रस्सी से झूलती मिली परिधि सभी की आंखों में खौफ उतर आया. जितेंद्र जैन ने कांपते हुए कई चाबियोंं से गौरव के कमरे का ताला खोलने की कोशिश की. लेकिन ताला नहीं खुला. आखिर ताला तोड़ना पड़ा.
अंदर पहुंचे तो भयावह दृश्य देख कर सभी सन्न रह गए. परिधि का गला कई सारी रस्सियों से कसा हुआ था और उस की जीभ बाहर निकली हुई थी. रस्सियों से बंधे हुए हाथपैरों के साथ परिधि खिड़की से लटकी हुई थी. लगता था वारदात को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई थी.
बेटी की दुर्दशा देख कर अजय वहीं लड़खड़ा गए. इस से पहले कि वो पत्नी संजना को संभालते, वो वहीं गश खा कर गिर पड़ी.घटना इतनी भयावह और दहलाने वाली थी कि पलभर में आग की तरह पूरे शहर में फैल गई. इत्तला मिलने पर कोतवाली पुलिस को घटनास्थल पर पहुंचने के लिए उमड़ती भीड़ के बीच रास्ता बनाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी.
पुलिस पहुंचने से पहले रोतेबिलखते घर वाले बच्ची को अस्पताल ले जा चुके थे, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.डाक्टर भी एक बार तो फटीफटी आंखों से परिधि की हालत को देखते रह गए. उन के मुंह से निकले बिना नहीं रहा, ‘ऐसी दरिंदगी तो कोई वहशी नरपिशाच ही कर सकता है.’
लड़की की मौत की खबर ने भड़की हुई भीड़ के गुस्से की आग में घी का काम किया. पुलिस तितरफा चक्रव्यूह में घिरी हुई थी.
एक तरफ पुलिस अधिकारियों को घटनास्थल का मुआयना कर तफ्तीश में जुटना था, दूसरी तरफ थाने का घेराव और प्रदर्शन पर उतारू लोगों की समझाइश करनी थी, तीसरी तरफ आरोपी को पकड़ने के लिए दबिश देने की काररवाई करनी थी. लेकिन समाज बंधुओं, व्यापारिक संगठनों तथा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के उग्र प्रदर्शन ने पुलिस के हाथपांव फुला दिए.
कोतवाली से अजय जैन के मकान का फासला 15 मिनट से ज्यादा का नहीं है. प्रदर्शनकारियों की उमड़ती भीड़ से पहले ही थानाप्रभारी हंसराज मीणा, सीओ अमर सिंह राठौड़, एडिशनल एसपी राजेश मील और प्रवीण जैन ने मौके पर पहुंच कर साक्ष्य जुटाए. तब तक एफएसएल टीम भी अपने काम में जुटी रही.
बेटी के शव के पास रोतेबिलखते अजय जैन और संजना से पूछताछ करना पुलिस के लिए आसान नहीं था. उन के रुंधे गले से एक ही बात निकल रही थी, ‘‘जिस पर विश्वास किया उसी ने विश्वास की हत्या कर दी.’’
फिर भी पुलिस जितना कुछ जान सकी, उस का लब्बोलुआब यह था कि रोजाना गौरव के पास परिधि की 3 और सहेलियां भी ट्यूशन पढ़ने जाती थीं, उस दिन केवल परिधि को ही बुलाया गया था. घर के लोग शादी में गए हुए थे, गौरव अकेला ही घर पर था.अजय जैन का कहना था कि गौरव को पता होगा कि परिवार को शादी में जाना था. परिवार के लोग शादी में गए हुए थे, इस का उस ने फायदा उठाया और एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर परिधि को अकेले ही बुला लिया.
पुलिस तफ्तीश में वहां मौजूद समाज के लोग और घर वाले इस बात पर अड़े थे कि जब तक आरोपी पकड़ा नहीं जाएगा, न तो शव का पोस्टमार्टम होने दिया जाएगा और न ही अंतिम संस्कार किया जाएगा.
बाद में एसपी केसर सिंह शेखावत ने मौके पर पहुंच कर लोगों को समझाया, तब कहीं जा कर परिधि के शव का पोस्टमार्टम हो सका. पोस्टमार्टम मैडिकल बोर्ड द्वारा कराए जाने के बाद उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.
अंतिम संस्कार के समय अजय दंपत्ति का विलाप सभी को बेहाल कर रहा था. 9 जनवरी को जिस बेटी का जन्मदिन मनाया, उन्हीं हाथों से 13 फरवरी को उस का अंतिम संस्कार कर रहे थे.
को कोटा बंद का आह्वान किया. उसी बीच इस हत्याकांड के विरोध में शहर के विभिन्न स्कूलों और सापरिधि की हत्या के विरोध में समाजबंधु, व्यापारिक संगठनों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों का कोतवाली के सामने धरना बरकरार था. उन्होंने सोमवार माजिक संगठनों ने कैंडल मार्च भी निकाला.
सोमल ने कहा, ‘‘तारु, क्या हमारा भी बच्चा हो सकता है?’’
‘‘पता नहीं… मगर बच्चा तो मां के गर्भ में ही पलता है न… फिर कैसे होगा?’’ तारेश ने कहा.
‘‘विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है, कोई तो रास्ता होगा… क्या हम सैरोगेसी तकनीक का सहारा नहीं ले सकते?’’
‘‘हो सकता है यह संभव हो, मगर इस में कई कानूनी अड़चनें भी आ सकती हैं. क्या कानून हम जैसे लोगों को सैरोगेसी की इजाजत देता है और सब से बड़ी बात यह कि हम सैरोगेट मां कहां से लाएंगे? हमारे तो सब रिश्तेदार भी हम से किनारा कर चुके हैं. खैर अभी तुम ये सब बातें छोड़ो… किसी दिन किसी विशेषज्ञ से मिलते हैं,’’ कह कर तारेश ने एक बार तो चर्चा को विराम दे दिया, मगर बात उस के दिमाग से निकली नहीं. उस ने ठान लिया कि अगर संभव हुआ तो वह सोमल की इस इच्छा को जरूर पूरा करेगा.
एक दिन तारेश किसी काम से एक नामी हौस्पिटल गया. वहां आईवीएफ सैंटर देख कर उस के पांव ठिठक गए. उसे सोमल का सपना याद आ गया. उस ने वहां की हैड डा. सरोज से अपौइंटमैंट लिया और सोमल के साथ उन से मिलने पहुंच गया.
डा. सरोज ने उन की पूरी बात ध्यान से सुनी और बताया कि सोमल का सपना आईवीएफ और सैरोगेसी तकनीक के माध्यम से पूरा हो सकता है.
दोनों के चेहरे पर आई उम्मीद की रोशनी को परखते हुए वे आगे बोलीं, ‘‘देखिए, सरकार ने हाल ही में सैरोगेसी बिल पास किया है जिस के अनुसार सिंगल पेरैंट और समलैंगिक जोड़ों को इस की इजाजत नहीं होगी. हालांकि अभी यह कानून नहीं बना है, लेकिन निकट भविष्य में यह परेशानी आ सकती है. वैसे आप ने सुना होगा कि पिछले दिनों ही फिल्म अभिनेता तुषार कपूर इसी तकनीक के माध्यम से पहले सिंगल पिता बने हैं. हमारे पास और भी कई सिंगल महिलाओं और पुरुषों ने मातापिता बनने के लिए रजिस्ट्रेशन करा रखा है. आप भी करवा सकते हैं.’’
‘‘किराए की कोख का इंतजाम कैसे होगा?’’
‘‘इस के लिए आप को अपनी किसी नजदीकी रिश्तेदार की मदद लेनी होगी.’’
‘‘मगर हमारे रिश्तेदारों ने हमारा सामाजिक बहिष्कार कर रखा है.’’
‘‘अब इतनी मेहनत तो आप लोगों को करनी ही होगी,’’ कह कर डा. ने अगले विजिटर को बुलवा लिया.
सोमल को लीना भाभी याद आ गईं. उस ने उन्हें फोन लगाया, ‘‘हाय भाभी, कैसी हैं आप?’’
‘‘सोमल बाबू को आज हमारी याद कैसे आ गई?’’ लीना ने अपनेपन से पूछा तो सोमल मुद्दे पर आ गया और कहा, ‘‘मुझे इस काम के लिए तुम्हारी मदद की जरूरत है.’’
‘‘माफ करना सोमल, मगर इस मसले पर मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती. तुम्हारे भैया इस के लिए कभी राजी नहीं होंगे और मेरे लिए अपना परिवार बहुत महत्त्वपूर्ण है.’’
लीना के टके से जवाब से सोमल की एकमात्र उम्मीद भी खत्म हो गई.
अब जो आखिरी उम्मीद उन्हें नजर आ रही थी वह था इंटरनैट. कहते हैं यहां खोजो तो सब मिल जाता है. दोनों साथी जोरशोर से इंटरनैट खंगालने लगे. इसी कवायद में उन्हें एक समाचारपत्र रिपोर्टर की कवर स्टोरी पढ़ने को मिली, जिस में उस ने लिखा था कि गुजरात में स्थित आणंद एक ऐसी जगह है जहां सैरोगेट मदर आसानी से उपलब्ध हैं और यही नहीं यहां अब तक सैरोगेसी से लगभग 1,100 बच्चों का जन्म हो चुका है. पढ़ते ही दोनों खिल उठे. फिर क्या था पहुंच गए दोनों आणंद, जहां उन के सपने पर सचाई की मुहर लगने वाली थी. यहां एक टैस्ट ट्यूब बेबी क्लिनिक के बाहर उन का संपर्क एक दलाल से हुआ जोकि सैरोगेसी के लिए किराए की कोख का इंतजाम करता था. उन की स्थिति और बच्चा पाने की प्रबल इच्छा को देखते हुए दलाल ने उन की मजबूरी का पूरापूरा फायदा उठाया और कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए मुंहमांगी कीमत में उन के लिए एक औरत को कोख किराए पर देने के लिए तैयार कर लिया. 2 ही दिन में सभी आवश्यक औपचारिकताएं भी पूरी करवा दीं.
1 महीने बाद उन्हें वापस आना था ताकि आगे की कार्यवाही को अंजाम दिया जा सके. दोनों खुशीखुशी वापस मुंबई आ गए.
तभी अचानक एक दिन यह हादसा हुआ और तारेश की दुनिया में अंधेरा छा गया. दोनों साथी पिता बनने की खुशी सैलिब्रेट करने और मौसम की पहली बारिश में भीगने का मजा लेने खंडाला जा रहे थे. तभी हाईवे पर तेज गति से आ रहे एक ट्रक ने अनियंत्रित हो कर उन की कार को टक्कर मार दी. दोनों को जख्मी हालत में हौस्पिटल ले जाया जा रहा था, मगर रास्ते में सोमल जिंदगी की जंग हार गया. सोमल की मौत पर भी उस के घर से कोई नहीं आया.
1 महीना बीतने पर दलाल का फोन आया तो तारेश ने उसे अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताया और सोमल के संरक्षित शुक्राणुओं की मदद से पिता बनने की इच्छा जाहिर की. दलाल ने इस बाबत कुछ और रकम का इंतजाम करने के लिए कहा. तारेश ने अपनी सारी जमापूंजी इस प्रोजैक्ट पर खर्च कर दी.
सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद महिला के अंडाणु और सोमल के स्पर्म बैंक में सुरक्षित रखे शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में निषेचित करवा कर भ्रूण को सैरोगेट मदर के गर्भ में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया और निश्चित समय पर उस बच्ची का जन्म हुआ जिस का जैनेटिक पिता सोमल था.
तारेश जानता था कि इस बच्ची को अकेले पालना आसान काम नहीं है. मगर सोमल का सपना पूरा करना ही अब उस का एकमात्र सपना था और इस के लिए वह किसी नहीं भी हालात का सामना करने के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार था.
कौंट्रैक्ट के अनुसार 1 महीने तक बच्ची को सैरोगेट मां ने अपना दूध पिलाया और फिर बच्ची को तारेश के अनाड़ी हाथों में सौंप कर चली गई.
1 महीने की कोमल काया को ले कर तारेश सोमल के घर गया. जब उस ने सोमल के मम्मीपापा को बताया कि यह बच्ची सोमल की है तो राखी उसे गोद में लेने आगे बढ़ी. मगर मम्मीपापा के विरोध के कारण उस के बढ़ते कदम रुक गए.
तारेश ने कहा, ‘‘मैं जानता हूं आप लोग मुझ से नफरत करते हैं, मगर इस बच्ची में तो आप का अपना अंश है… हालांकि मैं अकेला ही इसे बेहतर परवरिश दे सकता हूं, मगर आज अगर सोमल जिंदा होता तो वह भी यही चाहता कि उस की बच्ची को उस के दादादादी का आशीर्वाद और बूआ का स्नेह मिले…’’ कह कर तारेश कुछ देर खड़ा रहा. मगर सामने से कोई पौजिटिव जवाब न पा कर वह बच्ची को गोद में लिए बाहर की ओर पलट गया.
अभी दरवाजे से बाहर नहीं निकला था कि सोमल की मां की आवाज आई, ‘‘रुको.’’
तारेश ने मुड़ कर देखा तो बच्ची के दादादादी अपनी आंखें पोंछते हुए उस की तरफ बढ़ रहे थे.
दादा ने कहा, ‘‘बेटा तो चला गया, लेकिन उस की निशानी को हम अपने से दूर नहीं जाने देंगे. इस बच्ची को हम पालेंगे और हां, मूल न सही सूद ही सही… हम तुम्हारा एहसान नहीं भूलेंगे…’’
‘‘मगर यह बच्ची हम दोनों का सपना है,’’ तारेश को लगा मानो वह बच्ची को हमेशा के लिए खो देगा.
‘‘हांहां, तुम्हीं इस के पिता रहोगे. मगर अभी इसे एक मां की ज्यादा जरूरत है… अगर तुम्हें एतराज न हो तो यह जिम्मेदारी राखी निभा सकती है.’’
‘‘मगर आप लोग तो सचाई जानते हैं… मैं राखी को कभी पति का सुख नहीं दे पाऊंगा.’’
‘‘मैं पत्नी का नहीं मां बनने का सुख चाहती हूं,’’ इस बार राखी ने कहा और बच्ची को अपनी गोद में ले लिया. तारेश को लगा जैसे बच्ची की मासूम मुसकराहट में सोमल खिलखिला रहा है.
परिधि की हत्या से कोटा में मचे जबरदस्त कोहराम के बाद अब आरोपी गौरव जैन की गिरफ्तारी का मामला पुलिस की नाक का सवाल बन गया था. कोटा के विधायक और शहरी विकास मंत्री शांति धारीवाल की चेतावनी के बाद पुलिस और मुस्तैद हो गई थी.बुधवार 16 फरवरी, 2022 को आईजी रविदत्त और एसपी केसरसिंह शेखावत द्वारा बुलाई गई महत्त्वपूर्ण बैठक में ऐसे मामलों में तहकीकात की परंपरागत रणनीति में बदलाव करते हुए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. कोटा पुलिस ने 200 पुलिसकर्मियों को शामिल करते हुए 29 टीमें बनाईं.
कोटा पुलिस ने दूसरी बार किसी हत्यारे को पकड़ने के लिए यह रणनीति दोहराई थी. इस से पहले वर्ष 2013 में रुद्राक्ष हत्याकांड में पुलिस को कमोबेश इतना ही दलबल इस्तेमाल किया था.टीम का नेतृत्व एडिशनल एसपी स्तर के 6 अधिकारियों को सौंपा गया. इस के अलावा कोटा रेंज के 6 सीओ स्तर के अधिकारियों 20 थानाप्रभारियों को भी शामिल कर लिया गया.पुलिस ने एडिशनल एसपी भगवत सिंह हिंगड़, संजय जैन और उमा शर्मा समेत पुराने और अनुभवी अफसरों को भी टीम में शामिल किया. अपराधी के भागने के रास्ते, सीसीटीवी कैमरे खंगालने तथा मंदिरों और रिश्तेदारों के घरों की खोजबीन करने में माहिर पुलिस अफसरों को भी शामिल किया गया. पुलिस ने खासकर जैन मंदिरों और जैन धर्मशालाओं को खंइस बीच छात्रा की हत्या के मामले में मैडिकल बोगालने के लिए अलग से फोर्स लगाई.
र्ड द्वारा किए गए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि गला घोटने की वजह से छात्रा की मौत हुई. मैडिकल टर्म में इसे दम घुटना यानी ‘एस्फिक्सिया’ कहा जाता है. छात्रा के जिस्म पर 6 चोंटें पाई गईं. इस का मतलब छात्रा ने आरोपी से बचाव के लिए काफी संघर्ष किया था.पुलिस के खोजी दस्तों को पहली कामयाबी मंगलवार 15 फरवरी को मिली. गौरव की स्कूटी केशवराय पाटन रोड पर
टोल प्लाजा से आगे एक खंडहरनुमा मकान में मिली. आरोपी पर किया ईनाम घोषित
पुलिस को इस का संकेत सीसीटीवी कैमरों से मिला था. इस से समझा गया कि गौरव स्कूटी ले कर नयापुरा, रंगपुर होता हुआ नार्दर्न बाईपास से केशवरायपाटन मार्ग पर पहुंचा और वीरान खंडहर में स्कूटी छोड़ कर भाग गया.
पुलिस ने उस के आत्महत्या किए जाने के अंदेशे में चंबल की नहरों को भी खंगाला, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. इस बीच बुधवार 23 फरवरी को नयापुरा स्थित विवेकानंद चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरों में एक संदिग्ध सा फोटो कैद हुआ. कपड़ों और चालढाल से बेशक वो युवती लगती थी. लेकिन कई बातें उस के मर्दाना होने की चुगली कर रही थीं.पुलिस को मानना पड़ा कि हो न हो, वह युवती के वेश में गौरव हो सकता है. इसी वजह से वह पुलिस को लगातार गच्चा दे रहा है. अब पुलिस ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए इस ऐंगल पर खोजबीन शुरू कर दी.
उधर छात्रा की हत्या पर शहर भर में विरोध प्रदर्शन के कारण दबाव में आई पुलिस का आरोपी की सूचना देने वाले को 10 हजार का ईनाम देने की घोषणा करनी पड़ी. जबकि एक कोचिंग संस्थान ने आरोपी को पकड़ने के लिए एक लाख के ईनाम की घोषणा कर दी.शहर में बढ़ते आक्रोश के कारण शहरी मंत्री शांति धारीवाल तुरतफुरत कोटा पहुंचे और एसपी को नए सिरे से टीम गठित करने के आदेश दिए. दबाव से आजिज आए धारीवाल को यहां तक कहना पड़ा कि क्या हमें जयपुर से एडीजी स्तर के अधिकारियों को यह काम सौंपना पड़ेगा.
शहरी मंत्री शांति धारीवाल ने पीडि़त परिवार को सांत्वना देते हुए दिलासा दी और छलक आए आंसुओं पर काबू पाते हुए भरोसा दिलाया कि परिधि के हत्यारे को पकड़ने के लिए नए सिरे से पुलिस की एक और टीम गठित होगी. एडीजे स्तर के पुलिस अफसरों को भी जयपुर से कोटा भेजा जाएगा.परिधि के परिजनों के पास पहुंचने से पहले धारीवाल ने पुलिस अधिकारियों की भी बैठक ली और उन से अब तक की प्रगति की जानकारी ली.आखिरकार पुलिस की कोशिश रंग लाई. छात्रा की हत्या के आरोपी गौरव को पुलिस ने घटना के नौवें दिन सोमवार 21 फरवरी को गुरुग्राम में गिरफ्तार कर लिया. गौरव के रिश्तेदारों की निगाहबीनी से ही पुलिस को सफलता मिली.
सोमवार की रात गौरव गुरुग्राम स्थित अपनी बहन के घर पहुंचा, इस से पहले कि वह घर में दाखिल होता पुलिस ने उसे बाहर से ही दबोच लिया. गौरव इस बात से बेखबर था कि उस की बहन गुरुग्राम में नहीं, बल्कि टोंक में स्थित अपनी ससुराल गई हुई थी.गौरव की गिरफ्तारी सीओ अमर सिंह और साइबर सेल के इंचार्ज प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठित टीम द्वारा की गई. एसपी केसर सिंह शेखावत ने शहरी विकास मंत्री धारीवाल को इस बात की जानकारी दी, तब उन्होंने चैन की सांस ली.इस गिरफ्तारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही इस खबर की पुष्टि हुई, धारीवाल ने
परिधि के परिजनों को सूचना देने के लिए फोन लगाया.
लेकिन जब उन का फोन नहीं लगा तो धारीवाल ने अपने विश्वस्त बाल कल्याण समिति के सदस्य अरुण भार्गव को फोन कर सूचना दी और अजय जैन के घर जा कर भार्गव ने इस बात पर अमल करते हुए परिधि के घर वालों को सूचना देते हुए शहरी विकास मंत्री धारीवाल से उन की बात करवाई.
रिमांड अवधि में पुलिस ने गौरव से परिधि की हत्या के संबंध में पूछताछ की. पूछताछ के बाद परिधि की हत्या की जो कहानी सामने आई, हैरान कर देने वाली निकली—
लगभग 26 वर्षीय गौरव सर्राफा व्यापारी जितेंद्र जैन का इकलौता बेटा था. इसलिए वह चाहते थे कि पढ़लिख कर जवान हो चुका बेटा उन के कामकाज में हाथ बंटाना शुरू कर दे. लेकिन गौरव की पुश्तैनी व्यवसाय में रुचि न देख कर जितेंद्र जैन ने उस पर ज्यादा दबाव देना उचित नहीं समझा.
गौरव की रुचि पढ़नेपढ़ाने में थी, इसलिए उस ने घर पर ही ट्यूशन सेंटर खोल लिया. कोटा वैसे भी कोचिंग संस्थानों के लिए प्रसिद्ध रहा है, ऐसे में कई घरेलू ट्यूशन सेंटर भी कमाखा रहे थे.
फिलहाल उस का रुझान लड़कियों की तरफ था, इस की वजह जो गौरव का मानना था कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियां पढ़ाई में दिलचस्पी लेती हैं.अभी उस के पास 4 लड़कियां ट्यूशन के लिए आती थीं. परिधि भी उन में से एक थी. परिधि और गौरव के घर वालों के बीच काफी घनिष्ठता थी.15 वर्षीय परिधि आईआईटी की तैयारी कर रही थी. परिधि सुंदर और स्मार्ट थी, पढ़ाई के प्रति उस की तन्मयता और लगन ने भी गौरव को काफी प्रभावित किया था. गौरव दिनोंदिन परिधि के प्रति गहरा आकर्षण अनुभव करने लगा था. ट्यूशन का समय हालांकि 2 घंटे का था. लेकिन गौरव अकसर उसे ट्यूशन के बाद भी कुछ देर के लिए रोकने लगा था.
लड़कियों को इस में अटपटा नहीं लगता था. स्वाभाविक रूप से उन की सोच थी कि पारिवारिक घनिष्ठता की वजह से गौरव परिधि को ज्यादा समय देना चाहता होगा. परिधि किशोरावस्था के उस दौर में थी, जब लड़कियां सब कुछ समझ कर भी सीधे तौर पर ‘ना’ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं.इशारों से बहुत कुछ कहने के बाद भी जब गौरव को परिधि की तरफ से कोई तवज्जो नहीं मिली तो उस ने एक दिन खुल कर कह दिया, ‘‘परिधि, क्या तुम मेरा मन नहीं पढ़ पा रही हो. मेरे दिल की धड़कनों में अब तुम ही रचबस गई हो. क्या तुम भी ऐसा महसूस नहीं कर रही हो?’’
गौरव की बारबार की रट से आजिज आ चुकी अब तक संकोचवश चुप्पी साधे हुए परिधि का धैर्य भी एक दिन जवाब दे गया. उस ने पारिवारिक रिश्तों और उस के शैक्षिक स्तर का मान रखते हुए रूखे लफ्जों में कह दिया, ‘‘सर, इस तरह का प्रस्ताव आप को शोभा नहीं देता. मेरी उम्र अभी ऐसी फालतू बातों के सोचने की नहीं है. मुझे अपने करिअर पर ध्यान देना है.’’ परिधि ने पूरी हिम्मत जुटाते हुए कहा, ‘‘आप ने आइंदा फिर कोई बात की तो मैं ट्यूशन पर आना छोड़ दूंगी.’’
इस के साथ ही परिधि उठने को हुई तो गौरव ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘परिधि, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. मेरे प्यार को इस तरह मत ठुकराओ. मेरे अंदर डर बैठ गया है, अगर तुम मुझे नहीं मिली तो मेरा क्या होगा?’’इस बार परिधि बुरी तरह भड़क उठी. गौरव से अपना हाथ छुड़ाते हुए उस ने कहा, ‘‘निर्लज्जता की भी हद होती है. आप को अपने मानसम्मान का भी ध्यान नहीं है.’’ आंखें तरेरते हुए परिधि अब गौरव पर बुरी तरह बरस पड़ी, ‘‘सोचो, अगर मैं ने घर वालों को तुम्हारी करतूत बता दी तो क्या होगा तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का.’’इस के साथ ही बुरी तरह झल्लाते हुए परिधि फुरती से सीढि़यां उतर गई.
परिधि की फटकार से बुरी तरह आहत और अपमानित गौरव की आंखें क्रोध से दहक उठीं, उस के मुंह से शब्दों का लावा उबल पड़ा, ‘परिधि, अगर तुम मेरी नहीं हो सकी तो किसी की भी नहीं हो सकोगी, यह मेरा वादा रहा.’परिधि जा चुकी थी, उस ने यह सब नहीं सुना. उस की बड़बड़ाहट जारी थी, ‘परिधि तूने अब तक मेरा प्यार देखा है, अब मेरा खौफ भी देखना. ऐसा सबक सिखाऊंगा कि किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहोगी.’अगले 2-3 दिन परिधि ट्यूशन से कन्नी काट गई. मां ने पूछा तो यह कह कर टाल गई कि मम्मी लगातार पढ़ने से सिरदर्द होने लगता है. कुछ दिन ट्यूशन नहीं जाऊंगी तो ठीक हो जाएगा. घर वालों को उस ने सच्चाई नहीं बताई.
अब जबकि इस लालसा में रंजिश का जहर घुल गया था. तो परिधि के आए बिना कैसे बात बनेगी. 3 दिन बाद उस ने परिधि को फोन करते हुए उस से माफी मांगी, ‘‘सौरी परिधि, मैं बहक गया था. अब आइंदा ऐसा नहीं होगा. तुम ट्यूशन पर आना मत छोड़ो.’’ परिधि को भी इत्मीनान हो गया कि गौरव ने अपनी भूल सुधार ली है. उस ने फिर से ट्यूशन जाना शुरू कर दिया.
गौरव ने बुन लिया पूरा तानाबाना
अब जबकि परिधि ने ट्यूशन पर आना शुरू कर दिया था तो गौरव ने भी परिधि से अपनी बात मनवाने का तानाबाना बुनना शुरू कर दिया. अब वह मुनासिब वक्त का इंतजार करने लगा. उस ने तय कर लिया था कि पहले वह परिधि को प्रपोज करेगा, लेकिन अगर उस ने बात नहीं मानी तो उस की हत्या कर के भाग जाएगा.
गौरव ने तय कर रखा था कि वह लड़की का वेश बना कर निकलेगा तो पुलिस लाख सिर पटकने के बाद भी उसे नहीं पकड़ पाएगी. उस की योजना सिक्किम जा कर नई जिंदगी शुरू करने की थी, जहां से उसे पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था.
लड़की जैसा दिखने के लिए उस ने ‘यूट्यूब’ में कई वीडियो देखे और पूरी तरह नकल करने का अभ्यास कर लिया. इस के लिए उस ने गुमानपुरा बाजार से स्कार्फ, ग्लव्ज, चश्मा आदि सामान खरीद लिया.
परिधि के इनकार की स्थिति में उसे बांधने के लिए कुछ रस्सियां भी उस ने इकट्ठी कर के रख लीं. गौरव का इंतजार फरवरी की 13 तारीख को खत्म हुआ. उस दिन रविवार था, उस के घर वालों को शादी में जाना था. ऐसे में घर में कोई नहीं रहेगा.
दिमाग में बैठ गया था परिधि
को पाने का फितूर
रविवार छुट्टी के बावजूद उस ने एक्स्ट्रा क्लास के बहाने परिधि को बुलाना तय कर लिया था. एक दिन पहले छावनी चौराहे पर स्थित प्राइवेट ट्रैवल एजेंसी पर मीनाक्षी के नाम से उस ने हरिद्वार के लिए टिकट बुक करवा ली थी.
रविवार 13 फरवरी को ट्यूशन के लिए पहुंची परिधि जैसे ही गौरव के सामने किताबें खोल कर बैठी, उस ने योजना के मुताबिक मिन्नतें करते हुए प्रपोज किया, ‘‘परिधि, मैं तुम से सिर्फ एक शब्द सुनना चाहता हूं, हां या ना.’’
एक पल रुकते हुए उस ने कहा, ‘‘अगर तुम मेरी नहीं हो सकी तो ध्यान रखना, किसी की नहीं हो सकती.’’
इस से पहले कि गौरव कुछ और कहता, परिधि गुस्से से बुरी तरह उबल पड़ी, ‘‘तुम इंसान तो हो ही नहीं, भेडि़ए हो, जो मौका देख कर भले ही दुम दबा लेता है, लेकिन अपनी हवस के लिए पैने दांत गड़ाने में देर नहीं करता. बहुत हो चुकी ट्यूशन और बहुत हो चुकी पढ़ाई. आइंदा अपनी मनहूस सूरत दिखाने की कोशिश मत करना.’’ कहते हुए परिधि पांवों से स्टडी डेस्क ठेलती हुई बाहर की तरफ बढ़ी.
लेकिन इस से पहले कि परिधि दरवाजा लांघ पाती, गौरव ने फुरती से आगे बढ़ कर उसे दबोच लिया, ‘‘तुम मुझे ठुकरा कर कैसे जाओगी.’’
इस के साथ ही गौरव उसे फर्श पर गिरा कर उस के साथ जबरदस्ती की कोशिश करने लगा.
परिधि ने बचाव के लिए पूरी ताकत से हाथपैर मारे, लेकिन गौरव ने उस के बाल पकड़ कर घसीट दिया. परिधि खूब चीखीचिल्लाई, लेकिन वहां उस की सुनने वाला था कौन? गौरव एक बार फिर चीखा और बालों से घसीटते हुए प्रलाप करने लगा, ‘‘तुम मेरी नहीं हो सकती तो किसी की नहीं हो सकती.’’
पगलाए सांड की तरह गौरव परिधि को खामोश करने के लिए उस का गला दबाता चला गया. यहां तक कि उस की जीभ बाहर निकल आई. चीखपुकार खत्म हो चुकी थी. परिधि अब मृत देह में बदल गई थी.
उखड़ती सांसों पर काबू पाते हुए गौरव ने परिधि की मौत को खुदकुशी का रूप देने के लिए हाथपैर और गला रस्सियों से कस दिया और उसे खिड़की से लटका दिया.
उसे अब शहर से बाहर भागना था. पहले उस ने औरतों वाला सामान काबू किया, लेकिन तभी ठिठक गया. पैसों का जुगाड़ तो उस ने किया ही नहीं था.
कमरे का ताला बंद करने के बाद वह मां के कमरे की दराज टटोलते हुए 9 हजार रुपए ले लिए. उस कमरे को भी ताला लगाया और नीचे दौड़ा. अब तक साढ़े 12 बज चुके थे. उस ने परिधि की मां को फोन किया कि आ कर उसे ले जाए.
आननफानन में उस ने स्कूटी निकाली और बाहर निकल गया. उस ने अपना मोबाइल किशोर सागर तालाब में फेंक दिया. स्कूटी से वह केशोरायपाटन रोड वीरान खंडहर तक पहुंचा. स्कूटी वहां छोड़ने और स्त्री रूप धरने के बाद एक स्कूटर सवार से लिफ्ट ले कर नयापुरा पहुंच गया. यहीं बस में रिजर्वेशन पहले से ही था.
बस में बैठ कर वह हरिद्वार पहुंच गया. बहन के घर तो वह पैसे खत्म हो जाने के कारण पहुंचा था, लेकिन पुलिस के हत्थे चढ़ गया. सूत्रों का कहना है कि पुलिस की इस सफलता के पीछे उस के मुखबिर तंत्र की सक्रियता ज्यादा कारगर रही. उस ने हरिद्वार पहुंच कर स्त्री वेश को तिलांजलि दे दी और बाल कटवा कर चालढाल भी बदल ली थी. बेशक वह अपनी पहचान छिपा रहा था, लेकिन मुखबिर पुलिस को पलपल की सूचना दे रहे थे.
मुखबिर की सूचना पर ही पुलिस उसे गुरुग्राम में उस की बहन के घर से गिरफ्तार कर सकी. पुलिस अधिकारी इस बात को ले कर काफी हैरान थे कि गौरव का पिछला कोई आपराधिक रिकौर्ड भी नहीं रहा, फिर भी कैसे वह पुलिस को बारबार गच्चा देने में कामयाब रहा. पुलिस ने इस मामले में एक हजार पेज की चार्जशीट पेश की. कथा लिखे जाने तक वह न्यायिक अभिरक्षा में था
30जुलाई, 2022 की सुबह 9 बजे उन्नाव जिले की सफीपुर कोतवाली के प्रभारी अवनीश
कुमार सिंह को सूचना मिली कि बब्बर अली खेड़ा निवासी किन्नर मुसकान की बीती रात किसी ने हत्या कर दी. चूंकि मुसकान सफीपुर कस्बे की चर्चित किन्नर थी, सो उस की हत्या की खबर पा कर अवनीश कुमार सिंह आश्चर्यचकित हो उठे.
उन्होंने किन्नर की हत्या किए जाने की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी, फिर सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो लिए.सफीपुर कोतवाली से बब्बर अली खेड़ा मोहल्ला करीब 2 किलोमीटर से भी कम दूरी पर था. अत: पुलिस वहां महज आधे घंटे में ही पहुंच गई. उस समय घर के बाहर भीड़ तो थी, लेकिन सन्नाटा छाया था. इंसपेक्टर अवनीश कुमार सिंह ने सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घर में प्रवेश किया.
कमरे में पहुंचते ही उन के पांव ठिठक गए. कमरे के अंदर फर्श पर मुसकान का शव खून से लथपथ पड़ा था. उस की हत्या गोली मार कर की गई थी. हत्यारे ने गोली उस के माथे से सटा कर मारी थी. उस की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी.इंसपेक्टर अवनीश कुमार सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी दिनेश त्रिपाठी तथा डीएसपी अंजनी कुमार राय वहां पर आ गए. उन्होंने मौके पर डौग स्क्वायड, फोरैंसिक तथा सर्विलांस टीम को भी बुलवा लिया.
पुलिस अधिकारियों ने भी शव का तथा कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे का सामान बिखरा पड़ा था, साथ ही अलमारी खुली हुई थी. अलमारी का लौकर भी खुला था तथा उस के अंदर रखा कीमती सामान गायब था. देखने से ऐसा लग रहा था कि हत्या लूट के इरादे से की गई थी.घर की रसोई में कचौडि़यां और सब्जी रखी थी. ऐसा लग रहा था कि हत्या खाना खाने के पहले ही कर दी गई थी. अर्थात 29 जुलाई की रात 10-11 बजे के बीच उसे मौत के घाट उतारा होगा.
हत्यारे मुसकान के अति करीबी रहे होंगे, क्योंकि वे पहचाने जाने के डर से घर के अंदर लगे 2 सीसीटीवी व डीवीआर (डिजिटल वीडियो रिकौर्डिंग) सेट भी उखाड़ कर ले गए थे. हत्यारे इतने चालाक थे कि वे वहां हत्या का कोई सबूत छोड़ कर नहीं गए थे. मुसकान का महंगा मोबाइल फोन भी गायब था.घटनास्थल पर मुसकान की रसोइया पुष्पा व संतोषा मौजूद थीं. एसपी दिनेश त्रिपाठी ने जब उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने काफी अहम जानकारी दी. पुष्पा ने बताया कि वह और संतोषा कई सालों से किन्नर गुरु मुसकान के घर खाना बनाने का काम करती है.
मुसकान घर में अपने पति सोनू कश्यप के साथ रहती थी. सोनू मथुरा का रहने वाला है. वह ज्यादातर मथुरा में ही रहता है. लेकिन उस का यहां आनाजाना बना रहता है.पुष्पा ने यह भी बताया कि मुसकान के साथ उस की 3 चेलियां सलोनी, अन्नू व रूबी भी रहती थीं. बीती शाम जब वह खाना बनाने आई थी तो तीनों मौजूद थीं. उस ने उन सब के लिए कचौडि़यां व सब्जी बनाई थी. सलोनी मथुरा की रहने वाली है और अन्नू झांसी की है. जबकि रूबी मुरादाबाद की है.
पुष्पा ने बताया कि वह सराय सूबेदार में रहती है, जो यहां से कुछ दूरी पर है. आज सुबह वह घर का काम निपटा रही थी, तभी मुसकान का कुत्ता चीकू उस के घर आया और भौंकने लगा. फिर वह साड़ी का पल्लू खींच कर उसे घर के बाहर ले आया.घर के डौग चीकू की वफादारी रही काबिलेतारीफ
चीकू की वफादारी देख कर वह समझ गई कि जरूर मुसकान के घर कुछ अनहोनी हुई है. उस ने तब फोन कर सहयोगी रसोइया संतोषा को बुलवा लिया. फिर वे दोनों डौगी चीकू के साथ मुसकान के घर आई.
घर पर रूबी, सलोनी व अन्नू नहीं थीं और मुसकान के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था. पड़ोस में मुसकान का ढोलकिया मनोज बाबा रहता था, हम ने तब उसे भी बुला लिया. इस के बाद हम तीनों ने मिल कर किसी तरह दरवाजा खोला.
कमरे में घुसते ही हम तीनों के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर फर्श पर मुसकान की लाश पड़ी थी और कमरे की अलमारी खुली पड़ी थी.लाश देख कर तीनों घबरा गए और फिर हत्या की जानकारी अड़ोसपड़ोस वालों को दी. उस के बाद तो पूरे कस्बे में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ जुटने लगी. इसी बीच ढोलकिया मनोज बाबा ने हत्या की सूचना पुलिस को दी.
दोनों एकदूसरे से लिपट कर देर तक रोते रहे. वे जुदा नहीं होना चाहते… आज रात तारेश और सोमल को पता चल गया कि वे दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. इस एक रात ने उन्हें समझा दिया कि क्यों उन्हें एकदूसरे का साथ इतना अच्छा लगता. आज रात दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर अपने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया, जो दुनिया की निगाहों में धर्मविरोधी था, अप्राकृतिक था… हां, वे गे थे और उन्हें इस बात पर कोई शर्म नहीं थी.
दोनों ने अपनाअपना प्लेसमैंट कैंसिल कर तय किया कि वे दिल्ली में ही रह कर काम तलाश करेंगे. कुछ दिनों के प्रयास के बाद तारेश को एक मल्टी नैशनल कंपनी में नौकरी मिल गई. फिर कुछ दिन बाद सोमल को भी. दोनों की जिंदगी फिर से पटरी पर आ गई. सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहा.
तारेश की मां अब उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी थीं और सोमल के घर वाले भी यही चाहते थे कि उस का घर बस जाए. दोनों घरों में जोरशोर से लड़कियां देखी जा रही थीं. मगर वे दोनों लव बर्ड्स इन सब बातों से बेखबर अपने में ही खोए थे. उन की एक अलग ही दुनिया थी. उन्हें बिलकुल अंदेशा नहीं था कि कोई तूफान आने वाला है.
जब बारबार बिना किसी ठोस कारण के लड़कियां रिजैक्ट होने लगीं तो तारेश की मां का माथा ठनका कि कहीं किसी लड़की का चक्कर तो नहीं…
यही हाल सोमल के घर पर भी था. हकीकत जानने के लिए एक दिन बिना बताए तारेश की मां दिल्ली उन के फ्लैट पहुंच गईं. दोनों के हावभाव से उन्हें दाल में कुछ काला लगा. उन्होंने फोन कर के तारेश के पापा और सोमल के घर वालों को भी बुला लिया.
दोनों लड़कों ने साफसाफ कह दिया कि वे एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताना चाहते हैं और किसी को भी उन के लिए लड़की ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है. पहले तो दोनों के घर वालों ने उन्हें समाज में अपनी इज्जत का हवाला दे कर बहुत समझाया. सोमल की मां ने बहन की शादी में आने वाली परेशानी का वास्ता दिया. वंश बेल के खत्म होने का डर भी दिखाया, मगर जब दोनों अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए तो तारेश की मां ने सोमल को और सोमल के घर वालों ने तारेश को जी भर कर कोसा. खूब हंगामा हुआ. मामला फ्लैट से बिल्डिंग में फैला और फिर पूरी सोसाइटी में वायरल हो गया. मकानमालिक ने फ्लैट खाली करने का नोटिस दे दिया.
बात धीरेधीरे दोनों के औफिस में भी पहुंच गई. हर व्यक्ति उन्हें ऐसे देख रहा था जैसे वे किसी दूसरे ही ग्रह के प्राणी हों. कल तक जो साथी उन के साथ काम करते, खातेपीते, उठतेबैठते, पार्टियां करते थे आज अचानक उन से कन्नी काटने लगे, अछूतों सा व्यवहार करने लगे. दोनों को ही घुटन होने लगी.
सोमल के तो बौस ने उसे एकांत में बुला कर समझा भी दिया, ‘‘देखो सोमल, तुम्हारे कारण औफिस का माहौल खराब हो रहा है. कर्मचारी अपने काम पर कम, तुम्हारी स्टोरी पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. बेहतर होगा तुम इस्तीफा दे दो. अगर रिमार्क के साथ निकाले जाओगे तो तुम्हारे भविष्य के लिए घातक होगा.’’
तूफानों में बहने वालों के लिए वक्त कभी आसान नहीं होता. हार कर दोनों ने शहर छोड़ने का फैसला कर लिया और मुंबई शिफ्ट हो गए. इस बीच सोमल की बहन राखी की भी शादी हो गई. मगर उसे खबर तक नहीं की गई.
घर वालों ने तो पहले ही किनारा कर लिया था. सभी पुराने दोस्त भी छूट चुके थे. बस सोमल की एक चचेरी भाभी लीना ही थी, जिस ने इतना कुछ होने के बाद भी उस से संपर्क बनाए रखा था. अब इस नए शहर में दोनों को कोई नहीं जानता था. फिर से एक नई जिंदगी की शुरुआत हुई.
एक दिन अचानक लीना भाभी ने फोन पर बताया कि सोमल राखी के पति की ऐक्सीडैंट में डैथ हो गई. सोमल तड़प उठा. बहुत प्यार करता था अपनी बहन से.
‘उसे इस मुश्किल घड़ी में अपनी बहन के पास होना चाहिए,’ सोच कर तत्काल में ट्रेन के टिकट ले सोमल पहुंच गया अपनी बहन के पास.
उसे देखते ही राखी दौड़ कर लिपट गई भाई से. तभी उस की सास आई और उसे खींचते हुए भीतर ले गई. साथ ही सोमल को भी एहसास करवा गई कि उस का आना उन्हें जरा भी नहीं भाया. बस यही आखिरी मुलाकात थी सोमल की अपने अपनों से. इस के बाद उस की और तारेश की दुनिया एकदूसरे तक ही सिमट कर रह गई.
एक दिन दोनों फुरसत के पलों में टीवी पर ‘हे बेबी’ फिल्म देख रहे थे, जिस में 3 पुरुष साथी मिल कर एक बच्ची की परवरिश करते हैं.
‘आप ने तो पूर्ण स्वस्थ और सुयोग्य जीतेंद्र से मेरा विवाह किया था न? मैं ने जिंदगी की हर खुशी इन से पाई है. स्वस्थ व्यक्ति कभी बीमार भी हो सकता है तो क्या बीमार को छोड़ दिया जाता है. इन की इस बीमारी को मैं ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. दुनिया में संघर्षशील व्यक्ति न जाने कितने असंभव कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, तो क्या मैं मानव सेवा परम धर्म के संस्कार वाले समाज में अपने पति की सेवा का प्रण नहीं ले सकती.
‘जीतेंद्र को इस हाल में छोड़ कर आप अपने दिल से पूछिए, क्या वाकई मैं आप के पास खुश रह पाऊंगी. यह मातापिता की अवहेलना से आहत हैं… पत्नी के भी साथ छोड़ देने से इन का क्या हाल होगा जरा सोचिए.
‘मम्मी, आप पुत्री मोह में आसक्त हो कर ऐसा सोच रही हैं लेकिन मैं ऐसा करना तो दूर ऐसा सोच भी नहीं सकती. हां, आप कुछ दिन यहां रुक जाइए… यश और गौरव को नानानानी का साथ अच्छा लगेगा. इन दिनों मैं उन पर ध्यान भी कम ही दे पाती हूं.’
रत्ना धीरेधीरे अपनी बात स्पष्ट कर रही थी. वह कुछ और कहती इस से पहले रत्ना के पापा, जो चुपचाप हमारी बात सुन रहे थे, उठ कर रत्ना को गले लगा कर बोले, ‘बेटी, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. इसी तरह हौसला बनाए रहो, बेटी.’
रत्ना के निर्णय ने मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया था. ऐसा लगा कि मेरी शिक्षा अधूरी थी. मैं ने रत्ना को जीवन संघर्ष मानने का मंत्र तो दिया मगर सहजता से जिम्मेदारियों का वहन करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने का पाठ मुझे रत्ना ने पढ़ाया. मैं उस के सिर पर हाथ फेर कर भरे गले से सिर्फ इतना ही कह पाई थी, ‘बेटी, मैं तुम्हारे प्यार में हार गई लेकिन तुम अपने कर्तव्यों की निष्ठा में जरूर जीतोगी.’
कुछ दिन रत्ना और बच्चों के साथ गुजार कर मैं धीरज के साथ वापस आ गई थी. हम रहते तो ग्वालियर में थे मगर मन रत्ना के आसपास ही रहता था. दोनों बेटे अपने बच्चों और पत्नी के परिवार में खुश थे. मैं उन की तरफ से निश्चिंत थी. हम सभी चिंतित थे तो बस, रत्ना पर आई मुसीबत से. धीरज छुट्टियां ले कर मेरे साथ हरसंभव कोशिश करते जबतब इंदौर पहुंचने की.
रत्ना के ससुर इस मुश्किल समय में रत्ना को सहारा दे रहे थे. उन्होंने बडे़ संघर्षों के साथ अपने दोनों बेटों को लायक बनाया था. जीतेंद्र ही आर्थिक रूप से घर को सुदृढ़ कर रहे थे. हर्ष तब मेडिकल कालिज में पढ़ रहा था. इसलिए घर की आर्थिक स्थिति डांवांडोल होने लगी थी. बीमारी की वजह से जीतेंद्र को महीनों अवकाश पर रहना पड़ता था. अनेक बार छुट्टियां अवैतनिक हो जाती थीं. दवाइयों का खर्च तो था ही. काफी समय आगरा में अस्पताल में भी रहना पड़ता था.