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होली स्पेशल: बनारसी साड़ी- भाग 1

आज सुबह सुबह ही प्रशांत भैया का फोन आया. ‘‘छुटकी,’’ उन्होंने आंसुओं से भीगे स्वर में कहा, ‘‘राधा नहीं रही. अभी कुछ देर पहले वह हमें छोड़ गई.’’

मेरा जी धक से रह गया. वैसे मैं जानती थी कि कभी न कभी यह दुखद समाचार भैया मुझे देने वाले हैं. जब से उन्होंने बताया था कि भाभी को फेफड़ों का कैंसर हुआ है, मेरे मन में डर बैठ गया था. मैं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि भाभी को और थोड़े दिनों की मोहलत मिल जाए पर ऐसा न हुआ. भला 40 साल की उम्र भी कोई उम्र होती है, मैं ने आह भर कर सोचा. भाभी ने अभी दुनिया में देखा ही क्या था. उन के नन्हेनन्हे बच्चों की बात सोच कर कलेजा मुंह को आने लगा. कंठ में रुलाई उमड़ने लगी.

मैं ने भारी मन से अपना सामान पैक किया. अलमारी के कपड़े निकालते समय मेरी नजर सफेद मलमल में लिपटी बनारसी साड़ी पर जा टिकी. उसे देखते ही मुझे बीते दिन याद आ गए.

कितने चाव से भाभी ने यह साड़ी खरीदी थी. भैया को दफ्तर के काम से बनारस जाना था. ‘‘चाहो तो तुम भी चलो,’’ उन्होंने भाभी से कहा था, ‘‘पटना से बनारस ज्यादा दूर नहीं है और फिर 2 ही दिन की बात है. बच्चों को मां देख लेंगी.’’

‘‘भैया मैं भी चलूंगी,’’ मैं ने मचल कर कहा था.

‘‘ठीक है तू भी चल,’’ उन्होंने हंस कर कहा था.

हम तीनों खूब घूमफिरे. फिर हम एक बनारसी साड़ी की दुकान में घुसे.

‘‘बनारस आओ और बनारसी साड़ी न खरीदो, यह हो ही नहीं सकता,’’ भैया बोले.

भाभी ने काफी साडि़यां देख डालीं. फिर एक गुलाबी रंग की साड़ी पर उन की नजर गई, तो उन की आंखें चमक उठीं, लेकिन कीमत देख कर उन्होंने साड़ी परे सरका दी.

‘‘क्यों क्या हुआ?’’ भैया ने पूछा, ‘‘यह साड़ी तुम्हें पसंद है तो ले लो न.’’

‘‘नहीं, कोई हलके दाम वाली ले लेते हैं. यह बहुत महंगी है.’’

‘‘तुम्हें दाम के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं,’’ कह कर उन्होंने फौरन वह साड़ी बंधवाई और हम दुकान से बाहर निकले.

‘‘शशि के लिए भी कुछ ले लेते हैं,’’ भाभी बोलीं.

‘‘शशि तो अभी साड़ी पहनती नहीं. जब पहनने लगेगी तो ले लेंगे. अभी इस के लिए एक सलवारकमीज का कपड़ा ले लो.’’

मेरा बहुत मन था कि भैया मेरे लिए भी एक साड़ी खरीद देते. मेरी आंखों के सामने रंगबिरंगी साडि़यों का समां बंधा था. जैसे ही हम घर लौटे मैं ने मां से शिकायत जड़ दी. मां को बताना बारूद के पलीते में आग लगाने जैसा था.

मां एकदम भड़क उठीं, ‘‘अरे इस प्रशांत के लिए मैं क्या कहूं,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘बीवी के लिए 8 हजार रुपए खर्च कर दिए. अरे साथ में तेरी बिन ब्याही बहन भी तो थी. उस के लिए भी एक साड़ी खरीद देता तो तेरा क्या बिगड़ जाता? इस बेचारी का पिता जिंदा होता तो यह तेरा मुंह क्यों जोहती?’’

‘‘मां, इस के लिए भी खरीद देता पर यह अभी 14 साल की ही तो है. इस की साड़ी पहनने की उम्र थोड़े ही है.’’

‘‘तो क्या हुआ? अभी नहीं तो एकाध साल बाद ही पहन लेती. बीवी के ऊपर पैसा फूंकने को हरदम तैयार. हम लोगों के खर्च का बहुत हिसाबकिताब करते हो.’’

भैया चुप लगा गए. मां बहुत देर तक बकतीझकती रहीं.

भाभी ने साड़ी मां के सामने रखते हुए कहा, ‘‘मांजी, यह साड़ी शशि के लिए रख लीजिए. यह रंग उस पर बहुत खिलेगा.’’

मां ने साड़ी को पैर से खिसकाते हुए कहा, ‘‘रहने दे बहू, हम साड़ी के भूखे नहीं हैं. देना होता तो पहले ही खरीदवा देतीं. अब क्यों यह ढोंग कर रही हो? तुम्हारी साड़ी तुम्हें ही मुबारक हो.’’ फिर वे रोने लगीं, ‘‘प्रशांत के बापू जीवित थे तो हम ने बहुत कुछ ओढ़ा और पहना. वे मुझे रानी की तरह रखते थे. अब तो तुम्हारे आसरे हैं. जैसे रखोगी वैसे रहेंगे. जो दोगी सो खाएंगे.’’ साड़ी उपेक्षित सी बहुत देर तक जमीन पर पड़ी रही. फिर भाभी ने उसे उठा कर अलमारी में रख दिया.

मुझे याद है कुछ महीने बाद भैया के सहकर्मी की शादी थी और घर भर को निमंत्रित किया गया था.

‘‘वह बनारसी साड़ी पहनो न,’’ भैया ने भाभी से आग्रह किया, ‘‘खरीदने के बाद एक बार भी तुम्हें उसे पहने नहीं देखा.’’

‘‘भाभी साड़ी पहन कर आईं तो उन पर नजर नहीं टिकती थी. बहुत सुंदर दिख रही थीं वे. भैया मंत्रमुग्ध से उन्हें एकटक देखते रहे.’’

‘‘चलो सब जन गाड़ी में बैठो,’’ उन्होंने कहा.

मां की नजर भैया पर पड़ी तो वे बोलीं, ‘‘अरे, तू यही कपड़े पहन कर शादी में जाएगा?’’

‘‘क्यों क्या हुआ ठीक तो है?’’

‘‘खाक ठीक है. कमीज की बांह तो फटी हुई है.’’

‘‘ओह जरा सी सीवन उधड़ गई है. मैं ने ध्यान नहीं दिया.’’

‘‘अब यही फटी कमीज पहन कर शादी में जाओगे? जोरू पहने बनारसी साड़ी और तुम पहनो फटे कपड़े. तुम्हें अपनी मानमर्यादा का तनिक भी खयाल नहीं है. लोग देखेंगे तो हंसी नहीं उड़ाएंगे?’’

‘‘मैं अभी कमीज बदल कर आता हूं.’’

‘‘लाइए मैं 1 मिनट में कमीज सी देती हूं,’’ भाभी बोलीं, ‘‘उतारिए जल्दी.’’

थोड़ी देर में भाभी बाहर आईं, तो उन्होंने अपनी साड़ी बदल कर एक सादी फूलदार रेशमी साड़ी पहन ली थी.

‘‘यह क्या?’’ भैया ने आहत भाव से पूछा,’’ तुम पर कितनी फब रही थी साड़ी. बदलने की क्या जरूरत थी?

‘‘मुझे लगा साड़ी जरा भड़कीली है. दुलहन से भी ज्यादा बनसंवर कर जाऊं यह कुछ ठीक नहीं लगता.’’

भैया चुप लगा गए.

उस दिन के बाद भाभी ने वह साड़ी कभी नहीं पहनी. हर साल साड़ी को धूप दिखा कर जतन से तह कर रख देतीं थीं.

मैं जानती थी कि भाभी को मां की बात लग गई है. मां असमय पति को खो कर अत्यंत चिड़चिड़ी हो गई थीं. भाभी के प्रति तो वे बहुत ही असहिष्णु थीं. और इधर मैं भी यदाकदा मां से चुगली जड़ कर कलह का वातावरण उत्पन्न कर देती थी.

घर में सब से छोटी होने के कारण मैं अत्यधिक लाडली थी. भैया भी जीजान से कोशिश करते कि मुझे पिता की कमी महसूस न हो और उन पर आश्रित होने की वजह से मुझ में हीन भाव न पनपे. इधर मां भी पलपल उन्हें कोंचती रहती थीं कि प्रशांत अब गृहस्थी की बागडोर तेरे हाथ में है. तू ही घर का कर्ताधर्ता है. तेरा कर्तव्य है कि तू सब को संभाले, सब को खुश रखे.

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होली स्पेशल: बनारसी साड़ी- भाग 2

लेकिन क्या यह काम इतना आसान था? सम्मिलित परिवार में हर सदस्य को खुश रखना कठिन था.

भैया प्रशासन आधिकारी थे. आय अधिक न थी पर शहर में दबदबा था. लेकिन महीना खत्म होतेहोते पैसे चुक जाते और कई चीजों में कटौती करनी पड़ती. मुझे याद है एक बार दीवाली पर भैया का हाथ बिलकुल तंग था. उन्होंने मां से सलाह की और तय किया कि इस बार दीवाली पर पटाखे और मिठाई पर थोड़ेबहुत पैसे खर्च किए जाएंगे और किसी के लिए नए कपड़े नहीं लिए जाएंगे.

‘‘लेकिन छुटकी के लिए एक साड़ी जरूर ले लेना. अब तो वह साड़ी पहनने लगी है. उस का मन दुखेगा अगर उसे नए कपड़े न मिले तो. अब कितने दिन हमारे घर रहने वाली है? पराया धन, बेटी की जात.’’

‘‘ठीक है,’’ भैया ने सिर हिलाया.

मैं नए कपड़े पहन कर घर में मटकती फिरी. बाकी सब ने पुराने धुले हुए कपड़े पहने हुए थे. लेकिन भाभी के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आई. जहां तक मुझे याद है शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा हो जब घर में किसी बात को ले कर खटपट न हुई हो. भैया के दफ्तर से लौटते ही मां उन के पास शिकायत की पोटली ले कर बैठ जातीं. भैयाभाभी कहीं घूमने जाते तो मां का चेहरा फूल जाता. फिर जैसे ही वे घर लौटते वे कहतीं, ‘‘प्रशांत बेटा, घर में बिन ब्याही बहन बैठी है. पहले उस को ठिकाने लगा. फिर तुम मियांबीवी जो चाहे करना. चाहे अभिसार करना चाहे रास रचाना. मैं कुछ नहीं बोलूंगी.’’

कभी भाभी को सजतेसंवरते देखतीं तो ताने देतीं, ‘‘अरी बहू, सारा समय शृंगार में लगाओगी, तो इन बालगोपालों को कौन देखेगा?’’ कभी भाभी को बनठन कर बाहर जाते देख मुंह बिचकातीं और कहतीं, ‘‘उंह, 3 बच्चों की मां हो गईं पर अभी भी साजशृंगार का इतना शौक.’’

इधर भैया भाभी को सजतेसवंरते देखते तो उन का चेहरा खिल उठता. शायद यही बात मां को अखरती थी. उन्हें लगता था कि भाभी ने भैया पर कोई जादू कर दिया है तभी वे हर वक्त उन का ही दम भरते रहते हैं. जबकि भाभी के सौम्य स्वभाव के कारण ही भैया उन्हें इतना चाहते थे. मैं ने कभी किसी बात पर उन्हें झगड़ते नहीं देखा था. कभीकभी मुझे ताज्जुब होता था कि भाभी जाने किस मिट्टी की बनी हैं. इतनी सहनशील थीं वे कि मां के तमाम तानों के बावजूद उन का चेहरा कभी उदास नहीं हुआ. हां, एकाध बार मैं ने उन्हें फूटफूट कर रोते हुए देखा था. भाभी के 2 छोटे भाई थे जो अभी स्कूल में पढ़ रहे थे. वे जब भी भाभी से मिलने आते तो भाभी खुशी से फूली न समातीं. वे बड़े उत्साह से उन के लिए पकवान बनातीं.

उस समय मां का गुस्सा चरम पर पहुंच जाता, ‘‘ओह आज तो बड़ा जोश चढ़ा है. चलो भाइयों के बहाने आज सारे घर को अच्छा खाना मिलेगा. लेकिन रानीजी मैं पूछूं, तुम्हारे भाई हमेशा खाली हाथ झुलाते हुए क्यों आते हैं? इन को सूझता नहीं कि बहन से मिलने जा रहे हैं, तो एकाध गिफ्ट ले कर चलें. बालबच्चों वाला घर है आखिर.’’

‘‘मांजी, अभी पढ़ रहे हैं दोनों. इन के पास इतने पैसे ही कहां होते हैं कि गिफ्ट वगैरह खरीदें.’’

‘‘अरे इतने भी गएगुजरे नहीं हैं कि 2-4 रुपए की मिठाई भी न खरीद सकें. आखिर कंगलों के घर से है न. ये सब तौरतरीके कहां से जानेंगे.’’

भाभी को यह बात चुभ गई. वे चुपचाप आंसू बहाने लगीं.

कुछ वर्ष बाद मेरी शादी तय हो गई. मेरे ससुराल वाले बड़े भले लोग थे. उन्होंने दहेज लेने से इनकार कर दिया. जब मैं विदा हो रही थी तो भाभी ने वह बनारसी साड़ी मेरे बक्से में रखते हुए कहा, ‘‘छुटकी, यह मेरी तरफ से एक तुच्छ भेंट है.’’

‘‘अरे, यह तो तुम्हारी बहुत ही प्रिय साड़ी है.’’

‘‘हां, पर इस को पहनने का अवसर ही कहां मिलता है. जब भी इसे पहनोगी तुम्हें मेरी याद आएगी.’’

‘हां भाभी’ मैं ने मन ही मन कहा, ‘इस साड़ी को देखूंगी तो तुम्हें याद करूंगी. तुम्हारे जैसी स्त्रियां इस संसार में कम होती हैं. इतनी सहिष्णु, इतनी उदार. कभी अपने लिए कुछ मांगा नहीं, कुछ चाहा नहीं हमेशा दूसरों के लिए खटती रहीं, बिना किसी प्रकार की अपेक्षा किए.’ मुझे उन की महानता का तब एहसास होता था जब वे अपने प्रति होते अन्याय को नजरअंदाज कर जातीं.

मेरी ससुराल में भरापूरा परिवार था. 2 ननदें, 1 लाड़ला देवर, सासससुर. हर नए ब्याहे जोड़े की तरह मैं और मेरे पति भी एकदूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करते. शाम को जब मेरे पति दफ्तर से लौटते तो हम कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बनाते. जब मैं बनठन का तैयार होती, तो मेरी नजर अपनी ननद पर पड़ती जो अकसर मेरे कमरे में ही पड़ी रहती और टकटकी बांधे मेरी ओर देखती रहती. वह मुझ से हजार सवाल करती. कौन सी साड़ी पहन रही हो? कौन सी लिपस्टिक लगाओगी? मैचिंग चप्पल निकाल दूं क्या? इत्यादि. बाहर की ओर बढ़ते मेरे कदम थम जाते. ‘‘सुनो जी,’’ मैं अपने पति से फुसफुसा कर कहती, ‘‘सीमा को भी साथ ले चलते हैं. ये बेचारी कहीं बाहर निकल नहीं पाती और घर में बैठी बोर होती रहती है.

‘‘अच्छी बात है,’’ ये बेमन से कहते, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो.’’

मेरी सास के कानों में यह बात पड़ती तो वे बीच ही में टोक देतीं,

‘‘सीमा नहीं जाएगी तुम लोगों के साथ. उसे स्कूल का ढेर सारा होमवर्क करना है और उस को ले जाने का मतलब है टैक्सी करना, क्योंकि मोटरसाइकिल पर 3 सवारियां नहीं जा सकतीं.’’

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बेटे का पाप

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माध्यम: सास के दुर्व्यवहार को क्या भुला पाई मीना

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सत्यकथा: पत्नी की सहेली पर वासना का वार

दिन ढलने वाला था. करीब 3 बजे का वक्त रहा हागा. उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले 26 वर्षीय अमन बिष्ट कमरे में बैड पर करवटें बदल रहा था. मन में अजीब तरह की बेचैनी थी. काल सेंटर की ड्यूटी से सुबह 5 बजे घर आया था. सीधा बैड पर कंबल में जा घुसा था. पत्नी अनुप्रिया कब ड्यूटी पर घर से निकली, उसे पता ही नहीं चला. दिन में 11 बजे के करीब नींद खुली, तब फ्रैश होने के लिए सीधा बाथरूम में गया.

आधे घंटे बाद किचन में रखा फ्रिज खोलने लगा. उस पर एक चिट चिपकी थी. चिट पर लिखा था, ‘दूध खत्म हो गया है, ले आना. रात की बची सब्जी खा लेना. आटा रखा है. परांठा बना लेना.’ चिट पत्नी अनुप्रिया लगा कर गई थी.

सुबह साढ़े 8 बजे निकलते हुए उस ने सोए अमित को जगा कर कहने के बजाय चिट पर लिख दिया था. चिट की सारी बातें आदेश थीं. पढ़ कर अमन भीतर ही भीतर तिलमिला गया. पत्नी दरवाजा बाहर से लौक कर गई थी. डुप्लीकेट चाबी फ्रिज पर रखी थी.

वह कौशिक एनक्लेव के अपार्टमेंट के नीचे की दुकान से दूध, ब्रेड और मक्खन खरीद लाया. चाय बनाई. उस के साथ 4 ब्रेड सेंक लिए. खाने के बाद कमरे में ही इधरउधर चहलकदमी करता हुआ मोबाइल पर सोशल साइटों को स्क्राल करने लगा.

अचानक जाने उसे क्या सूझी, उस ने बार्डरोब से पत्नी के कपड़े निकाल कर बैड पर फैला दिए. उस में से कुछ अंडरगारमेंट छांटे. बाकी कपड़े सहेज कर दोबारा बार्डरोब में रख दिए.

कुछ समय बाद उस ने मोबाइल से एक नंबर पर काल मिलाया, ‘‘हैलो प्रियंका, क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ खास नहीं, यूं ही शादी के लिए लहंगे का प्राइस पता कर रही हूं. मम्मी ने कहा है कि मेरी शादी के कुछ हफ्ते ही बचे हैं.’’ प्रियंका बोली.

वह उस की पत्नी अनुप्रिया के स्कूल की खास सहेली थी. पास में ही अपने मातापिता और भाईबहन के साथ रहती थी. अमन ने पत्नी की उसी सहेली प्रियंका को काल किया था. वह उस से काफी घुलीमिली थी. उस के घर भी आनाजाना लगा रहता था.

जब कभी अमन का मन विचलित होता या उदासी से घिर जाता, तब प्रियंका से बातें कर लिया करता था. इस बात को प्रियंका भी समझती थी.

उस रोज 18 फरवरी, 2022 को भी अमन का मन बेचैन था. मन में कुछ वैसी बातें गांठ बन रही थीं, जो प्रियंका ही खोल सकती थी. इसलिए वह अपने मन की बात प्रियंका को बताना चाहता था. खुशमिजाज प्रियंका को उस ने कहा, ‘‘तुम से आज मिलना चाहता हूं, कुछ जरूरी काम है.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ? फिर अनुप्रिया से झगड़ा हो गया?’’ प्रियंका बोली.

‘‘वैसा ही कुछ समझ लो, वैलेंटाइन डे के एक दिन पहले से ही रूठी है.’’

‘‘आखिर हुआ क्या?’’ प्रियंका बोली.

‘‘मैं जो गिफ्ट देना चाहता था, उस का नाम सुनते ही भड़क उठी. फिर भी मैं अगले रोज खरीद लाया,’’ अमन बोला.

‘‘क्या गिफ्ट था, जरा मैं भी तो सुनूं.’’ प्रियंका बोली.

‘‘मिलोगी, तब उस बारे में बताऊंगा.’’ अमन बोला.

‘‘अच्छा छोड़ो पुरानी बात, अब क्या है? वैलेंटाइन गए तो कई दिन गुजर गए,’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘मैं चाहता हूं कि उस के पसंद की साड़ी खरीदूं, लेकिन मुझे उस की अच्छी समझ नहीं है. इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ बाजार चलो ताकि मैं अच्छी साड़ी खरीद लूं. वैसे भी तुम उस का टेस्ट मुझ से अच्छी तरह जानती हो,’’ अमन आग्रह के लहजे में बोला.

‘‘चलो ठीक है चलती हूं, लेकिन मम्मी से पूछ कर काल करती हूं. तुम अपनी स्कूटी ले कर आ जाना,’’ कहती हुई प्रियंका ने फोन कट कर दिया.

कुछ देर में ही प्रियंका ने अमन को फोन कर आने की सूचना दे दी. अमन 10 मिनट में प्रियंका के घर चला गया. उसे स्कूटी पर अपने फ्लैट पर ले आया. जबकि प्रियंका ने उस से सीधे बाजार चलने को कहा, तब उस ने बताया कि पहले उसे वह गिफ्ट को दिखाना चाहता है, जो पत्नी के लिए खरीदा था.’’

बातें करतेकरते दोनों फ्लैट में आ गए थे. अमन ने प्रियंका को सीधा बैडरूम में जाने के लिए इशारा किया और खुद किचन में चला गया. प्रियंका बैडरूम में बैड पर फैले कपड़ों को देख कर चौंक पड़ी.

तुरंत वह भी किचन में आते ही बोली, ‘‘यह सब क्या है अमन? बैडरूम की तुम ने क्या हालत बना रखी है. और…और उस पर तुम ने बीवी के कैसेकैसे कपड़े फैला रखे हैं. मुझे लगता है कि अनुप्रिया ने तो ऐसा नहीं किया होगा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ पसंद नहीं आया वह सब,’’ अमन मुसकराता हुआ बोला.

‘‘पसंद? कैसी बेशर्मी की बातें कर रहे हो, वह भी एक लड़की के सामने. अब समझी कि अनुप्रिया तुम से क्यों नाराज हुई होगी.’’ प्रियंका सख्ती से बोली.

‘‘इस में नाराज होने की बात क्या है? मैं वही तो उस के लिए वैलेंटाइन गिफ्ट ले कर आया था. उसे पसंद नहीं आया. तुम्हें पसंद है तो तुम ले लो मेरी तरफ से यह गिफ्ट.’’

‘‘तुम तो बड़े बदतमीज हो. मैं तुम से अंडरगारमेंट्स गिफ्ट लूंगी? शर्म नहीं आती है तुम्हें… मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा और सभ्य समझती थी, लेकिन तुम तो बेहद ही गंदे इंसान निकले. मैं जा रही हूं.’’ कहती हुई प्रियंका मेन गेट की ओर बढ़ी.

अमन ने उस का हाथ पकड़ लिया. एक झटके में हाथ छुड़ा कर प्रियंका तेजी से दरवाजा खोलने के लिए हैंडल घुमाने लगी. दरवाजा लौक था. पीछे से अमन उस के पास आ कर बोला, ‘‘लौक लगा है. दरवाजा तब तक नहीं खुलेगा, जब तक मैं नहीं चाहूंगा.’’

प्रियंका का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बैडरूम में ले गया. उसे बैड पर वहीं गिरा दिया, जहां अनुप्रिया के लिए खरीदे गए अंडरगारमेंट्स फैले थे. कुटिलता के साथ बोला, ‘‘मैं आज इस बिकिनी और ब्रा को तुम्हें अपने हाथों से पहनाऊंगा और गिफ्ट भी करूंगा…’’

प्रियंका बैड से उठ बैठी. उस ने हाथ जोड़ लिए. वहां से जाने देने की भीख मांगने लगी, लेकिन अमन के दिमाग में उस समय कुछ और ही चल रहा था. प्रियंका उस की आंखों में सैक्स का उतावलापन देख कर सहम गई थी.

कमरे से निकलने की कोशिश करने लगी, लेकिन अमन उसे दबोचने का प्रयास करने लगा, ‘‘मैं जो कहता हूं, सीधी तरह मान जाओ, वरना मैं कुछ गलत कर बैठूंगा, तब मुझे बाद में मत कहना.’’

‘प्लीज मुझे छोड़ दो! छोड़ दो!!’ प्रियंका कहती रही. जबकि अमन उसे अपनी जिद के आगे झुकाने में लगा रहा.

‘‘मैं तुम्हें अपने हाथों से बिकिनी पहनाऊंगा, साथ में एक सेल्फी लूंगा. फिर तुम उसी पर अपने कपड़े पहन लेना और चली जाना. मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं.’’ अमन बोला.

‘‘नहीं…नहीं, प्लीज… अगले महीने मेरी शादी होने वाली है,’’ प्रियंका गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘तो तुम ऐसे नहीं मानोगी.’’ यह कहते हुए अमन तेजी से किचन जा कर नायलोन की रस्सी ले आया.

पीछेपीछे दरवाजे तक आ चुकी प्रियंका को धकेलते हुए उस ने उसे बैड पर दोबारा पटक दिया. उस के हाथपैर बांध दिए. उस के साथ जबरदस्ती करने लगा. उस ने उस की जींस की बेल्ट खोलने की कोशिश की.

बचाव में प्रियंका पलट गई. अमन गुस्से में बोला, ‘‘साली… हरामजादी, हमारी बिल्ली, हम से म्याऊं. यह ले और छटपटा ले.’’ गुस्से में बड़बड़ाते हुए अमन ने उस के गले में रस्सी फंसा कर जोर से खींच दिया. प्रियंका की हलकी सी चीख निकल पड़ी और छटपटाती हुई कुछ पल में ही शांत हो गई.

औंधे मुंह पड़ी प्रियंका को देख कर अमन बोला, ‘‘सीधी तरह मान जाती तो बेहोश नहीं होती. पड़ी रह ऐसे. तेरे साथ मैं तो अब मनमाफिक सैक्स भी करूंगा…’’

अमन प्यार से प्रियंका के बदन को सहलाने लगा. उस की जींस खोल दी. उसे बिकिनी पहनाई. मोबाइल में उस की तसवीरें भी लीं और अपने मन की हर मुराद पूरी कर ली.

पत्नी की बेरुखी के चलते यौन जीवन से वंचित गुबार निकालने के बाद उस ने पाया कि प्रियंका बेहोश नहीं थी, बल्कि उस की सांसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं. इस दौरान उस ने प्रियंका की लाश के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध भी बनाए.

प्रियंका की मौत हो जाने का एहसास होने पर वह घबरा गया. उस ने बचाव के लिए फटाफट अपने कपड़े और जरूरी सामान बैग में भरे और फरार हो गया. प्रियंका की लाश उस ने वहीं छोड़ दी. कमरे को इंटरलौक करने के अलावा बाहर से एक दूसरा ताला जड़ दिया.

शाम के करीब 8 बजे अनुप्रिया ड्यूटी से अपने फ्लैट पर आई. बाहर दूसरा ताला जड़ा देख चौंक गई. किसी अनहोनी से भी आशंकित हो गई. कारण इंटरलौक के साथसाथ दूसरा ताला तभी लगाया जाता था, जब दोनों अधिक समय या कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर जाते थे.

अमन की स्कूटी नीचे पार्किंग में लगी थी. उस के पास बाहर लगे ताले की एक्स्ट्रा चाबी नहीं थी. वह सोच में पड़ गई. क्या करे… नहीं चाहते हुए भी उस ने अमन के मोबाइल पर काल किया, जो स्विच्ड औफ था.

अब उस की चिंता और बढ़ गई. कुछ देर इंतजार किया. करीब आधे घंटे तक वह नहीं आया, तब उस ने पड़ोसियों की मदद से ताला तुड़वाया.

कमरे में घुसते ही उसे कुछ अच्छा महसूस नहीं हुआ. जहांतहां सामान बिखरा पड़ा था. बैडरूम में जाते ही उस की चीख निकल गई. बैड पर एक युवती की अर्धनग्न लाश पड़ी थी. उस का चेहरा आधा दिख रहा था. उस ने तुरंत उसे पहचान लिया, मुंह से निकल पड़ा, ‘‘अरे यह तो प्रियंका है. यहां कैसे आई?’’

उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को काल कर लाश की सूचना दे दी. पुलिस टीम के साथ 5 मिनट में ही आ गई. पुलिस बैड पर पड़ी लाश की स्थिति, पास पड़ी नीले रंग की नायलोन की रस्सी, गले में रस्सी के गहरे निशान, अस्तव्यस्त बैड की चादर, बिखरे कपड़े आदि से समझ गई कि उस की गला घोट कर हत्या की गई है. युवती का अर्धनग्न शरीर रेप की भी गवाही दे रहा था.

पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में अनुप्रिया ने बताया कि मरने वाली प्रियंका उस की सहेली थी. उस का पति अमन बिष्ट वारदात के बाद से ही फरार है.

शुरुआती जांच में हत्या का संदेह अनुप्रिया के पति पर गया. पुलिस ने मृतका के घर वालों को इस की सूचना दे कर घटनास्थल पर बुला लिया.

मृतका की मां भागीभागी आई. उन्होंने पुलिस को बताया कि उस की बेटी प्रियंका अनुप्रिया के पति अमन के साथ बाजार से साड़ी खरीदवाने के लिए गई थी. अमन ही उसे बुलाने आया था.

इस मामले में थाना बुराड़ी में अमन बिष्ट के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. अनुप्रिया ने बताया कि उस ने अमन से 2 साल पहले प्रेम विवाह किया था. ग्रैजुएट अनुप्रिया एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी. जबकि अमन एक काल सेंटर में काम करता था.

उस ने हरियाणा से पौलिटैक्निक किया था. अमन के मातापिता उन के प्रेम विवाह से नाराज चल रहे थे. वे अमन से कोई संबंध नहीं रखते थे. इस कारण अमन परिवार वालों से अलग किराए के मकान में रहता था.

फरार अमन की तलाशी के लिए डीसीपी (नौर्थ) सागर सिंह कलसी ने एसीपी स्वागत पाटिल के नेतृत्व में एक टीम बनाई.

टीम में बुराड़ी थानाप्रभारी राजेंद्र प्रसाद, एसआई सतेंद्र कुमार, दीपक कुमार, एएसआई राजीव कुमार, हैडकांस्टेबल सतवीर, परवीन कुमार, कांस्टेबल शीशराम, कुलदीप के साथसाथ महिला कांस्टेबल मेघा को शामिल किया गया.

अमन को ढूंढने की शुरुआत 18 फरवरी से हो गई. उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया गया. अगले रोज 19 फरवरी की शाम को दिल्ली पुलिस ने अमन का फोन लखनऊ में औन पाया. तुरंत वहां की पुलिस को सूचना दे कर मदद मांगी गई. लेकिन पुलिस उसे लखनऊ में नहीं दबोच पाई.

मोबाइल फोन सर्विलांस के माध्यम से 20 फरवरी, 2022 को अमन के जयपुर में होने की जानकारी मिली. दिल्ली पुलिस ने तुरंत वहां की पुलिस से संपर्क किया. अमन जयपुर से निकल भागने में सफल नहीं हो पाया. जयपुर की पुलिस ने अमन को बस अड्डे से गिरफ्तार कर लिया.

21 फरवरी की सुबहसुबह अमन बुराड़ी थाने में था. उस से जांच टीम ने प्रियंका की हत्या के मामले में गहन पूछताछ की. जल्द ही उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

अमन के बयान के आधार पर उस पर 24 वर्षीय युवती प्रियंका की हत्या और उस के साथ अप्राकृतिक यौनाचार संबंधी आईपीसी की धाराएं लगाई गईं. हत्या की धारा 302 तो पहले से ही एफआईआर में दर्ज थी. उस में बलात्कार की धारा और अप्राकृतिक यौन संबंध की धारा 377 को  भी जोड़ दिया गया.

अमन ने बताया कि उस ने प्रियंका के साथ बलात्कार करने की कोशिश की थी. वह उस की हत्या नहीं करना चाहता था, लेकिन उस के द्वारा  विरोध करने पर गुस्से में उस के गले में रस्सी डाल दी थी. उसे अंदाजा नहीं था कि उस की मौत हो जाएगी.

इस छानबीन के बाद पुलिस ने दावा किया कि आरोपी एक सैक्स उन्मादी युवक था. वह नियमित रूप से पोर्न देखता था. अपनी पत्नी के साथ यौन जीवन से असंतुष्ट था.

इस कारण ही उस ने 24 वर्षीया प्रियंका को निशाना बना लिया था. यहां तक कि वह ड्रग्स और सैक्स क्षमता बढ़ाने वाली गोलियां लेता था. वह अपने करीबी दोस्तों के तानों से भी परेशान था. वे उसे कमजोर मर्द का ताना देते थे.

पूछताछ के दौरान अमन ने पत्नी के वास्ते साड़ी दिलाने के बहाने प्रियंका को अपने कमरे में बुलाने की बात स्वीकार ली. उस की बात मानने से इनकार करने पर जबरदस्ती की. गुस्से में आ कर उस की गरदन पर इतना जोर लगाया कि उस का दम घुट गया.

पुलिस ने नीले रंग की नायलोन की रस्सी बरामद कर ली. मैडिकल रिपोर्ट के आधार पर अप्राकृतिक यौन संबंध का खुलासा हो गया था.

दिल्ली पुलिस ने पूछताछ कर 23 फरवरी, 2022 को उसे कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

(यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पीडि़ता की निजता की रक्षा के लिए उस की पहचान का खुलासा नहीं किया गया है. कथा में अनुप्रिया और प्रियंका परिवर्तित नाम हैं)

बेटे का पाप : भाग 3

6 मार्च, 2020 की शाम साढ़े 5 बजे लक्ष्मी देवी घर पर नहीं थी, वह मंदिर गई हुई थी. शिवम ने रानी को बुला लिया और घर में रखे पैसे और गहने निकालने लगा. तभी लक्ष्मी देवी घर वापस लौट आई. शिवम की हरकत देख कर वह बिफर पड़ी, ‘‘शिवम!’’

मां की आवाज सुन कर शिवम चौंक गया और एक झटके में खड़ा हो कर अपनी मां की तरफ  देखने लगा. उस के पास ही रानी भी खड़ी थी.

बेटे शिवम को दुत्कारते हुए लक्ष्मी देवी बोली, ‘‘अब यही दिन तो दिखाना बाकी रह गया तुझे दुष्ट. खुद तो कभी कुछ कमाया नहीं और मेरी जिंदगी भर की पूंजी को चुरा कर उड़ाने पर आमादा है. आज तुझे तो मैं सबक सिखा कर ही रहूंगी. अभी मैं पुलिस को फोन करती हूं और तुम दोनों को अंदर करवाती हूं. जब जेल की हवा खाओगे, तब समझ में आएगा.’’

यह सुन दोनों घबरा उठे और एकदूसरे की ओर देखा. शिवम ने महसूस किया कि रानी जैसे उस से कह रही हो रोको अपनी मां को. शिवम ने सहमति में सिर हिलाया. फिर अपनी मां की ओर झपटा. मां के हाथ से मोबाइल छीन कर शिवम ने मां को बैड पर गिरा दिया. फिर बैड पर रखे तकिया से उस ने अपनी मां का कस कर मुंह दबा दिया, जिस से दम घुटने से लक्ष्मी देवी की मौत हो गई.

अब शिवम को समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करे. उस ने रानी को उस के घर भेजा. फिर मकान के मेनगेट में लौक लगा कर वह भावना एस्टेट गया, वहां एक चाय की दुकान पर बैठा रहा. वहां बैठने के दौरान उस ने रानी से कई बार फोन पर बात की. वह चाय की दुकान पर 5 घंटे बैठा रहा. रात 11 बजे वह घर पहुंचा, तब उस ने जगदीशपुरा थाने को मां की मौत हो जाने की सूचना दी.

सूचना मिलने पर इंसपेक्टर राजेश कुमार अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया तो लक्ष्मी देवी के शरीर पर किसी तरह की चोट के निशान नहीं दिखे. इस का मतलब यही था कि किसी चीज से गला घोंटा गया है.

इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह घर पर नहीं था. अभी वह घर लौटा तो मां को इस हालत में पाया. घर में किसी अंजान व्यक्ति द्वारा वारदात किए जाने की शंका होते ही उस ने पुलिस को सूचना दी.

इन सब में इंसपेक्टर राजेश कुमार को अजीब बात यह लगी कि जिस बेटे की मां की मौत हुई थी उस बेटे को कोई गम नहीं था, चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी, यह आश्चर्य की बात थी.

शिवम पर संदेह होने पर भी उन्होंने छेड़ा नहीं. अभी ऐसा कोई सुबूत उन के पास नहीं था, जिस से उसे गुनहगार ठहराया जा सके. उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

फिर थाने आ कर उन्होंने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में मृत्यु का कारण दम घुटना बताया गया था. मौत भी सूचना मिलने के पांच घंटे पहले होने की  बात बताई गई थी.

इस के बाद इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय शिवम की लोकेशन उस के घर की ही थी. काल डिटेल्स में एक नंबर पर इंसपेक्टर राजेश कुमार की नजर गई, उस नंबर पर शिवम की रोज कई बार बात होती थी.

घटना वाले दिन भी देर रात तक कई बार उस नंबर पर बात की गई थी. उस नंबर की जांच की गई तो वह शिवम के पड़ोस में रहने वाली रानी का निकला. घटना के समय रानी के मोबाइल फोन की लोकेशन शिवम के साथ ही थी.

8 मार्च, 2020 को इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम और रानी को गिरफ्तार कर लिया. उन से थाने ला कर पूछताछ की गई तो दोनों ने हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद इंसपेक्टर कुमार ने हत्या में प्रयुक्त तकिया भी बरामद कर लिया, जिस से उन्होंने लक्ष्मी देवी का गला घोंटा था.

आवश्यक कागजी खानापूर्ति करने के बाद शिवम और रानी को सक्षम न्यायालय में पेश किया गया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

अब क्या करूं मैं

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बेटे का पाप : भाग 2

शिवम उस की तारीफ करते हुए पहले भी ऐसा कुछेक बार कर चुका था. रानी शिवम के मन की यौन जिज्ञासाओं को समझती थी. इसलिए उस की हरकतों का बुरा नहीं मानती थी.

वह जानती थी कि शिवम का मन इस से आगे कुछ और भी चाहता होगा, पर वह शिवम से यही कहती थी, ‘‘बेसब्र मत बनो, मैं तुम से प्यार करती हूं और शादी के बाद पूरी तरह तुम्हारी हो जाऊंगी, तब जो जी चाहे करना.’’

शिवम भी उस की भावनाओं को समझ कर खुद को रोक लेता था. लेकिन आज माहौल एकदम बदला हुआ था. शिवम के नग्न भीगे कसरती बदन को देख कर रानी की सोई हुई भावनाएं जाग उठी थीं. जब शिवम ने उस की पतली कमर में हाथ डाल कर जिस तरह उस के होंठों को चूमा तो उस के बदन में चिंगारियां चटखने लगी थीं.

एक फुट के फासले पर खड़े शिवम के हाथ में रानी की कलाई थी और निगाहों में एक सवाल था. वह अपलक रानी के चेहरे को निहार रहा था. जबकि रानी की झुकी हुई आंखें चोरीचोरी उस के बदन को देख रही थीं. उस की नजरों के लक्ष्य को समझ कर शिवम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जब तुम्हारा हूं तो मेरे शरीर का जर्राजर्रा तुम्हारा है इन पर तुम्हारा ही हक है.’’

रानी लजा गई. चेहरे पर हया की लाली फैली तो कांपते होंठों से उस ने कहा, ‘‘तुम बहुत शरारती होते जा रहे हो.’’

‘‘हुस्न का खजाना बांहों में हो तो बड़ेबड़े तपस्वी बेईमान हो जाते हैं.’’ कहते हुए शिवम रानी के एकदम करीब खिसक आया. उस ने अपने दोनों हाथ दीवार पर टिका कर उस ने रानी को अपनी जद में ले लिया. फिर धीरे से अपने होंठ उस के होंठों की तरफ  बढ़ाए.

‘‘नहीं शिवम यह ठीक नहीं है,’’ रानी ने उसे रोकना चाहा, लेकिन शिवम तब तक अपने जिस्म का बोझ उस पर डाल चुका था. तन की गरमी पा कर रानी का विरोध मंद पड़ गया.

रानी भी खुद पर नियंत्रण न रख सकी. फिर दोनों पहली बार आनंद की एक नई दुनिया की सैर को निकल गए. मंजिल मिलने के बाद ही वह एकदूसरे से अलग हुए.

रानी को हासिल करने के बाद शिवम उस का और भी दीवाना हो गया. उस की सुबह रानी से शुरू होती थी और शाम रानी पर खत्म होती थी. उन को अलग होने का बिलकुल भी मन नहीं होता था लेकिन लोकलाज के चलते शिवम अपने घर और रानी अपने घर जाने को मजबूर हो जाती.

दोनों विवाह कर के एक साथ जिंदगी बिताना चाहते थे लेकिन यह संभव नहीं था. क्योंकि वे एक जाति के नहीं थे. ऐसे में लक्ष्मी देवी कभी भी अपने बेटे शिवम को दूसरे कुल में शादी करने की अनुमति नहीं देती.

लक्ष्मी देवी पुजारिन होने के कारण धार्मिक प्रवृत्ति की थी. वह हरगिज दोनों के रिश्ते को मंजूरी नहीं देती. अपनी मां के बारे में शिवम बखूबी जानता था. ऐसे में शिवम के दिमाग में उथलपुथल मचने लगी कि क्या करे, क्या न करे.

उसे सिर्फ एक ही रास्ता सूझा कि वह आर्यसमाज मंदिर में रानी से शादी कर ले और उसे ले कर कहीं दूर चला जाए. रानी से  शिवम ने बात की तो उस का भी यही कहना था कि जब परिवार हमारे मन की करेंगे नहीं, हमारी खुशियों के बारे में नहीं सोचेंगे तो हम क्यों उन के बारे में सोचें. हम भी वही करेंगे जो हमें सही लगेगा.

आपसी सहमति के बाद दोनों ने आर्यसमाज मंदिर में विवाह कर लिया. विवाह कर के दोनों बहुत खुश थे. क्योंकि वह एक नई जिंदगी की शुरुआत जो कर रहे थे.

विवाह करने के बाद शिवम ने कुछ सोच कर अपनी मां लक्ष्मी देवी को रानी के साथ विवाह करने के बारे में बताया तो लक्ष्मी देवी ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई, ‘‘निखट्टू घर में पड़ेपड़े मेरे दिए निवाले तोड़ता रहा, कभी एक पैसे का काम नहीं किया. अब ऊपर से चोरीछिपे शादी कर लेने की बात कर रहा है. पहले तुझे, अब उसे भी छाती पर बैठा कर खिलाऊं, ऐसा कभी नहीं हो सकता. वैसे भी मैं तेरी इस शादी को नहीं मानती.’’

‘‘आप मानो न मानो रानी से मेरी शादी हो चुकी है. मैं उसे हरगिज नहीं छोड़ सकता.’’ इतना कह कर शिवम वहां से चला गया.

लक्ष्मी देवी बैठ कर सिसकने लगी और उस दिन को कोसने लगी, जब शिवम पैदा हुआ था. वह सिसकते हुए बोली, ‘‘ऐसे कपूत से तो निपूती रहती.’’

इस के बाद मांबेटे में शादी की बात को ले कर रोज झगड़ा होने लगा.

दूसरी ओर रानी के घरवालों ने उस के लिए उपयुक्त वर देख कर उस का रिश्ता पक्का कर दिया. रानी इस से घबरा उठी. एक तरफ रानी की शादी तय हो गई, दूसरी ओर लक्ष्मी देवी उस को अपनाने को तैयार नहीं थी.

ऐसे में दोनों घर से भाग कर कहीं और अपनी दुनिया बसाने के बारे में सोचने लगे. शिवम के पास कोई कामधाम तो था नहीं, जो पैसे होते. इसलिए शिवम ने फैसला किया कि वह घर में रखे रुपए और गहने चोरी से निकाल कर रानी के साथ भाग जाएगा.

 

बेटे का पाप : भाग 1

जब किसी को किसी से प्यार हो जाए, तो उस की हालत अजीब हो जाती है. सोतेजागते उस का ही खयाल, उस के ही सपने आते हैं. सीने में अजीब सी आग भरी होने का अहसास होता है. इतना ही नहीं, आंखों और नींद में रार मच जाती है. प्रेम दीवानी रानी का यही हाल था. जब तक वह अपने प्रेमी शिवम शर्मा को देख न लेती तब तक बेचैनी उसे सताती रहती थी.

शिवम कहीं दूर नहीं रानी के घर के पास ही रहता था. बचपन से रानी उसे देखती आ रही थी. उस के प्रति मन में कभी किसी प्रकार की भावना नहीं आई थी. मोहल्ले में जैसे सब रहते थे, वैसे ही शिवम रहता था. शिवम का थोड़ा महत्त्व इसलिए था कि दूसरे लोगों के मकान कुछ फासले पर थे, जबकि शिवम रानी के घर के पास ही रहता था.

प्यार के लिए मुद्दत के इंतजार की जरूरत नहीं होती. यह तो कुदरत की वह नेमत है, जो किसी भी पल इंसान को मिल जाती है. गर्मियों की एक सुबह की बात है. कहीं जाने के लिए शिवम रानी के घर के सामने से गुजर रहा था. उस वक्त उस के जेहन में कल्पना तक नहीं थी कि कुछ क्षणों बाद उस के जीवन में एक नया मोड़ आने वाला है.

गरमी के मौसम में लू चलने के कारण धूल बहुत उड़ती है. इसीलिए लोग घरों के सामने पानी की छिड़काव कर देते हैं, ताकि धूल न उड़े.

उस सुबह रानी भी पानी से भरी बाल्टी ले कर अपने घर के सामने छिड़काव करने के लिए दरवाजे पर आई. वह यह नहीं देख पाई कि सामने से शिवम निकल रहा है. उस ने बाल्टी के पानी से मग भरा और दरवाजे से बाहर फेंक दिया. फेंका गया पानी शिवम पर गिरा. कुछ पल के लिए वह चौंक गया और उस के पैर जहां के तहां ठिठक गए.

रानी भी उसे देखती रह गई. मन में वह सोच रही थी कि यह उस से क्या हो गया. शिवम न जाने कहां जा रहा था, उस की एक गलती से उस के कपड़े भीग गए. शिवम अब उसे बहुत डांटेगा.

रानी हैरान तब हुई, जब शिवम ने अपने गीले कपड़े झटके और रानी की आंखों में देख कर मुसकराने लगा. शिवम की मुसकराहट ने रानी के डर को दूर कर दिया, वह बोली, ‘‘मैं ने तुम्हें आते नहीं देखा था, गलती से पानी फेंक दिया, माफ  कर दो.’’

‘‘गरमी के इस मौसम में ठंडा पानी मन को तरावट देता है. थोड़ी देर के लिए ही सही, ताजगी और तरावट का मजा आ गया,’’ शिवम हंसने लगा, ‘‘रही कपड़े भीगने की बात तो उस की चिंता नहीं. मौसम ऐसा है कि कुछ कदम चलते ही गरम हवा कपड़े सुखा देगी.’’ वह एक बार फिर मुसकराया और अपनी राह चल पड़ा.

शिवम की मुसकान में न जाने ऐसा क्या था कि तीर की तरह रानी के जिगर के पार हो गई. उस ने बाल्टी से पानी का मग भरा और अपने सिर पर उड़ेल लिया.

रानी की मां ने यह तमाशा देखा तो वह चिल्लाई,‘‘दरवाजे पर खड़ी हो कर तू खुद को क्यों भिगो रही है, नहाना है तो घर के भीतर आ कर नहा ले.’’

‘‘मम्मी, मैं नहा नहीं रही, ठंडे पानी से कपड़े भिगो कर खुद को ताजगी और तरावट से भर रही हूं.’’ वह बोली.

इस के बाद वह महसूस करने लगी कि जब शिवम भीगा होगा, तब उस ने ऐसा ही महसूस किया होगा. उस पल से एक अहसास ही नहीं जुड़े, दिल के तार भी जुड़ गए. बस इस के बाद शिवम बहुत तेजी से रानी के दिलोदिमाग पर छाता चला गया.

शिवम का हाल भी रानी से अलग नहीं था. पानी फेंकने में हुई चूक के बाद उस का हैरान चेहरा और फैली आंखें शिवम के दिल में बस गई थीं.

बस इसी एक बात ने उस की सोच को नई दिशा दे दी. शिवम ने रानी के बारे में सोचा तो वह यकायक अपनी सी लगने लगी. दिल भी उछल कर बोलने लगा कि हां उसे भी रानी से प्यार हो गया है.

ताजनगरी आगरा के जगदीशपुरा थाना क्षेत्र के वैशाली नगर, नगला गूजर में रमेश चंद्र शर्मा रहते थे. परिवार में उन की पत्नी लक्ष्मी देवी और इकलौता पुत्र शिवम शर्मा था. रमेश चंद्र पंडिताई का काम करते थे. उसी से परिवार का खर्च चलता था.

करीब 12 साल पूर्व रमेश चंद्र की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी. अब लक्ष्मी देवी पर अपना और बेटे का पेट भरने और उसे अच्छी जिंदगी देने की जिम्मेदारी आ गई.

पति की पंडिताई को करते देखते हुए लक्ष्मी भी उस में पारंगत हो गई थी. इसलिए पति की मृत्यु के पश्चात एक मंदिर की पुजारिन बन गई. वहां आने वाले चढ़ावे से अपना और बेटे का पेट पालने लगी.

25 साल के हो चुके शिवम ने केवल इंटरमीडिएट तक ही पढ़ाई की थी. उस ने कुछ दिन एक कपड़े की दुकान पर काम किया, फिर वहां से छोड़ दिया. बेरोजगारी में दिन काटने लगा. मां जो लाती उसी में वह गुजारा कर लेता.

लक्ष्मी देवी के मकान के पास ही कालीचरण का मकान था. 20 वर्षीय रानी कालीचरण की ही बड़ी बेटी थी. रानी ने हाईस्कूल तक ही पढ़ाई की थी. पासपास रहने के कारण दोनों परिवार एकदूसरे से परिचित थे.

बचपन से रानी और शिवम एकदूसरे को देखते आ रहे थे. किशोरावस्था को पार कर के युवावस्था में प्रवेश कर गए, तब भी उन के मन नहीं मचले. उस दिन पानी के मग ने दोनों के बीच एक बेनाम रिश्ता बना दिया. ऐसा बेनाम रिश्ता जिस में तड़प, बेचैनी, कसक और प्यार था.

उस दिन से शिवम और रानी की आंखें एकदूजे के दीदार की प्यासी रहने लगीं. शिवम फुरसत में होता तो वह अपने घर के चबूतरे पर बैठा होता. मन रानी के बारे में सोच रहा होता और प्यासी आंखें उस के द्वार पर टकटकी लगाए होतीं.

शिवम को देखने के लिए किसी बहाने से रानी भी घर के बाहर आ जाती. दोनों की आंखें मिलतीं तो दोनों के लब खिल जाते. इस के साथ ही धड़कनों की गति बढ़ जाती.

रानी और शिवम में बातचीत होनी सामान्य बात थी. पूरे मोहल्ले के सामने बात भी करते तो उन के रिश्ते पर कोई शक नहीं करता. कहते हैं कि न, जब प्यार होता है तो मन में चोर भी पैदा हो जाता है. रानी और शिवम के मन में भी चोर पैर जमाए बैठा था. सो एकांत में सामना होते ही मानो उन की हिम्मत जवाब देने लगती.

शिवम को भी डर लगता कि प्रेम निवेदन सुन कर रानी भड़क गई तो सिर पर इतने जूते पड़ेंगे कि वह गंजा हो जाएगा.

कुछ दिन यूं ही आंखमिचौली चलती रही, फिर एक दिन मौका मिला तो शिवम ने हिम्मत कर के मन की बात कह दी, ‘‘रानी, मुझे तुम से प्यार हो गया है, अब तुम भी अपने प्यार को जता कर मेरे दिल की रानी बन जाओ.’’

शर्म से रानी के गाल गुलाबी हो गए. उस ने सिर झुका लिया और पैर के अंगूठे से जमीन खुरचने की नाकाम कोशिश करने लगी.

रानी के अंदाज से वह समझ गया कि डरने की कोई बात नहीं. रानी भी उस से प्यार करती है.

प्रेम तभी आनंद देता है जब उस का प्रदर्शन किया जाए. शिवम भी रानी के मुंह से उस के दिल का हाल सुनना चाहता था. इसलिए उसे बोलने के लिए उकसाया, ‘‘कहो न, तुम भी मुझ से प्यार करती हो?’’

रानी ने सिर उठा कर शिवम की आंखों में देखा, उस के बाद पुन: नजरें नीची कर लीं. मुसकराई, इकरार में सिर हिलाया और तेजी से उस के सामने से हट गई. शिवम का दिल बल्लियों उछलने लगा, वह समझ गया कि रानी को भी उस से प्यार है.

मोहब्बत का इजहार और इकरार होते ही रानी व शिवम की प्रेम कहानी शुरू हो गई. कभी शिवम का सूना घर, कभी पार्क तो कभी सुनसान स्थान रानी और शिवम की मोहब्बत के खामोश गवाह बनने लगे.

शिवम की मां मंदिर चली जाती तो घर में शिवम ही अकेला रह जाता था. ऐसे में रानी मिलने के लिए शिवम के घर आ जाती थी. वहां उस से घंटों बतियाती, प्यार भरी बातें करती.

एक रोज रानी सजसंवर कर शिवम के घर पहुंची. उस ने नया सूट पहन रखा था. शिवम के कमरे में दाखिल हुई तो उसे शिवम नहीं दिखा, वह बाथरूम में था. रानी ने आवाज लगाई, ‘‘शिवम!’’

‘‘कौन?’’ शिवम ने बाथरूम के अंदर से ही पूछा.

‘‘अच्छा तो जनाब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते. आ कर बताऊं कौन हूं मैं?’’ रानी का लहजा शरारत भरा था.

‘‘बिलकुल आ जाओ, मैं कौन सा डरता हूं.’’ वह बोला.

रानी को लगा कि इस समय अन्य कोई वहां आ गया तो बदनामी होगी उस की. वह वापस मुड़ी और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. दरवाजा बंद करने के बाद उस ने बाथरूम के दरवाजे पर दस्तक दी तो शिवम ने उसे अंदर खींच लिया. शिवम मात्र अंडरवियर पहने हुए था. उस का पूरा शरीर पानी से भीगा हुआ था.

शिवम की आंखों में शरारत नाच रही थी. उस ने रानी को करीब खींचा तो वह चिहुंक उठी, ‘‘छोड़ो मेरा सूट गीला हो जाएगा, आज ही पहना है इसे. मैं तो तुम्हें अपना सूट दिखाने आई थी कि तारीफ  क रोगे तुम मेरी.’’

‘‘तारीफ  तो मैं तुम्हारी हमेशा करता हूं, आज फिर से कह रहा हूं कि तुम से हसीन इस जहां में कोई नहीं है.’’ कहते हुए शिवम ने उस के होंठों को चूम लिया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

माध्यम – भाग 3 : सास के दुर्व्यवहार को क्या भुला पाई मीना

काश, मेरी सास होतीं उस समय और देख पातीं उन लोगों के मुख पर उभरती संतुष्टि, कृतज्ञता तथा संकटमुक्ति की अनुभूति को.

‘‘मीना, क्या बात है? आज तो शाम से तुम गौतम बुद्ध हो गई हो. एकदम समाधिस्थ, चिंतन में डूबी.’’

प्रदीप ने मेरे दोनों कंधे पकड़ कर झकझोर दिया. मैं अतीत की गलियों से लौट कर, वर्तमान के राजपथ पर आ गई. हां, मैं सचमुच खो गई थी. 3 विकल्प थे मेरे सामने. 2 में बेईमानी, संवेदनशून्यता और क्रूरता थी.

अनायास मैं ने दोपहर को बंबई से आया पत्र प्रदीप की ओर बढ़ा दिया. उलझे हुए हावभाव का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने मुझ से पत्र लिया और गौर से पढ़ने लगे. मेरी दृष्टि प्रदीप के मुख पर टिकी थी. कुछ पल पूर्व की प्रफुल्लता उन के चेहरे से काफूर हो गई और उस का स्थान ले लिया, चिंता, ऊहापोह, उलझन और उदासी ने.

पत्र पढ़ कर प्रदीप ने मेरी तरफ याचक दृष्टि से ताका और बोले, ‘‘यह तो सब गड़बड़ हो गया. अब क्या करना है?

‘‘सीमा की ससुराल वाले भी कमाल के लोग हैं. मायके में इतनी परेशानी है. पर उन्हें तो अपने बेटे के इम्तिहान और बेटी के जापे की चिंता है, बहू की मां चाहे मरे या जिए, उन की बला से.’’

‘‘प्रदीप, हर सास ऐसे ही सोचती है. याद है, पिछले साल, आप का औरंगाबाद तबादला होने से पहले मेरे घर से चिट्ठी आई थी.’’

‘‘मैं ने तुम्हें भेजा था.’’

‘‘हां, प्रदीप. आप ने समझदारी से काम लिया था. पर मैं ने आप को एक बात नहीं बताई.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मांजी ने मुझ से बड़ी कड़वी बातें कही थीं. उन्होंने कहा था कि जो लड़कियां बातबेबात मायके दौड़ती हैं, उन का अपना घर कभी सुखी नहीं रह सकता. लड़की की मां, बेटी की समस्याओं के लिए ससुराल वालों की आलोचना करती है, लड़की को भड़काती है. ससुराल वालों के प्रति उन के मन में वितृष्णा उत्पन्न करती है. फल यह होता है कि लड़की अपने घर जा कर स्थापित नहीं हो पाती.’’

‘‘मीना, उस को छोड़ो. अब बताओ, क्या करना है?’’ प्रदीप ने पूछा.

‘‘करना क्या है? हमें कल सुबह ही बंबई रवाना होना है.’’

‘‘और छुट्टी का क्या होगा?’’

‘‘प्रदीप, घूमनेफिरने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है. हम मांजी को बीमार और पिताजी तथा भैया को इस संकट में छोड़ कर सैरसपाटे के लिए कैसे जा सकते हैं? मायका हो या पति का घर, बच्चों तथा बहूबेटी का मांबाप, सासससुर की सेवा करना प्रथम कर्तव्य है.’’

‘‘और यह जो सामान बंधा हुआ है, उस का क्या होगा?’’

‘‘उसे भी बंबई लिए चलते हैं.’’

प्रदीप ने मेरी ओर अनुराग भरी दृष्टि डाली. क्या उस में केवल स्नेह था? नहीं, उस में प्रशंसा, गर्व, खुशी और संतोष सब का संगम था.

अगले दिन दोपहर बाद करीब साढ़े 3 बजे हम लोग बंबई पहुंच गए. अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के हमें आया देख कर मां, पिताजी और छोटे भैया के चेहरों पर सूर्योदय के बाद की सी चमक आ गई. वे कितने खुश, मुग्ध और चिंतारहित से लगने लगे थे.

मैं ने मांजी की दशा देखी तो अपने निर्णय की बुद्धिमत्ता का विचार आत्मतुष्टि उत्पन्न कर गया. वास्तव में वह काफी तकलीफ में थीं. साथ ही घर पूरी तरह से अस्तव्यस्त हो चुका था.

‘‘बहू आ गई. अब कोई चिंता नहीं,’’ यह थी पिताजी की प्रतिक्रिया. उन्होंने चैन की सांस ली.

‘‘भाभी, आप अचानक कैसे आ गईं?’’ मेरे देवर ने घोर आश्चर्य से पूछा.

‘‘बहू, तुम लोग तो दक्षिण भारत की यात्रा पर जाने वाले थे?’’ मांजी ने पूछा.

‘‘हां, मांजी. पर मातापिता की सेवा तो हम सब का प्रथम कर्तव्य है. आप की दुर्घटना की सूचना पा कर हम सैरसपाटे के लिए कैसे जा सकते थे?’’

मांजी कुछ नहीं बोलीं. केवल उन की आंखों में नमी उभर आई.

हमारे आगमन से घर में नवजीवन का संचार हो गया. मैं ने आते ही घर के संचालन की बागडोर संभाल ली. सफाई, धुलाई, रसोईघर का काम, खाना बनाना, मांजी की सेवा और समयसमय पर उन को दवा तथा खानपान देना.

3-4 दिन में ही घर का कायाकल्प हो गया.

चौथे दिन मांजी के मुख से निकल ही गया, ‘‘घर को पुरुष नहीं, औरत ही चला सकती है, चाहे वह बहू हो या बेटी.’’

मैं क्या कहती? शब्दों में नहीं, गरदन को हिला कर मैं ने मांजी के कथन से अपनी सहमति प्रकट कर दी.

‘‘सीमा की ससुराल वाले बड़े मतलबी और स्वार्थी हैं. जोत रखा होगा मेरी बेटी को. 4 दिन पहले ननद के बेटी हुई है. जच्चा का कितना काम फैल जाता है. सास की निर्दयता तो देखो, उसे इतना भी खयाल नहीं कि बहू की मां की टांग टूट गई है और घर पर कोई नहीं है देखभाल करने वाला…’’

मांजी की भुनभुनाहट सुन कर मुझे अंदर से खुशी हुई. इनसान पर जब बीतती है तब उसे पता चलता है. पिछले वर्ष मांजी को क्या हुआ? तब वह सास थीं और आज? केवल मां.

7वें दिन एक अप्रत्याशित घटना घटी. शाम के 7 बजे अचानक, बिना किसी पूर्व सूचना के सीमा आ धमकी. साथ में था अशोक, उस का पति.

घर में खुशी की धूम मच गई. मांजी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले. बेटी और दामाद का अनायास आगमन निश्चित रूप से अभूतपूर्व सुख का क्षण था.

हमें देख कर वे दोनों चौंके. उन्होंने हमारे वहां होने की कल्पना तक नहीं की थी.

‘‘चिट्ठी पा कर दौड़े चले आए बेचारे. 1 सप्ताह से बहू ऐसी सेवा कर रही है कि बस पूछो मत,’’ मांजी के स्वर में सच्ची प्रशंसा थी.

‘‘भाभी, कितनी छुट्टियां बची हैं तुम्हारी?’’ सीमा ने पूछा.

‘‘यही 8-10 दिन,’’ मैं ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ कर कहा.

‘‘ठीक है. कल खिसको यहां से. अब मैं संभालती हूं यह मोरचा,’’ सीमा बोली.

‘‘पर अब आरक्षण वगैरह कैसे मिलेगा?’’ प्रदीप के स्वर में निराशा?थी.

‘‘भैया, मतलब तो छुट्टी और सैरसपाटे से है. दक्षिण नहीं जा सकते तो गोआ चले जाओ. बसें जाती हैं. वहां ठहरने के लिए जगह मिल ही जाएगी. कैलनगूट तट की सुनहरी बालू में अर्धनग्न लेट कर मस्ती मारो,’’ सीमा एक सांस में कह गई.

प्रदीप ने मेरी तरफ देखा और मैं ने उस की तरफ.

‘‘हां, बहू. अब सीमा आ गई है. तुम लोग कल चले जाओ. क्यों छुट्टियां बरबाद करते हो,’’ कह कर मांजी ने सीमा से पूछा, ‘‘क्यों री, तेरी सास ने तुझे कैसे छोड़ दिया?’’

‘‘पिताजी की चिट्ठी पढ़ कर उन्होंने खुद कहा कि मैं तुरंत बंबई जाऊं. उन्होंने तो पहले भी मना नहीं किया था. वह तो मुझे ही कहने का साहस नहीं हुआ. इन के इम्तिहान, मंजू बहनजी का जापा और फिर यह भी आप को देखने के लिए चिंतित हो गए.’’

मांजी के मुख पर रुपहली आभा बिखर गई. वह भावातिरेक से कांपने लगीं फिर कुछ क्षण बाद बोलीं, ‘‘सचमुच, मेरे बच्चे और संबंधी इतने उदार, कृपालु और प्रेमी हैं. कितना खयाल रखते हैं हमारा.’’

‘‘बहू,’’ मांजी ने मुझे संबोधित कर के कहा, ‘‘6 मास पूर्व के अपने आचरण पर मैं लज्जित हूं. पहले जमाने में परिवार के अंदर लड़कियों की सेना होती थी. एक गई तो दूसरी उस का स्थान ले लेती थी. पर आज? हम दो, हमारे दो. एकमात्र लड़की चली जाए तो बहुत खलता है. उस पर वह हारीबीमारी, सुखदुख में काम न आए तो बड़ा भावनात्मक कष्ट होता?है,’’ कह कर मांजी ने थकान के कारण आंखें बंद कर लीं.

‘‘आप आराम कीजिए, मांजी,’’ कह कर हम सब बगल के कमरे में चले गए और गप्पें मारने लगे.

मुझे अपने निर्णय पर संतोष था. साथ ही अगले दिन गोआ जाने का मन में उत्साह था. संभवत: मेरे लिए सब से ज्यादा गौरव की बात थी, मेरे अपने घर में मानवीय संबंधों के आधारभूत मूल्यों की पुन: स्थापना…शायद इस का माध्यम मैं ही थी.

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