जुड़वा स्टार बहनें ‘चिंकी-मिंकी’

जुड़वा बच्चों का जीवन हमेशा ही चर्चा का विषय रहा है. इस को ले कर कई फिल्में भी बनीं और उपन्यास भी लिखे गए. कह सकते हैं यह विषय हमेशा से रोचक रहा है. दिल्ली की रहने वाली ‘चिंकी- मिंकी’ ने जब टिकटौक और इंस्टाग्राम पर अपने रोचक वीडियो पोस्ट करने शुरू किए तो रातोंरात वे मशहूर हो गईं.

अपनी इस खासियत को अपना हुनर बना कर ‘चिंकी-मिंकी’ ने खुद को टीवी की दुनिया में भी स्थापित कर लिया है. अब वे फैशन, टीवी और फिल्मों की दुनिया में अपना नाम कमाना चाहती हैं. कम उम्र में ही दोनों ने दौलत और शोहरत दोनों ही हासिल कर ली है. ‘चिंकी-मिंकी’ दोनों में ही भरपूर ग्लैमर है. जिस की वजह से वे लगातार हिट हो रही हैं.

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भारत और चीन के विवाद में भले ही टिकटौक को बंद कर दिया गया हो, पर टिकटौक पर वीडियो बना कर मशहूर होने वालों की संख्या कम नहीं है. छोटे शहरों और गांव के युवा अपने वीडियो बना कर खूब मशहूर हुए हैं. ‘चिंकी-मिंकी’ उन में सब से मशहूर हैं.

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दिल्ली की रहने वाली चिंकी मिंकी जुड़वा बहनों के असली नाम सुरभि मेहरा और समृद्धि मेहरा हैं. ये दोनों टिकटौक की पापुलर स्टार्स हैं. इन दोनों के टिकटौक पर करीब 10 लाख फालोअर्स हैं. 2019 के टौप 5 वायरल वीडियो में से एक वीडियो इन दोनों का भी था.

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खास बात यह है कि दोनों सिर्फ टिकटौक पर ही नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम पर भी बेहद मशहूर हैं. चिंकी और मिंकी का नाम इतना मशहूर हुआ कि दोनों के असली नाम सुरभि मेहरा और समृद्धि मेहरा को लोग भूल ही गए हैं.

दिल्ली की रहने वाली इन दोनों जुड़वा बहनों के जीवन में तमाम ऐसे पल मौजूद हैं, जो मुश्किल और हास्यपूर्ण भी रहे हैं. दोनों को देख कर अंदाज लगाना मुश्किल है कि किस का क्या नाम है.

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चिंकी और मिंकी दोनों केवल 60 सेकेंड के अंतर से छोटी और बड़ी बहनें हैं. चिंकी यानी सुरभि मेहरा बड़ी और मिंकी यानी समृद्धि मेहरा छोटी है. समृद्धि मेहरा की आवाज थोड़ी पतली है. इन का जन्म दिसंबर 1998 में हुआ था. चिंकी और मिंकी दोनों की पढ़ाई दिल्ली से हुई. 12वीं क्लास में चिंकी ने 92 फीसदी और मिंकी ने 89 फीसदी नंबर हासिल किए.

चिंकी और मिंकी ने स्नातक की पढ़ाई कालेज औफ वोकेशनल स्टडीज शेख सराय, नई दिल्ली से पूरी की. पढ़ाई के दौरान ही चिंकी और मिंकी टिकटोक पर वीडियो बनाने लगी. ये दोनों ही बहनें स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करना चाहती थीं. इन की तैयारी कनाडा जाने की थी. इसी बीच मशहूर हास्य टीवी सीरियल ‘द कपिल शर्मा शो’ में औडिशन के लिए इन्होंने अपना वीडियो भेजा तो उन को सिलेक्ट कर लिया गया.

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यह बात जब दोनों ने अपने पैरेंट्स को बताई तो उन्हें लगा कि दोनों मस्तीमजाक कर रही हैं. जब उन को पता चला कि यह सच बोल रही हैं तो इन को शूटिंग के लिए मुंबई बुलाया गया. वहां इन लोगों ने स्क्रिप्ट याद कर के मेहनत से अपना किरदार निभाया और इन के लिए सफलता का रास्ता खुल गया. अब चिंकी मिंकी ने जौब करने का फैसला दरकिनार कर दिया है. दोनों अलगअलग फैशन ब्रांड के लिए फोटो शूट और तमाम दूसरे तरह के काम करने लगी हैं.

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सुरभि और समृद्धि मेहरा में सब से खास बात यह है कि दोनों हुबहू एक जैसी हैं. दोनों अपने हेयरस्टाइल और गेटअप को भी एकदूसरे से पूरी तरह मैच रखती हैं. चिंकी मिंकी को देख कपिल शर्मा भी कंफ्यूज हो गए थे. चिंकी बताती है कि उन्हें खुद उन के पैरेंट्स नहीं पहचान पाते थे. ऐसे में कई बार बीमार एक होती थी और दवाई दूसरी को खिला दी जाती थी.

22 साल की उम्र में ही इन का फीगर 32-28-32 किसी अभिनेत्री को मात देता है. इस से साफ लगता है कि फिल्मों में भी ये बहुत आसानी से सफल हो सकती हैं. फैशन ब्रांड, फोटो शूट, वीडियोज और इवेंट के जरिए ये दोनों बहनें 1 से 2 लाख रुपए हर माह कमा लेती हैं. इन की अपनी सालाना कमाई 70 से 80 लाख के करीब होगी.

चिंकी मिंकी दोनों को ही घूमने का बेहद शौक  है. इन दोनों को अपने वीडियो बनाने, पबजी खेलने का भी शौक है. इन का पहला वीडियो ‘चिंकी मिंकी झाबुआ इंदौर ब्लौग’ था. इसे बहुत सफलता मिली. चिंकी मिंकी दोनों को ही अपना फीगर बनाए रखने का बेहद शौक  है.

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ऐसे में ये खानेपीने का बहुत ख्याल रखती हैं. इस के बाद भी कभीकभार चौकलेट और पिज्जा खाती हैं. टमाटर सूप इन को बेहद पसंद है. फलों में आम खाने का शौक है और पहनने में काला और पीला रंग बेहद पसंद है. चिंकी मिंकी दोनों को ही दूसरों को चौंकाने में मजा आता है. इस कारण दोनों एक जैसे कपड़े पहनती हैं और एक जैसे हावभाव प्रदर्शित करती हैं. उन की बातों से किसी को यह पता नहीं चलता कि कौन चिंकी है कौन मिंकी.

दोनों की आवाज में थोड़ा सा अंतर है. इस के अलावा हावभाव और बातचीत करने के अंदाज में अंतर है. यह अंतर वही पकड़ सकता है जो लगातार इन के साथ रहता हो, इन्हें पूरी तरह से समझता हो. सामान्य लोगों के लिए इस अंतर को पकड़ना सरल नहीं है. जिस से ये सभी को चौंकाती रहती हैं.

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लौंगिया देवी की इस दुखद मौत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना दुख जाहिर किया. इतना ही नहीं, दाह संस्कार के दौरान कुछ कर्मचारी पदाधिकारी भी वहां हाजिर हुए.

लौंगिया देवी काफी समय से बीमार थीं. उन की कोई सुध लेने वाला नहीं था. उन के दोनों बेटे मजदूरी करने के लिए किसी दूसरी जगह चले गए. लौंगिया देवी घर में अकेली रह रही थीं. एक दिन अचानक ‘द फ्रीडम’ के संस्थापक सुधीर कुमार उन के गांव गेहलौर पहुंचे. उन्होंने 19 नवंबर को वीडियो बना कर लौंगिया देवी के बुरे हालात को दिखाया, जिसे सोशल मीडिया पर कई लोगों ने शेयर किया.

लोगों की यह आवाज गृह विभाग के मुख्य सचिव आमिर शुभानी के कानों तक पहुंची. उन्होंने तत्काल गया के डीएम को फोन किया. गया के डीएम ने एंबुलैंस भेज कर लौंगिया देवी को सदर अस्पताल में भर्ती कराया. पर उन की हालत ठीक नहीं रहने की वजह से उन्हें सदर अस्पताल से मगध मैडिकल कालेज रेफर कर दिया गया. कुछ दिनों तक वहां इलाज चला, फिर वहां से भी उन्हें पटना रेफर कर दिया गया.

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लेकिन लौंगिया देवी के परिवार वाले उन्हें पटना नहीं ले जा सके और घर ले आए. घर लाते ही 4 दिसंबर को लौंगिया देवी ने दम तोड़ दिया.

याद रहे कि अपने दम पर पहाड़ काट कर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी पर केतन मेहता ने ‘मांझी : द माउंटेनमैन’ फिल्म बनाई थी और करोड़ों रुपए कमाए थे. आज उन्हीं दशरथ मांझी के परिवार के सदस्यों की हालत बहुत ज्यादा चिंताजनक है.

जिस फूस की झोंपड़ी में लौंगिया देवी रहती थीं, पिछले 3 साल से उस के फूस की मरम्मत तक नहीं हो सकी थी. ‘दशरथ मांझी महोत्सव’ का बैनर उस झोंपड़ी के ऊपर डाला हुआ है. उस पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का फोटो भी साफ नजर आ रहा है, जो मुख्यमंत्री की कल्याणकारी योजनाओं का मजाक उड़ा रहा है. याद रहे कि लौंगिया देवी पहाड़ काटने में अपने पिता दशरथ मांझी की मदद करती थीं. उन्हें खानपानी भी यही लौंगिया देवी ही पहुंचाने जाती थीं.

जब दशरथ मांझी जिंदा थे, तब वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने गए थे. तब नीतीश कुमार ने अपनी कुरसी छोड़ कर उन्हें उस पर बिठा दिया था. अखबारों में प्राथमिकता के साथ पहले पेज पर यह खबर छपी थी. तब लोगों के दिल में नीतीश कुमार के प्रति भी सम्मान का भाव खूब जगा था.

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दशरथ मांझी के किरदार पर फिल्म बना कर और किताबें लिख कर लोगों ने अथाह कमाई की है, पर उस के असली हकदार उन के परिवार के सदस्य आज भी गरीबी और जलालत के बीच जिंदगी जी रहे हैं. लिहाजा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सिर्फ ट्विटर पर श्रद्धांजलि नहीं दें, इन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तभी कारगर होगी जब दशरथ मांझी के परिवार के हालात में सुधार होगा.

छालीवुड एक्ट्रेस : पति, प्रेमी और धोखा

प्रथम घटना-

राजधानी रायपुर के तेलीबांधा क्षेत्र में सोशल मीडिया में दोस्ती के बाद प्रिया का प्यार मनोज से हुआ, शादी हुई और बाद में पता चला मनोज तो पहले ही शादीशुदा है. प्रिया ने क्षुब्ध होकर अग्नि स्नान कर आत्महत्या कर ली.

दूसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के बलदेव बाग की एक किशोरी बबली का प्रेम रायपुर के एक युवक अशोक के साथ हुआ शारीरिक आकर्षण के फेर में पड़कर अपना सब कुछ गंवाने के बाद, जब शादी की गुहार लगाई तो अशोक ने मुंह फेर लिया. लड़की ने आत्महत्या कर ली.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के चांपा जांजगीर जिला के अकलतरा में एक लड़की ने प्यार में धोखा खाकर किरोसिन तेल उड़ेल अपनी जान दे दी.

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जब किसी अबोध लड़की के पांव बहकते हैं पति अथवा मां बाप को छोड़कर, घर के आंगन डेहरी को लांघती है तो उसे नोचने और खसोटने के लिए जाने कितने लोग सामने आ जाते हैं. ऐसा हमने अक्सर फिल्मों और कहानियों में पढ़ा है, और देखा है. ऐसा ही कुछ घटनाक्रम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. जहां छत्तीसगढ़ के फिल्मी दुनिया अर्थात छालीवुड की एक्ट्रेस ने पति को इस महत्वकांक्षी आशाओं के फेर में छोड़ दिया कि वह फिल्मों की रंगीन दुनिया की ओर जा रही है तो दूसरी तरफ एक सह कलाकार ने मीठी चुपड़ी बातें करके उसका दैहिक शोषण कर लिया. अंततः
छत्तीसगढ़ फिल्म इंडस्ट्री की महिला कलाकार पुष्पा बेहरा ने आग लगाकर खुदकुशी करने की कोशिश की है और बुरी तरह जलने के पश्चात उसका अस्पताल में इलाज जारी है. 70 फिसदी जली हालत में इलाज के लिए जिला रायगढ़ अस्पताल में भर्ती कराया गया है. विगत दिनों उसका एक वीडियो “वायरल” हुआ – जिसमें उसने अपने प्रेमी पर आरोप लगाते हुए अग्नि स्नान करते हुएआत्महत्या करने की बात कही है.

वह घर की रही न घाट की!

इस प्रतिनिधि को जिला रायगढ़ के जूटमिल थाना प्रभारी अमित शुक्ला ने बताया कि पुष्पा बेहरा 70 फिसदी जल चुकी है. उनका इलाज चल रहा है, मामले में फिलहाल किसी को हिरासत में नहीं लिया गया है. पुष्पा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें उसने खुदकुशी करने का कारण प्रेमी मोहन पटेल द्वारा धोखा देने नहीं व उसे बदनाम करने को बताया है. वीडियो में वह कह रही है कि उनका प्रेमी हादसे से एक दिन पहले उनके घर में आया और उनपर कई लांछन लगाने के साथ घर में तोड़फोड़ भी की.
महिला के जीजा अरूण साहू के अनुसार मोहन पटेल के घर में घुसकर तोड़फोड़ करने के बाद पुष्पा ने फोन पर इसकी जानकारी उसे दी.

दरअसल पुष्पा के जीवन की त्रासदी यह रहेगी अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण जहां उसने पहले अपने मां और पिता को छोड़ा और एक प्रेमी नीरज शर्मा से प्रेम विवाह कर लिया और आगे चलकर उसे भी छोड़कर मोहन पटेल की ओर आकर्षित हो गई एक फिल्मी कहानी की तरह आगे चलकर स्थिति ऐसी बनी कि नवल की रही और न घाट की. ऐसी परिस्थितियों में मानसिक रूप से परेशान होकर उसने पेट्रोल डालकर आत्महत्या करने की कोशिश की है.

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पुष्पा का “प्रेम विवाह”

संपूर्ण घटनाक्रम को देखें तो यह तथ्य सामने आ गए हैं कि पुष्पा गलत सोहबत में पड़ कर बिगड़ती चली गई. सबसे पहले उसने जवान होते ही होश संभालते ही अपना रास्ता स्वयं तय करने का निर्णय किया और लव मैरिज कर पति के साथ रहने लगी. कुछ दिनों बाद जब उसकी महत्वाकांक्षा ने उड़ान भरी तो उसने रायपुर छालीवुड की तरफ रुख किया. और वहां कथित प्रेमी से धोखा खाया. फिल्मों के आकर्षण से खींच कर रायपुर के फिल्मी संसार की ओर आकर्षित पुष्पा की कहानी यह बताती है कि आज की नारी थोड़ा भी रास्ता भटकी नहीं की उसके जीवन में अंधेरा ही अंधेरा होता है.

महिला पुष्पा बेहरा (28) आदिवासी बाहुल्य रायगढ़ जिला की लैलूंगा विकासखंड की मूल निवासी है. वह प्रेम विवाह के पश्चात रायगढ़ स्थित साहेबनगर कालोनी में किराए के मकान में पति नीरज शर्मा के साथ रहती थी. इस दरमियान वह पति को बार-बार फिल्मों के आकर्षण के बारे में बताती तो पति पुष्पा को रोकने का समझाने का प्रयास करता रहा मगर फिल्मों की दुनिया के आकर्षण ने साल भर पहले पति से विवाद के बाद दोनों अलग रहने लगे थे. पुलिस के अनुसार पुष्पा रायगढ़ थाना क्षेत्र के मिट्ठुमुड़ा इलाके में पहुंची और खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा अग्नि स्नान करने के पश्चात बुरी तरह जल चुकी है. पुलिस उसका बयान लेकर मामले की तफ्तीश कर रही है या के दोषी कौन है?

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भ्रष्टाचार की बीमारी सरकारी योजनाओं में सेंधमारी

मसला

अमला है सरकारी जिस को एक धुन है,

लूटना, खाना ही जिस का खास गुन है.

आम जनता की कमाई भरी जिस में,

इस सड़े गोदाम में चूहे और घुन हैं.

ये लाइनें टैक्स देने वालों के पैसे के बल पर चल रही सरकारी स्कीमों में मची सेंधमारी पर मोजूं लगती हैं. आजादी के बाद से गरीबों, नौजवानों, औरतों व किसानों के नाम पर केंद्र व राज्यों की सरकारों ने बहुत सी योजनाएं चलाईं. पैसे की नहरें बहाईं, लेकिन पानी आखिरी छोर तक नहीं पहुंचा. लिहाजा, नतीजा वही ढाक के तीन पात. देश में करोड़ों लोग आज भी गरीबी की चपेट में हैं. साथ ही, बहुत सी समस्याएं बरकरार व भयंकर हैं.

कारण हैं खास

तालीम की कमी, नशा, अंधविश्वास व निकम्मापन गरीबी की सब से खास वजहें हैं, लेकिन गरीबों के लिए चल रही सरकारी योजनाओं का बेजा इस्तेमाल भी इस की एक बड़ी वजह है. नतीजतन, सरकारी अमले में गले तक रचाबसा भ्रष्टाचार का दलदल है, इसलिए ज्यादातर सरकारी स्कीमें गरीबी दूर करने में बेअसर, नाकाम व बिचौलियों के लिए चारागाह साबित हुई हैं. इन की बदौलत भ्रष्ट नेताओं, अफसरों व मुलाजिमों ने अकूत दौलत इकट्ठी की है.

जिन के कंधों पर जरूरतमंदों के लिए चल रही योजनाओं के तहत राहत पहुंचाने की जिम्मेदारी है, वे अपना फर्ज व जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा कर अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं. वे किसी को कानोंकान खबर नहीं देते, इसलिए बहुत कम लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी हो पाती है. सरकारी महकमे अपने दफ्तरों के बाहर चल रही योजनाओं में जनता के लिए दी जा रही छूट, कर्ज व सहूलियतों वगैरह का ब्योरा नहीं लिखवाते.

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सरकारी मुलाजिम कहीं किसी जरूरतमंद का फार्म भरवाने में मदद नहीं करते, उलटे उन्हें जराजरा से काम के लिए बारबार दफ्तरों के चक्कर कटवाते हैं. नतीजतन, बहुत से लोग या तो दलालों की शरण में जा कर अपनी जेब कटवाते हैं या थकहार कर घर बैठ जाते हैं.

ज्यादातर गरीब भोले, नावाकिफ व कम पढ़ेलिखे हैं. उन्हें अपने हकों व सरकारी स्कीमों की जानकारी नहीं है. वे सरकारी राहत व इमदाद पाने की खानापूरी भी नहीं कर पाते और उन में से ज्यादातर लोग सरकारी सहूलियतों से बेदखल रह जाते हैं. उन की जगह दूसरे लोग सांठगांठ कर के उन का हिस्सा हड़पने में कामयाब हो जाते हैं.

बिगड़ैल अमला

सरकारें हर साल अरबों रुपए बहुत सी योजनाओं में खर्च करती हैं, लेकिन उन का एक बड़ा हिस्सा वे गटक जाते हैं, जो चील, गिद्ध, कौवों की तरह ताक में लगे रहते हैं. मसलन, बहुत से लोग आज भी बेघर हैं. वे किसी तरह अपना सिर छिपाने के लिए फूंस के छप्पर, खपरैल व मिट्टी से बने कच्चे घरों में रहते हैं. ऐसे गरीब लोगों को पक्का घर मुहैया कराने की गरज से साल 2016-17 में प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की गई थी, लेकिन चालाक, मक्कार व दलाल लोग मुलाजिमों की मदद से इस में भी गड़बड़ी करने में कामयाब हो गए.

इस योजना से फायदा उठाने वालों के लिए तयशुदा शर्तें रखी गई थीं, लेकिन योजनाओं को लागू करने का जिम्मा तो सब से नीचे के मुलाजिमों पर होता है और वे अपना घर भरने के लिए मनमानी बंदरबांट करने लगते हैं. उन की नकेल कसने वाले भी अपने हिस्से के लालच में उन से मिल जाते हैं, इसलिए वे भी उन्हें चैक करने के बजाय अपनी आंखें मूंद लेते हैं.

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कुलमिला कर भ्रष्ट व निकम्मे सरकारी मुलाजिमों की मिलीभगत व मनमानी की वजह से अकसर गरीबों की जगह उन अमीरों को भी लिस्ट में शामिल कर लिया जाता है, जो असल में राहत या इमदाद पाने के हकदार नहीं होते. बाद में जब कहीं कोई शिकायत होती है, तो पोल खुलती है और जांचपड़ताल में गड़बड़ी पाई जाती है.

यही उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी हुआ. वहां प्रधानमंत्री आवास योजना में जिले के 1,884 लोगों में 534 लोग अपात्र यानी गलत पाए गए. सिर्फ किसी एक इलाके या किसी एक योजना में ही पलीता लगाया जा रहा है, ऐसा नहीं है. अपवाद छोड़ कर सरकार की ज्यादातर योजनाओं में लूटखसोट व बंदरबांट चल रही है, इसलिए हांड़ी का एक चावल देख कर ही बाकी सब का पता लग जाता है.

घपले और घोटाले

किसान सम्मान निधि योजना में  10 करोड़ किसानों के बैंक खातों में  6-6 हजार रुपए भेजने का दावा किया जा रहा है, लेकिन इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश में 1-2 नहीं, पूरे 14,000 लोग अपात्र पाए गए हैं. इन में से 1,200 किसान अकेले गोंडा जिले के हैं. राज्य सरकार ने इस पर कड़ा कदम उठाया है.

गरीब किसानों के लिए चली इस स्कीम में जिन्होंने बेजा तरीकों से सेंधमारी कर के सरकारी पैसा हड़पा ,वे अब उस रकम को सरकारी खजाने में वापस जमा करेंगे.

खेती महकमे ने चेताया है कि जिन लोगों ने गलत तरीके से किसान सम्मान निधि का पैसा लिया है, वे फौरन उसे वापस जमा कर दें, वरना उन से जुर्माने समेत वसूली की जाएगी.

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब व उत्तर प्रदेश में गरीब छात्रों को दिए जाने वाले वजीफे में हुए करोड़ों रुपयों की गड़बड़ी की जांच चल रही है.

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5 साल पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पिछले दिनों फर्जी छात्र व फर्जी कालेज दिखा कर सरकारी वजीफे के  6 करोड़ रुपए हड़पे गए थे. यह मामला बरसों तक माली जरायम केसों की जांच करने वाली पुलिस के पास रहा. अब कुसूरवार अफसरों पर मुकदमा कायम करने के लिए मंजूरी मांगी गई है.

इस के बाद साल 2018 में इटावा और मेरठ जिलों में स्कौलरशिप हड़पने के 109 मामले पकड़े गए थे, जिन पर एफआईआर दर्ज कराई गई थी. कमोबेश यही हाल विधवा पैंशन व बुढ़ावा पैंशन स्कीमों का है.

सरकारी योजनाओं में मिली रकम अब सीधे गरीबों के बैंक खातों में जाती है, लेकिन गड़बड़घोटाले करने वाले तरकीब व तरीके का तोड़ निकाल ही लेते हैं. इन का पूरा गिरोह मिलीभगत से काम करता है. कंप्यूटर में लाभार्थी की डिटेल फीड करते वक्त जानबूझ कर बैंक खातों का नंबर बदल दिया जाता है, इसलिए जो सरकारी सहूलियतें पाने के हकदार हैं, वे पीछे छूट जाते हैं और जो असरदार, चालबाज या छुटभैए नेता या उन के चमचे, चेलेचपाटे बेजा फायदा उठाने में कामयाब हो जाते हैं.

सरकारी योजनाओं में सारे असल गरीबों को इमदाद नहीं मिलती. यह बात यहीं खत्म नहीं होती. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा यह कि उन के साथ चौतरफा बेजा बरताव भी होता है. सहूलियतें देने का लौलीपौप दिखा कर काम कराने के नाम पर उन से मोटी रकम वसूली जाती है और बाद में उन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता है, इसलिए ज्यादातर गरीब बेचारे ठगे से देखते हुए रह जाते हैं.

ठगी पहले कदम से

सरकारी योजनाओं में गरीबों को लूटने का सिलसिला फार्म भरने के पहले पायदान से ही शुरू हो जाता है. कर्ज व छूट का फार्म भरवाने व बाद में मिलने वाली रकम का लालच दे कर दलाल पहले ही अपना हिस्सा झटक लेते हैं. बीते लौकडाउन के दौरान ऐसे बहुत से लोगों के कामधंधे बंद हो गए थे, जो रोज कमा कर खाते थे, इसलिए वे बेहद परेशान थे.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के इश्तिहार अखबारों में छपे थे. इस में ठेलेखोमचे आदि लगाने वालों को 10,000 रुपए का कर्ज मिलने का दावा किया गया था. सरकार ने मेरठ में 65,000 लोगों को इस स्कीम का फायदा देने का मकसद तय किया था. इस के उलट नगरनिगम के मुलाजिमों ने बीते 4 महीने में सिर्फ 18,745 लोगों का ही रजिस्ट्रेशन किया.

गौरतलब है कि उस में से केवल 6,815 फार्म ही बैंकों को भेजे गए. जब लीड बैंक से इस बाबत जानकारी की गई, तो पता लगा कि उन को 5,606 फार्म मिले. 209 फार्म बीच में कहां गायब हो गए, यह कोई नहीं जानता. और सुनिए, इन में से सिर्फ 1,036 फार्म ही कर्ज मंजूरी की सिफारिश करने लायक पाए गए, लेकिन कितनों को पैसा मिला, यह किसी को भी पता नहीं है.

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कड़वा सच

मेरठ में फलों की रेहड़ी लगा रहे किशनपुरा के दिनेश से जब इस लेखक ने बात की, तो उस ने बताया कि एक आदमी खुद को सरकारी मुलाजिम बता कर फार्म भरने के नाम पर उस से 200 रुपए ले गया. फिर उस के बाद क्या हुआ, यह आज तक पता नहीं चला.

इस ठगी का शिकार दिनेश अकेला नहीं है. आइसक्रीम बेच रहे मंशा, फूल बेचने वाले नंदू व जूस निकालने वाले फुरमान ने बताया कि उन्हें आज भी इंतजार है कि शायद कुछ इमदाद जरूर मिलेगी. हालांकि उन के पास कोई रसीद या फार्म भरने वाले का नामपता नहीं है. तालीम व जानकारी की कमी से बहुत

से गरीब लोग आएदिन ठगी के शिकार होते हैं.

यह है हल

सरकारी योजनाओं में पसरी लूटखसोट बंद करने के लिए जरूरी है कि योजनाओं का प्रचारप्रसार कारगर तरीकों से किया जाए. असली हकदार लोगों को छांट कर उन की पहचान लिस्ट बनाते वक्त पूरी जांचपड़ताल सही तरीके से की जाए. साथ ही, उन्हें जागरूक किया जाए. अपनी जेब भरने के लालच में गड़बड़ी करने वाले मुलाजिमों की जवाबदेही तय की जाए. घपलेघोटालों की जांच जल्दी पूरी की जाए. दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए, साथ ही, उन से ब्याज व जुर्माने समेत सरकारी पैसों की वसूली की जाए.

गरीबों की स्कीमों में घुसपैठ करने वाले अमीरों पर भी तगड़ा जुर्माना लगे और उन के नाम व फोटो इश्तिहारों में सार्वजनिक किए जाएं. हर योजना का पब्लिक औडिट हो, ताकि गड़बड़ी करने वालों पर कारगर नकेल कसी जा सके, वरना सरकारी स्कीमों में गरीबों के हक पर अमीरों की सेंधमारी आगे भी इसी तरह जारी रहेगी.

बिहार : सरकारी नौकरियों की चाहत ने बढ़ाई बेरोजगारी

धीरज कुमार

प्रदेश की राजधानी पटना में तकरीबन सभी जिलों के लड़केलड़कियां अलगअलग शहर के कोचिंग सैंटरों में अपना भविष्य बेहतर करने की उम्मीद में भागदौड़ करते देखे जा सकते हैं. उन की एक ही ख्वाहिश होती है कि किसी तरह से प्रतियोगिता परीक्षा में पास कर सरकारी नौकरी हासिल करना.

बहुत से लड़केलड़कियां अपना भविष्य बनाने की चाह में पटना जैसे शहरों में कई सालों से टिके होते हैं, फिर भले ही उन के मातापिता किसान हैं, रेहड़ी चलाने वाले हैं, छोटेमोटे धंधा करने वाले हैं. उन की थोड़ी आमदनी भी होगी, लेकिन वे अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए पैसा खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, चाहे इस के लिए खेत बेच कर, कर्ज ले कर, गहने गिरवी रख कर कोचिंग सैंटरों में लाखों रुपए क्यों न बरबाद करना पड़े.

कोचिंग सैंटर वाले भी इस का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. ज्यादातर कोचिंग सैंटर सौ फीसदी कामयाबी का दावा कर लाखों का कारोबार करते हैं, भले ही उन की कामयाबी की फीसदी जीरो के बराबर हो.

अब सवाल यह कि किसी सरकार के पास इतने इंतजाम हैं, जो सभी नौजवानों को नौकरी मुहैया करा देगी? इस सवाल के जवाब के लिए पिछले तकरीबन 10 सालों की  प्रमुख रिक्तियों और बहालियों का विश्लेषण किया गया. राज्य सरकार ने साल 2010 में बिहार में पहली बार शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) का आयोजन किया था. इस परीक्षा में 26.79 लाख लोगों ने आवेदन किया था, जिन में से मात्र 1.47 लाख अभ्यर्थियों को पास किया गया. इस में कामयाबी का फीसदी मात्र साढ़े 5 फीसदी था. राज्य सरकार ने उन सफल अभ्यर्थियों में से तकरीबन एक से सवा लाख लोगों को नियोजन किया.

उस समय शिक्षकों को सरकार ने  जो बहाली की, उन्हें नियोजन यानी आउटसोर्सिंग पर रखा गया, जिन को सरकार नियत वेतन देती है. नियमित शिक्षकों की तरह वेतन व अन्य सुविधाएं नहीं देती है. हां, चुनाव के समय कुछ पैसे बढ़ा कर वोट बैंक के लिए खुश करने की कोशिश की जाती है.

आज उन्हीं शिक्षकों ने कानून का दरवाजा खटखटा कर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ी, ताकि उन्हें पुराने शिक्षकों की तरह दूसरी सुविधाएं मिलें. लेकिन वे सरकार और अदालत के चक्रव्यूह में फंस कर हार गए.

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी दलील पेश की है कि स्थायी बहाली नहीं होंगी. पहले की हुई स्थायी बहाली को वर्तमान सरकार डाइंग कैडर यानी मृतप्राय मान चुकी है.

इस का मतलब यह है कि अब जो भी बहाली होगी, वह सिर्फ नियत वेतन पर रखा जाएगा. अब पुरानी बहाली की तरह ईपीएफ, बीमा, पैंशन, ग्रेच्युटी, स्थानांतरण, अनुकंपा पर नौकरी देने का प्रावधान आदि की सुविधाएं खत्म कर दी गई हैं.

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जबकि गैरसरकारी संस्थाओं में आज भी ऐसी सुविधाओं में से कुछ ही दी जाती हैं. यही वजह है कि मेहनत करने वाले लोग प्राइवेट संस्थाओं को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, लेकिन इस के बावजूद भी कुछ  लोग अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागना फायदेमंद है या नुकसानदायक.

बिहार सरकार स्टाफ सिलैक्शन कमीशन (एलडीसी) 2014 में  तकरीबन 13,000 पदों की बहाली के लिए परीक्षा का आयोजन किया गया. इन पदों पर बहाली के लिए तकरीबन  13 लाख  अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था. कई बार यह परीक्षा रद्द की गई. इस परीक्षा को टालते हुए लगभग  5-6 साल बीत जाने के बाद भी अभी उस की बहाली पूरी नहीं की गई है. अगर रिक्तियों के अनुपात में बहाली की संख्या को देखा जाए तो इस परीक्षा में महज  1 फीसदी अभ्यर्थियों का चयन किया जाना है.

बिहार सरकार जानबूझ कर कोई भी बहाली को कम समय में पूरा नहीं करती है, बल्कि उसी बहाली को कई सालों में चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की कोशिश करती है, ताकि समय लंबा खिंचे. इस से अभ्यर्थी धीरेधीरे कम होंगे और सरकार के एजेंडे का प्रचारप्रसार ज्यादा होगा. इस तरह सरकार को ज्यादा फायदा मिलेगा. ऐसी प्रक्रिया में कुछ अभ्यर्थियों की तो उम्र भी निकल जाती है, जिस के कारण वे बहाली से पहले ही छंट जाते हैं.

साल 2019 में बिहार पुलिस में कांस्टेबल के 11,880 पदों पर बहाली होनी थी, जिस में तकरीबन 13 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन दिए थे. अभ्यर्थियों के अनुपात में यह महज एक फीसदी से भी कम बहाली की गई. इस के साथ ही कई अन्य छोटीमोटी बहालियां हुईं जैसे दारोगा की बहाली, नर्स की बहाली, पशुपालन विभाग में बहाली वगैरह. इन सभी पदों की बहाली में सीटें कम थीं. इन 10 सालों की बहाली में तकरीबन छोटीबड़ी सभी बहालियां मिला कर तकरीबन डेढ़ से 2 लाख अभ्यर्थियों की बहाली हुई होगी.

ऊपर मोटेतौर पर 2-3 परीक्षाओं का जिक्र किया गया. गौर करने की बात  यह है कि तीनों परीक्षाओं  में तकरीबन 50 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया, जिन में से तकरीबन 2 लाख लोगों को नौकरी मिल गई.

बिहार के नौजवानों की यह खासीयत है कि एकसाथ कई परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. अगर मान लिया जाए कि तीनों परीक्षा में कुछ लोग समान रूप से सम्मिलित हुए हों, तो तकरीबन 30 से 35 लाख नौजवान 10 सालों में बेरोजगार रह गए यानी उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल पाई.

राज्य और केंद्र सरकार द्वारा युवाओं में स्किल पैदा करने के लिए ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के तहत कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. लेकिन इन प्रशिक्षण केंद्रों पर प्लेसमैंट की योजना नहीं होने के चलते ये सभी कार्यक्रम कागजों पर ही रह गए हैं. इसी तरह नौकरी से वंचित लोगों की वजह से बेरोजगारों की तादाद काफी बड़ी हो जाती है. उन में से ज्यादातर लोग घर छोड़ कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं. स्किल की कमी में कम तनख्वाह पर बाहरी राज्यों में काम करना पड़ता हैं.

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नीतीश सरकार अपने शुरू के कार्यकाल में बेरोजगारी दूर करने और रोजगार बढ़ाने के लिए बाहरी राज्यों के गैरसरकारी संस्थाओं को बिहार में आमंत्रित कर नियोजन मेला का आयोजन करती थी, जिस का मीडिया में काफी प्रचारप्रसार भी किया जाता था. इस में दूसरे राज्यों के धागा मिल, कपड़ा मिल, बीमा कंपनियां, सिक्योरिटी कंपनी, साइकिल कंपनी, मोटर कंपनी वगैरह छोटीबड़ी तकरीबन 20-22 कंपनियां हर जिले में आ रही थीं. उस में 18 से 25 साल की उम्र के लड़के और लड़कियों को रोजगार देने का काम किया जाता था. लेकिन लोगों ने गैरसरकारी कंपनी होने के चलते रोजगार हासिल करने में जोश नहीं दिखाया, इसलिए सरकार को वह कार्यक्रम बंद करना पड़ा.

केंद्र सरकार की ओर से की जाने वाली बहाली जैसे रेलवे, बैंक वगैरह में कम कर दी गई हैं या तकरीबन रोक दी गई हैं. फिर भी बिहार के छोटेबड़े शहरों में तैयारी करने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है, बल्कि इजाफा ही हुआ है.

साल 2001 से साल 2005 के बीच बिहार सरकार ने 11 महीने के लिए राज्य में शिक्षामित्रों की बहाली की थी. यह बहाली मुखिया द्वारा की गई थी, जिन का मासिक वेतन मात्र 1,500 रुपए था. बाद में आई सरकार ने उन के मासिक वेतन में बढ़ोतरी 3,000 रुपए कर दी. साल 2015 में  वर्तमान सरकार शिक्षकों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए वेतनमान तो लागू कर दिया, पर आज भी पुराने शिक्षकों की तरह सुविधाओं से वंचित रखा गया है.

आज सरकार हजार डेढ़ हजार रुपए पर किसी भी तरह की बहाली निकालती है, तो लोगों की भीड़ लग जाती है. लोगों का मानना है कि पहले सरकारी दफ्तर में किसी तरह से घुस जाओ. आने वाले समय में सरकार अच्छस वेतन दे ही देगी. इसी का नतीजा है कि बिहार में तकरीबन ढाई लाख रसोइया विद्यालयों में इस उम्मीद में काम कर रही हैं कि आने वाले दिनों में सरकार अच्छा वेतन देगी.

सरकारी नौकरियों के पीछे भागने की खास वजह यह रही है कि इस में मेहनत कम करनी पड़ती है. इस के उलट गैरसरकारी दफ्तरों में काम ज्यादा करना पड़ता है.

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बिहार में खेती लायक जमीन होते हुए भी लोगों का खेतीबारी के प्रति मोहभंग होता जा रहा है. इस के पीछे बाढ़, सुखाड़ और नवीनतम कृषि उपकरणों की कमी होना भी है, जिस के कारण लोगों के पास एकमात्र विकल्प सरकारी तंत्र में नौकरियों की तलाश करना रह जाता है.

नौजवानों को चाहिए कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागने के बजाय वे अपने अंदर हुनर पैदा करें. इस पर अपने पौजिटिव नजरिए को विकसित करने की जरूरत है. कोई भी नया हुनर सीख कर अपने कामधंधे में लगा जा सकता है और अपने परिवार के लिए सहारा बना जा सकता है.

सोशल मीडिया की दोस्ती से आप हो सकते हैं तबाह, पढ़ें पूरी खबर

संपूर्ण देश दुनिया सहित छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया के माध्यम से सेक्स संबंध बनाए जाने और बाद में धोखा देने की घटनाएं हो रही है. आए दिन ऐसी घटनाएं हमारे आसपास घटित हो रही है कि फेसबुक, व्हाट्सएप आदि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म के माध्यम से युवक-युवतियों में बातचीत शुरु होती है, संबंध बनते हैं, मुलाकातें होती हैं, और धीरे धीरे स्थिति सेक्स संबंध स्थापित करने तक पहुंच जाती है. और फिर शुरू होता है लड़की का यह आग्रह की मुझे अपना लो, विवाह कर लो. मगर युवक अब आनाकानी करने लगते हैं. और लड़की को अहसास होता है कि मैं छलावे में आ गई, धोखा खा गयी और मेरा जीवन बर्बाद हो गया.

आज हम इस रिपोर्ट में इस प्रकार की कुछ घटनाओं को संकेतिक रूप से यहां प्रस्तुत करते हुए यह बताने का अथक प्रयास कर रहे हैं कि युवक हो या युवतियां फेसबुक की दोस्ती, संबंधों को लेकर एक सीमा के आगे चले जाएंगे तो यह आग से खेलना होगा. सोशल मीडिया की दोस्ती, सेक्स संबंध एक ऐसी चिंगारी है जो जीवन तबाह कर देती है.

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला जशपुर जिले के बगीचा इलाके का रहने वाले एक युवक अमन तिवारी पीएससी की तैयारी करने के लिए बिलासपुर शहर आया था. यहां उसने फेसबुक के जरिए एक युवती को अपने जाल में फंसा लिया. इसके बाद करीब दो साल तक युवती से दुष्कर्म करता रहा.
युवती ने जब जब शादी के लिए कहा तो युवक ने इंकार कर दिया.

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युवती के मुताबिक युवक ने उससे कहा था -” वह उससे प्यार करता है और शादी भी उसी से करेगा.” इसी का भ्रम जाल बुनकर आरोपी युवक उससे शारीरिक संबंध बनाता रहा. इस दौरान युवती ने जब युवक से शादी करने की बात कही, तो युवक ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया.

युवक से मिले इस धोखे से आहत युवती ने आरोपी के खिलाफ बिलासपुर के कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. युवती की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी युवक अमन तिवारी को मौके पर दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया.

दोस्ती और प्रेम जाल

एक आदिवासी किशोरी की फेसबुक पर एक साल पहले पाली गांव निवासी रमन शर्मा (28) से दोस्ती हुई . बातचीत करते हुए युवक ने उसे प्रेमजाल में फंसा लिया. युवक उसे राजधानी रायपुर घूमने के बहाने घर से भगाकर अपने साथ ले गया. फिर अपने दोस्त पवन की मदद से किराए के मकान में रंजन ने किशोरी को रखा. वहां वह शादी करने का झांसा देते हुए किशोरी से दुष्कर्म करता रहा. बाद में उसे वापस शहर लाकर छोड़ दिया.किशोरी के परिजनों की रिपोर्ट पर पुलिस ने मामले में आरोपी के खिलाफ अपहरण समेत दुष्कर्म, पाक्सो एक्ट व एट्रोसिटी एक्ट का अपराध दर्ज कर लिया .

आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम संभावित स्थानों पर गई लेकिन वह हर बार भाग निकलता. आखिर साइबर सेल की मदद से पुलिस द्वारा उसके मोबाइल का लोकेशन खंगाला गया. जिसके बाद उसके बिलासपुर में होने की जानकारी मिली. पुलिस की एक टीम दिल्ली भेजी गई। टीम ने वहां जानकारी जुटाते हुए आरोपी रमन शर्मा को पकड़ लिया.

और झांसा देकर बंधक बना लिया

एक प्राइवेट हास्पिटल में नर्सिंग का काम करने वाली युवती की सोशल मीडिया पर जिस युवक से पहचान हुई थी उसी युवक ने धोखे में उसे गांव ले जाकर बंधक बना लिया. इसके बाद युवक व उसके दोस्तों ने कई दिनों तक युवती के साथ रेप किया. युवती करीब हफ्तेभर बाद किसी तरह भागकर रविवार को जशपुर के लुडेर गांव से अंबिकापुर पहुंची तो मामला सामने आया. युवती के साथ आरोपियों ने मारपीट भी की है. पुलिस ने मामले में जशपुर जिले के ग्राम लुडेर निवासी कुलदीप लकड़ा नामक युवक व उसके तीन अन्य साथियों के खिलाफ केस दर्ज कर उनकी तलाश शुरू कर दी.

युवती मूलत: बलरामपुर जिले के राजपुर इलाके की रहने वाली है. वह अंबिकापुर के मिशन चौक इलाके में किराए के मकान में रहकर एक प्राइवेट हास्पिटल में काम कर रही थी. इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी कुलदीप लकड़ा, अजय और राजकुमार को गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. वहीं फरार आरोपी की पुलिस तलाश कर रही है.

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पुलिस ने बताया कि युवती और आरोपी का परिचय फेसबुक पर हुई थी.पहले दोनों ने चैटिंग से बातचीत होती थी. इसके बाद मोबाइल पर बातचीत करने लगे और एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाने लगे. युवक के झांसे में आकर युवती उसके ऊपर विश्वास करने लगी. युवक ने अंबिकापुर में आकर मुलाकात करने की बात की तो वह तैयार हो गई.

आरोपी युवक बाइक से अंबिकापुर आया था.यहां गांव गुदरी में युवती को मिलने के लिए बुलाया. इसके बाद घूमने की बात कहकर युवती को बाइक से प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट ले गया. यहां से फिर परिजनों से मिलाने की बात कहकर उसे अपने घर ग्राम लुडेर ले गया. युवक के गांव में दो घर हैं. एक में घर में कोई नहीं रहता है. इसी घर में युवती को बंधक बनाकर रखा.

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अच्छे पड़ोसी हैं जरूरी

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी ने हमें इतना मसरूफ कर दिया है कि हमारे पास अपने पड़ोसियों के साथ बैठ कर बात करने का क्या, उन से उन का नाम तक पूछने का समय नहीं है.

अब लोगों के घर तो बड़े होते जा रहे हैं, पर अपने पड़ोसियों के लिए उन के दरवाजे तक नहीं खुलते हैं. मर्द अपने पड़ोसियों से कोई खास संबंध नहीं रखते हैं, जबकि औरतें टैलीविजन के सामने पड़े रहने में ज्यादा सुकून महसूस करती हैं. बच्चों को भी बाहर जा कर पड़ोस के बच्चों के साथ न खेलने की हिदायतें दी जाती हैं.

यह नया चलन अच्छा नहीं है, पर अफसोस हमारे समाज पर हावी हो रहा है, जबकि पड़ोसी के साथ रिश्ते केवल 1-2 वजहों से नहीं, बल्कि बहुत सी वजहों से अच्छे साबित होते हैं.

मुसीबत की घड़ी में आप के दूर बैठे रिश्तेदार मदद करने के लिए एकदम से नहीं आ पाते हैं, बल्कि आप के पड़ोसी ही सब से पहले आप की तरफ मदद का हाथ बढ़ाते हैं.

पड़ोसी हर तरह के होते हैं. कुछ अच्छे भी होते हैं तो कुछ बुरे भी, लेकिन एक अच्छा पड़ोसी आप की हर तरह से मदद करता है.

मुश्किल घड़ी में साथ

आजकल अखबारों की सुर्खियों में किसी न किसी वारदात की खबर छपी होती है. इन वारदातों में लोगों के घरों में चोरी होना, घर में घुस कर किया गया जोरजुल्म व घर से बाहर गलीपड़ोस में बच्चों को अगवा कर लेने की खबरें होती हैं.

इन वारदातों के पीछे अहम वजह है अकेलापन. लोगों के अपने पड़ोसियों से खत्म हो रहे रिश्ते उन के घर की तरफ बढ़ रहे जुर्म को बढ़ावा देने का काम करते हैं, जबकि पड़ोसियों से जुड़े रहने पर आप एक मजबूत संगठन की तरह होते हैं जिस पर एकदूसरे की हिफाजत व मदद करने की जिम्मेदारी होती है.

  • अक्तूबर, 2018. हरियाणा में गुरुग्राम के ट्यूलिप औरेंज हाईराइज अपार्टमैंट्स में पड़ोसी की मदद करने का एक ऐसा वाकिआ सामने आया जिस ने अच्छे और हिम्मती पड़ोसी होने की मिसाल दी. 33 साला स्वाति गर्ग ने पड़ोसियों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी ही जान दांव पर लगा दी थी.

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हुआ यों था कि एक छोटे से शौर्टसर्किट से लगी आग ने उस इमारत के एक फ्लोर पर बड़ा भीषण रूप ले लिया था. स्वाति गर्ग अपार्टमैंट्स से निकलने के बजाय वहां मौजूद सभी लोगों को होशियार कर बाहर जाने के लिए कहने लगीं.

आग बुझने के बाद फायरफाइटर्स को छत के दरवाजे पर बेहोशी की हालत में स्वाति मिली थी. अस्पताल ले जाते समय उन की रास्ते में ही मौत हो गई थी.

  • अगस्त, 2017. अपने देवर द्वारा चाकू से किए गए कई वारों के बाद छत से फेंकी गई एक औरत को उस के पड़ोसियों ने बचाया.

दिल्ली के वजीरपुर में रहने वाली 25 साला उस औरत के साथ बलात्कार की नाकाम कोशिश के बाद उस के देवर ने उसे छत से नीचे गिराने की कोशिश की थी.

उस औरत के शोर मचाने से पड़ोसी अपनेअपने घरों से बाहर आ गए थे. छत से धक्का दिए जाने के बाद वह औरत एक कूलर के स्टैंड को पकड़ कर कुछ देर लटकी रही थी, फिर होश खोने पर जब वह गिरी तो उस के पड़ोसियों ने उसे पकड़ लिया. अस्पताल जाने पर पता लगा कि जख्म गहरे नहीं थे.

  • अक्तूबर, 2015. उत्तर प्रदेश के बिसड़ा गांव में एक मुसलिम परिवार की हिंदू पड़ोसियों ने मदद कर जान बचाई और सहीसलामत दूसरी जगह पहुंचने में मदद की थी.

दरअसल, उस मुसलिम परिवार पर गांव के कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्होंने एक बछड़े की बलि दी है. इस आरोप के चलते 55 साला मोहम्मद इखलाक का कत्ल कर दिया गया था और उन के बाकी परिवार वालों को जान से मारने की धमकियां दी गई थीं. जब यह बात उन के पड़ोसियों विनीत कुमार, उमेश कुमार और अशोक को पता चली तो उन्होंने उन्हें सहीसलामत दादरी रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया था.

ऐसे ढेरों मामले सामने आते हैं जहां पड़ोसियों ने अपने आसपास के लोगों की जान बचाई या उन्हें किसी बड़े खतरे से बाहर निकाला.

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जिंदगी में रस घोलते

पड़ोसी केवल मुश्किल समय में ही नहीं, बल्कि खुशी के माहौल को और मजेदार बनाने में भी सब से बेहतर साबित होते हैं. बगीचे की छोटीमोटी सफाई हो या घर की चीनी खत्म हो जाए तो पड़ोसी का दरवाजा खटखटा दें. पड़ोसियों के साथ ऐसे आपसी संबंध बहुत खट्टेमीठे होते हैं जो जिंदगी में ताजगी भर देते हैं.

  • ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ जैसे टैलीविजन सीरियल हमें अच्छे पड़ोसियों की अहमियत का अहसास दिलाते हैं. पड़ोसियों के साथ तीजत्योहार मनाना, पिकनिक पर जाना या बैठ कर बातें करना, इन सब में अपना ही एक मजा है.
  • बच्चों के स्कूल के दोस्त अकसर उन के घरों से बहुत दूर रहते हैं. घर में दिनभर बंद कमरे में वीडियो गेम खेलना बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा असर डालता है. अगर बच्चे पड़ोस के बच्चों का साथ देंगे तो वे अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेल सकेंगे, बातें कर सकेंगे और शारीरिक व मानसिक तौर पर सेहतमंद भी रहेंगे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, 55 फीसदी बच्चों को उन के मातापिता द्वारा बाहर जा कर खेलने की इजाजत नहीं दी जाती है, जबकि उन के विकास के लिए उन्हें पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने दिया जाना चाहिए.

  • अगर आप घर से दफ्तर जाने में लेट हो रहे हैं या आप को दोपहर में कहीं बाहर जाना हो, आधी रात में कभी अस्पताल जाने की जरूरत हो तो आप के पड़ोसी ही आप की मदद कर सकते हैं, आप को लिफ्ट दे सकते हैं. साथ ही, आप के न होने पर पीछे से आप के घर की निगरानी भी रख सकते हैं.

आल इंडिया इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डिप्रैशन से पीडि़त 50 फीसदी बच्चे 14 साल की उम्र से कम के हैं और ऐसे 75 फीसदी नौजवान 15 से 25 साल की उम्र के हैं.

ये आंकड़े इस बात के सुबूत हैं कि किस तरह बच्चों और नौजवानों के मानसिक तनाव उन्हें समाज से दूर व अकेलेपन के करीब खींच रहे हैं.

अगर वे अपने आसपड़ोस के हमउम्र से बात करें, उन के साथ घूमेंफिरें व अपनी परेशानियों के बारे में चर्चा करें, तो शायद उन्हें इस अकेलेपन से जूझना नहीं पड़ेगा.

  • पड़ोसियों में अगर आपसी स्नेह हो तो उन के बच्चे भी आमतौर पर एकदूसरे के अच्छे दोस्त होते हैं. वे आपस में जहां चाहे साथ जा सकते हैं और उन के बुरी संगत में पड़ने की चिंता से मातापिता भी मुक्त रह सकते हैं.

ऐसे कायम रखें रिश्ते

पड़ोसियों से रिश्ते बनाने का सब से पहला नियम है कि उन्हें उन की प्राइवेसी दें. दोस्ती का हाथ जरूर बढ़ाएं, पर दखलअंदाजी न करें. अगर उन्हें किसी तरह की जरूरत है तो कोशिश करें कि आप उन की मदद कर सकें.

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आप हफ्ते में एक बार किटी पार्टी का प्रोग्राम भी बना सकते हैं. इस से आप एकदूसरे के परिवारों से परिचित होंगे व आपसी संबंधों में मिठास भी रहेगी.

अकसर घरेलू औरतें घरों में ही रहती हैं और केवल बच्चों को स्कूल से लाना, ले जाना ही करती हैं. ऐसी औरतें पड़ोस की दूसरी औरतों के साथ पास के बाजार या माल वगैरह में जा कर बाहरी दुनिया से रूबरू हो सकती हैं.

अगर आप की और आप के पड़ोसी की काम करने की जगह आसपास है तो गाड़ी में एकसाथ भी जाया जा सकता है. इस से पैसों की बचत के साथसाथ रिश्ते भी मजबूत होते हैं.

न दहेज न बैंडबाजा और हो गई शादी

राजपूत समाज की एक शादी में दूल्हे और उस के परिवार ने टीके की रस्म में सवा लाख रुपए लेने से साफ इनकार कर दिया. शगुन का सिर्फ एक रुपया ही स्वीकार किया.

जोधा परिवार ढिमडा बेरा भांवता, अजमेर के रहने वाले अजय सिंह राठौड़ की शादी थी. उन की बरात टोंक जिले की निवाई तहसील के गांव माताजी का भूरटिया के रहने वाले चतर सिंह राजावत के घर गई, जहां उन की शादी कविता कंवर के साथ हुई.

इस दौरान जब टीके  की रस्म शुरू हुई तो दुलहन के पिता ने थाल में नोटों की गड्डियां रख कर दूल्हे की तरफ बढ़ाया. यह देख अजय ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मैं यह पैसा नहीं ले सकता. हमारे लिए तो दुलहन ही दहेज है. देना ही है तो एक रुपया शगुन के तौर पर दे दें.’

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दुलहन पक्ष के लोगों ने काफी समझाया, लेकिन दूल्हा अपनी बात पर अडिग रहा. उस ने भारीभरकम रकम के बजाय एक रुपए का सिक्का ही टीके के शगुन के तौर पर लिया.

दूल्हे की ऐसी पहल को देख कर शादी में आए हर किसी ने उस की तारीफ की.

दूल्हे के पिता कमलेश सिंह राठौड़ ने बताया कि हर लड़की को उस के मातापिता पढ़ालिखा कर बड़ा करते हैं. शादी में उन्हें दहेज की चिंता भी सताती है. लेकिन एक पिता जब अपनी बेटी को ही दे देता है तो इस से बढ़ कर और क्या चाहिए?

दूल्हे के पिता की यह बात सुन कर दुलहन के पिता चतर सिंह राजावत की आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने कहा कि वे बेटी की शादी में टीके के तौर पर सवा लाख रुपए देने को तैयार थे, मगर समधीजी ने यह रकम न ले कर बड़प्पन दिखाया है. यह समाज के लिए अच्छा संदेश है. ऐसा दामाद और ससुर पा कर उन का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.

देश में जहां एक तरफ लोग अपनी बेटियों की शादी में लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च कर के गरीब लड़कियों के परिवार वालों के सामने तमाम मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजपूत समाज के अजय सिंह राठौड़ ने शादी के मंडप का सामाजिक जागरूकता के लिए इस्तेमाल कर के समाज में एक बेहतरीन मिसाल पेश की है.

दरअसल, ‘5 लाख लड़कियां हर साल मां के पेट में मार दी जाती हैं सिर्फ दहेज की वजह से’ और ‘दहेज की कमी की वजह से लड़कियों की शादी न हो पाना’ जैसी सामाजिक हकीकत अजय सिंह राठौड़ और उन के पिता को काफी दिनों से बेचैन कर रही थी, इसलिए दहेज प्रथा के खिलाफ बिना दहेज और फुजूलखर्ची किए सादगी से शादी की और समाज में एक मिसाल कायम की.

अजय सिंह राठौड़ बताते हैं कि अपने आसपास मौजूद तमाम लोगों को देखासुना करते थे जो लैंगिक बराबरी और सुधार की बातें हमेशा करते थे, लेकिन सुधार की पहल खुद से करने में कतराते थे. लेकिन पिताजी की प्रेरणा से उन में बराबरी की समझ पैदा हुई और इस सादा शादी के जरीए दहेज जैसी सामाजिक बुराई के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई.

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फेरों में लिया जिम्मा

हर किसी के लिए शादी उस का यादगार पल होता है, इसलिए उसे और ज्यादा यादगार बनाने के लिए कुछ न कुछ अलग किया जाता है. कुछ शादी के नाम पर लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च करना अपनी शान समझते हैं तो कुछ दहेज को समाज में शाप समझते हुए इस प्रथा को खत्म करने के लिए शादी में शगुन में बतौर एक रुपया स्वीकार कर रहे हैं.

ऐसा ही एक नजारा मंड्रेला कसबे में संचालित एक निजी स्कूल रुक्मिणी देवी विद्या पीठ के डायरैक्टर व फौजी रह चुके तेजाराम बड़सरा के डाक्टर बेटे विकास बड़सरा की शादी में देखने को मिला, जब उन्होंने दहेज न लेते हुए इलाके की 11 जरूरतमंद लड़कियों की पढ़ाईलिखाई का जिम्मा लिया.

मंड्रेला कसबे के नजदीक गांव सूखा का बांस, जिला चूरू के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डाक्टर विकास बड़सरा की शादी चिड़ावा की डाक्टर रुचिका के साथ हुई.

शादी में दूल्हे के पिता तेजाराम बड़सरा ने वर्तमान समय में दिनोंदिन बढ़ रही दहेज प्रथा के खिलाफ समाज को सही संदेश देने के लिए शगुन का एक रुपया ले कर अच्छा संदेश दिया.

तेजाराम बड़सरा ने बताया कि उन का परिवार शुरू से ही सामाजिक सरोकारों को निभाने में विश्वास रखने वाला रहा है. दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई के रूप में उभर रही है, ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हर किसी को अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाते हुए इस गलत प्रथा की खिलाफत करनी चाहिए.

डाक्टर विकास बड़सरा व डाक्टर रुचिका ने बताया कि उन्होंने सात फेरों के साथ ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की शपथ ली है. इस के तहत वे क्षेत्र की 11 जरूरतमंद बालिकाओं को गोद ले कर उन की पढ़ाईलिखाई का खर्चा उठाएंगे. उन की इस पहल की क्षेत्र के लोगों ने तारीफ की.

सीकर जिले की फतेहपुर तहसील के भींचरी गांव में महज एक रुपए में हुई शादी का असर भी तुरंत देखा गया. शादी में आए 2 और लोगों ने अपने बच्चों की शादी महज एक रुपए में करने का वादा करते हुए वहीं पर सगाई पक्की कर दी.

मुंशी खां बेसवा ने बताया कि बेसवा के रोशन खां के बेटे शमीर खान का निकाह भींचरी के इसहाक खान की बेटी अफसाना के साथ हुआ. निकाह में सिर्फ एक रुपया नेग दिया गया और दुलहन को मात्र एक जोड़ी कपड़ों में ही विदा किया. दोनों ही परिवारों द्वारा शादी का कार्ड भी नहीं छपवाया गया और न ही खाने का आयोजन किया गया. इस निकाह की बेसवा, भींचरी, आलमास, भगासरा समेत आसपास के कायमखानी समाज के लोगों ने तारीफ की.

कायमखानी समाज में शादी में डीजे बंद करने, सादगी से शादी करने और दूसरी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कायमखानी यूथ बिग्रेड सीकर के कार्यकर्ता इस जिले में एक साल से काम कर हैं और उन की मुहिम अब रंग ला रही है. एक साल की कोशिशों के बाद कायमखानी समाज के लोग डीजे और दहेज के बिना सादगी से शादी के लिए राजी हो रहे हैं.

बेसवा गांव से भींचरी गांव में बरात बेहद सादगी से की गई थी. शादी में शामिल सभी लोग अपने वाहनों से ही भींचरी आए.

दूल्हा पक्ष द्वारा एक भी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया गया था. बरात में डीजे या बैंडबाजा नहीं था. फोटोग्राफर को भी नहीं बुलाया गया. बरातियों को सिर्फ चाय पिलाई गई.

दूल्हे के पिता रोशन खान ने तो चाय के लिए भी मना कर दिया था. लेकिन दुलहन के पिता ने कहा कि चाय तो आदरसत्कार के लिए है.

न बराती, न बैंडबाजा

पिलानी के वार्ड 2 में रहने वाले रतनलाल रोहिल्ला ने 28 साल पहले बिना बैंडबाजा और बराती के शादी की थी. बिलकुल इसी तरीके से अपने बेटे रोहित की शादी कर मिसाल पेश की.

रतनलाल का कहना है कि शादी में गैरजरूरी खर्चा व समय की बरबादी को ले कर यह फैसला लिया गया. बेटे के लिए लड़की के नेगचार के लिए घर वालों और रिश्तेदारों के साथ कसबे के वार्ड 24 में आए थे.

नेहरू बाल मंदिर स्कूल में अध्यापक के पद पर काम कर रहे पवन कुमार दर्जी की बेटी सीमा के नेगचार के लिए पहुंचे. वर पक्ष ने इसी दिन सादगी के साथ शादी किए जाने का प्रस्ताव रख दिया. पवन कुमार के अलावा उन के चाचा रामकुमार दर्जी, डाक्टर आनंद, डाक्टर लक्ष्मण, मनीराम, लूनकरण वर्मा, चानण वगैरह ने प्रस्ताव मान लिया और शादी की तैयारी में जुट गए.

अचानक लिए गए इस फैसले और वरवधू पक्ष की रजामंदी से शादी हो गई. शाम को वरमाला के साथसाथ सात फेरे की रस्म भी पूरी की गई. मेहमान भी बहुत कम रहे. दहेज भी नहीं लिया गया. लोगों ने इस पहल की तारीफ भी की.

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महल्ले के प्रमुख पीडी जांगिड़ ने बताया कि दोनों परिवारों ने आज के जमाने को देखते हुए एक मिसाल कायम की है. महल्ले वाले न केवल हैरान हैं, बल्कि खुश भी हैं.

गौरतलब है कि दुलहन सीमा एमएससी कर चुकी है. दूल्हे रोहित ने दिल्ली, हल्द्वानी, मसूरी में स्किल डवलपमैंट का औफिस खोल रखा है. सात फेरों के लिए न मंडप, न ही पंडित, न घोड़ी और न ही कोई बैंडबाजा.

दुर्गादास कालोनी, सीकर में हुई इस अनूठी शादी को देख कर हर कोई हैरत में था. हर कोई यही कहता दिखा कि अगर सभी जगह ऐसा होने लगे तो दहेज के चलते न किसी की बेटी जलेगी और न ही किसी बहू को शर्मिंदा होना पड़ेगा.

शादी के गवाह बने लोगों ने इस के बाद दुलहन आनंद कंवर शेखावत व दूल्हे दीपेंद्र सिंह सहित इन दोनों के पिता उम्मेद सिंह व जीवण सिंह को शाबाशी भी दी कि दोनों परिवारों के इस अनूठे संकल्प से केवल 17 हजार रुपए में शादी हो गई, वरना दोनों परिवारों के लाखों रुपए दिखावे में खर्च हो जाते.

सामाजिक मंचों से भी आ रही जागरूकता अलवर जिले के अकबरपुर गांव में दहेज की फुजूलखर्ची के विरोध में पंचायत की गई. पंचायत में लोगों ने शादियों में बैंडबाजा, आतिशबाजी, महंगी गाड़ी वगैरह पर रोक लगाने का फैसला किया. अगर कोई इस नियम को तोड़ेगा तो उस का हुक्कापानी बंद कर दिया जाएगा.

ओमकार सिंह ने कहा कि दहेज प्रथा खत्म करने और फुजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए गुर्जर समाज में मुहिम चलाई जा रही है. दिखावे के चलते गरीब लोगों को अपनी बेटियों की शादी में दिक्कतें आ रही हैं. कुछ लोग दहेज देने से बचने के लिए बच्चियों की भू्रूण हत्या भी करा रहे हैं.

पंचायत में मौजूद पूर्व जिला पंचायत सदस्य रवींद्र भाटी ने कहा कि गुर्जर समाज में शादियों में दहेज के चलते फुजूलखर्ची बेहिसाब बढ़ गई है. समाज में लोग जमीन कब्जे के बदले मिले मुआवजे को बैंडबाजे, आतिशबाजी, महंगे टैंट, महंगी गाड़ी वगैरह पर लुटा रहे हैं.

पंचायत में फैसला किया गया है कि जो दहेज विरोधी फैसलों को नहीं मानेगा, उस का गुर्जर समाज बहिष्कार करेगा. साथ ही, गांव में दहेज की शादी भी नहीं होने देंगे.

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सोशल मीडिया कुंठित लोगों का खतरनाक नशा

सोशल मीडिया की बात हो और फेसबुक का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. वैसे तो मार्क जुकरबर्ग ने इसे अपनों से जुड़े रहने के लिए, उन का हालचाल लेने के लिए बनाया था, पर जैसे ही यह दुनियाभर में मशहूर हुआ और लोग खासकर भारत के लोग थोक के भाव में इस से जुड़ने लगे तो यह चंदू चाय वाले का वह अड्डा बन गया जहां नकारा, निकम्मे और कुंठित लोगों ने जम कर अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी. अब तो उन की भाषा भी इतनी फूहड़ हो गई है कि वे किसी की भी मांबहन एक करने में पीछे नहीं रहते हैं.

बानगी देखिए : नैशनल लैवल के एक कांग्रेसी नेता ने कहा, ‘भाजपा गाय के लिए पूरे देश को बरबाद कर रही है.’

किसी ने चुटकी ली, ‘भाई, तुम भी तो गधे के लिए पूरे देश को बरबाद करने पर तुले हो.’

इसी तरह किसी नेता ने हालिया सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल पूछा कि वायु सेना ने पेड़ पर बम गिराए या आतंकियों पर? तो किसी ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि बम चाहे जहां भी गिरा हो, पर धुआं तुम्हारे पिछवाड़े से काहे निकल रहा है?

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पाकिस्तान के साथ हुई तनातनी और उस के बाद पाकिस्तान के साथ कारोबार में कटौती करने के गंभीर नतीजों को नजरअंदाज करते हुए किसी मसखरे ने फेसबुक पर पोस्ट डाली, ‘भारत के लड़के फेसबुक पर टमाटर की डीपी लगा कर पाकिस्तानी लड़कियों से सैटिंग कर रहे हैं… सुधर जाओ कमीनो.’

फेसबुक से जुड़ा एक कड़वा सच और भी है कि पूरी दुनिया में इस के सब से ज्यादा ऐक्टिव यूजर्स यानी इस्तेमाल करने वाले लोग भारत में हैं. उन में से बहुत से तो इस में सिर्फ अपने दिमाग में भरा कचरा परोस रहे हैं. उन्हीं कुंठित लोगों से परेशान मार्क जुकरबर्ग के माथे पर अब चिंता की लकीरें साफ दिखाई देती हैं. इस से उन को मिलने वाले इश्तिहारों में भी भारी कमी आई है.

लिहाजा, मार्क जुकरबर्ग फेसबुक में बड़ा बदलाव करने जा रहे हैं. वे लोगों को सार्वजनिक मेलजोल की जगह निजी बातचीत की तरफ मुड़ने के लिए बढ़ावा देंगे. इस से फेसबुक पर आप के पोस्ट, मैसेज वगैरह बहुत ही सीमित लोगों तक पहुंचेंगे.

फेसबुक पर लग रहे निजता हनन और डाटा चोरी के आरोपों के बीच मार्क जुकरबर्ग का कहना है कि इस बदलाव से यूजर की निजता तय होगी. फेसबुक को ‘डिजिटल लिविंग रूम’ बनाने की बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘नए बदलाव के तहत यूजर ऐसे ही लोगों के साथ अपने पोस्ट साझा करेंगे जिन्हें वे अच्छी तरह जानते हैं.’

फेसबुक द्वारा इतना बड़े और कड़े कदम उठाने की एक सामाजिक वजह भी है. वह यह है कि बहुत से लोग फर्जी अकाउंट बना कर दूसरों को ठगने लगे हैं. इन्हें ‘क्लोन अकाउंट’ कहा जाता है, जहां यह नहीं पता चलता है कि सामने वाला असल में कौन है.

उत्तर प्रदेश के बरेली की ही एक मिसाल लेते हैं. वहां साल 2018 में सोशल मीडिया पर खूब जहर उगला गया. किसी की फेसबुक आईडी हैक कर उस में बेहूदा वीडियो क्लिप डाल दी गई तो किसी के साथ गालीगलौज की गई. आम जनता ही नहीं, देश के प्रधानमंत्री तक के खिलाफ ऊलजुलूल बातें की गईं.

हमारे देश में बहुत से लोग तो सैक्स को ले कर कुंठित रहते हैं. अगर वे किसी लड़की को अपना दोस्त नहीं बना पाते हैं तो सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउंट बना कर किसी अनजान लड़की की इज्जत की धज्जियां उड़ाने से भी बाज नहीं आते हैं.

उत्तर प्रदेश में बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र की रहने वाली एक लड़की ने फेसबुक पर अपना अकाउंट बना रखा था. उसे फेसबुक पर ही किसी सोनिया नाम की लड़की की फ्रैंड रिक्वैस्ट आई. सोनिया को लड़की समझ कर उसे फ्रैंड बना लिया गया, जबकि किसी लड़के ने सोनिया के नाम से फर्जी अकाउंट बनाया था और फिर फोटोशौप की मदद से उस लड़की के फोटो को अश्लील बना कर वायरल कर दिया.

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इसी तरह ह्वाट्सएप भी सोशल मीडिया का एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां इस को इस्तेमाल करने वालों का बहुत बड़ा जमावड़ा है.

आंकड़ों की मानें तो भारत की सवा अरब आबादी में से तकरीबन 70 करोड़ लोगों के पास फोन हैं. इन में से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन हैं. साढ़े 15 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने ह्वाट्सएप पर अपनी उंगलियों का कमाल दिखाते हैं.

मौजूदा सरकार की धर्मनिरपेक्षता पर उंगली उठाने या ‘भारत में अब डर लगता है’ कहने की हिम्मत करने वालों को बहुत से लोग देश का सब से बड़ा दुश्मन समझते हैं.

हाल ही में इस मुद्दे पर किसी ने ह्वाट्सएप पर मैसेज कर दिया था कि ‘भारत में डर महसूस करने वाले अमेरिका घूम आएं, क्योंकि वहां एयरपोर्ट पर चड्डी उतार कर सारा डर दूर कर दिया जाता है.’

अभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक सांसद और विधायक के बीच हुई लड़ाई को भी महिमामंडित कर दिया गया. किसी ने तो शेर ही लिख डाला, ‘इतना तो मजनू भी नहीं पिटा था लैला के प्यार में, जितना विधायकजी पिट गए अपनी सरकार में.’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो जैसे चुटकुले की टकसाल ही बना दिया गया है. मामला चाहे किसी से भी जुड़ा हो, उन को बेवजह बीच में घसीट दिया जाता है. अगर कोई उन के हक में कुछ बोल दे तो फिर बवाल सा मच जाता है.

हाल ही में ह्वाट्सएप पर किसी ने पोस्ट डाली थी, ‘दुनिया में 3 काम बहुत मुश्किल हैं…पहला हाथी को गोद में लेना, दूसरा चींटी को नहलाना और तीसरा केजरीवाल के चमचों को समझाना.’

सोशल मीडिया के सब से गलत इस्तेमाल के चलते हमारे रिश्तों में दरार आ रही है. नई पीढ़ी के इश्कबाज एकदूसरे से ज्यादा इस बात पर यकीन करते हैं कि सामने वाला ह्वाट्सएप पर किस के साथ कैसी बातें कर रहा है.

अब चूंकि स्मार्टफोन में तरहतरह के लौक आ गए हैं, पासवर्ड बन गए हैं तो अपनी सीक्रेट बातें अपनों से छिपाना आसान हो गया है.

मैं ने मैट्रो में कई बार देखा है कि स्कूलकालेज के तथाकथित प्रेमी जोड़े एकदूसरे के स्मार्टफोन में उन की दूसरों के साथ की गई चैटिंग खंगालते रहते हैं.

मजे की बात तो यह है कि अगर वे दूर हैं और फोन पर बतिया रहे हैं तो थोड़ा सा शक होते ही एकदूसरे की ह्वाटसएप की चैटिंग के स्क्रीनशौट तक मांग लेते हैं.

बहुत से प्रेमी जोड़े तो मौका मिलते ही सिर्फ मस्ती के लिए सैक्स करते वीडियो तक बना लेते हैं जो उन की लड़ाई या ब्रेकअप के बाद वायरल कर दिए जाते हैं. लड़के ऐसे वीडियो को ब्लैकमेलिंग के लिए भी इस्तेमाल करते हैं.

कई बार तो अपनी किसी सैक्स कुंठा को निकालने के लिए लड़कियां खुद अकेले में कभी नहाते हुए तो कभी कपड़े बदलते हुए वीडियो बना लेती हैं और उन्हें खुद ही वायरल कर देती हैं.

इस तरह का खुद से ही बेहूदा मजाक करने का यह कैसा अजीब दौर है? हम महाशक्ति बनने की राह पर हैं या दुनिया को बताना चाहते हैं कि हम से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है?

चलो, मान लेते हैं कि राजनीति से जुड़े लोग ऐसी फालतू बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, पर अब तो लोग सोशल मीडिया पर इस तरह का जहर उगलने लगे हैं कि बहुतों की रिश्तेदारी और दोस्ती भी दांव पर लगने लगी है.

इतना ही नहीं, जातिवाद का अजगर भी रोजाना अपना आकार बढ़ा रहा है. किसी सिरफिरे ने पोस्ट कर दिया, ‘गणेश के सिर से भी हाथी को हटाया जाए, इस से बहुजन समाज पार्टी का प्रचार होता है.’

एक बड़े दैनिक अखबार ने सोशल मीडिया पर वायरल होती तसवीरों की पड़ताल की थी कि किस तरह झूठ को सच बनाने की कोशिश की गई थी. उन तसवीरों में यह कह कर प्रचार किया गया था कि इस बार महाशिवरात्रि पर इंदौर में कुछ मुसलिम औरतों ने कांवड़ उठाई थी. उस के बाद तो उन्हें बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया जबकि हकीकत तो यह थी कि वे तसवीरें साल 2015 की थीं और उन का इस बार की महाशिवरात्रि से कोई लेनादेना नहीं था.

ऐसे कुंठित लोगों का कोई ईमान नहीं होता है. वे सोशल मीडिया के ही शेर होते हैं. ऐसे लोग मस्तीमस्ती में कुछ भी ऊटपटांग पोस्ट कर देते हैं जिस का कभीकभार बड़ा भयानक नतीजा भी सामने आता है. लोगों की इन्हीं बेवकूफियों के चलते सरकार सोशल मीडिया को ले कर सख्त हो जाती है.

संवेदनशील मुद्दे पर तो इस के इस्तेमाल पर ही बैन लगा दिया जाता है. जम्मूकश्मीर में सेना और जनता के बीच तनाव और महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन इस के जीतेजागते उदाहरण हैं.

लोगों के इस तरह कुंठित होने की एक सब से बड़ी वजह यह भी है कि अब लोग जानकारी देने वाली किताबों और अच्छी पत्रिकाओं से दूर भागने लगे हैं. जब वे अपनी पढ़ाई की किताबों पर ही ढंग से ध्यान नहीं देते हैं तो फिर अच्छे साहित्य को किस हाथ से छुएंगे?

आज मोबाइल फोन में बसी सोशल मीडिया की यह जो आभासी दुनिया है वह ज्यादातर लोगों के लिए ऐसा नशा बन चुकी है जो उन्हें एड्स की तरह धीरेधीरे खोखला कर रही है.

इस लत से समय रहते पीछा छुड़ा लीजिए वरना किसी दिन (माफ कीजिए, सोशल मीडिया की ही जबान में) आप के पिछवाड़े से धुआं निकलेगा और आप को पता तक नहीं चलेगा.

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सोशल मीडिया पर इन चीजों से बचें

इस मायावी संसार की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस ने हमें विचारों से तानाशाह बना दिया है. अगर सामने वाला अपनी घटिया जबान से आप पर खांसता है तो आप उस पर पूरी उलटी ही कर देते हैं. लेकिन खुद पर लगाम लगाना भी हमारे ही हाथ में है.

याद रखें कि हम सोशल मीडिया पर कोई खबर नहीं, बल्कि जानकारी पढ़ या देख रहे होते हैं जिस का कोई पुख्ता सुबूत हो, यह जरूरी नहीं है इसलिए किसी भी तरह की नैगेटिविटी या नफरत फैलाने वाली बातों से बचें.

किसी ने कोई बात कही तो जरूरी नहीं है कि आप उस का जवाब दें. बहुत से लोग जानबूझ कर उकसाने वाली बात कहते हैं, उन को नजरअंदाज कर दें. धर्म, जातिवाद, देश या समाज की रक्षा का ठेका न लें. इस से कभी आप बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.

जब तक जानकारी न हो, किसी के मैसेज को फौरवर्ड न करें. किसी के पेज को लाइक न करें. इस से आप या आप के दोस्त ठगी का शिकार हो सकते हैं.

सब से अक्लमंदी की बात यह है कि अपनी भाषा पर काबू रखें. गाली देने से तो एकदम बचें.

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बुजुर्गों की सेवा फायदे का सौदा

भारत में 10 करोड़ से भी ज्यादा बुजुर्ग हैं और साल 2050 तक इन की तादाद साढ़े 32 करोड़ हो जाने की उम्मीद है जो कुल आजादी का तकरीबन 20 फीसदी है.

मिनिस्ट्री फौर स्टैटिस्टिक्स ऐंड प्रोग्राम इंप्लीमैंटेशन द्वारा साल 2016 में दी गई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 10 करोड़, 39 लाख बुजुर्ग हैं जिन की उम्र 60 साल से ऊपर है. ये कुल आबादी का तकरीबन 8.5 फीसदी हैं.

एआईएससीसीओएन के 2015-16 के सर्वे के मुताबिक, अपने परिवार के साथ रह रहे 60 फीसदी बुजुर्गों को गालीगलौज व मारपीट तक सहनी पड़ती है, जबकि 39 फीसदी बुजुर्ग अकेले ही रहना पसंद करते हैं.

हैल्पएज इंडिया द्वारा देश के 19 छोटेबड़े शहरों में 4,500 से ज्यादा बुजुर्गों पर किए एक सर्वे के मुताबिक, 44 फीसदी बुजुर्गों का कहना है कि सार्वजनिक जगहों पर उन के साथ बुरा सुलूक होता है, वहीं 53 फीसदी बुजुर्गों का कहना है कि समाज उन के साथ भेदभाव करता है. ढलती उम्र, धीरेधीरे काम करने और ऊंचा सुनने की वजह से लोग उन से रूखा बरताव करते हैं.

सेवा करें मेवा मिलेगा

आमतौर पर इस मतलबी दुनिया में बुजुर्गों के पास अपनों का ही साथ नहीं होता, पर रुपएपैसों के मामले में उन का दबदबा रहता है. ज्यादा कुछ नहीं तो भी अपना मकान तो होता ही है.

ऐजवैल फाउंडेशन द्वारा की गई एक स्टडी के मुताबिक, 65 फीसदी बुजुर्गों के पास कोई आमदनी का जरीया नहीं होता, पर 35 फीसदी बुजुर्गों के पास प्रोपर्टी, पैसा, बचत, इन्वैस्टमैंट्स और पुश्तैनी जायदाद होती है.

कभी अच्छी नौकरी में रहे या अच्छा कारोबार करने वाले ज्यादातर बुजुर्ग अब बड़े घरों में अकेले ही जी रहे हैं. कुछ बुजुर्गों के बच्चे विदेश जा कर बस चुके हैं तो कुछ दूसरे शहरों में पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में रह रहे हैं.

इन बुजुर्गों की जिंदगी अपनों की कमी की खलिश में तप रही होती है. तनहा जिंदगी गुजारे नहीं गुजरती.

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इन बुजुर्गों में से कुछ अपने दूर के रिश्तेदारों को साथ रहने के लिए अपने घर बुला लेते हैं तो कुछ नौकरों के भरोसे ही अपनी बचीखुची जिंदगी गुजारने की कोशिश करते हैं.

यही नहीं, इस बुढ़ापे की उम्र में उन्हें कोई न कोई बीमारी भी जकड़े रहती है, सुनाई कम देने लगता है, नजरें धुंधली हो चुकी होती हैं वगैरह.

ऐसे में कोई शख्स बुढ़ापे की लाठी बन कर अगर इन की जिंदगी में शामिल हो जाता है, इन की खुशियों और गमों को बांटने की कोशिश करता है तो इन बुजुर्गों की बोझिल बूढ़ी आंखों में उस के लिए प्यार उमड़ पड़ता है. धीरेधीरे वह शख्स ऐसे बुजुर्गों के लिए अपनों से बढ़ कर बन जाता है. समय के साथ मुमकिन है कि बुजुर्ग अपना सबकुछ उस बेगाने के नाम लिख कर दुनिया से विदा हो जाएं और वह शख्स थोड़े समय में ही हजारपति से करोड़पति का सफर तय कर ले.

कोई चाहे मैनेजर हो, ड्राइवर हो या घरेलू नौकरानी, यह मुमकिन है कि अगर दिल लगा कर बुजुर्गों की सेवा की जाए तो मेवा खाने को जरूर मिलेगा. बस, सब्र रखना होगा.

यकीन रखिए, यह उस बेगाने के लिए फायदे का सौदा साबित होगा. ज्यादातर मामलों में बुजुर्ग अंतिम समय में काम आने वाले को बहुतकुछ दे देते हैं. उन से दूर रह रहे बच्चे भी काफी उदार हो जाते हैं और पिता या मां का अंतिम दिनों में खयाल रखने वालों का जम कर ध्यान रखते हैं.

इस सिलसिले में एक उदाहरण रांची से सटे एक गांव में रहने वाले रामलाल का लिया जा सकता है.

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रामलाल ने शुरू से ही अपनी जिंदगी में गरीबी देखी थी. वह रतनलाल के यहां माली का काम किया करता था. रतनलाल तीजत्योहार पर उस के बीवीबच्चों को पुराने कपड़े, मिठाइयां वगैरह दे देते थे. रामलाल भी रतनलाल के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करने लगा था.

समय के साथ रतनलाल बूढ़े हो चले. उन के दोनों बेटे शहर जा कर बस गए. घर में पतिपत्नी ही रह गए. पत्नी की तबीयत भी खराब रहने लगी थी. नौकर तो कई थे, पर धीरेधीरे जब उम्र के साथ रतनलाल कमजोर होने लगे और कमाई भी घटती चली गई तो नौकरों ने भी साथ छोड़ दिया.

ऐसे समय में एक रामलाल ही था जिस ने रतनलाल का साथ नहीं छोड़ा.  रामलाल की बीवी भी रतनलाल के घर साफसफाई का काम करने लगी. कुछ समय बाद रतनलाल की पत्नी चल बसीं. अब बस रामलाल व उस की बीवी ही  बुजुर्ग रतनलाल की देखभाल करते रहे.

एक दिन रतनलाल को भी लकवा मार गया. बेटे ने 2 दिन के लिए आ कर अपनी हाजिरी दी और रामलाल पर सब सौंप कर वह शहर चला गया.

रतनलाल पैसों के हिसाबकिताब से ले कर घर चलाने के सभी कामों के लिए रामलाल पर निर्भर थे. रामलाल के सामने हजारों रुपए यों ही पड़े रहते, पर उस ने कभी एक पैसा इधरउधर नहीं किया.

इधर रामलाल का बेटा शहर जा कर पढ़ना चाहता था. रामलाल ने यह बात रतनलाल को बताई थी, पर कभी पैसे मांगे नहीं. समय यों ही बीतता रहा.

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एक दिन रतनलाल ने एक वकील बुलाया और अपना बंगला रामलाल के नाम कर दिया. यह देख रामलाल हैरान रह गया.

रतनलाल ने उसे गले लगाते हुए कहा कि यह उस की मेहनत और ईमानदारी का बदला है. अपने बेटे ने जो नहीं किया, वह एक गैर ने किया. तो फिर बेटे का क्या हक? हक तो उस गैर का ही होगा न. रामलाल की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

यह महज कहानी नहीं, बल्कि एक सचाई है.

कोई शौर्टकट नहीं

सेवा करें पर शौर्टकट में नहीं, बल्कि दिल से, ईमानदारी से करें. खाना बनाना हो, देखभाल करनी हो या बाहर के काम हों, सबकुछ अपना बन कर करें. आप अपने घर वालों के लिए जैसे जीजान लगा देते हैं, एक बार इन अकेले बुजुर्गों के लिए भी वैसा कर के देखें. वे आप की झोली खुशियों से भर देंगे.

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