एक और बेटे की मां- भाग 2: रूपा अपने बेटे से क्यों दूर रहना चाहती थी?

वह थोड़ी आश्वस्त हुई. उधर मुन्ना बातें करते हुए किशोर के साथ दूसरी ओर चला गया था कि मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन अस्पताल से ही था. नीरज ने कोरोना से पीडि़त पड़े पड़ोसी के भाई को अमेरिका फोन किया तो सरल सा जवाब मिला, ‘‘उन लोगों ने अपने मन की करी, अब खुद भुगतो.’’ और पीछे कहा गया. फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा, तो उधर से आवाज आई, ‘‘आप राकेशजी के घर से बोल रही हैं?’’

‘‘नहीं, मैं उन के पड़ोस से बोल रही हूं,’’ वह बोली, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘सौरी मैम, हम मिसेज रूपा को बचा नहीं सके. एक घंटा पहले ही उन की डैथ

हो गई. आप उन की डैड बौडी लेने और अन्य औपचारिकताएं पूरी करने यहां आ जाएं,’’ यह सुन कर उस का पैर थरथरा सा गया. यह वह क्या सुन रही है…

नीरज ने आ कर उसे संभाला और उस के हाथ से फोन ले कर बातें करने लगा था, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘अब कहना क्या है?’’ उधर से फिर वही आवाज आई, ‘‘अब डैड बौडी लेने की औपचारिकता रह गई है. आप आ कर उसे पूरा कर दीजिए.’’

‘‘सौरी, हम इस संबंध में कुछ नहीं जानते,’’ नीरज बोल रहे थे, ‘‘मिसेज रूपा के पति राकेशजी आप ही के अस्पताल में कोरोना वार्ड में ऐडमिट हैं. उन से संपर्क कीजिए.’’

इतना कह कर उन्होंने फोन काट कर प्रश्नवाचक दृष्टि से शोभा को देखा. शोभा को जैसे काठ मार गया था. बड़ी मुश्किल से उस ने खुद को संभाला, तो नीरज बोले, ‘‘एक नंबर का अहंकारी है राकेश. ऐसे आदमी की मदद क्या करना. कल को कहीं यह न कह दे कि आप को क्या जरूरत थी कुछ करने की. वैसे भी इस कोरोना महामारी के बीच बाहर कौन निकलता है. वह भी उस अस्पताल में जाना, जहां वैसे पेशेंट भरे पड़े हों.’’

तब तक किशोर उन के पास चला आया और पूछने लगा, ‘‘मम्मीपापा लौट के आ रहे हैं न अंकल?’’

इस नन्हे, अबोध बच्चे को कोई क्या जवाब दे? यह विकट संकट की घड़ी थी. उसे टालने के लिए वह बोली, ‘‘अभी मैं तुम लोगों को कुछ खाने के लिए निकालती हूं. पहले कुछ खा लो.’’

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‘‘मु झे भूख नहीं है आंटी. मु झे कुछ नहीं खाना.’’

‘‘कैसे नहीं खाना,’’  नीरज द्रवित से होते हुए बोले, ‘‘मुन्ना और श्वेता के साथ तुम भी कुछ खा लो.’’

फिर वे शोभा से बोले, ‘‘तुम किचन में जाओ. तब तक मैं कुछ सोचता हूं.’’

वह जल्दी में दूध में कौर्नफ्लैक्स डाल कर ले आई और तीनों बच्चों को खाने को दिया. फिर वह किशोर से मुखातिब होती हुई बोली, ‘‘तुम्हारे नानानानी या मामामौसी होंगे न. उन का फोन नंबर दो. मैं उन से बात करती हूं.’’

‘‘मेरी मम्मी का कोई नहीं है. वे इकलौती थीं. मैं ने तो नानानानी को देखा भी नहीं.’’

‘‘कोई बात नहीं, दादादादी, चाचाचाची तो होंगे,’’ नीरज उसे पुचकारते हुए बोले, ‘‘उन का ही फोन नंबर बताओ.’’

‘‘दादादादी का भी देहांत हो गया है. एक चाचा  हैं. लेकिन, वे अमेरिका में रहते हैं. कभीकभी पापा उन से बात करते थे.’’

‘‘तो उन का नंबर निकालो,’’ वह शीघ्रता से बोली, ‘‘हम उन से बात करते हैं.’’

किशोर ने मोबाइल फोन में वह नंबर ढूंढ़ कर निकाला. नीरज ने पहले उसी फोन से उन्हें डायल किया, तो फोन रिंग ही नहीं हुआ.

‘‘यह आईएसडी नंबर है. फोन कहां से  होगा,’’ कह कर वे  झुं झलाए, फिर उस नंबर को अपने मोबाइल में नोट कर फोन लगाया. कई प्रयासों के बाद वह फोन लगा, तो उस ने अपना परिचय दिया, ‘‘आप राकेशजी हैं न, राकेशजी के भाई. मैं उन का पड़ोसी नीरज बोल रहा हूं. आप के भाई और भाभी दोनों ही कोरोना पौजिटिव हैं और अस्पताल में भरती हैं.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘अरे, आप को जानकारी दे रहा हूं. आप उन के रिश्तेदार हैं. उन का बच्चा एक सप्ताह से फ्लैट में अकेला ही रह रहा है.’’

‘‘कहा न कि मैं क्या करूं,’’ उधर से  झल्लाहटभरी आवाज आई, ‘‘उन लोगों ने अपने मन की करी, तो भुगतें भी. अस्पताल में ही भरती हैं न, ठीक हो कर वापस लौट आएंगे.’’

नीरज ने शोभा को इशारा किया, तो वह उन का इशारा सम झ बच्चों को अपने कमरे में ले गई. तो वे फोन पर उन से धीरे से बोले, ‘‘आप की भाभी की डैथ हो गई है.’’

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‘‘तो मैं क्या कर सकता हूं? मैं अमेरिका में हूं. यहां भी हजार परेशानियां हैं. मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता.’’

‘‘अरे, कुछ कर नहीं सकते, न सही. मगर बच्चे को फोन पर तसल्ली तो दे लो,’’ मगर तब तक उधर से कनैक्शन कट चुका था.

‘‘यह तो अपने भाई से भी बढ़ कर खड़ूस निकला,’’ नीरज बड़बड़ाए और उस की ओर देखते हुए फोन रख दिया. तब तक किशोर आ गया था, ‘‘आंटी, मैं अपने घर नहीं जाऊंगा. मु झे मेरी मम्मी के पास पहुंचा दो. वहीं मु झे जाना है.’’

‘‘तुम्हारी मम्मी अस्पताल में भरती हैं और वहां कोई नहीं जा सकता.’’

‘‘तो मैं आप ही के पास रहूंगा.’’

‘‘ठीक है, रह लेना,’’ वह उसे पुचकारती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हें कहां भेज रही हूं. तुम खाना खा कर मुन्ने के कमरे में सो जाना.’’

मेरा पति सिर्फ मेरा है- भाग 2: अनुषा ने अपने पति को टीना के चंगुल से कैसे निकाला?

बहू कभीकभी हमें जिंदगी में समझौते करने पड़ते हैं. 1-2 बार भुवन ने जौब छोड़ने की भी कोशिश की, मगर उस ने आत्महत्या की धमकी दे डाली. भुवन के प्रति आकर्षित है, इसलिए उसे अपने औफिस से निकलने भी नहीं देती.’’

तभी ससुर भी उसे समझाने आ गए. बोले, ‘‘सच कहूं बहू तो उस ने काफी कुछ किया है हमारे लिए. मेरे हार्ट की सर्जरी कराने में भी पानी की तरह पैसे बहाए. इन सब के बदले भुवन का थोड़ा वक्त ही तो लेती है. सुबह भुवन 1 घंटा जल्दी चला जाता है ताकि उस के साथ समय बिता सके और रात में थोड़ा रुक जाता है. बस, इतनी ही डिमांड है उस की.’’

‘‘यदि टीना को भुवन इतना ही पसंद था तो उसी से शादी क्यों नहीं करा दी आप लोगों ने? मेरी जिंदगी क्यों खराब की?’’

‘‘बेटी टीना शादीशुदा है. उस की शादी भुवन से नहीं हो सकती.’’

शादी के दूसरे दिन ही अपनी जिंदगी में आए इस कड़वे अध्याय को पढ़ कर

अनुषा विचलित हो गई थी. सोचा मां को हर बात बता दे और सबकुछ छोड़ कर मायके चली जाए. मगर फिर मां की कही बातें याद आ गईं कि हमेशा धैर्य बनाए रखना.

आधे घंटे में भुवन लौट आया. खापी कर और बरतन निबटा कर जब अनुषा अपने कमरे में पहुंची तो देखा भुवन टीना से बातें कर रहा है. अनुषा को देखते ही उस ने फोन काट दिया और अनुषा को बांहों में भरने लगा. अनुषा छिटक कर अलग हो गई और उलाहनेभरे स्वर में बोली, ‘‘मेरी सौतन से बातें कर रहे थे?’’

भुवन हंस पड़ा, ‘‘अरे यार सौतन नहीं है वह. बस मुझ पर मरती है और मैं भी उस के साथ थोड़ाबहुत हुकअप कर लेता हूं. बस और क्या. खूबसूरत है साथ चलती है तो अपना भी स्टैंडर्ड बढ़ जाता है,’’ बेशर्मी से बोलते हुए भुवन सहसा ही सीरियस हो गया, ‘‘देखो अनुषा, जीवनसाथी तो तुम ही हो मेरी. मेरे जीवन का हर रास्ता लौट कर तुम्हारे पास ही आएगा.’’

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‘‘वह तो ठीक है भुवन मगर ऐसा कब तक चलेगा? इस टीना को तुम में इतनी दिलचस्पी क्यों है? कहीं न कहीं तुम भी उसे भाव देते होगे तभी तो उसे आगे बढ़ने का मौका मिलता है.’’

‘‘देखो यार, मेरा तो एक ही फंडा है, थोड़ी खुशी मुझे मिल जाती है और थोड़ी उसे. इस में गलत क्या है औफिस में मेरी पोजीशन बढ़ाती है और मैं उसे थोड़ा प्यार दे देता हूं. बस, इस से ज्यादा और कुछ नहीं. दिल में तो केवल तुम ही हो न…’’ कह कर भुवन ने लाइट बंद कर दी और न चाहते हुए भी अनुषा को समर्पण करना पड़ा.

समय इसी तरह निकलने लगा. लगभग रोजाना ही टीना घर आ धमकती. वह

जब भी आती भुवन के साथ फ्लर्ट करती, अदाएं बिखेरती और अनुषा पर व्यंग्य कसती.

एक दिन भुवन के बालों को अपनी उंगलियों में घुमाते हुए शोख आवाज में बोली, ‘‘एक राज बताऊं अनुषा, तुम्हारे काम आएगा?’’

अनुषा ने कोई जवाब नहीं दिया.

मगर टीना ने बोलना जारी रखा, ‘‘पता है, भुवन कब खुद पर काबू नहीं रख पाता.’’

‘‘कब?’’ भुवन ने टोका तो हंसते हुए टीना बोली, ‘‘जब कोई लड़की हलके गुलाबी रंग की नाइटी पहन कर उस के करीब जाए. फिर तो भुवन का खुद पर वश नहीं चलता.’’

सुन कर भुवन सकपका गया और टीना हंसती हुई बोली, ‘‘वैसे अनुषा, एक बात और बताऊं,’’ भुवन के बिलकुल करीब पहुंचते हुए टीना ने कहा तो अनुषा का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा.

अनुषा को और भी ज्यादा जलाती हुई टीना बोलने लगी,’’ काली टीशर्ट और ग्रे जींस में तुम्हारा पति इतना हैंडसम लगता है कि दुनिया का कोई भी पुरुष तुम्हारे पति के आगे पानी भरे.’’

अनुषा ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर टीना ने अपने फ्लर्टी अंदाज में बोलना जारी रखा, ‘‘जानते हो भुवन, तुम्हारी कौन सी अदा और कौन सी चीज मुझे अपनी तरफ खींचती है?’’

अनुषा का गुस्सा देख भुवन टीना के पास से उठ कर दूर खड़ा हो गया तो नजाकत के साथ उस के करीब से गुजरती हुई टीना बोली, ‘‘यह तुम्हारी सब जान कर भी अनजान बने रहने की अदा. तोबा दिल का सुकून छिन जाता है जब तुम्हारी निगाहों में अपनी मुहब्बत देखती हूं. चलो अब चलती हूं मैं वरना कोई गुस्ताखी न हो जाए मुझ से…’’

इस तरह की बेशर्मियां टीना अकसर करती.

हनीमून पर जाने से 2 दिन पहले की बात है. उस दिन रविवार था. भुवन सुबह से ही अपने कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहा था. अनुषा दोपहर के खाने की तैयारियों में लगी थी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई तो अनुषा ने जा कर दरवाजा खोला. सामने टीना खड़ी थी. खुले बाल, स्लीवलैस बौडीहगिंग टौप और जींस के साथ डार्क रैड लिपस्टिक में उसे देख कर अनुषा का चेहरा बन गया.

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टीना नकली हंसी बिखेरती अंदर घुस

आई और पूछा, ‘‘नई दुलहन आप के श्रीमानजी कहां हैं?’’

‘‘वे अपने कमरे में काम कर रहे हैं.’’

‘‘ओके मैं मिल कर आती हूं,’’ अनुषा के इस कथन पर टीना ठहाके मार कर हंसती हुई बोली, ‘‘आंटी, सुना आप ने? आप की बहू तो मुझ से औपचारिकताएं निभा रही है. उसे पता ही नहीं कि मैं इस घर में किसी भी कमरे में किसी भी समय जा सकती हूं,’’ कहते हुए वह भुवन के कमरे की तरफ बढ़ गई.

अनुषा ने सवालिया नजरों से सास की तरफ देखा तो सास ने नजरें नीची कर लीं. टीना ने भुवन के कमरे में जा कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. करीब 1 घंटे बाद उस ने दरवाजा खोला. उतनी देर अनुषा के सीने में आग जलती रही. उसी समय उस ने हनीमून के टिकट फाड़ डाले. रात तक अपना कमरा बंद कर रोती रही.

सास ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देख बहू, पुरुषों द्वारा 2 स्त्रियों के साथ संबंध बना कर रखना कोई नई बात तो है नहीं. सदियों से ऐसी बातें चली आ रही हैं. यहां तक कि देवीदेवता भी इस से अछूते नहीं. कृष्ण का ही उदाहरण ले, जिन की 16 हजार रानियां थीं. रानी रुक्मिणी के साथसाथ राधा से भी उन के संबंध थे. पांडु और राजा दशरथ की भी 3-3 पत्नियां थीं तो इंद्र ने भी अहिल्या के साथ…’’

‘‘मांजी आप प्लीज अपनी दलीलें मुझे मत दीजिए. मुझे मेरे दर्द के साथ अकेला रहने दीजिए. एक बात बताइए मांजी, आप को इस में कुछ गलत नहीं लग रहा? अगर ऐसा है और यह घर टूटता है तो आप इस का इलजाम मुझ पर मत लगाइएगा.’’

इंतजार- भाग 2: क्यों सोमा ने अकेलापन का सहारा लिया?

सुपरवाइजर बहुत कड़क था. वह एक मिनट भी चैन की सांस नहीं लेने देता. किसी को भी आपस में बात करते या हंसीमजाक करते देखता, तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी दिया करता.

कारखाने का बड़ा उबाऊ वातावरण था. औसत दरजे का कमरा, उस में  10-12 औरतआदमी, चारों और कमीजों का ढेर और धीमाधीमा चलता पंखा. नए कपड़ों की गरमी में लगातार काम में जुटे रह कर वह थक जाती और ऊब भी जाती.

थकीमांदी जब वह घर लौटती तो एक कोठरी में बाबू की गालीगलौज और नशे में अम्मा के साथ लड़ाई व मारपीट से दोचार होना पड़ता. लड़ाई?ागड़े के बाद उसे सोता सम?ा दोनों अपने शरीर की भूख मिटाते. उसे घिन आती और वह आंखों में ही रात काट देती.

सवेरे पड़ोस का रमेश उसे लाइन मारते हुए कहता, ‘अरे सोमा, एक मौका तो दे मु?ो, तु?ो रानी बना कर रखूंगा.’

वह आंखें तरेर कर उस की ओर देखती और नाली पर थूक देती.

विमला काकी व्यंग्य से मुसकरा कर कहती, ‘कल तुम्हारे बाबू बहुत चिल्ला रहे थे, क्या अम्मा ने रोटी नहीं बनाईर् थी?’

वह इस नाटकीय जीवन से छुटकारा चाहती थी. उस ने नौकरी के साथसाथ बीए की प्राइवेट परीक्षा पास कर ली थी.

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जब वह बीए पास हो गई तो उस की तरक्की हो गई. आंखों ही आंखों में वहां काम करने वाले महेंद्र से उस की दोस्ती हो गई. वह अम्मा से छिपा कर उस के लिए टिफिन में रोटी ले आती. दोनों साथसाथ चाय पीते, लंच भी साथ खाते. कारखाने के सुपरवाइजर दिलीप ने बहुत हाथपैर पटके कि तुम्हें निकलवा दूंगा, यहां काम करने आती हो या इश्क फरमाने. लेकिन, जब आपस में मन मिल जाए तो फिर क्या?

‘महेंद्र एक बात सम?ा लो, तुम से दोस्ती जरूर की है लेकिन मु?ा से दूरी बना कर रहना. मु?ा पर अपना हक मत सम?ाना, नहीं तो एक पल में मेरीतेरी दोस्ती टूट जाएगी.’

‘देख सोमा, तेरी साफगोई ही तो मु?ो बहुत पसंद है. जरा देर नहीं लगी और सूरज को हमेशा के लिए छोड़ कर आ गई.’

इस तरह आपस में बातें करतेकरते दोनों अपने दुख बांटने लगे.

‘महेंद्र, तुम शादी क्यों नहीं कर लेते?’

‘जब से लक्ष्मी मु?ो छोड़ कर चली गई, मेरी बदनामी हो गई. मेरे जैसे आदमी को भला कौन अपनी लड़की देगा.’

‘वह छोड़ कर क्यों चली गई?’

‘उस का शादी से पहले किसी के साथ चक्कर था. अपनी अम्मा की जबरदस्ती के चलते उस ने मु?ा से शादी तो कर ली लेकिन महीनेभर में ही सबकुछ लेदे कर भाग गई. उस का अपना अतीत उस की आंखों के सामने घूम गया था.

अब महेंद्र के प्रति उस का लगाव अधिक हो गया था.

एक दिन उस को बुखार था, इसलिए वह काम पर नहीं गई थी. वह घर में अकेली थी. तभी गंगाराम (बाबू के दोस्त) ने कुंडी खटखटाई, ‘एक कटोरी चीनी दे दो बिटिया.’

वह चीनी लेने के लिए पीछे मुड़ी ही थी कि उस ने उस को अपनी बांहों में जकड़ लिया था. लेकिन वह घबराई नहीं, बल्कि उस की बांहों में अपने दांत गड़ा दिए. वह बिलबिला पड़ा था. उस ने जोर की लात मारी और पकड़ ढीली पड़ते ही वह बाहर निकल कर चिल्लाने लगी. शोर सुनते ही लोग इकट्ठे होने लगे.

लेकिन उस बेशर्म गंगाराम ने जब कहा कि तेरे बाबू ने मु?ा से पैसे ले कर तु?ो मेरे हाथ बेच दिया है. अब तु?ो मेरे साथ चलना होगा.

‘थू है ऐसे बाप पर, हट जा यहां से, नहीं तो इतना मारूंगी कि तेरा नशा काफूर हो जाएगा,’ वह क्रोध में तमतमा कर बोली, ‘मैं आज से यहां नहीं रहूंगी.’

आसपास जमा भीड़ बाबू के नाम पर थूक रही थी. लड़ाई की खबर मिलते ही अम्मा भी भागती हुई आ गई थी. वह उसे सम?ाने की कोशिश करती रही लेकिन उस ने तो कसम खा ली थी कि वह इस कोठरी के अंदर पैर कभी नहीं रखेगी.

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उसी समय महेंद्र उस का हालचाल पूछने आ गया था. सारी बातें सुन कर बोला, ‘तुम मेरी कोठरी में रहने लगो, मैं अपने दोस्त के साथ रहने लगूंगा.’

अम्मा की गालियों की बौछार के साथसाथ रोनाचिल्लाना, इन सब के बीच वह उस नर्क को छोड़ कर महेंद्र की कोठरी में आ कर रहने लगी थी. अम्मा ने चीखचीख कर उस दिन उस से रिश्ता तोड़ लिया था.

महेंद्र के साथ जाता देख अम्मा उग्र हो कर बोल रही थी, ‘जा रह, उस के साथ, देखना महीनापंद्रह दिन में तु?ा से मन भर जाएगा. बस, तु?ो घर से बाहर कर देगा.’

महेंद्र को सोमा काफी दिनों से जानती थी. उस ने उस की आंखों में अपने लिए सच्चा प्यार देखा था. उस की निगाहों में, बातों में वासना की ?ालक नहीं थी.

कारखाने में वह अब सुपरवाइजर बन गई थी. उस के मालिक उस के काम से बहुत खुश थे.

ममता- भाग 3: क्या माधुरी को सासुमां का प्यार मिला

‘मैं अपनी पूरी जिंदगी घर में निठल्ले बैठे नहीं गुजार सकती. वैसे ही अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा इस परिवार को भेंट कर ही चुकी हूं, लेकिन अब और नहीं कर सकती,’ आक्रोश में सास ने उत्तर दिया था.

‘मम्मीजी, घर में भी दूसरे सैकड़ों जरूरी काम हैं, यदि किए जाएं तो,’ कहना चाह कर भी माधुरी कह नहीं सकी थी. व्यर्थ ही उन का गुस्सा बढ़ जाता और हासिल कुछ भी न होता. हो सकता है वे अपनी जगह ठीक हों वरना कौन पढ़ीलिखी औरत फालतू के कामों में अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहेगी.

मम्मीजी का निर्णय अपना है. पर वह उस सचाई को कैसे भूल सकती है जिस के पीछे उस का भोगा हुआ अतीत छिपा है, तनहाइयां छिपी हैं, रुदन छिपा है, जिस को देखने का, पहचानने का उस के पालकों के पास समय ही नहीं था. उस समय उसे लगता था कि ऐसे दंपती संतान को जन्म ही क्यों देते हैं, जब उन के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है. वह बेचारा उन की प्यारभरी निगाह के लिए जीवनभर तड़पता ही रह जाता है लेकिन वह निगाह उसे नसीब नहीं होती. आज इंसान पैसों के पीछे भाग रहा है, लेकिन पैसों से मन की शांति, प्यार तो नहीं खरीदा जा सकता.

एक बच्चे को जब मां की कोख की गरमी चाहिए तब उसे बोतल और पालना मिलता है, जब वह मां का हाथ पकड़ कर चलना चाहता है, अपनी तोतली आवाज में दुनियाभर के प्रश्न पूछ कर अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहता है, तब उसे आया के हाथों में सौंप दिया जाता है या महानगरों में खुले के्रचों में, जहां उस का बचपन, उस की भावनाएं, उमंगें कुचल कर रह जाती हैं. वह एकाकीपन से इतना घबरा उठता है कि अकेले रहने मात्र से सिहर उठता है.

उसे याद है कि वह 15 वर्ष तक अंगूठा पीती रही थी, अंगूठा चूसना उसे न केवल मानसिक तृप्ति देता था वरन आसपास किसी के रहने का एहसास भी कराता था. अचानक किसी को सामने पा कर चौंक उठना तथा ठीक से बातें न कर पाना भी उस की कमजोरी बन गई थी. इस कमजोरी के लिए भी सदा उसे ही दोषी ठहराया जाता रहा था.

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जब सब बच्चे स्कूल में छुट्टी होने पर खुश होते थे तब माधुरी चाहती थी कि कभी छुट्टी हो ही न, क्योंकि छुट्टी में वह और अकेली पड़ जाती थी. मातापिता के काम पर जाने के बाद घर खाने को दौड़ता था. घर में सुखसुविधा का ढेरों सामान मौजूद रहने के बावजूद उस का बचपन सिसकता ही रह गया था. वह नहीं चाहती थी कि उस की संतानें भी उसी की तरह घुटघुट कर जीते हुए किसी अनहोनी का शिकार हों या मानसिक रोगी बन जाएं.

बाद में पल्लव से ही पता चला था कि प्रारंभ में तो मम्मी पूरी तरह घरेलू ही थीं किंतु पापा के व्यापार में निरंतर मिलती सफलता के कारण वे अकेली होती गईं तथा समय गुजारने के लिए उन्होंने समाज सेवा प्रारंभ की. बढ़ती व्यस्तता के कारण घर को नौकरों पर छोड़ा जाने लगा और अब उन्होंने उस क्षेत्र में ऐसी जगह बना ली है कि जहां से लौटना उन के लिए न तो संभव है और शायद न ही उचित.

‘‘बेटी, नाश्ता कर ले,’’ मम्मी का स्नेहिल स्वर उसे चौंका गया और वह अतीत की यादों से निकल कर वर्तमान में आ गई.

‘‘न जाने तुम ने मम्मी पर क्या जादू कर दिया है कि सबकुछ छोड़ कर तुम्हारी तीमारदारी में लगी हैं,’’ मम्मीजी को आवश्यकता से अधिक उस की देखभाल करते देख पल्लव ने उसे चिढ़ाते हुए कहा था.

‘‘क्यों नहीं करूंगी उस की देखभाल? तू तो सिर्फ मेरा बेटा ही है किंतु यह तो बहू होने के साथसाथ मेरी बेटी भी है तथा मेरे होने वाले पाते की मां भी है,’’ मम्मीजी, जो पास में खड़े बेटे की बात सुन रही थीं, ने अपनी चिरपरिचित मुसकान के साथ कहा था.

मम्मीजी जहां पहले एक दिन घर में रुकने के नाम पर भड़क जाती थीं, वहीं वह सप्ताहभर से अपने सारे कार्यक्रम छोड़ कर उस की देखभाल में लगी हैं. आज माधुरी को खुद पर ग्लानि हो रही थी. उस के मन में उन के लिए कितने कलुषित विचार थे. वास्तव में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि स्त्री पहले मां है बाद में पत्नी या अन्य रूपों को जीती है. मां रूपी प्रेम का स्रोत कभी समाप्त नहीं होता. ममता कभी नहीं मरती.

मम्मीजी उन स्त्रियों में से नहीं थीं जो घरपरिवार के लिए अपना पूर्ण जीवन समर्पित करना अपना ध्येय समझती हैं, वे उन से कहीं परे थीं, अलग थीं. अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने समाज में अपनी एक खास पहचान बनाई थी.

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अब उस की यह धारणा धूमिल होती जा रही थी कि समाज सेवा में लिप्त औरतें घर से बाहर रहने के लिए ही इस क्षेत्र में जाती हैं. कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं.

उसे लग रहा था कि बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद यदि संभव हो सका तो वह भी देश के गरीब और पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए अपना योगदान अवश्य देगी. फिलहाल तो उसे अपनी कोख में पलने वाले बच्चे की ओर ध्यान देना है, जो उस की जरा सी असावधानी से मरतेरते बचा है. सोचतेसोचते उस ने करवट बदली और उसी के साथ ही उसे महसूस हुआ मानो वह कह रहा है, ‘ममा, जरा संभल कर, कहीं मुझे फिर से चोट न लग जाए.’

‘नहीं बेटा, अब तुझे कुछ नहीं होगा. मैं हूं न तेरी देखभाल के लिए,’ माधुरी ने दोनों हाथों से बढ़े पेट को ऐसे थाम लिया मानो वह गिरते हुए अपने कलेजे के टुकड़े को पकड़ रही है. उस के चेहरे पर मातृत्व की गरिमा, अजन्मे के लिए अनोखा, अटूट प्रेम दिखाई दे रहा था.  द्य

मां अत्यंत ही महत्त्वाकांक्षी थीं. यही कारण था कि दादी के बारबार यह कहने पर कि वंश चलाने के लिए बेटा होना ही चाहिए, उन्होंने ध्यान नहीं दिया था. उन का कहना था कि आज के युग में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं रह गया है.

दूसरा विवाह- भाग 2: क्या सोनाक्षी से विशाल प्यार करता था?

अकसर औरतों को कपड़ेगहनों का शौक होता है. अलमारी अटी पड़ी होती है कपड़ों से उन की, लेकिन लीना की अलमारी किताबों से अटी पड़ी है. एक भूख है उसे पढ़ने की. एक दिन भी न पढे़, तो खालीखाली सा लगता है उसे, और विशाल के साथ भी ऐसा ही है. कितना भी बिजी क्यों न हो अपनी लाइफ में, रोज थोड़ाबहुत पढ़ना नहीं भूलता वह. रहा ही नहीं जाता बिना पढ़े उसे. जिंदगी सार्थक लगती है उसे पढ़ने से, वरना तो इंसान के जीवन में भागमभाग लगी ही रहती है.

लेकिन लीना दोनों के बीच कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहती थी. इसलिए ‘घर में बहुत काम है,’ का बहाना कर जाने से मना कर दिया. लेकिन विशाल तो जिद पर अड़ गया कि उसे भी उन के साथ बुकफेयर चलना ही पड़ेगा. हार कर लीना को उन के साथ जाना पड़ा.

बुकफेयर में जहां लीना और विशाल किताबें देखने में व्यस्त थे, वहीं सोनाक्षी बस आतेजाते लोगों को निहारने और मोबाइल में व्यस्त दिख रही थी. उस के चेहरे से लग रहा था उसे यहां आ कर जरा भी अच्छा नहीं लगा. वह तो कहीं घूमने या फिल्म देखने की सोच रही थी, मगर विशाल उसे यहां खींच लाया.  इशारों से कहा भी उस ने कि चलो अब यहां से, बोर हो रही हूं, तो विशाल ने भी इशारों से कहा कि ‘अभी रुकेगा वह यहां, चाहे तो वह जा सकती है घर.

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क्या करती वह, एक तरफ बैठ गई और अपना मोबाइल चलाने लगी. गुस्सा भी आ रहा था उसे कि यहां आई ही क्यों? घर में ही रहती इस से अच्छा. भले ही सोनाक्षी और विशाल एकदूसरे को 2 सालों से जानते थे, पर उन की एक भी आदत ऐसी नहीं थी जो आपस में मेल खाती हो. इसलिए अकसर दोनों में अपनेअपने मत को ले कर टकराव होता. और फिर हारने को दोनों में से कोई तैयार नहीं होता.

वहीं, विशाल को लीना का साथ इसलिए भी अच्छा लगता था क्योंकि दोनों की बहुत सी आदतें मिलतीजुलती थीं. बातविचारों में भी वह बहुत शालीन थी. उस से बातें कर विशाल को मानसिक स्फूर्ति मिलती थी. जिस तरह से वह बोलती थी न, लगता जैसे उस की बातों से शहद टपक रहा हो. उस के रूप, रस और गंध में विशाल ऐसे खो जाता कि उसे कुछ होश ही नहीं रहता था. जब सोनाक्षी टोकती, उसे तब होश आता कि कहां है वह और किसी सोच मे डूबा था.

लीना को भी विशाल से बातें करना अच्छा लगता था. पता नहीं क्यों, पर उसे देखते ही लीना के चेहरे पर मुसकान तैर जाती. उन की दोस्ती तो किताबों से शुरू हुई थी. अकसर दोनों एकदूसरे को अपनीअपनी किताबें लेतेदेते रहते थे. पढ़ना दोनों को बहुत अच्छा लगता था. लेकिन वहीं सोनाक्षी किताबों से कोसों दूर भागती. जब विशाल कहता कि किताबें पढ़ कर देखो कभी, ज्ञान का खजाना छिपा है उन में. तब मुंह बनाती सोनाक्षी कहती कि नहीं, उसे इन किताबोंउताबों में कोई दिलचस्पी नहीं है.  उसे तो, बस, विशाल में दिलचस्पी है. और उस की बात पर विशाल मुसकरा पड़ता था.

सोनाक्षी का किताबों से दूरदूर तक कोई नातारिश्ता नहीं था. आश्चर्य होता उसे कि कैसे कोई इतनी मोटीमोटी किताबें हफ्तेदस  दिन में खत्म कर सकता है? वह तो सालों तक भी एक किताब खत्म नहीं कर पाएगी.

उसे तो फिल्में देखना, घूमना, होटलों में भोजन करना पसंद है. जिंदगी में मौजमस्ती होती रहे, बस, और कुछ नहीं चाहिए उसे. इसलिए तो कभीकभी विशाल के साथ भी वह बोर होने लगती थी क्योंकि उस के साथ होते हुए भी वह किताबों में खोया रहता था. गुस्से में कह भी देती, ‘किताबों से ही क्यों नहीं बातें करते? उसे ही अपना दोस्त बना लो न.’ तो हंसते हुए विशाल कहता कि वह तो अभी कुछ साल पहले उस की दोस्त बनी है. लेकिन ये किताबें तो बचपन से उस की साथी हैं, जो आजीवन उस की दोस्त रहेंगी.’

लेकिन, अब एक और दोस्त मिल गई है उसे लीना के रूप में. बिलकुल उस की तरह ही सोच रखने वाली. जब भी दोनों बातें करने लगते, सोनाक्षी तुनक कर वहां से उठ कर चल देती और कहती कि उन की बातों का मुद्दा सिर्फ किताबें और पढ़ाई ही क्यों होता है, कुछ और क्यों नहीं होता? और उस की बात पर दोनों हंस पड़ते.

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‘‘हंसो मत यार, सही कह रही हूं. और कोई बात नहीं सू झती क्या तुम दोनों को? जब देखो किताबें, देशदुनिया और राजनीति पर बातें करते रहते हो. अरे भई, कुछ इंट्रैस्ंिटग बातें भी कर लिया करो कभी. मैं तो स्कूलकालेज की ही किताबें पढ़पढ़ कर इतनी ऊब चुकी थी कि सोचती कब पीछा छूटे इन से और मैं चैन की सांस लूं,’’ हंसती हुई सोनाक्षी अपने बचपन की बातें याद कर कहती, ‘‘तुम्हें पता है विशाल, बचपन में मेरा स्कूल से भागने का रिकौर्ड था.

‘‘घर से मेरा स्कूल कुछ दूरी पर ही था. पापा मु झे स्कूल छोड़ कर जैसे ही जाते, मैं पीछेपीछे घर पहुंच जाती. यह रोज का किस्सा बन गया था. परेशान थे मांपापा मु झे ले कर. डर लगता उन्हें कि कहीं रास्ते में कोई गाड़ी ठोकर न मार दे मु झे या कोई उठा कर ही ले भागा, तो फिर क्या करेंगे वे. और स्कूल से भागना क्या अच्छी बात है? इसलिए एक बार पापा ने टीचर को ही डांट पिला दी कि बच्चा उन के स्कूल से भाग जाता है, क्या उन्हें पता नहीं चलता? अगर बच्चे को कुछ हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा फिर?

‘‘फिर क्या था, टीचर ने उस रोज मु झे रस्सी से बांध दिया ताकि मैं स्कूल से भाग न सकूं. लेकिन मैं ने रोनाचिल्लाना इतना मचाया कि उन्हें मु झे खोलना ही पड़ा. लेकिन प्रिंसिपल ने भी कह दिया कि स्कूल में अब मेरे लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे बच्चे को वह अपने स्कूल में नहीं पढ़ा सकते. बहुत खुश थी मैं कि स्कूल और किताबों से मेरा पाला छूटा. लेकिन पापा ने जो मार मारी न उस रोज, आह, आज भी कांप उठती हूं याद कर के.

‘‘उस दिन के बाद से मैं स्कूल से कभी नहीं भागी, लेकिन किताबों के प्रति मेरी नफरत बरकरार रही. वह तो पापा के डर के कारण इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनी पड़ी, वरना तो पढ़ाई मु झे सजा से कोई कम नहीं लगती है आज भी,’’ सोनाक्षी बोली.

‘‘कैसी बातें कहती हो तुम सोनाक्षी?’’ पढ़ना क्या सजा होता है? अरे, किताबों में तो ज्ञान का भंडार छिपा है. मैं तो किताब पढ़ने के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सकता. सोने से पहले रोज जब तक थोड़ा पढ़ न लूं, नींद नहीं आती’’ विशाल की बात पर लीना ने भी सहमति जताई और कहा कि उसे भी बिना पढे़ नींद नहीं आती. काम से फुरसत मिलते ही वह किताब ले कर बैठ जाती है. मजा आता है उसे पढ़ने में.

ए क सुर में दोनों को बोलते देख सोनाक्षी हंस पड़ी और एक लंबी

सांस छोड़ती हुई बोली, ‘‘हूं, मु झे लगता है तुम दोनों की जोड़ी खूब जमेगी, क्योंकि एकजैसे जो हो तुम दोनों.’’

उस की बातों पर दोनों एकदूसरे को देखने लगे और आंखों ही आंखों में जो बातें हुईं, ये तो उन्हें ही पता था. कहते हैं, आंखें दिल के  झरोखे सी होती हैं.  झरोखे बंद भी हो सकते हैं, पर होंठों की कोर एक ऐसा सूचक है जो कभी चुकता नहीं.

विशाल अपलक अब भी लीना को वैसे ही निहार रहा था. कुछ क्षणों की वह तंद्रा लीना को मानो उस कमरे से दूर अलग कहीं ले गई थी जहां होंठों के कोरों का कसाव, बिना तनिक कांपे भी, जैसे अनजाने कुछ नरम पड़ गया था. मुंह के आसपास की असंख्य शिराओं का अदृश्य तनाव कुछ ढीला हो गया था और जीवन का अदम्य लचीलापन जैसे फिर उभर कर एक स्निग्ध लहर बन गया था. ऐसा पहले भी कई बार हुआ जब किताबें लेतेदेते दोनों का हाथ आपस में स्पर्श कर जाता तो उन की आंखें बातें करने लगती थीं.

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सोनाक्षी ने उसे  झक झोरा तो पाया कि वह कहीं खो गया था. लेकिन लक्ष्य किया उस ने कि उस के चेहरे के हावभाव को कोई पढ़ नहीं पाया. नास्तिकों की भीड़ में जैसे कोई भक्त अनदेखे क्षणभर आंख बंद कर अपने आराध्य का ध्यान कर लेता है, वैसे ही विशाल कहीं पर भी हो या किसी के साथ हो, अपनी लीना को मन की आंखों से देख ही लेता था.

लेकिन फिर भी लीना विशाल को सिर्फ एक अच्छा दोस्त सम झती थी. उस के दिल में कुछ भी नहीं था उसे ले कर. वह तो आज भी अपने दिल में सूरज को बसाए हुए थी, जो अब इस दुनिया में नहीं है. 4 वर्षों पहले लीना और सूरज विवाह बंधन में बंधे थे. हंसतेमुसकराते शादी के 2 साल कैसे गुजर गए, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन सूरज की मौत की खबर ने लीना को तोड़ कर रख दिया. एक तसल्ली थी कि उस का सूरज देश के लिए शहीद हुआ है. गर्व था उसे अपने पति पर.

सूरज फौज में था. अपनी बेटी को विधवा के रूप में देख कर लीना की मां ने तो खटिया ही पकड़ ली और उस के पापा गुमसुम से हो गए. लेकिन वे चाहते थे कि उन के जीतेजी बेटी का घर फिर से बस जाए क्योंकि जिंदगी इतनी छोटी भी नहीं होती कि बगैर किसी सहारे के जिया जा सके और वे कब तक बेटी के साथ रह पाएंगे. आज न कल, वे भी अपनी आंखें मूंद ही लेंगे, फिर क्या होगा लीना का?

सूरज के मांपापा भी बहू को बंधन में बांध कर नहीं रखना चाहते थे और अब जब बेटा ही नहीं रहा उन का, फिर बहू को वे किस अधिकार से अपने पास रख सकते थे? लेकिन लीना दूसरे विवाह को हरगिज तैयार न थी क्योंकि सूरज अब भी उस का प्यार था, उस का पति था. लीना वह स्थान किसी और को नहीं देना चाहती थी. उस के लिए तो अब यही घर उस का अपना घर था और सूरज के मांपापा उस की जिम्मेदारी.

याद है उसे, जब भी सूरज का खत या फोन आता, एक बात तो वह जरूरत कहता था, ‘लीना, मेरे मांपापा अब तुम्हारी जिम्मेदारी हैं, उन का ध्यान रखना’ और लीना कहती, ‘हां, वह इस जिम्मेदारी को अच्छे से निभाएगी, चिंता न करें.’ ऐसे में कैसे वह अपने वचन से पलट सकती थी? इसलिए उस ने कभी फिर दूसरा विवाह न करने का फैसला कर लिया.

सूरज के जाने के बाद वह बखूबी  अपनी जिम्मेदारी निभा रही है.  लेकिन सूरज की कमी उसे खलती रहती है. इसलिए तो उस ने अपनेआप को किताबों में  झोंक दिया था. वैसे, सूरज के मांपापा भी यही चाहते थे कि लीना दूसरा विवाह कर ले अब. कई बार कहा भी उन्होंने. कई रिश्ते भी आए.  पर लीना का एक ही जवाब था कि वह दूसरा विवाह नहीं करेगी.

उस दिन सोनाक्षी को अच्छे से तैयार होते देख लीना कहने लगी, ‘‘कब तक यों ही सजसंवर कर विशाल को रि झाती रहोगी ननद रानी? क्यों नहीं कह देतीं उस से अपने मन की बात? एकदूसरे को अच्छी तरह सम झने लगे हो तुम दोनों, तो अब क्या सोचविचार करना? कहीं ऐसा न हो, मांपापा तुम्हारी शादी कहीं और तय कर दें और फिर तुम कुछ न कर पाओ.’’

भाभी की बात सोनाक्षी को भी सही लगी कि अगर विशाल आगे नहीं बढ़ रहा है, तो क्यों नहीं वही आगे बढ़ कर अपने प्यार का इजहार कर देती है. लेकिन कैसे वह अपने प्यार का इजहार करे, सम झ नहीं आ रहा था.

‘‘अब इस में सोचनासम झना क्या है सोनू? देखो, अगले हफ्ते ही विशाल का जन्मदिन है, तो इस से अच्छा मौका और क्या होगा.’’ लीना की यह बात सोनाक्षी को जंच गई और मन ही मन उस ने इजहारे प्यार का फैसला कर लिया. सोच लिया उस ने कि कैसे वह विशाल के सामने अपने प्यार कर इजहार करेगी.

सोनाक्षी ने तो पहली ही नजर में विशाल को अपना दिल दे दिया था. लेकिन विशाल ने आज तक नहीं जताया उसे कि वह उस से प्यार करता है. लेकिन उस की बातों, हावभाव और सोनाक्षी को ले कर उस की बेचैनी को देख, उसे यही लगता है कि वह भी उस से प्यार करता है. वैसे भी, जरूरी तो नहीं कि हर बात कह कर ही जताई जाए. मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि मु झ से मिले बिना वह एक दिन भी नहीं रह पाता है. तभी तो कोई न कोई बहाना बना कर सीधे मेरे घर आ पहुंचता है. अपने मन में यह सोच सोनाक्षी मुसकरा पड़ी थी.

सोनाक्षी को यह नहीं पता कि विशाल उस से नहीं, बल्कि उस की विधवा भाभी लीना से प्यार करता है और उस की खातिर ही वह उस के घर बहाने बना कर आता रहता है. यह कब, कैसे और कहां हुआ. नहीं पता उसे. लेकिन जैसेजैसे उस ने लीना को जाना, उस के प्रति वह आकर्षित होता चला गया. इसलिए सोनाक्षी से मिलने के बहाने ही वह उस के घर चला आता था. भले ही वह सोनाक्षी से बातें करता था पर उस का दिल और दिमाग तो लीना के पास ही होता था.

लॉकडाउन: आखिर अर्जुन की बुआ अपनी बनावटी बातों से क्यों दिल दुखाती थी

‘‘दिनेश, तुम बिलकुल चिंता मत करो, अर्जुन मेरा भी तो बेटा है. पिंकी, बबलू तो उस के पीछे ही लगे रहते हैं. घर में ही तो रह रहा है. यह मत सोचो कि लौकडाउन में उस का यहां रहना मेरे लिए कोई परेशानी की बात होगी. मेरे लिए तो जैसे पिंकी, बबलू हैं वैसा अर्जुन. उस से बात करवाऊं?’’

किचन में बरतन धोते हुए अर्जुन के कानों में बुआ अंजू के शब्द पड़े तो उस का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. अब बुआ पापा से बात कराने के लिए उसे फोन न दे दें. नहीं करनी है उसे अपने पापा से बात.

पर बुआ ने फोन होल्ड पर रखा था. उसे पकड़ाते हुए बोलीं, ‘‘लो बेटा, अपने पापा से बात कर लो. उस के बाद थोड़ा आराम कर लेना.’’

अर्जुन समझ गया कि यह सब पापा को सुनाने के लिए कहा गया है. उस ने हाथ पोंछ कर फोन बहुत बेदिली से पकड़ा. पापा उस का हालचाल ले रहे थे, उस ने बस हांहूं में जवाब दे कर फोन रख दिया. वह बरतन धो कर चुपचाप बालकनी में रखी कुरसी पर बैठ गया.

आज मुंबई में लौकडाउन की वजह से फंसे हुए उसे 2 महीने हो रहे थे. वह यहां वाशी में होस्टल में रह कर इंजीनियरिंग के बाद एक कोर्स कर रहा था. अचानक कोरोना के प्रकोप के चलते होस्टल बंद हो गया और सारे स्टूडैंट्स अपनेअपने घर जाने लगे.

वह सहारनपुर से आया हुआ था. उस ने अपने पिता दिनेश को कहा कि वह भी घर आ रहा है. ट्रेन या कोई भी फ्लाइट मिलने पर वह फौरन आना चाहता है.

दिनेश ने कहा, ‘नहींनहीं… आने की कोई जरूरत नहीं है. यह तो कुछ दिनों की ही बात है. क्यों आओगे फिर जाओगे? वहीं अंजू बुआ के यहां चले जाओ.’

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उस ने कहा था, ‘नहीं पापा, कुछ दिनों की बात नहीं है, मेरे सभी साथी फ्लाइट पकड़ कर घर चले गए हैं. मैं भी मुंबई से फौरन निकलना चाहता हूं.’

‘नहीं, बुआ के पास चले जाओ. क्यों आनेजाने में फालतू खर्च करना. वह भी तो अपना घर है.’

उस ने अपनी मम्मी रीना से बात की, ‘मम्मी, पापा मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे? लौकडाउन लंबा चलेगा. यह 2 दिनों की बात नहीं है, मुझे घर आना है.’

‘हां, बेटा, मैं भी यही चाहती हूं कि तुम अपने घर ही आ जाओ. ऐसे समय मेरी आंखों के आगे रहो. पर तुम्हारे पापा बिलकुल सुन ही नहीं रहे.’

‘और आप भी जानती हैं बुआ को. बस मीठी बोली बोल कर सामने वाले को बेवकूफ बनाती हैं. जब भी उन से मिलने गया, इतना दिखावटी है उन के यहां सब. मुझे नहीं रहना उन के यहां. मम्मी, कुछ करो न.’

जिद्दी पति के सामने रीना की एक न चली. सब बंद होता गया और अर्जुन को अंजू के घर ही आना पड़ा. बात 1-2 दिनों की थी नहीं. यह किसी को भी नहीं पता था कि कब हालात सामान्य होंगे.

अंजू, उस के पति विनय और दोनों बच्चों ने उस का स्वागत दिल खोल कर किया. अर्जुन स्वभाव से सरल था इसलिए शांत सा रहता. कुछ दिन तो उसे कोई दिक्कत नहीं हुई, पर जब अंजू की कामवाली भी छुट्टी पर चली गई तो अब घर के कामधाम कौन संभाले, इस का बंटवारा होने लगा.

अंजू ने पूछा, ‘पहले यह बताओ कि बरतन कौन धोएगा?’

20 साल की पिंकी ने कहा, ‘मैं तो बिलकुल भी नहीं. मेरे हाथ खराब हो जाएंगे.’

15 साल के बबलू ने कहा, ‘मेरी तो औनलाइन क्लासेज हो सकती हैं और आप के सिंक भरभर के बरतन धोने में तो आप की कामवाली ही रो देती है. सौरी मम्मी, यह तो अपने बस का नहीं.’

विनय ने सफाई दी, ‘बरतन धोने में तो मेरी कमर भी चली जाएगी.’

अंजू ने सब को घूरते हुए कहा, ‘तुम सब रहने दो, बस बहाने बना रहे हो. मैं तुम लोगों से कहूंगी ही नहीं. मेरा अर्जुन धो लेगा. यही मेरा बेटा है. क्यों अर्जुन?’

अर्जुन ने इतना ही कहा, ‘ठीक है बुआ, धो लूंगा.’

अंजू ने फिर पूछा, ‘कुकिंग में हैल्प कौन करेगा?’

सब चुप रहे. तब अंजू ने कहा, ‘मुझे तो तुम लोगों से उम्मीद ही नहीं. तुम लोगों पर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है. ठीक है, मैं देख लूंगी. पिंकी तुम्हें साफसफाई करनी पड़ेगी और बबलू, सूखे कपड़े तुम ही तह करोगे. मेरा अर्जुन मेरी हैल्प करेगा. बस, मुझे तुम लोगों को कुछ कहना ही नहीं.’

लौकडाउन बढ़ता जा रहा था और इस के साथ ही अर्जुन मन ही मन टूटता भी जा रहा था. बुआ कहने को तो बहुत प्यार से पेश आतीं, पर वह उन की चालाकियों को समझ रहा था. पिंकी, बबलू उस के आगेपीछे घूमते. विनय उस के साथ बातें करते रहते. देखने में सब सामान्य लगता पर अर्जुन भी कोई बच्चा तो था नहीं, बुआ की मीठीमीठी बातों का मतलब इतने लंबे समय में अच्छी तरह समझ चुका था. उसे अपने पापा के लिए मन में बहुत नाराजगी थी. बेटे के आगे पिता ने पैसे को ज्यादा महत्त्व दिया था, बजाय इस के कि वह घर पहुंच जाए. उन्हें अपनी इस बहन का स्वभाव भी अच्छी तरह पता था.

पिता आर्थिक रूप से समृद्ध थे. ऐसा नहीं कि उस का इस समय जाने का खर्च वे सहन न कर पाते, पर बेकार की उन की सनक के कारण आज वह बुआ का एक ऐसा नौकर बन कर रह गया है, जो उन के किसी भी काम को मना नहीं कर पाता है. अब तो न कहीं जा ही सकता है.

घर से निकले लगभग 2 महीने हो गए थे. बाहर से आया सामान वही सैनिटाइज करता है. कोई उस सामान को तभी हाथ लगाता है जब वह साफ कर देता है. उस की लाइफ की ही कोई वैल्यू नहीं है.

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बुआ का कहना है कि वही अच्छी तरह से सैनिटाइज करता है बाकी सब तो लापरवाह हैं. बुआ के उस से काम करवाने के स्टाइल पर अब अर्जुन को मन ही मन हंसी भी आ जाती है.

अर्जुन को अपनी मम्मी पर भी बहुत गुस्सा आता है कि क्यों उन्होंने अपने मन की बात पापा के सामने नहीं रखी? क्यों वे अपनी बात पापा से मनवा नहीं पातीं?

मम्मी जब भी उस से फोन पर बात करती हैं,  बुआ आसपास ही रहती हैं, फिर वह व्हाट्सऐप पर उन्हें अपनी हालत बताता है और फिर बाद में चैट डिलीट कर देता है, क्योंकि पिंकी, बबलू, कभी भी उस का फोन छेड़ते रहते हैं.

कभीकभी उसे लगता है कि पिंकी, बबलू को भी कहीं उस का फोन चैक करते रहने की ट्रेनिंग तो नहीं दे डाली बुआ ने?

उस ने एक बार मना भी किया था कि मेरा फोन मत छेड़ो, पर उस के इतना कहते ही बच्चों ने शोर मचा दिया था कि भैया ने डांटा. उसे फौरन बात संभालनी पड़ी थी.

अर्जुन अपने से 3 साल छोटी बहन अंजलि के टच में लगातार रहता. वह एक बार मुंबई घूमने आई थी. उसे बुआ के घर 4-5 दिन रहना पड़ा था. वापस घर लौट कर उस ने सब के सामने कान पकड़े थे. कहा था, ‘मैं तो कभी बुआ के घर नहीं जाऊंगी. मीठा बोल कर काम में ही जोत कर रखती हैं. क्या बताऊं, बैठने ही नहीं देतीं. ‘‘मेरी बेटी, मेरी बेटी’’ कह कर कितना काम करवा लिया. पापा, आप की बहन है या कोई मीठी छुरी?’

इस नाम पर वह खूब हंसा था. जब से अर्जुन यहां फंसा है अंजलि उस से बुआ के हाल मीठी छुरी कह कर ही लेती है. वह उसे सब बताता है.

अंजलि भी भाई के लिए दुखी है. कहां उसे आदत है घर के काम करने की? कामचोर नहीं है अर्जुन, पर इतना भी समझ रहा है कि पिता और बुआ के बीच पिस गया है वह. पिता से तो वह अब कोई बात ही नहीं कर रहा है.

कभी वह भी देर से उठता है और इस बीच दिनेश का फोन आ जाए तो बुआ उन से ऐसे बात करती हैं कि जैसे वह इतना आराम कर रहा है और वे यही चाहती हैं कि बस वह यों ही उन के घर रहे. वह तो बाद में उसे अंजलि से पता चलता है जब पापा बताते हैं कि ‘देखो, क्या ठाठ से रख रही है मेरी बहन उसे. आजकल के बच्चे तो यों ही उस के पीछे पड़े रहते हैं,’ और वह यह सुन कर कुढ़ कर रह जाता है.

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एक दिन तो उसे शरारत सूझी. उस ने बबलू से कहा, ‘‘मेरा वीडियो बनाओगे जब मैं बरतन धोऊंगा?’’

बबलू ने पूछा, ‘‘क्यों भैया?’’

‘‘अपने दोस्तों को दिखाऊंगा. वे भी भेजते हैं मुझे ऐसे वीडियो.’’

बबलू ने यह बात मम्मी यानी उस की बुआ को बता दी, और फिर वीडियो तो बनना ही नहीं था.

यह लौकडाउन उसे बहुत भारी पड़ा है. उसे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि उस के पिता ने उस की बात नहीं मानी. उस की जमा हुई फीस खतरे में थी, इसलिए पापा ने उसे न बुला कर अपने कुछ पैसे बचा लिए. क्यों वे किसी की बात नहीं सुनते? कितना दर्द दिया है उन्होंने उसे. शरीर से भी थक चुका है वह और मन से भी. पता नहीं कितने दिन और ऐसे… अर्जुन की आंखों से आंसू बह कर गालों तक आ गए, मगर उस ने झट से आंसू पोंछ लिए क्योंकि बुआ आवाज जो लगा रही थीं.

कोरोना लव- भाग 1: शादी के बाद अमन और रचना के रिश्ते में क्या बदलाव आया?

अमन घर में पैर रखने ही जा रहा था कि रचना चीख पड़ी, ‘‘बाहर…बाहर जूता खोलो. अभी मैं ने पूरे घर में झाड़ूपोंछा लगाया है और तुम हो कि जूता पहन कर अंदर घुसे आ रहे हो.’’

‘‘अरे, तो क्या हो गया? रोज तो आता हूं,’’ झल्लाते हुए अमन जूता बाहर ही खोल कर जैसे ही अंदर आने लगा रचना ने फिर उसे टोका, ‘‘नहीं, बैठना नहीं, जाओ पहले बाथरूम और अच्छे से हाथमुंहपैर सब धो कर आओ. और हां, अपना मोबाइल भी सैनिटाइज करना मत भूलना. वरना यहांवहां कहीं भी रख दोगे और फिर पूरे घर में इन्फैक्शन फैलाओगे.’’

रचना की बात पर अमन ने उसे घूर कर देखा. ‘क्या है, घूर तो ऐसे रहे हैं जैसे खा ही जाएंगे. एक तो इस कोरोना की वजह से बाई नहीं आ रही है. सोसाइटी वालों की तरफ से सख्त मनाही है और ऊपर से इन की नवाबी देखो. जैसे मैं इन के बाप की नौकर हूं. यह नहीं होता जरा कि काम में मेरी थोड़ी हैल्प कर दें. नहीं, उलटे काम को और बड़ा कर रख देते हैं. कहीं जूता खोल कर रख देंगे, कहीं भीगा तौलिया फेंक आएंगे. कितनी बार कहा, हाथ धो कर फ्रिज या किचन का कोई सामान छुआ करो. लेकिन नहीं, समझ ही नहीं आता इन्हें. बेवकूफ कहीं के,’ अपने मन में ही भुनभुनाई रचना.

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‘‘हूं, बड़ी आई साफसफाई पर  लैक्चर देने वाली. समझती क्या है अपनेआप को? जैसे इस घर की मालकिन यही हो. हां, करूंगा, जैसा मेरा मन होगा करूंगा,’’ अमन भन्नाता हुआ अपने कमरे में घुस गया और दरवाजा बंद कर लिया.

‘‘वैसे, गलती इन मर्दों की भी नहीं है. गलती है उन मांओं की जो बेटियों को तो सारी शिक्षा, संस्कार दे डालती हैं, पर अपने बेटों को कुछ नहीं सिखातीं, क्योंकि उन्हें तो कोई जरूरत ही नहीं है न सीखने की. बीवी तो मिल ही जाएगी बना कर खिलाने वाली,’’ अमन को भुनभुनाते देख वह चुप नहीं रह पाई और बोल दिया जो मन में आया.

बहुत गुस्सा आ रहा था उसे आज. कहा था अमन से, लौकडाउन की वजह से बाई कुछ दिन काम पर नहीं आएगी, तो वह उस की मदद कर दिया करे काम में, क्योंकि उसे और भी काम होते हैं. ऊपर से अभी औफिस का काम भी उसे घर से करना पड़ रहा है, तो समय नहीं मिल पाता है. लेकिन अमन ने ‘तुम्हारा काम है तुम जानो, मुझ से नहीं होगा’ कह कर बात वहीं खत्म कर दी. तो गुस्सा तो आएगा ही न? क्या वह अकेली रहती है इस घर में जो सारे कामों की जिम्मेदारी उस की ही है? आखिर वह भी तो नौकरी करती है बाहर जा कर. यह बात अमन क्यों नहीं समझता.

खाना खाते समय भी दोनों में घर के काम को ले कर बहस शुरू हो गई. रचना ने सिर्फ इतना कहा कि घर के कुछ सामान लाने थे. अगर वह ले आता तो अच्छा होता. वह गई थी दुकान राशन का सामान लाने, पर वहां बड़ी लंबी लाइन लगी थी इसलिए वापस चली आई.

‘‘तो वापस क्यों आ गईं? क्या जरा देर खड़ी रह कर सामान खरीद नहीं सकती थीं जो बारबार मुझे फोन कर के परेशान कर रही थीं? एक तो मुझे इस लौकडाउन में भी बैंक जाना पड़ रहा है, ऊपर से तुम चाहती हो कि मैं घर के कामों में भी तुम्हारी मदद कर दूं? नहीं हो सकता है,’’ चिढ़ते हुए अमन बोला.

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‘‘हां, पता है मुझे, तुम से तो कोई उम्मीद लगाना ही बेकार है. क्या करती मैं, धूप में खड़ीखड़ी पकती रहती? फोन इसलिए कर रही थी कि तुम औफिस से आते हुए घर के सामान लेते आना? लेकिन नहीं, तुम तो फोन भी नहीं उठा रहे थे मेरा. वैसे, एक बात बताओ, अभी तो बैंक में पब्लिक डीलिंग हो नहीं रही है, फिर करते क्या हो जो मेरा एक फोन नहीं उठा सकते या घर का कोई सामान खरीद कर नहीं ला सकते? बोलो न? घरबाहर के सारे कामों की जिम्मेदारी मेरी ही है क्या? तुम्हें कोई मतलब नहीं?’’

‘‘पब्लिक डीलिंग नहीं होती है तो क्या बैंक में काम नहीं होते हैं? और ज्यादा सवाल मत करो मुझ से. जो करना है, जैसे करना है, समझो खुद, समझी? खुद तो आराम से ‘वर्क फ्रौम होम’ कर रही हो. जब मरजी होती है, आराम कर लेती हो, दोस्तों से बातें कर लेती हो और दिखा रही हो कि कितना काम करती हो.’’

ये घर बहुत हसीन है- भाग 3: उस फोन कॉल ने आन्या के मन को क्यों अशांत कर दिया

लेखक- मधु शर्मा कटिहा

‘‘देखो वह सामने सीढ़ीदार खेत, पहाड़ों पर जगह कम होने के कारण बनाए जाते हैं ऐसे खेत… और दूर वहां रंगीन सा गलीचा दिख रहा है? फूलों की खेती होती है उधर.’’

कुछ देर बाद हलका कोहरा छाने लगा. आर्यन ने बताया कि ये सांवली घटाएं हैं जो अकसर शाम को आकाश के एक छोर से दूसरे तक कपड़े के थान सी तन जाती है. कभी बरसती हैं तो कभी सुबह सूरज के आते ही अपने को लपेट अगले दिन आने के लिए वापस चली जाती हैं.

सूरज ढलने के साथ अंधेरा होने लगा तो दोनों नीचे आ गए. घर सुंदर बल्बों और झूमरों से जगमग कर रहा था. वान्या का अंगअंग भी आर्यन के प्रेम की रोशनी से झिलमिला रहा था. सुबह वाली बात मन में अंधेरे में कहीं गुम सी हो गई थी.

प्रेमा के खाना बना कर जाने के बाद आर्यन वान्या को डायनिंग रूम के पास बने एक कमरे में ले गया. कमरे की अलमारी से महंगी क्रौकरी, चांदी के चम्मच, नाइफ और फोर्क आदि वान्या को बेहद आकर्षित कर रहे थे, लेकिन थकान से शरीर अधमरा हो रहा था. कमरे में बिछे गद्देदार सिल्वर ग्रे काउच पर वह गोलाकार मुलायम कुशन के सहारे कमर टिका कर बैठ गई. आर्यन ने कांच के 2 गिलास लिए और पास रखे रैफ्रीजरेटर से ऐप्पल जूस निकाल कर गिलासों में उड़ेल दिया. वान्या ने गिलास थामा तो पैंदे पर बाहर की ओर क्रिस्टल से बने गुलाबी कमल के फूल की सुंदरता में खो गई.

‘‘फूल तो ये हैं… कितने खूबसूरत,’’ कहते हुए आर्यन ने अपने ठंडे जूस में डूबे अधरों से वान्या के होंठों को छू लिया. वान्या मदहोश हो खिलखिला उठी.

‘‘जूस में भी नशा होता क्या? मैं अपने बस में कैसे रहूं?’’ वान्या के कान में फुसफुसाया.

‘‘नशा तो तुम्हारी आंखों में है.’’ कांपते लबों से इतना ही कह पाई वान्या और आंखें मूंद लीं.

सहसा आर्यन का फोन बज उठा. आर्यन सब भूल जूस का गिलास टेबल पर रख बच्चे से बातें करने लगा.

रात को अकेले बिस्तर पर लेटी हुई वान्या विचित्र मनोस्थिति से गुजर रही थी.

‘कभी लगता है आर्यन जैसा प्यार करने वाला न जाने कैसे मिल गया? लेकिन अगले ही पल स्वयं को छला हुआ महसूस करती हूं. सिर से पांव तक प्रेम में डूबा आर्यन एक फोन के आते ही सबकुछ बिसरा देता है? क्या है यह सब?’ आर्यन की पदचाप सुन वान्या आंखें मूंद कर सोने का अभिनय करते हुए चुपचाप लेटी रही. आर्यन ने लाइट औफ की और वान्या से लिपट कर सो गया.

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अगले दिन भी वान्या अनमनी सी थी. तबीयत भी ठीक नहीं लग रही थी उसे अपनी. सारा दिन बिस्तर पर लेटी रही. आर्यन बिजनैस का काम निबटाते हुए बीचबीच में हाल पूछता रहा. वान्या के घर से फोन आया. अपने मम्मीपापा को उस ने अपने विषय में कुछ नहीं बताया, लेकिन उन की स्नेह भरी आवाज सुन वह और भी बेचैन हो उठी.

रात को आर्यन खाने की 2 प्लेटें लगा कर उस के पास बैठ गया. टीवी औन किया तो पता लगा कि अगले दिन ‘जनता कर्फ्यू’ की घोषणा हो गई है.

‘‘अब क्या होगा? लगता है पापा का कहा सच होने वाला है. वे आज ही फोन पर कह रहे थे कि लौकडाउन कभी भी हो सकता है.’’ वान्या उसांस लेते हुए बोली.

आर्यन ने उस के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, ‘‘घबराओ मत तुम्हें कोई काम नहीं करना पड़ेगा. प्रेमा कहीं दूर थोड़ी ही रहती है कि लौकडाउन में आएगी नहीं. तुम क्यों उदास हो रही हो? लौकडाउन हो भी गया तो हम दोनों साथसाथ रहेंगे सारा दिन… मस्ती होगी हमारी तो.’’

वान्या को अब कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. पानी पी कर सोने चली गई. मन की उलझन बढ़ती ही जा रही थी. ‘पहले क्या मैं कम परेशान थी कि यह जनता कर्फ्यू, लौकडाउन हुआ तो अपने घर भी नहीं जा सकूंगी मैं. आर्यन से फोन के बारे में कुछ पूछूंगी और उस ने कह दिया कि हां, मेरी पहले भी शादी हो चुकी है. तुम्हें रहना है तो रहो, नहीं तो जाओ. जो जी में आए करो तो क्या करूंगी? यहां इतने बड़े घर में कैसी पराई सी हो गई हूं. आर्यन का प्रेम सच है या ढोंग? अजीब से सवाल बिजली से कौंध रहे थे वान्या के मनमस्तिष्क में.’

अपने आप में डूबी वान्या सोच रही थी कि इस विषय में कहीं से कुछ पता लगे तो उसे चैन मिल आए. ‘कल प्रेमा से सफाई करवाने के बहाने पूरे घर की छानबीन करूंगी, शायद कोई सुराग हाथ लग जाए,’ सोच उसे थोड़ा चैन मिला तो नींद आ गई.

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सजा- भाग 4: तरन्नुम ने असगर को क्यों सजा दी?

घंटी की आवाज सुनते ही हमउम्र जुड़वां 3 साल के नन्हे बच्चे, एक पमेरियन कुत्ता और नौकर चारों ही दरवाजे पर लपके. जाली के दरवाजे के अंदर से ही नौकर बोला, ‘‘आप कौन, कहां से तशरीफ ला रही हैं?’’

रीता ने कहा, ‘‘जा कर मालकिन से बोलो, बिन्नी दी ने भेजा है.’’

नौकर ने दरवाजा पूरा खोलते हुए कहा, ‘‘आइए, वे तो सुबह से आप का ही इंतजार कर रही हैं.’’

बैठक कक्ष सजाने वाले की नफासत की दाद दे रहा था जैसे हर चीज अपनी सही जगह पर थी. यहां तक कि खरगोश की तरह सफेद कुरतेपाजामे में उछलकूद मचाते बच्चे भी जैसे इस कमरे की सजावट का हिस्सा हों. उन्हें बैठे 5 मिनट ही बीते होंगे कि कमरे का परदा सरका, आने वाली को देख कर रीता झट से उठी, ‘‘हाय निकहत आपा, कितनी प्यारी दिख रही हैं आप इस फालसाई रंग में.’’

निकहत हंस दी, ‘‘आज ज्यादा ही सुंदर दिख रही हूं. गरज की मारी आ गई वरना तो बिन्नी के पास आ कर गुपचुप से चली जाती है, कभी भूले से भी यहां तशरीफ नहीं लाई.’’

‘‘क्यों बिन्नी के साथ ईद पर नहीं आई थी,’’ रीता ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘पर अभी तो ईद भी नहीं और नया साल भी नहीं. खैर इनायत है, गरज से ही सही, आई तो,’’ निकहत ने कहा, ‘‘और सुनाओ, कैसा चल रहा है तुम्हारा कामकाज.’’

‘‘वहां से आजकल छुट्टी ले रखी है. इन से मिलिए, ये हैं मेरी सहेली तरन्नुम, रामपुर से आई हैं. इन के शौहर यहां पर हैं. अपना मकान है लेकिन किराएदार खाली नहीं कर रहे हैं. शादी को 8-10 महीने होने को आए लेकिन अब तक मियां का साथ नहीं हो पाया. किराए पर ढंग का घर मिल नहीं रहा और होटल में रहते 5-7 दिन हो गए. बिन्नी दी से बात की तो उन्होंने आप के घर का ऊपरी हिस्सा खाली होने की बात कही. सुनते ही मैं तुरंत इन्हें खींचती आप के पास ले आई.’’

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‘‘रामपुर में किस के घर से हैं आप?’’ निकहत ने पूछा.

‘‘वहां बहुत बड़ी जमींदारी है मेरे अब्बू की. क्या आप भी वहीं से हैं?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो कभी वहां गई नहीं. पिछले साल मेरे शौहर गए थे अपने दोस्त की शादी में. मैं ने सोचा शायद आप उन्हें जानती होंगी.’’

‘‘किस के यहां गए थे? रामपुर में हमारे खानदानी घर ही ज्यादातर हैं.’’

‘‘अब नाम तो मुझे याद नहीं होगा, क्या लेंगी आप…चाय या ठंडा? वैसे अब थोड़ी देर में ही खाना लग रहा है. आप को हमारे साथ आज खाना जरूर खाना होगा. हमारे साहब तो दौरे पर गए हैं. बच्चों के साथ 5-6 दिन से खिचड़ी, दलिया खातेखाते मुंह का स्वाद ही खराब हो गया.

‘‘रीता को तो हैदराबादी बिरयानी पसंद है, साथ में मुर्गमुसल्लम भी. मैं जरा रसोई में खानेपीने का इंतजाम देख लूं. नौकर नया है वरना मुर्गे का भरता ही बना देगा. तब तक आप यह अलबम देखिए. रीता, अपनी पसंद का रेकार्ड लगा लो,’’ कहती हुई निकहत अंदर चली गई.

तरन्नुम ने अलबम खोला और उस की आंखें असगर से मिलतेजुलते एक आदमी पर अटक गईं. अगला पन्ना पलटा. निकहत के साथ असगर जैसा चेहरा. अलगअलग जगह, अलगअलग कपड़े. पर असगर से इतना कोई मिल सकता है वह सोच भी नहीं सकती थी. उस ने रीता को फोटो दिखा कर पूछा, ‘‘ये हजरत कौन हैं?’’

‘‘क्यों, आंखों में चुभ गया है क्या?’’ रीता हंस दी, ‘‘संभल के, यह तो निकहत दीदी के पति हैं. है न व्यक्तित्व जोरदार, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. असल में इन के मांबाप जल्दी ही गुजर गए. निकहत अपने मांबाप की इकलौती बेटी थी तिस पर लंबीचौड़ी जमीनजायदाद, बस, समझो लाटरी ही लग गई इन साहब की. नौकरी भी निकहत के अब्बू ने दिलवाई थी.’’

तरन्नुम को अब न गजल सुनाई दे रही थी और न ही कमरे में बच्चों की खिलखिलाती हंसी का शोर, वह एकदम जमी बर्फ सी सर्द हो गई. दिल की धड़कन का एहसास ही बताता था कि सांस चल रही है.

निकहत ने जब खाने के लिए बुलाया तब वह जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौट कर आई, ‘‘आप बेकार ही तकल्लुफ में पड़ गईं, हमें भूख नहीं थी,’’ उस ने कहा.

‘‘तो क्या हुआ, आज का खाना हमारी भूख के नाम पर ही खा लीजिए. हमें तो आप की सोहबत में ही भूख लग आई है.’’

रोशनी सा दमकता चेहरा, उजली धूप सी मुसकान, तरन्नुम ठगी सी देखती रही. फिर बोली, ‘‘आप के पति कितने खुशकिस्मत हैं, इतनी सुंदर बीवी, तिस पर इतना बढि़या खाना.’’

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‘‘अरे आप तो बेकार ही कसीदे पढ़ रही हैं. अब इतने बरसों के बाद तो बीवी एक आदत बन जाती है, जिस में कुछ समझनेबूझने को बाकी ही नहीं रहता. पढ़ी किताब सी उबाऊ वरना क्या इतनेइतने दिन मर्द दौरे पर रहते हैं? बस, उन की तरफ से घर और बच्चे संभाल रहे हैं यही बहुत है,’’ निकहत ने तश्तरी में खाना परोसते हुए कहा.

‘‘कहां काम करते हैं कुरैशी साहब?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘कटलर हैमर में, उन का दफ्तर कनाट प्लेस में है. असगर पहले इतना दौरे पर नहीं रहते थे जितना कि पिछले एक बरस से रह रहे हैं.’’

‘‘असगर,’’ तरन्नुम ने दोहराया.

‘‘हां, मेरे शौहर, आप ने बाहर तख्ती पर अ. कुरैशी देखा था. अ. से असगर ही है. हमारे बच्चे हंसते हैं, अब्बू, ‘अ’ से अनार नहीं हम अपनी अध्यापिका को बताएंगे ‘अ’ से असगर,’’ फिर प्यार से बच्चे के सिर पर धौल लगाती बोली, ‘‘मुसकराओ मत, झटपट खाना खत्म करो फिर टीवी देखेंगे.’’

‘‘अरे, तरन्नुम तुम कुछ उठा नहीं रहीं,’’ रीता ने तरन्नुम को हिलाया.

‘‘हूं, खा तो रही हूं.’’

‘‘क्यों, खाना पसंद नहीं आया?’’ निकहत ने कहा, ‘‘सच तरन्नुम, मैं भी बहुत भुलक्कड़ हूं. बस, अपनी कहने की रौ में मुझे दूसरे का ध्यान ही नहीं रहता. खाना सुहा नहीं रहा तो कुछ फल और दही ले लो.’’

‘‘न दीदी, मुझे असल में भूख थी ही नहीं, वह तो खाना बढि़या बना है सो इतना खा गई.’’

‘‘अच्छा अब खाना खत्म कर लो फिर तुम्हें ऊपर वाला हिस्सा दिखाते हैं, जिस में तुम्हें रहना है. तुम्हारे यहां आ कर रहने से मेरा भी अकेलापन खत्म हो जाएगा.’’

‘‘पर किराए पर देने से पहले आप को अपने शौहर से नहीं पूछना होगा,’’ तरन्नुम ने कहा.

‘‘वैसे कानूनन यह कोठी मेरी मिल्कियत है. पहले हमेशा ही उन से पूछ कर किराएदार रखे हैं. इस बार तुम आ रही हो तो बजाय 2 आदमियों के बीच बातचीत हो इस बार तरीका बदला जाए,’’ निकहत शरारत से हंस दी, ‘‘यानी मकान मालकिन और किराएदारनी तथा मध्यस्थ भी इस बार मैं औरत ही रख रही हूं. राजन कपूर की जगह बिन्नी कपूर वकील की हैसियत से हमारे बीच का अनुबंध बनाएंगी, क्यों?’’

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रीता जोर से हंस दी, ‘‘रहने दो निकहत दीदी, बिन्नी दी ने शादी के बाद वकालत की छुट्टी कर दी.’’

‘‘इस से क्या हुआ,’’ निकहत हंसी, ‘‘उन्होंने विश्वविद्यालय की डिगरी तो वापस नहीं कर दी है. जो काम कभी न हुआ तो वह आज हो सकता है. क्यों तरन्नुम, तुम्हारी क्या राय है? मैं आज शाम तक कागजात तैयार करवा कर होटल भेज देती हूं. तुम अपनी प्रति रख लेना, मेरी दस्तखत कर के वापस भेज देना. रही किराए के अग्रिम की बात, उस की कोई जल्दी नहीं है, जब रहोगी तब दे देना. आदमी की जबान की भी कोई कीमत होती है.’’

रीता तरन्नुम को तीसरे पहर होटल छोड़ती हुई निकल गई.

द चिकन स्टोरी- भाग 1: क्या उपहार ने नयना के लिए पिता का अपमान किया?

लेखक- अरशद हाशमी

‘‘अरे यार, यह उपकार तो बड़ा छिपारुस्तम निकला, पूरी यूनिवर्सिटी में टौप मार दिया,’’ इकबाल ने अपनी आंखें बड़ी करते हुए कहा.

‘‘हमें तो लग रहा था वंदना या रुचि ही क्लास में टौप करेंगी. इस ने तो क्लास ही नहीं, पूरी यूनिवर्सिटी को पछाड़ दिया,’’ विनोद ने अपनी राय दी.

‘‘तुम्हारा तो वह सब से अच्छा दोस्त है, वह टौप और तुम मुश्किल से बस, पास हुए हो,’’ अजहर ने मेरी तरफ देखते हुए यह कहा तो सब हंसने लगे और मैं खिसिया कर रह गया.

दोस्त अगर फेल हो जाए तो दुख होता है, लेकिन अगर दोस्त टौप कर जाए, तो ज्यादा दुख होता है. यह डायलौग भले ही अभिनेता व निर्माता आमिर खान की फिल्म ‘थ्री ईडियट्स’ में आया हो लेकिन अपना हाल भी कुछ ऐसा ही था.

उपकार बहुत कम बोलने वाला लड़का था और क्लास में उस की बातचीत ज्यादातर मु?ा से ही होती थी.  अपनी क्लास में वंदना, रुचि, नेहा, जेबा और निधि जैसी एक से बढ़ कर एक इंटैलिजैंट लड़कियां थीं तो शंकर और अतीक भी किसी से कम नहीं थे. फिर भी उपकार इन सब को पीछे छोड़ कर न सिर्फ क्लास, बल्कि पूरी यूनिवर्सिटी में टौप आया था.

‘‘बधाई हो भाई, अब चुपचाप पार्टी दे दो,’’ अगले दिन मैं ने उपकार को देखा तो उस को गले लगा लिया और आगे कहा, ‘‘तुम ने मेरा नाम रोशन कर दिया.’’ मैं ने बनावट के साथ कहा तो सब हंसने लगे.

उपकार से मेरी दोस्ती कालेज के पहले ही दिन हो गई थी. मेरी तरह वह भी कम बोलने वाला था. इस के अलावा उस का घर मेरे घर के पास ही था. हम दोनों रोजाना कालेज साथ ही जाते थे. उपकार की माताजी का देहांत कई बरस पहले हो गया था. उस के पिताजी सरकारी औफिसर थे, सेवानिवृत्ति के बाद वे गांव में रह रहे थे. शहर में उन का एक घर था जहां उपकार अकेला रहता था.

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‘‘यार, कुछ टिप्स हमें भी दे दो,’’ एक दिन कालेज जाते समय मैं ने उपकार से कहा और ठहाका लगते हुए आगे बोला, ‘‘क्लास में सब हमें देख कर हंसते हैं कि एक ऊपर से टौपर है और एक नीचे से.’’

‘‘अरे, मैं कुछ अनोखा थोड़ी पढ़ता हूं. मैं भी वही सब पढ़ता हूं जो सब पढ़ते हैं,’’ उपकार ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अरे यार, मैं तुम्हारी टौप पोजीशन नहीं छीन लूंगा. मेरा लैवल मैं जानता हूं और तुम भी,’’ मैं ने जोर से हंसते हुए कहा. मैं मन ही मन सम?ा रहा था, यह अपना सीक्रेट नहीं बताना चाहता.

‘‘अच्छा, तुम खुद आ कर देख लेना. आज शाम को घर आ जाओ साथ मिल कर पढ़ते हैं,’’ उस ने मु?ो अपने घर आने की दावत दी तो मैं तुरंत तैयार हो गया.

शाम को मैं उस के घर पहुंचा. वह मेज पर किताबें फैलाए बैठा था और बड़े से रजिस्टर में कुछ लिख रहा था.

‘‘आओ बैठो. देखो, मैं कैसे प्रैक्टिस करता हूं. मैं हर सवाल को 5-7 बार अच्छी तरह पढ़ लेता हूं और फिर उस को लिख कर देखता हूं. इस से मेरी प्रैक्टिस अच्छी रहती है और लिखने की वजह से मु?ो जवाब भी अच्छे से याद रहता है,’’ उपकार ने मु?ो सम?ाते हुए कहा.

‘‘बस,’’  मु?ो तो तरीका कुछ खास नहीं लगा.

‘‘चलो अच्छा, हम दोनों यह सवाल साथसाथ पढ़ते हैं, फिर इस का जवाब लिख कर देखेंगे,’’ उपकार ने मु?ो कैमिस्ट्री का एक सवाल देते हुए कहा.

मैं ने सवाल एक बार पढ़ा. दूसरी बार पढ़ने पर मु?ो तो लगा कि मु?ो सब याद हो गया लेकिन उपकार ने सवाल को 4-5 बार पढ़ा. फिर हम ने अपनेअपने रजिस्टर पर उस का जवाब लिखा और एकदूसरे के जवाब की जांच की. वाकई में उपकार ने पूरा जवाब एकदम सही लिखा था जबकि मैं ने कई चीजें छोड़ दी थीं.

‘‘देखा तुम ने. बारबार पढ़ने और लिखने से मेरी अच्छी प्रैक्टिस हो जाती है,’’ उपकार ने कहा.

मु?ो उस की बात सम?ा में आ गई. फिर तो मैं रोज ही उस के घर जाने लगा और हम साथसाथ ही पढ़ाई करते.

‘‘सुनो, तुम्हारे घर कभी चिकन नहीं बनता क्या?’’ उस दिन उपकार ने पढ़ाई करतेकरते अचानक मु?ा से पूछा.

‘‘बनता है. क्यों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अरे, तो कभी ला कर खिला न,’’ उस ने बोला तो मेरे हाथ से रजिस्टर गिरतेगिरते बचा.

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‘‘मजाक कर रहे हो न?’’ मैं ने संभल कर मुसकराते हुए पूछा.

‘‘इस में मजाक जैसा क्या है. किसी दिन ले कर आओ, तो साथ खाते हैं,’’ उपकार ने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया.

‘‘अच्छा, तुम चाहते हो कि मैं एक उच्च कोटि के ब्राह्मण के घर चिकन ले कर आऊं ताकि तुम्हारे पिताजी मेरा कचूमर बना दें,’’ मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘और तुम यह नौनवेज कब से खाने लगे?’’ मैं ने जानना चाहा.

‘‘मैं तो स्कूलटाइम से ही खाता आ रहा हूं,’’ उपकार ने जवाब दिया.

‘‘और क्या, तुम्हारे पिताजी को पता है तुम्हारी इस उपलब्धि के बारे में,’’ मैं ने उस पर व्यंग्य कसा.

‘‘अरे, पिताजी यहां रहते कहां हैं. महीने में एकदो बार आते हैं. उन को पता कैसे चलेगा. और मैं कौन सा रोजरोज खाता हूं,’’ अपने रजिस्टर में लिखतेलिखते उपकार बोला.

‘‘नहीं भाई, नहीं. मैं यह रिस्क नहीं ले सकता. अगर अंकलजी को पता चल गया, मैं यहां चिकन लाया था, तो मेरा यहां आना तो बंद हो ही जाएगा, मेरे बापू मेरी धुलाई करेंगे सो अलग,’’ मैं ने हाथ खड़े कर दिए.

‘‘अरे, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, यार. मैं हर बार किसी होटल पर ही खाता हूं, लेकिन घर के चिकन की बात ही कुछ और होगी. तू, बस, अगली बार ले कर आ.’’

वह किसी भी तरह मान ही नहीं रहा था. अब मैं भी था तो एक टीनेजर ही, आ गया उस की बातों में परिणाम की चिंता किए बगैर.

कुछ दिनों बाद घर पर चिकन बना, तो मैं ने थोड़ा सा चिकन एक डब्बे में डाला और शाम को पहुंच गया उपकार के घर. मेरे हाथ में डब्बा देख कर वह सम?ा गया कि उस में क्या है. खुशी से उस की आंखें चमक उठीं.

‘‘यार, खुश कर दिया तू ने तो. आज तो मजा आ जाएगा. पढ़ाई कर के खाते हैं.’’ उपकार की बातों से उस की खुशी छलक रही थी.

दोनों बैठे पढ़ रहे थे कि अचानक गांव से उपकार के पिताजी आ गए. उन को देखते ही मेरी घिग्गी बंध गई, आंखों के सामने अंधेरा छा गया और जबान तालू से जा चिपकी. एक क्षण के लिए तो उपकार भी घबरा गया लेकिन फिर सामान्य सा बन कर बैठा रहा. घबराहट के मारे मैं अंकलजी को नमस्ते भी नहीं कर पाया.

‘‘कैसे हो बेटा, पढ़ाई हो रही है. बहुत अच्छे,’’ अंकलजी ने मु?ा से कहा, तो मेरी हालत और खराब हो गई.

उपकार ने मु?ो सामान्य रहने का इशारा किया.

‘‘मैं जरा पाठक साहब से मिल कर आता हूं,’’ अंकलजी ने उपकार से कहा और कपड़े बदलने अंदर कमरे में चले गए. मैं ने जल्दी से चिकन का डब्बा टेबल के नीचे छिपा दिया..

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