Story In Hindi: बिगड़ी बात बनानी है – नंदा को नींद क्यों नहीं आ रही थी

Story In Hindi: रातभर नंदना की आंखों में नींद नहीं थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उस के साथ क्या हो रहा है. पूरा शरीर टूट रहा था. सुबह उठी तो ऐसे लगा चक्कर खा कर गिर जाएगी. गिरने से बचने के लिए बैड पर बैठ गई. नंदना चुपचाप अपने बैड पर बैठी थी कि तभी उसे अपनी भाभी तनुजा की आवाज सुनाई दी,’’ क्या बात है नंदू आज तुम्हें औफिस नहीं जाना है क्या?

नंदना ने किसी तरह भाभी को जवाब दिया कि हां भाभी जाना है… अभी तैयार हो रही हूं.नंदना की आवाज की सुस्ती को महसूस कर तनुजा अपना काम छोड़ कर उस के कमरे में चली आई. पूछा, ‘‘क्या बात है नंदू तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?

‘‘हां, भाभी,’’ नंदू ने जवाब दिया.‘‘देखकर तो नहीं लगता,’’ तनुजा उस का माथा छूते हुए बोली, ‘‘अरे तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है.’’‘‘हां भाभी,’’ कहते हुए नंदना बाथरूम की तरफ भागी, उसे बहुत तेज उबकाई आई. तनुजा भी उस के पीछेपीछे गई. नंदना उलटी कर रही थी.

तनुजा चिंतित हो गई कि पता नहीं क्या हो गया नंदू को. इस के भैया भी शहर से बाहर गए हुए हैं. समझ नहीं आ रहा क्या करे. तनुजा नंदना को सहारा दे कर बिस्तर तक ले आई और फिर बिस्तर पर लेटाते हुए सख्त आवाज में बोली, ‘‘कोई जरूरत नहीं है तुम्हें औफिस जाने की… तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है.’’

नंदना बिना कोई जवाब दिए चुपचाप लेट गई.तनुजा नंदना के लिए चाय लेने किचन में चली गई. जब वह चाय ले कर आई, तो देखा कि नंदना की आंखों से आंसू टपक रहे हैं.तनुजा उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘रो क्यों रही है पगली. ठीक हो जाएगी.’’

‘‘आप मेरा कितना ध्यान रखती हो भाभी. आप ने कभी मुझे मां की कमी महसूस नहीं होने दी. हमेशा अपने स्नेह तले रखा. मेरी हर गलती को माफ किया… पता नहीं भाभी मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है.’’‘‘क्या हो गया है तुझे? चायनाश्ता कर ले, फिर डाक्टर के पास ले चलती हूं.’’

तनुजा के कहने पर नंदना डाक्टर के पास चलने को तैयार हो गई. तनुजा की सहेली माधवी बहुत अच्छी डाक्टर हैं. वह नंदना को उसी के पास ले गई.माधवी ने नंदना का चैकअप करने के बाद तनुजा को अपने कैबिन में बुलाया और बोली, ‘‘तनुजा, नंदना की शादी हो गई है क्या?’’‘‘नहीं माधवी, अभी तो नहीं हुई. हां, उस के रिश्ते की बात जरूर चल रही है. पर तू ये सब क्यों पूछ रही है? कुछ सीरियस है क्या?’’

‘‘हां तनुजा, बात तो सीरियस ही है. नंदना प्रैगनैंट है… लगभग 4 महीने हो चुके हैं.’’माधवी की बात सुनते ही तनुजा के पैरों तले से जमीन ही निकल गई. वह मन ही मन बुदबुदाने लगी कि नंदना तूने यह क्या किया, 4 महीने हो गए और मुझे बताया तक नहीं.और फिर तनुजा नंदना को ले कर घर आ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उस से इस बारे में कैसे पूछे.

तनुजा ने नंदना को दवा और खाना दे कर सुला दिया. फिर सोचा शाम तक इस की तबीयत ठीक हो जाएगी तब इस से तसल्ली से पूछेगी कि ये सब कैसे हुआ.शाम को 5 बजे चाय ले कर तनुजा नंदना के कमरे में पहुंची तो देखा वह रो रही है.नंदना के सिरहाने बैठते हुए तनुजा बोली, ‘‘नंदू उठो चाय पी लो. फिर मुझे तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं.’’

‘‘जी भाभी, मुझे भी आप से एक बात करनी है,’’ कह कर नंदना चाय पीने लगी.चाय पीने के बाद दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगीं कि बात की शुरुआत कौन पहले करे.आखिर मौन को तोड़ते हुए तनुजा बोली, ‘‘नंदना तुम्हें पता है कि तुम प्रैगनैंट हो?’’‘‘नहीं भाभी, पर मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है.’’

नंदना की बात पर तनुजा को गुस्सा आ गया, तुम 30 साल की होने वाली हो नंदना और तुम्हें यह पता नहीं कि तुम प्रैगनैंट हो… 4 महीने हो चुके हैं.. कैसे इतनी बड़ी बात तुम ने मुझ से बताने की जरूरत नहीं समझी? तुम्हारे भैया को और पापाजी को क्या जवाब दूंगी मैं? दोनों ने तुम्हारी जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ी है और तुम ने ऐसा कर दिया कि मैं उन्हें मुंह दिखाने लायक नहीं रही.’’

नंदना रोते हुए बोली, ‘‘आप को तो पता है न भाभी मेरे पीरियड्स अनियमित हैं… मुझे नहीं पता चला कि  ये सब कैसे हो गया.’’तनुजा अपने गुस्से पर काबू रखते हुए बोली, ‘‘कौन है वह जिसे तुम प्यार करती हो? किस के साथ रह कर तुम ने अपनी मर्यादा की सारी हदें लांघ दीं? अगर तुम्हें कोई पसंद था तो मुझे बताती न, मैं बात करती तुम्हारी शादी की.’’

‘‘भाभी, मैं और भैया के बौस वीरेंद्र,’’ इतना कह कर नंदना रोने लगी.‘‘सत्यानाश नंदना… वीरेंद्र तो शादीशुदा है और उस के बच्चे भी हैं… वह तुम से शादी करेगा?’’‘‘पता नहीं भाभी,’’ वंदना धीरे से बोली.‘‘जब भैया ने मुझे उन से पार्टी में मिलाया था, तो मुझे नहीं पता था कि वह शादीशुदा हैं. उन्होंने तो मुझे अभी भी नहीं बताया.. यह आप बता रही हैं.’’

नंदना की बात सुन कर तनुजा गुस्से से पगला सी गई. फिर नंदना के कंधे झंझोड़ते हुए बोली, ‘‘अब मैं क्या करूं नंदना, तुम्हीं बताओ? मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है. 4 दिनों में पापाजी औैर तुम्हारे भैया आ जाएंगे… कैसे उन का सामना करोगी तुम?’’‘‘मुझे बचा लो भाभी.. भैया और पापा को पता चल गया तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी… भैया तो मार ही डालेंगे मुझे.’’

‘‘कुछ सोचने दो मुझे,’’ कह कर तनुजा अपने कमरे में चली गई. सारी रात सोचते रहने के बाद उस ने यही तय किया कि उसे रजत को बताना ही होगा कि नंदना प्रैगनैंट है, भले ही गुस्सा होंगे, लेकिन कोई हल तो निकलेगा.’’सुबह ही तनुजा ने पति रजत को फोन कर के सारी बात बता दी. सब कुछ सुनने के बाद रजत सन्न रह गया. फिर बोला, ‘‘मैं दोपहर की फ्लाइट से घर आ रहा हूं. तब तक तुम अपनी सहेली माधवी से बात कर लो. अगर अबौर्शन हो जाए तो अच्छा है… बाकी बातें बाद में देखेंगे. मुझे नहीं पता था कि वीरेंद्र मुझे इतना बड़ा धोखा देगा,’’ कह कर रजत ने फोन रख दिया.

घर का काम निबटाने के बाद तनुजा नंदना के कमरे में गई. वह घुटनों पर मुंह रखे रो रही थी.तनुजा उस के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘अब रोने से कुछ नहीं होगा. नंदू चलो हम डाक्टर के पास चलते हैं, और दोनों तैयार हो कर माधवी के पास पहुंचीं.तनुजा माधवी से बोली, ‘‘अबौर्शन कराना है नंदना का.’’‘‘ठीक है, चैकअप करती हूं कि हो सकता है या नहीं.’’

नंदना का चैकअप करने के बाद माधवी बोली, ‘‘आईर्एम सौरी तनु यह अबौर्शन नहीं हो पाएगा. इस से नंदना की जिंदगी को खतरा हो सकता है. साढ़े 4 महीने हो चुके हैं.’’माधवी की बात सुन कर तनुजा परेशान हो उठी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे. थोड़े दिनों में तो सब को पता चल जाएगा नंदना के बारे में. फिर क्या होगा इस की जिंदगी का? कौन करेगा इस से शादी? अपनी नासमझी में नंदू ने इतनी बड़ी गलती कर दी है कि जिस की कीमत उसे जिंदगी भर चुकानी पड़ेगी. नंदू की हालत के बारे में सोच कर तनुजा की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘क्या करूं… कैसे संवारूं मैं नंदू की जिंदगी को,’’ तनुजा अपना सिर हाथों में दबाए सोच ही रही थी कि तभी रजत की आवाज सुनाई दी, ‘‘क्या हुआ तनु? सब ठीक है न?रजत को देखते ही तनुजा उस से लिपट गई, ‘‘कुछ भी ठीक नहीं है रजत, इस बेवकूफ लड़की ने अपनी जिंदगी बरबाद कर ली… माधवी कह रही है अगर अबौर्र्शन हुआ, तो उस की जान चली जाएगी.’’

रजत झल्लाते हुए बोला, ‘‘चली जाए जान इस की… क्या मुंह दिखाएंगे हम लोगों को?‘‘कैसी बातें कर रहे हो आप? आखिर नंदू हमारी बेटी जैसी है… उस ने गलती की है, तो उसे सुधारना हमारी जिम्मेदारी है न? आप हिम्मत न हारें कोई न कोई रास्ता निकलेगा ही… फिलहाल हम नंदू को घर ले चलते हैं.’’

रजत और तनुजा नंदना को ले कर घर आ गए. गुस्से की अधिकता के चलते रजत ने नंदना की तरफ न तो देखा न ही उस से एक शब्द बोला. उसे अपनेआप पर भी गुस्सा आ रहा था कि क्यों उस ने नंदू से वीरेंद्र का परिचय कराया.. उसे पता तो था ही कि साला एक नंबर का कमीना है. रजत ने कभी सोचा भी नहीं था कि वीरेंद्र उस की बहन के साथ ऐसा करेगा.

घर पहुंच कर नंदू रजत के पैरों पर गिर कर बोली, ‘‘भैया मुझे माफ कर दो… आप बचपन से मेरी गलतियां माफ करते आए हो.. भले ही आप मुझे पीट लो, लेकिन मुझ पर गुस्सा न करो.’’रजत उस का माथा थपक कर अपने कमरे में चला गया.

उस दिन तीनों में से किसी ने भी खाना नहीं खाया. सब परेशान थे. किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए.तनुजा बोली, ‘‘3-4 दिन में पापाजी आ जाएंगे, उन से क्या कहेंगे? नंदना के बारे में सुन कर तो उन्हें हार्टअटैक ही आ जाएगा.’’रजत बोला, ‘‘मैं पापा से कह देता हूं कि वे अभी कुछ दिन और चाचा के यहां रह लें. तब तक हम कुछ सोच लेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर तनुजा अपने कमरे में चली गई औैर नंदना भी सोने चली गई.जब रजत कमरे में आया तो तनुजा उन से बोली, ‘‘मैं सोच रही थी कि कुछ दिनों के लिए शिमला वाले भैया के पास चली जाऊं नंदना को ले कर.’’‘‘वहां जा कर क्या करोगी? तुम्हारे भैया तो अकेले रहते हैं न,’’ रजत ने कहा.‘‘हां,’’ तनुजा ने जवाब दिया, ‘‘शादी नहीं की है उन्होंने… सोच रही हूं उन से नंदना से शादी करने की बात कहूं. वे मेरी बात नहीं काटेंगे.’’

‘‘यह तो ठीक नहीं है तनुजा कि तुम नंदना को जबरदस्ती उन से बांध दो. वैसे उन्होंने शादी क्यों नहीं की अभी तक 37-38 साल के तो हो ही गए होंगे न?’’‘‘दरअसल, वे जिस लड़की से प्यार करते थे उस ने उन्हीं के दोस्त के साथ अपना घर बसा लिया. तब से भैया का मन उचट गया. बहुत सारी लड़कियां बताईं पर उन्हें कोई भी नहीं जंची. मुझे लग रहा है नंदना और उन की जोड़ी ठीक रहेगी. मैं एक बार नंदना से भी पूछ लेती हूं.’’

‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करो. अब तो दूसरा रास्ता भी नजर नहीं आ रहा… शहर में जा कर नंदना भी धीरेधीरे सब कुछ भूल जाएगी.’’अगले ही दिन तनुजा नंदना को ले कर शिमला चली गई. रजत ने अपने पापा को कुछ दिनों तक मुंबई चाचा के पास ही रुकने को कह दिया.शिमला पहुंच कर तनुजा ने अपने भैया विमलेश को सारी बात बताई, तो वे बोले, ‘‘तनु, मुझे कोई ऐतराज नहीं है. मुझे नंदना पसंद है, लेकिन तू पहले उस से पूछ ले.’’

तनुजा ने नंदना से इस बारे में पूछा तो उस ने अपनी स्वीकृति दे दी.तनुजा ने रजत को फोन कर के सारी बात बताई. रजत बहुत खुश हुआ. बोला, ‘‘समझ नहीं आ रहा तुम्हें कैसे धन्यवाद दूं. तनुजा तुम सही मानों में मेरी जीवनसंगिनी हो… तुम्हारी जगह कोई और होती तो बात का बतंगड़ बना देती, लेकिन तुम ने बिगड़ी बात को अपनी समझ से बना दिया… मैं सारी जिंदगी तुम्हारा आभारी रहूंगा.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हो आप? क्या नंदना मेरी कुछ नहीं है? उसे मैं ने हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह माना है.’’रजत ने पापा को फोन कर के बुला लिया और उन्हें सारी बात बता दी, साथ ही यह भी बता दिया कि परेशान होने की जरूरत नहीं है. तनुजा के भैया विमलेश को नंदना बहुत पसंद है और उन्होंने उस से विवाह करने की इच्छा जताई है. फिर दोनों परिवारों की रजामंदी से नंदना का विमलेश के साथ विवाह हो गया. विदाई के समय नंदना अपनी भाभी तनुजा के गले लग कर खूब रोई. वह बस यही बोले जा रही थी कि आप ने मेरी जिंदगी फिर से संवार दी भाभी… आप जैसी भाभी सभी को मिले. Story In Hindi

Hindi Story: भूल – प्यार के सपने दिखाने वाले अमित के साथ क्या हुआ?

Hindi Story: कैफे कौफी डे’ में रजत, अमित, विनोद और प्रशांत बैठे गपें मार रहे थे, इतने में अचानक रजत की नजर घड़ी पर गई तो वह बोला, ‘‘अमित, तुझे तो अभी ‘उपवन लेक’ जाना है न, वहां पायल तेरा इंतजार कर रही होगी.’’

अमित ने अपने कौलर ऊपर करते हुए कहा, ‘‘वही एक अकेली थोड़ी है जो मेरा इंतजार कर रही है, कई हैं, करने दे उसे भी इंतजार, बंदा है ही ऐसा.’’

प्रशांत हंसा, ‘‘हां यार, तू अमीर बाप की इकलौती औलाद है, हैंडसम है, स्मार्ट है, लड़कियां तो तुझ पर मरेंगी ही.’’

अमित ने इशारे से वेटर को बुला कर बिल मंगवाया और बिल चुकाने के बाद अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और बोला, ‘‘चलो, मैं चलता हूं, थोड़ा टाइमपास कर के आता हूं,’’ सब ने ठहाका लगाया और अमित बाहर निकल गया. वह सीधा ‘उपवन लेक’ पहुंचा, पायल वहां बैंच पर बैठी थी, उस ने कार से उतरते अमित को देखा तो खिल उठी. वह अमित को देखती रह गई. शिक्षित, धनी, स्मार्ट अमित उस जैसी मध्यवर्गीय घर से ताल्लुक रखने वाली साधारण लड़की को प्यार करता है, यह सोचते ही पायल खुद पर इतरा उठी. पास आते ही अमित ने उस की कमर में हाथ डाल दिया और इधरउधर देखते हुए कहा, ‘‘चलो, कहीं चल कर कौफी पीते हैं.’’

‘‘नहीं अमित, अगर किसी ने देख लिया तो?’’

‘‘अरे पायल, मैं तुम्हें जिस होटल में ले जाऊंगा वहां तुम्हारी जानपहचान का कोई फटक भी नहीं सकता.’’

पायल को अमित की यह बात बुरी तो लगी, लेकिन उस के व्यक्तित्व के रोब में दबा उस का मन कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया, उस ने चुपचाप सिर हिला दिया. अमित उसे एक शानदार महंगे होटल में ले गया और दोनों ने एक कोने में बैठ कर कौफी और कुछ स्नैक्स का और्डर दे दिया, हलकाहलका मधुर संगीत और होटल के शानदार इंटीरियर को देख पायल का मन झूम उठा.

अमित की मीठीमीठी बातें सुन कर पायल किसी और ही दुनिया में पहुंच गई. करीब घंटेभर दोनों साथ बैठे रहे. इस दौरान कभी अमित पायल का हाथ अपने हाथ में ले कर बैठता तो कभी उस के खूबसूरत सुनहरे बालों को उंगलियों से सहलाने लगता. पायल हमेशा की तरह सुधबुध खो कर उस की बातों की दीवानी बन खोई रही. जब उस के मोबाइल की घंटी बजी तो वह होश में आई, उस के पापा का फोन था, उन्होंने पूछा, ‘‘कहां हो?’’

पायल ने तुरंत कहा, ‘‘बस पापा, रास्ते में हूं, घर पहुंचने वाली हूं.’’ उस ने अमित से कहा, ‘‘अब मैं जा रही हूं, फिर मिलेंगे.’’ अमित ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मैं यहां अपने दोस्त का इंतजार कर रहा हूं, वह आता ही होगा.’’ पायल चली गई. अमित ने मुसकराते हुए घड़ी देखी. रंजना को उस ने आधे घंटे बाद यहीं बुलाया था. वह जानता था कि पायल घंटेभर से ज्यादा नहीं रुक पाएगी, क्योंकि उस के पापा काफी अनुशासनप्रिय हैं.

अमित बिजनैसमैन कमलकांत का इकलौता बेटा था, मम्मी का देहांत हो चुका था. उस ने अभीअभी एमबीए किया था ताकि बिजनैस संभाल सके. वह युवतियों को खिलौना समझता था, उन पर पैसा खर्च कर वह अपना उल्लू साधता था. वह कई युवतियों से एकसाथ फ्लर्ट करता था. कालेज में युवतियां उस की दीवानी थीं, जिस का उस ने हमेशा फायदा उठाया.

पायल के जाने के बाद वह अब रंजना का इंतजार कर रहा था. खुले विचारों वाली रंजना मौडर्न ड्रैस पहन कर मिलने आई थी. अमित को देख कर उस ने फ्लाइंग किस की और पास पहुंच कर उस से सट कर बैठ गई. अमित ने उस से प्यार भरी बातें कीं और छेड़खानी शुरू कर दी.

रंजना खुद को बड़ी खुशनसीब मानती थी कि उसे अमित जैसा दौलतमंद बौयफ्रैंड मिला. उस ने शादी का जिक्र किया, ‘‘अमित, तुम डैड से हमारी शादी की बात कब कर रहे हो?’’

अमित चौंक कर बोला, ‘‘देखता हूं, अभी तो डैड बहुत बिजी हैं,’’ कहते हुए वह मन ही मन हंसा, ’कितनी बेवकूफ होती हैं लड़कियां, दो बोल प्यार के सुन कर शादी के सपने देखने लगती हैं, हुंह. शादी और इन से, शादी तो अपने ही जैसे उच्चवर्गीय परिवार की किसी लड़की से करूंगा, मखमल में टाट का पैबंद तो लगने से रहा,’अमित ने रंजना की बातों का रुख मोड़ दिया. फिर घंटेभर टाइमपास कर रंजना को ले कर कार की तरफ बढ़ा और उस के घर से पहले ही कार रोक कर उसे उतार कर आगे बढ़ गया.

वह जब घर पहुंचा तो उस के पिता कमलकांत औफिस से आ चुके थे, वे ड्राइंगरूम में गुमसुम बैठे थे. अमित गुनगुनाते हुए घर के अंदर दाखिल हुआ तो उस से पापा की नजरें मिलीं. अमित ने अपने पिता के चेहरे की गंभीरता भांप ली और बोला, ‘‘डैड, कुछ प्रौब्लम है क्या? आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

कमलकांत कुछ नहीं बोले, बस, सोफे पर उन्होंने सिर टिका लिया. अमित घबरा कर आगे बढ़ा, ‘‘क्या हुआ डैड?’’

कमलकांत की बुझीबुझी सी आवाज आई, ‘‘2 दिन से सोच रहा हूं तुम्हें बताने के लिए, मुझे एबीसी कंपनी के शेयरों में काफी घाटा हुआ है. अब सारा पैसा डूब गया, जबरदस्त नुकसान हुआ है.’’

दोनों बापबेटा काफी देर सिर पकड़ कर बैठे रहे, फिर कमलकांत ने कहा,

‘‘मि. कुलकर्णी की बेटी से तुम्हारे रिश्ते की जो बात चल रही थी आज उन्होंने भी बात घुमाफिरा कर इस रिश्ते को खत्म करने का संकेत दे दिया है. अब तुम्हें कोई लड़की पसंद हो तो बता देना,’’ तभी नौकर ने आ कर खाना बनाने के लिए पूछा तो दोनों ने ही मना कर दिया.

दोनों के होश उड़े हुए थे, दोनों बापबेटा अपनेअपने कमरे में रातभर जागते रहे. कमलकांत रातभर अपने वकील, सैक्रेटरी, मैनेजर से बात करते रहे, अमित ने तो अपना फोन ही स्विचऔफ कर दिया था, कहां तो वह रोज इस समय फोन पर किसी न किसी लड़की को भविष्य के सुनहरे सपने दिखा रहा होता था. अगले कुछ दिनों में स्थिति और भी स्पष्ट होती चली गई थी. शहर में चर्चा होने लगी, इसी वजह से कमलकांत को हार्टअटैक आ गया, उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती किया गया. अमित की भी हालत खराब थी. रिश्तेदारों ने भी उस से दूरी बना ली. सिर्फ एकदो दोस्त उस के साथ अस्पताल में थे.

अमित पिता की रातदिन देखभाल कर रहा था. कुछ दिन बाद जब उन की हालत में कुछ सुधार हुआ तो डाक्टर के निर्देशों के साथ घर आते ही उन्होंने अमित से कहा, ‘‘बेटा, तुम जल्दी से जल्दी साधारण ढंग से ही शादी कर लो, मेरी एक चिंता तो खत्म हो जाएगी. तुम्हारी तो इतनी सारी लड़कियों से दोस्ती है. मुझे बताओ, किस से शादी करना चाहते हो?’’

‘‘डैड, पहले आप ठीक तो हो जाओ, मुझे तय करने के लिए थोड़ा समय चाहिए.’’

समाचारपत्रों में छपी खबरों से अब तक रंजना, पायल और अन्य लड़कियों को भी अमित के चरित्र और कमलकांत की गिरती साख की खबर लग चुकी थी. अमित ने पायल को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने साफ इनकार कर दिया और बोली, ‘‘तुम एक आवारा और चरित्रहीन लड़के हो, लड़कियों की भावनाओं से खेलते हो. शादी तो दूर मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती.‘‘

अमित पायल के व्यंग्यबाणों से अपमान, मानसिक पीड़ा और क्रोध में जला जा रहा था. इस पीड़ा से उस ने अपनेआप को बहुत मुश्किल से संभाला. सामान्य होने के बाद उस ने रंजना को फोन किया तो रंजना का भी जवाब था, ‘‘तुम अब कुछ भी नहीं हो अमित, जिस पिता के पैसे पर ऐश कर के लड़कियों को बेवकूफ बनाते थे वह पैसा तो अब डूब गया. अब मेरी भी तुम में कोई रुचि नहीं है. मुझे पूजा, अनीता और मंजू के बारे में भी पता चल चुका है, अब सब तुम्हारी हकीकत जान चुके हैं. पिता की दौलत के बिना तुम कुछ नहीं हो, किसी लड़की को अपने से कम समझना, तुम लड़कों का ही हक नहीं है बल्कि हम में भी फैसला लेने की क्षमता, इच्छा, रुचि और पसंद होती है. काश, तुम गरीब और साधारण रूपरंग वाले लेकिन चरित्रवान युवक होते और लड़कियों की भावनाओं से नहीं खेलते,’’ कह कर रंजना ने उस की बात सुने बिना ही फोन रख दिया.

अमित को ऐसा लगा जैसा कि रंजना ने उसे करारा तमाचा मारा हो. निष्प्राण सा वह बिस्तर पर ढह गया. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो शरीर का खून पानी हो गया हो. उस का गला सूखने लगा और वह अब कुछ करने की हालत में नहीं था. वह बड़ी मुश्किल से उठा और पापा को उस ने अपने हाथ से जबरदस्ती कुछ खिला कर दवा दी, फिर अपने कमरे में आ कर निढाल पड़ गया. उस के दिलोदिमाग में विचारों की आंधी का तांडव चल रहा था. वह इस तरह अपने को ठुकराना सहन नहीं कर पा रहा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस जैसे स्मार्ट, हैंडसम लड़के का कोई लड़की इस तरह से अपमान कर सकती है. उस ने अब तक न जाने कितनी लड़कियों को अपनी बातों के जाल में फंसाया था, लेकिन आज उन साधारण लड़कियों ने उस के घमंड को चकनाचूर कर दिया.

मन शांत हुआ तो उस ने सोचा कि सिर्फ पुरुष होने के नाते वह किसी लड़की की भावनाओं से नहीं खेल सकता. उस ने हमेशा अपनी भावनाओं को ही महत्त्व दिया. कभी उस के मन में यह बात नहीं आई कि किसी लड़की का भी आत्मसम्मान व पसंदनपसंद हो सकती है. उस के दिमाग में तो हमेशा यही गलतफहमी रही कि उसे पा कर हर लड़की खुद को धन्य समझेगी, लेकिन उस रात आत्मविश्लेषण करते हुए उस ने महसूस किया कि पायल और रंजना की बातों ने उस की सोच को नया आयाम दिया है. सुबह उस का मन एकदम शांत था, ठीक तूफान के गुजरने के बाद की तरह शांत. उसे अपनी भूल का एहसास हो चुका था. वह मन ही मन पायल, रंजना और पता नहीं कितनी लड़कियों से माफी मांग रहा था. Hindi Story

Hindi Family Story: क्या मैं गलत हूं – शादीशुदा मयंक को क्या अपना बना पाई मायरा?

Hindi Family Story: पियाबालकनी में आ कर खड़ी हो गई. खुली हवा में सांस ले कर ऐसा लगा जैसे घुटन से बाहर आ गई हो. आसपास का शांत वातावरण, हलकीहलकी हवा से धीरेधीरे लहराते पेड़पौधे, डूबता सूरज सबकुछ सुकून मन को सुकून सा दे रहा था. सामने रखी चेयर पर बैठ कर आंखें मूंद लीं. भरसक प्रयास कर रही थी अपने को भीतर से शांत करने का. लेकिन दिमाग शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. एक के बाद एक बात दिमाग में आती जा रही थी…

मैं पिया इस साल 46 की हुई हूं. जानपहचान वाले अगर मेरा, मेरे परिवार का खाका खींचेंगे तो सब यही कहेंगे, वाह ऐश है पिया की, अच्छाखासा खातापीता परिवार, लाखों कमाता पति, होशियार कामयाब बच्चे, नौकरचाकर और क्या चाहिए किसी को लाइफ में खुद भी ऐसी कि 4 लोगों के बीच खड़ी हो जाए तो अलग ही नजर आती है. खूबसूरती प्रकृति ने दोनों हाथों से है. ऊपर से उच्च शिक्षा ने उस में चारचांद लगा दिए. तभी तो मयंक को वह एक नजर में भा गई थी.

‘नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी, बेंगलुरु’ से मास्टर डिगरी ली थी उस ने.

जौब के बहुत मौके थे. मयंक का गारमैंट्स का बिजनैस देशविदेश में फैला था. फैशन इलस्टेटर की जौब के लिए उस ने अप्लाई किया था. उस के डिजाइन्स किए गारमैंट्स के कंपनी को काफी बड़ेबड़े और्डर मिले. मयंक की अभी तक उस से मुलाकात नहीं हुई, बस नाम ही

सुना था.

पिया के काम की तारीफ और स्पैशल इंसैंटिव के लिए मयंक ने उसे स्पैशल अपने कैबिन में बुलाया. कंपनी के सीईओ से मिलना पिया के लिए फक्र की बात थी.

मयंक को देखा तो देखती रह गई. किसी फिल्मी हीरो जैसी पर्सनैलिटी थी उस की. लेकिन पिया कौन सी कम थी. मयंक के दिल में उसी दिन से उतर गई थी. पिया कंपनी के सीईओ के लिए कुछ ऐसावैसा सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन मयंक ने तो बहुत कुछ सोच लिया था पिया को देख कर. अब तो वह नित नए बहाने बना कर पिया को डिस्कस करने के लिए कैबिन में बुला लेता. पिया बेवकूफ तो थी नहीं कि कुछ सम?ा न पाती. मयंक ने उस से जब बातों ही बातों में शादी का प्रस्ताव रखा तो पिया को लगा कि कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रही. सपनों का राजकुमार उसे मिल गया था.

शादी के बाद पिया का हर दिन सोना और रात चांदी थी. 1 साल के अंदर ही पिया बेटे अनुज की मां बन गई और डेढ़ साल बाद ही स्वीटी की किलकारियों से घर फिर से गुलजार हो गया.

कहते हैं न जब प्रकृति देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है. दोनों बच्चे एक से बढ़ कर एक होशियार. अनुज 12वीं के बाद ही आस्ट्रेलिया चला गया और वहां से बीबीए करने के बाद उस ने मयंक के साथ बिजनैस संभाल लिया. बापबेटे की देखरेख में बिजनैस खूब फूलफल रहा था. स्वीटी का एमबीबीएस करते हुए शशांक के साथ अफेयर हो गया तो दोनों की पढ़ाई खत्म होते हुए उन की शादी कर दी. आज दोनों मिल कर अपना बड़ा सा क्लीनिक चला रहे हैं.

पिया की यह कहानी सुन कर यह लगेगा न वाऊ क्या लाइफ है. पिया को भी ऐसा लगता है. लेकिन लाइफ यों ही मजे से गुजरती रहे ऐसा भला होता है? बस पिया की जिंदगी में भी ट्विस्ट आना बाकी था.

मयंक का अपने बिजनैस के सिलसिले में दुबई काफी आनाजाना था. मायरा जरीवाला गुजरात से थी. गारमैंट्स स्टार्टअप से शुरुआत की थी उस ने और आज उस की गुजराती टचअप लिए क्लासिक और मौडर्न ड्रैसेज की खूब डिमांड हो रही थी. बहुत महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. मयंक की गारमैंट इंडस्ट्री के साथ टाइअप कर के वह अपने और पांव पसारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने दुबई में मयंक के साथ एक मीटिंग रखी थी.

मयंक 48 वर्ष का हो चुका था. कहते हैं कि पुरुष इस उम्र में अपने अनुभव, अपने धीरगंभीर व्यक्तित्व और पैसे वाला हो तो उस की पर्सनैलिटी में गजब की रौनक आ जाती है. माएरा मयंक के इस रोबीले व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. उस की कंपनी के साथ टाइअप के साथसाथ उस की जिंदगी के साथ भी टाइअप करने की उस ने ठान ली.

पता नहीं क्यों पत्नी चाहे कितनी ही खूबसूरत, प्यार करने वाली हो, हर तरह से खयाल रखने वाली हो, लेकिन जहां कोई दूसरी औरत, ऊपर से खूबसूरत लाइन देने लगे तो पुरुष को उस की तरफ खिंचते हुए ज्यादा देर नहीं लगती. मयंक भी पुरुष था. मायरा एक बिजनैस वूमन थी. ऊपर से पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी 35 साल की खूबसूरत औरत.

मयंक धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होता गया. मायरा नए दौर की औरत थी, जिस के लिए पुरुष के साथ रिलेशनशिप बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. अपनी खुशी उस के लिए सब से ज्यादा माने रखती थी. मयंक और वह अब अकसर दुबई में ही मिलते और हफ्ता साथ बिता कर अपनेअपने बिजनैस में लग जाते. दोनों बिजनैस वर्ल्ड में अपनी रैपो बना कर रखना चाहते थे.

‘‘मयंक डियर, मु?ो बुरा लगता है कि मेरे कारण तुम पिया के साथ धोखा कर रहे हो. लेकिन मैं क्या करूं. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. अब मेरी खुशी तुम से जुड़ी है,’’ मायरा मयंक को अपनी बांहों के घेरे में घेरती हुई बोली.

‘‘मायरा, मैं तुम से ?ाठ नहीं बोलूंगा. पिया से मैं भी प्यार करता हूं. लेकिन अब जब भी तुम्हारे साथ होता हूं मु?ो अजीब सा सुकून मिलता है. मैं उसे कोई दुख नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन तुम्हें अब छोड़ भी नहीं सकता. वह मेरी जिंदगी है तो तुम मेरी सांस हो. मायरा, अब मैं तुम्हें जीवनभर यों ही प्यार करना चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब तक पिया की जगह एक तरफ

है और तुम्हारी दूसरी तरफ. मैं दोनों को ही शिकायत का मौका नहीं देना चाहता,’’ मयंक ने मायरा को एक भरपूर किस करते हुए अपने आगोश में ले लिया.

मयंक ने पूरी कोशिश की थी कि पिया को मायरा के बारे में कुछ पता न चले.

वह मायरा के साथ अपनी सारी चैट साथ ही

साथ डिलीट कर देता था. मोबाइल में अपना फिंगर पासवर्ड लगा रखा था. पिया खुद भी मयंक का मोबाइल कभी चैक नहीं करती थी, पूरा विश्वास जो था उस पर, लेकिन उस दिन मयंक नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम में गया मायरा के 2-3 व्हाट्सऐप मैसेज आ गए.

पिया की नजर मोबाइल पर पड़ी. मोबाइल पर 2-3 बार बीप की आवाज हुई. नोटीफिकेशन में माई डियर लिखा दिख गया.

पिया का माथा ठनक गया. अब उसे मयंक की हरकतों पर शक होना शुरू हो गया. मयंक का बिजनैस ट्रिप की बात कह कर जल्दीजल्दी दुबई जाना, मोबाइल चैट पढ़ते हुए मंदमंद मुसकान, उस पर जरूरत से ज्यादा प्यार लुटाना, बातवेबात उसे गिफ्ट दे कर खुश रखना.

अपनी बौडी फिटनैस के लिए जिम एक दिन भी मिस न करना, डाइट पर पूरापूरा ध्यान देना जिस के लिए वह कहतेकहते थक जाती थी, लेकिन वह लापरवाही करता था. पिया को एक के बाद एक सब बातें जुड़ती नजर आने लगीं.

मयंक की जिंदगी में आजकल क्या चल रहा है उस का पता लगाना उस के लिए मुश्किल नहीं था. मयंक का ऐग्जीक्यूटिव असिस्टैंट समीर को एक तरह से पिया ने ही जौब पर रखा था. वह उस की फ्रैंड सीमा का कजिन था. समीर पिया की बहुत इज्जत करता था और अपनी बड़ी बहन मानता था.

पिया ने जब समीर से मयंक के प्रेमप्रसंग के बारे में पूछा तो उस ने अपना नाम बीच में न आने की बात कह पिया को मायरा के बारे में सबकुछ बता दिया.

समीर उसे मायरा और मयंक के बीच के बारे में बताता जा रहा था और पिया को लग रहा था जैसे उस के सपनों का महल जिसे उस ने प्यार से मजबूत बना दिया था आज रेत की तरह ढह गया है.

कहां कमी छोड़ दी थी उस ने. सबकुछ तो मयंक के कहे अनुसार करती रही थी. उस ने कहा नौकरी छोड़ दो, उस ने छोड़ दी. अपने कैरियर के पीक पर थी वह लेकिन मयंक के प्यार के आगे सब फीका लगा. उस ने कहा कि पिया बच्चों की देखभाल तुम्हारी जिम्मेदारी है, मैं अपने काम में बिजी हूं, तो यह बात भी उस ने मयंक की चुपचाप मान ली थी.

बच्चों की हर जिम्मेदारी उस ने खुद पर ले ली थी. अड़ोसपड़ोस, नातेरिश्तेदार, घरबाहर की सब व्यवस्था उस ने संभाल ली थी. किस के लिए, मयंक के लिए न, क्योंकि मयंक ही उस की दुनिया था. सबकुछ उस से ही तो जुड़ा था और उस ने कितनी आसानी से मायरा को उस के हिस्से का प्यार दे दिया. यह भी नहीं सोचा कि उस पर क्या बीतेगी, जब उसे पता चलेगा.

पिया को ऐसा लग रहा था जैसे उस की नसों में गरम खून दौड़ रहा है. तनमन दहक रहा है. मन कर रहा था कि मयंक को सब के सामने शर्मसार कर दे.

पिया यह सब तू क्या सोच रही है’, अचानक पिया को अपने मन की आवाज सुनाई दी, ‘पिया, यह तो तु?ो मयंक के बारे में अचानक शक हो गया तो तू ने सच पता कर लिया. अगर उस दिन फोन नहीं देखती तो? सबकुछ वैसा ही चलता रहता जैसे पिछले कई बरसों से चलता आ रहा है.’

पिया की सोच जैसे तसवीर का दूसरा पहलू देखने लगी थी. आज समाज में मयंक का एक रुतबा है. बेटे की बिजनैस टाइकून की इमेज बनी हुई. बेटी स्वीटी अपनी ससुराल में सिरआंखों पर बैठाई जाती है, क्योंकि उस का मायका रुसूखदार है. खुद का सोसाइटी में हाई प्रोफोइल स्टेट्स रखती है. आज अगर वह मुंह खोलती है तो मयंक के इस अफेयर को ले कर मीडिया वाले मिर्चमसाला लगा कर जगजाहिर कर देंगे. उन के बिजनैस पर इस का बहुत फर्क पड़ेगा.

बरसों से कमाई गई शोहरत पर ऐसा धब्बा लगेगा जिस का खमियाजा अनुज को भुगतना पड़ेगा, बेटा जो है. अभी तो उस का पूरा भविष्य पड़ा है आगे अपनी शोहरत बटोरने के लिए. स्वीटी के लिए मयंक उस के आइडियल पापा हैं. समाज में कितना रुतबा है उन के खानदान का. ऊफ, सब मिट्टी में मिल जाएगा. सोचतेसोचते पिया का सिर चकराने लगा था.

‘‘पिया मैडम, जरा संभल कर. आप ठीक तो हैं न, आप यहां आराम से बैठिए,’’ समीर ने पिया को कुरसी पर बैठाते हुए कहा.

पिया को पानी का गिलास दिया तो वह एक सांस में पी गई. उस की चुप्पी सबकुछ वैसा ही चलते रहने देगी जैसे चलता आ रहा है और अपने साथ हो रही बेवफाई को सरेआम करती है तो सच बिखर जाएगा. दिल और दिमाग में टकराव चल रहा था.

अचानक पिया कुरसी से उठ खड़ी हुई. पर्स से मोबाइल निकाला और

मयंक को फोन मिलाया, ‘‘मयंक, कहां हो तुम.’’

‘‘डार्लिंग, मीटिंग के लिए बाहर आया था. क्यों क्या बात है?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘वह मैं तुम्हारे औफिस आई थी कि साथ लंच करते हैं.’’

‘‘ओह, यह बात है. नो प्रौब्लम, ऐसा करो तुम शंगरिला होटल पहुंचो, मैं सीधा तुम्हें वहां

15 मिनट में मिलता हूं. साथ लंच करते हैं वहां,’’ मयंक ?ाट से बोला.

‘‘ठीक है मैं पहुंचती हूं,’’ बोल कर पिया ने फोन काट दिया.

पिया जब होटल पहुंची तो मयंक उसे उस का इंतजार करता मिला.

पिया को लगा जैसे मयंक वही तो है जैसे पहले था. उस का खयाल रखने वाला. उसे इंतजार न करना पड़े इसलिए खुद पहले पहुंच जाना. मयंक के प्यार में कमी तो उसे कहीं दिख नहीं रही.

दोनों ने साथ लंच किया और मयंक ने उसे घर छोड़ा और औफिस चला गया, क्योंकि 4 बजे उस की क्लाइंट के साथ फिर मीटिंग थी.

घर आ कर पिया बालकनी में बैठ गई थी. उस ने निर्णय ले लिया. मयंक का सबकुछ बिखेर कर रख देगा. जो कुछ वह देख पा रही है शायद मयंक ने उस बारे में सोचा तक नहीं है. उस का सबकुछ तबाह हो जाएगा.

मयंक ने शायद सोचा ही नहीं कि मायरा के साथ उस की खुशी बस तभी तक है जब तक सब परदे के पीछे है. सच सामने आ गया तो सब खत्म हो जाएगा. न प्यार का यह नशा रहेगा, न परिवार में इज्जत, न समाज में मानप्रतिष्ठा.

‘उस की तो दोनों तरफ हार है. मयंक की तबाही से उसे क्या हासिल होगा. खुशी तो मिलने से रही. फिर यह ?ाठ ही क्यों नहीं अपना लिया जाए,’ पिया दिल को एक तरफ रख दिमाग से सोचने लगी, ‘मयंक उस से मायरा का सच छिपाने के लिए उस से बेइंतहा प्यार करने लगा है. प्यार तो कर रहा है न.

‘उस के प्यार के बिना वह नहीं रह सकती. नहीं जी पाएगी वह उस के बिना. मयंक इस भुलावे में रहे कि वह उस की सचाई जानती तो अच्छा ही है. सब अच्छी तरह तो चल रहा है.

‘पत्नी हूं मैं उस की, मेरा हक कोई और छीन नहीं सकता. पतिपत्नी के रिश्ते में सचाई होनी चाहिए. यह बात मानती है वह लेकिन अगर आज वह मयंक को उस के सच के साथ नंगा कर देगी तो क्या उन के बीच वह पहले जैसा प्यार रह पाएगा? नहीं, कई बार झूठ को ही अपनाना पड़ता है. दवा कड़वी होती है, लेकिन इलाज के लिए खानी ही पड़ती है.’

पिया ने अब निर्णय ले लिया और एक नई पहल शुरू करने के लिए वह कमरे के भीतर गई. लाइट औन की. पूरा कमरा लाइट से जगमगा उठा. अब अंधेरा नहीं था. मयंक के सामने जाहिर नहीं होने देगी कि वह सब जान चुकी है. शायद यही सब के लिए ठीक है. गलत तो नहीं है वह कहीं? Hindi Family Story

Story In Hindi: औरों से जुदा – निशा ने जब खुद को रवि को सौंपने का फैसला किया

Story In Hindi: अपनीसहेली महक का गुस्से से लाल हो रहा चेहरा देख कर निशा मुसकराने से खुद को रोक नहीं सकी. बोली, ‘‘मयंक की बर्थडे पार्टी में तेरे बजाय रवि प्रिया को क्यों ले जा रहा है?’’ निशा की मुसकराहट ने महक का गुस्सा और ज्यादा भड़का दिया.

निशा ने प्यार से महक का हाथ थामा और फिर शांत स्वर में जवाब दिया, ‘‘परसों रविवार को मेरा जापानी भाषा का एक महत्त्वपूर्ण इम्तिहान है, इसलिए मैं ने रवि को सौरी बोल दिया था. रही बात प्रिया की, तो वह रवि की अच्छी फ्रैंड है. दोनों का पार्टी में साथ जाना तुझे क्यों परेशान कर रहा है?’’ ‘‘क्योंकि मैं प्रिया को अच्छी तरह जानती हूं. वह तेरा पत्ता साफ रवि को हथियाना चाहती है.’’

‘‘देख एक सुंदर, स्मार्ट और अमीर लड़के को जीवनसाथी बनाने की चाह हर लड़की की तरह प्रिया भी अपने मन में रखती है, तो क्या बुरा कर रही है?’’ ‘‘तू रवि को खो देगी, इस बात को सोच कर क्या तेरा मन जरा भी चिंतित या परेशान नहीं होता है?’’

‘‘नहीं, क्योंकि रवि की जिंदगी में मुझ से बेहतर लड़की और कोई नहीं है,’’ निशा का स्वर आत्मविश्वास से लबालब था. ‘‘उस ने पहले मुझ से ही पार्टी में चलने को कहा था, यह क्यों भूल रही है तू?’’

‘‘प्रिया को रवि के साथ जाने का मौका दे कर तू ने गलती करी है, निशा. तुम जैसी मेहनती लड़की को इम्तिहान में पास होने की चिंता करनी ही नहीं चाहिए थी. रवि के साथ पार्टी में तुझे ही जाना चाहिए था, बेवकूफ.’’ ‘‘सच बात तो यह है कि मेरा मन भी नहीं लगता है रवि के अमीर दोस्तों के द्वारा दी जाने वाली पार्टियों में, महक. लंबीलंबी कारों में आने वाले मेहमानों की तड़कभड़क मुझे नकली और खोखली लगती है. न वे लोग मेरे साथ सहज हो पाते हैं और न मैं उन सब के साथ. तब रवि भी पार्टी का मजा नहीं ले पाता है. इन सब कारणों से भी मैं ऐसी पार्टियों में रवि के साथ जाने से बचती हूं,’’ निशा ने बड़ी सहजता से अपने मन की बात महक से कह दी.

‘‘तू मेरी एक बात का सचसच जवाब देगी?’’ ‘‘हां, दूंगी.’’

‘‘क्या तू रवि से शादी करने की इच्छुक नहीं है?’’

कुछ पलों के सोचविचार के बाद निशा ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘यह सच है कि रवि मेरे दिल के बेहद करीब है…उस का साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है, लेकिन हमारी शादी जरूर हो, ऐसी उलझन मैं अपने मन में नहीं पालती हूं. भविष्य में जो भी हो मुझे स्वीकार होगा.’’ ‘‘अजीब लड़की है तू,’’ महक हैरानपरेशान हो उठी, देख, ‘‘अमीर खानदान की बहू बन कर तू अपने सारे सपने पूरे कर सकेगी. तुझे रवि को अपना बना कर रखने की कोशिशें बढ़ा देनी चाहिए. इस मामले में जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वासी होना गलत और नुकसानदायक साबित होगा, निशा.’’

‘‘रवि को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए मेरा उस के पीछे भागना मूर्खतापूर्ण और बेहूदा लगेगा, महक. अच्छे जीवनसाथी साथसाथ चलते हैं न कि आगेपीछे.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘अब लेकिनवेकिन छोड़ और मेरे साथ जिम चल. कुछ देर वहां पसीना बहा कर मैं तरोताजा होना चाहती हूं,’’ निशा ने एक हाथ में अपना बैग उठाया और दूसरे हाथ से महक का हाथ पकड़ कर बाहर चल पड़ी. निशा ने अपनी मां को जिम जाने की बात बताई और फिर दोनों सहेलियां फ्लैट से बाहर आ गईं.

जिम में अच्छीखासी भीड़ इस बात की सूचक थी कि लोगों में स्वस्थ रहने व स्मार्ट दिखने की इच्छा बढ़ती जा रही है. निशा वहां की पुरानी सदस्य थी, इसलिए ज्यादातर लोग उसे जानते थे. उन सब से हायहैलो करते हुए वह पसीना बहाने में दिल से लग गई. लेकिन महक की दिलचस्पी तो उस से बातें करने में कहीं ज्यादा थी.

खुद को फिट रखने की आदत ने निशा की फिगर को बहुत आकर्षक बना दिया था. उस का पसीने में भीगा बदन वहां मौजूद हर पुरुष की प्रशंसाभरी नजरों का केंद्र बना हुआ था. उन नजरों में अश्लीलता का भाव नहीं था, क्योंकि अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वह उन सभी की दोस्ती, स्नेह व आदरसम्मान की पात्रता हासिल कर चुकी थी. लगभग 1 घंटा जिम में बिताने के बाद दोनों घर चल पड़ीं.

‘‘यू आर द बैस्ट, निशा,’’ अचानक महक के मुंह से निकले इन प्रशंसाभरे शब्दों को सुन कर निशा खुश होने के साथसाथ हैरान भी हो उठी. ‘‘थैंकयू, स्वीटहार्ट, लेकिन अचानक यों प्यार क्यों दर्शा रही है?’’ निशा ने भौंहें मटकाते हुए पूछा.

‘‘मैं सच कह रही हूं, सहेली. तेरे पास क्या नहीं है? सुंदर नैननक्श, गोरा रंग, लंबा कद… एमकौम, एमबीए और जापानी भाषा की जानकारी…बहुराष्ट्रीय कंपनी में शानदार नौकरी…एक साधारण से स्कूल मास्टर की बेटी के लिए ऐसे ऊंचे मुकाम पर पहुंचना सचमुच काबिलेतारीफ है.’’ ‘‘जो गुण और परिस्थितियां कुदरत ने दिए हैं, मैं न उन पर घमंड करती हूं और न ही कोई शिकायत है मेरे मन में. अपने व्यक्तित्व को निखारने व कड़ी मेहनत के बल पर अच्छा कैरियर बनाने के प्रयास दिल से करते रहना मेरे लिए हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है. अपनी गरीबी और सुखसुविधाओं की कमी का बहाना बना कर जिंदगी में तरक्की करने का अपना इरादा कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया. मेरे इसी गुण ने मुझे इन ऊंचाइयों तक पहुंचाया है,’’ अपने मन की बातें बताते हुए निशा की आवाज में उस का आत्मविश्वास साफ झलक रहा था.

‘‘अब रवि से तेरी शादी भी हो जाए तो फिर तेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं रहेगी,’’ महक ने भावुक लहजे में अपने मन की इच्छा दर्शाई. कुछ पल खामोश रह कर निशा ने किसी दार्शनिक के से अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने अपनी खुशियों को रवि के साथ शादी होने से बिलकुल नहीं जोड़ रखा है. कुछ खास पा कर अपनी खुशियां हमेशा के लिए तय कर लेना मुमकिन भी नहीं होता है, सहेली. जीवनधारा निरंतर गतिमान है और मैं अपनी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर बनाने को निरंतर गतिशील रहना चाहती हूं. मेरे लिए यह जीवन यात्रा महत्त्वपूर्ण है, मंजिलें नहीं. रवि से मेरी शादी हो गई, तो मैं खुश हूंगी और नहीं हुई तो दुखी नहीं हूंगी.’’

‘‘तुम दूसरी लड़कियों से कितनी अलग हो.’’ ‘‘सहेली, हम सब ही इस दुनिया में अनूठे और भिन्न हैं. दूसरों से अपनी तुलना करते रहना अपने समय व ताकत को बेकार में नष्टकरना है. मैं अपनी जिंदगी को खुशहाल अपने बलबूते पर बनाना चाहती हूं. इस यात्रा में रवि मेरा साथी बनता है, तो उस का स्वागत है. ऐसा नहीं होता है, तो भी कोई गम नहीं क्योंकि कोई दूसरा उपयुक्त हमराही मुझे जरूर मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

‘‘शायद तेरे इस अनूठेपन के कारण ही रवि तेरा दीवाना है… तेरा आत्मविश्वास, तेरी आत्मनिर्भरता ही तेरी ताकत और अनूठी पहचान है.’’ महक के मुंह से निकले इन वाक्यों को सुन कर निशा बड़े रहस्यमयी अंदाज में मुसकराने लगी थी.

महक और निशा ने घर का आधा रास्ता ही तय किया होगा जब रवि की कार उन की बगल में आ कर रुकी. उसे अचानक सामने देख कर निशा का चेहरा गुलाब के फूल सा खिल उठा. ‘‘हाय, तुम यहां कैसे?’’ निशा ने रवि से प्रसन्न अंदाज में हाथ मिलाया और फिर छोड़ा

ही नहीं. ‘‘पार्टी में जाने का मन नहीं किया,’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए जवाब दिया, ‘‘कुछ समय तुम्हारे साथ बिताने के बाद पार्टी में जाऊंगा.’’

‘‘क्या? प्रिया को भी साथ ले जाओगे?’’ महक चुभते से लहजे में यह पूछने से खुद को नहीं रोक पाई. ‘‘नहीं, वह अमित के साथ जा चुकी है. चलो, आइसक्रीम खाने चलते हैं,’’ रवि ने महक के सवाल का जवाब लापरवाही से देने के बाद अपना ध्यान फिर से निशा पर केंद्रित कर लिया.

‘‘पहले मुझे घर छोड़ दो,’’ महक का मूड उखड़ा सा हो गया. ‘‘ओके,’’ रवि ने साथ चलने के लिए महक पर जरा भी जोर नहीं डाला.

निशा रवि की बगल में और महक पीछे की सीट पर बैठ गई तो रवि ने कार आगे बढ़ा दी. ‘‘पहले तुम दोनों मेरे घर चलो,’’ निशा ने मुसकराते हुए माहौल को सहज करने की कोशिश करी. ‘‘नहीं, यार. मैं कुछ वक्त सिर्फ तुम्हारे साथ गुजारना चाहता हूं,’’ रवि ने उस के प्रस्ताव का फौरन विरोध किया.

‘‘पहले घर चलो, प्लीज,’’ निशा ने प्यार से रवि का कंधा दबाया, ‘‘मां के हाथ की बनी एक खास चीज तुम्हें खाने को मिलेगी.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘वह सीक्रेट है.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘प्लीज, बड़े प्यार से करी गई प्रार्थना को रवि अस्वीकार नहीं कर सका और फिर कार निशा के घर की तरफ मोड़ दी.’’

महक अपने घर की तरफ जाना चाहती थी, पर निशा ने उसे प्यार से डपट कर खामोश कर दिया. वह समझती थी कि उस की सहेली रवि को उस के प्रेमी के रूप में उचित प्रत्याशी नहीं मानती है. महक को डर था कि रवि उसे प्रेम में जरूर धोखा देगा. काफी समझाने के बाद भी निशा उस के इस डर को दूर करने में सफल नहीं रही थी. इसीलिए जब ये दोनों उस के साथ होती थीं, तब उसे माहौल खुश बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास हमेशा करना पड़ता था.

रवि मीठा खाने का शौकीन था. निशा की मां के हाथों के बने शाही टोस्ट खा कर उस की तबीयत खुश हो गई. मीठा खा कर महक अपने घर चली गई. निशा ने रवि को खाना खिला कर ही भेजा. हंसतेबोलते हुए 2 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला.

‘‘लंबी ड्राइव पर जाने का मौसम हो रहा है,’’ ताजी ठंडी हवा को चेहरे पर महसूस करते हुए रवि ने कार में बैठने से पहले अपने मन की इच्छा व्यक्त करी. ‘‘आज के लिए माफी दो. फिर किसी दिन कार्यक्रम…’’

‘‘परसों चलने का वादा करो…, इम्तिहान के बाद?’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए पूछा. ‘‘श्योर,’’ निशा ने फौरन रजामंदी जाहिर

कर दी. ‘‘इम्तिहान खत्म होते ही निकल लेंगे.’’

‘‘ओके.’’ ‘‘पूछोगी नहीं कि कहां चलेंगे?’’

‘‘तुम्हारा साथ है, तो हर जगह खूबसूरत बन जाएगी.’’

‘‘आई लव यू.’’ ‘‘मी टू.’’

रवि ने निशा के हाथ को कई बार प्यार से चूमा और फिर कार आगे बढ़ा दी. रवि के चुंबनों के प्रभाव से निशा के रोमरोम में अजीब सी मादक सिहरन पैदा हो गई थी. दिल में अजीब सी गुदगुदी महसूस करते हुए वह अपने कमरे में लौटी और तकिए को छाती से लगा कर पलंग पर लेट गई. रवि के बारे में सोचते हुए उस का तनमन अजीब सी खुमारी में डूबता जा रहा था. उस के होंठों की मुसकान साफ जाहिर कर रही थी कि उस वक्त उस के सपनों की दुनिया बड़ी रंगीन बनी हुई थी.

रविवार को दोपहर 12 बजे निशा की जापानी भाषा की परीक्षा समाप्त हो गई. वह हौल से बाहर आई तो उस ने रवि को अपना इंतजार करते पाया. सिर्फ 1/2 घंटे बाद रवि की कार दिल्ली से आगरा जाने वाले राजमार्ग पर दौड़ रही थी. दोनों का साथसाथ किसी दूसरे शहर की यात्रा करने का यह पहला मौका था.

मौसम बहुत सुहावना था. ठंडी हवा अपने चेहरों पर महसूस करते हुए दोनों प्रसन्न अंदाज में हसंबोल रहे थे. कुछ देर बाद निशा आंखें बंद कर के मीठे, प्यार भरे गाने गुनगुनाने लगी. रवि रहरह कर उस के सुंदर, शांत चेहरे को देख मुसकराने लगा.

‘‘तुम संसार की सब से सुंदर स्त्री हो,’’ रवि के मुंह से अचानक यह शब्द निकले, तो निशा ने झटके से अपनी आंखें खोल दीं.

रवि की आंखों में अपने लिए गहरे प्यार के भावों को पढ़ कर उस के गौरे गाल गुलाबी हो उठे और फिर शरमाए से अंदाज में वह सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘झूठे.’’

रवि ने कार की गति धीमी करते हुए उसे एक पेड़ की छाया के नीचे रोक दिया. फिर उस ने झटके से निशा को अपनी तरफ खींचा और उस के गुलाबीि होंठों पर प्यारा सा चुंबन अंकित कर दिया. निशा की तेज सांसों और खुले होंठों ने उसे फिर से वैसा करने को आमंत्रित किया, तो रवि के होंठ फिर से निशा के होंठों से जुड़ गए.

इस बार का चुंबन लंबा और गहन तृप्ति देने वाला था. उस की समाप्ति पर दोनों ने एकदूसरे की आंखों में गहन प्यार से झांका. ‘‘तुम एक जादूगरनी हो,’’ निशा की पलक को चूमते हुए रवि ने उस की तारीफ करी.

‘‘वह तो मैं हूं,’’ निशा हंस पड़ी. ‘‘मेरा दिल इस वक्त मेरे काबू में नहीं है.’’

‘‘मेरा भी.’’ ‘‘मैं तुम्हें जी भर कर प्यार करना चाहता हूं.’’

‘‘मैं भी.’’ ‘‘सच?’’

निशा ने बेहिचक ‘हां’ में सिर ऊपरनीचे हिलाया, तो रवि की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. ‘‘क्या तुम्हें अपनी बदनामी का, अपनी छवि खराब होने का डर नहीं है?’’

‘‘क्या करना है और क्या नहीं, इसे मैं दूसरों की नजरों से नहीं तोलती हूं, रवि.’’ ‘‘फिर भी शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने को समाज गलत मानता है, खासकर लड़कियों के लिए.’’

निशा ने आगे झुक कर रवि के गाल को चूमा और फिर सहज अंदाज में बोली, ‘‘स्वीटहार्ट, पुरानी मान्यताओं को जबरदस्ती ओढ़े रखने में मेरा विश्वास नहीं है. मैं इतना जानती हूं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूं और तुम्हारा स्पर्श मेरे रोमरोम में मादक झनझनाहट पैदा कर देता है.’’ ‘‘तुम्हारे साथ सैक्स संबंध बनाने का फैसला मैं तुम्हारी और अपनी खुशियों को ध्यान में रख कर करूंगी. वैसा करने के लिए तुम मुझ से शादी करने का झूठासच्चा वादा करो, यह कतई जरूरी नहीं है.’’

‘‘तो क्या तुम मेरे साथ सोने को तैयार हो?’’ ‘‘बड़ी खुशी से,’’ निशा का ऐसा जवाब सुन कर रवि जोर से चौंका, तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘तुम्हें समझना मेरे बस की बात नहीं है. साधारण से घर में पैदा हुई लड़की इतनी असाधारण… इतनी अनूठी… इतनी आत्मविश्वास से भरी कैसे हो गई है?’’ कार को फिर से आगे बढ़ाते हुए हैरान रवि ने यह सवाल मानो खुद से ही पूछा हो. ‘‘जिस के पास अपने सपनों को पूरा करने के लिए हिम्मत, लगन और कठिन मेहनत करने जैसे गुण हों, वह इंसान साधारण घर में पैदा होने के बावजूद असाधारण ऊंचाइयां ही छू सकती है,’’ होंठों से बुदबुदा कर निशा ने रवि के सवाल का जवाब खुद को दिया और फिर रवि के हाथ को प्यार से पकड़ कर शांत अंदाज में आंखें मूंद लीं.

आत्मविश्वासी निशा अपने भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थी. मस्त अंदाज में सीटी बजा रहे रवि ने भी भविष्य को ले कर एक फैसला उसी समय कर लिया. ताजमहल के सामने निशा के सामने शादी करने का प्रस्ताव रखने का निर्णय लेते हुए उस का दिल अजीब खुशी और गुदगुदी से भर उठा था, साधारण बगीचे में उगे इस असाधारण फूल की महक से वह अपना भावी जीवन भर लेने को और इंतजार नहीं करना चाहता था. Story In Hindi

Long Hindi Story: सौदा – आखिरी भाग

Long Hindi Story, लेखक – हरे राम मिश्र

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : विधवा दुलारी की बेटी रुपाली घर से क्या गई, वापस नहीं लौटी. दुलारी नेता मनोहर लाल के दरवाजे गुहार लगाने पहुंची. उन्होंने भरोसा दिलाया और कहा कि थाने में रिपोर्ट लिखवा दो. वहां मुंशी ने खर्चापानी मांगा और दुलारी की चांदी की अंगूठी रख ली. इस के बाद दुलारी ऐयाश किस्म के सरपंच से मिलने गई. अब पढि़ए आगे…

हालांकि, सरपंच से दुलारी की मुलाकात नहीं हुई और वह फिर से घर लौट आई. काफी शाम हो चुकी थी. उस ने पतीले में थोड़ा चावल डाला और नमकप्याज के साथ पका कर किसी तरह उसे हलक से नीचे उतारा. दालसब्जी कुछ नहीं थी.

दुलारी की रात किसी तरह कटी. पूरी रात वह जागती रही. लेकिन, बिटिया का अभी कोई सुराग नहीं मिला था.

दूसरे दिन अलसुबह ही दुलारी फिर से मनोहर लाल के घर पहुंच गई थी. इस बार वह अपने साथ गांव के एक लड़के को ले कर गई थी. हालांकि, बदनामी के डर से उस ने रास्ते में बिटिया के गायब होने के बारे में कोई चर्चा नहीं की, लेकिन गांव में यह बात रायते की तरह फैल चुकी थी, क्योंकि थाने से सरपंच को फोन पर मामले की जानकारी दी गई थी, ताकि लापता रूपा को खोजने में मदद मिल सके.

मनोहर लाल के यहां दुलारी की जाति के ही एक और आदमी, जो बगल के गांव का छुटभैया नेता था, से उस की मुलाकात हुई. वह मनोहर लाल से अपने गांव के वोट उन के लिए फिक्स करवाने के एवज में सौदा करने आया था और मछली बाजार के ग्राहक की तरह उन से ‘मोलतोल’ कर रहा था.

उस नेता के बारे में दुलारी अच्छे से जानती थी कि उस का धंधापानी क्या है और कैसे वह नकली दारू का सप्लायर है, क्योंकि उसी की दी हुई दारू पीने से उस के गांव में कुछ लोगों की मौत हुई थी.

‘‘क्या हुआ…’’ देखते ही मनोहर लाल ने पूछा, ‘‘मिली आप की बेटी…’’

‘‘नहीं मिली…’’ इतना कह कर दुलारी रोने लगी.

‘‘थाने गई थीं?’’ पूछने पर दुलारी ने हां में सिर हिलाया.

फिर मनोहर लाल ने अपने एक शागिर्द से थानेदार को फोन करवाया और दुलारी को बताया गया कि बेटी को पुलिस खोज रही है. मिलने पर सूचित करेगी. परेशान नहीं हो.

थकहार कर दुलारी फिर घर लौट आई. अब तक दोपहर का सूरज चढ़ आया था.

2 दिन बीत गए. रोतेरोते दुलारी के आंसू खत्म हो गए. उस ने इन दिनों ठीक से खानापीना भी नहीं किया था और भागदौड़ में उसे तेज बुखार अलग से हो गया.

तीसरे दिन, दोपहर का समय था. दुलारी घर के भीतर अपनी खटिया पर चिंतित बैठी थी. तभी गांव के चौकीदार लुल्लन ने आ कर दुलारी को बताया कि उस की बेटी पड़ोस के जिले के एक अस्पताल में भरती है. पुलिस बयान लेने वहां जा रही है. तुम भी अस्पताल पहुंचो. दारोगाजी ने बोला है.

चौकीदार ने आगे कहा कि तुम्हारी बेटी नशे की हालत में तहसील के बसस्टैंड पर लावारिस मिली थी, जिसे कुछ लोगों ने स्थानीय चौकी के सुपुर्द कर दिया था. पुलिस वालों ने उसे अस्पताल में भरती करवा दिया है. जाओ मिल लो.

दुलारी की आंखों में चमक आ गई. उस ने किसी तरह गांव के एक आदमी से कुछ पैसे उधार लिए और अपने साथ चलने की चिरौरी की. वह अस्पताल पहुंची, तो बेटी उसे अकेले एक बिस्तर पर पड़ी मिली, जिसे कुछ पुलिस वाले और डाक्टर घेरे हुए थे और कुछ लिखापढ़ी कर रहे थे. काफी देर बाद दुलारी को अपनी बेटी रूपा से बात करने का मौका मिल पाया.

दुलारी ने देखते ही अपनी बेटी को प्यार से भींच लिया, माथा चूमा, गले लगाया. उस का हीरा उसे मिल गया था. उस ने बेतहाशा उसे चूमा, दुलारा और प्यार किया. बेटी भी मां को देख कर रोने लगी. आखिर वही तो उस का सबकुछ थी.

रूपा ने देर शाम को अपनी मां से अपने साथ रेप और मारपीट की दर्दनाक घटना बताई, जिसे गांव के बगल के यादव टोला के लड़कों ने अंजाम दिया था. दोनों लड़के गांव की ताकतवर और बहुसंख्यक पिछड़ी बिरादरी से थे, लेकिन उन की जातियां अलगअलग थीं.

खैर, पुलिस ने रूपा का बयान दर्ज किया और नियमानुसार मैडिकल भी हुआ. एफआईआर भी दर्ज हुई.
दुलारी अगले 2 दिन रूपा के साथ अस्पताल और थानेअदालत के चक्कर लगाती रही.

चूंकि मनोहर लाल इस मामले में थोड़ा लगे हुए थे, इसलिए पुलिस ने जांच शुरू की. पहले आरोपी सुमेश के नाई समुदाय के लोग सामने आ गए और आरोपी के घर वाले रूपा को ही सैक्स की भूखी लड़की साबित करने लगे.

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह आरोपी लड़का टोले के पूर्व पंचायत सदस्य का बेटा और वर्तमान विधायक ‘मुंशीजी’ का खास आदमी था.

दूसरा आरोपी युवक क्षत्रिय समुदाय का रितेश था, जिस के यहां यह सब करना ‘मर्दानगी’ की पहचान थी. इस समुदाय में अपराध पर बहस न हो कर कौन उस लड़की की मदद कर रहा है, उस पर चर्चा हो रही थी.

सब जल्द ही पता चल गया. नाम मनोहर लाल का आया. बात मनोहर लाल तक, जो कुछ समय पहले ही दिल्ली से एक बिजनैस डील कर के लौटे थे, इस धमकी के साथ पहुंचाई गई कि क्षत्रियों की इज्जत से एक ‘धंधे वाली’ की आड़ में मत खेलो. निबटना है तो निबट लो. देखते हैं कि अगला चुनाव कैसे जीतते हो.

मनोहर लाल ने इस मामले को ध्यान से सुना. फिर कुछ दिन वे चुप रहे. उन्हें लगा कि मामला खत्म हो जाएगा. लेकिन, इधर नाई समुदाय जहां लड़के के पक्ष में जुलूस निकाल रहा था, वहीं क्षत्रिय समुदाय मनोहर लाल पर मामले को खत्म करवाने वरना सबक सीखने के लिए तैयार रहने का अल्टीमेटम दे कर पंचायत कर रहा था.

इधर दुलारी की जाति और गांव के कई छुटभैया लोग उस के पास सम?ाते के लिए दबाव बनाने के लिए रोज उस के घर पहुंच रहे थे. पुलिस आरोपियों से पैसा खाने के लिए दबाव बना रही थी. हालांकि, थानेदार की भी आरोपियों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह दबाव बना कर सिर्फ वसूली कर रहा था.

परेशान थी तो बस दुलारी. उस के गांव और जाति के ताकतवर लोग भी उस के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे. जो भी उस से मिलता, एक ही ‘डील’ करने की फिराक में रहता. जातबिरादरी के किसी नेता, कार्यकर्ता की कोई दिलचस्पी नहीं थी कि पीडि़त परिवार को ‘इंसाफ’ मिले.

इधर, आरोपी लड़कों के परिवार वालों के साथ यह मामला दिन ब दिन जातबिरादरी का सवाल बनता जा रहा था. इस मामले को सत्ताधारी विधायकों ने भी अपने हित में मोड़ना शुरू कर दिया. नया तर्क गढ़ा गया कि मनोहर लाल को वोट नहीं देने के कारण क्षत्रिय और नाई बिरादरी को बदनाम करने का खेल खेला जा रहा है. एक दलित लौंडिया कैसे रेप का आरोप लगा सकती है…? उस की हैसियत क्या है…?

इसी बात पर आरोपियों ने जात की 2 साझा पंचायत भी करवाईं, जिन में कई स्थानीय नेता शामिल हुए.

इस से पुलिस के साथसाथ मनोहर लाल भी बैकफुट पर आ गए. वे मामले में शामिल नहीं होने की कसमें खाने लगे, क्योंकि उन्हें इस से दलित बिरादरी के वोट खिसकने का कोई डर नहीं था. डर तो बाकी जातियों के बिदकने का था. इन सब से रूपा और दुलारी तो इतना ज्यादा घबरा गईं कि उन्हें अपने ही घर में अब बहुत डर लगने लगा.

इधर, खुलेआम माइक लगा कर मनोहर लाल को ललकारा जाने लगा. मनोहर लाल को बड़े चुनावी नुकसान का डर लग गया, क्योंकि विधानसभा की 2 ताकतवर जातियों की गोलबंदी से उन का चुनाव हारना तय था. उन्हें कुछ लोगों ने समझाया कि एक अदद ‘लौंडिया’ के लिए अपनी सियासी पारी को कमजोर मत करो. केस में समझौता करवाइए और मामला निबटा दीजिए.

रूपा की जाति और गांव के कई छुटभैए नेता भी यही चाहते थे, ताकि मनोहर लाल को दोनों जातियों का सपोर्ट मिल सके और वे चुनाव जीत सकें.

अब मनोहर लाल को लगा कि चुप्पी से काम नहीं चलेगा, क्योंकि मामला बिगड़ चुका है. वे अब अपने ‘सियासी’ नुकसान के डर से इस मामले को मैनेज कराने में लग गए. उन्होंने अपने शार्गिंदों से लड़की को सैक्स की भूखी होने का प्रचार भी करवाया. उस की मां का भी दामन दागदार बताने की पूरी कोशिश करवाई गई, ताकि यह लगे कि उन्हें इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं है. इस तरह पूरा एक महीना निकल गया.

लेकिन, इन सब से बहुत दूर विधवा दुलारी को बस इसी बात का संतोष था कि उस की बेटी उस के पास आ गई है. एक गरीब को और क्या चाहिए. पुलिस, थाना, वकील, कचहरी उस के बस का नहीं है. अब उसे और किसी चीज में कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि वह रोज थानेकचहरी और वकील के पास जाने का खर्च ही नहीं उठा सकती थी. उसे तकरीबन रोज थाने बुलाया जाता और दिनभर बयान लेने के नाम पर बैठाए रखा जाता.

इस मामले का विवेचक भी दलित जाति का था, जिस के लिए एकमात्र मकसद पैसा कमाना था, क्योंकि वह एक खेत खरीदने के लिए 30 लाख की रकम किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द इकट्ठा करना चाहता था. इस केस में आरोपी, पुलिस, जाति के छोटे नेता, कार्यकर्ता सब अपने हिसाब से फायदा लेने के लिए खेल रहे थे. लेकिन, दुलारी और रूपा इन सब से बेपरवाह और अनजान थीं. वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को फिर से पटरी पर लाना चाहती थीं, जो रूपा के साथ हुई घटना के बाद उतर गई थी.

दुलारी को अपनी बेटी मिल गई थी, बाकी उसे किसी ‘इज्जत’ की कोई फिक्र नहीं थी. भूखे, नंगे और गरीब लोग इंसाफ के बारे में नहीं सोचते.

तकरीबन एक हफ्ता और बीता होगा. एक दिन सुबह अचानक दुलारी को मनोहर लाल के एक शागिर्द ने हवेली पर पहुंचने का संदेश दिया.

दुलारी हवेली पर गई भी. बेटी के भविष्य को ले कर लंबी भूमिका बनाने के बाद, जिस में उसे रूपा के बदनाम होने से ले कर, शादी, सुरक्षा का डर सबकुछ दिखाया गया, धमकी वाली भाषा में भी सम?ाया गया. बोला गया कि समझौता कर लो.

डरीसहमी दुलारी से कुछ कागजों पर अंगूठा लगवाया गया, जो बाद में अदालत में समझौते के प्रपत्र के बतौर पुलिस द्वारा जमा किया गया. हवेली से चलते वक्त उसे एक लिफाफा दिया गया, जिसे उस ने घर में खोल कर देखा. उस मे 500 के 10 नोट थे. उस के इंसाफ का ‘सौदा’ हो चुका था, जिस में, जाति के नेता, पुलिस, सरपंच सब शामिल थे.

लेकिन, इस सौदे में शामिल नहीं थी तो सिर्फ दुलारी की ‘इच्छा’, जिसे पैसे और ताकत के दम पर मनोहर लाल ने अपनी जाति का होने के बावजूद रौंदवा दिया था. हालांकि, इस के बाद भी मनोहर लाल इस बार फिर विधायक नहीं बन पाए, क्योंकि पिछड़ों ने दलितों को इसलिए वोट नहीं दिए, ताकि वे सियासीतौर पर मजबूत न हों. शायद एक विधवा की आह ने उन के सियासी कैरियर को भस्म कर दिया था. Long Hindi Story

Family Story In Hindi: समाज से हारी विधवा

Family Story In Hindi: ‘भारत माता की जय’, ‘शहीद अमर जिंदाबाद’… कुछ ऐसे ही देशभक्ति के नारों से आकाश गूंज रहा था और लोगों की जोश भरी आवाज से दीवारें तक थर्रा रही थीं, पर तिरंगे में लिपटा हुआ अमर का शरीर तो बेजान पड़ा हुआ था. दुश्मन की एक गोली ने उस के शरीर से प्राण खींच लिए थे.

अमर की बटालियन के साथी बताते हैं कि वह अपने मोरचे पर बहुत बहादुरी से लड़ा था और मरने से पहले उस ने पाकिस्तान के कई सैनिक मार गिराए थे.

पर वही वीर अमर अब बेजान था. आसपड़ोस और सगेसंबंधियों के रोनेधोने के बीच पूरे राजकीय सम्मान
के साथ उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

सरकार के कई नेता भी अमर के घर आए और मीडिया के कैमरे पर आ कर दुश्मन देश से अमर की मौत का बदला लेने की बात कह कर चले गए.

अगले दिन सरकार ने अमर के कसबे के एक चौराहे का नाम बदल कर ‘शहीद अमर चौक’ रखने का फरमान जारी कर दिया.

इस बीच सरकार की तरफ से शहीद अमर के लिए 10 लाख रुपए का मुआवजा घोषित किया गया, तो अमर के मांबाप को अपने बेटे पर और भी नाज हो उठा.

पर इन सब के बीच अमर की 25 साल की विधवा निधि भी थी, जिसे न तो सरकारी अनुदान से कुछ लेनादेना था और न तो देशभक्ति के नारों से. वह तो भरी जवानी में ही अपना जीवनसाथी खो चुकी थी.

अमर ने न जाने कितने वादे किए थे निधि से. कितनी जगह दोनों को साथ घूमने जाना था, पर अफसोस कि अमर सिंह की मौत के बाद सबकुछ खत्म हो गया था.

रात में निधि जब बिस्तर पर लेटती, तो उसे अपने बगल में अमर के न होने का दुख सालता था. निधि के तनमन को एक साथी की जरूरत तो थी ही और अब उस के सामने पहाड़ सी जिंदगी भी पड़ी थी. भरी जवानी में विधवा हो जाने का इतना भारी दुख सहना भी उस के लिए मुश्किल था.

हालांकि, निधि मानसिक रूप से काफी मजबूत थी, फिर भी साथी के असमय चले जाने का दुख काफी गहरा होता है और इस दर्द से निकलने में निधि को पूरा एक साल लग गया था.

निधि भी जानती थी कि दुख को ओढ़ कर बैठने से दुख चार गुना बढ़ जाता है. दुख को कम करने के लिए उसे भूलना ही बेहतर होता है.

एक दिन निधि ने अपना मोबाइल उठाया, तो देखा कि उस की बैटरी सिर्फ एक फीसदी रह गई थी. उस ने अनमने ढंग से उसे चार्जिंग पर लगा दिया और बुदबुदा उठी, ‘‘इस मोबाइल की बैटरी की तरह मेरी जिंदगी भी क्यों खत्म नहीं हो जाती?’’

निधि की इस बुदबुदाहट में घोर पीड़ा थी, पर वह अब तक समझ चुकी थी कि उसे आगे की जिंदगी इसी पीड़ा के साथ काटनी होगी.

निधि ने गमले में लगे सूखे पौधों को पानी दिया. किचन की सिंक साफ की और घर की बाकी साफसफाई करने की शुरुआत कर दी.

निधि ने ध्यान दिया कि उस के सासससुर अब भी अपने बेटे के गम को पाले हुए हैं. बेटे की मौत का गम तो असहनीय तो होता है, पर जब बेटे की शहादत का फायदा अपने अहंकार और रुतबे को पोषित करने के लिए होने लगे, तब यह बात उचित नहीं लगती.

महल्ले के लोग अब भी निधि के सासससुर से अमर और उस की शहादत की बातें करते रहते और उस के सासससुर मुग्ध भाव से सुनते. शायद वे एक वीर बेटे के मांबाप होने पर गर्व महसूस करते थे, पर ऐसी बातों से निधि को सिर्फ दुख ही पहुंचता था.

निधि ने घर पर ध्यान दिया तो पाया कि बहुत सारा सामान खत्म हो चुका था. अब तो उसे खुद ही बाजार जाना होगा.

आईने के सामने खड़े हो कर निधि ने अपने चेहरे को देखा. उस की आंखें सूजी हुई थीं और चेहरा भी उतरा हुआ लग रहा था.

निधि ने बेपरवाही से बालों का जूड़ा बनाया और अपना मोबाइल चार्जिंग पौइंट से अलग किया. मोबाइल 82 फीसदी चार्ज हो चुका था.

अपने हाथों में मोबाइल की गरमी को महसूस करते हुए निधि ने थैला उठाया और अपनी सास से बाजार जाने की बात कह कर बाहर निकलने लगी.

निधि ने महसूस किया कि उस की सास नहीं चाहती हैं कि वह बाजार खुद जाए और बाहर लोगों से बातचीत करे. और तो और एक बार जब निधि ने गुलाबी रंग का सूट पहन लिया था, तब उस की सास ने कितना डांटा था उसे और अहसास कराया था कि विधवा को सिर्फ सफेद कपड़े ही पहनने चाहिए.

निधि ने अपने मोबाइल पर आए हुए ह्वाट्सएप मैसेज चैक करने शुरू किए.

वीरेश के कई मैसेज पड़े हुए थे और उस की कई काल्स भी आई थीं, जिन का जवाब वह नहीं दे पाई थी.

घर के माहौल में निधि भला वीरेश से बात भी क्या करती? वैसे भी अपने और वीरेश के बीच के प्यार को निधि ने दुनियाभर से छिपा रखा था. लोग क्या कहेंगे? समाज क्या सोचेगा? एक शादीशुदा औरत का एक गैरमर्द के साथ प्रेम संबंध समाज के लोगों को बिलकुल मंजूर नहीं और फिर निधि सवर्ण परिवार थी, जबकि वीरेश दलित जाति से था. पर प्यार तो प्यार है, वह न जाति देखता है और न ही शादी का बंधन.

अभी निधि अजीब सी उलझन में ही थी कि उस का मोबाइल बज उठा. यह वीरेश का ही फोन था. उस ने फोन को रिसीव करने की बजाय हड़बड़ाहट में काट दिया.

थोड़ी देर बाद फिर से वीरेश का फोन आया. इस बार निधि ने फोन रिसीव कर लिया, ‘‘देखो वीरेश, मैं गहरे दुख से उबरने की कोशिश कर रही हूं. तुम से शादी से पहले पहले प्यार था, पर अब मैं एक विधवा हूं और तुम से कोई मेलजोल ठीक नहीं होगा…’’

निधि एक सांस में बहुतकुछ कह देना चाहती थी, पर वीरेश ने उसे रोकते हुए कहा, ‘तो क्या तुम्हारे विधवा हो जाने से मेरे लिए प्यार खत्म हो गया है?’

वीरेश के इस सवाल का निधि को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था. वह खामोश थी. सच तो यह था कि अमर के जाने के बाद वह वीरेश के कंधे पर सिर रख कर रो लेना चाहती थी, उस से लिपट कर अपना दुख हलका कर लेना चाहती थी, पर समाज उसे इस की इजाजत नहीं देता.

कुछ सोचते हुए एक बार फिर से निधि ने फोन काट दिया था.

निधि की शादी उस की मरजी के बिना ही तय कर दी गई थी और जब निधि ने दबे शब्दों में मां से बताया था कि वह एक लड़के वीरेश से प्यार करती है और उसी से शादी करना चाहती है, तो मां ने लड़के के बारे में, उस के कामधंधे, उस की जाति के बारे में पूछा और यह जान कर वे बुरी तरह बिफर गईं कि लड़का एक दलित जाति का है.

मां ने आंखें तरेर कर निधि को फटकार लगाई थी और उसे चेताया था कि वह चुपचाप अपने प्यार का गला घोंट दे. उस के पिता अपनी ऊंची जाति के अहंकार के आगे किसी दलित लड़के को पसंद नहीं करेंगे.

निधि अपने मां के अनकहे शब्दों को भी अच्छी तरह समझ गई थी और उस ने अपने अरमानों का गला घोंटते हुए शादी के लिए हां कह दिया था.

निधि ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपने होने वाले पति अमर सिंह से कोई धोखा नहीं करेगी, इसलिए अपने शादी से पहले के प्रेम संबंध और एक दलित प्रेमी के बारे में सबकुछ बता दिया था.

अमर ने सबकुछ बहुत शांति से सुन लिया था. उस के चेहरे का रंग भी फक्क पड़ चुका था, पर उस ने अपनेआप को संभाला और एक लंबी सांस छोड़ते हुए निधि की तारीफ की, ‘‘अच्छा किया जो तुम ने मुझे यह राज बताया, इसीलिए तो मैं यह बात जान सका. कहीं तुम यह बात मुझे न बताती तो भला मैं कैसे जानता?’’

इस के बाद अमर ने निधि से कहा कि उसे निधि के पुराने समय से कोई लेनादेना नहीं है. अब निधि और अमर पतिपत्नी हैं, वह इसी बात का ध्यान रखे और कोई गलत कदम न उठाए. तभी से निधि ने वीरेश से किनारा कर लिया था.

निधि ने एक मैसेज लिख कर वीरेश से माफी मांग ली और उसे हर जगह से ब्लौक भी कर दिया था. पर पहला प्यार किसी को भूले नहीं भूलता. निधि भी वीरेश को भूल नहीं पाई. उस के मन में वीरेश के लिए कोई कोना तो था ही और इस कोने में उस दिन एक मधुर संगीत बज उठा जब एक नए नंबर से फोन आया, जिसे रिसीव करते ही निधि जान गई कि वीरेश ने फोन किया है.

‘‘तुम्हें तो मैं ने ब्लौक कर दिया था वीरेश…’’

‘निधि, मैं तुम से यह कहना चाहता हूं कि एक प्रेमी की तरह नहीं, पर हम एक अच्छे दोस्त की तरह तो रह ही सकते हैं न.’

वीरेश की इस बात को निधि मना नहीं कर सकी और तब से एक बार फिर वीरेश और निधि के बीच बातचीत शुरू हो गई थी.

अमर की मौत के बाद वीरेश का कोई फोन नहीं आया था. उस दिन सुबह जब निधि ने मोबाइल उठाया तो उस ने देखा कि मोबाइल पर वीरेश का एक लंबा सा मैसेज आया हुआ था :

‘अमर के जाने का मुझे भी दुख है और मैं इसे अपने लिए कोई मौका नहीं समझ रहा, पर यह तो मेरे प्रेम की सूखी डाल पर दोबारा हरियाली आने जैसी बात है. तुम ने अपने घर वालों की बात रख कर ब्याह कर लिया था, पर अब क्या तुम्हारे सासससुर और मांबाप तुम्हारी दोबारा शादी करेंगे?

‘अगर नहीं तो क्यों और अगर हां तो फिर मेरे साथ क्यों नहीं? क्योंकि मैं दलित हूं, पर किसी से कम तो नहीं. अच्छा दिखता हूं, अच्छी नौकरी है मेरे पास. तुम को खुश रख सकता हूं.

‘और अगर तुम अपने सासससुर को नहीं छोड़ना चाहती तो मैं उन का बेटा बन कर उन के साथ रहने और उन्हें अपने साथ रखने तक को तैयार हूं. अब बताओ, हमारे प्रेम संबंध को शादी के बंधन में बदलने के लिए तैयार हो? तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा.’

यह पढ़ कर निधि की आंखें छलछला उठी थीं. उसे इस मैसेज का कुछ भी जवाब समझ नहीं आया. वह उठी और चाय बना कर बालकनी में चली लगी.

आज निधि को कुछ सामान लेने बाजार जाना था. शोरूम में निधि ने शैंपू पर नजर डाली, तो वीरेश की यादें ताजा हो गईं.

निधि जब भी अपने बालों को शैंपू करती थी, तो वीरेश उसे कहता था कि बालों को ऐसे ही खुला छोड़ दो. ऐसा कर के तुम बहुत खूबसूरत दिखती हो.

निधि घर का सामान खरीद कर घर लौट आई. उस के मांबाप आए हुए थे.

मां को देख कर निधि उन से लिपट गई थी. होंठों पर मुसकराहट थी, पर आंखों में नमी आने से नहीं रोक सकी.

पापा से गले लगते ही आंखों से मोती ढुलक ही पड़े.

निधि की दोबारा शादी किए जाने पर विचार हो रहा था.

‘‘मां, वीरेश का फोन आया था. वह मुझ से अब भी शादी करना चाहता है,’’ निधि ने अकेले में अपनी मां से सकुचाते हुए कहा.

मां ने गुस्से से निधि को घूरा और कोसने लगीं कि भले ही विधवा हो गई है, पर अब भी उस दलित लड़के के फेर में पड़ी हुई है. उस की शादी एक दलित से कतई नहीं हो सकती.

‘‘हमारा बेटा चला गया है और अब तो बहू को मिलने वाली पैंशन का सहारा रहेगा. हमारा बुढ़ापा तो बेटे की पैंशन पर ही कटेगा. और देखा जाए तो उस की पैंशन पर हमारा हक भी तो है.

आखिर बेटे को पढ़ानेलिखाने और अफसर बनाने में हम ने भी तो मोटा इंवैस्ट किया था और हम निधि की दोबारा शादी नहीं करेंगे. वह हमारे खानदान की शान है और हमारी शान हमारे पास ही रहेगी,’’ निधि के मांबाप को ससुर का टका सा जवाब मिल गया था.

उस रात निधि ठीक ढंग से सो नहीं पाई थी. यह बात ठीक है कि उस के पति ने सेना में अपना फर्ज निभाते हुए जान दी थी, जिस बात पर उसे गर्व है, पर अपने पिछले प्रेम के बारे में उस ने अमर से कुछ छिपाया भी तो नहीं था.

और आज जब अमर दुनिया में नहीं है, तो उसे वीरेश के साथ जिंदगी बिताने में कोई बुराई नजर नहीं आती, पर उस के मांबाप अपनी जाति के दंभ में अपनी बेटी के अरमानों को ताक पर रख रहे हैं और सासससुर उसे मिलने वाली पैंशन के लालच में उस का दूसरा ब्याह नहीं करना चाहते.

अगले दिन निधि ने वीरेश को फोन मिलाया और कहा कि वह उस से मिलना चाहती है. वे दोनों एक कैफे में सुबह के 11 बजे मिले. वीरेश ने मीठी कौफी ली, जबकि निधि ने हमेशा की तरह बिना चीनी वाली कौफी ही ली.

निधि ने पूरी बात बताई तो वीरेश ने कहा, ‘‘नीची जाति के उलाहने के नाम पर मैं ने बहुतकुछ झेला है. मेरी हर कामयाबी को इसीलिए कमतर आंका गया, क्योंकि मैं छोटी जाति का हूं. पर क्या केवल जाति से हमारी अचीवमैंट छोटी या बड़ी हो जाती है?’’ वीरेश की आवाज में गुस्सा था.

वीरेश ने आगे कहा, ‘‘आज जब मेरी जिंदगी में प्यार दोबारा दस्तक दे रहा है, तो यह समाज जाति के नाम पर फिर से मुझे दुखी कर रहा है.’’

‘‘और समाज मुझे शहीद की विधवा कह कर महिमामंडित तो कर रहा है, पर साथ ही यह भी चाहता है कि मैं इसी दर्द के सहारे झूठी मुसकराहट चिपकाए फिरूं और अपनी पूरी जिंदगी अकेले ही काट दूं,’’ निधि बोल पड़ी.

वे दोनों बारबार एकदूसरे को देख रहे थे. उन की समस्या का समाधान तो यह हो सकता था कि निधि सबकुछ छोड़ कर वीरेश के पास चली आए और अपने प्रेम को शादी में बदल ले, पर वह अपने सासससुर और समाज के डर से ऐसा नहीं कर पा रही थी. कहीं न कहीं जाति के दंभ ने 2 प्रेमियों को एक बार
फिर मिलने से पहले ही अलग कर दिया था.

वीरेश ने अपने कौफी खत्म कर दी थी और निधि ने आधी कप कौफी बिना पिए ही छोड़ दी थी. बिल वीरेश ने नहीं, बल्कि निधि ने चुकता किया था और बाहर निकल कर दोनों ने भारी मन से फीकी मुसकराहट के साथ एकदूसरे को अलविदा कहा और अपनेअपने रास्ते पर चल दिए. Family Story In Hindi

News Story: देखा तेरा वादा – विजय और अनामिका की प्रेम कहानी

News Story: विजय की मम्मी की मुराद पूरी हो गई थी. उन के कहने पर विजय कांवड़ ले कर आया था. कांवड़ लाने से ज्यादा खुशी तो इस बात की थी कि विजय जब लौट रहा था, तब किसी मंत्री ने कांवडि़यों पर फूलों की बारिश की थी. विजय ने कुछ फूल चुन कर उठा लिए थे और अपनी मम्मी को दे दिए थे.

‘‘ये फूल तो मैं संभाल कर रखूंगी,’’ मम्मी ने विजय का माथा चूमते हुए कहा था.

‘‘मम्मी, मैं कांवड़ तो ले आया, पर मेरे पैरों में छाले पड़ गए हैं. बहुत दर्द हो रहा है,’’ विजय ने अपने पैरों की हालत दिखाते हुए बताया.

‘‘अरे बेटा, यह तो भोले बाबा का प्रसाद है. तू ऐसा कर कुछ दिन के लिए वर्क फ्रौम होम कर ले,’’ मम्मी ने सलाह दी.

‘‘वह सब तो ठीक है, पर न जाने क्यों अनामिका ने मुंह फुला रखा है,’’ विजय बोला.

‘‘कोई बात नहीं. जब तुम दोनों मिलोगे तो सारे गिलेशिकवे दूर कर लेना,’’ मम्मी ने कहा और विजय के लिए हलदी वाला दूध बनाने रसोईघर में चली गईं.

आज विजय ने अनामिका को मिलने के लिए बुलाया था. वह पिछले एक घंटे से कैफे में बैठा था, पर अनामिका अभी तक नहीं आई थी.

विजय ने अनामिका को फोन मिलाया, पर फोन भी स्विच औफ बता रहा था. विजय मन ही मन कुढ़ रहा था और उसे गुस्सा भी बहुत आ रहा था.

अगले दिन विजय अनामिका के घर चला गया. वह घर पर ही थी, पर बात करने के मूड में नहीं लग रही थी.

विजय ने पूछा, ‘‘क्या हुआ मेरी जान? किस बात पर मुझे इग्नोर कर रही हो?’’

‘‘कुछ भी नहीं. मैं कौन होती हूं तुम्हें इग्नोर करने वाली. तुम अपनी कांवड़ यात्रा में ही मगन रहो. मुझे भी अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने दो,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या बात है? हमारे बीच कांवड़ यात्रा कहां से आ गई?’’ विजय ने कुढ़ते हुए पूछा.

‘‘बीच में आई है तभी तो बोल रही हूं. तुम ने कहा था कि हम कुंभलगढ़ किला देखने जाएंगे. बारिश के मौसम में वहां के नजारे शानदार होते हैं. पर अब सब चौपट हो गया. तुम ने अपना किया वादा नहीं निभाया,’’ अनामिका ने कहा.

यह सुन कर विजय का भी पारा चढ़ गया. वह बोला, ‘‘वाह, क्या ताना मारा है. ऐसा क्या नहीं है, जो मैं ने तुम्हारे लिए नहीं किया है. तुम्हारे घर का किराया भरा, महंगे कपड़े खरीद कर दिए, अच्छे से अच्छे रैस्टोरैंट में खाना खिलाया… और जहां तक वादे की बात है, तो तुम ने भी बहुत बार अपना वादा नहीं निभाया…’’

यह सुनते ही अनामिका का भी पारा बढ़ गया. वह चिल्लाई, ‘‘बहुत खूब. तुम ने मेरे लिए इतना कुछ किया, तो क्या मैं ने तुम्हारी रातें रंगीन नहीं कीं… आज तुम मुझे खर्चे गिना रहे हो. तुम तो नरेंद्र मोदी की तरह हो गए हो. अपने अलावा किसी दूसरे की उपलब्धियां दिखाई ही नहीं देती हैं…’’

‘‘इस में नरेंद्र मोदी कहां से आ गए. उन्होंने जो कहा है, वह कर के भी दिखाया है. तुम अपनी बहस में हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री को मत घसीटो,’’ विजय बोला.

विजय नरेंद्र मोदी का फैन था, तो उसे अनामिका की यह बात चुभ गई. पैर के छालों से ज्यादा तो आज दिल के छाले फूट गए थे.

‘‘किया ही क्या नरेंद्र मोदी और उन की सरकार ने? बस, पिछली सरकारों को कोसना और अपने गुणगान करना. डबल इंजन की सरकार के सारे वादे कोरे साबित हुए हैं,’’ अब तो अनामिका एकदम लड़ाई के मूड में आ गई थी.

‘‘बताओ, कहां फेल हुई यह सरकार? मुझे भी तो पता चले…’’ विजय ने पूछा.

‘‘केंद्र सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है, पर इस पर ज्यादा कुछ काम नहीं हुआ है. कल ही मैं एक पुराना अखबार देख रही थी. लेबर ब्यूरो रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कुशल कामगारों की तादाद महज 2 फीसदी है, जबकि दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी स्किल्ड कर्मचारी हैं और जापान में इन की तादाद 80 फीसदी तक है. सरकार के ही आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात की उम्मीद काफी कम बताई गई है कि भविष्य में कुशल कामगारों का लक्ष्य पूरा हो सकेगा.

‘‘यहां एक तरफ लोगों को काम नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ संघ परिवार से जुड़ी विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कई सांसद हिंदुओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं, ताकि हिंदुओ की आबादी तेजी से बढ़ सके.’’

‘‘तो क्या हिंदुओं की आबादी नहीं बढ़नी चाहिए?’’ विजय ने पूछा.

‘‘पर ऐसा करने का मकसद क्या है? बात सिर्फ आबादी की नहीं है, पर यह हिंदुत्व का कार्ड खेलना बड़ा खतरनाक है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो कहा भी कि भाजपा और संघ द्वारा समाज में नफरत, धमकी और डर का वातावरण फैलाने की कोशिश लगातार जारी है.

‘‘महंगाई पर लगाम लगाने पर भी यह सरकार एकदम फेल हुई है. पैट्रोलडीजल के बढ़े दाम से देश में हाहाकार है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पैट्रोल सब से ज्यादा महंगा हुआ है, जबकि मोदी सरकार सत्ता में आने से पहले यह कहती रही कि उन की सरकार पैट्रोलडीजल के दाम कांग्रेस की सरकार से भी कम कर देगी. भारत में तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं यानी मोदी सरकार का महंगाई कम करने का वादा भी सिर्फ वादा ही साबित हुआ.’’

‘‘लेकिन इस सरकार ने धारा 370 हटा कर ऐतिहासिक काम किया है,’’ विजय बोला.

‘‘सत्ता में आने से पहले भाजपा के 2 सब से बड़े हथियार थे कश्मीर मुद्दा और पाकिस्तान. इन 2 मुद्दों में से एक कश्मीर घाटी में मोदी सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद वहां लंबे समय से आशांति और हिंसक माहौल अब भी जारी है.

‘‘कांग्रेस की सरकार से अगर तुलना करें तो मोदी सरकार के कार्यकाल में घाटी की हालत बद से बदतर हुई है. पहलगाम कांड इस सरकार की सब से बड़ी नाकामी है. क्या कश्मीरी पंडित दोबारा घाटी में लौटे? नहीं न, फिर किस मुंह से यह दावा किया जा रहा है कि धारा 370 के हटने के बाद कश्मीर में शांति बहाल हो गई है?

‘‘ऐसे ही नोटबंदी का फैसला लिया गया था. याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के नरेंद्र मोदी के भाषण को. चुनावी रैलियों में उन का एक भी भाषण ऐसा नहीं होता था, जो बिना कालेधन के जिक्र के पूरा हो जाए. मगर आज हकीकत सब के सामने है.

‘‘नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कहा करते थे कि उन की सरकार जब सत्ता में आएगी तो विदेशों में जमा भारतीय लोगों का कालाधन वे ले आएंगे, मगर अब भी लोगों को इस बात का इंतजार है कि विदेशों से कालाधन कब आएगा. इस मामले पर मोदी सरकार की यह सब से बड़ी नाकामी है कि अभी तक न सरकार को पता है कि विदेशों में कितना कालाधन जमा है और वह कब तक देश में वापस आएगा,’’

अनामिका आज बहस के फुल मूड में लग रही थी.

‘‘तुम कांग्रेस की जबान बोल रही हो,’’ विजय ने तुनक कर कहा.

‘‘जब कोई तर्क न बचे तो कांग्रेस के सिर पर ठीकरा फोड़ दो. तुम लोगों की यही आदत है. याद है कि मोदी सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में हर साल 2 करोड़ रोजगार का वादा किया था, मगर नए रोजगार पैदा करने के मामले में मोदी सरकार औंधे मुंह गिरी है. यही वजह है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर भाजपा और मोदी सरकार बैकफुट पर नजर आती है.

‘‘बेरोजगारी के मुद्दे पर जब मोदी सरकार फंसी तो पकौड़े बेचने को भी रोजगार की श्रेणी में ले आई और अपनी उपलब्धि बताने लगी. सच तो यह है कि नए रोजगार पैदा करने का वादा मोदी सरकार नहीं निभा पाई है.

‘‘कहां गई ‘आदर्श ग्राम योजना’, जिस के तहत हर सांसदों के द्वारा 5 गांवों को गोद लेने की व्यवस्था है, जिस में से एक भी गांव आदर्श ग्राम की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है?

‘‘छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके भूपेश बघेल ने तो संवादाताओं से बातचीत में आरोप लगाया, ‘नरेंद्र मोदी के 11 साल विफलताओं और जन विरोधी नीतियों का शानदार स्मारक हैं. उन्होंने शुरुआत में लोगों को सपने दिखाए और 11 साल पूरे होतेहोते सिंदूर उजाड़ने तक पहुंच गए.’

‘‘उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के नेता इन 11 सालों का खूब ढोल पीट रहे हैं, लेकिन अगर देखें कि 11 साल में आप को क्या मिला है, तो पाएंगे कि भाजपा सरकार की सारी योजनाएं नाकाम हो गई हैं.

‘‘भाजपा सरकार के 11 साल के कार्यकाल में पूरा देश असुरक्षित महसूस कर रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी कभी कहते हैं कि लोगों की कपड़ों से पहचान हो जाती है, कभी पंचर बनाने वाली बातें करते हैं, कभी श्मशान और कब्रिस्तान की बात करते हैं.

‘‘आदिवासीदलितों पर अत्याचार से वे विचलित नहीं होते, लोगों का अपमान करने में उन्हें मजा आता है और उन के लोग जनता को प्रताडि़त करते हैं, फिर भी किसी के ऊपर कोई ऐक्शन नहीं होता.

‘‘भूपेश बघेल ने यह भी कहा कि जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल से ले कर मनमोहन सिंह तक विदेश नीति में कभी कोई बदलाव नहीं आया, जिस के कारण पूरी दुनिया के लोग भारत की आवाज को गंभीरता से सुनते भी थे और जुड़ते भी थे, लेकिन हाल ही में जो आतंकवादी घटना घटी, पूरी दुनिया ने उस की आलोचना तो की, लेकिन कोई देश हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ.

‘‘उन्होंने यह भी दावा किया कि जब भारतपाकिस्तान के बीच संघर्ष चल रहा था, तब अमेरिका के राष्ट्रपति ने आधे घंटे पहले कहा कि ‘मैं ने संघर्ष विराम करवा दिया’. अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस बात को कई बार कहा, जिस के कारण पूरा देश अपमानित महसूस कर रहा है, क्योंकि इस के पहले भारत ने कभी
दूसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की थी.

‘‘छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके भूपेश बघेल ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री ने किसानों की आय दोगुनी करने और स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात कही थी, लेकिन आज किसान अपनी फसल को औनेपौने दाम में बेचने को मजबूर हैं. आज हालात ये है कि पूरे देश में डीएपी नहीं मिल रहा, कई राज्यों में बीज उपलब्ध नहीं हैं…

‘‘है कोई जवाब तुम्हारे पास? जब तुम्हारा नेता जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पा रहा है, तो तुम से क्या उम्मीद रखी जाए. कांवड़ लाने से तुम्हें क्या मिला? आस्था का मतलब यह नहीं है कि अंधे बन जाओ.

‘‘तुम्हारे लिए और भी जरूरी काम हैं. कल को आईएएस बनोगे तो क्या नई पीढ़ी को देश को बांटने वाली शिक्षा दोगे? नहीं न?’’ अनामिका ने अपने दिल की पूरी भड़ास निकाल दी.

विजय चुप था. एक तो उस ने वादाखिलाफी की थी, दूसरा उस ने अनामिका का यह कह कर दिल दुखाया था कि उस ने अनामिका के लिए कई काम किए हैं. यही बात अनामिका को चुभ गई थी और उस ने सरकार के बहाने विजय को लपेट दिया था. कमरे में अब भी चुप्पी छाई हुई थी. News Story

Story In Hindi: आजादी का जिहाद

Story In Hindi: ‘‘निशा, अब हमें शादी कर लेनी चाहिए?’’ मुनार ने कहा.

‘‘हां, लेकिन इस से पहले हमें बहुतकुछ सोचना पड़ेगा,’’ निशा बोली.

‘‘क्या सोचना पड़ेगा?’’ मुनीर ने सवाल किया.

‘‘यही कि तुम मुसलिम हो, मैं हिंदू हूं. वैसे तो न तुम मुसलिम हो. न मैं हिंदू. न तुम ने कभी दिन में 5 बार नमाज पढ़ी है, न रमजान में पूरे रोजे रखे हैं, न कभी हज किया है, न कभी जकात (दान) देने के बारे में सोचा है.

‘‘मैं भी न कभी मंदिर जाती हूं, न पूजापाठ करती हूं, न गंगा नहाने किसी तीर्थ पर गई हूं. लेकिन हमारे समाज का कानून कहता है कि जिस धर्म के मानने वाले मांबाप ने तुम्हें जन्म दिया है, वही तुम्हारा धर्म है,’’ निशा ने अपनी बात रखी.

‘‘यह हिंदूमुसलिम की बात कहां से आ गई हमारे बीच? सच तो यह है कि हम दोनों का धर्म अगर कोई है तो वह है इश्क का धर्म और इश्क का धर्म समाज के किसी भी बंधन को नहीं मानता,’’ मुनीर बोला.

‘‘लेकिन हमें लोगों की चिंता तो करनी पड़ेगी. हम शादी करेंगे तो हो सकता है कि हिंदू समाज तुम पर लव जिहाद का इलजाम लगा कर तुम्हारी हत्या कर दे और हो सकता है कि तुम्हारा परिवार मुझे कलमा पढ़ाने पर जोर देने लगे,’’ निशा ने कहा.

‘‘हां, हो तो सकता है. होने को तो कुछ भी हो सकता है,’’ मुनीर ने मामले की गंभीरता को समझने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘मुनीर, तुम मुनीर हो. मुनीर का मतलब होता है प्रकाश. मैं निशा हूं. निशा का मतलब होता है रात, अंधकार. न अंधेरे के बिना प्रकाश की कल्पना की जा सकती है, न प्रकाश के बिना अंधेरे की. हमें कोई जुदा नहीं कर सकता, लेकिन रहना तो हमें इसी समाज में है. हम दोनों हिंदुओं की कंपनियों में काम करते हैं. हो सकता है कि हमारी शादी को लव जिहाद कह कर हम दोनों को नौकरी से निकाल दिया जाए. तब
हम पेट भरने के लिए किस के सामने हाथ फैलाएंगे?

धर्म की हिफाजत के नाम पर कोई कट्टरपंथी तुम्हारे खिलाफ एफआईआर लिखा सकता है. तुम जेल चले जाओगे तो मैं क्या करूंगी? किस की मां को मौसी कहूंगी? राज्य सरकार ने लव जिहाद विरोधी कानून भी तो बना रखा है,’’ निशा ने कहा.

‘‘लेकिन यह सब होता क्यों है?’’ मुनीर ने सवाल किया.

‘‘इसलिए कि जो लोग अपने धर्म को खतरे में पड़ा हुआ महसूस करते हैं, उन को धर्म का मतलब पता ही नहीं है. धर्म की परिभाषा है ‘धर्मो धारयते प्रजा:’ यानी जिस तरह से लोग बरताव करते हैं, वही उन का धर्म होता है. इन लोगों ने अपने विश्वास को अपना धर्म मान लिया है.

‘‘धर्म कोई पवित्र शब्द नहीं है. पवित्र शब्द होता तो औरत की माहवारी को मासिक धर्म न कहा जाता. चोरधर्म, वेश्याधर्म, राजधर्म जैसे शब्द न बनते.

‘‘मुनीर, किसी का अपना विश्वास जब कट्टरता बन जाता है तब उसे लगता है कि उसी का धर्म दुनिया का सब से अच्छा धर्म है. वही एक सच्चा धर्म है. सब को उसी का धर्म अपनाना चाहिए. जो इसे अपनाने से इनकार करता है, उसे जिंदा रहने का हक नहीं है. दूसरे किसी विश्वास को वजूद में रहने का हक नहीं है.

यह धर्म नहीं, धर्मांधता है,’’ निशा बोली.

निशा ने भाषण सा ही दे दिया था. मुनीर एकटक उस की ओर देखता रहा.

तनिक दम ले कर निशा फिर बोली, ‘‘इन लोगों ने धर्म को जिस मतलब में लिया है, उस का नतीजा देखो. अमेरिका में ईसाई यहूदियों को मार रहे हैं. भारत में गोहत्या के शक में हिंदू मुसलिम को मार रहे हैं.

लखनऊ में शिया और सुन्नी एकदूसरे को मार रहे हैं. अफगानिस्तान में मुसलिम ही मुसलिम को मार रहे हैं. पाकिस्तान में नमाज पढ़ रहे लोगों पर बम गिराया जाता है.’’

‘‘यह धर्म नहीं, पागलपन है निशा. सरासर पागलपन,’’ मुनीर ने कहा.

‘‘लेकिन इस पागलपन का शिकार हम क्यों बनें?’’ निशा बोली.

‘‘निशा, न हम निकाह करने के लिए किसी मौलवी के पास जाएंगे, न फेरे लेने के लिए किसी पंडित को बुलाएंगे. हम कोर्टमैरिज करेंगे,’’ मुनीर ने राय दी.

‘‘कोर्टमैरिज से पहले नोटिस भी लगेगा मैरिज औफिस में. उसे कोई भी पढ़ सकता है,’’ निशा बोली.

मुनीर का दिमाग भन्ना गया. उस से कुछ कहते नहीं बन रहा था. वह उठ कर खिड़की के पास खड़ा हो गया. बाहर आसमान में घने बादल छाए हुए थे. बीचबीच में बिजली कड़क रही थी.

आसमान की ओर उंगली उठा कर मुनीर ने कहा, ‘‘यहां आओ निशा, देखो घने बादलों ने जो अंधेरा कर रखा है, उस के बीच चमक कर बिजली कैसी रोशनी फैला रही है.’’

निशा जहां बैठी थी, वहीं बैठी रही. वह बोली, ‘‘यह शायरी करने का समय नहीं है मुनीर. हम इस तरह तुम्हारे दोस्त के कमरे में चोरीछिपे कब तक मिलते रहेंगे?’’

‘‘तो हम ऐसा करते हैं, एकसाथ खुदखुशी कर के यह साबित कर देते हैं कि समाज तो क्या, मौत भी हमें अलग नहीं कर सकती.’’

‘‘फिर वही शायराना बात. खुदकुशी किसी समस्या का हल नहीं होती. बुजदिली की हद है खुदखुशी,’’ निशा बोली.

‘‘तुम तो संजीदा हो गईं. मैं तो पलों के बोझ को हलका करने के लिए मजाक कर रहा था,’’ मुनीर ने कहा.

‘‘यह मजाक का समय भी नहीं है,’’ निशा बोली.

मुनीर आ कर कुरसी पर बैठ गया. सोचता रहा, सोचता रहा. अपने प्यार और अपनी हिम्मत को आंकता रहा. बाहर बादलों ने झमाझम बारिश शुरू कर दी थी. खिड़की के शीशे पर धड़ाधड़ बारिश की बौछारें पड़ रही थीं. उन के शोर में उसे अपने और निशा के ऊपर छोड़े जाने वाले तानों की आवाज सुनाई दे रही थी.

निशा भी चुपचाप बैठी सोचती रही. आज पहली बार ऐसा हुआ था कि दोस्त के कमरे के एकांत में उन्होंने न एकदूसरे को छुआ था, न गले लगे थे, न एकदूसरे को चूमा था.

मुनीर ने एक भरपूर नजर निशा पर डाली और कहा, ‘‘हम यह देश छोड़ कर किसी और देश में जा कर रहेंगे. यहां के समाज से, यहां के लोगों से कोई वास्ता ही नहीं रखेंगे.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं है मुनीर. कहीं पर भी हमें वर्कपरमिट कैसे मिलेगा? रहेंगे कहां? खाएंगे क्या?’’

फिर बहुत ज्यादा गंभीर हो कर निशा ने कहा, ‘‘तुम में हिम्मत है तो समाज से लोहा लो. यह लड़ाई अपने घर से शुरू करो. अपने मातापिता को समझाओ कि वे मुझे बगैर कलमा पढ़ाए अपना लें. इधर मैं भी यही लड़ाई लड़ती हूं. और अगर उन को तुम स्वीकार नहीं हो, तो मैं उन से नाता तोड़ लूंगी.’’

अब तक मुनीर भी किसी फैसले पर पहुंचने की पूरी तैयारी कर चुका था. वह बोला, ‘‘मुझे मंजूर है. मैं साबित कर दूंगा कि कोई कितना ही कट्टरतावादी क्यों न हो, न मुझ से मेरा प्यार छीन सकता है, न ही मेरी जिंदगी.’’

दोनों के चेहरों पर एक उदास सी मुसकराहट दौड़ी. वे दोनों उठ खड़े हुए. निशा ने लपक कर मुनीर को आगोश में ले लिया.

मुनीर ने उसे भींच कर छाती से लगाते हुए कहा, ‘‘चलो देखें, बाहर धरती अपने बाल खोले बारिश के झरने में नहा रहा होगी. बस, तुम धरती बनी रहना, मैं बारिश का पानी बन कर तुम्हारे अंदर समा जाऊंगा.’’

मुनीर की बांहों में से निकलते हुए निशा ने कहा, ‘‘चलो, हम जिहाद शुरू करते हैं. लव जिहाद नहीं, इनसानी हकों की हिफाजत का जिहाद, इश्क करने की आजादी का जिहाद.’’ Story In Hindi

Social Story In Hindi: होंठ लाल काली आंखें

Social Story In Hindi: सागर अपने दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी पर निकला. हाईवे पर कुछ जवान लड़कियां भड़कीले कपड़ों में खड़ी थीं. एक ढाबे वाले ने बताया कि बांछड़ा समाज की ये लड़कियां सड़क किनारे अपने डेरों में देह धंधा करती हैं. सागर एक डेरे में गया. वहां धंधा करने वाली एक लड़की ने उसे एक कड़वे सच से रूबरू कराया.

तकरीबन 3 साल पहले की बात है. अपने दोस्तों नागेंद्र, बृजेंद्र और अरविंद के साथ 10 दिन की घुमक्कड़ी के दौरान मेरा एक ऐसे सच से सामना हुआ, जिसे देखसुन कर मेरी रूह तक कांप गई.

उस दिन शाम का समय था. रतलाम से मंदसौरनीमच की ओर हमारा अभी 7 किलोमीटर तक का सफर ही तय हुआ था कि सड़क किनारे खड़ी जवान लड़़कियों को देख कर हमें हैरानी हुई. कार की रफ्तार धीमी कर मीलों दूर तक हम यह नजारा देख रहे थे.

कुछ देर के बाद हम ने एक ढाबे पर रुकने की सोची. कार से उतर कर ढाबे पर पड़ी खाट पर हम चारों दोस्त बैठ गए. हमारे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे.

तभी ढाबे का एक वेटर हाजिर हो गया.

अरविंद ने खाने का और्डर करते हुए उस वेटर से पूछा, ‘‘हाईवे पर ये जवान लड़कियां क्यों खड़ी रहती हैं?’’

यह सवाल सुनते ही उस वेटर ने अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘साहब, आप को चाहिए क्या? रातभर के लिए लड़की मिल जाएगी. मालिक से बात कर लीजिएगा.’’

उस वेटर का जवाब सुन कर हम लोग सकपका से गए. इस के बाद हम लोगों ने काउंटर पर जा कर ढाबे के मालिक जगदीश मीणा से उन लड़कियों के बारे में पूछा, तो उस ने बताया, ‘‘साहब, ये लड़कियां यहां के बांछड़ा समुदाय की हैं, जो अपने जिस्म का सौदा करने के लिए रोजाना ही सड़़कों पर उतर आती हैं.’’

‘‘इन्हें किसी का डर नहीं लगता, जो इस तरह खुलेआम सड़कों पर ग्राहक ढूंढ़ती हैं?’’ नागेंद्र ने पूछा.

‘‘ऐसा नहीं है कि ये लड़कियां चोरीछिपे किसी मजबूरी में इस तरह का धंधा करती हैं. इन जवान लड़कियों के मांबाप बड़े शौक से इन से यह घिनौना काम करवाते हैं. कई बार तो मांबाप ही इन लड़कियों के लिए ग्राहक ढूंढ़ कर लाते हैं.’’

जगदीश मीणा से सड़कों पर खड़ी लड़कियों के बारे में यह सच जान कर हम हैरान रह गए. खाने के समय भी हम लोगों की चर्चा में यही लड़कियां रहीं.

मध्य प्रदेश में मंदसौर से नीमच की ओर जाने वाले नैशनल हाईवे पर सफर के दौरान सड़कों पर भड़कीले कपड़ों में सजीधजी लड़कियों को देख कर गाडि़यों की रफ्तार अपनेआप ही धीमी हो जाती है.

होंठों पर लाल रंग की चटक लिपस्टिक और काजल भरी आंखों से इशारा करती लड़कियां ट्रक और कार चलाने वालों का ध्यान अपनी ओर अनायास ही खींच लेती हैं.

अपनी अदाओं से लोगों को लुभाती ये जवान लड़कियां अपने जिस्म का सौदा करती हैं. जिस्मफरोशी के इस बाजार में रोजाना न जाने कितनी ही लड़कियां चंद सौ रुपयों के लिए अपनी बोली लगाती हैं.

जिन लोगों ने महूनीमच नैशनल हाईवे का सफर किया है, उन्होंने कभी न कभी बांछड़ा समाज की इन लड़कियों को जरूर देखा होगा. भले ही किसी की गाड़ी न रुकी हो, लेकिन सड़क किनारे खड़ी 16-17 साल की उन लड़कियों को जरूर देखा गया होगा जो होंठों पर लिपस्टिक पोते, आंखों में काजल मले, खुले बालों के साथ, कमर मटकाती खुद के बिकने का इंतजार करती हैं.

रतलाम में मंदसौर, नीमच की ओर जाने वाले महूनीमच नैशनल हाईवे पर जावरा से तकरीबन 7 किलोमीटर दूर गांव बगाखेड़ा से बांछड़ा समुदाय के डेरों की शुरुआत होती है.

यहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर हाईवे पर ही परवलिया डेरा है. इस डेरे में बांछड़ा समुदाय के तकरीबन 50 परिवार रहते हैं.

महूनीमच नैशनल हाईवे पर डेरों की यह हालत नीमच जिले के नयागांव तक है. रतलाम जिले के दूरदराज के गांव भी इन के डेरों से आबाद हैं.

यह समुदाय हमेशा ग्रुप में रहता है, जिन्हें डेरा कहते हैं. बांछड़ा समुदाय के ज्यादातर लोग झोंपड़ीनुमा कच्चे मकानों में रहते हैं. इन की बस्ती को आम बोलचाल की भाषा में डेरा कहते हैं.

इन लोगों के बारे में यह भी कहा जाता है कि मेवाड़ की गद्दी से उतारे गए राजा राजस्थान के जंगलों में छिप कर अपने अलगअलग ठिकानों से मुगलों से लोहा लेते रहे थे. यह भी माना जाता है कि उन के कुछ सिपाही नरसिंहगढ़ में छिप गए थे और फिर वहां से मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में चले गए.

जब सेना बिखर गई तो उन लोगों के पास रोजीरोटी चलाने का कोई जरीया नहीं बचा. गुजारे के लिए मर्द डकैती डालने लगे, तो औरतों ने देह धंधे को अपना पेशा बना लिया. ऐसा कई पीढि़यों तक चलता रहा और आखिर में यह मजबूरी एक परंपरा बन गई.

शाम हो चली थी. अभी हम लोग सड़क से उतर कर एक डेरे की तरफ बढ़ रहे थे. टिमटिमाते बल्बों की रोशनी में अपने डेरे के सामने खड़ी उन लड़कियों को देख ही रहे थे. हर उम्र के मर्दों की मौजूदगी वहां दिखाई दे रही थी. किसी के कदम नशे में डगमगाते थे, तो कोई तयशुदा चाल में अंधेरे में खुलते दरवाजों की ओर बढ़ता था. हर दरवाजे पर सजी औरतें इशारों से ग्राहकों को बुला रही थीं और हम लोग थोड़ा सहमे हुए से थे.

तभी किसी नन्ही उंगली की हलकी सी पकड़ ने मेरी सोच की डोरी को झकझोर दिया.

‘‘अंकल, मेरी दीदी आप को बुला रही है,’’ 6-7 साल की मासूम सी एक बच्ची बोली. उस की आंखों में विजयी मुस्कान थी, चेहरा दमक रहा था.

‘‘कहां है तुम्हारी दीदी?’’

‘‘वह घर के अंदर, आप मेरे साथ चलो न.’’

उस लड़की के चेहरे में छिपी मासूमियत ने मुझे झकझोर दिया. क्या वह अपनी बहन के लिए ग्राहक ढूंढ़ रही है? यह खयाल आते ही मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई.

‘‘चलो न अंकल फिर मुझे खाना भी खाना है,’’ कह कर उस लड़की ने मेरा हाथ थाम लिया.

पहले तो मैं अकेले जाने से झिझका, मगर अपने अखबार के लिए एक खास रिपोर्ट बनाने के लिहाज से मेरे कदम अपनेआप उस लड़की के साथ चल पड़े.

मेरे दोस्त मुझे जाते हुए देख रहे थे. अरविंद बोला, ‘‘चले जाओ सागर, हम लोग यहीं हैं.’’

वह बच्ची फुरती में आगेआगे भागती, गलियों से होते हुए एक दरवाजे तक मुझे ले गई. उस ने दरवाजे पर हलकी सी दस्तक दी और मुझे देख कर मुसकराई.

दरवाजा खुला. एक अधेड़ सा आदमी बाहर निकला. बच्ची मुझे भीतर तक ले गई और कमरे के एक ओर इशारा कर के बोली, ‘‘यह मेरी दीदी है.’’

सामने एक पलंग पर बैठी औरत की तरफ मैं ने अपनी नजरें दौड़ाईं. वह औरत 28-30 साल की रही होगी. चेहरा खूबसूरत नहीं, मगर थका हुआ भी नहीं, बल्कि ऐसा, जिस में वक्त ठहर गया हो.

‘‘बैठिए,’’ कहते हुए वह औरत मुसकराई, मगर मुसकराहट से ज्यादा उस की आंखों में कई सवाल थे.

‘‘पानी या चाय कुछ लेंगे आप?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘जी नहीं, शुक्रिया.’’

‘‘ठीक है, पहले पैसे दीजिए.’’

मैं ने 500 रुपए का एक नोट उस के सामने कर दिया. उस ने नोट उठाया, माथे से लगाया और सामने टंगे एक पर्स में डाल दिया.

‘‘कहां तक पढ़ी हैं आप? आप को यह घिनौना काम अच्छा लगता है क्या?’’ मेरे इन सवालों पर वह औरत कुछ सकपकाई, मगर दूसरे ही पल आंखों में शरारत लिए बोली, ‘‘मैं तो खूब पढ़ना चाहती थी साहब, मगर मांबाप ने परंपरा की दुहाई दी. फिर भी नहीं मानी तो कहा गया कि तुम्हारी नानी और मां ने भी यही काम किया है.

‘‘आखिर में दो जून की रोटी का वास्ता दिया गया, तो मेरी आंखों के सामने अपने छोटेछोटे भाईबहनों के चेहरे घूमने लगे और घुटने टेकते हुए मैं ने समझौता कर लिया.

‘‘साहब, बांछड़ा समुदाय की लड़कियों को परंपरा का हवाला दे कर छोटी उम्र में ही देह धंधे के दलदल में धकेल दिया जाता है.’’

‘‘यह नन्ही गुडि़या आप की बहन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्यों वक्त बरबाद कर रहे हैं साहब. जिस काम के लिए आए हैं, उसी से मतलब रखिए,’’ उस औरत ने अपनी बांहें मेरी गरदन पर डालते हुए कहा.

मैं ने कहा, ‘‘देखिए, मैं उस नीयत से नहीं आया. मैं एक पत्रकार हूं और तुम लोगों के इस घिनौने पेशे के खिलाफ पत्रिका में लिखना चाहता हूं. मैं आप से कुछ कहना और पूछना चाहता हूं.’’

‘‘तो कहिए मगर. वक्त की कीमत है. आप घंटे के पैसे रख लीजिए, मेरी बात सुन लीजिए.’’

मैं ने फिर एक 200 का नोट उस की तरफ बढ़ा दिया. उस ने थोड़ी देर मुझे देखा और नोट रखते हुए बोली, ‘‘हां, बताइए?’’

‘‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि इस बच्ची का जन्म शाप बन कर रह गया है?’’ मेरे इस सवाल पर उस औरत की हंसी बाहर निकल आई. अपनेआप को संभालते हुए उस ने जो बताया, उस ने मेरी रूह को झकझोर कर रख दिया.

‘‘साहब, देश का पढ़ालिखा तबका भले ही बेटी को मां के पेट में ही मारने पर उतारू है, मगर हमारे यहां तो बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है. मगर इस जश्न के पीछे छिपा है एक शर्मनाक सच.

एक बेटी यानी कम से कम 2 पुश्तों की आमदनी का जरीया. बांछड़ा समाज में, जो बेटियों की देह पर जिंदा है, देह धंधा बुरा नहीं है, बल्कि वह लघु उद्योग बन गया है.’’

मैं ने एक सांस में कह दिया, ‘‘आप यह काम छोड़ क्यों नहीं देतीं और शादी कर लीजिए. एक नई जिंदगी
शुरू कीजिए.’’

वह औरत इस तरह हंसी जैसे मैं ने कोई बचकाना सवाल कर दिया हो. वह बोली, ‘‘शादी? हम तो हर रोज शादी करते हैं साहब… कभी घंटेभर की, कभी पूरी रात की. शादी हमारे लिए एक सौदा है, सौगात नहीं.’’

‘‘आप के मातापिता को पता है कि आप यह धंधा करती हैं?’’

मेरा सवाल पूरा होने से पहले ही उस ने जवाब दिया, ‘‘अभी जो इस डेरे से दरवाजा खोल कर बाहर जाने वाला आदमी आप ने देखा… वही मेरा बाप है.’’

यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘‘और वह छोटी सी गुडि़या?’’

‘‘वह मेरी बेटी है.’’

‘‘बेटी? लेकिन वह आप को दीदी क्यों बुलाती है?’’

‘‘मैं ने उसे मां कहना कभी सिखाया ही नहीं, क्योंकि अगर वह जा कर बोलेगी कि मेरी ‘मां’ बुला रही है, तो कौन मेरे पास आएगा?’’

अब मैं बुत बन गया था. उस का जवाब मेरे जेहन में गूंज गया.

वह औरत बोली, ‘‘यहां लड़कियां सिर्फ अपनी होती हैं. उन के बाप कौन हैं, यह भी हम नहीं जानते. बेटियां हमारी जगह लेती हैं और बेटे दलाल बनते हैं. यही उसूल है इस बांछड़ा डेरे का.’’

तभी बाहर से फिर वही आवाज आई, ‘‘दीदी, टाइम हो गया.’’

मुझे लगा जैसे मेरी धड़कन वहीं अटक गई.

‘‘इस बच्ची का नाम क्या है?’’

‘‘मुसकान.’’

‘‘इस का क्या सोचा है?’’

‘‘बांछड़ा समुदाय में प्रथा के मुताबिक घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है. वह मेरी तरह ही यही करेगी और मेरा सहारा बनेगी. आप यों ही वक्त बरबाद कर रहे हो.’’

अब मैं खड़ा हो गया और बाहर निकल आया. मुसकान बाहर खड़ी थी. वह मुसकराते हुए मुझ से बोली, ‘‘मेरी बख्शीश?’’

आंखों में आई नमी को पोंछते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘बस 50 रुपए,’’ उस लड़की ने मासूमियत से हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा.

मैं ने चुपचाप उस लड़की की हथेली पर 50 रुपए रख दिए. वह फुदकती हुई, चिडि़या की तरह उन्हीं गलियों में गुम हो गई. Social Story In Hindi

Story In Hindi: हत्यारा मांझा

Story In Hindi: हमारे छोटे से कसबे में करीम चाचा जैसा पतंगबाज कोई नहीं था, लेकिन अब वे काफी उम्रदराज हो चुके थे. उन्होंने पतंग उड़ाना बंद कर दिया था. अब वे अपनी किराना की दुकान चलाते थे और पतंगों को उड़ते देख कर बहुत खुश होते थे.

करीम चाचा के बेटे का नाम सलीम था, जो शादीशुदा थे और एक 8 साल के बेटे फजल के बाप भी. फजल को पतंगें उड़ती देखने का बड़ा शौक था. सलीम पेंच लड़ाते, पर सामने वाले की पतंग नहीं काट पाते.

एक दिन सलीम ने अपने अब्बा से पूछा, ‘‘मेरी पतंग क्यों कट जाती है?’’

‘‘पतंग उड़ाना भी एक कला है सलीम,’’ करीम चाचा ने बताया.

‘‘आप तो अपने समय के माने हुए पतंगबाज रहे हैं, फिर मुझे यह हुनर क्यों नहीं आया?’’ सलीम बोले.

‘‘हां, रहा हूं,’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा.

‘‘हमें भी बताइए पेंच लड़ाने की कला,’’ सलीम ने कहा.

तभी महल्ले के कुछ और लड़के भी वहां आ गए. उन में से एक लड़के राकेश ने कहा, ‘‘चाचा, हमें भी बताइए. ज्ञान पर सब का हक होता है. द्रोणाचार्य ने अपने बेटे और शिष्यों में कभी फर्क नहीं किया. उन के बेटे अश्वत्थामा से ज्यादा काबिल उन का शिष्य अर्जुन था.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा, ‘‘लेकिन यह सीखने वाले की लगन पर होता है.’’

‘‘चलिए, हमें बताइए. आप हम लोगों के भी गुरु हुए,’’ राकेश ने कहा.

करीम चाचा ने पतंग में कन्नी बांधने के तरीके से ले कर पतंग छोड़ने, उड़ाने और पेंच लड़ाने के एक से एक तरीके बताए, जिन्हें सुन कर सब दंग रह गए और यह मान गए कि वाकई पतंग उड़ाना और दूसरे की पतंग काटना एक कला है. जैसे तलवारबाजी, तीरंदाजी, वैसे ही पतंगबाजी.

आजकल देशभर में चीनी मांझे की चर्चा जोरों पर है. वैसे तो भारत और चीन के बीच कोई भाईचारा नहीं है खासकर लड़ाई के बाद. लेकिन वर्ल्ड ट्रेड और्गैनाइजेशन की संधि के तहत भारतीय सरकार सीधेतौर पर चीनी सामान का बहिष्कार नहीं कर सकती. उस पर कोई अंकुश नहीं लगा सकती.

चीन में तो हर चीज बनने लगी है, जिस का इस्तेमाल भारत कर रहा है. लोग जम कर खरीदते हैं, क्योंकि चीन का बना माल सस्ता होता है, पर टिकाऊ तो बिलकुल नहीं.

इस का नतीजा यह हो रहा है कि होली दीवाली से ले कर तकरीबन हर बड़े त्योहार पर चीन की बनी चीजें बिकने लगी हैं और स्वदेशी चीजों को कोई कौडि़यों के भाव पर भी नहीं खरीद रहा है.

टैक्नोलौजी के मामले में चीन ने कमाल कर रखा है. आज बाजारों में बिकने वाले सस्ते, आकर्षक, शानदार मोबाइल फोन सब चीन की ही देन हैं. कुछ देशभक्त स्वदेशी चीजों को बढ़ावा देने के लिए जब चीनी सामान का विरोध करते हैं, लोगों से चीनी सामान खरीदने के बहिष्कार की बात कहते हैं, तो उधर से चीन के अखबार गरजते हुए बयान देते हैं कि भारत के लोग बुजदिल और कामचोर हैं. उन की देशभक्ति का नशा जल्दी उतर जाता है और फिर वे हम से ही सामान खरीदते हैं.

इसी बीच करीम चाचा ने सलीम से कहा, ‘‘चीनी सामान की कोई गारंटी नहीं होती. ये कारोबारी हैं. इन्हें अपने फायदे से मतलब है. इन की बनाई चीजें खरीदना ठीक नहीं है. हमारे यहां के पटाके और चीन से आए पटाकों में बहुत फर्क है. उन के पटाकों से प्रदूषण और तरहतरह की बीमारियां फैलती हैं.’’

इस पर सलीम ने कहा, ‘‘चीनी हो या देशी, होता तो दोनों के पटाकों में बारूद ही न. अब्बू, आप भी कहां अखबार की खबरों पर ध्यान देते हैं… अगर चीन का सामान खरीदने से कोई हमें देशद्रोही कहता है, तो कहता रहे. सभी खरीदते हैं. ज्यादा ही दर्द है तो सरकार पाबंदी लगा दे, इसे गैरकानूनी बता दे. तब ये सामान अपनेआप बिकना बंद हो जाएंगे. फिर हम ही क्यों सोचें? क्या हिंदू नहीं खरीदते हैं? वे तो सब से ज्यादा खरीदते हैं. दीवाली उन का त्योहार है. वे तो देवीदेवताओं की मूर्तियों से ले कर दीए तक चीन द्वारा बनाए खरीदते हैं.’’

सलीम की बात काटते हुए करीम चाचा ने कहा, ‘‘बेटा, इस में हिंदूमुसलिम वाली बात कहां से आ गई? हम एक देश में रहते हैं. उन की गलती हमारी गलती एक ही बात है और इस का बुरा नतीजा दोनों को ही भुगतना पड़ता है.’’

सलीम ने कहा, ‘‘लेकिन अब्बू, क्याक्या बंद करवाएंगे स्वदेशी के समर्थक? सारे स्वदेशी समर्थकों के पास चीनी मोबाइल हैं. कोई दूसरा रास्ता नहीं है चीनी सामान से बचने का. एक से एक डैकोरेटिव स्टाइलिश लाइट चर्च में भी लगती है, मंदिर में भी और मसजिद में भी. लोग सस्ता और सुंदर सामान ही खरीदते हैं.

देशभक्ति का इन सब से क्या लेनादेना?’’

‘‘बेटा, ये चीनी कारोबारी हैं. इन का करोड़ोंअरबों का कारोबार है. इन से हमारे देश की कंपनियां और फैक्टरियां पिछड़ रही हैं. लोगों का रोजगार छीना जा रहा है,’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘हमारे यहां के लोग टैक्नोलौजी में सस्ता, सुंदर सामान बनाने में पिछड़े हैं, तो यह हमारे कारोबारियों की गलती है. इस में किसी दूसरे को कुसूरवार क्यों ठहराना?’’ सलीम बोले.

‘‘अब तो पतंग और मांझा भी चीनी आने लगा है, तो क्या तुम उसे भी खरीदोगे?’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘क्यों नहीं?’’ सलीम ने लापरवाही से कहा और बाहर निकल गए.

‘‘सस्ते के चक्कर में किसी दिन मुसीबत में मत फंस जाना. याद रखना, सब से ज्यादा नुकसान इस्तेमाल करने वाले का होता है,’’ करीम चाचा ने कहा.

लेकिन यह सुनने के लिए सलीम उस वक्त उन के पास नहीं थे. वे घर से बाहर निकल चुके थे.

अगस्त का महीना था. आसमान में उड़ती पतंगें, लहराती पतंगें. कटती पतंगें, गिरती पतंगें. अब पहले की तरह पतंग लूटने वाले तो नहीं थे, लेकिन पतंग उड़ाने और काटने का जुनून अब भी लोगों में था.

दोपहर से शाम तक सलीम की कई पतंगें कट चुकी थीं. हर कटती पतंग पर उन का बेटा फजल उदास हो जाता. बेटे की उदासी देख कर उन्हें शर्म आने लगी. वे बेटे के सामने खुद को हारा हुआ सा महसूस करने लगे.

सलीम ने अपने बेटे फजल को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘चिंता मत कर. कल तुम्हें खुश कर दूंगा. जितनी कहोगे, उतनी पतंगें काट कर दिखाऊंगा.’’

सलीम यह कह कर बाजार की ओर निकले. वे अपने पिता की दुकानदारी भी संभालते थे, लेकिन पतंग उड़ाने के लिए वे समय निकाल ही लेते थे. पतंग उड़ाने के गुर अपने अब्बू से पूछ लेते थे. अब्बू तो पुराने पतंगबाज थे, सो मना नहीं करते थे.

रात में फजल ने अपने दादा करीम मियां से कहा, ‘‘दादाजी हमारी 10 पतंगें कट गईं.’’

करीम मियां ने कहा, ‘‘पतंगबाजी कला है, जो अभी तुम्हारे अब्बू को नहीं आई है. मैं होता तो 10 क्या 20 पतंगें काट देता.’’

यह सुन कर सलीम ने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘पतंगबाजी अब कोई कला नहीं रही अब्बा. सब मांझे का कमाल है. कल देखना, मैं ऐसा मांझा लाऊंगा कि आसमान में उड़ने वाली सारी पतंगें जमीन पर नजर आएंगी.’’

सलीम की बात खत्म होने से पहले अब्बू ने यह जरूर कहा, ‘‘मांझे की ताकत से पतंग काटने में अपना क्या हुनर? हमें बाजार से सावधान रहना चाहिए.’’

लेकिन सलीम तब तक अपने कमरे में जा चुके थे.

अगली सुबह सलीम ने पतंग दुकानदार से कहा, ‘‘मुझे सब से मजबूत मांझा चाहिए.’’

दुकानदार ने धीरे से कहा, ‘‘मजबूती का तो बाप है, लेकिन पुलिस छापा मार कर जब्त कर रही है. बैन लगा दिया है प्रशासन ने.’’

‘‘यहां कौन देख रहा है. तुम चुपके से दे दो.’’

‘‘लेकिन दाम थोड़े ज्यादा लगेंगे,’’ दुकानदार ने कहा.

‘‘चलेगा, लेकिन मांझा मजबूत होना चाहिए.’’

‘‘चीनी मांझा है, जो तलवार का काम करेगा. एक नहीं सौ पतंगें काटने की हैसियत रखता है, लेकिन सावधानी से बरतना,’’ दुकानदार ने धीरे से कहा.

चीनी मांझा सुन कर सलीम को यकीन आ गया कि आज तो वे बेटे को कई पतंगें काट कर दिखाएंगे और खुश करेंगे. कल अपनी हार और बेटे के उतरे चेहरे को देख कर उन्हें बहुत मायूसी हुई थी.

शाम को 4 बजे घर की छत पर फजल ने पतंग छोड़ी. पिता ने मांझा खींचा. हलकीहलकी हवा में पतंग ऊपर की ओर उठी. सलीम ने ढील दी, फिर मांझा खींचा, फिर ढील दी, फिर मांझा खींचा. थोड़ी देर में पतंग आसमान से बातें करने लगी थी.

करीम मियां भी छत पर आ गए. उन्होंने मांझे की ओर देख कर कहा, ‘‘यह बड़ा खतरनाक है. मांझा है या हथियार.’’

‘‘अब्बू, बस आज आप कुछ मत बोलना,’’ सलीम ने कहा.

तभी सलीम की पतंग का पेंच लड़ गया. सलीम ने एक जोरदार झटका दिया और सामने वाले की पतंग कट गई.

‘‘ये काटा…’’ फजल खुशी से चहक उठा.

‘‘अभी और पतंगें कटेंगी बेटा. तुम देखते जाओ अपने बाप का कमाल,’’ सलीम बोले.

‘‘यह तुम्हारा कमाल नहीं, बल्कि इस मांझे का है. मैं कहता हूं बंद करो यह तमाशा. यह पतंगबाजी नहीं, मांझाबाजी है,’’ करीम मियां ने कहा.

‘‘क्या अब्बू, आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे आप ने कभी पतंग नहीं उड़ाई…’’

‘‘हम ने पतंगें उड़ाई हैं. मैं तुम्हें भी नहीं रोकता, लेकिन यह मांझा खतरनाक है. किसी को लग गया तो मुसीबत हो जाएगी.’’

‘‘एक दिन मैं कुछ नहीं बिगड़ता अब्बू,’’ इस के बाद सलीम ने एक और पतंग काटी.

फजल खुशी से चीख पड़ा, ‘‘वाह अब्बू, कमाल कर दिया आप ने.’’

बेटे की तारीफ से सलीम का सीना फख्र से चौड़ा हो गया. आसमान में जितनी पतंगें थीं, 1-1 कर के जमीन की धूल चाटती नजर आ रही थीं.

करीम मियां ने फिर चेतावनी दी, ‘‘ऐसी ही धूल चीन ने हमें युद्ध में चटाई है अपने आधुनिक हथियारों के दम पर. बंद करो यह अनीति से, चीनी मांझे से पतंगबाजी का खेल.’’

‘‘आज नहीं दादाजी, कल हमारी 10 पतंगें कटी थीं. हम बदला ले कर रहेंगे,’’ फजल की बात सुन कर करीम मियां ने कहा, ‘‘बेटे, दूसरे के हथियार से युद्ध जीता तो क्या जीता? इस में अपना हुनर, अपना जौहर कहां है? मैं फिर कह रहा हूं कि यह खतरनाक हो सकता है.’’

‘‘अब्बू, यह युद्ध नहीं पतंगबाजी है. हुनर किसी का हो, जीत तो अपनी है. फिर यह युद्ध नहीं महज खेल है. आप अपने पोते के चेहरे की खुशी देखिए,’’ सलीम बोले.

करीम मियां अपने पोते की खुशी को देख कर चुप हो गए. सलीम धड़ाधड़ पतंगें काट रहे थे और फजल खुशी से किलकारी मार कर हंस रहा था.

सलीम कम से कम 20 पतंगें काट चुके थे और अब थक गए थे.

फजल ने कहा, ‘‘अब्बू, अब मैं पतंग काटूंगा.’’

‘‘क्यों नहीं, लेकिन जरा संभल कर,’’ सलीम बोले.

इस के बाद सलीम ने चरखी पकड़ ली. पतंग आसमान में थी. मांझा अब फजल के हाथ में था.

सलीम ने कहा, ‘‘ढील दो और अपनी पतंग दूसरी पतंग के पास ले जाओ’’

फजल ढील देता गया.

‘‘अब खींचो,’’ सलीम ने कहा.

फजल ने मांझा खींचा. दोनों पतंगें आपस में उलझ चुकी थीं. सलीम चरखी में लिपटा मांझा ले कर पीछे
खड़े थे.

‘‘यह आखिरी पतंग है. इसे हर हाल में काटना है फजल,’’ सलीम ने कहा.

‘‘जी अब्बू, ऐसा ही होगा,’’ फजल बोला.

‘‘फजल, यही मौका है. मांझे आपस में लिपट चुके हैं. एक जोरदार झटका मारो. मांझा अपनी ओर खींचो.’’

सलीम के कहे मुताबिक फजल ने झटका दिया, लेकिन 8 साल के बच्चे के हाथ का झटका काफी नहीं था.

यह देख कर सलीम ने चरखी नीचे रखी और मांझे को अपने हाथ में ले कर पूरी ताकत से खींचा. पतंग कट चुकी थी. सलीम खुशी से चीखे. लेकिन तभी फजल कराह कर जमीन पर गिर पड़ा. सलीम ने जब मांझे को झटका दिया,

तो वह फजल के गले को चीरता निकल गया.

फजल की गरदन से खून की धार बह रही थी. उसे मौत के मुंह में जाता देख कर सलीम बेहोश हो गए और करीम मियां को तो जैसे लकवा मार गया. Story In Hindi

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