Mother’s Day Special- मोहपाश : बच्चों से एक मां का मोहभंग

जब से कुमार साहब ने औफिस से 2 महीने की छुट्टी ले कर नैनीताल जाने का मन बनाया था, तब से ही विभा परेशान थी. उस ने पति को टोका भी था, ‘‘अजी, पूरी जवानी तो हम ने घर में ही काट दी, अब भला बुढ़ापे में कहा घूमने जाएंगे.’’

‘‘अरे भई, यह किस डाक्टर ने कहा है कि जवानी में ही घूमना चाहिए, बुढ़ापे में नहीं,’’ कुमार साहब भी तपाक से बोले.

विभा के गिरते स्वास्थ्य को देख कर कुमार साहब बड़े चिंतित थे. उन्होंने कई डाक्टरों को भी दिखाया था. सभी ने एक ही बात कही थी कि दवा के साथसाथ उन्हें अधिक से अधिक आराम की भी जरूरत है.

काफी सोचविचार के बाद कुमार साहब ने 2 महीने नैनीताल में रहने का प्रोग्राम बनाया था कि इस बहाने कुछ समय के लिए ही सही, शहर के प्रदूषित वातावरण से मुक्ति मिलेगी और घर के झमेलों से दूर रह कर विभा को आराम भी मिलेगा.

कुमार साहब का कोई लंबाचौड़ा परिवार न था. 2 बेटे थे, दोनों ही इंजीनियर. बड़ी कंपनियों में कार्यरत थे. विवाह के बाद दोनों ने अपने अलगअलग आशियाने बना लिए थे. शायद यह घर उन्हें छोटा लगने लगा था. वैसे भी एक गली के पुराने घर में रहना उन के स्तर के अनुकूल न था.

जब से बेटे अलग हुए, तब से ही विभा का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता गया. विभा ने बच्चों को ले कर अनेक सुनहरे सपने बुन रखे थे, पर बच्चों के जीवन में शायद मां का कोईर् स्थान ही न था. विभा इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. बच्चों के व्यवहार ने विभा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया था.

महीने में 1-2 बार बच्चे उन से मिलने आते थे और कुछ देर बैठ कर औपचारिक बातें कर के चले जाते थे. इसी तरह समय बीतता गया. बच्चों से मिलनाजुलना अब पहले से भी कम हो गया. इसी बीच वे 1 पोते व 1 पोती के दादादादी भी बन गए.

दोनों बहुएं पढ़ीलिखी थीं. उन्होंने भी अपने लिए नौकरी ढूंढ़ ली. अब पहली बार उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ कि उन्हें मांबाबूजी से अलग घर नहीं बसाना चाहिए था. मां घर में होतीं तो बच्चों को संभाल लेतीं.

बड़ी बहू नंदिता तो एक दिन बेटे गौतम को ले कर सास के पास पहुंच भी गई. बहू, पोते को देख कर विभा निहाल हो गई.

‘अमित नहीं आया?’ उस ने शिकायती लहजे में बहू से पूछा.

‘क्या करूं मांजी, उन्हें तो दिनभर औफिस के काम से ही फुरसत नहीं है. कितने दिन से कह रही थी कि मांबाबूजी से मिलने की बड़ी इच्छा है, औफिस से जल्दी आ जाना, पर आ ही नहीं पाते. आखिर परेशान हो कर मैं अकेली ही गौतम को ले कर आ गई.’

‘बहुत अच्छा किया बहू,’ गदगद स्वर में विभा बोली और गौतम को खिलाने लगीं.

‘मांजी, आप को यह जान कर खुशी होगी कि मैं ने नौकरी कर ली है.’

‘हां बेटी, बात तो खुशी की ही है. भला हर किसी को नौकरी थोड़े ही मिलती है? जो नौकरी लायक होता है, उसे ही नौकरी मिलती है. मेरी बहू इतनी काबिल है, तभी तो उसे नौकरी मिली,’ विभा ने खुश होते हुए कहा.

‘पर मांजी, एक समस्या है, अब गौतम को तो आप को ही संभालना पड़ेगा. मैं चाहती हूं कि आप और बाबूजी हमारे साथ रहें. इस घर को किराए पर दे देंगे.’

‘नहीं बेटी, यह तो संभव नहीं है. इस घर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं. इस घर में मैं ब्याह कर आई थी. इसी घर में मेरी गोद भरी थी. इस घर के कोनेकोने में मेरे अमित और विजय की किलकारियां गूंजती हैं. इसी घर में तुम और स्मिता आईं और यह घर खुशियों से भर गया. अकेली होने पर यही यादें मेरा सहारा बनती हैं. इस घर को मैं नहीं छोड़ सकती.’

विभा ने साफ मना किया तो नंदिता बोली, ‘ठीक है मांजी, फिर मैं औफिस जाते समय गौतम को यहां छोड़ जाया करूंगी और लौटते समय ले जाया करूंगी.’

‘यह ठीक रहेगा,’ विभा ने अपनी सहमति देते हुए कहा. हालांकि उन का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, पर वह अपने एकाकी जीवन से बहुत ऊब चुकी थी. अब दिन भर गौतम उस के साथ रहेगा. इस कल्पना मात्र से ही वह खुश थी.

जब कुमार साहब को इस बात पता चला कि दिनभर गौतम की देखभाल विभा करेगी तो उन्हें यह अच्छा न लगा. अतएव झुंझला कर बोले, ‘जिम्मेदारी लेने से पहले अपना स्वास्थ्य तो देखा होता. दिनभर एक बच्चे को संभालना कोई आसान काम है?’

‘अपने बच्चे हैं. अपने बच्चों के हम ही काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा?’ विभा ने समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘गौतम यहां रहेगा तो क्या मुझे अच्छा नहीं लगेगा? मुझे भी अच्छा लगेगा, पर मुझे दुख तो इस बात का है कि तुम्हारे ये स्वार्थी बच्चे काम पड़ने पर तो अपने बन जाते हैं, पर काम निकलते ही पराए हो जाते हैं,’ कुमार साहब बोले तो विभा ने चुप रहने में ही भलाई समझी.

जैसे ही छोटी बहू स्मिता को पता चला कि गौतम दिनभर मांजी के पास रहा करेगा, वैसे ही उस ने भी अपनी बेटी ऋचा को वहां छोड़ने का निर्णय ले लिया.

2 दिनों बाद से ही गौतम और ऋचा पूरा दिन अपनी दादी के साथ बिताने लगे. विभा का पूरा दिन उन दोनों के छोटेछोटे कामों में कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. कुछ महीने हंसीखुशी बीत गए, पर जैसेजैसे वे बड़े हो रहे थे, विभा के लिए समस्याएं बढ़ती जा रही थीं. अब बच्चे आपस में लड़तेझगड़ते तो थे ही, पूरे घर को भी अस्तव्यस्त कर देते थे, जिसे फिर से जमाने में विभा को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी.

विभा अपनी परेशानियों को कुमार साहब से छिपाने का लाख प्रयत्न करती, पर उन से कुछ छिपा न रहता था. एक दिन वे औफिस से लौटे तो देखा कि विभा के पैर में पट्टी बंधी थी.

‘क्या हुआ पैर में?’ कुछ परेशान होते हुए उन्होंने पूछा.

‘कुछ नहीं,’ विभा ने बात टालने का प्रयत्न किया, पर तभी पास खेलती ऋचा तुतलाती आवाज में बोली, ‘‘दादाजी, दौतम ने तांच ता दिलाछ तोल दिया. दादीमां तांच उथा लही थी. तबी इनते पैल में तांच लद दया. दादाजी, आप दौतम को दांतिए. वह भोत छलालती है. दादीमां को भोत तंग कलता है,’’ ऋचा गौतम की शिकायत लगाते हुए लाड़ से दादाजी के गले में झूल गई.

ऋचा की प्यारीप्यारी तुतलाती बातें सुन कर कुमार साहब मुसकरा दिए,  ‘और तू भी अपनी दादीमां को तंग करती है,’ उन्होंने कहा तो वह तुरंत गरदन हिलाते हुए बोली, ‘नहींनहीं, मैं तभी इन्हें पलेछान नहीं तलती. मैं तो हमेछा इनता ताम ही तरती हूं. बले ही पूछ लो दादीमां छे.’

अभी कुमार साहब और विभा ऋचा की प्यारीप्यारी बातों का आनंद उठा ही रहे थे कि तभी गौतम के चिल्लाने की आवाज आई.

‘अरे, क्या हुआ?’ कहती हुई विभा दूसरे कमरे में भागी. गौतम वहां आंखों में आंसू भरे अपने पैर को पकड़ कर बैठा था.

‘क्या हुआ बेटा?’ विभा ने उसे पुचकारते हुए पूछा.

‘दादीमां, मैं तो स्टूल पर चढ़ कर अलमारी की सफाई कर रहा था, पर पता नहीं स्टूल कैसे खिसक गया और मैं गिर पड़ा,’ गौतम ने सफाई देते हुए कहा.

‘पैर पकड़े क्यों बैठा है? क्या पैर में चोट लग गई?’

‘हां दादीमां, पैर मुड़ गया,’ पैर को और जोर से पकड़ते हुए वह बोला.

विभा ने गौतम को खड़ा कर के चलाने का प्रयास किया, पर दर्द काफी था, वह चल नहीं सका.

‘लगता है गौतम के पैर में मोच आ गई है,’ विभा ने कुमार साहब को बताया तो वे उसे ले कर तुरंत डाक्टर के पास पहुंचे.

मन ही मन वे झुंझला रहे थे कि अब बुढ़ापे में यही काम रह गया हमारा. सचमुच गौतम के पैर में मोच आ गई थी. रात को नंदिता गौतम को लेने के लिए पहुंची तो उस के पैर में मोच आई देख कर वह भी परेशान हो उठी.

कुमार साहब और विभा ने जब नंदिता को गौतम से यह पूछते हुए सुना कि तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई तो वे सन्न रह गए.

‘अभी भी तुम्हारा मोहभंग हुआ या नहीं?’ कुमार साहब ने उदास सी मुसकान बिखेरते हुए पूछा, पर विभा मौन थी मानो उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था. पर बहू का वह वाक्य  ‘तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई,’ उस के कानों में बारबार गूंज रहा था.

ममता की मारी विभा को बच्चों के मोहपाश ने बुरी तरह जकड़ रखा था. वह उस से निकलने का जितना प्रयास करती, उस की जकड़न उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती. स्थिति यहां तक पहुंची कि विभा ने बिस्तर ही पकड़ लिया.

पिछले कई दिनों से विभा को बुखार था. कुमार साहब ने अमित को फोन कर दिया, ‘बेटा अमित, तुम्हारी मां की तबीयत काफी खराब है. आज तुम गौतम को यहां मत भेजना, वह संभाल नहीं सकेगी. विजय को भी कह देना कि वह भी ऋचा को न भेजे.’

‘पर बाबूजी, ऐसे कैसे चलेगा? नंदिता की नईनई नौकरी है, उसे तो छुट्टी नहीं मिल सकती. मैं कोशिश करूंगा, यदि मुझे छुट्टी मिल गई तो आज मैं गौतम को रख लूंगा. विजय को भी मैं बता दूंगा.’

अगले दिन अमित और विजय के ड्राइवर आ कर दोनों बच्चों को विभा के पास छोड़ गए, साथ ही कह गए कि उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मजबूर हो कर कुमार साहब ने छुट्टी ली और दोनों बच्चों की देखभाल की. दिनभर उन की शरारतों से वे परेशान हो गए.

शाम के समय जब विभा की तबीयत कुछ संभली, तब कुमार साहब ने उसे फिर समझाया, ‘देख लिया अपने बच्चों को? तुम उन के बच्चे पालने में दिनभर खटती रहती हो और तुम्हारी दोनों में से एक बहू से भी यह न हुआ कि 1 दिन की छुट्टी ले कर तुम्हारी देखभाल कर लेती.’

‘क्या करें, उन की भी कोई मजबूरी होगी,’ कह विभा ने करवट बदल ली.

रात को दोनों बेटे बच्चों को लेने आए. जितनी देर वे वहां बैठे, अपनी सफाईर् पेश करते रहे.

‘मां, नंदिता के औफिस में आज बाहर से कोई पार्टी आई हुई थी, इसलिए उसे छुट्टी नहीं मिली और मुझे भी जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी.’

अमित ने कहा तो विजय भी कैसे चुप रहता. बोला, ‘मां, स्मिता ने भी छुट्टी लेने की बहुत कोशिश की, पर उस के कालेज में आजकल परीक्षाएं चल रही हैं. और मैं तो अभी शाम को ही टूर से लौटा हूं.’

कुमार साहब यह अच्छी तरह समझ गए थे कि यहां रह कर विभा को आराम नहीं मिलेगा. उस के स्वार्थी बेटे और बहुएं उस की ममता का नाजायज फायदा उठाते रहेंगे. इसलिए उन्होंने कुछ समय के लिए घर से बाहर जाने की सोची थी.

विभा सोच रही थी कि यदि वे नैनीताल चले जाएंगे तो गौतम और ऋचा की देखभाल कौन करेगा. उस ने अपने मन की बात कुमार साहब से कही तो वह भड़क उठे,  ‘‘अरे, जिन के अपने शहर में नहीं रहते उन के बच्चे क्या नहीं पलते? तुम्हारे बेटेबहू इतना कमाते हैं, क्या बच्चों के लिए नौकर नहीं रख सकते? क्या इस शहर में शिशुगृहों की कमी है? तुम ने उन के बच्चों की जिम्मेदारी ले रखी है क्या? उन्हें अपनेआप संभालने दो अपने बच्चों को.’’

जब अमित और विजय को मालूम हुआ कि मां और बाबूजी नैनीताल जा रहे हैं तो वे परेशान हो उठे.

‘‘मांजी, 2 महीने बाद मेरे कालेज में छुट्यिं हो जाएंगी. आप तब चली जाना नैनीताल. यदि आप चली गईं तो बच्चों को कौन संभालेगा,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी बताते हुए विभा से कहा.

विभा क्या उत्तर देती, वह तो स्वयं परेशान थी. तभी पास बैठे कुमार साहब बोले, ‘‘बेटी, यदि हम नैनीताल नहीं जाएंगे तब भी तुम्हारी सास की तबीयत ऐसी नहीं है कि वह 2-2 बच्चों को संभाल सके. यह भला किस का सहारा बनेगी, इसे तो स्वयं सहारे की जरूरत है.’’

बाबूजी की बात सुन कर सब चुप थे. पहली बार उन्हें एहसास हो रहा था कि  उन्हें मांबाबूजी कि कितनी जरूरत थी. कुमार साहब और विभा नैनीताल के लिए रवाना हो गए. विभा उदास थी. कुमार साहब भी खुश न थे. उन के सामने अपने बच्चों के परेशान चेहरे घूम रहे थे. कुमार साहब को उदास देख कर विभा ने पूछा, ‘‘आप उदास क्यों हैं? आप को खुश होना चाहिए, हम नैनीताल जा रहे हैं.’’

‘‘तुम क्या सोचती हो कि बच्चों को परेशान देख कर मुझे अच्छा लगता है? पर मैं यह नहीं चाहता कि बच्चे हमारे प्यार का गलत फायदा उठाएं. इस के लिए उन्हें सबक देना जरूरी है और इस के लिए कठोर भी होना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिए.’’

कुमार साहब की बात सुन कर विभा संतुष्ट थी. उस के चारों ओर घिरे उदासी के बादल छंटने लगे थे. वह समझ गई थी कि इस मोहपाश में जकड़ कर वह मां का कर्तव्य पूरा नहीं कर पाएगी. आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि जिस मोहपाश में वह अब तक घिरी थी, उस की जकड़न स्वत: ही ढीली हो रही है.

Mother’s Day Special: एक थी मां- कहानी एक नौकरानी की

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एक थी मां- भाग 3: कहानी एक नौकरानी की

मेरे आते ही गोलू का पास के ही एक नर्सरी स्कूल में एडमिशन करा दिया गया था. गोलू को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए मैं ही जाती थी.

वह जब मुझे प्यार से अपनी आवाज में ‘कश्मीरा दीदी’ कहता था, तो सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगता था. गोलू को देख कर मुझे बारबार मेरे अपने भाई अमर की याद आती रहती थी. पता नहीं, अब वह घर में अकेले कैसे रहता होगा.

साकेत अंकल ने गोलू को घर पर पढ़ाने के लिए एक टीचर रख लिया था. आंटी के कहने पर वे टीचर मुझे भी पढ़ाने लगे थे. मैं भी मन लगा कर पढ़ने लगी थी.

समय बीतता रहा. कैसे 2 साल बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला. अब तो मुझे कभी एहसास भी नहीं होता था कि मैं इस घर की नौकरानी हूं. मैं भी घर के एक सदस्य की तरह वहां रह रही थी.

मैं सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही हर साल अपने घर जाती थी और भाई को राखी बांध कर वापस आ जाती थी. मैं गोलू को भी राखी बांधती थी.

देखतेदेखते अंकल के यहां 6 साल गुजर गए. अब गोलू 10 साल का हो गया था. इसी साल अंकल ने एक सरकारी स्कूल से मुझे मैट्रिक का इम्तिहान दिलवा दिया था और मैं अच्छे अंक से पास भी हो गई थी.

सिकंदरपुर में अब मेरा भाई भी पढ़ने लगा था. इतने साल में अंकल द्वारा दिए हुए पैसे से पिताजी ने अपना कर्जा चुका दिया था और अब वे एक ठेले पर फल बेचने लगे थे.

मां अभी भी पहले जैसे ही अपनी दुनिया में मस्त रहती थीं. उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं थी. इसी बीच मेरे दादाजी इस दुनिया से चल बसे थे.

बाकी सबकुछ अब ठीक से चल रहा था, मगर अचानक एक दिन मुझे एक ऐसी बुरी खबर मिली कि सुन कर मेरी जान हलक में आ गई. मेरे मासूम भाई अमर को किसी ने मार कर सड़क किनारे फेंक दिया था. सुबह सड़क के किनारे उस की लाश मिली थी.

मैं यह खबर सुन कर मानो मर सी गई थी, मगर मेरे मुंहबोले भाई गोलू और अंकलआंटी के प्यार के चलते मैं अपनेआप को संभाल पाई थी.

अमर की मौत के बाद अब मेरा अपने घर जाना भी बंद हो गया था. पिताजी जब कभी बलिया आते तो मुझ से मिल लेते थे. कभीकभार फोन कर के भी बात कर लेते थे, पर अपनी मां के लिए तो मैं कब की पराई हो गई थी.

धीरेधीरे सबकुछ पहले जैसा होता जा रहा था. इसी बीच मैं ने इंटर भी पास कर लिया था. भले ही मैं स्कूल या कालेज कभी गई नहीं थी, मगर घर पर ही पढ़पढ़ कर मैं सभी इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास करती जा रही थी.

अंकल ने अब मेरा कालेज में भी एडमिशन करा दिया था. मैं अपनेआप को बहुत खुशनसीब समझती थी कि मुझे अपने मांबाप से भी ज्यादा चाहने वाले पराए मांबाप मिले थे.

मगर मेरी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी थी, तभी तो एक दिन सुबह एक और दिल दहला देने वाली खबर मुझे मिली. पिताजी का भी किसी ने रात में घर के अंदर ही खून कर दिया था.

यह सुनते ही मेरे ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कोई धीरेधीरे हमेशा के लिए मुझ से दूर करता जा रहा था. पहले भाई और अब पिताजी को भी किसी ने जान से मार दिया था. आखिर मेरे भाई या पिताजी ने किसी का क्या बिगाड़ा था? कौन था, जो ये हत्याएं कर रहा था?

पर कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक न एक दिन तो भरता ही है और जब भरता है तो वह किसी न किसी दिन फूटता ही है. ऐसा ही कुछ हुआ इस बार.

पिताजी का खून करने वाले गुनाहगार के गुनाह की काली करतूत का काला चिट्ठा इस बार पुलिस ने खोल दिया था. खून किसी और ने नहीं, बल्कि मेरी अपनी मां ने ही अपनी ऐयाशी को छिपाने के लिए अपने प्रेमी के साथ मिल कर किया था.

इतना ही नहीं, जिस रात मैं ने मां के कमरे में एक अनजान आदमी को देखा था, अपनी उसी पोल के खुलने के डर से चाल चल कर मुझे घर से दूर नौकरानी बना कर मेरी मां ने ही मुझे बलिया भेजा था. मां ने ही दुकान में आग लगवा कर मुझे घर से दूर करने की चाल चली थी.

यही नहीं, मेरी उस अपनी मां ने ही अपनी हवस की आग को जलाए रखने के लिए अपने ही हाथों अपने बेटे का भी गला दबा कर जान से मारा था. शायद अमर को जन्म देने वाली अपनी मां की हकीकत का पता चल गया था.

मेरी मां और उन के प्रेमी को कोर्ट से आजीवन कैद की सजा मिली थी. यह सुन कर मेरे सीने में अपनी मां के प्रति धधकती आग को कुछ ठंडक मिली थी.

एक बार फिर से अपने मुंहबोले भाई गोलू और पराए मातापिता के प्यार के चलते मैं बीती बातें भुला कर पहले जैसी होने की कोशिश करने लगी थी.

अब मैं ने ग्रेजुएशन कर ली थी. गोलू भी 12वीं पास कर गया था. अब वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने वाला था. इसी बीच मेघना आंटी ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी.

साकेत अंकल के औफिस में काम करने वाला एक लड़का पंकज हमेशा किसी न किसी काम से घर आया करता था. वह देखने में हैंडसम था. मैं भी अब 24 साल की बला की खूबसूरत लड़की हो गई थी.

अचानक एक दिन मैं अंकल और आंटी के साथ बैठी बातें कर रही थी कि आंटी ने मेरे सामने पंकज के साथ शादी करने की बात रख दी. मैं उन की बात को कैसे टालती और वह भी पंकज जैसे अच्छे लड़के के साथ.

अंकल ने पंकज को मेरी हकीकत बता दी थी. पंकज या उन के परिवार वालों ने भी कोई एतराज नहीं जताया.

आज मेरी यानी आप की कश्मीरा की शादी पंकज से हो रही थी.

मैं अभी अपने बैडरूम में आईने के सामने खड़ी हो कर अपनी जिंदगी के उतारचढ़ाव रूपी भंवर में गोते लगा रही थी कि अचानक पीछे से किसी ने छू कर मेरी तंद्रा भंग कर दी.

मैं जब खयालों की दुनिया से हकीकत में आई, तो देखा कि सामने मेरा मुंहबोला भाई गोलू और मुंहबोली मां मेघना खड़ी थीं.

दोनों की आंखों में मेरे इस घर को छोड़ कर अब नए घर में जाने की टीस आंसू के रूप में साफ झलक रही थी. मैं दोनों से लिपट कर जोरजोर से रोने लगी. जिंदगी में पहली बार आज मुझे बेपनाह सुख हो रहा था. सब को ऐसी मां मिले, भले पराई ही सही.

एक थी मां- भाग 2: कहानी एक नौकरानी की

पिताजी कभी मना करते, तो उलटे मां उन्हें ही उन की औकात याद दिलाने लगती थीं. पिताजी चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाते थे. आखिर वे अभी तक अपने पिता के कमाए पैसों पर ही तो जीते आ रहे थे.

अब हम दोनों भाईबहन स्कूल जाने के लायक तो हो गए थे, मगर पैसे की तंगी और मांपिताजी के आपसी झगड़े के चलते हम दोनों स्कूल नहीं जा पा रहे थे.

पिताजी से जब मां का रोजरोज का झगड़ा सहा नहीं गया, तो उन्होंने घर के नजदीक वाले मंदिर के पास ही एक पूजा सामग्री और फूल माला की दुकान खोल ली थी. दुकान खोलने के लिए पिताजी ने अपने कुछ जानपहचान वालों से ही पैसे उधार लिए थे.

पिताजी अब अपने काम में ज्यादा बिजी रहने लगे थे. चोरी के डर से रात में भी वे दुकान पर ही सो जाते थे. इधर मां का रहनसहन और चालढाल बहुत तेजी से बदलता जा रहा था.

अब उन्होंने एक मोबाइल फोन भी खरीद लिया था. पिताजी ने जब मोबाइल फोन के बारे में पूछा था, तो अपने मायके से मिला हुआ बता कर पिताजी को डांट कर चुप करा दिया था.

मां अब दिनभर खुद कमरे में सोई रहती थीं और घर का सारा काम हम दोनों भाईबहन से कराने लगी थीं. स्कूल जाने की उम्र में हम दोनों भाईबहन अब हमेशा घर के कामों में उलझे रहने लगे थे. अब तो बातबात पर मां हम दोनों को पीटने भी लगती थीं.

एक रात की बात है. मैं और मेरा भाई अमर साथ ही सोए हुए थे. हम दोनों बचपन से ही साथ सोते आ रहे थे. अचानक आधी रात को मेरे भाई के पेट में दर्द होने लगा था. मुझ से जब उस का दर्द देखा नहीं गया, तो मैं मां के कमरे की ओर उन्हें बुलाने चल पड़ी थी, यह सोच कर कि शायद उन के पास कोई दवा होगी.

बहुत बार दरवाजा खटखटाने और चिल्लाने के बाद मां ने गुस्से में दरवाजा खोला था. जब मैं ने उन्हें अमर के पेटदर्द के बारे में बताया, तो वे मुझे ही गाली देने लगी थीं.

उन की एकएक बात मुझे आज भी याद है, जो मां ने अपने बेटे के लिए कही थी, ‘तुम्हारा भाई पेटदर्द से मर नहीं जाएगा. दिनभर चोरी करकर के तो खाता रहता है, फिर पेटदर्द तो उस का करेगा ही न…’

मैं चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई थी. कैसी मां थीं वे. मैं चुपचाप अपने नसीब को कोसती हुई कमरे की ओर जाने के लिए अभी मुड़ी ही थी कि तभी मैं ने मां के कमरे में एक अजनबी आदमी को देखा था.

मैं ठीक से चेहरा नहीं देख पाई थी. मां भांप गई थीं कि मैं ने कमरे के अंदर के आदमी को देख लिया था. वे उस समय बोली कुछ नहीं, सिर्फ तेजी से दरवाजा बंद कर लिया था.

भाई के पेटदर्द के चलते मैं बहुत परेशान थी, इसीलिए उस ओर मैं ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी. अमर अभी भी कमरे में जमीन पर लेटा पेट पकड़े दर्द से कराह रहा था. पिताजी तो दुकान पर ही रात में सोते थे, इसीलिए मैं उन को बुला भी नहीं सकती थी.

मैं अमर को पेट के बल लिटा कर उस की पीठ सहलाने लगी. मेरे ऐसा करने से उसे राहत मिलने लगी और कुछ ही देर के बाद उस का पेटदर्द कम हो गया था.

अगले दिन सुबह जब पिताजी घर आए, तो वे पहली बार बहुत खुश दिखाई दे रहे थे. उन्होंने दुकान के लिए लिया हुआ कर्ज चुकाने के लिए पूरा पैसा जमा कर लिया था. वे कल ही जा कर महाजन को पैसा देने की बात कर रहे थे. अब वे हम दोनों भाईबहन को भी स्कूल में दाखिल कराने के लिए बोल रहे थे.

पता नहीं क्यों उस समय मां पिताजी की बात सुन कर भी अनसुना करते हुए कहीं और खोई हुई थीं. वे थी तो पास में ही बैठीं, पर कुछ बोल नहीं रही थीं.

उसी दिन पहली बार पिताजी ने हम सभी को होटल में ले जा कर खाना खिलाया था. उस रात पिताजी हम दोनों भाईबहन के पास ही सो भी गए थे. हम तीनों ने उस रात बहुत सारे सपने देखे थे.

मगर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था. सुबह जब उठे तो एक बुरी खबर को सुन कर हम सब के पैर तले की जमीन खिसक गई थी. पिताजी की दुकान में रात में आग लग गई थी. सारा सामान जल कर राख हो गया था. महाजन को देने के लिए रखा हुआ पैसा, जिसे पिताजी ने अपनी मेहनत से एकएक पाई जोड़ कर जमा किया था, वह भी आग में जल गया था. मां भी उस दिन बहुत रोई थीं, मगर शायद वह भी उन का दिखावा था.

पिताजी फिर से टूट गए थे. हम सब का देखा हुआ सपना एक ही बार में बिखर गया था.

दुकान जलने के कुछ ही दिन के बाद मां ने मुझे अपने दूर के एक रिश्तेदार के कहने पर बलिया में एक साहब के यहां घर का काम करने और उन के 4 साल के बच्चे की देखभाल के लिए भेज दिया था.

पिताजी ने मां को बहुत समझाया कि अभी कश्मीरा 10 साल की बच्ची है, भला कैसे किसी के यहां नौकरानी का काम कर पाएगी? मगर मां ने एक न सुनी. मैं यानी कश्मीरा बलिया में अपने मालिक साकेत भारद्वाज के यहां नौकरानी बन कर आ गई.

मेरा भाई मुझ से दूर नहीं होना चाहता था. वह भी मेरे साथ ही बलिया आने की जिद पर अड़ गया था, मगर मां ने उसे कमरे में बंद कर दिया था. मैं भी यह सोच कर कि मेरे कमाए पैसे से शायद पिताजी द्वारा लिया हुआ दुकान का कर्जा जमा हो जाएगा, बलिया आ गई थी.

मेरे मालिक साकेत सर और मालकिन मेघना मैडम का बलिया में खुद का घर था. साहब एक औफिस में बड़े पद पर थे. मैडम भी एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करती थीं. दोनों का एक 4 साल का बेटा था गौरव भारद्वाज, जिसे प्यार से सभी ‘गोलू’ कहते थे.

पहले साहब की अपनी बहन साथ में रहती थीं. वे ही बच्चे की देखभाल भी करती थीं, मगर उन की इसी साल शादी हो गई थी और वे यहां से चली गई थीं, जिस के चलते ही इस घर में अब मुझे लाया गया था.

पहले ही दिन से साकेत सर के यहां मुझे इतना प्यार मिला कि अपने घर से भी अच्छा यह घर लगने लगा. मैं सर और मैडम के कहने पर ही उन्हें ‘अंकल’ और ‘आंटी’ कहने लगी थी. गोलू भी मुझे दीदी कहने लगा था. वह तुरंत मुझ से घुलमिल गया था. वह हमेशा मेरे पास ही रहता था.

एक थी मां- भाग 1: कहानी एक नौकरानी की

मैंअपने बैडरूम में लगे आदमकद आईने के सामने खड़ी अपनेआप को देख रही थी. मेरे चेहरे पर खुशी और गम के मिलेजुले भाव आजा रहे थे. पता नहीं क्यों आज मेरा अतीत मुझे बारबार याद आ कर परेशान कर रहा था. कमरे के बाहर से शादी में बजने वाली शहनाई की धुन की धीमी आवाज आ रही थी. एक बात बताऊं, शादी किसी और की नहीं, बल्कि मेरी ही हो रही थी.

घर में अभी मेरी ही विदाई की तैयारी चल रही थी. सभी उसी में बिजी थे. मैं भी अभी दुलहन के लिबास में ही आईने के सामने खड़ी थी.

शादी से पहले तकरीबन सभी लड़कियां अपनी ससुराल और पति के बारे में ढेर सारे सपने संजोती हैं, मगर मैं ने आज तक कभी कुछ नहीं सोचा था. अगर मैं कुछ सपने संजोती भी तो कितने…? वैसे भी मेरी जैसी बदनसीब लड़की को सपने देखने का हक कहां होता है. फिर भी मैं जितने सपने देखती, उस से सैकड़ों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों गुना ज्यादा अच्छा परिवार और पति मुझे मिलने जा रहा था.

मेरे होने वाले पति किसी फिल्मी हीरो से कम दिखने में नहीं थे. अच्छी सरकारी नौकरी थी. पिता के एकलौते बेटे थे. पूरा परिवार सुखी और अमीर था.

ऐसा पति और परिवार पाने के बावजूद भी मैं आज अंदर से खुश नहीं थी, जबकि मुझे तो खुशी से पागल हो कर खूब नाचना चाहिए था, मगर मैं अभी अपनी पुरानी यादों के भंवर में ही उलझी बुझीबुझी सी खुद से ही बातें करने में लगी थी.

आप को एक बात बताऊं, सुन कर आप भी चौंक जाएंगे. मैं जिस घर में अभी दुलहन बनी आईने के सामने खड़ी थी, उस घर की मैं नौकरानी थी… नौकरानी कश्मीरा. मगर आज तक मेरे मालिक और मालकिन ने कभी मुझे घर की नौकरानी नहीं समझा था. वे दोनों हमेशा मुझे अपनी बेटी मानते थे.

मैं आई तो थी इस घर में 14 साल पहले नौकरानी बन कर ही, लेकिन आज इस घर की बेटी बन कर शादी के सुर्ख लाल जोड़े में विदा होने जा रही थी.

मगर, अब मैं जो बात आप को बताने जा रही हूं, उसे सुन कर तो आप के पैर तले की जमीन खिसक जाएगी. आप को पता है कि मेरी अपनी मां, जिस ने मुझे जन्म और यह नाम दिया था, भी अभी जिंदा थीं.

मेरी बात सुन कर आप के होश उड़ गए न? जरा सोचिए, मैं कैसेकैसे और किनकिन हालात से गुजर रही होऊंगी. मैं आज आप को अपनी पूरी कहानी सुनाती हूं, शायद आप को बताने से मेरे दिल का भी बोझ कुछ कम हो जाएगा.

बात आज से 35 साल पहले की है. उस समय मेरे पिता यानी गणेश गिरी की उम्र 10 साल की थी. परिवार में मेरे दादाजी यानी दीनानाथ गिरी और मेरे पिताजी के अलावा कोई और नहीं था. दादीजी 5 साल पहले ही मर गई थीं.

मेरा परिवार उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से शहर सिकंदरपुर में रहता था. यह बलिया से तकरीबन

30-35 किलोमीटर दूर है.

मेरे दादाजी को धर्मग्रंथ और हस्त विज्ञान का अच्छा ज्ञान था. वे पूजापाठ और लोगों का हाथ देख कर उन का भविष्य बताने का काम करते थे. सभी उन की बहुत इज्जत करते थे.

मेरे दादाजी की प्रबल इच्छा थी कि उन का बेटा यानी मेरे पिताजी भी पढ़लिख कर धर्मग्रंथों के अच्छा ज्ञाता बनें और उन से भी बड़े विद्वान बनें, मगर मेरे दादाजी की सोच के एकदम सब उलटा हो रहा था.

मेरे पिताजी को संस्कृत कौन कहे, उन का तो पढ़नेलिखने में ही मन नहीं लगता था. दादाजी बहुत डांटते और समझाते, मगर कोई फायदा नहीं होता था. मेरे पिताजी दिनभर अपने दोस्तों के साथ सिर्फ मटरगश्ती करने में लगे रहते थे.

और आखिर में वही हुआ, जिस का मेरे दादाजी को डर था. मेरे पिताजी मैट्रिक में फेल हो गए थे, 1-2 बार नहीं, बल्कि 4-4 बार. दादाजी ने पिताजी को मैट्रिक का इम्तिहान दिलवाया था, मगर हर बार पिताजी फेल ही होते थे.

मेरे दादाजी ने गुस्से में आ कर यह सोच कर कि शायद शादी करने से वह संभल जाएगा, इसलिए उन्होंने मेरे पिताजी की शादी करवा दी थी.

पूरे सिकंदरपुर में मेरे दादाजी का अच्छाखासा नाम था, जिस के चलते मैट्रिक फेल होने के बावजूद मेरे पिताजी की शादी एक अच्छे परिवार में हो गई थी.

मेरी मां पुष्पा गिरी दुलहन बन कर मेरे पिताजी के घर आ गई थीं. वे बहुत खूबसूरत और पढ़ीलिखी थीं, पर दादाजी ने जिस सोच के साथ मेरे पिताजी का ब्याह कराया था, वह कामयाब नहीं हुआ. मेरे पिताजी ने पढ़ाईलिखाई तो छोड़ ही दी थी, वे अब भी कोई कामधंधा नहीं करते थे. सिर्फ दिनभर दोस्तों के साथ घूमा करते थे.

शादी के एक साल बाद ही मेरा यानी इस कश्मीरा गिरी का धरती पर आना हुआ और ठीक 2 साल बाद मेरे छोटे भाई अमर गिरी का. अब हम परिवार में 5 सदस्य हो गए थे, मगर कमाने वाले अभी भी सिर्फ मेरे दादाजी ही थे. नतीजतन, घर चलाने में अब बहुत दिक्कतें होने लगी थीं.

पहले सिर्फ दादाजी ही मेरे पिताजी को उन की फालतू हरकतों पर डांटा करते थे, मगर अब मां भी बातबात पर पिताजी को ताने देने लगी थीं.

इस बात से घर में अब आएदिन पतिपत्नी, बापबेटे में पारिवारिक झगड़े शुरू हो गए थे. दादाजी भी अब इस चिंता में बीमार रहने लगे थे.

मुझे आज भी वे दिन याद थे, क्योंकि तब तक मैं 5 साल की हो गई थी. पिताजी दादाजी से किसी बात को ले कर बहस कर रहे थे. पहली बार मेरी मां ने भी पिताजी के पक्ष में हो कर दादाजी को कुछ बोला था.

मां का साथ पा कर पिताजी का जोश और बढ़ गया. इस का नतीजा यह हुआ कि मेरे दादाजी गुस्से में अपने खुद के बनाए घर को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए थे. मेरे पिताजी ने मना करना तो दूर उलटे उन्हें तुरंत घर से जाने को कह दिया था.

सिकंदरपुर से कुछ ही दूरी पर एक शहर है मऊ. वहां मेरी बूआ रहती थीं, जो मेरे दादाजी को हमेशा अपने पास बुलाती थीं. दादाजी अभी तक मना करते आ रहे थे, मगर उस दिन मेरे पिताजी के रवैए से ऊब कर वे वहीं रहने के लिए चले गए थे.

मेरे दादाजी के घर छोड़ कर जाने से सब से ज्यादा खुशी शायद मेरी मां को हुई थी, क्योंकि दादाजी के जाते ही मेरी मां का बरताव और चालचलन एकदम बदल गया था. जहां पहले घर में भी वे घूंघट निकाले रहती थीं, वहीं अब सूटसलवार और जींसटीशर्ट पहनने लगी थीं.

Mother’s Day Special- प्रश्नों के घेरे में मां: भाग 1

अरु भाभी और शशांक भैया के चेहरे के उठतेगिरते भावों को पढ़तेपढ़ते मैं सोच रही थी कि बंद मुट्ठी में रेत की तरह जब सबकुछ फिसल जाता है तब क्यों इनसान चेतता है?

बीच में ही बात काटते हुए शशांक बोल पडे़ थे, ‘नहीं डाक्टर अवस्थी, ऐसा नहीं कि हम लोग निधि को प्यार नहीं करते या हमेशा उसे मारतेपीटते ही रहते हैं. समस्या तो यह है कि निधि बहुत गंदी बातें सीख रही है.’

नन्ही निधि का छोटा सा बचपन मेरी आंखों के सामने कौंध उठा. घटनाएं चलचित्र की तरह आंखों के परदे पर आजा रही थीं.

उस दिन तेज बरसात हो रही थी. ओले भी गिर रहे थे. पड़ोस के मकान से जोरजोर से आती आवाजें सुन कर मेरा दिल दहल उठा. शशांक कह रहे थे, ‘बदमिजाज लड़की, साफसाफ बता, क्या चाहती है तू? क्या इस नन्ही सी जान की जान लेना चाहती है. छोटी बहन आई है यह नहीं कि खुद को सीनियर समझ कर उस की देखभाल करे. हर समय मारपीट पर ही उतारू रहती है.’

कमरे में गूंजती बेरहम आवाजें बाहर तक सुनाई पड़ रही थीं. निधि की कराह के साथ पूरे वेग से फूटती रुलाई को साफसाफ सुना जा सकता था.

‘पापा प्लीज, मुझे मत मारो. ऐसा मैं ने किया क्या है?’

‘पूरा का पूरा रोटी का टुकड़ा सीमा के मुंह में ठूंस दिया और पूछती है किया क्या है? देखा नहीं कैसे आंखें फट गई थीं उस बेचारी की?’

‘पापा, मैं ने सोचा सब ने नाश्ता कर लिया है. गुड्डी भूखी होगी,’ रोंआसी आवाज में अंदर की ताकत बटोरते हुए निधि ने सफाई सी दी.

‘एक माह की बच्ची रोटी खाएगी, अरी, अक्ल की दुश्मन, वह तो सिर्फ मां का दूध पीती है,’ आंखें तरेरते हुए शशांक बिफर उठे और एक थप्पड़ निधि के गाल पर जड़ दिया.

उस घर में जब से सीमा का जन्म हुआ था. ऐसा अकसर होने लगा था और वह बेचारी पिट जाती थी.

निधि का आर्तनाद सुन कर मैं सोचती कि ये कैसे मांबाप हैं जो इतना भी नहीं समझ पाते कि ऐसा क्रूर और कठोर व्यवहार बच्चे की कोमल भावनाओं को समाप्त करता चला जाएगा.

निधि बचपन से ही मेरे घर आया करती थी. जिस दिन अरु अस्पताल से सीमा को ले कर घर आई, वह बेहद खुश थी. दादी की मदद ले कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उस ने पूरे कमरे में रंगबिरंगे खिलौने सजा दिए.

सीमा का नामकरण संस्कार संपन्न हुआ. मेहमान अपनेअपने घर चले गए थे. परिवार के लोग बैठक में जमा हो कर गपशप में मशगूल थे. निधि भी सब के बीच बैठी हुई थी. अचानक अपनी गोलगोल आंखें मटका कर बालसुलभ उत्सुकता से उस ने मां की तरफ देख कर पूछ लिया, ‘मां, मेरा भी नामकरण ऐसे ही हुआ था?’

‘ऊं हूं,’ चिढ़ाने के लिए उस ने कहा, ‘तुम्हें तो मैं फुटपाथ से उठा कर लाई थी.’

निधि को विश्वास नहीं हुआ तो दोबारा प्रश्न किया, ‘सच, मम्मी?’

अरु ने निधि की बात को सुनी- अनसुनी कर सीमा के नैपीज और फीडर उठाए और अपने कमरे में चली गई.

अगले दिन 10 बजे तक जब निधि सो कर नहीं उठी, तब अरु का ध्यान बेटी की तरफ गया. उस ने जा कर देखा तो पता चला कि तेज बुखार से निधि का पूरा शरीर तप रहा था. आंखों के डोरे लाल थे. कपोलों पर सूखे आंसुओं की परत जमा थी. अरु ने पुचकार कर पूछा, ‘तबीयत खराब है या किसी ने कुछ कहा है?’

निधि ने मां की किसी भी बात का उत्तर नहीं दिया.

निधि का बुखार तो ठीक हो गया पर अब वह हर समय गुमसुम सी बैठी रहती थी. घर में वह न तो किसी से कुछ कहती, न ज्यादा बात ही करती थी. अपने कमरे में पड़ीपड़ी घंटों किताब के पन्ने पलटती रहती. घर के सभी सदस्य यही समझते कि निधि पहले से ज्यादा मन लगा कर पढ़ने लगी है.

एक दिन सीमा को तेज बुखार चढ़ गया. दादी और शशांक दोनों घर पर नहीं थे. अरु समझ नहीं पा रही थी कि सीमा को ले कर कैसे डाक्टर के पास जाए. तभी निधि स्कूल से आ गई. उसे भी हरारत के साथ खांसीजुकाम था. अरु सीमा को निधि के हवाले कर डाक्टर के पास दवाई लेने चली गई. वापस लौटी तो सीमा के लिए ढेर सारी दवाइयां और टानिक थे पर उस में निधि के लिए कोई दवा नहीं थी.

शाम को शशांक और दादी लौट आए. कोई सीमा की पेशानी पर हाथ रखता, कोई गोदी में ले कर पुचकारता. मां पानी की पट्टियां सीमा के माथे पर रखती जा रही थीं पर किसी ने निधि की ओर ध्यान नहीं दिया.

शाम को सीमा थोड़ी ठीक हुई तो अरु उसे गोद में ले कर बालकनी में आ गई. मैं भी कुछ पड़ोसिनों के साथ अपनी बालकनी में बैठी थी. अचानक निधि ने एक छोटा सा पत्थर उठा कर नीचे फेंक दिया तो प्रतिक्रिया में अरु जोर से चिल्लाई, ‘निधि, चल इधर, वहां क्या देख रही है? छत से पत्थर क्यों फेंका?’

अरु की तेज आवाज सुन कर मेरे साथ बैठी एक पड़ोसिन ने कहा, ‘रहने दीजिए भाभीजी, बच्चा है.’

‘ऐसे ही तो बच्चे बिगड़ते हैं. यदि अभी से नहीं रोका तो सिर पर चढ़ कर बोलेगी,’ अरु की आवाज में चिड़- चिड़ापन साफ झलक रहा था.

मैं निधि के बारे में सोचने लगी थी कि उसे भी तो सीमा की तरह बुखार था. उस का भी तो मन कर रहा होगा कोई उसे पुचकारे, उस की तबीयत के बारे में पूछे. क्योंकि सीमा के जन्म से पहले उस के शरीर पर लगी छोटी सी खरोंच भी पूरे परिवार को चिंता में डाल देती थी. लेकिन इस समय सभी सीमा की तबीयत को ले कर चिंतित थे और निधि को अपने घर वालों की उपेक्षा बरदाश्त नहीं हो पा रही थी.

अम्मा- भाग 1: आखिर अम्मा वृद्धाश्रम में क्यों रहना चाहती थी

सब से बड़ी बात-बड़ों की जिंदगी का अनुभव कितनी समस्याओं को सुलझा देता है. लेकिन आज अम्मां वृद्धाश्रम में थीं. क्या वृद्धाश्रम से वापस घर आना उन्हें मंजूर हुआ? आफिस से फोन कर अजय ने नीरा को बताया कि मैं  आनंदधाम जा रहा हूं, तो उस के मन में विचारों की बाढ़ सी आ गई. आनंदधाम यानी वृद्धाश्रम. शहर के एक कोने में स्थित है यह आश्रम. यहां ऐसे बेसहारा, लाचार वृद्धों को शरण मिलती है जिन की देखभाल करने वाला अपना इस संसार में कोई नहीं होता. रोजमर्रा की सारी सुविधाएं यहां प्रदान तो की जाती हैं पर बदले में मोटी रकम भी वसूली जाती है.

बिना किसी पूर्व सूचना के क्यों जा रहा है अजय आनंदधाम? जरूर कोई गंभीर बात होगी.

यह सोच कर नीरा कार में बैठी और अजय के दफ्तर पहुंच गई. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, सब खैरियत तो है?’’

‘‘नीरा, अम्मां, पिछले 1 साल से आनंदधाम में रह रही हैं. आश्रम से महंतजी का फोन आया था. गुसलखाने में फिसल कर गिर पड़ी हैं.’’

अजय की आवाज के भारीपन से ही नीरा ने अंदाजा लगा लिया था कि अम्मां के अलगाव से मन में दबीढकी भावनाएं इस पल जीवंत हो उठी हैं.

‘‘हम चलते हैं, अजय. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘अच्छा होगा मां को यदि किसी विशेषज्ञ को दिखाएं.’’

‘‘ठीक है, रुपए बैंक से निकलवा कर चलते हैं. पता नहीं कब कितने की जरूरत पड़ जाए,’’ सांत्वना के स्वर में नीरा ने कहा तो अजय को तसल्ली हुई.

‘‘मैं तो इस घटना को सुनने के बाद इतना परेशान हो गया था कि रुपयों का मुझे खयाल ही नहीं आया. प्राइवेट अस्पताल में रुपए की तो जरूरत पड़ेगी ही.’’

कुछ ही समय में नीरा रुपए ले कर आ गई. कार स्टार्ट करते ही पत्नी की बगल में बैठे अजय की यादों में 1 साल पहले का वह दृश्य सजीव हो उठा जब तिर्यक कुटिल दृष्टि से नीरा ने अम्मां को इतना अपमानित किया था कि वह चुपचाप अपना सामान बांध कर घर से चली गई थीं.

जातेजाते भी अम्मां की तीक्ष्ण दृष्टि नीरा पर टिक गई थी.

‘अजय, मेरी जिंदगी बची ही कितनी  है? मेरे लिए तू अपनी गृहस्थी में दरार मत डाल,’ अम्मां की गंभीर आवाज और अभिजात दर्पमंडित व्यक्तित्व की छाप वह आज तक अपने मानसपटल से कहां मिटा पाया था.

‘जाना तो अम्मां सभी को है… और रही दरार की बात, तो वह तो कब की पड़ चुकी है. अब कहीं वह दरार खाई में न बदल जाए. यह सोच लीजिए,’ अम्मां के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई नीरा बोली. वह तो इसी इंतजार में बैठी थी कि कब अम्मां घर छोडे़ं और उसे संपूर्ण सफलता हासिल हो.

कहीं अजय की भावुकता अम्मां के पैरों में पुत्र प्रेम की बेडि़यां डाल कर उन्हें रोक न ले, इस बात का डर था नीरा को इसलिए भी वह और अधिक तल्ख हो गई थी.

अगले ही दिन अजय ने फोन पर कुटिल हंसी की खनक में डूबी और बुलंद आवाज की गहराई में उभरते दंभ की झलक के साथ नीरा को किसी से बात करते सुना:

‘जिंदगी भर अब पास न फटकने देने का इंतजाम कर लिया है. कुशलक्षेम पूछना तो दूर, अजय श्राद्ध तक नहीं करेगा अम्मां का.’

उस दिन पत्नी के शब्दों ने अजय को झकझोर कर रख दिया था. समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो गया. पर जब आंखों से परदा हटा तो उस ने निर्णय लिया कि किसी भी हाल में अम्मां को जाने नहीं देगा. रोया, गिड़गिड़ाया, हाथ जोडे़, पैर छुए, पर अम्मां रुकी नहीं थीं. दयनीय बनना उन की फितरत में नहीं था. स्वाभिमानी शुरू से ही थीं.

अम्मां के जाने के बाद उन के तकिए के नीचे से एक लिफाफा मिला था. लिखा था, ‘इनसान क्यों अपनेआप को परिवार की माला में पिरोता है? इसीलिए न कि परिवार का हर संबंधी एकदूसरे के लिए सुखदुख का साथी बने. लेकिन जब वक्त और रिश्तों के खिंचाव से परिवार की डोर टूटने लगे तो अकेले मोती की तरह इधरउधर डोलने या अपने इर्दगिर्द बने सन्नाटे में दुबक जाने के बजाय वहां से हट जाना बेहतर होता है.

‘हमेशा के लिए नहीं, कुछ समय के लिए ही जा रही हूं पर यह समय, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ सालों का भी हो सकता है. दिल से दिल के तार जुड़े होते हैं और ये तार जब झंकृत होते हैं तो पता चल जाता है कि हमें किसी ने याद किया है. जिस पल हमें ऐसा महसूस होगा, हम जरूर मिलेंगे, अम्मां.’

तेज बारिश हो रही थी. गाड़ी से बाहर देखने की कोशिश में अजय ने अपना चेहरा खिड़की के शीशे से सटा दिया. बाहर खिड़की के कांच पर गिर रही एकएक बूंद धीरेधीरे एकसाथ मिल कर पूरे कांच को ढक देती थी. जरा सा कांच पोंछने पर अजय को हर बार एक चेहरा दिखाई देता था. ढेर सारा वात्सल्य समेटे, झुर्रियों भरा वह चेहरा, जिस ने उसे प्यार दिया, 9 माह अपनी कोख में रखा, अपने रक्तमांस से सींचा, आंचल की छांव दी. उस का स्वास्थ्य, उस की पढ़ाई, उस की खुशी, अम्मां की पूरी दुनिया ही अजय के इर्दगिर्द सिमटी थी.

जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में नीरा और अजय विवाह सूत्र में बंधे थे उन हालात में नीरा को परिवार का अंश बनने के लिए अम्मां को न जाने कितना संघर्ष करना पड़ा था.

लाखों रुपए के दहेज का प्रस्ताव ले कर, कई संपन्न परिवारों से अजय के लिए रिश्ते आए थे, पर अम्मां ने बेटे की पसंद को ही सर्वोपरि माना. अम्मां यही दोहराती रहीं कि गरीब घर की लड़की अधिक संवेदनशील होगी. घर का वातावरण सुखमय बनाएगी, अच्छी पत्नी और सुघड़ बहू साबित होगी.

पासपड़ोस के अनुभवों, किस्से- कहानियों को सुन कर अजय ने यही निष्कर्ष निकाला था कि बहू के आते ही घर का वातावरण बदल जाता है. अजय का मन किसी अज्ञात आशंका से घिरा है, अम्मां यह समझ गई थीं. बड़ी ही समझदारी से उन्होंने अजय को समझाया था :

‘बेटा, लोग हमेशा बहुओं को ही दोषी ठहराते हैं, पर मेरी समझ में ऐसा होता नहीं है. घर में जब भी कोई नया सामान आता है तो पुराने सामान को हटना ही पड़ता है. नया पत्ता तभी शाख पर लगता है जब पुराना उखड़ता है. जब भी किसी पौधे को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह आरोपित किया जाता है तो वह तभी पुष्पित, पल्लवित होता है जब उसे पर्याप्त मात्रा में खादपानी मिलता है. सामंजस्य, समझौता, समर्पण, दोनों ही पक्षों की तरफ से होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता, तो परिवार बिखरता है.’

अजय आश्वस्त हो गया. अम्मां ने नीरा को प्यार और अपनत्व से और नीरा ने उन्हें सम्मान और कर्तव्यनिष्ठा से अपना लिया. बहू में उन की आत्मा बसती थी. उसे सजतेसंवरते देख अम्मां मुग्धभाव से हिलोरें लेतीं. नीरा की कमियों को कोई गिनवाता तो चट से मोर्चा संभाल लेतीं.

‘मेरी अपर्णा को ही क्या आता था. पर धीरेधीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले, सबकुछ सीखती चली गई.’

1 वर्ष बीततेबीतते अजय जुड़वां बेटों का बाप बन गया. अम्मां के चेहरे पर भारी संतोष की आभा झलक उठी. इसी दिन के लिए ही तो वह जैसे जी रही थीं. अस्पताल के कौरीडोर में नर्सों, डाक्टरों से बातचीत करतीं अम्मां को देख कर कौन कह सकता था कि वह घर से बाहर कभी निकली ही नहीं.

लवकुश नाम रखा उन्होंने अपने पोतों का. 40 दिन तक उन्होंने नीरा को बिस्तर से उठने नहीं दिया. अपर्णा को भी बुलवा भेजा. ननदभौजाई गप्पें मारतीं, अम्मां चौका संभालतीं.

‘अब तो महीना होने को आया. मेरी सास तो 21 दिन बाद ही घर की बागडोर मुझे संभालने को कह कर खुद आराम करती हैं,’ अम्मां की भागदौड़ से परेशान अपर्णा ने कहा तो अम्मां ने बुरा सा मुंह बनाया.

‘तेरी ससुराल में होता होगा. थोड़ा-बहुत काम करने से शरीर में जंग नहीं लगता.’

‘थोड़ाबहुत?’ अपर्णा ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में पूछा था.

‘संयुक्त परिवार की यही  तो परिभाषा है. जरूरत पड़ने पर एकदूसरे के काम आओ. कच्चा शरीर है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई तो जिंदगी भर का रोना.’

सवा महीना बीत गया. अपर्णा अपनी ससुराल लौट रही थी. अम्मांबाबूजी हमेशा भरपूर नेग देते थे. और इस बार तो लवकुश भी आ गए थे. अपर्णा ने मनुहार की. ‘2 दिन बाद तो मैं चली जाऊंगी. अम्मां, एक बार बाजार तो मेरे साथ चलो.’

‘ऐसा कर, अजय दफ्तर के लिए निकले तो दोनों ननदभावज उस के साथ ही निकल जाओ. जो जी चाहे, खरीद लो. पेमेंट बाबूजी कर देंगे.’

‘आप के साथ जाने का मन है, अम्मां. एक दिन भाभी संभाल लेंगी,’ अपर्णा ने मचल कर कहा तो अम्मां की आंखें नम हो आई थीं.

‘फिर कभी सही. तेरे जाने की तैयारी भी तो करनी है.’

विदाई: क्या कविता को नीरज का प्यार मिला?

Story in hindi

विदाई- भाग 2: क्या कविता को नीरज का प्यार मिला?

उस ने आगे बढ़ कर अपनी पत्नी को बांहों में भर लिया. कविता अचानक हिचकियां ले कर रोने लगी. नीरज की आंखों से भी आंसू बह रहे थे.

कविता के शरीर ने जब कांपना बंद कर दिया तब नीरज ने उसे अपनी बांहों के घेरे से मुक्त किया. अब तक अपनी मजबूत इच्छाशक्ति का सहारा ले कर उस ने खुद को काफी संभाल भी लिया था.

‘‘मेरे सामने यह रोनाधोना नहीं चलेगा, जानेमन,’’ उस ने मुसकरा कर कविता के गाल पर चुटकी भरी, ‘‘इन मुसीबत के क्षणों को भी हम उत्साह, हंसीखुशी और प्रेम के साथ गुजारेंगे. यह वादा इसी वक्त तुम्हें मुझ से करना होगा, कविता.’’

नीरज ने अपना हाथ कविता के सामने कर दिया.

कविता शरमाते हुए पहली बार सहज ढंग से मुसकराई और उस ने हाथ बढ़ा कर नीरज का हाथ पकड़ लिया.

उस रात नीरज अपनी ससुराल में रुका. दोनों ने साथसाथ खाना खाया. फिर देर रात तक हाथों में हाथ ले कर बातें करते रहे.

भविष्य के बारे में कैसी भी योजना बनाने का अवसर तो नियति ने उन से छीन ही लिया था. अतीत की खट्टीमीठी यादों को ही उन दोनों ने खूब याद किया.

सुहागरात, शिमला में बिताया हनीमून, साथ की गई खरीदारी, देखी हुई जगहें, आपसी तकरार, प्यार में बिताए क्षण, प्रशंसा, नाराजगी, रूठनामनाना और अन्य ढेर सारी यादों को उन्होंने उस रात शब्दों के माध्यम से जिआ.

हंसतेमुसकराते, आंसू बहाते वे दोनों देर रात तक जागते रहे. कविता उसे यौन सुख देने की इच्छुक भी थी पर कैंसर ने इतना तेज दर्द पैदा किया कि उन का मिलन संभव न था.

अपनी बेबसी पर कविता की रुलाई फूट पड़ी. नीरज ने बड़े सहज अंदाज में पूरी बात को लिया. वह तब तक कविता के सिर को सहलाता रहा जब तक वह सो नहीं गई.

‘‘मैं तुम्हारी अंतिम सांस तक तुम्हारे पास हूं, कविता. इस दुनिया से तुम्हारी विदाई मायूसी व शिकायत के साथ नहीं बल्कि प्रेम व अपनेपन के एहसास के साथ होगी, यह वादा है मेरा तुम से,’’ नींद में डूबी कविता से यह वादा कर के ही नीरज ने सोने के लिए अपनी आंखें बंद कीं.

अगले दिन सुबह नीरज और कविता 2 कमरों वाले एक फ्लैट में  रहने चले आए. यह खाली पड़ा फ्लैट नीरज के एक पक्के दोस्त रवि का था. रवि ने फ्लैट दिया तो अन्य दोस्तों व आफिस के सहयोगियों ने जरूरत के दूसरे सामान भी फ्लैट में पहुंचा दिए.

नीरज ने आफिस से लंबी छुट्टी ले ली. जहां तक संभव होता अपना हर पल वह कविता के साथ गुजारने की कोशिश करता.

उन से मिलने रोज ही कोई न कोई घर का सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त आ जाते. सभी अपनेअपने ढंग से सहानुभूति जाहिर कर उन दोनों का हौसला बढ़ाने की कोशिश करते.

नीरज की समझ में एक बात जल्दी ही आ गई कि हर सहानुभूतिपूर्ण बातचीत के बाद वह दोनों ही उदासी और निराशा का शिकार हो जाते थे. शब्दों के माध्यम से शरीर या मन की पीड़ा को कम करना संभव नहीं था.

इस समझ ने नीरज को बदल दिया. कविता का ध्यान उस की घातक बीमारी पर से हटा रहे, इस के लिए उस ने ज्यादा सक्रिय उपायों को इस्तेमाल में लाने का निर्णय किया.

उसी शाम वह बाजार से लूडो और कैरमबोर्ड खरीद लाया. कविता को ये दोनों ही खेल पसंद थे. जब भी समय मिलता दोनों के बीच लूडो की बाजी जम जाती.

एक सुबह रसोई में जा कर नीरज ने कविता से कहा, ‘‘मुझे भी खाना बनाना सिखाओ, मैं चाय बनाने के अलावा और कुछ जानता ही नहीं.’’

‘‘अच्छा, खाना बनाना सीखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी जनाब,’’ कविता उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए मुसकराई.

‘‘मैडमजी, मैं पूरी लगन से सीखूंगा.’’

‘‘मेरी डांट भी सुननी पड़ेगी.’’

‘‘मुझे मंजूर है.’’

‘‘तब पहले सब्जी काटना सीखो,’’ कविता ने 4 आलू मजाकमजाक में नीरज को पकड़ा दिए.

नीरज तो सचमुच आलुओं को धो कर उन्हें काटने को तैयार हो गया. कविता ने उसे रोकना भी चाहा, पर वह नहीं माना.

उसे ढंग से चाकू पकड़ना भी कविता को सिखाना पड़ा. नीरज ने आलू के आड़ेतिरछे टुकड़े बड़े ध्यान से काटे. दोनों ने ही इस काम में खूब मजा लिया.

‘‘अब मैं तुम्हें खिलाऊंगा आलू के पकौड़े,’’ नीरज की इस घोषणा को सुन कर कविता ने इतनी तरह की अजीबो- गरीब शक्लें बनाईं कि उस का हंसतेहंसते पेट दुखने लगा.

नीरज ने बेसन खुद घोला. तेल की कड़ाही के सामने खुद ही जमा रहा. कविता की सहायता व सलाह लेना उसे मंजूर था, पर पकौड़े बनाने का काम उसी ने किया.

उस दिन के बाद से नीरज भोजन बनाने के काम में कविता का बराबर हाथ बंटाता. कविता को भी उसे सिखाने में बहुत मजा आता. रसोई में साथसाथ बिताए समय के दौरान वह अपना दुखदर्द पूरी तरह भूल जाती.

‘‘मैं नहीं रहूंगी, तब भी आप कभी भूखे नहीं रहोगे. बहुत कुछ बनाना सीख गए हो अब आप,’’ एक रात सोने के समय कविता ने उसे छेड़ा.

‘‘तुम से मैं ने यह जो खाना बनाना सीखा है, शायद इसी की वजह से ऐसा समय कभी नहीं आएगा, जो तुम मेरे साथ मेरे दिल में कभी न रहो,’’ नीरज ने उस के होंठों को चूम लिया.

नीरज से लिपट कर बहुत देर तक खामोश रहने के बाद कविता ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘आप के प्यार के कारण अब मुझे मौत से डर नहीं लगता है.

‘‘जिस से जानपहचान नहीं उस से डरना क्या. जीवन प्रेम से भरा हो तो मौत के बारे में सोचने की फुरसत किसे है,’’ नीरज ने इस बार उस की आंखों को बारीबारी से चूमा.

‘‘आप बहुत अच्छे हो,’’ कविता की आंखें नम होने लगीं.

‘‘थैंक यू. देखो, अगर मैं तुम्हारी तारीफ करने लगा तो सुबह हो जाएगी. कल अस्पताल जाना है. अब तुम आराम करो,’’ अपनी हथेली से नीरज ने कविता की आंखें मूंद दीं.

कुछ ही देर में कविता गहरी नींद के आगोश में पहुंच गई. नीरज देर तक उस के कमजोर पर शांत चेहरे को प्यार से निहारता रहा.

हर दूसरे दिन नीरज अपने किसी दोस्त की कार मांग लाता और कविता को उस की सहेलियों व मनपसंद रिश्तेदारों से मिलाने ले जाता. कभीकभी दोनों अकेले किसी उद्यान में जा कर हरियाली व रंगबिरंगे फूलों के बीच समय गुजारते. एकदूसरे का हाथ थाम कर अपने दिलों की बात कहते हुए समय कब बीत जाता उन्हें पता ही नहीं चलता.

नीरज कितनी लगन व प्रेम से कविता की देखभाल कर रहा है, यह किसी की नजरों से छिपा नहीं रहा. कविता के मातापिता व भाई हर किसी के सामने नीरज की प्रशंसा करते न थकते.

नीरज के अपने मातापिता को उस का व्यवहार समझ में नहीं आता. वे उस के फ्लैट से हमेशा चिंतित व परेशान से हो कर लौटते.

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