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Funny Story : असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं

Funny Story. यह अलग ही तरह का शख्स था. पता नहीं कहां कौन सी साधारण बात इसे खास लगने लगे, किस बात से मोहित हो जाए, कुछ कह नहीं सकते थे. जिन बातों से एक आम आदमी को ऊब होती थी, इस आदमी को उस में मजा आता था. एक अजीब सा आनंद आता था उसे. इस की अभिरुचि बिलकुल अलग ही तरह की थी. वैसे यह मेरा दोस्त है, फिर भी मैं कई बार सोचने को मजबूर हो जाता हूं कि आखिर यह आदमी किस मिट्टी का बना है. मिट्टी सी चीज में अकसर यह सोना देखता है और अकसर सोने पर इस की नजर ही नहीं जाती.

मैं इस के साथ मुंबई घूमने गया था. हम टैक्सी में दक्षिण मुंबई के इलाके में घूम रहे थे. हमारी टैक्सी बारबार सड़क पर लगे जाम के कारण रुक रही थी. जब टैक्सी ऐसे ही एक बार रुकी तो इस का ध्यान सड़क के किनारे बनी एक 25 मंजिली बिल्ंिडग की 15वीं मंजिल पर चला गया, जहां एक कमरा खुला दिख रहा था. मानसून का समय था. आसमान में बादल छाए थे. कमरे की लाइट जल रही थी, पंखा घूमता दिख रहा था. वह बोल उठा, ‘यार, इस को कहते हैं ऐश. देखो, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वो महाशय आराम फरमा रहे हैं, वह भी पंखे की हवा में.’

मैं ने सोचा इस में क्या ऐश की बात है? मैं ने कहा, ‘यार, वह आदमी जो उस कमरे में दिख रहा है, वह क्या कुछ काम नहीं करता होगा? आज कोई कारण होगा कि घर पर है.’

अब वह बोला, ‘यार, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वह ऐश कर रहा है. यह तो एक बिल्डिंग के एक माले के एक फ्लैट की बात है, यहां तो हर फ्लैट में लोग मजे कर रहे हैं.’

मैं ने झल्ला कर कहा, ‘हां, हर फ्लैट नहीं, हर फ्लैट के हर कमरे में कहो और अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हुए हैं.’

यह तो एक घटना मुंबई की रही. एक दिन शाम को घूमते हुए शहर के रेलवे स्टेशन पर मिल गया. मैं शाने भोपाल ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. यह तफरीह करने आया था. चूंकि ट्रेन के लिए समय था, सो हम एक बैंच पर बैठ गए. स्टेशन पर आजा रही ट्रेनों को यह टकटकी लगा कर देखता. बोगी में बैठे लोगों को देखता. यदि किसी एसी बोेगी में कोई यात्री दिख जाता आपस में बतियाते या खाना खाते, लेटे पत्रिका पढ़ते तो यह कहता, ‘यार, देखो इन के क्या ऐश हैं. मस्त एसी में यात्रा कर रहे हैं, खापी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं और अपन यहां कुरसी पर बैठे हैं?’

मैं ने कहा, ‘यार, इस में क्या खास बात हो गई? अपन लोग भी जाते हैं तो इसी तरह मौज करते हैं यदि तुम्हारे पैमाने से बात तोली जाए.’ मैं ने आगे कहा, ‘वैसे मैं तो रेलयात्रा को एक बोरिंग चीज मानता हूं.’ अब मेरा मित्र बोल पड़ा, ‘अरे यार, तुम नहीं समझोगे क्या आनंद है यात्रा का. मस्ती में पड़े रहो, सोते ही रहो और यदि घर से परांठेसब्जी लाए हो तो उस का भी मजा अलग ही है. काश, अपन भी ऐसे ही इस समय ट्रेन की ऐसी ही किसी बोगी में बैठे होते तो मजा आ जाता.’

मैं ने कहा, ‘तो चल मेरे साथ? असल जिंदगी जीना, मैं तो खैर बोर होऊंगा तो होते रहूंगा.’ लेकिन इस बात पर यह मौन हो गया.

इसे कौन से साधारण दृश्य अपील कर जाएं, कहना मुश्किल था. एक बार मैं और यह कार से शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पौट को जा रहे थे. एक जगह ट्रैफिक कुछ धीमा हो गया था. इस की नजर सड़क के किनारे खड़े ट्रकों व उस के साइड में बैठे ड्राइवरक्लीनरों पर चली गई.

वे अपनी गाडिं़यां खड़ी कर खाना पका रहे थे. ईंटों के बने अस्थायी चूल्हे पर खाना पक रहा था. एक व्यक्ति रोटियां सेंक रहा था, एक सब्जी बना रहा था. बाकी बैठे गपशप कर रहे थे. बस, इतना दृश्य इस के लिए असली जिंदगी वाला इस का जुमला फेंकने और उसे लंबा सेंकने के लिए काफी था.

यह बोल उठा, ‘देखो यार, जिंदगी इस को कहते हैं मस्त, कहीं भी रुक गए, पकायाखाया, फिर सो गए और जब नींद खुली तो फिर चल दिए और अपन, बस चले जा रहे हैं. अभी किसी होटल में ऊटपटांग खाएंगे. ये अपने हाथ का ही बना खाते हैं, इस में  किसी मिलावट व अशुद्धता की गुंजाइश ही नहीं है. ऐसी गरम रोटियां होटल में कहीं मिलती हैं क्या?

मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘ऐसा करते हैं अगली बार तुम भी रसोई का सामान ले कर चलना. अपन भी ऐसे ही सड़क के किनारे रुक कर असली जिंदगी का मजा लेंगे. और तुरंत ही मजा लेना है तो चल आगे, किसी शहरकसबे के बाजार से अपना तवा, बेलन और किराने का जरूरी सामान खरीद लेते हैं, इस पर वह मौन हो गया.

मैं एक बार इस के साथ हवाईजहाज से बेंगलुरु से देहरादून गया. फ्लाइट के 2 स्टौप बीच में थे. एयर होस्टैस और दूसरे हौस्पिटैलिटी स्टाफ के काम को यह देखतासुनता रहा. बाद में बोला, ‘यार, असली मजे तो इन्हीं के हैं? 2 घंटे में इधर, तो 2 घंटे में उधर. सुबह उठ कर ड्यूटी पर आए तो दिल्ली में थे, नाश्ता किया था मुंबई में. लंच लिया बेंगलुरु में और डिनर लेने फिर दिल्ली आ गए. करना क्या है, बस, मुसकराहटों को फेंकते चलना है. एक बार हर उड़ान में सैफ्टी निर्देशों का प्रदर्शन करना है, बस, फिर जा कर बैठ जाना है. प्लेन के लैंड करते समय फिर आ जाना है और यात्रियों के जाते समय बायबाय, बायबाय करना है. इसे कहते हैं जिंदगी.’

मैं ने कहा, ‘यार, तुझे हर दूसरे आदमी की जिंदगी अच्छी लगती है, अपनी नहीं.’ मैं ने आगे कहा कि इन की जिंदगी में रिस्क कितना है? अपन तो कभीकभी प्लेन में बैठते हैं तो हर बार सब से पहला खयाल सहीसलामती से गंतव्य पहुंच जाने का ही आता है. अब इस बात पर यह बंदा मौन हो गया, कुछ नहीं बोला. बस, इतना ही दोहरा दिया कि असली ऐश तो ये करते हैं.

एक और दिन की बात है. यह अपने खेल अनुभव के बारे में बता कर  दूसरों की जिंदगी में फिर से तमगे पर तमगे लगा रहा था. वनडे क्रिकेट मैच देख आया था नागपुर में, बोला, ‘यार, जिंदगी हो तो खिलाड़ी जैसी. कोई काम नहीं, बस, खेलो, खेलो और जम कर शोहरत व दौलत दोनों हाथों से बटोर लो. जनता भी क्या पगलाती है खिलाडि़यों को देख कर, इतनी भीड़, इतनी भीड़, कि बस, मत पूछो.’

मैं ने कहा, ‘बस कर यार, अभी पिछले सप्ताह प्रसिद्ध गायक सोनू निगम का कार्यक्रम हुआ था, उस में भी तेरा यह कहना था कि अरे बाप रे, क्या भीड़ है. लोग पागलों की तरह दाद दे रहे हैं, झूम रहे हैं. जिंदगी तो ऐसे कलाकारों की होती है’ मैं ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर वे क्या ऐसे ही पहुंच गए हैं. न जाने कितने पापड़ बेले हैं, कितना संघर्ष किया है. असली कलाकार तो मैं तुझे मानता हूं जो असली जिंदगी को कहांकहां से निकाल ढूंढ़ता है.’

वह बोला, ‘यार, यह सब ठीक है. पापड़आपड़ तो सब बेलते हैं, लेकिन समय भी कुछ होता है. ये समय के धनी लोग हैं और अपन समय के कंगाल? घिसट कर जी रहे हैं.’ मैं ने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी असली जिंदगी जीने की अगली उपमा किस के बारे में होगी, उस का इंतजार कर रहा हूं. तुम्हारा यह चेन स्मोकर की तरह का नशा हो गया है कि हर दूसरे दिन किसी दूसरे की जिंदगी में तुम्हें नूर दिखता है और अपनी जिंदगी कू्रर.’

वह कुछ नहीं बोला. अब उस के मौन हो जाने की बारी थी. उस का मौन देख कर मैं ने भी अब मौन रहना उचित समझा, वरना मैं ने कुछ कहा तो पता नहीं यह फिर किस से तुलना कर के अपने को और मुझे भी नीचा फील करवा दे.

मेरे इस दोस्त का नाम तकी रजा है. महीनेभर बाद पिछले शनिवार को मैं इस से मिलने घर गया था. मैं आजकल इस के ‘असली जिंदगी इन की है’ जुमले से थोड़ा डरने लगा हूं. मुझे लग रहा था कि कहीं यह मेरे पहुंचते ही ‘असली जिंदगी तो इन की है’ कह कर स्वागत न कर दे. मैं इस के घर का गेट खोल कर अंदर दाखिल हुआ. यह लौन में ही बैठा हुआ था.

मेरी ओर इस की नजर गई. लेकिन तकी, जो ऊपर को टकटकी लगाए कुछ देख रहा था, ने तुरंत नजर ऊपर कर ली. मैं उस के सामने पड़ी कुरसी पर जा कर बैठ गया. उस के घुटनों को छू कर मैं ने कहा कि क्या बात है, सब ठीक तो है? वह मेरे यह बोलते ही बोला, ‘क्या ठीक है यार, ऊपर देख? कैसे एक तोता मस्त अमरूद का स्वाद ले रहा है?’

मैं ने ऊपर की तरफ देखा, वाकई एक सुरमी हरे रंग का लेकिन लाल रंग की चोंच, जोकि तोते की होती ही है, वाला तोता अमरूद कुतरकुतर कर खा रहा था और बारीकबारीक अमरूद के कुछ टुकड़े नीचे गिर रहे थे. थोड़ी देर बाद वह फुर्र से टांयटांय करते उड़ गया. फिर एक दूसरा तोता आ गया. उस के पीछे 2-3 तोते और आ गए. वे सब एकएक अमरूद पर बैठ गए.

एक अमरूद पर तो 2 तोते भी बैठ कर उसे 2 छोरों से कुतरने लगे. कौमी एकता का दृश्य था. तकी बोला, ‘यार, असली जिंदगी तो इन की है. जमीन पर आने की जरूरत ही नहीं, हवा में रहते ही नाश्ता, खाना, टौयलेट सब कर लिया.’ और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि तकी ने जैसे ही यह बोला कि एक तोता, जो उस के सिर के ठीक ऊपर वाली डाल पर था, ने अपना वेस्ट मैटेरियल सीधे तकी के सिर पर ही गिरा दिया.

‘यह भी कोई तरीका है,’ कह कर तकी अंदर की ओर भागा. जब वह वापस आया तो मैं ने कहा, ‘हां यार, वाकई असली जिंदगी ये ही जी रहे हैं.’ तकी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा.

मैं ने इस के ‘असली जिंदगी ये जी रहे हैं’ वाले आगामी बेभाव पड़ने वाले डायलौग से बचने के लिए बात को आम भारतीय की तरह महंगाई को कोसने के शाश्वत विषय की ओर मोड़ दिया.

तकी बोला, ‘हां यार, यह महंगाई तो जान ले रही है.’ लेकिन थोड़ी ही देर में असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं’ का साजोसामान ले जाती कुछ बैलगाडि़यां सामने से निकल रही थीं. ये गड़रियालुहार थे जोकि खानाबदोश जिंदगी जीते हैं. बैलगाडि़यों पर पलंग, बच्चे और सब सामान लदा दिख रहा था. अब तकी टकटकी लगा कर इन्हें ही देख रहा था. उस की आंखों ने बहुतकुछ देख लिया जो कि उसे बाद में शब्दों में प्रकट कर मेरी ओर शूट करना था. अंतिम बैलगाड़ी जब तक 25 मीटर के लगभग दूर नहीं पहुंच गई, यह उसे टकटकी लगा कर देखता ही रहा. अब वह बोला, ‘यार, जिंदगी तो इन की है?’

मैं ने कहा, ‘खानाबदोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है?’

वह बोला, ‘यार, तुम नहीं समझोगे, इसी में जिंदगी का मजा है. एक जगह से दूसरी जगह को ये लोग हमेशा घूमते रहते हैं. कहीं भी रुक लिए और कहीं भी बनाखा लिया, और कहीं भी रात गुजार ली. भविष्य की कोई चिंता नहीं, मस्तमौला, घुमक्कड़ जिंदगी, सब को कहां मिलती है.’

मैं ने सोचा कि इस को भी यह अच्छा कह रहा है. अब तो यहां से रवानगी डालना ही ठीक होगा, वरना ‘असली जिंदगी तो इन की है’ का कोई न कोई नया संस्करण कहीं न कहीं से इस के लिए प्रकट हो जाएगा, जिसे वह मेरे पर शूट करेगा जो कि मुझे आजकल हकीकत की गोली से भी तेज लगने लगा है. Funny Story

Hindi Story : औलाद की चाहत – कैसे भरी सायरा की कोख

Hindi Story. उस्मान की शादी को 5 साल हो गए थे, मगर अभी भी उसे बाप होने का सुख नहीं मिला था. उस्मान की बीवी सायरा की गोद नहीं भरी तो उस्मान के अब्बा बेचैन रहने लगे. उन्हें यह चिंता सताने लगी कि वे पोते या पोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से चले जाएंगे.

तभी किसी ने उन्हें बताया कि पास वाले गांव में एक पहुंचे हुए मुल्लाजी आए हुए हैं. वे जिस किसी को भी तावीज देते हैं, उस की हर मुराद पूरी हो जाती है.

इतना सुनना था कि उस्मान के अब्बा अगले ही दिन उन मुल्लाजी के पास पहुंच गए.

मुल्लाजी ने कहा, ‘‘मैं घर आ कर पहले आप की बहू को देखूंगा कि उस पर किस का साया है. और हां, साए को दूर करने में खर्चा भी आएगा.’’

‘‘आप पैसे की परवाह मत करो, बस मेरे बेटे और बहू को औलाद का सुख दे दो.’’

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उस्मान के अब्बा उसी वक्त मुल्लाजी को अपने साथ ले आए और उन्हें बैठक में बिठा कर उन्होंने उस्मान व सायरा को बताया, ‘‘इन मुल्लाजी के तावीज से तुम्हारी औलाद की चाहत जरूर पूरी होगी, बस तुम दोनों को इन की हर बात माननी पड़ेगी.’’

थोड़ी देर के बाद उस्मान की बीवी सायरा को बैठक में बुलाया गया. जैसे ही मुल्लाजी की नजर सायरा पर पड़ी, वे उसे पाने के लिए बेताब हो गए. हों भी क्यों न, सायरा थी ही इतनी खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, गदराया बदन जिसे देखते ही कोई भी मदहोश हो जाए.

मुल्लाजी किसी भी कीमत पर सायरा को अपनी बांहों में भरना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपनी चाल चली और उस के मखमली पेट पर हाथ रखते हुए उस्मान के अब्बा से कहा, ‘‘तुम्हारे एक दुश्मन ने जादूटोने से इस की गोद बांध रखी है. जब तक इस को खोला नहीं जाएगा, तब तक यह मां नहीं बन पाएगी.

‘‘इस काम में 3 दिन लगेंगे और यह काम रात को 12 बजे अकेले में बंद कमरे में करना पड़ेगा और इस में काफी पैसा भी लगेगा, क्योंकि जाफरान से 3 तावीज बनाने पड़ेंगे.’’

उस्मान और सायरा को तो औलाद की इतनी ज्यादा चाहत थी कि उन्होंने फौरन हां कर दी. उस्मान के अब्बा ने 50,000 रुपए उस ढोंगी मुल्लाजी को दे दिए. उन्होंने उन के घर में से एक कमरा ले लिया और कहा, ‘‘जब तक पूरा इलाज न हो, तब तक कोई भी कमरे में मेरी बिना इजाजत के अंदर न आए.’’

मुल्लाजी शाम ढलते ही कमरे के अंदर लुबान जला कर कुछ बुदबुदाने लगे. कभी उन की आवाज तेज हो जाती, तो कभी शांत.

मुल्लाजी कभी किसी से बात करने का नाटक करते और चिल्लाते, ‘‘तू इसे छोड़ कर चला जा, वरना तु?ो यहीं भस्म कर दूंगा. क्यों इस बच्ची की कोख पर बैठा है? क्यों इसे मां नहीं बनने दे रहा है? इस मासूम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?’’

इस तरह मुल्लाजी ने कई घंटे तक यह नाटक जारी रखा और रात ढलते ही उन्होंने सायरा को अपने कमरे में बुलाया और उसे एक तावीज देते हुए बोले, ‘‘इसे अपनी शर्मगाह में रख लो और चुपचाप लेट जाओ. एक घंटे तक बिलकुल भी हिलनाडुलना नहीं.

‘‘और हां, इस एक घंटे के लिए अपने बदन पर कोई भी सिला हुआ कपड़ा मत पहनना. बिना सिला हुआ कपड़ा जैसे चादर वगैरह से अपना बदन ढक लो.’’

सायरा तो औलाद की चाहत में अंधी हो चुकी थी. वह उस पाखंडी मुल्लाजी की हवस भरी नजरों को भांप नहीं पा रही थी. सायरा ही क्या, उस का शौहर और ससुर भी औलाद की चाहत में कुछ नहीं सम?ा पा रहे थे, इसलिए उन्होंने सायरा को उस पाखंडी मुल्लाजी के पास अकेले बंद कमरे में भेज दिया था. उन की आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी जो बंधी हुई थी.

उधर बंद कमरे में सायरा ने अपने बदन से सारे कपड़े अलग किए और चादर ओढ़ कर एक चटाई पर लेट गई.

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उस पाखंडी मुल्लाजी ने सायरा के पास आ कर अगरबत्ती जलाई, पूरे कमरे को खुशबू से महकाया और कुछ बुदबुदाने लगे. फिर वे सायरा से बोले, ‘‘अपनी आंखें बंद कर के चुपचाप लेटी रहो और कुछ भी बोलने की कोशिश मत करना, वरना सारा कियाधरा बेकार हो जाएगा, फिर तुम कभी भी मां नहीं बन पाओगी.’’

सायरा चुपचाप लेटी थी और पाखंडी मुल्लाजी तावीज ले कर उस के होंठों से रगड़ते हुए कुछ बुदबुदाने का नाटक करते हुए धीरेधीरे उस के बदन को सहलाने लगे. उन की इस हरकत पर सायरा हैरान थी, पर औलाद पाने की चाहत में वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, जिस का वे पाखंडी मुल्लाजी फायदा उठा रहे थे.

मुल्लाजी सायरा का बदन सहलाते रहे और उस तावीज को उस की शर्मगाह के पास ले जा कर छेड़छाड़ करने लगे. जल्द ही सायरा की जवानी उफान पर आ गई और वह मुल्लाजी की इस हरकत से मदहोश होने लगी.

सायरा की हवस जाग उठी थी. पाखंडी मुल्लाजी की इस हरकत ने उस के अंदर जोश भर दिया और इस का फायदा उठा कर उस मुल्लाजी ने उस के साथ खूब मजा किया. औलाद पाने की चाहत में सायरा उन के सामने पूरी तरह से बिछ चुकी थी.

इसी तरह उन पाखंडी मुल्लाजी ने 3 दिन तक सायरा की देह के मजे लिए और उस के जिस्म से खूब खेला. 3 दिन बाद उन्होंने उस्मान और उस के अब्बू से कहा, ‘‘जल्दी ही तुम्हें खुशखबरी मिल जाएगी,’’ और वहां से चले गए.

एक हफ्ता गुजर गया, पर सायरा को उम्मीद की कोई किरण नजर न आई. वह सम?ा चुकी थी कि उन पाखंडी मुल्लाजी ने दौलत के साथसाथ उस की इज्जत भी लूट ली है.

उस्मान और उस के अब्बू हैरान थे कि उन की बहू अभी भी पेट से नहीं हुई. उन्होंने पास के गांव जा कर उन मुल्लाजी से मिलना चाहा, तो पता चला कि वे तो यहां एक परिवार से लाखों रुपए ले कर भाग गए हैं.

अब उस्मान और उस के अब्बा को अपने ऊपर पछतावा हो रहा था कि वे क्यों पाखंडी मुल्लाजी की बातों में आ गए. बाद में उन्होंने एक अस्पताल में जा कर एक लेडी डाक्टर से सायरा का चैकअप कराया, तो उन्होंने बताया कि सायरा की बच्चेदानी में सूजन है, जिस की वजह से वह मां नहीं बन पा रही है. 2-3 महीने के इलाज से सब ठीक हो जाएगा.

और हुआ भी यही. 3 महीने के इलाज के बाद सायरा को बच्चा ठहर गया और वक्त पूरा होने के बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

इस तरह न जाने कितनी सायरा औलाद की चाहत में अपनी इज्जत गंवा बैठती हैं और न जाने कितने उस्मान दौलत के साथसाथ अपने घर की आबरू भी पाखंडी मुल्लाओं को सौंप देते हैं. Hindi Story

Story in Hindi : भभूत का कमाल – स्वामीजी का जादू या जंजाल

Story in Hindi. आज फिर बिस्तर पर निढाल पड़े पति को शीला आंखों में आंसू लिए नफरत की नजरों से देख रही थी. आधी रात जवानी पर थी, लेकिन शीला तड़प रही थी. वजह, उस की कोख अभी तक नहीं भरी थी.

शीला का पति नामर्द जो निकला था. वह काम से आते ही थकामांदा खापी कर सो जाता. कभीकभार उस की नसों में खून दौड़ जाता, तो थोड़ी देर के लिए वह शीला से प्यार जता देता. फिर शीला जल बिन मछली की तरह आधी भूख लिए तड़प कर रह जाती.

शीला सोचने लगी कि कुछ तो उपाय करना चाहिए. पड़ोस की लालमती को भी 7 साल के बाद बच्चा हुआ था.

यह सब शायद स्वामीजी की कृपा थी, जो लालमती को औलाद सुख मिला.

स्वामी कृपानंद पास के गांव धरमपुर में तालाब के किनारे आश्रम बना कर रहते थे. लालमती स्वामीजी के पास जा कर दवा और भभूत लाई थी.

एक दिन लालमती बता रही थी कि स्वामीजी दवा और भभूत देते हैं, जिसे पतिपत्नी को 3 महीने तक खानी पड़ती है.

‘अब मैं लालमती से मिलूंगी, तभी काम बनेगा,’ यह सोचतेसोचते शीला न जाने कब सो गई.

सुबह हुई, तो शीला आंखें मलते हुए उठी. वह जल्दी से नहाईधोई, फिर घर के सारे काम निबटा कर लालमती के घर जा पहुंची.

लालमती अपने बेटे को खाना खिला रही थी. यह देख कर शीला के अंदर भी टीस उभरी. काश, मुझे भी एक ऐसी औलाद मिल जाए, तो क्या कहने. शीला ने लालमती के सामने अपने मन की बात कह दी.

लालमती हंसते हुए उस से बोली, ‘‘बिलकुल न घबराओ बहन, मैं भी तुम्हारी तरह 7 साल तक बच्चे के लिए परेशान हुई, तमाम डाक्टरों से इलाज कराया, लेकिन आखिर में स्वामीजी की मेहरबानी से ही यह औलाद मिली.

‘‘तुम चाहो, तो मेरे साथ आज ही स्वामीजी के पास चलो. वैसे, स्वामीजी रविवार और मंगलवार को ही ज्यादा औरतों की कोख भरने के लिए भभूत देते हैं और झाड़फूंक भी करते हैं.’’

‘‘चलो, अभी चलें,’’ शीला आंखों में चमक लिए बोली. वे दोनों स्वामीजी के पास चल दीं.

स्वामीजी की कुटिया एकांत में बनी थी. उस के आसपास 2-3 किलोमीटर दूर गांव बसे थे. स्वामीजी के पास जा कर दोनों उन के पैरों पर गिर पड़ीं और उन का आशीर्वाद लिया.

स्वामीजी 6 फुट के हट्टेकट्टे कसरती बदन के मालिक थे. उन्होंने जब शीला को पैर छूते देखा, तो उस के उभारों पर नजर रखते हुए वे चिडि़या को जाल में फंसाने की बात सोचने लगे.

शीला के सिर पर हाथ रख कर सहलाते हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा पूरी हो.’’

शीला को यह सुन कर रोना आ गया. आंखों में आंसू भर कर वह बोली, ‘‘स्वामीजी, 5 साल से अभी तक मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई. अब तो मैं बड़ी उम्मीद ले कर आप के पास आई हूं.’’

वे बोले, ‘‘मेरे दरबार से अभी तक कोई भी खाली हाथ नहीं लौटा है. बताओ, क्या बात है?’’

शीला से पहले ही लालमती बोल पड़ी, ‘‘बाबाजी, जो मेरी समस्या थी, वही शीला की भी है. 5 साल हो गए, अभी तक इस की गोद नहीं भरी है.’’

‘‘ठीक है, कुछ पूजा करनी होगी. तकरीबन 5 हजार रुपए लग जाएंगे और तुम अपने पति को भी साथ लाना. परसों मंगलवार को पूजा होगी,’’ स्वामीजी ने शीला से मुखातिब होते हुए कहा.

कुछ प्रसाद और भभूत दे कर उन्होंने शीला और लालमती को घर भेज दिया.

शाम को शीला ने अपने पति को सारी बातें बताईं. उस का पति रमेश स्वामीजी के पास जाने को तैयार हो गया, क्योंकि वह भी औलाद की चाह में तमाम ओझागुनियों, मुल्लामौलवियों को दिखा चुका था.

रमेश हर पल अंधविश्वास में पड़ कर अनापशनाप सोचता रहता. उसे लगता कि किसी पड़ोसी ने उस के घर पर कुछ तंत्रमंत्र कर दिया है. दूसरे दिन लालमती के साथ शीला और उस का पति रमेश स्वामीजी के आश्रम में पहुंचे.

स्वामीजी बोले, ‘‘बेटा, घबराओ मत. सब ठीक हो जाएगा. घर पर भी हवन करना होगा. अब तुम पूजा का सामान ले आओ. 7 दिनों तक पूजा करनी पड़ेगी. मंत्रों का जाप भी करना होगा.’’

रमेश की आंखों पर धर्म की पट्टी पड़ चुकी थी. स्वामीजी पर भरोसा कर के वह सामान लेने चला गया. इधर बंद कमरे में पहले ही एक गिलास में पानी भर कर उस में नशीली गोली मिला दी गई थी. कुछ देर बाद स्वामीजी ने वह पानी शीला को पीने के लिए दिया, फिर शीला की जवानी का भरपूर मजा लूटा.

इस तरह रोज झाड़फूंक व पूजापाठ का झांसा दे कर स्वामीजी शीला की इज्जत से खेलते रहे.

शीला को भी सबकुछ मालूम हो गया, क्योंकि पहले ही दिन पानी पीने के बाद नशा छाया और होश में आने पर उसे एहसास हो गया कि स्वामीजी उस के साथ क्या कर चुके हैं.

एक दिन स्वामीजी ने शीला से फिर गिलास में पानी मंगवाया, तो शीला बोल पड़ी, ‘‘स्वामीजी, अब गिलास और पानी की जरूरत नहीं. अब तो जो हो रहा है, वह वैसे भी हो सकता है, क्योंकि बच्चे पैदा करना मेरे पति के बस की बात नहीं.

‘‘आप मुझे बेहोशी में लूट ही चुके हैं. अब जब तक बच्चा ठहर नहीं जाता, तब तक मैं खुद को आप को सौंपती हूं.’’

यह सुन कर स्वामीजी और शीला खूब देर तक वासना का खेल खेलते रहे. कुछ दिनों बाद शीला के पैर भारी हो गए.

रमेश कभीकभार शीला के साथ सो पाता था और स्वामीजी की दी गई भभूत खाता रहता था.

शीला को एक दिन सुबहसुबह उलटी होती देख रमेश शीला से पूछ बैठा, ‘‘क्या पैर भारी हो गए?’’

शीला ने मुसकरा कर ‘हां’ में सिर हिलाया.

रमेश खुशी से समझाते हुए बोला, ‘‘यह सब स्वामीजी की भभूत का कमाल है.’’ खुश हो कर रमेश ने स्वामीजी को 5 हजार रुपए दे दिए. Story in Hindi

Family Story : मेरी स्वीट मिट्ठी- नाना की रिटायरमेंट बाद क्या हुआ

Family Story. मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करने के लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत

रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही. Family Story

Family Story in Hindi : जिंदगी की तलाश में – कैसे बदला कृष्ण का जीवन

Family Story in Hindi. शाम गहराने लगी थी, मगर बाहर के अंधेरे से घोर अंधेरा कृष्ण के भीतर छाने लगा था. अपने चेहरे को हथेलियों से ढके, आंखें मूंदे उस ने मोबाइल के ईयरफोन कान में ठूंस कर सुनीता की आवाज दबाने की नाकाम कोशिश में अपना सारा ध्यान गाने पर लगा दिया था, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए…’

गाना खत्म होतेहोते कृष्ण की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. उस के जी में आया कि वह अपने हालात पर खूब फूटफूट कर रोए… मगर उस से ऐसा नहीं हो सका और अंदर की हूक आंखों से आंसू बन कर बहती रही.

कृष्ण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी इस मोड़ पर आ कर खड़ी हो जाएगी, जहां वह कहीं का नहीं रहेगा… काश, वह उस नर्स के इश्क में न फंसा होता… काश… उस ने घर वालों की बात मानी होती… काश… उस ने अपने और अपने परिवार के बारे में सोचा होता… काश… काश… काश… मगर अब क्या हो सकता था… जिंदगी इसी काश में उलझ कर रह गई थी.

कृष्ण को अच्छी तरह याद है कि पिता की अचानक हुई मौत के बाद उन की जगह पर उस की नौकरी लगते ही उस के जैसे पंख उग आए थे. जवानी का जोश और मुफ्त में मिली पिताजी की जगह रेलवे की नौकरी के बाद दोस्तीयारी में पैसे उड़ाना, मोटरसाइकिल पर सजसंवर कर इधर से उधर चक्कर काटना, मौका मिलते ही दोस्तों के साथ मौजमस्ती मारना… बस, यही उस का रोज का काम बन गया था. तब न उसे दोनों बहनों के ब्याह की चिंता थी और न विधवा मां की सेहत की फिक्र.

एक दिन दोस्तों के साथ पिकनिक पर भीग जाने पर कृष्ण को बुखार चढ़ गया था. अस्पताल में नर्स से सूई लगवाते हुए उस की नजरों से घायल हो कर कृष्ण उस का दीवाना हो उठा था, जब नर्स ने अपने मदभरे नैनों में ढेर सारा प्यार समेटे हुए पूछा था, ‘‘सूई से डरते तो नहीं हो? आप को सूई लगानी है.’’

कृष्ण उस नर्स की हिरनी सी बड़ीबड़ी आंखों को बस देखता रह गया था. सफेद पोशाक में गोलमटोल चेहरे वाली नर्स की उन आंखों ने जैसे उसे अपने अंदर समा लिया था. उसे लगा था, जैसे खुशबू से सराबोर हवा ने उसे मदहोश कर दिया हो, जैसे पहाड़ों पर घटाएं बरसने को उमड़ पड़ी हों…

नर्स ने बांह ऊंची करने के लिए कृष्ण का हाथ अपने कोमल हाथों में लिया, तो वह कंपकंपा कर बोला था, ‘‘डर तो लगता है, पर आप लगाएंगी तो लगवा लूंगा.’’

इतना कहते हुए नर्स ने शर्ट की बांह ऊपर चढ़ा दी थी. नर्स ने हौले से सूई लगा कर कृष्ण की आंखों में झांकते हुए पूछा था, ‘‘दर्द तो नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘कृष्ण.’’

‘‘मतलब कृष्ण कन्हैया हैं आप… गोपियों के कन्हैया…’’ नर्स ने इंजैक्शन की जगह को रुई से रगड़ते हुए मुसकरा कर कहा था.

कृष्ण अपने घर चला आया था. शरीर का बुखार तो अब उतर चुका था, मगर नर्स के इश्क का बुखार उस पर इस कदर हावी हो गया था कि आंखें बंद करते ही नर्स की बड़ीबड़ी हिरनी सी आंखें नजर आती थीं.

बुखार उतरने के बाद भी कृष्ण कई बार अस्पताल के चक्कर लगा आता. नर्स से किसी न किसी बहाने दुआसलाम कर आता. नर्स भी उस से मुसकरा कर बात करती.

उसी दौरान क्रिसमस पर हिम्मत कर कृष्ण ने नर्स को रास्ते में रोक कर ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर लाल गुलाबों का गुलदस्ता थमा दिया था. नर्स

ने भी मुसकरा कर उस का तोहफा कबूल कर लिया था.

बस, फिर वे दोनों मिलने लगे थे. प्यार हो चुका था, इजहार हो चुका था. घर में क्या हो रहा है, कृष्ण को कुछ परवाह न थी. वह उस नर्स को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर घूमता… उस के प्यार में झूमता, मस्ताता बस.

उधर ब्याह लायक बहनें कृष्ण के इस आवारापन की हरकतों को देख कर मजबूरन मां को संभालने की खातिर अपना घर बसाने की सोच भी न पाती थीं. अगर उन्होंने ब्याह रचा लिया, तो दिल की मरीज विधवा मां को कौन संभालेगा? बस, इसी एक बड़े सवाल ने उन्हें कुंआरी रहने पर मजबूर कर दिया था. वे दोनों घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल कर रोजीरोटी कमाने लगी थीं.

फिर अचानक ही नर्स का तबादला और उसी के चलते ही कृष्ण का घर से और दूर हो जाना… वह कईकई दिन घर से 200 किलोमीटर दूर अपने प्यार के नशे में चूर पड़ा रहता.

और एक दिन जैसे बिजली गिरी थी कृष्ण पर. नर्स के घर का दरवाजा बिना खटखटाए घनघोर घटाओं में भीगता वह अचानक अंदर दाखिल हुआ था, तो सामने का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह नर्स किसी और मर्द के साथ बिस्तर पर थी.

कृष्ण को यह सब देख कर ऐसा लगा था, जैसे किसी ने उस के दिल में छुरा भोंक दिया हो, जैसे सारा आसमान घूमने लगा हो… उसे लगा था कि वह खून से लथपथ हो कर वीरान रेगिस्तान में अकेला घायल खड़ा हो और तमाम चीलकौए उसे नोंच खाने को उस पर मंडरा रहे हों… कितने वादे… कितनी कसमें खाई थीं… कैसे कहती थी वह नर्स, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती कृष्ण… मैं मर जाऊंगी, जो तुम मेरे न हुए…’

कृष्ण को लगा था कि जमीन फट जाए और वह उस में समा जाए… जैसे नर्स के क्वार्टर की दीवारें आग से भभक उठी हों, वैसे ही नफरत की आग में भभक उठा था कृष्ण.

कृष्ण नर्स को कुछ कह पाता, उस से पहले ही नर्स ने उस से रूखी आवाज में कहा था, ‘‘बेवकूफ इनसान, तुम को इतना भी नहीं पता कि किसी लड़की के घर का दरवाजा खटखटा कर अंदर आना चाहिए…’’ फिर गुर्राते हुए नफरत भरे अंदाज में उस ने घूरते हुए कृष्ण से कहा था, ‘‘ऐसे घूर कर क्या देख रहे हो मुझे? ये नए डाक्टर साहब हैं. मेरे नए फ्रैंड… अभी एक हफ्ता पहले ही डिस्पैंसरी में पोस्टिंग हुआ है…’’

कृष्ण मुट्ठी भींचे सब सुनता रहा था. जी में आया कि नर्स का गला ही घोंट दे, मगर वह कुछ और कहती, उस से पहले ही वह मुड़ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर निकल पड़ा था तेज रफ्तार से घर की ओर… जैसे वह जल्दी से जल्दी दूर… बहुत दूर भाग जाना चाहता हो… जैसे नर्स की आवाज उस का पीछा कर रही हो और वह

उसे सुनना नहीं चाहता हो… वह टूट गया था अंदर ही अंदर.

इसी तरह उदासी और तनहाई में दिन रगड़रगड़ कर बीत रहे थे कि एक दिन अचानक ही कृष्ण के कानों में किसी की दिल भेद देने वाली रुलाई सुनाई पड़ी.

‘अरे, यह तो सुनीता के रोने की आवाज है,’ कृष्ण पहचान गया था. सुनीता, उस की पड़ोसन… मजबूर, बेसहारा सी, मगर निहायत ही खूबसूरत, जिसे उस का पति रोज शराब पी कर बिना बात मारता है और वह उस की मार खाती जाती है. आखिर जाए भी तो कहां… उस का इस दुनिया में कोई नहीं… मामा ने मामी की रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर उसे एक बेरोजगार शराबी से ब्याह कर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

कृष्ण, जो अपने प्यार में नाकाम हो कर टूट चुका था, न जाने क्यों अचानक ही उठ कर सुनीता के घर की ओर लपका. वह  रोजरोज सुनीता को यों पिटते नहीं देख सकता.

कृष्ण ने दरवाजा खोल कर पिटती सुनीता को हाथ से पकड़ा ही था कि वह उस के सीने से इस कदर लिपट पड़ी, जैसे कोई बच्चा मार के डर से लिपट जाता है.

‘‘बचा लो इस राक्षस से, वरना मुझे यह मार ही डालेगा…’’ सुनीता कृष्ण से लिपट कर फूट पड़ी थी. पता नहीं, कृष्ण के टूटे दिल को सुनीता के यों सीने से लग जाने से कितना सुकून मिला था. उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘मैं तुम्हें इस तरह पिटता नहीं देख सकता सुनीता…’’

‘‘अबे हट, बड़ा आया सुनीता का आशिक. तू होता कौन है इसे बचाने वाला…?’’ कहते हुए सुनीता के पति ने कृष्ण को जोर का धक्का दे दिया और खुद कमरे में रखी हौकी उठा कर कृष्ण के ऊपर लपका. अगर पड़ोसी न बचाते, तो वह नशे में कृष्ण के सिर पर हौकी दे मारता.

मगर अब सुनीता कृष्ण के सामने आ खड़ी थी उसे बचाने के लिए. सारा महल्ला तमाशा देख रहा था.

सुनीता के पति ने तमाम महल्ले वालों के सामने चीखचीख कर कहा, ‘‘आशिक बनता है इस का… कब से चल रहा है तुम्हारा चक्कर… रख सकता है हमेशा के लिए इसे… चार दिन ऐश करेगा और छोड़ देगा… इतना ही मर्द है तो ले जा हमेशा के लिए और रख ले अपनी बीवी बना कर… मुझे इस की जरूरत भी नहीं…’’

सुनीता और सारा महल्ला खामोश हो कर कृष्ण के जवाब का इंतजार करने लगे. सुनीता उस से लिपटी कांप रही थी. कृष्ण के जवाब के इंतजार में उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था.

‘‘हां, बना लूंगा अपनी बीवी… एक औरत पर हाथ उठाते, भूखीप्यासी रखते, जुल्म करते शर्म नहीं आती… बड़ा मर्द बनता है… देख, कैसा मारा है इसे…’’ कृष्ण ने जेब से रूमाल निकाल कर सुनीता के होंठों से बहता खून पोंछ दिया.

सुनीता कृष्ण के सीने से लगी आंखों में आंसू लिए बस उसे ही देखती रह गई, जैसे कहना चाह रही हो, ‘मेरे लिए इतना रहम… आखिर क्यों? मैं तो शादीशुदा और एक बच्ची की मां… फिर भी…’

किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया. फिर क्या, पुलिस के सामने ही सुनीता ने कृष्ण को और कृष्ण ने सुनीता को स्वीकार कर लिया. महिला थाने में रिपोर्ट, फिर फैमिली कोर्ट से आसानी से तलाक हो गया.

पता नहीं, कृष्ण ने अपने पहले प्यार को भुलाने के लिए या सुनीता पर इनसानियत के नाते तरस खा कर उसे घर वालों, महल्ले वालों और रिश्तेदारों की परवाह किए बगैर अपना लिया था… फिर किराए का अलग मकान… सुनीता की बेटी का नए स्कूल में दाखिला और लोन पर ली गई नई कार…

शायद अपने पहले प्यार को भुलाने की कोशिश में कृष्ण ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और सुनीता उसे और उस के द्वारा मुहैया कराए गए ऐशोआराम पा कर निहाल हो गई थी.

उधर, कृष्ण सुनीता की बांहों में पड़ा उस की रेशमी जुल्फों से खेलता और नर्स के साथ बिताए पलों को सुनीता के साथ दोहराने की कोशिश करता. पड़ोस में रहने के चलते शायद सुनीता उस के पहले प्यार के बारे में सबकुछ जानती थी.

कृष्ण को न बूढ़ी मां की चिंता थी, न दोनों बहनों के प्रति फर्ज का भान. हां, कभी सुनीता को उस ने मांबहनों के साथ रहने के लिए दबाव दिया था, तो सुनीता ने दोटूक शब्दों में कह दिया था, ‘‘मैं उस महल्ले में तुम्हारी मांबहनों के साथ कभी नहीं रह सकती. लोग तुम्हारे और नर्स के किस्से छेड़ेंगे, जो मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा…’’

समय के साथसाथ कृष्ण का अपने पहले प्यार को भुलाने और जोश में आ कर सुनीता को अपनाने की गलतियों का अहसास होने लगा.

सुनीता ऐशोआराम की आदी हो गई. वह कृष्ण के उस पर किए गए उपकार को भी भूल गई और एक लड़के को जन्म देने के बाद तो उस के बरताव में न जाने कैसा बदलाव आया कि कृष्ण अपने किए पर पछताने लगा.

कभीकभार मां के पास रुक जाने, दोस्तयारों के पास देर हो जाने पर सुनीता उसे इतना भलाबुरा कहने लगी कि उस का जी करता उसे जहर ही दे दे. वह अकसर नर्स को ले कर ताना मारने लगी. न समय पर नाश्ता, न समय पर खाना… कृष्ण के लेट घर आने पर खुद खा कर बेटी को ले कर सो जाना उस का स्वभाव बन गया.

सुनीता तो अब नर्स और कृष्ण के पहले प्यार को ले कर ताना मारती रहती थी. ज्यादा कुछ बोलने पर वह दोटूक कह देती थी, ‘‘नर्स ने धोखा दिया तुम्हें इस चक्कर में मुझे अपना लिया, वरना इतने बदनाम आदमी से कौन रचाता ब्याह? मुझे अपना कर कोई अहसान नहीं कर दिया तुम ने… अभी भी मुझे क्या पता कहांकहां जाते हो… किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो…’’

तब काटो तो खून नहीं वाली हालत हो जाती थी कृष्ण की. वह चीख पड़ता, ‘‘हां… उड़ाता हूं… खूब उड़ाता हूं गुलछर्रे… तेरी इच्छा है तो तू भी उड़ा ले…’’ और निकल जाता कार ले कर दूर जंगलों में.

एक दिन कृष्ण तेज बुखार से तपता जब नजदीकी डिस्पैंसरी में इलाज कराने पहुंचा, तो सन्न रह गया. हाथ

में इंजैक्शन लिए उस की वही नर्स खड़ी थी.

कृष्ण ने उस के हाथ से परची छीन ली. नर्स ने आसपास देखा. दोपहर के डेढ़ बजे का समय था. मरीज जा चुके थे. उस के और कृष्ण के अलावा वहां कोई नहीं था.

नर्स ने कृष्ण के हाथ से दोबारा परची ली और कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप को…’’

बाकी शब्द नर्स के गले में अटक कर रह गए. कान पकड़ कर आंखों में आंसू भरे वह कृष्ण के कदमों में झुक गई.

कृष्ण का गुस्सा नर्स को यों गिड़गिड़ाते देख बुखार की गरमी से जैसे पिघल गया. उस ने बुखार से तपते अपने हाथों से उठाते हुए पहली बार नर्स को उस के नाम से पुकारा, ‘‘बस भी करो मारिया. मैं अब…’’

कहतेकहते रुक गया कृष्ण और अपनी बांहें खोल कर मारिया के सामने कर दीं.

‘‘पास ही स्टाफ क्वार्टर है, मैं उसी में रहती हूं. अभी एक हफ्ता पहले ही ट्रांसफर हुआ है यहां. आप को देखने की कितनी तमन्ना थी… आज पूरी हो गई. प्लीज आना… ए 41 नंबर है र्क्वाटर का,’’ कहते हुए मारिया ने आंसुओं से भरी आंखों से कृष्ण को इंजैक्शन लगा दिया.

घर आ कर कृष्ण निढाल सा पलंग पर पड़ गया. आंखों में मारिया की आंसुओं भरी आंखें और फूल

सा कुम्हलाया चेहरा था. आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज चमकती बिजली थी. कृष्ण पलंग पर आंखें मूंदे यों ही पड़ा रहा और आज के दिन के बारे में सोचता रहा…

सुनीता ने एक बार भी कृष्ण से तबीयत खराब होने के बावजूद खानेपीने, दवा वगैरह के बारे में नहीं पूछा. बस, नए दिलाए हुए मोबाइल फोन से वह चिपकी रही.

आज तीसरा दिन था. बुखार अभी भी महसूस हो रहा था, मगर रविवार के दिन डाक्टर कम ही मिलता है, फिर भी कृष्ण किसी तरह उठा और डिस्पैंसरी की ओर चल दिया. उस की सोच के मुताबिक डाक्टर नहीं आया था. मारिया ही डिस्पैंसरी संभाल रही थी.

कृष्ण को देखते ही मारिया गुलाब के फूल सी खिल उठी, ‘‘ओह कृष्ण… अब कैसा है आप का तबीयत?’’

केरल की होने के चलते मारिया के हिंदी के उच्चारण कुछ बिगड़े हुए होते थे. उस ने कृष्ण की कलाई को अपने नरम हाथों से पकड़ कर नब्ज टटोलने की कोशिश की ही थी कि तभी कृष्ण ने हाथ खींच लिया.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘अभी तक नाराज हो…’’ कहते हुए मारिया ने कृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया. कृष्ण को लगा जैसे वह कोयले की तरह धूधू कर जल उठा हो. जैसे उसे 104 डिगरी बुखार हो गया हो. तभी मारिया ने मौका पा कर अपने पंजों पर खड़े हो उस के होंठों पर अपने धधकते होंठ रख दिए.

मारिया की आंखों में नशा उतरने लगा था. डिस्पैंसरी खाली थी. खाली डिस्पैंसरी के एक खाली कमरे की हवा मारिया की गरम सांसों से गरम हो चली थी.

‘‘कृष्ण, मुझे माफ कर दो. देखो न, आप की मारिया आप से अपने प्यार की भीख मांग रही है. अभी भी वही आग, वही कसक और वही प्यार बाकी है मारिया में… एक बार, सिर्फ एक बार…’’

कृष्ण, जो मारिया का साथ पा कर कुछ पल को अपने होश खो बैठा था, ने मारिया को दूर धकेल दिया और बोला, ‘‘मुझे तुम से घिन आ रही है. तुम प्यार के नाम पर कलंक हो. मैं तुम से प्यार नहीं, बल्कि नफरत करता हूं. मुझे कभी अपनी सूरत भी मत दिखाना…’’

इतना कहता हुआ कृष्ण डिस्पैंसरी से बाहर चला गया था. मारिया ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गई.

कृष्ण नफरत से भरा भनभनाता सीधे अपने घर की तरफ निकल पड़ा था. उसे लग रहा था जैसे उस के चारों ओर आग जल रही हो, जिस में वह जला जा रहा हो… मारिया ने जैसे उस के अंदर आग भर दी थी… प्यार की नहीं, नफरत की आग. बस, उसी आग में जलता जब घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख हैरान रह गया.

घर के दरवाजे पर सुनीता का पहला पति सुनीता का हाथ अपने हाथों में लिए उस से कह रहा था, ‘‘चिंता मत करो, मैं जल्दी आऊंगा…’’ फिर कृष्ण को देख कर वह नजरें झुकाए हुए चुपचाप वहां से खिसक लिया.

कृष्ण ने सुनीता के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘मक्कार… धोखेबाज… बता, कब से चल रहा है यह सब?’’

सुनीता गाल को सहलाते हुए कृष्ण पर चिल्लाई, ‘‘जब से तुम्हारा नर्स के साथ चक्कर चल रहा है. कहां से आ रहे हो? मारिया से मिल कर न? अपने गरीबान में झांक लो, तब मुझे कुछ कहना. वे आएंगे… तुम उन्हें रोक भी नहीं सकते… उन की बेटी मेरे पास है… क्या कर लोगे तुम?’’

कृष्ण को लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगा. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. इतना बड़ा धोखा.

कृष्ण चल पड़ा था अपने घर की ओर. मांबहनों के पास. टूटे कदम और बोझिल मन लिए. जा कर ‘धम्म’ के पलंग पर पड़ गया था. उसे लगा जैसे वह न घर का रहा न घाट का… न मांबहनों का हो पाया और न मारिया या सुनीता का… आखिर उसे उस के भटकने की सजा जो मिल गई थी.

कृष्ण की आंखों में आंसू थे. सुनीता की गूंजती आवाज दबाने के लिए उस ने मोबाइल फोन के ईयरफोन कानों में ठूंस लिए थे, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए… जब ये सोचा तो घबरा गए… आ गए, हम कहां आ गए…’ Family Story in Hindi

Hindi Humor Story : महाभोज

Hindi Humor Story. सुबह उठते ही गरमागरम चाय का अभी पहला घूंट ही गटका था कि अंदर काफरमान कानों के रास्ते अंदर उतर गया, ‘‘आज नाश्ता तभी बनेगा जब बाजार से सब्जी आ जाएगी.’’

हुआ यह था कि पिछले एक सप्ताह से दफ्तर के कामों में इतना उलझा रहा कि लौटते समय बाजार बंद हो जाता था और सब्जी का थैला बैग में पड़ा रह जाता. इन दिनों में पत्नी ने छोले व राजमा के साथ बेसन का कई तरह से इस्तेमाल कर एक तो अपनी पाक कला ज्ञान का भरपूर परिचय कराया, दूसरे, सब्जी की कमी को पूरा कर हमारी इज्जत ढकी थी.

पत्नी के आदेश को सिरमाथे मान कर मैं शार्टकट के रास्ते तेज कदमों से सब्जी बाजार की ओर जा रहा था. अभी थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि नाक में तेज बदबू ने प्रवेश किया. मैं ने अपनी उल्लू जैसी आंखों को मटका कर चारों ओर देखा पर कुछ दिखलाई नहीं दिया. अभी वहां से कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि फिर जोरदार बदबू का झोंका आया. अब की बार मैं ने कुत्ते जैसी नाक से मजबूरी में बदबू को सूंघा और उस जगह पर नजर डाली जहां से वातावरण प्रदूषित हो रहा था. देखा, एक मरा हुआ ढोर नगरनिगम के कचरे के डब्बे में पड़ा था और कौए उस को नोंचनोंच कर खा रहे थे.

नाक पर रूमाल रखा और स्कूली दिनों को याद कर 100 मीटर की फर्राटा दौड़ लगा दी. सामने से तिवारीजी आते दिखाई दिए और मुझे इस तरह इतना फर्राटे से भागते देखा तो रोक कर पूछने लगे, ‘‘क्यों भाई, सब ठीकठाक तो है?’’

मैं ने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और तिवारीजी के चेहरे को देखा तो वह किसी हौरर फिल्म के डे्रकुला जैसे लग रहे थे. बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे हुए बाल, नंगे पांव, गंदे से कपड़े. ‘‘बात क्या है, तिवारीजी, आप ठीकठाक तो हैं न?’’

‘‘क्यों, मुझे क्या हुआ?’’

‘‘अरे भाई, ये बढ़ी हुई दाढ़ी, नंगे पांव, बिखरे हुए बेतरतीब केश, और ये बढ़े हुए नाखून…आखिर माजरा क्या है?’’

तिवारीजी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरा और बोले, ‘‘तुम्हें नहीं मालूम?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं मालूम.’’

‘‘यार, तुम कैसे हिंदू हो?’’

‘‘क्या मतलब? आप की दाढ़ीनाखून बढ़ने से मेरे हिंदू होने का क्या संबंध है?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘यार, हिंदू होने के नाते तुम्हें इतना तो पता होना ही चाहिए कि इन दिनों पितृपक्ष (श्राद्ध) के दिन चल रहे हैं और इन दिनों में न तो कोई शुभ काम किया जाता है और न ही दाढ़ीनाखून कटवाते हैं.’’

‘‘लेकिन तिवारीजी, हिंदू धर्म में इस तरह का कोई नियम है, ऐसा कुछ मैं ने आज तक किसी भी हिंदू धार्मिक पुस्तक में नहीं पढ़ा.’’

‘‘यार, वेदपुराणों में लिखा है, ऐसा हमें हमारे बापदादा ने बताया था.’’

‘‘आप ने पढ़ा है?’’ मैं ने नास्तिकों की तरह पूछा.

‘‘इस में पढ़ना क्या है? बुजुर्गों ने कहा है सो है, यही तो हमारी हिंदू संस्कृति, धर्म और सभ्यता है.’’

‘‘जहां पर प्रश्न करने की, शक करने की कोई गुंजाइश नहीं होती,’’ मैं ने कहा.

‘‘चुप रहो यार, ऐसा कर के पुरखों की आत्मा को शांति मिलती है.’’

‘‘क्या तुम्हारे पूर्वज तुम्हें ऐसा गंदा देख कर खुश हो रहे होंगे,’’ मैं ने उन का मजाक बनाते हुए कहा, ‘‘अजीब तुम्हारे पुरखे हैं.’’

‘‘लगता है, तुम पर किसी अधर्मी की छाया पड़ गई है.’’

‘‘बिलकुल नहीं मित्र, जो धर्म में है ही नहीं उसे प्रचारित करने वालों के खिलाफ मैं बोल रहा हूं. इसी कारण आज हिंदू धर्म मजाक बन गया है,’’ मैं ने एक संक्षिप्त सा भाषण ही दे डाला.

‘‘देखो यार, तुम्हारे भाषण देने से मुझ पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा क्योंकि मैं भगवाधारी कट्टर पार्टी से हूं और पार्टी का आदेश सिरमाथे पर,’’ तिवारीजी बोले, ‘‘पुरखे ऐसा करने से खुश होते हैं तो मैं ने ऐसा कर दिया. मैं तो वही करूंगा जो पार्टी के लोग चाहते हैं. फिर मुझे अपनी जाति से बाहर तो कोई नहीं करेगा,’’ ऐसा कह कर तिवारीजी हीही कर के हंस पड़े.

मैं ने तिवारीजी से कहा, ‘‘गजब का स्टेमना है आप का.’’

प्रशंसा सुन कर वह खुश हो गए और कहने लगे, ‘‘क्या बताएं यार, अकेले मैं ने नहीं मेरे पूरे परिवार ने आज अभी तक भोजन ग्रहण नहीं किया है.’’

‘‘क्यों? क्या मिला नहीं?’’

‘‘कैसी बातें करते हो तुम, सातों पकवान बना कर रख छोड़े हैं लेकिन खा नहीं सकते.’’

‘‘क्यों, क्या बात हो गई?’’

‘‘यार, सुबह से हम पूर्वजों को यानी कि कौओं को खाने का निमंत्रण दे रहे हैं लेकिन अभी तक वह नहीं पहुंचे. लगता है यह प्रजाति भी लुप्त हो रही है,’’ कह कर उन्होंने अपनी काली गरदन के पास उंगली रगड़ कर मैल की गोली बनाई और क्रिकेटर की तरह निशाना साध कर फेंक दी और उदास हो गए.

उन की उदासी मुझ से देखी नहीं गई. पूरे परिवार को भूख से परेशान होने की बात सुन कर मेरा मन द्रवित हो उठा. मैं ने कहा, ‘‘यार, तिवारीजी, मैं कुछ कहूं?’’

मरी हुई आवाज उन के मुंह से निकली, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे नहीं लगता कि कौए तुम्हारे यहां लंच लेने आएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ हैरत से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने पूछा.

‘‘यार, जिन्हें तुम न्योता दे रहे हो वे सब तो महाभोज करने में लगे हैं.’’

‘‘कौए, महाभोज, क्या मतलब?’’ तिवारीजी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यार, अभी जिस रास्ते से मैं भागता हुआ  आ रहा था उस पर एक मरे हुए जानवर को कौए खा रहे थे, तुम ही कहो, आज के दिन इतनी अच्छी नानवेज डिश छोड़ कर वह घासफूस खाने तुम्हारे घर की छत पर क्यों आएंगे?’’

‘‘इस का अर्थ तो यह हुआ कि आज मेरा पूरा परिवार भूखा ही रहेगा.’’

‘‘शायद,’’ मैं ने भी गंभीरता से कहा.

‘‘फिर क्या उपाय हो सकता है?’’ तिवारीजी ने किसी क्लाइंट की तरह मुझ से सलाह मांगी.

‘‘एक उपाय है.’’

‘‘कहो दोस्त, जल्दी कहो, पूरे परिवार को जोरों से भूख लगी है.’’

मैं ने पहले तो अपने दाएंबाएं देखा ताकि मौका मिले तो भाग सकूं. फिर कहा, ‘‘यार, एक भोजन की थाली परोस कर उस मरे हुए जानवर के पास रख आओ. हो सकता है टेस्ट चेंज करने के लिए कौए कुछ खा लें.’’

‘‘आइडिया तो बहुत बढि़या है,’’ कह कर तिवारीजी ने मुझे अपने गले से चिपटा लिया और अपने घर की ओर तेज कदमों से चल दिए ताकि जल्दी से थाली परोस कर मरे ढोर के पास रख सकें, जहां उन के पुरखे उसे ग्रहण कर सकें. Hindi Humor Story

Office Humor Story: काश, मेरा भी बौस होता

Office Humor Story. आज फिर अनीता छुट्टी पर है. इस का अंदाज मैं ने इसी से लगा लिया कि वह अभी तक तैयार नहीं हुई. लगता है कल फिर वह बौस को अदा से देख कर मुसकराई होगी. तभी तो आज दिनभर उसे मुसकराते रहने के लिए छुट्टी मिल गई है.

मेरे दिल पर सांप लोटने लगा. काश, मेरा भी बौस होता…बौसी नहीं…तो मैं भी अपनी अदाओं के जलवे बिखेरती, मुसकराती, इठलाती हुई छुट्टी पर छुट्टी करती चली जाती और आफिस में बैठा मेरा बौस मेरी अटेंडेंस भरता होता…पर मैं क्या करूं, मेरा तो बौस नहीं बौसी है.

बौस शब्द कितना अच्छा लगता है. एक ऐसा पुरुष जो है तो बांस की तरह सीधा तना हुआ. हम से ऊंचा और अकड़ा हुआ भी पर जब उस में फूंक भरो तो… आहा हा हा. क्या मधुर तान निकलती है. वही बांस, बांसुरी बन जाता है.

‘‘सर, एक बात कहें, आप नाराज तो नहीं होंगे. आप को यह सूट बहुत ही सूट करता है, आप बड़े स्मार्ट लगते हैं,’’ मैं ऐसा कहती तो बौस के चेहरे पर 200 वाट की रोशनी फैल जाती है.

‘‘ही ही ही…थैंक्स. अच्छा, ‘थामसन एंड कंपनी’ के बिल चेक कर लिए हैं.’’

‘‘सर, आधे घंटे में ले कर आती हूं.’’

‘‘ओ के, जल्दी लाना,’’ और बौस मुसकराते हुए केबिन में चला जाता. वह यह कभी नहीं सोचता कि फाइल लाने में आधा घंटा क्यों लगेगा.

पर मेरी तो बौसी है जो आफिस में घुसते ही नाक ऊंची कर लेती है. धड़मधड़म कर के दरवाजा खोलेगी और घर्रर्रर्रर्र से घंटी बजा देगी, ‘‘पाल संस की फाइल लाना.’’

‘‘मेम, आज आप की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

वह एक नजर मेरी आंखों में ऐसे घूरती है जैसे मैं ने उस की साड़ी का रेट कम बता दिया हो.

‘‘काम पूरा नहीं किया क्या?’’ ठां… उस ने गरम गोला दाग दिया. थोड़ी सी हवा में ठंडक थी, वह भी गायब हो गई, ‘‘फाइल लाओ.’’

दिल करता है फाइल उस के सिर पर दे मारूं.

‘‘सर, आज मैं बहुत थक गई हूं, रात को मेहमान भी आए थे, काफी देर हो गई थी सोने में. मैं जल्दी चली जाऊं?’’ मैं अपनी आवाज में थकावट ला कर ऐसी मरी हुई आवाज में बोलती जैसी मरी हुई भैंस मिमियाती है तो बौस मुझे देखते ही तरस खा जाता.

‘‘हां हां, क्यों नहीं. पर कल समय से आने की कोशिश करना,’’ यह बौस का जवाब होता.

लेकिन मेरे मिमियाने पर बौसी का जवाब होता है, ‘‘तो…? तो क्या मैं तुम्हारे पांव दबाऊं? नखरे किसी और को दिखाना, आफिस टाइम पूरा कर के जाना.’’

मन करता है इस का टाइम जल्दी आ जाए तो मैं ही इस का गला दबा दूं.

‘‘सर, मेरे ससुराल वाले आ रहे हैं, मैं 2 घंटे के लिए बाहर चली जाऊं,’’ मैं आंखें घुमा कर कहती तो बौस भी घूम जाता, ‘‘अच्छा, क्या खरीदने जा रही हो?’’ बस, मिल जाती परमिशन. पर यह बौसी, ‘‘ससुराल वालों से कह दिया करो कि नौकरी करने देनी है कि नहीं,’’ ऐसा जवाब सुन कर मन से बददुआ निकलने लगती है. काश, तुम्हारी कुरसी मुझे मिल जाती तो…लो इसी बात में मेरी बौसी महारानी पानी भरती दिखाई देती.

उस दिन पति से लड़ाई हो गई तो रोतेरोते ही आफिस पहुंची थी. मेरे आंसू देखते ही बौसी बोली, ‘‘टसुए घर छोड़ कर आया करो.’’ लेकिन अगर मेरा बौस होता तो मेरे आंसू सीधे उस के (बौस के) दिल पर छनछन कर के गरम तवे पर ठंडी बूंदों की तरह गिरते और सूख जाते. वह मुझ से पूछता, ‘क्या हुआ है? किस से झगड़ा हुआ.’ तब मैं अपने पति को झगड़ालू और अकड़ू बता कर अपने बौस की तारीफ में पुल बांधती तो वह कितना खुश हो जाता और मेरी अगले दिन की एक और छुट्टी पक्की हो जाती.

कोई भी अच्छी ड्रेस पहनूं या मेकअप करूं तो डर लगने लगता है. बौसी कहने लगती है, ‘‘आफिस में सज कर किस को दिखाने आई हो?’’ अगर बौस होता तो ऐसे वाहियात सवाल थोड़े ही करता? वह तो समझदार है, उसे पता है कि मैं उस के दिल के कोमल तारों को छेड़ने और फुसलाने के लिए ही तो ऐसा कर रही हूं. वह यह सब जान कर भी फिसलता ही जाएगा. फिसलता ही जाएगा और उस की इसी फिसलन में उस की बंद आंखों में मैं अपने घर के हजारों काम निबटा देती.

पर मेरी किस्मत में बौस के बजाय बौसी है, बासी रोटी और बासी फूल सी मुरझाई हुई. उस के होेते हुए न तो मैं आफिस टाइम पर शौपिंग कर पाती हूं, न ही ससुराल वालों को अटेंड कर पाती हूं, न ही घर जा कर सो पाती हूं, न ही अपने पति की चुगली उस से कर के उसे खुश कर पाती हूं और न ही उस के रूप और कपड़ों की बेवजह तारीफ कर के, अपने न किए हुए कामों को अनदेखा करवा सकती हूं.

अगर मेरा बौस होता तो मैं आफिस आती और आफिस आफिस खेलती, पर काम नहीं करती. पर क्या करूं मैं, मेरी तो बौसी है. इस के होने से मुझे अपनी सुंदरता पर भी शक होने लगा है. मेरा इठलाना, मेरा रोना, मेरा आंसू बहाना, मेरा सजना, मेरे जलवे, मेरे नखरे किसी काम के नहीं रहे.

इसीलिए मुझे कभीकभी अपने नारी होने पर भी संदेह होने लगा है. काश, कोई मेरी बौसी को हटा कर मुझे बौस दिला दे.  Office Humor Story

Family Story in Hind: मौत और फैसला- लक्ष्मी, श्रीनिवास और बम धमाका

Family Story in Hindi: लक्ष्मी और श्रीनिवास ने लवमैरिज की थी. पर कुछ समय के बाद ही श्रीनिवास बदल गया था. लक्ष्मी अपने पति को गलत रास्ते पर जाने से न रोक सकी, लेकिन वह अपने सपनों को भी नहीं मरने देना चाहती थी. क्या थे उस के सपने और क्या लक्ष्मी का पति सही रास्ते पर आ पाया? लक्ष्मी अपने हाथ में एक खुला खत लिए हुए खड़ी थी और थरथर कांप रही थी. उस ने घबराते हुए टिकटिक करती हुई घड़ी की तरफ नजर फेंकी. 5 बजने में 35 मिनट बाकी थे. वह फिर से खत देखने लगी. लक्ष्मी देख रही थी कि टेढ़ेमेढ़े अक्षरों में क्या लिखा है, क्या वह इस समय भी पहुंच सकती है? हां, अभी समय है. वह मौके पर पहुंच सकती है. उस ने झपट कर सोफे पर पड़ा हुआ हैंडबैग उठाया और तेजी से बाहर निकली.

घर के सामने ही लक्ष्मी की स्कूटी खड़ी थी. उस ने तेजी से स्कूटी स्टार्ट की और गुलाब बाग की ओर चल पड़ी. उसे रास्ते की भीड़ पर गुस्सा आ रहा था.

फिर भी लक्ष्मी की स्कूटी सनसनाती हुई भीड़भाड़ से भरी सड़कों से गुजरने लगी. लक्ष्मी बारबार घड़ी देख रही थी. समय बड़ी तेजी से निकल रहा था. साढ़े 4 हुए, फिर पौने 5 और अब 4 बज कर 50 मिनट. बस, 10 मिनट और… गुलाब बाग थोड़ी दूर है. ट्रैफिक भी कितना है कि वह कैसी मरी चाल से चला पा रही है स्कूटी को.

4 बज कर 55 मिनट पर लक्ष्मी गुलाब बाग के बड़े दरवाजे पर पहुंची. वहां एक मीटिंग हो रही थी. चारों तरफ नीले झंडे लगे हुए थे.

लक्ष्मी ने स्कूटी खड़ी की और भीड़ की तरफ दौड़ी. भीड़ में घुस पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन वह पलभर में ही बीचोंबीच पहुंच गई.

मंच पर फूलमालाओं से लदा हुआ, सफेद कपड़े और नीली टोपी पहने हुए एक आदमी जोरदार भाषण दे रहा था. उस की आवाज लाउडस्पीकरों के जरीए चारों तरफ फैल रही थी.

लक्ष्मी ने न तो उस आदमी की तरफ देखा और न उस के भाषण का एक भी शब्द सुनने की कोशिश की. उस की आंखें श्रीनिवास को ढूंढ़ रही थीं.

आखिरकार लक्ष्मी ने श्रीनिवास को ढूंढ़ ही लिया. वह मंच के नीचे तीसरी लाइन में बैठा था, लेकिन इस समय 5 बजने में सिर्फ कुछ ही सैकंड बाकी थे.

लक्ष्मी जल्दी से जल्दी श्रीनिवास के पास पहुंचने के लिए भीड़ में से रास्ता बनाने की कोशिश कर रही थी. अचानक उस ने देखा कि श्रीनिवास ने अपनी जेब से एक पिस्तौल निकाली. लक्ष्मी को यह होश नहीं रहा कि पहले पिस्तौल छूटी या उस के मुंह से चीख निकल पड़ी.

फूलमालाओं से लदा हुआ आदमी कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़ा. उस के सीने से सुर्ख खून की धार बह चली. भीड़ में इस हादसे से खलबली मच गई. हर आदमी चीख रहा था.

लक्ष्मी भीड़ के बीच फंस गई थी. वह कुचली जा रही थी, लेकिन फिर भी श्रीनिवास के पास पहुंचने की कोशिश कर रही थी.

अचानक लक्ष्मी को श्रीनिवास के चारों तरफ पुलिस की खाकी वरदियां दिखाई दीं. वह समझ गई कि पुलिस ने उसे पकड़ लिया है.

इस के बाद पुलिस की गाड़ी आ गई. उसे श्रीनिवास की झलक भर मिली थी कि सिपाहियों ने उसे गाड़ी में बंद कर दिया. गाड़ी धूल का गुबार उड़ाती हुई चली गई. लक्ष्मी उस गुबार को देखती रह गई.

लक्ष्मी ने पता लगाने की कोशिश की कि श्रीनिवास को किस जेल में भेजा गया है, मगर कुछ भी पता न लग सका. वह उसी जगह घूमती रही. जब अंधेरा हो गया और वह थक कर चूर हो गई, तो घर लौट आई.

अपने कमरे में आते ही लक्ष्मी एक आरामकुरसी पर गिर पड़ी. उस ने कमरे की बत्ती तक नहीं जलाई. खुली खिड़की से आती हुई रोशनी की पट्टी एक नौजवान के फोटो पर पड़ रही थी.

लक्ष्मी उस फोटो की तरफ एकटक देख रही थी. उस नौजवान के चेहरे पर शांत मुसकराहट खेल रही थी. लक्ष्मी समझ नहीं पा रही थी कि उस की मासूम निगाहों के पीछे आतंक की आग कहां छिपी थी. उसे 5 साल पहले की बातें याद आने लगीं…

उस समय वे दोनों कालेज में पढ़ते थे. वह यानी श्रीनिवास कट्टर राष्ट्रीय विचारों का था. लक्ष्मी उस के विचारों से प्रभावित हो कर उस की तरफ खिंच गई थी. श्रीनिवास के विचार कभीकभी उसे बहुत खतरनाक मालूम पड़ते थे, लेकिन वह फिर भी उस की ओर खिंचती ही चली गई.

लक्ष्मी श्रीनिवास के नजदीक आने की कोशिश करने लगी और उस के एक दोस्त ने श्रीनिवास से उस का परिचय करा दिया. श्रीनिवास भी उस की तरफ खिंच गया था, इसलिए उन की दोस्ती बढ़ने लगी. बिलकुल उसी तरह, जैसे हवा लगने से आग बढ़ती है. हालांकि उन के विचार कभीकभी टकरा जाते थे. लक्ष्मी उदारवादी थी, सब को बराबर समझाने वाली. लेकिन वह मोह बंधन तोड़ न सकी और उस ने श्रीनिवास के साथ ब्याह कर लिया.

कुछ समय तक वे दोनों बहुत सुखी रहे. श्रीनिवास एक आदर्श पति की तरह लक्ष्मी को सुखी रखने की कोशिश करता रहा. लक्ष्मी यह देख कर खुश होने लगी कि उस ने अपने पति की विचित्र सोच को बदल दिया है.

एक साल सपनों और कल्पनाओं में निकल गया. इस के बाद श्रीनिवास ऊबने लगा और रात को देर तक बहस करने लगा. वह अब अकसर ही कहने लगता था, ‘‘लक्ष्मी, मैं तो तुम्हें अपनी पत्नी समझता हूं, लेकिन तुम मुझे अपना पति नहीं समझती हो.’’

लक्ष्मी ने श्रीनिवास को अपनी तरफ से समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह उसे जरा भी न समझ पाई. श्रीनिवास इतना जिद्दी था कि अपने सामने किसी की नहीं सुनता था. बस अपने दल के कट्टर नेताओं की ही बात वह मानता था. उन की पार्टी की सरकार थी, पर उसे इस में भी कमी नजर आती थी. वह चाहता था कि जो भी काम हो रहा है, उस का जल्दी से जल्दी नतीजा सामने आए.

एक दिन शाम को श्रीनिवास ने लक्ष्मी के सामने ऐलान कर दिया कि वह इस दल के आंतकवादियों के दस्ते में शामिल हो गया है. उस का विचार था कि केवल हिंसा द्वारा ही देश की संस्कृति को बचाया जा सकता है.

लक्ष्मी को इस फैसले से बहुत दुख हुआ. उस ने खुद अपने और होने वाले बच्चे की खातिर श्रीनिवास को समझाने की कोशिश की. वह प्रेम और फर्ज की जद्दोजेहद में फंसा रहा. न तो वह लक्ष्मी के प्यार को कुचल सकता था और न ही फर्ज से मुंह मोड़ना चाहता था.

आखिर में जब श्रीनिवास को आतंकवादी संगठन द्वारा एक विपक्षी नेता को खत्म करने का काम सौंपा गया, तो उस ने फर्ज के सामने लक्ष्मी के प्यार की परवाह नहीं की. वह लक्ष्मी और अपने मासूम बच्चे को तकलीफ नहीं देना चाहता था, फिर भी वह अपने आदर्शों के सामने निजी बातों को नहीं आने देना चाहता था. अगर वह इस काम से हट गया, तो कभी अपनेआप को माफ नहीं कर सकेगा.

श्रीनिवास ने ये सब बातें लक्ष्मी को अपने आखिरी खत में समझा कर माफी मांग ली थी. ह्वाट्सएप इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की कि कहीं वह पकड़ा न जाए. लक्ष्मी ने उसे इस जुर्म से बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब वह वहां पहुंची, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अगले दिन सुबह लक्ष्मी सैंट्रल पुलिस स्टेशन जाने वाली बस में बैठ गई. उस के पास ही एक आदमी अखबार पढ़ रहा था. उस अखबार में मोटे अक्षरों में कल शाम की हत्या की खबर छपी थी.

लक्ष्मी उस की तरफ देखे बिना न रह सकी. कुछ लोग श्रीनिवास को हत्यारा और जानवर कह रहे थे, तो कुछ उसे देशभक्त बता रहे थे. लक्ष्मी का दिल पीड़ा से कराह रहा था.

लक्ष्मी का गुस्सा भी बढ़ रहा था. इन लोगों के हिसाब से श्रीनिवास जानवर है. ये अजनबी लोग क्या जानें कि बहादुर होते हुए भी श्रीनिवास का ब्रेनवाश किया जा चुका है. ये क्या जानें कि श्रीनिवास ने कितनी बेवकूफी से सपनों की वेदी पर अपने प्रेम की बलि दी है.

नहीं, कोई भी श्रीनिवास को नहीं समझता. उसे बचाने की कोशिश की जा रही थी. उसे सही बताने की कि एक को मार कर उस आवाज को बदला नहीं जा सकता. उसे समझाने की किसी ने कोशिश नहीं की. सिर्फ वही उस के विचारों को समझ सकी थी. उस ने अपने प्यार से उसे गलत रास्ते पर चलने से रोकने की कोशिश भी की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. जब उस ने कोशिश करने में जरा भी कसर नहीं रखी, तो वह कैसे अपनेआप को दोष दे.

पुलिस स्टेशन के सामने बस रुक गई, तो लक्ष्मी उतर गई. काफी परेशानी के बाद उसे श्रीनिवास से मिलने की इजाजत मिली.

श्रीनिवास एक आरामदेह कमरे में था. लक्ष्मी ने देखा कि वह हमेशा की तरह शांत है. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरी लक्ष्मी, मुझे दुख है कि मैं ने तुम्हें तकलीफ पहुंचाई है. चिंता मत करो, कुछ ही दिनों में मैं छूट जाऊंगा.’’

‘‘क्या तुम्हें इस बात का दुख नहीं है कि तुम ने एक आदमी की जान ली है?’’ लक्ष्मी ने पूछा.

‘‘हां, एक इनसान के नाते मुझे दुख है, लेकिन वह आदमी संस्कृति की रक्षा में बाधक था.’’

‘‘तुम अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. हो सकता है कि वह अपने नजरिए से समाज के एक हिस्से के लिए कुछ करने की कोशिश कर रहा हो.’’

‘‘बिलकुल हो सकता है, लेकिन वह हमारे सपनों के देश को बनाने में रोड़ा बन रहा था.’’

‘‘ओह श्रीनिवास, तुम सिर्फ अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. मैं तुम्हारा नजरिया समझती हूं. तकलीफ मुझे इस पर होती है कि मैं तुम्हारे किसी काम न आ सकी,’’ लक्ष्मी की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मेरी अच्छी लक्ष्मी, तुम गलत कहती हो. तुम हमेशा से मेरी प्रेरणा रही हो. दुखदर्द में तुम ने मुझे बहुत सहारा दिया है. लेकिन लक्ष्मी, तुम्हारा प्रेम और त्याग भी मेरे आदर्शों की भूख न मिटा सके. मैं इतना जिद्दी न होता और मेरे विचार दूसरी ही दिशा में मुड़ जाते. तुम चिंता न करो, मैं जल्दी ही छोड़ दिया जाऊंगा.

‘‘कुछ भी हो लक्ष्मी, अपने बच्चे को अब उसी रास्ते पर ले जाना है. उसे अपनेआप को समझने में मदद देनी है. यह याद रखना कि मैं ने हमेशा तुम्हारे प्रेम और त्याग की कद्र की है. आज भी मेरे साथ तुम्हारी मीठी यादें हैं, मेरे साथ वे पल हैं, जिन में मुझे रोशनी मिली थी, इसलिए कभी हिम्मत मत खोना.’’

लक्ष्मी सब्र के साथ कानून के फैसले का इंतजार करती रही. श्रीनिवास के खिलाफ गवाह नहीं मिले.

फैसला होने का दिन नजदीक आ रहा था. लक्ष्मी के गर्भ के दिन भी पूरे हो रहे थे. जिस दिन सुबह श्रीनिवास का फांसी पर फैसला आने वाला था, ठीक उसी समय, उसी दिन, लक्ष्मी ने एक बेटे को जन्म दिया. वह उस के नन्हे से मुख की तरफ एकटक देखती रही. उस की आंखों में भी उसे वही आग नजर आई, जो श्रीनिवास की आंखों में जला करती है. उसे लगा कि यह भी श्रीनिवास बनेगा.

तभी खबर आई कि कोर्ट ने गवाहों की कमी के आधार पर श्रीनिवास को बरी कर दिया था, पर जब वह बाहर आ रहा था, तब एक आदमी ने उसे माला पहनाई और तभी एक बम धमाका हुआ. वह आदमी और श्रीनिवास दोनों वहीं मारे गए.

लक्ष्मी ने अपने बेटे की तरफ देखा और सोचा कि उस का श्रीनिवास तो फिर से उस के पास आया है, पर उस ने ठान लिया कि वह जिंदगी को नए सिरे से नई दिशा की ओर मोड़ देगी और इस श्रीनिवास को संस्कृति के बहके नारों की ओर नहीं जाने देगी.

Family story in Hindi: धरतीपुत्र – इंजीनियर बना किसान

Family story in Hindi: मोहन और सुरेश 2 भाई थे. मोहन बड़ा, सुरेश छोटा था. उन के बचपन में ही पिता का देहांत हो गया था. दोनों की मां ने बहुत मुश्किल से उन का पालनपोषण किया था. मां की तकलीफ देखते हुए मोहन छोटी उम्र से ही काम करने लगा था. दोनों मांबेटा मिल कर छोटे से खेत में सब्जियां उगाते, उन्हें बाजार में बेचते, साथ ही दूसरे के खेतों में मजदूरी भी करते थे. एक बार मां ने मोहन से कहा था, ‘‘बेटा, तू भी पढ़ाई कर ले. मैं सब संभाल लूंगी. भले ही अच्छा खाना नहीं दे सकूंगी, रोटी का जुगाड़ तो हो ही जाएगा.’’मोहन ने कहा, ‘‘मां, अगर हम दोनों भाई पढ़ेंगे, तो किसी की पढ़ाई भी सही ढंग से नहीं होगी. अगर मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूंगा, तो छोटा भाई अच्छी तरह पढ़ाई कर लेगा. मैं शाम को मास्टरजी से पढ़ लिया करूंगा और वे इम्तिहान भी दिलवा देंगे.’’

सुरेश पढ़ाई में बहुत तेज था. बड़े भाई और मां की उम्मीदों पर खरा उतरता हुआ वह कामयाबी के रास्ते पर आगे बढ़ता रहा.

मोहन भी पास के हाईस्कूल के एक मास्टरजी की मदद से रात में पढ़ाई करता और उन्हीं की सलाह से फार्म भर कर उस ने मैट्रिक और इंटर का इम्तिहान पास किया था. इस के बाद पत्राचार से बीए करते हुए उस ने नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से कई तरह की ट्रेनिंग ले कर खेतीबारी से जुड़ी नई से नई तकनीक की जानकारी हासिल कर ली थी.

सुरेश का जिस दिन अपने ही राज्य के इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला हुआ, मोहन ने पूरे गांव को मिठाई खिलाई थी.

सुरेश जब कालेज में पढ़ रहा था, उसी समय उस के बड़े भाई मोहन का ब्याह हो गया. उस की भाभी बहुत प्यारी और सब का ध्यान रखने वाली थीं. भाभी के आने से घर में रौनक हो गई और सुरेश की पढ़ाई पूरी होने से पहले घर में गुडि़या सी भतीजी भी आ गई.

सुरेश अपनी भतीजी को बहुत स्नेह करता था. उस की इच्छा थी कि वह भतीजी को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाए और उसे हर वह खुशी दे, जो बचपन में इन दोनों भाइयों को नहीं मिल पाई थी.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन की इच्छा थी कि सुरेश एमबीए में दाखिला ले ले, पर पढ़ाई खत्म करते ही सुरेश की नौकरी एक बड़ी विदेशी कंपनी में लग गई, जिस का दफ्तर मुंबई में था.

सुरेश की तनख्वाह भी बहुत ज्यादा थी. इस वजह से सुरेश ने पत्राचार कोर्स से एमबीए करने का फैसला किया. उस ने अपने भाई और मां को भी समझ कर नौकरी करने के पक्ष में तैयार कर लिया.

नौकरी लगने के बाद सुरेश ने मोहन और मां से अपने साथ ही मुंबई चलने के लिए कहा, पर मोहन ने मुंबई जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘देख भाई, तू वहां नौकरी कर और यहां हमारी खेती भी है, उसे मैं संभालूंगा.

‘‘हम ने तो धीरेधीरे कर के कुछ और खेत भी ले लिए हैं. हमारी जो बंजर जमीन पड़ी थी, उस में भी सरकार की ओर से आम के बाग लगाने का प्रस्ताव मिला है, इसलिए हमें यहीं रहने दे.

‘‘हम मुंबई जरूर घूमने आएंगे. अभी तू अकेले जा कर नौकरी कर ले. जब हम तुम्हारी शादी करेंगे, तब तुम अपनी पत्नी को भी ले जाना. और जब तुम्हारी भतीजी स्कूल में पढ़ने लायक होगी, तब उसे भी अपने साथ रखना.’’

सुरेश बोला, ‘‘क्या भैया, अभीअभी तो मेरी नौकरी लगी है और आप शादी की बात कर रहे हैं. पहले एक अच्छा मकान बना लें, उस के बाद मेरी शादी की सोचना.

‘‘हमारा मकान बहुत छोटा और पुराना है. आप की सारी आमदनी तो मुझे पढ़ाने में लग गई. जो थोड़ीबहुत बचत होती थी, उस से आप ने और खेत ही बढ़ाए हैं.

‘‘मकान की मरम्मत भी नहीं हुई. मेरी भाभी और नन्ही भतीजी को इस मकान में कितनी परेशानी होती है, इसलिए पहले मकान, उस के बाद आगे की कुछ बात आप सोचना.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू तो पूरा पागल है. अरे, हम दोनों काम एकसाथ कर सकते हैं.’’

कुछ दिनों के बाद सुरेश मुंबई चला गया. वह तनख्वाह मिलते ही अपना खर्च निकाल कर हर महीने मोहन भैया को एक अच्छीखासी रकम भेज देता था.

एक दिन सुरेश ने फोन पर भैया से कहा, ‘‘भैया, मैं नए घर का नक्शा भिजवा रहा हूं, आप घर बनवाना शुरू कर दें.’’

मोहन ने वह नक्शा देख कर कहा, ‘‘पर, इतना बड़ा मकान बनाने के लिए तो कई लाख रुपए लगेंगे…’’

सुरेश बोला, ‘‘तो क्या हुआ भैया. मैं बैंक से कर्ज ले लूंगा. मेरी तनख्वाह से कर्ज चुकता होता रहेगा.’’

मोहन ने पहले तो कर्ज लेने के लिए बहुत मना किया, पर सुरेश की जिद पर मान गया. सुरेश ने बैंक से कर्ज ले लिया.

सुरेश की शादी के लिए भी बहुत से प्रस्ताव आ रहे थे. एक अच्छी लड़की देख कर मां और भैयाभाभी ने उस का ब्याह करा दिया.

मोहन जब अपनी पत्नी को ले कर मुंबई जा रहा था, तब वह अपने साथ अपनी भतीजी को भी ले जाना चाह रहा था, लेकिन मां ने समझाया, ‘‘इसे अभी मत ले जाओ, यह छोटी है. थोड़ी और बड़ी हो जाने दो, फिर ले जाना पढ़ाने के लिए.

‘‘अभी तुम दोनों जाओ. वैसे भी तुम दोनों का जीवन शुरू ही हुआ है अभी. पूरी जिंदगी पड़ी है जिम्मेदारी निभाने को.’’

सुरेश चला गया और मोहन ने घर बनवाना शुरू किया, पर न जाने उस के दिमाग में क्या बात आई कि बैंक से कर्ज लिए गए रुपए जैसेजैसे मिलते गए, उन में से आधे पैसों से उस ने खेती लायक कुछ जमीन खरीद ली और उस पर और्गैनिक खेती करने लगा.

मोहन ने आधे पैसे से साधारण सा मकान बना लिया, जिस में सुविधाएं तो सब थीं, पर जो मौडर्न डिजाइन सुरेश ने भेजा था, वह नहीं था.

सुरेश जब भी फोन पर मोहन को मकान के फोटो भेजने के लिए कहता, तो मोहन हंस कर बोलता, ‘‘कुछ राज भी तो रहने दे, जब पूरा मकान बन जाएगा तब देख लेना.’’

पूरा परिवार हंसीखुशी गांव और शहर दोनों जगह पर अपना समय बिता रहा था कि अचानक कोरोना वायरस का कहर शुरू हो गया.

कोरोना काल में हुई मंदी के चलते कई बड़ीबड़ी कंपनियों ने अपने मुलाजिमों की छंटनी कर दी थी. उन्हीं में सुरेश भी था. उस ने गांव जाने का फैसला किया.

पत्नी नेहा गांव जाने के लिए तो तैयार हो गई, पर उसे एक अलग ही चिंता सता रही थी, ‘‘गांव में हमारा रहनाखाना तो हो जाएगा, लेकिन बैंक की किस्त कहां से भरेंगे? हर महीने इतनी बड़ी रकम देना बड़ा मुश्किल होगा. ऐसे में तो हमारी गांव की जमीन भी बिक सकती है. भैया ने सही कहा था आप से कि अभी बड़ा घर बनवाने की जरूरत नहीं है.’’

यह सुन कर सुरेश बोला, ‘‘अभी तो गांव में चल कर देखते हैं. कुछ नहीं होगा तो कोई अपना ही काम शुरू करूंगा. कम से कम यह मुसीबत का समय तो निकल जाए.’’

जब नेहा और सुरेश गांव पहुंचे, तो नए घर को देख कर हैरान रह गए. भैया और मां खेत पर गए थे, भाभी घर में थीं.

थोड़े गुस्से और नाराजगी के मिलेजुले भाव से सुरेश ने भाभी से कहा, ‘‘भाभी, यह सब क्या है… यह घर बनवाया है आप ने… इतने सारे रुपयों में इतना साधारण सा मकान क्यों बना है? मैं ने तो भैया को एक बड़ा और मौडर्न मकान बनाने के लिए पैसा दिया था.’’

भाभी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘देवरजी, अभी तो आए हो, पहले नहाधो लो, कुछ खापी कर थोड़ा आराम तो कर लो, फिर अपने रुपयों का भी हिसाब कर लेना.’’

भाभी की बात सुन कर सुरेश थोड़ा सकपका गया, इसलिए वह एकदम से बोला, ‘‘नहींनहीं भाभी, आप बुरा मत मानिए. मैं तो इतना साधारण मकान देख कर यह बोल रहा था.’’

भाभी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं. अच्छा, मैं गरम पानी दे रही हूं. जाओ, पहले नहा कर आओ.’’

कमरे में जाने के बाद सुरेश को नहाने के लिए कपड़े निकाल कर देते हुए नेहा ने कहा, ‘‘आप को आते ही भाभी से ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. शायद उन्हें आप की बात पसंद नहीं आई.’’

सुरेश बोला, ‘‘मैं अपनी गलती मानता हूं, लेकिन मैं भी क्या करता… बैंक से इतना ज्यादा कर्ज लिया था. नौकरी लगने के बाद से ही मैं उन्हें पैसे भेजता रहा, बहुत सोचसमझ कर मैं ने खुद पर खर्च किया है. अपने भविष्य के लिए भी मैं ने कुछ भी नहीं रखा है. जोकुछ बचत हुई, तुम्हारे आने के बाद ही हुई. ऐसे में इतना साधारण मकान देख कर मैं अपने को रोक नहीं पाया.’’

नेहा ने कहा, ‘‘जो हो गया, वह हो गया, लेकिन आगे भैया या मां के सामने इस बारे में आप कुछ भी नहीं बोलेंगे.’’

सुरेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा ठीक है, अब नहाने भी दोगी या यह भाषण ही देती रहोगी…’’

छोटे भाई के गांव आने की खबर सुन कर मोहन और मां भी घर आ गए. नेहा द्वारा मना किए जाने के बाद भी सुरेश ने मां और भैया के सामने भी अपना वही सवाल रख दिया.

मोहन ने कहा, ‘‘पहले यह बताओ कि अचानक बिना सूचना के तुम कैसे आ गए, वह भी कोरोना काल में. अब यहां तुम्हें 15 दिन तक क्वारंटीन रहना होगा.’’

सुरेश बोला, ‘‘हम क्वारंटीन रह लेंगे, क्योंकि शहर में रहते तो कुछ दिन बाद फाके करने की नौबत आ जाती. एक बुरी सूचना है कि मेरी नौकरी छूट गई है. और अब मैं यह सोच रहा हूं कि बैंक से जो कर्ज लिया उस की किस्त कैसे भर पाऊंगा. इतना पैसा भी नहीं है कि कोई नया रोजगार भी कर सकूं. अभी के समय में तो कोई नया धंधा भी नहीं चलेगा. ऐसे में बैंक की किस्त देना मुश्किल लगता है.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू घबरा मत छोटे, कुछ भी मुश्किल नहीं होगा. हमारा धंधा अभी भी चलेगा.’’

सुरेश ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘मैं समझ नहीं भैया, कैसा धंधा?

मोहन ने समझाया, ‘‘तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारे द्वारा हर महीने भेजे गए और तुम्हारे नक्शे के मुताबिक मकान नहीं बना कर बचाए गए रुपए मैं ने कहीं उड़ा दिए क्या? नहीं मेरे भाई. इस साधारण मकान में सुविधाएं तो सारी हैं, बस मौडर्न नहीं है. इस तरह का मकान बनाने से आधी से ज्यादा रकम बच गई थी…’’

‘‘वही तो मैं भी पूछ रहा था कि साधारण मकान बना कर पैसे बचाने की जरूरत क्या आ गई आप को?’’ सुरेश ने मोहन की बात काटते हुए पूछ लिया.

मोहन ने कहा, ‘‘थोड़ा धीरज रख छोटे, वही मैं तुझे बता रहा हूं. उस बची हुई रकम से मैं ने कुछ उपजाऊ जमीन खरीद ली थी और उस पर नए तरीके से खेतीबारी कर रहा हूं.

‘‘इस बार हम ने तरबूज और खरबूजे लगाए थे. इस फसल से खर्च काट कर 3 लाख रुपए की आमदनी हुई है, जिसे मैं ने बैंक में जमा कर दिया है. उस से हम लोग कई महीने तक बैंक की किस्त दे ही सकते हैं. उस के खत्म होने के पहले हमारे आम की फसल की आमदनी आ जाएगी.’’

सुरेश खुश हो कर बोला, ‘‘मान गया भैया आप को. मैं तो महज दिखावे पर ध्यान दे रहा था, पर आप ने घर की माली हालत मजबूत करने पर ध्यान रखा.’’

मोहन ने हंसते हुए कहा, ‘‘आखिर तेरा बड़ा भाई हूं. और हां, तू कहता है तेरा रोजगार खत्म हो गया… कहां खत्म हुआ है. अभी तो और ज्यादा आगे बढ़ने का समय है. मैं अकेले सबकुछ नहीं संभाल पा रहा था, अब तुम मेरी मदद करना.’’

मोहन भैया की सूझबूझ से सुरेश बहुत प्रभावित था. उस ने अपनी पत्नी की ओर देखा और कहा, ‘‘देखा, तुम चिंता करती आ रही थी कि कर्ज कैसे चुकाएंगे. कल तक हम नौकर थे तो परेशानी थी, अब हम अपनी धरती मां के पुत्र बने हैं, अब हमें कोई परेशानी नहीं होगी. बैंक का कर्ज भी चुकता हो जाएगा.

‘‘धरती मां हमें उपज के रूप में अपना इतना स्नेहदुलार देंगी कि हम मालामाल हो जाएंगे. मैं अपने घर में रह कर खेतीबारी करूंगा. हां, मैं धरतीपुत्र किसान हूं.’’

Story in Hindi: सही सजा – मठ की जायदाद

Story in Hindi. पुरेनवा गांव में एक पुराना मठ था. जब उस मठ के महंत की मौत हुई, तो एक बहुत बड़ी उलझन खड़ी हो गई. महंत ने ऐसा कोई वारिस नहीं चुना था, जो उन के मरने के बाद मठ की गद्दी संभालता.

मठ के पास खूब जायदाद थी. कहते हैं कि यह जायदाद मठ को पूजापाठ के लिए तब के रजवाड़े द्वारा मिली थी.

मठ के मैनेजर श्रद्धानंद की नजर बहुत दिनों से मठ की जायदाद पर लगी हुई थी, पर महंत की सूझबूझ के चलते उन की दाल नहीं गल रही थी.

महंत की मौत से श्रद्धानंद का चेहरा खिल उठा. वे महंत की गद्दी संभालने के लिए ऐसे आदमी की तलाश में जुट गए, जो उन का कहा माने. नया महंत जितना बेअक्ल होता, भविष्य में उन्हें उतना ही फायदा मिलने वाला था.

उन दिनों महंत के एक दूर के रिश्तेदारी का एक लड़का रामाया गिरि मठ की गायभैंस चराया करता था. वह पढ़ालिखा था, लेकिन घनघोर गरीबी ने उसे मजदूर बना दिया था.

मठ की गद्दी संभालने के लिए श्रद्धानंद को रामाया गिरि सब से सही आदमी लगा. उसे आसानी से उंगलियों पर नचाया जा सकता था. यह सोच कर श्रद्धानंद शतरंज की बिसात बिछाने लगे.

मैनेजर श्रद्धानंद ने गांव के लोगों की मीटिंग बुलाई और नए महंत के लिए रामाया गिरि का नाम सु?ाया. वह महंत का रिश्तेदार था, इसलिए गांव वाले आसानी से मान गए.

रामाया गिरि के महंत बनने से श्रद्धानंद के मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने धीरेधीरे मठ की बाहरी जमीन बेचनी शुरू कर दी. कुछ जमीन उन्होंने तिकड़म लगा कर अपने बेटेबेटियों के नाम करा ली. पहले मठ के खर्च का हिसाब बही पर लिखा जाता था, अब वे मुंहजबानी निबटाने लगे. इस तरह थोड़े दिनों में उन्होंने अपने नाम काफी जायदाद बना ली.

रामाया गिरि सबकुछ जानते हुए भी अनजान बना रहा. वह शुरू में श्रद्धानंद के एहसान तले दबा रहा, पर यह हालत ज्यादा दिन तक नहीं रही.

जब रामाया गिरि को उम्दा भोजन और तन को आराम मिला, तो उस के दिमाग पर छाई धुंध हटने लगी. उस के गाल निकल आए, पेट पर चरबी चढ़ने लगी. वह केसरिया रंग के सिल्क के कपड़े पहनने लगा. जब वह माथे और दोनों बाजुओं पर भारीभरकम त्रिपुंड चंदन लगा कर कहीं बाहर निकलता, तो बिलकुल शंकराचार्य सा दिखता.

गरीबगुरबे लोग रामाया गिरि के पैर छू कर आदर जताने लगे. इज्जत और पैसा पा कर उसे अपनी हैसियत समझ में आने लगी.

रामाया गिरि ने श्रद्धानंद को आदर के साथ बहुत समझाया, लेकिन उलटे वे उसी को धौंस दिखाने लगे.

श्रद्धानंद मठ के मैनेजर थे. उन्हें मठ की बहुत सारी गुप्त बातों की जानकारी थी. उन बातों का खुलासा कर देने की धमकी दे कर वे रामाया गिरि को चुप रहने पर मजबूर कर देते थे. इस से रामाया गिरि परेशान रहने लगा.

एक दिन श्रद्धानंद मठ के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. चाय खत्म हुई कि वे कुरसी से लुढ़क गए. किसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस श्रद्धानंद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहती थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भेद खुलने का डर था, इसलिए रामाया गिरि थानेदार को मठ के अंदर ले गया और लेदे कर मामले को रफादफा करा दिया.

श्रद्धानंद को रास्ते से हटा कर रामाया गिरि बहुत खुश हुआ. यह उस की जिंदगी की पहली जीत थी. उस में हौसला आ चुका था. अब उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं थी.

रामाया गिरि नौजवान था. उस के दिल में भी आम नौजवानों की तरह तमाम तरह की हसरतें भरी पड़ी थीं. खूबसूरत औरतें उसे पसंद थीं. सो, वह पूजापाठ का दिखावा करते हुए औरत पाने का सपना संजोने लगा.

उन दिनों मठ की रसोई बनाने के लिए रामप्यारी नईनई आई थी. उस की एक जवान बेटी कमली भी थी. इस के बावजूद उस की खूबसूरती देखते ही बनती थी. गालों को चूमती जुल्फें, कंटीली आंखें और गदराया बदन.

एक रात रामप्यारी को घर लौटने में देर हो गई. मठ के दूसरे नौकर छुट्टी पर थे, इसलिए कई दिनों से बरतन भी उसे ही साफ करने पड़ रहे थे.

रामाया गिरि खाना खा कर अपने कमरे में सोने चला गया था, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. चारों ओर खामोशी थी. आंगन में बरतन मांजने की आवाज के साथ चूडि़यों की खनक साफसाफ सुनाई दे रही थी.

रामाया गिरि की आंखों में रामप्यारी की मस्त जवानी तैरने लगी. शायद उसे पाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था. उस ने आवाज दी, ‘‘रामप्यारी, जरा इधर आना.’’

रामाया गिरि की आवाज सुन कर रामप्यारी सिहर उठी. वह अनसुनी करते हुए फिर से बरतन मांजने लगी.

रामाया गिरि खीज उठा. उस ने बहाना बनाते हुए फिर उसे पुकारा, ‘‘रामप्यारी, जरा जल्दी आना. दर्द से सिर फटा जा रहा है.’’

अब की बार रामप्यारी अनसुनी नहीं कर पाई. वह हाथ धो कर सकुचाती हुई रामाया गिरि के कमरे में पहुंच गई.

रामाया गिरि बिछावन पर लेटा हुआ था. उस ने रामप्यारी को देख कर अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराई, फिर टेबिल पर रखी बाम की शीशी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘जरा, मेरे माथे पर बाम लगा दो…’’

मजबूरन रामप्यारी बाम ले कर रामाया गिरि के माथे पर मलने लगी. कोमल हाथों की छुअन से रामाया गिरि का पूरा बदन झनझना गया. उस ने सुख से अपनी आंखें बंद कर लीं.

रामाया गिरि को इस तरह पड़ा देख कर रामप्यारी का डर कुछ कम हो चला था. रामाया गिरि उसी का हमउम्र था, सो रामप्यारी को मजाक सूझाने लगा.

वह हंसती हुई बोली, ‘‘जब तुम्हें औरत के हाथों ही बाम लगवानी थी, तो कंठीमाला के झमेले में क्यों फंस गए? डंका बजा कर अपना ब्याह रचाते. अपनी घरवाली लाते, फिर उस से जी भर कर बाम लगवाते रहते…’’

वह उठ बैठा और हंसते हुए कहने लगा, ‘‘रामप्यारी, तू मुझ से मजाक करने लगी? वैसे, सुना है कि तुम्हारे पति को सिक्किम गए 10 साल से ऊपर हो गए. वह आज तक नहीं लौटा. मुझे नहीं समझ आ रहा कि उस के बिना तुम अपनी जवान बेटी की शादी कैसे करोगी?’’

रामाया गिरि की बातों ने रामप्यारी के जख्म हरे कर दिए. उस की आंखें भर उठीं. वह आंचल से आंसू पोंछने लगी.

रामाया गिरि हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, रोने से कुछ नहीं होगा. मेरे पास एक रास्ता है. अगर तुम मान गई, तो हम दोनों की परेशानी हल हो सकती है.’’

‘‘सो कैसे?’’ रामप्यारी पूछ बैठी.

‘‘अगर तुम चाहो, तो मैं तेरे लिए पक्का मकान बनवा दूंगा. तेरी बेटी की शादी मेरे पैसों से होगी. तुझे इतना पैसा दूंगा कि तू राज करेगी…’’

रामप्यारी उतावली हो कर बोली, ‘‘उस के बदले में मुझे क्या करना होगा?’’

रामाया गिरि उस की बांह को थामते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, सचमुच तुम बहुत भोली हो. अरी, तुम्हारे पास अनमोल जवानी है. वह मुझे दे दो. मैं किसी को खबर नहीं लगने दूंगा.’’

रामाया गिरि का इरादा जान कर रामप्यारी का चेहरा फीका पड़ गया. वह उस से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझ से भारी भूल हो गई. मैं सम?ाती थी कि तुम गरीबी में पले हो, इसलिए गरीबों का दुखदर्द समझाते होगे. लेकिन तुम तो जिस्म के सौदागर निकले…’’

इन बातों का रामाया गिरि पर कोई असर नहीं पड़ा. वासना से उस का बदन ऐंठ रहा था. इस समय उसे उपदेश के बदले देह की जरूरत थी.

रामप्यारी कमरे से बाहर निकलने वाली थी कि रामाया गिरि ने झपट कर उस का आंचल पकड़ लिया.

रामप्यारी धक से रह गई. वह गुस्से से पलटी और रामाया गिरि के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया.

रात के सन्नाटे में तमाचे की आवाज गूंज उठी. रामाया गिरि हक्काबक्का हो कर अपना गाल सहलाने लगा.

रामप्यारी बिफरती हुई बोली, ‘‘रामाया, ऐसी गलती फिर कभी किसी गरीब औरत के साथ नहीं करना. वैसे मैं पहले से मठमंदिरों के अंदरूनी किस्से जानती हूं. बेचारी कुसुमी तुम्हारे गुरु महाराज की सेवा करते हुए अचानक गायब हो गई. उस का आज तक पता नहीं चल पाया.

‘‘मैं थूकती हूं तुम्हारी महंती और तुम्हारे पैसों पर. मैं गरीब हूं तो क्या हुआ, मुझे इज्जत के साथ सिर उठा कर जीना आता है.’’

इस घटना को कई महीने बीत गए, लेकिन रामाया गिरि रामप्यारी के चांटे को भूल नहीं पाया.

एक रात उस ने अपने खास आदमी खड्ग सिंह के हाथों रामप्यारी की बेटी कमली को उठवा लिया. कमली नीबू की तरह निचुड़ी हुई लस्तपस्त हालत में सुबह घर पहुंची. कमली से सारा हाल जान कर रामप्यारी ने माथा पीट लिया.

समय के साथ रामाया गिरि की मनमानी बढ़ती गई. उस ने अपने विरोधियों को दबाने के लिए कचहरी में दर्जनों मुकदमे दायर कर दिए. मठ के घंटेघडि़याल बजने बंद हो गए. अब मठ पर थानाकचहरी के लोग जुटने लगे.

रामाया गिरि ने अपनी हिफाजत के लिए बंदूक खरीद ली. उस की दबंगई के चलते इलाके के लोगों से उस का रिश्ता टूटता चला गया.

रामाया गिरि कमली वाली घटना भूल सा गया. लेकिन रामप्यारी और कमली के लिए अपनी इज्जत बहुत माने रखती थी.

एक दिन रामप्यारी और कमली धान की कटाई कर रही थीं, तभी रामप्यारी ने सड़क से रामाया गिरि को मोटरसाइकिल से आते देखा.

बदला चुकाने की आग में जल रही दोनों मांबेटी ने एकदूसरे को इशारा किया. फिर दोनों मांबेटी हाथ में हंसिया लिए रामाया गिरि को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ीं.

रामाया गिरि सारा माजरा समझ गया. उस ने मोटरसाइकिल को और तेज चला कर निकल जाना चाहा, पर हड़बड़ी में मोटरसाइकिल उलट गई.

रामाया गिरि चारों खाने चित गिरा. रामप्यारी के लिए मौका अच्छा था. वह फुरती से रामाया गिरि के सीने पर चढ़ गई. इधर कमली ने उस के पैरों को मजबूती से जकड़ लिया.

रामप्यारी रामाया गिरि के गले पर हंसिया रखती हुई बोली, ‘‘बोल रामाया, तू ने मेरी बेटी की इज्जत क्यों लूटी?’’

इतने में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. रामाया गिरि लोगों की हमदर्दी खो चुका था, सो किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की.

रामाया गिरि का चेहरा पीला पड़ चुका था. जान जाने के खौफ से वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘रामप्यारी… रामप्यारी, मेरा गला मत रेतना.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारा गला नहीं रेतूंगी. गला रेत दिया तो तुम झटके से आजाद हो जाओगे. मैं सिर्फ तुम्हारी गंदी आंखों को निकालूंगी. दूसरों की जिंदगी में अंधेरा फैलाने वालों के लिए यही सही सजा है.’’

रामप्यारी बिलकुल चंडी बन चुकी थी. रामाया गिरि के लाख छटपटाने के बाद भी उस ने नहीं छोड़ा. हंसिया के वार से रामाया गिरि की आंखों से खून का फव्वारा उछल पड़ा.

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