आत्माराम की पीड़ा : रिटायर्ड फौजी का दर्द

फौज की नौकरी ने आत्माराम को अनुशासन और सेहतमंद रहने की उपयोगिता के बारे में अच्छी तरह से बता दिया था.

50 साल की उम्र में 20 साल की फौज की नौकरी से उन्होंने छुट्टी तो पा ली थी, पर हर समय कुछ करने को मचलने वाला मन और तन अभी काम करने को तैयार रहता था.

आत्माराम की बड़ी बेटी शादी कर अपनी ससुराल जा चुकी थी और बेटा मस्तमलंग भविष्य के लिए कुछ भी ढंग से सोचने लायक नहीं हुआ था. मौजमस्ती ही उस की जिंदगी का टारगेट बना हुआ था.

बेटे की हालत और अपना खालीपन भरने को देखते हुए आत्माराम ने अपने घर पर ही एक परचून की दुकान खोल ली थी. अब फौजी रह चुका आत्माराम दुकानदार बनने और महल्ले में अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश में था. आटेनमक के भाव के साथसाथ वह चेहरे के भाव को भी पढ़ना सीख रहा था.

कोई सिगरेट पीने दुकान में आता तो पीने वाले को उसे फौज की नौकरी का एक किस्सा फ्री में सुनाया जाता. अच्छा बरताव और आमदनी में बढ़ोतरी दुकान पर मन लगाने के लिए काफी थी. अब बेटे को भी 3-4 घंटे दुकान में गुजारने के लिए मना लिया गया.

लड़का भी दुकानदारी में तेज निकला और सालभर में उस ने दुकान से उठने वाले गल्ले को दोगुना कर दिया. पिता की पुत्र की भविष्य को ले कर चिंता काफी कम हो गई थी और वे अब लोगों के निजी और सार्वजनिक काम कराने में मदद करने लगे.

नगरपालिका के चुनाव में कुछ लोगों ने आत्माराम को वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया. आत्माराम की बस एक ही शर्त थी कि वे अपनी जमापूंजी से चुनाव के लिए पैसा खर्च नहीं करेंगे, जो लोगों ने मान ली. मैदान में 5 मुख्य उम्मीदवार थे, लेकिन आत्माराम 563 वोट से जीत गए.

आत्माराम अब ‘फौजीराम’ के नाम से ज्यादा पहचाने जाने लगे और पूरे तनमन से लोगों के काम करवाने में जुटे रहने लगे. सेवा के काम में वे इतना रम गए कि नियमित दिनचर्या कहीं पीछे छूटती चली गई.

कभी बीमार न पड़ने वाला शरीर अब सिरदर्द और थकान अनुभव करने लगा. 5 साल तक लोगों से जुड़ाव और जनसेवा का नतीजा यह हुआ कि ‘फौजीराम’ अब पूरे नगरपालिका क्षेत्र में अच्छी छाप छोड़ चुके थे.

अगला वार्ड चुनाव आत्माराम आसानी से भारी मतों से जीत गए और बिना किसी दल का होने के बावजूद उन्हें निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया.

जिम्मेदारी बढ़ी, तो चिंताओं में भी इजाफा होने लगा. न भोजन सही समय पर करना, न वर्जिश के लिए समय निकाल पाना. डायबिटीज और ब्लड प्रैशर नियमित दवा सेवन के स्तर तक पहुंच गए. लोगों को राहत पहुंचाने के मकसद को पूरा में सिर्फ 7 साल में उन का बदन काफी ?ाड़ गया.

बेटे की शादी के अगले दिन बहू घर आई और थकेहारे आत्माराम बिस्तर से उठ कर खड़े नहीं हो पा रहे थे. पत्नी को चिंता हुई और अपने घरेलू उपचार से राहत देने की कोशिश भी की, पर उन की तकलीफ को सम?ा न पाईं, तो बाकी घर वालों से सलाह कर उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला लिया गया.

जिस की कभी बीमार के रूप में कल्पना न की गई हो, उसे यों बिस्तर पर कराहते देख ज्यादा चिंता ने मरीज को शहर के सब से महंगे अस्पताल के दरवाजे पर ले जा कर खड़ा कर दिया.

मरीज को इमर्जैंसी मे भरती कर इलाज तो शुरू कर दिया गया, पर एक  शख्स को मरीज का परचा बनवाने और दूसरी लिखापढ़ी करने के लिए खड़ा कर दिया गया.

कुछ देर में ही हलचल बढ़ गई. डाक्टर ने आत्माराम के 10 टैस्ट कराने के बाद माइनर हार्ट अटैक की घोषणा कर दी.

हार्ट अटैक का नाम सुनते ही परिवार व परिचितों के हाथपैर फूल गए. एंजियोग्राफी करनी पड़ेगी, ब्लौकेज ज्यादा हुआ तो स्टंट डालना पड़ेगा. जल्दी से फार्म साइन हो गया और फौजी आत्माराम आईसीयू के बिस्तर पर सीमित कर दिए गए.

मिलनाजुलना अब डाक्टर के रहमोकरम पर था. चिंता के मारे परिवार वालों का काम अब प्रार्थना करना और डाक्टर द्वारा लिखी दवा दौड़ कर लाना था. पार्षद होने के चलते थोड़ी ज्यादा देखरेख का फायदा आत्माराम को

मिल रहा था, पर लंबीचौड़ी फीस के लिए कोई राहत नहीं दी जा रही थी.

शादी के मोटे खर्च के बाद यह बड़ा खर्च बिना उधार के पूरा नहीं हो सकता था, जिस के लिए अभी शादी किए बेटे को मदद की गुहार लगानी पड़ रही थी. डाक्टर जो कह रहे थे, उस के अलावा कुछ भी सोचने और करने की हालत में कोई नहीं था.

आपरेशन कर दिया गया. 3 दिन बाद प्राइवेट वार्ड में मरीज को शिफ्ट कर दिया गया. एक आदमी के वहां और रुकने का इंतजाम था.

5 दिन तक मरीज के साथ परिवार के भी सब्र का इम्तिहान होता रहा. आखिरकार 8वें दिन बड़ी मिन्नत के बाद डिस्चार्ज करने के लिए अस्पताल राजी हुआ.

उम्मीद से कहीं ज्यादा बिल को कुछ कम कराने की कोशिश ने इस देरी को और ज्यादा कर दिया. आखिरकार कुछ दिन पहले अपने बेटे की बरात ले कर लौटे मरीज आत्माराम की अस्पताल से चली बरात रात के 10 बजे घर लौटी.

घर पर अपने बिस्तर पर लेटते ही सुकून से भरी सांस लेते हुए आत्माराम गहरी नींद में ऐसे सो गए, जैसे सालों से वे इस नींद के लिए तरस रहे हों.

अगली सुबह जब आत्माराम जागे, तो सब ठीक था. बस, स्फूर्ति से दिनचर्या शुरू करने वाले शरीर पर जैसे ब्रेक लगा दिए गए हों. हाथपैर के साथ दिमाग ने भी खुद को बीमार मान लिया था.

10 दिन की बीमारी ने उन्हें 10 साल से ज्यादा बूढ़ा कर दिया था.

आखिरकार 60 साल की उम्र में पहुंचने से पहले ही आत्माराम की मौत हो गई. लोग उन की अर्थी के पीछे चलते हुए बात कर रहे थे कि ये अस्पताल इलाज लेने गए थे या मौत? अच्छेभले सेहतमंद इनासन का ज्यादा पैसा कमाने की नीयत से किए गए इलाज ने तन और मन से बुरी तरह तोड़ दिया था.

Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi: पति-पत्नी की टॉप 10 बेस्ट कहानियां हिन्दी में

Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi: पति और पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं. यह एक ऐसा रिश्ता होता है जहां प्यार के साथ-साथ तकरार भी देखने को मिलता है. यह रिश्ता दो लोगों को पूरी जिंदगी बांध कर रखता है. जीवन के हर सुख-दुख में पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ निभाते हैं.  इस आर्टिकल में हम लेकर आए हैं सरस सलिल की 10 Best Husband-Wife Story In Hindi. इन कहानियों को पढ़कर आप पति-पत्नी के रिश्ते को गहराई से समझ पाएंगे.  तो अगर आपको भी हैं कहानियां पढ़ने का शौक तो पढ़िए सरस सलिल की Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi.

1. तुम ही चाहिए ममू

husband-wife-story-in-hindiकुछ अपने मिजाज और कुछ हालात की वजह से राजेश बचपन से ही गंभीर और शर्मीला था. कालेज के दिनों में जब उस के दोस्त कैंटीन में बैठ कर लड़कियों को पटाने के लिए तरहतरह के पापड़ बेलते थे, तब वह लाइब्रेरी में बैठ कर किताबें खंगालता रहता था.

ऐसा नहीं था कि राजेश के अंदर जवानी की लहरें हिलोरें नहीं लेती थीं. ख्वाब वह भी देखा करता था. छिपछिप कर लड़कियों को देखने और उन से रसीली बातें करने की ख्वाहिश उसे भी होती थी, मगर वह कभी खुल कर सामने नहीं आया.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

2. भीगी पलकों में गुलाबी ख्वाब: क्या ईशान अपनी भाभी को पसंद करता था?

husband-wife-story-in-hindi

मालविका की गजल की डायरी के पन्ने फड़फड़ाने लगे. वह डायरी छोड़ दौड़ी गई. पति के औफिस जाने के बाद वह अपनी गजलों की डायरी ले कर बैठी ही थी कि ड्राइंगरूम के चार्ज पौइंट में लगा उस का सैलफोन बज उठा.

फोन उठाया तो उधर से कहा गया, ‘‘मैं ईशान बोल रहा हूं भाभी, हम लोग मुंबई से शाम तक आप के पास पहुंचेंगे.’’

42 साल की मालविका सुबह 5 बजे उठ कर 10वीं में पढ़ रहे अपने 14 वर्षीय बेटे मानस को स्कूल बस के लिए  रवाना कर के 49 वर्षीय पति पराशर की औफिस जाने की तैयारी में मदद करती है. नाश्तेटिफिन के साथ जब पराशर औफिस के लिए निकल जाता और वह खाली घर में पंख फड़फड़ाने के लिए अकेली छूट जाती तब वह भरपूर जी लेने का उपक्रम करती. सुबह 9 बजे तक उस की बाई भी आ जाती जिस की मदद से वह घर का बाकी काम निबटा कर 11 बजे तक पूरी तरह निश्ंिचत हो जाती.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

3. मेरा पति सिर्फ मेरा है: अनुषा ने अपने पति को टीना के चंगुल से कैसे निकाला?

husband-wife-story-in-hindi

सुबहबह के 6 बज गए थे. अनुषा नहाधो कर तैयार हो गई. ससुराल में उस का पहला दिन जो था वरना घर में क्या मजाल कि कभी सुबह 8 बजे से पहले उठी हो.

विदाई के समय मां ने समझाया, ‘‘बेटी, लड़कियां कितनी भी पढ़लिख जाएं उन्हें अपने संस्कार और पत्नी धर्म कभी नहीं भूलना चाहिए. सुबह जल्दी उठ कर सिर पर पल्लू रख कर रोजाना सासससुर का आशीर्वाद लेना. कभी पति का साथ न छोड़ना. कैसी भी परिस्थिति आ जाए धैर्य न खोना और मुंह से कभी कटु वचन न निकालना.’’

‘‘जैसी आप की आज्ञा माताश्री…’’

जिस अंदाज में अनुषा ने कहा था उसे सुन कर विदाई के क्षणों में भी मां के चेहरे पर हंसी आ गई थी.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

4. तुम सावित्री हो: क्या पत्नी को धोखा देकर खुश रह पाया विकास?

husband-wife-story-in-hindi

अमेरिका के एअरपोर्ट से जब मैं हवाईजहाज में बैठी तो बहुत खुश थी कि जिस मकसद से मैं यहां आई थी उस में सफल रही. जैसे ही हवाईजहाज ने उड़ान भरी और वह हवा से बातें करने लगा वैसे ही मेरे जीवन की कहानी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के आगे चलने लगी और मैं उस में पूरी तरह खो गई…

विकास और मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं. वैसे मैं उम्र में विकास से 1 वर्ष बड़ी हूं. वे कंपनी में एम.डी. हैं, जबकि मैं सीनियर मैनेजर. कंपनी में साथसाथ काम करने के दौरान अकसर हमारी मुलाकात होती रहती थी. मेरे मम्मीपापा मेरी शादी के लिए लड़का देख रहे थे, लेकिन कोई अच्छा लड़का नहीं मिल रहा था. आखिर थकहार के मम्मीपापा ने लड़का देखना बंद कर दिया. तब मैं ने भी उन से टैलीफोन पर यही कहा कि वे मेरी शादी की चिंता न करें. जब होनी होगी तब चट मंगनी पट शादी हो जाएगी. दरअसल, विकास का कार्यक्षेत्र मेरे कार्यक्षेत्र से एकदम अलग था. यदाकदा हम मिलते थे तो वह भी कंपनी की लिफ्ट या कैंटीन में. वे कंपनी में मुझ से सीनियर थे, हालांकि मैं पहले एक दूसरी कंपनी में कार्यरत थी. मैं ने उन के 3 वर्ष बाद यह कंपनी जौइन की थी. एक बार कंपनी के एक सेमिनार में मुझे शोधपत्र पढ़ने के लिए चुना गया. उस समय सेमिनार की अध्यक्षता विकास ने की थी. जब मैं ने अपना शोधपत्र पढ़ा तब वे मुझ से इतने इंप्रैस हुए कि अगले ही दिन उन्होंने मुझे अपने कैबिन में चाय के लिए आमंत्रित किया. चाय के दौरान हम ने आपस में बहुत बातें कीं. बातोंबातों में उन्होंने मुझ से मेरे बारे में ंसारी बातें मालूम कर लीं. रही उन के बारे में जानकारी लेने की बात, तो मैं उन के बारे में बहुत कुछ जानती थी और जो नहीं जानती थी वह भी उन से पूछ लिया.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

5. प्रेरणा: क्या शादीशुदा गृहस्थी में डूबी अंकिता ने अपने सपनों को दोबारा पूरा किया?

husband-wife-story-in-hindi

‘‘बड़ी मुद्दत हुई तुम्हारा गाना सुने. आज कुछ सुनाओ. कोई भी राग उठा लो,  बागेश्वरी, विहाग या मालकोश, जो इस समय के राग हैं,’’ रात का भोजन करने के बाद मनोहर लाल ने अंकिता से इच्छा व्यक्त की. वे बड़े लंबे समय के बाद अपनी बेटी और दामाद के यहां उन से मिलने आए थे.

इस से पहले कि अंकिता कुछ कहती, उस की 14 साल की बेटी चहक पड़ी, ‘‘सुना तो है कि मां बड़ा अच्छा गाती थीं, संगीत विशारद भी हैं, लेकिन मैं ने तो आज तक इन के मुख से कोई गाना नहीं सुना.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम तो इतना बढि़या गाती थीं. कुछ और समय लखनऊ में रहना हो गया होता तो तुम ने संगीत में निपुणता प्राप्त कर ली होती.’’

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

6. तुम्हारे हिस्से में: पत्नी के प्यार में क्या मां को भूल गया हर्ष?

husband-wife-story-in-hindi

बाइक ‘साउथ सिटी’ मौल के सामने आ कर रुकी तो एक पल के लिए दोनों के बदन में रोमांच से गुदगुदी हुई. मौल का सम्मोहित कर देने वाला विराट प्रवेशद्वार. द्वार के दोनों ओर जटायु के विशाल डैनों की मानिंद दूर तक फैली चारदीवारी. चारदीवारी पर फ्रेस्को शैली के भित्तिचित्र. राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय उत्पादों की नुमाइश करते बड़ेबड़े आदमकद होर्डिंग्स और विंडो शोकेस. सबकुछ इतना अचरजकारी कि देख कर आंखें बरबस फटी की फटी रह जाएं.

भीतर बड़ा सा वृत्ताकार आंगन. आंगन के चारों ओर भव्यता की सारी सीमाओं को लांघते बड़ेबड़े शोरूम. बीच में थोड़ीथोड़ी दूर पर आगतों को मासूमियत के संग अपनी हथेलियों पर ले कर ऊपर की मनचाही मंजिलों तक ले जाने के लिए तत्पर एस्केलेटर.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

7. मेरा प्यार था वह: क्यों शादी के बाद मेघा बदल गई?

husband-wife-story-in-hindi

मुझे ऐसा लगा कि नीरज वहीं उस खिड़की पर खड़ा है. अभी अपना हाथ हिला कर मेरा ध्यान आकर्षित करेगा. तभी पीछे से किसी का स्पर्श पा कर मैं चौंकी.

‘‘मेघा, आप यहां क्या कर रही हैं? सब लोग नाश्ते पर आप का इंतजार कर रहे हैं और जमाईजी की नजरें तो आप ही को ढूंढ़ रही हैं,’’ छेड़ने के अंदाज में भाभी ने कहा.

सब हंसतेबोलते नाश्ते का मजा ले रहे थे, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. मैं एक ही पूरी को तोड़े जा रही थी.

‘‘अरे मेघा, खा क्यों नहीं रही हो बहू, मेघा की प्लेट में गरम पूरियां डालो,’’ मां ने भाभी से कहा.

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए. मेरा नाश्ता हो गया,’’ कह कर मैं उठ गई.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

8. कोरोना लव : शादी के बाद अमन और रचना के रिश्ते में क्या बदलाव आया?

husband-wife-story-in-hindi

अमन घर में पैर रखने ही जा रहा था कि रचना चीख पड़ी, ‘‘बाहर…बाहर जूता खोलो. अभी मैं ने पूरे घर में झाड़ूपोंछा लगाया है और तुम हो कि जूता पहन कर अंदर घुसे आ रहे हो.’’

‘‘अरे, तो क्या हो गया? रोज तो आता हूं,’’ झल्लाते हुए अमन जूता बाहर ही खोल कर जैसे ही अंदर आने लगा रचना ने फिर उसे टोका, ‘‘नहीं, बैठना नहीं, जाओ पहले बाथरूम और अच्छे से हाथमुंहपैर सब धो कर आओ. और हां, अपना मोबाइल भी सैनिटाइज करना मत भूलना. वरना यहांवहां कहीं भी रख दोगे और फिर पूरे घर में इन्फैक्शन फैलाओगे.’’

पूरी कहानी पढ़ने के  लिए यहां क्लिक करें…

9. धोखा: क्या संदेश और शुभ्रा शादी से खुश थे?

husband-wife-story-in-hindi

संदेश और शुभ्रा ने एकदूसरे को पसंद कर शादी के लिए रजामंदी दी थी. दोनों के परिवारों ने खूब अच्छी तरह देखपरख कर संदेश और शुभ्रा की शादी करने का फैसला किया था. यह कोई प्रेम विवाह नहीं था. रिश्तेदारों ने ही ये रिश्ता करवाया था.

संदेश एमबीए कर के एक कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर काम कर रहा था, तो शुभ्रा भी एमए कर के सिविल सर्विस के लिए कोशिश कर रही थी. ऐसे में शुभ्रा के एक रिश्तेदार ने संदेश के बारे में शुभ्रा के मम्मीपापा को बताया. शुभ्रा के मम्मीपापा रिश्ते की बात करने के लिए संदेश के घर गए.

संदेश के पिताजी बैंक से रिटायर्ड थे तो मम्मी घरेलू औरत थी. इस तरह देखादिखाई के बाद संदेश और शुभ्रा की शादी हुई.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

10. दुनिया पूरी: क्या पत्नी को दिए गए वचन को वह निभा पाया?

husband-wife-story-in-hindi

मेरी पत्नी का देहांत हुए 5 वर्ष बीत गए थे. ऐसे दुख खत्म तो कभी नहीं होते, पर मन पर विवशता व उदासीनता की एक परत सी जम गई  थी. इस से दुख हलका लगने लगा था. जीवन और परिवार की लगभग सभी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं. नौकरी से सेवानिवृत्ति, बच्चों की नौकरियां और विवाह भी.

जिंदगी एक मोड़ पर आ कर रुक गई थी. दोबारा घर बसाना मु झे बचकाना खयाल लगता था. चुकी उमंगों के बीज भला किसी उठती उमंग में क्यों बोए जाएं.  अगर सामने भी चुकी उमंग ही हो, तो दो ठूंठ पास आ कर भी क्या करें. मु झे याद आता था कि एक बार पत्नी और अपनी खुद की नौकरी में अलगअलग पोस्ंिटग होने पर जाने के लिए अनिच्छुक पत्नी को सम झाते हुए मैं ने यह वचन दे डाला था कि मैं जीवन में कभी किसी दूसरी औरत से शरीर के किसी रिश्ते के बारे में होश रहने तक सोचूंगा भी नहीं.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

खुल गई आंखें : कैसी थी रवि की पत्नी गुंजा

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं सम  झा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई सम  झ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी.

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

मनीष सेना में कैप्टन था. जब रिया मां के पेट में थी उन्हीं दिनों बौर्डर पर सिक्योरिटी का जायजा लेते समय आतंकियों के एक हमले में उस की जान चली गई थी. इस के बाद सुधा टूट कर रह गई थी. पर मनीष की निशानी की खातिर वह जिंदा रही. अब उस ने लोगों की सेवा को ही अपने जीने का मकसद बना लिया था.

थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद रवि कुछ बुदबुदाया. शायद उसे प्यास लग रही थी. सुधा उस के बुदबुदाने का मतलब सम  झ गई थी. उस ने 8-10 चम्मच पानी उस को पिला दिया. पानी पिला कर उस ने रूमाल से रवि के होंठों को पोंछ दिया था. फिर वह पास ही रखे स्टूल पर बैठ कर आहिस्ताआहिस्ता उस का सिर सहलाने लगी थी. यह देख कर रवि की आंखें नम हो गई थीं.

सुधा को रवि के बारे में मालूम था. डाक्टर अशोक लाल ने उसे रवि के बारे में पहले से ही सबकुछ बता दिया था. नर्सिंगहोम में रवि के दफ्तर से आनेजाने वालों का जिस तरह से तांता लगा रहता, उसे देख कर उस के रुतबे का अंदाजा लग जाता था.

कुछ दिनों के इलाज के बाद बेशक अभी भी रवि कुछ बोल पाने में नाकाम था, पर उस के हाथपैर हिलनेडुलने लगे थे. अब वह किसी चिट पर लिख कर अपनी कोई बात सुधा या डाक्टर के सामने आसानी से रख पा रहा था. कभी जब सुधा की रात की ड्यूटी होती तब भी वह पूरी मुस्तैदी से उस की सेवा में लगी रहती.

एक दिन सुबह जब सुधा अपनी ड्यूटी पर आई तो रवि बहुत खुश नजर आ रहा था. सुधा के आते ही रवि ने उसे एक चिट दी, जिस पर लिखा था, ‘आप बहुत अच्छी हैं, थैंक्स.’

चिट के जवाब में सुधा ने जब उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकरा कर ‘वैलकम’ कहा तो उस की आंखें भर आई थीं. उस दिन रवि के धीरे से ‘आई लव यू’ कहने पर सुधा शरमा कर रह गई थी.

सुधा का साथ पा कर रवि के मन में जिंदगी को एक नए सिरे से जीने की इच्छा बलवती हो उठी थी. जब तक सुधा उस के पास रहती, उस के दिल को बड़ा ही सुकून मिलता था.

एक दिन सुधा की गैरहाजिरी में जब रवि ने वार्ड बौय से उस के बारे में कुछ जानना चाहा था तो वार्ड बौय ने सुधा की जिंदगी की एकएक परतें उस के सामने खोल कर रख दी थीं.

सुधा की कहानी सुन कर रवि भावुक हो गया था. उस ने उसी पल सुधा को अपनाने और एक नई जिंदगी देने का मन बना लिया था. उस ने तय कर लिया था कि वह कैसे भी हो, सुधा को अपनी पत्नी बना कर ही दम लेगा. पर सवाल यह उठता था कि एक पत्नी के होते हुए वह दूसरी शादी कैसे करता?

उस दिन अस्पताल से छुट्टी मिलते ही रवि दफ्तर के कुछ काम निबटा कर सीधा अपने गांव चला गया था. जब वह सुबह अपने गांव पहुंचा तब घर वाले हैरान रह गए थे. बूढे़ मांबाप की आंखों में तो आंसू आतेआते रह गए थे.

पूरे घर में अजीब सा भावुक माहौल बन गया था. आसपास के लोग रवि के घर के दरवाजे पर इकट्ठा हो कर घर के अंदर का नजारा देखे जा रहे थे.

रवि बहुत कम दिनों के लिए गांव आया था. वह जल्दी से जल्दी गुंजा को तलाक के लिए तैयार कर शहर लौट जाना चाहता था. पर घर का माहौल एकदम से बदल जाने के चलते वह असमंजस में पड़ गया था. उस दिन पूरे समय गुंजा उस की खातिरदारी में लगी रही. वह उसे कभी कोई पकवान बना कर खिलाती तो कभी कोई. पर रवि पर उस की इस मेहमाननवाजी का कोई असर नहीं हो रहा था.

दिनभर की भीड़भाड़ से जू  झतेजू  झते और सफर की रातभर की थकान के चलते उस रात रवि को जल्दी ही नींद आ गई थी. गुंजा ने अपना व उस का बिस्तर एकसाथ ही लगा रखा था, पर इस की परवाह किए बगैर वह दालान में पड़े तख्त पर ही सो गया था. पर थोड़ी ही देर में उस की नींद खुल गई थी. उसे नींद आती भी तो कहां से. एक तो मच्छरमक्खियों ने उसे परेशान कर रखा था, उस पर से भविष्य की योजनाओं ने थकान के बावजूद उसे जगा दिया था.

रवि देर रात तक सुधा और अपनी जिंदगी के तानेबाने बुनने में ही लगा रहा. रात के डेढ़ बजे उस पर दोबारा नींद की खुमारी चढ़ी कि उसे अपने पैरों के पास कुछ सरसराहट सी महसूस हुई. उसे ऐसा लगा मानो किसी ने उस के पैरों को गरम पानी में डुबो कर रख दिया हो.

रवि हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने देखा, गुंजा उस के पैरों पर अपना सिर रखे सुबक रही थी. पास में ही मच्छर भगाने वाली बत्ती चारों ओर धुआं छोड़ रही थी. उस के उठते ही गुंजा उस से लिपट गई और फिर बिलखबिलख कर रोने लगी.

गुंजा रोते हुए बोले जा रही थी, ‘‘इस बार मु  झे भी शहर ले चलो. मैं अब अकेली गांव में नहीं रह सकती. भले ही मु  झे अपनी दासी बना कर रखना, पर अब अकेली छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मैं कुएं में कूद कर मर जाऊंगी.’’

गुंजा की यह दशा देख कर अचानक रवि उस के प्रति कुछ नरम होते हुए भावुक हो उठा. वह अपने दिलोदिमाग में हाल में बने गए सपनों को भूल कर अचानक गुंजा की ओर मुखातिब हो चला था.

गुंजा ने जब बातों ही बातों में रवि को बताया कि उस ने शहर चलने के लिए एबीसीडी समेत अंगरेजी की कई कविताएं भी मुंहजबानी याद कर रखी हैं तो रवि उस के भोलेपन पर मुसकरा उठा.

आज पहली बार उसे गुंजा का चेहरा बहुत अच्छा लगा था और उस के मन में गुंजा के प्रति प्यार का ज्वार उमड़ पड़ा था. वह उस की कमियों को भूल कर पलभर में ही उस के आगोश में समाता चला गया था.

रवि गुंजा के बदन से खेलता रहा और वह आंखों में आंसुओं का समंदर लिए उस के प्यार का जवाब देती रही.

एक ही रात और कुछ समय के प्यार ने ही रवि के कई सपनों को जहां तोड़ दिया था वहीं उस के दिलोदिमाग में कई नए सपने भी बुनते चले गए थे. वह गुंजा को तन, मन व धन से अपनाने को तैयार हो गया था, पर सवाल यह था कि शहर जा कर वह सुधा को क्या जवाब देगा. जब सुधा को यह पता चलेगा कि वह पहले से ही शादीशुदा है और जब उस को अब तक का उस का प्यार महज नाटक लगेगा तो उस के दिल पर क्या बीतेगी.

इसी उधेड़बुन के साथ रवि अगली सुबह शहर को रवाना हो चला था. गुंजा को उस ने कह दिया था कि वह अगले हफ्ते उसे लेने गांव आएगा.

शहर पहुंचते ही रवि किसी तरह से सुधा से मिल कर उस से अपनी गलतियों व किए की माफी मांगना चाहता था. अपने बंगले पर पहुंच कर वह नहाधो कर सीधा नर्सिंगहोम पहुंचा, पर वहां सुधा से उस की मुलाकात नहीं हो पाई.

पता चला कि आज वह नाइट ड्यूटी पर थी. वह वहां से किसी तरह से पूछतापूछता सुधा के घर जा पहुंचा, पर वहां दरवाजे पर ताला लटका मिला. किसी पड़ोसी ने बताया कि वह अपनी बेटी के स्कूल गई हुई है.

मायूस हो कर रात को नर्सिंगहोम में सुधा से मिलने की सोच कर रवि सीधा अपने दफ्तर चला गया. आज उस का दिन बड़ी मुश्किल से कट रहा था. वह चाहता था कि किसी तरह से जल्दी से रात हो और वह सुधा से मिल कर उस से माफी मांग ले.

रात के 8 बजने वाले थे. सुधा के नर्सिंगहोम आने का समय हो चुका था, इसलिए तैयार हो कर रवि भी नर्सिंगहोम की ओर बढ़ चला था. मन में अपनी व सुधा की ओर से आतेजाते सवालों का जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते वह कब नर्सिंगहोम के गेट पर जा पहुंचा था, उसे पता ही नहीं चला.

रिसैप्शन पर पता चला कि सुधा प्राइवेट वार्ड के 4 नंबर कमरे में किसी मरीज की सेवा में लगी है. किसी तरह से इजाजत ले कर वह सीधा 4 नंबर कमरे में घुस गया, पर वहां का नजारा देख कर वह पलभर को ठिठक गया. सुधा एक नौजवान मरीज के अधनंगे शरीर को गीले तौलिए से पोंछ रही थी.

रवि को आगे बढ़ता देख उस ने उसे दरवाजे पर ही रुक जाने का इशारा किया. रवि दरवाजे पर ही ठिठक गया था.

मरीज का बदन पोंछने के बाद सुधा ने उसे दूसरे धुले हुए कपड़े पहनाए. उसे अपने हाथों से एक कप दूध पिलाया और कुछ बिसकुट भी तोड़तोड़ कर खिलाए. फिर वह उसे अपनी बांहों के सहारे से बिस्तर पर सुलाने की कोशिश करने लगी.

मरीज को नींद नहीं आते देख सुधा उस के सिर पर हाथ फेरते हुए व थपकी दे कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगी थी. उस के ममता भरे बरताव से मरीज को थोड़ी ही देर में नींद आ गई थी.

जैसे ही मरीज को नींद आई, रवि लपक कर सुधा के करीब आ गया था. उस ने सुधा को अपनी बांहों में भरने की कोशिश की, पर सुधा छिटक कर उस से दूर हो गई.

‘‘अरे, यह आप क्या कर रहे हैं. आप वही हैं न, जो कुछ दिन पहले यहां एक सड़क हादसे के बाद दाखिल हुए थे. अब आप को क्या दिक्कत है?’ सुधा ने उस से पूछा.

‘‘अरे, यह क्या कह रही हो तुम? ऐसे अजनबियों जैसी बातें क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारा वही रवि हूं जिस ने तुम्हारे प्यार के बदले में तुम से भी उतना ही प्यार किया था और हम जल्दी ही शादी करने वाले थे,’’ कहता हुआ रवि उस के करीब आ गया.

रवि की बातों के जवाब में सुधा ने कहा, ‘‘मिस्टर आप रवि हैं या कवि, आप की बातें मेरी सम  झ से परे हैं. आप किस प्यार और किस शादी की बात कर रहे हैं, मैं सम  झ नहीं पा रही हूं.

‘‘देखिए, मैं एक नर्स हूं. मेरा काम यहां मरीजों की सेवा करना है. भला इस में प्यार और शादी कहां से आ गई.’’

‘‘तो क्या आप ने मुझे भी महज एक मरीज के अलावा कुछ नहीं सम  झा?’’ रवि बौखलाते हुए बोला.

सुधा ने अपने मरीज की ओर देखते हुए रवि को धीरेधीरे बोलने का इशारा किया और उसे खींचते हुए दरवाजे तक ले गई. वह उस को सम  झाते हुए बोली, ‘‘आप को गलतफहमी हुई है. हम यहां प्यार करने नहीं बल्कि अपने मरीजों की सेवा करने आते हैं.

‘‘अगर हम भी प्यारव्यार और शादीवादी के चक्कर में पड़ने लगे तो हमारे घर में हर दिन एक नया पति दिखाई देगा.

‘‘प्लीज, आप यहां से जाइए और मेरे मरीज को चैन से सोने दीजिए.’’

इस बीच मरीज ने अपनी आंखें खोल लीं. उस ने सुधा से पानी पीने का इशारा किया. सुधा तुरंत जग में से पानी निकाल कर चम्मच से उसे पिलाने बैठ गई. पानी पिलातेपिलाते वह मरीज के सिर को भी सहलाए जा रही थी.

रवि सुधा से अपनी जिस बात के लिए माफी मांगने आया था, वह बात उस के दिल में ही रह गई. उसे तसल्ली हुई कि सुधा के मन में उस के प्रति ऐसी कोई बात कभी आई ही नहीं थी, जिसे सोच कर उस ने दूर तक के सपने देख लिए थे.

सुधा रवि से ‘सौरी’ कहते हुए अपने मरीज की तीमारदारी में लग गई. रवि ने कमरे से बाहर निकलते हुए एक नजर सुधा व उस के मरीज पर डाली. मरीज को लगी हुई पेशाब की नली शायद निकल गई थी, इसलिए वह कराह रहा था. सुधा उसे प्यार से पुचकारते हुए फिर से नली को ठीक करने में लग गई थी.

सुधा की बातों और आज के उस के बरताव ने रवि के मन का सारा बो  झ हलका कर दिया था.

आज रात रवि को जम कर नींद आई थी. एक हफ्ते तक दफ्तर के कामों में बिजी रहने के बाद रवि दोबारा अपने गांव जाने वाली रेल में सवार था. उस की रेल भी उसे गुंजा तक जल्दी पहुंचाने के लिए पटरियों पर सरपट दौड़ लगाती हुई आगे बढ़ी चली जा रही थी. जो गांव उसे कल तक काटता था और जिस की ओर वह मुड़ कर भी नहीं देखना चाहता था, आज उस के आगोश में समाने को बेताब था.

तृप्ति : क्या था काली डायरी का राज

मैं सुकु बाई, आज 4 महीने की छुट्टी के बाद काम पर वापस गई, तो दीदी ने दरवाजा खोला. उन्होंने मुझे अंदर बुलाया और हालचाल पूछा. मेरे घर वालों की खैरखबर ली.

मैं इस घर में 15 साल से काम कर रही हूं. पिछले दिनों मैं अपने गांव चली गई थी. बेटे को बड़े स्कूल में दाखिल कराना था.

जब से मेरे पति की मौत हुई है, तब से मेरे बेटे को देखने वाला मेरे अलावा और कोई नहीं है. एक दूर की बूढ़ी ताई हैं, जिन के पास उसे छोड़ा हुआ है. ताई को खर्चापानी भेजती रहती हूं.

पर इस बार मुझे गांव जाना पड़ा, क्योंकि बेटे का स्कूल बदली कराना ताई के बस की बात नहीं थी. रोजीरोटी का सवाल है, जिस की वजह से मुझे गांव से कोसों दूर यहां दिल्ली में रहना पड़ता है, वरना किस का मन नहीं करता अपने बच्चों के बीच रहने का.

दीदी और भैया बहुत अच्छे लोग हैं खासतौर पर भैया. बहुत बड़ा दिल है भैया का. मुझे जब कभी जरूरत पड़ती है, तो मैं भैया से ही पैसे मांगती हूं. कभी मना नहीं करते और न ही कभी पैसे लौटाने की बात करते हैं.

भैया हंस कर कहते हैं, ‘दे देना सुकु बाई, जब तुम्हारा बेटा बड़ा हो जाए और कमाने लगे तब लौटा देना.’

दीदी ने बताया कि मेरे पीछे जो काम वाली रखी थी, वह बहुत ही चालू काम करती थी. फिर वे मुझे काम बता कर किसी जरूरी मीटिंग के लिए बाहर चली गईं. फिलहाल मेरे सिवा घर में कोई और नहीं था. दीदी का एकलौता बेटा बाहर पढ़ता है.

मैं ने घर में झाड़ूपोंछा किया, रसोई साफ की, रात के लिए खाना बनाया और फिर कमरों की झाड़पोंछ शुरू कर दी. घर वाकई बहुत गंदा पड़ा था.

काम करतेकरते मैं थक गई. सोचा कि थोड़ा सुस्ता लिया जाए. अपने घर में वैसे भी कौन मेरा इंतजार कर रहा था. खाली पड़ा था.

मगर फिर आसपास देखा तो मन हुआ कि बैठेबैठे क्या करना, थोड़ी और धूलमिट्टी झाड़ ली जाए. मैं झाड़न लेकर बैडरूम में घुसी. बिस्तर पर बहुत सी किताबें बिखरी पड़ी थीं. न जाने कौन से दफ्तर में दीदी काम करती थीं कि जब देखो लिखती ही रहती थीं. मैं बिखरी किताबें समेटने लगी.

मैं ने देखा कि बिस्तर के बीचोंबीच कंबल के नीचे नंगी औरतों की तसवीरों वाली एक मैगजीन पड़ी थी. जाने दीदी और भैया में से कौन इसे देखता होगा. मैं ने उसे उठा कर तकिए के नीचे रख दिया.

एक काली डायरी भी मिली, जिस पर दीदी का नाम था. उस के पन्ने पलटे तो पाया कि उस में बहुत से किस्सेकहानियां लिखे हुए हैं.

मैं 8वीं पास हूं. हिंदी पढ़ लेती हूं. दीदी की डायरी पढ़ना नहीं चाहती थी, मगर उस में कुछ ऐसा लिखा था, जिस ने मुझे उन की डायरी पढ़ने पर मजबूर कर दिया :

मैं और मेरे पति प्रताप बहुत अच्छे दोस्त बन चुके हैं. हमारी उम्र 50 को टापने वाली है. मुझे सैक्स में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, मगर प्रताप को है. इन की तो यह हालत है कि इस उम्र में भी अगर किसी कमसिन लड़की को देख लें, तो इन की नजर बदल जाती है. मुझ से भी 3 दिन से ज्यादा दूर नहीं रह पाते. और जब कभी मूड में आते हैं, तो देर रात तक सोने नहीं देते और फिर उस के बाद 2 दिन तक शरीर में दर्द रहता है…

मुझे ऐसी निजी बातें पढ़ कर अजीब सा लगा. क्या एक विधवा को यह सब करना ठीक था? हरगिज नहीं. मैं उठ कर दरवाजे की तरफ गई, मगर वहां कोई नहीं था. मैं वापस बैडरूम में आ कर बैठ गई और डायरी खोल ली :

पिछली दफा जब मेरा दिल किया कि इन के साथ बैठ कर प्यारभरी बातें की जाएं, इन के दिल में कोई नया ही खयाल घूम रहा था. कहने लगे कि चलो इस बार कुछ अलग करते हैं.

‘क्या?’

‘किसी लड़की को बुलाते हैं.’

‘कहां से आएगी लड़की?’

‘अरे, इस की फिक्र तुम मत करो. यह लो उस का नंबर और मिलाओ.’

मुझे हलकी सी जलन हुई कि भला यह क्या बात हुई. मेरे पल किसी और को? गलत बात है यह. फिर मैं ने सोचा कि चलो छोड़ो. इन को सैक्स की तलब रहती है और मेरी डायरी को कहानियों की. किसी को बदला नहीं जा सकता. पति जैसा है उसे वैसे ही स्वीकारने में गृहस्थ जीवन की खुशी है.

जब मुझे पहली बार शक हुआ था कि प्रताप शादी के बाद भी बाहर मुंह मारते हैं, मुझे बहुत बुरा लगा था. फिर मैं ने सोचा था, बहुत सोचा और इस निचोड़ पर पहुंची कि इन का अगर एक यह ऐब नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इन में और कोई कमी नहीं. दरियादिल हैं, पैसा कमाना खूब जानते हैं, एक अच्छे बेटे, बाप और भाई हैं. बस, एक अच्छे पति नहीं हैं. अगर मैं इन्हें ऐसे ही स्वीकार लूं, तो मेरे अहम को दबना सीखना होगा और बाकी का निजाम जैसा है वैसा ही दिखेगा और चलता रहेगा.

मुझे यह फायदा होगा कि मैं जान पाऊंगी कि अपना अहम खत्म करने के बाद जो सुनहरा मंजर है, जिस के बारे में धर्मग्रंथों में बारबार बोला गया है, आखिर क्या चीज है. फिर आखिर में तो हर औरत एक मां ही है, तो अपने पति के लिए क्यों नहीं.

हर 4-6 महीनों में दोस्तों के साथ घूमने जाना. कभी जकार्ता, कभी चीन, कभी मलयेशिया, कभी सिंगापुर… और कुछ नहीं इन के औरतबाजी करने के रास्ते थे. एक बार तो अपने दोस्तों के साथ भारत में ही किसी शहर में घूमने निकल गए, यह कह कर कि इन का दोस्त और उस के 2 रिश्तेदार ही साथ में होंगे.

सफर के दौरान जब मैं ने हालचाल पूछने के लिए फोन किया, तो पीछे से किसी लड़की के हंसने की आवाजें आ रही थीं. जब सफर से वापस आए तो 2 दिन तक रंगीले मिजाज में रहे. बिस्तर में भी नईनई हरकतें आजमाते रहे.

बीवी हूं, समझ गई, इन के बिना कुछ कहे. बहुत सोचविचार किया और हार कर इस नतीजे पर पहुंची कि मुझे इन का दोस्त बन कर जीना सीखना होगा. तलाक मुझ अनाथ के बस की बात नहीं और न ही कलहक्लेश करना. ये जैसे थे, इन्हें वैसे ही स्वीकारना पड़ा.

जब इन्होंने मुझे लड़की को फोन कर के बुलाने को कहा, तो मैं ने सोचा कि चलो देखते हैं, अपने पति को किसी दूसरी औरत से प्यार करते अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है. और कुछ नहीं तो एक नया अनुभव ही सही. मेरी डायरी की भूख भी तो बेअंत है. अपना पेट भरवाने के लिए मुझे कुछ भी दिखाने को तैयार हो गई.

मैं ने फोन कर के लड़की को बुला लिया. थोड़ी देर में घर की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो एक 20-22 बरस की जवान लड़की को सामने खड़ा पाया. उस ने फूलों वाला लंबा सा फ्रौक पहना था, जिस में उस की उभरी हुई छाती मुश्किल से छिप रही थी. तीखे नैननक्श और गोरा रंग, पर्स कंधे पर लटका हुआ.

मैं ने उसे अंदर बुला लिया और उसे ले कर बैडरूम में आ गई. प्रताप तब बैडरूम में बैठे किसी से फोन पर बात कर रहे थे. हमें देखते ही वे फोन उठा कर घर से बाहर निकल गए. शायद कोई जरूरी बात करनी थी.

प्रताप कारोबार के आगे सैक्स को कुछ नहीं समझाते. सही भी है. पैसा उड़ाने से पहले कमाना जरूरी है.

मैं लड़की को ले कर पीछे आंगन में चली गई और वक्त बिताने के लिए उसे बातों में लगा लिया. मुझे सुनने का शौक था और उसे बोलने का. वह बहुत बोली. अपने किस्से सुनाने लगी. एक से एक बेहूदा और फूहड़. सारा समय बोलती रही.

उस की बातें बंद ही नहीं हो रही थीं. ग्राहकों की लंबीलंबी गाडि़यों में घूमना, मर्दों का उस के साथ वह सब करना जो वे अपनी बीवियों के साथ नहीं कर सकते, पार्टियों में जाम से जाम टकराना, महफिलों में नंगे नाचना उस के लिए आम बातें थीं.

उस ने बताया था, ‘अरे, एक पार्टी में तो मुझे 3-4 आदमियों ने इकट्ठा पकड़ लिया, एक यहां से शुरू हो गया और दूसरा वहां से. आप मानोगे नहीं कि 60-70 साल के बूढ़े भी मलाई लगा कर चाटते हैं.’

मैं ने पूछा कि कभी पुलिस से पाला नहीं पड़ता, तो वह बोली, ‘पड़ता है न. एक पुलिस ही है, जिस से बिना नागा पाला पड़ता रहता है. हफ्ता भी लेती है और रोब भी जमाती है. कई बार तो मुफ्त में ले कर चलती बनती है.’

एक बार पुलिस ने उसे और उस की 2 सहेलियों को पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा. तीनों की साड़ियां एकदूसरे की साड़ी से बांध दीं. भागें तो कपड़े उतरें और न भागें तो डंडे पड़ें. बड़ी मुश्किल से वह समय कटा और आज तक जेहन से उस का खौफ नहीं निकला. बड़ा ही दर्दनाक हादसा था.

‘कभी कोई वहशी भी मिला है? तुम्हें तो कई तरह के लोग मिलते होंगे?’

उस ने बताया कि एक दफा उसे 2 आदमी ले गए थे. दोनों के दोनों लंबेचौड़े मुस्टंडे जिन्हें देख कर वह घबरा गई. फिर उस ने अपनेआप को संभाला और कहा कि 1-1 कर के आएं. मगर वे नहीं माने.

दोनों एकसाथ ही उस पर टूट पड़े और ऐसे लूटा कि उस की सुधबुध खो गई. तृप्ति होने के बाद उन्होंने उसे उस की बस्ती में छोड़ दिया.

‘कैसी बस्ती?’

‘हिजड़ों की बस्ती. वहीं तो रहती हूं मैं. मैं हिजड़ा हूं.’

‘पर, तुम्हारा शरीर?’

‘यह तो सर्जरी का कमाल है.’

मैं ने मन ही मन सोचा कि यह सही रही. प्रताप का यह शौक भी मुझे सहना होगा.

थोड़ी देर बाद हम घर के अंदर वापस आ गए. प्रताप की फोन पर हो रही बात खत्म हो चुकी थी और वे बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहे थे. एकदम तैयार बैठे थे.

हमें देखते ही वे हमें बैडरूम के अंदर ले गए और दरवाजा बंद कर लिया. मैं पास ही में बैठ गई.

प्रताप ने एक बड़ा जाम बना कर लड़की को दिया और फिर अपने लिए भी ठीक वैसा ही पैग बनाया. मुझे देने लगे तो मैं ने मना कर दिया कि मेरा मूड नहीं है.

शराब का सुरूर चढ़ते ही प्रताप उस लड़की से चिपट गए और एक घंटा वे उस के जिस्म से खेलते रहे. मैं चुपचाप लिखती रही. फारिग हो कर उन्होंने लड़की को पैसे दे कर भेज दिया और मेरे पास आ कर एक बच्चे की तरह बेफिक्र सो गए.

अगले दिन मैं ने प्रताप को चाय का प्याला देते हुए उठाया और लड़की का सच बताया.

‘मुझे क्या बता रही हो शारदा, मैं ने ही तो उस की सर्जरी करवाई थी…’

तभी घर के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई. लगता था दीदी वापस आ गई थीं. मैं ने जल्द ही डायरी वापस रखी और उठ कर अपनी आंखें धोईं.

‘इन बड़े लोगों में क्याक्या चलता रहता है,’ सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने चल दी.

जूही: आसिफ के साथ मास्टर साहब ने क्या किया?

आसिफ दुकान बंद कर के जब अपने घर पहुंचा, तो ड्राइंगरूम के दरवाजे पर जा कर ठिठक गया. अंदर से उस के अम्मीअब्बा के बोलने की आवाजें आ रही थीं.

‘‘दुलहन तो मुश्किल से 16-17 साल की है और मास्टर साहब 40-50 के. बेचारी…’’

इतना सुनते ही आसिफ जल्दी से दीवार की आड़ में हो गया और सांस रोक कर सारी बातें बड़े ध्यान से सुनने लगा.

‘‘ऐसी शादी से तो बेहतर होता कि लड़की के मांबाप उसे जहर दे कर ही मार डालते,’’ आसिफ की अम्मी सलमा ने कहा.

‘‘तुम नहीं जानती सलमा, लड़की के मांबाप तो बचपन में ही चल बसे थे. गरीब मामामामी ने ही उस की परवरिश की है. 4-4 लड़कियां ब्याहने को हैं,’’ अब्बा ने बताया.

‘‘यह भी कोई बात हुई. कम से कम उस की जोड़ का लड़का तो ढूंढ़ लेते.

‘‘इतनी हसीन और कमसिन लड़की को इस बूढ़े के पल्ले बांधने की क्या जरूरत आ पड़ी थी, जिस के पहले ही 4-4 बच्चे हैं.

‘‘हाय, मुझे तो उस की जवानी पर तरस आ रहा है. कैसे देख रही थी वह मेरी तरफ. इस समय उस पर क्या बीत रही होगी,’’ अम्मी ने कहा.

आसिफ इस से आगे कुछ और सुनने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. वह धीरे से अपने कमरे में जा कर कुरसी पर बैठ गया.

आसिफ आंखें मूंद कर सोने लगा, ‘क्या वाकई वह 16-17 साल की है? क्या सचमुच वह हसीन है? अगर वह खूबसूरत लगती होगी तो क्या मास्टर साहब की कमजोर आंखें उस के हुस्न की चमक बरदाश्त कर पाएंगी? आज की रात क्या वह… क्या मास्टर साहब…’ यह सोचतेसोचते उस का सिर चकराने लगा और वह कुरसी से उठ कर कमरे में टहलने लगा.

थोड़ी देर बाद आसिफ की अम्मी खाना रख गईं, मगर उस से खाया न गया. बड़ी मुश्किल से वह थोड़ा सा पानी पी कर बिस्तर पर लेट गया, पर उसे नींद भी नहीं आई. रातभर करवटें बदलते हुए वह न जाने क्याक्या सोचता रहा.

सुबह हुई तो आसिफ मुंह में दातुन दबाए छत पर चढ़ गया और बेकरारी से टहलटहल कर मास्टर साहब के आंगन में झांकने लगा. कुछ ही देर में आंगन में एक परी दिखाई दी.

उसे देख कर आसिफ अपने होशोहवास खो बैठा. फिर कुछ संभलने के बाद उस की खूबसूरती को एकटक देखने लगा. परी को भी लगा कि कोई उसे देख रहा है. उस ने निगाहें ऊपर उठाईं तो आसिफ को देख कर वह शरमा गई और छिप गई.

लेकिन आसिफ उस का मासूम चेहरा आंखों में लिए देर तक उस के खयालों में डूबा रहा. उस की धड़कनें तेज हो गई थीं. दिल में नई चाहत सी उमड़ पड़ी थी. वह फिर उस परी को देखना चाहता था, पर वह नजर न आई.

इस के बाद आसिफ रोज सुबहसुबह मुंह में दातुन दबाए छत पर चढ़ जाता. परी आंगन में आती. उस की निगाह आसिफ की निगाह से टकराती. फिर वह शरमा कर छिप जाती.

लेकिन एक दिन आसिफ को देख कर उस की निगाह झुकी नहीं. वह उसे देखती रही. आसिफ भी उसे देखता रहा. फिर उन के चेहरे पर मुसकराहटें फूटने लगीं और बाद में तो उन में इशारेबाजी भी होने लगी.

अब उन दोनों के बीच केवल बातें होनी बाकी थीं. पर इस के लिए आसिफ को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा.

मास्टर साहब सुबहसवेरे घर से निकलते थे तो स्कूल से शाम को ही लौटते थे. उन के बच्चे भी स्कूल चले जाते थे. घर में केवल मास्टर साहब की अंधीबहरी मां रह जाती थीं.

एक दिन उस परी का इशारा पा कर आसिफ नजर बचा कर उन के घर में घुस गया. वह उसे बड़े प्यार से अपने कमरे में ले गई और पलंग पर बैठने का इशारा कर के खुद भी पास बैठ गई.

थोड़ी घबराहट के साथ उन में बातचीत शुरू हुई. उस ने अपना नाम जूही बताया. आसिफ ने भी उसे अपना नाम बताया. फिर दोनों ने यह जाहिर किया कि वे एकदूसरे पर दिलोजान से मरते हैं.

आसिफ ने जूही के हाथों पर अपना हाथ रख दिया. वह सिहर उठी. उस पर नशा सा छाने लगा. आसिफ उस के जिस्म पर हाथ फेरने लगा. वह खामोश रही और खुद को आसिफ के हवाले करती चली गई.

कुछ देर बाद जब वे दोनों एकदूसरे से अलग हुए तो जूही अपना दुखड़ा ले कर बैठ गई. ऐसा दुख जिस का आसिफ को पहले से अंदाजा था. लेकिन उस के मुंह से सुन कर आसिफ को पूरा यकीन हो गया. इस से उस का हौसला और भी बढ़ गया.

वह जूही को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी दुखी नहीं होने दूंगा.’’

उस के बाद तो उन के इस खेल का सिलसिला सा चल पड़ा. इस चक्कर में आसिफ अब सुबह के बजाय दोपहर

को दुकान पर जाने लगा. वह रोज सुबह 10 बजे तक मास्टर साहब और उन के बच्चों के स्कूल जाने का इंतजार करता. जब वे चले जाते तो जूही का इशारा पा कर वह उस के पास पहुंच जाता.

एक दिन वह मास्टर साहब के बैडरूम में पलंग पर लेट कर रेडियो पर गाने सुन रहा था. जूही उस के लिए रसोईघर में चाय बना रही थी. दरवाजा खुला हुआ था, जबकि रोज वह अंदर से बंद कर देती थी.

अचानक मास्टर साहब आ गए. उन का कोई जरूरी कागज छूट गया था.

आसिफ को अपने पलंग पर आराम से पसरा देख मास्टर साहब के तनबदन में आग लग गई, पर उन्होंने सब्र से काम लिया और फाइल से कागज निकाल कर चुपचाप रसोईघर में चले गए.

‘‘आसिफ यहां क्या कर रहा है?’’ उन्होंने जूही से पूछा.

अचानक मास्टर साहब की आवाज सुन कर जूही का पूरा जिस्म कांप गया और चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. लेकिन जल्दी ही वह संभलते हुए बोली, ‘‘जी, कुछ नहीं. जरा रेडियो का तार टूट गया था. मैं ने ही उसे बुलाया है.’’

मास्टर साहब फिर कुछ न बोले और चुपचाप घर से बाहर निकल गए.

मास्टर साहब के बाहर जाने के बाद ही जूही की जान में जान आई. वह चाय छोड़ कर कमरे में आ गई. आसिफ अभी तक पलंग पर सहमा हुआ बैठा था.

आसिफ ने कांपती आवाज में पूछा, ‘‘वे गए क्या…?’’

‘‘हां,’’ जूही ने कहा.

‘‘दरवाजा बंद नहीं किया था क्या?’’ आसिफ ने पूछा.

‘‘ध्यान नहीं रहा,’’ जूही बोली.

‘‘अच्छा हुआ कि हम…’’ वह एक गहरी सांस ले कर बोला.

‘‘लगता है, उन्हें शक हो गया है,’’ जूही चिंता में डूबते हुए बोली.

‘‘कुछ नहीं होगा…’’ आसिफ ने उस का कंधा दबाते हुए कहा, ‘‘अच्छा, अब मुझे चलना चाहिए,’’ इतना कह कर वह दुकान पर चला गया.

उस के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक मिलने से परहेज किया. जब वे मास्टर साहब की तरफ से पूरी तरह बेफिक्र हो गए, तो यह खेल फिर से

चल पड़ा और हफ्तोंमहीनों नहीं, बल्कि सालों तक चलता रहा. उस दौरान जूही 2 बच्चों की मां भी बन गई.

एक दिन मास्टर साहब काफी गुस्से में घर में दाखिल हुए. किसी ने जूही के खिलाफ उन के कान भर दिए थे.

जूही को देखते ही मास्टर साहब उस पर बरस पड़े, ‘‘क्या समझती हो अपनेआप को. जो तुम कर रही हो, उस का मुझे पता नहीं है. आज के बाद अगर आसिफ यहां आया तो उसे जिंदा न छोड़ूंगा.’’

यह सुन कर जूही डर गई और कुछ भी नहीं बोली. फिर मास्टर साहब गुस्से में आसिफ के अब्बा के पास जा कर चिल्लाने लगे, ‘‘अपने लड़के को समझा दीजिए, मेरी गैरमौजूदगी में वह मेरे घर में घुसा रहता है. आज के बाद उसे वहां देख लिया तो गोली मरवा दूंगा.’’

आसिफ के अब्बा निहायत ही शरीफ इनसान थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे को खूब डांटाफटकारा. इस का नतीजा यह हुआ कि एक दिन आसिफ ने मास्टर साहब को रास्ते में रोक लिया.

‘‘अब्बा से क्या कहा तुम ने? मुझे गोली मरवाओगे? तुम्हारी खोपड़ी उड़ा दूंगा, अगर उन से कुछ कहा तो,’’ आसिफ ने मास्टर साहब का गरीबान पकड़ कर धमकी दी.

उस के बाद न तो मास्टर साहब ने आसिफ को गोली मरवाई और न ही आसिफ ने मास्टर साहब की खोपड़ी उड़ाई.

धीरेधीरे बात पुरानी हो गई. जिस्मों का खेल बंद हो गया. लेकिन आंखों का खेल जारी रहा और आसिफ इंतजार करता रहा जूही के बुलावे का.

पर जूही ने उसे फिर कभी नहीं बुलाया. हां, उस ने एक खत जरूर आसिफ को भिजवा दिया जिस में लिखा था:

‘तुम तो जानते हो कि मैं अपनी किस मजबूरी के चलते इस अधेड़ आदमी से ब्याही गई हूं. अगर यह भी मुझे छोड़ देंगे तो फिर मुझे कौन अपनाएगा? अब मेरे बच्चे भी हैं, उन्हें कौन सहारा देगा? यह सब सोच कर डर सा लगता है. उम्मीद है, तुम मेरी मजबूरी को समझने की कोशिश करोगे.’

खत पढ़ने के बाद आसिफ ने दरवाजे पर खड़ेखड़े बड़ी बेबसी से जूही की तरफ देखा और भारी कदमों से दुकान की तरफ बढ़ गया.

ऐसे रिश्ते का यह खात्मा तो होना ही था. वह तो मास्टर साहब की भलमनसाहत थी कि जूही और आसिफ सहीसलामत रह गए.

गांव की ओर : रमुआ की नौकरी

डाक्टर की सलाह पर रमुआ हवापानी बदलने के लिए अपने गांव जा रहा था. न जाने कितने साल हो गए थे उसे गांव गए हुए. मांबाप के मरने के बाद से वह एक बार भी गांव नहीं गया था.

रमुआ तकरीबन 10-12 साल पहले गांव से शहर आया था. गांव में उस की थोड़ीबहुत खेती थी. खेती के साथसाथ वह गांव में मजदूरी भी करता था.

गांव के कुछ लोग शहर में मजदूरी करते थे. जब रमुआ उन को गांव से वापस शहर जाते देखता था तो उस का मन भी मचल उठता था. लेकिन मांबाप उसे शहर नहीं जाने देते थे.

जब मजदूर शहर से गांव लौटते तो अपनी बीवी के लिए चूड़ियां, बिंदी वगैरह लाते थे. यह देख कर रमुआ की बीवी सोचती कि काश, उस का पति भी शहर जाता. वह रमुआ को शहर जाने के लिए उकसाती थी.

एक दिन जिद कर के रमुआ रोजगार के लिए शहर चला गया. हफ्तेभर बाद उस ने बीवीबच्चों को भी वहां बुला लिया.

रमुआ को अपने गांव वालों की मदद से कैमिकल बनाने वाली किसी फैक्टरी में दिहाड़ी पर काम मिल गया था. रहने के लिए उस ने अपने साथियों के साथ शहर के बाहर एक नाले के किनारे ?ोंपड़ी बना ली थी.

रमुआ को जब पहली बार तनख्वाह मिली तो वह हैरान रह गया. इतना पैसा उस ने आज तक नहीं कमाया था.

रमुआ सोचने लगा कि वह अपने बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी दिलाएगा.

शुरू के कुछ महीने तो अच्छे बीते, लेकिन बाद में यही पैसे कम पड़ने लगे. शहर में महंगाई ज्यादा थी और खर्चे भी गांव से ज्यादा थे.

धीरेधीरे रमुआ को भी अपने साथियों की तरह शराब पीने की लत लग गई. कभीकभी उसे काम नहीं मिलता था. फैक्टरी में हड़ताल भी अकसर होती रहती थी.

समय के साथसाथ रमुआ के बच्चे बड़े होते गए. साथ ही, नाले से लगा पूरा इलाका भी ?ोंपडि़यों का एक जंगल सा बन गया.

अब हफ्ता वसूलने वाले गिरोह पैदा हो गए थे. रमुआ को भी नगरपालिका व गुंडों को हफ्ता देना पड़ता था. इस चक्कर में जो आमदनी पहले बहुत ज्यादा दिखती थी, अब उस में घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो गया था. बीवी तो पहले ही लोगों के घरों में बरतन मांजने का काम कर रही थी, अब बच्चों को भी काम पर लगा दिया गया था. इस इलाके में यह नई बात नहीं थी. सब परिवारों में यही हो रहा था.

रमुआ की बीवी का किसी गैर मर्द से चक्कर चल रहा था. इस बात को ले कर वह आएदिन अपनी बीवी से लड़ता रहता था. वह उसे शराब पीने के लिए कोसती थी.

धीरेधीरे रमुआ का बेटा व बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह बुरी आदतों के शिकार हो गए. बेटा भी अब छिप कर शराब पीने लगा था. बीड़ी तो वह खुलेआम ही पीता था.

पहले जब रमुआ अपने बेटे को डांटता और पीटता था तो वह चुपचाप सुन लेता था, लेकिन अब वह भी जवाब देने लगा था, ‘तुम खुद पीते हो तो मुझे डांटते क्यों हो?’

रमुआ ताज्जुब से सिर पकड़ कर बैठ जाता था. सोचता कि आजकल के बच्चों को क्या हो गया है. उस ने तो बचपन में क्या पूरी जिंदगी में अपने बाप को ऐसे जवाब देना तो दूर आंख मिला कर बात भी नहीं की थी.

दूसरी ओर रमुआ की बड़ी बेटी, जो अपनी मां के साथ काम पर जाती थी, ने भी बस्ती की दूसरी लड़कियों के रंगढंग अपना लिए थे. वह काली थी तो क्या हुआ, पर जवान थी. लोगों की तीखी नजरें व फिकरे उस की जवानी में उबाल लाते थे. उस ने बस्ती के कुछ आवारा लड़कों को दिल दे दिया था.

प्यार के 2 रास्ते होते हैं. एक रास्ता शादी का होता?है और दूसरा बरबादी का.

रमुआ की बेटी इतनी खुशनसीब नहीं थी कि प्यार के पहले रास्ते पर चलती. कई लड़कों से उस के जिस्मानी रिश्ते बने और वह भी बिना शादी के ही पेट से हो गई.

हालांकि बस्ती में रहने वाली दाई ने दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी इस मुसीबत से छुटकारा दिला दिया था, पर रमुआ के लिए यह बात फांस बन गई.

तभी फैक्टरी में हड़ताल हो गई. इस बार हड़ताल काफी लंबी चली. लगता था जैसे दोनों तरफ के लोग अखाड़े में उतर आए हों.

जल्दी ही भूखे रहने की नौबत आ गई. शहर की महंगाई में अकेली कमाई से पेट नहीं भरता. इस वजह से घर में क्लेश बढ़ गया.

अब बीवी अकेली कमाती थी, इसलिए दबती नहीं थी. रमुआ मन मार कर रह जाता था. मौका मिलते ही वह घर का सामान बेच कर शराब पी लेता था.

एक दिन रमुआ की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई. ज्यादा शराब पीने व फैक्टरी में जो कैमिकल बनता था, उस की वजह से रमुआ के फेफड़े खराब हो गए. डाक्टर ने उसे कुछ दिन जगह बदलने की सलाह दी.

पहले तो रमुआ ने डाक्टर की सलाह नहीं मानी. लेकिन जब वह ठीक नहीं हुआ तो गांव जाने की तैयारी करने लगा.

एक दिन रमुआ के घर पुलिस आई और उस के बेटे कालू के बारे में पूछने लगी. रमुआ को हैरानी हुई कि आखिर उस के बेटे ने ऐसा क्या कर दिया.

काफी पूछने पर पुलिस ने बताया कि कालू ने चोरी की है.

रमुआ घबरा कर बोला, ‘साहब, वह तो कई दिनों से घर आया ही नहीं, पता नहीं कहां गया है?’

‘क्या तुम्हें अपने बच्चे के बारे में पता नहीं, कैसे बाप हो तुम?’ पुलिस ने धमकाया.

रमुआ सिर ?ाका कर चुपचाप सुनता रहा. उस के दिमाग में हलचल मच गई. वह सोचने लगा कि आखिर इस शहर ने उसे क्या दिया? फिर उसे लगा कि इस शहर ने उसे काम तो दिया है नहीं तो गांव में कभी अकाल, तो कभी बाढ़ की मार सहनी पड़ती थी.

काफी सोचविचार के बाद रमुआ ने गांव लौटने की ठानी. गांव जाने के लिए पहले तो रमुआ की बीवी व बच्चों ने मना किया, पर बाद में वे राजी हो गए.

गांव पहुंचते ही रमुआ के दोस्तों व रिश्तेदारों ने उसे घेर लिया.

शाम को रमुआ अपने दोस्तों के साथ गांव घूमने गया तो उस ने देखा कि गांव के बाहर खुदाई का काम चल रहा?है.

‘‘अरे रहमान, यहां क्या हो रहा है?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘गांव में कच्ची नहर बन रही है. इस में पानी आएगा और हम साल की 2 फसलें ले सकेंगे.

‘‘और हां, इस की खुदाई भी हम गांव वाले ही कर रहे हैं. पंचायत इस के बदले में हमें 10 किलो अनाज व 30 रुपए दिहाड़ी देती है,’’ रहमान ने बताया.

‘‘अच्छा, तभी तो मैं ने गांव में कोई हुक्का पीते या बातें करते हुए नहीं देखा,’’ रमुआ ने कहा.

‘‘हां, अब बच्चे भी स्कूल जाते हैं और आदमी व औरतें नहर व दूसरे कामों पर जाते हैं,’’ रहमान ने बताया.

‘‘दूसरे कौन से काम…?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘प्रधानमंत्री गांव सड़क योजना, सरकारी दवाखाना, स्कूल व पंचायत के भवन बनाने जैसे काम,’’ रहमान ने जोश में आ कर बताया.

‘‘क्या गांव में इतने सारे काम हो रहे हैं?’’ रमुआ आंखें फाड़ कर बोला.

‘‘और नहीं तो क्या,’’ रहमान ने जवाब दिया.

लौटते समय अंधेरा हो गया था. रहमान ने चलते हुए कहा, ‘‘यार, तुम्हें तो अंधेरे में परेशानी होती होगी. तुम तो शहर में बिजली के आदी हो गए होगे?’’

अब रमुआ क्या जवाब देता. उस की झोंपड़ी में 25 वाट का बल्ब था. वह भी कभीकभी ही रोशनी देता था. गली में खंभा तो था, पर बल्ब नहीं था.

आज खाना रमुआ के दोस्त बनवारी के यहां था. रमुआ व उस के परिवार को लगा कि उन्हें इतना लजीज खाना खाए कितने साल हो गए.

सुबह उठ कर रमुआ अपने खेत की ओर गया. इतने सालों में जमीन में खरपतवार हो गए थे. खेत की मिट्टी को हाथ लगाते ही रमुआ रोने लगा.

उसे दीनू काका आते दिखाई दिए तो उस ने पूछा, ‘‘इतनी सुबहसुबह कहां जा रहे हो काका?’’

‘‘पास के कसबे के बैंक में जा रहा हूं. खेत में बीज बोने व हल खरीदने के लिए कर्ज ले रहा हूं,’’ दीनू काका ने जवाब दिया.

‘‘क्या सरकार हम जैसे छोटे लोगों को भी कर्ज देती है?’’ रमुआ ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘हां, वह भी कम ब्याज पर,’’ दीनू काका ने कहा और चल पड़े.

रमुआ की बीवी को पड़ोसी फरजाना पंचायतघर की ओर ले गई. उस ने गांव की औरतों व शहर की एक लड़की को वहां बैठे देखा तो पूछा, ‘‘अरे दीदी, यहां क्या हो रहा है?’’

‘‘यह लड़की गांव की औरतों को सिलाईकढ़ाई का काम सिखाती है और शहर से काम ला कर देती है,’’ फरजाना ने कहा.

रात को रमुआ व उस की बीवी ने गांव में आए इस बदलाव को देख कर एक फैसला किया.

सुबह रमुआ को अपना घर ठीक करते हुए देख वहां सब लोग जमा हो गए. जुम्मन ने हैरत से पूछा, ‘‘क्यों रमुआ, यहां ज्यादा दिन रहने का इरादा है क्या?’’

‘‘अब मैं कभी शहर नहीं जाऊंगा. सब के बीच यहीं काम करूंगा. शहर में गंदगी व बीमारी के सिवा कुछ नहीं रखा है. अब मैं ने सोच समझ कर फैसला किया है कि मुझे यहीं पर रहना है,’’ रमुआ ने गांव वालों से कहा.

रमुआ की बीवी फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘बस, अब हम यह गांव छोड़ कर कभी नहीं जाएंगे.’’

कुछ अरसे बाद रमुआ की बेटी की शादी भी गांव में हो गई. उस का बेटा मजदूरी के साथसाथ खेती भी करने लगा. सभी लोग खुश थे.

अब रमुआ न शराब पीता था, न ही उस की बीवी उस से झगड़ती थी.

रमुआ को देख कर बाकी गांव वाले भी शहर से वापस आ गए. अब लोग शहर जाने की बात पर एकदूसरे को चुटकुले सुनाते और हंसते हैं

घर है या जेल : क्या था मोहन की कमाई का राज

नई नवेली पत्नी उर्मिको पा कर मोहन बहुत खुश था. हो भी क्यों न, आखिर हूर की परी जो मिली थी उसे. सच में गजब का नूर था उर्मि में. अगर उसे बेशकीमती पोशाक और लकदक गहने पहना दिए जाते तो वह किसी रानीमहारानी से कम न लगती. लेकिन बेचारी गरीब मांबाप की बेटी जो ठहरी, तो कहां से उसे यह सब मिलता भला, पर सपने उस के भी बहुत ऊंचेऊंचे थे.

अब सपने तो कोई भी देख सकता है न. तो बेचारी वह भी ऊंचेऊंचे सपना देखती थी कि उस का राजकुमार भी सफेद छोड़े पर चढ़ कर उसे ब्याहने आएगा और उसे दुनियाभर की खुशियों से नहला देगा.

लेकिन जब उर्मि ने अपने दूल्हे के रूप में मोहन को देखा तो उस का मन बु?ाबुझा सा हो गया क्योंकि मोहन उस के सपनों के राजकुमार से कहीं भी मैच नहीं बैठ रहा था. खैर, चल पड़ी वह अपने पति मोहन के साथ जहां वह उसे ले गया.

‘‘जब शादी हो ही गई है तो अब अपनी जिम्मेदारी भी संभालना सीखो…’’ पिता का यह हुक्म मान कर मोहन उर्मि को ले कर शहर आ गया और काम की तलाश करने लगा.

लेकिन मोहन को कहीं भी कोई ढंग का काम नहीं मिल पा रहा था. दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह किसी तरह कुछ पैसे कमा लेता, मगर उतने से क्या होगा और दोस्त के घर भी वह कितने दिन ठहरता भला?

आखिर मोहन को काम न मिलता देख उस दोस्त ने सलाह दी कि क्यों न वह बड़ी सब्जी मंडी से सब्जियां ला कर बेचे. इस से उस की अच्छी कमाई हो जाएगी और रोज काम न मिलने की फिक्र भी नहीं रहेगी.

किसी तरह जोड़ेजुटाए पैसों से मोहन बड़ी सब्जी मंडी जा कर सब्जियां खरीद लाया और उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचने लगा.

अब मोहन का रोज का यही काम था. अंधेरे मुंह सुबहसवेरे उठ कर वह बड़ी सब्जी मंडी चला जाता और वहां से थोक भाव में खूब सारी फलसब्जियां खरीद कर उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचता.

अब मोहन की कमाई इतनी होने लगी थी कि पतिपत्नी के लिए अच्छे से दालरोटी जुट जाती थी. बेचारा मोहन, जब फलसब्जियां बेच कर थकाहारा घर आता तो उस के माथे पर पसीने का मुकुट और सीने में धड़कनों का जंगल होता, लेकिन फिर भी वह अपनी खूबसूरत पत्नी का मुखड़ा देख कर अपनी सारी थकान भूल जाता.

लेकिन उस की उर्मि जाने उस से क्या चाहती थी. वह कभी खुश ही नहीं रहती थी. नहीं, वैसे तो वह खुश रहती थी, पर मोहन को देखते ही ठुनकने लगती थी कि उसे क्याक्या कमी है.

बेचारा मोहन हर तरह से कोशिश करता कि उर्मि को खुश रखे, पर उस की मांगें रोजाना बढ़ती ही जाती थीं.

मोहन मेहनत के चार पैसे इसलिए ज्यादा कमाना चाहता था ताकि उर्मि को ज्यादा से ज्यादा खुश रख सके, मगर उर्मि को इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी. वह तो अपने ही पड़ोस के एक बांके नौजवान धीरुआ के साथ नैनमटक्का कर रही थी.

तेलफुलेल, चूड़ी, बिंदी वगैरह बेचने वाला धीरुआ पर उस का दिल आ गया था. जब भी वह उसे देखती, उसे कुछकुछ होने लगता.

सोचती, काश, धीरुआ उस का पति होता तो कितना मजा आता. पता नहीं, क्यों उस के मांबाप ने उस से 10 साल  से भी ज्यादा बड़े मोहन के साथ उसे ब्याह दिया?

उधर धीरुआ भी जब उर्मि को देखता तो देखता रह जाता. उस के गठीले बदन के उभार को देख कर उस के मुंह से लार टपकने लगती. उसे लगता, कैसे वह उसे अपने ताकतवर हाथों में समेट ले और फिर कभी छोड़े ही न. और वैसे भी वह अभी तक कुंआरा था.

जब भी उर्मि उस की दुकान पर आती, धीरुआ उसे ही निहारते रहता. यह बात उर्मि भी सम?ा रही थी इसलिए तो बहाना बना कर वह उस की दुकान पर अकसर जाती रहती थी.

धीरुआ अपने मोबाइल फोन में उर्मि को बढि़याबढि़या प्यार वाले गाने सुनाता और वीडियो भी दिखाता. प्यार वाले गाने सुन कर वह ऐसे मंत्रमुग्ध हो जाती कि पूछो मत. वह खुद को उस गाने की हीरोइन ही सम?ाने लगती और धीरुआ को हीरो.

एक दिन उर्मि ने ठुनकते हुए मोहन से मोबाइल फोन की मांग कर दी. हैसियत तो नहीं थी बेचारे की, लेकिन फिर भी एक सस्ता सा मोबाइल, जिस से सिर्फ बात हो सकती थी, उर्मि के लिए खरीद लाया.

मोबाइल फोन देख कर उर्मि बहुत खुश तो नहीं हुई, पर लगा चलो बात तो होगी न इस से. अब उस का जब भी मन करता, धीरुआ को फोन लगा देती और खूब बातें करती. पर अपने पति मोहन से कभी सीधे मुंह बात नहीं करती थी.

न जाने क्यों उर्मि बातबात पर मोहन पर चढ़ जाती और बेचारा मोहन भी उस के गुस्से को शरबत सम?ा कर चुपचाप हंसतेहंसते पी जाता.

सोचता, उम्र कम है इसलिए सम?ा भी थोड़ी कम है. मगर उसे तो मोहन जरा भी भाता ही नहीं था. उस का दिल तो अपने आशिक धीरुआ के दिल से जा कर अटक गया था.

किसी तरह हिचकोले खाते हुए मोहन और उर्मि की गृहस्थी चल रही थी. लेकिन कहते हैं न, वक्त कब करवट ले, कह नहीं सकते. अचानक एक दिन लोगों में हड़कंप देख कर मोहन चौंक गया. देखा तो सब अपनेअपने सामान समेट कर भागने लगे हैं.

‘‘अरे, क्या हुआ भाई?’’ मोहन ने पास में अपनी सब्जियां समेट रहे सब्जी वाले से पूछा.

‘‘अरे, क्या हुआ क्या, तुम भी अपना सामान जल्दी से उठा कर भागो. तुम देख नहीं रहे कब्जा हटाने के लिए नगर प्रशासन का दस्ता आया हुआ है,’’ उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘नगर प्रशासन का दस्ता… पर वह क्यों भाई?’’ मोहन ने उस सब्जी वाले से हैरानी से पूछा.

‘‘क्योंकि यहां सब्जियां बेचना गैरकानूनी है,’’ ?ां?ालाते हुए उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘गैरकानूनी… पर यहां शहर के बीचोंबीच कुछ लोगों ने जो मौल और होटल बना रखे हैं, वे भी आधे से ज्यादा सरकारी जमीन पर हैं तो उन्हें ये प्रशासन वाले क्यों कुछ नहीं कहते? क्या इन लोगों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती? हम गरीब ही मिले हैं इन्हें सताने को?’’ मोहन ने गुस्से से कहा.

‘‘अरे भाई, वे अमीर लोग हैं. पैसा और पहुंच बहुत है उन की. फिर उन के खिलाफ क्यों कोई कार्यवाही होने लगी? चल, मैं तो चला, तू भी निकल ले जल्दी से,’’ कह कर वह सब्जी वाला चलता बना.

मोहन भी खुद में भुनभुनाते हुए अपनी सब्जियां समेटने लगा, लेकिन तभी किसी की कड़क आवाज से वह कांप उठा और उस के हाथ थरथर कांपने लगे.

‘‘क्यों बे, अब तु?ो क्या अलग से न्योता देता… हां, बोल?’’ कह कर उस में से एक ने उस की टोकरी में ऐसी लात मारी कि वह लुढ़कती हुई दूर चली गई. सारे टमाटर सड़क पर छितरा गए.

तभी एक दूसरा अफसर उस की तरफ बढ़ा ही था कि मोहन हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहने लगा, ‘‘साहब, मैं अभी उठाए लेता हूं सारी सब्जियां, दया माईबाप दया…’’

लेकिन मोहन की बातों को अनसुना कर एक बड़े अफसर ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘इन का तो यह रोज का नाटक है. जब तक इन्हें सबक नहीं सिखाओगे, सम?ोंगे नहीं,’’ कह कर उस ने उस की बचीखुची सब्जियां भी फेंक दीं.

बेचारा मोहन उन सब के सामने गिड़गिड़ाता रह गया. वह अपने आंसू पोंछते हुए जो भी सब्जियां बची थीं, ले कर घर चला गया, पर वहां भी उर्मि की जहरीली बातों ने उसे मार डाला.

‘‘तो क्या करूं… बोल न? क्या गरीब होना मेरी गलती है या वहां जा कर सब्जियां बेच कर मैं ने कोई गुनाह कर दिया, बोलो?’’ मोहन रोंआसी आवाज में बोला.

‘‘वह सब मु?ो नहीं पता… तुम चोरी करो, डकैती करो, जेब काटो चाहे जो भी करो मु?ो तो बस पैसे चाहिए घर चलाने के लिए,’’ जख्म पर महरम लगाने के बदले उर्मि अपनी बातों से उसे और जख्म देने लगी.

अब क्या करता बेचारा, पैसे तो थे नहीं जो फिर से कोई धंधा शुरू करता. कहीं सचमुच में उर्मि उसे छोड़ कर भाग न जाए, इस वजह से मोहन ने गलत रास्ता अख्तियार कर लिया.

अब सब्जियां बेचने के बजाय लोगों की जेबें काटने लगा और छोटीमोटी चोरियां भी करने लगा.

शुरूशुरू में तो मोहन को बहुत बुरा लगता था ये सब काम करने में, लेकिन फिर धीरेधीरे उसे भी यह सब करने में मजा आने लगा.

घर में सामानपैसा आते रहने से उर्मि भी अब खुश रहने लगी थी. उस के ठाठ देख आसपड़ोस की औरतें जल मरतीं और उर्मि उन्हें देख और इतराती. लेकिन उन के पास यह सुख भी ज्यादा दिनों तक टिका न रह सका.

एक दिन मोहन चोरी करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गया और उसे जेल भेज दिया.

मोहन के जेल जाने से उर्मि को कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उस की तो और मौज हो गई. अब वह खुल कर धीरुआ के साथ आंखें चार करने लगी.

धीरुआ उसे जबतब अपने घर ले जाता और दोनों खूब मस्ती करते. अपनी मोटरसाइकिल पर वह उर्मि को खूब घूमाताफिराता, सिनेमा दिखाता. जब लोग कुछ कहते तो उर्मि उन्हें दोटूक जवाब दे कर चुप कर देती.

इधर बिना गुनाह साबित हुए ही मोहन महीनों तक जेल में पड़ा सड़ता रहा, क्योंकि कोई उस की जमानत कराने नहीं आया इसलिए. जब जान लिया उर्मि ने कि अब मोहन नहीं आने वाला, तो एक दिन वह धीरुआ के साथ भाग गई.

बिना गुनाह साबित हुए ही महीनों जेल में गुजारने की बात जब एक कैदी दोस्त ने सुनी तो उसे मोहन पर दया आ गई. छूटते ही उस कैदी दोस्त ने मोहन की जमानत तो करवा दी, लेकिन महीनों जेल में पड़े रहने से वह बहुत कमजोर हो गया. जब पत्नी के बारे में जाना तो उस का दिल और टूट गया. लगा जिस के लिए उस ने इतना सबकुछ सहा, वही उस का साथ छोड़ गई.

अब मोहन बीमार और बेसहारा हो गया था. न तो अब वह कोई काम करने लायक रहा और न ही चोरीजेबकतरी के ही लायक रह गया. कोई कुछ दे जाता तो खा लेता, वरना भूखे पेट ही सो जाता. उसे लग रहा था कि उस के लिए तो जेल भी वैसी ही थी जैसा घर.

गलती : मकान मालकिन की ब्लैकमेलिंग का राज

साढ़े 5 लाख रुपए कोई छोटी रकम नहीं होती. साढ़े 5 लाख तो क्या, उस के पास अभी साढ़े 5 हजार रुपए भी नहीं हैं और उसे धमकी मिली है साढ़े 5 लाख रुपए देने की. नहीं देने पर उस की तसवीर को उजागर करने की धमकी दी गई है.

उस ने अपने मोबाइल फोन में ह्वाट्सऐप पर उस तसवीर को देखा. उस के नंगे बदन पर उस का मकान मालिक सवार हो कर बेशर्मों की तरह सामने देख रहा था. साथ में धमकी भी दी गई थी कि इस तरह की अनेक तसवीरें और वीडियो हैं उस के पास. इज्जत प्यारी है तो रकम दे दो.

यह ह्वाट्सऐप मैसेज आया था उस की मकान मालकिन सारंगा के फोन से. एक औरत हो कर दूसरी औरत को वह कैसे इस तरह परेशान कर सकती है? अभी तक तो कविता यही जानती थी कि उस की मकान मालकिन सारंगा को इस बारे में कुछ भी नहीं पता. बस, मकान मालिक घनश्याम और उस के बीच ही यह बात है. या फिर यह भी हो सकता है कि सारंगा के फोन से घनश्याम ने ही ह्वाट्सऐप पर मैसेज भेजा हो.

कविता अपने 3 साल के बच्चे को गोद में उठा कर मकान मालकिन से मिलने चल दी. वह अपने मकान मालिक के ही घर के अहाते में एक कोने में बने 2 छोटे कमरों के मकान में रहती थी.

मकान मालकिन बरामदे में ही मिल गईं.

‘‘दीदी, यह क्या है?’’ कविता ने पूछा.

‘‘तुम्हें नहीं पता? 2 साल से मजे मार रही हो और अब अनजान बन रही हो,’’ मकान मालकिन बोलीं.

‘‘लेकिन, मैं ने क्या किया है? घनश्यामजी ने ही तो मेरे साथ जोरजबरदस्ती की है.’’

‘‘मुझे कहानी नहीं सुननी. साढ़े 5 लाख रुपए दे दो, मैं सारी तसवीरें हटा दूंगी.’’

‘‘दीदी, आप एक औरत हो कर…’’

‘‘फालतू बातें करने का वक्त नहीं है मेरे पास. मैं 2 दिन की मुहलत दे रही हूं.’’

‘‘लेकिन, मेरे पास इतने पैसे कहां से…’’

‘‘बस, अब तू जा. 2 दिन बाद ही अपना मुंह दिखाना… अगर मुंह दिखाने के काबिल रहेगी तब.’’

कविता परेशान सी अपने कमरे में वापस आ गई. उस के दिमाग में पिछले 2 साल की घटनाएं किसी फिल्म की तरह कौंधने लगीं…

कविता 2 साल पहले गांव से ठाणे आई थी. उस का पति रामप्रसाद ठेले पर छोटामोटा सामान बेचता था. घनश्याम के घर में उसे किराए पर 2 छोटेछोटे कमरों का मकान मिल गया था. वहीं वह अपने 6 महीने के बच्चे और पति के साथ रहने लगी थी.

सबकुछ सही चल रहा था. एक दिन जब रामप्रसाद ठेला ले कर सामान बेचने चला गया था तो घनश्याम उस के घर में आया था. थोड़ी देर इधरउधर की बातें करने के बाद उस ने कविता को अपने आगोश में भरने की कोशिश की थी.

जब कविता ने विरोध किया तो घनश्याम ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल कर उस के 6 महीने के बच्चे के सिर पर तान दी थी और कहा था, ‘बोल क्या चाहती है? बच्चे की मौत? और इस के बाद तेरे पति की बारी आएगी.’

कोई चारा न देख रोतीसुबकती कविता घनश्याम की बात मानती रही थी. यह सिलसिला 2 साल तक चलता रहा था. मौका देख कर घनश्याम उस के पास चला आता था. 1-2 बार कविता ने घर बंद कर चुपचाप अंदर ही पड़े रहने की कोशिश की थी, पर कब तक वह घर में बंद रहती. ऊपर से घनश्याम ने उस की बेहूदा तसवीर भी खींच ली थी जिन्हें वह सभी को दिखाने की धमकी देता रहता था.

इन हालात से बचने के लिए कविता ने कई बार अपने पति को घर बदलने के लिए कहा भी था पर रामप्रसाद उसे यह कह कर चुप कर देता था कि ठाणे जैसे शहर में इतना सस्ता और महफूज मकान कहां मिलेगा? वह सबकुछ कहना चाहती थी पर कह नहीं पाती थी.

पर आज की धमकी के बाद चुप रहना मुमकिन नहीं था. कविता की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इतने पैसे जुटाना उस के बस में नहीं था. यह ठीक है कि रामप्रसाद ने मेहनत कर काफी पैसे कमा लिए हैं, पर इस लालची की मांग वे कब तक पूरी करते रहेंगे. फिर पैसे तो रामप्रसाद के खाते में हैं. वह एक दुकान लेने के जुगाड़ में है. जब रामप्रसाद को यह बात मालूम होगी तो वह उसे ही कुसूरवार ठहराएगा.

रामप्रसाद रोजाना दोपहर 2 बजे ठेला ले कर वापस आ जाता था और खाना खा कर एक घंटा सोता था. मुन्ने के साथ खेलता, फिर दोबारा 4 बजे ठेला ले कर निकलता और रात 9 बजे के बाद लौटता था.

‘‘आज खाना नहीं बनाया क्या?’’ रामप्रसाद की आवाज सुन कर कविता चौंक पड़ी. वह कुछ देर रामप्रसाद को उदास आंखों से देखती रही, फिर फफक कर रो पड़ी.

‘‘क्या हुआ? कोई बुरी खबर मिली है क्या? घर पर तो सब ठीक हैं न?’’ रामप्रसाद ने पूछा.

जवाब में कविता ने ह्वाट्सऐप पर आई तसवीर को दिखा दिया और सारी बात बता दी.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ रामप्रसाद ने पूछा.

कविता हैरान थी कि रामप्रसाद गुस्सा न कर हमदर्दी की बातें कर रहा है. इस बात से उसे काफी राहत भी मिली. उस ने सारी बातें रामप्रसाद को बताईं कि किस तरह घनश्याम ने मुन्ने के सिर पर रिवौल्वर सटा दिया था और उसे भी मारने की बात कर रहा था.

रामप्रसाद कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘इस में तुम्हारी गलती सिर्फ इतनी ही है कि तुम ने पहले ही दिन मुझे यह बात नहीं बताई. खैर, बेटे और पति की जान बचाने के लिए तुम ने ऐसा किया, पर इन की मांग के आगे झुकने का मतलब है जिंदगीभर इन की गुलामी करना. मैं अभी थाने में रिपोर्ट लिखवाता हूं.’’

रामप्रसाद उसी वक्त थाने जा कर रिपोर्ट लिखा आया. जैसे ही घनश्याम और उस की पत्नी को इस की भनक लगी वे घर बंद कर फरार हो गए.

कविता ने रात में रामप्रसाद से कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’’

‘‘माफी की कोई बात ही नहीं है. तुम ने जो कुछ किया अपने बच्चे और पति की जान बचाने के लिए किया. गलती बस यही कर दी तुम ने कि सही समय पर मुझे नहीं बताया. अगर पहले ही दिन मुझे बता दिया होता तो 2 साल तक तुम्हें यह दर्द न सहना पड़ता.’’

कविता को बड़ा फख्र हुआ अपने पति पर जो इन हालात में भी इतने सुलझे तरीके से बरताव कर रहा था. साथ ही उसे अपनी गलती का अफसोस भी हुआ कि पहले ही दिन उस ने यह बात अपने पति को क्यों नहीं बता दी. उस ने बेफिक्र हो कर अपने पति के सीने पर सिर रख दिया.

दिल के रिश्ते : क्या रवि ने धोखाधड़ी

ट्रेन अहमदाबाद स्टेशन से अपने तय समय पर शाम के पौने 6 बजे रवाना हुई. सामान के नाम पर एकलौता बैग राजन ने ऊपर लगेज स्टैंड पर रखा और फर्स्ट क्लास कंपार्टमैंट की आरामदायक सीट पर अधलेटा सा खिड़की के कांच से बाहर पीछे छूटते लोगों को देखता अपने घर के खयालों में गुम हो गया.

ट्रेन जितनी रफ्तार से मंजिल की ओर दौड़ रही थी, राजन का दिमाग उतनी ही रफ्तार से यादों के पथरीले रास्तों पर दौड़ रहा था. उन रिश्तों के आसपास, जिन में 2 छोटे भाई, बहन स्नेहा और रवि थे. रवि जिस से राजन के परिवार का खून का रिश्ता नहीं था.

वे स्कूल के खुशगवार दिन थे. पढ़ने की लगन के बीच शाम को खेलना और मस्त रहना राजन के साथ एक आम दिनचर्या हुआ करती थी. इसी बीच पापा का खेत के काम में हाथ बंटाने का आदेश मिलना एक तरह का बदलाव ले कर आता था.

‘‘साहब, रात में खाना चाहिए क्या?’’ ट्रेन कैटरिंग स्टाफ का एक लड़का सामने आ कर खड़ा हो गया, तो राजन वर्तमान में लौट आया.

‘‘क्या है खाने में?’’

‘‘वैज या नौनवैज?’’ उस स्टाफ ने बड़े अदब से पूछा.

‘‘वैज…’’ राजन ने भी उतनी ही सहजता के साथ जवाब दिया.

‘‘मटरपनीर, दाल अरहर, मिक्स वैज, चावल, चपाती, रायता और सलाद.’’

कुछ सोच कर राजन बोला, ‘‘ठीक है, भेज देना.’’

लड़का चला गया, तो राजन ने एक बार खिड़की से बाहर नजर डाली. ट्रेन खेतों, पेड़पौधों और छितराई बस्तियों को पीछे छोड़ते हुए सरपट दौड़ रही थी.

राजन ने उठ कर बैग से आज ही बुक स्टौल से खरीदी पत्रकार रवीश कुमार की एक किताब ‘बोलना ही है’ निकाली और बर्थ पर बैठ कर पढ़ने लगा.

राजन 3 साल बाद अपने घर लौट रहा था, वह भी अकेले. उस की पत्नी शीतल ने यह कह कर चलने से मना कर दिया था कि एक हफ्ता गांव में रहे तो बच्चे पढ़ाई से दूर हो जाएंगे. उस का मानना है कि गांव में निठल्लेपन को बढ़ावा मिलता है.

राजन के पापा का बरताव सब बच्चों के प्रति दोस्ताना था. किसी दिन खेत में काम ज्यादा होता, तो सुबह के नाश्ते के समय वे कहते थे, ‘आज तुम में से एक की जरूरत है, जिस को स्कूल में बहुत जरूरी काम न हो, वह छुट्टी ले ले.’’

फिर किसी दिन स्नेहा पूछ लेती, ‘‘पापा, वैसे तो आप हम सब को खूब पढ़ कर कामयाब होने की सलाह देते हो, दूसरी तरफ रोज किसी न किसी की छुट्टी भी करा देते हो. ऐसा क्यों?’’

पर इस बात का पापा ने कभी जवाब नहीं दिया.

गरमियों में पास के शहर में मेला लगता था, जिस का राजन को पूरे साल इंतजार रहता था. उस दिन हर साल की तरह पापा सब को मेला दिखाने ले कर गए. सब ने उस दिन खूब मस्ती की. झला झले, आइसक्रीम खाई और खिलौने भी खरीदे. आखिर में सब सर्कस देखने की कतार में खड़े थे कि राजन की उम्र का एक लड़का उन्हें भीड़ में रोता दिखाई दिया.

‘क्या नाम है तुम्हारा?’ पापा ने बड़े प्यार के साथ उस के सिर पर हाथ फेर कर पूछा था.

‘रवि,’ उस लड़के ने सुबकते हुए जवाब दिया था.

‘तुम्हारे मम्मीपापा कहां हैं?’

पर छोटी उम्र के उस बच्चे के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था. सर्कस देखने का प्रोग्राम रद्द कर पापा ने उसे खिलौने दिलाए और जो उस ने खाने को कहा खिलाया. फिर उसे सही जगह पहुंचाने की कोशिश में देर रात हो गई. निराश हो कर जब वे सब घर लौटे, तो रवि उन के साथ था.

शायद प्यार से बड़ी कोई रिश्तेदारी नहीं होती. 2-4 दिन लगे रवि को उन के बीच घुलमिल जाने में और उतने ही दिन उस ने अपने मम्मीपापा को याद किया.

फिर जिंदगी ने अपनी रफ्तार पकड़ ली. रवि अब राजन के साथ स्कूल जाने और बीच में छुट्टी ले कर खेतों मे काम करने की पारिवारिक परंपरा का हिस्सा हो गया.

धीरेधीरे खेत के काम में रवि का ऐसा मन लगा कि वह कभीकभार ही स्कूल जाता था. इस बात से राजन और उस के दोनों भाई एक तरह से खुश थे, क्योंकि उन के हिस्से का सारा काम अब रवि ने संभाल लिया था.

स्नेहा समेत वे चारों भाईबहन बहुत अच्छे नंबरों से ग्रैजुएशन और फिर पोस्ट ग्रैजुएशन तक पढ़े. सब से छोटा भाई नीलेश पीडब्लूडी महकमे में इंजीनियर हो गया था. उस से बड़ा संजीव पास के इलाके के स्कूल में टीचर और राजन भारत संचार निगम लिमिटेड में क्लर्क हो गया था, जबकि रवि एक तरह से उन की पुश्तैनी जायदाद और मातापिता का सहारा बन गया.

गांव से निकलते समय राजन और उस के दोनों भाइयों ने यह फैसला किया था कि चूंकि रवि ने उन के हिस्से का काम किया है, इसलिए उसे कभी किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होने दी जाएगी.

राजन के विचारों ने जितने समय में जिंदगी के पिछले 10 साल के सार को दोहराया, ट्रेन उतने समय में दिल्ली पहुंच गई थी. वहां की आबोहवा से अपनेपन की महक आने लगी थी. अभी घर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर होने के बावजूद लगता था कि वह घर पहुंच गया है.

राजन जब ट्रेन से नीचे उतरा, तो अनाउंसमैंट हो रही थी कि करनाल के लिए लोकल ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 10 से चलने के लिए तैयार है. अचानक उस की नजर प्लेटफार्म पर आजा रहे लोगों के बीच एक चेहरे पर पड़ी. कोई उस का ही हम उम्र सिर पर एक गट्ठर सा लिए चला जा रहा था.

जब तक राजन यह तय कर पाता कि वह चेहरा जाना पहचाना था, तब तक वह आंखों से ओझल हो गया. दिल कहता था कि राजन ने भीड़ में रवि को देखा था, पर तब तक ट्रेन चल पड़ी थी.

दोपहर के 2 बजे राजन घर में दाखिल हुआ, तो उसे देखते ही घर में जैसे उत्सव का सा माहौल बन गया. घर के सब सदस्य हालचाल पूछने के लिए जमा हो गए. पड़ोस के चाचाताऊ के परिवार सहित, सिवा रवि के.

जब भीड़ छंट गई, तो राजन ने पापा से पूछा, ‘‘रवि कहां है?’’

जवाब देने की जगह पापा गुमसुम से हो गए. उन के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘चला गया.’’

‘‘क्यों चला गया?’’

‘‘बेटा, अपनेपराए में फर्क तो होता ही है न? एक न एक दिन तो वह फर्क अपना असर दिखाता ही है. पराए लोग चोरी करने से बाज नहीं आते. वह भी नहीं आया,’’ पापा ने आंखें चुराते हुए कहा, जैसे वे कुछ छिपा रहे हों.

‘‘उस ने क्या चोरी किया? पैसे चुराए हैं क्या?’’

‘‘हां, हर साल की तरह इस बार भी धान की फसल बेच कर वह घर आया तो रुपए ला कर घर में नहीं दिए. उस से पूछा तो बहाने बनाता रहा. ज्यादा जोर डाल कर पूछा तो तेरा नाम ले कर कहने लगा कि भैया के आने पर बताऊंगा. गुस्से में तेरे बड़े भाई ने कह दिया कि वह हमेशा के लिए घर से चला जाए और वह चला गया.’’

इस खबर को सुन कर राजन को ठीक वैसा ही लगा जैसा किसी अपने की मौत हो जाने पर लगता है. भैया छुट्टी पर घर आए हुए थे, इस बात की खुशी अब मन से काफूर हो गई. राजन वापस चल दिया.

‘‘कहां जा रहे हो बेटा? रवि अब कहां मिलेगा?’’

‘‘मंडी जा रहा हूं. आढ़ती से पूछने कि क्या रवि रुपए ले गया था?’’

‘‘हम ने फोन कर के पूछा था,’’ अपराधियों की तरह सिर झांका कर पापा ने कहा.

‘‘क्या बताया उस ने?’’

‘‘रवि ने… यह कह कर रुपए वहीं छोड़ दिए थे कि अगले साल स्नेहा की शादी में इकट्ठा ले कर जाएगा…’’ पापा ने कहा. उन की आंखों में पछतावे के आंसू झलक आए थे, ‘‘बेटा, हमें माफ कर दो. रवि लगन से काम करने में इतना बिजी रहता था कि बहुत बातें बताना भूल जाता था. वह समझता था कि गैर होने की वजह से हर बात बताने की उस की मजबूरी है.

‘‘जो थोड़ीबहुत बातें वह बता नहीं पाता था, वे ही सब के मन में शक पैदा करती रहीं. आज वही शक हद पर पहुंच गया था.’’

‘‘सही कहा पापा आप ने, गैरों को हर पल अपनी ईमानदारी का सुबूत देते रहना होता है. यही समाज का उसूल है. आप भी तो उसी समाज का हिस्सा हैं, फिर आप से या भैया से क्या गिला करना?

‘‘लेकिन, रवि अपनेपन का जो सुबूत दे गया है, वह मुझे हमेशा कचोटता रहेगा. उस ने अपना समझ कर परिवार के लिए सबकुछ किया और हम ने उसे खाली हाथ चलता कर दिया,’’ राजन ने कहा और खेतों की ओर निकल गया. शायद कहीं रवि दिख ही जाए.

देवर : अपने पति से क्यों दूर हो रही थी मंजू

प्रदीप को पति के रूप में पा कर मंजू के सारे सपने चूरचूर हो गए. प्रदीप का रंग सांवला और कद नाटा था. वह मंजू से उम्र में भी काफी बड़ा था.

मंजू ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, मगर थी बहुत खूबसूरत. उस ने खूबसूरत फिल्मी हीरो जैसे पति की कल्पना की थी.

प्रदीप सीधासादा और नेक इनसान था. वह मंजू से बहुत प्यार करता था और उसे खुश करने के लिए अच्छेअच्छे तोहफे लाता था. मगर मंजू मुंह बिचका कर तोहफे एक ओर रख देती. वह हमेशा तनाव में रहती. उसे पति के साथ घूमनेफिरने में भी शर्म महसूस होती.

मंजू तो अपने देवर संदीप पर फिदा थी. पहली नजर में ही वह उस की दीवानी हो गई थी.

संदीप मंजू का हमउम्र भी था और खूबसूरत भी. मंजू को लगा कि उस के सपनों का राजकुमार तो संदीप ही है.

प्रदीप की नईनई नौकरी थी. उसे बहुत कम फुरसत मिलती थी. अकसर वह घर से बाहर ही रहता. ऐसे में मंजू को देवर का साथ बेहद भाता. वह उस के साथ खूब हंसीमजाक करती.

संदीप को रिझाने के लिए मंजू उस के इर्दगिर्द मंडराती रहती. जानबूझ कर वह साड़ी का पल्लू सरका कर रखती. उस के गोरे खूबसूरत बदन को संदीप जब चोर निगाहों से घूरता तो मंजू के दिल में शहनाइयां बज उठतीं.

वह चाहती कि संदीप उस के साथ छेड़छाड़ करे मगर लोकलाज के डर और घबराहट के चलते संदीप ऐसा कुछ नहीं कर पाता था.

संदीप की तरफ से कोई पहल न होते देख मंजू उस के और भी करीब आने लगी. वह उस का खूब खयाल रखती. बातोंबातों में वह संदीप को छेड़ने लगती. कभी उस के बालों में हाथ फिराती तो कभी उस के बदन को सहलाती. कभी चिकोटी काट कर वह खिलखिलाने लगती तो कभी उस के हाथों को अपने सीने पर रख कर कहती, ‘‘देवरजी, देखो मेरा दिल कैसे धकधक कर रहा है…’’

जवान औैर खूबसूरत भाभी की मोहक अदाओं से संदीप के मन के तार झनझना उठते. उस के तनबदन में आग सी लग जाती. वह भला कब तक खुद को रोके रखता. धीरेधीरे वह भी खुलने लगा.

देवरभाभी एकदूसरे से चिपके रहने लगे. दोनों खूब हंसीठिठोली करते व एकदूसरे की चुहलबाजियों से खूब खुश होते. अपने हाथों से एकदूसरे को खाना खिलाते. साथसाथ घूमने जाते. कभी पार्क में समय बिताते तो कभी सिनेमा देखने चले जाते. एकदूसरे का साथ उन्हें अपार सुख से भर देता.

दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. संदीप के प्यार से मंजू को बेहद खुशी मिलती. हंसतीखिलखिलाती मंजू को संदीप बांहों में भर कर चूम लेता तो कभी गोद में उठा लेता. कभी उस के सीने पर सिर रख कर संदीप कहता, ‘‘इस दिल में अपने लिए जगह ढूंढ़ रहा हूं. मिलेगी क्या?’’

‘‘चलो देवरजी, फिल्म देखने चलते हैं,’’ एक दिन मंजू बोली.

‘‘हां भाभी, चलो. अजंता टौकीज में नई फिल्म लगी है,’’ संदीप खुश हो कर बोला और कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में चला गया.

मंजू कपड़े बदलने के बाद आईने के सामने खड़ी हो कर बाल संवारने लगी. अपना चेहरा देख कर वह खुद से ही शरमा गई. बनठन कर जब वह निकली तो संदीप उसे देखता ही रह गया.

‘‘तुम इस तरह क्या देख रहे हो देवरजी?’’ तभी मंजू इठलाते हुए हंस कर बोली.

अचानक संदीप ने मंजू को पीछे से बांहों में भर लिया और उस के कंधे को चूम कर बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो, भाभी. काश, हमारे बीच यह रिश्ता न होता तो कितना अच्छा होता?’’

‘‘अच्छा, तो तुम क्या करते?’’ मंजू शरारत से बोली.

‘‘मैं झटपट शादी कर लेता,’’ संदीप ने कहा.

‘‘धत…’’ मंजू शरमा गई. लेकिन उस के होंठों पर मादक मुसकान बिखर गई. देवर का प्यार जताना उसे बेहद अच्छा लगा. खैर, वे दोनों फिल्म देखने चल पड़े.

फिल्म देख कर जब वे बाहर निकले तो अंधेरा हो चुका था. वे अपनी ही धुन में बातें करते हुए घर लौट पड़े. उन्हें क्या पता था कि 2 बदमाश उन का पीछा कर रहे हैं.

रास्ता सुनसान होते ही बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और बदतमीजी करने लगे. यह देख कर संदीप डर के मारे कांपने लगा.

‘‘जान प्यारी है तो तू भाग जा यहां से वरना यह चाकू पेट में उतार दूंगा,’’

एक बदमाश दांत पीसता हुआ संदीप के आगे गुर्राया.

‘‘मुझे मत मारो. मैं मरना नहीं चाहता,’’ संदीप गिड़गिड़ाने लगा.

‘‘जा, तुझे छोड़ दिया. अब फूट ले यहां से वरना…’’

‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ संदीप. मुझे बचा लो…’’ तभी मंजू घबराए लहजे में बोली.

लेकिन संदीप ने जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह वहां से भाग खड़ा हुआ. सारे बदमाश हो… हो… कर हंसने लगे.

मंजू उन की कैद से छूटने के लिए छटपटा रही थी पर उस का विरोध काम नहीं आ रहा था.

बदमाश मंजू को अपने चंगुल में देख उसे छेड़ते हुए जबरदस्ती खींचने लगे. वे उस के कपड़े उतारने की फिराक में थे.

‘‘बचाओ…बचाओ…’’ मंजू चीखने लगी.

‘‘चीखो मत मेरी रानी, गला खराब हो जाएगा. तुम्हें बचाने वाला यहां कोई नहीं है. तुम्हें हमारी प्यास बुझनी होगी,’’ एक बदमाश बोला.

‘‘हाय, कितनी सुंदर हो? मजा आ जाएगा. तुम्हें पाने के लिए हम कब से तड़प रहे थे?’’ दूसरे बदमाश ने हंसते हुए कहा.

बदमाशों ने मंजू का मुंह दबोच लिया और उसे घसीटते हुए ले जाने लगे. मंजू की घुटीघुटी चीख निकल रही थी. वह बेबस हो गई थी.

इत्तिफाक से प्रदीप अपने दोस्त अजय के साथ उसी रास्ते से गुजर रहा था. चीख सुन कर उस के कान खड़़े हो गए.

‘‘यह तो मंजू की आवाज लगती है. जल्दी चलो,’’ प्रदीप अपने दोस्त अजय से बोला.

दोनों तेजी से घटनास्थल पर पहुंचे. अजय ने टौर्च जलाई तो बदमाश रोशनी में नहा गए. बदमाश मंजू के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे. मंजू लाचार हिरनी सी छटपटा रही थी.

प्रदीप और अजय फौरन बदमाशों पर टूट पड़े. उन दोनों ने हिम्मत दिखाते हुए उन की पिटाई करनी शुरू कर दी. मामला बिगड़ता देख बदमाश भाग खडे़ हुए, लेकिन जातेजाते उन्होंने प्रदीप को जख्मी कर दिया.

मंजू ने देखा कि प्रदीप घायल हो गया है. वह जैसेतैसे खड़ी हुई और सीने से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. उस ने अपने आंसुओं से प्रदीप के सीने को तर कर दिया.

‘‘चलो, घर चलें,’’ प्रदीप ने मंजू को सहारा दिया.

उन्हें घर पहुंचा कर अजय वापस चला गया. मंजू अभी भी घबराई हुई थी. पर धीरेधीरे वह ठीक हुई.

‘‘यह क्या… आप के हाथ से तो खून बह रहा है. मैं पट्टी बांध देती हूं,’’ प्रदीप का जख्म देख कर मंजू ने कहा.

‘‘मामूली सा जख्म है, जल्दी ठीक हो जाएगा,’’ प्रदीप प्यार से मंजू को देखते हुए बोला.

मंजू के दिल में पति का प्यार बस चुका था. प्रदीप से नजर मिलते ही वह शरमा गई. वह मासूम लग रही थी. उस का प्यार देख कर प्रदीप की आंखें छलछला आईं.

बीवी का सच्चा प्यार पा कर प्रदीप के वीरान दिल में हरियाली छा गई. वह मंजू को अपनी बांहों में भरने के लिए मचल उठा.

इतने में मंजू का देवर संदीप सामने आ गया. वह अभी भी घबराया हुआ था. बड़े भाई के वहां से जाने के बाद संदीप ने अपनी भाभी का हालचाल पूछना चाहा तो मंजू ने उसे दूर रहने का इशारा किया.

‘‘तुम ने तो मुझे बदमाशों के हवाले कर ही दिया था. अगर मेरे पति समय पर न पहुंचते तो मैं लुट ही गई थी. कैसे देवर हो तुम?’’ जब मंजू ने कहा तो संदीप का सिर शर्म से झुक गया.

इस एक घटना ने मंजू की आंखें खोल दी थीं. अब उसे अपना पति ही सच्चा हमदर्द लग रहा था. वह अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें