Hindi Story: उपहार

लेकिन मोहिनी थी कि उसे एक भी तोहफा न पसंद आता. आखिर में जब सत्या की मेहनत की कमाई से खरीदे छाते को भी नापसंद कर के मोहिनी ने फेंका तो…

‘‘सिर्फ एक बार, प्लीज…’’

‘‘ऊं…हूं…’’

‘‘मोहिनी, जानती हो मेरे दिल की धड़कनें क्या कहती हैं? लव…लव… लेकिन तुम, लगता है मुझे जीतेजी ही मार डालोगी. मेरे साथ समुद्र किनारे चलते हुए या फिर म्यूजियम देखते समय एकांत के किसी कोने में तुम्हारा स्पर्श करते ही तुम सिहर कर धीमे से मेरा हाथ हटा देती हो. एक बार थिएटर में…’’

‘‘सत्या प्लीज…’’

‘‘मैं ने ऐसी कौन सी अनहोनी बात कह दी. मैं तो केवल इतना चाहता हूं कि तुम एक बार, सिर्फ एक बार ‘आई लव यू’ कह दो. अच्छा यह बताओ कि तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं?’’

‘‘नहीं जानती.’’

‘‘यह भी क्या जवाब हुआ भला? हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं. हैसियत भी एक जैसी ही है. तुम्हारी और मेरी मां इस रिश्ते के लिए मना भी नहीं करेंगी. हां, तुम मना कर दोगी, दिल तोड़ दोगी, तो मैं…तो मर जाऊंगा, मोहिनी.’’

‘‘मुझे एक छाता चाहिए सत्या. धूप में, बारिश में, बाहर जाते समय काफी तकलीफ होती है. ला दोगे न?’’

‘‘बातों का रुख मत बदलो. छाता दिला दूं तो ‘आई लव यू’ कह दोगी न?’’

मोहिनी के जिद्दी स्वभाव के बारे में सोच कर सत्या तिलमिला उठा पर वह दिल के हाथों मजबूर था. मोहिनी के बिना वह अपनी जिंदगी सोच ही नहीं सकता था. लगा, मोहिनी न मिली तो दिल के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे.

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सत्या ने पहली बार जब मोहिनी को देखा तो उसे दिल में तितलियों के पंखों की फड़फड़ाहट महसूस हुई थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें, सीधी नाक, ठुड्डी पर छोटा सा तिल, नमी लिए सुर्ख गुलाबी होंठ, लगा मोहिनी की खूबसूरती का बयान करने के लिए उस के पास शब्दों की कमी है.

मोहिनी से पहली मुलाकात सत्या की किसी इंटरव्यू देने के दौरान हुई थी. मिक्सी कंपनी में सेल्समैन व सेल्स गर्ल की आवश्यकता थी. वहां दोनों को नौकरी नहीं मिली थी.

कुछ दिनों बाद ही एक दूसरी कंपनी के साक्षात्कार के समय उस ने दोबारा मोहिनी को देखा था. गुलाबी सलवार कमीज में वह गजब की लग रही थी. कहीं यह वो तो नहीं? ओफ…वही तो है. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं.

मोहिनी ने भी उसे देखा.

‘बेस्ट आफ लक,’ सत्या ने कहा.

उस की आंखें चमक उठीं. गाल सुर्ख गुलाबी हो उठे.

‘थैंक यू,’ मोहिनी के होंठों से ये दो शब्द फूल बन कर गिरे थे.

यद्यपि वहां की नौैकरी को वह खुद न पा सका पर मोहिनी पा गई. माइक्रोओवन बेचने वाली कंपनी… प्रदर्शनी में जा कर लोगों को ओवन की खूबियों से परिचित करवा कर उन्हें ओवन खरीदने के लिए प्रेरित करने का काम था.

सत्या ने नौकरी मिलने की खुशी में मोहिनी को आइसक्रीम पार्टी दे डाली. मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया. छुट्टी के दिन व काम पूरा करने के बाद मोहिनी की शाम सत्या के साथ गुजरती. सत्या का हंसमुख चेहरा, मजाकिया बातें, दिल खोल कर हंसने का अंदाज मोहिनी को भा गया था. वह उस से सट कर चलती, उस की बातों में रस लेती. एक बार सिनेमाहाल में परदे पर रोमांस दृश्य देख विचलित हो कर अंधेरे में सत्या ने झट मोहिनी का चेहरा अपने हाथों में ले कर उस के होंठों पर अपने जलतेतड़पते होंठ रख दिए थे.

यह प्यार नहीं तो और क्या है? हां, यही प्यार है. सत्या के दिल ने कहा तो फिर ‘आई लव यू’ कहने में क्या हर्ज है?

पिछली बार मोहिनी के जन्म-दिन पर सत्या चाहता था कि वह अपने प्यार का इजहार करे. जन्मदिन पर मोहिनी ने उस से सूट मांगा. 500 रुपए का एक सूट उस ने दस दुकानों पर देखने के बाद पसंद किया था पर खरीदने के लिए उस के पास रुपए नहीं थे क्योंकि प्रथम श्रेणी में स्नातक होने के बाद भी वह बेरोजगार था.

घर के बड़े ट्रंक में एक पान डब्बी पड़ी थी. पिताजी की चांदी की… पुरानी…भीतर रह कर काली पड़ गई थी. मां को भनक तक लगे बिना सत्या ने चालाकी से उसे बेच दिया और मोहिनी के लिए सूट खरीदा.

आसमानी रंग के शिफान कपड़े पर कढ़ाई की गई थी. सुंदर बेलबूटे के साथ आगे की तरफ पंख फैलाया मोर. सत्या को भरोसा था कि इस उपहार को देख कर मोर की तरह मोहिनी का मन मयूर भी नाच उठेगा. उस से लिपट कर वह थैंक्यू कहेगी और ‘आई लव यू’ कह देगी. इन शब्दों को सुनने के लिए उस के कान कितने बेकरार थे पर उस के उपहार को देख कर मोहिनी के चेहरे पर कड़वाहट व झुंझलाहट के भाव उभरे थे.

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‘यह क्या सत्या? इतना घटिया कपड़ा. और देखो तो…कितना पतला है, नाखून लगते ही फट जाएगा. यह देखो,’ कहते हुए उस ने अपने नाखून उस में गड़ाए और जोर दे कर खींचा तो कपड़ा फट गया. सत्या को लगा था यह कपड़ा नहीं, उस के पिताजी की पान डब्बी व मां के सेंटिमेंट दोनों तारतार हो गए हैं.

‘कितने का है?’ मोहिनी ने पूछा.

‘तुम्हें इस से क्या?’

‘रुपए कहां से मिले?’

‘बैंक से निकाले,’ सत्या ने सफाई से झूठ बोल दिया.

और इस बार छाता…उस ने मोलभाव किया. अपनेआप खुलने व बंद होने वाला छाता 2 सौ रुपए का था. दोस्तों से रुपए मिले नहीं. घर में जो कुछ ढंग की चीज नजर आई मां की आंखें बचा कर उसे बेच कर सिनेमा, ड्रामा, होटल के खर्चे में वह पहले से पैसे फूंक चुका था.

काश, एक नौकरी मिल गई होती. इस समय वह कितना खुश होता. मोहिनी के मांगने के पहले उस की आवश्यकताओं की वस्तुओं का अंबार लगा देता. चमचमाते जूते पर धूल न जमे, कपड़ों की क्रीज न बिगड़े, एक अदद सी नौकरी, बस, उसे और क्या चाहिए. पर वह तो मिल नहीं रही थी.

नौकरी तो दूर की बात, अब उस की प्रेमिका, उस की जिंदगी मोहिनी एक छाता मांग रही है. क्या करे? अचानक उसे रवींद्र का ध्यान आया जो बचपन में उस का सहपाठी था. बड़ा होने पर वह अपने पिता के साथ उन के प्रेस में काम करने लगा. बाद में पिता के सहयोग से उस ने प्रिंटिंग इंक बनाने की फैक्टरी लगा ली थी. बस, दिनरात उसी फैक्टरी में कोल्हू के बैल की तरह लगा रहता था.

एक दोस्त से पैसा मांगना सत्या को बुरा तो लग रहा था पर क्या करे दिल के हाथों मजबूर जो था.

‘‘उधार पैसे मांग रहे हो पर कैसे चुकाओगे? एक काम करो. ग्राइंडिंग मशीन के लिए आजकल मेरे पास कारीगर नहीं है. 10 दिन काम कर लो, 200 रुपए मिलेंगे. साथ ही कुछ सीख भी लोगे.’’

इंक बनाने के कारखाने में ग्राइंडिंग मशीन पर काम करने की बात सोच कर ही सत्या को घिन आने लगी थी. पर क्या करे? 200 रुपए तो चाहिए. किसी भी हाल में…और कोई चारा भी तो नहीं.

10 दिन के लिए वह जीजान से जुट गया. मशीनों की गड़गड़ाहट… पसीने से तरबतर…मैलेकुचैले कपड़े… थका देने वाली मेहनत, उस ने सबकुछ बरदाश्त किया. 10वें दिन उस ने छाता खरीदा. मोलभाव कर के उस ने 150 रुपए में ही उसे खरीद लिया. 50 रुपए बचे हैं, मोहिनी को ट्रीट भी दूंगा, उस की मनपसंद आइसक्रीम…उस ने सोचा.

तालाब के किनारे बना रेस्तरां. खुले में बैठे थे मोहिनी और सत्या. वह अपलक अपने प्यार को देख रहा था. हवा के झोंके मोहिनी की लटों को उलझा देते और वह उंगलियों से उन्हें संवार लेती. मोहिनी के चेहरे की खुशी, उस की सुंदरता का जादू, वातावरण की मादकता को बढ़ाए जा रही थी. सत्या का मन उसे भींच कर अपनी अतृप्त इच्छाओं को तृप्त कर लेने का था, किंतु बरबस उस ने अपनी कामनाओं को काबू में कर रखा था.

कटलेट…फिर मोहिनी की मनपसंद आइसक्रीम…सत्या ने बैग से छाता निकाला. वह मोहिनी की आंखों में चमक व चेहरे पर खुशी देखने के लिए लालायित था.

‘‘सत्या, यह क्या है?’’ मोहिनी ने पूछा.

‘‘तुम ने एक छाता मांगा था न…यह कंचन काया धूप में सांवली न पड़ जाए, बारिश में न भीगे, इसीलिए लाया हूं.’’ मोहिनी ने बटन दबाया. छाता खुला तो उस का चेहरा ढक गया. छाते के बारीक कपड़े से रोशनी छन कर भीतर आई.

‘‘छी…तुम्हें तो कुछ खरीदने की तमीज ही नहीं सत्या. देखो तो कितनी घटिया क्वालिटी का छाता है. इसे ले कर मैं कहीं जाऊं तो चार लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? छाते को झल्लाहट के साथ बंद कर के पूरे वेग से उस ने तालाब की ओर उसे फेंका. छाता नाव से टकरा कर पानी में डूब गया.’’

सत्या उसे भौंचक हो कर देखता रहा. क्षण भर…वह खड़ा हुआ, कुरसी ढकेल कर दौड़ पड़ा. सीढि़यां उतर कर नाव के समीप गया. नाव को हटा कर उस ने पानी में हाथ डाल कर टटोला. छाता पूरी तरह डूब गया था. हाथपैर से टटोल कर थोड़ी देर की मशक्कत के बाद वह उसे ले आया. उस के चेहरे पर क्रोध व निराशा पसरी हुई थी.

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‘‘मोहिनी, इस छाते को खरीदने के लिए 10 दिन…पूरे 10 दिन मैं ने खूनपसीना एक किया है, हाथपैर गंदे किए हैं, इंक फैक्टरी में काम सीखा है. सोच रहा था कुछ दिनों में रुपए का जुगाड़ कर के क्यों न एक छोटी सी इंक फैक्टरी मैं भी खोल लूं. कितने अरमानों से इसे खरीद कर लाया था. तुम ने मेरी मेहनत को, मेरे अरमानों को बेकार समझ कर फेंक दिया. आई एम सौरी…वेरीवेरी सौरी मोहिनी…जिसे पैसों का महत्त्व नहीं मालूम ऐसी मूर्ख लड़की को मैं ने चाहा. लानत है मुझ पर…गुड बाय…’’

‘‘एक मिनट सत्या,’’ मोहिनी ने कहा.

‘‘क्या है?’’ सत्या ने मुड़ कर पूछा तो उस की आवाज में कड़वाहट थी.

‘‘तुम ने सूट खरीद कर दिया था, उसे भी मैं ने फाड़ दिया था, तब तो तुम ने कुछ कहा नहीं. क्यों?’’

‘‘बात यह है कि…’’

‘‘…कि वह तुम्हारी मेहनत के पैसों से खरीदा हुआ नहीं था. मैं तुम्हारी मां से मिली थी. तुम मेहनत से डरते हो, यह मैं ने उन की बातों से जाना. 500 रुपए के सूट को मैं ने फाड़ा तब तो तुम ने कुछ नहीं कहा और अब इस छाते के लिए कीचड़ में भी उतर गए, जानते हो क्यों? क्योंकि यह तुम्हारी मेहनत की कमाई का है.’’

‘‘मैं इसी सत्या को देखना चाहती थी कि जो मेहनत से जी न चुराए, किसी भी काम को घटिया न समझे, मेहनत कर के कमाए और मेहनत की खाए?’’

मोहिनी उस के समीप गई. उस के हाथों से उस छाते को लिया और बोली, ‘‘सत्या, यह मेरे जीवन का एक कीमती तोहफा है. इस के सामने बाकी सब फीके हैं. अब तुम मुझ से नाराज तो नहीं हो?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘उस के समीप जा कर मोहिनी ने उसे गले लगाया.’’

‘‘उफ्, मेरे हाथपैर कीचड़ से सने हैं, मोहिनी.’’

‘‘कोई बात नहीं. एक चुंबन दोगे?’’

‘‘क्या?’’

‘‘आई लव यू सत्या.’’

सत्या के दिल में तितलियों के पंखों की फड़फड़ाहट का एहसास उसी तरह से हो रहा था जैसे उस ने पहली बार मोहिनी को देखने पर अपने दिल में महसूस किया था.  लेखक- सुजय कुमार

Hindi Story: मै भी “राहुल गांधी” बनूंगा ..

हे पाठकराम ! तुम मेरी मनोभावना सुनकर मन ही मन हंस रहे होगे. यह रोहरानंद बावला है क्या ? क्या राहुल गांधी बनना आसान है क्या कोई भी ऐरा गैरा सोचेगा और राहुल ‘बाबा’ बन जाएगा. अगर ऐसा हो तो कौन नहीं चाहेगा,मगर सच यह है कि यह संभव नहीं है.अतः सोचना भी गदहगदह पच्चीसी नहीं तो क्या है.

मगर रुको ! मेरी बात भी सुन लो .मैं एक आम इंसान हूं मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं ,महत्वकाक्षाएं होंगी कि नहीं. मानते हो न ! तो अगर मैं छोटा-मोटा नेता बनना चाहू ,पार्टी मेंबर बनना चाहूं तो तुम उसे सहजता से लोगे .मगर मैं जरा ऊंची महत्वाकांक्षा पाल बैठा हूं तो तुम मुझ पर हंस रहे हो. इसे मैं अपनी टांग खींचना कहूंगा.

दोस्त ! इच्छा छोटी मोटी क्यों पालू ? और सुनो अगर मैं राहुल गांधी बन गया तो मेरे नजदीकी सखा,मित्र होने का पूर्ण लाभ तुम्हें ही मिलेगा… अतः मेरे लक्ष्य को पुख्ता बनाने में मेरी मदद करो. आगे तुम्हें भी तो लाभ मिलेगा .

तो , राहुल गांधी बनने के असंख्य लाभ है. दुनिया में रातों-रात लोग मुझे जानने लगेंगे, पहचानने लगेंगे, मेरी एक एक अदा पर लोग जान न्योछावर करने तत्पर होंगे. मेरी बात लोग बड़े ध्यान से सुनेंगे. फिर भले ही सुनकर हंस पड़ें. मैं जो भी करूंगा, वह चर्चा का सबब बन जाएगा.

मेरी एक एक बात का गूढ़ार्थ निकाला जाएगा. अगर मैं सिमी का समर्थन करूंगा तो संघ परिवार हाय तौबा मचायेगा.अगर मैं मुंबई को सारे देश की सौगात कहूंगा तो शिवसैनिक तमतमा जाएंगे. मैं किसी दलित के घर सोया नहीं कि भूचाल आ जाएगा. अर्थात में जो भी करूंगा उसकी सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया होगी।

मित्र ! मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा.आज मैं कुछ भी करूं कुछ भी कहूं देश की चींटी तक तवज्जो नहीं देती. फिर मेरा जीना निर्रथक है कि नहीं ? सो बहुत सोच समझकर यह चतुराई भरा निर्णय लिया है कि अगर मुझे दुनिया की निगाह में आना है तो राहुल गांधी बनना ही होगा.

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तुम कहोगे – मेरी बात अब तुम्हें थोड़ी-थोड़ी समझ आ रही है. मगर फिर भी दृढ शब्दों में कहोगे- राहुल गांधी बनना तो असंभव हैं! तुम पगलाये गए हो…क्योंकि दुनिया में जस्ट सेम टू सेम बनना असंभव है. ऐसा सोचना भी दिमागी दिवालियापन का सबूत देता है. और अवश्य मेरा इलाज बांका* में होना चाहिये.

तो हे सखा ! जरा रुको तुम यथार्थ की जिंदगी में हो और मैं भावुक इंसान कल्पना लोक में जीता हूं. ठीक है, यथार्थ में ऐसा संभव नहीं है मगर सोचने से क्या संभव नहीं हुआ है. अभी पांच सात सौ वर्ष पूर्व किसने सोचा था कि बिजली का बल्ब, दूरभाष,एसी गाड़ियां तारकोल की सड़क पर दौड़ेगी ? किसने सोचा था विशालकाय प्लांट होंगे,हवा में ट्रेन दौड़ेगी ?
हमारे हाथों में मोबाइल होगी, भारत चांद पर पहुंच जाएगा! तो भाई सोचने से सब संभव होता है .मैं भोला-भाला सरल इंसान हूं. मैं महत्वाकांक्षा पालने का भी हकदार नहीं हूं क्या!

पाठकराम ! मुझ सा साधारण आदमी और क्या कर सकता है…सोचने और कल्पना के घोड़े दौड़ाने में पैसे भी नहीं लगते, सो सोचता हूं।तुम कहोगे,- भई! अपनी औकात के भीतर सोचो. जितनी चादर उतना पैर पसारो. मैं कहता हूं,-मैं क्यों क्षुद्र सोच रखू ,क्यों मुख्यमंत्री,राज्यपाल बनने का ख्वाब पालूं । मैं तो बड़ा ख्वाब देखूगा, बल्कि देख रहा हूं जिसमें सारे पद स्वमेव समा जाए.

देखो मित्र ! तुम्हारा यह दोस्त ऊंची उड़ान भर रहा है. राहुल गांधी बनने के सैकड़ों फायदे हैं. अगर कहीं ईश्वर ने मेरी सुन ली या अचानक में राहुल बाबा बन गया तो देश की सबसे पुरानी और वृद्धकाय कांग्रेस पार्टी मेरी पतलून की जेब में होगी.
और जब कांग्रेस मेरी मुट्ठी में होगी तो अनेक प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकारें मेरे इशारे पर चलेंगी. हस्तीनापुर का कांग्रेस मुख्यालय मेरी हथेली मैं होगा . मैं प्रधानमंत्री बनूंगा.नहीं भी बना तो हमारी गठबंधन सरकार का जो भी शख्स प्रधानमंत्री होगा, मेरी और सम्मान से देखेगा. मैं जब तलक बैठूंगा नहीं, प्रधानमंत्री,मंत्री और बड़े-बड़े नेता बैठेंगे नहीं. अब बताओ मुझे और क्या चाहिए ? मेरी एक बात उनके लिए पत्थर की लकीर होगी.केंद्र सरकार उसे पूर्ण करने में ऐसे लग जाएगी जैसे कोई ईश्वरी आदेश हो..

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मित्र !अब बता तू ही बता… मैं क्यों पार्षद, विधायक,मेयर बनने की सोचू. राहुल बनते ही वीवीआईपी बन जाऊंगा जिधर से गुजरूगा ऐसी चाक र्चौबंद व्यवस्था सरकार करेगी मानो कोई राष्ट्राध्यक्ष आया है.परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा…..
दोस्त ! मुझे और क्या चाहिए .मैं तो यह सोच कर ही धन्य हो गया कि मैं राहुल बाबा बनूंगा.सोचते ही आत्मा तृप्त हो गई. ऐसा लगा मानो सचमुच में राहुल बन गया. सच मित्र हम गरीब आम भारतीय कभी कुछ नहीं बन सकेंगे…कम से कम सोच कर जीवन को आनंदमय बना ले . चंद खुशी का क्षण इस तरह बटोर ले.कल्पना के घोड़े दौड़ा कर ह्रदय को प्रफुल्लित कर ले. क्योंकि यथार्थ बहुत बहुत कड़वा है मेरे यार…

Hindi Story: पदचिह्न

Hindi Story: बात बहुत छोटी सी थी किंतु अपने आप में गूढ़ अर्थ लिए हुए थी. मेरा बेटा रजत उस समय 2 साल का था जब मैं और मेरे पति समीर मुंबई घूमने गए थे. समुद्र के किनारे जुहू बीच पर हमें रेत पर नंगे पांव चलने में बहुत आनंद आता था और नन्हा रजत रेत पर बने हमारे पैरों के निशानों पर अपने छोटेछोटे पांव रख कर चलने का प्रयास करता था. उस समय तो मुझे उस की यह बालसुलभ क्रीड़ा लगी थी किंतु आज 25 वर्ष बाद नर्सिंग होम के कमरे में लेटी हुई मैं उस बात में छिपे अर्थ को समझ पाई थी.

हफ्ते भर पहले पड़े सीवियर हार्टअटैक की वजह से मैं जीवन और मौत के बीच संघर्ष करती रही थी, मैं समझ सकती हूं वे पल समीर के लिए कितने कष्टकर रहे होंगे, किसी अनिष्ट की आशंका से उन का उजला गौर वर्ण स्याह पड़ गया था. माथे पर पड़ी चिंता की लकीरें और भी गहरा गई थीं, जीवन की इस सांध्य बेला में पतिपत्नी का साथ क्या माने रखता है, इसे शब्दों में जाहिर कर पाना नामुमकिन है.

नर्सिंग होम में आए मुझे 6 दिन बीत गए थे. यद्यपि मुझे अधिक बोलने की मनाही थी फिर भी नर्सों की आवाजाही और परिचितों के आनेजाने से समय कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था. अगली सुबह डाक्टर ने मेरा चेकअप किया और समीर से बोले, ‘‘कल सुबह आप इन्हें घर ले जा सकते हैं किंतु अभी इन्हें बहुत एहतियात की जरूरत है.’’

घर जाने की बात सुनते ही हर्षित होने के बजाय मैं उदास हो गई थी. मन में बेचैनी और घुटन का एहसास होने लगा था. फिर वही दीवारें, खिड़कियां और उन के बीच पसरा हुआ भयावह सन्नाटा. उस सन्नाटे को भंग करता मेरा और समीर का संक्षिप्त सा वार्तालाप और फिर वही सन्नाटा. बेटी पायल का जब से विवाह हुआ और बेटा रजत नौकरी की वजह से दिल्ली गया, वक्त की रफ्तार मानो थम सी गई है. शुरू में एक आशा थी कि रजत का विवाह हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा. किंतु सब ठीक हो जाएगा जैसे शब्द इनसान को झूठी तसल्ली देने के लिए ही बने हैं. सबकुछ ठीक होता कभी नहीं है. बस, एक झूठी आशा, झूठी उम्मीद में इनसान जीता रहता है.

मैं भी, इस झूठी आशा में कितने ही वर्ष जीती रही. सोचती थी, जब तक समीर की नौकरी है, कभी बेटाबहू हमारे पास आ जाया करेंगे, कभी हम दोनों उन के पास चले जाया करेंगे और समीर के रिटायरमेंट के बाद तो रजत अपने साथ हमें दिल्ली ले ही जाएगा किंतु सोचा हुआ क्या कभी पूरा होता है? रजत के विवाह के बाद कुछ समय तक आनेजाने का सिलसिला चला भी. पोते धु्रव के जन्म के समय मैं 2 महीने तक दिल्ली में रही थी. समीर रिटायर हुए तो दिल्ली के चक्कर अधिक लगने लगे. बेटेबहू से अधिक पोते का मोह अपनी ओर खींचता था. वैसे भी मूलधन से ब्याज अधिक प्यारा होता है.

धु्रव की प्यारी मीठीमीठी बातों ने हमें फिर से हमारा बचपन लौटा दिया था. धु्रव के साथ खेलना, उस के लिए खिलौने लाना, छोटेछोटे स्वेटर बनाना, कितना आनंददायक था सबकुछ. लगता था धु्रव के चारों तरफ ही हमारी दुनिया सिमट कर रह गई थी. किंतु जल्दी ही मुट्ठी में बंद रेत की तरह खुशियां हाथ से फिसल गईं. जैसेजैसे मेरा और समीर का दिल्ली जाना बढ़ता गया, नेहा का हमारे ऊपर लुटता स्नेह कम होने लगा और उस की जगह ले ली उपेक्षा ने. मुंह से उस ने कभी कुछ नहीं कहा. ऐसी बातें शायद शब्दों की मोहताज होती भी नहीं किंतु मुझे पता था कि उस के मन में क्या चल रहा था. भयभीत थी वह इस खयाल से कि कहीं मैं और समीर उस के पास दिल्ली शिफ्ट न हो जाएं.

ऐसा नहीं था कि रजत नेहा के इस बदलाव से पूरी तरह अनजान था, किंतु वह भी नेहा के व्यवहार की शुष्कता को नजरअंदाज कर रहा था. मन ही मन शायद वह भी समझता था कि मांबाप के उस के पास आ कर रहने से उन की स्वतंत्रता में बाधा पड़ेगी. उस की जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी जिस से उस का दांपत्य जीवन प्रभावित होगा. उस के और नेहा के बीच व्यर्थ ही कलह शुरू हो जाएगी और ऐसा वह कदापि नहीं चाहता था. मैं ने अपने बेटे रजत का विवाह कितने चाव से किया था. नेहा के ऊपर अपनी भरपूर ममता लुटाई थी किंतु…

मैं ने एक गहरी सांस ली. मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. शरीर में और भी शिथिलता महसूस हो रही थी. मन न जाने कैसाकैसा हो रहा था. मांबाप इतने जतन से बच्चों को पालते हैं और बच्चे क्या करते हैं मांबाप के लिए? बुढ़ापे में उन का सहारा तक बनना नहीं चाहते. बोझ समझते हैं उन्हें. आक्रोश से मेरा मन भर उठा था. क्या यही संस्कार दिए थे मैं ने रजत को?

इस विचार ने जैसे ही मेरे मन को मथा, तभी मन के भीतर कहीं छनाक की आवाज हुई और अतीत के आईने में मुझे अपना बदरंग चेहरा नजर आने लगा. अतीत की न जाने कितनी कटु स्मृतियां मेरे मन की कैद से छुटकारा पा कर जेहन में उभरने लगीं.

मेरा समीर से जिस समय विवाह हुआ, वह आगरा में एक सरकारी दफ्तर में एकाउंट्स अफसर थे. वह अपने मांबाप के इकलौते लड़के थे. मेरी सास धार्मिक विचारों वाली सीधीसादी महिला थीं. विवाह के बाद पहले दिन से ही उन्होंने मां के समान मुझ पर अपना स्नेह लुटाया. मेरे नाजनखरे उठाने में भी उन्होंने कमी नहीं रखी. सारा दिन अपने कमरे में बैठ कर मैं या तो साजशृंगार करती या फिर पत्रिकाएं पढ़ती रहती थी और वह अकेली घर का कामकाज निबटातीं.

उन में जाने कितना सब्र था कि उन्होंने मुझ से कभी कोई गिलाशिकवा नहीं किया. समीर को कभीकभी मेरा काम न करना खटकता था, दबे शब्दों में वह अम्मां की मदद करने को कहते, किंतु मेरे माथे पर पड़ी त्योरियां देख खामोश रह जाते. धीरेधीरे सास की झूठीझूठी बातें कह कर मैं ने समीर को उन के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया, जिस से समीर और उन के मांबाप के बीच संवादहीनता की स्थिति आ गई. आखिर एक दिन अवसर देख कर मैं ने समीर से अपना ट्रांसफर करा लेने को कहा. थोड़ी नानुकूर के बाद वह सहमत हो गए. अभी विवाह को एक साल ही बीता था कि मांबाप को बेसहारा छोड़ कर मैं और समीर लखनऊ आ गए.

जिंदगी भर मैं ने अपने सासससुर की उपेक्षा की. उन की ममता को उन की विवशता समझ कर जीवनभर अनदेखा करती रही. मैं ने कभी नहीं चाहा, मेरे सासससुर मेरे साथ रहें. उन का दायित्व उठाना मेरे बस की बात नहीं थी. अपनी स्वतंत्रता, अपनी निजता मुझे अत्यधिक प्रिय थी. समीर पर मैं ने सदैव अपना आधिपत्य चाहा. कभी नहीं सोचा, बूढ़े मांबाप के प्रति भी उन के कुछ कर्तव्य हैं. इस पीड़ा और उपेक्षा को झेलतेझेलते मेरे सासससुर कुछ साल पहले इस दुनिया से चले गए.

वास्तव में इनसान बहुत ही स्वार्थी जीव है. दोहरे मापदंड होते हैं उस के जीवन में, अपने लिए कुछ और, दूसरे के लिए कुछ और. अब जबकि मेरी उम्र बढ़ रही है, शरीर साथ छोड़ रहा है, मेरे विचार, मेरी प्राथमिकताएं बदल गई हैं. अब मैं हैरान होती हूं आज की युवा पीढ़ी पर. उस की छोटी सोच पर. वह क्यों नहीं समझती कि बुजुर्गों का साथ रहना उन के हित में है.

आज के बच्चे अपने मांबाप को अपने बुजुर्गों के साथ जैसा व्यवहार करते देखेंगे वैसा ही व्यवहार वे भी बड़े हो कर उन के साथ करेंगे. एक दिन मैं ने नेहा से कहा था, ‘‘घर के बड़ेबुजुर्ग आंगन में लगे वट वृक्ष के समान होते हैं, जो भले ही फल न दें, अपनी छाया अवश्य देते हैं.’’

मेरी बात सुन कर नेहा के चेहरे पर व्यंग्यात्मक हंसी तैर गई थी. उस की बड़ीबड़ी आंखों में अनेक प्रश्न दिखाई दे रहे थे. उस की खामोशी मुझ से पूछ रही थी कि क्यों मम्मीजी, क्या आप के बुजुर्ग आंगन में लगे वट वृक्ष के समान नहीं थे, क्या वे आप को अपनी छाया, अपना संबल प्रदान नहीं करते थे? जब आप ने उन के संरक्षण में रहना नहीं चाहा तो फिर मुझ से ऐसी अपेक्षा क्यों?

आहत हो उठी थी मैं उस के चेहरे के भावों को पढ़ कर और साथ ही साथ शर्मिंदा भी. उस समय अपने ही शब्द मुझे खोखले जान पड़े थे. इस समय मन की अदालत में न जाने कितने प्रसंग घूम रहे थे, जिन में मैं स्वयं को अपराधी के कटघरे में खड़ा पा रही थी. कहते हैं न, इनसान सब से दूर भाग सकता है किंतु अपने मन से दूर कभी नहीं भाग सकता. उस की एकएक करनी का बहीखाता मन के कंप्यूटर में फीड रहता है.

मैं ने चेहरा घुमा कर खिड़की के बाहर देखा. शाम ढल चुकी थी. रात्रि की परछाइयों का विस्तार बढ़ता जा रहा था और इसी के साथ नर्सिंग होम की चहल पहल भी थक कर शांत हो चुकी थी. अधिकांश मरीज गहरी निद्रा में लीन थे किंतु मेरी आंखों की नींद को विचारों की आंधियां न जाने कहां उड़ा ले गई थीं. सोना चाह कर भी सो नहीं पा रही थी, मन बेचैन था. एक असुरक्षा की भावना मन को घेरे हुए थी. तभी मुझे अपने नजदीक आहट महसूस हुई, चेहरा घुमा कर देखा, समीर मेरे निकट खड़े थे.

मेरे माथे पर हाथ रख स्नेह से बोले, ‘‘क्या बात है पूजा, इतनी परेशान क्यों हो?’’

‘‘मैं घर जाना नहीं चाहती हूं,’’ डूबते स्वर में मैं बोली.

‘‘मैं जानता हूं, तुम ऐसा क्यों कह रही हो? घबराओ मत, कल का सूरज तुम्हारे लिए आशा और खुशियों का संदेश ले कर आ रहा है. तुम्हारे बेटाबहू तुम्हारे पास आ रहे हैं.’’ Hindi Story

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Hindi Story: कोठे में सिमटी पार्वती – देह धंधे की काली छाया

Hindi Story: आगे एक सार्वजनिक पेशाबखाना था, जहां से तेज बदबू आ रही थी. 10 कदम और आगे चलने पर 64 नंबर कोठे के ठीक सामने ‘चाय वाला’ की चाय की खानदानी दुकान थी. चाय की दुकान से 5 कदम हट कर अधेड़ उम्र की दरमियाना कद की पार्वती खड़ी थी. उस की उम्र 45 साल के करीब लग रही थी. वह सड़क के बगल से हो कर गुजरने वाले ऐसे राहगीरों को इशारा कर के बुला रही थी, जो लार टपकाती निगाहों से कोठे की तरफ देख रहे थे.

पार्वती की आंखें और गाल अंदर की तरफ धंसने लगे थे. चेहरे पर सिकुड़न के निशान साफसाफ झलकने लगे थे. अपने हुस्न को बरकरार रखने के लिए उस ने अपनी छोटीछोटी काली आंखों में काजल लगाया हुआ था.

गरमी की वजह से पार्वती का शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था. हाथों में रंगबिरंगी चूडि़यां सजी हुई थीं. सोने की बड़ीबड़ी बालियां कानों से नीचे कंधे की तरफ लटक रही थीं. वह लाल रंग की साड़ी में ढकी हुई थी, ताकि ग्राहकों को आसानी से अपनी तरफ खींच सके.

पिछले 3 घंटे से पार्वती यों ही चाय की दुकान के बगल में खड़ी हो कर राहगीरों को अपनी तरफ इशारा कर के बुला रही थी, लेकिन अभी तक कोई भी ग्राहक उस के पास नहीं आया था.

पार्वती को आज से 10 साल पहले तक ग्राहकों को फंसाने के लिए इतनी ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी. उस ने कभी सोचा तक नहीं था कि उस को ये दिन भी देखने पड़ेंगे.

आज से 28-29 साल पहले जब पार्वती इस कोठे में आई थी तो उस को सब से ऊपरी मंजिल यानी चौथी मंजिल पर रखा गया था, जहां 3 सालों तक उस की निगरानी होती रही थी. वहां तो वह बैंच पर बैठी रहती थी और सिंगार भी बहुत कम करती थी, फिर भी ग्राहक खुद उस के पास बिना बुलाए आ जाते थे. लेकिन आज ऐसा समय आ गया है कि इक्कादुक्का ग्राहक ही फंस पाते हैं.

जो धंधेवालियां अब अधेड़ उम्र की हो गई हैं, वे सब से निचली मंजिल पर शिफ्ट कर दी गई हैं. चौथी और तीसरी मंजिल पर सभी नई उम्र की धंधेवालियां बाजार को संवारती हैं. दूसरी मंजिल पर 25 से ले कर 40 साल की उम्र तक की धंधेवालियां हैं और सब से निचली मंजिल पर 40 साल से ज्यादा उम्र की धंधेवालियां रहती हैं, जो किसी तरह अपनी उम्र इस कोठे में गुजार रही हैं.

ऊपरी मंजिलों पर जहां लड़कियां एक बार में ही 400-500 से ज्यादा

रुपए ऐंठती थीं, वहीं पार्वती को सिर्फ 50-100 रुपए पर संतोष करना पड़ता था. उस में से भी आधा पैसा तो कोठे की मालकिन यमुनाबाई को चुकाना पड़ता था.

आज जब पुराना जानापहचाना ग्राहक रामवीर, जिस की करोलबाग में कपड़ों की खानदानी दुकान है, पार्वती को देख कर बड़ी तेजी से शक्ल छुपाता हुआ ऊपरी मंजिल की तरफ चला गया तो पार्वती को बहुत दुख हुआ. वह उन दिनों को याद करने लगी, जब रामवीर की शादी नहीं हुई थी. तब वह अकसर अपनी जिस्मानी प्यास बुझाने के लिए पार्वती के पास आता था. अब पिछले कुछ महीने से एक बार फिर उस ने इस कोठे में आना शुरू किया है, लेकिन रंगरलियां नई उम्र की लड़कियों के साथ ऊपरी मंजिल पर मनाता है.

मंटू जैसे 50 से भी ज्यादा पुराने ग्राहक थे, जो पार्वती की तरह ही

45 साल से ज्यादा के हो चुके थे. इन के बच्चे भी जवान हो गए थे, लेकिन ये लोग भी हफ्ते में 1-2 बार 64 नंबर के कोठे में हाजिरी दे देते थे.

इन में से कई चेहरे पार्वती को अच्छी तरह से याद हैं. वह अभी तक इन्हें नहीं भूल पाई है. इन ग्राहकों में से कुछ की प्यारमुहब्बत वाली घिसीपिटी बातें आज तक पार्वती के कानों में गूंजती रहती हैं. लेकिन अब जब ये लोग पार्वती को देख कर तेज कदमों से ऊपर की मंजिलों पर चले जाते हैं तो वह टूट जाती है.

पार्वती नेपाल के एक खूबसूरत गांव से यहां आई थी. कोठे की दुनिया में फंस कर वह सिगरेटशराब पीने लगी थी. इस के बाद वह जिंदगी की सारी कमाई अपने आशिकों, दलालों और सहेलियों के साथ पी गई.

पार्वती के साथ 10 और लड़कियां भी नेपाल से यहां आई थीं, आधी से ज्यादा लड़कियां अपना 5 साल का करार पूरा कर के वापस लौट गईं और दूरदराज के पहाड़ी गांवों में अपने भविष्य को संवार चुकी थीं, लेकिन पार्वती की बदकिस्मती ने उस को इस दलदल से निकलने ही नहीं दिया.

दुनिया में देह धंधा ही एक ऐसा पेशा है, जहां पर अनुभव और समय बढ़ने

के साथ आमदनी और जिस्मफरोशी की कीमत में गिरावट होती जाती है. नई

उम्र की धंधेवालियों को तो मुंहमांगा पैसा मिल जाता है.

पार्वती जब 16 साल की थी तो उस को चौथी मंजिल पर जगह मिली थी. उस के बाद तीसरी मंजिल, दूसरी मंजिल पर आई और अब पहली मंजिल की अंधेरी कोठरी में आ कर अटक गई है, जहां पर बाहरी दुनिया को झांकने के लिए एक खिड़की तक नहीं है.

जब दिल नहीं लगता था तो पार्वती शीतल से बात करती थी, जो उसी के साथ नेपाल से यहां आई थी.

शीतल की एक बेटी थी, जिस के बाप का कोई अतापता नहीं था. उस लड़की ने एक साल पहले अपनी मां का कारोबार संभाल लिया था और चौथी मंजिल पर अपना बाजार लगाती थी.

उस के पास ही तीसरे बिस्तर पर सलमा रहती थी, जो राजस्थान के सीकर जिले से आज से 25 साल पहले यहां आई थी. उस को भी किसी अजनबी से एक बेटा पैदा हो गया था. बेटा अब मां को सहारा देने लगा था. उस को तालीम हासिल करने का मौका कभी नहीं मिल पाया था.

अब वह लड़का दलाली का काम करने लगा था. वह अजमेरी गेट, कमला मार्केट, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के इर्दगिर्द ग्राहकों की तलाश में मंडराता रहता था. वह अच्छाखासा पैसा कमा लेता था. कभीकभार तो वह ग्राहक से हजारों रुपए ऐंठ लेता था.

दूसरी तरफ लक्ष्मी बैठती थी, जो तेलंगाना के करीमनगर से पार्वती के जमाने में यहां आई थी. उस की हालत कमोबेश पार्वती जैसी ही थी. पार्वती की तरह ही लक्ष्मी को किसी भी अजनबी से कोई औलाद नहीं हो पाई थी.

पार्वती की यही तीनों सब से अच्छी सहेलियां थीं, जो अपना सुखदुख बांटती थीं. यही पार्वती का एक छोटा सा संसार था, एक छोटा सा समाज था.

पार्वती का जन्म नेपाल की राजधानी काठमांडू से काफी ऊपर एक सुंदर पहाड़ी गांव में हुआ था. गांव काफी चढ़ाई पर था, जहां पर तब 3 दिन तक पैदल चल कर पहुंचने के अलावा कोई दूसरा साधन नहीं था. लोग वहां से रोजगार की तलाश में मैदान और तराई के हिस्से में आते थे, क्योंकि गांव में जीविका का कोई भी अच्छा जरीया नहीं था.

पार्वती के मांबाप भी गांव के ज्यादातर लोगों की तरह गरीब थे और उन लोगों की जिंदगी पूरी तरह खेती पर ही निर्भर करती थी.

जब पार्वती 10 साल की थी तो उस का पिता बीमारी की चपेट में आ कर इस दुनिया से चल बसा था. अब घर में काम करने वालों में मां अकेली बच गई थी.

दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने में मां को काफी पसीना बहाना पड़ता था. वह पूरा दिन अपने छोटे से खेत में काम करती थी और बकरियां और भेड़ें पालती थी. पार्वती कामकाज में मां का हाथ बंटाने लगी थी.

पार्वती के घर से थोड़ा सा हट कर धर्म बहादुर का घर था. उस का घर दूर से देखने पर ही किसी सुखी अमीर आदमी का घर लगता था.

धर्म बहादुर हर साल 6 महीने के लिए पैसा कमाने के लिए दिल्ली चला जाता था और पैसा कमा कर गरमी के मौसम में घर लौट आता था. उस के बीवीबच्चे अच्छे कपड़े पहनते थे और अच्छा खाना खाते थे.

पार्वती की मां की नजर में धर्म बहादुर बहुत मेहनती और नेकदिल इनसान था. एक बार धर्म बहादुर दिल्ली से घर लौटा तो उस ने पार्वती की मां से कहा, ‘‘अब तो पार्वती 15 साल की हो गई है. अगर वह मेरे साथ दिल्ली जाती है तो उस को अपनी जानपहचान के सेठजी के घर में बच्चों का खयाल रखने का काम दिला देगा. उन का बच्चा छोटा है. पार्वती बच्चे की देखरेख करेगी. पैसा भी ठीकठाक मिल जाएगा और 2 सालों के अंदर वह मेरे साथ गांव वापस आ जाएगी.’’

मां ने कुछ सोचविचार किया और फिर वह मान गई, क्योंकि धर्म बहादुर एक अच्छा पड़ोसी था और मां को उस के ऊपर पूरा भरोसा था.

पार्वती के मन में भी अब दिल्ली जाने की लालसा जागने लगी थी. वह अब जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी. चेहरे पर खूबसूरती चढ़ने लगी थी. वह दिल्ली के बारे में काफी सुन चुकी थी. अब उसे अपनी आंखों से देखना चाहती थी.

उसी सर्दी में मां ने पार्वती को धर्म बहादुर के साथ दिल्ली भेज दिया. चूंकि वह उन का पड़ोसी था और पार्वती का दूर का चाचा लगता था, इसीलिए मां उस पर यकीन करती थी. पार्वती के पिता के मर जाने के बाद वह उन दोनों की थोड़ीबहुत मदद भी कर दिया करता था.

धर्म बहादुर पार्वती को हिमालय के आगोश में बसे हुए इस छोटे से पहाड़ी गांव से उतार कर सीधा दिल्ली के जीबी रोड के इस 64 नंबर कोठे में ले आया. अब अल्हड़ और भोलीभाली पार्वती को मालूम हुआ कि वह तो एक दलाल के हाथ में फंस गई है.

धर्म बहादुर 64 नंबर कोठे की चौथी मंजिल पर धंधेवालियों से नकदी वसूल कर बक्से में रखता था और यमुनाबाई को हिसाबकिताब दिया करता था. वह यमुनाबाई के लिए कई सालों से काम करता आ रहा था.

इस तरह से पार्वती कोठे की बदबूदार दुनिया में फंस गई थी. इस घटना ने उस की जिंदगी के रुख को पूरब से पश्चिम की तरफ मोड़ दिया था.

धर्म बहादुर ने कुछ पैसा मां को ईमानदारी से पहुंचा दिया था, लेकिन पार्वती दिल से काफी टूट गई थी. धर्म बहादुर ही उस की जिंदगी का पहला ऐसा मर्द था, जिस ने उसे कच्ची कली से फूल बना दिया था और फिर उस के बाद यमुनाबाई को एक सेठ ने शगुन में मोटी रकम दी और वह इस मासूम कली को 2 हफ्ते तक चूसता रहा. वह चाह कर भी यह सब नहीं रोक सकी थी.

इस के बाद तो पार्वती पूरी तरह से खुल चुकी थी. उदासी और डर की दुनिया से 3 महीने के अंदर ही बाहर निकल आई और कोठे की रंगीन दुनिया में इस तरह खो गई कि 30 साल किस तरह बीते, इस का उसे पता भी नहीं चला. हां, यहां आने के 3 साल बाद वह एक बार घर लौटी थी, पर तब तक मां बहुत ज्यादा बीमारी हो चुकी थी. बेटी के घर लौटते ही मां एक महीने के अंदर ही चल बसी.

कुछ दिनों के बाद पार्वती को फिर से उस कोठे की याद आने लगी थी, जहां पर कम से कम उस के आशिक उस की खूबसूरती की तारीफ तो करते थे. उस ने घर में ताला मार कर चाबी पड़ोसी को दे दी और फिर से कोठे की इसी रंगीन दुनिया में लौट आई. तब से ले कर आज तक वह यहीं पर फंसी रह गई.

जब कभी पार्वती बहुत ज्यादा मायूस होने लगती थी, तब वह सलीम चाय वाले से गुफ्तगू कर के अपने दिल को बहलाती थी. सलीम चाय वाला अपने अब्बा की मौत के बाद पिछले कई सालों से अकेला ही चाय बेचता आ रहा था. वह भी अब बूढ़ा हो गया था. वह पार्वती के सुनहरे लमहों से ले कर अभी तक की बदहाली का गवाह बन कर इस कोठे के गेट के सामने चाय बेचता आ रहा था.

वह पार्वती को कभीकभार मुफ्त में चाय, पान और सिगरेटगुटका दे दिया करता था. जब इन सब चीजों से भी उस का दिल तंग हो जाता था तो वह वीर बहादुर के पास कुछ देर बैठ कर नेपाली भाषा में बात कर लेती थी और अपने वतन के हालात पूछ लेती थी.

वीर बहादुर पार्वती के गांव के ही आसपास के किसी पहाड़ी गांव से यहां आया था और रिश्ते में धर्म बहादुर का दूर का भाई लगता था. अपने देशवासियों से बात कर के दिल को थोड़ाबहुत सुकून मिलता था.

जब पार्वती सड़क के किनारे खड़ीखड़ी थक जाती थी और कोई ग्राहक भी नहीं मिलता था तो वह उसी अंधेरी कोठरी में वापस लौट आती थी, जहां रात हो या दिन, हमेशा एक बल्ब टिमटिमाता रहता था और उस बल्ब में इतनी ताकत नहीं थी कि वह पूरी कोठरी को जगमगा पाए.

जब पार्वती खाली होती थी तब वह सामने रेलवे स्टेशन पर खड़ी जर्जर होती एक मालगाड़ी और अपनी जिंदगी के बारे में सोचते हुए खो जाती थी कि धंधेवाली की जवानी और जिंदगी भी इसी मालगाड़ी की तरह है, जो तेज रफ्तार से कहां से कहां तक चली जाती है, इस का पता भी नहीं चल पाता है.

जब वह ज्यादा चिंतित हो जाती तो सलमा उस को हिम्मत बंधाते हुए कहती थी, ‘‘मेरा बेटा है न. तुम को कुछ भी होगा तो वह मदद करेगा. जब तक मैं यहां हूं, तब तक हम दोनों साथसाथ रहेंगी. एकदूसरे की मदद करेंगी. तुम रोती क्यों हो… हम तवायफों की जिंदगी ही ऐसी है, इस पर रोनाधोना बेकार है.’’

अपनी सहेलियों की ऐसी बातों को सुन कर पार्वती ने आंसू सुखा लिए और अगले दिन के धंधे के बारे में सोचने लगी. शाम को चारों सहेलियां मिल कर शराब खरीदती थीं और नशे में खोने की कोशिश करती थीं लेकिन शराब भी अब उन पर कुछ असर नहीं कर पाती थी.

इधर कई दिनों से पार्वती काफी परेशान रहती थी. अपने पुश्तैनी घर के सामने के बगीचे, पेड़पौधे, पहाड़ पर झरने के उन सुंदर नजारों को काफी याद किया करती थी.

उन्हें देखने की काफी चाहत होती थी. लेकिन वह ऐसे कैदखाने में बंद थी, जहां शुरुआती दिनों की तरह अब ताला नहीं लगता था, लेकिन इतने सालों बाद इस कैदखाने से आजाद हो कर भी अपनेआप को अंदर से गुलाम महसूस करती थी. अब वह चाह कर भी कहीं जा नहीं पाती थी.

सुबह हो गई थी. अचानक पार्वती की नींद टूट गई. ऊपरी मंजिल से नेपाली लड़कियों के रोने की आवाज कानों में गूंजने लगी. वह उठ कर बैठ गई और आंखों को मलते हुए सोचने लगी, ‘ये लड़कियां, मेरी हमवतन क्यों रो रही हैं? कोई लड़की ऊपर मर तो नहीं गई?’

पार्वती दौड़ कर ऊपरी मंजिल की तरफ बढ़ी. जैसे ही वह वहां पर पहुंची, वैसे ही पाया कि कई लड़कियां जोरजोर से छाती पीटपीट कर रो रही थीं.

पूछने पर पता चला कि आज सुबह काठमांडू के आसपास एक विनाशकारी भूकंप आया है और सबकुछ तबाह हो चुका है. बहुत सारे घर तहसनहस हो गए हैं और हजारों की तादाद में लोग मारे गए हैं. इस में कई लड़कियों के सगेसंबंधी भी मर गए थे.

सामने वीर बहादुर चुपचाप बैठा हुआ था. उस की आंखों से आंसू टपक रहे थे. उस को देख कर पार्वती ने पूछा, ‘‘तू क्यों आंसू बहा रहा है बे? तेरा भी कोई सगासंबंधी भूकंप की चपेट में आया है क्या?’’

इस पर वीर बहादुर के मुंह से कुछ शब्द निकले, ‘‘मेरा मौसेरा भाई धर्म बहादुर भी अपनी बीवीबच्चों समेत घर में दब कर मर गया है. गांव में काफी लोग भूकंप में अपनी जान गंवा चुके हैं. सबकुछ तबाह हो गया है.’’

इतना कह कर वीर बहादुर रोने लगा, लेकिन पार्वती की आंखों से बिलकुल आंसू नहीं निकले. उस के गुलाबी चेहरे पर मुसकराहट और खुशी की लहर बिखरने लगी. इसे देख कर वीर बहादुर काफी अचरज में पड़ गया, किंतु पार्वती पर इन लोगों के रोनेधोने का कोई असर नहीं हुआ.

अगले दिन पार्वती ने सुबह के 10 बजे बैग में अपना सारा सामान पैक किया और रेलवे स्टेशन की तरफ चलने लगी. उस की सहेलियां शीतल, लक्ष्मी और सलमा की आंखों से आंसू टपक रहे थे. इतने सालों बाद वह अपनी सहेलियों को नम आंखों से विदाई दे रही थी.

वीर बहादुर तीसरी मंजिल से पार्वती की तरफ टकटकी निगाह से देख रहा था. सामने सलीम चाय वाले ने एक पान लगा कर पार्वती को दे दिया. पार्वती पान को शान से चबाते हुए रेलवे स्टेशन की तरफ अहिस्ताआहिस्ता बढ़ती जा रही थी. कुछ पलों के अंदर ही वह हमेशा के लिए इन लोगों की नजरों से ओझल हो गई. Hindi Story

Family Story In Hindi: छोटी छोटी बातें

Family Story In Hindi: मेरी एक पोती है. कुछ दिन हुए उस का जन्मदिन मनाया गया था. इस तरह वह अब 6 वर्ष से ज्यादा उम्र की हो गई है. उस की और मेरी बहुत छनती है. मेरे भीतर जो एक छोटा सा लड़का छिपा हुआ है वह उस के साथ बहुत खेलती है. उस के भीतर जो एक प्रौढ़ दिमाग है उस के साथ मैं वादविवाद कर सकता हूं. जब वह हमारे पास होती है तो उस का सारा संसार इस घर तक ही सीमित हो कर रह जाता है. जब वह चली जाती है तो फिर फोन पर बड़ी संक्षिप्त बात करती है. खुद कभी फोन नहीं करती. हम करें तो छोटी सी बात और फिर ‘बाय’ कह कर फोन रख देती है.

आज अचानक उस का फोन आ गया. मैं ने पूछा तो बोली, ‘‘बस, यूं ही फोन कर दिया.’’

‘‘क्या तुम स्कूल नहीं गईं?’’

‘‘नहीं, आज छुट्टी थी.’’

‘‘तो फिर हमारे पास आ जाओ. लेने आ जाऊं?’’

‘‘नहीं. मम्मी घर पर नहीं हैं. उन की छुट्टी नहीं.’’

‘‘तो उन को फोन पर बता दो या मैं उन को फोन कर देता हूं.’’

‘‘नहीं, मैं आना नहीं चाहती.’’

‘‘तो क्या कर रही हो?’’

‘‘वह जो कापी आप ने दी थी ना, उस पर लिख रही हूं.’’

‘‘कौन सी कापी?’’

‘‘वही स्क्रैप बुक जिस में हर सफे पर एक जैसे आदमी का नाम लिखना होता है, जो मुझे सब से ज्यादा अच्छा लगता हो.’’

‘‘तो लिख लिया?’’

‘‘सिर्फ 3 नाम लिखे हैं. सब से पहले सफे पर आप का. दूसरे  सफे पर मम्मी का, तीसरे पर नानी का…बस.’’

मैं ने सोचा, बाप के नाम का क्या हुआ, दादी के नाम का क्या हुआ? वह उसे इतना प्यार करती है. बेचारी को बहुत बुरा लगेगा. किंतु यह तो दिल की बात है. मेरी पोती की सूची, स्वयं उस के द्वारा तैयार की गई थी. किसी ने उसे कुछ बताया व सिखाया नहीं था. फिर मैं ने कहा, ‘‘उस के साथ उन लोगों की तसवीरें भी लगा देना.’’

‘‘आप के पास अपनी लेटेस्ट तसवीर है?’’

मैं ने कल ही तसवीर खिंचवाई थी. अच्छी नहीं आई थी. अब मेरी तसवीरें उतनी अच्छी नहीं आतीं जितनी जवानी के दिनों में आती थीं. न जाने आजकल के कैमरों को क्या हो गया है.

‘‘हां, है,’’ मैं ने उत्तर दिया. फिर मैं ने सलाह दी, ‘‘उन लोगों के जन्म की तारीख भी लिखना.’’

‘‘उन को अपने जन्म की तारीख कैसे याद होगी?’’

‘‘सब को याद होती है.’’

‘‘नहीं, जब वह पैदा हुए थे तो बहुत छोटे थे न, छोटे बच्चों को तो अपने जन्म की तारीख का पता नहीं होता.’’

‘‘बाद में लोग बता देते हैं.’’

‘‘आप कब पैदा हुए?’’

‘‘23 मार्च 1933.’’

‘‘अरे, इतना पहले? तब तो आप पुराने जमाने के हुए ना?’’

‘‘हां,’’ मैं ने कहा.

मुझे एक धक्का सा लगा. वह मुझे बूढ़ा कह रही थी बल्कि उस से भी ज्यादा प्राचीन काल का मानस, मानो मुझे किसी पुरातत्त्ववेत्ता ने कहीं से खोज निकाला हो.

‘‘तो फिर आप को नए जमाने की बातें कैसे मालूम हैं?’’

‘‘तुम्हारे द्वारा. तुम जो नए जमाने की हो. मुझे तुम से सब कुछ मालूम हो जाता है.’’

‘‘इसीलिए आप मेरे मित्र बनते हो?’’ उस ने बड़े गर्व से कहा.

‘‘हां, इसीलिए.’’

उसे मैं ने यह नहीं बताया कि वह मुझे हर मुलाकात में नया जीवन देती है. मुझे जीवित रखती है. यह बातें शायद उस के लिए ज्यादा गाढ़ी, ज्यादा दार्शनिक हो जातीं. तत्त्व ज्ञान और दर्शन भी आयु के अनुसार उचित शब्दों में समझाना चाहिए.

इस के पश्चात मैं चाहता था कि उस से कहूं कि वह जिन लोगों को प्यार करती है और जिन के नाम उस ने अपनी स्क्रैप बुक में लिखे हैं उन की उन खूबियों के बारे में लिखे जिन के कारण वह उसे अच्छे लगते हैं ताकि वह उस के मनोरंजन का विषय बन सके और बाद में फिर जब उस के अपने बच्चे हों तो उन की मानसिक वृद्धि और विस्तार का साधन बन सके.

इतने में उस ने सवाल किया, ‘‘आप के मरने की तारीख क्या होगी?’’

‘‘वह तो मुझे मालूम नहीं. मौत तो किसी समय भी हो सकती है. इसी समय और देर से भी. वह तो बाद में लिखी जा सकती है.’’

‘‘आप में से पहले कौन जाएगा, आप या दादी?’’

‘‘शायद मैं. परंतु कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

‘‘आप क्यों?’’

‘‘क्योंकि साधारण- तया मर्द लोग पहले मरते हैं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि वह उम्र में बड़े होते हैं.’’

‘‘परंतु अनिश से तो मैं बड़ी हूं.’’

मैं हंस पड़ा. अनिश उस का चचेरा भाई है. उस से 2 वर्ष छोटा और आजकल दोनों की बड़ी गहरी दोस्ती है.

‘‘तो क्या तुम अनिश से शादी करोगी?’’

मैं ने पूछा. ‘‘हां,’’ उस ने ऐसे अंदाज में कहा मानो फैसला हो चुका है और हमें मालूम होना चाहिए था.

‘‘परंतु अभी तो तुम बहुत छोटी हो. शादी तो बड़े हो कर होती है. हो सकता है कि तुम्हें बाद में कोई और लड़का अच्छा लगने लगे.’’

‘‘अच्छा,’’ उस ने हठ नहीं किया. वह कभी हठ नहीं करती. उचित तर्क हो तो उसे मान लेती है.

‘‘अच्छा, तो लोग मरते क्यों हैं?’’

इस प्रश्न का उत्तर तो अभी तक कोई नहीं दे सका है, बल्कि अनगिनत लोगों ने जरूरत से ज्यादा उत्तर देने की कोशिश की है और वह भी मरने से पहले. जिस बात का निजी अनुभव न हो उस के बारे में मुझे कुछ कहना पसंद नहीं. वह तो ‘सिद्धांत’ बन जाता है और मैं ‘सिद्धांतों’ से बच कर रहता हूं. लेकिन यह भी तो एक ‘सिद्धांत’ है.

बहरहाल, इस समय सवाल मेरी पोती के सवाल के जवाब का था और उस का कोई संतोषजनक उत्तर मेरे पास नहीं था, फिर भी मैं उसे निराश नहीं कर सकता था. मुझे एक आसान सा उत्तर सूझा. मैं ने कहा, ‘‘क्योंकि लोग बीमार हो जाते हैं.’’

‘‘बीमार तो मैं भी हुई थी, पिछले महीने.’’

‘‘नहीं, ऐसीवैसी बीमारी नहीं. बहुत गंभीर किस्म की बीमारी.’’

‘‘इस का मतलब कि बीमार नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां.’’

‘‘तो आप भी बीमार न होना.’’

‘‘कोशिश तो यही करता हूं.’’

‘‘आप भी बीमार न होना और मैं भी बीमार नहीं होऊंगी.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘तो फिर अगले इतवार को आप से मिलूंगी. आप की तसवीर भी ले लूंगी. हां, दादी से भी कहना कि वह भी बीमार न हों, नहीं तो खाना कौन खिलाएगा.’’

‘‘अच्छा, तो मैं दादी तक तुम्हारा संदेश पहुंचा दूंगा.’’

‘‘अच्छा, बाय.’’

अब मुझे अगले हफ्ते तक जिंदा रहना है ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी की यह कड़ी कायम रह सके. Family Story In Hindi

Hindi Story: विरासत – आकर्षण को मिला विरासत का तोहफा

Hindi Story: ‘‘दादाजी, आप का पाकिस्तान से फोन है,’’ आश्चर्य भरे स्वर में आकर्षण ने अपने दादा नंद शर्मा से कहा.

‘‘पाकिस्तान से, पर अब तो हमारा वहां कोई नहीं है. फिर अचानक…फोन,’’ नंद शर्मा ने तुरंत फोन पकड़ा.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘अस्सलामअलैकुम, मैं पाकिस्तान, जडांवाला से जहीर अहमद बोल रहा हूं. मैं ने आप का साक्षात्कार यहां के अखबार में पढ़ा था. मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि मेरे शहर जड़ांवाला के रहने वाले एक नागरिक ने हिंदुस्तान में खूब तरक्की पाई है. मैं ने यह भी पढ़ा है कि आप के मन में अपनी जन्मभूमि को देखने की बड़ी तमन्ना है. मैं आप के लिए कुछ उपहार भेज रहा हूं जो चंद दिनों में आप को मिल जाएगा, शेष बातें मैं ने पत्र में लिख दी हैं जो मेरे उपहार के साथ आप को मिल जाएगा.’’

फोन पर जहीर की बातें सुन कर नंद शर्मा भावुक हो उठे. फिर बोले, ‘‘भाई, आज बरसों बाद मैं ने अपने जन्मस्थान से किसी की आवाज सुनी है. आज आप से बात कर के 55 साल पहले का बीता समय आंखों के आगे घूम रहा है. मैं क्या कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है. बस, आप की समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं.’’

इतना कहतेकहते नंद शर्मा की आंखें डबडबा गईं. वह आगे कुछ न कह सके और फोन रख दिया.

14 साल का आकर्षण अपने दादाजी के पास ही खड़ा था. उस ने दादाजी को इतना भावुक होते कभी नहीं देखा था.

कुछ समय तक नंद शर्मा की आंखें नम रहीं. उन्हें ऐसा लगा था मानो वह वहां केवल शरीर से मौजूद थे, उन का मन 55 साल पहले के जड़ांवाला में था.

आकर्षण कुछ देर वहां बैठा और उन के सामान्य होने का इंतजार करता रहा. फिर बोला, ‘‘दादाजी, आप को अपने पुराने घर की याद आ रही है?’’

‘‘हां बेटा, बंटवारे के समय मैं 17 साल का था. आज भी मुझे वह दिन याद है जब जड़ांवाला में कत्लेआम शुरू हुआ और दंगाइयों ने चुनचुन कर हिंदुओं को गाजरमूली की तरह काटा था. हमारे पड़ोसी मुसलमान परिवार ने हमें शरण दी और फिर मौका पा कर एकएक कर के मेरे परिवार के लोगों को सेना के पास पहुंचा दिया था. मेरे परिवार में केवल मैं ही पाकिस्तान में बचा था. मैं भी मौका देख कर निकलने की ताक में था कि किसी ने दंगाइयों को खबर कर दी कि नंद शर्मा को उस के पड़ोसियों ने पनाह दे रखी है.

‘‘खबर पा कर दंगाई पागलों की तरह उस घर की ओर झपटे. इस से पहले कि वे मेरी ओर पहुंच पाते मुझे छत के रास्ते से उन्होंने भगा दिया.

‘‘मैं एक छत से दूसरी छत को फांदता हुआ जैसे ही सड़क पर पहुंचा कि तभी सेना का ट्रक आ गया और सेना को देख कर दंगाई भाग खड़े हुए. फिर उसी ट्रक से सेना ने मुझे अमृतसर के लिए रवाना कर दिया.

‘‘उस वक्त तक मैं यही समझता था कि यह अशांति कुछ समय की है… धीरधीरे सब ठीक हो जाएगा, मैं फिर अपने परिवार के साथ वापस जड़ांवाला जा पाऊंगा पर यह मेरा भ्रम था. पिछले 55 सालों में कभी ऐसा मौका नहीं आया. मेरा शहर, मेरी जन्मभूमि, मेरी विरासत हमेशा के लिए मुझ से छीन ली गई.’’

इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए. आकर्षण का मन अभी और भी बहुत कुछ जानने को इच्छुक था पर उस समय दादा को परेशान करना उचित नहीं समझा.

नंद शर्मा हरियाणा के अंबाला शहर में एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे. उन की गिनती वहां के वरिष्ठ पत्रकारों में होती थी. कुछ समय पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री ने एक पत्रकार सम्मेलन में उन्हें सम्मानित किया था. उस सम्मेलन में पाकिस्तान से भी पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल आया हुआ था. उस समारोह में नंद शर्मा ने इस बात का जिक्र किया था कि वह विभाजन के बाद जड़ांवाला से भारत कैसे आए थे और साथ ही वहां से जुड़ी यादों को भी ताजा किया.

समारोह समाप्त होने के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने उन का साक्षात्कार लिया और पाकिस्तान आ कर अपने अखबार में उसे छाप भी दिया. वह साक्षात्कार जड़ांवाला के वकील जहीर अहमद ने पढ़ा तो उन्हें यह जान कर बहुत दुख हुआ कि कोई व्यक्ति इस कदर अपनी जन्मभूमि को देखने के लिए तड़प रहा है.

जहीर एक नेकदिल इनसान था. उस ने नंद शर्मा के लिए फौरन कुछ करने का फैसला लिया और समाचारपत्र में प्रकाशित नंबर पर उन से संपर्क किया.

नंद शर्मा एक भरेपूरे परिवार के मुखिया थे. उन के 4 बेटे और 1 बेटी थी. सभी विवाहित और बालबच्चों वाले थे. आज के इस भौतिकवादी युग में भी सभी मिलजुल कर एक ही छत के नीचे रहते थे.

आकर्षण ने जब सब को पाकिस्तान से आए फोन के  बारे में बताया तो सब विस्मित रह गए. फिर नंद शर्मा के बड़े बेटे मोहन शर्मा ने पिता के पास जा कर कहा, ‘‘बाबूजी, यदि आप कहें तो हम सब जड़ांवाला जा सकते हैं और अब तो बस सेवा भी शुरू हो चुकी है. इसी बहाने हम भी अपने पुरखों की जमीन को देख आएंगे.’’

‘‘मन तो मेरा भी करता है कि एक बार जड़ांवाला देख आऊं पर देखो कब जाना होता है,’’ इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए.

एक दिन नंद शर्मा के नाम एक पार्सल आया. वह पार्सल देखते ही आकर्षण जोर से चिल्लाया, ‘‘दादाजी, आप के लिए पाकिस्तान से पार्सल आया है,’’ और इसी के साथ परिवार के सारे सदस्य उसे देखने के लिए जमा हो गए.

नंद शर्मा आंगन में कुरसी डाल कर बैठ गए. आकर्षण ने उस पैकेट को खोला. उस में 100 से भी अधिक तसवीरें थीं. हर तसवीर के पीछे उर्दू में उस का पूरा विवरण लिखा हुआ था.

नंद शर्मा के चेहरे पर उमड़ते खुशी के भावों को आसानी से पढ़ा जा सकता था. उन्होंने ही नहीं, उन का पूरा परिवार उन तसवीरों को देख कर भावविभोर हो उठा.

एक तसवीर उठाते हुए नंद शर्मा ने कहा, ‘‘यह देखो, हमारा घर, हमारी पुश्तैनी हवेली और यहां अब बैंक आफ पाकिस्तान बन गया है.’’

नंद शर्मा के पोतेपोतियां बहुत हैरान हो उन तसवीरों को देख रहे थे. उन के छोटे पोते मानू और शानू बोले, ‘‘दादाजी, क्या इन में आप का स्कूल भी है?’’

‘‘हां बेटा, अभी दिखाता हूं,’’ कह कर उन्होंने तसवीरों को उलटापलटा तो उन्हें स्कूल की तसवीर नजर आई. अपने स्कूल की तसवीर देख कर उन का चेहरा खिल उठा और वह खुशी से चिल्ला उठे, ‘‘यह देखो बच्चों, मेरा स्कूल और यह रही मेरी कक्षा. यहां मैं टाट पर बैठ कर बच्चों के साथ पढ़ता था.’’

धीरेधीरे जड़ांवाला के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, खेल के मैदान, सिनेमाघर, वहां की गलियां, पड़ोसियों के घर, गोलगप्पे, चाट वालों की दुकान और वहां की छोटी से छोटी जानकारी भी तसवीरों के माध्यम से सामने आने लगी. अंत में एक छोटी सी कपड़े की थैली को खोला गया. उस में कुछ मिट्टी थी और साथ में एक छोटा सा पत्र था. पत्र जहीर अहमद का था जिस में उस ने लिखा था :

‘नमस्ते, आज यह तसवीरें आप के पास पहुंचाते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है. आप भी सोचते होंगे कि मुझे क्या जरूरत पड़ी थी यह सब करने की. भाईजान, मेरे वालिद बंटवारे से पहले पंजाब के बटाला शहर में रहते थे. अपने जीतेजी वह कभी अपने शहर वापस न आ सके. उन के मन में यह आरजू ही रह गई कि वह अपनी जन्मभूमि को एक बार देख सकें. इसलिए जब मैं ने आप के बारे में पढ़ा तो फैसला किया कि आप की खुशी के लिए जो बन पड़ेगा, जरूर करूंगा.

‘भाईजान, इस पोटली में आप के पुश्तैनी मकान की मिट्टी है जो मेरे खयाल से आप के लिए बहुत कीमती होगी. इस के साथ ही मैं अपने परिवार की ओर से भी आप को पाकिस्तान आने की दावत देता हूं. आप जब चाहें यहां तशरीफ ला सकते हैं. आप अपने बच्चों, पोतेपोतियों के साथ यहां आएं. हम आप की खातिरदारी में कोई कमी नहीं रखेंगे.

‘आप का, जहीर अहमद.’

पत्र पढ़तेपढ़ते नंद शर्मा भावुक हो उठे. उन्होंने फौरन घर की पुश्तैनी मिट्टी को अपने माथे से लगाया और अपने पोते आकर्षण को बुला कर उस मिट्टी से सब के माथे पर तिलक करने को कहा.

‘‘दादाजी, पाकिस्तानी तो बहुत अच्छे हैं,’’ आकर्षण बोला, ‘‘फिर क्यों हम उस देश को नफरत की दृष्टि से देखते हैं. आज जहीर अहमद के कारण ही घरबैठे आप को अपनी विरासत के दर्शन हुए हैं.’’

‘‘ठीक कहते हो बेटा,’’ नंद शर्मा बोले, ‘‘घृणा और नफरत की दीवार तो चंद नेताओं और संकीर्ण विचारधारा वाले तथाकथित लोगों ने बनाई है. आम हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी के दिलों में कोई मैल नहीं है. आज अगर मैं तुम्हारे सामने जिंदा हूं तो अपने उस मुसलिम पड़ोसी परिवार के कारण जिन्होंने समय रहते मुझे व मेरे परिवार को वहां से बाहर निकाला.’’

नंद शर्मा अगले कुछ दिनों तक घर आनेजाने वालों को जड़ांवाला की तसवीरें दिखाते रहे. एक दिन शाम को जब वह पत्रकार सम्मेलन से वापस आए तो ‘हैप्पी बर्थ डे टू दादाजी’ की ध्वनि से वातावरण गूंज उठा. उस दिन उन के जन्मदिन पर बच्चों ने उन्हें पार्टी देने का मन बनाया था.

नंद शर्मा को उन के पोतेपोतियों ने घेर लिया और फिर उन्हें उस कमरे की ओर ले गए जहां केक रखा था. वहां जा कर उन्होंने केक काटा और फिर सब ने खूब मस्ती की. फोटोग्राफर को बुलवा कर तसवीरें भी खिंचवाई गईं. बाद में उन में से एक तसवीर जो पूरे परिवार के साथ थी, वह जड़ांवाला भेज दी गई.

वक्त गुजरता रहा. धीरधीरे पत्राचार और फोन के माध्यम से दोनों परिवारों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. देखते ही देखते 1 साल बीत गया. एक दिन जहीर अहमद का फोन आया, ‘‘भाईजान, ठीक 1 माह बाद मेरे बड़े बेटे की शादी है. आप सपरिवार आमंत्रित हैं. और हां, कोई बहाना बनाने की जरूरत नहीं है. मैं ने सारा इंतजाम कर दिया है. आप के पुरखों की विरासत आप का इंतजार कर रही है.’’

नंद शर्मा तो मानो इसी पल का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा, ‘‘ऐसा कभी हो सकता है कि मेरे भतीजे की शादी हो और मैं न आऊं. आप इंतजार कीजिए, मैं सपरिवार आ रहा हूं.’’

रात के खाने पर जब सारा परिवार जमा हुआ तो नंद शर्मा ने रहस्योद्घाटन किया, ‘‘ध्यान से सुनो, हम सब लोग अगले माह जड़ांवाला जहीर के बेटे की शादी में जा रहे हैं. अपनीअपनी तैयारियां कर लो.’’

‘‘हुर्रे,’’ सब बच्चे खुशी से नाच उठे.

‘‘सच है, अपनी जमीन, अपनी मिट्टी और अपनी विरासत, इन की खुशबू ही कुछ और है,’’ कह कर नंद शर्मा आंखें बंद कर मानो किसी अलौकिक सुख में खो गए. Hindi Story

Hindi Story : विषकन्या बनने का सपना

Hindi Story : इस महीने की 12 तारीख को अदालत से फिर आगे की तारीख मिली. हर तारीख पर दी जाने वाली अगली तारीख किस तरह से किसी की रोशन जिंदगी में अपनी कालिख पोत देती है, यह कोई मुझ से पूछे.

शादीब्याह के मसले निबटाने वाली अदालत यानी ‘मैट्रीमोनियल कोर्ट’ में फिरकी की तरह घूमते हुए आज मुझे 3 साल हो चले हैं. अभी मेरा मामला गवाहियों पर ही अटका है. कब गवाहियां पूरी होंगी, कब बहस होगी, कब मेरा फैसला होगा और कब मुझे न्याय मिलेगा. यह ‘कब’ मेरे सामने नाग की तरह फन फैलाए खड़ा है और मैं बेबस, सिर्फ लाचार हो कर उसे देख भर सकती हूं, इस ‘कब’ के जाल से निकल नहीं सकती.

वैसे मन में रहरह कर कई बार यह खयाल आता है कि शादीब्याह जब मसला बन जाए तो फिर औरतमर्द के रिश्ते की अहमियत ही क्या है? रिश्तों की आंच न रहे तो सांसों की गरमी सिर्फ एकदूसरे को जला सकती है, उन्हें गरमा नहीं सकती.

आपसी बेलागपन के बावजूद मेरा नारी स्वभाव हमेशा इच्छा करता रहा सिर पर तारों सजी छत की. मेरी छत मेरा वजूद था, मेरा अस्तित्व. बेशक, इस का विश्वास और स्नेह का सीमेंट जगहजगह से उखड़ रहा था फिर भी सिर पर कुछ तो था पर मेरे न चाहने पर भी मेरी छत मुझ से छीन ली गई, मेरा सिर नंगा हो गया, सब उजड़ गया. नीड़ का तिनकातिनका बिखर गया. प्रेम का पंछी दूर कहीं क्षितिज के पार गुम हो गया. जिस ने कभी मुझ से प्रेम किया था, 2 नन्हेनन्हे चूजे मेरे पंखों तले सेने के लिए दिए थे, उसे ही अब मेरे जिस्म से बदबू आती थी और मुझे उसे देख कर घिन आती थी.

अब से कुछ साल पहले तक मैं मिसेज वर्मा थी. 10 साल की परिस्थितियों की मार ने मेरे शरीर को बज्र जैसा कठोर बना दिया. अब तो गरमी व सर्दी का एहसास ही मिटने लगा है और भावनाएं शून्यता के निशान पर अटक गई हैं. लेकिन मेरे माथे की लाल, चमकदार बिंदी जब दुनिया की नजरों में धूल झोंक रही होती, मैं अकसर अपनी आंखों में किरकिरी महसूस किया करती.

उस दिन भी खूब जोरों की बारिश हुई थी. भीतर तक भीग जाने की इच्छा थी पर उस दिन बारिश की बूंदें, कांटों की चुभन सी पूरे जिस्म को टीस गईं और दर्द से आत्मा कराह उठी थी. मैं ने अपने बिस्तर पर, अपने अरमानों की तरह किसी और के कपड़े बिखरे देखे थे, मेरा आदमी, अपनी मर्दानगी का झंडा गाड़ने वाला पुरुष, हमेशा के लिए मेरे सामने नंगा हो चुका था.

‘‘हरामखोर तेरी हिम्मत कैसे हुई कमरे में इस तरह घुसने की?’’ शराब के भभके के साथ उस के शब्द हवा में लड़खड़ाए थे. मैं ने उन शब्दों को सुना. उस की जबान और मेरी टांगें लड़खड़ा रही थीं. मुझे लगा, जिस्म को अपने पैरों पर खड़ा करने की सारी शक्ति मुझ से किसी ने खींच ली थी. बड़ी मुश्किल से 2 शब्द मैं ने भी उत्तर में कहे थे, ‘‘यह मेरा घर है…मेरा…तुम ऐसा नहीं कर सकते.’’

इस से पहले कि मैं कुछ और कहती, देखते ही देखते मेरे जिस्म पर बैल्ट से प्रहार होने लगे थे. दोनों बच्चे मुझ से चिपके सिसक रहे थे, उन का कोमल शरीर ही नहीं आत्मा भी छटपटा रही थी.

इस के बाद बच्चों को सीने से लगाए मैं जिंदगी की अनजान डगर पर उतर आई थी. मेरी बेटी जो तब छठी में पढ़ती थी, आज 12वीं जमात में है, बेटा भी 8वीं की परीक्षा की तैयारी में है. उन दिनों मेरे बालों में सफेदी नहीं थी लेकिन आज सिर पर बर्फ सी गिरी लगती है. आंखों के ऊपर मोटे शीशे का चश्मा है. पीठ तब कड़े प्रहारों और ठोकरों से झुकती न थी लेकिन आज दर्द के एहसास ने ही बेंत की तरह उसे झुका दिया है. सच, यादें कितना निरीह और बेबस कर देती हैं इनसान को.

कुछ महीनों के बाद बातचीत, रिश्तेदारियां, सुलहसफाई और समझौते जैसी कई कोशिशें हुईं, पर विश्वास का कागजी लिफाफा फट चुका था, प्रेम की मिसरी का दानादाना बिखर गया था. बाबूजी का मानना कि आदमी का गुस्सा पानी का बुलबुला भर है, मिनटों में बनता, मिनटों में फूटता है, झूठ हो गया था. अकसर पुरुष स्वभाव को समझाते हुए कहते, ‘देख बेटी, मर्द कामकाज से थकाहारा घर लौटता है, न पूछा कर पहेलियां, उसे चिढ़ होती है…उसे समझने की कोशिश कर.’

मैं अपने बाबूजी को कैसे समझाती कि मैं ने इतने साल किस तरह अनसुलझी पहेलियां सुलझाने में होम कर दिए. सीने में बैठा अविश्वास का दर्द, बीचबीच में जब भी टीस बन कर उठता है तो लगता है किसी ने गाल पर तड़ाक से थप्पड़ मारा है.

मेरे, मेरे बच्चों और मेरे अम्मांबाबूजी के लंबे इंतजार के बाद भी कोई मुझे पीहर में बुलाने नहीं आया. मैं अमावस्या की रात के बाद पूर्णिमा की ओर बढ़ते चांद के दोनों छोरों में अकसर अपनी पतंग का माझा फंसा, उसे नीचे उतारने की कोशिश करती, लेकिन चांद कभी मेरी पकड़ में नहीं आया. मेरा माझा कच्चा था.

मेरी बेटी नींद से उठ कर अकसर अपनी बार्वी डौल कभी राह, कभी अलमारी के पीछे तो कभी अपने खिलौनों की टोकरी में तलाशती और पूछती, ‘‘मां, हम अपने पुराने घर कब जाएंगे?’’

उस के इस सवाल पर मैं सिहर उठती, ‘‘हाय, मेरी बेटी…भाग्य ने अब तुझ से तेरी बार्बी डौल छीन कर ऐसे अंधे कुएं में फेंक दी है, जहां से मैं उसे ढूंढ़ कर कभी नहीं ला सकती.’’

बेटी चुप हो जाती और मैं गूंगी. इसी तरह मेरी मां भी गूंगी हो जातीं जब मैं पूछती, ‘‘अम्मां, आप ने मेरे बारे में क्या सोचा? मैं क्या करूं, कहां जाऊं? मेरे 2 छोटेछोटे बच्चे हैं, इन को मैं क्या दूं? प्राइवेट स्कूल की टीचर की नौकरी के सहारे किस तरह काटूंगी पहाड़ सी पूरी जिंदगी?’’

मां की जगह कंपकंपाते हाथों से छड़ी पकड़े, आंखों के चश्मे को थोड़ा और आंखों से सटाते हुए बाबूजी, टूटी बेंत की कुरसी पर बैठते हुए उत्तर देते, ‘‘बेटी, अब जो सोचना है वह तुझे ही सोचना है, जो करना है तुझे ही करना है…हमारी हालत तो तू देख ही रही है.’’

ठंडी आह के साथ उन के मन का गुबार आंखों से फूट पड़ता, ‘समय ने कैसी बेवक्त मार दी है तोषी की अम्मां…मेरी बेटी की जिंदगी हराम कर दी, इस बादमाश ने.’

बस, इसी तरह जिंदगी सरकती जा रही थी. एक दिन सर्द हवा के झोंकों की तरह यह खबर मेरे पूरे वजूद में सिहरन भर गईं कि फलां ने दूसरी शादी कर ली है.

‘शादी, यह कैसे हो सकता है? हमारा तलाक तो हुआ ही नहीं,’ मैं ने फटी आंखों से एकसाथ कई सवाल फेंक दिए थे. लग रहा था कि पांव के नीचे की धरती अचानक ही 5-7 गज नीचे सरक गई हो और मैं उस में धंसती चली जा रही हूं.

अम्मां और बाबूजी ने फिर हिम्मत बंधाई, ‘उस के पास पैसा है, खरीदे हुए रिश्ते हैं, तो क्या हुआ, सच तो सच ही है, हिम्मत मत हारो, कुछ करो. सब ठीक हो जाएगा.’

मैं ने जाने कैसी अंधी उम्मीद के सहारे अदालत के दरवाजे खटखटा दिए, ‘दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो, मुझे न्याय दो, मेरा हक दो…झूठ और फरेब से मेरी झोली में डाला गया तलाक मेरी शादी के जोड़े से भारी कैसे हो सकता है?’ मैं ने पूछा था, ‘मेरे बच्चों के छोटेछोटे कपड़े, टोप, जूते और गाडि़यां, तलाक के कागजी बोझ के नीचे कैसे दब सकते हैं?’

मैं ने चीखचीख कर, छाती पीटपीट कर, उन झूठी गवाहियों से पूछा था जिन्होंने चंद सिक्कों के लालच में मेरी जिंदगी के खाते पर स्याही पोत दी थी. लेकिन किसी ने न तो कोई जवाब देना था, न ही दिया. आज अपने मुकदमे की फाइल उठाए, कचहरी के चक्कर काटती, मैं खुद एक मुकदमा बन गई हूं. हांक लगाने वाला अर्दली, नाजिर, मुंशी, जज, वकील, प्यादा, गवाह सभी मेरी जिंदगी के शब्दकोष में छपे नए काले अक्षर हैं.

आजकल रात के अंधेरे में मैं ने जज की तसवीर को अपनी आंखों की पलकों से चिपका हुआ पाया है. न्यायाधीश बिक गया, बोली लगा दी चौराहे पर उस की, चंद ऊंची पहुंच के अमीर लोगों ने. लानत है, थू… यह सोचने भर से मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है.

भावनाओं के भंवर में डूबतीउतराती कभी सोचती हूं, मेरा दोष ही क्या था जिस की उम्रकैद मुझे मिली और फांसी पर लटके मेरे मासूम बच्चे. न चाहते हुए भी फाड़ कर फेंक देने का जी होता है उन बड़ीबड़ी, लालकाली किताबों को, जिन में जिंदगी और मौत के अंधे नियम छपे हैं, जो निर्दोषों को जीने की सजा और कसूरवारों को खुलेआम मौज करने की आजादी देते हैं. जीने के लिए संघर्ष करती औरत का अस्तित्व क्यों सदियों से गुम होता रहा है, समाज की अनचाही चिनी गई बड़ीबड़ी दीवारों के बीच?

ये प्रश्न हर रोज मुझे नाग बन कर डंसते हैं और मैं हर रोज कटुसत्य का विषपान करती, विषकन्या बनने का सपना देखती हूं.

आसमान में बादल का धुंधलका मुझे बोझिल कर जाता है लेकिन बादलों की ही ओट से कड़कती बिजली फिर से मेरे अंदर उम्मीद जगाती है जीने की, अपनी अस्मिता को बरकरार रखने की और मैं बारिश में भीतर तक भीगने के लिए आंगन में उतर आती हूं.

लेखक – निर्मलविक्रम

विरक्ति: उस बूढ़े दंपति में कैसे संक्रमण फैला?

मैं उन से मिलने गया था. पैथोलाजी विभाग के अध्यक्ष और ब्लड बैंक के इंचार्ज डा. कांत खराब मूड में थे, विचलित और विरक्त.

‘‘सब बेमानी है, बकवास है. महज दिखावा और लफ्फाजी है,’’ माइक्रो- स्कोप में स्लाइड देखते हुए वह कहे जा रहे थे, ‘‘सोचता हूं सब छोड़छाड़ कर बच्चों के पास चला जाऊं. बहुत हो गया.’’

‘‘क्या हुआ, सर? क्या हो गया?’’ मैं ने पूछा तो कुछ क्षण चुपचाप माइक्रोस्कोप में देखते रहे, फिर बोले, ‘‘एच.आई.वी., एड्स… ऐसा शोर मचा रखा है जैसे देश में यही एक महामारी है.’’

‘‘सर, खूब फैल रही है. कहते हैं अगर रोकथाम नहीं की गई तो स्थिति भयानक हो जाएगी. महामारी…’’

मेरी बात बीच में ही काटते हुए डा. कांत तल्ख लहजे में बोले, ‘‘महामारी, रोकथाम. क्या रोकथाम कर रहे

हो. पांचसितारा होटल

में कानफ्रेंस, कंडोम वितरण. महामारी तो तुम लोगों के आडंबर और हिपोक्रेसी की है. बड़ी चिंता है लोगों की. इतनी ही चिंता है तो हिपे- टाइटिस बी. के बारे में क्यों नहीं कुछ करते. देश में महामारी हिपे टाइ-टिस बी. की है.

‘‘हजारों लोग हर साल मर रहे हैं, लाखों में संक्रमण है. यह भी तो वैसा ही रक्त प्रसारित, विषाणुजनित रोग है. इस की चिंता क्यों नहीं. असल में चिंता तो विदेशी पैसे और बिलगेट्स की है. एड्स उन की चिंता है तो हमारी चिंता भी है.’’

‘‘क्या हुआ, सर? आज तो आप बहुत नाराज हैं,’’ मैं बोला.

‘‘होना क्या है, तुम लोगों की बकवास सुनतेदेखते तंग आ गया हूं. एच.आई.वी., एड्स, दोनों का एकसाथ ऐसे प्रयोग करते हो जैसे संक्रमण न हुआ दालचावल की खिचड़ी हो गई. क्या दोनों एक ही बात हैं. क्या रोकथाम कर रहे हो? तुम्हें याद है यूनिवर्सिटी वाली उस महिला का केस?’’

‘‘कौन सी, सर? उस अविवाहित महिला का केस जिस ने रक्तदान किया था और जिस का ब्लड एच.आई.वी. पाजिटिव निकला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, वही,’’ डा. कांत बोले.

‘‘उस को कैसे भूल सकते हैं, सर. गुस्से से आगबबूला हो रही थी. हम ने तो उसे गुडफेथ में बुला कर रिजल्ट बताया था वरना कानूनन एच.आई.वी. पोजि-टिव ब्लड को नष्ट करना भर लाजमी होता है. हमारा पेशेंट तो रक्त लेने वाला होता है, देने वाला तो स्वेच्छा से आता है. देने वाले में रोग निदान के लिए तो हम टेस्ट करते नहीं.’’

डा. कांत कुछ नहीं बोले, चुपचाप सुनते रहे.

‘‘वह महिला अविवाहित थी. उस के किसी से यौन संबंध नहीं थे. उस ने कभी रक्त नहीं लिया और न ही किसी प्रकार के इंजेक्शन आदि. इसीलिए तो हम ने उस की प्री टेस्ट काउंसिलिंग कर वेस्टर्न ब्लोट विधि से टेस्ट करवाने की सलाह दी थी. हम ने उसे बता दिया था कि जिस एलिसा विधि से हम टेस्ट करते हैं वह सेंसिटिव होती है, स्पेसिफिक नहीं. उस में फाल्स पाजिटिव होने के चांसेज होते हैं. सब तो समझा दिया था, सर. उस में हम ने क्या गलती की थी?’’

‘‘गलती की बात नहीं. इन टेस्टों के चलते उस महिला को जो मानसिक क्लेश हुआ उस के लिए कौन जिम्मेदार है?’’

‘‘सर, उस के लिए हम क्या कर सकते थे. जीव विज्ञान में कोई भी टेस्ट 100 प्रतिशत तो सही होता नहीं. हर टेस्ट की अपनी क्षमता होती है. हर टेस्ट में फाल्स पाजिटिव या फाल्स निगेटिव होने की संभावना

होती है. सेंसिटिव में फाल्स पाजिटिव और स्पेसिफिक में फाल्स निगेटिव.’’

‘‘बड़ी ज्ञान की बातें कर रहे हो,’’ डा. कांत बोले, ‘‘यह बात आम लोगों को समझाने की जिम्मेदारी किस की है? खुद को उस महिला की जगह, उस की समझ और सोच के हिसाब से रख कर देखो. उसे कितना संताप हुआ होगा. खैर, उसे छोड़ो. उस लड़के की बात करो जो अपनी लिम्फनोड की बायोप्सी ले कर आया था. उस का तो वेस्टर्न ब्लोट टेस्ट भी पाजिटिव आया था. वह तो कनफर्म्ड एच.आई.वी. पाजिटिव था. उस में क्या किया? क्या किया तुम ने रोकथाम के लिए?’’

‘‘वही जवान लड़का न सर, जिस की किसी बाहर के सर्जन ने गले की एक लिम्फनोड निकाल कर भिजवाई थी? जिस लड़के को कभीकभार बुखार, शरीर गिरागिरा रहना और वजन कम होने की शिकायत थी, पर सारे टेस्ट करवाने पर भी कोई रोग नहीं निकला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, वही,’’ डा. कांत बोले, ‘‘याद है तुम्हें, वह बायोप्सी रक्त कैंसर की आरंभिक अवस्था न हो, इस का परीक्षण करवाने आया था. टेस्ट में रक्त कैंसर के लक्षण तो नहीं पाए गए थे, पर उस की लिम्फनोड में ऐसे माइक्रोस्कोपिक चेंजेज थे जो एच.आई.वी. पाजिटिव मामलों में देखने को मिलते हैं.’’

‘‘जी, सर याद है. उस की स्वीकृति ले कर ही हम ने उस का एच.आई.वी. टेस्ट किया था और वह पाजिटिव निकला था. उसे हम ने पाजिटिव टेस्ट के बारे में बताया था. उस की भी हम ने काउंसिलिंग की थी. किसी प्रकार के यौन संबंधों से उस ने इनकार किया था. रक्त लेने, इंजेक्शन, आपरेशन आदि किसी की भी तो हिस्ट्री नहीं थी. हम ने सब समझा कर नियमानुसार ही उसे वैस्टर्न ब्लोट टेस्ट करवाने की सलाह दी थी.’’

‘‘नियमानुसार,’’ बड़े तल्ख लहजे में डा. कांत ने दोहराया, ‘‘जब उस ने आ कर बताया था कि उस का वैस्टर्न ब्लोट टेस्ट भी पाजिटिव है तब तुम ने नियमानुसार क्या किया था? याद है उस ने आ कर माफी मांगी थी. हम से झूठ बोलने के लिए माफी. उस ने बाद में बताया था कि उस की शादी हो चुकी है, गौना होना है. मंगेतर कालिज में पढ़ रही थी. उस ने यौन संबंध न होने का झूठ भी स्वीकारा था. उस ने कहा था वह और उस के कुछ दोस्त एक लड़की के यहां जाते थे, याद है?’’

‘‘जी, सर, अच्छी तरह याद है, भले घर का सीधासादा लड़का था. उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया था. बड़ा घबराया हुआ था. जानना चाहता था कि उस का क्या होगा. हम ने उस की पूरी पोस्ट टेस्ट काउंसिलिंग की थी. बता दिया था उसे, कैसे सुरक्षित जीवन जीना…’’

‘‘नियमानुसार जबानी जमाखर्च हुआ और एड्स की रोकथाम

की जिम्मेदारी

पूरी हो गई,’’

डा. कांत ने बीच में बात काटी.

‘‘और क्या कर सकते थे, सर?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जिस लड़की के साथ उस का विवाह हो चुका था और गौना होना था उसे ढूंढ़ कर बताना आवश्यक नहीं था? उस के प्र्रति क्या तुम्हारा दायित्व नहीं था? तुम कौन सा वह केस बता रहे थे जिस में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि अगर आप का कोई रोगी एच.आई.वी. या ऐसे ही किसी संक्रमण से ग्रसित है और वह किसी व्यक्ति को संक्रमण फैला सकता है तो ऐसे व्यक्ति को इस खतरे के बारे में न बताने पर डाक्टर को दोषी माना जाएगा. अगर उस चिह्नित रोगी व्यक्ति को संक्रमण हो जाए तो उस डाक्टर के खिलाफ फौजदारी की काररवाई भी हो सकती है.’’

‘‘जी सर, डा. एक्स बनाम अस्पताल एक्स नाम का मामला था,’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, वही, अजीब नाम था केस का,’’ डा. कांत ने कहना जारी रखा, ‘‘लिम्फनोड वाले लड़के ने अपने दोस्तों के बारे में बताया था. क्या उन दोस्तों को पहचान कर उन का भी एच.आई.वी. टेस्ट करना आवश्यक नहीं था? क्या उस लड़की या वेश्या, जिस के यहां वे जाते थे उसे पहचानना, उस का टेस्ट करना आवश्यक नहीं था? एड्स की रोकथाम के लिए क्या उसे पेशे से हटाना जरूरी नहीं था?’’

‘‘जरूरी तो था, सर, पर नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, और न ही ऐसी कोई व्यवस्था है जिस से हम यह सब कर सकें,’’ मैं ने अपनी मजबूरी बताई.

‘‘तो फिर एड्स की रोकथाम क्या खाक करोगे. बेकार के ढकोसले क्यों करते हो? जो एच.आई.वी. पाजिटिव है उसे बताने की क्या आवश्यकता है. उसे जीने दो अपनी जिंदगी. जब एच.आई.वी. पाजिटिव व्यक्ति एड्स का रोगी हो कर आए तब जो करना हो वह करना.’’

‘‘लेकिन सर,’’ मैं ने कहना शुरू किया तो डा. कांत ने फिर बीच में ही टोक दिया.

‘‘लेकिन दुर्भाग्य तो यह है कि एच.आई.वी. संक्रमण, वेश्या के पास जाने या यौन संबंधों से ही नहीं, किसी शरीफ आदमी और महिला को चिकित्सा प्रक्रिया से भी हो सकता है,’’ वह बोले.

‘‘हां, सर, एच.आई.वी. संक्रमण होने के तुरंत बाद जिसे हम विंडो पीरियड कहते हैं, ब्लड टेस्ट पाजिटिव नहीं आता. लेकिन ऐसा व्यक्ति अगर रक्तदान करे तो उस से रक्त पाने वाले को संक्रमण हो सकता है.’’

सुन कर डा. कांत बोले, ‘‘मैं इस चिकित्सा प्रक्रिया की बात नहीं कर रहा. ऐसा न हो उस के पूरे प्रयास किए जाते हैं, जिस केस को ले कर मुझे ग्लानि विरक्ति और अपनेआप को दोषी मान कर क्षोभ हो रहा है और जिसे ले कर मैं सबकुछ छोड़ने की बात कर रहा हूं, वह कुछ और ही है.’’

मैं कुछ बोला नहीं. चुपचाप उन के बताने का इंतजार करता रहा. अवश्य ही कोई खास बात होगी जिस ने डा. कांत जैसे वरिष्ठ चिकित्सक को इतना विचलित कर दिया कि वह सबकुछ छोड़ने की सोच रहे हैं.

काफी देर चुप रहने के बाद बड़ी संजीदगी से लरजती आवाज में वह बोले, ‘‘कल देर रात घर आए थे, मियांबीवी दोनों. काफी बुजुर्ग हैं. रिटायर हुए भी 15 साल हो चुके हैं. बेटेपोतों के भरे परिवार के साथ रहते हैं.

‘‘कहने लगे, दोनों सोच रहे हैं कहीं जा कर चुपके से आत्महत्या कर लें क्योंकि एच.आई.वी पाजिटिव होना बता कर मैं ने उन्हें किसी लायक नहीं रखा है. मैं ने उन्हें किसलिए बताया कि वे एच.आई.वी. पाजिटिव हैं. उन दोनों का किसी से यौन संबंध नहीं हो सकता और न ही रक्तदान करने की उन की उम्र है. फिर उन से संक्रमण होने का किसे खतरा था जो मैं ने उन्हें एच.आई.वी. पाजिटिव होने के बारे में बताया? जब एच.आई.वी. का निदान कर कुछ किया ही नहीं जा सकता तो फिर बताया किसलिए? वे कैसे सहन करेंगे, अपने बच्चों, पोतों का बदला हुआ रुख जब उन्हें मालूम होगा. उन को संक्रमण का कोई खतरा नहीं है पर अज्ञात का भय, जब बच्चे उन के पास आने से कतराएंगे. कहने लगे, उचित यही होगा कि नींद की गोलियां खा कर जीवन समाप्त कर लें.’’

कहतेकहते डा. कांत चुप हो गए तो मैं ने कहा, ‘‘सर, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. एड्स संक्रमण ऐसे तो होता नहीं. जब संक्रमण हुआ है तो उसे भुगतना और फेस भी करना ही होगा.’’

जवाब में डा. कांत ने कहा, ‘‘मेरी भी समझ में नहीं आया था कि उन्हें संक्रमण हुआ कैसे. मैं उन्हें अरसे से बहुत नजदीक से जानता हूं. घनिष्ठ घरेलू संबंध हैं. बड़ा साफसुथरा जीवन रहा है उन का. किसी प्रकार के बाहरी यौन संबंधों का सवाल ही नहीं उठता और उन का विश्वास करने का भी कोई कारण नहीं.

‘‘जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं था कि जिस से चाहेअनचाहे एच.आई.वी. संक्रमण हो सकता. सब पूछा था, काफी चर्चा हुई. वे बारबार मुझ से ही पूछते थे कि फिर कैसे हो गया संक्रमण. अंत में उन्होंने मुझे बताया कि वे डायबिटीज के रोगी अवश्य हैं. उन्हें इंसुलिन या अन्य इंजेक्शन तो कभी लेने नहीं पड़े पर वे नियमित रूप से टेस्ट करवाने एक प्राइवेट लैब में जाते थे. उन्होंने बताया, उस लैब में उंगली से ब्लड एक प्लंजर से लेते थे. दूसरे रोगियों में भी वही प्लंजर काम में लिया जाता था.

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‘‘क्या उस से उन को संक्रमण हुआ है, क्योंकि इस के अलावा तो उन्होंने कभी कोई इंजेक्शन नहीं लिए. जब मैं ने बताया कि यह संभव है तो उन्होंने कहा कि इस लैब के खिलाफ काररवाई क्यों नहीं करते? लैब को ऐसा करने से रोका क्यों नहीं गया? जो उन्हें हुआ है वह दूसरे मासूम लोगों को भी हो सकता है या हुआ होगा.’’

कुछ पल शांत रह कर वह फिर बोले, ‘‘और मैं सोच रहा था कि आत्महत्या उन्हें करनी चाहिए या मुझे? क्या लाभ है ऐसे रोगों का निदान करने में जिन का इलाज नहीं कर सकते और जिन की रोकथाम हम करते नहीं. महज ऐसे रोेगियों का जीना दुश्वार करने से लाभ? क्या सोचते होंगे वे लोग जिन का निदान कर मैं ने जीना दूभर कर दिया?’’        द्य

नौटंकीबाज पत्नी : क्या सागर कर पाया खुदकुशी

इसलिए सागर को अपने लिए बागबगीचे पसंद करने और मांसमछली पका लेने वाली पत्नी चाहिए थी. वह चाहता था कि उस की पत्नी घर और खेतीबारी संभालते हुए गांव में रह कर उस के मातापिता की सेवा करे, क्योंकि सागर नौकरी में बिजी रहने के चलते ज्यादा दिनों तक गांव में नहीं ठहर सकता था. ऐसे में उसे ऐसी पत्नी चाहिए थी जो उस का घरबार बखूबी संभाल सके.

आखिरकार, सागर को वैसी ही लड़की पत्नी के रूप में मिल गई, जैसी उसे चाहिए थी. नयना थोड़ी मुंहफट थी, लेकिन खूबसूरत थी. उस ने शादी की पहली रात से ही नखरे और नाटक करना शुरू कर दिया. सुहागरात पर सागर से बहस करते हुए वह बोली, ‘‘तुम अपना स्टैमिना बढ़ाओ. जो सुख मुझे चाहिए, वह नहीं मिल पाया.’’

दरअसल, सागर एक आम आदमी की तरह सैक्स में लीन था, लेकिन वह बहुत जल्दी ही थक गया. इस बात पर नयना उस का जम कर मजाक उड़ाने लगी, लेकिन सागर ने उस की किसी बात को दिल पर नहीं लिया. उसे लगा, समय के साथसाथ पत्नी की यह नासमझी दूर हो जाएगी. छुट्टियां खत्म हो चुकी थीं और उसे मुंबई लौटना था.

नयना ने कहा, ‘‘मुझे इस रेगिस्तान में अकेली छोड़ कर क्यों जा रहे हो?’’

सच कहें तो नयना भी यही चाहती थी कि सागर गांव में न रहे, क्योंकि पति की नजर व दबाव में रहना उसे पसंद नहीं था और न ही उस के रहते वह पति के दोस्तों को अपने जाल में फंसा सकती थी. मायके में उसे बेरोकटोक घूमने की आदत थी, जिस वजह से गांव के लड़के उसे ‘मैना’ कह कर बुलाते थे.

मुंबई पहुंचने के बाद सागर जब भी नयना को फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. उसे अकसर कालेज के दोस्तों के फोन आते थे.

लेकिन धीरेधीरे सागर को शक होने लगा कि कहीं नयना अपने बौयफ्रैंड से बात तो नहीं करती है? सागर की मां ने बताया कि नयना घर का कामधंधा छोड़ कर पूरे गांव में आवारा घूमती रहती है.

एक दिन अचानक सागर गांव पहुंच गया. बसस्टैंड पर उतरते ही सागर ने देखा कि नयना मैदान में खड़ी किसी लड़के से बात कर रही थी और कुछ देर बाद उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ कर वह चली गई. देखने में वह लड़का कालेज में पढ़ने वाला किसी रईस घर की औलाद लग रहा था. नैना उस से ऐसे चिपक कर बैठी थी, जैसे उस की प्रेमिका हो.

घर पहुंचने के बाद सागर और नैना में जम कर कहासुनी हुई. नैना ने सीधे शब्दों में कह दिया, ‘‘बौयफ्रैंड बनाया है तो क्या हुआ? मुझे यहां अकेला छोड़ कर तुम वहां मुंबई में रहते हो. मैं कब तक यहां ऐसे ही तड़पती रहूंगी? क्या मेरी कोई ख्वाहिश नहीं है? अगर मैं ने अपनी इच्छा पूरी की तो इस में गलत क्या है? तुम खुद नौर्मल हो क्या?’’

‘‘मैं नौर्मल ही हूं. लेकिन तू हवस की भूखी है. फिर से उस मोटरसाइकिल वाले के साथ अगर गई तो घर से निकाल दूंगा,’’ सागर चिल्लाया.

‘‘तुम क्या मुंबई में बिना औरत के रहते हो? तुम्हारे पास भी तो कोई होगी न? ज्यादा बोलोगे तो सब को बता दूंगी कि तुम मुझे जिस्मानी सुख नहीं दे पाते हो, इसलिए मैं दूसरे के पास जाती हूं.’’

यह सुन कर सागर को जैसे बिजली का करंट लग गया. ‘इस नौटंकीबाज, बदतमीज, पराए मर्दों के साथ घूमने वाली औरत को अगर मैं ने यहां से भगा दिया तो यह मेरी झूठी बदनामी कर देगी… और अगर इसे मां के पास छोड़ता हूं तो यह किस के साथ घूम रही होगी, क्या कर रही होगी, यही सब सोच कर मेरा काम में मन नहीं लगेगा,’ यही सोच कर सागर को नींद नहीं आई. वह रातभर सोचता रहा, ‘क्या एक पल में झूठ बोलने, दूसरे पल में हंसने, जोरजोर से चिल्ला कर लोगों को जमा करने, तमाशा करने और धमकी देने वाली यह औरत मेरे ही पल्ले पड़नी थी?’

बहुत देर तक सोचने के बाद सागर के मन में एक विचार आया और बिना किसी वजह से धमकी देने वाली इस नौटंकीबाज पत्नी नयना को उस ने भी धमकी दी, ‘‘नयना, मैं तुझ से परेशान हो कर एक दिन खुदकुशी कर लूंगा और एक सुसाइड नोट लिख कर जाऊंगा कि तुम ने मुझे धोखा दे कर, डराधमका कर और झूठी बदनामी कर के आत्महत्या करने पर मजबूर किया है. किसी को धोखा देना गुनाह है. पुलिस तुझ से पूछताछ करेगी और तेरा असली चेहरा सब के सामने आएगा. तेरे जैसी बदतमीज के लिए जेल का पिंजरा ही ठीक रहेगा.’’

सागर के लिए यह औरत सिर पर टंगी हुई तलवार की तरह थी और उसे रास्ते पर लाने का यही एकमात्र उपाय था. खुदकुशी करने का सागर का यह विचार काम आ गया. यह सुन कर नयना घबरा गई.

‘‘ऐसा कुछ मत करो, मैं बरबाद हो जाऊंगी,’’ कह कर नयना रोने लगी.

इस के बाद सागर ने नयना को मुंबई ले जाने का फैसला किया. उस ने भी घबरा कर जाने के लिए हां कर दी. उस के दोस्त फोन न करें, इसलिए फोन नंबर भी बदल दिया.

अब वे दोनों मुंबई में साथ रहते हैं. नयना भी अपने बरताव में काफी सुधार ले आई है.

अनकही व्यथा: दहेज प्रथा से जूझते आम लोगों की कहानी

कालोनी में सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर सुदर्शन के यहां उन की पुत्री के विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं. सुदर्शन ने 3 वर्ष पहले ही कालोनी में मकान बनवाया था और उस समय की लागत के अनुसार मकान बनवाने में केवल 1 लाख रुपए लगे थे. 4 बडे़ कमरे, बैठक, रसोईघर, हरेक कमरे से जुड़ा गुसलखाना, सामने सुंदर लान जिस में तरहतरह के फूल लगे थे और पीछे एक बड़ा आंगन था. मकान की शान- शौकत देखते ही बनती थी.

उसी सुदर्शन के मकान के सामने आज विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं. पूरी सड़क घेर कर काफी दूर तक कनातें लगाई गई थीं. शहर की सब से नामी फर्म ने सजावट का ठेका लिया था. चांदी और सुनहरे तारों की लडि़यां, रंगबिरंगे बल्ब, सोफे और गद्दीदार कुरसियां, झाड़-फानूस, सभी से वह पूरा क्षेत्र सजा हुआ था. स्वागत द्वार के पास ही परंपरागत शहनाईवादन हो रहा था. उस के लिए भी प्रसिद्ध कलाकार बुलाए गए थे.

जब मकान बना था तब भी पड़ोस में रहने वाले प्रोफेसर बलराज को बड़ा आश्चर्य हुआ था कि इतना रुपया सुदर्शन के पास कहां से आया. उन्हीं को नहीं, अन्य लोगों को भी इस बात पर अचंभा हुआ था, लेकिन यह पूछने का साहस किसी में नहीं था. आज बलराज को सुदर्शन की पुत्री के विवाह पर की गई सजावट और शानशौकत देख कर विस्मय हो रहा था.

बलराज हजार रुपए वेतन पा कर भी कभी मकान बनवाने की कल्पना नहीं कर सके और 15  वर्षं से इस कालोनी में किराए के मकान में रह रहे थे. उन की पत्नी कभीकभी व्यंग्य में कह दिया करती थीं, ‘‘जाइए, देख ली आप की प्रोफेसरी. इस मास्टरी लाइन में रखा ही क्या है? देख लो, सामने वाले नायब तहसीलदार विजय ने कैसी शानदार कोठी बनवा ली है और उधर देखो, थानेदार जयसिंह ने नए ढंग से क्या प्यारा बंगला बनवाया है. अपने बाईं ओर सुदर्शन की कोठी तो देख ही रहे हो, दाईं तरफ वाली विकास अधिकारी रतनचंद्र की कोठी पर भी नजर डाल लो.

‘‘इन्हें क्या तन- ख्वाह मिलती है? सच तो यह है कि शायद तुम से आधे से भी कम तनख्वाह मिलतीहोगी, लेकिन देख लो, क्या ठाट हैं. सभी के बच्चे कानवेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं. फल और मेवों से घर भरे हुए हैं. और एक हम लोग हैं, न ढंग से खा पाते हैं और न पहन पाते हैं. वही कहावत हुई न, नाम बडे़ और दर्शन छोटे.’’

‘‘इन्हें क्या तन- ख्वाह मिलती है? सच तो यह है कि शायद तुम से आधे से भी कम तनख्वाह मिलतीहोगी, लेकिन देख लो, क्या ठाट हैं. सभी के बच्चे कानवेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं. फल और मेवों से घर भरे हुए हैं. और एक हम लोग हैं, न ढंग से खा पाते हैं और न पहन पाते हैं. वही कहावत हुई न, नाम बडे़ और दर्शन छोटे.’’

बलराज पत्नी की बातों पर अकसर झुंझलाया करते थे. किंतु वह जानते थे कि उन की पत्नी की बातों में दम है, गहरी सचाई है. वह आज तक नहीं समझा सके कि इन लोगों के पास इतना पैसा कहां से आ रहा है? कैसे वे इतना बढि़या शानशौकत भरा जीवन बिता रहे हैं? और वह ऐसा क्यों नहीं कर पाते? बलराज जैसे सीधेसादे प्रोफेसर इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर भी नहीं ढूंढ़ पाते थे.

वह एक कालिज में भारतीय इतिहास के प्राध्यापक थे. प्राय: उन का अधिकांश समय गहरे अध्ययन और चिंतनमनन में ही बीतता था. परिवार में पत्नी के अलावा एक बड़ा पुत्र और 2 पुत्रियां थीं. पुत्र केवल बी.ए. तक ही पढ़ सका और एक फर्म में विक्रय प्रतिनिधि हो गया. उन की दोनों लड़कियों ने अवश्य एम.ए., बी.एड. कर लिया था. तीनों बच्चे बहुत सुंदर थे. लड़के का विवाह हो चुका था और एक बच्चा था.

लड़कियों के विवाह की चिंता उन्हें परेशान किए हुए थी. कई वरों को उन्होंने देख लिया था और कई वर और उन के मातापिता उन की पुत्रियों को देख चुके थे किंतु फिर भी कहीं बात तय नहीं हो पाई थी. वह काफी परेशान थे. सोचते थे कि दोनों ही लड़कियां विवाह योग्य हैं. 2-4 दिन के अंतर से दोनों का ही विवाह कर देंगे, लेकिन जब वर मिलेगा तभी तो विवाह होगा. किंतु वर कहां मिले?

उन की नजर सुदर्शन की कोठी की ओर चली गई. इस समय तक पंडाल भर चुका था. बड़ेबडे़ सेठसाहूकार अपनीअपनी कारों में आए थे. आखिर आते क्यों नहीं? सुदर्शन सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर जो था, इसीलिए शहर के व्यापारी वर्ग के सभी गण्यमान्य व्यक्ति वहां उपस्थित थे.

बलराज चौंके. ओह, वे व्यर्थ की बातें क्यों सोच रहे हैं? उन्हें भी अब सुदर्शन के यहां पहुंच जाना चाहिए. घर की महिलाएं पड़ोस में जा चुकी थीं. घर में अब उन के सिवा कोई नहीं था. वह भी जल्दी जाना चाहते थे, किंतु मन में अनजाने ही एक ऐसी अव्यक्त वेदना घर कर गई थी कि हृदय पर उन्हें एक भारी बोझ सा अनुभव हो रहा था. यह शायद अपनी पुत्रियों के विवाह तय न हो पाने के कारण था.

पटाखों और बैंडबाजों की आवाज से उन की विचारधारा टूटी. ओह, बरात आ गई. बलराज तुरंत दरवाजे पर ताला लगा कर पड़ोस में लपके.

बरात अब बिलकुल नजदीक आ चुकी थी और बैंड के शोर में ‘ट्विस्ट’ नाच अपनी चरमसीमा पर था. आगत अतिथिगण उठ कर खडे़ हो गए थे. उन में से कुछ आगे बढ़ कर नाच देखने लगे. वर का सजासजाया घोड़ा अब ‘स्वागतम्’ वाले द्वार के बिलकुल निकट आ गया था. बलराज भी अब आगे बढ़ आए थे.

परिवार की महिलाओं द्वारा अब वर का स्वागत हो रहा था. फूलों का सेहरा उठा कर वर के माथे पर तिलक किया जा रहा था. वर के मुख को देखने की उत्सुकता से बलराज ने भीड़ में सिर ऊपर उठा कर उस के मुख को देखा तो वह बुरी तरह चौंक गए. वर का मुख उन का अत्यंत जानापहचाना था.

बलराज का पूरा शरीर पसीने से भीग गया. यह सब कैसे हुआ? सचमुच यह कैसे हुआ? अशोक यहां कैसे आ गया?

लगभग 3 महीने पहले यही अशोक अपने पिता, भाई, मां तथा बहन के साथ उन की पुत्री रुचि को देखने उन के यहां आया था. उस दिन उन्होंने भी अपने आसपड़ोस के 4 आदमियों को इकट्ठा कर लिया था जिस में पड़ोस के सुदर्शन का परिवार भी सम्मिलित था.

बलराज को वह दिन अच्छी तरह याद था. अशोक अत्यंत सुंदर व सुसंस्कृत नवयुवक था. वह अच्छे पद पर था. एकाध वर्ष में स्टेट बैंक की किसी शाखा का मैनेजर बनने वाला था. उन के एक मित्र ने उस से तथा उस के परिवार से बलराज का परिचय कराया था. लड़का उन्हें बहुत पसंद आया था और उन्होंने अपनी रूपमती पुत्री रुचि का उस से विवाह कर देने का निश्चय कर लिया था.

किंतु निश्चय कर लेना एक बात है और कार्यरूप में परिणत करना दूसरी बात है. उन की हार्दिक इच्छा होने के बावजूद अशोक और रुचि का विवाह तय नहीं हो सका था. इस में सब से बडे़ बाधक अशोक के पिता थे. उन के उस समय कहे गए शब्द अब बलराज के कानों में गूंज रहे थे :

‘प्रोफेसर साहब, यह ठीक है कि आप एक बडे़ कालिज में प्रोफेसर हैं. यह भी सही है कि आप अच्छी तनख्वाह पाते हैं, लेकिन यह बताइए, आप हमें क्या दे सकते हैं? मेरा लड़का एम.ए., बी.काम. है, बैंक में बड़ा अफसर होने जा रहा है. हम ने उस की पढ़ाईलिखाई पर 40-50 हजार से ऊपर खर्च कर दिया है और अफसर बनवा दिया है, इसीलिए न कि हमें यह सब रुपया वापस मिल जाएगा.’

उन्होंने रुक कर फिर कहा, ‘यदि आप हमें 1 लाख रुपए नकद दे सकते हैं और लड़की के जेवर, कपड़ों के अलावा फ्रिज, रंगीन टेलीविजन और स्कूटर दे सकते हैं तो मिलाइए हाथ. बात अभी और इसी समय पक्की समझिए. नहीं तो हमें माफ कीजिए.’

बलराज उस मांग को सुन कर अत्यंत विचलित हो गए थे. वह मात्र एक प्रोफेसर थे जिस के पास वेतन और कुछ परीक्षाओं में परीक्षक होने से प्राप्त धन की ही आमदनी थी. वह दहेज को सदा समाज और देश के लिए अभिशाप समझते रहे, इसीलिए उन्होंने अपनी आदर्शवादिता का निर्वाह करते हुए अपने पुत्र के विवाह में कुछ नहीं लिया था.

उन्हें अपनी पुत्रवधू पसंद आ गई थी और वह प्रसन्नता के साथ उसे अपनी बहू बना कर ले आए थे. वह उस से आज भी पूर्णतया संतुष्ट थे. उन्हें कभी भी उस से या उस के परिवार से शिकायत नहीं हुई थी. वे यही सोचते थे कि जब मैं ने अपने पुत्र के विवाह में कुछ नहीं लिया तो मेरी पुत्रियों के विवाह में भी मुझ से कोई कुछ नहीं मांगेगा.

किंतु आज उन का वह स्वप्न छिन्नभिन्न हो गया, वह पराजित हो गए, उन के सम्मुख ठोस यथार्थ आ चुका था. उन्होंने बड़े निराशा भरे स्वर में अशोक के पिता से कहा था, ‘आप की मांग ऐसी है कि मुझ जैसा अध्यापक कभी पूरी नहीं कर पाएगा, कैलाशजी. एक पिता का सब से बड़ा कर्तव्य यही है कि वह अपनी संतानों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दे कर हर रूप में योग्य व समर्थ बना कर उन का जीवन व्यवस्थित कर दे. वह कर्तव्य मैं ने कर दिया है.

‘मेरी लड़की अत्यंत सुंदर होने के साथसाथ एम.ए., बी.एड. है, गृहकार्य में पूर्णतया दक्ष है. मुझे विश्वास है कि जहां भी जाएगी, वह घर उसे पा कर सुखी होगा. मैं आप को केवल एक ही भरोसा दे सकता हूं कि अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर अच्छे से अच्छा विवाह करूंगा और आप को संतोष देने का प्रयत्न करूंगा, लेकिन किसी भी चीज को देने का वादा नहीं कर सकता.’

और कैलाशजी अपने पुत्र अशोक को ले कर वापस चले गए थे. बलराज की पुत्री का विवाह तय नहीं हो पाया था. उस दिन वह बेहद निराश और मायूस रहे. उन्होंने उस दिन खाना नहीं खाया और किसी से बोले भी नहीं. जीवन में पहली बार उन्हें यथार्थ के ठोस धरातल का एहसास हुआ था. वह जान गए थे कि यह दुनिया अब उन के स्वप्नों की दुनिया नहीं रही है. यह बहुत बदल गई है, सचमुच बेहद बदल गई है.

अब वही लड़का अशोक वर के रूप में सामने खड़ा था और वह भी पड़ोसी सुदर्शन के यहां. क्या सुदर्शन ने अशोक के पिता की पूरी मांगें मान लीं? लेकिन यह कैसे हो सकता है? सुदर्शन के पास इतना रुपया कहां से आया? और उन की लड़की भी तो अत्यंत कुरूप और मात्र इंटर पास है. अशोक को तो सुंदर लड़की चाहिए थी. क्या अशोक ने उसे पसंद कर लिया?

वह अपने कंधे पर किसी के हाथ की थपथपाहट से चौंके. सड़क के उस पार की कोठी के मालिक रामेंद्र बगल में खडे़ थे. उन्होंने पसीने में भीगा अपना चेहरा उन के मुख पर टिका दिया और खोएखोए से देखते रहे.

रामेंद्र उन्हें भीड़ से अलग एक किनारे ले गए और धीरे से बोले, ‘‘मैं जानता हूं कि आप इस लड़के अशोक को देख कर बेहद चौंके हैं और शायद दुखी भी हुए हैं. मैं आप के मन की व्यथा समझ रहा हूं, प्रोफेसर साहब. बात इतनी है कि आजकल वरों की नीलामी हो रही है. जो जितनी अधिक ऊंची बोली लगाएगा वही अपनी पुत्री का विवाह कर पाएगा. सुदर्शन ने आप के यहां इस लड़के को देख लिया और उस के बाप से उसे खरीद लिया.

‘‘उधर देखिए,’’ सामने इशारा करते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘‘इसे देने के लिए नया स्कूटर खड़ा है, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, स्टीरियो और टेपरिकार्डर कोने में रखे हैं. मंडप के नीचे साडि़यों और जेवरात की बहार पर भी नजर डालिए. यही सब तो इस वर के पिता को चाहिए था जो आप दे नहीं सके थे. शायद आप को यह भी पता नहीं कि सुदर्शन ने तिलक की रस्म के समय 51 हजार रुपए दिए थे और शेष अब दिए जाएंगे.’’

बलराज ने भर्राए, अटकते स्वरों में कहा, ‘‘लेकिन सुदर्शन की लड़की… वह तो बहुत बदसूरत है, ज्यादा पढ़ीलिखी भी नहीं है. क्या लड़के ने उसे पसंद कर लिया?’’

रामेंद्र व्यंग्य से मुसकराए. धीरे से बोले, ‘‘लड़के ने ही तो लड़की पसंद कर के शादी की है. लड़के को लड़की नहीं, रुपया चाहिए था. दहेज चाहिए था. वह मिल गया. एक बडे़ होटल में दावत पर इन सभी को बुलाया गया था. वहीं मोलभाव हुआ था और तुरंत वहीं तिलक की रस्म भी कर दी गई थी. तभी तो हम लोगों को पता नहीं चला. वह तो कल मेरी पत्नी को कहीं से यह सबकुछ पता चला, तब मैं जान पाया.’’

बलराज ने खोएखोए स्वर में कहा, ‘‘रामेंद्रजी, इतना सबकुछ देना मेरी सामर्थ्य के बाहर है. अब मैं क्या करूंगा. मेरी लड़कियों का विवाह कैसे होगा?’’

रामेंद्रजी ने सहानुभूतिपूर्वक कहा, ‘‘मैं आप की कठिनाई समझ रहा हूं, प्रोफेसर साहब, लेकिन आज का युग तो मोलभाव का युग है, नीलामी का युग है. आप ने दुकानों में सजी हुई वस्तुओं पर कीमतें टंगी हुई देखी होंगी. बढि़या माल चाहिए, बढि़या दाम देने होंगे. वही हाल आजकल वरों का है. वर का जितना बड़ा पद होगा उसी अनुपात में आप को उस की कीमत नकद एवं सामान के रूप में देनी होगी.’’

रामेंद्रजी ने थोड़ा रुक कर, फिर सांस भर कर धीरे से कहा, ‘‘बोलिए, आप कैसा और कौन सा माल खरीदेंगे? चाहे जैसा माल खरीदिए, शर्त यही है कि कीमत आप को देनी होगी.’’

बलराज हलकी सर्दी में भी पसीने से बुरी तरह भीग चुके थे. वह एकटक असहाय दृष्टि से ठाकुर साहब को देखते रहे और फिर बिना कुछ बोले तेजी से अपने घर की ओर बढ़ गए.

बलराज कब तक निश्चेष्ट पडे़ रहे, यह उन्हें याद नहीं. उन का शरीर निश्चेष्ट अवश्य था, किंतु उन का मस्तिष्क सक्रिय था. वह अनर्गल विचारों में डूबतेउतराते रहे और उन की तंद्रा तब टूटी जब उन की पत्नी ने उन के माथे को सहलाया. फिर उस ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या सो गए?’’

उन्होंने धीरे से नेत्र खोल कर एक क्षण अपनी पत्नी को देखा और फिर निर्निमेष उसे देखते ही रहे.

पत्नी ने घबराए स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न? आप की आंखें लाल क्यों हैं?’’

बलराज धीरे से उठ कर बैठ गए और हौले स्वर में बोले, ‘‘मैं ठीक हूं, रमा. मुझे कुछ नहीं हुआ है.’’

पलंग के पास पड़ी कुरसी पर पत्नी बैठ गई. कुछ क्षणों तक खामोशी रही, फिर रमा ने धीरे से कहा, ‘‘सुदर्शनजी रात्रिभोज के लिए आप को काफी ढूंढ़ते रहे. शायद वह लड़की के दहेज का सामान भी आप को दिखाना चाहते थे, लेकिन मैं जानती हूं कि आप क्यों चले आए. मैं तो इतना ही कहूंगी कि इस तरह दुखी होने से क्या होगा. हम अपनी विवशताओं की सीमाओं में बंधे हैं. हम अपनेआप को बेच कर भी इतना सब कुछ नहीं दे सकते.

‘‘किंतु मुझे विश्वास है कि चाहे देर से ही सही, वह समय जरूर आएगा जब कोई समझदार नौजवान इन दहेज के बंधनों को तोड़ कर हमारी बेटी को ब्याह ले जाएगा. हां, हमें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी.’’

बलराज ने भर्राए स्वर में कहा, ‘‘नहीं, रमा, ऐसा विश्वास व्यर्थ है. सोने और चांदी से चमचमाते इस युग में हम सीमित साधनों वाले इनसान जिंदा नहीं रह सकते. क्या तुम्हें यह विचित्र नहीं लगता कि पड़ोसियों की कम पढ़ीलिखी, बदसूरत लड़कियां एकएक कर ब्याही जा रही हैं, क्योंकि वे अच्छा दहेज दे सकने में समर्थ हैं, इसलिए कि उन के पास रिश्वत, सरकारी माल की हेराफेरी और भ्रष्टाचार से कमाया पैसा है और हम ईमानदार लोग असहाय एवं बेबस हो कर यह सब देख रहे हैं और सह रहे हैं.

‘‘रमा, आज धन और पैसे का बोलबाला है, चांदी के जूते के सामने इनसान ने अपनी शर्महया, इज्जतआबरू, मानअपमान सभी को ताक पर रख दिया है. इनसान सरेबाजार बिक गया है. नीलाम हो गया है.’’

बलराज थोड़ी देर रुके. फिर सांस भर कर बोले, ‘‘मेरे दिल में एक ही बात की कसक है कि एक अध्यापक अपनी सीमित आय के कारण अपनी पुत्री का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वह एक वर की कीमत दे सकने में असमर्थ है. वर पक्ष वाले भी इसीलिए अध्यापकों के पास नहीं आते. तब समाज का यह प्रबुद्ध वर्ग कहां जाए? क्या करे? मैं जानता हूं कि इस प्रश्न का उत्तर मैं या तुम नहीं दे सकते. इस प्रश्न का तो पूरे समाज को ही उत्तर देना होगा.’’

पत्नी की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला, केवल हलकी सिसकियों की आवाज सुनाई देती रही.

पास के कमरे से कुछ और सिसकियों की आवाज सुनाई दे रही थी. ये सिसकियां उन लड़कियों की थीं जो शादी का जोड़ा पहनने की प्रतीक्षा में जाने कब से बैठी हैं और जाने कब तक बैठी रहेंगी. पता नहीं, उन के सपनों का राजकुमार कब घोड़े पर चढ़ कर उन्हें लेने आएगा.

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