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सौगात: खर्राटों की आवाज से परेशान पत्नी की कहानी -भाग 3

उस के इस विद्रोहात्मक कदम ने फिजी में रह रहे उस के मातापिता को बड़ा नाराज किया. मां की नाराजगी तो खैर कुछ दिनों के बाद दूर हो गई, जब उन की नातिन के जन्म पर जमील ने वापसी टिकट भेज कर बुलाना चाहा तो वह अपनी ममता की नदी पर सख्ती का बांध न बांध सकीं और उन के पास 4 माह रह कर अपनी बेटी की सुखी गृहस्थी देख कर, संतुष्ट मन से वापस फिजी चली गईं पर पिता ने उसे आज तक क्षमा नहीं किया है.

वह अपने पति तथा बच्ची के साथ फिजी भी गई, पर पिता ने न तो उस से और न उस के पति से कोई बात की. पर हां, बच्ची को प्यार करने से वह स्वयं को नहीं रोक सके. बच्ची जब उन्हें नाना कहती तो उन की पलकें भीग जातीं. कहा जाता है मूल से प्यारा ब्याज होता है.

आज तपस्या दूसरी बार गर्भवती है. उस के पति ने उस पर कभी भी अनुचित बंधन नहीं लगाया. अलगअलग धर्मों के होते हुए भी उन में विश्वास, प्रेम व स्नेह की डोर दिनप्रतिदिन दृढ़ होती जा रही है. जमील घर के कार्यों में उसे भरसक सहयोग देते हैं. तपस्या शाम को 4 घंटे की नौकरी करती है और उस समय बच्ची व घर की देखभाल उस के पति ही करते हैं. इतना ही नहीं, कभीकभी घर लौटने पर खाना भी तैयार मिलता है. दोनों एकदूसरे की भावनाओं की कद्र करते हैं जोकि वैवाहिक जीवन का आधार है.

ईद पर सेंवइयां व बकरीद पर मीट व अन्य व्यंजन बनाना तपस्या कभी नहीं भूलती और होली, दशहरा, दीवाली पर तपस्या के लिए नई साड़ी या अन्य उपहार लाना जमील को सदा याद रहता है. अभी शादी की पिछली वर्षगांठ पर 550 पौंड का चायना डिनर सेट जमील ने उसे भेंट किया था.

पर तपस्या मुझ से कहने लगी, ‘‘प्रेरणाजी, ये महंगे उपहार उन के प्यार व सहयोग की भावना के समक्ष कुछ भी नहीं हैं. मुझे शायद मेरे मांबाप द्वारा ढूंढ़ा गया मेरी जाति का लड़का इतना सुख न दे पाता जितना कि इस गैरधर्म, गैरदेश के युवक ने मुझे दिया है. मेरा आंचल तो भरता ही जा रहा है इन के प्यार की सौगात से,’’ और तपस्या की आंखें आंसुओं से छलछला गईं.

मैं सोचने लगी कि यदि आज ऐसे उदाहरणों को देखने के पश्चात भी समाज की आंखों पर जाति व धर्म का परदा पड़ा है तो ऐसा समाज किस काम का? आवश्यकता है हमें अपने मन की आंखों को खोल कर अपना भलाबुरा स्वयं समझने की. सच्चा प्यार भी देश, जाति, धर्म व समाज का मुहताज नहीं होता. प्यार की इस निर्मल स्वच्छ धारा को दूषित करते हैं हमारे ही समाज के कठोर नियम व संकीर्ण दृष्टिकोण.

सत्यकथा: अमिता और उसके प्रेमी का गुनाह

वह 10 मई 2022 की आधी रात थी. उस समय रात के 2 बज रहे थे. उस समय सोनी नेगी गहरी नींद में सो रही थी. अचानक उसे लगा कि कोई जोरजोर से उस के बैडरूम का दरवाजा खटखटा रहा है. तभी वह बैड पर उठ कर बैठ गई थी तथा उस ने पास में ही सो रहे अपने पति जितेंद्र को भी जगा दिया था.
इस के बाद सोनी बाहर दरवाजे से आ रही आवाज को सुनने लगी. सोनी ने आवाज को पहचान लिया था. वह आवाज उस की जेठानी अमिता की थी. पहले तो सोनी ने सोचा कि अमिता बेवक्त उस के बैडरूम का दरवाजा क्यों खटखटा रही है? मगर उस ने फिर भी किसी अनहोनी की आशंका के चलते दरवाजा खोल दिया था.

जैसे ही सोनी ने दरवाजा खोला तो अचानक अमिता उस के कमरे में बदहवास सी घुस आई और जल्दी में उस ने बताया, ‘‘सोनी तुम्हारे जेठजी रात को अच्छेभले खाना खा कर और शराब पी कर सोए थे, मगर अब न जाने उन्हें क्या हो गया है कि उन का शरीर सुन्न हो गया है. लगता है कि उन्हें हार्टअटैक आ गया है.’’अमिता के मुंह से यह बात सुन कर सोनी व उस का पति जितेंद्र अमिता के बैडरूम में पहुंचे, जहां पर अमिता का पति दीपक बेसुध सा लेटा था. सोनी ने देखा कि दीपक के शरीर में कोई हलचल नहीं थी तथा उस के चेहरे व शरीर के कुछ हिस्सों पर मामूली चोटों के निशान भी थे. चोट के निशान देख कर सोनी को कुछ शक भी हुआ था.

दीपक के शरीर पर लगी चोटों के बारे में जब जितेंद्र व सोनी ने अपनी भाभी अमिता से पूछा तो अमिता उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई थी, बल्कि वह जल्दी से जल्दी बेसुध पड़े दीपक को पास के अस्पताल में ले जाने की जिद करने लगी.दीपक की हालत देख कर जितेंद्र व सोनी को शक हो रहा था, मगर वे जल्दी ही दीपक को ले कर अस्पताल जाने की तैयारी करने लगे.

यह घटना देहरादून के थाना रायवाला अंतर्गत खांडगांव की है. खांडगांव से ऋषिकेश का एम्स अस्पताल मात्र 18 किलोमीटर दूर है. तभी आननफानन में जितेंद्र, अमिता व सोनी, दीपक को उपचार हेतु एम्स ले कर पहुंचे थे. एम्स के चिकित्सकों ने 34 वर्षीय दीपक को देख कर मृत घोषित कर दिया.
दीपक के शरीर पर लगी कुछ चोटों व गले में लगे कुछ निशानों को देख कर डाक्टरों को संदेह हो गया था तथा उन्होंने इस की सूचना रायवाला थाने को दे दी थी. उस वक्त रायवाला के थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी छुट्टी पर थे, अत: थानेदार धनंजय सिंह को एम्स में भेजा गया.

एम्स पहुंच कर जब थानेदार धनंजय ने दीपक के शव का निरीक्षण किया और दीपक की मौत के बारे में उस के घर वालों से जानकारी ली तो धनंजय को भी शक हो गया. इस के बाद थानेदार धनंजय ने दीपक के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया था.

इसी प्रकार 4 दिन बीत गए थे. 15 मई, 2022 को रायवाला के थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी छुट्टी से लौट आए थे. जब उन्हें खांडगाव निवासी दीपक की संदिग्ध मौत के बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने इस घटना का हर पहलू से अवलोकन किया. उन्हें यह मामला कुछ अटपटा सा लगा था.अटपटा इसलिए लगा था कि पत्नी हार्ट अटैक के कारण पति की मौत होना बता रही थी, जबकि पति के शरीर पर कई जगह चोटों के निशान भी थे. इस के अलावा दीपक की मौत से पहले उस की नाक से खून निकल रहा था. पुजारी को यह मामला हत्या का लग रहा था. पुजारी यह जानना चाहते थे कि यदि दीपक की हत्या हुई है तो किस ने और क्यों की?

अभी पुजारी इसी कशमकश में ही उलझे थे कि उन्होंने सोचा कि दीपक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तो बाद में ही आएगी, इस से पहले क्यों न इस मामले की सच्चाई का पता लगाया जाए. इस के लिए सब से पहले पुजारी ने देहरादून की एसओजी (ग्रामीण) के कांस्टेबल नवनीत राणा से संपर्क किया था तथा उसे जल्दी ही अमिता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स उपलब्ध कराने को कहा.इस के अलावा थानाप्रभारी ने दूसरा काम यह किया था कि उन्होंने रायवाला थाने के थानेदार नीरज त्यागी व सिपाहियों दिनेश महर व प्रदीप गिरी को सादे कपड़ों में खांडगांव भेजा और उन्होंने उन्हें गांव में घूम कर गांव वालों से दीपक व अमिता की आम शोहरत की जानकारी करने को कहा था.

थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी की यह योजना काफी सफल रही. 2 दिन के बाद पुजारी को अमिता के मोबाइल की काल डिटेल्स प्राप्त हो गई थी. काल डिटेल्स की जानकारी के अनुसार अमिता अकसर सतेंद्र नेगी नामक व्यक्ति से काफी काफी देर तक बातें करती रहती थी.इस के अलावा उन्हें अमिता और सतेंद्र की मोबाइल बातचीत की रिकौर्डिंग भी मिल गई. उन्होंने जब रिकौर्डिंग को सुना तो अमिता खुद ही संदेह के दायरे में आ गई.

उधर खांडगांव से लौट कर थानेदार नीरज त्यागी ने जो जानकारी थानाप्रभारी पुजारी को दी थी, उसे जान कर पुजारी को संदेह ही नहीं, बल्कि पूरा विश्वास हो गया कि दीपक नेगी की हत्या में उस की पत्नी अमिता का हाथ जरूर है. नीरज त्यागी ने उन्हें बताया कि खांडगांव में रहने वाले दीपक नेगी व अमिता के 2 बच्चे हैं. दीपक द्वारा गांव में छोटामोटा ठेका ले कर घर का खर्च चलाया जाता है. दिसंबर 2021 से दीपक के मकान का का काम चल रहा है. यह निर्माण कार्य पूर्व सैनिक ठेकेदार सतेंद्र नेगी निवासी मोहल्ला श्यामपुर ऋषिकेश की देखरेख में चलाया जा रहा है.

दीपक नेगी शराबी प्रवृत्ति का था. दीपक ने अपने मकान का ठेका सतेंद्र नेगी को 31 लाख रुपए में दिया था. निर्माण का कार्य अभी तक चल रहा है. गत कई महीनों से ठेकेदार सतेंद्र नेगी व अमिता की अतरंगता काफी बढ़ गई थी. ठेकेदार सतेंद्र नेगी वक्तबेवक्त दीपक के घर में अकसर आताजाता रहता है.

सतेंद्र द्वारा दीपक की गैरमौजूदगी में अकसर उस के घर जाने से तथा दीपक की पत्नी अमिता से अकेले में बातचीत करने के कारण, दीपक के छोटे भाई जितेंद्र व उस की पत्नी सोनी सहित मोहल्ले वालों को भी अमिता के चरित्र पर संदेह था. अमिता का पति दीपक भी अमिता को ठेकेदार सतेंद्र से अकसर दूरी बनाने के लिए कहता रहता था.थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी ने थानेदार नीरज त्यागी के इस कथन को गंभीरता से लिया. ये सब जानकारियां होने के बाद पुजारी ने दीपक की मौत के मामले में एसएसपी जन्मेजय खंडूरी से इस बाबत विचारविमर्श किया था तथा इस प्रकरण में उन का निर्देशन मांगा था.

श्री खंडूरी ने दीपक की मौत के प्रकरण में उस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद सतेंद्र व अमिता से पूछताछ करने के निर्देश दिए थे. वह 23 मई, 2022 का दिन था. उस वक्त रायवाला के थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी अपने औफिस में ही बैठे थे, तभी उन्हें दीपक नेगी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. जब पुजारी ने दीपक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पढ़ा तो वे चौंक पड़े. इस में दीपक की मौत का कारण गला दबा कर दम घुटना बताया गया था.

इस के बाद पुजारी ने इस प्रकरण में पूछताछ के लिए अमिता व ठेकेदार सतेंद्र को बुलाया. थाने में अमिता व सतेंद्र से दीपक की मौत के मामले में पुजारी द्वारा गहन पूछताछ की गई थी. मगर जब पुजारी ने दोनों को अलगअलग ले जा कर पूछताछ की तो दीपक की मौत पर पड़ा परदा
हट गया.घटना की जानकारी देते हुए अमिता ने पुलिस को बताया कि बीते कई महीनों से ठेकेदार सतेंद्र के साथ मेरे अवैध संबंध थे, जिस की कुछकुछ जानकारी मेरे पति दीपक को हो गई थी. 10 मई, 2022 की घटना वाली रात को 12 बजे दीपक ने हम दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया था. इस कारण हम दोनों अपनी पोल खुलने के डर से घबरा गए थे.

तभी हम दोनों ने एकराय हो कर चुनरी से दीपक का गला घोट कर उसे मार डाला था. इस के बाद हम दोनों ने दीपक को बैड पर लिटा दिया था. फिर सतेंद्र ठेकेदार वहां से चला गया था.
थोड़ी देर बाद मैं ने साक्ष्य छिपाने के लिए अपने देवर जितेंद्र व देवरानी सोनी को अपने कमरे में बुलाया था और उन्हें दीपक को हार्ट अटैक होने की बात बताई थी.इस के बाद पुजारी ने अमिता के ये बयान दर्ज कर लिए थे. पूछताछ के दौरान ठेकेदार सतेंद्र ने भी प्रेमिका अमिता के बयान में सहमति जताते हुए दीपक की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

दीपक की मौत का परदाफाश होने के बाद पुजारी ने इस हत्या का मुकदमा दीपक के छोटे भाई जितेंद्र नेगी की तहरीर पर भादंवि की धारा 302, 201 व 34 के तहत दर्ज कर लिया था. इस के बाद पुजारी ने दीपक की हत्या के खुलासे की जानकारी एसएसपी जन्मेजय खंडूरी को दी. सतेंद्र व अमिता को पुलिस ने कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.आरोपी सतेंद्र पहले सेना में नौकरी करता था तथा वर्ष 2013 में सेना से वह रिटायर हुआ था. सतेंद्र का अपनी पहली पत्नी से तलाक हो गया था. इस के बाद उस ने वर्ष 2015 में दूसरी शादी कर ली थी. रिटायरमेंट के बाद सतेंद्र भवन निर्माण के ठेके लेता था. उस के 2 बच्चे हैं.

अमिता का परिवार मूलरूप से उत्तराखंड के जिला टिहरी गड़वाल का रहने वाला है तथा 8 साल पहले दीपक से उस की शादी हुई थी. 2 बच्चों की मां अमिता भी सतेंद्र के साथ वासना के दलदल में ऐसी डूबी थी कि उस ने अपना परिवार खुद ही उजाड़ लिया था.कथा लिखे जाने तक सतेंद्र व अमिता देहरादून जेल में बंद थे. दीपक की हत्या की जांच थानाप्रभारी भुवनचंद पुजारी कर रहे थे. पुजारी विवेचना पूरी करने के बाद इस प्रकरण में सतेंद्र व अमिता के विरुद्ध चार्जशीट न्यायालय में भेजने की तैयारी कर रहे थे.

एक दामाद और : पांच बेटी होने के बाद भी उसे कोई दिक्कत नहीं थी क्यों

हम शर्मिंदा हैं उजरिया -भाग 3

जिस के जवाब में उजरिया ने उन्हें बताया, ‘‘भला जिस्म के धंधे में बड़ी उम्र वाली औरतों की पूछ ही कहां होती है…’’ ‘‘पर, तुझे हमारे बारे में इतना सबकुछ कैसे पता?’’ ‘‘मुझे यह सब इसलिए पता है, क्योंकि जिस लड़की के जिस्म को तुम लोग उस दिन चूमचाट और नोच रहे थे, वह और कोई नहीं, बल्कि मेरी सगी बहन थी…

हम दोनों बहनें अपने कैंसर से पीडि़त पिता का इलाज कराना चाहती हैं, इसीलिए,’’ कह कर उजरिया चुप हो गई. एक दलित औरत के हाथ का बना खाना खाने से मना करने वाले लड़कों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अब क्या करना चाहिए? भले ही आज उन्होंने एक दलित औरत के हाथ का खाना खाने से मना किया हो, पर उसी की सगी बहन के साथ तो वे अपना शरीर बांट ही चुके हैं और इन बातों से मैस के अंदर उन लोगों की काफी बेइज्जती तो हो ही चुकी थी. इतना सब कह कर उजरिया बाहर खुली हवा में आ चुकी थी. वहां उसे थोड़ा सुकून मिल रहा था.

, जबकि डिमैलो ग्रुप के लड़कों की नजरें कह रही थीं, ‘हम शर्मिंदा हैं उजरिया…’ उजरिया तेज कदमों से गोमती पुल के नीचे बनी बस्ती में पहुंच जाना चाहती थी और अपनी छोटी बहन और पिता के गले लग कर खूब रोना चाहती थी. किसी के कमरे में रखा टैलीविजन तेज आवाज में चल रहा था, जिस पर कोई नेता बोल रहा था, ‘‘हम सवर्णों की पार्टी आप सब से यह वादा करती है कि हम शोषित, वंचित और दलित लोगों का खास ध्यान रखेंगे और उन्हें समाज में ऊंचा दर्जा दिलाएंगे…’’ उस नेता की आवाज सुन कर उजरिया ने नफरत से सिर झटक दिया और उस के मुंह से निकला, ‘‘हुं…

सीप में बंद मोती : भाग 2

छोटे से बगीचे से फूलपत्तियां तोड़ कर वह रोज पुष्पसज्जा करती. कई बार तो आलोक भी सजे हुए सुंदर से घर को देख कर हैरान रह जाता. तारीफ के बोल  उस के मुंह से निकलने को ही होते पर वह उन्हें अंदर ही घुटक लेता.

पाक कला में निपुण अरुणा रोज नएनए व्यंजन बनाती. उस की तो भूख जैसे दोगुनी हो गई थी. नहाने जाता तो स्नानघर में कपड़े, तौलिया, साबुन सब करीने से सजे मिलते. यह सब देख कर  मन ही  मन अरुणा के प्रति प्यार और स्नेह के अंकुर से फूटने लगते, पर फिर उसी क्षण वही पुरानी कटुता उमड़ कर सामने आ जाती और वह सोचता, ये काम तो कोई नौकर भी कर सकता है.

एक दिन वह दफ्तर से आ कर बैठा ही था कि नरेश, विवेक, राजेश सजीधजी  पत्नियों के साथ उस के घर आ धमके. नरेश बोला, ‘‘आज पकड़े गए, जनाब.’’

उन सब के चेहरे देख कर एक बार तो आलोक सन्न सा रह गया. क्या सोचेंगे ये सब अरुणा को देख कर? क्या यही रूप की रानी थी, जिसे अब तक उस ने छिपा कर रखा हुआ था? पर मन के भाव छिपा कर वह चेहरे पर मुसकान ले आया और बोला, ‘‘आओआओ, यार, धन्यवाद जो तुम सब इकट्ठे आए.’’

‘‘आज तो खासतौर से भाभीजी से मिलने आए हैं,’’ विवेक  बोला और फिर सब बैठक में आ गए. सुघड़ता और कलात्मकता से सजी बैठक में आ कर सभी नजरें घुमा कर सजावट देखने लगे. राजेश बोला, ‘‘अरे वाह, तेरे घर का तो कायाकल्प हो गया है, यार.’’

तभी अंदर से अरुणा मुसकराती हुई आई और सब को नमस्ते कर के बोली, ‘‘बैठिए, मैं आप लोगों के लिए चाय लाती हूं.’’

‘‘आप भी क्या सोचती होंगी कि आप के पति के कैसे दोस्त हैं जो अब तक मिलने भी नहीं आए पर इस में हमारा कुसूर नहीं है. आलोक ही बहाने बनाबना कर हमें आने से रोकता रहा.’’

‘‘अरुणा, तुम्हारी पुष्पसज्जा तो गजब की है,’’ सोनिया प्रंशासात्मक स्वर में बोली, ‘‘हमारे बगीचे में भी फूल हैं पर   मुझे सजाने का तरीका ही नहीं आता. तुम सिखा देना मुझे.’’

‘‘इस में सिखाने जैसी तो कोई बात ही नहीं,’’ अरुणा संकुचित हो उठी. वह रसोई में चाय बनाने चली गई.  कुछ ही देर में प्लेटों में गरमागरम ब्रेडरोल और गुलाबजामुन ले आई.

‘‘आप इनसान हैं या मशीन?’’ विवेक हंसते हुए बोला, ‘‘कितनी जल्दी सबकुछ तैयार कर लिया.’’

‘‘अब आप लोग गरमागरम खाइए मैं ब्रेडरोल तलती जा रही हूं.’’

1 घंटे बाद जब सब जाने लगे तो नरेश आलोक को कोहनी मार कर बोला, ‘‘वाकई यार, तू ने बड़ी सुघड़ और अच्छी बीवी पाई है.’’

आलोक समझ नहीं पाया, नरेश सच बोल रहा है या मजाक कर रहा है. जाते समय सब आलोक और अरुणा को आमंत्रित करने लगे  तो आलोक बोला, ‘‘दिन तय मत करो, यार, जब फुरसत होगी आ जाएंगे और फिर  खाना खा कर ही आएंगे.’’

‘‘फिर तो तुम्हें फीकी मूंग की दाल और रोटी ही मिलेगी,’’ विवेक हंसता हुआ बोला, ‘‘हमारी पत्नी का तो लगभग रोज का यही घिसापिटा मीनू है.’’

‘‘और कहीं हमारे यहां खिचड़ी  ही न बनी हो. सोनिया जब भी थकी होती है खिचड़ी ही बनाती है. वैसे अकसर यह थकी ही रहती है,’’ नरेश टेढ़ी नजरों से सोनिया को देख कर बोला.

सब चले गए तो अरुणा बिखरा घर सहेजने लगी और आलोक आरामकुरसी पर पसर गया. उस ने कनखियों से अरुणा को देखा, क्या सचमुच उसे  सुघड़ और बहुत अच्छी पत्नी मिली है? क्या सचमुच उस के दोस्तों को उस के जीवन पर रश्क है? उस के मन में अंतर्द्वंद्व सा चल रहा था. उसे अरुणा पर दया सी आई. 2 माह होने को हैं. उस ने अरुणा को कहीं घुमाया भी नहीं है. कभी घूमने निकलते भी हैं तो रात को.

एक दिन शाम को आलोक दफ्तर  से आया तो बोला, ‘‘अरुणा, झटपट तैयार हो जाओ, आज नरेश के घर चलते हैं.’’

अरुणा ने हैरानी से उसे देखा और फिर खामोशी से तैयार होने चल पड़ी.  थोड़ी देर में ही वह तैयार हो कर आ गई. जब वे नरेश के घर पहुंचे तो अंदर से जोरजोेर से आती आवाज से चौंक कर दरवाजे पर ही रुक गए. नरेश चीख रहा था, ‘‘यह घर है या नरक, मेरे जरूरी कागज तक तुम संभाल कर नहीं रख सकतीं. मुन्ने ने सब फाड़ दिए हैं. कैसी जाहिल औरत हो, कौन तुम्हें पढ़ीलिखी कहेगा?’’

‘‘जाहिल हो तुम,’’ सोनिया का तीखा स्वर गूंजा, ‘‘मैं तुम्हारी नौकरानी नहीं हूं जो तुम्हारा बिखरा सामान ही सारा दिन सहेजती रहूं.’’

बाहर खड़े अरुणा और आलोक संकुचित से हो उठे. ऐसे हालात में वे कैसे अंदर जाएं, समझ नहीं पा रहे थे. फिर आलोक ने  गला खंखार कर दरवाजे पर लगी घंटी बजाई. दरवाजा सोनिया ने खोला. बिखरे बाल, मटमैली सी सलवटों वाली साड़ी और  मेकअपविहीन चेहरे  में वह काफी फूहड़ और भद्दी लग रही थी. आलोक ने हैरानी से सोनिया को देखा. सोनिया संभल कर बोली, ‘‘आइए… आइए, आलोकजी,’’ और वह अरुणा का हाथ थाम कर अंदर ले आई.

उन्हें सामने देख नरेश झेंप सा गया और वह सोफे पर बिखरे कागजों  को समेट कर बोला, ‘‘आओ…आओ, आलोक, आज कैसे रास्ता भूल गए?’’

आलोक और अरुणा सोफे पर बैठ गए. आलोक ने नजरें घुमा कर देखा, सारी बैठक अस्तव्यस्त थी. बच्चों के खिलौने, पत्रिकाएं, अखबार, कपड़े इधरउधर पड़े थे. हालांकि नरेश के घर आलोक पहले भी आता था, पर अरुणा के आने के बाद वह पहली बार यहां आया था. इन 2 माह में ही अरुणा  के कारण व्यवस्थित रूप से सजेधजे घर में रहने से उसे नरेश का घर बड़ा ही बिखरा और अस्तव्यस्त लग रहा  था.

अनजाने ही वह सोनिया और अरुणा की तुलना करने लगा. सोनिया नरेश से किस तरह जबान लड़ा रही थी. घर भी कितना गंदा रखा हुआ है. स्वयं भी किस कदर फूहड़ सी बनी हुई है. क्या फायदा ऐसे मेकअप और लीपापोती का जिस के उतरते ही औरत कलईर् उतरे बरतन सी बेरंग, बेरौनक नजर आए.

इस  के विपरीत अरुणा कितनी सभ्य और सुसंस्कृत है. उस के साथ कितनी शालीनता से बात करती है. अपने सांवले रंग पर फबने वाले हलके रंग के कपड़े कितने सलीके से पहन कर जैसे हमेशा तैयार सी रहती है. घर भी कितना साफ रखती है. लोग जब उस के घर की तारीफ करते हैं तब गर्व से उस का सीना  भी फूल जाता है.

तभी सोनिया चाय और एक प्लेट में भुजिया लाई तो नरेश बोला, ‘‘अरे, आलोक और उस की पत्नी पहली बार घर आए हैं, कुछ खातिर करो.’’

‘‘अब घर में तो कुछ है नहीं. आप झटपट जा कर बाजार  से ले आओ.’’

‘‘नहीं…नहीं,’’ आलोक बोला, ‘‘इस समय कुछ खाने की इच्छा भी नहीं है,’’ मन ही मन वह सोच रहा था, अरुणा मेहमानों के सामने हमेशा कोई न कोई घर की बनी हुई चीज अवश्य रखती है. जो खाता है, तारीफ किए बिना नहीं रहता. कुछ देर बैठ कर आलोक और अरुणा ने उन से विदा ली. बाहर आ कर आलोक बोला, ‘‘रास्ते में विवेक का घर भी पड़ता है. जरा उस के यहां भी हाजिरी लगा लें.’’

चलतेचलते उस ने अरुणा का हाथ अपने हाथों में ले लिया. अरुणा हैरानी से उसे देखने लगी. सदा उस की उपेक्षा करने वाले पति का यह अप्रत्याशित व्यवहार उस की समझ में नहीं आया.

विवेक के घर जब वे पहुंचे तो दरवाजा खटखटाने पर तौलिए से हाथ पोंछता विवेक रसोई  से निकला और उन्हें  देख कर शर्मिंदा सा हो कर बोला, ‘‘अरे वाह, आज तो जाने सूरज कहां से निकला जो तुम  लोग हमारे घर आए हो.’’

विवेक  के घर का भी वही हाल था.  बैठक इस तरह से अस्तव्यस्त थी  जैसे  अभी तूफान आ कर गुजरा हो. विवेक पत्रिकाएं समेटता हुआ बोला, ‘‘आप लोग बैठो, मैं चाय बनाता हूं. नीलम तो लेडीज क्लब गई हुईर् है.’’

पत्नी क्लब में पति रसोई में. आलोक को मन ही मन हंसी आ गई. तभी अरुणा खड़े हो कर बोली, ‘‘आप बैठिए भाई साहब, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर अरुणा रसोई में चली गई.

तभी विवेक का 1 साल का बेटा भी उठ कर रोने लगा. विवेक उसे हिलाडुला कर चुप कराने का प्रयास करने लगा.

हम शर्मिंदा हैं उजरिया

एक दामाद और : पांच बेटी होने के बाद भी उसे कोई दिक्कत नहीं थी क्यों -भाग 1

नरेश को दहेज में घरगृहस्थी के आवश्यक सामान के अतिरिक्त 4 सालियां भी मिली थीं. ससुर के पास न केवल जायदाद थी बल्कि एक सफल व्यवसाय भी था. इस कारण जब एक के बाद एक 5 पुत्रियों ने जन्म लिया तो उन के माथे पर एक भी शिकन न पड़ी. उन्होंने आरंभ से ही हर पुत्री के नाम काफी रुपया जमा कर दिया था जो प्रतिवर्ष ब्याज कमा कर पुत्रियों की आयु के साथसाथ बढ़ता जाता था.

नरेश एक सरकारी संस्थान में सहायक निदेशक था. समय के साथ तरक्की कर के उस का उपनिदेशक और फिर निदेशक होना निश्चित था. हो सकता है कि वह बीच में ही नौकरी छोड़ कर कोई दूसरी नौकरी पकड़ ले. इस तरह वह और जल्दी तरक्की पा लेगा. युवा, कुशल व होनहार तो वह था ही. इन्हीं सब बातों को देखते हुए उसे बड़ी पुत्री उर्मिला के लिए पसंद किया गया था.

उर्मिला को अपने पति पर गर्व था. वह एक बार उस के दफ्तर गई थी और बड़ी प्रभावित हुई थी. अलग सुसज्जित कमरा था. शानदार मेजकुरसी थी. मेज पर फाइलों का ढेर लगा था. पास ही टेलीफोन था, जो घड़ीघड़ी बज उठता था. घंटी बजाने से चपरासी उपस्थित हुआ और केवल नरेश के सिर हिलाने से ही तुरंत जा कर एक ट्रे में 2 प्याले कौफी और बिस्कुट ले आया था. यह बात अलग थी कि वह जो वेतन कटकटा कर घर लाता था उस से बड़ी कठिनाई से पूरा महीना खिंच पाता था. शादी से पहले तो उसे यह चिंता लगी रहती थी कि रुपया कैसे खर्च करे, परंतु शादी के बाद मामला उलटा हो गया. अब हर घड़ी वह यही सोचता रहता था कि अतिरिक्त रुपया कहां से लाए.

उर्मिला का हाथ खुला था, जवानी का जोश था और नईनई शादी का नशा था. अकसर नरेश को हाथ रोकता देख कर बिना सोचेसमझे झिड़क देती थी. खर्चा करने की जो आदत पिता के यहां थी, वही अब भी बदस्तूर कायम थी.

महीने का आरंभ था. घर का खानेपीने का सामान आ चुका था और मन में एक हलकापन था. शाम को फिल्म देखने का कार्यक्रम बना लिया था. फिल्म का नाम ही इतना मजेदार था कि सोचसोच कर गुदगुदी सी होने लगती थी. फिल्म थी ‘दिल धड़के, शोला भड़के.’

दिन के 11 बजे थे. नरेश अपने दफ्तर के कार्य में व्यस्त थे. निदेशक बाहर दौरे पर जाने वाले थे. उन के लिए आवश्यक मसौदे व कागजों की फाइल तैयार कर के 4 बजे तक उन के सुपुर्द करनी थी. इसी समय टेलीफोन बज उठा. निदेशक का निजी सचिव सुबह से 4 बार फोन कर चुका था. फिर उसी का होगा. होंठ चबाते हुए उस ने फोन उठाया.

‘‘नरेश.’’

फोन पर उर्मिला के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी.

‘‘बोलो, मैं कौन हूं?’’

‘‘तुम्हारा भूत लगता है. सुनो, अभी मैं बहुत व्यस्त हूं. तुम 1 बजे के बाद फोन करना.’’

‘‘सुनो, सिनेमा के टिकट खरीद लिए?’’

‘‘नहीं, अभी समय नहीं मिला. चपरासी बिना बोले बैंक चला गया है. आने पर भेजूंगा.’’

‘‘इसीलिए फोन किया था. 4 टिकट और ले लेना.’’

 

बिगड़ी लड़की : अजय से ड्राइविंग के बारे में कौन पूछ रहा था – भाग 2

जगह काफी दूर थी, पर जीपीएस लगा था. अजय ने लड़की को उस की जगह पर पहुंचाया. उतरते हुए लड़की ने 2,000 का एक नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘यह आप का मेहनताना है.’’ अजय बोला, ‘‘मैडम, आप मुसीबत में थीं, इसलिए मैं ने मदद की. जिस दिन आप मुझे ड्राइवर रख लेंगी, उस दिन मुझे यह पैसे भी दे देना,’’ यह कहते हुए उस ने चाबी लड़की के हाथों में पकड़ाई और तेज कदमों से चला गया. कुछ कदम चलने के बाद अजय को कार की डिक्की के खुलने की आवाज आई. वह लड़की एक बड़ा सा सूटकेस उस कार की डिक्की से निकाल रही थी,

पर उस से निकल नहीं रहा था. अजय ने सोचा कि वह उस की मदद करे, इसलिए वह लौटा और बोला, ‘‘क्या मैं मदद करूं?’’ लड़की थोड़ी सकपकाई, फिर अपनी हालत देखते हुए बोली, ‘‘हां, इस सूटकेस को अंदर ले जाना है.’’ सूटकेस बहुत भारी था, पर अजय के लिए मुश्किल नहीं था. वह उसे आसानी से उठा कर ले गया. लड़की ने उसे बैडरूम में पलंग के गद्दे को उठा कर सामान रखने की जगह में रखवा दिया. अजय को कुछ अजीब सा लगा, पर फिर उस ने कंधा उचकाया कि उसे क्या लेनादेना. लड़की ने कहा, ‘‘थैंक यू वैरी मच जैंटलमैन.’’ अजय घर से निकल कर चला आया.

सड़क पर लगे नल पर सुबह अजय नहाधो कर तैयार हुआ और सेठजी के कारखाने के पास जा पहुंचा. तकरीबन 10 बजे कारखाने का दफ्तर खुला. उसे अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई. वह दरबान के करीब गया और कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मुझे बड़े साहब से मिलना है.’’ दरबान ने मिलने का कार्ड बनवा दिया. तकरीबन साढ़े 10 बजे एक कार अहाते के अंदर घुसी. दरबान ने अजय को बताया, ‘‘साहब आ गए हैं.’’ कार में से एक आदमी उतरा. देखने से ही वह कोई बहुत बड़े सेठ मालूम पड़ रहे थे, लेकिन अजय उन को देखते ही उदास हो गया, क्योंकि ये सेठ तनेजा नहीं थे. उस ने दरबान से पूछा, ‘‘क्या ये ही बड़े सेठजी हैं?’’ दरबान ने बताया, ‘‘हां, आजकल ये ही बड़े सेठजी हैं. इन से बड़े सेठजी का देहांत हुए तो डेढ़ साल हो गया. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था.’’ अब तो अजय की रहीसही हिम्मत भी जाती रही.

वह लौटने के लिए मुड़ा ही था कि दिल के किसी कोने से आवाज आई, ‘एक बार कोशिश कर के तो देखो. क्या पता, काम बन जाए.’ दिल की बात मान कर अजय छोटे सेठजी के पास जाने के लिए तैयार हो गया. उस ने उन के दफ्तर का दरवाजा खोला और पूछ कर अंदर चला गया. उस ने उन्हें प्रणाम किया, तो उन्होंने उसे निहारा और सामने वाली कुरसी पर बैठने के लिए कहा. अजय बैठ तो गया, लेकिन वैसे ही हाथ जोड़े रखा. सेठजी ने वह कार्ड देख कर कहा, ‘‘अच्छा, तो तुम्हारा नाम अजय?है? मैं इस कारोबार का साझेदार प्रदीप हूं. सेठजी ने तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दिया था.

तुम्हारी ईमानदारी की तारीफ वे अकसर करते थे. खैर, यह बताओ कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’ ‘‘जी… जी… मैं काम की तलाश में यहां आया हूं. मैं ने बीकौम कर लिया है. मैं कार चलाना और ठीक करना भी जानता हूं.’’ ‘‘ठीक है, तुम्हें काम मिल सकता है. क्या ड्राइवरी का काम कर सकते हो? वेतन 20,000 रुपए होगा, साथ में रहने के लिए जगह भी, लेकिन पता नहीं, तुम यह काम करना चाहोगे या नहीं.’’ ‘‘मैं सीखने के लिए सबकुछ करने को तैयार हूं.’’ ‘‘अच्छा, तो मैं तुम्हें ऐसी लड़की की गाड़ी संभालने का काम दे रहा हूं, जो बहुत भली है, लेकिन अब ‘भटक’ गई है, बातबात पर बिगड़ती है.’’ अजय ने सोचा, ‘कितनी भी बिगड़ी क्यों न हो, आखिर है तो लड़की ही.’ वह उस का पता ले कर चल पड़ा. उस पते के मुताबिक सेठ तनेजा की लड़की ‘मधु’ की गाड़ी उसे संभालनी थी. वह जिस घर में पहुंचा, वह वही था, जहां रात को आया था. वह मधु से मिलने गया. घर के अहाते में बैठ कर वह उसी का इंतजार कर रही थी. उस लड़की के पास पहुंच कर उस ने देखा, वह वही रात वाली लड़की थी, जिस ने उसे पहुंचाया था. वह आसानी से सोच सकता था कि वह बिगड़ी हुई?है.

‘‘तो तुम ही हमारे नए ड्राइवर हो? हम तुम्हारे एहसानमंद हैं, क्योंकि तुम ने हमारे पिताजी की जान बचाई थी. तुम एक तारीख से काम संभाल लो,’’ मीठी, लेकिन सख्त आवाज में मधु ने कहा. उसे बिलकुल याद नहीं था कि यह अजय ही था, जो रात उस के साथ घर तक आया था. अंधेरे की वजह से और नशे के चलते वह उसे पहचान ही नहीं पाई. अजय ने सोचा, ‘इस लड़की का राज पता करना पड़ेगा. वह जो भी कहेगी और जैसा कहेगी मैं करूंगा.’ उस ने हामी भर दी. अगले दिन वह सामान ले कर घर पहुंच गया. वह रामू काका से मिला. रामू काका ने जो सेठजी के यहां 20 साल से नौकरी कर रहे हैं, उसे बताया कि मधु की मरजी और समय का खयाल रखना, वह पागल नहीं?है, जो तुम पर बिगड़ेगी. अगली सुबह अजय मधु के सामने जा पहुंचा और प्रणाम कर के खड़ा हो गया. ‘‘गाड़ी तैयार रखो. मुझे एक जगह जाना है.’’ अजय गाड़ी में चालक की जगह पर बैठ गया. मधु आई तो भड़क उठी. बोली, ‘‘तुम मालिक नहीं हो. जब भी गाड़ी चलाओ, ड्राइवर की वरदी पहनो और बिल्ला लगाओ. जाओ, जल्दी करो.’’ अजय को गुस्सा तो बहुत आया, पर उसे अपना मकसद पूरा करना था,

इसलिए वह दी गई वरदी पहन कर आ गया. उसे अहसास हो गया कि कुछ लोग मधु को ब्लैकमेल कर रहे हैं और उस से वे काम करवा रहे हैं, जो मधु के पैसे और कारखाने को हथियाना चाहते हैं. जल्दी ही अजय ने एकएक का पूरा खाका बना लिया. अब उसे सरगना की तलाश थी. इसी तरह पूरा महीना बीत गया. इस दौरान अजय मधु के हर तेवर को बरदाश्त करता रहा. एक दिन तो गजब हो गया. मधु की सहेली प्रिया को उस के घर छोड़ने के लिए मधु ने ही अजय से कहा था. घर के पास पहुंचने पर प्रिया ने अजय के गाल को चूम लिया. तब उस के होंठों पर लिपस्टिक की लाली साफ उतर गई. प्रिया उसे रिझाने लगी और अजय से कहा, ‘‘मुझे कमरे तक ले चलो न. मुझ से चला नहीं जाता.’’ अजय प्रिया के बारे में जानना चाहता था, इसलिए उस ने उस की बात मान ली. घर में और कोई नहीं था, पर एक दीवार पर 4-5 टीवी स्क्रीनें थीं, जिन में जगहजगह की लाइव पिक्चरें आ रही थीं. पहली मंजिल के कमरे पर जैसे ही उस ने प्रिया को लिटाया, उस ने उस के गले में बांहें डाल दीं और कहा, ‘‘डियर, तुम सिर्फ मधु को मजे देते हो, आज मेरीतुम्हारी रात मेरे साथ,’’ कहते हुए प्रिया कपड़े उतारने लगी.

अजय सकपकाया, पर संभलते हुए बोला, ‘‘हांहां, क्यों नहीं. तुम्हारे जैसी कमसिन बाला को कोई छोड़ भी कैसे सकता है. बस, बाथरूम तक हो कर आया,’’ कह कर वह कमरे से बाहर निकला, फिर घर का दरवाजा बंद कर के गाड़ी से घर चला आया. अगले दिन मधु ने अजय से तुरंत नौकरी छोड़ देने के लिए कह दिया. प्रिया ने शिकायत की थी कि अजय ने उस के साथ बदतमीजी की थी. अजय भी जोशीला था. सुबह गाड़ी से जाने के लिए उस ने अपना सामान बांधा और जब वह स्टेशन पर पहुंचा, तब गाड़ी आने में 2 घंटे की देरी थी. अजय इंतजार करने लगा. वह मधु के बारे में ही सोच रहा था. उस दौरान उस ने मधु को सारी घटना मैसेज कर दी. थोड़ी देर में ट्रेन प्लेटफार्म पर आती दिखाई दी, तभी उस की नजर पास खड़ी मधु पर पड़ी. वह चौंक गया. ऐसा लगता था, जैसे रातभर वह सोई नहीं थी. ‘‘चलो अजय,’’ मधु ने उदास लहजे में कहा. अजय चुपचाप खड़ा रहा, फिर वह उस के साथ चल पड़ा. दोनों गाड़ी में बैठे. मधु गाड़ी चलाने लगी. वह उसे तेज रफ्तार से चला रही थी. अजय कुछ समझ नहीं पा रहा था कि वह उसे कहां ले जा रही है. एक वीरान सी जगह पर पहुंच कर मधु ने कार रोक दी.

वहां कंटीली झाडि़यां, घासफूस उगे थे. पास ही छोटी सी झील थी. मधु वहीं बैठ गई. वह कंटीली झाडि़यों को निहारती रही, फिर बोली, ‘‘अजय, मेरी जिंदगी इन्हीं कांटों से हो कर गुजरी है. तुम समझते हो कि मैं जन्म से ही बिगड़ी हूं, लेकिन ऐसी बात नहीं?है. ‘‘मैं जब 7 साल की थी, तो मेरी मां मुझे छोड़ कर चली गईं. पिताजी को अपने कारोबार से ही फुरसत नहीं थी, जो मुझ से 2 मिनट मीठी बातें करें. ‘‘मुझे पैसों की कमी नहीं थी, राजकुमारी की तरह मुझे पालापोसा जा रहा था, लेकिन उन्हें कौन समझाता कि मुझे पैसे नहीं, प्यार चाहिए. ‘‘पिताजी के दिल में मेरे लिए प्यार बहुत था, लेकिन समय नहीं था. सगेसंबंधियों के समझाने पर और मेरी खुशी की खातिर उन्होंने दूसरी शादी कर ली. पहले तो नई मां ने मुझे दुलार दिया, लेकिन जब मेरी सौतेली बहन पैदा हुई, तो मां का ध्यान उस की तरफ ज्यादा रहने लगा. मेरा भाई भी कुछ नहीं कर पाया. ‘‘मेरे पिता पर उस ने ऐसा जादू किया था कि सचाई जानने के बावजूद भी वे कुछ कर नहीं सकते थे.’’ फिर कुछ पर रुक कर मधु बोली, ‘‘मैं खून के आंसू रोती रही. एक दिन मेरी सौतली मां व बहन को उन की करतूत की सजा मिल गई. वे कार दुर्घटना में मारी गईं. तब पिताजी कुछ समय के लिए गमगीन रहे, लेकिन फिर मुझ पर ध्यान दिया.

 

बढ़ाने के चक्कर में कहीं कम न हो जाए सैक्स पावर

उत्तर प्रदेश के 28 साला राहुल को शादी के बाद हुआ. अपनी नईनवेली पत्नी के साथ जोरदार और पलंगतोड़ हमबिस्तरी करने की ख्वाहिश में उस ने वियाग्रा नाम की दवा की जरूरत से ज्यादा खुराक यानी ओवर डोज ले ली. वियाग्रा या कोई भी दवा आमतौर पर ज्यादा नुकसानदेह नहीं होती, थोड़ेबहुत साइड इफैक्ट हो सकते हैं, लेकिन वे समय रहते ठीक भी हो जाते हैं. अगर न हों तो तुरंत डाक्टर से मशवरा लेने की हर कोई कह देता है. यही बात वियाग्रा पर लागू होती है. रोहित ने गलती यह की कि एकसाथ 6-8 गोलियां वियाग्रा की खा लीं और कुछ दिन उन के असर को यह सोचते हुए छिपाता रहा कि इस बार भी सब अपनेआप ठीक हो जाएगा. सैक्स पावर और हमबिस्तरी की मीआद बढ़ाने के लिए 25 मिलीग्राम की एक गोली और ज्यादा ढीलापन रहता हो, तो 50 मिलीग्राम की एक गोली काफी होती है.

वैसे, प्राइवेट पार्ट में इरैक्शन यानी तनाव के लिए वियाग्रा की गोली का सेवन पिछले 20 सालों में तेजी से बढ़ा है. इस ने तो हद कर दी 5 जून, 2022 को राहुल को प्रयागराज के सब से बड़े सरकारी अस्पताल मोतीलाल नेहरू मैडिकल कालेज में भरती कराया गया, तो वहां मौजूद डाक्टर भी हैरान रह गए, क्योंकि उन की जिंदगी में आया यह पहला मामला था, जिस में प्राइवेट पार्ट में तनाव कम या खत्म नहीं हो रहा था वरना अब तक तो ऐसे ही नौजवान ज्यादा आते थे, जिन के अंग में या तो तनाव नहीं आता था या वे पूरी तरह तैयार नहीं होते थे या फिर वे जल्दी डिस्चार्ज हो जाते थे. लेकिन हो गया इलाज यूरोलौजी डिपार्टमैंट के मुखिया डाक्टर दिलीप चौरसिया ने केस अपने हाथ में लिया और इलाज शुरू किया. यह मामला प्राइवेट पार्ट की नसों में खामी आ जाने का था,

जो कभीकभार लाखों में से किसी एक को होता है. उन की टीम ने मुंबई के एक नामी डाक्टर रुपिन शाह के फार्मूले को अपनाया और पेनाइथल प्रोस्थैसिस के एक महीने के अंतर से 2 आपरेशन कर रोहित को ठीक कर दिया. रोहित तो डाक्टरों की कोशिशों के चलते ठीक हो गया, लेकिन देश में लाखोंकरोड़ों नौजवान ऐसे हैं, जो नीमहकीमों के चक्कर में पड़ कर अपनी जिंदगी तबाह कर लेते हैं और मारे शर्म और डर के किसी को बताते भी नहीं कि सैक्स पावर बढ़ाने के लालच में उन की सैक्स पावर या तो कम हो गई है या बिलकुल ही खत्म हो गई है. रोहित भी शायद यही करता, अगर उसे अंग उठे रहने की परेशानी पेश न आ रही होती. अब वह ठीक हो गया है, तो उम्मीद है कि उस की पत्नी भी इस बात को बुरा सपना मान कर वापस आ जाएगी.

जानलेवा टोटके रोहित का मामला तो जैसेतैसे सुलट और सुलझ गया, लेकिन भोपाल के 24 साला प्रतीक का मर्ज अभी तक ज्यों का त्यों है, जिस ने तकरीबन 2 साल पहले अपनी गर्लफ्रैंड पर रौब गांठने और सैक्स के पहले एमपी नगर के एक फुटपाथी नीमहकीम से सैक्स पावर बढ़ाने वाली दवाएं 500 रुपए में ली थीं. नीमहकीम की हिदायत के मुताबिक प्रतीक ने पुडिया में बंधी खुराक गरम दूध से हलक में उड़ेल ली और तयशुदा जगह पर माशूका का इंतजार करने लगा. इस बाबत ह्वाट्सएप पर बात हो चुकी थी कि वह शाम के 5 बजे तक पहुंच जाएगी, फिर दोनों खूब मस्ती करेंगे. पर थोड़ी देर बाद माशूका का मैसेज आया कि घर पर मेहमान आ गए हैं,

इसलिए अब वह शाम के 7 बजे तक पहुंच पाएगी. प्रतीक मन और तन मसोस कर रह गया, क्योंकि उस नीमहकीम की दवा असर दिखाने लगी थी, लेकिन पेट के नीचे नहीं, बल्कि ऊपर जहां गैस बन रही थी और जोरदार गुड़गुड़ हो रही थी. देखते ही देखते प्रतीक को दस्त होने का सिगनल मिला, तो वह सार्वजनिक शौचालय की तरफ भागा. थोड़ी देर बाद फारिग हो कर आया, तो पेट में तेज दर्द उठा, इतना तेज कि बरदाश्त नहीं हो रहा था. लिहाजा, उस ने अपने एक दोस्त को फोन किया और कहा कि भाई, जल्दी एमपी नगर आ कर मुझे डाक्टर के यहां ले चल.

अब तक उस पर से माशूका और सैक्स का नशा उतर चुका था. डाक्टर ने प्रतीक की जांच की और पूछा कि क्याक्या खायापीया था, तो वह हकीमजी की पुडि़या वाली बात छिपा गया. डाक्टर की दवा लेने से उस दिन तो आराम रहा, लेकिन दूसरे दिन फिर दस्त लगने लगे. अब उस का माथा ठनका कि हकीमजी तो उसे चूना लगा गए हैं. इस बार दूसरे डाक्टर को दिखाया, तो प्रतीक को यह सच बताने में ही अपनी भलाई लगी कि उस ने सैक्स पावर बढ़ाने की दवा ली थी. डाक्टर ने पहले तो तबीयत से प्रतीक को डांटा कि पढ़ेलिखे समझदार हो कर भी इन लुटेरों के चक्कर में पड़ते हो.

खैर, अब जाओ और इतनी जांचें करवा कर लाओ. अब तक इलाज में उस के 3,000 रुपए फुंक चुके थे, लेकिन परेशानी जबरदस्त थी, इसलिए वह इलाज करवाता रहा. इस के 2 साल बाद भी कभीकभी एकदम से दस्त लगने लगते हैं, तो उसे शौचालय की तरफ भागना ही पड़ता है. अब प्रतीक ने नीमहकीमों से तोबा कर ली है कि ये लोग जानतेसमझते कुछ नहीं हैं, बस पैसा कमाने की गरज से नौजवानों को खानदानी इलाज का झांसा दे कर अपना पेट भर रहे हैं, इसलिए इन से बचना चाहिए. पूरे देश में ऐसे तथाकथित नीमहकीमों का जाल बिछा है, जो नामर्द को मर्द बनाने का ठेका लिए बैठे हैं. शर्तिया औलाद पैदा करवाने के अलावा ये लोग वीर्य को इतना गाढ़ा करने के नुसखे बताते हैं कि गाढ़े और काढ़े में फर्क खत्म हो जाता है.

सैक्स ड्राइव बढ़ाने की जड़ीबूटियां भी इन के झोलों में रहती हैं. औरत को पूरी तरह से संतुष्ट करने की रामबाण औषधि भी इन के पास मिल जाती है. सैक्स पावर बढ़ाने की गारंटी देने वाले इन नीमहकीमों के नुकसानदेह इलाज के बारे में कई बार पोल खुल चुकी है. ‘सरस सलिल’ में भी न जाने कितनी बार ऐसे लेख छपे हैं, जो पाठकों को इन ठगों से बचने के लिए आगाह करते रहे हैं और सैक्स के बारे में उपयोगी जानकारियां देते रहे हैं कि इन बातों को समझें और करें, जो शादीशुदा जिंदगी में रंग घोल देती हैं. यह बहुत बड़ी गलतफहमी है कि मैं अपनी पत्नी या माशूका को बिस्तर में संतुष्ट नहीं कर पाऊंगा या ज्यादा देर तक टिक नहीं पाऊंगा. इस गलतफहमी से बचें,

क्योंकि पत्नी या माशूका आप से प्यार और इज्जत चाहती है और जब ये दोनों उसे मिलेंगे, तो वह सैक्स में भरपूर साथ और मजा देगी. बहुत सी आहें और चीखें संतुष्टि का पैमाना नहीं हैं. पैमाना है सैक्स करने का तरीका और ताकत, जो कुदरत जवान होते ही सभी को देती है. इस के बाद भी अगर कोई परेशानी या कमजोरी लगे, तो तुरंत बिना शरमाए डाक्टर से मिलें. वह आप की समस्या, जो आमतौर पर वहम होती है, को मिनटों में दूर कर देगा.

सीप में बंद मोती : भाग 1

 

टन…टन…दफ्तर की घड़ी ने साढ़े 4 बजने की सूचना दी तो सब एकएक कर के उठने लगे. आलोक ने जैसे यह आवाज सुनी ही नहीं.

‘‘चलना नहीं है क्या, यार?’’ नरेश ने पीठ में एक धौल मारी तो वह चौंक गया, ‘‘5 बज गए क्या?’’

‘‘कमाल है,’’ नरेश बोला, ‘‘घर में नई ब्याही बीवी बैठी  है और पति को यह भी पता नहीं कि 5 कब बज गए. अरे मियां, तुम्हारे तो आजकल वे दिन हैं जब लगता है घड़ी की सुइयां खिसक ही नहीं रहीं और कमबख्त  5 बजने को ही नहीं आ रहे, पर एक तुम हो कि…’’

नरेश के व्यंग्य से आलोक के सीने में एक चोट सी लगी. फिर वह स्वयं को संभाल कर बोला, ‘‘मेरा कुछ काम अधूरा पड़ा है, उसे पूरा करना  है. तुम चलो.’’

नरेश चल पड़ा. आलोक गहरी सांस ले कर कुरसी से टिक गया और सोचने लगा. वह नरेश को कैसे बताता कि नईनवेली बीवी है तभी तो वह यहां बैठा है. उस  के अंदर की उमंग जैसे मर सी गई है. पिताजी को भी न जाने क्या सूझी कि उस के गले में ऐसी नकेल डाल दी जिसे न वह उतार सकता है और न खुश हो कर पहन सकता है. वह तो विवाह करना ही नहीं चाहता था. अकेले रहने का आदी हो गया था…विवाह की इच्छा ही नहीं होती थी.

उस ने कई शौक पाले हुए थे. शास्त्रीय संगीत  के महान गायकों के  कैसटों का  अनुपम खजाना था उस के पास जिन्हें सुनतेसुनते वह न जाने कहां खो जाता था. इस के अलावा अच्छा साहित्य पढ़ना, शहर में आयोजित सभी चित्रकला प्रदर्शनियां देखना, कवि सम्मेलनों आदि में भाग लेना उस के प्रिय शौक थे और इन सब में व्यस्त रह कर उस ने विवाह के बारे  में कभी सोचा भी न था.

ऐसे में पिताजी का पत्र आया था,  ‘आलोक, तुम्हारे लिए एक लड़की देखी है. अच्छे खानदान की, प्रथम श्रेणी में  एम.ए. है. मेरे मित्र की बेटी है. फोटो साथ भेज रहा हूं. मैं तो उन्हें हां कर चुका हूं. तुम्हारी स्वीकृ ति का इंतजार है.’

अनमना सा हो कर उस ने फोटो उठाया और गौर से देखने लगा था. तीखे नाकनक्श की एक आकर्षक मुखाकृति थी. बड़ीबड़ी भावप्रवण आंखें जैसे उस के सारे वजूद पर छा गई थीं और जाने किस रौ में उस ने वापसी डाक से ही पिताजी को अपनी स्वीकृति  भेज  दी थी.

पिताजी ने 1 माह बाद ही विवाह की तारीख नियत कर दी थी. उस के दोस्त  नरेश, विपिन आदि हैरान थे और उसे सलाह दे रहे थे  कि सिर्फ फोटो देख कर ही वह विवाह को कैसे राजी हो गया. कम से कम एक बार लड़की से रूबरू तो हो लेता. पर जवाब में वह हंस कर बोला था, ‘फोटो तो मैं ने देख ही लिया है. अब पिताजी लंगड़ीलूली बहू तो चुनेंगे नहीं.’

पर कितना गलत सोचा था उस ने. विवाह की प्रथम रात्रि को ही उस ने अरुणा के चेहरे पर  प्रथम दृष्टि डाली तो सन्न रह गया था. अरुणा की रंगत काफी सांवली थी. फिर तो वे बड़ीबड़ी भावप्रवण आंखें, जिन में वह अकसर कल्पना में डूबा रहता था, वे तीखे नाकनक्श जो धार की तरह सीधे उस के हृदय में उतर जाते थे, सब जैसे कपूर से  उड़ गए थे और रह गया था अरुणा का सांवला रंग.

अरुणा से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर सुबह पिताजी से लड़ पड़ा था, ‘कैसी लड़की देखी है आप ने मेरे लिए? आप पर भरोसा कर  के मैं ने बिना देखे ही विवाह के लिए हां कर दी थी और आप ने…’

‘क्यों, क्या कमी है लड़की में? लंगड़ीलूली है क्या?’ पिताजी टेढ़ी  नजरों से उसे देख कर बोले थे.

‘आप ने तो बस, जानवरों की तरह सिर्फ हाथपैरों की सलामती का ही ध्यान रखा. यह नहीं देखा कि उस का रंग कितना काला है.’

‘बेटे,’ पिताजी समझाते हुए बोले थे, ‘अरुणा अच्छे घर की सुशील लड़की है.

प्रथम श्रेणी में एम.ए. है. चाहो तो नौकरी करवा लेना. रंग का सांवला होना कोई बहुत बड़ी कमी नहीं है. और फिर अरुणा सांवली अवश्य है, पर काली नहीं.’

पिताजी और मां दोनों ने उसे अपने- अपने ढंग से समझाया था पर उस का आक्रोश कम न हुआ था. अरुणा के कानों में भी शायद इस वार्तालाप के  अंश पड़ गए थे. रात को वह धीमे स्वर में बोली थी, ‘शायद यह विवाह आप की इच्छा के विरुद्ध हुआ है…’

वह खामोश रहा था. 15 दिन बाद ही वह काम पर वापस आ गया था. अरुणा भी उस के साथ थी. कानपुर आ कर अरुणा ने उस की अस्तव्यस्त गृहस्थी को सुचारु रूप से समेट लिया था.

‘‘साहब, घर नहीं जाना क्या?’’

चपरासी दीनानाथ का स्वर कान में पड़ा तो उस की विचारतंद्रा टूटी. 6 बज चुके थे. वह उठ खड़ा हुआ . घर जाने का भी जैसे कोई उत्साह नहीं था उस के अंदर. उसे आए 15 दिन हो गए हैं. अभी तक उस के दोस्तों ने अरुणा को नहीं देखा है. जब भी वे घर आने की बात करते हैं वह कोई  न कोई बहाना बना कर टाल जाता है.

आखिर वह करे भी क्या? नरेश की बीवी सोनिया कितनी सुंदर है और आकर्षक भी. और विपिन की पत्नी कौन सी कम है. राजेश की पत्नी लीना भी कितनी गोरी और सुंदर है. अरुणा तो इन सब के सामने कुछ भी नहीं. उस के दोस्त तो पत्नियों को बगल में सजावटी वस्तु की तरह लिए घूमते हैं. एक वह है कि दिन के समय भी अरुणा को साथ ले कर बाहर नहीं निकलता. न जाने कैसी हीन ग्रंथि पनप रही है उस के अंदर. कैसी बेमेल जोड़ी है उन की.

घर पहुंचा तो अरुणा ने बाहर कुरसियां निकाली हुई थीं. तुरंत ही वह चाय और पोहा बना कर ले आई. वह खामोश चाय की चुसकियां ले रहा था. अरुणा उस के मन का हाल काफी हद तक समझ रही थी. उस ने छोटे से घर को तो अपने कुशल हाथों और कल्पनाशक्ति से सजा  रखा था पर पति के मन की थाह वह नहीं ले पा सकी थी.

 

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