड़ गई.

‘‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम्हारा मूड हो तो खाना बाहर खाया जा सकता है,’’ रवि ने उसे हाथ से पकड़ कर अपने पास बैठा लिया.

‘‘किस कारण इतना खुश नजर आ रहे हो ’’ संगीता ने खिंचे से स्वर में पूछा.

‘‘आज मेरे नए बौस उमेश साहब ने मुझे अपने कैबिन में बुला कर मेरे साथ दोस्ताना अंदाज में बहुत देर तक बातें कीं. उन की वाइफ से तो आज दोपहर में तुम मिली ही थीं. उन्हें एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने मैं ही ले गया था. मेरे दोस्त विपिन के पिताजी उस स्कूल के चेयरमैन को जानते हैं. उन की सिफारिश से बौस की वाइफ को वहां टीचर की जौब मिल जाएगी. बौस मेरे काम से भी बहुत खुश हैं. लगता है इस बार मुझे प्रमोशन जरूर मिल जाएगी,’’ रवि ने एक ही सांस में संगीता को सारी बात बता डाली. संगीता ने उस की भावी प्रमोशन के प्रति कोई प्रतिक्रिया जाहिर करने के बजाय वार्त्तालाप को नई दिशा में मोड़ दिया, ‘‘प्रौपर्टी डीलर ने कल शाम जो किराए का मकान बताया था, तुम उसे देखने कब चलोगे ’’

‘‘कभी नहीं,’’ रवि एकदम चिड़ उठा.

‘‘2 दिन से घर के सारे लोग बाहर गए हुए हैं और ये 2 दिन हम ने बहुत हंसीखुशी से गुजारे हैं. कल सुबह सब लौट आएंगे और रातदिन का झगड़ा फिर शुरू हो जाएगा. तुम समझते क्यों नहीं हो कि यहां से अलग हुए बिना हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे…हम अभी उस मकान को देखने चल रहे हैं,’’ कह संगीता उठ खड़ी हुई.

‘‘मुझे इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाना है. अगर तुम में जरा सी भी बुद्धी है तो अपनी बहन और जीजा के बहकावे में आना छोड़ दो,’’ गुस्से के कारण रवि का स्वर ऊंचा हो गया था. ‘‘मुझे कोई नहीं बहका रहा है. मैं ने 9 महीने इस घर के नर्क में गुजार कर देख लिए हैं. मुझे अलग किराए के मकान में जाना ही है,’’ संगीता रवि से भी ज्यादा जोर से चिल्ला पड़ी. ‘‘इस घर को नर्क बनाने में सब से ज्यादा जिम्मेदार तुम ही हो…पर तुम से बहस करने की ताकत अब मुझ में नहीं रही है,’’ कह रवि उठ कर कपड़े बदलने शयनकक्ष में चला गया और संगीता मुंह फुलाए वहीं बैठी रही.

उन का बाहर खाना खाने का कार्यक्रम तो बना ही नहीं, बल्कि घर में भी दोनों ने खाना अलगअलग और बेमन से खाया. घर में अकेले होने का कोई फायदा वे आपसी प्यार की जड़ें मजबूत करने के लिए नहीं उठा पाए. रात को 12 बजे तक टीवी देखने के बाद जब संगीता शयनकक्ष में आई तो रवि गहरी नींद में सो रहा था. अपने मन में गहरी शिकायत और गुस्से के भाव समेटे वह उस की तरफ पीठ कर के लेट गई. किराए के मकान में जाने के लिए रवि पर दबाव बनाए रखने को संगीता अगली सुबह भी उस से सीधे मुंह नहीं बोली. रवि नाश्ता करने के लिए रुका नहीं. नाराजगी से भरा खाली पेट घर से निकल गया और अपना लंच बौक्स भी मेज पर छोड़ गया. करीब 10 बजे उमाकांत अपनी पत्नी आरती, बड़े बेटे राजेश, बड़ी बहू अंजु और 5 वर्षीय पोते समीर के साथ घर लौटे. वे सब उन के छोटे भाई के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए 2 दिनों के लिए गांव गए थे.

फैली हुई रसोई को देख कर आरती ने संगीता से कुछ तीखे शब्द बोले तो दोनों के बीच फौरन ही झगड़ा शुरू हो गया. अंजु ने बीचबचाव की कोशिश की तो संगीता ने उसे भी कड़वी बातें सुनाते हुए झगड़े की चपेट में ले लिया. इन लोगों के घर पहुंचने के सिर्फ घंटे भर के अंदर ही संगीता लड़भिड़ कर अपने कमरे में बंद हो गई थी. उस की सास ने उसे लंच करने के लिए बुलाया पर वह कमरे से बाहर नहीं निकली. ‘‘यह संगीता रवि भैया को घर से अलग किए बिना न खुद चैन से रहेगी, न किसी और को रहने देगी, मम्मी,’’ अंजु की इस टिप्पणी से उस के सासससुर और पति पूरी तरह सहमत थे. ‘‘इस की बहन और मां इसे भड़काना छोड़ दें तो सब ठीक हो जाए,’’ उमाकांत की विवशता और दुख उन की आवाज में साफ झलक रहा था.

‘‘रवि भी बेकार में ही घर से कभी अलग न होने की जिद पर अड़ा हुआ है. शायद किराए के घर में जा कर संगीता बदल जाए और इन दोनों की विवाहित जिंदगी हंसीखुशी बीतने लगे,’’ आरती ने आशा व्यक्त की.‘‘किराए के घर में जा कर बदल तो वह जाएगी ही पर रवि को यह अच्छी तरह मालूम है कि उस के घर पर उस की बड़ी साली और सास का राज हो जाएगा और वह इन दोनों को बिलकुल पसंद नहीं करता है. बड़े गलत घर में रिश्ता हो गया उस बेचारे का,’’ उमाकांत के इस जवाब को सुन कर आरती की आंखों में आंसू भर आए तो सब ने इस विषय पर आगे कोई बात करना मुनासिब नहीं समझा.

शाम को औफिस से आ कर रवि उस से पिछले दिन घटी घटना को ले कर झगड़ा करेगा, संगीता की यह आशंका उस शाम भी निर्मूल साबित हुई. रवि परेशान सा घर में घुसा तो जरूर पर उस की परेशानी का कारण कोई और था. ‘‘मुझे अस्थाई तौर पर मुंबई हैड औफिस जाने का आदेश मिला है. मेरी प्रमोशन वहीं से हो जाएगी पर शायद यहां दिल्ली वापस आना संभव न हो पाए,’’ उस के मुंह से यह खबर सुन कर सब से ज्यादा परेशान संगीता हुई.

‘‘प्रमोशन के बाद कहां जाना पड़ेगा आप को ’’ उस ने चिंतित लहजे में पूछा.

‘‘अभी कुछ पता नहीं. हमारी कंपनी की कुछ शाखाएं तो ऐसी घटिया जगह हैं, जहां न अच्छा खानापीना मिलता है और न अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाएं ढंग की हैं,’’ रवि के इस जवाब को सुन कर उस का चेहरा और ज्यादा उतर गया.

‘‘तब आप प्रमोशन लेने से इनकार कर दो,’’ संगीता एकदम चिड़ उठी, ‘‘मुझे दिल्ली छोड़ कर धक्के खाने कहीं और नहीं जाना है.’’ ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या  मैं अपनी प्रमोशन कैसे छोड़ सकता हूं ’’ रवि गुस्सा हो उठा.

‘‘तब इधरउधर धक्के खाने आप अकेले जाना. मैं अपने घर वालों से दूर कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अपना फैसला सुना कर नाराज नजर आती संगीता अपने कमरे में घुस गई.

आगामी शनिवार को रवि हवाईजहाज से मुंबई चला गया. उस के घर छोड़ने से पहले ही अपनी अटैची ले कर संगीता मायके चली गई थी. रवि के मुंबई चले जाने से संगीता की किराए के अलग घर में रहने की योजना लंगड़ा गई. उस के भैयाभाभी तो पहले ही से ऐसा कदम उठाए जाने के हक में नहीं थे.

उस की दीदी और मां रवि की गैरमौजूदगी में उसे अलग मकान दिलाने का हौसला अपने अंदर पैदा नहीं कर पाईं. विवाहित लड़की का ससुराल वालों से लड़झगड़ कर अपने भाईभाभी के पास आ कर रहना आसान नहीं होता, यह कड़वा सच संगीता को जल्द ही समझ में आने लगा. कंपनी के गैस्टहाउस में रह रहा रवि उसे अपने पास रहने को बुला नहीं सकता था और संगीता ने अपनी ससुराल वालों से संबंध इतने खराब कर रखे थे कि वे उसे रवि की गैरमौजूगी में बुलाना नहीं चाहते थे.

सब से पहले संगीता के संबंध अपनी भाभी से बिगड़ने शुरू हुए. घर के कामों में हाथ बंटाने को ले कर उन के बीच झड़पें शुरू हुईं और फिर भाभी को अपनी ननद की घर में मौजूदगी बुरी तरह खलने लगी. संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी की तो उन का बेटा उन से झगड़ा करने लगा. तब संगीता की बड़ी बहन और जीजा को झगड़े में कूदना पड़ा. फिर टैंशन बढ़ती चली गई. ‘‘हमारे घर की सुखशांति खराब करने का संगीता को कोई अधिकार नहीं है, मां. इसे या तो रवि के पास जा कर रहना चाहिए या फिर अपनी ससुराल में. अब और ज्यादा इस की इस घर में मौजूदगी मैं बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ अपने बेटे की इस चेतावनी को सुन कर संगीता की मां ने घर में काफी क्लेश किया पर ऐसा करने के बाद उन की बेटी का घर में आदरसम्मान बिलकुल समाप्त हो गया. बहू के साथ अपने संबंध बिगाड़ना उन के हित में नहीं था, इसलिए संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी करना बंद कर दिया. उन में आए बदलाव को नोट कर के संगीता उन से नाराज रहने लगी थी.

संगीता की बड़ी बहन को भी अपने इकलौते भाई को नाराज करने में अपना हित नजर नहीं आया था. रवि की प्रमोशन हो जाने की खबर मिलते ही उस ने अपनी छोटी बहन को सलाह दी, ‘‘संगीता, तुझे रवि के साथ जा कर ही रहना पड़ेगा. भैया के साथ अपने संबंध इतने ज्यादा मत बिगाड़ कि उस के घर के दरवाजे तेरे लिए सदा के लिए बंद हो जाएं. जब तक रवि के पास जाने की सुविधा नहीं हो जाती, तू अपनी ससुराल में जा कर रह.’’ ‘‘तुम सब मेरा यों साथ छोड़ दोगे, ऐसी उम्मीद मुझे बिलकुल नहीं थी. तुम लोगों के बहकावे में आ कर ही मैं ने अपनी ससुराल वालों से संबंध बिगाड़े हैं, यह मत भूलो, दीदी,’’ संगीता के इस आरोप को सुन कर उस की बड़ी बहन इतनी नाराज हुई कि दोनों के बीच बोलचाल न के बराबर रह गई. रवि के लिए संगीता को मुंबई बुलाना संभव नहीं था. संगीता को बिन बुलाए ससुराल लौटने की शर्मिंदगी से हालात ने बचाया.

दरअसल, रवि को मुंबई गए करीब 2 महीने बीते थे जब एक शाम उस के सहयोगी मित्र अरुण ने संगीता को आ कर बताया, ‘‘आज हमारे बौस उमेश साहब के मुंह से बातोंबातों में एक काम की बात निकल गई, संगीता… रवि के दिल्ली लौटने की बात बन सकती है.’’

‘‘कैसे ’’ संगीता ने फौरन पूछा.

अनुंकपा के आधार पर उस की पोस्टिंग यहां हो सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं ’’ संगीता के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे.

‘‘मैं पूरी बात विस्तार से समझाता हूं. देखो, अगर रवि यह अर्जी दे कि दिल के रोगी पिता की देखभाल के लिए उस का उन के पास रहना जरूरी है तो उमेश साहब के अनुसार उस का तबादला दिल्ली किया जा सकता है.’’ ‘‘लेकिन रवि के बड़े भैयाभाभी भी तो मेरे सासससुर के पास रहते हैं. इस कारण क्या रवि की अर्जी नामंजूर नहीं हो जाएगी ’’

‘‘उन का तो अपना फ्लैट है न ’’

‘‘वह तो है.’’

‘‘अगर वे अपने फ्लैट में शिफ्ट हो जाएं तो रवि की अर्जी को नामंजूर करने का यह कारण समाप्त हो जाएगा.’’

‘‘यह बात तो ठीक है.’’

‘‘तब आप अपने जेठजेठानी को उन के फ्लैट में जाने को फटाफट राजी कर के उमेश साहब से मिलने आ जाओ,’’ ऐसी सलाह दे कर अरुण ने विदा ली. संगीता ने उसी वक्त रवि को फोन मिलाया.

‘‘तुम जा कर भैयाभाभी से मिलो, संगीता. मैं भी उन से फोन पर बात करूंगा,’’ रवि सारी बात सुन कर बहुत खुश हो उठा था. संगीता को झिझक तो बड़ी हुई पर अपने भावी फायदे की बात सोच कर वह अपनी ससुराल जाने को 15 मिनट में तैयार हो गई. रवि के बड़े भाई ने उस की सारी बात सुन कर गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘संगीता, इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है कि रवि का तबादला दिल्ली में हो जाए पर मुझे अपने फ्लैट को किराए पर मजबूरन चढ़ाना पढ़ेगा. उस की मासिक किस्त मैं उसी किराए से भर पाऊंगा.’’ रवि और संगीता के बीच फोन पर 2 दिनों तक दसियों बार बातें हुईं और अंत में उन्हें बड़े भैया के फ्लैट की किस्त रवि की पगार से चुकाने का निर्णय मजबूरन लेना पड़ा.

सप्ताह भर के अंदर बड़े भैया का परिवार अपने फ्लैट में पहुंच गया और संगीता अपना सूटकेस ले कर ससुराल लौट आई. रवि ने कूरियर से अपनी अर्जी संगीता को भिजवा दी. उसे इस अर्जी को रवि के बौस उमेश साहब तक पहुंचाना था. संगीता ने फोन कर के उन से मिलने का समय मांगा तो उन्होंने उसे रविवार की सुबह अपने घर आने को कहा. ‘‘क्या मैं आप से औफिस में नहीं मिल सकती हूं, सर ’’ संगीता इन शब्दों को बड़ी कठिनाई से अपने मुख ने निकाल पाई.

‘‘मैं तुम्हें औफिस में ज्यादा वक्त नहीं दे पाऊंगा, संगीता. मैं घर पर सारे कागजात तसल्ली से चैक कर लूंगा. मैं नहीं चाहता हूं कि कहीं कोई कमी रह जाए. यह मेरी भी दिली इच्छा है कि रवि जैसा मेहनती और विश्वसनीय इनसान वापस मेरे विभाग में लौट आए. क्या तुम्हें मेरे घर आने पर कोई ऐतराज है ’’

‘‘न… नो, सर. मैं रविवार की सुबह आप के घर आ जाऊंगी,’’ कहते हुए संगीता का पूरा शरीर ठंडे पसीने से नहा गया था. उस के साथ उमेश साहब के घर चलने के लिए हर कोई तैयार था पर संगीता सारे कागज ले कर वहां अकेली पहुंची. उन के घर में कदम रखते हुए वह शर्म के मारे खुद को जमीन में गड़ता महसूस कर रही थी. उमेश साहब की पत्नी शिखा का सामना करने की कल्पना करते ही उस का शरीर कांप उठता था. रवि के मुंबई जाने से कुछ दिन पूर्व ही वह शिखा से पहली बार मिली थी. उस मुलाकात में जो घटा था, उसे याद करते ही उस का दिल किया कि वह उलटी भाग जाए. लेकिन अपना काम कराने के लिए उसे उमेश साहब के घर की दहलीज लांघनी ही पड़ी.

अचानक उस दिन का घटना चक्र उस की आंखों के सामने घूम गया. उस दिन रवि शिखा को एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने ले जा रहा था. रवि का बैंक उस स्कूल के पास ही था. उसे बैंक में कुछ पर्सनल काम कराने थे. जितनी देर में शिखा स्कूल में इंटरव्यू देगी, उतनी देर में वह बैंक के काम करा लेगा, ऐसा सोच कर रवि कुछ जरूरी कागज लेने शिखा के साथ अपने घर आया था. संगीता उस दिन अपनी मां से मिलने गई हुई थी. वह उस वक्त लौटी जब शिखा एक गिलास ठंडा पानी पी कर उन के घर से अकेली स्कूल जा रही थी. वह शिखा को पहचानती नहीं थी, क्योंकि उमेश साहब ने कुछ हफ्ते पहले ही अपना पदभार संभाला था.

‘‘कौन हो तुम  मेरे घर में किसलिए आना हुआ ’’ संगीता ने बड़े खराब ढंग से शिखा से पूछा था.

‘‘रवि और मेरे पति एक ही औफिस में काम करते हैं. मेरा नाम शिखा है,’’ संगीता के गलत व्यवहार को नजरअंदाज करते हुए शिखा मुसकरा उठी थी.

‘मेरे घर मेें तुम्हें मेरी गैरमौजूदगी में आने की कोई जरूरत नहीं है… अपने पति को धोखा देना है तो कोई और शिकार ढूंढ़ो…मेरे पति के साथ इश्क लड़ाने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे घर आ कर तुम्हारी बेइज्जती करूंगी,’’ उसे यों अपमानित कर के संगीता अपने घर में घुस गई थी. तब उसे रोज लगता था कि रवि उस के साथ उस के गलत व्यवहार को ले कर जरूर झगड़ा करेगा पर शिखा ने रवि को उस दिन की घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं था. अब रवि की दिल्ली में बदली कराने के लिए उसे शिखा के पति की सहायता चाहिए थी. अपने गलत व्यवहार को याद कर के संगीता शिखा के सामने पड़ने से बचना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं सका.

उन के ड्राइंगरूम में कदम रखते ही संगीता का सामना शिखा से हो गया.

‘‘मैं अकारण अपने घर आए मेहमान का अपमान नहीं करती हूं. तुम बैठो, वे नहा रहे हैं,’’ उसे यह जानकारी दे कर शिखा घर के भीतर चल दी.

‘‘प्लीज, आप 1 मिनट मेरी बात सुन लीजिए,’’ संगीता ने उसे अंदर जाने से रोका.

‘‘कहो,’’ अपने होंठों पर मुसकान सजा कर शिखा उस की तरफ देखने लगी.

‘‘मैं…मैं उस दिन के अपने खराब व्यवहार के लिए क्षमा मांगती हूं,’’ संगीता को अपना गला सूखता लगा.

‘‘क्षमा तो मैं तुम्हें कर दूंगी पर पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो…यह ठीक है कि तुम मुझे नहीं जानती थीं पर अपने पति को तुम ने चरित्रहीन क्यों माना ’’ शिखा ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस दिन मुझ से बड़ी भूल हुई…वे चरित्रहीन नहीं हैं,’’ संगीता ने दबे स्वर में जवाब दिया.

‘‘मेरी पूछताछ का भी यही नतीजा निकला था. फिर तुम ने हम दोनों पर शक क्यों किया था ’’

‘‘उन दिनों मैं काफी परेशान चल रही थी…मुझे माफ कर…’’

‘‘सौरी, संगीता. तुम माफी के लायक नहीं हो. तुम्हारी उस दिन की बदतमीजी की चर्चा मैं ने आज तक किसी से नहीं की है पर अब मैं सारी बात अपने पति को जरूर बताऊंगी.’’

‘‘प्लीज, आप उन से कुछ न कहें.’’

‘‘मेरी नजरों में तुम कैसी भी सहायता पाने की पात्रता नहीं रखती हो. मुझे कई लोगों ने बताया है कि तुम्हारे खराब व्यवहार से रवि और तुम्हारे ससुराल वाले बहुत परेशान हैं. अपने किए का फल सब को भोगना ही पड़ता है, सो तुम भी भोगो. शिखा को फिर से घर के भीतरी भाग की तरफ जाने को तैयार देख संगीता ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं आप से वादा करती हूं कि मैं अपने व्यवहार को पूरी तरह बदल दूंगी…अपनी मां और बहन का कोई भी हस्तक्षेप अब मुझे अपनी विवाहित जिंदगी में स्वीकार नहीं होगा…मेंरे अकेलेपन और उदासी ने मुझे अपनी भूल का एहसास बड़ी गहराई से करा दिया है.’’

‘‘तब रवि जरूर वापस आएगा… हंसीखुशी से रहने की नई शुरुआत के लिए तुम्हें मेरी शुभकामनाएं संगीता…आज से तुम मुझे अपनी बड़ी बहन मानोगी तो मुझे बड़ी खुशी होगी.’’ Hindi Family Story

‘‘थैंक यू, दीदी,’’ भावविभोर हो इस बार संगीता उन के गले लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उमेश साहब के प्रयास से 4 दिन बाद रवि के दिल्ली तबादला होने के आदेश निकल गए. इस खबर को सुन कर संगीता अपनी सास के गले  लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उसी दिन शाम को रवि के बड़े भैया उमेश साहब का धन्यवाद प्रकट करने उन के घर काजू की बर्फी के डिब्बे के साथ पहुंचे.

‘‘अब तो सब ठीक हो गया न राजेश ’’

‘‘सब बढि़या हो गया, सर. कुछ दिनों में रवि बड़ी पोस्ट पर यहीं आ जाएगा. संगीता का व्यवहार अब सब के साथ अच्छा है. अपनी मां और बहन के साथ उस की फोन पर न के बराबर बातें होती हैं. बस, एक बात जरा ठीक नहीं है, सर.’’

‘‘कौन सी, राजेश ’’

‘‘सर, संयुक्त परिवार में मैं और मेरा परिवार बहुत खुश थे. अपने फ्लैट में हमें बड़ा अकेलापन सा महसूस होता है,’’ राजेश का स्वर उदास हो गया.

‘‘अपने छोटे भाई के वैवाहिक जीवन को खुशियों से भरने के लिए यह कीमत तुम खुशीखुशी चुका दो, राजेश. अपने फ्लैट की किस्त के नाम पर तुम रवि से हर महीने क्व10 हजार लेने कभी बंद मत करना. यह अतिरिक्त खर्चा ही संगीता के दिमाग में किराए के मकान में जाने का कीड़ा पैदा नहीं होने देगा.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. वैसे रवि से रुपए ले कर मैं नियमित रूप से बैंक में जमा कराऊंगा. भविष्य में इस मकान को तोड़ कर नए सिरे से बढि़या और ज्यादा बड़ा दोमंजिला मकान बनाने में यह पैसा काम आएगा. तब मैं अपना फ्लैट बेच दूंगा और हम दोनों भाई फिर से साथ रहने लगेंगे,’’ राजेश भावुक हो उठा. ‘‘पिछले दिनों रवि को मुंबई भेजने और तुम्हारे फ्लैट की किस्त उस से लेने की हम दोनों के बीच जो खिचड़ी पकी है, उस की भनक किसी को कभी नहीं लगनी चाहिए,’’ उमेश साहब ने उसे मुसकराते हुए आगाह किया. ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा, सर. आप मेरी तरफ से शिखा मैडम को भी धन्यवाद देना. उन्होंने रवि के विवाहित जीवन में सुधार लाने का बीड़ा न उठाया होता तो हमारा संयुक्त परिवार बिखर जाता.’’

‘‘अंत भला तो सब भला,’’ उमेश साहब की इस बात ने राजेश के चेहरे को फूल सा खिला दिया था. Hindi Family Story

Family Story : सांझा दुख

Family Story : कोरोनाकाल चल रहा है. हम सब अपनेअपने घरों में लौकडाउन का पालन करते हुए भी डरे हुए हैं. पता नहीं कब किस को क्या हो जाए. एक ही तरह की दिनचर्या निभाते हुए मन की उलझन और बढ़ती ही जा रही है. कब, कहां, और कैसे? हर मौत पर दिमाग में ये सवाल कौंध रहे हैं.

अरे, अभी उन से 10 दिनों पहले ही तो बात हुई थी और आज… विवशता, हताशा और पीड़ा का मिलाजुला रूप हम सब पर भारी है. कैसी महामारी है कि हम अपनों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं जब उन को हमारी सब से ज्यादा जरूरत है.

स्पर्श, प्यार के दो बोल और सेवा के लिए तड़पते हमारे अपने, अकेले में किस से गुहार कर रहे होंगे? तकलीफ को सांझ कर मन शांत हो जाता है. हम ऐसी डरावनी बीमारी के खौफ से घिरे हैं कि उस के पास हम बैठ भी नहीं सकते जिस से हमारा जीवनभर का नाता है.

दूर से अपनों की परेशानी देख मन तड़प जाता है और एक टीस कि काश.. ऐसा नहीं होता. हमारे अपने बिछुड़ रहे हैं और ऐसी बिछुड़न, कि हम फिर से मिलने की आस भी नहीं संजो पा रहे हैं.

मेरे दिल में यही सब बातें चल रही थीं कि मां आ कर मेरे पास खड़ी हो गईं. नम आंखें बहुतकुछ कह रही थीं. मुझे सीने से लगाते हुए बोलीं, ‘‘शरद नहीं रहा, बिट्टू. कोरोना के काल ने उस को अपनी चपेट में ले लिया.’’

मैं स्तब्ध मां का चेहरा देखती रही. खामोशी के बीच हमारे अंदर दिल चीर डालने वाला दुख सांझ हो रहा था. आंखें उमड़ रही थीं.

मां के जाते ही औंधेमुंह बिस्तर पर कटे पेड़ की तरह ढह गई मैं. आंसू हमारे सुखदुख की साथी तकिया को भिगोते रहे.

शरद भैया से मेरा खून का रिश्ता नहीं था, पर खून के रिश्तों पर हमेशा भारी रहा है यह आत्मिक रिश्ता. बचपन से ही वे हमारे लिए रोलमौडल रहे. भैया के कंधे पर बैठ हम कहांकहां की सैर कर आते थे. मैं छोटीछोटी समस्याओं पर उन के पास पहुंच, रोते हुए और अपनी फ्रौक से आंसू पोंछते हुए उन की गोद में सिर रख कर शिकायतों का पुलिंदा खोल दिया करती थी. कभी मां सा, कभी भाई सा, तो कभी सहेलियों सा बरताव करते.

वे हंसते हुऐ कहते, ‘थोड़ा रूक जा बिट्टू. जब मैं डाक्टर बन जाऊंगा, तब इन सब को इंजैक्शन लगा कर दर्द का एहसास करवाऊंगा.’

खूब हंसती मैं, और तरहतरह की ऐक्टिंग कर के बताती कि दर्द के कारण वे सब कैसे बिलबिलाएंगे. थोड़ी बड़ी हुई. उन के आने पर चाय मैं ही बनाती थी, क्योंकि उन को मेरे हाथ की बनी चाय पसंद थी.

चाय पीते हुए वे कहते, ‘चाची, बिट्टू की शादी हम इसी शहर में कराएंगे, ताकि हम सब को उस के हाथ की बनी चाय हमेशा मिलती रहे.’

बनावटी गुस्सा दिखाती हुई मैं भैया को मारने लगती. वे मुझे सीने से लगाते हुए कहते, ‘इस को कभी भी अपनेआप से दूर नहीं जाने दूंगा.’

मेरी हर समस्या का समाधान था भैया के पास. मेरे स्कूल से ले कर कालेज तक के सफर में भैया हमेशा मार्गदर्शक रहे मेरे.

एक दिन हंसते हुए मैं उन से बोली, ‘आप की अपनी कोई बहन नहीं है न, इसीलिए आप मु?ा से बहुत प्यार करते हैं.’

मु?ो आज भी याद है वह दिन. उन्हें बिलकुल भी बुरी नहीं लगी मेरी बात. उलटे, उन्होंने मेरी नाक पकड़ कर बोला था, ‘बिट्टू, तुम हर जन्म में मेरी बहन हो, और रहोगी. अपना और पराया क्या होता है? जहां प्रेम की लौ जगी, वही अपना है.’

कुछ वर्षों बाद भैया मैडिकल की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चले गए. मैं बहुत रोई थी. जैसे, मेरी दुनिया बेरंग हो गई हो. सुबह के उजाले से ले कर देररात तक उन के साथ की यादें मु?ो और उदास कर जातीं.

फोन पर जब मैं अपनी समस्याएं बताने लगती तो वे कहते, ‘इतनी समस्याओं का, बस, एक समाधान है तेरी शादी. दूल्हा आ जाएगा तेरी जिंदगी में, तब जा कर इस निरीह भाई को राहत मिलेगी.’

गुस्से से कहती मैं, ‘अच्छा, तो आप मुझ से छुटकारा चाहते हैं. इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली मैं आप को. और वैसे भी, पहले आप की शादी होगी, तब मेरी.’

भैया के डाक्टर बनते ही उन की शादी हो गई. खूब नाची थी मैं. खुशी मेरे दामन में नहीं समा रही थी.

बाद के दिनों में वे मुझे चिढ़ाते, ‘चाची, मेरी शादी में नागिन डांस के लिए तो इस को पद्मश्री अवार्ड मिलना चाहिए था.’

वक्त के साथ हम सब बदलते गए. मेरी भी शादी हो गई. जिम्मेदारियों ने पैरों में बेडि़यां डाल दीं. मां की आवाज सुन कर मैं आंसू पोंछते हुए बैठ गई.

अपनी गोद में मेरा सिर रख कर प्यार से हाथ फेरते हुए मां बोलीं, ‘‘बिट्टू, तुम्हारे अंदर एक जीव पल रहा है, वह भी तो तुम्हारे खाने का इंतजार कर रहा है.’’

पेट पर हाथ रख कर सोचने लगी मैं, ‘काश, भैया मेरी कोख में आ जाते. मैं मां बन कर उन का खूब खयाल रखती और अपने से कभी भी दूर न जाने देती.’

बहुत प्रयास करने के बाद मैं ने खुद को संयत कर भाभी को कौल किया. उन के रोने की आवाज मेरे कानों में पिघले सीसे की तरह आहत कर रही थी.

‘‘शरद बगैर मुझ से कुछ बोले चले गए, बिट्टू. मैं अब किस को प्यार करूंगी? किस के सहारे रहूंगी? चारों तरफ अंधेरा दिख रहा है? मेरे तो सिर का ताज ही बिखर गया, बिट्टू.’’

‘‘समय के सामने हम सब विवश हैं, भाभी. धैर्य रखिए. अमन का खयाल रखिए. उस पर इन दुखों का असर नहीं होना चाहिए. टूट जाएगा तो बिखरे को समेटना बहुत मुश्किल होगा, भाभी.’’

तभी अमन की आवाज ने मेरी बची हुई हिम्मत को भी तोड़ कर रख दिया, ‘‘मैं पापा के साथ खेलना चाहता हूं. पापा से मिले हम को एक महीना हो गया है बूआ. सब के पापा हैं, तो मेरे पापा हमें छोड़ कर क्यों चले गए? बताओ बूआ?’’

सांत्वना के शब्द यहीं पर खत्म हो गए थे मेरे. मैं शून्य में निहारते हुए बोली, ‘‘इस का जवाब किसी के पास भी नहीं होगा, अमन बेटा.’’

मां के हाथों में खाने की थाली दिखी, तो आंखों ने सवाल किया और जबान पूछ बैठी, ‘‘मां, पीर पराई है या अपनी है?’’

‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे,’’ गाती हुई मां वहां से चली गईं.

लेखिका – कात्यायनी दीप

Raksha Bandhan : हावी हुआ जाति का जहर

Raksha Bandhan . ‘‘मेरे सामने तो तुम उसे राधा बहन मत बोलो. मुझे तो यह गाली की तरह लगता है,’’ मालती भड़क उठी.

‘‘अगर उस ने बिना कुछ पूछे अचानक आ कर मुझे राखी बांध दी, तो इस में मेरा क्या कुसूर? मैं ने तो उसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा था,’’ मोहन बाबू तकरीबन गिड़गिड़ाते हुए बोले.

‘‘हांहां, इस में तुम्हारा क्या कुसूर? उस नीच जाति की राधा से तुम ने नहीं, तो क्या मैं ने ‘राधा बहन, राधा बहन’ कह कर नाता जोड़ा था. रिश्ता जोड़ा है, तो राखी तो वह बांधेगी ही.’’

‘‘उस का मन रखने के लिए मैं ने उस से राखी बंधवा भी ली, तो ऐसा कौन सा भूचाल आ गया, जो तुम इतना बिगड़ रही हो?’’

‘‘उंगली पकड़तेपकड़ते ही हाथ पकड़ते हैं ये लोग. आज राखी बांधी है, तो कल को भाईदूज पर खाना खाने भी बुलाएगी. तुम को तो जाना भी पड़ेगा. आखिर रिश्ता जो जोड़ा है. मगर, मैं तो ऐसे रिश्तों को निभा नहीं पाऊंगी,’’ मालती ने अपने मन का सारा जहर उगल दिया.

राधा अभी राखी बांध कर गई ही थी कि उसे याद आया कि वह मोहन बाबू को मिठाई खिलाना भूल गई थी.

अपने घर से मिठाई ला कर वे खुशीखुशी मोहन बाबू के घर आ रही थी, मगर मोहन बाबू और उन की बीवी मालती की आपस में हो रही बहस सुन कर उस के पैर ठिठक कर आंगन में ही रुक गए.

जब राधा ने उन की पूरी बात सुनी, तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसे लगा जैसे उस ने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. वह चुपचाप उलटे पैर लौट गई. उस की आंखों में आंसू छलक आए थे.

मोहन बाबू सरकारी स्कूल में टीचर थे. तकरीबन 6 महीने पहले ही वे इस गांव में तबादला हो कर आए थे. यह गांव शहर से काफी दूर था, इसलिए मजबूरन उन्होंने यहीं पर मकान किराए पर ले लिया.

मोहन बाबू बहुत ही मिलनसार और अच्छे इनसान थे. वे बहुत जल्द ही गांव वालों से घुलमिल गए. गांव का हर आदमी उन की इज्जत करता था, क्योंकि वे छुआछूत, जातपांत वगैरह दकियानूसी बातों को नहीं मानते थे.

राधा थी तो विधवा मगर मजदूरी कर के वह अपने बेटे को पढ़ाना चाहती थी

मोहन बाबू के मकान से कुछ ही दूरी पर राधा एक झोंपड़ीनुमा मकान में रहती थी. उस का लड़का मोहन बाबू के स्कूल में पढ़ता था.

राधा थी तो विधवा, मगर मजदूरी कर के वह अपने बेटे को पढ़ाना चाहती थी. उसी पर उस की जिंदगी की सारी उम्मीदें टिकी हुई थीं, इसलिए वह समयसमय पर स्कूल आ कर उस की पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछती रहती. उस के बेटे के चलते ही मोहन बाबू की उस से जानपहचान थी.

मोहन बाबू भी राधा के बेटे को चाहते थे, क्योंकि वह पढ़नेलिखने में तेज था, इसलिए वे खुद उस के बेटे पर ज्यादा ध्यान देते थे.

राधा जब भी स्कूल आती, उन से ही मिलती और अपने बेटे के बारे में ढेर बातें करती.

मोहन बाबू राधा को राधा बहन कह कर ही बात करते थे. उन के लिए तो यह केवल संबोधन ही था, मगर राधा तो सचमुच ही उन्हें अपना भाई समझने लगी थी. तभी तो रक्षाबंधन के दिन बिना कुछ सोचेसमझे उस ने उन्हें राखी बांध दी थी.

राधा को अपनी गलती का एहसास तब हुआ, जब उस ने उन की और मालती की आपस में हो रही बातें सुनीं. उस के बाद उस ने मोहन बाबू के घर जाना ही बंद कर दिया.

एक बार 2-3 दिन तक मोहन बाबू स्कूल नहीं आए, तो राधा को चिंता होने लगी. मोहन बाबू ने चाहे उसे ऊपरी तौर पर बहन माना था, मगर उस के लिए तो वह रिश्ता दिल की गहराइयों तक पैठ बना चुका था. लगातार 2-3 दिनों तक उन का स्कूल न आना राधा के लिए चिंता की बात बन गया.

आखिरकार दिल के आगे मजबूर हो कर राधा मोहन बाबू के घर जा पहुंची. घर का दरवाजा खुला हुआ था. उस ने बाहर से ही दोचार बार आवाज लगाई, मगर जब काफी देर तक अंदर से कोई जवाब न आया, तो वह किसी डर से सिहर उठी.

मोहन बाबू पलंग पर चुपचाप लेटे थे. राधा ने पलंग के पास जा कर आवाज लगाई, ‘‘भैया… भैया…’’ मगर उन्होंने कोई जवाब न दिया. वह घबरा गई और उस ने उन्हें झकझोर दिया. मगर उन्होंने तब भी कोई जवाब नहीं दिया.

उस ने मालती को ढूंढ़ा, मगर वह वहां नहीं थी. अस्पताल वहां से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर शहर में था, इसलिए आननफानन उस ने किसी तरह एक ट्रैक्टर वाले को और कुछ गांव वालों को तैयार किया, फिर वह उन्हें अस्पताल ले गई.

डाक्टर ने मोहन बाबू को चैक कर तुरंत भरती करते हुए कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप लोग इन्हें समय पर ले आए, वरना हम कुछ नहीं कर पाते. यह बुखार बहुत जल्दी कंट्रोल से बाहर हो जाता है.’’

‘‘अब तो मोहन भैया ठीक हो जाएंगे न?’’ राधा ने आंखों में आंसू लाते हुए डाक्टर से पूछा.

‘‘जब तक इन्हें होश नहीं आ जाता, हम कुछ नहीं कह सकते. मगर मेरा मन इतना जरूर कहता है कि आप जैसी बहन के होते हुए इन्हें कुछ नहीं हो सकता,’’ डाक्टर ने मुसकराते हुए कहा.

मोहन बाबू पलंग पर चुपचाप लेटे थे. उन की दवादारू लगातार चल रही थी, मगर अभी तक उन्हें होश नहीं आया था. राधा उन के पलंग के पास चुपचाप बैठी थी. रहरह कर न जाने क्यों उस की आंखों से आंसू छलक जाते थे.

तकरीबन 12 घंटे बाद मोहन बाबू को होश आया और उन्होंने आंखें खोलीं.

मोहन बाबू को होश में आया देख राधा की आंखें खुशी से चमक उठीं. बाकी सभी गांव वाले तो उन्हें भरती करवा कर चले गए थे. बस, राधा ही अकेली उन के पास देखरेख के लिए थी. हां, कुछ लोग उन का हालचाल पूछने के लिए जरूर आतेजाते थे, मगर काफी कम, क्योंकि लोगों को राधा का वहां होना खलता था.

दवाएं देने व मोहन बाबू की देखरेख की जिम्मेदारी राधा बखूबी निभा रही थी. समय पर दवाएं देना वह कभी नहीं चूकती थी.

मोहन बाबू के मैले पसीने से सने कपड़े धोने में राधा को जरा भी संकोच न होता. उसे खुद के भोजन का तो ध्यान न रहता, मगर उन्हें डाक्टर की सलाह के मुताबिक भोजन ला कर जरूर खिलाती.

मालती मायके गई हुई थी. उसे टैलीग्राम तो कर दिया था, लेकिन उसे आने में 3 दिन लग गए. तीसरे दिन वह घर आ पहुंची.

जब मालती अस्पताल आई, तो राधा मोहन बाबू के पलंग के पास बैठी थी. मोहन बाबू खाना खा रहे थे. उसे देखते ही उन के हाथ मानो थम से गए.

मालती को देखते ही राधा उठ खड़ी हुई और उस के पास आ कर बोली, ‘‘भाभी, अब आप अपनी जिम्मेदारी निभाइए.’’

राधा जाने के लिए पलटी, मगर फिर वह एक पल के लिए रुक कर बोली, ‘‘और हां, मैं ने इन्हें अपने घर का खाना नहीं खिलाया है. होटल से ला कर खिलाना तो मेरी मजबूरी थी. हो सके, तो इस के लिए मुझे माफ कर देना.’’

मालती बस हैरान सी खड़ी हो कर उसे जाते हुए देखती रह गई, मगर कुछ बोल नहीं पाई.

राधा के इन शब्दों को सुन कर मालती क्या समझ चुकी थी

राधा के इन शब्दों को सुन कर मालती समझ चुकी थी कि शायद राधा रक्षाबंधन पर उस के और मोहन बाबू के बीच हुए झगड़े को सुन चुकी है.

कुछ ही दिनों में मोहन बाबू ठीक हो गए और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई. मगर राधा उन के घर नहीं आई. बस, वह लोगों से ही उन का हालचाल मालूम कर लिया करती थी.

एक दिन अचानक मालती राधा के घर जा पहुंची. राधा कुछ चौंक सी गई.

‘‘बैठने के लिए नहीं कहोगी राधा बहन?’’ मालती ने ही चुप्पी तोड़ी.

‘‘हांहां, बैठो भाभी,’’ राधा ने हिचकिचाते हुए कहा और चारपाई बिछा दी.

‘‘कल भाईदूज है. हमारे यहां तो बहनें इस दिन अपने घर भैयाभाभी को भोजन के लिए बुलाती हैं, क्या तुम्हारे यहां ऐसा रिवाज नहीं है?’’

‘‘है तो, मगर…?’’

‘‘अगरमगर कुछ नहीं. हमें और शर्मिंदा मत करो. हम दोनों कल तुम्हारे यहां खाना खाने आएंगे,’’ मालती ने कुछ शर्मिंदा हो कर कहा.

राधा की आंखें खुशी से नम हो गईं. उसे आज लग रहा था कि मोहन बाबू को भाई बना कर उस ने कोई गलती नहीं की. Raksha Bandhan

Social Story : बूआजी का भूत-क्या थी इस कहानी की असलियत

Social Story. कैलाश की मां मर गई थीं. वे 75 साल की थीं. कैलाश ने अपने मामा के लड़कों के साथ रिश्तेदारों को भी खबर पहुंचा दी. तकरीबन सभी रिश्तेदार और समाज के लोग कैलाश के इस दुखद समय पर हाजिर हो गए. फिर कैलाश ने अपनी मां की अर्थी का इंतजाम कर दाह संस्कार भी कर दिया.

उसी दिन शाम को ही नातेरिश्तेदारों के साथ बैठ कर कैलाश मृत्युभोज का दिन व समय तय करने के लिए चर्चा करने लगा, तभी कैलाश के मामा के लड़के मोहन ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘भाई, अभी मृत्युभोज की तारीख तय मत करो… मैं बूआजी की गौरनी करना चाहता हूं. उस के बाद तुम मृत्युभोज कर लेना.’’

कैलाश ने पूछा, ‘‘यह गौरनी क्या होती है?’’

मोहन ने कैलाश को हैरानी से देखा, ‘‘गौरनी नहीं जानते तुम… यह गौने का छोटा रूप है,’’ फिर वह समझाने लगा, ‘‘मैं बूआजी को इज्जत से उन के मायके यानी अपने घर ले जाऊंगा. बाकायदा उन का ट्रेन, बस वगैरह का टिकट भी लूंगा. जो वे खाएंगी खिलाऊंगा, फिर समाज के लोगों को न्योता दे कर अच्छेअच्छे पकवान बना कर भोजन कराऊंगा.

‘‘उस के बाद बूआजी को नए कपड़ों और सिंगार के सामान के साथ इज्जत से तुम्हारे घर विदा कर दूंगा. भाई, फिर तुम मृत्युभोज की तारीख तय कर लेना.

‘‘पर, मां तो मर गई हैं. उन की देह को हम ने जला भी दिया है. कैसे ले जाओगे उन्हें?’’ कैलाश ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं बूआजी के पुराने कपड़ों को बूआजी समझ कर ले जाऊंगा… अब मेरी ट्रेन का समय हो रहा है. चल, जल्दी से बूआजी को मेरे साथ विदा कर दे.’’

कैलाश हैरान हो कर मोहन का मुंह ताकने लगा, तो मोहन ने उसे झिड़का, ‘‘मूर्ख, मेरा मुंह क्या ताक रहा है? जा, बूआजी के पुराने कपड़े ले आ.’’

कैलाश घर के भीतर जा कर थोड़ी देर में अपनी मां के पुराने कपड़े एक पौलीथिन बैग में रख कर ले आया. मोहन उसे देख कर चीख पड़ा, ‘‘अबे, बूआजी का दम घुट जाएगा. जल्दी पौलीथिन से बाहर निकाल.’’

कैलाश ने घबरा कर फौरन कपड़े बाहर निकाले और एक गहरी लंबी सांस ली, मानो अपनी मां को दम घुटने से बचा लिया हो, फिर मायूस हो कर उस ने कपड़े मोहन को थमा दिए. मोहन बोला, ‘‘अब बूआजी से माफी मांग और प्रणाम कर के बोल कि मां घर जल्दी आ जाना.’’

लाचार कैलाश कपड़ों से माफी मांग कर बोला, ‘‘मां, घर जल्दी आ जाना.’’ मोहन ने कपड़ों से कहा, ‘‘चलो बूआजी अपने मायके. वहां भाईभतीजे आप का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.’’ मोहन अपनी पत्नी शारदा को साथ ले रिकशा स्टैंड पर आ गया. थोड़ी देर में एक रिकशा उस के पास आ कर रुका.

‘‘कहां जाओगे?’’ ‘‘रेलवे स्टेशन. तुम 3 सवारियों का कितना पैसा लोगे?’’

रिकशे वाले ने इधरउधर देख कर पूछा, ‘‘तीसरा कौन है?’’ ‘‘देख नहीं रहे हो. मेरे हाथ में बूआजी हैं,’’ मोहन ने जवाब दिया.

रिकशे वाले ने गौर से देख कर कहा, ‘‘ये तो किसी औरत के पुराने कपड़े हैं.’’ ‘‘इन्हें कपड़े मत कहो.’’

मोहन ने नाराजगी जाहिर की, ‘‘ये मेरी बूआजी हैं. इन का अभीअभी कुछ देर पहले देहांत हो गया है.

‘‘पर, तुम चिंता मत करो, मैं बूआजी का पूरा किराया दूंगा.’’

यह सुन कर रिकशे वाला डर कर कांपने लगा, क्योंकि मोहन के चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और माथे पर लगा तिलक तांत्रिक होने का संकेत दे रहे थे.

‘‘भैया, आप की बूआजी को बिठा कर ले जाना मेरे बस की बात नहीं है,’’ रिकशे वाला हाथ जोड़ते हुए बोला.

इतना कह कर वह रिकशा ऐसे ले कर भागा, जैसे बूआजी का भूत उस के पीछे पड़ गया हो. मोहन और उस की पत्नी उस को रोकते रह गए, पर वह नहीं रुका.

थोड़ी देर बाद एक सवारी टैंपो वहां आ कर रुका. निराश मोहन और शारदा की आंखों में चमक लौट आई. सवारी टैंपो में पहले से ही 3-4 सवारियां बैठी थीं और 4-5 सवारियों के बैठने की जगह थी. मोहन शारदा के साथ बैठ गया और पास ही खाली सीट पर बूआजी के कपड़े रख कर बोला, ‘‘बूआजी, अब आप आराम से यहां बैठिए. आप को कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

आसपास बैठी सवारियां उस की बात सुन कर हैरत से उसे और कपड़ों को देखने लगीं.

‘‘अजीब आदमी है, कपड़ों से बात कर रहा है,’’ टैंपो का कंडक्टर बोला. ‘‘भैया, खाली सीट से कपड़े उठा लो और उधर सरक कर बैठो. मुझे और भी सवारियां लेनी हैं,’’ कंडक्टर बोला.

मोहन ने तैश में आ कर जवाब दिया, ‘‘तमीज से बोलो… वे कपड़े नहीं, बूआजी हैं और उन का किराया मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘कहां हैं बूआजी?’’ कंडक्टर ने हैरानी से पूछा. ‘‘वे मर गई हैं, लेकिन उन के कपड़े ही बूआजी हैं.’’

‘‘तो क्या बूआजी के भूत को साथ ले कर चल रहा है?’’

परेशान मोहन तैश में बोला, ‘‘यही समझ ले.’’ आसपास बैठी सवारियां उन की बातें सुन कर खौफ से भर गईं और सभी एकएक कर के टैंपो से उतर गईं.

कंडक्टर ने देखा कि सवारियां डर कर उतरी हैं, तो वह भी डर गया. हालात से समझौता करते हुए कंडक्टर हाथ जोड़ कर मोहन से बोला, ‘‘भाई, तू मुझ से किराया ले ले और किसी दूसरी गाड़ी से स्टेशन चला जा, पर अपनी बूआजी को नीचे उतार ले. मेरी सारी सवारियां डर कर भाग रही हैं.’’

मोहन ने उसे समझाने की कोशिश की, पर सवारी और कंडक्टर उस की बात सुनने को तैयार नहीं हुए. मोहन थकहार कर कपड़े उठा कर टैंपो से उतर गया.

‘‘ऐसे तो हम किसी गाड़ी में नहीं बैठ पाएंगे,’’ शारदा ने कहा, ‘‘अब किसी रिकशे वाले को यह मत बताओ कि बूआजी हमारे साथ हैं.’’

‘‘बात तो तुम ठीक कह रही हो, पर इस उम्र में बूआजी को बिना भाड़ा दिए ले जाना सरासर बेईमानी है. उन की आत्मा हमें कोसेगी.’’

‘‘चलो, फिर पैदल ही चलते हैं.’’ ‘‘ठीक है,’’ कह कर मोहन और शारदा पैदल चल दिए.

थोड़ी दूर चलने के बाद शारदा बोली, ‘‘सुनोजी, बूआजी थक गई होंगी, क्यों न कहीं बैठ कर हम थोड़ा आराम कर लें?’’

‘‘ऐसे कैसे थकेंगी बूआजी. उन को तो हम उठाए हैं.’’ ‘‘मेरा मतलब है कि बूआजी को थोड़ा चायनाश्ता करवा दो, बेचारी कब से भूखीप्यासी हमारे साथ चल रही हैं.’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो. सवारी गाड़ी के चक्कर में बूआजी की भूखप्यास का मुझे जरा भी खयाल नहीं आया.’’

एक होटल में जा कर मोहन ने एक खाली कुरसी पर बूआजी के कपड़े रखे और और्डर दिया, ‘‘भैया, 3 गिलास पानी और 3 जगह 2-2 समोसे और चाय देना.’’

नौकर ने पानी, चाय, समोसे टेबल पर रख कर पूछा, ‘‘तीसरा कौन है साहब?’’

मोहन तैश में आ कर बोला, ‘‘इन कपड़ों के सामने सामान रख दे. तुझे बूआजी नजर नहीं आएंगी.’’ नौकर ने मोहन और कपड़ों को अजीब नजरों से देखा और चुपचाप नहाने चला गया. नाश्ता और पानी का गिलास कपड़ों के सामने सरका कर मोहन बोला, ‘‘बूआजी, समोसे खा कर पानी पी लो.’’

नौकर ने दूर से मोहन की बुदबुदाहट सुनी, पर उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह डर कर सीधा अपने मालिक के पास पहुंचा.

थोड़ी देर बाद होटल मालिक मोहन के सामने जा खड़ा हुआ और बोला, ‘‘यहां क्या यह तांत्रिक पूजा चल रही है? यह होटल है, तुम्हारी तंत्र साधना की जगह नहीं. चलो, उठो यहां से.’’

मोहन हड़बड़ा कर सफाई देने लगा, ‘‘आप गलत समझ रहे हो, दरअसल…’’

मालिक झल्लाया, ‘‘मुझे मूर्ख बना रहे हो… कपड़े को समोसा खिला रहे हो, पानी पिला रहे हो और ऊपर से मंत्र बुदबुदा रहे हो. मेरे नौकर ने तुम्हें दूर से देखा है.’’

तभी नौकर ने मालिक की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘मालिक, जब मैं ने तीसरी प्लेट के बारे में पूछा, तो यह आदमी बोला कि कपड़ों के सामने रख दे. यह प्लेट बुआजी की है, जो तुझे नजर नहीं आएंगी.’’

मोहन के कुछ बोलने से पहले ही मालिक बोला, ‘‘चलो, उठो यहां से. नाश्ते के पैसे भी मत दो. चलो, होटल के बाहर जाओ.’’ मोहन और शारदा बेइज्जत हो कर होटल के बाहर आ कर रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए.

रेलवे स्टेशन पहुंच कर मोहन 3 टिकट ले कर ट्रेन में जा बैठा और खाली सीट पर कपड़े रख दिए. धीरेधीरे डब्बा मुसाफिरों से भरने लगा. एक मुसाफिर ने मोहन से कहा, ‘‘भैया, कपड़े उठाओ, उधर सरको और हमें भी बैठने की जगह दो.’’ मोहन बोला, ‘‘बूआजी बैठी हैं.’’

उस मुसाफिर ने सोचा कि शायद इस की बूआजी बाथरूम वगैरह कहीं गई होंगी. वह आगे बढ़ गया, तभी दूसरे मुसाफिर ने कपड़े के लिए मोहन को टोका, तो मोहन ने वही जवाब दिया, ‘‘बूआजी बैठी हैं.’’

वह आदमी खीज कर बड़बड़ाने लगा, ‘‘हमारा देश भी अजीब है. बस सीट पर कपड़ा या रूमाल रख दो, तो आरक्षण हो जाता है.’’

डब्बा जब खचाखच भर गया और ट्रेन चलने को हुई, तो पास ही खड़े एक मुसाफिर ने पूछा, ‘‘भैया, तेरी बूआजी कब आएंगी? ‘‘आएंगी क्या…? बूआजी तो यहीं बैठी हैं,’’ मोहन बोला.

‘‘कहां बैठी हैं? हमें तो नजर नहीं आ रही हैं.’’ ‘‘कपड़े ही बूआजी हैं.’’

‘‘तो भाई ऐसा कर, अपनी बूआजी को गोद में बिठा ले,’’ उस आदमी ने तैश में आ कर कहा, ‘‘और हमें बैठने दे.’’

मोहन जिद पर अड़ गया, ‘‘नहीं उठाऊंगा. मैं ने बूआजी का टिकट लिया है,’’ मोहन की उस मुसाफिर से जम कर बहस होने लगी.

तभी वहां टिकट कलक्टर यानी टीसी आ गया. उस ने मोहन से कपड़े उठाने को कहा, तो मोहन ने जवाब दिया, ‘‘नहीं उठाऊंगा. मैं ने बूआजी का टिकट लिया है.’’

टीसी ने टिकट देख कर गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘टिकट बराबर है.’’ मोहन के चेहरे पर जीत भरी मुसकान आ गई.

टीसी ने गुजारिश करते हुए मोहन से कहा, ‘‘देखो भाई, आप सही हैं, टिकट सही है, पर दूसरे मुसाफिरों को सुविधा मिले, इसलिए अपनी बूआजी के कपड़े गोद में रख लो.’’

मोहन टीसी की बात ठुकराते हुए अपनी जिद पर अड़ा रहा, तभी टीसी के दिमाग में कुछ आया. वह मोहन से बोला, ‘‘जरा फिर से टिकट दिखाना.’’

मोहन ने उसे टिकट दे दिया. टीसी ने टिकट देख कर पूछा, ‘‘आप की बूआजी सीनियर सिटीजन हैं.’’

‘‘जी हां, मैं ने टिकट भी सीनियर सिटीजन का ही लिया है,’’ मोहन ने गर्व से जवाब दिया.

‘‘आप की बूआजी नजर नहीं आ रही हैं. मैं कैसे अंदाजा लगा लूं कि वे सीनियर सिटीजन हैं. कोई पहचानपत्र या आधारकार्ड वगैरह है?’’

अब तो मोहन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. वह हिचकिचाते हुए बोला, ‘‘जी, वह तो नहीं है.’’

टीसी ने मन ही मन सोचा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. ‘‘पहचानपत्र नहीं है. चलो, फाइन के साथ दोगुना किराया दे दो या इन कपड़ों को बूआजी मत कहो. अच्छी तरह समझ लो कि ये कपड़े हैं और चुपचाप उठा लो. अंधविश्वास छोड़ो, वरना जुर्माने के साथ दोगुना किराया भरो.’’

थकहार कर मोहन ने कपड़े उठा लिए, तो एक मुसाफिर उस सीट पर जा कर बैठ गया.

टीसी के जाते ही दूसरे मुसाफिर अंधविश्वास के खिलाफ चर्चा में मशगूल हो गए और इधर मोहन चुपचाप नजरें झुकाए शर्मिंदा होते हुए न चाहते हुए भी उन की बातें सुनता रहा.  Social Story

Short Story in Hindi : अलाव की आंच

Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.

सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.

इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.

उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.

सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.

एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’

सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’

चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’

तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.

सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’

सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार

में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.

Hindi Story : क्या क्या ख्वाब दिखाए: मेरी पत्नी छंदा

Hindi Story. ख्वाब दिखाना तो महिलाओं का शगल होता है. मेरी पत्नी छंदा को भी सपने दिखाने का शौक है. मैं ने एक दिन छंदा से कहा, ‘‘तुम प्लीज मुझे सपने मत दिखाया करो. यह सब काम तो प्रेमिका का होता है.’’

वह गार्डन में मिलती है. मुसकराती है, जूड़े में लगे फूल को संवारती है, फिर धीरे से कहती है, ‘‘हमारी शादी हो जाएगी न हैंडसम, तब मैं डैड से कह कर दफ्तर में पीए बनवा दूंगी. कार दिलवा दूंगी फिर हम हनीमून के लिए बैंकाक, सिंगापुर जाएंगे. बड़ा मजा आएगा न.’’

प्रेमी ख्वाब के समुद्र में गोता लगाने लगता है. बाद में पता चलता है कि ऐसे ख्वाब के चक्कर उस ने कई पे्रमियों के साथ चलाए हैं. सब को पतंग समझ कर सपनों के आसमान पर जी भर कर उड़ाया है. अपनी जमीन छोड़ चुके प्रेमी हवा में उड़ते रहे और वे अब जमीन के रहे न आसमान के, त्रिशंकु बन कर अधर में लटकते रहे.

मैं ने कहा, ‘‘क्षमा करना देवी, मैं शादीशुदा हूं, घर में सपने दिखाने के लिए पत्नी है. वह रातदिन सपने दिखाती रहती है.’’

प्रेमिका ठहाका मार कर हंसते हुए बोली, ‘‘पत्नी व सपने? अच्छा मजाक कर लेते हो. सपने दिखाना प्रेमिका को ही शोभा देता है. पत्नी तो बेचारी चूल्हाचौका,  झाड़ूपोंछा, बर्तनों की सफाई में, बच्चों की चिल्लपों में उलझी रहती है. उस के पास न तो सोने की फुरसत होती है न सपने देखने का समय बचता है. एक पल पति से बात करने के लिए तरस जाती है बेचारी. घरगृहस्थी का चक्कर होता ही ऐसा है. पत्नी तो ब्लाटिंगपेपर बन कर रह जाती है जहां सारे सपने एकएक कर सोख लिए जाते हैं.’’

इस के बाद प्रेमिका की खिल- खिलाहट काफी देर तक मेरे कान में गूंजती रही. मैं मन ही मन एक फिल्मी गीत गुनगुनाने लगा, ‘‘रात ने क्याक्या ख्वाब दिखाए…’’

सात फेरों के समय पत्नी का हर फेरा किसी रंगीन ख्वाब से कम नहीं होता. पहले फेरे में छंदा ने ख्वाब का पहला फंदा डालते हुए कहा था, ‘‘डार्लिंग, मैं वचन देती हूं कि मेरी ओर से तुम्हें किसी प्रकार की शिकायत नहीं होगी.’’

मैं ने कहा था, ‘‘थैंक्स…’’

दूसरा फेरा लेते हुए वह बोली थी, ‘‘मैं तुम्हें वह सब सुख दूंगी जो हर पति चाहता है.’’

मैं ने प्रसन्न मुद्रा में कहा, ‘‘ख्वाब अच्छा है. बुनती जाओ.’’

वह तुरंत बोली, ‘‘हम अपने बच्चों को जापान पढ़ने भेजेंगे.’’

ख्वाबों के आकाश से वह तारे तोड़ने लगी. तब मेरा पति धर्म जाग गया.

मैं ने पूछा, ‘‘ठंडा पीओगी? सपने बुनने में तुम्हें राहत मिलेगी.’’

‘‘आप ऐसा कैसे बोल रहे हैं. मैं तो अपनी गृहस्थी की नींव मजबूत करने के लिए अपनी कोमल भावनाएं जाहिर कर रही थी. तुम्हारी पत्नी बन रही हूं. खाना बनाऊंगी भी और पेट भर तुम्हें खिलाऊंगी भी. तुम तो जानते ही होगे कि पत्नी अपने पति के दिल पर शासन करने के लिए उस के पेट से ही रास्ता बनाती है.’’

छंदा नारी रहस्य बताती जा रही थी.

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जो पत्नी स्वादिष्ठ भोजन बनाना जानती है उस का पति हमेशा उस के आसपास मंडराता रहता है, फुदकता रहता है. उन के बीच सदैव प्रेम बना रहता है. प्यार कभी मुरझाता नहीं.’’

छंदा सप्तपदी की एकएक शपथ में ख्वाबों का उल्लेख करती रही, जिस में कम खर्च, सहनशीलता, आपसी सहयोग ‘…सुख मेरा ले ले मैं दुख तेरा ले लूं’ टाइप के फिल्मी गीत के मुखड़े शामिल थे.

ऐसी बातें कर जो सपने छंदा ने मुझे दिखाए तब मैं ने अपने भाग्य को सराहा था. अपने को दुनिया का सब से भाग्यशाली पति समझा था, जिसे ऐसी सुशील, दूरदर्शी पत्नी मिली थी.

 

गृहस्थी के विषय में मैं निश्ंिचत था. ख्वाबगाह में आराम से लेटेलेटे चैन की बांसुरी बजाता रहा. तब मुझे क्या पता था कि छंदा ने अभी तो सिर्फ मेरी उंगली पकड़ी है, वह धीरेधीरे पहुंचा पकड़ने की गुप्त तैयारी कर रही है.

छंदा ने कहा, ‘‘सुनो, मिसेज चोपड़ा ने बसंत विहार में 45 लाख का फ्लैट लिया है. क्यों न हम भी एक फ्लैट वहां बुक करा लें. आप का ख्वाब पूरा हो जाएगा.’’

मेरे कान खड़े हो गए. एक पल को मुझे लगा कि मेरा ख्वाब टूटने से कहीं मेरा ब्लडप्रेशर न बढ़ जाए. गंभीर हो कर मैं ने कहा, ‘‘प्रिय छंदा, मध्यवर्गीय परिवार के सपने भी छोटेछोटे होते हैं. बड़ेबड़े सपने देखना हमें शोभा नहीं देता. इन के टूटने पर हम डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं. ख्वाब तो शुद्ध घी की तरह होता है जिसे हर कोई पचा नहीं पाता. अपना यह छोटा सा मकान क्या बुरा है. सिर पर बस, छत होनी चाहिए. रातोंरात तुम्हारे लखपति बनने के ख्वाब ने ही हमें शेयरमार्केट के आकाश से पटक कर जमीन दिखला दी. तब तुम ने इस हादसे को सहजता से लिया था.’’

‘‘ऐसी करवटें तो शेयर बाजार का ऊंट बदलता रहता है. आज घाटे में हैं कल फिर लाभ में आ जाएंगे. सब दिन एक जैसे नहीं होते,’’ कहते हुए वह मुझे फिर से अच्छे दिन आने के ख्वाब दिखाने लगी.

मैं जानता हूं कि बीवी के ख्वाब के पीछे उस की महत्त्वाकांक्षी भावनाएं ही हैं. मैं ने विवाह के समय ली गई शपथ याद दिलाते हुए कहा, ‘‘तुम सभी सुख मुझे दोगी जो हर पति चाहता है.’’ मेरे द्विअर्थी संवाद सुन कर वह ‘धत’ कहते हुए शरमा गई.

मेरी स्थिति ‘खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है’ की तरह हो गई. मैं भी पत्नी के साथ रहतेरहते रातदिन ख्वाब देखने लगा हूं. हम शाम को साथसाथ ख्वाब बुनते हैं. ख्वाब देखना आज देश की पहली जरूरत है. ख्वाब ही तो हमें आगे बढ़ाते हैं. पहले जब मैं ख्वाब नहीं देखता था तब रक्तचाप, मधुमेह बीमारी का शिकार था. अब ख्वाब साकार करने के लिए नईनई योजनाएं बना रहे हैं. इसी अनुसार अर्थात चादर के अनुसार पैर पसार रहे हैं. आशा का संचार मन में हो रहा है. छंदा अब पत्नी के रूप में प्रेमिका नजर आने लगी है. नएनए ख्वाबों की जननी है वह, उसे मैं अब ख्वाबों की मलिका कहने लगा हूं. Hindi Story

Hindi Story : बरसाती नदी

Hindi Story. वह एक बरसाती नदी थी, जो 2 गांवों के बीच बहती थी. नदी के उत्तरी किनारे पर एक लड़की कपड़े धोने के लिए आती थी.

वह लड़की गोरीचिट्टी, गोल चेहरे और बड़ीबड़ी आंखों वाली थी. उस का चेहरा हमेशा हंसतामुसकराता लगता.

नदी के दक्षिणी किनारे पर एक लड़का गायभैंसें चराने आता था. एक दिन नदी के उत्तरी किनारे पर वह लड़की कपड़े धो रही थी.

लड़का अपनी भैंसों को चरातेचराते नदी के किनारे तक आ पहुंचा था. जब उस ने लड़की को देखा, तो अचकचा कर रुक गया.

उस ने गौर से लड़की को एक बार और देखा, फिर चारों तरफ इस अंदाज में घूमा कि कोई देख तो नहीं रहा.

लड़के ने इतमीनान से गहरी सांस ली. आसपास कोई नहीं था. वह वहीं बैठ कर उस लड़की को ताकता रहा.

अब तो यह सिलसिला चल पड़ा. वे दोनों रोज नदी पर आने लगे. उन दोनों की नजरों ने बहुतकुछ कह लिया था, अब जबान की बारी थी. पहल कौन करता? आखिर लड़के ने हिम्मत दिखाई और एक दिन लड़की से पूछा, ‘‘क्या, तुम उतरपाड़ा में रहती हो?’’

लड़की मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, पर तुम्हें क्या? तुम तो अहिरपाड़ा में रहते हो न?’’

‘‘हां, लेकिन तुम कैसे जानती हो?’’ लड़के ने जानना चाहा.

‘‘तुम्हारी तरफ वही तो पहला गांव है. क्या मैं इतना भी नहीं समझती?’’ लड़की बोली.

यह सुन कर लड़का झेंप गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘मैं तुम से बात कर रहा हूं… तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?’’

‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है?’’ लड़की बोली.

उस लड़के ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘नाम का क्या करोगे?’’ लड़की ने सवाल का जवाब सवाल से दिया.

लड़का शायद उतना चालाक नहीं था. वह बेवकूफ की तरह लड़की को ताकता रहा. तब तक लड़की कपड़े धो चुकी थी. वह उठ खड़ी हुई और धुले कपड़ों की गठरी उठाते हुए बोली, ‘‘बुद्धू कहीं के… लड़की से बात करने में इतनी शर्म आती है, तो जा कर गायभैंसें चराओ. मेरा नाम पूनम है और तुम अपना नाम बताना चाहो तो बता दो, वरना मैं जाती हूं.’’

उस लड़के ने हिम्मत जुटाई और लड़खड़ाती आवाज में बोला, ‘‘रंजन.’’

लड़की ने सुना, कनखियों से उस की तरफ देखा और एक कटीली मुसकराहट बिखेर कर अपने गांव की तरफ बढ़ गई.

नदी सूख चुकी थी. दोनों तरफ की दूरियां भी खत्म हो चुकी थीं. अब वे दोनों नदी पार कर एकदूसरे की तरफ आ जाते और ढेर सारी बातें करते.

उस नदी के दक्षिणी किनारे पर बरगद का पेड़ था. लड़का उधर से ही आता था. वे दोनों ज्यादातर उसी पेड़ के नीचे मिलते थे.

लड़के ने लाख कोशिश की, पर लड़की ने अपना जिस्म उस को नहीं सौंपा. वह बस यही कहती, ‘‘शादी के बाद…’’

‘‘पर हमारी शादी होगी कैसे?’’ लड़का पूछता. ‘‘जैसे हम ने प्यार किया है,’’ वह मुसकरा कर कहती.

‘‘यानी…’’ लड़का समझा नहीं पाता और अचकचा कर उस की तरफ देखता.

लड़का परेशान हो कर पूछता, ‘‘मैं यादव, तुम लोध. हैं तो हम दोनों पिछड़ी जाति के, पर क्या हमारे परिवार वाले मानेंगे? कैसे होगी हमारी शादी?’’

‘‘होगी…’’ वह शांत भाव से कहती, ‘‘गांव में तो नहीं होगी, पर अगर तुम में हिम्मत है, तो हम दिल्ली चलते हैं.’’ ‘‘क्या ऐसा हो सकता है?’’ लड़के ने झिझकता  हुए पूछा.

वह अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. लाड़प्यार में वह पढ़ा नहीं. बैल का बैल रह गया.

लड़के के पिता का दूध का कारोबार था. वे सुबह बड़ेबड़े डब्बों में दूध भर कर साइकिल पर लाद कर पास के स्टेशन जाते और वहां से ट्रेन पकड़ कर शहर जाते. शाम तक सारा दूध बेच कर घर वापस आते.

लड़का भैंसें चरा कर जवान हुआ था. वह कमअक्ल तो नहीं था, पर दुनियादारी की बातें कम जानता था.

लड़की ने जब उसे भगा कर दिल्ली चलने के लिए कहा, तो उस के हाथपांव फूल गए. दिल्ली में वह कहां रहेगा? क्या काम करेगा? क्या घर जैसा सुख वहां मिलेगा? यही सब सोच कर उस के बदन में कंपकंपी छूटने लगी थी.

जब लड़के की समझ  में कुछ नहीं आया, तो उस ने गांव के एक लड़के से बात की, ‘‘यार रमेश, तुम तो दिल्ली रह कर आए हो. जरा बताओ, कैसी है वह? तुम वहां क्या करते हो?’’

रमेश ने रंजन से पूछा, ‘‘क्यों भाई, गांव से जी ऊब गया है क्या? दिल्ली क्यों जाना चाहते हो?’’

‘‘कुछ नहीं यार, मैं तो यों ही पूछ रहा था. सुना है, दिल्ली बहुत खूबसूरत  है. कभी मौका मिला, तो घूम कर आऊंगा.’’

‘‘अच्छी बात है. दिल्ली सचमुच बहुत खूबसूरत है, पर ऊपर से. अगर आप लाखों में खेल रहे हो तो ठीक है, वरना हमारे जैसे लोगों के लिए दिल्ली बेकार है,’’ रमेश ने दोटूक जवाब दिया.

‘‘लेकिन जब तुम लोग गांव आते हो, तो अच्छाखासा पैसा ले कर आते हो, साफसुथरे कपड़े पहनते हो, हर तरह का शौक करते हो. फिर वहां किस चीज की कमी है, जिस से तुम दुखी होते हो?’’

‘‘यह तुम नहीं समझोगे. एक बार दिल्ली जाओ, सब समझ  में आ जाएगा. जब किसी प्लास्टिक या लोहे के कारखाने में काम करना पड़ेगा, तो पता चलेगा कि दिल्ली कैसी है.

‘‘जब 8-10 लड़के एक ही कमरे में  रहेंगे, साफसफाई का मौका नहीं मिलेगा, रात में लेटने को धूलमिट्टी से भरे कपड़ों का बिछावन मिलेगा, तो सारे अरमान धूल में मिल जाएंगे.

‘‘महीने में जो तनख्वाह मिलती है, वह तो बस दालरोटी के लिए ही पूरी पड़ती है. अगर हम जैसे लोग वहां अच्छा खाना खाने लगें, तो हमारा घर लौटना मुश्किल हो जाएगा. टिकट खरीदने तक के पैसे भी न बचेंगे.’’

‘‘क्या वहां काम करने के इतने कम पैसे मिलते हैं?’’

‘‘और नहीं तो क्या? शुरुआत में मालिक हजारपंद्रह सौ रुपए महीना ही पगार देता है. अच्छे कारीगर हो गए, तो शायद दोढाई हजार रुपए दे देगा.

‘‘वहां उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर भरे हुए हैं. काम मिलता ही नहीं है. जो थोड़े पढ़ेलिखे होते हैं, वे किसी दुकान में सेल्समैन लग जाते हैं. वही थोड़ी आराम की नौकरी है. बाकी तो बस किसी तरह गुजारा करते हैं और गांव आ कर ऐसे बनते हैं, जैसे वहां अफसरी कर रहे हों.’’

ऐसी बातें सुन कर रंजन की रहीसही हिम्मत भी जवाब दे गई. पूनम के साथ दिल्ली भाग जाने का सपना भयानक हादसा दिखने लगा.

उस की समझ  में नहीं आया कि करे तो क्या करे.

अब रंजन ने नदी की तरफ जाना छोड़ दिया था. दूसरी तरफ पूनम बेचैन और परेशान थी. वह दिल्ली जाने के लिए तैयार बैठी थी.

वह रोज नदी के किनारे जा कर रंजन का इंतजार करती, लेकिन रंजन नहीं आता. धीरेधीरे वह रंजन से नफरत करने लगी थी.

गुस्से में वह एक दिन अहिरपाड़ा पहुंच गई. उसे रंजन का घर मालूम नहीं था, पर पूछतेपूछते पहुंच  गई.

रंजन घर के बाहर ही था. पूनम को देख उस का माथा ठनका. उस ने झटपट अपने चारों तरफ देखा, कोई नहीं था. तब तक पूनम उस के पास आ गई थी.

रंजन ने उस की आंखों में तैरते गुस्से और नफरत की आग को महसूस किया, पर कुछ कह न सका.

पूनम उस के पास से गुजरती हुई बोली, ‘‘मैं बरगद के पेड़ के नीचे तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. फौरन आ जाओ, वरना तुम्हारे घर में जा बैठूंगी.’’

रंजन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. वह उलटे पैर खेतों की तरफ निकल गया. दोनों बरगद के पेड़ के पास आमनेसामने खड़े थे.

पूनम गुस्सा होते हुए बोली, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें? सारी मर्दानगी और प्यार की कसक धूल में मिल गई? कहां गया तुम्हारा वह प्यार, जिस का तुम दम भरते थे?

‘‘पहले तो जब देखो, तब मेरा बदन नोचने के लिए भेडि़ए की तरह तैयार रहते थे. अब क्यों नहीं आते हो मुझ  से मिलने? ऐसी क्या बात हो गई है कि तुम मुझ  से मिलना तक नहीं चाहते? मैं ने तुम्हें अपना बदन नहीं सौंपा… इसलिए? बोलो, कब करोगे मुझ  से शादी?’’

रंजन चुप रहा. पूनम ठीक उस के सामने खड़ी हो गई. इतनी करीब कि उन दोनों की न केवल सांसें, बल्कि सीने भी आपस में टकराने लगे.

पूनम ने दोनों हाथों से रंजन के कंधे पकड़ कर हिला दिए और बोली, ‘‘मुझे  पता है, तुम कभी मुझ  से ब्याह नहीं करने वाले. तुम्हें तो मेरे जिस्म से प्यार था. उसे भोगना चाहते थे न.

‘‘ठीक है, अगर हिम्मत है तो आगे बढ़ो और खेलो मेरे बदन से. यहां कोई देखने वाला नहीं है. लूट लो मेरी इज्जत और उसे सरेआम तारतार कर दो. मर्द हो न तुम… कर लो अपनी मनमानी… देखते क्या हो, आगे बढ़ो.’’

सचमुच आसपास कोई नहीं था.

पूनम पर जैसे जुनून सवार था. उस की सांस धौंकनी की तरह चल रही थी. वह रंजन को पकड़ कर हिलाए जा रही थी और वह था कि भीगी बिल्ली की तरह सिकुड़ा था. बदन में जवानी का कोई उबाल, कोई जोश नहीं था. वह पूनम से नजर तक नहीं मिला पा रहा था. उस के पसीने छूट गए थे.

रंजन को वहां से भाग कर बच निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. उस ने चोर नजरों से इधरउधर देखा भी, पर पूनम के हाथों की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह हिल भी नहीं सकता था.

तभी पूनम ने उसे जोर का एक धक्का दिया और उस के मुंह पर थूकते  हुए बोली, ‘‘जा, मां का दूध पी. जवान होने में अभी बहुत समय लगेगा तुझे.

‘‘लेकिन एक बात याद रखना, औरत जब अपनी पर आती है, तो एक बरसाती नदी की तरह होती है. वह किनारों को तोड़फोड़ देती है. तब उस पर बांध नहीं बांधा जा सकता. उस को संभालने के लिए आपसी समझदारी और हद से ज्यादा प्यार की जरूरत होती है.’’

रंजन नामर्द की तरह वहीं चुपचाप लेटा रहा. पूनम ने आगे कुछ नहीं कहा. थोड़ी देर बाद वह अपने घर लौट गई.

इस तरह उन दोनों का प्यार बरसाती नदी की तरह सूख गया. Hindi Story

Hindi Short Story : बाबा की महिमा

Hindi Short Story. भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. आखिर 3 महीने के मौनव्रत के बाद आज बाबा मुक्तानंद महाराज भक्तों को आशीर्वाद जो देंगे.

जैसे ही यह खबर सूबे में पहुंची, सुबह से ही बाबा के आश्रम के बाहर भक्तों की भीड़ लगने लगी. बाबा ने अपने भक्तों को आशीर्वाद देने का समय दोपहर 2 बजे तय किया था.

आश्रम में भरपूर भीड़ हो जाने के बाद बाबा के स्वयंसेवक बड़े से पंडाल में भक्तों को बैठाने में लगे हुए थे और ठीक 2 बजे बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे पंडाल में बैठे सभी भक्तों से बोले, ‘‘तबीयत ठीक न होने के बावजूद बाबा आप सभी से मिलने को बेकरार हैं, लेकिन आज पहले दिन पंडाल में आए भक्तों में से केवल गंभीर समस्याओं वाले भक्त ही यहां रहें और जो भक्त आज बाबा के दर्शन करने आए हैं, वे कल दोपहर में आने की कृपा करें.’’

सचिव के इस ऐलान के बाद तकरीबन आधा पंडाल खाली होने लगा. भक्त बाबा की गद्दी के पास रखे दानपात्र में कीमती सामान व नकदी डालते हुए आश्रम के बड़े दरवाजे से बाहर निकलते गए.

अब पंडाल में केवल 100-150 भक्त ही रह गए थे. बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे ने बारीबारी से बाकी बचे भक्तों से उन की समस्या को सुना और उन्हें बाबा की कुटिया के बाहर बने 5 गेटों के बाहर अलगअलग लाइनों में खड़ा करवा दिया. साथ ही, सभी भक्तों को यह हिदायत भी दे दी गई कि बाबा हर 5 औरतों के बाद 2 मर्दों की समस्या सुनेंगे और हल बताएंगे.

सभी भक्तों को 5 लाइनों में तरीके से खड़ा करने के बाद बाबा के सचिव ने बाबा की कुटिया के भीतर जा कर थोड़ी देर बाद बड़ा दरवाजा खोल दिया और वहीं लाउडस्पीकर से अलगअलग लाइनों में खड़ी औरतों को एकएक कर के बाबा के सामने आने को कहा.

पहली औरत के आते ही बाबा ने जोर से कहा, ‘‘ऐ देवी, तुम्हें अभी तक औलाद का सुख नहीं मिला है.’’

बाबा के इतना कहते ही वह औरत  उन के पैरों में गिर गई और फल, नकदी व दूसरी चीजें उन के चरणों में रख दीं. साथ ही, अपने हाथ की सोने की अंगूठी भी उतार कर बाबा को दे दी.

बाबा ने उस औरत को भभूत और एक सेब देते हुए कहा, ‘‘अब तुम 6 महीने बाद शाम ढले आना.’’

इस के बाद दूसरी लाइन की एक औरत भीतर आई, तो बाबा ने उस के परिवार में कारोबारी घाटे की बात कही. उस औरत की आंखें खुली की खुली रह गईं और बाबा को सामान दे कर वह भी भभूत और सेब ले कर चलती बनी.

तीसरी औरत को बाबा ने उस के पति के साथ मनमुटाव की जानकारी दी. बाबा की यह बात सुन कर वह औरत भी हैरान रह गई.

अगली औरत के आने पर बाबा ने उस के बेटे की नौकरी न लगने की बात की. इसी तरह आखिरी लाइन की औरत के आने पर बाबा ने उसे बताया कि उस के पूरे परिवार को बीमारियों ने घेर रखा है.

इस तरह बारीबारी से औरत व मर्द आते रहे और बाबा उन से पूछे बिना ही उन की समस्या बता कर उन्हें अपना आशीर्वाद, भभूत, फल वगैरह प्रसाद में देते रहे. इस के एवज में तमाम भक्त नकदी, पूजा का सामान, सोने व चांदी के जेवर, कपड़े, साड़ी और दूसरी कीमती चीजें बाबा को देते रहे.

दोपहर के 2 बजे से यह सिलसिला शाम के 7 बजे तक चलता रहा. जो भी भक्त बाबा की कुटिया से बाहर आता, वह पंडाल में बैठे बाकी भक्तों को बाबा के चमत्कार के किस्से सुनाता हुआ आश्रम से बाहर निकल जाता.

जब सभी भक्त बाबा के आश्रम से चले गए, तो बाबा मुक्तानंद महाराज के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे कुटिया के भीतर गए और भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का हिसाबकिताब करने लगे.

सारा चढ़ावा अलगअलग छांट कर और भारी मात्रा में आए जेवरात व नकदी की गिनती वगैरह कर लेने के बाद बाबा ने कुल दान का 25 फीसदी अलग कर के एक पोटली में बांध कर सचिव को सौंप दिया.

आखिर सचिव 25 फीसदी हिस्से का हकदार तो था ही. उसी ने तो पंडाल में बैठे तमाम भक्तों को उन की परेशानियों के हिसाब से ही बाबा की कुटिया के बाहर बनी पांचों लाइनों में अलगअलग खड़ा कर दिया था.

पहली लाइन में खड़े भक्तों को औलाद सुख नहीं था, तो दूसरी लाइन में भक्त बीमारी से परेशान थे. इसी तरह चौथी लाइन के भक्तों के परिवार में नौकरी न लगने जैसी समस्याएं थीं.

लाइन के हिसाब से ही बाबा भक्तोें की समस्या का अंदाजा लगा लेते थे.

दान का एकचौथाई हिस्सा ले कर सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे महीने की 14 तारीख को फिर से आने का वादा कर के लंबेलंबे कदमों से आश्रम से बाहर निकल गया.    Hindi Short Story

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