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क्यों का प्रश्न नहीं : भाग 1

सुबह के 10 बजे थे. डेरे के अपने औफिस में आ कर मैं बैठा ही था. लाइजन अफसर के रूप में पिछले 2 साल से मैं सेवा में था. हाल से गुजरते समय मैं ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि बाहर मिलने के लिए कौनकौन बैठा है. 10 और 12 बजे के बीच मिलने का समय था. सभी मिलने वाले एक पर्ची पर अपना नाम लिख कर बाहर खड़े सेवादार को दे देते और वह मेरे पास बारीबारी भेजता रहता. 12 बजे के करीब मेरे पास जिस नाम की पर्ची आई उसे देख कर मैं चौंका.

यह जानापहचाना नाम था, मेरे एकमात्र बेटे का. मैं ने बाहर सेवादार को यह जानने के लिए बुलाया कि इस के साथ कोई और भी आया है.

‘‘जी, एक बूढ़ी औरत भी साथ है.’’

मैं समझ गया, यह बूढ़ी औरत और कोई नहीं, मेरी धर्मपत्नी राजी है. इतने समय बाद ये दोनों क्यों आए हैं, मैं समझ नहीं पाया. मेरे लिए ये अतीत के अतिरिक्त और कुछ नहीं थे. संबंध चटक कर कैसे टूट गए, कभी जान ही नहीं पाया. मैं ने इन के प्रति अपने कर्तव्यों को निश्चित कर लिया था.

‘‘साहब, इन दोनों को अंदर भेजूं?’’ सेवादार ने पूछा तो मैं ने कहा, ‘‘नहीं, ड्राइवर सुरिंदर को मेरे पास भेजो और इन दोनों को बाहर इंतजार करने को कहो.’’

वह ‘जी’ कह कर चला गया.

सुरिंदर आया तो मैं ने दोनों को कोठी ले जाने के लिए कहा और कहलवाया, ‘‘वे फ्रैश हो लें, लंच के समय बात होगी.’’

बेबे, जिस के पास मेरे लिए खाना बनाने की सेवा थी, इन का खाना बनाने के लिए भी कहा. वे चले गए और मैं दूसरे कामों में व्यस्त हो गया.

लंच हम तीनों ने चुपचाप किया. फिर मैं उन को स्टडीरूम में ले आया. दोनों सामने की कुरसियों पर बैठ गए और मैं भी बैठ गया. गहरी नजरों से देखने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘तकरीबन 2 साल बाद मिले हैं, फिर भी कहिए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

भाषा में न चाहते हुए भी रूखापन था. इस में रिश्तों के टूटन की बू थी. डेरे की परंपरा को निभा पाने में शायद मैं फेल हो गया था. सब से प्यार से बोलो, मीठा बोलो, चाहे वह तुम्हारा कितना ही बड़ा दुश्मन क्यों न हो. देखा, राजी के होंठ फड़फड़ाए, निराशा से सिर हिलाया परंतु कहा कुछ नहीं.

बेटे ने कहा, ‘‘मैं मम्मी को छोड़ने आया हूं.’’

‘‘क्यों, मन भर गया? जीवन भर पास रखने और सेवा करने का जो वादा और दावा, मुझे घर से निकालते समय किया था, उस से जी भर गया या अपने ऊपर से मां का बोझ उतारने आए हो या मुझ पर विश्वास करने लगे हो कि मैं चरित्रहीन नहीं हूं?’’

थोड़ी देर वह शांत रहा, फिर बोला, ‘‘आप चरित्रहीन कभी थे ही नहीं. मैं अपनी पत्नी सुमन की बातों से बहक गया था. उस ने अपनी बात इस ढंग से रखी, मुझे यकीन करना पड़ा कि आप ने ऐसा किया होगा.’’

‘‘मैं तुम्हारा जन्मदाता था. पालपोस कर तुम्हें बड़ा किया था. पढ़ायालिखाया था. बचपन से तुम मेरे हावभाव, विचारव्यवहार, मेरी अच्छाइयों और कमजोरियों को देखते आए हो. तुम ने कल की आई लड़की पर यकीन कर लिया पर अपने पिता पर नहीं. और राजी, तुम ने तो मेरे साथ 35 वर्ष गुजारे थे. तुम भी मुझे जान न पाईं? तुम्हें भी यकीन नहीं हुआ. जिस लड़की को बहू के रूप में बेटी बना कर घर में लाया था, क्या उस के साथ मैं ऐसी भद्दी हरकत कर सकता था? सात जन्मों का साथ तो क्या निभाना था, तुम तो एक जन्म भी साथ न निभा पाईं. तुम्हारी बहनें तुम से और सुमन से कहीं ज्यादा खूबसूरत थीं, मैं उन के प्रति तो चरित्रहीन हुआ नहीं? उस समय तो मैं जवान भी था. तुम्हें भी यकीन हो गया…?’’

‘‘शायद, यह यकीन बना रहता, यदि पिछले सप्ताह सुमन को अपनी मां से यह कहते न सुना होता, ‘एक को तो उस ने झूठा आरोप लगा कर घर से निकलवा दिया है. यह बुढि़या नहीं गई तो वह उसे जहर दे कर मार देगी,’’’ बेटे ने कहा, ‘‘तब मुझे पता चला कि आप पर लगाया आरोप कितना झूठा था. मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई. मैं ने मम्मी को भी इस बारे में बताया. तब से ये रो रही हैं. मन में यह भय भी था कि कहीं सचमुच सुमन, मम्मी को जहर न दे दे.’’

2 सगे भाइयों की साझा प्रेमिका की नफरत का सैलाब : भाग 3

डाटा डिलीट करने से पुलिस को शक हुआ कि कहीं दंपति की हत्या की साजिश रचने वाली कोमल तो नहीं है. अनूप का मोबाइल फोन खंगालने पर कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला.
गहन जांचपड़ताल के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक मुन्नालाल व उन की पत्नी राजदेवी के शवों का पंचनामा कराया फिर पोस्टमार्टम हेतु पुलिस सुरक्षा में लाला लाजपत राय चिकित्सालय भिजवा दिया.
शवों को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाने के बाद पुलिस अधिकारियोें और फोरैंसिक टीम के सदस्यों ने सिर से सिर जोड़ कर इस
जघन्य कांड के संबंध में विचारविमर्श किया और अब तक की गई जांचपड़ताल की
समीक्षा की.

विचारविमर्श के बाद यह बात सामने आई कि मृतक दंपति के बेटा बेटी में ही कोई एक है, जिस ने कातिलों के साथ मिल कर हत्या की साजिश रची है. पुलिस जांच में मृतक दंपति का बेटा अनूप तो शक के घेरे में नहीं आया, लेकिन दंपति की पालनहार बेटी कोमल शक के दायरे में आ चुकी थी. अत: पुलिस ने कोमल को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया.
कोमल को थाना बर्रा लाया गया. डीसीपी सलमान ताज ने कोमल को महिला पुलिस की सुरक्षा में सामने बिठाया फिर उस से सवालजवाब शुरू किए.
उन्होंने पूछा, ‘‘3 नकाबपोश कातिल घर में कैसे घुसे? घर का दरवाजा खुला था?’’
‘‘सर, मुझे पता नहीं. घर का मुख्य दरवाजा मम्मीजी बंद करती थीं.’’ कोमल ने बताया.
‘‘जब तुम ने नकाबपोशों को घर से भागते देखा था तो शोर क्यों नहीं मचाया था?’’ डीसीपी ने पूछा.
‘‘सर, मैं उन्हें देख कर डर गई थी. शोर मचाती तो वे शायद मुझ पर पलटवार कर सकते थे.’’
‘‘कोमल, तुम यह बताओ कि कातिलों ने तुम्हारे मांबाप की हत्या की, लेकिन तुम्हें क्यों छोड़ दिया. जबकि तुम वहां मौजूद थी?’’
‘‘पता नहीं सर.’’
‘‘तुम ने मातापिता व भाई को बीती रात जूस दिया था. भाई को जूस पीने के बाद उल्टी व चक्कर आने लगे थे. कहीं तुम ने उस जूस में जहर तो नहीं मिलाया था?’’
‘‘नहीं सर, मैं भला ऐसा क्यों करूंगी? हम अकसर जूस बना कर सभी को देते थे. बीती रात भी दिया था. मैं जहर क्यों मिलाऊंगी?’’
‘‘सीसीटीवी फुटेज में एक युवक रात पौने एक बजे तुम्हारे घर दाखिल हुआ फिर सवा 2 बजे हाथ में थैला लिए हुए बाहर आया. क्या उस के लिए तुम्हीं ने दरवाजा खोला था?’’ डीसीपी ने पूछा.

इस प्रश्न से कोमल का चेहरा फक पड़ गया. फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘सर, मैं उस के बारे में कुछ भी नहीं जानती. मैं ने किसी के लिए दरवाजा नहीं खोला.’’
डीसीपी सलमान ताज ने उस से अगला सवाल किया, ‘‘तुम ने अपने मोबाइल फोन का डाटा क्यों डिलीट कर दिया? क्या उस में हत्या का रहस्य छिपा था?’’
इस प्रश्न का कोमल ने जवाब नहीं दिया. उस ने चुप्पी साध ली.
तभी उन्होंने अगला सवाल किया, ‘‘तुम्हारे अंडरगारमेंट्स में सीमेन मिला है. क्या तुम ने किसी से फिजिकल रिलेशन बनाए थे?’’
इस प्रश्न का भी कोमल ने जवाब नहीं दिया और चेहरा नीचे झुका लिया.

कोमल ने स्वीकारा दोनों हत्याओं का जुर्म

हर प्रश्न का गोलमोल जवाब दे कर कोमल पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही. लेकिन डीसीपी को यकीन हो गया था कि दंपति हत्या का रहस्य कोमल के पेट में ही छिपा है. अब उस पर सख्ती बरती गई. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही देर बाद कोमल टूट गई और उस ने पालनहार मातापिता की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.
कोमल ने बताया कि उस ने अपने पहले प्रेमी राहुल उत्तम की मदद से हत्या की साजिश रची, फिर राहुल के भाई यानी दूसरे प्रेमी रोहित की मदद से मुन्नालाल व राजदेवी की हत्या कर दी. उस ने भाई अनूप को भी मारने का प्लान बनाया था, लेकिन किस्मत ने उसे बचा लिया.
कोमल ने बताया कि राहुल और रोहित सगे भाई हैं. दोनों फतेहपुर जिले के गांव शाहजहांपुर के रहने वाले हैं. राहुल सेना में है. वह कोलाबा (मुंबई) के मिलिट्री अस्पताल बेस में सहायक एंबुलेंस चालक है. जबकि उस का छोटा भाई रोहित कर्रही (कानपुर) में रहता है और ईरिक्शा चलाता है. वह दोनों सगे भाइयों की प्रेमिका है. दोनों भाई उस की मौसी के रिश्तेदार हैं.
यह सुनने के बाद वहीं पर मौजूद पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने अपने पालनहार मातापिता का बेरहमी से कत्ल क्यों किया?’’
‘‘सर, मेरे मातापिता मुझे प्रताडि़त करते थे. हर बात पर टोकते थे. भाई के आगे मेरी कोई वैल्यू नहीं थी. भाई अनूप को मांबाप ने सिर पर चढ़ा रखा था. सब उसी की बात मानते थे. ऐसा लगता था कि पूरी जायदाद भी उसी के नाम कर दी जाएगी.
‘‘मां राजदेवी भी मुझे प्रताडि़त करती थी. वह मुझे फोन पर बात नहीं करने देती थी. घर के बाहर जाने पर टोकाटाकी करती थी. मुझे जब पता चला कि मैं उन की कोखजाई नहीं, गोद ली गई बेटी हूं, तब से नफरत और बढ़ गई थी. मुझे ऐसा लगता था कि मातापिता व भाई रास्ते से हट जाएंगे तो करोड़ों रुपए की संपत्ति मुझे मिल जाएगी. और मेरी जिंदगी संवर जाएगी. वह किसी एक प्रेमी से विवाह कर आराम से जिंदगी गुजारेगी.
‘‘प्यार और धन के हवस में अंधी हो कर मैं ने रिश्तों का कत्ल कर दिया. लेकिन यह पता नहीं था कि गहरी साजिश रचने के बावजूद पुलिस इतनी जल्दी पकड़ लेगी. मुझे मांबाप की हत्या करने का कोई अफसोस नहीं है.’’
कोमल के बयान के बाद पुलिस अधिकारियों ने रोहित और राहुल को गिरफ्तार करने के लिए 2 टीमें लगाईं. एसआई प्रमोद व जमाल को राहुल की गिरफ्तारी के लिए फ्लाइट से मुंबई भेजा गया. जबकि इंसपेक्टर दीनानाथ मिश्रा की टीम रोहित को पकड़ने के लिए सक्रिय हुई.

मुंबई आर्मी बेस से प्रेमी राहुल को
किया गिरफ्तार

पुलिस टीम ने रोहित के गांव शाहजहांपुर में छापा मारा, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. टीम ने उस के पिता विद्यासागर से उस के अन्य ठिकानों का पता किया फिर ताबड़तोड़ छापे मारे.
इसी बीच टीम को पता चला कि रोहित कानपुर (देहात) के भोगनीपुर तिराहे पर मौजूद है. और वह सूरत भागने की फिराक में है. पुलिस टीम ने 6 जुलाई, 2022 की सुबह दबिश दे कर रोहित को भोगनीपुर तिराहे से गिरफ्तार कर लिया.
थाना बर्रा में जब उस ने कोमल को पुलिस हिरासत में देखा तो वह सब समझ गया. उस ने बिना हीलाहवाली के डबल मर्डर का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में प्रयुक्त तेज धार वाला चाकू, खून से सने कपड़े, जूता व झोला आदि सामान कर्रही के पास नाले से बरामद करा दिया.
इस सामान को पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. रोहित ने यह भी खुलासा किया कि दंपति की हत्या के पहले उस ने कोमल के साथ शारीरिक संबंध भी बनाए थे.
इधर मुंबई गई पुलिस टीम ने कोलाबा (मुंबई) स्थित आर्मी मैडिकल बेस के अधिकारियों को राहुल का अरेस्ट वारंट सौंपा और राहुल को हैंडओवर करने की बात कही. गिरफ्तारी के जरूरी कागजात लेने के बाद अधिकारियों ने राहुल को कानपुर की पुलिस की सुपुर्दगी में दे दिया. इस के बाद राहुल को मुंबई कोर्ट में पेश कर कानपुर पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर ले आई.
थाना बर्रा में पुलिस अधिकारियों ने उस से पूछताछ शुरू की तो वह सेना की धौंस जमाने लगा और लगाए गए आरोपों को नकारता रहा. अंत में पुलिस अधिकारियों ने उसे झांसे में लिया और उसे बताया कि उसे सरकारी गवाह बना देंगे. सजा कम होगी और नौकरी भी मिलने की संभावना है.

इस के बाद राहुल टूट गया और साजिश रचने का आरोप स्वीकार कर लिया. उस ने स्वीकार किया कि घटना वाली रात कोमल मोबाइल फोन के जरिए उस के संपर्क में थी. उस ने ही घटना के पूर्व नशीली गोलियां भाई रोहित को एक केमिस्ट मित्र के मार्फत मुहैया कराई थीं. उस ने ही भाई रोहित से कहा था कि कोमल जो चाहती है, वह करो.
हत्या का खुलासा होने के बाद पुलिस ने पहले गिरफ्तार किए गए अनूप के साले मयंक व सुरेंद्र को थाने से घर भेज दिया. क्योंकि दंपति की हत्या में उन का कोई हाथ नहीं था.
चूंकि पुलिस ने डबल मर्डर का खुलासा कर दिया था और कातिलों को गिरफ्तार कर आलाकत्ल भी बरामद कर लिया था, अत: बर्रा थानाप्रभारी दीनानाथ मिश्र ने मृतक के बेटे अनूप को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/120 बी के तहत कोमल व रोहित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

प्यार और संपत्ति के लालच ने
बनाया अपराधी

राहुल हत्या में शामिल नहीं था. पुलिस ने उसे षडयंत्र रचने व उस में शामिल होने का दोषी पाया. पुलिस ने भादंवि की धारा 120बी के तहत राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और उसे भी विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में प्यार और धन की हवस में रिश्तों के कत्ल की सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई.
उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के नरवल थानांतर्गत एक गांव है- प्रेमपुर. इसी गांव में रामचंद्र उत्तम सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कृष्णा के अलावा 4 बेटे भैयालाल, मुन्नालाल, राजेलाल तथा छोटेलाल थे. रामचंद्र किसान थे. उन के पास 15 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. रामचंद्र ने अपने जीवन काल में ही चारों भाइयों के बीच घर व जमीन का बंटवारा कर दिया था. चारों भाइयों के बीच करीब 4-4 बीघा जमीन हिस्से में आई थी.
मुन्नालाल का मन खेतीकिसानी में नहीं लगता था सो वह सालों पहले छोटे भाई छोटेलाल को साथ ले कर कानपुर आ गए थे. यहां उन्होंने बर्रा-2 की सब्जी मंडी में बिजली की दुकान खोली. दोनों भाइयों की मेहनत और लगन से दुकान अच्छी चलने लगी और आमदनी भी होने लगी. इसी बीच मुन्नालाल की नौकरी फील्डगन फैक्ट्री में लग गई. नौकरी लगने के बाद मुन्नालाल ने बिजली की दुकान भाई छोटेलाल के हवाले कर दी.
समय बीतते मुन्नालाल उत्तम ने बर्रा भाग 2 में यादव मार्केट के पास ईडब्लूएस स्कीम के तहत केडीए की एक कालोनी में फ्लैट ले लिया. फिर उस में परिवार सहित रहने लगे. मुन्नालाल के परिवार में पत्नी राजदेवी के अलावा एक बेटा अनूप था, जिस की उम्र मात्र 2 साल थी.
सन 1998 में मुन्नालाल के भाई छोटेलाल की पत्नी कमला ने 2 जुड़वां बेटियों को जन्म दिया. कमला ने इन का नाम बरखा और कोमल रखा.
छोटेलाल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. वह 2 बच्चियों का पालनपोषण कैसे करेगा, यही सोच कर मुन्नालाल और उन की पत्नी राजदेवी ने एक बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई. क्योंकि उन का एक ही बेटा था और वह बेटी चाहते थे. छोटेलाल और कमला बच्ची को गोद देने को राजी हो गए.

एक साल की कोमल को लिया था गोद

कोमल की उम्र एक साल थी, तभी मुन्नालाल व राजदेवी ने उसे गोद ले लिया था. उस समय मुन्नालाल के बेटे अनूप की उम्र 4 साल थी. अनूप को बहन के रूप में कोमल मिली तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा.

चूंकि मुन्नालाल की बेटी की आकांक्षा पूरी हुई थी, सो उस ने कोमल का नाम आकांक्षा रख दिया. इस के बाद बिना भेदभाव के बड़े लाड़प्यार से कोमल उर्फ आकांक्षा का पालनपोषण किया तथा उसे पढ़ायालिखाया.
मुन्नालाल जितना खयाल अपने बेटे अनूप का रखते थे, उतना ही आकांक्षा का भी रखते थे. इस लाड़प्यार के कारण गलीमोहल्ला तो दूर खास रिश्तेदार भी न जान सके कि कोमल उर्फ आकांक्षा उन की सगी बेटी नहीं है.
कोमल उर्फ आकांक्षा बचपन से ही सुंदर थी. जवान हुई तो उस की सुंदरता में और भी निखार आ गया. कोमल जितनी सुंदर थी, उतनी ही पढ़नेलिखने में भी तेज थी. उस ने बीए करने के बाद 2 वर्षीय बीटीसी के लिए एस.जे. महाविद्यालय, रमईपुर में प्रवेश ले लिया था. वह बीटीसी कर टीचर बनना चाहती थी.

कोमल उर्फ आकांक्षा की मौसी बिंदकी (फतेहपुर) में रहती थी. एक रोज कोमल अपने मम्मीपापा के साथ मौसी के घर विवाह समारोह मे गई. सजीधजी कोमल विवाह समारोह में खास लग रही थी.
इसी विवाह समारोह में कोमल की मुलाकात राहुल उत्तम से हुई. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हुए. शादी समारोह में उन की बात तो ज्यादा न हो सकी. लेकिन वे एकदूसरे के दिल में जरूर समा गए.
राहुल उत्तम के पिता विद्यासागर उत्तम फतेहपुर जनपद के शाहजहांपुर गांव में रहते थे. उन के 2 बेटे राहुल व रोेहित थे. राहुल सेना में था और कोलाबा (मुंबई) में मिलिट्री बेस अस्पताल में सहायक एंबुलेंस चालक था. वह पणजी गोवा बेस से संबद्ध था. दूसरा बेटा रोहित अपराधी प्रवृत्ति का था. वह कर्रही कानपुर में रहता था और ईरिक्शा चलाता था. दोनों भाई कोमल की मौसी के रिश्तेदार थे.

राहुल से हुई मुलाकात बदली प्यार में

कोमल और राहुल की मुलाकात को अभी सप्ताह भी न बीता था कि एक रोज कोमल के इंस्टाग्राम एकाउंट में राहुल की तरफ से फ्रैंड रिक्वेस्ट आई, जिस के बाद एक सप्ताह तक दोनो की इंस्टाग्राम चैट पर ही बात होती रही. इस के बाद दोनों फेसबुक पर भी फ्रैंड बन गए और मैसेंजर से बात होने लगी.
कुछ दिन बाद दोनों की मोबाइल फोन पर बात होने लगी. फोन पर प्यारमोहब्बत की बातें करते.
कुछ माह बाद जब राहुल कानपुर आया तो उस ने कोमल उर्फ आकांक्षा से मुलाकात की. उन का प्यार पहले ही परवान चढ़ चुका था, अत: शारीरिक मिलन में देर नहीं लगी.
राहुल कोमल को अपने एक रिश्तेदार के घर ले जाता था जो बर्रा में रहता था. वहीं राहुल कोमल से शारीरिक संबंध बनाता था. राहुल जब तक रहता था, कोमल उस से मिलती रहती थी.
कोमल को शरीर सुख का चस्का लग गया था. इस सुख को पाने के लिए कोमल ने राहुल के भाई रोहित से दोस्ती कर ली और उस ने रोहित से भी शारीरिक रिश्ता कायम कर लिया. लेकिन कोमल ने इस रिश्ते की भनक राहुल को नहीं लगने दी. रोहित कोमल को अपने ईरिक्शा पर बैठा कर कानपुर शहर की सैर कराने लगा.
इसी बीच कोमल उर्फ आकांक्षा के भाई अनूप की शादी बिंदकी निवासी देवीसहाय की बेटी सोनिका से हो गई. उस का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था. 5 दिन ससुराल में रही, उस के बाद वह मायके चली गई. उस ने अनूप के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा दिया.
अनूप के साले मयंक व सुरेंद्र ने मामले को सुलटाने के लिए उस से 50 लाख रुपयों की मांग की. न देने पर जानमाल के नुकसान की धमकी दी. इस धमकी से मुन्नालाल तिलमिला उठे और वह परेशान रहने लगे.
वर्ष 2021 की जनवरी माह में कोमल को पता चला कि वह मुन्नालाल की सगी नहीं बल्कि गोद ली बेटी है. उस के पिता तो छोटेलाल हैं. यह पता चलने के बाद कोमल का व्यवहार मुन्नालाल व राजदेवी के प्रति बदलने लगा.
उसे लगने लगा कि उस के पिता उस की शादी साधारण परिवार में कर देंगे और करोड़ों की संपत्ति अपने बेटे के नाम कर देंगे.

मां राजदेवी को हो गया था कोमल पर शक

राजदेवी फोन पर बात करने पर उसे टोकती थी और घर से निकलने पर भी टोका करती थी. इसलिए वह राजदेवी से भी नफरत करने लगी थी.
अब तक मुन्नालाल फील्ड गन फैक्ट्री से सुपरवाइजर के पद से रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. हाईवे किनारे गांव में 4 बीघा जमीन थी, जो करोड़ों की थी. इस के अलावा गुजैनी व नौबस्ता में प्लौट व मकान था, जिन की कीमत कई करोड़ रुपए थी. इस अकूत संपत्ति की जानकारी कोमल उर्फ आकांक्षा को थी. इस पर उस की गिद्धदृष्टि लगी थी.
कोमल की नफरत तब और बढ़ गई, जब मुन्नालाल उस के लिए वर खोजने लगे. कोमल को लगा कि जल्द ही उसे घर से रुखसत कर दिया जाएगा और सारी संपत्ति उस के हाथ से निकल जाएगी.
राजदेवी को भी जानकारी हो गई थी कि कोमल बाहर गुलछर्रे उड़ाने लगी है और किसी दिन उस की इज्जत पर दाग लगा क र फुर्र हो जाएगी. वह भी चाहती थी कि कोमल की शादी जल्द हो जाए.
कोमल ने मांबाप की अकूत संपत्ति की जानकारी अपने दोनों प्रेमियों राहुल और रोहित को दी. संपत्ति के लालच में राहुल और रोहित फंस गए. कोमल ने राहुल से कहा कि वह उस के मातापिता व भाई को ठिकाने लगा दे. उस के बाद वह उस से शादी कर लेगी और बाप की प्रौपर्टी भी उसे मिल जाएगी. फिर दोनों आराम से जिंदगी गुजारेंगे.

5 अप्रैल, 2022 को राहुल छुट्टी पर घर आया. उस के बाद कोमल ने खुल कर राहुल से बात की और पूरे परिवार को नेस्तनाबूद करने की योजना बनाई. इस योजना में उस का भाई रोहित भी शामिल रहा.
राहुल 12 दिन कानपुर शहर रहा. इस बीच लगभग हर रोज दोनों शारीरिक सुख उठाते रहे. 17 मई को राहुल वापस मुंबई चला गया.
राहुल के जाने के बाद कोमल हर रोज मोबाइल फोन पर उस से बात करती थी और अपना दुखड़ा सुना कर उसे हत्या के लिए उकसाती थी. राहुल को भी संपत्ति का लालच आ गया था, अत: उस ने 2 जुलाई, 2022 को अपने भाई रोहित से कहा मार डालो पूरे परिवार को.
योजना के तहत उस ने नशीली गोलियों का इंतजाम अपने एक केमिस्ट दोस्त के सहयोग से किया, फिर रोहित को रामादेवी ओवर ब्रिज पर भेजा. रोहित ने नींद की गोलियों के 10 पत्ते ला कर कोमल को दे दिए. कोमल ने उन गोलियों को पीस कर चूर्ण बना लिया.
4 जुलाई, 2022 की रात 8 बजे कोमल ने मम्मीपापा व भाई को खाना खिलाया, फिर 9 बजे रात को जूसर से अनार व चुकंदर का मिक्स जूस निकाला. इस के बाद निकाले गए जूस में उस ने नशीली गोलियों का चूर्ण मिला दिया. इस जूस को 3 गिलासों में डाल कर कोमल ने मुन्नालाल, राजदेवी व अनूप को दे दिया.
मुन्नालाल और राजदेवी ने तो किसी तरह जूस पी लिया लेकिन अनूप ने 2-3 घूंट ही जूस पिया. उसे जूस कड़वा लगा तो उस ने बाकी जूस नहीं पिया और कोमल से शिकायत की कि जूस कड़वा है. जूस पीने के बाद अनूप का जी मिचलाने लगा और चक्कर सा आने लगा तो वह अपने कमरे में जा कर लेट गया और अंदर से कुंडी लगा ली.
इधर जूस पीने के बाद मुन्नालाल व उन की पत्नी बेसुध हो गए. कोमल ने बेहोशी की फोटो राहुल को भेजी और बताया कि दोनों बेहोश हो गए है. उन की मौत का इंतजार है.

इस के बाद कोमल ने मुन्नालाल के मोबाइल फोन पर सुसाइड नोट टाइप किया फिर अपने फोन पर इस नोट का स्क्रीन शौट लिया. दरअसल, कोमल का प्लान था कि मम्मीपापा ने भाई अनूप के कारण आत्महत्या कर ली, फिर आत्मग्लानि से अनूप ने भी मौत को गले लगा लिया.
लेकिन जब रात 12 बजे तक मुन्नालाल की मौत नहीं हुई और उसे अपना प्लान फेल होता नजर आया तो उस ने तीनों को कत्ल करने की योजना बनाई. इस के लिए उस ने रोहित को मैसेज भेजा और तुरंत घर आने को कहा.
प्लान-ए फेल होने की सूचना उस ने मोबाइल फोन से राहुल को भी दे दी. इस के बाद कोमल ने प्लान-बी बनाया. इस प्लान के तहत अनूप ने पहले मांबाप का कत्ल किया, फिर स्वयं फांसी लगा कर जीवनलीला समाप्त कर ली.

हत्या से पहले बनाए थे शारीरिक संबंध

रात लगभग पौने एक बजे रोहित मुंह पर कपड़ा लपेट कर कोमल के घर पहुंचा. कोमल ने दरवाजा पहले ही खोल रखा था, अत: रोहित आसानी से घर में घुस गया. रोहित घर के अंदर आया तो कोमल ने उसे गले लगा लिया. रोहित भी उस से लिपट गया.
इस के बाद दोनों बिस्तर पर पहुंच गए और दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए. शारीरिक सुख प्राप्त करने के बाद कोमल उस कमरे में आई, जहां मुन्नालाल बेसुध पडे़ थे. उस ने घृणा भरी नजर मुन्नालाल पर डाली फिर रसोई से गोश्त काटने वाला चाकू ले आई.
कोमल ने चाकू रोहित को पकड़ाया और बोली, ‘‘मार डालो मेरे बाप को.’’
रोहित ने चाकू पकड़ा तो वह घबरा गया और उस के हाथ कांपने लगे. तब कोमल ने रोहित के हाथ से चाकू छीन लिया और बाप की गरदन पर वार कर दिया. एक ही वार से मुन्नालाल की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और खून का फव्वारा फूट पड़ा. मुन्नालाल कुछ देर छटपटाया, फिर दम तोड़ दिया.
बाप को मौत के घाट उतारने के बाद कोमल उस कमरे में पहुंची, जहां राजदेवी बेसुध पड़ी थी. दोनों ने मिल कर राजदेवी को उठाया और उस कमरे में लाए, जहां मुन्नालाल मरा पड़ा था. यहां रोहित ने चाकू से राजदेवी पर वार किया तो वह छटपटाने लगीं.
इसी छटपटाहट में कोमल ने उस के हाथों को दबोचा तो चाकू से वार करते समय कोमल की अंगुली में कट लग गया. कुछ क्षण छटपटाने के बाद राजदेवी ने भी दम तोड़ दिया. डबल मर्डर करने के बाद भी कोमल और रोहित विचलित नहीं हुए.
बाथरूम में जा कर कोमल और रोहित ने खून से सने हाथपैर व चाकू धोया, फिर कपड़े बदले. कोमल ने अनूप की शर्ट रोहित को पहनने को दी. इस के बाद रोहित ने खून से सने कपड़े तथा चाकू लाल रंग के थैले में डाला फिर मुंह पर सफेद रंग का कपड़ा लपेट कर हाथ में थैला ले कर रात सवा 2 बजे कोमल के घर से निकल गया.

रोहित के घर आने तथा घर से बाहर जाने की तसवीरें बगल के घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गईं. इस की जानकारी रोहित को नहीं हुई. घर से निकलने के बाद रोहित ने खून से सने कपड़े, चाकू, जूता व थैला कर्रही स्थित नाले के पास फेंक दिए. उस के बाद वह फरार हो गया.
इधर कोमल रात 3 बजे के आसपास पहली मंजिल पर अनूप के कमरे के बाहर पहुंची और जोरजोर से दरवाजा पीटने लगी. अनूप ने दरवाजा खोला तो सामने कोमल खड़ी थी. वह रोते हुए बोली, ‘‘भैया, जल्दी से नीचे चलो, मम्मीपापा मर गए हैं.’’
अनूप घबरा गया. वह नीचे आया तो देखा कि मांबाप की किसी ने गला काट कर हत्या कर दी है. उस ने घर के बाहर शोर मचाया तो पासपड़ोस के लोग आ गए. इस के बाद अनूप ने डायल 112 पर फोन कर के पुलिस को सूचना दी तो पुलिस की वैन आ गई.
डायल 112 पुलिस ने कंट्रोलरूम को सूचना दी तो पुलिस महकमे में सनसनी फैल गई. आननफानन में थाना बर्रा पुलिस व पुलिस अधिकारी घटनास्थल पहुंचे और जांच शुरू की. जांच में प्यार और धन की हवस में रिश्तों के कत्ल का सनसनीखेज खुलासा हुआ.
थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी कोमल, रोहित तथा राहुल से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से तीनों को जिला जेल भेज दिया गया.द्य

तपस्या- भाग 2 : क्या शिखर के दिल को पिघला पाई शैली?

‘ठीक है बेटी, अगर सुखनंदन भी यही कहेगा तो फिर मैं अब कभी जोर नहीं दूंगा,’ पिताजी का स्वर निराशा में डूबा हुआ था.

तभी अचानक शिखर के पिता को दिल का दौरा पड़ा था और उन्होंने अपने बेटे को सख्ती से कहा था कि वह अपने जीतेजी अपने मित्र को दिया गया वचन निभा देना चाहते हैं, उस के बाद ही वह शिखर को विदेश जाने की इजाजत देंगे. इसी दबाव में आ कर शिखर  शादी के लिए तैयार हो गया था. वह तो कुछ समझ ही नहीं पाई थी.  उस के पिता जरूर बेहद खुश थे और उन्होंने कहा था, ‘मैं न कहता था, आखिर सुखनंदन मेरा बचपन का मित्र है.’

‘पर, पिताजी…’ शैली का हृदय  अभी  भी अनचाही आशंका से धड़क रहा था.

‘तू चिंता मत कर बेटी. आखिरकार तू अपने रूप, गुण, समझदारी से सब का  दिल जीत लेगी.’

फिर गुड्डेगुडि़या की तरह ही तो आननफानन में उस की शादी की सभी रस्में अदा हो गई थीं. शादी के समय भी शिखर का तना सा चेहरा देख कर वह पल दो पल के लिए आशंकाओं से घिर गई थी. फिर सखीसहेलियों की चुहलबाजी में सबकुछ भूल गई थी.

शादी के बाद वह ससुराल आ गई थी. शादी की पहली रात मन धड़कता रहा था. आशा, उमंगें, बेचैनी और भय सब के मिलेजुले भाव थे. क्या होगा? पर शिखर आते ही एक कोने में पड़ रहा था, उस ने न कोई बातचीत की थी, न उस की ओर निहार कर देखा था.

वह कुछ समझ ही नहीं सकी थी. क्या गलती थी उस की? सुबह अंधेरे ही वह अपना सामान बांधने लगा था.

‘यह क्या, लालाजी, हनीमून पर जाने की तैयारियां भी शुरू हो गईं क्या?’ रिश्ते की किसी भाभी ने छेड़ा था.

‘नहीं, भाभी, नौकरी पर लौटना है. फिर अमरीका जाने के लिए पासपोर्ट वगैरह भी बनवाना है.’

तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया था वह. दूसरे कमरे में बैठी शैली ने सबकुछ सुना था. फिर दिनभर खुसरफुसर भी चलती रही थी. शायद सास ने कहा था, ‘अमरीका जाओ तो फिर बहू को भी लेते जाना.’

‘ले जाऊंगा, बाद में, पहले मुझे तो पहुंचने दो. शादी के लिए पीछे पड़े थे, हो गई शादी. अब तो चैन से बैठो.’

न चाहते हुए भी सबकुछ सुना था शैली ने. मन हुआ था कि जोर से सिसक पड़े. आखिर किस बात के लिए दंडित किया जा रहा था उसे? क्या कुसूर था उस का?

पिताजी कहा करते थे कि धीरेधीरे सब का मन जीत लेगी वह. सब सहज हो जाएगा. पर जिस का मन जीतना था वह तो दूसरे ही दिन चला गया था. एक हफ्ते बाद ही फिर दिल्ली से अमेरिका भी.

पहुंच कर पत्र भी आया था तो घर वालों के नाम. उस का कहीं कोई जिक्र नहीं था. रोती आंखों से वह देर तक घंटों पता नहीं क्याक्या सोचती रहती थी. घर में बूढ़े सासससुर थे. बड़ी शादीशुदा ननद शोभा अपने बच्चों के साथ शादी पर आई थी और अभी वहीं थी. सभी उस का ध्यान रखते थे. वे अकसर उसे घूमने भेज देते, कहते, ‘फिल्म देख आओ, बहू, किसी के साथ,’ पर पति से अपनेआप को अपमानित महसूस करती वह कहां कभी संतुष्ट हो पाती थी.

शोभा जीजी को भी अपनी ससुराल लौटना था. घर में फिर वह, मांजी और बाबूजी ही रह गए थे. महीने भर के अंदर ही उस के ससुर को दूसरा दिल का दौरा पड़ा था. सबकुछ अस्तव्यस्त हो गया. बड़ी कठिनाई से हफ्ते भर की छुट्टी ले कर शिखर भी अमेरिका से लौटा था, भागादौड़ी में ही दिन बीते थे. घर नातेरिश्तेदारों से भरा था और इस बार भी बिना उस से कुछ बोले ही वह लौट गया था.

‘मां, तुम अकेली हो, तुम्हें बहू की जरूरत है,’ यह जरूर कहा था उस ने.

शैली जब सोचने लगती है तो उसे लगता है जैसे किसी सिनेमा की रील की तरह ही सबकुछ घटित हो गया था उस के साथ. हर क्षण, हर पल वह जिस के बारे में सोचती रहती है उसे तो शायद कभी अवकाश ही नहीं था अपनी पत्नी के बारे में सोचने का या शायद उस ने उसे पत्नी रूप में स्वीकारा ही नहीं.

इधर सास का उस से स्नेह बढ़ता जा रहा था. वह उसे बेटी की तरह दुलराने लगी थीं. हर छोटीमोटी जरूरत के लिए वह उस पर आश्रित होती जा रही थीं. पति की मृत्यु तो उन्हें और बूढ़ा कर गई थी, गठिया का दर्द अब फिर बढ़ गया था. कईर् बार शैली की इच्छा होती, वापस पिता के पास लौट जाए. आगे पढ़ कर नौकरी करे. आखिर कब तक दबीघुटी जिंदगी जिएगी वह? पर सास की ममता ही उस का रास्ता रोक लेती थी.

‘‘बहूरानी, क्या लौट आई हो? मेरी दवाई मिली, बेटी? जोड़ों का दर्द फिर बढ़ गया है.’’

मां का स्वर सुन कर तंद्रा सी टूटी शैली की. शायद वह जाग गई थीं और उसे आवाज दे रही थीं.

‘‘अभी आती हूं, मांजी. आप के लिए चाय भी बना कर लाती हूं,’’ हाथमुंह धो कर सहज होने का प्रयास करने लगी थी शैली.

चाय ले कर कमरे में आई ही थी कि बाहर फाटक पर रिकशे से उतरती शोभा जीजी को देखते ही वह चौंक गई.

‘‘जीजी, आप इस तरह बिना खबर दिए. सब खैरियत तो है न? अकेले ही कैसे आईं?’’

बरामदे में ही शोभा ने उसे गले से लिपटा लिया था. अपनी आंखों को वह बारबार रूमाल से पोंछती जा रही थी.

‘‘अंदर तो चल.’’

और कमरे में आते ही उस की रुलाई फूट पड़ी थी. शोभा ने बताया कि अचानक ही जीजाजी की आंखों की रोशनी चली गई है, उन्हें अस्पताल में दाखिल करा कर वह सीधी आ रही है. डाक्टर ने कहा है कि फौरन आपरेशन होगा. कम से कम 10 हजार रुपए लगेंगे और अगर अभी आपरेशन नहीं हुआ तो आंख की रोशनी को बचाया न जा सकेगा.

एक रात की उजास : भाग 3

उस किशोर की तरह वह खुशकिस्मत तो थी नहीं कि लेटते ही नींद आ जाती. दृश्य जागती आंखों में किसी दुखांत फिल्म की तरह जीवन के कई टुकड़ोंटुकड़ों में चल रहे थे कि तभी उन्हें हलका कंपन महसूस हुआ. खिड़की, दरवाजों की आवाज से उन्हें तुरंत समझ में आया कि यह भूकंप का झटका है.

‘‘उठो, उठो…भूकंप आया है,’’ उन्होंने किशोर को झकझोर कर हिलाया. और दोनों हाथ पकड़ कर तेज गति से बाहर भागीं.

उन के जागते रहने के कारण उन्हें झटके का आभास हो गया. झटका लगभग 30 सेकंड का था लेकिन बहुत तेज नहीं था फिर भी लोग चीखते- चिल्लाते बाहर निकल आए थे. कुछ सेकंड बाद  सबकुछ सामान्य था लेकिन दिल की धड़कन अभी भी कनपटियों पर चोट कर रही थी.

जब भूकंप के इस धक्के से वह उबरीं तो अपनी जिजीविषा पर उन्हें अचंभा हुआ. वह तो सोच रही थीं कि उन्हें जीवन से कतई मोह नहीं बचा लेकिन जिस तेजी से वह भागी थीं, वह इस बात को झुठला रही थी. 82 साल की उम्र में निपट अकेली हो कर भी जब वह जीवन का मोह नहीं त्याग सकतीं तो यह किशोर? इस ने अभी देखा ही क्या है, इस की जिंदगी में तो भूकंप का भी यह पहला ही झटका है. उफ, यह क्या करने जा रही थीं वह. किस हक से उस मासूम किशोर को वे मृत्युदान करने जा रही थीं. क्या उम्र और अकेलेपन ने उन की दिमागी हालत को पागलपन की कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है?

मालतीजी ने मिचमिची आंखों से किशोर की ओर देखा, वह उन से लिपट गया.

‘‘दादी, मैं अपने घर जाना चाहता हूं, मैं मरना नहीं चाहता…’’ आवाज कांप रही थी.

वह उस के सिर पर प्यार भरी थपकियां दे रही थीं. लोग अब साहस कर के अपनेअपने घरों में जा रहे थे. वह भी उस किशोर को संभाले भीतर आ गईं.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘उदय जयराज.’’

अभी थोड़ी देर पहले तक उन्हें इस परिचय की जरूरत महसूस नहीं हुई थी. मृत्यु की इच्छा ने अनेक प्रश्नों पर परदा डाल दिया था, पर जिंदगी के सामने तो समस्याएं भी होती हैं और समाधान भी.

ऐसा ही समाधान मालतीजी को भी सूझ गया. उन्होंने उदय को आदेश दिया कि अपने मम्मीपापा को फोन करो और अपने सकुशल होने की सूचना दो.

उदय भय से कांप रहा था, ‘‘नहीं, वे लोग मुझे मारेंगे, सूचना आप दीजिए.’’

उन्होेंने उस से पूछ कर नंबर मिलाया. सुबह के 4 बज रहे थे. आधे घंटे बाद उन के घर के सामने एक कार रुकी. उदय के मम्मीपापा और उस का छोटा भाई बदहवास से भीतर आए. यह जान कर कि वह रेललाइन पर आत्महत्या करने चला था, उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. रात तक उन्होेंने उस का इंतजार किया था फिर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

उदय को बचाने के लिए उन्होेंने मालतीजी को शतश: धन्यवाद दिया. मां के आंसू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘आप दोनों से मैं एक बात कहना चाहती हूं,’’ मालतीजी ने भावनाओं का सैलाब कुछ थमने के बाद कहा, ‘‘देखिए, हर बच्चे की अपनी बौद्घिक क्षमता होती है. उस से ज्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं होता. उस की बुद्घि की दिशा पहचानिए और उसी दिशा में प्रयत्न कीजिए. ऐसा नहीं कि सिर्फ डाक्टर या इंजीनियर बन कर ही इनसान को मंजिल मिलती है. भविष्य का आसमान हर बढ़ते पौधे के लिए खुला है. जरूरत है सिर्फ अच्छी तरह सींचने की.’’

अश्रुपूर्ण आंखों से उस परिवार ने एकएक कर के उन के पैर छू कर उन से विदा ली.

उस पूरी घटना पर वह पुन: विचार करने लगीं तो उन का दिल धक् से रह गया. जब उदय अपने घर वालों को बताएगा कि वह उसे नींद की गोलियां खिलाने वाली थीं, तो क्या गुजरेगी उन पर.

अब तो वह शरम से गड़ गईं. उस मासूम बचपन के साथ वह कितना बड़ा क्रूर मजाक करने जा रही थीं. ऐन वक्त पर उस की बेखबर नींद ने ही उन्हें इस भयंकर पाप से बचा लिया था.

अंतहीन विचारशृंखला चल पड़ी तो वह फोन की घंटी बजने पर ही टूटी. उस ओर उदय की मम्मी थीं. अब क्या होगा. उन के आरोपों का वह क्या कह कर खंडन करेंगी.

‘‘नमस्ते, मांजी,’’ उस तरफ चहकती हुई आवाज थी, ‘‘उदय के लौट आने की खुशी में हम ने कल शाम को एक पार्टी रखी है. आप की वजह से उदय का दूसरा जन्म हुआ है इसलिए आप की गोद में उसे बिठा कर केक काटा जाएगा. आप के आशीर्वाद से वह अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करेगा. आप के अनुभवों को बांटने के लिए हमारे इष्टमित्र भी लालायित हैं. उदय के पापा आप को लेने के लिए आएंगे. कल शाम 6 बजे तैयार रहिएगा.’’

‘‘लेकिन मैं…’’ उन का गला रुंध गया.

‘‘प्लीज, इनकार मत कीजिएगा. आप को एक और बात के लिए भी धन्यवाद देना है. उदय ने बताया कि आप उसे नींद की गोलियां खिलाने के बहाने अपने घर ले गईं. इस मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाने के कारण ही वह आप के साथ आप के घर गया. समय गुजरने के साथ धीरेधीरे उस का उन्माद भी उतर गया. हमारा सौभाग्य कि वह जिद्दी लड़का आप के हाथ पड़ा. यह सिर्फ आप जैसी अनुभवी महिला के ही बस की बात थी. आप के इस एहसान का प्रतिदान हम किसी तरह नहीं दे सकते. बस, इतना ही कह सकते हैं कि अब से आप हमारे परिवार का अभिन्न अंग हैं.’’

उन्हें लगा कि बस, इस से आगे वह नहीं सुन पाएंगी. आंखों में चुभन होने लगी. फिर उन्होंने अपनेआप को समझाया. चाहे उन के मन में कुविचार ही था पर किसी दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं था. आखिरकार परिणाम तो सुखद ही रहा न. अब वे पापपुण्य के चक्कर में पड़ कर इस परिवार में विष नहीं घोलेंगी.

इस नए सकारात्मक विचार पर उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ. कहां गए वे पश्चात्ताप के स्वर, हर पल स्वयं को कोसते रहना, बीती बातों के सिर्फ बुरे पहलुओं को याद करना.

उदय का ही नहीं जैसे उन का भी पुनर्जन्म हुआ था. रात को उन्होंने खाना खाया. पीने के पानी के बरतन उत्साह से साफ किए. हां, कल सुबह उन्हेें इन की जरूरत पड़ेगी. टीवी चालू किया. पुरानी फिल्मों के गीत चल रहे थे, जो उन्हें भीतर तक गुदगुदा रहे थे. बिस्तर साफ किया. टेबल पर नींद की गोलियां रखी हुई थीं. उन्होंने अत्यंत घृणा से उन गोलियों को देखा और उठा कर कूड़े की टोकरी में फेंक दिया. अब उन्हें इस की जरूरत नहीं थी. उन्हें विश्वास था कि अब उन्हें दुस्वप्नरहित अच्छी नींद आएगी.

उलझन : कनिका की मां प्रेरणा किसे देख कर थी हैरान?

तपस्या- भाग 1: क्या शिखर के दिल को पिघला पाई शैली?

शैली उस दिन बाजार से लौट रही थी कि वंदना उसे रास्ते में ही मिल गई.

‘‘तू कैसी है, शैली? बहुत दिनों से दिखाई नहीं दी. आ, चल, सामने रेस्तरां में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

वंदना शैली को घसीट ही ले गई थी. जाते ही उस ने 2 कप कौफी का आर्डर दिया.

‘‘और सुना, क्या हालचाल है? कोई पत्र आया शिखर का?’’

‘‘नहीं,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे कर शैली का मन उदास  हो गया था.

‘‘सच शैली कभी तेरे बारे में सोचती हूं तो बड़ा दुख होेता है. आखिर ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी तेरे पिताजी को जो तेरी शादी कर दी? ठहर कर, समझबूझ कर करते. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल तो है नहीं.’’

इस बीच बैरा मेज पर कौफी रख गया और वंदना ने बातचीत का रुख दूसरी ओर मोड़ना चाहा.

‘‘खैर, जाने दे. मैं ने तुझे और उदास कर दिया. चल, कौफी पी. और सुना, क्याक्या खरीदारी कर डाली?’’

पर शैली की उदासी कहां दूर हो पाई थी. वापस लौटते समय वह देर तक शिखर के बारे में ही सोचती रही थी. सच कह रही थी वंदना. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल थोड़े ही होता है. पर उस के साथ क्यों हुआ यह खेल? क्यों?

वह घर लौटी तो मांजी अभी भी सो ही रही थीं. उस ने सोचा था, घर पहुंचते ही चाय बनाएगी. मांजी को सारा सामान संभलवा देगी और फिर थोड़ी देर बैठ कर अपनी पढ़ाई करेगी. पर अब कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था. वंदना उस की पुरानी सहेली थी. इसी शहर में ब्याही थी. वह जब भी मिलती थी तो बड़े प्यार से. सहसा शैली का मन और उदास हो गया था. कितना फर्क आ गया था वंदना की जिंदगी में और उस की  अपनी ंिंजदगी में. वंदना हमेशा खुश, चहचहाती दिखती थी. वह अपने पति के साथ  सुखी जिंदगी बिता रही थी. और वह…अतीत की यादों में खो गई.

शायद उस के पिता भी गलत नहीं होंगे. आखिर उन्होंने शैली के लिए सुखी जिंदगी की ही तो कामना की थी. उन के बचपन के मित्र सुखनंदन का बेटा था शिखर. जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तभी  उन्होंने  यह रिश्ता तय कर दिया था. सुखनंदन ने खुद ही तो हाथ मांग कर यह रिश्ता तय किया था. कितना चाहते थे वह उसे. जब भी मिलने आते, कुछ न कुछ उपहार अवश्य लाते थे. वह भी तो उन्हें चाचाजी कहा करती थी.

‘‘वीरेंद्र, तुम्हारी यह बेटी शुरू से ही मां के अभाव में पली है न, इसलिए बचपन में ही सयानी हो गई है,’ जब वह दौड़ कर उन की खातिर में लग जाती तो वह हंस कर उस के पिता से कहते.

फिर जब शिखर इंजीनियर बन गया तो शैली के पिता जल्दी शादी कर देने के लिए दबाव डालने लगे थे. वह जल्दी ही रिटायर होने वाले थे और उस से पहले ही यह दायित्व पूरा कर लेना चाहते थे. पर जब सुखनंदन का जवाब आया कि शिखर शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा है तो वह चौंक पड़े थे. यह कैसे संभव है? इतने दिनों का बड़ों द्वारा तय किया रिश्ता…और फिर जब सगाई हुई थी तब तो शिखर ने कोई विरोध नहीं किया था…अब क्या हो गया?

शैली के पिता ने खुद भी 2-1 पत्र लिखे थे शिखर को, जिन का कोई जवाब नहीं आया था. फिर वह खुद ही जा कर शिखर के बौस से मिले थे. उन से कह कर शायद जोर डलवाया था उस पर. इस पर शिखर का बहुत ही बौखलाहट भरा पत्र आया था. वह उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं, यह तक लिखा था उस ने. कितना रोई थी तब वह और पिताजी से भी कितना कहा था, ‘क्यों नाहक जिद कर रहे हैं? जब वे लोग नहीं चाहते तो क्यों पीछे पड़े हैं?’

पारसमणि के लिए हुए बावरे : भाग 2

बाबूलाल की इस तरह की गोलमोल बातें सुन कर गांव वाले अलगअलग अर्थ निकाल रहे थे. कुछ लोग मान रहे थे कि बाबूलाल ने स्वीकार कर लिया है कि उस के पास पारस मणि है और कुछ लोगों को साफसाफ महसूस हुआ कि ऐसा कुछ भी नहीं है, मगर गांव में बाबूलाल की अब तो बल्लेबल्ले अपने उफान पर थी.बाबूलाल यादव बड़े ठाटबाट से रहा करता था. वह एक तांत्रिक था. पूजा और तंत्रमंत्र से वह अच्छे पैसे कमा लेता था.

आज भी गांवदेहात में मजदूरी कोई बहुत ज्यादा नहीं है. लोग शहर की ओर पलायन कर जाते हैं या फिर गांव के धनी किसानों के यहां काम कर के जीवनयापन करते हैं. मगर बाबूलाल तांत्रिक होने के कारण बड़े मजे से अपनी जिंदगी गुजार रहा था.अच्छा पहनता, अच्छा खातापीता. लोग उसे बिना जमीनजायदाद के भी बड़ा आदमी मानते थे. उस की साख दिनोंदिन आसपास के गांव में भी फैलती चली जा रही थी.

छत्तीसगढ़ का जांजगीर-चांपा जिला धनधान्य से परिपूर्ण होने के कारण धान का सच्चे अर्थों में कटोरा कहा जा सकता है.जिले के जांजगीर थानांतर्गत गांव मुनुंद है, जहां लगभग ढाई हजार लोगों की बस्ती है और ज्यादातर लोग खेतीकिसानी कर के अपना जीवन बसर करते हैं. यहीं बाबूलाल यादव तंत्रमंत्र और झाड़फूंक करते हुए धीरेधीरे आसपास के गांवों में प्रसिद्ध हो गया था.

आसपास के गांवों ही नहीं, बल्कि उस के पास आसपास के जिलों कोरबा, बिलासपुर से भी लोग आने लगे थे. वह किसी बीमारी भूतप्रेत आदि बाधाओं को दूर करने का दावा करता था. उस का प्रभाव बढ़ता ही चला जा रहा था.उस के पास कोई पारस मणि है, यह चर्चा भी आसपास के गांवों से होती हुई दूर तक प्रसारित हो चुकी थी.जिला चांपा जांजगीर के बाराद्वार निवासी टेकचंद जायसवाल, जो एक किसान परिवार से है, ने भी एक दिन जब यह सुना कि तांत्रिक बाबूलाल के पास पारस मणि है तो उस के मन में उत्सुकता पैदा हुई कि क्यों न इसी तरीके से पारस मणि को हथिया लिया जाए.

वह साहसी व्यक्ति के रूप में गांव में जाना जाता था. शरीर में ताकत थी और वह गांव में अच्छे रुतबे वाला था. टेकचंद ने जब यह बात सुनी तो उस ने अपने दोस्तों से पता लगाया कि आखिर माजरा क्या है.एक दिन उस ने गांव बिरगहनी के रहने वाले अपने एक दोस्त राजेश हरबंस से मोबाइल पर इस संबंध में बात की. फिर दोनों ने प्लान बनाया कि बाबूलाल यादव के गांव चलें और उस से मिल कर समझा जाए कि आखिर सचमुच उस के पास पारस मणि है या कोई अफवाह है. अगर उस के पास पारस मणि है तो उसे हथियाने की योजना बनाई जाए.

टेकचंद जायसवाल और राजेश हरबंस दोनों हमउम्र थे. टेकचंद अपनी बाइक से बाराद्वार से बिरगहनी आ पहुंचा. उस के बाद दोनों बाइक से बाबूलाल यादव से मिलने मुनुंद गांव की ओर बढ़ चले.
रास्ते में दोनों बातें कर रहे थे. टेकचंद ने बाइक चलाते हुए राजेश से पूछा, ‘‘राजेश भाई, क्या महसूस कर रहे हो तुम? क्या सच में पारस मणि होती है?’’‘‘हां, यह सच है कि पारस मणि होती है. मैं ने गूगल पर सर्च किया और पाया कि ऐसी पारस मणि का जिक्र हमारे ग्रंथों में भी है. मगर यह भी सच है कि उसे पाना आसान नहीं है, यह तो बड़े भाग्य से मिलती है. लाखोंकरोड़ों लोगों में से किसी एक के पास होती है.’’ राजेश ने कहा.

बाइक चलाते हुए टेकचंद ने कहा, ‘‘भाई, मेरी बात को तुम ने माना स्वीकार किया है. मुझे भी लगता है कि पारस मणि होती तो है. अब हमें यह पता करना है कि क्या बाबूलाल यादव तांत्रिक के पास पारस मणि है भी? और अगर है तो उसे कैसे प्राप्त किया जाए?’’ टेकचंद बोला.‘‘देखो भाई, कोई भी आदमी जिस के पास पारस मणि होगी, वह यह नहीं बताएगा कि मेरे पास है. अगर तुम्हारे पास होगी तो क्या भला किसी को बताओगे?’’ राजेश ने तर्क दिया.

‘‘हां, तुम्हारी बात भी बिलकुलसही है. अब कैसे पता करें भला?’’ टेकचंद बोला
‘‘इस का सीधा सा रास्ता यह है कि हम लोग गांव वालों से पता करेंगे. गांव वाले सच बताएंगे. गांव में कोई भी सच्चाई छिप नहीं सकती. और हो सकेगा तो बाबूलाल यादव से भी मिल कर के देखेंगे कि आखिर सच क्या है, वह कैसा आदमी है. बातचीत से भी बहुत कुछ समझ में आ जाएगा.’’
उस दिन टेकचंद और राजेश हरबंस बाबूलाल यादव के गांव मुनुंद पहुंचे और कुछ लोगों से बातचीत की. लोगों ने उन्हें दबी जुबान में बताया कि बाबूलाल के पास सचमुच पारस मणि है, मगर वह स्वीकार नहीं करता.

इस के बाद दोनों बाबूलाल से भी मिले. उस के हावभाव और बातचीत से दोनों ही बड़े प्रभावित हुए और जब घर लौटे तो दोनों इस बात को पूरी तरीके से मान चुके थे कि बाबूलाल के पास कुछ तो ऐसा है जिस से वह मालामाल हुआ है.टेकचंद और राजेश हरबंस ने धीरेधीरे महमदपुर निवासी रामनाथ श्रीवास, बलौदा की शांतिबाई यादव, कोरबा निवासी यासीन खान और अन्य कई लोगों से बातचीत कर के एक योजना पर अमल करने की कोशिश शुरू कर दी.

उन सभी ने यह प्लान बनाया कि अलगअलग तरीके से हम बाबूलाल यादव से उस के घर पर जा कर मिलेंगे. चूंकि वह तांत्रिक है, इसलिए अपना इलाज कराने का बहाना भी बना सकते हैं. बातचीत करते हुए हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि उस ने वह पारस मणि कहां छिपा रखी है या फिर ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि पारस मणि हमें दिखा दे तो हम लोग उसे हथिया लें.राजेश हरबंस और शांति यादव दोनों ही गांव बिरगहनी थाना बलौदा एक ही गांव के रहने वाले और आपस में परिचित थे. दोनों ने योजना बनाई कि शांतिबाई की बीमारी का हवाला देते हुए बाबूलाल यादव से मिला जाए.
राजेश हरबंस ऐसी परिस्थिति बनाएगा कि पारस मणि ले कर के खुद बाबूलाल खड़ा हो जाएगा.

शांतिबाई यादव की उम्र 21 वर्ष थी. वह दिखने में खूबसूरत और कमसिन थी. राजेश हरबंस उसे अपना परिचित बताते हुए एक दिन बाबूलाल यादव के घर पहुंच गया और इलाज की फरियाद की. शांतिबाई ने बाबूलाल से हंस कर बातें की और बताया कि उस के शरीर में हमेशा दर्द बना रहता है. कई डाक्टरों को दिखाया मगर वह ठीक नहीं हो पा रही है, इसलिए सोचा कि आप के पास झाडंफूंक करवाऊं.
बाबूलाल यादव ने शांतिबाई का इलाज शुरू किया. उसे तंत्रमंत्र कर के भभूत दी और कहा कि कोई बाधा है जिसे वह एक महीने में ठीक कर देगा. इस के लिए उसे हर सप्ताह आना पड़ेगा.

 

अपना बेटा -भाग 2 : मामाजी को देख क्यों परेशान हो उठे अंजलि और मुकेश

अंजलि ने देखा कि मामाजी की बातों में कोई वैरभाव नहीं था. मुकेश भी अंजलि को देख रहा था, मानो कह रहा हो, देखो, हम बेकार ही डर रहे थे.

‘‘अरे, तुम्हारे दोनों बच्चे कहां हैं? क्या नाम हैं उन के?’’

‘‘गगन और रजत,’’ मुकेश बोला, ‘‘स्कूल गए हैं. वे तो जाना ही नहीं चाह रहे थे. कह रहे थे मामाजी से मिलना है. इसीलिए कार से गए हैं ताकि समय से घर आ जाएं.’’

‘‘अच्छा? तुम ने अपने बच्चों को गाड़ी भी सिखा दी. वेरी गुड. मेरे पास तो गाड़ी ही नहीं है, बच्चे सीखेंगे क्या… शादियां कर लूं यही गनीमत है. मैं तो कानवेंट स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ा सका. अगर तुम मेरे एक को भी…पढ़ा…’’ मामाजी इतना कह कर रुक गए पर अंजलि और मुकेश का हंसता चेहरा बुझ सा गया.

अंजलि वहां से उठ कर बेडरूम में चली गई.

‘‘कब आ रहे हैं बच्चे?’’ मामाजी ने बात पलट दी.

‘‘आने वाले होंगे,’’ मुकेश इतना ही बोले थे कि घंटी बज उठी. अंजलि दरवाजे की तरफ लपकी. गगनरजत थे.

‘‘मामाजी आ गए…’’ दोनों ने अंदर कदम रखने से पहले मां से पूछ लिया और कमरे में कदम रखते ही पापा के साथ एक अजनबी को बैठा देख कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यही हैं मामाजी.

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दोनों ने उन के पैर छू लिए. मुकेश ने हंस के कहा, ‘‘मामाजी, मेरे बेटे गगन और रजत हैं.’’

‘‘वाह, कितने बड़े लग रहे हैं. दोनों कद में बाप से ऊंचे निकल रहे हैं और शक्लें भी इन की कितनी मिलती हैं,’’  इस के आगे मामाजी नहीं बोले.

‘‘मामाजी, मैं आप के लिए आइसक्रीम लाया हूं. मम्मी, ये लो ब्रिक,’’ गगन ने अंजलि को ब्रिक पकड़ा दी.

‘‘अच्छा, तुम्हें कैसे पता कि मामाजी को आइसक्रीम अच्छी लगती है?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘पापा, आइसक्रीम किसे अच्छी नहीं लगती,’’ गगन बोला.

अंजलि ने सब को प्लेटों में आइसक्रीम पकड़ा दी. उस के बाद मामाजी ने दोनों बच्चों से पूछना शुरू किया कि कौन सी क्लास में पढ़ते हो? क्याक्या पढ़ते हो? किस स्कूल में पढ़ने जाते हो? वहां क्याक्या खाते हो?

‘‘बस, मामाजी, अब आप आराम कर लें,’’ अंजलि ने उठते हुए कहा, ‘‘गगनरजत, तुम दोनों कपड़े बदल लो, मैं तुम्हारे कमरे में ही खाना ले कर आती हूं.’’

‘‘मामाजी, आप अभी रहेंगे न हमारे साथ?’’ गगन ने उठतेउठते पूछा.

‘‘हां, 3-4 दिन तो रहूंगा ही.’’

अंजलि के साथ गगन और रजत अपने बेडरूम की तरफ बढ़े.

अंजलि रसोई में जाने लगी तो मामाजी ने मुकेश से पूछा, ‘‘गगन को ही एडोप्ट किया था न तुम ने…’’ मुकेश सकपका गया.

‘‘दोनों को देखने पर बिलकुल नहीं लगता कि इन में एक गोद लिया है,’’ मामाजी ने फिर बात दोहराई थी.

‘‘मामाजी, यह क्या बोल रहे हैं?’’ मुकेश ने हैरत से मामाजी को देखा, ‘‘आप को ऐसा नहीं बोलना चाहिए. वह भी बच्चों के सामने?’’

बच्चे मामाजी की बात सुन कर रुक गए थे. अंजलि के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. गगन तो सन्न ही रह गया. रजत को जैसे होश सा आया.

‘‘मम्मी, मामाजी किस की बात कर रहे हैं? कौन गोद लिया है?’’

अंजलि तो मानो बुत सी खड़ी रह गई थी. सालों पहले कहे गए मामाजी के शब्द, ‘गैर, गैर होते हैं अपने अपने, मैं ऐसा साबित कर दूंगा,’ उस की समझ में अब आ रहे थे. तो इतने सालों बाद मामाजी इसलिए मेरे घर आए हैं कि मेरा बसाबसाया संसार उजाड़ दें.

गगन अभी तक खामोश मामाजी को ही देख रहा था. अंजलि को जैसे होश आया हो, ‘‘कुछ नहीं, बेटे, किसी और गगन की बात कर रहे हैं. तुम अपने कमरे में जाओ.’’

मुकेश के पांव जड़ हो रहे थे.

‘‘अरे, अंजलि बेटे, तुम ने गगन को बताया नहीं कि इस को तुम अनाथाश्रम से लाई थीं. उस के बाद रजत पैदा हुआ था…’’ मामाजी रहस्यमय मुसकान के साथ बोले.

‘‘यह क्या कह रहे हैं, मामाजी?’’ मुकेश विचलित होते हुए बोला.

‘‘देखो मुकेश, आज नहीं तो कल किसी न किसी तरह गगन को सच का पता चल ही जाएगा तो फिर तुम क्यों छिपा रहे हो इस को.’’

गगन जहां खड़ा था वहीं बुत की तरह खड़ा रहा, पर उस की आंखें भर आईं, क्योंकि मम्मीपापा भी मामाजी को चुप कराने की ही कोशिश कर रहे थे. यानी वह जो कुछ कह रहे हैं वह सच… रजत हैरानपरेशान सब को देख रहा था. गगन पलट कर अपने बेडरूम में चला गया. रजत उस के पीछेपीछे चला आया. पूरे घर का माहौल पल भर में बदल गया था. कपड़े बदल कर गगन सो गया. उस ने खाना भी नहीं खाया.

‘‘मम्मी, गगन रोए जा रहा है, आज वह दोस्तों से मिलने भी नहीं गया. पहले कह रहा था कि मुझे एक पेपर लेने जाना है.’’

अंजलि की हिम्मत नहीं हुई गगन से कुछ भी पूछे. रात के खाने के लिए अंजलि ने ही नहीं चाहा कि गगन व रजत मामाजी के पास बैठ कर खाना खाएं. मामाजी टीवी देखने में मस्त थे. ऐसा लग रहा था कि उन का मतलब हल हो गया. मुकेश भी ज्यादा बात नहीं कर रहा था. उसे ध्यान आ रहा था उस झगड़े का, जो मम्मीपापा, मामामामी ने उस के साथ किया था. दरअसल, वे चाहते थे कि हमारा बच्चा नहीं हुआ तो मामी के छोटे बच्चे को गोद ले लें. पर अंजलि चाहती थी कि हम उस बच्चे को गोद लें जिस के मातापिता का पता न हो, ताकि कोई चांस ही न रहे कि बच्चा बड़ा हो कर अपने असली मातापिता की तरफ झुक जाए. वह यह भी चाहती थी कि जिसे वह गोद ले वह बच्चा उसे ही अपनी मां समझे.

तपस्या- भाग 3 : क्या शिखर के दिल को पिघला पाई शैली?

‘‘अब मैं क्या करूं? कहां से इंतजाम करूं रुपयों का? तू ही शिखर को खबर कर दे, शैली. मेरे तो जेवर भी मकान के मुकदमे में गिरवी  पड़े  हुए हैं,’’ शोभा की रुलाई नहीं थम रही थी.

जीजाजी की आंखों की रोशनी… उन के नन्हे बच्चे…सब का भविष्य एकसाथ ही शैली के  आगे घूम गया था.

‘‘आप ऐसा करिए, जीजी, अभी तो ये मेरे जेवर हैं, इन्हें ले जाइए. इन्हें खबर भी करूंगी तो इतनी जल्दी  कहां पहुंच पाएंगे रुपए?’’

और शैली ने अलमारी से निकाल कर अपनी चूडि़यां और जंजीर  आगे रख दी थीं.

‘‘नहीं, शैली, नहीं…’’ शोभा स्तंभित थी.

फिर कहनेसुनने के बाद ही वह जेवर लेने के लिए तैयार हो पाई थी. मां की रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘बहू, तू तो हीरा है.’’

‘‘पता नहीं शिखर कब इस हीरे का मोल समझ पाएगा,’’ शोभा की आंखों में फिर खुशी के आंसू छलक पड़े थे.

पर शैली को अनोखा संतोष  मिला था. उस के मन ने कहा, उस का नहीं तो किसी और का परिवार तो बनासंवरा रहे. जेवरों का शौक तो उसे वैसे ही नहीं था. और अब जेवर पहने भी तो किस की खातिर? मन की उसांस को उस ने दबा  दिया था.

8 दिन के बाद खबर मिली थी, आपरेशन सफल रहा. शिखर को भी अब सूचना मिल गई थी, और वह आ रहा था. पर इस बार शैली ने अपनी सारी उत्कंठा को दबा लिया था. अब वह किसी तरह का उत्साह  प्रदर्शित नहीं कर  पा रही थी. सिर्फ तटस्थ भाव से रहना चाहती थी वह.

‘‘मां, कैसी हो? सुना है, बहुत बीमार रही हो तुम. यह क्या हालत बना रखी है? जीजाजी को क्या हुआ था अचानक?’’ शिखर ने पहुंचते ही मां से प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘मेरी  तो तबीयत तू देख ही रहा है, बेटे. बीच में तो और भी बिगड़ गई थी. बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. बेचारी बहू ने ही सब संभाला. तेरे जीजाजी  की तो आंखों की रोशनी ही चली गई थी. उसी समय आपरेशन नहीं होता तो पता नहीं क्या होता. आपरेशन के लिए पैसों का भी सवाल था, लेकिन उसी समय बहू ने अपने जेवर दे कर तेरे जीजाजी  की आंखों की रोशनी वापस ला दी.’’

‘‘जेवर दे दिए…’’ शिखर हतप्रभ था.

‘‘हां, क्या करती शोभा? कह रही थी कि तुझे खबर कर के रुपए मंगवाए तो आतेआते भी तो समय लग जाएगा.’’

मां बहुत कुछ कहती जा रही थीं पर शिखर के सामने सबकुछ गड्डमड्ड हो गया था. शैली चुपचाप आ कर नाश्ता रख गई थी. वह नजर उठा कर  सिर ढके शैली को देखता रहा था.

‘‘मांजी, खाना क्या बनेगा?’’ शैली ने धीरे से मां से पूछा था.

‘‘तू चल. मैं भी अभी आती हूं रसोई में,’’ बेटे के आगमन से ही मां उत्साहित हो उठी थीं. देर तक उस का हालचाल पूछती रही थीं. अपने  दुखदर्द  सुनाती रही थीं.

‘‘अब बहू भी एम.ए. की पढ़ाई कर रही है. चाहती है, नौकरी कर ले.’’

‘‘नौकरी,’’ पहली बार कुछ चुभा शिखर के मन में. इतने रुपए हर महीने  भेजता हूं, क्या काफी नहीं होते?

तभी उस की मां बोलीं, ‘‘अच्छा है. मन तो लगेगा उस का.’’

वह सुन कर चुप रह गया था. पहली बार उसे ध्यान आया, इतनी बातों के बीच इस बार मां ने एक बार भी नहीं कहा कि तू बहू को अपने साथ ले जा. वैसे तो हर चिट्ठी में उन की यही रट रहती थी. शायद अब अभ्यस्त हो गई हैं  या जान गई हैं कि वह नहीं ले जाना चाहेगा. हाथमुंह धो कर वह अपने किसी दोस्त से मिलने के लिए घर से निकला  पर मन ही नहीं हुआ जाने का.

शैली ने शोभा को अपने जेवर दे  दिए, एक यही बात उस  के मन में गूंज रही थी. वह तो शैली और उस के पिता  दोनों को ही बेहद स्वार्थी समझता रहा था जो सिर्फ अपना मतलब हल करना जानते हों. जब से शैली के पिता ने उस के बौस से कह कर उस पर शादी के लिए दबाव डलवाया था तभी से उस का मन इस परिवार के लिए नफरत से भर गया था और उस ने सोच लिया था कि मौका पड़ने पर वह भी इन लोगों से बदला ले कर रहेगा. उस की तो अभी 2-4 साल शादी करने की इच्छा नहीं थी, पर इन लोगों ने चतुराई से उस के भोलेभाले पिता को फांस लिया. यही सोचता था वह अब तक.

फिर शैली का हर समय चुप रहना उसे खल जाता. कभी अपनेआप पत्र भी तो नहीं लिखा था उस ने. ठीक है, दिखाती रहो अपना घमंड. लौट आया तो  मां ने उस का खाना परोस दिया था. पास ही बैठी बड़े चाव से खिलाती रही थीं. शैली रसोई में ही थी. उसे लग रहा था कि  शैली जानबूझ कर ही उस  के सामने आने से कतरा रही है.

खाना खा कर उस ने कोई पत्रिका उठा ली थी. मां और शैली ने भी खाना खा लिया था. फिर मां को दवाई  दे कर शैली मां  के कमरे से जुड़े अपने छोटे से कमरे में चली गई और कमरे की बत्ती जला दी थी.

देर तक नींद नहीं आई थी शिखर को. 2-3 बार बीच में पानी पीने के बहाने  वह उठा भी था. फिर याद आया था पानी का जग  तो शैली  कमरे में ही  रख गई थी. कई बार इच्छा हुई थी चुपचाप उठ कर शैली को  आवाज देने की. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज  पहली बार उसे क्या हो रहा है. मन ही मन वह अपने परिवार के बारे में सोचता रहा था. वह सगा बेटा हो कर भी घरपरिवार का इतना ध्यान नहीं रख पा रहा था. फिर शैली तो दूसरे घर की है. इसे क्या जरूरत है सब के लिए मरनेखपने की, जबकि उस का पति ही उस की खोजखबर नहीं ले रहा हो?

पूरी रात वह सो नहीं सका था.

दूसरा दिन मां को डाक्टर के यहां दिखाने के लिए ले जाने, सारे परीक्षण फिर से करवाने में बीता था.

सारी दौड़धूप में शाम तक काफी थक चुका था वह. शैली अकेली कैसे कर पाती होगी? दिनभर वह भी तो मां के साथ ही उन्हें सहारा दे कर चलती रही थी. फिर थकान के  बावजूद रात को मां से पूछ कर उस की पसंद के कई व्यंजन  खाने  में बना लिए थे.

‘‘मां, तुम लोग भी साथ ही खा लो न,’’ शैली की तरफ देखते हुए उस ने कहा था.

‘‘नहीं, बेटे, तू पहले गरमगरम खा ले,’’ मां का स्वर लाड़ में भीगा हुआ था.

कमरे में आज अखबार पढ़ते हुए शिखर का मन जैसे उधर ही उलझा रहा था. मां ने शायद खाना खा लिया था, ‘‘बहू, मैं तो थक गईर् हूं्. दवाई दे कर बत्ती बुझा दे,’’ उन की आवाज आ रही थी. उधर शैली रसोईघर में सब सामान समेट रही थी.

‘‘एक प्याला कौफी मिल सकेगी क्या?’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े हो कर उस ने कहा था.

शैली ने नजर उठा कर देखा भर था. क्या था उन नजरों में, शिखर जैसे सामना ही नहीं कर पा रहा था.

शैली कौफी का कप मेज पर रख कर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिखर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आओ, बैठो.’’

उस के कदम ठिठक से गए थे. दूर की कुरसी की तरफ बैठने को उस के कदम बढ़े ही थे कि शिखर ने धीरे से हाथ खींच कर उसे अपने पास पलंग पर बिठा लिया था.

लज्जा से सिमटी वह कुछ बोल भी नहीं पाई थी.

‘‘मां की तबीयत अब तो काफी ठीक जान पड़ रही है,’’ दो क्षण रुक कर शिखर ने बात शुरू करने का प्रयास किया था.

‘‘हां, 2 दिन से घर में खूब चलफिर रही हैं,’’ शैली ने जवाब में कहा था. फिर जैसे उसे कुछ याद हो आया था और वह बोली थी, ‘‘आप शोभा जीजी से भी मिलने जाएंगे न?’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘मांजी को भी साथ ले जाइएगा. थोड़ा परिवर्तन हो जाएगा तो उन का मन बदल जाएगा. वैसे….घर से जा भी कहां पाती हैं.’’

शिखर चुपचाप शैली की तरफ देखता भर रहा था.

‘‘मां को ही क्यों, मैं तुम्हें भी साथ ले चलूंगा, सदा के लिए अपने साथ.’’

धीरे से शैली को उस ने अपने पास खींच लिया था. उस के कंधों से लगी शैली का मन जैसे उन सुमधुर क्षणों में सदा के लिए डूब जाना चाह रहा था.

अधेड़ प्रेम की रुसवाई : भाग 1

प्यार की कोई उम्र नहीं होती, यह किसी भी उम्र में किसी से हो सकता है. जैसे 2 शादीशुदा बेटियों की मां मिथिलेश को गांव के ही 4 जवान बेटों के पिता किरणपाल से हो गया था. जमाने की रुसवाई को नजरंदाज कर यह प्यार 10 सालों तक चला. इस के बाद इस का जो खूनी अंजाम हुआ, वह… ‘अंजलि मैं तुम्हें भूल जाऊं ये हो नहीं सकता और तुम मुझे भूल जाओ ये मैं होने नहीं दूंगा…’फिल्म ‘धड़कन’ में सुनील शेट्टी ने यह डायलौग क्या मारा, नौजवानों को अपनी प्रेमिकाओं को अपनी मोहब्बत की ताकत दिखाने का जबरदस्त मसाला मिल गया.

बहुत से आशिकों ने सिचुएशन के मुताबिक इस डायलौग में थोड़ाबहुत फेरबदल कर के इजहारे मोहब्बत किया होगा. हर प्रेमी किसी न किसी मौके पर अपनी महबूबा के सामने यह डायलौग जरूर मारता है. इस डायलौग को सुन कर प्रेमिकाओं को भी लगता है कि उन का प्रेमी उन के लिए कितना पजेसिव है. 2 दशक से यह डायलौग प्रेमी दिलों की तड़प जाहिर करता आ रहा है.लेकिन जब सुनील शेट्टी के डायलौग की तर्ज पर किरणपाल ने तमंचा लहराते हुए अपनी प्रेमिका मिथिलेश से कहा, ‘‘तू मेरी हो न सकी और मैं तुझे किसी और की होने न दूंगा…’’ तो मारे डर के मिथिलेश अपनी जान बचाने के लिए भागी.

मगर उस दिन किरणपाल के सिर पर इंतकाम का ऐसा भूत सवार था कि उस ने अपनी प्रेमिका पर गोली दाग दी. धांय… धांय… एक नहीं 2-2 गोलियां. वह तय कर के आया था कि बस अब यह प्रेम कहानी यहीं खत्म कर देनी है.पहली गोली लगते ही मिथिलेश जमीन पर गिर कर तड़पने लगी. किरणपाल उस के पास आया. खून से लथपथ जमीन पर पड़ी छटपटाती प्रेमिका को देख कर उस की आंखें भीग गईं.
वह पलभर उसे टकटकी लगाए निहारता रहा और फिर रोतेरोते उस के शरीर पर झुक गया. वह उस के तड़पते जिस्म को अपनी छाती से भींच कर रोने लगा और तमंचे का स्ट्रिगर फिर दबा दिया.

इस बार गोली मिथिलेश की छाती पर लगी और कुछ ही देर में उस की छटपटाहट भी शांत हो गई. आंखें मुंद गईं और गरदन एक ओर को लुढ़क गई. किरणपाल प्रेमिका के मृत शरीर से लिपट गया. उसे अपनी बांहों में लपेट कर फूटफूट कर रोने लगा.अचानक उस ने तमंचे की नाल अपनी कनपटी से लगाई और स्ट्रिगर फिर दबा दिया. धांय के साथ गोली निकली और किरणपाल के लगी. यानी मिथिलेश को मार कर किरणपाल ने अपनी भी इहलीला समाप्त कर ली.

दोनों के शव एकदूसरे से लिपटे हुए जब लोगों ने देखे तो फिर जितने मुंह उतनी बातें, क्योंकि मामला ही कुछ ऐसा था. जिन बातों को बदनामी के डर से अब तक दबाछिपा कर रखा गया था, मौत के इस मंजर ने उन्हें उघाड़ कर रख दिया.प्रेम में असफल प्रेमी के इंतकाम की यह भयानक कहानी है मेरठ के परीक्षितगढ़ के गांव दुर्वेशपुर की. आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि ये युवावस्था में कदम रखने वाले किन्हीं 18-20 साल के प्रेमी युगल की कहानी नहीं, बल्कि 2 शादीशुदा और जवान बच्चों के अधेड़ मातापिता के प्रेम और उस के अंत की कहानी थी.

मेरठ के परीक्षितगढ़ के गांव दुर्वेशपुर में 15 जुलाई की सुबह हुई इस वारदात से इलाके में हड़कंप मच गया.उस रात किरणपाल रात भर जागता रहा. बारबार सिरहाने तकिए के नीचे रखे तमंचे को निकाल कर बिस्तर पर उठ बैठता. लोडेड तमंचे को होंठों से लगाता फिर उसे अंगुलियों के बीच घुमाता दरवाजे से कभी बाहर कभी अंदर होता फिर बिस्तर पर आ बैठता.

उस की बेचैनी चरम पर थी. वह किसी निष्कर्ष पर पहुंच चुका था और उस निष्कर्ष से अब उसे कोई विमुख नहीं कर सकता था. 10 साल की मोहब्बत आज अपने अंजाम पर पहुंचने वाली थी.पौ फटते ही किरणपाल अपनी पैंट में तमंचा खोंस कर निकल पड़ा. उस के अंदर आग सी लगी हुई थी. आज फैसला हो जाना था. वह अब दोहरी जिंदगी से तंग आ चुका था. अपने प्यार को वह पूरी तरह पा लेना चाहता था, मगर वह उसे हासिल नहीं हो रहा था. और अब तो वह उस से मिलना ही नहीं चाहती थी. बातबात पर उसे ताने देने लगी थी. पीछा छोड़ने को कहने लगी थी.

उस के घर से कोई 400 मीटर की दूरी पर था उस की प्रेमिका मिथिलेश का घर. उसे पता था कि हर रोज वह भोर में घर के पीछे गोबर बटोरने आती है. किरणपाल घात लगा कर वहीं बैठ गया और उस के आने का इंतजार करने लगा.

साढ़े 6 बजे के करीब उस की प्रेमिका मिथिलेश हाथों में कूड़ा उठाए घर से निकली और उसी ओर चल पड़ी. घर के पीछे खाली जगह थी, जहां गायभैंसें गोबर कर जाती थीं. मिथिलेश ने हाथ का कूड़ा अभी फेंका ही था कि किरणपाल आड़ से निकल कर सामने आ खड़ा हुआ. उस की लंबी गुच्छेदार मूंछों के पीछे उस का उग्र चेहरा देख कर मिथिलेश डर गई.

मिथिलेश का पति धीर सिंह उस वक्त घर पर ही था, ऐसे में किरणपाल कोई बखेड़ा न खड़ा करे, यह सोच कर वह घर की ओर भागने को हुई. मगर किरणपाल ने उसे मौका ही नहीं दिया और तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी.गोली लगने के बाद मिथिलेश जान बचाने के लिए चंद कदम भागी, मगर फिर लड़खड़ा कर गिर पड़ी. उस का शरीर गोली लगने से छटपटा रहा था. किरणपाल उस के सामने आ खड़ा हुआ. उस ने डूबीडूबी आंखों से किरणपाल की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो, ‘ये तुम ने क्या किया?’

किरणपाल भी उसे यूं तड़पता देख रो पड़ा. मगर अब उस के सामने कोई रास्ता नहीं बचा था. वह रोतेरोते घुटनों के बल बैठ गया और तड़पती प्रेमिका को बाहों में ले कर बोला, ‘‘तू मेरी हो न सकी, मैं तुझे किसी दूसरे की होने न दूंगा मिथिलेश…’’कुछ पल वह उसे सीने से लगा कर रोता रहा, फिर उस ने उस पर दोबारा फायर झोंक दिया. दूसरी गोली लगते ही मिथिलेश जोर से तड़पी और थोड़ी देर में शांत हो गई.

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