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फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां, एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में सम?ादारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

* 14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछें निकलने लगीं, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछें उगें और वह परेशान हो गया.

* 12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के बाद ही वह सामान्य हो पाई.

* राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ सम?ा में आता चला गया.

* दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और सम?ादारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे

समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को सम?ा सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. वहां के मालवणी इलाके में रहने वाली

14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और सम?ा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम को जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, ‘‘शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.’’

कुलमिला कर कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

धर्म की बेड़ियों में फंसी औरत

सभी धर्मों, धार्मिक ग्रन्थों और वेदों में, स्त्री के रूप और व्यवहार की जो चर्चा की गई है वह औरत की व्यथा का बयान ही है. कोई भी धर्म महिलाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहा है, तो क्यों कर हम इन धार्मिक पाखंडों का लबादा ओढ़े रखें. अब हम उन धार्मिक नारियों (सीता, द्रौपदी, सावित्री, मेनका आदि) को अपना रोल मौडल मानने से भी इनकार करते हैं जो आजीवन मूक और बधिर बनी रहीं क्योंकि उन्होंने अशिक्षा के कारण पंडों की नजर से देखा, पर आज की महिलाएं शिक्षित हैं, तो अपना भलाबुरा धर्म और इन पंडों की नजरों से क्यों देखें. अपना भलाबुरा पहचानने की हम में अब समझ भी है और परखने की हिम्मत और हौसला भी है.

‘धर्म की बेड़ियां खोल रही है औरत’ पुस्तक में अस्मिता के इन्हीं उद्देश्यों के अनुसार ही धर्म में स्त्री की छवि को दर्शाते हुए उसे धार्मिक आडंबरों से बाहर लाने की कोशिश शब्दों द्वारा की गई है. हमेशा औरत को धर्म का अनुगमन करने पर क्यों विवश किया जाता है. वह आज इस धर्म का पल्ला छोड़ना चाहती है तो ये पंडे, पुजारी, मौलवी क्यों उसे उसी ओर धकेलते हैं. समाज में स्त्री की इस दुर्दशा का कारण धर्म ही है.

इस पुस्तक में पौराणिक और साहित्यिक कथाओं के स्त्रियोचित व्यवहार और विशेष रूप से स्त्रीप्रधान चरित्रों को उजागर करने की संकल्पना की है, जिस से नारी जीवन में प्रेरणा और एक नई सोच की नियति पैदा होती है.

आधुनिक नारी की परिभाषा देते हुए नीलम आधुनिक नारी के विचारों को इस तरह बयां करती हैं : ‘रामायण व महाभारत की स्तुति सैकड़ों वर्षों से इस समाज में इसलिए हो रही है कि स्त्रियां द्रौपदी, गांधारी बनी आंसू बहाती रहें, इन पुरुषों की सत्ता ऐसे ही निर्बाध बनी रहे.’ फिर लड़कियों के स्वर को ऊंचा करती हैं, ‘हमें अपने ये रोल मौडल स्वीकार्य नहीं हैं.’

धर्मों की बात करते हुए हिंदू धर्म में सब से पहले वर्णन सीता का आता है. इस पर डा. उमा देशपांडे सीता को जहां अमर्यादित पुरुष राम की पत्नी बताती हैं वहीं उर्मिला को मौन व खोखली सामाजिक मान्यता का दर्जा डा. नलिनी पुरोहित अपनी कविता ‘उर्मिला का टूटता मौन’ में देती हैं.

इसी तरह हिंदू धर्म की अन्य नारियों जैसे द्रौपदी, सावित्री, सती, तारामती, कुंती, गांधारी, मेनका आदि के उदाहरणों से भी नारी के चरित्र का तार्किक चित्रण उकेरा गया है. इस बात की स्पष्टता इन शब्दों में झलकती है :

‘‘क्यों रहूं घेरे में बंद खींची गई लक्ष्मण रेखा के मध्य मैं भी हूं मजबूत इतनी कि खींच सकती हूं रेखा किसी को रखने के लिए.’’

नीलम कुलश्रेष्ठ (संपादक) अपनी कथा ‘सति इतिकथा’ में सती को चरितार्थ करती हैं कि क्या सती अपने लंबे सुहाग के लिए ही सबकुछ नहीं कर रही थी, तो उस में इस का ही भला निहित था? लेकिन यह भी गलत नहीं है कि धर्मगुरुओं ने ही पति को श्रेष्ठ मानने के लिए एक स्त्री को आमादा किया है और यही धर्मगुरु एक स्त्री के साए से भी घृणा करते हैं. यह स्पष्ट है नीलम के ही आलेख ‘स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री और स्त्री’ के शब्दों में :

‘‘स्वामीनारायण धर्म के धार्मिक गुरुओं की संकीर्ण मानसिकता का परिचय मुझे तब मिला जब एक विवाह समारोह में हम स्त्रियों से यह कहा गया कि हम सब स्टेज की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ से मुंह फेर कर खड़ी हो जाएं क्योंकि वरपक्ष के स्वामीनारायण मत के गुरु वरवधू को आशीर्वाद देने आ रहे हैं.’’

स्त्री से इतनी घृणा करने वाले ये धर्मगुरु किस प्रकार समाज का भला कर सकते हैं क्योंकि स्त्री भी समाज का ही एक हिस्सा है. इस पर ये धर्मगुरु भी इन धार्मिक ग्रंथों को गलत मानते हैं. ‘क्या धर्म का प्रचार जरूरी है’ आलेख में गीताबेन शाह के शब्द भी यही स्वीकारते हैं, ‘रामायण, महाभारत व गीता सब राजनीति ही है. यदि हम राम व कृष्ण को भगवान का अवतार मानते हैं तो उन्होंने भी तो राजकुटुंब में जन्म लिया था, किसी राजकुटुंब का काम राजनीति के बिना चल नहीं सकता तो धर्म व राजनीति अलग कहां हुए?’

स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री में तो विधवा स्त्री को संक्रामक रोग का दर्जा दिया जाता है तो इस धर्म का लोग, खासकर औरतें क्यों अनुगमन करें.

हर धर्म में स्त्री की तुलना या तो जानवर से की गई है या फिर किसी रोग से. और यह दर्जा देने वाले ये धार्मिक गुरु इन्हीं महिलाओं के कंधों पर धर्म की बंदूक रख कर चला रहे हैं. इन धर्मग्रंथों में अपनी इतनी बुरी स्थिति पाते हुए भी महिलाएं अभी तक क्यों धर्म के भंवर में फंसी हुई हैं? यह सवाल बारबार जेहन को मथता है. अगर इस भंवर से औरतें निकलना चाहती हैं तो सब से पहले खुद को अबला कहना व समझना छोड़ें और फिर अबला बनाने वाले इन पंडों- मौलवियों को इस समाज से बहिष्कृत करें.

इस पुस्तक में कई जगह पर ऐसे धार्मिक पहलुओं पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं, जिन से धर्म में स्त्री की क्षतविक्षत दशा का बोध होता है. पुस्तक में खास बात यह भी है कि इस में सभी कुछ (एक कविता को छोड़ कर) स्त्रियों द्वारा ही लिखा गया है. ऐसे में एक पुरुष (कार्तिक साराभाई) का अपनी कविता के माध्यम से पुरुषों पर ही आक्षेप सचमुच सराहनीय है. साथ ही इस में मल्लिका साराभाई, किरण बेदी, मृदुला गर्ग, उमा देशपांडे जैसी हस्तियों ने अपने शाब्दिक हस्ताक्षर दे कर इसे और भी सशक्त बना दिया है.

फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में समझदारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सब से बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

-14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछ निकलने लगी, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछ उगे और वह परेशान हो गया.

-12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के ही बाद वह सामान्य हो पाई.

-राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ समझ में आता चला गया.

दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और समझदारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को समझ सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी

दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. मुंबई के मालवणी इलाके में रहने वाली 14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और समझा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम में जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने लड़की को मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, “शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.”

कुलमिला कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती, तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

टॉप 10 सामाजिक समस्याएं हिन्दी में

कहा जाता है कि हम आधुनिक जमाने में रहते हैं लेकिन आज भी हमारे समाज की सोच पुराने रीति-रिवाज और ख्यालों से बंधी हुई है, ऐसे में हमें कई समाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इन समस्याओं के कारण कई लोग अपनी जान भी गंवा देते हैं. तो इस खबर में हम आपके लिए लेकर आए हैं, टॉप 10 समाजिक समस्याएं हिन्दी. इसे पढ़कर आप इन समाजिक समस्याओं से रूबरू होंगे और समाज को सच का आईना दिखाएंगे.

  1. शर्मनाक: पकड़ौआ विवाह- बंदूक की नोक पर शादी

social issues in hindi

कहते हैं कि शादी ऐसा लड्डू है, जो खाए वह पछताए और जो न खाए वह भी पछताए. लेकिन वहां आप क्या करेंगे, जहां जबरन गुंडई से आप की मरजी के खिलाफ आप के मुंह में यह लड्डू ठूंसा जाने लगे? हम बात कर रहे हैं ‘पकड़ौवा विवाह’ की, जो बिहार के कुछ जिलों में आज भी हो रहे हैं.

22 साल के शिवम का सेना के टैक्निकल वर्ग में चयन हो गया था और वह 17 जनवरी को नौकरी जौइन करने वाला था. हमेशा की तरह एक सुबह जब वह अपने कुछ दोस्तों के साथ सैर पर निकला, तभी कार में सवार कुछ लोगों ने उसे अगवा कर लिया.

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2.गांव की औरतें: हालात बदले, सोच वही

social issues in hindi

राज कपूर ने साल 1985 में फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ बनाई थी, जो पहाड़ के गांव पर आधारित थी. इस में हीरोइन मंदाकिनी ने गंगा का किरदार निभाया था. फिल्म का सब से चर्चित सीन वह था, जिस में मंदाकिनी  झरने के नीचे नहाती है. वह एक सफेद रंग की सूती धोती पहने होती है. पानी में भीगने के चलते उस के सुडौल अंग दिखने लगते हैं.

उस दौर में गांव की औरतों का पहनावा तकरीबन वैसा ही होता था. सूती कपड़े की धोती के नीचे ब्लाउज और पेटीकोट पहनने का रिवाज नहीं था. इस की वजह गांव की गरीबी थी, जहां एक कपड़े में ही काम चलाना पड़ता था.

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3. जिगोलो: देह धंधे में पुरुष भी शामिल

social issues in hindi

देह व्यापार का एक बाजार ऐसा भी है, जहां के सैक्सवर्कर औरतें नहीं बल्कि मर्द होते हैं. जिन्हें जिगोलो कहा जाता है. उन्हें यौन पिपासा से भरी औरतों को हर तरह से खुश करना होता है. आजकल जिगोलो की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. इस धंधे में मोटी कमाई तो होती ही है साथ ही…

भरे बदन वाली एक अधेड़ महिला कमसिन दिखने की अदाओं के साथ ड्राइंगरूम में खड़ी थी. वहीं कुछ दूसरी महिलएं सिगरेट का धुंआ उड़ाती कुछ दूरी बना कर सोफे पर क्रास टांगों के साथ बैठी थीं. सभी के बीच अपनेअपने सैक्स अपील वाले यौवन को दर्शाने की होड़ सी दिख रही थी.

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4. रीति रिवाजों में छिपी पितृसत्तात्मक सोच

social issues in hindi

हम पुरुषवादी समाज में रहते हैं जहां स्त्रियों को हमेशा से दोयम दर्जा दिया जाता रहा है. स्त्री कितना भी पढ़लिख ले, अपनी काबिलीयत के बल पर ऊंचे से ऊंचे पद पर काबिज हो जाए पर घरपरिवार और समाज में उसे पुरुषों के अधीन ही माना जाता है.

उस के परों को अकसर काट दिया जाता है ताकि वह ऊंची उड़ान न भर सके. स्त्रियों को दबा कर रखने और उन की औकात दिखाने के लिए तमाम रीतिरिवाज व परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं.

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5. धर्म का धंधा: कुंडली मिलान, समाज को बांटे रखने का बड़ा हथियार!

social issues in hindi

लड़केलड़की की कुंडलियों में यदि 36 गुणों में सभी गुणों का मिलान हो जाए तो क्या इस की कोई गारंटी है कि वैवाहिक जीवन खुशहाल रहेगा? यदि ऐसा न हुआ तो इस में किस का दोष माना जाएगा? क्या शादी से पहले कुंडली मिलान करना आवश्यक है या फिर कुंडली मिलान की प्रक्रिया के पीछे समाज को बांटे रखने वाली मानसिकता काम करती है? क्या यह सिर्फ एक धर्म में ही है या इस जैसी कोई प्रक्रिया अन्य धर्मों में भी पाई जाती है?

साल था जनवरी 2018, जब राजीव की शादी के लिए जगहजगह लड़की तलाशने के लिए लोगों के घर जाया जा रहा था. उन के घर वाले ऐसी बहू की तलाश में थे जो सुंदर हो, सुशील हो, घरबार का काम करना आता हो, पढ़ीलिखी हो इत्यादि.

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6. पत्नी की सलाह मानना दब्बूपन की निशानी नहीं

social issues in hindi

पुरुषप्रधान समाज में आज महिलाएं हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं. ऐसे में पढ़ीलिखी, योग्य व समझदार पत्नी की राय को सम्मान देना पति का गुलाम होना नहीं, बल्कि उस की बुद्धिमत्ता को दर्शाता है.

कपिल इंजीनयर हैं. लोक सेवा आयोग से चयनित राकेश उच्च पद पर हैं. विभागीय परिचितों, साथियों में दोनों की इमेज पत्नियों से डरने, उन के आगे न बोलने वाले भीरु या डरपोक पतियों की है. पत्नियों का आलम यह है कि नौकरी संबंधी समस्याओं की बाबत मशवरे के लिए पतियों के उच्च अधिकारियों के पास जाते समय वे भी उन के साथ जाती हैं.

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7. वर्जिनिटी: टूट रही हैं बेडि़यां

social issues in hindi

आदिकाल से ही औरतों के लिए शुचिता यानी वर्जिनिटी एक आवश्यक अलंकार के रूप में निर्धारित कर दी गई है. यकीन न हो, तो कोई भी पौराणिक ग्रंथ उठा कर देख लीजिए.

अहल्या की कहानी कौन नहीं जानता. शुचिता के मापदंड पर खरा नहीं उतरने के कारण जीतीजागती, सांस लेती औरत को पत्थर की शिला में परिवर्तित हो जाने का श्राप मिला था. पुराणों के अनुसार, उस का दोष सिर्फ इतना ही था कि वह अपने पति का रूप धारण कर छद्मवेश में आए छलिए इंद्र को उस के स्पर्श से पहचान न सकी.

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8. नारी हर दोष की मारी

social issues in hindi

आज भी स्त्रियों के लिए सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं जैसे उन्हें निगलने के लिए मुंह बाए खड़ी हैं. कई योजनाएं बनती हैं, लेख लिखे जाते हैं, कहानियां गढ़ी जाती हैं, प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं और सब से खास प्रतिवर्ष महिला दिवस भी मनाया जाता है. किंतु हकीकत यह है कि घर की चारदीवारी में महिलाएं बचपन से ले कर बुढ़ापे तक समाज एवं धर्म की मान्यताओं में बंधी कसमसा कर रह जाती हैं.

कुंआरी लड़की एवं विधवा दोष

कुछ महीने पहले की ही बात है  झुन झुनवाला की 25 वर्षीय बिटिया के विवाह की बात चल रही थी, लड़कालड़की दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया था. लेकिन फिर बात आगे न बढ़ सकी, जब  झुन झुनवाला से पूछा गया कि मिठाई कब खिला रही हैं तो कहने लगीं…

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9. वर्जनिटी: चरित्र का पैमाना क्यों

social issues in hindi

हमारे शास्त्रों और सामाजिक व्यवस्था ने वर्जिनिटी यानी कौमार्य को विशेष रूप से महिलाओं के चरित्र के साथ जोड़ कर उन के लिए अच्छे चरित्र का मानदंड निर्धारित कर दिया है.

हमारे समाज में वर्जिनिटी की परिभाषा इस के बिलकुल विपरीत है. दरअसल, समाज और शास्त्रों के अनुसार इस का अर्थ है कि आप प्योर हैं. हम किसी चीज या वस्तु की प्युरिटी की बात नहीं कर रहे हैं वरन लड़की की प्युरिटी की बात कर रहे हैं. लड़की की वर्जिनिटी को ही उस की शुद्धता की पहचान बना दी गई है. लड़कों की वर्जिनिटी की कहीं कोई बात नहीं करता. बात केवल लड़कियों की वर्जिनिटी की करी जाती है.

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10. समलैंगिकता मिथक बनाम सच

social issues in hindi

भारत में समलैंगिकता आज भी हंसीमजाक का हिस्सा मात्र है. कानून बनने के बाद भी लोग समलैंगिकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे कई मिथक हैं जिन के चलते समलैंगिक लोगों के लिए वातावरण दमघोंटू बना हुआ है.

पिछले वर्ष फरवरी में एक फिल्म आई थी, ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’. उस में समलैंगिक जोड़े को अपनी शादी के लिए परिवार, समाज और मातापिता से संघर्ष करते हुए दिखाया गया था. वह कहीं न कहीं हमारे समाज की सचाई और समलैंगिकों के प्रति होने वाले व्यवहार के बहुत करीब थी.

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सोशल मीडिया क्राइम: नाइजीरियन ठगों ने किया कारनामा

यह ठगी की क्राइम स्टोरी पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे की ठगी के कैसे-कैसे नायाब नमूने लोगों ने इजाद कर लिए हैं. इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की
राजनांदगांव पुलिस को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है. सोशल मीडिया के जरिए आनलाइन ठगी करने वाले दो नाईनीरियन को पुलिस ने नईदिल्ली से गिरफतार किया है इनके नाम- किबी स्टेनली ओकवो और नवाकोर इमानुएल हैं.

दंपत्ति से 44 लाख की ठगी

पुलिस अधीक्षक कमललोचन कश्यप ने बताया कि राजनांदगांव निवासी श्रीमती सुनीता आर्य पति चैतूराम आर्य ने विगत एक दिसंबर को उक्त आरोपियों के खिलाफ एक रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा था कि जुलाई 2018 में किसी डेविड सूर्ययन नामक व्यक्ति उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी. तथा खुद को लंदन निवासी होना बताया. काफी दिनों तक दोनों के बीच चेटिंग होती रही और एक दिन उपरोक्त व्यक्ति ने कहा कि वह उसे मोबाइल, गोल्डन ज्वेलरी, रिंग, जूते, कोट, घडी चैनल, बैग इत्यादि सामान गिफट करना चाहता है परंतु उसका जहांज फिनलैण्ड में रूका पड़ा है, उसके बाद पीड़िता के पास एक व्यक्ति का फेान आया जिसने खुद को कस्टम अधिकारी बताया और कहा कि उपरोक्त सामान चाहिऐ तो उसे 62500 रूपये जमा कराने होंगे. इस तरह क्राइम प्रारंभ हो गया विश्वास करके आगे दंपत्ति ने यूपी जमाने प्रारंभ कर दिए और धीरे धीरे 44लाख रुपए की चपत उन्हें लग गई.

ये भी पढ़ें- सुलज ना सकी वैज्ञानिक परिवार की मर्डर मिस्ट्री

ऐसे हुआ ठगी का एहसास

इधर पीड़िता ने उसके झांसे में आते हुए रकम जमा कर दी परंतु जब सामान नही पहुंचा तेा उसने डेविड सूर्ययन से संपर्क करना चाहा मगर उसका सोशल मीडिया एकाउंट और मोबाइल नम्बर बंद बताया जा रहा था. आश्चर्य कि इस तरह पीड़िता से कुल 44 लाख की आनलाइन धोखाधड़ी हो गई. उसके बाद पीड़िता ने राजनंदगांव पुलिस अधीक्षक एवं अधिकारियों से संपर्क किया जिन के निर्देश पर कोतवाली थाना में मामला दर्ज हुआ. रिपोर्ट
दर्ज करने के बाद पुलिस ने भादवि की धारा 420, 34 एवं 66 डी के तहत जुर्म दर्ज किया.

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अंततः अपराधी पकड़े गए

पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया और जाल बिछाकर ठगों को दबोच लिया। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव पुलिस ने ऑनलाइन साइबर क्राइम को बहुत गंभीरता से लिया और इसके लिए एक क्राइम इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई जोशीला पुलिस कप्तान कश्यप को रिपोर्ट कर रही थी बहुत ही चालाकी से दोनों नाइजीरियन नागरिकों को पुलिस ने जाल में फंसाया और गिरफ्तार करके राजनंदगांव ले आई है पुलिस ने दोनों का बयान दर्ज किया उन्होंने स्वीकार किया कि यह काम वह विगत 2 वर्षों से कर रहे थे और अनेक लोगों को अपना शिकार बनाया है. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया जहां से जमानत के अभाव में उन्हें जेल भेज दिया गया है.

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