Hindi Family Story: मैले साब – कैसी थी हवलदार की मेहमाननवाजी

Hindi Family Story: हवलदार सिंह पुलिस में नहीं, बल्कि राजनीति में थे. वे अपने क्षेत्र के विधायक थे. गांव के लोग आदर से उन्हें ‘मैले साब’ बुलाते थे. इंगलिश का एमएलए बोलने में उन्हें थोड़ी मुश्किल आती थी. विधायकजी को भी इस उपनाम से एतराज नहीं था.

वोटरों के रुझान के मद्देनजर आम चुनाव के ठीक पहले ‘मैले साहब’ ने अपनी पार्टी से बगावत कर जनवादी मोरचा का दामन थाम लिया था. पूरे देश में जनवादी मोरचा के पक्ष में लहर चल रही थी.

चुनाव में अगड़ेपिछड़े दोनों का ठीकठाक सहयोग मिला और मैले साब की नैया पार लग गई. उन की विधायकी सलामत रही और पुरानी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई. राजधानी में उन का पुराना बंगला उन के ही कब्जे में रह गया.

मैले साब के परिवार में उन की पत्नी और 2 बेटियां थीं. पिछली विधायकी में ही बेटियों की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके थे. बेटियां ससुराल में खुश थीं. पत्नी उन के साथ ही विधायक आवास में रहती थीं. वे अकसर बीमार रहती थीं. कोविड काल में संक्रमित हुईं और अस्पताल से लौट नहीं पाईं.

गांव के पुश्तैनी मकान की देखरेख रघु करता था. घर की साफसफाई, रसोई, खेतीबारी वही देखता था. बेटियां, दामाद और बच्चे विधायक आवास पर ही आना पसंद करते थे. रघु 25 साल का हट्टाकट्टा नौजवान था और अभी कुंआरा था.

‘‘जल्दी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी कर लो… रसोई से फुरसत ले कर खेतीबारी पर मन लगाओ…’’ मैले साब को अपनी जायदाद की चिंता थी. खेती से होने वाली सालाना आमदनी से वे संतुष्ट नहीं थे.

‘‘मैना मौसी ने लड़की पसंद कर रखी है… महीनेभर की छुट्टी लगेगी…’’ रघु ने बताया. उस की मैना मौसी का गांव पास के दूसरे जिले में था. पिछले साल तक दोनों गांव एक ही जिले में आते थे.

‘‘रजनी के बच्चों की छुट्टियां हैं… गांव आने की बात है… मैं सलाह कर के महीनेभर की छुट्टी पक्की कर दूंगा…’’ मैले साहब ने भरोसा दिलाया. रजनी उन की बड़ी बेटी थी.

रघु जब 9 साल का था, तभी उस की मां कालाजार के चपेट में आ कर गुजर गई थी. मैना मौसी ने उसे अपने पास रखा था. पिछले चुनाव में रघु ने दोस्तों के साथ अपने गांव का पोलिंग बूथ का जिम्मा लिया था. इसी दौरान जानपहचान हुई और भरोसा कर मैले साब ने गांव की अपनी गृहस्थी रघु को सौंप दी.

शादी हफ्तेभर में निबट गई. मौसी ने नई बहू को अपने ही पास रखने की बात कही.

‘‘खेतीबारी का काम तो कुछ महीनों का होता है. फुरसत मिले, आ जाना. सीता पढ़ीलिखी और होशियार है. गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है… हफ्तेभर की भी छुट्टी होगी तो तुम्हारे पास आ जाएगी,’’ मौसी ने रघु और सीता को पास बुला कर सुझाया. सीता अपने स्कूल की नौकरी से जुड़ी थी. उसे बच्चों से काफी लगाव था.

रघु लौट कर आया तो मैले साब घर पर ही थे. बेटीदामाद, नातीनातिन सब थे. घर में चहलपहल थी. रघु मेहमानों की खातिर में जुट गया. बच्चों ने रघु अंकल से दोस्ती कर ली.

बेटीदामाद और बच्चों को विदा कर मैले साब उदास हो गए थे. उन की बड़ी बेटी अपनी मां पर गई थी. मैले साब को पत्नी की बहुत याद आ रही थी.

‘‘ह्विस्की मिलेगी…’’ मैले साब ने रघु को बुलाया… डर था… प्रदेश में शराबबंदी लागू थी.

‘‘ह्विस्की का तो पता नहीं था… चोरीछिपे देशी बिकती है…’’ रघु बोला.

‘‘नींद लाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा… जुगाड़ लगाओ…’’ मैले साब ने कहा.

रघु ने अपने दोस्तों से बात की… मनोहर ने गिरधारी का नाम लिया… गिरधारी शराबी और गंजेड़ी था.

‘‘शराबबंदी की ऐसीतैसी… ह्विस्की और देशी सब मिलेगी… रोकड़ा मांगता… दारू और छोकरी होना… और जिंदगी में क्या रखा है… सरकार की…’’ गिरधारी ने सरकार को गंदी गाली दी.

रघु ह्विस्की और देशी दोनों ले आया.

रघु ने चखने में भुनी मछली और बकरे का गोश्त बनाया. चखना, दारू की बोतल और गिलास बैठक में सजा कर रख दिया.

मैले साब को शराब थोड़ी चढ़ी तो बड़बड़ाने लगे… रघु को पास बुलाया और पीने की जिद की.

नानुकर करते हुए रघु ने देशी की आधी बोतल गटक ली.

‘‘मेरे पास टाइम किधर है… देश की राजधानी में मिनिस्टर बनूंगा… इधर

पूरी हवेली तुम्हारे नाम कर दूंगा… परिवार के साथ यहीं रहो… फूलोफलो… खुश रहो…’’

नशे में धुत्त मैले साब जमीन पर ही पसर गए… कुछ ही देर में खर्राटे भरने लगे.

अगले हफ्ते मैले साब राजधानी चले गए. पार्टी के एमएलए की खरीदफरोख्त और पाला बदलने की खबर थी. महामहिम के पास हाजिरी लगानी थी.

दशहरे की छुट्टी आने वाली थी. सीता को रघु के साथ रहने का ज्यादा मौका नहीं मिला था. स्कूल की दूसरी टीचर छेड़ती थी.

सरोज अकसर तंग किया करती थी… वह पेट से थी… 5वां महीना चल रहा था.

‘‘सैयां बसे परदेस… रैना कैसे बीते पिया बिन…’’ सरोज उसे छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी. सीता का भी मन मचल रहा था.

रघु को सीता को साथ लाने में कोई परेशानी नहीं थी. धान की फसल की कटाई पूरी हो चुकी थी. सीता के साथ मैना मौसी भी आई थी. मैले साब का मकान हवेलीनुमा था. सीता को छोड़ कर मौसी दूसरे ही दिन वापस चली गई.

शादी के बाद पहली बार कुछ दिनों के लिए साथ रहने का मौका मिला था. पूरी आजादी थी. सीता रघु की मांसल बांहों और मर्दानगी पर फिदा हो चुकी थी. वह रघु की बांहों में चिपकी रहती थी. रघु के साथ खेतों में ट्रैक्टर पर मस्ती करती थी.

इस बीच अचानक मैले साब का इनोवा गाड़ी में आना हुआ. बड़ी गाड़ी में सूबे के बड़े मिनिस्टर आए थे.

रघु मेहमान की खातिरदारी में जुट गया. सीता को रसोई संभालनी पड़ी. मिनिस्टर के साथ कई बौडीगार्ड जीप से आए थे.

चखने और दारू की फरमाइश हुई. गिरधारी ने रम और ह्विस्की के लिए हरे नोटों की गड्डियां ऐंठी. इस धंधे से उस की काफी अच्छीखासी कमाई होती थी. छापामारी होने पर महकमे के अफसर को नजराना देना पड़ता था.

मिनिस्टर साहब देर रात तक पीते रहे. सरकार पलटने की साजिश नाकाम कर पाने की खुशी थी.

सीता ने खाना परोसा था. वह मेहमानों के पास जाने से हिचकिचा रही थी. मैले साब ने रघु को मजबूर किया, तो घूंघट निकाल कर खाना परोसने आई.

घूंघट में उस की सूरत तो छिप गई, पर गदराया बदन और मस्त जवानी ने मिनिस्टर साहब को पागल बना दिया था.

मिनिस्टर साहब बिस्तर में पड़ेपड़े करवटें बदल रहे थे. बेचैनी हो रही थी. सीता भी गई थी. रात रंगीन कर अपनी प्यास और सफर की थकान मिटाना चाहते थे.

देर रात मिनिस्टर साहब ने रघु को अपने कमरे में बुलाया और अपना घिनौना प्रस्ताव रखा.

‘‘बस, एक रात की बात है… मुझे तुम्हारी जोरू से जबरदस्ती नहीं करनी… इस में मजा नहीं आता… पूरी कीमत मिलेगी…’’ मिनिस्टर साहब ने अपने गले से सोने की मोटी चेन और हीरे की कीमती अंगूठी निकाली. मुंहमांगी रकम भी देने का लालच दे कर रघु को राजी करने की कोशिश की.

‘‘गरीब की आबरू से खिलवाड़ मत करो साहब… हम दोनों ने आप की सेवा की है… इस का तो खयाल करो…’’ रघु ने साफ इनकार कर दिया. वह बेहद गुस्से में था, पर लाचार था.

सूबे के मिनिस्टर के सामने उस की हैसियत ही क्या थी. अपनी जान की कीमत पर भी सीता की आबरू बचाने को तैयार था. सीता उस की पत्नी, उस की जीवनसंगिनी थी.

मैले साब गहरी नींद में थे. उन को घटनाक्रम की बिलकुल खबर नहीं थी. मिनिस्टर साहब और रघु के बीच की तनातनी से उन की नींद उचट गई.

रघु ने किस्सा बयान किया, तो उन्हें बेहद बुरा लगा. मैले साब को अपने मेहमान से ऐसी बेहूदगी की उम्मीद नहीं थी.

‘‘सीता मेरी बेटी है… मेरी तीसरी बेटी… मेरे पुश्तैनी मकान की वारिस…’’ मैले साब ने ऐलान किया.

सीता भावुक हो गई. उसे भरोसा हुआ… वह फफक पड़ी. मैले साब ने उसे गले से लगा लिया.

मिनिस्टर साहब का नशा काफूर हो चुका था. भोरअंधेरे उन्होंने ड्राइवर को बुलाया और अपनी इनोवा में चुपचाप निकल गए. वैसे, वे अपनी इस करतूत पर शर्मिंदा नहीं थे. हवलदार सिंह उर्फ मैले साब की मेहमाननवाजी पसंद नहीं आई थी. वे अगले चुनाव में सबक सिखाने की सोच रहे थे. Hindi Family Story

Romantic Story In Hindi: विसाल ए यार – इश्क की अंगड़ाई

Romantic Story In Hindi: दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद किसी बीमारी के चलते आयशा की मां चल बसी थीं. पिता ने दोनों को बड़े लाड़प्यार से पाला था.

आयशा बेशक अमीर लड़की थी, पर उसे पैसे का घमंड छू तक नहीं गया था. लेकिन हां, जिद की पक्की थी वह. जो कह दिया या सोच लिया वह तो कर के ही रहना है, फिर चाहे उस में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं.

आयशा की इसी जिंदादिली पर रोहित मरमिटा था, मगर वह यह नहीं जानता था कि आयशा इतने बड़े घराने से है. आखिरकार दोनों का इश्क अंगड़ाई लेने लगा.

‘‘आयशा, हमारा ग्रेजुएशन का यह आखिरी साल है. तुम ने आगे के बारे में क्या सोचा है? क्या तुम आगे पढ़ोगी या कुछ और?’’

‘‘रोहित, मैं तो अभी आगे पढ़ने की सोच रही हूं, मगर मैं तुम्हारे सिवा किसी और को अपना लाइफ पार्टनर नहीं बना सकती. अगर तुम्हें शादी की जल्दी हो तो मैं अपना प्लान बदल भी सकती हूं. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं, मगर तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. तुम न मिले तो मैं मर जाऊंगी.’’

‘‘आयशा, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा, लेकिन अभी मैं इस लायक भी नहीं कि अपने परिवार का बोझ उठा सकूं. मुझे अभी आगे और पढ़ना है, ताकि मैं किसी अच्छी पोस्ट पर जौब कर सकूं और तुम्हें और अपने परिवार को हर वह खुशी दे सकूं, जिस के तुम सब हकदार हो. तुम्हें इंतजार करना होगा.’’

‘‘मैं मरते दम तक भी इंतजार करूंगी, लेकिन एक बार तुम्हें मेरे पापा से मिल लेना चाहिए. तब तक मेरी भी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, फिर हम दोनों मिल कर अपना परिवार संभाल लेंगे.’’

‘‘ठीक है. मैं कल ही तुम्हारे पापा से मिलता हूं.’’

अगले दिन रोहित आयशा के पापा से मिलने गया, तो आयशा के पापा ने उस से कहा, ‘‘अरे रोहित, आओ बेटा. मुझे तुम्हारे बारे में आयशा ने सब बता दिया है. बेटा, तुम ने बहुत सही फैसला लिया कि एक बार सैट हो कर ही शादी के बारे में सोचना है.’’

‘‘जी हां अंकल, पहले इनसान को परिवार पालने लायक बनना चाहिए, उस के बाद ही परिवार को आगे बढ़ाने का सोचना चाहिए. आप से मुझे यही उम्मीद थी. आयशा… अब मेरी अमानत है आप के पास. ठीक है तो मैं चलता हूं.’’

जैसे ही रोहित जाने के लिए उठा, आयशा के पापा ने उस के हाथ पर

50 लाख रुपए का चैक रख दिया, जिसे रोहित हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘अंकल, यह सब क्या है?’’

‘‘बेटा, यह मेरी तरफ से एक छोटी सी मदद है, जो तुम्हारा भविष्य बनाने में काम आएगी. और अब मेरी बेटी को भूलने की कोशिश करो, ताकि मैं उस की शादी किसी अच्छे और ऊंचे घराने में कर सकूं.’’

‘‘अंकल, आप मेरी मदद कर रहे हैं या मेरे प्यार का सौदा?’’

‘‘कुछ भी समझ लो. अभी मैं तुम्हें प्यार से समझा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो कि मुझे सख्ती से काम लेना पड़े.’’

रोहित चैक ठुकरा कर चला गया और जातेजाते कह गया, ‘‘अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो कोई भी हमें मिलने से नहीं रोक सकता.’’

‘‘पहले इस लायक बन कर दिखाओ,’’ आयशा के पापा को भी अब गुस्सा आने लगा.

आयशा ने लाख कहा कि वह रोहित के बिना जिंदा नहीं रह सकती, पर उस के पापा ने उस की एक न सुनी और फरमान सुना दिया कि अगले महीने आयशा की शादी उन के दोस्त के बेटे आशीष से कर दी जाएगी.

अगले महीने आयशा की शादी बिजनैस टायकून सुरेश मेहता के बेटे आशीष मेहता से करा दी गई. लेकिन जब आयशा विदा होने लगी, तब उस ने पापा को एक नजर देख कर कहा, ‘‘पापा, अब तक मैं आप के साए तले थी, आप का हर हुक्म मानने को मजबूर थी, लेकिन अब मैं अपना हर फैसला लेने के लिए आजाद हूं.’’

‘‘आशीष, मैं किसी और से प्यार करती हूं, इसलिए मैं आप के साथ पत्नी धर्म नहीं निभा सकती,’’ आयशा ने सुहागरात पर ही अपने पति से साफ लफ्जों में कह दिया.

‘‘अगर ऐसा है, तो तुम ने अपने पापा से क्यों नहीं कहा? अब मुझे कहने से क्या फायदा? अब कानूनन तुम मेरी पत्नी हो और तुम पर मेरा हक है.’’

‘‘मगर, किसी की मरजी के खिलाफ उस का शरीर पाना भी कानूनन जुर्म है, यह तो आप जानते ही होंगे, इसलिए आप मुझे तलाक दे दें, ताकि मैं भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकूं और आप भी.’’

‘‘मैं तुम्हें तलाक नहीं दे सकता. यह सब तुम्हें पहले सोचना था. हमारी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएंगी… क्या कहेंगे लोग कि बिजनैस टायकून मेहता का बेटा बीवी को नहीं संभाल सका. मैं तुम्हें किसी कीमत पर तलाक नहीं दूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, इस के जिम्मेदार आप खुद होंगे, मैं उसे नहीं छोड़ सकती.’’

और वही हुआ, जो एक पत्नी को नहीं करना चाहिए था. आयशा अकसर रोहित से मिलती, उस पर अपने हुस्न का जाल बिछाती, मगर रोहित खुद पर काबू पा लेता.

आग भला घी से कितना दूर रहेगी. जब घी और आग पासपास होंगे, तो आग बढ़ेगी भी, भड़केगी भी. एक दिन रोहित भी बहक गया और दोनों के जिस्मानी संबंध बन गए.

अब आयशा रोहित को कहती कि वह उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखे, ताकि किसी तरह उस का पति उसे तलाक दे दे. अगर रोहित कहता कि ऐसा करना गलत है, तो आयशा बीमार होने का नाटक करती. एक बार उस ने कार से जानबूझ कर अपना ऐक्सिडैंट भी किया, ताकि रोहित की हमदर्दी उसे मिल सके… और उधर अपने पति आशीष से भी कुछ न छिपाती, ताकि वह परेशान हो कर उसे तलाक दे दे.

लेकिन आयशा का पति अपने खानदान और अपने स्टेटस की वजह से उसे तलाक नहीं देना चाहता था. उस ने आयशा को बहुत समझाया कि वह गलत काम न करे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, रोहित को भी आयशा के जिस्म का चसका लगता गया. साथ ही, आयशा के पति के पैसे पर ऐश करने का भी वह आदी हो गया था. वह अब आयशा को किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता था, यहां तक कि उस की पढ़ाई का खर्च भी आयशा ही उठाती थी.

अचानक रोहित के पिता की मौत हो गई और इधर आयशा के पति ने भी आयशा के सारे बैंक अकाउंट सील करवा दिए. आयशा का घर से निकलना भी बंद कर दिया.

अब न तो आयशा के पास पैसा था और न ही रोहित के पापा की कमाई. सारी जिम्मेदारी रोहित पर आ गई. रोहित और आयशा का मिलना बंद हो गया.

इत्तिफाक से एक अच्छेखासे परिवार की एकलौती लड़की का रिश्ता रोहित के लिए आया और मां के समझाने पर रोहित ने शादी कर ली और ससुर का सारा बिजनैस संभालने लगा, जिस से रोहित का परिवार सैटल हो गया.

कुछ समय तक तो आयशा चुप रही, मगर उसे तन की भूख जब हद से बढ़ कर सताने लगी और रोहित से मिलने भी न दिया गया, तो उस ने खुदकुशी करने की कोशिश की.

आयशा के खुदकुशी करने वाले मुद्दे पर भी ससुराल वालों के लिए ही मुसीबत खड़ी होगी, इसलिए उस के पति आशीष ने अब अपने मातापिता से कुछ भी छिपाना ठीक नहीं समझा.

सारी बात जान कर आशीष के मातापिता ने आशीष को आयशा से तलाक के लिए राजी कर लिया.

इधर आयशा का तलाक हुआ और जैसे ही खुशीखुशी वह रोहित से मिलने उस के घर गई, सामने ही रोहित अपनी पत्नी के साथ नजर आया.

‘‘अरे आयशा, आओ… बड़े अच्छे मौके पर आई हो. आज मेरे बेटे का नामकरण है. आओ, तुम भी मेरे बेटे को आशीर्वाद दो.’’

आयशा हैरान सी खड़ी कभी रोहित को देखती, तो कभी उस के साथ खड़ी उस की पत्नी को, जिस की गोद में प्यारा सा बच्चा था. दूर कहीं से ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म का सुरैया का गाना चल रहा था… ‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता…’ Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: गुनाहों का रिश्ता – सुदीप का किरण के लिए प्यार

Hindi Romantic Story: ‘‘किरण, क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर तुम ने मुझसे अचानक बोलना क्यों बंद कर दिया?’’

‘‘यों ही.’’

‘‘मुझ से कोई गलती हो गई हो, तो बताओ… मैं माफी मांग लूंगा.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है सुदीप. अब मैं सयानी हो गई हूं न, इसलिए लोगों को मुझ पर शक होने लगा है कि कहीं मैं गलत रास्ता न पकड़ लूं,’’ किरण ने उदास मन से कहा.

‘‘जब से तुम ने मुझे अपने से अलग किया है, तब से मेरा मन बेचैन रहने लगा है.’’

सुदीप की बातें सुन कर किरण बोली, ‘‘अभी तक हम दोनों में लड़कपन था, बढ़ती उम्र में जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं. दूसरों के कहने पर यह सब समझ में आया.’’

‘‘तुम ने कभी मेरे बारे में सोचा है कि मैं कितना बेचैन रहता हूं?’’

‘‘घर का काम निबटा कर जब मैं अकेले में बैठती हूं, तो दूसरे दोस्तों की यादों के साथसाथ तुम्हारी भी याद आती है. हम दोनों बचपन के साथी हैं. अब बड़े हो कर भी लगता है कि हम एकदूसरे के हमजोली बने रहेंगे.’’

‘‘तो दूरियां मत बनाए रखो किरण,’’ सुदीप ने कहा.

यह सुन कर किरण चुप हो गई.

जब सुदीप ने अपने दिल की बात कही, तो किरण का खिंचाव उस की ओर ज्यादा बढ़ने लगा.

दोनों अपने शुरुआती प्यार को दुनिया की नजरों से छिपाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जब दोनों के मिलने की खबर किरण की मां रामदुलारी को लगी, तो उस ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपनी हद में ही रहे.

उसी दिन से सुदीप का किरण के घर आनाजाना बंद हो गया.

लेकिन मौका पा कर सुदीप किरण के घर पहुंच गया. किरण ने बहुत कहा कि वह यहां से चला जाए, लेकिन सुदीप नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम से दिल लगाया, तुम डरती क्यों हो? मैं  तुम से शादी करूंगा, मु?ा पर भरोसा करो.’’

‘‘सुदीप, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन… जैसे अमीर और गरीब का रिश्ता नहीं होता, इसी तरह से ब्राह्मण और नीची जाति का रिश्ता भी मुमकिन नहीं, इसलिए हम दोनों दूर ही रहें तो अच्छा होगा.’’

सुदीप पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा.

वह आगे बढ़ा और किरण को बांहों में भर कर चूमने लगा. पहले तो किरण को अच्छा लगा, लेकिन जब सुदीप हद से ज्यादा बढ़ने लगा, तो वह छिटक कर अलग हो गई.

‘‘बस सुदीप, बस. ऐसी हरकतें जब बढ़ती हैं, तो अनर्थ होते देर नहीं लगती. अब तुम यहां से चले जाओ,’’ नाखुश होते हुए किरण बोली.

‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है किरण, प्यार में यही सब तो होता है.’’

‘‘होता होगा. तुम ने इतनी जल्दी कैसे सम?ा लिया कि मैं इस के लिए राजी हो जाऊंगी?’’

‘‘बस, एक बार मेरी प्यास बुझ दो. मैं दोबारा नहीं कहूंगा. शादी से पहले ऐसा सबकुछ होता है.’’

‘‘नहीं सुदीप, कभी नहीं.’’

इस तरह सुदीप ने किरण से कई बार छेड़खानी की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली.

कुछ दिन बाद किरण के मातापिता  दूसरे गांव में एक शादी में जातेजाते किरण को कह गए थे कि वह घर से बाहर नहीं निकलेगी और न ही किसी को घर में आने देगी.

उस दिन अकेली पा कर सुदीप चुपके से किरण के घर में घुसा और अंदर

से किवाड़ बंद कर किरण को बांहों में कस लिया.

अपने होंठ किरण के होंठों पर रख कर वह देर तक जबरदस्ती करता रहा, जिस से दोनों के जिस्म में सिहरन पैदा हो गई, दोनों मदहोश होने लगे.

किरण के पूरे बदन को धीरेधीरे सहलाते हुए सुदीप उस की साड़ी ढीली कर के तन से अलग करने की कोशिश करने लगा.

किरण का ध्यान टूटा, तो उस ने जोर से धक्का दे कर सुदीप को चारपाई से अलग किया और अपनी साड़ी ठीक करते हुए गरजी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की. चले जाओ यहां से.’’

‘‘चला तो जाऊंगा, लेकिन याद रखना कि तुम ने आज मेरी इच्छा पूरी नहीं होने दी,’’ सुदीप गुस्से में चला गया.

उस के जाने के बाद किरण की आंखों से आंसू निकल आए.

मां के लौटने पर किरण ने सारी सचाई बता दी. रामदुलारी ने उसे चुप रहने को कहा.

किरण के पिता सुंदर लाल से रामदुलारी ने कहा, ‘‘लड़की सयानी हो गई है, कुछ तो फिक्र करो.’’

‘‘तुम इसे मामूली बात सम?ाती हो? आजकल लड़की निबटाने के लिए गांठ भरी न हो, तो कोई बात नहीं करेगा. भले ही उस लड़के वाले के घर में कुछ न हो.’’

‘‘तो क्या यही सोच कर हाथ पर हाथ धर बैठे रहोगे?’’

‘‘भरोसा रखो. वह कोई गलत काम नहीं करेगी.’’

सुंदर लाल की दौड़धूप रंग लाई और एक जगह किरण का रिश्ता पक्का हो गया.

किरण की शादी की बात जब सुदीप के कानों में पहुंची, तो वह तड़प उठा.

एक रात किरण अपने 8 साला भाई के साथ मकान की छत पर सोई थी. उस के बदन पर महज एक साड़ी थी.

किरण और सुदीप के मकानों के बीच दूसरे पड़ोसी का मकान था, जिसे पार करता हुआ सुदीप उस की छत पर चला गया.

सुदीप किरण की बगल में जा कर लेट गया. किरण की नींद खुल गई. देखा कि वह सुदीप की बांहों में थी. पहले तो उस ने सपना सम?ा, पर कुछ देर में ही चेतना लौटी. वह सबकुछ सम?ा गई. उस ने सुदीप की बेजा हरकतों पर ललकारा.

‘‘चुप रहो किरण. शोर करोगी, तो सब को पता चल जाएगा. बदनामी तुम्हारी होगी. मैं तो कह दूंगा कि तुम ने रात में मु?ो मिलने के लिए बुलाया था,’’ कहते हुए सुदीप ने किरण का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

इस के बाद सुदीप किरण के साथ जोरजबरदस्ती करता रहा और वह चुपचाप लेटी रही.

किरण की आंखें डबडबा गईं. उस ने कहा, ‘‘सुदीप, आज तुम ने मेरी सारी उम्मीदों को खाक में मिला दिया. आज तुम ने मेरे अरमानों पर गहरी चोट पहुंचाई है. मैं तुम से प्यार करती हूं, करती रहूंगी, लेकिन अब मेरी नजरों से दूर हो जाओ,’’ कह कर वह रोने लगी.

उसी समय पास में सोए किरण के छोटे भाई की नींद खुली.

‘मांमां’ का शोर करते हुए वह छत से नीचे चला गया और वहां का देखा हाल मां को  सुनाया. सुंदर लाल भी जाग गया. दोनों चिल्लाते हुए सीढ़ी से छत की ओर भागे. उन की आवाज सुन कर सुदीप किरण को छोड़ कर भाग गया.

दोनों ने ऊपर पहुंच कर जो नजारा देखा, तो दोनों के रोंगटे खड़े हो गए. मां ने बेटी को संभाला. बाप छत पर से सुदीप को गालियां देता रहा.

दूसरे दिन पंचायत बैठाने के लिए किरण के पिता सुंदर लाल ने ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद से गुजारिश करते हुए पूरा मामला बतलाया और पूछा, ‘‘हम लोग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं. आप हमारे साथ चलेंगे, तो पुलिस कार्यवाही करेगी, वरना हमें टाल दिया जाएगा.’’

‘‘सुंदर लाल, मैं थाने चलने के लिए तैयार हूं, लेकिन सोचो, क्या इस से तुम्हारी बेटी की गई इज्जत वापस लौट आएगी?’’

‘‘फिर हम क्या करें प्रधानजी?’’

‘‘तुम चाहो, तो मैं पंचायत बैठवा दूं. मुमकिन है, कोई रास्ता दिखाई पड़े.’’

‘‘आप जैसा ठीक सम?ों वैसा करें,’’ कहते हुए सुंदर लाल रोने लगा.

दूसरे दिन गांव की पंचायत बैठी.

गांव के कुछ लोग ब्राह्मणों के पक्ष में थे, तो कुछ दलितों के पक्ष में.

कुछ लोगों ने सुदीप को जेल भिजवाने की बात कही, तो कुछ ने सुदीप से किरण की शादी पर जोर डाला.

शादी की बात पर सुदीप के पिता बिफर पड़े, ‘‘कैसी बातें कहते हो?

कहीं हम ब्राह्मणों के यहां दलित

ब्याही जाएगी.’’

कुछ नौजवान शोर मचाने लगे, ‘जब तुम्हारे बेटे ने दलित से बलात्कार किया, तब तुम्हारा धर्म कहां था?’

‘‘ऐसा नहीं होगा. पहली बात तो यह कि सुदीप ने ऐसा किया ही नहीं. अगर गलती से किया होगा, तो धर्म नहीं बदल जाता,’’ सुदीप की मां बोली.

‘‘तो मुखियाजी, आप सुदीप को जेल भिजवा दें, वहीं फैसला होगा,’’ किरण की मां रामदुलारी ने कहा.

ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद ने पंचों की राय जानी, तो बोले, ‘पंचों की राय है कि सुदीप ने जब गलत काम किया है, तो अपनी लाज बचाने के लिए किरण से शादी कर ले, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहे.’

यह सुन कर ब्राह्मण परिवार सन्न रह गया.

पंचायत ने किरण की इच्छा जानने की कोशिश की. किरण ने भरी पंचायत में कहा, ‘‘मेरी इज्जत सुदीप ने लूटी है. इस वजह से अब मु?ो उसी के पास अपनी जिंदगी महफूज नजर आती है.

‘‘गंदे बरताव की वजह से मैं सुदीप से शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब मैं मजबूर हूं, क्योंकि इस घटना को जानने के बाद अब मु?ा से कोई शादी नहीं करना चाहेगा.’’

सुदीप के पिता ने दुखी मन से कहा, ‘‘मेरी इच्छा तो किरण की शादी वहशी दरिंदे सुदीप के साथ करने की नहीं थी, फिर भी मैं किरण की शादी सुदीप से करने को तैयार हूं.’’

किरण व सुदीप के घरपरिवार में शादी पर रजामंदी हो जाने पर पंचायत ने भी यह गुनाहों का रिश्ता मान लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Story: कई कई रावण से रुबरु

Hindi Story: रोहरानंद से रहा नहीं गया दशानन के पास पहुंच हाथ जोड़कर पूछा,- महात्मन क्या इस नाचीज को एक प्रश्न का जवाब मिलेगा ? हे मनीषी! ज्ञान के सागर!! कृपया, मेरी जिज्ञासा को शांत करें .

दशानन ने सर नीचे कर कहा,- अब अंतिम वक्त में, क्या पूछना चाहते हो .अच्छा होता,  दो-चार दिन पूर्व आते.

रोहरानंद ने नम्र स्वर में कहा,- हे वीर, दशानन! प्लीज… अगर आप मेरी जिज्ञासा शांत नहीं करेंगे तो मेरा दिल टूट जाएगा…

रावण के मुखड़े पर स्मित हास्य तैरने लगी-

-‘अच्छा ! अपनी जिज्ञासा शांत करो । पूछो वत्स…’

दशानन की मधुर वाणी से रोहरानंद को आत्म संबल मिला और उसने खुलकर प्रश्न किया, हे रिपुदमन!कृपया मुझे यह बताएं,  कि आपके चेहरे पर इतनी सौम्यता कहां से आई, इस आभा का रहस्य क्या है ? आपको देखने मात्र से हृदय को बड़ी ठंडक महसूस होने लगी है.

दशानन – ( हंसते हुए ) बस.हम तो तुम्हारे प्रश्न पूछने के अंदाज से भयभीत हो गए थे.जाने क्या जानना चाहता है… हम यही सोच रहे थे.

रोहरानंद,- महात्मा रावण! मैं ने जो महसूस किया उसी जिज्ञासा का शमन चाहता हूं.

दशानन- ( सकुचाते हुए ) वत्स! संभवत: इसका कारण मेरे निर्माता आयोजको का मन है. तुम नहीं जानते,रावण दहन कमेटी के पदाधिकारी स्वच्छ, सरल हृदय के लोग हैं उनकी प्रतिछाया में मैं भी सरल और सादगी को अंगीकार किए हुए हूं.

रोहरानंद प्रसन्न हुआ,दशानन ने आत्मीयता से हाथ मिलाया उसे गर्माहट महसूस हुई.

कहा,-दशानन ! क्या मैं आपका सेल्फी प्राप्त कर सकता हूं.

दशानन मुस्कुराए  – क्यों नहीं. हमारी मित्रता की यह अविस्मरणीय स्मृति होगी.

रोहरानंद पुरानी बस्ती पहुंचा. एक निरीह रावण खड़ा था, देखते ही दया आने लगी. रोहरानंद ने पास पहुंच विनम्र  स्वर में कहा,- मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं ?

आदमकद के साधारण से दशानन ने  भावविहीन चेहरा लिए कहा क्या, सचमुच,  आप मेरी मदद करेंगे ?

रोहरानंद – हां वाकई ! मगर मेरी क्षमता के भीतर.अगर आप आधुनिक सीता हरण में मारीच सृदश्य मदद मांगेंगे, तो मैं कहाँ  कर पाऊंगा.

दशानन- नहीं नहीं,  मुझे तो आपका सिर्फ मारंल सपोर्ट चाहिए.

रोहरानंद- उसके लिए तो मैं हर क्षण तत्पर हूं .

दशानन-( हाथ जोड़कर ) सिर्फ इतनी कृपया करो, समिति वालों को कुछ  जरा चंदा वगैरह करवा दो. कैसे फटे पुराने कागज,  मेरे देह पर चिपका दिए हैं. मुझे बड़ी शर्म आ रही है । लंकाधिपति  रावण की इज्जत का कुछ तो ख्याल रखना चाहिए.

रावण के दु:खी वाणी को सुनकर रोहरानंद का दिल भर आया. उसने समिति वालों की भरसक मदद करने का आश्वासन देकर, आगे बढ़ने मे भलाई समझी.

आगे रोहरानंद बाल्को पहुंच गया,स्टेडियम मैं विराट रावण अट्टाहास लगाता खड़ा था. ऐश्वर्य उसके रोएं रोएं से टपक रहा था. दशानन को देखते ही लोगों के हृदय में एक आंतक, एक सम्मान की भावना स्वमेव जागृत हो जाती थी.

दशानन ने अपनी विशाल गोल- गोल आंखें घुमाते हुए पुराने जमाने के खलनायक की भांति हुंकारा,-ओह कैसा है रे तू. बडी देर कर दी, कहां था अभी तक.

रोहरानंद ने हिचकिचाते हुए ससम्मान कहा,- क्षमा चाहता हूं एक-दो पुराने मित्र मिल गए थे,बस देर हो गई.

दशानन- समय की कीमत किया करो .अपने काम से काम रखो. दोस्त यार काम नहीं आएंगे. खुद को बुलंद करना सीखो. देखो! वेदांता, बाल्को कंपनी किस तरह सतत आगे बढ़ रही है.

रोहरानंद- सर ! कंपनी और मुझ जैसे अदने से व्यक्ति में अंतर तो रहेगा. कहां मैं कहां वेदांता.

दशानन- कंपनी को कौन चलाता है ?तुम जैसा इंसान ही न .अगर इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता ? चिमनी गिर गई थी- गिरी थी न .मगर देखो, कैसे आज लोग उस भीषण त्रासदी को भूल गए हैं.

रोहरानंद – वाकई आप सही हैं. मुझे बहुत कुछ सीखना है. मैं वेदांता से यह सब सीखूगां.

दशानन- ( स्निग्ध मुस्कान बिखेर कर ) बहुत अच्छा चलो,  इंजॉय करो…

रोहरानंद गरीब बस्ती पहुंचा. दशानन जी खड़े, मानो उसी का इंतजार कर रहे थे .रोहरानंद को देखा तो अपने पास बुलाया फुसफुसा कर कहा,- भूख लगी है कुछ जुगाड़ करो न .

रोहरानंद- हे वीर! यहां तो खाने को कुछ भी नहीं है.

दशानन – अरे भाई! ऐसा अनर्थ ना करो, सच ! बड़ी भूख लगी है .अगर मुझे भोजन नहीं दिया गया तो ठीक नहीं होगा.

रोहरानंद- हे लंका नरेश! सच यहां भोज्य सामग्री एक रत्ती भर नहीं है । एक बात मानोगे .वैसे भी अभी आपको अग्नि के सुपुर्द करेंगे ही, जरा धैर्य धारण करो.

दशानन की छोटी- छोटी गोल आंखें घूमने लगी, – देखो मैं यहां एक मिनट भी नहीं रुकूगां. मैं जा रहा हूं.और देखते-देखते दशानन गधे के सिंग की तरह गायब हो गया. Hindi Story

Hindi Funny Story: सबके अच्छे दिन आ गए

Hindi Funny Story: इस देश में बहुत अच्छे दिन आ चुके हैं. चारों ओर विकास की गंगा बहुत जोरों से बहती जा रही है. यह भी कह सकते हैं कि चारों ओर विकास ही विकास पैदा होता जा रहा है और बहुत तेजी से आगे भी पैदा होता रहेगा.

देश में व्यापारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. कर्मचारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. किसानों के अच्छे दिन आ चुके हैं. खूब महंगा आलूप्याज बेचबेच कर वे खूब मालामाल होते जा रहे हैं.

चोरउचक्कों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. सभी चोरउचक्के अपनीअपनी ड्यूटी समय से बजा कर अपना और देश का विकास अंधाधुंध करते जा रहे हैं.

देश में दुराचार और सदाचार के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. एक तरफ दुराचार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐनकाउंटर कर के सदाचार का श्रीगणेश हो रहा है. ऐसा विकास क्या आप ने कहीं देखा होगा? मेरा दावा है, कहीं नहीं देखा होगा.

देश से करोड़ोंअरबों रुपए ले कर भागने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं. काला धन गोरा करने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं.

नेताओं के बाथरूम में नहाते हुए, मालिश कराते हुए मनोरंजक वीडियो के अच्छे दिन आ चुके हैं.

सत्ता के गलियारों और अधिकारियों के अहातों में भटकती विषकन्याओं के अच्छे दिन आ चुके हैं. हनी ट्रैप के सजीव प्रसारण से यह हम जान चुके हैं.

नोटबंदी के बाद नकली करंसी धड़ाधड़ पैदा करने वाली मशीनों के अच्छे दिन आ चुके हैं. चोरउचक्कों, उठाईगीरों, डकैतोंहत्यारों के संसदविधानसभाओं में पहुंचने के अच्छे दिन आ चुके हैं.

हम दुनिया का सब से बड़ा मंदिर बनाने जा रहे हैं, अब पंडेपुजारियों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

भूमाफिया, शिक्षा माफिया, किडनी चोरों, गरीब औरतों की बच्चेदानी निकाल, बां झ बना कर चांदी कूटने वाले डाक्टरों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

पिछड़ों के अच्छे दिन आ चुके हैं, इसीलिए उन के आरक्षण को खत्म करने की मांग जोर पकड़ रही है.

दलितों के भी अच्छे दिन आ गए हैं. उन्हें घोडि़यों पर बैठ कर शादियां करने की जरूरत नहीं रही है.

डायन, कुलटा, निगोड़ी, करमजली, बढ़ती महंगाई के अच्छे दिन आ चुके हैं.

मैं ऐसी विकास की गंगा बहाते हुए देश के हर घर को बिलकुल पवित्र कर दूंगा. देश में सभी खुश हैं. सभी अमीर हैं. कोई दुखी नहीं है. कोई परेशान नहीं है. कोई पीडि़त नहीं है, कोई पीडि़ता नहीं है. किसी को कोई तकलीफ नहीं है.

गीता में भी कहा गया है, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है. जो होगा अच्छा होगा. जो होने वाला है, वह भी अच्छा होगा. और दोस्तो, हमें इस देश पर गर्व है कि सब से अच्छे दिन आ चुके हैं. आए कि नहीं आए…

हमारे अच्छे दिनों की तारीफ दुनियाभर में हो रही है, इसलिए दुनियाभर में यह फकीर  झोला उठा कर घूमते हुए सब की बधाइयां ले रहा है. आप भी हमें अपनी बधाइयां हमारी ओर  झोंकते रहें और कहते रहें, अच्छे दिन आ गए, अच्छे दिन आ गए. Hindi Funny Story

Story In Hindi: सवाल अपने बेटे की अंग्रेजी तालीम का

Story In Hindi: ‘‘बच्चे को एलकेजी में भरती करने वाला मुझे फार्म तो दीजिए,’’ मैं ने अंगरेजी स्कूल के क्लर्क से कहा.

पहले तो उस ने मुझे घूरा, फिर पूछा, ‘‘किसे भरती कराना है?’’

‘‘कहा न, बच्चे को,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘कहां है आप का बच्चा?’’ मेरे आसपास नजर दौड़ाते हुए उस ने पूछा.

‘‘घर में,’’ मैं ने बताया.

‘‘जिसे भरती होना है, उसे घर छोड़ आए. जाइए, उसे ले कर आइए.’’

‘‘भला क्यों…?’’

‘‘पहले मैं उस बच्चे का इंटरव्यू लूंगा. अगर वह भरती होने लायक होगा, तब फार्म दूंगा. यही प्रिंसिपल साहब का आर्डर है,’’ उस ने खुलासा करते हुए बताया.

‘‘भरती करना है या नहीं, यह फैसला कौन लेगा?’’

‘‘प्रिंसिपल साहब. वे आप का इंटरव्यू ले कर फैसला करेंगे.’’

‘‘बच्चे के इंटरव्यू की बात तो गले उतरती है, लेकिन मेरा इंटरव्यू… बात कुछ जमी नहीं,’’ मैं ने हैरानी जाहिर की.

‘‘देखिए, यह अंगरेजी स्कूल है, कोई खैराती या सरकारी नहीं. हमें बच्चे के साथसाथ स्कूल के भले का खयाल रखना पड़ता है, इसीलिए बच्चे के साथसाथ उस के माता पिता का भी इंटरव्यू लिया जाता है.’’

‘‘बात समझ में आई या नहीं? अब जाइए और बच्चे को ले कर आइए.’’

मैं जातेजाते धड़कते दिल से पूछ बैठा, ‘‘किस भाषा में इंटरव्यू लेते हैं प्रिंसिपल साहब?’’

‘‘अंगरेजी स्कूल में दाखिला कराने आए हो और यह भी नहीं जानते?’’

इतना सुनते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मुझे अंगरेजी नहीं आती थी. आज पता चला कि अंगरेजी स्कूल में बच्चे को भरती कराना कितना मुश्किल काम है, खासतौर पर मेरे लिए.

घर पहुंचा, तो मेरी बीवी ने पूछा, ‘‘हो गई भरती?’’

‘‘अभी नहीं,’’ मैं ने ठंडे दिल से कहा.

‘‘क्यों…’’ बीवी की आवाज में उलझन थी.

‘‘फिर बताऊंगा, फिलहाल तो बच्चे को फटाफट तैयार कर दो. उसे स्कूल ले कर जाना है,’’ मैं ने कहा.

मैं ने भी कहने को तो कह दिया, लेकिन मुझे अंगरेजी न आने का कोई हल नजर नहीं आ रहा था.

अचानक मुझे रास्ता सूझा कि मेरे पड़ोसी को अंगरेजी आती है. क्यों न उस से मदद मांगी जाए.

मैं मदद मांगने के लिए उस के पास चला गया. थोड़ी आनाकानी के बाद उस ने बात मान ली. मैं उसे और बच्चे को ले कर स्कूल पहुंचा.

‘‘क्या पढ़ते हो मुन्ना?’’ दाखिले के पहले दौर में क्लर्क ने पुचकारते हुए बच्चे से जब पूछा, तो मैं ने टोका, ‘‘अरे सरजी, अभी पढ़ कहां रहा है… पढ़ाना तो अब आप लोगों को है.’’

‘‘अरे, एबीसीडी तो पढ़ता होगा?’’ चौंकते हुए उस ने कहा.

‘‘जी नहीं,’’ अचानक मेरे मुंह से सच बात निकल गई.

‘‘तो क्या बिना तैयारी के ही दाखिला कराने चले आए?’’

मैं ने बात को बिगड़ते देख कहा, ‘‘मेरे कहने का मतलब है कि अभी स्कूल में नहीं पढ़ रहा. घर में एबीसीडी सिखा रहे हैं.’’

‘‘वही तो मैं पूछ रहा था.’’

‘‘जी हां… जी हां,’’ बात बनती देख मैं ने चैन की सांस ली.

उस ने बच्चे से और भी सवाल पूछे, जिन के माकूल जवाब वह दे नहीं पाया.

बहरहाल, बेहद खुशामद के बाद क्लर्क ने एहसान जताते हुए मुझे फार्म दे दिया.

फार्म भरने के बाद हम लोग प्रिंसिपल साहब के पास पहुंचे. पहले उन्होंने 5 मिनट तक भाषण पिलाया, जिस का मतलब यह था कि अंगरेजी स्कूल में पढ़ना कोई हंसीखेल नहीं है. यहां पढ़ाने के लिए घर का माहौल अंगरेजी वाला होना चाहिए.

फिर प्रिंसिपल साहब ने इंटरव्यू लेना शुरू किया. अंगरेजी में पूछे गए सवालों के जवाब पड़ोसी देने लगा, इसलिए प्रिंसिपल ने समझा कि बच्चे का पिता वही है. वैसे भी वह इस तरह बनठन कर गया था, जैसा अंगरेजी स्कूल में बच्चे को पढ़ाने वाले पिता का होना चाहिए.

प्रिंसिपल साहब बीचबीच में हिंदी में भी कुछ पूछ लेते थे, तब जवाब मैं दे देता था. इस से प्रिंसिपल साहब ने अंदाजा लगाया कि मैं लड़के के पिता का दोस्त हूं, इसीलिए उन्होंने पूछा भी नहीं कि हम दोनों में से लड़के का पिता कौन है?

यही मैं चाहता था, ताकि दाखिला हो जाने के बाद जब इस राज का भंडाफोड़ हो, तो मुझे यह कहने का मौका मिले कि जब पूछा ही नहीं गया, तो बताते कैसे?

खैर, किसी तरह से लड़के का दाखिला हो गया.

कुछ दिनों बाद प्रिंसिपल साहब का मेरे नाम नोटिस आया. लड़के की पढ़ाई के सिलसिले में मुझे बुलाया गया था. अब तो मेरी आंखों के आगे सचमुच अंधेरा छाने लगा.

मैं फिर पड़ोसी के पास गया, लेकिन इस बार उस ने मेरी मदद करने से साफ इनकार कर दिया. अलबत्ता, मेरी हौसलाअफजाई करते हुए उस ने कहा, ‘‘घबराओ मत, हिम्मत से काम लो. बच्चे का दाखिला हो चुका है. अब कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.

‘‘वैसे भी इतने दिनों बाद प्रिंसिपल साहब यह भूल चुके होंगे कि उस दिन लड़के का बाप बन कर मैं गया था.’’

मैं दिल मजबूत कर के प्रिंसिपल के पास चला गया. उन्होंने मुझ से शिकायत करते हुए पूछा (गनीमत थी कि हिंदी में) कि मैं लड़के को घर में पढ़ाता क्यों नहीं? मगर, मैं कैसे कह देता कि मैं अंगरेजी नहीं पढ़ पाया और उसी कमी को बच्चे के जरीए पूरा करने की कोशिश कर रहा हूं?

खैर, मैं बहाने बनाने लगा. तब वे सोच में पड़ कर बड़बड़ाने लगे कि आखिर आप के लड़के का दाखिला हो कैसे गया?

हालांकि प्रिंसिपल साहब ने खूब फटकार लगाई, लेकिन मुझे इस बात की बेहद खुशी थी कि उन की ओर से मुझे मेरे बेटे के पिता के रूप में मंजूरी मिल चुकी थी.

मैं ने मन ही मन पड़ोसी का शुक्रिया अदा किया कि उस ने आज मेरे साथ चलने से इनकार कर के अच्छा ही किया, वरना मैं स्कूल में बेटे का पिता कहलाने का हक खो देता. Story In Hindi

Hindi Family Story: वजह – प्रिया से लड़के वालों ने क्यों रिश्ता तोड़ लिया

Hindi Family Story: ‘‘अरे,संभल कर बेटा,’’ मैट्रो में तेजी से चढ़ती प्रिया के धक्के से आहत बुजुर्ग महिला बोलीं.

प्रिया जल्दी में आगे बढ़ गई. बुजुर्ग महिला को यह बात अखर गई. वे उस के करीब जा कर बोलीं, ‘‘बेटा, चाहे कितनी भी जल्दी हो पर कभी शिष्टाचार नहीं भूलने चाहिए. तुम ने एक तो मुझे धक्का मार कर मेरा चश्मा गिरा दिया उस पर मेरे कहने के बावजूद मुझ से माफी मांगने के बजाय आंखें दिखा रही हो.’’

अब तो प्रिया ने उन्हें और भी ज्यादा गुस्से से देखा. मैं जानती हूं, प्रिया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है. इस में उस की कोई गलती नहीं. वह घर की इकलौती लाडली बेटी है. गजब की खूबसूरत और होशियार भी. वह जल्दी नाराज होती है तो सामान्य भी तुरंत हो जाती है. उसे किसी की टोकाटाकी या जोर से बोलना पसंद नहीं. इस के अलावा उसे किसी से हारना या पीछे रहना भी नहीं भाता.

जो चाहती उसे पा कर रहती. मैं उसे अच्छी तरह समझती हूं. इसीलिए सदैव उस के पीछे रहती हूं. आगे चलने या रास्ते में आने का प्रयास नहीं करती.

मुझे जिंदगी ने भी कुछ ऐसा ही बनाया है. बचपन में अपनी मां को खो दिया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. सौतेली मां को मैं बिलकुल नहीं भाती थी. मैं दिखने में भी खूबसूरत नहीं. एक ही उम्र की होने के बावजूद मुझ में और प्रिया में दिनरात का अंतर है. वह दूध सी सफेद, खूबसूरत, नाजुक, बड़ीबड़ी आंखों वाली और मैं साधारण सी हर चीज में औसत हूं.

जाहिर है, पापा की लाडली भी प्रिया ही थी. मेरे प्रति तो वे केवल अपनी जिम्मेदारी ही निभा रहे थे. पर मैं ने बचपन से ही अपनी परिस्थितियों से समझौता करना सीख लिया था. मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती. सब की परवाह करती पर इस बात की परवाह कभी नहीं करती कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है. जिंदगी जीने का एक अलग ही तरीका था मेरा. शायद यही वजह थी कि प्रिया मुझ से बहुत खुश रहती. मैं अकसर उस की सुरक्षाकवच बन कर खड़ी रहती.

आज भी ऐसा ही हुआ. प्रिया को बचाने के लिए मैं सामने आ गई, ‘‘नहींनहीं आंटीजी, आप प्लीज उसे कुछ मत कहिए. प्रिया ने आप को देखा नहीं था. वह जल्दी में थी. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगती हूं, प्लीज, माफ कर दीजिए.’’

‘‘बेटा जब गलती तूने की ही नहीं तो माफी क्यों मांग रही है? तूने तो उलटा मुझे मेरा गिरा चश्मा उठा कर दिया. तेरे जैसी बच्चियों की वजह से ही दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बाकी है वरना इस के जैसी लड़कियां तो…’’

‘‘मेरे जैसी से क्या मतलब है आप का? ओल्ड लेडी, गले ही पड़ गई हो,’’ बुजुर्ग महिला को झिड़कती हुई प्रिया आगे बढ़ गई.

मुझे प्रिया की यह बात बहुत बुरी लगी. मैं ने बुजुर्ग महिला को सहारा देते हुए खाली पड़ी सीट पर बैठाया और उन्हें चश्मा पहना कर प्रिया के पास लौट आई.

हम दोनों जल्दीजल्दी घर पहुंचे. प्रिया का मूड औफ हो गया था. पर मैं उसे लगातार चियरअप करने का प्रयास करती रही.

मैं सिर्फ प्रिया की रक्षक या पीछे चलने वाली सहायिका ही नहीं थी वरन उस की सहेली और सब से बड़ी राजदार भी थी. वह अपने दिल की हर बात सब से पहले मुझ से ही शेयर करती. मैं उस के प्रेम संबंधों की एकमात्र गवाह थी. उसे बौयफ्रैंड से मिलने कब जाना है, कैसे इस बात को घर में सब से छिपाना है और आनेजाने का कैसे प्रबंध करना है, इन सब बातों का खयाल मुझे ही रखना होता था.

प्रिया का पहला बौयफ्रैंड 8वीं क्लास में उस के साथ पढ़ने वाला प्रिंस था. उसी ने पीछे पड़ कर प्रिया को प्रोपोज किया था. उस की कहानी करीब 4 सालों तक चली. फिर प्रिया ने उसे डिच कर दिया. दूसरा बौयफ्रैंड वर्तमान में भी प्रिया के साथ था. अमीर घर का इकलौता चिराग वैभव नाम के अनुरूप ही वैभवशाली था. प्रिया की खूबसूरती से आकर्षित वैभव ने जब प्रोपोज किया तो प्रिया मना नहीं कर सकी.

आज भी प्रिया उस के साथ रिश्ता निभा रही है पर दिल से उस से जुड़ नहीं सकी है. बस दोनों के बीच टाइमपास रिलेशनशिप ही है. प्रिया की नजरें किसी और को ही तलाशती रहती हैं.

उस दिन हमें अपनी कजिन की शादी में नोएडा जाना था. मम्मी ने पहले ही ताकीद कर दी थी कि दोनों बहनें समय पर तैयार हो जाएं. प्रिया के लिए पापा बेहद खूबसूरत नीले रंग का गाउन ले आए थे जबकि मैं ने अपनी पुरानी मैरून ड्रैस निकाल ली.

नई ड्रैस प्रिया की कमजोरी है. इसी वजह से जब भी पापा प्रिया को पार्टी में ले जाना चाहते तो इसी तरह एक नई ड्रैस उस के बैड पर चुपके से रख आते.

आज भी प्रिया ने नई डै्रस देखी तो खुशी से उछल पड़ी. जल्दी से तैयार हो कर निकली तो सब दंग रह गए. बहुत खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आज तो तू बहुतों का कत्ल कर के आएगी,’’ मैं ने प्यार से उसे छेड़ा तो वह मुझे बांहों में भर कर बोली, ‘‘बहुतों का कत्ल कर के क्या करना है, मुझे तो बस अपने उसी सपनों के राजकुमार की ख्वाहिश है जिसे देखते ही मेरी नजरें झपकना भूल जाएं.’’

‘‘जरूर मिलेगा मैडम, मगर अभी सपनों की दुनिया से जरा बाहर निकलिए और पार्टी में चलिए. क्या पता वहीं कोई आप का इंतजार कर रहा हो,’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.

पार्टी में पहुंच कर हम मस्ती करने लगे. करीब 1 घंटा बीत चुका था. अचानक प्रिया मेरी बांह पकड़ कर खींचती हुई मुझे अलग ले गई और कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘प्रज्ञा वह देखो सामने. ब्लू सूट पहने मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा है. मुझे तो बस इसी से शादी करनी है.’’

मैं खुशी से उछल पड़ी, ‘‘सच प्रिया? तो क्या तेरी तलाश पूरी हुई?’’

‘‘हां,’’ प्रिया ने शरमाते हुए कहा.

सामने खड़ा नौजवान वाकई बहुत हैंडसम और खुशमिजाज लग रहा था. मैं ने कहा, ‘‘मुझे तेरी पसंद पर नाज है प्रिया, मैं पता लगाती हूं कि यह है कौन? वैसे तब तक तुझे उस से दोस्ती करने का प्रयास करना चाहिए.’’

वह रोंआसी हो कर बोली, ‘‘यार यही तो समस्या है. वह पहला लड़का है जो मुझे भाव नहीं दे रहा. मैं ने 1-2 बार प्रयास किया पर वह अपने घर वालों में ही व्यस्त है.’’

‘‘यार कुछ लड़के शर्मीले होते हैं. हो सकता है वह दूसरे लड़कों की तरह बोल्ड न हो जो पहली मुलाकात में ही दोस्ती के लिए उतावले हो उठते हैं.’’

‘‘यार तभी तो यह लड़का मुझे और भी ज्यादा पसंद आ रहा है. दिल कर रहा है कि किसी भी तरह यह मेरा बन जाए.’’

‘‘तू फिक्र मत कर. मैं इस के बारे में सारी बात पता करती हूं. सारी कुंडली निकलवा लूंगी,’’ मैं ने उस लड़के की तरफ देखते हुए कहा.

जल्द ही कोशिश कर के मैं ने उस लड़के से जुड़ी काफी जानकारी इकट्ठी कर ली. वह हमारी कजिन के फ्रैंड का भाई था. उस का नाम मयूर था.

वह कहां काम करता है, कहां रहता है, क्या पसंद है, घर में कौनकौन हैं जैसी बातें मैं ने प्रिया को बता दीं. प्रिया ने फेसबुक, लिंक्डइन जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर जा कर उस लड़के के बारे में और भी जानकारी ले ली. प्रिया ने फेसबुक पर मयूर को फ्रैंड रिक्वैस्ट भी भेजी पर उस ने स्वीकार नहीं की.

अब तो मैं अकसर देखती कि प्रिया उस लड़के के ही खयालों में खोई रहती है. उसी की तसवीरें देखती रहती है या उस की डिटेल्स ढूंढ़ रही होती है. मुझे समझ में आ गया कि प्रिया को उस लड़के से वास्तव में प्यार हो गया है.

एक दिन मैं ने यह बात पापा को बता दी और आग्रह किया कि वे उस लड़के के घर प्रिया का रिश्ता ले कर जाएं. पापा ने उस के परिवार वालों से बात चलाई तो पता चला कि वे लोग भी मयूर के लिए लड़की ढूंढ़ रहे हैं. पापा ने अपनी तरफ से प्रिया के लिए उन्हें प्रपोजल दिया.

रविवार के दिन मयूर और उस के परिवार वाले प्रिया को देखने आने वाले थे. प्रिया बहुत खुश थी. अपनी सब से अच्छी ड्रैस पहन कर वह तैयार हुई. मैं ने बहुत जतन से उस का मेकअप किया. मेकअप कर के बालों को खुला छोड़ दिया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

मगर आज पहली दफा प्रिया मुझे नर्वस दिखाई दे रही थी. जब प्रिया को उन के सामने लाया गया तो मयूर और उस की मां एकटक उसे देखते रह गए. मैं भी पास ही खड़ी थी. मयूर ने तो कुछ नहीं कहा पर उस की मां ने बगैर किसी औपचारिक बातचीत के जो कहा उसे सुन कर हम सब सकते में आ गए.

लड़के की मां ने कहा, ‘‘खूबसूरती और आकर्षण तो लड़की में कूटकूट कर भरा है, मगर आगे कोई बात की जाए उस से पहले ही क्षमा मांगते हुए मैं यह रिश्ता अस्वीकार करती हूं.’’

प्रिया का चेहरा उतर गया. पापा भी इस अप्रत्याशित इनकार से हैरान थे. अजीब मुझे भी बहुत लग रहा था. आखिर प्रिया जैसी खूबसूरत और पढ़ीलिखी बड़े घर की लड़की को पाना किसी के लिए भी हार्दिक प्रसन्नता की बात होती और फिर प्रिया भी तो इस रिश्ते के लिए कितनी उत्साहित थी.

पापा ने हाथ जोड़ते हुए धीरे से पूछा, ‘‘इस इनकार की वजह तो बता दीजिए. आखिर मेरी बच्ची में कमी क्या है?’’

लड़के की मां ने बात बदली और मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह लड़की पसंद है. यदि आप चाहें तो मैं इसे अपनी बहू बनाना पसंद करूंगी. आप घर में बात कर के जब चाहें अपना जवाब दे देना.’’

पापा ने उम्मीद के साथ मयूर की ओर देखा तो वह भी हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अंकल, जैसा मम्मी कह रही हैं मेरा जवाब भी वही है. मैं भी चाहूंगा कि प्रज्ञा जैसी लड़की ही मेरी जीवनसाथी बने.’’

प्रिया रोती हुई अंदर भाग गई. मैं भी उस के पीछेपीछे अंदर चली गई. उन्हें बिदा कर मम्मीपापा भी जल्दी से प्रिया के कमरे में आ गए.

मगर प्रिया किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी. रोती हुई बोली, ‘‘प्लीज, आप लोग बाहर जाएं, मैं अभी अकेली रहना चाहती हूं.’’

हम सब बाहर आ गए. इस समय मेरी स्थिति अजीब हो रही थी. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. कुसूरवार न होते हुए भी आज मैं सब की आंखों में चुभ रही थी. मम्मी मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थीं तो प्रिया भी नजरें चुरा रही थी. मुझे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह भी प्रिया बहुत उदास दिखी. उस की नजरों में दोषी मैं ही थी और यह बात सहन करना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैं ने तय किया कि मैं मयूर के घर वालों के इनकार की वजह जान कर रहूंगी. प्रिया को छोड़ कर उन्होंने मुझे क्यों चुना जबकि प्रिया मुझ से लाख गुना ज्यादा खूबसूरत और स्मार्ट है, होशियार है. मैं तो कुछ भी नहीं.

बात की तह तक पहुंचने का फैसला कर मैं मयूर के घर पहुंच गई. बहुत आलीशान और खूबसूरत घर था उन का. महरी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा. घर बहुत करीने से सजा था. मैं ड्राइंगरूम का जायजा ले रही थी कि तभी बगल के कमरे से चश्मा पोंछती बुजुर्ग महिला निकलीं.

मुझे उन्हें पहचानने में एक पल भी नहीं लगा. यह तो मैट्रो वाली वही बुजुर्ग महिला थीं जिन का चश्मा कुछ दिन पहले प्रिया ने गिरा दिया था. मैं ने उन्हें चश्मा उठा कर दिया था. मुझे सहसा सारी बात समझ में आने लगी कि क्यों प्रिया को रिजैक्ट कर उन्होंने मुझे चुना.

सामने से मयूर की मां निकलीं. मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, मैं समझ सकती हूं कि तू क्या पूछने आई है. शायद तुझे अपने सवाल का जवाब मिल भी गया होगा. दरअसल, उस दिन मैट्रो में मैं भी वहीं थी और सब कुछ अपनी नजरों से देखा था. खूबसूरती, रंगरूप, धन, इन सब से ऊपर एक चीज होती है और वह है संस्कार. हमें एक सभ्य और व्यवहारकुशल बहू चाहिए बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’

मैं ने आगे बढ़ कर दोनों के पांव छूने चाहे पर अम्मांजी ने मुझे गले से लगा लिया.

घर पहुंची तो प्रिया ने पहले की तरह रूखेपन से मेरी तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई.

मैं उस के पास जा कर धीरे से बोली, ‘‘कल के इनकार की वजह जानने मैं मयूर के घर गई थी. तुझे याद हैं वे बुजुर्ग महिला, जिन का चश्मा मैट्रो में तेरी टक्कर से नीचे गिर गया था? दरअसल, वे बुजुर्ग महिला मयूर की दादी हैं और इसी वजह से उन्होंने तुझे न कह दिया.

पर तू परेशान मत हो प्रिया. तेरी पसंद के लड़के को मैं कभी अपना नहीं बनाऊंगी. मैं न कह कर आई हूं.’’

प्रिया खामोशी से मेरी तरफ देखती रही. उस की आंखों में रूखेपन की जगह बेचारगी और अफसोस ने ले ली थी. थोड़ी देर चुप बैठने के बाद वह धीरे से उठी और मुझे गले लगाती हुई बोली, ‘‘पागल है क्या? इतने अच्छे रिश्ते के लिए कभी न नहीं करते. मैं करवाऊंगी मयूर से तेरी शादी.’’

मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी तो वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘आज तक तू मेरे लिए जीती रही है. आज समय है कि मैं भी तेरे लिए कुछ अच्छा करूं. खबरदार जो न कहा.’’

मेरे दिल पर पड़ा बोझ हट गया था. मैं ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया. Hindi Family Story

Romantic Story In Hindi: यादों के सहारे – प्रकाश का प्यार

Romantic Story In Hindi: वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था.

उस ने उस लड़की को अपने मकान के सामने वाली सड़क से गुजरते देखा था. उसे देख कर वह लड़की भी एक हलकी सी मुसकान छोड़ जाती थी. वह यहीं के कालेज में पढ़ती थी.

धीरेधीरे उस लड़की की मुसकान ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था. जब वे आपस में मिले, तो उस ने लड़की से कहा था, ‘‘तुम हर पल आंखों में छाई रहती हो. क्यों न हम हमेशा के लिए एकदूजे के हो जाएं?’’

उस लड़की ने कुछ नहीं कहा था. वह कैमिस्ट से दवा खरीद कर चली गई थी. उस का चेहरा उदासी में डूबा था.

उस लड़की का नाम नीलू था. नीलू के मातापिता उस के उदास चेहरे को देख कर चिंतित हो उठे थे.

पिता ने कहा था, ‘‘पहले तो नीलू के चेहरे पर मुसकराहट तैरती थी. लेकिन कई दिनों से उस के चेहरे पर गुलाब के फूल की तरह रंगत नहीं, वह चिडि़यों की तरह फुदकती नहीं, बल्कि किसी बासी फूल की तरह उस के चेहरे पर पीलापन छाया रहता है.’’

नीलू की मां बोली, ‘‘लड़की सयानी हो गई है. कुछ सोचती होगी.’’

नीलू के पिता बोले, ‘‘क्यों नहीं इस के हाथ पीले कर दिए जाएं?’’

मां ने कहा, ‘‘कोई ऊंचनीच न हो जाए, इस से तो यही अच्छा रहेगा.’’

नीलू की यादों को न भूल पाने वाले लड़के का नाम प्रकाश था. वह खुद इस कशिश के बारे में नहीं जानता था. वह अपनेआप को संभाल नहीं सका था. उसे अकेलापन खलने लगा था. उस की आंखों के सामने हर घड़ी नीलू का चेहरा तैरता रहता था.

एक दिन प्रकाश नीलू से बोला, ‘‘नीलू, क्यों न हम अपनेअपने मम्मीडैडी से इस बारे में बात करें?’’

‘‘मेरे मम्मीडैडी पुराने विचारों के हैं. वे इस संबंध को कभी नहीं स्वीकारेंगे,’’ नीलू ने कहा.

‘‘क्यों?’’ प्रकाश ने पूछा था.

‘‘क्योंकि जाति आड़े आ सकती है प्रकाश. उन के विचार हम लोगों के विचारों से अलग हैं. उन की सोच को कोई बदल नहीं सकता.’’

‘‘कोई रास्ता निकालो नीलू. मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता.’’

नीलू कुछ जवाब नहीं दे पाई थी. एक खामोशी उस के चेहरे पर घिर गई थी. दोनों निराश मन लिए अलग हो गए. पूरे महल्ले में उन दोनों के प्यार की चर्चा होने लगी थी.

‘‘जानती हो फूलमती, आजकल प्रकाश और नीलू का चक्कर चल रहा है. दोनों आपस में मिल रहे हैं.’’

‘‘हां दीदी, मैं ने भी स्कूल के पास उन्हें मिलते देखा है. आपस में दोनों हौलेहौले बतिया रहे थे. मुझ पर नजर पड़ते ही दोनों वहां से खिसक लिए थे.’’

‘‘हां, मैं ने भी दोनों को बैंक्वेट हाल के पास देखा है.’’

‘‘ऐसा न हो कि बबीता की कहानी दोहरा दी जाए.’’

‘‘यह प्यारव्यार का चक्कर बहुत ही बेहूदा है. प्यार की आंधी में बह कर लोग अपनी जिंदगी खराब कर लेते हैं.’’

‘‘आज का प्यार वासना से भरा है, प्यार में गंभीरता नहीं है.’’

‘‘देखो, इन दोनों की प्रेम कहानी का नतीजा क्या होता है.’’

प्रकाश के पिता उदय बा अपने महल्ले के इज्जतदार लोगों में शुमार थे. किसी भी शख्स के साथ कोई समस्या होती, तो वे ही समाधान किया करते थे.

धीरेधीरे यह चर्चा उन के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने घर आ कर अपनी पत्नी से कहा था, ‘‘सुनती हो…’’

पत्नी निशा ने रसोईघर से आ कर पूछा, ‘‘क्या है जी?’’

‘‘महल्ले में प्रकाश और नीलू के प्यार की चर्चा फैली हुई है,’’ उदय बाबू ने कहा.

‘‘तभी तो मैं मन ही मन सोचूं कि आजकल वह उखड़ाउखड़ा सा क्यों रहता है? वह खुल कर किसी से बात भी नहीं करता है.’’

‘‘मैं प्रोफैसर साहब के यहां से आ रहा था. गली में 2-4 औरतें उसी के बारे में बातें कर रही थीं.’’

‘‘मैं प्रकाश को समझाऊंगी कि हमें यह रिश्ता कबूल नहीं है,’’ निशा ने कहा.

उधर नीलू के मम्मीडैडी ने सोचा कि जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करवा दें और वे इस जुगाड़ में जुट गए. नीलू को जब इस बारे में मालूम हुआ था, तो उस ने प्रकाश से कहा, ‘‘प्रकाश, अब हम कभी नहीं मिल सकेंगे.’’

‘‘क्यों?’’ उस ने पूछा था.

‘‘डैडी मेरा रिश्ता करने की बात चला रहे हैं. हो सकता है कि कुछ ही दिनों में ऐसा हो जाए,’’ इतना कह कर नीलू की आंखों में आंसू डबडबा गए थे.

‘‘क्या तुम ने…?’’

‘‘नहीं प्रकाश, मैं उन के विचारों का विरोध नहीं कर सकती.’’

‘‘तो तुम ने मुझे इतना प्यार क्यों किया था?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘हम एकदूसरे के हो जाएं, क्या इसे प्यार कहते हैं? क्या जिस्मानी संबंध को ही तुम प्यार का नाम देते हो?’’ यह सुन कर प्रकाश चुप था.

‘‘क्या अलग रह कर हम एकदूसरे को प्यार नहीं करते रहेंगे?’’ कुछ देर चुप रह कर नीलू बोली, ‘‘मुझे गलत मत समझना. मेरे मम्मीडैडी मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन के प्यार को ठेस नहीं पहुंचा सकती.’’

‘‘क्या तुम उन का विरोध नहीं कर सकती?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘जिस ने हमें यह रूप दिया है, हमें बचपन से ले कर आज तक लाड़प्यार दिया है, क्या उन का विरोध करना ठीक होगा?’’ नीलू ने समझाया.

‘‘तो फिर क्या होगा हमारे प्यार का?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘अपनी चाहत को पाने के लिए मैं उन के अरमानों को नहीं तोड़ सकती. उन की सोच हम से बेहतर है.’’

इस के बाद वे दोनों अलग हो गए थे, क्योंकि लोगों की नजरें उन्हें घूर रही थीं. नीलू के मम्मीडैडी की आंखों के सामने बरसों पुराना एक मंजर घूम गया था. उसी महल्ले के गिरधारी बाबू की लड़की बबीता को भी पड़ोस के लड़के से प्यार हो गया था.

उस लड़के ने बबीता को खूब सब्जबाग दिखाए थे और जब उस का मकसद पूरा हो गया था, तो वह दिल्ली भाग गया था. कुछ दिनों तक बबीता ने इंतजार भी किया था. गिरधारी बाबू की बड़ी बेइज्जती हुई थी. कई दिनों तक तो वे घर से बाहर निकले नहीं थे. इतना बोले थे, ‘यह तुम ने क्या किया बेटी?’

बबीता मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह गई थी. एक दिन चुपके से मुंहअंधेरे घर से निकल पड़ी और हमेशाहमेशा के लिए नदी की गोद में समा गई.

गिरधारी बाबू को जब पता चला, तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया था. नीलू की शादी उमाकांत बाबू के यहां तय हो गई थी. जब प्रकाश को शादी की जानकारी हुई, तो उस की आंखों में आंसू डबडबा आए थे. वह अपनेआप को संभाल नहीं पा रहा था.

प्रकाश का एक मन कहता, ‘महल्ले को छोड़ दूं, खुदकुशी कर लूं…’ दूसरा मन कहता, ‘ऐसा कर के अपने प्यार को बदनाम करना चाहते हो तुम? नीलू के दिल को ठेस पहुंचाना चाहते हो तुम?’

कुछ पल तक यही हालत रही, फिर प्रकाश ने सोचा कि यह बेवकूफी होगी, बुजदिली होगी. उस ने उम्रभर नीलू की यादों के सहारे जीने की कमस खाई. नीलू की शादी हो रही थी. खूब चहलपहल थी. मेहमानों के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो गया था. गाजेबाजे के साथ लड़के की बरात निकल चुकी थी.

प्रकाश के घर के सामने वाली सड़क से बरात गुजर रही थी. वह अपनी छत पर खड़ा देख रहा था. वह अपनेआप से बोल रहा था, ‘मैं तुम्हें बदनाम नहीं करूंगा नीलू. इस में मेरे प्यार की रुसवाई होगी. तुम खुश रहो. मैं तुम्हारी यादों के सहारे ही अपनी जिंदगी गुजार दूंगा…’

प्रकाश ने देखा कि बरात बहुत दूर जा चुकी थी. प्रकाश छत से नीचे उतर आया था. वह अपने कमरे में आ कर कागज के पन्नों पर दूधिया रोशनी में लिख रहा था:

‘प्यारी नीलू,

‘वे पल कितने मधुर थे, जब बाग में शुरूशुरू में हमतुम मिले थे. तुम्हारा साथ पा कर मैं निहाल हो उठा था.

‘मैं रातभर यही सोचता था कि वे पल, जो हम दोनों ने एकसाथ बिताए थे, वे कभी खत्म न हों, पर मेरी चाहत के टीले को जमीन से उखाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर दिया गया.

‘मैं चाहता तो जमाने से रूबरू हो कर लड़ता, पर ऐसा कर के मैं अपनी मुहब्बत को बदनाम नहीं करना चाहता था. मेरे मन में हमेशा यही बात आती रही कि वे पल हमारी जिंदगी में क्यों आए?

‘तुम मेरी जिंदगी से दूर हो गई हो. मैं बेजान हो गया हूं. एक अजीब सा खालीपन पूरे शरीर में पसर गया है. संभाल कर रखूंगा उन मधुर पलों को, जो हम दोनों ने साथ बिताए थे.

‘तुम्हारा प्रकाश…’

प्रकाश की आंखें आंसुओं से टिमटिमा रही थीं. धीरेधीरे नीलू की यादों में खोया वह सो गया था. Romantic Story In Hindi

Best Hindi Story: देवर – मंजू के देवर ने उस के साथ क्या किया

Best Hindi Story: प्रदीप को पति के रूप में पा कर मंजू के सारे सपने चूरचूर हो गए. प्रदीप का रंग सांवला और कद नाटा था. वह मंजू से उम्र में भी काफी बड़ा था.

मंजू ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, मगर थी बहुत खूबसूरत. उस ने खूबसूरत फिल्मी हीरो जैसे पति की कल्पना की थी.

प्रदीप सीधासादा और नेक इनसान था. वह मंजू से बहुत प्यार करता था और उसे खुश करने के लिए अच्छेअच्छे तोहफे लाता था. मगर मंजू मुंह बिचका कर तोहफे एक ओर रख देती. वह हमेशा तनाव में रहती. उसे पति के साथ घूमनेफिरने में भी शर्म महसूस होती. मंजू तो अपने देवर संदीप पर फिदा थी. पहली नजर में ही वह उस की दीवानी हो गई थी.

संदीप मंजू का हमउम्र भी था और खूबसूरत भी. मंजू को लगा कि उस के सपनों का राजकुमार तो संदीप ही है. प्रदीप की नईनई नौकरी थी. उसे बहुत कम फुरसत मिलती थी. अकसर वह घर से बाहर ही रहता. ऐसे में मंजू को देवर का साथ बेहद भाता. वह उस के साथ खूब हंसीमजाक करती.

संदीप को रिझाने के लिए मंजू उस के इर्दगिर्द मंडराती रहती. जानबूझ कर वह साड़ी का पल्लू सरका कर रखती. उस के गोरे खूबसूरत बदन को संदीप जब चोर निगाहों से घूरता तो मंजू के दिल में शहनाइयां बज उठतीं.

वह चाहती कि संदीप उस के साथ छेड़छाड़ करे मगर लोकलाज के डर और घबराहट के चलते संदीप ऐसा कुछ नहीं कर पाता था.

संदीप की तरफ से कोई पहल न होते देख मंजू उस के और भी करीब आने लगी. वह उस का खूब खयाल रखती. बातोंबातों में वह संदीप को छेड़ने लगती. कभी उस के बालों में हाथ फिराती तो कभी उस के बदन को सहलाती. कभी चिकोटी काट कर वह खिलखिलाने लगती तो कभी उस के हाथों को अपने सीने पर रख कर कहती, ‘‘देवरजी, देखो मेरा दिल कैसे धकधक कर रहा है…’’

जवान औैर खूबसूरत भाभी की मोहक अदाओं से संदीप के मन के तार झनझना उठते. उस के तनबदन में आग सी लग जाती. वह भला कब तक खुद को रोके रखता. धीरेधीरे वह भी खुलने लगा.

देवरभाभी एकदूसरे से चिपके रहने लगे. दोनों खूब हंसीठिठोली करते व एकदूसरे की चुहलबाजियों से खूब खुश होते. अपने हाथों से एकदूसरे को खाना खिलाते. साथसाथ घूमने जाते. कभी पार्क में समय बिताते तो कभी सिनेमा देखने चले जाते. एकदूसरे का साथ उन्हें अपार सुख से भर देता.

दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. संदीप के प्यार से मंजू को बेहद खुशी मिलती. हंसतीखिलखिलाती मंजू को संदीप बांहों में भर कर चूम लेता तो कभी गोद में उठा लेता. कभी उस के सीने पर सिर रख कर संदीप कहता, ‘‘इस दिल में अपने लिए जगह ढूंढ़ रहा हूं. मिलेगी क्या?’’

‘‘चलो देवरजी, फिल्म देखने चलते हैं,’’ एक दिन मंजू बोली.

‘‘हां भाभी, चलो. अजंता टौकीज में नई फिल्म लगी है,’’ संदीप खुश हो कर बोला और कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में चला गया.

मंजू कपड़े बदलने के बाद आईने के सामने खड़ी हो कर बाल संवारने लगी. अपना चेहरा देख कर वह खुद से ही शरमा गई. बनठन कर जब वह निकली तो संदीप उसे देखता ही रह गया.

‘‘तुम इस तरह क्या देख रहे हो देवरजी?’’ तभी मंजू इठलाते हुए हंस कर बोली.

अचानक संदीप ने मंजू को पीछे से बांहों में भर लिया और उस के कंधे को चूम कर बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो, भाभी. काश, हमारे बीच यह रिश्ता न होता तो कितना अच्छा होता?’’

‘‘अच्छा, तो तुम क्या करते?’’ मंजू शरारत से बोली.

‘‘मैं झटपट शादी कर लेता,’’ संदीप ने कहा.

‘‘धत…’’ मंजू शरमा गई. लेकिन उस के होंठों पर मादक मुसकान बिखर गई. देवर का प्यार जताना उसे बेहद अच्छा लगा.

खैर, वे दोनों फिल्म देखने चल पड़े. फिल्म देख कर जब वे बाहर निकले तो अंधेरा हो चुका था. वे अपनी ही धुन में बातें करते हुए घर लौट पड़े. उन्हें क्या पता था कि 2 बदमाश उन का पीछा कर रहे हैं. रास्ता सुनसान होते ही बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और बदतमीजी करने लगे. यह देख कर संदीप डर के मारे कांपने लगा.

‘‘जान प्यारी है तो तू भाग जा यहां से वरना यह चाकू पेट में उतार दूंगा,’’

एक बदमाश दांत पीसता हुआ संदीप के आगे गुर्राया.

‘‘मुझे मत मारो. मैं मरना नहीं चाहता,’’ संदीप गिड़गिड़ाने लगा.

‘‘जा, तुझे छोड़ दिया. अब फूट ले यहां से वरना…’’

‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ संदीप. मुझे बचा लो…’’ तभी मंजू घबराए लहजे में बोली.

लेकिन संदीप ने जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह वहां से भाग खड़ा हुआ. सारे बदमाश हो… हो… कर हंसने लगे.

मंजू उन की कैद से छूटने के लिए छटपटा रही थी पर उस का विरोध काम नहीं आ रहा था. बदमाश मंजू को अपने चंगुल में देख उसे छेड़ते हुए जबरदस्ती खींचने लगे. वे उस के कपड़े उतारने की फिराक में थे.

‘‘बचाओ…बचाओ…’’ मंजू चीखने लगी.

‘‘चीखो मत मेरी रानी, गला खराब हो जाएगा. तुम्हें बचाने वाला यहां कोई नहीं है. तुम्हें हमारी प्यास बुझानी होगी,’’ एक बदमाश बोला.

‘‘हाय, कितनी सुंदर हो? मजा आ जाएगा. तुम्हें पाने के लिए हम कब से तड़प रहे थे?’’ दूसरे बदमाश ने हंसते हुए कहा.

बदमाशों ने मंजू का मुंह दबोच लिया और उसे घसीटते हुए ले जाने लगे. मंजू की घुटीघुटी चीख निकल रही थी. वह बेबस हो गई थी. इत्तिफाक से प्रदीप अपने दोस्त अजय के साथ उसी रास्ते से गुजर रहा था. चीख सुन कर उस के कान खड़़े हो गए.

‘‘यह तो मंजू की आवाज लगती है. जल्दी चलो,’’ प्रदीप अपने दोस्त अजय से बोला.

दोनों तेजी से घटनास्थल पर पहुंचे. अजय ने टौर्च जलाई तो बदमाश रोशनी में नहा गए. बदमाश मंजू के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे. मंजू लाचार हिरनी सी छटपटा रही थी.

प्रदीप और अजय फौरन बदमाशों पर टूट पड़े. उन दोनों ने हिम्मत दिखाते हुए उन की पिटाई करनी शुरू कर दी. मामला बिगड़ता देख बदमाश भाग खडे़ हुए, लेकिन जातेजाते उन्होंने प्रदीप को जख्मी कर दिया.

मंजू ने देखा कि प्रदीप घायल हो गया है. वह जैसेतैसे खड़ी हुई और सीने से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. उस ने अपने आंसुओं से प्रदीप के सीने को तर कर दिया.

‘‘चलो, घर चलें,’’ प्रदीप ने मंजू को सहारा दिया.

उन्हें घर पहुंचा कर अजय वापस चला गया. मंजू अभी भी घबराई हुई थी. पर धीरेधीरे वह ठीक हुई.

‘‘यह क्या… आप के हाथ से तो खून बह रहा है. मैं पट्टी बांध देती हूं,’’ प्रदीप का जख्म देख कर मंजू ने कहा.

‘‘मामूली सा जख्म है, जल्दी ठीक हो जाएगा,’’ प्रदीप प्यार से मंजू को देखते हुए बोला.

मंजू के दिल में पति का प्यार बस चुका था. प्रदीप से नजर मिलते ही वह शरमा गई. वह मासूम लग रही थी. उस का प्यार देख कर प्रदीप की आंखें छलछला आईं.

बीवी का सच्चा प्यार पा कर प्रदीप के वीरान दिल में हरियाली छा गई. वह मंजू को अपनी बांहों में भरने के लिए मचल उठा.

इतने में मंजू का देवर संदीप सामने आ गया. वह अभी भी घबराया हुआ था. बड़े भाई के वहां से जाने के बाद संदीप ने अपनी भाभी का हालचाल पूछना चाहा तो मंजू ने उसे दूर रहने का इशारा किया.

‘‘तुम ने तो मुझे बदमाशों के हवाले कर ही दिया था. अगर मेरे पति समय पर न पहुंचते तो मैं लुट ही गई थी. कैसे देवर हो तुम?’’ जब मंजू ने कहा तो संदीप का सिर शर्म से झुक गया.

इस एक घटना ने मंजू की आंखें खोल दी थीं. अब उसे अपना पति ही सच्चा हमदर्द लग रहा था. वह अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: सागर से मुझ को मिलना नहीं है – कहानी अल्हड़ गंगा की

Hindi Romantic Story: गंगा गांव की एक भोलीभाली और बेहद खूबसूरत लड़की थी. उस की मासूम खूबसूरती को वैसे तो शब्दों में ढालना बहुत ही मुश्किल है, पर यह समझ लीजिए कि गंगा को देख कर ऐसा लगता था, जैसे खेतों की हरियाली उसी पर छाई हुई है…

अल्हड़, मस्त गंगा पूरे गांव में घूमतीफिरती… कभी गन्ना चूसते हुए, तो कभी बकरी के बच्चे को पकड़ने के लिए… गांवभर के मुस्टंडे आंखें

भरभर कर उसे देखा करते और ठंडी आहें भरते थे, पर गंगा किसी को घास नहीं डालती थी.

गांव के सरपंच के बेटे की शादी का मौका था… सरपंच के घर खूब रौनक थी… दूरदराज के गांवों से भी ढेरों मेहमान आए थे.

गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह और सरपंच में गहरी दोस्ती थी, सो गंगा का पूरा परिवार उस शादी में घराती के रोल में बिजी था. कई सारे इंतजाम लक्ष्मण सिंह के ही जिम्मे थे…

गंगा की मां पार्वती घर के कामों को निबटाने में सरपंच की पत्नी का हाथ बंटा रही थी. गंगा के लिए तो यह शादी जैसे कोई त्योहार, कोई उत्सव जैसी थी… नएनए कपड़े पहनना, सजनासंवरना और नाचगाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना…

‘‘अरी ओ गंगा… कुछ काम भी कर लिया कर… सारा दिन यहां से वहां मटकती फिरती है…’’ पार्वती ने कहा.

‘‘अरी अम्मां, काम करने के लिए तू तो है… अभी तो मेरी खेलनेकूदने की उम्र है,’’ गंगा खिलखिलाते हुए बोली.

‘‘देख तो… ताड़ जैसी हो गई है… कल हाथ पीले हो गए, तो अपनी ससुराल में खिलाएगी… पत्थर…’’ पार्वती गुस्सा दिखाते हुए बोली.

‘‘अम्मां… तू फिक्र मत कर… मेरी ससुराल में नौकरचाकर होंगे… मैं नहीं करूंगी कोई कामधाम,’’ गंगा ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘तेरे मुंह में गुड़ की डली मेरी लाडो… तेरी खातिर ऐसी ही ससुराल देखेंगे…’’ बीच में गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह बोले.

‘‘यह लो… सेर को सवा सेर. समझाने के बजाय उस की हां में हां मिला रहे हो… ओ गंगा के बापू… क्यों इतना सिर चढ़ा रहे हो… लड़की जात है… दोचार गुण सीख लेगी तो ससुराल में काम आएंगे…’’ गंगा की मां तुनक कर बोली.

‘‘क्यों इस के पीछे पड़ी रहती हो… जब ब्याह होएगा… तो सब अपनेआप सीख जाएगी…’’ लक्ष्मण सिंह ने कहा.

‘‘बापू… यह देखो… यह घाघरा और चोली सिलवाई है… अम्मां की बनारसी साड़ी से… कैसी है बापू?’’ गंगा ने पिता से पूछा.

‘‘बहुत बढि़या है… मेरी लाडो एकदम रानी लगती है रानी…’’ लक्ष्मण सिंह खुश होते हुए बोले.

गंगा लहंगाचोली को अपने तन से लगा कर हिलहिल कर खुद को निहार रही थी.

शाम को सरपंच के यहां से बरात निकलनी थी. गंगा के मांबापू पहले ही वहां पहुंच चुके थे. गंगा सजसंवर कर जब वहां पहुंची, तो सब के मुंह खुले के खुले रह गए…

हर कोई गंगा को ही देख रहा था… सब को अपनी तरफ देखते हुए देख कर गंगा शरमा गई. शर्म के मारे उस के गाल और गुलाबी हो गए…

दूसरे गांवों के सरपंच भी वहां आए हुए थे. सीमन गांव के सरपंच और उन का बेटा निहाल भी इस शादी में आए थे… निहाल बांका जवान था. गठा हुआ शरीर और रोबदार चेहरामोहरा… झबरीली मूंछें और गुलाबी होंठ.

गंगा और निहाल ने एकसाथ एकदूजे को देखा. निहाल से नजरें मिलते ही गंगा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और निहाल तो बस एकटक गंगा को ही देखे जा रहा था… मानो उस की आंखें गंगा के सिवा कुछ देखना ही नहीं चाहती हों.

‘‘चलो चलो… जल्दी करो… वर निकासी का समय हो गया,’’ किसी ने कहा.

गंगा और निहाल की तंद्रा टूटी. बरात गई और बरात वापस भी आ गई… लेकिन गंगा और निहाल तो जैसे एकदूसरे में ठहर गए थे… प्यार का बीज फूट चुका था.

‘‘गंगा…’’ किसी ने धीरे से गंगा को पुकारा.

गंगा ने देखा कि एक कोने में निहाल खड़ा था… उस ने गंगा को इशारा किया कि घर के पीछे आ जाओ.

गंगा का दिल जोर से धड़क रहा था, पर निहाल से मिलने की बेताबी भी थी… सब से नजरें बचा कर गंगा घर के पिछवाड़े में पहुंच गई, जहां निहाल बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘गंगा…’’ निहाल ने गंगा के कान

में कहा.

गंगा का पूरा शरीर सिहर गया… मानो निहाल की सांसें, खून के साथ उस की धमनियों में बहने लगी हों.

‘‘हम आज अपने गांव वापस जा रहे हैं,’’ निहाल ने गंगा से कहा.

यह सुन कर गंगा की आंखों में आंसू आ गए और उस ने पलकें उठा कर निहाल को देखा.

‘‘अरी पगली, रोती क्यों हो… अब मैं तुम्हें ब्याह कर हमेशा के लिए साथ ले जाऊंगा,’’ निहाल ने गंगा के आंसू पोंछते हुए कहा.

गंगा थरथर कांप रही थी. निहाल ने उस का माथा चूम लिया. गंगा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. वह लता की तरह निहाल से लिपट गई.

निहाल उसे उठा कर पिछवाड़े में मवेशियों के लिए बनी कोठरी में ले गया. गंगा सुधबुध खो बैठी थी और निहाल बेताब था. उस अंधेरी कोठरी में अचानक बिजलियां चमकीं… कई सारे जुगनू टिमटिमाने लगे… जज्बातों की बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी… बांध टूट गए…

कुछ ही पलों में सबकुछ शांत था, मानो एक भयंकर तूफान आया और

फिर थम गया, जो छोड़ गया कुछ निशानियां… जिन्हें अब गंगा समेट

रही थी.

‘‘गंगा, मैं जल्दी ही आऊंगा और तुम्हें अपनी दुलहन बना कर ले जाऊंगा,’’ निहाल बोला.

गंगा शांत थी. उसे कुछ कहनेसुनने का समय ही न मिला. निहाल फुरती से कोठरी से बाहर निकल गया.

गंगा पिघली जा रही थी. निहाल के प्यार और इस अनोखे एहसास से घिरी गंगा कोठरी से बाहर निकली. निहाल अपने पिता के साथ वापस गांव के लिए निकल चुका था.

गंगा नहीं जानती थी कि जिस पर उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया है, वह कौन है, किस गांव का है और उसे लेने कब आएगा.

मदमस्त लहराती चंचल गंगा एकाएक शांत और गंभीर हो गई थी. रातदिन आहट रहती कि अब निहाल आए या उस की कोई खबर ही आ जाए… कई महीने बीत गए, पर निहाल नहीं आया.

पार्वती और लक्ष्मण सिंह समझ नहीं पा रहे थे कि खिलीखिली सी उन की बेटी क्यों पलपल मुरझा रही है.

नदी किनारे बैठ आंसू बहाती गंगा हताश हो गई… उस का धीरज अब जवाब दे चुका था. अम्मांबापू का ब्याह के लिए जोर देना… जैसे गंगा को भीतर ही भीतर मार रहा था.

एक दिन नदी की आतीजाती लहरों को देखतेदेखते जाने कौन सा तूफान गंगा के दिल में उठा कि उस ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा डूबने लगी. उस का दम घुटने लगा. सांसें उखड़ने लगीं. एकाएक हाथपैर मारती गंगा के हाथ में लकड़ी का एक भारी लट्ठा आ गया. गंगा उस के सहारे तैर कर नदी के किनारे आ गई.

पानी में कूदने, डूबने और मौत का सामना कर लौटी गंगा के मन में एक ही विचार बारबार कौंध रहा था कि जानबूझ कर पानी में कूदने या अनजाने में पानी में गिरने पर इनसान कितना छटपटाता होगा… कितनी तकलीफदेह मौत होती होगी… उस समय उसे अगर एक लकड़ी मिल जाए… तो कितनों की जान बच सकती है… बस, उस ने कुछ सोच कर जंगल से लकडि़यां तोड़ीं और उन से एक नाव तैयार की और उतार दी नदी में.

अब गंगा ने तय किया कि उस की जिंदगी का एक यही मकसद होगा… वह इस नाव से सब को पार लगाएगी और डूबतों के प्राण बचाएगी…

गंगा अब ‘नाव वाली गंगा’ कहलाने लगी. गरीब जरूरतमंदों को नदी पार कराने वाली गंगा… डूबतों की जान बचाने वाली गंगा…

अम्मांबापू की उस के आगे एक न चली. गंगा ने शादी करने से साफ मना कर दिया. कह दिया कि ब्याह की बात की तो वह नदी में कूद कर अपनी जान दे देगी. अम्मांबापू ने हार मान ली.

महीने बीते… साल गुजरे… नाव वाली गंगा नहीं बदली. वह डटी रही नदी किनारे… पार करवाती रही नदी… न जाने कितनी जानें बचाईं उस की नाव ने.

इस बार बारिश बहुत हुई. कई गांव के खेतखलिहान, घरजमीन सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए. गंगा के गांव में भी बाढ़ ने तहलका मचाया, लेकिन गंगा औरों की तरह गांव छोड़ कर भागी नहीं, बल्कि बाढ़ में डूबे लोगों को बचा कर उन की देखरेख करती रही.

बाढ़ का पानी अब उतार पर था. गंगा अपनी नाव के साथ नदी किनारे बैठी थी कि तभी किसी ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा ने लपक कर अपनी नाव उस तरफ चला दी. उस ने देखा कि एक नौजवान डूब रहा था, घबरा कर हाथपैर मार रहा था.

गंगा ने पास पहुंच कर उसे बड़ी मुश्किल से अपनी नाव पर चढ़ा लिया और उस की पीठ दबा कर पानी निकाला.

‘‘क्यों कूदे…?’’ गंगा ने औंधे पड़े उस नौजवान से पूछा.

‘‘मेरा तो सबकुछ लूट गया है. खेतखलिहान, घरजायदाद सब बरबाद हो गया और परिवार भी… सब बह गए. अब मैं

जी कर भी

क्या करूंगा… क्यों बचाया तुम ने?’’ उस  नौजवान ने उलटा लेटे हुए ही जवाब दिया.

‘‘तूफान तो आते हैं और चले जाते हैं… पर इस का यह मतलब तो नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गई. एक तूफान से क्या घबराना. हिम्मत करो और फिर जीना शुरू करो. हो सकता?है कि कुछ बहुत अच्छा हो जाए…’’ गंगा ने कहा.

इतना सुन कर वह नौजवान पलटा. गंगा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘निहाल…’’ गंगा बुदबुदाई.

‘‘गंगा…’’ निहाल गंगा को देख कर हैरान रह गया.

‘‘मैं ने तुम्हें धोखा दिया. उसी

की सजा मुझे मिली है,’’ निहाल रोते

हुए बोला.

गंगा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे.

‘‘गंगा, क्या तुम मुझे एक मौका और नहीं दोगी?’’ निहाल ने गंगा की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

गंगा अवाक थी. उस ने निहाल पर एक तीक्ष्ण निगाह डाली और बोली, ‘‘तुम ने पश्चाताप कर लिया. इस से तुम्हारे तनमन का मैल धुल गया है, लेकिन तुम्हारा और मेरा मेल मुमकिन नहीं है. आओ, तुम्हें नदी किनारे लगा दूं, क्योंकि बीच मंझधार में छोड़ना मेरी फितरत नहीं है.’’

निहाल को नदी किनारे पर उतार कर गंगा की नाव चल पड़ी. निहाल देखता रहा दूर तक, उथली लहरों पर गंगा को चप्पू चलाते हुए.

नदी की कलकल से मानो यही आवाज सुनाई दे रही थी :

‘सागर से मुझ को मिलना नहीं है,

सागर से मिल कर मैं खारी हो जाऊंगी.’ Hindi Romantic Story

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