कामयाब: एक भविष्यवाणी ने क्यों बदल दी चंचल -भाग 1

हमेशा जिंदादिल और खुशमिजाज रमा को अंदर आ कर चुपचाप बैठे देख चित्रा से रहा नहीं गया, पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है, रमा…?’’

‘‘अभिनव की वजह से परेशान हूं.’’

‘‘क्या हुआ है अभिनव को?’’

‘‘वह डिपे्रशन का शिकार होता जा रहा है.’’

‘‘पर क्यों और कैसे?’’

‘‘उसे किसी ने बता दिया है कि अगले 2 वर्ष उस के लिए अच्छे नहीं रहेंगे.’’

‘‘भला कोई भी पंडित या ज्योतिषी यह सब इतने विश्वास से कैसे कह सकता है. सब बेकार की बातें हैं, मन का भ्रम है.’’

‘‘यही तो मैं उस से कहती हूं पर वह मानता ही नहीं. कहता है, अगर यह सब सच नहीं होता तो आर्थिक मंदी अभी ही क्यों आती… कहां तो वह सोच रहा था कि कुछ महीने बाद दूसरी कंपनी ज्वाइन कर लेगा, अनुभव के आधार पर अच्छी पोस्ट और पैकेज मिल जाएगा पर अब दूसरी कंपनी ज्वाइन करना तो दूर, इसी कंपनी में सिर पर तलवार लटकी रहती है कि कहीं छटनी न हो जाए.’’

‘‘यह तो जीवन की अस्थायी अवस्था है जिस से कभी न कभी सब को गुजरना पड़ता है, फिर इस में इतनी हताशा और निराशा क्यों? हताश और निराश व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता. जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए सोच भी सकारात्मक होनी चाहिए.’’

‘‘मैं और अभिजीत तो उसे समझासमझा कर हार गए,’’ रमा बोली, ‘‘तेरे पास एक आस ले कर आई हूं, तुझे मानता भी बहुत है…हो सकता है तेरी बात मान कर शायद मन में पाली गं्रथि को निकाल बाहर फेंके.’’

‘‘तू चिंता मत कर,’’ चित्रा बोली, ‘‘सब ठीक हो जाएगा… मैं सोचती हूं कि कैसे क्या कर सकती हूं.’’

घर आने पर रमा द्वारा कही बातें चित्रा ने विकास को बताईं तो वह बोले, ‘‘आजकल के बच्चे जराजरा सी बात को दिल से लगा बैठते हैं. इस में दोष बच्चों का भी नहीं है, दरअसल आजकल मीडिया या पत्रपत्रिकाएं भी इन अंधविश्वासों को बढ़ाने में पीछे नहीं हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो विभिन्न चैनलों पर गुरुमंत्र, आप के तारे, तेज तारे, ग्रहनक्षत्र जैसे कार्यक्रम प्रसारित न होते तथा पत्रपत्रिकाओं के कालम ज्योतिषीय घटनाओं तथा उन का विभिन्न राशियों पर प्रभाव से भरे नहीं रहते.’’

विकास तो अपनी बात कह कर अपने काम में लग गए पर चित्रा का किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बारबार रमा की बातें उस के दिलोदिमाग में घूम रही थीं. वह सोच नहीं पा रही थी कि अपनी अभिन्न सखी की समस्या का समाधान कैसे करे. बच्चों के दिमाग में एक बात घुस जाती है तो उसे निकालना इतना आसान नहीं होता.

उन की मित्रता आज की नहीं 25 वर्ष पुरानी थी. चित्रा को वह दिन याद आया जब वह इस कालोनी में लिए अपने नए घर में आई थी. एक अच्छे पड़ोसी की तरह रमा ने चायनाश्ते से ले कर खाने तक का इंतजाम कर के उस का काम आसान कर दिया था. उस के मना करने पर बोली, ‘दीदी, अब तो हमें सदा साथसाथ रहना है. यह बात अक्षरश: सही है कि एक अच्छा पड़ोसी सब रिश्तों से बढ़ कर है. मैं तो बस इस नए रिश्ते को एक आकार देने की कोशिश कर रही हूं.’

और सच, रमा के व्यवहार के कारण कुछ ही समय में उस से चित्रा की गहरी आत्मीयता कायम हो गई. उस के बच्चे शिवम और सुहासिनी तो रमा के आगेपीछे घूमते रहते थे और वह भी उन की हर इच्छा पूरी करती. यहां तक कि उस के स्कूल से लौट कर आने तक वह उन्हें अपने पास ही रखती.

रमा के कारण वह बच्चों की तरफ से निश्ंिचत हो गई थी वरना इस घर में शिफ्ट करने से पहले उसे यही लगता था कि कहीं इस नई जगह में उस की नौकरी की वजह से बच्चों को परेशानी न हो.

विवाह के 11 वर्ष बाद जब रमा गर्भवती हुई तो उस की खुशी की सीमा न रही. सब से पहले यह खुशखबरी चित्रा को देते हुए उस की आंखों में आंसू आ गए. बोली, ‘दीदी, न जाने कितने प्रयत्नों के बाद मेरे जीवन में यह खुशनुमा पल आया है. हर तरह का इलाज करा लिया, डाक्टर भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे क्योंकि हर जांच सामान्य ही निकलती… हम निराश हो गए थे. मेरी सास तो इन पर दूसरे विवाह के लिए जोर डालने लगी थीं पर इन्होंने किसी की बात नहीं मानी. इन का कहना था कि अगर बच्चे का सुख जीवन में लिखा है तो हो जाएगा, नहीं तो हम दोनों ऐसे ही ठीक हैं. वह जो नाराज हो कर गईं, तो दोबारा लौट कर नहीं आईं.’

आंख के आंसू पोंछ कर वह दोबारा बोली, ‘दीदी, आप विश्वास नहीं करेंगी, कहने को तो यह पढ़ेलिखे लोगों की कालोनी है पर मैं इन सब के लिए अशुभ हो चली थी. किसी के घर बच्चा होता या कोई शुभ काम होता तो मुझे बुलाते ही नहीं थे. एक आप ही हैं जिन्होंने अपने बच्चों के साथ मुझे समय गुजारने दिया. मैं कृतज्ञ हूं आप की. शायद शिवम और सुहासिनी के कारण ही मुझे यह तोहफा मिलने जा रहा है. अगर वे दोनों मेरी जिंदगी में नहीं आते तो शायद मैं इस खुशी से वंचित ही रहती.’

उस के बाद तो रमा का सारा समय अपने बच्चे के बारे में सोचने में ही बीतता. अगर कुछ ऐसावैसा महसूस होता तो वह चित्रा से शेयर करती और डाक्टर की हर सलाह मानती.

धीरेधीरे वह समय भी आ गया जब रमा को लेबर पेन शुरू हुआ तो अभिजीत ने उस का ही दरवाजा खटखटाया था. यहां तक कि पूरे समय साथ रहने के कारण नर्स ने भी सब से पहले अभिनव को चित्रा की ही गोदी में डाला था. वह भी जबतब अभिनव को यह कहते हुए उस की गोद में डाल जाती, ‘दीदी, मुझ से यह संभाला ही नहीं जाता, जब देखो तब रोता रहता है, कहीं इस के पेट में तो दर्द नहीं हो रहा है या बहुत शैतान हो गया है. अब आप ही संभालिए. या तो यह दूध ही नहीं पीता है, थोड़ाबहुत पीता है तो वह भी उलट देता है, अब क्या करूं?’

हर समस्या का समाधान पा कर रमा संतुष्ट हो जाती. शिवम और सुहासिनी को तो मानो कोई खिलौना मिल गया, स्कूल से आ कर जब तक वे उस से मिल नहीं लेते तब तक खाना ही नहीं खाते थे. वह भी उन्हें देखते ही ऐसे उछलता मानो उन का ही इंतजार कर रहा हो. कभी वे अपने हाथों से उसे दूध पिलाते तो कभी उसे प्रैम में बिठा कर पार्क में घुमाने ले जाते. रमा भी शिवम और सुहासिनी के हाथों उसे सौंप कर निश्ंिचत हो जाती.

कामयाब: एक भविष्यवाणी ने क्यों बदल दी चंचल -भाग 3

रमा के चेहरे पर छाई संतुष्टि जहां चित्रा को सुकून पहुंचा रही थी वहीं इस बात का एहसास भी करा रही थी, कि व्यक्ति की खुशी और दुख उस की मानसिक अवस्था पर निर्भर होते हैं. ग्रहनक्षत्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. अब वह उस से कुछ छिपाना नहीं चाहती थी. आखिर मन का बोझ वह कब तक मन में छिपाए रहती.

‘‘रमा, मैं ने तुझ से एक बात छिपाई पर क्या करती, इस के अलावा मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं था,’’ मन कड़ा कर के चित्रा ने कहा.

‘‘क्या कह रही है तू…कौन सी बात छिपाई, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

‘‘दरअसल उस दिन तथाकथित पंडित ने जो तेरे और अभिनव के सामने कहा, वह मेरे निर्देश पर कहा था. वह कुंडली बांचने वाला पंडित नहीं बल्कि मेरे स्कूल का ही एक अध्यापक था, जिसे सारी बातें बता कर, मैं ने मदद मांगी थी तथा वह भी सारी घटना का पता लगने पर मेरा साथ देने को तैयार हो गया था,’’ चित्रा ने रमा को सब सचसच बता कर झूठ के लिए क्षमा मांग ली और अंदर से ला कर उस के दिए 501 रुपए उसे लौटा दिए.

‘‘मैं नहीं जानती झूठसच क्या है. बस, इतना जानती हूं कि तू ने जो किया अभिनव की भलाई के लिए किया. वही किसी की बातों में आ कर भटक गया था. तू ने तो उसे राह दिखाई है फिर यह ग्लानि और दुख कैसा?’’

‘‘जो कार्य एक भूलेभटके इनसान को सही राह दिखा दे वह रास्ता कभी गलत हो ही नहीं सकता. दूसरे चाहे जो भी कहें या मानें पर मैं ऐसा ही मानती हूं और तुझे विश्वास दिलाती हूं कि यह बात एक न एक दिन अभिनव को भी बता दूंगी, जिस से कि वह कभी भविष्य में ऐसे किसी चक्कर में न पड़े,’’ रमा ने उस की बातें सुन कर उसे गले से लगाते हुए कहा.

रमा की बात सुन कर चित्रा के दिल से एक भारी बोझ उठ गया. दुखसुख, सफलताअसफलता तो हर इनसान के हिस्से में आते हैं पर जो जीवन में आए कठिन समय को हिम्मत से झेल लेता है वही सफल हो पाता है. भले ही सही रास्ता दिखाने के लिए उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा पर उसे इस बात की संतुष्टि थी कि वह अपने मकसद में कामयाब रही.

 

डर: सेना में सेवा करने के प्रति आखिर कैसा था डर -भाग 1

मैं सुबह की सैर पर था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. इस समय कौन हो सकता है, मैं ने खुद से ही प्रश्न किया. देखा, यह तो अमृतसर से कौल आई है.

‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो फूफाजी, प्रणाम, मैं सुरेश

बोल रहा हूं?’’

‘‘जीते रहो बेटा. आज कैसे याद किया?’’

‘‘पिछली बार आप आए थे न. आप ने सेना में जाने की प्रेरणा दी थी. कहा था, जिंदगी बन जाएगी. सेना को अपना कैरियर बना लो. तो फूफाजी, मैं ने अपना मन बना लिया है.’’

‘‘वैरी गुड’’

‘‘यूपीएससी ने सेना के लिए इन्वैंट्री कंट्रोल अफसरों की वेकैंसी निकाली है. कौमर्स ग्रैजुएट मांगे हैं, 50 प्रतिशत अंकों वाले भी आवेदन कर सकते हैं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है.’’

‘‘फूफाजी, पापा तो मान गए हैं पर मम्मी नहीं मानतीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कहती हैं, फौज से डर लगता है. मैं ने उन को समझाया भी कि सिविल में पहले तो कम नंबर वाले अप्लाई ही नहीं कर सकते. अगर किसी के ज्यादा नंबर हैं भी और वह अप्लाई करता भी है तो बड़ीबड़ी डिगरी वाले भी सिलैक्ट नहीं हो पाते. आरक्षण वाले आड़े आते हैं. कम पढ़ेलिखे और अयोग्य होने पर भी सारी सरकारी नौकरियां आरक्षण वाले पा जाते हैं. जो देश की असली क्रीम है, वे विदेशी कंपनियां मोटे पैसों का लालच दे कर कैंपस से ही उठा लेती हैं. बाकियों को आरक्षण मार जाता है.’’

‘‘तुम अपनी मम्मी से मेरी बात करवाओ.’’

थोड़ी देर बाद शकुन लाइन पर आई, ‘‘पैरी पैनाजी.’’

‘‘जीती रहो,’’ वह हमेशा फोन पर मुझे पैरी पैना ही कहती है.

‘‘क्या है शकुन, जाने दो न इसे

फौज में.’’

‘‘मुझे डर लगता है.’’

‘‘किस बात से?’’

‘‘लड़ाई में मारे जाने का.’’

‘‘क्या सिविल में लोग नहीं मरते? कीड़ेमकोड़ों की तरह मर जाते हैं. लड़ाई में तो शहीद होते हैं, तिरंगे में लिपट कर आते हैं. उन को मर जाना कह कर अपमानित मत करो, शकुन. फौज में तो मैं भी था. मैं तो अभी तक जिंदा हूं. 35 वर्ष सेना में नौकरी कर के आया हूं. जिस को मरना होता है, वह मरता है. अभी परसों की बात है, हिमाचल में एक स्कूल बस खाई में गिर गई. 35 बच्चों की मौत हो गई. क्या वे फौज में थे? वे तो स्कूल से घर जा रहे थे. मौत कहीं भी किसी को भी आ सकती है. दूसरे, तुम पढ़ीलिखी हो. तुम्हें पता है, पिछली लड़ाई कब हुई थी?’’

‘‘जी, कारगिल की लड़ाई.’’

‘‘वह 1999 में हुई थी. आज 2018 है. तब से अभी तक कोई लड़ाई नहीं हुई है.’’

‘‘जी, पर जम्मूकश्मीर में हर रोज जो जवान शहीद हो रहे हैं, उन का क्या?’’

‘‘बौर्डर पर तो छिटपुट घटनाएं होती  ही रहती हैं. इस डर से कोईर् फौज में ही नहीं जाएगा. यह सोच गलत है. अगर सेना और सुरक्षाबल न हों तो रातोंरात चीन और पाकिस्तान हमारे देश को खा जाएंगे. हम सब जो आराम से चैन की नींद सोते हैं या सो रहे हैं वह सेना और सुरक्षाबलों की वजह से है, वे दिनरात अपनी ड्यूटी पर डटे रहते हैं.’’

मैं थोड़ी देर के लिए रुका. ‘‘दूसरे, सुरेश इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर के रूप में जाएगा. इन्वैंट्री का मतलब है, स्टोर यानी ऐसे अधिकारी जो स्टोर को कंट्रोल करेंगे. वह सेना की किसी सप्लाई कोर में जाएगा. ये विभाग सेना के मजबूत अंग होते हैं, जो लड़ने वाले जवानों के लिए हर तरह का सामान उपलब्ध करवाते हैं. लड़ाई में भी ये पीछे रह कर काम करते हैं. और फिर तुम जानती हो, जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु तक का रास्ता तय हो जाता है. जीवन उसी के अनुसार चलता है.

‘‘तो कोई डर नहीं है?

‘‘मौत से सब को डर लगता है, लेकिन इस डर से कोईर् फौज में न जाए यह एकदम गलत है. दूसरे, सुरेश के इतने नंबर नहीं हैं कि  वह हर जगह अप्लाई कर सके. कंपीटिशन इतना है कि अगर किसी को एमबीए मिल रहे हैं तो एमए पास को कोई नहीं पूछेगा. एकएक नंबर के चलते नौकरियां नहीं मिलती हैं. बीकौम 54 प्रतिशत नंबर वाले को तो बिलकुल नहीं. सुरेश अच्छी जगहों के लिए अप्लाई कर ही नहीं सकता. तुम्हें अब तक इस का अनुभव हो गया होगा शकुन, इसलिए उसे जाने दो.’’

कामयाब: एक भविष्यवाणी ने क्यों बदल दी चंचल -भाग 2

नहीं आ पाता होगा. वैसे भी एक निश्चित उम्र के बाद बच्चे अपनी ही दुनिया में रम जाते हैं तथा अपनी समस्याओं के हल स्वयं ही खोजने लगते हैं, इस में कुछ गलत भी नहीं है पर रमा की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गई. इतने जहीन और मेरीटोरियस स्टूडेंट के दिलोदिमाग में यह फितूर कहां से समा गया?

बेटी सुहासिनी की डिलीवरी के कारण 1 महीने घर से बाहर रहने के चलते ऐसा पहली बार हुआ था कि वह रमा और अभिनव से इतने लंबे समय तक मिल नहीं पाई थी. एक दिन अभिनव से बात करने के इरादे से उस के घर गई पर जो अभिनव उसे देखते ही बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाता था, उसे देख कर नमस्ते कर अंदर चला गया, उस के मन की बात मन में ही रह गई.

वह अभिनव में आए इस परिवर्तन को देख कर दंग रह गई. चेहरे पर बेतरतीब बढ़े बालों ने उसे अलग ही लुक दे दिया था. पुराना अभिनव जहां आशाओं से ओतप्रोत जिंदादिल युवक था वहीं यह एक हताश, निराश युवक लग रहा था जिस के लिए जिंदगी बोझ बन चली थी.

समझ में नहीं आ रहा था कि हमेशा हंसता, खिलखिलाता रहने वाला तथा दूसरों को अपनी बातों से हंसाते रहने वाला लड़का अचानक इतना चुप कैसे हो गया. औरों से बात न करे तो ठीक पर उस से, जिसे वह मौसी कह कर न सिर्फ बुलाता था बल्कि मान भी देता था, से भी मुंह चुराना उस के मन में चलती उथलपुथल का अंदेशा तो दे ही गया था. पर वह भी क्या करती. उस की चुप्पी ने उसे विवश कर दिया था. रमा को दिलासा दे कर दुखी मन से वह लौट आई.

उस के बाद के कुछ दिन बेहद व्यस्तता में बीते. स्कूल में समयसमय पर किसी नामी हस्ती को बुला कर विविध विषयों पर व्याख्यान आयोजित होते रहते थे जिस से बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके. इस बार का विषय था ‘व्यक्तित्व को आकर्षक और खूबसूरत कैसे बनाएं.’ विचार व्यक्त करने के लिए एक जानीमानी हस्ती आ रही थी.

आयोजन को सफल बनाने की जिम्मेदारी मुख्याध्यापिका ने चित्रा को सौंप दी. हाल को सुनियोजित करना, नाश्तापानी की व्यवस्था के साथ हर क्लास को इस आयोजन की जानकारी देना, सब उसे ही संभालना था. यह सब वह सदा करती आई थी पर इस बार न जाने क्यों वह असहज महसूस कर रही थी. ज्यादा सोचने की आदत उस की कभी नहीं रही. जिस काम को करना होता था, उसे पूरा करने के लिए पूरे मनोयोग से जुट जाती थी और पूरा कर के ही दम लेती थी पर इस बार स्वयं में वैसी एकाग्रता नहीं ला पा रही थी. शायद अभिनव और रमा उस के दिलोदिमाग में ऐसे छा गए थे कि  वह चाह कर भी न उन की समस्या का समाधान कर पा रही थी और न ही इस बात को दिलोदिमाग से निकाल पा रही थी.

आखिर वह दिन आ ही गया. नीरा कौशल ने अपना व्याख्यान शुरू किया. व्यक्तित्व की खूबसूरती न केवल सुंदरता बल्कि चालढाल, वेशभूषा, वाक्शैली के साथ मानसिक विकास तथा उस की अवस्था पर भी निर्भर होती है. चालढाल, वेशभूषा और वाक्शैली के द्वारा व्यक्ति अपने बाहरी आवरण को खूबसूरत और आकर्षक बना सकता है पर सच कहें तो व्यक्ति के व्यक्तित्व का सौंदर्य उस का मस्तिष्क है. अगर मस्तिष्क स्वस्थ नहीं है, सोच सकारात्मक नहीं है तो ऊपरी विकास सतही ही होगा. ऐसा व्यक्ति सदा कुंठित रहेगा तथा उस की कुंठा बातबात पर निकलेगी. या तो वह जीवन से निराश हो कर बैठ जाएगा या स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए कभी वह किसी का अनादर करेगा तो कभी अपशब्द बोलेगा. ऐसा व्यक्ति चाहे कितने ही आकर्षक शरीर का मालिक क्यों न हो पर कभी खूबसूरत नहीं हो सकता, क्योंकि उस के चेहरे पर संतुष्टि नहीं, सदा असंतुष्टि ही झलकेगी और यह असंतुष्टि उस के अच्छेभले चेहरे को कुरूप बना देगी.

मान लीजिए, किसी व्यक्ति के मन में यह विचार आ गया कि उस का समय ठीक नहीं है तो वह चाहे कितने ही प्रयत्न कर ले सफल नहीं हो पाएगा. वह अपनी सफलता की कामना के लिए कभी मंदिर, मसजिद दौड़ेगा तो कभी किसी पंडित या पुजारी से अपनी जन्मकुंडली जंचवाएगा.

मेरे कहने का अर्थ है कि वह प्रयत्न तो कर रहा है पर उस की ऊर्जा अपने काम के प्रति नहीं, अपने मन के उस भ्रम के लिए है…जिस के तहत उस ने मान रखा है कि वह सफल नहीं हो सकता.

अब इस तसवीर का दूसरा पहलू देखिए. ऐसे समय अगर उसे कोई ग्रहनक्षत्रों का हवाला देते हुए हीरा, पन्ना, पुखराज आदि रत्नों की अंगूठी या लाकेट पहनने के लिए दे दे तथा उसे सफलता मिलने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसे लगेगा कि यह सफलता उसे अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण मिली पर ऐसा कुछ भी नहीं होता.

वस्तुत: यह सफलता उसे उस अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण नहीं मिली बल्कि उस की सोच का नजरिया बदलने के कारण मिली है. वास्तव में उस की जो मानसिक ऊर्जा अन्य कामों में लगती थी अब उस के काम में लगने लगी. उस का एक्शन, उस की परफारमेंस में गुणात्मक परिवर्तन ला देता है. उस की अच्छी परफारमेंस से उसे सफलता मिलने लगती है. सफलता उस के आत्मविश्वास को बढ़ा देती है तथा बढ़ा आत्मविश्वास उस के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल डालता है जिस के कारण हमेशा बुझाबुझा रहने वाला उस का चेहरा अब अनोखे आत्मविश्वास से भर जाता है और वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता जाता है. अगर वह अंगूठी या लाकेट पहनने के बावजूद अपनी सोच में परिवर्तन नहीं ला पाता तो वह कभी सफल नहीं हो पाएगा.

इस के आगे व्याख्याता नीरा कौशल ने क्या कहा, कुछ नहीं पता…एकाएक चित्रा के मन में एक योजना आकार लेने लगी. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि उसे एक ऐसा सूत्र मिल गया है जिस के सहारे वह अपने मन में चलते द्वंद्व से मुक्ति पा सकती है, एक नई दिशा दे सकती है जो शायद किसी के काम आ जाए.

दूसरे दिन वह रमा के पास गई तथा बिना किसी लागलपेट के उस ने अपने मन की बात कह दी. उस की बात सुन कर वह बोली, ‘‘लेकिन अभिजीत इन बातों को बिलकुल नहीं मानने वाले. वह तो वैसे ही कहते रहते हैं. न जाने क्या फितूर समा गया है इस लड़के के दिमाग में… काम की हर जगह पूछ है, काम अच्छा करेगा तो सफलता तो स्वयं मिलती जाएगी.’’

‘‘मैं भी कहां मानती हूं इन सब बातों को. पर अभिनव के मन का फितूर तो निकालना ही होगा. बस, इसी के लिए एक छोटा सा प्रयास करना चाहती हूं.’’

‘‘तो क्या करना होगा?’’

‘‘मेरी जानपहचान के एक पंडित हैं, मैं उन को बुला लेती हूं. तुम बस अभिनव और उस की कुंडली ले कर आ जाना. बाकी मैं संभाल लूंगी.’’

नियत समय पर रमा अभिनव के साथ आ गई. पंडित ने उस की कुंडली देख कर कहा, ‘‘कुंडली तो बहुत अच्छी है, इस कुंडली का जाचक बहुत यशस्वी तथा उच्चप्रतिष्ठित होगा. हां, मंगल ग्रह अवश्य कुछ रुकावट डाल रहा है पर परेशान होने की बात नहीं है. इस का भी समाधान है. खर्च के रूप में 501 रुपए लगेंगे. सब ठीक हो जाएगा. आप ऐसा करें, इस बच्चे के हाथ से मुझे 501 का दान करा दें.’’

प्रयोग चल निकला. एक दिन रमा बोली, ‘‘चित्रा, तुम्हारी योजना कामयाब रही. अभिनव में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया. जहां कुछ समय पूर्व हमेशा निराशा में डूबा बुझीबुझी बातें करता रहता था, अब वही संतुष्ट लगने लगा है. अभी कल ही कह रहा था कि ममा, विपिन सर कह रहे थे कि तुम्हें डिवीजन का हैड बना रहा हूं, अगर काम अच्छा किया तो शीघ्र प्रमोशन मिल जाएगा.’’

सत्यकथा: समलैंगिक डॉ राखी का खौफनाक कदम

वाराणसी में कपसेठी थाना क्षेत्र के ग्रामीण इलाके मटुका (तक्खू की बावली) में तन्हा जिंदगी गुजार रही
डा. राखी वर्मा की वह रात भी करवटें बदलती गुजरी. दिमाग में तरहतरह के विचार आ रहे थे. वह अपने करिअर को ले कर चिंतित थी. उस ने होम्योपैथी में डाक्टरी की पढ़ाई पूर कर ली थी, लेकिन डाक्टरी में मन नहीं लग रहा था. वह कोई ऐसा सामाजिक काम करना चाहती थी, जिस से उस का समाज में रुतबा बने और मन को संतुष्टि भी मिले.
लेकिन उस रात बेचैनी किसी और बात को ले कर थी. मन में बारबार खास सहेली कंचन का खयाल आ रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि जिसे वह दिलोजान से चाहती है, आखिर वह उस की शादी में रोड़ा क्यों अटका रही है?
कंचन पटेल पास में रहने वाली ब्यूटीशियन थी. अपना ब्यूटीपार्लर चलाती थी. उस की अपनी छोटी सी दुनिया थी, जिस में पति के अलावा 2 छोटेछोटे बच्चे थे. उन के अलावा कोई और था तो वह थी सहेली राखी वर्मा.
दरअसल, 30 के करीब हो चुकी डा. राखी वर्मा को अपने मन के लायक एक जीवनसाथी का इंतजार था. ऐसा हमसफर, जो उस के मन को समझे, उसे तहेदिल से प्यार करे. उस की भावनाओं और विचारों का सम्मान करे. उस के हर इशारे को समझते हुए उस की सभी बातों को मानने के लिए तत्पर रहे. इन सब से बड़ी महत्त्वाकांक्षा थी कि उसे ऐसा पति चाहिए था, जो उस की सैक्स की जरूरतों को भी पूरा कर सके.
यही सब सोचसोच कर उस की रातें अकसर करवटें लेते बीतती थीं. देह की आग में वह सुलगती रहती थी. उसे वह अपनी सहेली कंचन से मिल कर शांत करने की कोशिश तो करती थी, लेकिन उस से पुरुष के देह सुख जैसा आनंद नहीं मिल पाता था, बल्कि उस की आग और भड़क जाती थी.
20 अप्रैल, 2022 की रात राखी कुछ ज्यादा ही बेचैन थी. उस के दिमाग में एक साथ कई बातें चल रही थीं. अपनी सहेली कंचन की कुछ बातों को ले कर वह गुस्से में भी थी.

हालांकि कुछ दिन पहले उस की कंचन के साथ जो बहस हुई थी, उस में गलती उसी की ही थी. इस के लिए उस ने माफी भी मांग ली थी. फिर भी राखी को बारबार यह महसूस हो रहा था कि कंचन उस का भविष्य चौपट करना चाहती है.
यही सब सोचतेसोचते उस ने मोबाइल लिया और एक वीडियो देखने लगी. मोबाइल देखते हुए कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.
अगले रोज 21 अप्रैल, 2022 को राखी की नींद काफी देर से खुली थी. घर में अकेली रहती थी. अपनी मरजी की मालकिन थी. उस के 2 भाई सूरत में रह कर प्राइवेट नौकरी करते थे.
‘अरे बाप रे! साढ़े 8 बज गए!! मोबाइल का अलार्म क्यों नहीं बजा.’ भुनभुनाती हुई रेखा अपने कपड़े दुरुस्त करने लगी, ‘अरे, मेरे कपड़े किस ने खोले? ब्रा कहां चली गई? यहां कौन आया था रात को? कोई तो नहीं, दरवाजे की कुंडी तो भीतर से लगी है.’ खुद से बड़बड़ाती हुई बैड के किनारे झांक कर देखा और
नीचे जमीन पर पड़ी ब्रा को उठा कर
पहनने लगी.
उस की नजर सामने के शीशे पर पड़ गई और अपने बदन को देख कर शरमा कर खुद से ही बोली, ‘इतनी सुंदर तो देह है मेरी… कंचन कैसे कहती है कि वह सैक्सी नहीं दिखती है. आज मैं बताती हूं उसे कि सैक्सी क्या होती है?’
इसी के साथ उस ने कंचन को फोन मिला दिया. कई बार घंटी बजने के बाद भी उस ने फोन नहीं उठाया.
‘‘लगता है पति को काम पर भेजने की तैयारी कर रही होगी,’’ बोलती हुई राखी ने फोन काट दिया और उसे चार्ज करने को लगा दिया.
थोड़ी देर में ही नहाधो कर राखी कमरे में आ गई. चार्जिंग में लगे मोबाइल को देखा. कंचन की 3 मिस काल आ चुकी थीं. उस ने तुरंत कंचन को काल कर दिया.
कंचन ने भी काल रिसीव कर लिया, ‘‘हैलो! हां राखी, बोलो. तुम को तो पता ही है सुबहसुबह बहुत काम होता है. सब के लिए नाश्तापानी बनाना होता है. पति को काम पर ले जाने के लिए अलग से कुछ पकाना होता है. खैर, बोलो किसलिए फोन किया है?’’
‘‘अरे, कोई खास बात नहीं, मन नहीं लग रहा था. बड़ी मुश्किल से रात गुजरी है. काम निपटा कर आ जा न, कुछ देर साथ बैठेंगे, गप्पें लड़ाएंगे. तुम्हें एक जरूरी बात भी बतानी है.’’

दिन के साढ़े 10 बजे के करीब कंचन राखी के पास आ गई थी. उस के आते ही राखी उस के गले लग गई. बोलने लगी. ‘‘चलो, मेरे कमरे में. घर में कोई नहीं है. हफ्तों हो गए तुम्हारे साथ एकांत में समय बिताए. तुम से बहुत बातें करनी हैं. कल तुम ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया था, वह भी तो जानना है कि आखिर तुम चाहती क्या हो?’’
‘‘लगता है, तुम आज भी मुझ से नाराज हो,’’ कंचन को न जाने क्यों
लगा कि राखी ने उसे किसी बहाने से बुलाया है.
‘‘नहीं कंचन, तुम्हारी जैसी मेरी कोई सहेली न पहले थी और न हो पाएगी. मैं भला तुम से क्यों नाराज रहने लगी. बस, एक ही बात मन में खटकती रहती है…’’
राखी की बात पूरी करने से पहले ही कंचन बोल पड़ी, ‘‘कौन सी बात?’’
‘‘वही जो तुम ने मेरे होने वाले ससुराल वालों से कही है,’’ राखी शिकायती लहजे में बोली.
‘‘तुम ने मेरी बात का गलत मतलब लगा लिया है. मैं ने तो उन्हें सिर्फ इतना कहा कि मेरी सहेली की नाक पर गुस्सा बैठा रहता है, लेकिन तुरंत वह कहां गायब हो जाता है उसे भी नहीं मालूम पड़ता. वह बहुत ही अच्छे दिल की लड़की है,’’ कंचन ने सफाई दी.
‘‘तुम्हारी इसी बात के कारण ही अब वे हम से रिश्ता नहीं करना चाहते,’’ राखी बोली.
‘‘अब देखो राखी, इस में मेरा क्या कसूर है, जो उन्होंने मेरी बात का गलत मतलब निकाल लिया. चलो, आज ही उस लड़के से मिल कर बात करती हूं. तुम भी साथ रहना.’’
‘‘और तुम ने लड़के को जो वीडियो दिखाया था, उस का क्या?’’
‘‘वीडियो? कैसा वीडियो?’’ कंचन चौंकती हुई बोली.
‘‘आयहाय! इतनी भोली मत बनो,’’ राखी बोली.
‘‘देखो, तुम मुझे गलत समझ रही हो. मैं किसी वीडियो के बारे में नहीं जानती,’’ कंचन बोली.
‘‘यह देखो, वह वीडियो तुम ने जिसे भेजा, उसी ने मुझे भेज कर शादी भी तोड़ दी,’’ राखी बोली और अपने मोबाइल में एक वीडियो प्ले कर कंचन की आंखों के सामने कर दिया.

वह वीडियो राखी और कंचन का था. वीडियो में दोनों हमबिस्तर थे. उत्तेजक सीन में उन के समलैंगिक होने के प्रमाण थे. एकदूसरे को चूमने और यौनाचार के सीन वाले करीब 5 मिनट के वीडियो में राखी की भावभंगिमा काफी आक्रामक और कामुकता वाली थी. उसे देख कर कंचन चौंकती हुई बोली, ‘‘यह वीडियो किस ने बनाया?’’
‘‘जिस ने भी बनाया गलत किया. खैर, अब छोड़. जो होना था हो गया, उसे तू ही सुधार सकती है. चल आज ही लड़के से मिल कर सब कुछ बता देते हैं,’’ राखी ने गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए कंचन को बैड पर गिरा दिया. खुद उस पर लेट गई और बेतहाशा चूमने लगी. उस के साथ छेड़छाड़ करने लगी.
‘‘अरे… अरेअरे… क्या करती हो? दिन का समय है. कोई आ जाएगा,’’ बोलती हुई कंचन राखी की पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगी.
‘‘कुछ नहीं, बस थोड़ी देर. वीडियो देखने के बाद मन नहीं मान रहा. मत रोक मुझे,’’ बेचैन हो चुकी राखी ने कंचन के कपड़े खोलने शुरू कर दिए थे.
इसी सिलसिले में उस ने कंचन के दुपट्टे को उस की आंखों पर पट्टी की तरह लपेट दिया था. तब तक कामुकता की चिंगारी कंचन की देह में भी सुलग चुकी थी. उस का प्रतिरोध ढीला पड़ गया था. उसे भी काफी दिनों बाद समलैंगिक सहेली का सैक्सी स्पर्श मिला था. यानी वह राखी के लिए समर्पण के मूड में आ चुकी थी.
अगले पल उस पर लेटी राखी उठ कर जैसे ही कंचन से अलग होने लगी, उस ने टोका, ‘‘अब आग जला कर कहां जा रही हो?’’
‘‘बस अभी आई, तुम आंखें बंद किए रहना,’’ इसी के साथ राखी कमरे से बाहर चली गई.
2 मिनट में ही पीछे हाथ किए हुए वह वापस लौट आई. आंखें मूंदे कंचन बोली, ‘‘आ गई?’’
‘‘हां, मेरी जान. और यह लो तुम्हारे लिए कुछ ले कर आई हूं.’’

उत्तर प्रदेश में वाराणसी जिले के मटुका तक्खू की बावली गांव निवासी संजय पटेल कंचन के पति हैं. वह मिर्जापुर
में भूमि परीक्षण अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं.
उस रोज 21 अप्रैल, 2022 को उन्हें औफिस जाने में देर हो चुकी थी. वह स्कूटर से अभी रास्ते में ही थे कि उन के मोबाइल की घंटी बजने लगी. उन्होंने तुरंत स्कूटर रोक कर मोबाइल देखा.
कंचन की काल थी. उन्होंने तुरंत काल रिसीव की.
‘‘हैलो भैया, मैं राखी बोल रही हूं. आप जल्दी से मेरे घर आ जाइए. कंचन भाभी की तबीयत अचानक बिगड़ गई
है. वैसे मैं ने उसे दवा दे दी है, लेकिन इमरजेंसी है.’’
कंचन के फोन से राखी का काल आने पर संजय को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. क्योंकि वही कंचन को औफिस के लिए निकलते समय स्कूटर से राखी के घर तक छोड़ गए थे. आश्चर्य तो उन्हें इस बात का था कि भलीचंगी कंचन को अचानक क्या हो गया.

इस पर ज्यादा दिमाग लगाने के बजाय वह 20 मिनट के भीतर ही राखी के घर जा पहुंचे. बाहर का दरवाजा आम दिनों की तरह भिड़ा हुआ था. कंचन के पति संजय दनदनाते हुए राखी और कंचन को आवाज लगाते हुए घर में चले गए.
कमरे में दाखिल होते ही वहां का दृश्य देख कर वह सन्न रह गए. उन्हें ऐसा लगा मानो पैरों के तले की जमीन खिसक गई हो. वह गिरतेगिरते बचे.
कमरे में डा. राखी बैड पर एक किनारे बैठी अपना खून सना हाथ साफ कर रही थी, जबकि बैड पर कंचन खून से लथपथ पड़ी हुई थी. राखी के पैर के पास ही एक फावड़ा पड़ा था, जिस पर खून लगा था. काफी खून जमीन पर भी गिरा हुआ था.
‘‘राखी, क्या हुआ कंचन को? ये खून कैसा है? किस ने किया ये सब? किस ने मारा कंचन को?’’ संजय चीखे.
‘‘मैं ने मारा,’’ धीमी आवाज में राखी बोली.
‘‘क्यों मारा इसे? इस ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा?’’ संजय गुस्से में बोले.
‘‘मेरी शादी रुकवा दी थी, इसीलिए मैं ने इसे फावड़े से काट डाला.’’
अब तक बैड पर पैर लटकाए बैठी राखी भी तेवर में आ चुकी थी.
‘‘ऐंऽऽ फावड़े से काट दिया? तुम्हारी इतनी हिम्मत, लड़की हो या कसाई?’’
यह कहते हुए संजय ने कंचन की नाक के सामने अपना हाथ ले जा कर देखा. उस की सांसें बंद थीं. तभी संजय ने जेब से मोबाइल निकाला और तुरंत पुलिस को फोन मिलाया. काल रिसीव होते ही संजय ने कहा, ‘‘हैलो पुलिस कंट्रोल रूम! जल्दी यहां आ जाइए, यहां तक्खू की बावली में एक औरत का खून हो गया है. खून करने वाली भी औरत है. वह भी यहीं है.’’ इतना कह कर उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी.
इस के थोड़ी देर बाद ही कपसेठी थाने की पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. कई पुलिस वालों को अचानक गांव में आया देख लोग भी चौंक गए. मौके पर पहुंची पुलिस ने सब से पहले हत्यारोपी सहेली डा. राखी वर्मा को हिरासत में ले लिया.
हत्या में प्रयुक्त फावड़ा पास ही पड़ा था. मृतका कंचन का शव बैड पर खून से सने अस्तव्यस्त कपड़ों में था. उस की आंखों पर दुपट्टे से पट्टी बंधी थी.

थानाप्रभारी ने इस की सूचना एडिशनल एसपी (ग्रामीण) नीरज पांडे, सीओ (बड़ागांव) जगदीश कालीरमन को भी दे दी. थोड़ी देर में वे भी मौके पर पहुंचे गए और घटना के संबंध में जानकारी ली. फोरैंसिक टीम ने सबूत जुटाने शुरू किए. प्रारंभिक काररवाई करने के बाद कंचन की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.
दिल दहला देने वाली इस घटना को अंजाम देने वाली राखी वर्मा बगैर किसी विरोध के चुपचाप पुलिस के साथ थाने चली गई. वहीं उस से पूछताछ हुई और उस के बयान नोट किए गए. राखी ने बताया कि मरने वाली कंचन पटेल (30) उस की सहेली थी.
कंचन ने अपने मकान के ही एक कमरे में ब्यूटीपार्लर खोल रखा था. उस का घर कुछ दूरी पर ही था. कंचन से उस की जानपहचान पिछले पंचायत चुनाव के दौरान तब हुई थी, जब वह ग्रामप्रधान का चुनाव लड़ी थी.
अपने बारे में राखी ने बताया कि उस के पिता बजरंगी वर्मा हैं. उस ने इलाहाबाद से बीएचएमएस की पढ़ाई की है. वह डा. राखी वर्मा है, लेकिन लोग उसे नेता के रूप में ही जानते हैं.
हालांकि प्रधान का चुनाव वह हार गई थी. चुनाव के दौरान ही कंचन और राखी के बीच नजदीकियां काफी बढ़ गई थीं. उन के बीच दोस्ती इस तरह की
बनी कि दोनों एक साथ काफी समय बिताने लगीं.
कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता था, जब वे न मिलती थीं. राखी के कंचन के परिवार से पारिवारिक संबंध बन गए थे. वह कंचन के पति को भैया कहती थी. इस तरह राखी कंचन की मुंहबोली ननद बन गई थी.
कंचन के देवर राजीव कुमार की तहरीर पर पुलिस ने राखी की मां सीमा देवी, पिता बजरंगी वर्मा, सावित्री, अमित समेत 5 जनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था.
राखी के परिजनों से हत्या का कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उस की कहीं शादी तय हो गई थी, लेकिन कंचन ने उस के ससुराल वालों से यह कह दिया था कि राखी की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं है. उस से शादी न करें.
इस की जानकारी राखी को भी हो गई थी, जिस से वह नाराज हो गई थी और घटना को अंजाम दे दिया. इस के साथ ही कुछ लोगों ने दबी जुबान में बताया कि कंचन और राखी के बीच अंतरंग संबंध थे. यानी वे लेस्बियन थीं.

कंचन के परिवार वाले उस पर दबाव डाल रहे थे कि वह राखी से दूरी बना ले, जिस कारण से कंचन ने राखी से दूरी बनानी शुरू कर दी थी. राखी एक विक्षिप्त मानसिकता की लड़की थी. वह हर बात को नकारात्मक तरीके से सोचती थी और बातबात पर उग्र हो जाती थी.
कई बार उस के स्वभाव को ले कर कंचन राखी को डांट भी लगा चुकी थी. पुलिस ने कंचन और राखी के बीच समलैंगिक संबंध के बारे में संजय पटेल से पूछा तो उन्होंने भी इसे दबी जुबान से स्वीकार कर लिया.
इसी के साथ उस ने यह भी बताया कि उस की पत्नी को समलैंगिक बनाने में राखी का ही हाथ है. वह पहले ऐसी नहीं थी. उस की वजह से कंचन से उस के अंतरंग संबंधों पर भी फर्क पड़ गया था.
उस से छुटकारा दिलाने के लिए उस ने दोनों के अंतरंग सीन का चोरीछिपे वीडियो बनाया था और वह वीडियो राखी को भेज कर चेतावनी दी थी कि वह कंचन के साथ संबंध खत्म कर ले वरना उस के होने वाले ससुराल वालों को इस बारे में बता देगा.
हालांकि इस के पीछे उस की मंशा बुरी नहीं थी. वह चाहता था कि राखी सामान्य जीवन गुजारे और नए बनने वाले वैवाहिक जीवन को अच्छी तरह से गुजारे.
लेकिन राखी ने इस का गलत अर्थ लगा लिया. उस ने सोचा कि कंचन ने उस की शादी बिगाड़ने का प्रयास किया. इसी बात से नाराज हो कर उस ने कंचन को मौत के घाट उतार दिया था. हत्या करने के तरीके के बारे में राखी ने पुलिस को जो बताया, वह भी कुछ कम हैरान करने वाला नहीं है.

पुलिस के सामने अपना जुर्म कुबूल करते हुए उस ने बताया कि इस की योजना वह महीने भर से बना रही थी. इस का खुलासा क्राइम ब्रांच की टीम द्वारा राखी के मोबाइल की जांच करने पर हुआ.
मोबाइल खंगालने पर पुलिस ने पाया गया कि एक माह से राखी यूट्यूब पर फावड़े से हत्या करने का वीडियो खोज रही थी. तफ्तीश में यह बात सामने आई कि घटना के दिन कंचन जब उस के घर पहुंची तो उस ने वीडियो से सीखे तरीके का इस्तेमाल बड़ी सफाई से कर लिया.
बैड पर लेटी कंचन की आंखों पर पट्टी बंधी थी. उसे इस का जरा भी अहसास नहीं था कि राखी उस के साथ क्या विश्वासघात करने वाली है. राखी ने फावड़े से कंचन का गला काट डाला था.
उस ने यह भी स्वीकार कर लिया कि कंचन और उस के बीच समलैंगिक संबंध थे और उसी दौरान एक आपत्तिजनक वीडियो कंचन के घर वालों के हाथ लग गया. वीडियो के आधार पर कंचन के परिजन उसे ब्लैकमेल कर रहे थे.
उसी वीडियो के चलते उस की शादी भी टूट गई थी. वह मानसिक तौर पर प्रताडि़त हो रही थी. इसी वजह से उस ने एक महीने पहले ही कंचन की हत्या की योजना बना ली थी.
डा. राखी वर्मा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस को प्रारंभिक जांच में इस हत्याकांड में अन्य नामजद लोगों की संलिप्तता नहीं दिखी.
आगे की तफ्तीश में नामजद लोगों के खिलाफ सबूत मिलने पर पुलिस उन के खिलाफ भी कानूनी काररवाई अमल में लाएगी.

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सत्यकथा: जुर्म बन गया नादान प्यार

नाबालिग कविता पर इश्क का जुनून सवार था. परिवार से दूर, मजे की जिंदगी और सैक्सी दिखने की चाहत उसे ले डूबी. किशोरावस्था में ही वह 2 प्रेमियों के बीच में फंस गई थी. उस की नादानी का प्यार ऐसा जुर्म बना कि…कविता 3 बहनों में सब से छोटी मात्र 16 साल की थी. स्वभाव से चंचल और अपनी मनमरजी वाली बातूनी लड़की. चेहरे पर मासूमियत और तीखे नयननक्श उस की सुंदरता को दर्शाते थे. जबकि अच्छा कद और उन्नत उभारों के साथ भरीपूरी देह के कारण वह 19-20 की दिखती थी.

2 बड़ी बहनों में वह सब से बड़ी बहन सरिता के साथ देहरादून में ही रहती, जबकि मंझली बहन कुसुम पौड़ी में रह कर प्राइवेट नौकरी कर रही थी. कविता दोनों बहनों की लाडली थी. उसे सरिता ने अपने पास 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के लिए रखा हुआ था. वह चाहती थी कि उस का एडमिशन देहरादून के मैडिकल कालेज में हो जाए. वह मंसूरी में जौब करती थी और देहरादून से रोज आनाजाना करती थी.
कविता फोन के जरिए दोनों बहनों के संपर्क में रहती थी. तीनों बहनों की रोज एक बार फोन से बात हो जाती थी. उन के मांबाप और परिवार के दूसरे सदस्य पौड़ी में ही रहते थे.

भोलीभाली मासूम दिखने वाली कविता ने ऐसा कारनामा कर दिया था, जिस के चलते वह 27 मार्च को देहरादून के रायपुर थाने में लाई गई थी. उसे एसपी (सिटी) सरिता डोवाल के निर्देश पर थानाप्रभारी आशीष रावत और महिला इंसपेक्टर भावना कर्णवाल ने हिरासत में लिया था.

कविता और उस के दोस्त आकाश पर हत्या जैसे संगीन आरोप लगे हुए थे, जबकि बहनों पर सच्चाई छिपाने की शिकायत थी. पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार वह पिछले 10 दिनों से लापता थी और अपनी बहन कुसुम के साथ मिल कर पुलिस की आंखों में धूल झोंक रही थी.मुखबिर की सूचना के आधार पर वह राजपुर क्षेत्र में अपनी बहन के घर में छिपी हुई थी. वहीं उस का दोस्त आकाश भी था. कविता के अलावा दोनों बहनों और आकाश को थाने लाया गया था.

डोवाल ने एसएसआई आशीष रावत को उन से पूछताछ करने के निर्देश दिए थे. पूछताछ की शुरुआत कविता से हुई थी.अपनी बात पर अड़ी कविता पुलिस को इधरउधर की बातों में उलझाने की कोशिश कर रही थी. पुलिस को पूछताछ में मदद नहीं करने पर लेडी इंसपेक्टर भावना कर्णवाल ने एक तमाचा जड़ते हुए पूछा, ‘‘तुम ने अपने प्रेमी को क्यों मारा?’’‘‘मैं ने नहीं मारा उसे…’’ कविता तपाक से बोल पड़ी.
‘‘मैं पूछ रही हूं क्यों मारा? …और तुम आधे घंटे से एक ही रट लगाए हुए हो, मैं ने नहीं मारा… मैं ने नहीं मारा…’’ भावना कर्णवाल तेज आवाज में बोलीं.कविता बुत बनी रही. उस के कुछ नहीं बोलने पर थानाप्रभारी आशीष रावत बोलने लगे, ‘‘लगता है फिर झापड़ खाने का इरादा है. इस बार डंडे भी लगेंगे. देखो मैडम, तुम्हारे लिए ही खास डंडा ले कर आई है. रबड़ की है टूटेगी नहीं. जोरदार चोट लगेगी.’’

रबड़ का डंडा सुनते ही कविता बोल पड़ी, ‘‘बताती हूं…बताती हूं…लेकिन पहले इस से भी तो पूछो…’’ यह कहती हुई कविता ने एक कोने में जमीन पर बैठे आकाश की ओर हाथ उठा कर इशारा किया.‘‘उस से भी पूछताछ होगी, लेकिन तुम्हारे सामने नहीं,’’ रावत ने कहा.‘‘तो मुझ से सब के सामने क्यों पूछताछ हो रही है?’’ कविता ने तर्क दिया.‘‘अच्छा तो यह बात है. चलो जाओ, उस चैंबर में वहां कोई नहीं है. तुम से वही झापड़ लगाने वाली पुलिस अधिकारी तुम्हारे मुंह से सब कुछ उगलवाएंगी. सचसच बताना. तुम्हारा यही बयान नोट कर मजिस्ट्रैट को सौंपा जाएगा.’’ रावत ने यह कहते हुए कविता को भावना कर्णवाल के हवाले कर दिया और आकाश को पूछताछ के लिए अपने सामने बैठा लिया, ‘‘चल तू बता, कविता का पहला प्रेमी तू है या वह, जो मारा गया?’’

‘‘जी, वही था,’’ आकाश बोला.रावत आकाश से पूछताछ करने लगे और दूसरी तरफ उसी वक्त कविता अपने अपराध की दास्तान सुनाने लगी. उस के एकएक शब्द को इंसपेक्टर ने रिकौर्ड करने के लिए मोबाइल औन कर दिया था. साथ ही डायरी में भी लिखती जा रही थीं. उस के अनुसार कविता, आकाश और लापता युवक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

देहरादून में कविता कहने को तो 12वीं की पढ़ाई करने और मैडिकल की तैयारी के लिए आई थी, लेकिन वह प्रेम का पाठ पढ़ने लगी थी. उसे परिवार और मांबाप से अलग खुला आसमान मिल गया था. खानेपहनने से ले कर घूमनेफिरने की भी वह शौकीन थी. जहां जी में आता था, घूमने निकल जाती थी.
मौल, बाजार, पार्क, फूड कार्नर से ले कर सिनेमा घर तक हो आती थी. इसी दरम्यान उस की मुलाकात एक रोज हमउम्र नरेंद्र उर्फ बंटी से हो गई थी.

नरेंद्र की मिठाई और चाट गोलगप्पे की दुकान थी. उस की दुकान पर चाट खाने के लिए छात्रछात्राओं की भीड़ लगी रहती थी. उस में लड़कियां ही अधिक होती थीं.नरेंद्र वैसे तो मिठाई के काउंटर पर ही बैठता था, लेकिन शाम के वक्त गोलगप्पे के काउंटर पर खुद आ जाता था. लड़कियां उस के गोलगप्पे खिलाने के तरीके और बीचबीच में कमेंट करने के काफी मजे लेती थीं.वह बड़े प्यार से गोलगप्पे का नाम सिनेमा के हीरो और हीरोइनों के नाम पर ग्राहकों के दोने में डालते हुए जब कभी कहता, ‘यह आ गया पुष्पा गोलगप्पा… न फूटेगा, न टूटेगा और न झुकेगा. फायर है फायर, फ्लावर मत समझना.’
संयोग से जब कभी वही गोलगप्पा फूट जाता था, तब सभी ग्राहक लड़कियां खिलखिला कर हंस पड़ती थीं. कविता भी अकसर वहां आती थी.

किसी का गोलगप्पा फूट जाने पर नरेंद्र उस के बदले मुफ्त में दूसरा गोलगप्पा दे देता था. उस की दुकान पर भीड़ जुटने का एक कारण यह भी था. कविता उस की इसी आदत की कायल हो गई थी.
अधिक गोलगप्पे खाने के लिए जानबूझ कर नाखून से फोड़ देती थी और मुफ्त का गोलगप्पा मांगने लगती थी. कई बार इसे ले कर उस की नरेंद्र से बहस भी हो जाती थी.एक दिन तो कविता ने हद ही कर दी. उस ने 3-3 गोलगप्पे फोड़ डाले. इस पर नरेंद्र भड़क उठा. गुस्से में बोला, ‘‘एक टोकन पर सिर्फ एक के फूटने पर ही एक्स्ट्रा मिलेगा…’’

उस दिन बात बहुत बढ़ गई थी और उन के बीच तूतूमैंमैं होने लगी. उसे एक बुजुर्ग महिला ग्राहक ने संभाला. कविता को समझाया, ‘‘बेटा उस का बिजनैस है. हमेशा मुफ्त ही देगा, तब उस का तो धंधा ही चौपट हो जाएगा. तुम भी संभल कर खाया करो न.’’कविता ने भुनभुनाते हुए एक्सट्रा गोलगप्पे के पैसे दिए और पैर पटकती जातेजाते बोल गई, ‘‘तुम्हारी दुकान पर अब नहीं आऊंगी कभी.’’
नरेंद्र उसे मटकती हुई जाते देखता रहा. उस रोज बात आईगई हो गई. एक ग्राहक के मना करने से नरेंद्र के बिजनैस पर कोई असर नहीं पड़ा. दरअसल गलती कविता की थी.

3 दिन बाद शाम को कविता दुकान पर 3-4 लड़कियों के पीछे अपनी बारी के इंतजार में खड़ी थी. हाथ में 30 रुपए का टोकन था. अचानक उस पर नरेंद्र की नजर पड़ी. संयोग से उस ने भी उसी वक्त नरेंद्र को देखा. दोनों की नजरें टकरा गईं.नरेंद्र ग्राहकों को गोलगप्पे देने में व्यस्त हो गया, जबकि कविता झेंप गई. जबकि पहले तो ‘पहले मुझे… पहले मुझे…’ का शोर मचाती रहती थी.
खैर, जल्द ही उस की बारी भी आ गई. उस ने चुपचाप अपना टोकन आगे बढा दिया. टोकन देख कर नरेंद्र ने मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘क्या बात है, 30 रुपए का टोकन. लगता है आज 3 दिनों की कसर एक बार में निकाल लोगी.’’

‘‘मुझे गोलगप्पे नहीं खाने हैं. पापड़ी चाट बना दो, दही पूरा डालना.’’ कविता धीमे से बोली.
‘‘कोई बात नहीं आज भी गुस्से में हो, उस दिन का गुस्सा गोलगप्पे पर क्यों उतार रही हो. बेचारा तो ऐसे ही फूटताटूटता रहता है. आज आलिया भट्ट गंगूबाई गोलगप्पा खिलाऊंगा. चाट के साथ 3 फ्री में.’’ नरेंद्र ने एक और चुटकी ली. इस पर कविता की हंसी फूट पड़ी.‘‘हंसी तो… आगे नहीं बोलूंगा, फिर नाराज हो जाओगी. यह लो पहले चाट खाओ, मिर्च कितनी डालूं. तीखी बनाऊं या नारमल…’’ नरेंद्र बोला.
‘‘भैया, तुम ने तो मुझे गंगूबाई गोलगप्पा नहीं खिलाया?’’ एक ग्राहक बोल पड़ी.

‘‘आप ने पापड़ी चाट भी तो नहीं लिया, आलिया पापड़ी जैसी चिपटी है न, इसलिए उस के साथ फ्री है,’’ यह सुन कर दूसरे ग्राहक हंस पड़े. कविता भी खिलखिला कर हंस दी.
उस रोज नरेंद्र ने न केवल बड़े प्यार से कविता को चाट खिलाई, बल्कि वादे के मुताबिक फ्री में 3 गोलगप्पे भी खिला दिए.उस के जाने से पहले कान के पास मुंह ले जा कर धीमी आवाज में बोला, ‘‘मैं दिल का बुरा नहीं हूं, दुकान पर आती रहा करो. तुम बहुत अच्छी लड़की हो.’’कविता पूरे रास्ते नरेंद्र की बातों का मतलब निकालती घर आ गई. रसोई में खाना पकाते समय भी उस की वही बातें दिमाग में चलती रहीं. यहां तक कि उस रोज पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था. वह सोच में पड़ गई कि नरेंद्र ने क्यों कहा कि दिल का बुरा नहीं हूं. दुकान पर आती रहना. तुम अच्छी लड़की हो.

दरअसल, कविता के दिल को नरेंद्र की बातें छू गई थीं. रात बेचैनी में कटी. अगले रोज दोपहर ढलने के बाद ही नरेंद्र की दुकान पर जा पहुंची. नरेंद्र उस समय चाट और गोलगप्पे की दुकान लगाने की तैयारी में लगा हुआ था. दुकान पर इक्कादुक्का ग्राहक ही थे. वे मिठाई खरीद रहे थे. नरेंद्र की नजर कविता पर पड़ी, चौंकते हुए उस ने पूछा, ‘‘इतना पहले! अभी तो दुकान लगने में समय है. मसाला पानी तैयार किया जा रहा है.’’‘‘कुछ नहीं इधर से गुजर रही थी, सोचा तुम से मिलती जाऊं,’’ कविता बोली.
‘‘मुझ से मिलती जाऊं? मुझ से?’’ नरेंद्र आश्चर्य से बोला.

‘‘हां, क्यों नहीं! और शाम को तो बहुत बिजी रहते हो. दरअसल, मैं कई दिनों से तुम्हारे गोलगप्पे के पानी के मसाले के बारे में पूछना चाह रही थी. और….’’ कविता के बात पूरी करने से पहले ही नरेंद्र चुटकी लेता हुआ बोल पड़ा, ‘‘… और क्या? मेरी दुकान के बगल में दुकान खोलने का इरादा तो नहीं है?’’
यह सुन कर कविता हंस पड़ी.‘‘तुम्हारी यही हंसी तो मुझे अच्छी लगती है. उस रोज न जाने मुझे क्या हो गया था, जो तुम्हें काफी भलाबुरा कह दिया था,’’ नरेंद्र बोला.
‘‘उस रोज गलती मेरी ही थी, मैं उस के लिए भी सौरी बोलती हूं.’’

दुकान के भीतर से ‘बंटी…बंटी…’’ की आवाज आते ही नरेंद्र बोल पड़ा, ‘‘हांजी, अभी आया…’’
‘‘अच्छा तो तुम्हारा नाम बंटी है? तुम्हें कौन पुकार रही है?’’ कविता आश्चर्य से बोली.
‘‘मेरी मम्मी है. भीतर किचन में गोलगप्पे तल रही हैं. मैं और मम्मी ही दुकान चलाते हैं.’’
‘‘और पिताजी?’’ कविता पूछी.‘‘वहां हैं दीवार पर फोटो में माला से आधे ढंक गए हैं.’’ मिठाई के काउंटर के पीछे दीवार पर लगी तसवीर की ओर इशारा कर बोला.नरेंद्र उर्फ बंटी के पिता का नाम अमर सिंह था. उन का कुछ साल पहले बीमारी से निधन हो गया था. वह नालापानी रोड थाना डालनवाला के निवासी थे.

उस के बाद नरेंद्र और कविता ने कब एकदूसरे के दिल में जगह बना ली, उन्हें पता ही नहीं चल पाया. वे समय निकाल कर डेटिंग पर भी जाने लगे. वैसे कविता नियमित उस की दुकान पर आने लगी.
यहां तक कि उस के कामकाज में भी हाथ बंटाने लगी. दोनों के दिल में प्यार फूलनेफलने लगा. वे एक रोज भी मिले बगैर नहीं रह पाते थे.

नरेंद्र कविता के शौक पूरे करने पर भी विशेष ध्यान देने लगा. दोनों साथसाथ घूमने जाने लगे. नरेंद्र उसे गिफ्ट भी देने लगा, उस का गिफ्ट पा कर कविता निढाल हो जाती थी, लेकिन महत्त्वाकांक्षी कविता की नरेंद्र से उम्मीदें बढ़ने लगी थीं.दूसरी तरफ नरेंद्र उस के यौनाकर्षण में बंध गया था. उस के पहनावे की तारीफ करता रहता था. मौका पा कर शरीर को छू लेता था. गाल, गरदन और पीठ सहला लेता था.
जब कभी पीठ सहलाते हुए नरेंद्र के हाथ कमर के नीचे तक चले जाते थे, तब कविता प्यार से उस का हाथ हटा देती थी. यहां तक कि नरेंद्र उसे अकेला पा कर चूमने की भी कोशिश कर चुका था.

इसी साल वैलेंटाइन डे के मौके पर नरेंद्र ने टहनी समेत गुलाब हाथ में देने के बजाय सीधा उस के स्तनों के बीच डाल दिया था और किस करने के लिए उस के चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया. इस तरह की अचानक घटना के लिए कविता जरा भी तैयार नहीं थी. वह नाराज हो गई, ‘‘ये क्या बदतमीजी है?’’
‘‘अरे आज वैलेंटाइन डे है, प्रेमियों का दिन.’’ नरेंद्र बोला.

‘‘वैलेंटाइन का मतलब तुम कुछ भी करोगे? मुझे यह सब हरकत पसंद नहीं. मैं देख रही हूं कि पिछले कई दिनों से तुम्हारी नजर बदल गई है.’’ कविता नाराजगी दिखाते हुई बोली.
‘‘अरे, मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हूं, तुम्हें चाहता हूं, तुम आज बहुत सैक्सी दिख रही थी, मन मचल गया तो मैं क्या करूं?’’ नरेंद्र बोला.‘‘तो… जो तुम्हारे जी में आएगा, वह करोगे? मुझे बुरी नजरों से घूरोगे, मेरे कपड़े के भीतर हाथ डालोगे, कमर पकड़ोगे? कल को तो तुम मेरे जींस में भी हाथ डाल दोगे और मैं बरदाश्त कर लूंगी, इस गलतफहमी में मत रहना…’’ कविता बोलती चली जा रही थी, ‘‘माना कि मुझे सैक्सी दिखने का शौक है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि तुम मेरे शरीर को छेड़ो, रेप करने की कोशिश करो…’’

‘‘तुम तो बात का बतंगड़ बना रही हो, रेप तक की बात कहां से आ गई. किस करना रेप है क्या?’’ नरेंद्र सहमता हुआ बोला.‘‘और नहीं तो क्या है? हम अभी प्रेमी हैं और कुछ नहीं. समझे मिस्टर नरेंद्र,’’ कविता डपटते हुए बोली.‘‘कल को पतिपत्नी बन जाएंगे,’’ नरेंद्र बोला.‘‘कल किस ने देखा है. मेरी इज्जत तो आज चली जाएगी,’’ कविता की आवाज और तेज हो गई थी.उस ने वहीं गुलाब के फूल को पैरों तले कुचल डाला. उस के गिफ्ट का पैकेट फेंक दिया और तेजी से सड़क पार कर गई. घर आ कर ही उस ने सांस ली.एक गिलास पानी पी कर मोबाइल फोन पर फेसबुक स्क्राल करने लगी. अपना अकाउंट खोल कर लिखने लगी, ‘‘आज मूड औफ हो गया, कोई बताएगा क्या करूं?’’

इस पोस्ट के आधे घंटे के भीतर कविता के फोन पर काल आया. फोन करने वाले का नाम आकाश था. कविता ने तुरंत काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हां आकाश, तुम कहां हो, तुम से अभी मिलना चाहती हूं.’’
‘‘क्यों, क्या हुआ? तुम बहुत परेशान दिख रही हो. तुम ने फेसबुक पर निराशा वाला पोस्ट क्यों डाला है, वह भी आज वैलेंटाइन डे के दिन. सब कुछ ठीक तो है न?’’ आकाश चिंता जताते हुए बोला.
‘‘मिलोगे तब बताऊंगी,’’ कविता उदासी से बोली.

आकाश ने ही मिलने की जगह बताई. शाम के समय पहले दोनों एक फूड कौर्नर पर मिले. उस के बाद बसस्टैंड के कोने में चले गए. वे जानते थे कि पार्क में प्रेमी युगलों की भीड़ होगी. बैठने की जगह नहीं मिलेगी.कविता ने आकाश को नरेंद्र के बारे में पूरी बात विस्तार से बताई. उस की हरकतों से अपनी परेशानी बताई. साथ ही उस ने बताया कि उस से पीछा छुड़ाना चाहती है, कोई उपाय बताए.
आकाश चुपचाप उस की बात सुनता रहा. उस समय तो उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन कविता को भरोसा दिया कि वह उस की भलाई के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य निकाल लेगा. आकाश की बातों ने कविता के दुखे दिल पर मरहम का काम किया, लेकिन नरेंद्र से छुटकारा पाने का वह भी कोई रास्ता निकालने के बारे में सोचने लगी.

22 साल का आकाश देहरादून में ही चावला चौक करनपुर थाना डालनवाला का निवासी था. उस के पिता सुरेंद्र पिछले 6 महीने से लापता थे. उस की महाराणा प्रताप चौक पर अंबे टायर सर्विस नाम की दुकान है. उस के घर में मां के अलावा 4 भाई व 2 बहनों का भरापूरा परिवार है.
आकाश की कविता से जानपहचान फेसबुक के जरिए हुई थी. जल्द ही उन के बीच फोन पर बात होने लगी और वे मिलनेजुलने भी लगे.

कविता को आकाश नरेंद्र की तुलना में ज्यादा सभ्य और समझदार लगता था. धीरेधीरे वह आकाश से प्रेम करने लगी. इस की जानकारी उस ने अपनी बहन कुसुम को भी दी थी.
कुसुम भी आकाश से मिल चुकी थी. उसे भी आकाश अच्छा लड़का लगा था. कविता को उस से मिलनेजुलने का विरोध नहीं किया. संयोग से वह सजातीय भी था. कुसुम चाहती थी कि कविता अपना करिअर तय होने के बाद ही उस से शादी करे, लेकिन नरेंद्र से छुटकारा पाने के लिए कविता जल्द शादी करना चाहती थी.

जब नरेंद्र को आकाश के बारे में जानकारी हुई, तब वह कविता को बदनाम करने की कोशिश में लग गया. वह कविता को मोहल्ले में बदनाम करने की ताक में रहता था. इसी आड़ में उस के साथ सैक्स संबंध बनाने की कोशिश करने लगा था. नरेंद्र नहीं चाहता था कि कविता की शादी आकाश से हो.
आकाश को जब नरेंद्र की हरकत के बारे में पता चला, तब उस से मिल कर उसे काफी समझाया. उस के रास्ते से हट जाने के लिए कहा. फिर भी नरेंद्र अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. उलटे उस ने फेसबुक पोस्ट के जरिए उसे ही बदनाम करने की धमकी दे डाली.

नरेंद्र की दी गई धमकी कविता और आकाश के दिल में चुभ गई. दोनों ने मिल कर एक योजना बनाई. उस के मुताबिक कविता ने 16 मार्च, 2022 को नरेंद्र से बात करने के लिए अपने घर बुलाया.
उस ने बहाना बनाया कि बड़ी बहन की शादी की बात करना चाहती है. कविता ने नरेंद्र के आने से पहले ही आकाश को अपने कमरे में छिपा लिया था.

नरेंद्र शाम को करीब साढ़े 7 बजे आ गया था. उस ने शराब पी रखी थी. कमरे में आते ही बैड पर लेट गया. तभी कविता भी उस की बगल में आ कर बैठ गई. नरेंद्र से बातें करने लगी. वह नरेंद्र का हाथ पकड़ कर उठाने लगी. अधलेटा नरेंद्र बैड पर ही बैठ गया.

मौका देख कर आकाश पीछे से दबेपांव आया और नरेंद्र के गले में बेल्ट कस दी. नरेंद्र झटके के साथ बैड पर गिर गया. उस ने अपने हाथों से बेल्ट निकालने की कोशिश की. तब तक कविता ने उस के हाथ पकड़ लिए थे.जल्द ही नरेंद्र बेजान हो गया था. उस की नाक से खून निकल आया. बेहोश नरेंद्र के मुंह पर आकाश ने जोर का घूंसा मारा. जब नरेंद्र की सांसें चलनी बंद हो गईं, तब दोनों ने मिल कर उस की लाश बोरे में भर दी.

लाश को जंगल में ठिकाने लगाने की उन की योजना थी, लेकिन उसे वहां तक ले जाने की समस्या आ गई थी. कारण आकाश के पास बुलेट मोटरसाइकिल थी. अगर उस पर रात में लाश ले जाता तो बुलेट की आवाज से पहचान हो सकती थी. इसलिए रात भर लाश कमरे में ही रखी रही. अगले रोज 17 मार्च, 2022 की सुबहसुबह आकाश अपनी बहन के घर जा कर उन की स्कूटी ले आया.स्कूटी पर नरेंद्र की लाश के बोरे को सामान की तरह लाद लिया और आमवाला ननूरखेड़ा होता हुआ तपोवन रोड पर लगभग 300 मीटर जंगल में अंदर चला गया. साथ में कविता भी थी. वहीं आकाश ने पहले से ही एक गड्ढा खोद रखा था. उन्होंने नरेंद्र की लाश गड्ढे में दबा दी. उस के बाद वे दोनों देहरादून से फरार हो गए.

उधर कविता कमरे पर नहीं दिखी तो बड़ी बहन कुसुम ने देहरादून आ कर कविता की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी. थाने में उस ने लिखवाया कि कविता 17 मार्च से लापता है और उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ है.कविता की गुमशुदगी की सूचना के आधार पर देहरादून पुलिस ने कविता की तलाश शुरू कर दी. कविता की बहनों को यह नहीं मालूम था कि नरेंद्र की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी 17 मार्च को ही लिखवाई जा चुकी थी. पुलिस दोनों लापता को मिला कर जांच में जुट गई थी. दोनों की तसवीरें थाने में जमा की जा चुकी थीं.

पुलिस ने दोनों लापता कविता और नरेंद्र को सोशल मीडिया पर खंगालना शुरू किया. उन के फोन नंबरों से एक ही प्रोफाइल में दोनों के एक साथ की तसवीरें मिल गईं. इस से दोनों के बीच जानपहचान होने का पता चल गया. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि मामला प्रेम संबंध में फरार प्रेमी युगल का है.
पुलिस को यह मामला बहुत अधिक संदिग्ध नहीं लगा, क्योंकि अकसर ऐसे प्रेमी कुछ रोज में खुद ही वापस आ जाते हैं. फिर भी उन के साथ कुछ भी अप्रत्याशित घटना हो सकती है, इसे ध्यान में रख कर उन के घरों के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकाले गए और मुखबिर भी लगा दिए गए. साथ ही कविता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स भी निकाली गई.

कविता की गुमशुदगी भादंवि की धारा 365 में तरमीम कर दी गई थी. इस की जांच पुलिस चौकी मयूर विहार के इंचार्ज अर्जुन सिंह गुसाईं कर रहे थे. उन्होंने अब तक की जांच प्रगति से सीओ अनिल जोशी समेत एसपी (सिटी) सरिता डोवाल को भी अवगत करा दिया था. जांच के सिलसिले में 4 दिनों के बाद थानेदार अर्जुन सिंह गुसाईं द्वारा कविता के घर के आसपास लगे 37 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक किए गए थे.

जब एसएसआई आशीष रावत द्वारा कविता के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक की गई, तब एक चौंकाने वाली जानकारी मिली कि मोबाइल भले ही स्विच्ड औफ था, मगर उस के मोबाइल से रोज मैसेज उस की बहन के मोबाइल पर भेजे जा रहे थे.

मुखबिर ने भी कविता के बारे में एक महत्त्वपूर्ण सूचना दी कि पिछले कुछ दिनों तक कविता एक युवक आकाश के साथ कई बार देखी जा चुकी थी. पुलिस के सामने अब मामला गंभीर लगा. क्योंकि अब तक पुलिस लापता नरेंद्र के साथ लापता कविता को जोड़ कर देख रही थी, उस में एक ट्विस्ट भी था. आकाश भी 17 मार्च से शहर में नहीं देखा गया था. उस के परिवार वाले भी उस के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दे पाए थे. इस तरह नरेंद्र, आकाश और कविता तीनों ही देहरादून से लापता चल रहे थे.
यह सूचना पा कर सरिता डोवाल का माथा ठनका. उन्हें लगा कि इस मामले में दाल में काला जरूर है. जांच से मिले सभी तरह की जानकारियों की कडि़यां नए सिरे से जोड़ी जाने लगीं.

इसी बीच 5वें दिन मुखबिर से कविता के आकाश के घर पर होने की सूचना मिली. और फिर उन्हें बगैर देरी किए हिरासत में ले लिया गया.
पूछताछ में कविता और आकाश ने बताया कि नरेंद्र की लाश को ठिकाने लगा कर कुछ सामान और रुपए ले कर दोनों बस से हरिद्वार चले गए थे. वहां एक दिन रह कर दोनों ट्रेन से दिल्ली चले गए. दिल्ली में 2 दिन ठहरने के बाद वे ट्रेन से असम निकल भागे. वहां 3 दिन रहने के बाद वे वापस देहरादून लौट आए. उन्हें लगा कि अब मामला निपट गया होगा, लेकिन यह उन की भूल थी.
कविता और आकाश ने नरेंद्र की लाश बरामद करवाने में पुलिस की मदद की और झाडि़यों में फेंकी बेल्ट के बारे में बता दिया. आकाश और कविता द्वारा नरेंद्र की लाश, उस की हत्या में इस्तेमाल की गई बेल्ट, आकाश का सैमसंग मोबाइल फोन तथा लाश को ले जाने वाला बोरा भी बरामद कर लिया गया.
पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर वह पोस्टमार्टम के लिए कोरोनेशन अस्पताल देहरादून भेज दी. नरेंद्र की गुमशुदगी थाना डालनवाला में दर्ज थी. वहां उस की हत्या की सूचना भेज दी गई.

थाना डालनवाला के एसएसआई महादेव उनियाल ने इस मामले में आईपीसी की धाराएं 302, 201 व 34 और बढ़ा दीं तथा उन्होंने आरोपियों आकाश व कविता को न्यायालय के समक्ष पेश कर दिया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नरेंद्र उर्फ बंटी की मौत का कारण गला घोटना बताया गया. कथा लिखे जाने तक आकाश जेल में और कविता बाल सुधार गृह में थी.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कविता परिवर्तित नाम है.

आशियाना: क्यों अपने ही आशियाने की दुश्मन बन बैठी अवनी – भाग 2

‘‘नहीं मधु, मुझे पैसे की जरूरत नहीं है, मेरा काम अच्छी तरह से चल जाता है.’’

‘‘ठीक है आंटी, लेकिन आप का मन अच्छा रहेगा तो आप शारीरिक रूप से भी स्वयं को स्वस्थ महसूस करेंगी.’’

‘‘ठीक है, देखती हूं.’’

‘‘बस, आंटी, बाकी काम अब मुझ पर छोड़ दीजिए,’’ कह कर मधु चली गई.

4 दिन बाद ही मधु एक बोर्ड बनवा कर लाई जिस पर लिखा था, ‘आशियाना.’ और नंदिता को दिखा कर बोली, ‘‘देखिए आंटी, आप का खालीपन मैं कैसे दूर करती हूं. अब आप के आसपास इतनी चहलपहल रहेगी कि आप ही शांति का एक कोना ढूंढें़गी.’’

नंदिता मुसकरा दीं, अंदर गईं, वापस आ कर मधु को कुछ रुपए दिए तो उस ने नाराजगी से कहा, ‘‘आंटी, आप के लिए मेरी भावनाओं का यही महत्त्व है?’’

‘‘अरे, बेटा, बोर्ड वाले को तो देने हैं न? उसी के लिए हैं. तुम्हारी भावनाओं, प्रेम और आदर को मैं किसी मूल्य से नहीं आंक सकती. इस वृद्धा के जीवन के सूनेपन को भरने के लिए तुम्हारे इस सराहनीय कदम का कोई मोल नहीं है.’’

‘‘आंटी, आप ऊपर के कमरे साफ करवा लीजिए. अब मैं चलती हूं, बोर्ड वाले को एक बोर्ड पिंकी के कालेज के पास लगाने को कहा है और यह वाला बोर्ड बाहर लगवा दूंगी,’’ मधु यह कह कर चली गई.

नंदिता ने पता नहीं कब से ऊपर जाना छोड़ा हुआ था. ऊपर बेटों के कमरों को बंद कर दिया था. आज वे ऊपर गईं, कमरे खोले तो पुरानी यादें ताजा हो आईं. राधा के साथ कमरों की सैटिंग ठीक की, साफसफाई करवाई और फिर नीचे आ गईं.

एक हफ्ते बाद पिंकी आई तो उस के साथ 2 लड़कियां और 1 महिला भी आई. पिंकी बोली, ‘‘आंटी, ये मेरे कालेज में नई आई हैं और इन के मम्मीपापा इन्हें होस्टल में रहने की इजाजत नहीं दे रहे हैं.’’

उस के बाद साथ आई महिला बोली, ‘‘आप के यहां मेरी बच्चियां रहेंगी तो हमें चिंता नहीं होगी. मधुजी ने बताया है कि आप के यहां दोनों सुरक्षित रहेंगी और अब तो देख कर बिलकुल चिंता नहीं रही. बस, आप कहें तो ये कल से ही आ जाएं?’’

नंदिता ने कहा, ‘‘हां, हां, क्यों नहीं?’’

‘‘तो ठीक है. ये अपना सामान ले कर कल आ जाएंगी,’’ यह कह कर वह चली गई.

अगले दिन ही नीता और ऋतु सामान ले कर आ गईं और राधा खुशीखुशी उन का सामान ऊपर के कमरों में सैट करवाने लगी.

नंदिताजी दोनों लड़कियों के खाने की पसंदनापसंद पूछ कर सोचने लगीं कि चलो, अब इन लड़कियों के बहाने खाना तो ढंग से बन जाया करेगा. शाम को अमेरिका से बड़े बेटे का फोन आया तो उन्होंने इस बारे में उसे बताया. वह कहने लगा, ‘‘मां, क्या जरूरत थी आप को इन चक्करों में पड़ने की, आप को आराम करना चाहिए.’’

‘‘यह आराम ही तो मुझे परेशान कर रहा था, इस में बुरा क्या है?’’ आशीष ने फोन रख दिया था. छोटे बेटे अनुराग को भी उन की यह योजना पसंद नहीं आई थी लेकिन नंदिता ने दोनोें की पसंद की चिंता नहीं की.

नीता और ऋतु शाम को आतीं तो नीचे ही नंदिता के साथ खाना खातीं, कुछ बातें करतीं फिर ऊपर चली जातीं. दोनों नंदिता से खूब घुलमिल गई थीं, उन के मातापिता के फोन आते रहते और नंदिताजी से भी उन की बात होती रहती. अब नंदिता को घर में, अपने जीवन में अच्छा परिवर्तन महसूस होता. वे अब खुश रहने लगी थीं.

15 दिन बाद ही एक और लड़की अवनि भी अपना बैग उठाए चली आई और सब बातें समझ कर नंदिता के हाथ में एडवांस रख दिया. नंदिता ने सब से पहले राधा की मदद के लिए एक और महिला चंपा को रख लिया. तीनों लड़कियां सुबह नाश्ता कर के जातीं फिर शाम को ही आतीं. सब के मातापिता को यह तसल्ली थी कि लड़कियों को साफसुथरा घर का खाना मिल रहा है.

नंदिता की कोई बेटी तो थी नहीं, अब हर रोज लड़कियों और उन के क्रियाकलापों को देखते रहने का लोभ वे संवरण न कर पातीं. लड़कियों के शोर में उन्हें जीवन का संगीत सुनाई देता, नई उमंग और इस संगीत ने उन के जीवन में नई उमंग, नया जोश भर दिया था.

दुबलीपतली, बड़ीबड़ी आंखों वाली, सुतवां नाक और गौरवर्णा अवनि उन के मन में बस गई. नीता और ऋतु हंसती, खिलखिलाती रहतीं लेकिन अवनि बस, हलका सा मुसकरा कर रह जाती और हमेशा सोच में घिरी दिखती. अवनि की मां की मृत्यु हो चुकी थी. उस के पिता फोन पर नंदिता से संपर्क बनाए रखते. गांव में ही वे अवनि के छोटे भाईबहन के साथ रहते थे. बिना मां की बच्ची से नंदिता को विशेष स्नेह था.

इधर कुछ दिनों से नंदिता देख रही थीं कि अवनि कालेज भी देर से जा रही थी और असमय लौट कर चुपचाप ऊपर अपने कमरे में पड़ी रहती थी. उन लड़कियों के व्यक्तिगत जीवन में नंदिता हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थीं लेकिन जब रहा नहीं गया तो नीता और ऋतु के जाने के बाद ऊपर गईं, देखा, अवनि आंखों पर हाथ रखे चुपचाप लेटी है. आहट पा कर उठ कर बैठ गई.

नंदिता ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, अवनि? तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंटी, कालेज जाने का मन नहीं था.’’

‘‘चलो, अगर तबीयत ठीक नहीं है तो डाक्टर को दिखा देती हूं.’’

‘‘नहीं, आंटी, आप परेशान न हों, मैं ठीक हूं.’’

नंदिता उस के बैड पर बैठ गईं. उस के सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘मैं अकेली जिंदगी काट रही थी, तुम लोग आए तो मैं फिर से जी उठी. सिर्फ पैसे दे कर पेइंगगेस्ट बनने की बात नहीं है, तुम लोगों से मैं जुड़ सी गई हूं. मेरी तो कोई बेटी है नहीं, तुम्हें देखा तो बेटी की कमी पूरी हो गई. मुझे भी अपनी मां की तरह समझ लो, किसी बात पर अकेले परेशान होने की जरूरत नहीं है, मुझ से अपनी परेशानी शेयर कर सकती हो.’’

अवनि सुबक उठी, घुटनों पर सिर रख कर रो पड़ी. एक बार तो नंदिता चौंक पड़ी, कहीं यह लड़की कोई गलती तो नहीं कर बैठी, यह विचार आते ही नंदिता मन ही मन परेशान हो गईं, फिर बोलीं, ‘‘अवनि, मुझे बताओ तो सही.’’

‘‘आंटी, मुझ से गलती हो गई है, मैं प्रैग्नैंट हूं. मैं पापा को क्या मुंह दिखाऊंगी.’’

‘‘कौन है, कहां रहता है?’’ नंदिताजी ने पूछा.

‘‘इसी शहर में रहता है. कह रहा है कि उस की मम्मी कभी अपनी जाति से बाहर इस विवाह के लिए तैयार नहीं होंगी.’’

‘‘तुम मुझे उस का पता और फोन नंबर तो दो.’’

‘‘नहीं, आंटी. संजय ने कहा है कि वह अपनी मम्मी से बात नहीं कर सकता, अब कुछ नहीं हो सकता.’’

‘‘सारी सामाजिक संहिताओं को फलांग कर तुम ने अच्छा तो नहीं किया लेकिन अब तुम मुझे उस का पता दो और फ्रेश हो कर कालेज जाओ, देखती हूं क्या हो सकता है.’’

नंदिता ने अवनि को कालेज भेजा और अवनि को बिना बताए उस के पिता केशवदास को फौरन आने के लिए कहा.

मधु को भी बुला कर उस से विचारविमर्श किया. शाम तक केशवदास आ गए. नंदिता ने उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया. केशवदास यह सब सुन कर सकते में आ गए और शर्मिंदा हो गए. उन की झुकी हुई गरदन देख कर नंदिता ने उन की मानसिक दशा का अंदाजा लगा कर कहा, ‘‘क्यों न एक बार संजय के मातापिता से मिल लिया जाए, आप कहें तो मैं और मधु भी चल सकते हैं.’’

 

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