Valentine’s Special- वेलेंटाइन डे: वो गुलाब किसका था

अपने देश में विदेशी उत्पाद, पहनावा, विचार, आचारसंहिता आदि का चलन जिस तरह से जोर पकड़ चुका है उस में वेलेंटाइन डे को तो अस्तित्व में आना ही था. वैसे अब यह बताने की जरूरत नहीं है कि वेलेंटाइन डे के दिन होता क्या है. फिर भी बात चली है तो खुलासा कर देते हैं कि चाहने वाले जवान दिलों ने इस दिन को प्रेम जाहिर करने का कारगर माध्यम बना लिया है. इस अवसर पर बाजार सजते हैं, चहकते, इठलाते लड़केलड़कियों की सड़कों पर आवाजाही बढ़ जाती है, वातावरण में खुमार, खनक, खुशी भर जाती है.

सेंट जोंसेफ कानवेंट स्कूल के कक्षा 11 के छात्र अभिराम ने इसी दिन अपनी सहपाठिनी निष्ठा को ग्रीटिंग कार्ड के ऊपर चटक लाल गुलाब रख कर भेंट किया था. निष्ठा ने अंदरूनी खुशी और बाहरी झिझक के साथ भेंट स्वीकार की थी तो कक्षा के छात्रछात्राओं ने ध्वनि मत से उन का स्वागत कर कहा, ‘‘हैप्पी फोर्टीन्थ फैब.’’

विद्यालय का यह पहला इश्क कांड नहीं था. कई छात्रछात्राओं का इश्क चोरीछिपे पहले से ही परवान चढ़ रहा था. आप जानिए, वे पढ़ाई की उम्र में पढ़ाई कम दीगर हरकतें ज्यादा करते हैं. चूंकि यह विद्यालय अपवाद नहीं है इसलिए यहां भी तमाम घटनाएं हुआ करती हैं.

एक छात्रा स्कूल आने और उस के निर्धारित समय का लाभ ले कर किसी के साथ भाग चुकी है. एक छात्रा को रसायन शास्त्र के अध्यापक ने लैब में छेड़ा था. इस के विरोध में विद्यार्थी तब तक हड़ताल पर बैठे रहे जब तक उन को प्रयोगशाला से हटा नहीं दिया गया. इस के बावजूद स्कूल का जो अनुशासन, प्रशासन और नियमितता होती है वह आश्चर्यजनक रूप से यहां भी है.

हां, तो बात निष्ठा की चल रही थी. उस ने दिल की बढ़ी धड़कनों के साथ ग्रीटिंग की इबारत पढ़ी- ‘निष्ठा, सेंट वेलेंटाइन ने कहा था कि प्रेम करना मनुष्य का अधिकार है. मैं संत का बहुत आभारी हूं-अभिराम.’

प्रेम की घोषणा हो गई तो उन के बीच मिलनमुलाकातें भी होने लगीं. दोनों एकदूसरे को मुग्धभाव से देखने लगे. साथसाथ ट्यूशन जाने लगे, फिल्म देखने भी गए.

कक्षा की सहपाठिनें निष्ठा से पूछतीं, ‘‘प्रेम में कैसा महसूस करती हो?’’

‘‘सबकुछ अच्छा लगने लगा है. लगता है, जो चाहूंगी पा लूंगी.’’

‘‘ग्रेट यार.’’

अपने इस पहले प्रेम को ले कर उत्साहित अभिराम कहता, ‘‘निष्ठा, मेरे मम्मीपापा डाक्टर हैं और वे मुझे भी डाक्टर बनाना चाहते हैं. यही नहीं वे बहू भी डाक्टर ही चाहते हैं तो तुम्हें भी डाक्टर बनना होगा.’’

‘‘और न बन सकी तो? क्या यह तुम्हारी भी शर्त है?’’

‘‘शर्त तो नहीं पर मुझे ले कर मम्मीपापा ऐसा सोचते हैं,’’ अभिराम बोला, ‘‘तुम्हारे घरवालों ने भी तो तुम्हें ले कर कुछ सोचा होगा.’’

‘‘यही कि मेरी शादी कैसे होगी, दहेज कितना देना होगा? आदि…’’ सच कहूं अभिराम तो पापामम्मी विचित्र प्राणी होते हैं. एक तरफ तो वे दहेज का दुख मनाएंगे, किंतु लड़की को आजादी नहीं देंगे कि वह अपने लिए किसी को चुन कर उन का काम आसान करे.’’

‘‘यह अचड़न तो विजातीय के लिए है हम तो सजातीय हैं.’’

‘‘देखो अभिराम, धर्म और जाति की बात बाद में आती है, मांबाप को असली बैर प्रेम से होता है.’’

‘‘मैं अपनी मुहब्बत को कुरबान नहीं होने दूंगा,’’ अभिराम ने बहुत भावविह्वल हो कर कहा.

‘‘बहुत विश्वास है तुम्हें अपने पर.’’

‘‘हां, मेरे पापामम्मी ने तो 25 साल पहले प्रेमविवाह किया था तो मैं इस आधुनिक जमाने में तो प्रेमविवाह कर ही सकता हूं.’’

‘‘अभि, तुम्हारी बातें मुझे भरोसा देती हैं.’’

अभिराम और निष्ठा अब फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगे. अभि के मातापिता दिनभर नर्सिंग होम में व्यस्त रहते थे अत: उस को फोन करने की पूरी आजादी थी. निष्ठा आजाद नहीं थी. मां घर में होती थीं. फोन मां न उठा लें इसलिए वह रिंग बजते ही रिसीवर उठा लेती थी.

मां एतराज करतीं कि देख निष्ठा तू घंटी बजते ही रिसीवर न उठाया कर. आजकल के लड़के किसी का भी नंबर डायल कर के शरारत करते हैं. अभी कुछ दिन पहले मैं ने एक फोन उठाया तो उधर से आवाज आई, ‘‘पहचाना? मैं ने कहा कौन? तो बोला, तुम्हारा होने वाला.’’

इस तरह अभिराम और निष्ठा का प्रेम अब एक साल पुराना हो गया.

अभिराम ने योजना बनाई कि निष्ठा, वेलेंटाइन डे पर कुछ किया जाए.

निष्ठा ने सवालिया नजरों से अभिराम को देखा, जैसे पूछ रही हो क्या करना है?

‘‘देखो निष्ठा, इस छोटे से शहर में कोई बीच या पहाड़ तो है नहीं,’’ अभिराम बोला. ‘‘अपना पुष्करणी पार्क अमर रहे.’’

‘‘पार्क में हम क्या करेंगे?’’

‘‘अरे यार, कुछ मौजमस्ती करेंगे. और कुछ नहीं तो पार्क में बैठ कर पापकार्न ही खा लेंगे.’’

‘‘नहीं बाबा, मैं वेलेंटाइन डे पर तुम्हारे साथ पार्क में नहीं जा सकती. जानते हो हिंदू संस्कृति के पैरोकार एक संगठन के कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है, जो लोग वेलेंटाइन डे मनाते हुए मिलेंगे उन्हें परेशान किया जाएगा.’’

‘‘निष्ठा, यही उम्र है जब मजा मार लेना चाहिए. स्कूल में यह हमारा अंतिम साल है. इन दिनों की फिर वापसी नहीं होगी. हम कुछ तो ऐसा करें जिस की याद कर पूरी जिंदगी में रौनक बनी रहे. हम पार्क में मिलेंगे. मैं तुम्हें कुछ गिफ्ट दूंगा, इंतजार करो,’’ अभिराम ने साहबी अंदाज में कहा.

निष्ठा आखिर सहमत हो गई. मामला मुहब्बत का हो तो माशूक की हर अदा माकूल लगती है.

शाम को दोनों पार्क में मिले. निष्ठा खास सजसंवर कर आई थी. पार्क के कोने की एकांत जगह पर बैठ कर अभिराम निष्ठा को वाकमैन उपहार में देते हुए बोला, ‘‘इस में कैसेट भी है जिस पर तुम्हारे लिए कुछ रिकार्ड किया है.’’

‘‘वाह, मुझे इस की बहुत जरूरत थी. अब मैं अपने कमरे में आराम से सोते हुए संगीत सुन सकूंगी.’’

अभिराम ने निष्ठा के गले में बांहें डाल कर कहा, ‘‘भारतीय संस्कृति ही नहीं बल्कि विकसित और आधुनिक देशों की संस्कृति भी प्रेम को बुरा कहती रही है. कैथोलिक ईसाइयों में प्रेम और शादी की मनाही थी. तब वेलेंटाइन ने कहा था कि मनुष्य को प्रेम की अभिव्यक्ति का अधिकार है. तभी से 14 फरवरी के दिन प्रेमी अपने प्रेम का इजहार करते हैं.’’

संगठन के कुछ कार्यकर्ता प्रेमियों को खदेड़ने आ पहुंचे हैं, इस से बेखबर दोनों प्रेम के सागर में हिचकोले ले रहे थे कि अचानक संगठन के कार्यकर्ताओं को लाठी, हाकी, कालारंग आदि लिए देख अभिराम व निष्ठा हड़बड़ा कर खड़े हो गए. कुछ लोग पार्क छोड़ कर भाग रहे थे, तो कुछ तमाशा देख रहे थे.

उधर संगठन के ऐलान को ध्यान में रख स्थानीय मीडिया वाले रोमांचकारी दृश्य को कैमरे में उतारने के लिए शाम को वहां आ डटे थे. उन्होंने कैमरा आन कर लिया. अभिराम व निष्ठा स्थिति को भांपते इस के पहले कार्यकर्ताओं ने दोनों के चेहरे काले रंग से पोत दिए.

निष्ठा ने बचाव में हथेलियां आगे कर ली थीं. अत: चेहरे पर पूरी तरह से कालिख नहीं पुत पाई थी.

‘‘क्या बदतमीजी है,’’ अभिराम चीखा तो एक कार्यकर्ता ने हाकी से उस की पीठ पर वार कर दिया.

हाकी पीठ पर पड़ते ही अभिराम भाग खड़ा हुआ. उसे इस तरह भागते देख निष्ठा असहाय हो गई. वह किस तरह अपमानित हो कर घर पहुंची यह तो वही जानती है. डंडा पड़ते ही भगोड़े का इश्क ठंडा हो गया. वेलेंटाइन डे मना कर चला है क्रांतिकारी बनने. अरे अभिराम, अब तो मेरी जूती भी तुझ से इश्क न करेगी.

निष्ठा देर तक अपने कमरे में छिपी रही. वह जब भी पार्क की घटना के बारे में सोचती उस का मन अभिराम के प्रति गुस्से से भर जाता. बारबार मन में पछतावा आता कि उस ने प्रेम भी किया तो किस कायर पुरुष से. फिल्मों में देखो, हीरो अकेले ही कैसे 10 को पछाड़ देते हैं. वे तो कुल 4 ही थे.

तभी उस के कानों में बड़े भाई विट्ठल की आवाज सुनाई पड़ी जो मां से हंस कर कह रहा था, ‘‘मां, कुछ इश्कमिजाज लड़केलड़कियां पुष्करणी पार्क में वेलेंटाइन डे मना रहे थे. एक संगठन के लोगों ने उन के चेहरे काले किए हैं. रात को लोकल चैनल की खबर जरूर देखना.’’

खबर देख विट्ठल चकित रह गया, जिस का चेहरा पोता गया वह उस की बहन निष्ठा है?

‘‘मां, अपनी दुलारी बेटी की करतूत देखो,’’ विट्ठल गुस्से में भुनभुनाते हुए बोला, ‘‘यह स्कूल में पढ़ने नहीं इश्क लड़ाने जाती है. इस के यार को तो मैं देख लूंगा.’’

मां और बेटा दोनों ही निष्ठा के कमरे में घुस आए. मां गुस्से में निष्ठा को बहुत कुछ उलटासीधा कहती रहीं और वह ग्लानि से भरी चुपचाप सबकुछ सुनती व सहती रही. उस के लिए प्रेम दिवस काला दिवस बन गया था.

उधर अभिराम को पता ही नहीं चला कि वह पार्क से कैसे निकला, कैसे मोटरसाइकिल स्टार्ट की और कैसे भगा. उसे अब लग रहा था जैसे सबकुछ अपने आप हो गया. निष्ठा उस की कायरता पर क्या सोच रही होगी? बारबार यह प्रश्न उसे बेचैन किए जा रहा था.

पिताजी घर में थे, रात को टेलीविजन पर बेटे को देख कर वह चौंके और फौरन उन की आवाज गूंजी, ‘‘अभिराम, इधर तो आना.’’

‘‘जी पापा…’’

‘‘तो तुम पढ़ाई नहीं इश्क कर रहे हो. मैं तुम्हें डाक्टर बनाना चाहता हूं और तुम रोड रोमियो बन रहे हो.’’

‘‘पापा, वो… मैं वेलेंटाइन डे मना रहा था.’’

‘‘बता तो ऐसे गौरव से रहे हो जैसे एक तुम्हीं जवान हुए हो. मैं तो कभी जवान था ही नहीं. देखो, मैं इस शहर का मशहूर सर्जन हूं. क्या कभी तुम ने इस बारे में सोचा कि तुम्हें टेलीविजन पर देख कर लोग क्या कहेंगे कि इतने बड़े सर्जन का बेटा इश्क में मुंह काला करवा कर आ गया. जाओ पढ़ो, चार मार्च से सालाना परीक्षा है और तुम इश्क में निकम्मे बन रहे हो. आज से इश्कबाजी बंद.’’

अभिराम अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर पड़ गया. इन बाप लोगों की चरित्रलीला समझ में नहीं आती. खुद इश्क लड़ाते रहे तो कुछ नहीं अब बेटे की बारी आई तो बड़ा बुरा लग रहा है. फिल्मों में बचपन का इश्क भी शान से चलता है और यहां सिखाया जा रहा है, इश्क में निकम्मे मत बनो. निष्ठा तुम ठीक कहती हो कि इन बड़े लोगों को असली बैर प्रेम से है.

बेचैन अभिराम निष्ठा को फोन करना चाह रहा था पर न साहस था न स्फूर्ति, न स्थिति.

4 मार्च को पहले परचे के दिन दोनों ने एकदूसरे को पत्र थमाए. अभिराम ने लिखा था, ‘निष्ठा, मैं तुम से सच्चा प्रेम करता हूं, साबित कर के रहूंगा.’

निष्ठा ने लिखा था, ‘यह सब प्रेम नहीं छिछोरापन है, और छिछोरेपन में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं.’.

उपलब्धि – शादीशुदा होने के बावजूद क्यों अलग थे सुनयना और सुशांत?

काश, आज उस ने सुबह चुपके से सुशांत की बातें न सुनी होतीं. वह किसी से मोबाइल पर कह रहा था, ‘‘हांहां डियर, मैं ठीक 5 बजे पहुंच जाऊंगा नक्षत्र होटल. वैसे भी अब तो सारा वक्त आप के खयालों में गुजरेगा,’’ कहते हुए ही सुशांत ने फोन पर ही किस किया तो सुनयना का दिल तड़प उठा.

सुनयना मानती थी कि सुशांत ने उसे साधारण मध्यवर्गीय परिवार से निकाल कर शानोशौकत की पूरी दुनिया दी. गाड़ी, बंगला, नौकरचाकर, कपड़े, जेवर… भला किस चीज की कमी रखी? फिर भी वह आज स्वयं को बहुत बेबस, लाचार और टूटा हुआ महसूस कर रही थी. वह बेसब्री से 5 बजने का इंतजार करने लगी ताकि नक्षत्र होटल पहुंच कर हकीकत का पता लगा सके. खुद को एतबार दिला सके कि यह सब यथार्थ है, महज वहम नहीं, जिस के आधार पर वह अपनी खुशियां दांव पर लगाने चली है.

पौने 5 बजे ही वह होटल के गेट से दूर गाड़ी खड़ी कर के अंदर रिसैप्शन में बैठ गई. दुपट्टे से अपना चेहरा ढक लिया और काला चश्मा भी लगा लिया ताकि सुशांत उसे पहचान न सके.

ठीक 5 बजे सुशांत की गाड़ी गेट पर रुकी. स्मार्ट नीली टीशर्ट व जींस में वह

गाड़ी से उतरा और रिसैप्शन की तरफ बढ़ गया. वहां पहले से ही एक लड़की उस का इंतजार कर रही थी. दोनों पुराने प्रेमियों की तरह गले मिले, फिर हाथों में हाथ डाले लिफ्ट की तरफ बढ़ गए.

सुनयना की आंखें भर आईं. उस का कंठ सूखने लगा. उसे महसूस हुआ जैसे वह फूटफूट कर रो पड़ेगी. थोड़ी देर डाल से टूटे पत्ते की तरह वहीं बैठी रही. फिर तुरंत स्वयं को संभालती हुई उठी और गाड़ी में बैठ गई. घर आ कर औंधे मुंह बिस्तर पर गिर पड़ी. देर तक रोती हुई सोचती रही कि किस मोड़ पर उस से क्या गलती हो गई जो सुशांत को यह बेवफाई करनी पड़ी? वह स्वस्थ है, खूबसूरत है, अपने साथसाथ सुशांत का भी पूरा खयाल रखती है, इतना प्यार करती है उसे, फिर सुशांत ने ऐसा क्यों किया?

हमेशा की तरह सुनयना ने स्वयं को संभालने और दिल की बातें करने के लिए सुप्रिया को फोन लगाया जो उस की सब से प्रिय सहेली थी. उस से वह हर बात शेयर करती. सुनयना की आवाज में झलकते दुख व कंपन को एक पल में सुप्रिया ने महसूस कर लिया. फिर घबराए स्वर में बोली, ‘‘सुनयना सब ठीक तो है? परेशान क्यों लग रही है?’’

सुनयना ने रुंधे गले से उसे सारी बातें बताईं, तो सुप्रिया ठंडी सांस लेती हुई बोली, ‘‘हिम्मत न हार. मैं मानती हूं, जिंदगी कई दफा हमें ऐसी स्थितियों से रूबरू कराती है, जहां हम दूसरों पर क्या, खुद पर भी विश्वास खो बैठते हैं. तू नहीं जानती, मैं खुद इस खौफ में रहती हूं कि कहीं मेरी जिंदगी में भी कोई ऐसा शख्स न आ जाए, जिस के लिए प्रेम की कोई कीमत न हो. मैं घबराती हूं, ठगे जाने से. प्यार में कहीं पछतावा हाथ न लगे, शायद इसलिए अपने काम के प्रति ही समर्पित रहती हूं.’’

‘‘शायद तू ठीक कह रही है, सुप्रिया मगर मैं क्या करूं? मैं ने तो अपनी जिंदगी सुशांत के  नाम समर्पित की थी.’’

‘‘ऐसा सिर्फ  तेरे साथ ही नहीं हुआ है सुनयना. तुझे याद है, स्कूल में हमारे साथ पढ़ने वाली नेहा?’’ सुप्रिया बोली.

‘‘कौन वह जिस की मां हमारे स्कूल में क्लर्क थीं?’’

‘‘हांहां, वही. अब वह भी किसी स्कूल में छोटीमोटी नौकरी करने लगी है. कभीकभी मां को किसी काम में मदद की जरूरत होती है, तो मैं उसे बुला लेती हूं. अटैच हो गई है हम से. पास में ही उस का घर है. अपने बारे में सब कुछ बताती रहती है. उस ने लव मैरिज की थी, पर उस के साथ भी यही कुछ हुआ.’’

‘‘उफ, फिर तो वह भी परेशान होगी. आ कर रो रही होगी, तेरे पास. अंदर ही अंदर घुट रही होगी, जैसे मैं…’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं. उस का रिऐक्शन बहुत अलग रहा. उस ने उसी वक्त खुल कर इस विषय पर अपने पति से बात की. जलीकटी सुना कर अपनी भड़ास निकाली. फिर अल्टीमेटम भी दे दिया कि यदि आइंदा इस घटना की पुनरावृत्ति हुई, तो वह घर में एक पल के लिए भी नहीं रुकेगी.’’

‘‘उस ने ठीक किया. मगर मैं ऐसा नहीं कर सकती. समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’ बुझे स्वर में सुनयना ने कहा.

‘‘यार, कभीकभी ऐसा होता है, जब दिमाग कुछ कहता है और दिल कुछ. तब समझ नहीं आता कि क्या किया जाए. बहुत असमंजस की स्थिति होती है खासकर जब धोखा देने वाला वही हो, जिसे आप सब से ज्यादा प्यार करते हैं. मेरी बात मान अभी तू आराम कर. सुबह ठंडे दिमाग से सोचना और वैसे भी छोटीछोटी बातों पर परेशान होना उचित नहीं.’’

‘‘यह बात छोटी नहीं प्रिया, मेरी पूरी जिंदगी का सवाल है. फिर भी चल, रिसीवर रखती हूं मैं,’’ कह कर सुनयना ने रिसीवर रख दिया और कमरे में आ कर सोने का प्रयास करने लगी. मगर मन था कि लौटलौट कर उसी लमहे को याद करने लगता, जब दिल को गहरी चोट लगी थी.

और फिर यह पहली दफा नहीं है जब सुशांत ने उस का दिल तोड़ा हो. इस से पहले भी रीवा के साथ सुशांत का बेहद करीबी रिश्ता होने का एहसास हुआ था उसे. मगर तब सुशांत ने यह  कह कर माफी मांग ली थी कि रीवा उस की बहुत पुरानी दोस्त है और उस से एकतरफा प्यार करती है. वह उस का दिल नहीं तोड़ना चाहता.

सुनयना यह सुन कर खामोश रह गई थी, क्योंकि प्रेम शब्द और उस से जुड़े एहसास का   बहुत सम्मान करती है वह. आखिर उस ने भी तो सुशांत से मुहब्बत की है. यह बात अलग है कि सुशांत के व्यक्तित्व व संपन्नता के आगे वह स्वयं को कमतर महसूस करती है और जबरन उसे स्वयं से बांधे रखना नहीं चाहती थी. आज जो कुछ भी उस ने देखा, उसे वह मुहब्बत तो कतई नहीं मान सकती थी. यह तो सिर्फ और सिर्फ वासना थी.

देर रात जब सुशांत लौटा तो हमेशा की तरह बहुत ही सामान्य व्यवहार कर रहा था. उस का यह रुख देख कर सुनयना के दिल में कांटे की तरह कुछ चुभा. मगर वह कुछ बोली नहीं. कहती भी क्या, जिंदगी तो स्वयं ही उस के साथ खेल खेल रही थी. पिछले साल उसे पता चला था कि सुशांत ड्रग ऐडिक्ट है, मगर तब उसे इतना अधिक दुख नहीं हुआ, जितना आज हुआ था. उस समय विश्वास टूटा था और आज तो दिल ही टूट गया था.

इस बात को बीते 2 माह गुजर चुके थे, मगर स्थितियां वैसी ही थीं. सुनयना खामोशी से सुशांत की हरकतों पर नजर रख रही थी. सुशांत पहले की तरह अपनी नई दुनिया में मगन था. कई दफा सुनयना ने उसे रंगे हाथों पकड़ा भी, मगर वह पूरी तरह बेशर्म हो चुका था. उस की एक नहीं 2-2, 3-3 महिलाओं से दोस्ती थी.

सुनयना अंदर ही अंदर इस गम से घुटती जा रही थी. एक बार अपनी मां से फोन पर इस बारे में बात करनी चाही तो मां ने पहले ही उसे रोक दिया. वे अपने रईस दामाद के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं, उलटा उसे ही समझाने लगीं, ‘‘इतनी छोटीछोटी बातों पर घर तोड़ने की बात सोचते भी नहीं.’’

सुनयना कभीकभी यह सोच कर परेशान होती कि आगे क्या करे? क्या सुशांत को तलाक देना या घर छोड़ने की धमकी देना उचित रहेगा? मगर वह ऐसा करे भी तो किस आधार पर? यह सारा ऐशोआराम छोड़ कर वह कहां जाएगी? मां के 2 बैडरूम के छोटे से घर में? उस ने ज्यादा पढ़ाई भी नहीं की है, जो अच्छी नौकरी हासिल कर चैन से दिन गुजार सके. भाईभाभी का चेहरा यों ही बनता रहता है. तो क्या दूसरी शादी कर ले? मगर कौन कह सकता है कि दूसरा पति उस के हिसाब का ही मिलेगा? उस के विचारों की उथलपुथल यहीं समाप्त नहीं होती. घंटों बिस्तर पर पड़ेपड़े वह अपनेआप को सांत्वना देती रहती और सोचती कि पति का प्यार भले ही बंट गया हो, पर घरपरिवार और समाज में इज्जत तो बरकरार है.

धीरेधीरे सुनयना ने स्वयं को समझा लिया कि अब यही उस की जिंदगी की हकीकत है. उसे इसी तरह सुशांत की बेवफाइयों के साथ जिंदगी जीनी है.

फिर एक दिन सुबहसुबह सुप्रिया का फोन आया. वह बड़ी उत्साहित थी. बोली, ‘‘सुनयना, जानती है अपनी नेहा ने पति को तलाक देने का फैसला कर लिया है? वह पति का घर छोड़ कर आ गई है.’’

सुनयना चौंक उठी, ‘‘यह क्या कह रही है तू? उस ने इतनी जल्दी इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया?’’

‘‘मेरे खयाल से उस ने कुछ गलत नहीं किया सुनयना. आखिर फैसला तो लेना ही था उसे. मैं तो कहती हूं, तुझे भी यही करना चाहिए. उस ने सही कदम उठाया है.’’

‘‘हूं,’’ कह रिसीवर रखती हुई सुनयना सोच में पड़ गई. दिन भर बेचैन रही. रात भर करवटें बदलती रही. दिल में लगातार विचारों का भंवर चलता रहा. आखिर सुबह वह एक फैसले के साथ उठी और स्वयं से ही बोल पड़ी कि ठीक है, मैं भी नेहा की तरह ही कठोर कदम उठाऊंगी. तभी सुशांत को पता चलेगा कि उस ने मेरा दिल दुखा कर अच्छा नहीं किया. बहुत प्यार किया था मैं ने उसे, मगर वह कभी मेरी कद्र नहीं कर सका. फिर सब कुछ छोड़ कर वह बिना कुछ कहे घर से निकल पड़ी. वह नहीं चाहती थी कि सुशांत फिर से उस से माफी मांगे और वह कमजोर पड़ जाए. न ही वह अब सुशांत की बेवफाई के साथ जीना चाहती थी, न ही अपना दर्द दिल में छिपा कर टूटे दिल के साथ ऐसी शादीशुदा जिंदगी जीना चाहती थी.

मायके वाले उस के काम नहीं आएंगे, यह एहसास था उसे, मगर इस खौफ की वजह से अपनी मुहब्बत का गला घुटते देखना भी मंजूर नहीं था. वह निकल तो आई थी, मगर अब सब से बड़ा सवाल यह था कि वह आगे क्या करे? कहां जाए? बहुत देर तक मैट्रो स्टेशन पर बैठी सोचती रही.

तभी प्रिया का फोन आया, ‘‘कहां है यार? घर पर फोन किया तो सुशांत ने कहा कि तू घर पर नहीं. फोन भी नहीं उठा रही है. सब ठीक तो है?’’

‘‘हां यार, मैं ने घर छोड़ दिया,’’ रुंधे गले से सुनयना ने कहा तो यह सुन प्रिया सकते में आ गई. बोली, ‘‘यह बता कि अब जा कहां रही है तू?’’

‘‘यही सवाल तो लगातार मेरे भी जेहन में कौंध रहा है. जवाब जानने को ही मैट्रो स्टेशन पर रुकी हुई हूं.’’

‘‘ज्यादा सवालजवाब में मत उलझ. चुपचाप मेरे घर आ जा,’’ प्रिया ने कहा तो सुनयना के दिल में तसल्ली सी हुई. उस को प्रिया का प्रस्ताव उचित लगा. आखिर प्रिया भी तो अकेली रहती है. 2 सिंगल महिलाएं एकसाथ रहेंगी तो एकदूसरे का सहारा ही बनेंगी.

सारी बातें सोच कर सुनयना चुपचाप प्रिया के घर चली गई. प्रिया ने उसे सीने से लगा लिया. देर तक सुनयना से सारी बातें सुनती रही. फिर बोली, ‘‘सुनयना, आज जी भर कर रो ले. मगर आज के बाद तेरे जीवन से रोनेधोने या दुखी रहने का अध्याय समाप्त. मैं हूं न. हम दोनों एकदूसरे का सहारा बनेंगी.’’

सुनयना की आंखें भर आईं. रहने की समस्या तो सहेली ने दूर कर दी थी, पर कमाने का मसला बाकी था. अगले दिन से ही उस ने अपने लिए नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी. जल्दी ही नौकरी भी मिल गई. वेतन कम था, मगर गुजारे लायक तो था ही.

नई जिंदगी ने धीरेधीरे रफ्तार पकड़नी शुरू की ही थी कि सुनयना को महसूस हुआ कि उस के शरीर के अंदर कोई और जीव भी पल रहा है. इस हकीकत को डाक्टर ने भी कन्फर्म कर दिया यानी सुशांत से जुदा हो कर भी वह पूरी तरह उस से अलग नहीं हो सकी थी. सुशांत का अंश उस की कोख में था. भले ही इस खबर को सुन कर चंद पलों को सुनयना हतप्रभ रह गई, मगर फिर उसे महसूस हुआ जैसे उसे जीने का नया मकसद मिल गया हो.

इस बीच सुनयना की मां का देहांत हो गया. सुनयना अपने भाईभाभी से वैसे भी कोईर् संबंध रखना नहीं चाहती थी. प्रिया और सुनयना ने दूसरे इलाके में एक सुंदर घर खरीदा और पुराने रिश्तों व सुशांत से बिलकुल दूर चली आई.

बच्ची थोड़ी बड़ी हुई तो दोनों ने उस का एडमिशन एक अच्छे स्कूल में करा दिया. अब सुनयना की दुनिया बदल चुकी थी. वह अपनी नई दुनिया में बेहद खुश थी. जबकि सुशांत की दुनिया उजड़ चुकी थी. जिन लड़कियों के साथ उस के गलत संबंध थे, वे गलत तरीकों से उस के रुपए डुबोती चली गईं. बिजनैस ठप्प होने लगा. वह चिड़चिड़ा और क्षुब्ध रहने लगा. इतने बड़े घर में बिलकुल अकेला रह गया था. लड़कियों के साथसाथ दोस्तों ने भी साथ छोड़ दिया. घर काटने को दौड़ता.

एक्र दिन वह यों ही टीवी चला कर बैठा था कि अचानक एक चैनल पर उस की निगाहें टिकी रह गईं. दरअसल, इस चैनल पर ‘सुपर चाइल्ड रिऐलिटी शो’ आ रहा था और दर्शकदीर्घा के पहली पंक्ति में उसे सुनयना बैठी नजर आ गई. वह टकटकी लगाए प्रोग्राम देखने लगा.

स्टेज पर एक प्यारी सी बच्ची परफौर्म कर रही थी. वह डांस के साथसाथ बड़ा मीठा गाना भी गा रही थी. उस के चुप होते ही शो के सारे जज खड़े हो कर तालियां बजाने लगे. सब ने खूब तारीफ की. जजों ने बच्ची से उस के मांबाप के बारे पूछा तो सारा फोकस सुनयना पर हुआ यानी यह सुनयना की बेटी है? सुशांत हैरान देखता रह गया. जजों के आग्रह पर सुनयना के साथ उस की सहेली प्रिया स्टेज पर आई. बच्ची ने विश्वास के साथ दोनों का हाथ पकड़ा और बोली, ‘‘मेरे पापा नहीं हैं, मगर मांएं 2-2 हैं. यही दोनों मेरे पापा भी हैं.’’

सिंगल मदर और सुपर चाइल्ड की उपलब्धि पर सारे दर्शक तालियां बजा रहे थे. इधर सुशांत अपने ही सवालों में घिरा था कि क्या यह मेरी बच्ची है? या किसी और की? नहींनहीं, मेरी ही है, तभी तो इस ने कहा कि पापा नहीं हैं, 2-2 मांएं हैं. पर किस से पूछे? कैसे पता चले कि सुनयना कहां रहती है? अपनी बच्ची को गोद में ले कर वह प्यार करना चाहता था. मगर यह मुमकिन नहीं था. बच्ची उस की पहुंच से बहुत दूर थी. वह बस उसे देख सकता था. मगर उस के पास कोई चौइस नहीं थी.

सुशांत तो ऐसा बेचारा बाप था, जो अपने अरमानों के साथ केवल सिसक सकता था. सुनयना बड़े गर्व से बेटी को सीने से लगाए रो रही थी. सुशांत हसरत भरी निगाहों से उन्हें निहार रहा था.

बस तुम्हारी हां की देर है: भाग 1

अपनीशादी की बात सुन कर दिव्या फट पड़ी. कहने लगी, ‘‘क्या एक बार मेरी जिंदगी बरबाद कर के आप सब को तसल्ली नहीं हुई जो फिर से… अरे छोड़ दो न मुझे मेरे हाल पर. जाओ, निकलो मेरे कमरे से,’’ कह कर उस ने अपने पास पड़े कुशन को दीवार पर दे मारा.

नूतन आंखों में आंसू लिए कुछ न बोल कर कमरे से बाहर आ गई. आखिर उस की इस हालत की जिम्मेदार भी तो वे ही थे. बिना जांचतड़ताल किए सिर्फ लड़के वालों की हैसियत देख कर उन्होंने अपनी इकलौती बेटी को उस हैवान के संग बांध दिया. यह भी न सोचा कि आखिर क्यों इतने पैसे वाले लोग एक साधारण परिवार की लड़की से अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं? जरा सोचते कि कहीं दिव्या के दिल में कोई और तो नहीं बसा है… वैसे दबे मुंह ही, पर कितनी बार दिव्या ने बताना चाहा कि वह अक्षत से प्यार करती है, लेकिन शायद उस के मातापिता यह बात जानना ही नहीं चाहते थे.

अक्षत और दिव्या एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों अंतिम वर्ष के छात्र थे. जब कभी अक्षत दिव्या के संग दिख जाता, नूतन उसे ऐसे घूर कर देखती कि बेचारा सहम उठता. कभी उस की हिम्मत ही नहीं हुई यह बताने की कि वह दिव्या से प्यार करता है पर मन ही मन दिव्या की ही माला जपता रहता था और दिव्या भी उसी के सपने देखती रहती थी.

‘‘नीलेश अच्छा लड़का तो है ही, उस की हैसियत भी हम से ऊपर है. अरे, तुम्हें तो खुश होना चाहिए जो उन्होंने अपने बेटे के लिए तुम्हारा हाथ मांगा, वरना क्या उन के बेटे के लिए लड़कियों की कमी है इस दुनिया में?’’

दिव्या के पिता मनोहर ने उसे समझाते हुए कहा था, पर एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि दिव्या मन से इस शादी के लिए तैयार है भी या नहीं.

मांबाप की मरजी और समाज में उन की नाक ऊंची रहे, यह सोच कर भारी मन से ही सही पर दिव्या ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी. वह कभी नहीं चाहेगी कि उस के कारण उस के मातापिता दुखी हों. कहने को तो लड़के वाले बहुत पैसे वाले थे लेकिन फिर भी उन्होंने मुंहमांगा दहेज पाया.

‘अब हमारी एक ही तो बेटी है. हमारे बाद जो भी है सब उस का ही है. तो फिर क्या हरज है अभी दें या बाद में’ यह सोच कर मनोहर और नूतन उन की हर डिमांड पूरी करते रहे, पर उन में तो संतोष नाम की चीज ही नहीं थी. अपने नातेरिश्तेदार को वे यह कहते अघाते नहीं थे कि उन की बेटी इतने बड़े घर में ब्याह रही है. लोग भी सुन कर कहते कि भई मनोहर ने तो इतने बड़े घर में अपनी बेटी का ब्याह कर गंगा नहा ली. दिल पर पत्थर रख दिव्या भी अपने प्यार को भुला कर ससुराल चल पड़ी. विदाई के वक्त उस ने देखा एक कोने में खड़ा अक्षत अपने आंसू पोंछ रहा था.

ससुराल पहुंचने पर नववधू का बहुत स्वागत हुआ. छुईमुई सी घूंघट काढ़े हर दुलहन की तरह वह भी अपने पति का इंतजार कर रही थी. वह आया तो दिव्या का दिल धड़का और फिर संभला भी़  लेकिन सोचिए जरा, क्या बीती होगी उस लड़की पर जिस की सुहागरात पर उस का पति यह बोले कि वह उस के साथ सबंध बनाने में सक्षम नहीं है और वह इस बात के लिए उसे माफ कर दे.

सुन कर धक्क रह गया दिव्या का कलेजा. आखिर क्या बीती होगी उस के दिल पर जब उसे यह पता चला कि उस का पति नामर्द है और धोखे में रख कर उस ने उसे ब्याह लिया?

पर क्यों, क्यों जानबूझ कर उस के साथ ऐसा किया गया? क्यों उसे और उस के परिवार को धोखे में रखा गया? ये सवाल जब उस ने अपने पति से पूछे तो कोई जवाब न दे कर वह कमरे से बाहर चला गया. दिव्या की पूरी रात सिसकतेसिसकते ही बीती. उस की सुहागरात एक काली रात बन कर रह गई.

सुबह नहाधो कर उस ने अपने बड़ों को प्रमाण किया और जो भी बाकी बची रस्में थीं, उन्हें निभाया. उस ने सोचा कि रात वाली बात वह अपनी सास को बताए और पूछे कि क्यों उस के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया? लेकिन उस की जबान ही नहीं खुली यह कहने को. कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे कि करे तो करे क्या, क्योंकि रिसैप्शन पर भी सब लोगों के सामने नीलेश उस के साथ ऐसे बिहेव कर रहा था जैसे उन की सुहागरात बहुत मजेदार रही. हंसहंस कर वह अपने दोस्तों को कुछ बता रहा था और वे चटकारे लेले कर सुन रहे थे. दिव्या समझ गई कि शायद उस के घर वालों को नीलेश के बारे में कुछ पता न हो. उन सब को भी उस ने धोखे में रखा हुआ होगा.

पगफेर पर जब मनोहर उसे लिवाने आए और पूछने पर कि वह अपनी ससुराल में खुश है, दिव्या खून का घूंट पी कर रह गई. फिर उस ने वही जवाब दिया जिस से मनोहर और नूतन को तसल्ली हो.

एक अच्छे पति की तरह नीलेश उसे उस के मायके से लिवाने भी आ गया. पूरे सम्मान के साथ उस ने अपने साससुसर के पांव छूए और कहा कि वे दिव्या की बिलकुल चिंता न करें, क्योंकि अब वह उन की जिम्मेदारी है. धन्य हो गए थे मनोहर और नूतन संस्कारी दामाद पा कर. लेकिन उन्हें क्या पता कि सचाई क्या है? वह तो बस दिव्या ही जानती थी और अंदर ही अंदर जल रही थी.

दिव्या को अपनी ससुराल आए हफ्ते से ऊपर का समय हो चुका था पर इतने दिनों में एक बार भी नीलेश न तो उस के करीब आया और न ही प्यार के दो बोल बोले, हैरान थी वह कि आखिर उस के साथ हो क्या रहा है और वह चुप क्यों है. बता क्यों नहीं देती सब को कि नीलेश ने उस के साथ धोखा किया है? लेकिन किस से कहे और क्या कहे, सोच कर वह चुप हो जाती.

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बचपन की वापसी – क्या हुआ था रोहित के साथ?

लेखक- राजेश जोशी

आज मुझे कहीं भीतर तक गुदगुदी हुई थी. वैसे तो बात झुंझलाने लायक थी परंतु मैं खुशी से विभोर हो उठी थी. मेरा सातवर्षीय बेटा रोहित धूलपसीने से सराबोर तूफानी गति से कमरे के भीतर आया. गंदे पैरों से साफसुथरी चादर बिछे पलंग पर 2-4 बार कूदा, फिर पलंग से ही उस कुरसी के हत्थे पर कूदा जिस पर मैं बैठी थी. हत्थे से वह मेरी गोद में लुढ़क गया और मचलमचल कर अपने धूलपसीने से मेरी साफसुथरी रेशमी साड़ी को सराबोर कर दिया. 2-4 मिनट मुझ से लिपटचिपट कर ममता की सुरक्षा से आश्वस्त हो, फ्रिज की ओर लंबी कूद लगाई. एक बोतल निकाल कर गटागट पानी पिया. फिर जिस गति से आया था उसी गति से वापस बाहर खेलने के लिए निकल गया.

रोहित की उस हुड़दंगी हरकत के बावजूद मैं खुश इसलिए हुई क्योंकि ऐसी हरकत ने उस का बचपना लौट आने का दृढ़ संकेत दिया था. मेरी यह बात शायद अटपटी या मूर्खतापूर्ण लगे क्योंकि किसी बच्चे का बचपना लौटने का भला क्या मतलब है? बच्चा है तो बचपना तो होगा ही.

बिलकुल ठीक बात है. रोहित में भी बचपना था. शुरू के 4 साल तक तो उस का बचपना ऐसा मोहक था कि सूरदास के श्याम का चित्रण भी मुझे फीका लगता था. एक बरफी के टुकड़े या टौफी के लिए ठुमकठुमक कर जब भी वह अपने मासूम करतब दिखाता तो बरबस ही रसखान की ‘छछिया भरि छाछ पे नाच नचावें’ वाली पंक्तियां याद आ जाती थीं. उस की संगीतमय, लयदार, तुतलाती बोली पर मैं यशोदा मैया की तरह बलिबलि जाती थी.

लेकिन ऐसा बस 4 सालों तक ही हुआ. उस के बाद अचानक उस का बचपना कम होता गया और वह मुरझा सा गया. उस के मुरझाने का जिम्मेदार अन्य कोई नहीं बल्कि मैं ही थी, उस की मां.

किसी भी मां की तरह मैं ने सपने में भी नहीं चाहा था कि मेरी कोख का फूल असमय मुरझाए. बल्कि मेरी कल्पना का फूल तो कुछ ज्यादा ही खिलाखिला, रंगीन, स्वस्थ, प्यारा व मनमोहक था. शायद कल्पना की यह ज्यादती ही मेरी शत्रु बन गई, मेरे रोहित के बचपने के लिए घातक बन गई.

रोहित के 4 साल का होने तक तो मैं सचमुच एक खुशहाल मां रही. मैं ने जो भी कल्पनाएं की थीं वे मानो किसी जादू की बदौलत पूरी होती गईं. बल्कि कल्पना की जो ज्यादती की थी वह भी पूरी होती गई.

मैं ने चाहा था कि पहलापहला मेरा लड़का हो. वही हुआ. वह किसी मौडल बेबी की तरह घुंघराले बालों वाला, तंदुरुस्त, गोरा व चमकदार हो, रोहित वैसा ही पनपा. मेरी कल्पना के मुताबिक ही उस ने 2-3 शिशु सौंदर्य प्रतियोगिताएं जीतीं. अपने सुदर्शन पति के साथ स्वयं सुदर्शना बनी अपने किलकारते बेटे को प्रैम में लिटा कर जब मैं पार्क में टहलती थी तो कोई गहरी साध पूरी हुई लगती थी.

संतान के मामले में हर ओर से प्रथम गिने जाने की मेरी आदत सी पड़ गई. मुझे इस बात का अभिमान भी हो चला था.

फिर मानो मेरे अभिमान पर किसी ने चोट करनी शुरू कर दी. उस दिन रोहित को सजाधजा कर तथा खुद भी सजधज कर मैं व मेरे पति दाखिले के वास्ते रोहित को स्कूल ले गए. वह स्कूल शहर का सब से अग्रणी अंगरेजीदां स्कूल था. हालांकि वह हमारे घर से 20 किलोमीटर की दूरी पर था परंतु सिर्फ दूरी के कारण उस सब से प्रसिद्ध स्कूल को नकारना मुझे मान्य नहीं था. फिर उस स्कूल की एक शानदार स्कूल बस चलती थी जोकि हमारे घर के नजदीक ही रुकती थी. स्कूल की यूनिफौर्म में रोहित को बस स्टाप तक लाना व बस में चढ़ा कर उसे ‘बायबाय’ करने वाली कल्पना को साकार करने के लिए यह बेहद उपयुक्त मौका था.

लेकिन ये सब कल्पनाएं धराशायी होती लगीं, जब रोहित को स्कूल में प्रवेश न मिला. इस का कारण यह था कि प्रवेश परीक्षा में रोहित कुछ भी नहीं कर पाया था. दरअसल, मैं ने उसे कुछ सिखाया ही नहीं था. मुझे यह एहसास ही नहीं था कि इतने छोटे बच्चे की लिखित परीक्षा भी होगी. फिर मैं ने दांतों तले उंगली दबा कर रोहित से भी छोटे बच्चों को वहां पैंसिल थामे ‘ए’ से ‘जेड’ तक लिखते देखा. एक 4 साल का बच्चा तो वहां ऐसा था जो  बड़ेबड़े सवाल हल कर के सब को चौंका  रहा था. कहते हैं उस का टीवी में भी प्रदर्शन हो चुका था.

स्कूल से विफल लौट कर मैं अपने कमरे में खूब रोई. इतना रोई कि घर वाले परेशान हो उठे. सुंदर सी ‘रिपोर्ट कार्ड’ में शतप्रतिशत नंबर व शानदार रिपोर्ट लाता रोहित, नर्सरी राइम को पश्चिमी धुन में सुनाता रोहित, मीठीमीठी अंगरेजी में सब से बतियाता रोहित…सारे सपने चूरचूर हो गए थे.

बहरहाल, यह बेहिसाब रोनाधोना काम आया. मेरे लगभग विरक्त ससुर विचलित हो उठे. पहले तो वे मुझे सुनासुना कर मेरी सास को समझाते रहे कि बच्चे को पास के रवींद्र ज्ञानार्जन निकेतन में डाल दो, वहां अंगरेजी भी पढ़ाते हैं परंतु माहौल हिंदुस्तानी रहता है. अपने त्योहार, संस्कृति आदि के बीच रह कर बच्चा बड़ा होता है. पुस्तकें भी बाल मनोवैज्ञानिकों द्वारा स्वीकृत, सरल व क्रमबद्ध होती हैं. परंतु उन की ये सब बातें मुझे उन्हीं के हिसाब की पुरातन व बूढ़ी लगीं. मेरा रुदन जारी रहा.

फिर मेरी सास के उकसाने पर वे कहीं बाहर गए. थोड़ी ही देर में लौट आए और मुझे सुनाते हुए मेरी सास से बोले, ‘‘इस से कह दो कि कल रोहित का दाखिला उसी स्कूल में हो जाएगा. शिक्षा निदेशक ने प्राचार्य से कह दिया है.’’

यह कह कर वे अपने कमरे में चले गए और मैं बौखलाई सी चुप हो गई. बस, ऐसे ही किन्हीं इक्कादुक्का मौकों पर याद आता था कि बिलकुल साधारण और सरल व्यवहार वाले मेरे वृद्ध ससुर न सिर्फ अवकाशप्राप्त उपकुलपति हैं बल्कि अपने तमाम छात्र पदाधिकारियों के बीच आदरणीय हैं.

मैं मन ही मन ससुरजी की जयजयकार कर प्रफुल्लित हो उठी. रात को जब पतिदेव दफ्तर से लौटे तो उन्हें दरवाजे पर ही यह बात बताई. वे खुश होने के साथ थोड़ा चिंतित भी हो उठे कि क्या रोहित अन्य बच्चों के बराबर आ पाएगा? मैं ने कहा, ‘‘चिंता की बात न करें. महीने भर के भीतर ही रोहित कक्षा में प्रथम होगा.’’

उस के बाद दाखिला, वरदी, किताबें, जूते, टाई आदि खरीदने, पहनाने के

2-4 खुशनुमा दिन निकले. स्कूल द्वारा अनापशनाप फंडों के नाम पर ढेर सारा पैसा बटोरने से कोफ्त तो हुई पर खुशी की इतनी भरमार थी कि उस का ज्यादा असर नहीं पड़ा.

पहले दिन रोहित जब स्कूल बस में चढ़ा तो उस का चेहरा घबराहट के मारे सफेद पड़ा हुआ था. फिर भी वह मुसकराने का प्रयत्न कर रहा था क्योंकि मैं ने उसे बहादुर बच्चा बने रहना तथा कतई न रोने का पाठ अच्छी तरह पढ़ा रखा था. मैं जब उसे बैठा कर बस से उतरने लगी तो वह दहाड़ मार कर रो पड़ा. मेरा दिल भी कांप गया तथा मैं इस इरादे से उस के पास बैठ गई कि स्कूल तक छोड़ आऊंगी. लेकिन तभी मशीनी मिठास भरी अंगरेजी बोलती हुई सिस्टर ने रोहित को लौलीपौप दे कर चुप कराया तथा मुझे ‘कोई चिंता न करें, हम सब संभाल लेंगे’ कहते हुए नीचे उतार दिया. जब बस चली तो मुझे फिर रोहित का कातर रुदन सुनाई पड़ा. बहरहाल, मैं मन कड़ा कर वापस घर आ गई. आखिर स्कूल जाना तो उसे सीखना ही था.

सुबह 7 बजे का निकला रोहित 4 बजे वापस घर पहुंचा. एक तो ऐसे ही स्कूल का समय लंबा था, ऊपर से दूर होने के कारण 2 घंटे आनेजाने में खपते थे. वापसी में रोहित रोंआसा होने के साथसाथ उनींदा भी था. वह आते ही मुझ से लिपट कर जोर से रोने लगा और ‘स्कूल नहीं जाऊंगा’ की रट लगाने लगा. मेरे अंदर की मां काफी कसमसाई थी, परंतु जो धुन सवार थी उस की तीव्रता में वह कसमसाहट खो गई. मैं उसे अंगरेजी बोलती हुई प्यार करने लगी और उसे उकसाने लगी कि अपना रोना वह अंगरेजी में रोए. चौकलेट दे कर उसे चुप कराया और दुलारतेपुचकारते हुए खाना खिलाया.

ऐसा शुरू में कुछ दिन हुआ और फिर शीघ्र ही यह सब आदत में आ गया. सप्ताहभर बाद जब स्कूल से लौट कर अलसाया सा रोहित खाना खा रहा था, मैं ने उस के बस्ते को जांचा. मैं उदास हो गई. जब देखा कि गणित व अंगरेजी की कापियों में लाल स्याही से अध्यापिकाओं ने लिख रखा था, ‘बच्चा कमजोर व पिछड़ा है. अभिभावक विशेष तैयारी कराएं. गृहकार्य में ‘ए’ से ‘जेड’ तक 10 बार लिखना था.

खैर, उस समय जल्दीजल्दी रोहित को खाना खिला कर मैं वहीं मेज पर उसे ‘ए बी सी डी’ सिखाने बैठ गई.

दो एक वर्ण तो उस ने लिख लिए परंतु फिर वह टालमटोल करने लगा. उसे नींद भी आ रही थी और वह बाहर बच्चों के साथ खेलना भी चाह रहा था. मैं थोड़ा खीज गई. मैं चाह रही थी कि एक ही दिन में वह पूरी वर्णमाला सीख ले. मैं ने उसे पीट कर सिखाना शुरू कर दिया. उस ने 2-1 वर्ण और सीख लिए. उस के बाद तो जैसे वह न सीखने पर अड़ गया. मैं सिखाने पर अड़ गई. मारने पर वह बेशर्म की तरह रोया. मुझे और गुस्सा आ गया.

इधर मेरी सास उलाहना देने लगीं, ‘‘अरे, अभी बच्चा है, सीख जाएगा धीरेधीरे. उसे खेलने दे कुछ देर. सुबह का गया स्कूल से थक कर आया है.’’

सास से मेरा मेल कम ही खाता था. उन की ये बातें तो मुझे बिलकुल नहीं सुहाईं. मैं रोहित को उठा कर अपने कमरे में ले गई. उस के छोटे से हाथ में जबरदस्ती पैंसिल थमा कर उस के सामने स्केल ले कर खड़ी हो गई कि देखूं, कैसे नहीं सीखता. स्केल से रोहित डरता था, ऊपर से मेरी मुखमुद्रा देख कर उस के बालक मन को कुछ अंदाजा हो गया. वह सहम कर चुप हो गया. पूरी चेष्टा कर के उस ने घंटेभर में 8-10 टेढ़ेमेढ़े वर्ण लिखने सीख लिए. मैं ने खुश हो कर उसे प्यार किया. वह भी एक थकी हुई बचकानी हंसी हंसा. फिर जल्दी ही वह सो गया.

इस तरह से रोहित से बचपना छीनने की शुरुआत हुई. मैं ने रोहित के पीछे पड़ कर रोज उसे पढ़ानालिखाना शुरू कर दिया. सुबह उठते ही उसे स्कूल जाने के लिए तैयार करती थी. तैयार करतेकरते भी उस से कुछ पूछतीबताती रहती थी. वह भी मशीनी तौर पर बताए और याद किए जाता था. शाम को स्कूल से लौटते ही मैं उस का बस्ता टटोलती थी तथा खाना दे कर कपड़े बदलवाती. फिर उस की अनेक आवश्यकताओं को जल्दी से निबटा कर उस को पढ़ाने बैठ जाती. इधर, सास ने ज्यादा भुनभुनाना शुरू कर दिया था. उन का गुस्सा भी मैं रोहित को पढ़ाते हुए निकालती.

छमाही परीक्षाओं में रोहित अपनी कक्षा में प्रथम आया. मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. घर में जो भी पड़ोसी या मेहमान आता, उसे मैं वह रिपोर्ट कार्ड जरूर दिखाती.

समय गुजरता गया. मैं अन्य सब बातों की उपेक्षा कर इस चेष्टा में लगा रही कि रोहित कक्षा में प्रथम बना रहे. धीरेधीरे वह शारीरिक तौर पर कमजोर पड़ने लगा. उस की आंखें सूनीसूनी रहने लगीं. खेलने में उस का मन न लगता. चिड़चिड़ाने भी लगा था. कई बार वह अजीब सी जिद कर के ऐसे रोने लगता कि मुझे गुस्सा आ जाए. उसे प्यार करने पर अब संतुष्टि सी नहीं होती थी. वह कुछ अजीब सी बातें व हरकतें करने लगा था. मुझे जबतब उस पर गुस्सा आने लगा.

कमजोर पड़ता देख उसे मोटा करने के लिए मैं टौनिक देने लगी. मक्खन व शहद जैसी चीजें ज्यादा खिलाने लगी, पर वह और कमजोर होता गया. अच्छीअच्छी चीजें जब मैं जबरदस्ती उसे खिला देती तो उसे उलटी हो जाती. उस से मैं परेशान व दुखी हो जाती.

फिर वह पढ़ाई में भी पिछड़ने लगा. कहां तो शुरू में उस ने सबकुछ तेजी से सीखा, परंतु तीसरी कक्षा में वह ठीक न चल पाया. घर में सबकुछ सही सुना कर वह परीक्षा में गलत कर आता. इस का उसे अफसोस भी होता और मेरी डांट अलग पड़ती. मैं दिनरात किताब लिए उस के पीछे  पड़ी रहती. वह भी रटता रहता परंतु फिर भी वह पिछड़ने लगा था.

मेरी कल्पना के सारे विस्तार एकसाथ सिकुड़ने लगे. मैं बौखलाने लगी. कई बार मुझे रोना आ जाता. मुझे लगता कि कहीं कुछ गलती तो जरूर हुई है. पर मैं यकीन नहीं कर पाती कि जो मैं ने इतना जोरशोर व मेहनत से किया था उस में कुछ गलत था.

गरमियों के अवकाश के दौरान रोहित अधिकतर बीमार रहा. खेलना तो वह जैसे भूल ही गया था. एक दिन उस का बुखार कुछ ज्यादा ही बढ़ गया. वह बेहोश सा हो गया जिस से मैं घबरा गई. मेरी घबराहट और बढ़ गई जब वह बेहोशी में कभी पहाड़े सुनाने लगा तो कभी अंगरेजी के प्रश्नोत्तर. ऐसा वह लगातार देर तक करता रहा. मैं डर गई.

मेरे पति देर रात तक दफ्तर से लौटते थे, इसलिए मुझे हिम्मत बंधाने के खयाल से मेरे सासससुर पास बैठे थे. वे पहाड़े व प्रश्नोत्तर उन्होंने भी सुने. मुझे लगा कि सास तीखा उलाहना देंगी, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा बल्कि मुझे हिम्मत बंधाने लगीं, ‘‘दवा दे दी है, बुखार उतरता ही होगा.’’

आज कभी न बोलने वाले मेरे ससुर बोले, ‘‘बेटी, जमाने के मायाजाल में इतना न फंसो कि प्रकृति की लय से कदम ही टूट जाएं. तुम्हारी धुन के कारण रोहित अपनी सब से मूल्यवान वस्तु गंवा चुका है यानी अपना बचपना. जरा 3 साल पहले के रोहित को याद करो. क्या यह वही रोहित है? खूब पढ़ालिखा कर इसे क्या बना दोगी? समाज व जिंदगी में ठीक तरह से बरत सके, इस के लिए पढ़ाई जरूरी तो है परंतु उस का मकसद व तरीका मानसिक विकास वाला होना चाहिए.

‘‘तुम ने तो मानसिक विकास के बजाय इसे मानसिक कुंठा का शिकार बना दिया और खुद भी मनोरोगी बन रही हो. जो भी है, अभी बात हाथ से निकली नहीं है. इन 3 सालों में अंगरेजियत भरी इस टीमटाम के खोखलेपन को तुम भी काफीकुछ समझ चुकी होगी.

‘‘बच्चे को जूते, टाई और बैल्ट में कस कर हर समय बाबू साहब बनाने के बजाय उसे अन्य बच्चों के साथ उछलकूद करने दो. बच्चे की यही प्राकृतिक आवश्यकता भी है. उसे फिर टौनिक देने की जरूरत नहीं रहेगी. उसे किसी नजदीक के छोटे व कम समय वाले स्कूल में डालो ताकि वह जल्दी घर आ सके और मां के प्यार की खुशबू पा सके. अंगरेजी के वाक्य रटाने के बजाय उसे समझ आने वाली भाषा में उन वाक्यों की गहराई को समझाओ ताकि उस का मानसिक विकास हो.

‘‘उसे खेलखेल में पढ़ाने के तरीके ईजाद करो. पढ़ाई उतनी ही कराओ जितनी कि उस का नन्हा दिमाग जज्ब कर सके. बच्चे को प्रथम लाने के चक्कर में न रहो. उस के दिमाग को विकसित करो. वैसे भी तुम पाओगी कि अधिकतर सही विकास वाले बच्चे ही अच्छे नंबर लाते हैं, विशेषकर बड़ी कक्षाओं में.’’

ससुरजी की बात मैं ने बहुत ध्यान से सुनी. यह लगभग वही आवाज थी जोकि आजकल मेरे मन में उठने लगी थी.

कुछ देर बाद रोहित का बुखार जब कुछ कम हुआ तो सासससुर अपने कमरे में चले गए. मेरी सोई हुई ममता कुछ ऐसी जागी कि थरथराते हुए मैं ने रोहित को अपने से चिपका लिया. रोहित क्षणभर को नींद से जागा और कुछ अविश्वास से मुझे देखा. फिर ‘मां’ कहता हुआ मुझ से कस कर लिपट कर सो गया.

दूसरे दिन मैं ने अपने सासससुर  को सुनाते हुए पति से कहा, ‘‘सुनिए, रवींद्र ज्ञानार्जन निकेतन का प्रवेशफार्म ले आना. इस बार रोहित को यहीं डालेंगे.’’

यह तो पागल है

अपनी पत्नी सरला को अस्पताल के इमरजैंसी विभाग में भरती करवा कर मैं उसी के पास कुरसी पर बैठ गया. डाक्टर ने देखते ही कह दिया था कि इसे जहर दिया गया है और यह पुलिस केस है. मैं ने उन से प्रार्थना की कि आप इन का इलाज करें, पुलिस को मैं खुद बुलवाता हूं. मैं सेना का पूर्व कर्नल हूं. मैं ने उन को अपना आईकार्ड दिखाया, ‘‘प्लीज, मेरी पत्नी को बचा लीजिए.’’

डाक्टर ने एक बार मेरी ओर देखा, फिर तुरंत इलाज शुरू कर दिया. मैं ने अपने क्लब के मित्र डीसीपी मोहित को सारी बात बता कर तुरंत पुलिस भेजने का आग्रह किया. उस ने डाक्टर से भी बात की. वे अपने कार्य में व्यस्त हो गए. मैं बाहर रखी कुरसी पर बैठ गया. थोड़ी देर बाद पुलिस इंस्पैक्टर और 2 कौंस्टेबल को आते देखा. उन में एक महिला कौंस्टेबल थी.

मैं भाग कर उन के पास गया, ‘‘इंस्पैक्टर, मैं कर्नल चोपड़ा, मैं ने ही डीसीपी मोहित साहब से आप को भेजने के लिए कहा था.’’

पुलिस इंस्पैक्टर थोड़ी देर मेरे पास रुके, फिर कहा, ‘‘कर्नल साहब, आप थोड़ी देर यहीं रुकिए, मैं डाक्टरों से बात कर के हाजिर होता हूं.’’

मैं वहीं रुक गया. मैं ने दूर से देखा, डाक्टर कमरे से बाहर आ रहे थे. शायद उन्होंने अपना इलाज पूरा कर लिया था. इंस्पैक्टर ने डाक्टर से बात की और धीरेधीरे चल कर मेरे पास आ गए.

मैं ने इंस्पैक्टर से पूछा, ‘‘डाक्टर ने क्या कहा? कैसी है मेरी पत्नी? क्या वह खतरे से बाहर है, क्या मैं उस से मिल सकता हूं?’’ एकसाथ मैं ने कई प्रश्न दाग दिए.

‘‘अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. डाक्टर अपना इलाज पूरा कर चुके हैं. उन की सांसें चल रही हैं. लेकिन बेहोश हैं. 72 घंटे औब्जर्वेशन में रहेंगी. होश में आने पर उन के बयान लिए जाएंगे. तब तक आप उन से नहीं मिल सकते. हमें यह भी पता चल जाएगा कि उन को कौन सा जहर दिया गया है,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और मुझे गहरी नजरों से देखते हुए पूछा, ‘‘बताएं कि वास्तव में हुआ क्या था?’’

‘‘दोपहर 3 बजे हम लंच करते हैं. लंच करने से पहले मैं वाशरूम गया और हाथ धोए. सरला, मेरी पत्नी, लंच शुरू कर चुकी थी. मैं ने कुरसी खींची और लंच करने के लिए बैठ गया. अभी पहला कौर मेरे हाथ में ही था कि वह कुरसी से नीचे गिर गई. मुंह से झाग निकलने लगा. मैं समझ गया, उस के खाने में जहर है. मैं तुरंत उस को कार में बैठा कर अस्पताल ले आया.’’

‘‘दोपहर का खाना कौन बनाता है?’’

‘‘मेड खाना बनाती है घर की बड़ी बहू के निर्देशन में.’’

‘‘बड़ी बहू इस समय घर में मिलेगी?’’

‘‘नहीं, खाना बनवाने के बाद वह यह कह कर अपने मायके चली गई कि उस की मां बीमार है, उस को देखने जा रही है.’’

‘‘इस का मतलब है, वह खाना अभी भी टेबल पर पड़ा होगा?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘और कौनकौन है, घर में?’’

‘‘इस समय तो घर में कोई नहीं होगा. मेरे दोनों बेटों का औफिस ग्रेटर नोएडा में है. वे दोनों 11 बजे तक औफिस के लिए निकल जाते हैं. छोटी बहू गुड़गांव में काम करती है. वह सुबह ही घर से निकल जाती है और शाम को घर आती है. दोनों पोते सुबह ही स्कूल के लिए चले जाते हैं. अब तक आ गए होंगे. मैं गार्ड को कह आया था कि उन से कहना, दादू, दादी को ले कर अस्पताल गए हैं, वे पार्क में खेलते रहें.’’

इंस्पैक्टर ने साथ खड़े कौंस्टेबल से कहा, ‘‘आप कर्नल साहब के साथ इन के फ्लैट में जाएं और टेबल पर पड़ा सारा खाना उठा कर ले आएं. किचन में पड़े खाने के सैंपल भी ले लें. पीने के पानी का सैंपल भी लेना न भूलना. ठहरो, मैं ने फोरैंसिक टीम को बुलाया है. वह अभी आती होगी. उन को साथ ले कर जाना. वे अपने हिसाब से सारे सैंपल ले लेंगे.’’

‘‘घर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं?’’ इंस्पैक्टर ने मुझ से पूछा.

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘सेना के बड़े अधिकारी हो कर भी कैमरे न लगवा कर आप ने कितनी बड़ी भूल की है. यह तो आज की अहम जरूरत है. यह पता भी चल गया कि जहर दिया गया है तो इसे प्रूफ करना मुश्किल होगा. कैमरे होने से आसानी होती. खैर, जो होगा, देखा जाएगा.’’

 

इतनी देर में फोरैंसिक टीम भी आ गई. उन को निर्देश दे कर इंस्पैक्टर ने मुझ से उन के साथ जाने के लिए कहा.

‘‘आप ने अपने बेटों को बताया?’’

‘‘नहीं, मैं आप के साथ व्यस्त था.’’

‘‘आप मुझे अपना मोबाइल दे दें और नाम बता दें. मैं उन को सूचना दे दूंगा.’’ इंस्पैक्टर ने मुझ से मोबाइल ले लिया.

फोरैंसिक टीम को सारी कार्यवाही के लिए एक घंटा लगा. टीम के सदस्यों ने जहर की शीशी ढूंढ़ ली. चूहे मारने का जहर था. मैं जब पोतों को ले कर दोबारा अस्पताल पहुंचा तो मेरे दोनों बेटे आ चुके थे. एक महिला कौंस्टेबल, जो सरला के पास खड़ी थी, को छोड़ कर बाकी पुलिस टीम जा चुकी थी. मुझे देखते ही, दोनों बेटे मेरे पास आ गए.

‘‘पापा, क्या हुआ?’’

‘‘मैं ने सारी घटना के बारे में बताया.’’

‘‘राजी कहां है?’’ बड़े बेटे ने पूछा.

‘‘कह कर गई थी कि उस की मां बीमार है, उस को देखने जा रही है. तुम्हें तो बताया होगा?’’

‘‘नहीं, मुझे कहां बता कर जाती है.’’

‘‘वह तुम्हारे हाथ से निकल चुकी है. मैं तुम्हें समझाता रहा कि जमाना बदल गया है. एक ही छत के नीचे रहना मुश्किल है. संयुक्त परिवार का सपना, एक सपना ही रह गया है. पर तुम ने मेरी एक बात न सुनी. तब भी जब तुम ने रोहित के साथ पार्टनरशिप की थी. तुम्हें 50-60 लाख रुपए का चूना लगा कर चला गया.

‘‘तुम्हें अपनी पत्नी के बारे में सबकुछ पता था. मौल में चोरी करते रंगेहाथों पकड़ी गई थी. चोरी की हद यह थी कि हम कैंटीन से 2-3 महीने के लिए सामान लाते थे और यह पैक की पैक चायपत्ती, साबुन, टूथपेस्ट और जाने क्याक्या चोरी कर के अपने मायके दे आती थी और वे मांबाप कैसे भूखेनंगे होंगे जो बेटी के घर के सामान से घर चलाते थे. जब हम ने अपने कमरे में सामान रखना शुरू किया तो बात स्पष्ट होने में देर नहीं लगी.

‘‘चोरी की हद यहां तक थी कि तुम्हारी जेबों से पैसे निकलने लगे. घर में आए कैश की गड्डियों से नोट गुम होने लगे. तुम ने कैश हमारे पास रखना शुरू किया. तब कहीं जा कर चोरी रुकी. यही नहीं, बच्चों के सारे नएनए कपड़े मायके दे आती. बच्चे जब कपड़ों के बारे में पूछते तो उस के पास कोई जवाब नहीं होता. तुम्हारे पास उस पर हाथ उठाने के अलावा कोई चारा नहीं होता.

‘‘अब तो वह इतनी बेशर्म हो गई है कि मार का भी कोई असर नहीं होता. वह पागल हो गई है घर में सबकुछ होते हुए भी. मानता हूं, औरत को मारना बुरी बात है, गुनाह है पर तुम्हारी मजबूरी भी है. ऐसी स्थिति में किया भी क्या जा सकता है.

‘‘तुम्हें तब भी समझ नहीं आई. दूसरी सोसाइटी की दीवारें फांदती हुई पकड़ी गई. उन के गार्डो ने तुम्हें बताया. 5 बार घर में पुलिस आई कि तुम्हारी मम्मी तुम्हें सिखाती है और तुम उसे मारते हो. जबकि सारे उलटे काम वह करती है. हमें बच्चों के जूठे दूध की चाय पिलाती थी. बच्चों का बचा जूठा पानी पिलाती थी. झूठा पानी न हो तो गंदे टैंक का पानी पिला देती थी. हमारे पेट इतने खराब हो जाते थे कि हमें अस्पताल में दाखिल होना पड़ता था. पिछली बार तो तुम्हारी मम्मी मरतेमरते बची थी.

‘‘जब से हम अपना पानी खुद भरने लगे, तब से ठीक हैं.’’ मैं थोड़ी देर के लिए सांस लेने के लिए रुका, ‘‘तुम मारते हो और सभी दहेज मांगते हैं, इस के लिए वह मंत्रीजी के पास चली गई. पुलिस आयुक्त के पास चली गई. कहीं बात नहीं बनी तो वुमेन सैल में केस कर दिया. उस के लिए हम सब 3 महीने परेशान रहे, तुम अच्छी तरह जानते हो. तुम्हारी ससुराल के 10-10 लोग तुम्हें दबाने और मारने के लिए घर तक पहुंच गए. तुम हर जगह अपने रसूख से बच गए, वह बात अलग है. वरना उस ने तुम्हें और हमें जेल भिजवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. इतना सब होने पर भी तुम उसे घर ले आए जबकि वह घर में रहने लायक लड़की नहीं थी.

‘‘हम सब लिखित माफीनामे के बिना उसे घर लाना नहीं चाहते थे. उस के लिए मैं ने ही नहीं, बल्कि रिश्तेदारों ने भी ड्राफ्ट बना कर दिए पर तुम बिना किसी लिखतपढ़त के उसे घर ले आए. परिणाम क्या हुआ, तुम जानते हो. वुमेन सैल में तुम्हारे और उस के बीच क्या समझौता हुआ, हमें नहीं पता. तुम भी उस के साथ मिले हुए हो. तुम केवल अपने स्वार्थ के लिए हमें अपने पास रखे हो. तुम महास्वार्थी हो.

‘‘शायद बच्चों के कारण तुम्हारा उसे घर लाना तुम्हारी मजबूरी रही होगी या तुम मुकदमेबाजी नहीं चाहते होगे. पर, जिन बच्चों के लिए तुम उसे घर ले कर आए, उन का क्या हुआ? पढ़ने के लिए तुम्हें अपनी बेटी को होस्टल भेजना पड़ा और बेटे को भेजने के लिए तैयार हो. उस ने तुम्हें हर जगह धोखा दिया. तुम्हें किन परिस्थितियों में उस का 5वें महीने में गर्भपात करवाना पड़ा, तुम्हें पता है. उस ने तुम्हें बताया ही नहीं कि वह गर्भवती है. पूछा तो क्या बताया कि उसे पता ही नहीं चला. यह मानने वाली बात नहीं है कि कोई लड़की गर्भवती हो और उसे पता न हो.’’

‘‘जब हम ने तुम्हें दूसरे घर जाने के लिए डैडलाइन दे दी तो तुम ने खाना बनाने वाली रख दी. ऐसा करना भी तुम्हारी मजबूरी रही होगी. हमारा खाना बनाने के लिए मना कर दिया होगा. वह दोपहर का खाना कैसा गंदा और खराब बनाती थी, तुम जानते थे. मिनरल वाटर होते हुए भी, टैंक के पानी से खाना बनाती थी.

‘‘मैं ने तुम्हारी मम्मी से आशंका व्यक्त की थी कि यह पागल हो गई है. यह कुछ भी कर सकती है. हमें जहर भी दे सकती है. किचन में कैमरे लगवाओ, नौकरानी और राजी पर नजर रखी जा सकेगी. तुम ने हामी भी भरी, परंतु ऐसा किया नहीं. और नतीजा तुम्हारे सामने है. वह तो शुक्र करो कि खाना तुम्हारी मम्मी ने पहले खाया और मैं उसे अस्पताल ले आया. अगर मैं भी खा लेता तो हम दोनों ही मर जाते. अस्पताल तक कोई नहीं पहुंच पाता.’’

इतने में पुलिस इंस्पैक्टर आए और कहने लगे, ‘‘आप सब को थाने चल कर बयान देने हैं. डीसीपी साहब इस के लिए वहीं बैठे हैं.’’ थाने पहुंचे तो मेरे मित्र डीसीपी मोहित साहब बयान लेने के लिए बैठे थे. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे सब से पहले आप की छोटी बहू के बयान लेने हैं. पता करें, वह स्कूल से आ गई हो, तो तुरंत बुला लें.’’

छोटी बहू आई तो उसे सीधे डीसीपी साहब के सामने पेश किया गया. उसे हम में से किसी से मिलने नहीं दिया गया. डीसीपी साहब ने उसे अपने सामने कुरसी पर बैठा, बयान लेने शुरू किए.

2 इंस्पैक्टर बातचीत रिकौर्ड करने के लिए तैयार खड़े थे. एक लिपिबद्ध करने के लिए और एक वीडियोग्राफी के लिए.

डीसीपी साहब ने पूछना शुरू किया-

‘‘आप का नाम?’’

‘‘जी, निवेदिका.’’

‘‘आप की शादी कब हुई? कितने वर्षों से आप कर्नल चोपड़ा साहब की बहू हैं?’’

‘‘जी, मेरी शादी 2011 में हुई थी.

6 वर्ष हो गए.’’

‘‘आप के कोई बच्चा?’’

‘‘जी, एक बेटा है जो मौडर्न स्कूल में दूसरी क्लास में पढ़ता है.’’

‘‘आप को अपनी सास और ससुर से कोई समस्या? मेरे कहने का मतलब वे अच्छे या आम सासससुर की तरह तंग करते हैं?’’

‘‘सर, मेरे सासससुर जैसा कोई नहीं हो सकता. वे इतने जैंटल हैं कि उन का दुश्मन भी उन को बुरा नहीं कह सकता. मेरे पापा नहीं हैं. कर्नल साहब ने इतना प्यार दिया कि मैं पापा को भूल गई. वे दोनों अपने किसी भी बच्चे पर भार नहीं हैं. पैंशन उन की इतनी आती है कि अच्छेअच्छों की सैलरी नहीं है. दवा का खर्चा भी सरकार देती है. कैंटीन की सुविधा अलग से है.’’

‘‘फिर समस्या कहां है?’’

‘‘सर, समस्या राजी के दिमाग में है, उस के विचारों में है. उस के गंदे संस्कारों में है जो उस की मां ने उसे विरासत में दिए. सर, मां की प्रयोगशाला में बेटी पलती और बड़ी होती है, संस्कार पाती है. अगर मां अच्छी है तो बेटी भी अच्छी होगी. अगर मां खराब है तो मान लें, बेटी कभी अच्छी नहीं होगी. यही सत्य है.

‘‘सर, सत्य यह भी है कि राजी महाचोर है. मेरे मायके से 5 किलो दान में आई मूंग की दाल भी चोरी कर के ले गई. मेरे घर से आया शगुन का लिफाफा भी चोरी कर लिया, उस की बेटी ने ऐसा करते खुद देखा. थोड़ा सा गुस्सा आने पर जो अपनी बेटी का बस्ता और किताबें कमरे के बाहर फेंक सकती है, वह पागल नहीं तो और क्या है. उस की बेटी चाहे होस्टल चली गई परंतु यह बात वह कभी नहीं भूल पाई.’’

‘‘ठीक है, मुझे आप के ही बयान लेने थे. सास के बाद आप ही राजी की सब से बड़ी राइवल हैं.’’

उसी समय एक कौंस्टेबल अंदर आया और कहा, ‘‘सर, राजी अपने मायके में पकड़ी गई है और उस ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया है. उस की मां भी साथ है.’’

‘‘उन को अंदर बुलाओ. कर्नल साहब, उन के बेटों को भी बुलाओ.’’

थोड़ी देर बाद हम सब डीसीपी साहब के सामने थे. राजी और उस की मां भी थीं. राजी की मां ने कहा, ‘‘सर, यह तो पागल है. उसी पागलपन के दौरे में इस ने अपनी सास को जहर दिया. ये रहे उस के पागलपन के कागज. हम शादी के बाद भी इस का इलाज करवाते रहे हैं.’’

‘‘क्या? यह बीमारी शादी से पहले की है?’’

‘‘जी हां, सर.’’

‘‘क्या आप ने राजी की ससुराल वालों को इस के बारे में बताया था?’’ डीसीपी साहब ने पूछा.

‘‘सर, बता देते तो इस की शादी नहीं होती. वह कुंआरी रह जाती.’’

‘‘अच्छा था, कुंआरी रह जाती. एक अच्छाभला परिवार बरबाद तो न होता. आप ने अपनी पागल लड़की को थोप कर गुनाह किया है. इस की सख्त से सख्त सजा मिलेगी. आप भी बराबर की गुनाहगार हैं. दोनों को इस की सजा मिलेगी.’’

‘‘डीसीपी साहब किसी पागल लड़की को इस प्रकार थोपने की क्रिया ही गुनाह है. कानून इन को सजा भी देगा. पर हमारे बेटे की जो जिंदगी बरबाद हुई उस का क्या? हो सकता है, इस के पागलपन का प्रभाव हमारी अगली पीढ़ी पर भी पड़े. उस का कौन जिम्मेदार होगा? हमारा खानदान बरबाद हो गया. सबकुछ खत्म हो गया.’’

‘‘मानता हूं, कर्नल साहब, इस की पीड़ा आप को और आप के बेटे को जीवनभर सहनी पड़ेगी, लेकिन कोई कानून इस मामले में आप की मदद नहीं कर पाएगा.’’

थाने से हम घर आ गए. सरला की तबीयत ठीक हो गई थी. वह अस्पताल से घर आ गई थी. महीनों वह इस हादसे को भूल नहीं पाई थी. कानून ने राजी और उस की मां को 7-7 साल कैद की सजा सुनाई थी. जज ने अपने फैसले में लिखा था कि औरतों के प्रति गुनाह होते तो सुना था लेकिन जो इन्होंने किया उस के लिए 7 साल की सजा बहुत कम है. अगर उम्रकैद का प्रावधान होता तो वे उसे उम्रकैद की सजा देते.

Holi Special: अधूरी चाह- भाग 3

अब शालिनी जो पैसे कमाने के चक्कर में नौकरी करने लगी थी, वह अब पति यानी संजय की जमापूंजी खत्म कर रही है. कभी संजय से 50,000 तो कभी एक लाख रुपए लेती, किसी न किसी काम के बहाने. घर के खर्चों और बच्चों के खर्चों की संजय को बिलकुल भी जानकारी नहीं थी, इसलिए जितना वह मांगती संजय दे देता.

इस तरह कई साल बीत गए, लेकिन कोई भी राज कहां तक राज रह सकता है. आखिरकार यह राज भी जगजाहिर हो गया. बात उठी है तो न जाने कितने कानों तक पहुंचेगी. जाहिर सी बात है कि संजय के कानों तक भी तो पहुंचनी ही थी, पहुंच गई.

संजय ने पूछा, तो शालिनी ने साफ इनकार कर दिया, लेकिन संजय को जहां से भी खबर मिली थी, वह खबर पक्की थी.

संजय को यह फिक्र थी कि बच्चे अब बड़े हैं, सम?ादार हैं, हर बात को सम?ाते हैं, उन के सामने वह कोई तमाशा नहीं करना चाहता था. बस, शालिनी को सम?ाता कि वह यह सब छोड़ दे या उसे छोड़ वहीं जा कर बसे, लेकिन शालिनी सच स्वीकार न करती.

इस बात को अब 11 साल बीत गए. शालिनी का वही रूटीन है. संजय अपनी नौकरी और ऐक्स्ट्रा काम में बिजी है, क्योंकि केवल नौकरी से घर का गुजारा नहीं चल रहा था.

शालिनी तकरीबन संजय का पैसा सब खत्म कर चुकी है और संजय ने औफिस से लोन भी लिया हुआ है. शालिनी जान गई कि संजय के साथ कोई भविष्य नहीं. वह संजय को तलाक के कागज थमा कर कहती है कि उसे तलाक चाहिए. संजय उसे तलाक दे देता है. शालिनी अजय से शादी कर लेती है.

शालिनी बच्चों को साथ ले जाती है अजय के घर. संजय अकेला बैठा सोच रहा है कि उस ने कहां क्या गलती की?

हां, याद आता है संजय को वह हर पल जबजब वह शालिनी के साथ हमबिस्तर हुआ, उस ने कभी शालिनी के इमोशन को नहीं सम?ा और जाना, बस केवल अपनी हवस शांत की और सो गया.

शालिनी कहती, ‘मु?ो तुम्हारा तन नहीं मन चाहिए. मु?ो केवल प्यार चाहिए, सैक्स ही जिंदगी की धुरी नहीं, जिंदगी का मतलब तो प्यार है.’’

लेकिन संजय इन बातों पर ध्यान न देता, क्योंकि उसे अपनी जवानी पर नाज था, फख्र था कि उस पर हजारों लड़कियां मरती हैं, यही घमंड उस की रगरग में बस चुका था. उस की नजर में औरत का प्यार कोई माने नहीं रखता, औरत केवल बिस्तर की शोभा ही बन सकती है.

शालिनी, जो जब तक संजय के साथ थी, सच्चे प्यार को तरसती रही, लेकिन उसे वह प्यार अजय श्रीवास्तव ने दिया. वह उस की दीवानी हो गई. कहते हैं कि औरत जब कुरबान करने पर आती है, तो अपनी जान की भी परवाह नहीं करती.

आज शालिनी अपनी जान देना चाहती है, संजय या अजय के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि अब उसे एहसास हो गया कि उस ने कितना गलत कदम उठाया था, लेकिन उसे इस बात का सुकून है कि उसे थोड़े समय के लिए ही सही, अजय से सच्चा प्यार तो मिला था. अब अजय ने बेशक शादी कर ली उस से, लेकिन वह उसे वह खुशी नहीं दे रहा, क्योंकि उस के सिर से शालिनी नाम का भूत उतर चुका है.

वह अब सम?ा चुका है कि शालिनी के पास अब कोई धनदौलत नहीं, वह तो केवल पैसों का भूखा निकला, शालिनी के लिए तो उस का प्यार चंद महीनों में ही खत्म हो गया था. अब उस ने शालिनी को भी पैसेपैसे के लिए मुहताज कर दिया है, बच्चे भी परेशान हैं.

संजय बच्चों को अपने पास लाना चाहता है, मगर बच्चे जानते हैं कि मां परेशान हैं. अब उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते वरना मां डिप्रैशन में न चली जाएं कहीं.

शालिनी अपने किए पर शर्मिंदा है और संजय को अब अपनी गलती का एहसास हो रहा है, लेकिन अब इस समस्या का समाधान नहीं है.

संजय ने कश्मीर छोड़ दिया हमेशा के लिए, करता भी क्या वहां रह कर. सिर पर कर्ज है लोगों का, जो लेले कर शालिनी की ख्वाहिशें पूरी करता रहा और किस तरह शालिनी को अपने सामने गैर के साथ देखता. रातोंरात भाग आया दिल्ली अपने भाइयों के पास. दोनों अपनी गलतियों पर पछता रहे हैं, लेकिन इन सब में बच्चों का भविष्य कहीं सुखद दिखाई नहीं देता.

भ्रमजाल

बहुत देर से कोई बस नहीं आई. मैं खड़ेखड़े उकता गई. एक अजीब सी सुस्ती ने मुझे घेर लिया. मेरे आसपास लोग खड़े थे, बतिया रहे थे, कुछ इधरउधर विचर रहे थे. मैं उन सब से निर्विकार अपने अकेलेपन से जू?ा रही थी. निगाह तो जिधर से बस आनी थी उधर चिपक सी गई थी. मन में एक प्रश्न यह भी उठ रहा था कि मैं जा क्यों रही हूं? न अम्मा, न बाबूजी, कोई भी तो मेरा इंतजार नहीं कर रहा है. तो क्या लौट जाऊं? पर यहां अकेली कमरे में क्या करूंगी. होली का त्योहार है, आलमारी ठीक कर लूंगी, कपड़े धो कर प्रैस करने का समय मिल जाएगा. 4 दिनों की छुट्टी है. समय ही समय है. सब अपने घरपरिवार में होली मना रहे होंगे. किसी के यहां जाना भी अजीब लगेगा…नहीं, चली ही जाती हूं. क्या देहरादून जाऊं शीला के पास? एकाएक मन शीला के पास जाने के लिए मचल उठा.

शीला, मेरी प्यारी सखी. हमारी जौइनिंग एक ही दिन की है. दोनों ने पढ़ाई पूरी ही की थी कि लोक सेवा आयोग से सीधी भरती के तहत हम इंटर कालेज में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हो गए. प्रथम तैनाती अल्मोड़ा में मिली.

अल्मोड़ा एक सुंदर पहाड़ी शहर है जहां कसबाई संस्कृति की चुलबुलाहट है. सुंदर आबोहवा, रमणीक पर्यटन स्थल, खूबसूरत मंदिर, आकार बदलते ?ारने, उपनिवेश राज के स्मृति चिह्न, और भी बहुत कुछ. खिली धूप और खुली हवा. ठंडा है किंतु घुटा हुआ नहीं. मैदानी क्षेत्रों की न धुंध न कोहरा. सबकुछ स्वच्छनिर्मल. जल्दी ही हमारा मन वहां रम गया.

दोनों पढ़ने वाले थे. शीघ्र ही हमारी दोस्ती परवान चढ़ने लगी. साथ भोजन करने से खाने का रस बना रहा. पहाड़ी जगह, सीधेसरल जन, रंग बदलते मौसम, रसीले फल और शाम को टहलना, सेहत तो बननी ही थी.

स्कूल की बंधीबंधाई दिनचर्या के उपरांत कुछ शौपिंग, कुछ बतियाना, स्फूर्तिपूर्वक लगता था. अन्यथा स्कूल का माहौल, बाप रे, ऐडमिशन, टाइमटेबल, लगातार वादन, होमवर्क, यूनिट टैस्ट, छमाही, सालाना, कौपियां, रिजल्ट, प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सदन, पत्रिका, संचयिका, अभिभावक संघ, बैठकें, प्रीबोर्ड, बोर्ड परीक्षा, गृह परीक्षा, प्रैक्टिकल्स…उफ, कहीं कुछ चूक हो जाए तो दुनियाभर की फजीहत. इन सब के बाद सवा महीने की गरमियों की छुट्टी. अधिकांश उड़ जाते अपने स्थायी बसेरों की ओर. मैं भी अल्मोड़ा के शीतल मनोहारी वायुमंडल को त्याग तपते आगरा में अम्माबाबूजी की शीतल छांव में जाने को बेताब रहती.

 

अम्माबाबूजी की दवा, खुराक, सामाजिक व्यवहार, कपड़ों की खरीदारी में कब ग्रीष्मावकाश फुर्र हो जाता, कुछ पता ही नहीं चलता. आतेआते भी, ‘मैं जल्दी आऊंगी,’ कह कर ही निकल पाती.

बीच में कुछ दिन देहरादून में दीदी और जीजाजी के पास रहती. वे भी इंतजार सा करते रहते. दीदी कमजोर थीं, 3 बच्चे छोटेछोटे. किसी भी जरूरत पर मु?ो जाना पड़ता था. मेरे बारबार चक्कर काटने से शीला खी?ा जाती. एक दिन तो फट पड़ी.

गजब की ठंड थी. पहाडि़यां बर्फ से लकदक हो गई थीं. रुकरुक कर होती बारिश ने सब को घरों में रहने को मजबूर सा कर दिया था. बर्फीली हवा ने पूरी वादी को अपने आगोश में ले लिया था. मैं छुट्टी की अप्लीकेशन और लैब की चाबी लिए शीला के घर की ओर चल दी. दरवाजा खटखटाया. कुछ देर यों ही खड़ी रही. शीला को आने में समय लगा. बिस्तर में रही होगी. हाथ में बैग देखते ही बोली, ‘इस मौसम में, इतनी ठंड में चिडि़या भी घोंसले में दुबकी है और एक तू है जो बर्फीली हवा की तरह बेचैन है.’

‘देहरादून से जीजाजी का फोन आया है. हनी को चोट लग गई है. शायद औपरेशन कराना पड़े.’

‘तेरे तो कई औपरेशन कर दिए इस बुलावे ने,’ शीला ने बात पूरी सुने बिना जिस विद्रूपता से मेरे हाथ से चाबी और अप्लीकेशन ?ापट कर दरवाजा खटाक से बंद किया, बरसों बाद भी उस का कसैलापन धमनियों में बहते खून में तिरने लगता है. शीला की बात से नहीं, हनी के व्यवहार से.

पिछली बार जब मैं उबाऊ और मैले सफर के बाद देहरादून पहुंची तो बड़ी देर तक हनी और बहू मिलने नहीं आए. हनी के मुख से निकले वाक्य ‘मौसी फिर आ गई हैं’ ने अनायास मु?ा से मेरा साक्षात्कार करा दिया. ऐसा नहीं था कि उन की आंखों में धूमिल होती प्रसन्नता की चमक और लुप्त होते उत्साह को मैं महसूस नहीं कर रही थी किंतु मैं अपने भ्रमजाल से बाहर ही नहीं आ पा रही थी. सबकुछ बदल रहा था, केवल मैं रुकी हुई थी. शीला ठीक कहती थी, ‘निकल इस व्यामोह से, सब की अपनी जिंदगी है. किसी को तेरी जरूरत नहीं. सब फायदा उठा रहे हैं. अपनी सुध ले.’

मु?ो बेचैनी सी होने लगी. बैग से पानी की बोतल निकाली. कुछ घूंट पिए. इस बीच एक बस आई थी. ठसाठस भरी. मैं अपनी जगह से हिल भी नहीं पाई. लोग सरकती बस में लटकते, चिपकते और ?ालते चले गए.

धीरेधीरे मु?ो लगने लगा कि अम्माबाबूजी की मु?ा पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी. वे हर चीज के लिए मेरी राह देखने लगे. मु?ो गर्व होने लगा, अपने लंबे भाइयों का कद छोटा होते देख. उन को यह जताने में मु?ो पुलक का अनुभव होने लगा कि मेरे रहते हुए अम्माबाबूजी को किसी बात की कोई कमी नहीं है, उन्हें बेटों की कोई दरकार नहीं. भाईभतीजे कुछ खिंचेखिंचे रहने लगे थे. भाभियां कुछ ज्यादा चुप हो गईं. पर मैं ने कब परवा की. बीचबीच में बाबूजी मु?ो इशारा करते थे परंतु मैं ने बात को छूने की कभी कोशिश ही नहीं की.

आज अम्माबाबूजी नहीं हैं. बादलों का वह ?ांड टुकड़ेटुकड़े हो गया जिसे मैं ने शाश्वत सम?ा लिया था.

पहले बाबूजी गए. 93 वर्ष की उम्र में भरेपूरे परिवार के बीच जब उन की अरथी उठी तो सब ने उन्हें अच्छा कहा. उसी कोलाहल में एक दबा स्वर यह भी उभरा कि बेटी को अनब्याहा छोड़ गए. कोई और समय होता तो मैं उस शख्स से भिड़ जाती. पर अब लगता है, अम्माबाबूजी बुजुर्ग हो गए थे किंतु असहाय नहीं थे. उन्होंने मेरे रिश्ते की सरगरमी कभी नहीं दिखाई. जैसे उन्होंने यह मान लिया था कि मैं विवाह करूंगी ही नहीं.

मेरी समवयस्का सखी शीला के घर से जबतब उस के लिए रिश्ते के प्रस्ताव आते रहते. एक रूमानियत उस की आंखों में तैरने लगी थी. बोलती तो जैसे परागकण ?ार रहे हों, चेहरे का आकर्षण दिन पर दिन बढ़ने लगा था. वह मु?ा से बहुतकुछ कहना चाहती थी पर मेरे लिए तो जैसे वह लोक था ही नहीं. आखिर, वह मु?ा से छिटक गई और अकेले ही अपने कल्पनालोक में विचरने लगी.

फिर एकाएक एक दिन उस ने मेरे हाथ में अपनी शादी का कार्ड रख दिया- शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते…मैं पंक्ति को पढ़ती जाती और अर्थ ढूंढ़ती जाती. शीला खीझ गई, ‘मेरी शादी है. फुरसत मिले तो आ जाना. मैं आज जा रही हूं.’ मैं उसे देखती रह गई.

शादी के बाद शीला वर्षभर यहां और रही. उस के पति शेखर ने पूरा जोर लगा दिया उस का देहरादून तबादला कराने में. शेखर वहां ‘सर्वे औफ इंडिया’ में अधिकारी थे. कोशिश करतेकरते भी सालभर लग गया. इस बीच वे शीला के पास यहां आते रहे. जब शेखर यहां आते तो मेरी एक सीमारेखा खिंच जाती. परंतु शीला मेरा पहले से भी अधिक खयाल रखने लगती. कोशिश करती कि मैं खाना अकेले न बनाऊं. मैं न जाती तो खाना पहुंचा देती. बहुत मना करती तो दालसब्जी तो जरूर दे जाती. शेखर के स्वभाव में गंभीरता दिखती थी इसलिए मिलने से बचती रही. लेकिन इस गंभीरता के नीचे सहृदयता की निर्मल धारा बह रही है, यह धीरेधीरे पता चला. अपनेआप ?ि?ाक कम होती चली गई और उन में मु?ो एक शुभचिंतक नजर आने लगा.

इसी दौरान शेखर ने मु?ो अरविंद के बारे में बताया, जो उन्हीं के औफिस में देहरादून में कार्यरत था. एक सरकारी कार्य के बहाने उसे अल्मोड़ा बुला कर मेरी मुलाकात भी करा दी. अरविंद ने मु?ो आकर्षित किया. अपने प्रति भी उस की रुचि अनुभव की. शेखर और शीला के दांपत्य के शृंगार का सौंदर्य देख चुकी थी. मैं विवाह के लिए उत्कंठित हो गई. शीला का भी आग्रह बढ़ता गया. कई प्रकार से वह मु?ो सम?ाती.

‘अम्माबाबूजी हमेशा नहीं रहेंगे. पीतपर्ण हैं…कभी भी ?ार जाएंगे. फिर वे अपना जीवन जी चुके हैं. बिंदु, तू बाद में पछताएगी. सोच ले.’

‘ठीक है, अम्माबाबूजी को मैं नहीं छोड़ पाऊंगी पर इस संबंध में तुम मेरे जीजाजी से बात करो,’ मैं ने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी स्वीकृति दे दी.

शीला हर्षित हो गई जैसे उसे कोई निधि मिल गई हो. तुरतफुरत उस ने शेखर की जीजाजी से बात करा दी. जीजाजी ने जिस उखड़ेपन से बात की वह शेखर के उत्साह को क्षीण करने के लिए काफी थी. वह बात नहीं थी, कटाक्ष था.

‘अच्छा, तो हमारी साली के रिश्ते की बातें इतनी सार्वजनिक हो गई हैं. आप उस की कलीग शीला के पति बोल रहे हैं न. किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है. घर में बिंदु के बहुत हितैषी हैं.’

शीला अपने पति के अपमान से तिलमिला गई. रोंआसी हो कहने लगी, ‘बिंदु, तेरे जीजाजी कभी तेरी शादी नहीं होने देंगे. अम्माबाबूजी के बस की बात नहीं और भाइयों की हद से तू निकल चुकी है. तु?ो स्वयं फैसला लेना होगा.’
पर मैं तो अपने बारे में कभी फैसला ले ही नहीं पाई. धीरेधीरे बात काल के गर्भ में समा गई. शेखर और शीला ने फिर कभी मेरे रिश्ते की बात नहीं की. पर हां, उन्होंने मु?ो देहरादून में जमीन या फ्लैट खरीदने को दोएक बार अवश्य कहा.

‘बिंदु, जमीन के दाम बढ़ते जा रहे हैं. तू समय रहते देहरादून में अपना मकान पक्का कर ले. अपना ठिकाना तो होना चाहिए.’

मैं चौंक गई. मैं और मकान. मैं पलट कर बोली, ‘देहरादून में मेरे दीदीजीजाजी हैं. एक जीजाजी सहारनपुर में हैं. मेरे लिए मकानों की कमी नहीं है.’

अब सबकुछ मेरी आंखों के सामने है. पिछली बार देहरादून गई तो सीधे शीला के पास चली गई थी. शीला प्रसन्न हुई, उस से अधिक हैरान. उस के 2 सुंदर बच्चे हमेशा की तरह मु?ा से चिपक गए. उन के लिए जो लाई थी, उन्हें पकड़ा दिया. शीला बिगड़ी. मैं चुप रही. शीला कुछ ढूंढ़ने लगी. बच्चों को लौन में खेलने भेज दिया.

‘बिंदु, कुछ परेशान लग रही है. सब ठीक है न?’

मेरा गला भर आया. स्वयं पर दया आने का यह विचित्र अनुभव था. शब्द नहीं निकल पाए. शीला पानी ले आई.

‘अच्छा, पहले पानी पी ले. थोड़ा आराम कर ले,’ कह कर शीला रसोई की ओर जाने लगी. मैं ने रोक दिया.

‘शीला, शेखर से कहना कि मेरे लिए कोई छोटा सा फ्लैट देख लें…’

शीला फट पड़ी, ‘अब आया तु?ो होश. जब पहले कहा था कि अपने लिए मकान देख ले तब तो तू ने कहा था कि मेरे बहुत सारे मकान हैं. कहां गए वे सारे मकान? अब याद आ रही है मकान खरीदने की, वह भी देहरादून में.’

शीला और उस के पति ने मकान ढूंढ़ने की कवायद शुरू कर दी. जमीन भी देखी, जमीन शहर से बहुत दूर थी, अकेली प्रौढ़ा के लिए ठीक नहीं लगा और शहर में फ्लैट बहुत महंगे थे. धीरेधीरे दोनों चीजें मेरी पहुंच से बहुत दूर चली गईं.

अब अम्मा भी नहीं रहीं. बाबूजी के जाने के 6 वर्ष बाद अम्मा भी छोड़ कर चली गईं. ऐसा लगने लगा कि जैसे मेरे जीवन का उद्देश्य ही खत्म हो गया. अब कहां जाऊं? सचमुच एक व्यामोह में कैद थी मैं. अब भ्रम टूटा तो 52 वर्ष की फिसलती उम्र के साथ अकेली खड़ी हूं…

भीड़ में कुछ हलचल हुई. शायद कोई बस आ रही है. बैग संभाल लिए. बस आ गई. रेले में मैं भी यंत्रवत सी बस में चढ़ गई. मंजिल हो न हो, सफर तो है ही.

सौंदर्य बोध- पार्ट 1: सुजाता को आखिर कैसे हुआ सौंदर्य बोध

शकुंतला शर्मा

रौयल मिशन स्कूल के वार्षिकोत्सव काआज अंतिम दिन था. छात्राओं का उत्साह अपनी चरम सीमा पर था, क्योंकि पुरस्कार समारोह की सब को बेचैनी से प्रतीक्षा थी. खेलकूद, वादविवाद, सामान्य ज्ञान के अतिरिक्त गायन, वादन, नृत्य, अभिनय जैसी अनेक प्रतियोगिताएं थीं. पर सब से अधिक उत्सुकता ‘कालेज रत्न‘ पुरस्कार को ले कर थी, क्योंकि जिस छात्रा को यह पुरस्कार मिलता, उसे अदलाबदली कार्यक्रम के अंतर्गत विदेश जाने का अवसर मिलने वाला था. कालेज में कई मेधावी छात्राएं थीं और सभी स्वयं को इस पुरस्कार के योग्य समझती थीं पर जब कालेज रत्न के लिए सुजाता के नाम की घोषणा हुईर् तो तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही एक ओर से आक्रोश के स्वर भी गूंज उठे. सब को धन्यवाद दे कर सुजाता स्टेज से नीचे उतरी तो उस की परम मित्र रोमा उसे मुबारकबाद देती हुई, उस के गले से लिपटती हुई बोली, ‘‘आज मैं तेरे लिए बहुत खुश हूं. तू ने असंभव को भी संभव कर दिखाया.‘‘

‘‘इस में तेरा योगदान भी कम नहीं है. तेरा सहयोग न होता तो यह कभी संभव न होता,‘‘ सुजाता कृतज्ञ स्वर में बोली. तभी सुजाता को उस के अन्य प्रशंसकों ने घेर लिया. उस के मातापिता भी व्याकुलता से उस की प्रतीक्षा कर रहे थे पर रोमा के मनमस्तिष्क पर तो पिछले कुछ दिनों की यादें दस्तक दे रही थीं. ‘सुजाता नहीं आई अभी तक?‘ रोमा ने उस दिन सत्या के घर पहुंचते ही पूछा.

‘नहीं, तुम्हारी प्रिय सखी नहीं आई अभी तक,‘ सत्या बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोली और वहां उपस्थित सभी युवतियों ने जोरदार ठहाका लगाया. ‘सौरी, तेरी हंसी उड़ाने का हमारा कोई इरादा नहीं था,‘ सत्या क्षमा मांगती हुई बोली.

‘तो किस की हंसी उड़ाने का इरादा था, सुजाता की?‘ ‘तू तो जानती है. हमें सुजाता का नाम सुनते ही हंसी आ जाती है. एक तो उस का रूपरंग ही ऐसा है. काला रंग, स्थूल शरीर, चेहरा ऐसा कि कोई दूसरी नजर डालना भी पसंद न करे. ऊपर से सिर में ढेर सारा तेल डाल कर 2 चोटियां बना लेती है. उस पर आंखों पर मोटा चश्मा. क्या हाल बना रखा है उस ने,‘ सत्या ने आंखें मटकाते हुए कहा.

‘मुझे तो वह बहुत सुंदर लगती है, उस की आंखों में अनोखी चमक है. तुम्हें तो उस की 2 चोटियों से भी शिकायत है. पर हम में से कितनों के उस के जैसे घने, लंबे बाल हैं. मोटा चश्मा तो बेचारी की मजबूरी है. आंखें कमजोर हैं उस की, तो चश्मा तो पहनेगी ही.‘ ‘कौंटैक्ट लैंस भी तो लगा सकती है. अपने रखरखाव पर थोड़ा ध्यान दे सकती है,‘ सत्या ने सुझाव दिया था.

‘हम होते कौन हैं, यह सुझाव देने वाले. वह जैसी है, अच्छी है. मुझे तो उस में कोई बुराई नजर नहीं आती.‘ ‘बुराई तो कोईर् नहीं है पर इस हाल में शायद ही उस का कोई मित्र बने. हम सब के बौयफ्रैंड हैं पर उस की तो तुझे छोड़ कर किसी लड़की से भी मित्रता नहीं है.‘

‘वह इसलिए कि वह हमारी तरह नहीं है. कितनी व्यस्त रहती है वह. खेलकूद, पढ़ाईलिखाई और हर तरह की प्रतियोगिता में क्या हम में से कोई उस की बराबरी कर सकता है. मेरी बचपन की सहेली है वह और मैं उस के गुणों के लिए उस का बहुत सम्मान करती हूं. बस एक विनती है कि उस के सामने ऐसा कुछ मत करना या कहना कि उसे दुख पहुंचे. ऐसा कुछ हुआ तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.‘ ‘तुम्हारी इतनी घनिष्ठ मित्र है, तो कुछ समझाओ उसे,‘ सत्या ने सलाह दी.

‘हम होते कौन हैं, उसे समझाने वाले. सुजाता बुद्धिमान और समझदार लड़की है. अपना भलाबुरा खूब समझती है,‘ रोमा ने समझाना चाहा. ‘अपनीअपनी सोच है. मेरी मम्मी तो कहती हैं कि लड़कियों को सब से अधिक ध्यान अपने रूपरंग पर देना चाहिए, पता है क्यों?‘ आभा भेद भरे स्वर में बोली.

‘क्यों?‘ सब ने समवेत स्वर में प्रश्न किया, मानो वह कोई राज की बात बताने जा रही हो. ‘क्योंकि लड़कों की बुद्धि से अधिक उन की आंखें तेज होती हैं,‘ आभा की भावभंगिमा और बात पर समवेत स्वर में जोरदार ठहाका लगा.

‘ऐसी बुद्धि वाले युवकों से दूर रहने में ही भलाई है, यह नहीं बताया तेरी मम्मी ने, रोमा ने आभा के उपहास का उत्तर उसी स्वर में दिया. ‘पता है, हमें सब पता है. अब छोड़ो यह सब और कल की पिकनिक की तैयारी करो,‘ सत्या ने मानो आदेश देते हुए कहा.

सभी सखियां अपने विचार प्रकट करने को उत्सुक थीं कि तभी द्वार पर दस्तक हुई. सुजाता को सामने खड़े देख कर सत्या सकपका गई. लगा, जैसे सुजाता दरवाजे के बाहर ही खड़ी उन की बातें सुन रही थी. पर दूसरे ही क्षण उस ने वह विचार झटक दिया. सुजाता ने उन की बातें सुनी होतीं,

तो क्या उस के चेहरे पर इतनी प्यारी मुसकान हो सकती थी. रोमा तो उसे देखते ही खिल उठी. ‘मिलो मेरे बचपन की सहेली सुजाता से. कुछ दिनों पहले ही हमारे कालेज में दाखिला लिया है,‘ रोमा ने सब से सुजाता का औपचारिक परिचय कराया.

‘हमें पता है,‘ वे बोलीं. हैलो, हाय और गर्मजोशी से हाथ मिला कर सब ने उस का स्वागत किया और पुन: पिकनिक की बातों में खो गईं. किस को क्या लाना है. यह निर्णय लिया गया. सुबह 5 बजे सब को मंदिर वाले चौराहे पर एकत्रित होना था. ‘सुजाता, तुम क्या लाओगी?‘ तभी सत्या ने प्रश्न किया.

‘पता नहीं, मैं आऊंगी भी या नहीं. मेरी मम्मी ने अभी अनुमति नहीं दी है. यदि आई तो तुम लोग जो कहोगी मैं ले आऊंगी.‘ सुजाता ने अपनी बात स्पष्ट की. ‘लो तुम आओगी ही नहीं तो लाओगी कैसे,‘ आभा ने प्रश्न किया.

‘उस की चिंता मत करो. सुजाता नहीं आई तो मैं ले आऊंगी,‘ रोमा ने आश्वासन दिया. ‘ठीक है, तुम दोनों मिल कर पूरियां ले आओ. सुजाता नहीं आ रही हो, तो थोड़ी अधिक ले आना. पर तुम्हारी मम्मी ने अभी तक अनुमति क्यों नहीं दी.‘

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मोह का जाल – भाग 5 : क्यों लड़खड़ाने लगा तनु के पैर

मन हाहाकार कर उठा था. एक को तो उस ने स्वयं ठुकरा दिया और दूसरी स्वयं उसे छोड़ कर चली गई. प्रकृति ने उसे उस के अमानवीय व अमानुषिक कृत्य के लिए दंड दे दिया था. अब मुझे भी प्रतीक्षित के आने की प्रतीक्षा रहती. उस की स्मरणशक्ति व बुद्धि काफी तीव्र थी. जो एक बार बता देती, भूलता नहीं था. किसी भी नई चीज, नई वस्तु को देख कर उस के उपयोग के बारे में बालसुलभ जिज्ञासा से पूछता तथा मैं भी यभासंभव उस के प्रश्नों का समाधान करती.

स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी थी. मेरी सहायता से प्रतीक्षित ने मौडल बनाया. मौडल देख कर वह अत्यंत प्रसन्न था.

प्रदर्शनी के पश्चात वह सीधा मेरे घर आया. मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. मैं अपने शयनकक्ष में लेटी आराम कर रही थी. दौड़ता हुआ आया व खुशी से चिल्लाता हुआ बोला, ‘‘डाक्टर आंटी, आप कहां हो? देखो, मुझे प्रथम पुरस्कार मिला है. और आंटी, गवर्नर ने हमारी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था और उन्होंने ही पुरस्कार दिया. आप को मालूम है, उन के साथ मेरी फोटो भी खिंची है. उन्होंने मेरी बहुत प्रशंसा की,’’ पलंग पर बैठते हुए उस ने कहा, ‘‘आप की तबीयत खराब है क्या?’’

‘‘लगता है थोड़ा बुखार हो गया है. ठीक हो जाएगा.’’

‘‘आप सब की देखभाल करती हैं किंतु अपनी नहीं,’’ तभी उस की नजर स्टूल पर रखे फोटो पर गई. हाथ में उठा कर बोला, ‘‘आंटी, यह तसवीर तो पापा की है, साथ में आप भी हैं. इस में आप दोनों जवान लग रहे हैं. यह तसवीर आप ने कब और क्यों खिंचवाई?’’

जिस का मुझे डर था वही हुआ, इसीलिए कभी उसे शयनकक्ष में नहीं लाती थी. वह फोटो मेरी अहम संतुष्टि का साधन बनी थी, सो, चाह कर भी अंदर नहीं रख पाई थी. मेरा अब कोई संबंध भी नहीं था मनुज से, लेकिन यदि तथ्य को छिपाने का प्रयत्न करती तो वह कभी संतुष्ट न हो पाता तथा कालांतर में मेरी उजली छवि में दाग लग सकता था. सो, सबकुछ सचसच बताना पड़ा.

वस्तुस्थिति जान कर वह उबल पड़ा था कि यह डैडी ने अच्छा नहीं किया. मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि डैडी ऐसा भी कर सकते हैं. मैं अभी डैडी से जा कर इस का उत्तर मांगता हूं कि उन्होंने आप के साथ ऐसा क्यों किया? मैं बीमार हो जाऊं तो क्या वे मुझे भी छोड़ देंगे? वह जाने को उद्यत हुआ. मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बेटा, मैं ने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा. जीवनपथ पर जैसे भी चली जा रही हूं, चलने दो, अब आखिरी पड़ाव पर मेरी भावनाओं, मेरे विश्वास, मेरे झूठे आत्मसम्मान को ठेस मत पहुंचाना तथा किसी से कुछ न कहना,’’ कहतेकहते एक बार फिर उस के सम्मुख आंसू टपक पड़े.

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा, मां, किंतु आप को न्याय दिलाने का प्रयत्न अवश्य करूंगा,’’ दृढ़ निश्चय व दृढ़ कदमों से वह कमरे से बाहर चला गया था.

किंतु उस के मुखमंडल से निकला, ‘मां’ शब्द उस के जाने के पश्चात भी वातावरण में गूंज कर उस की उपस्थिति का एहसास करा रहा था, कैसा था वह संबोधन… वह आवाज, उस की सारी चेतना…संपूर्ण अस्तित्व सिर्फ एक शब्द में खो गया था. जिस मोह के जाल को वर्षों पूर्व तोड़ आई थी, अनायास ही उस में फंसती जा रही थी…कैसा है यह बंधन? कैसे हैं ये रिश्ते? अनुत्तरित प्रश्न बारबार अंत:स्थल में प्रहार करने लगे थे.

सांप सीढ़ी – भाग 3 : प्रशांत के साथ क्या हुआ था?

बोर्ड बिछ गया.

‘‘नानी, मेरी लाल गोटी, आप की पीली,’’ हर्ष ने अपनी पसंदीदा रंग की गोटी चुन ली.

‘‘ठीक है,’’ मौसी ने कहा.

‘‘पहले पासा मैं फेंकूंगा,’’ हर्ष बहुत ही उत्साहित लग रहा था.

दोनों खेलने लगे. हर्ष जीत की ओर अग्रसर हो रहा था कि सहसा उस के फेंके पासे में 4 अंक आए और 99 के अंक पर मुंह फाड़े पड़ा सांप उस की गोटी को निगलने की तैयारी में था. हर्ष चीखा, ‘‘नानी, हम नहीं मानेंगे, हम फिर से पासा फेंकेंगे.’’

‘‘बिलकुल नहीं. अब तुम वापस 6 पर जाओ,’’ मौसी भी जिद्दी स्वर में बोलीं.

दोनों में वादप्रतिवाद जोरशोर से चलने लगा. मैं हैरान, मौसी को हो क्या गया है. जरा से बच्चे से मामूली बात के लिए लड़ रही हैं. मुझ से रहा नहीं गया. आखिर बीच में बोल पड़ी, ‘‘मौसी, फेंकने दो न उसे फिर से पासा, जीतने दो उसे, खेल ही तो है.’’

‘‘यह तो खेल है, पर जिंदगी तो खेल नहीं है न,’’ मौसी थकेहारे स्वर में बोलीं.

मैं चुप. मौसी की बात बिलकुल समझ में नहीं आ रही थी.

‘‘सुनो शोभा, बच्चों को हार सहने की भी आदत होनी चाहिए. आजकल परिवार बड़े नहीं होते. एक या दो बच्चे, बस. उन की हर आवश्यकता हम पूरी कर सकते हैं. जब तक, जहां तक हमारा वश चलता है, हम उन्हें हारने नहीं देते, निराशा का सामना नहीं करने देते. लेकिन ऐसा हम कब तक कर सकते हैं? जैसे ही घर की दहलीज से निकल कर बच्चे बाहर की प्रतियोगिता में उतरते हैं, हर बार तो जीतना संभव नहीं है न,’’ मौसी ने कहा.

मैं उन की बात का अर्थ आहिस्ताआहिस्ता समझती जा रही थी.

‘‘तुम ने गौतम बुद्ध की कहानी तो सुनी होगी न, उन के मातापिता ने उन के कोमल, भावुक और संवेदनशील मन को इस तरह सहेजा कि युवावस्था तक उन्हें कठोर वास्तविकताओं से सदा दूर ही रखा और अचानक जब वे जीवन के 3 सत्य- बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु से परिचित हुए तो घबरा उठे. उन्होंने संसार का त्याग कर दिया, क्योंकि संसार उन्हें दुखों का सागर लगने लगा. पत्नी का प्यार, बच्चे की ममता और अथाह राजपाट भी उन्हें रोक न सका.’’

मौसी की आंखों से अविरल अश्रुधार बहती जा रही थी, ‘‘पंछी भी अपने नन्हे बच्चों को उड़ने के लिए पंख देते हैं. तत्पश्चात उन्हें अपने साथ घोंसलों से बाहर उड़ा कर सक्षम बनाते हैं. खतरों से अवगत कराते हैं और हम इंसान हो कर अपने बच्चों को अपनी ममता की छांव में समेटे रहते हैं. उन्हें बाहर की कड़ी धूप का एहसास तक नहीं होने देते. एक दिन ऐसा आता है जब हमारा आंचल छोटा पड़ जाता है और उन की महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी. तब क्या कमजोर पंख ले कर उड़ा जा सकता है भला?’’

मौसी अपनी रौ में बोलती जा रही थीं. उन के कंधे पर मैं ने अपना हाथ रख कर आर्द्र स्वर में कहा, ‘‘रहने दो मौसी, इतना अधिक न सोचो कि दिमाग की नसें ही फट जाएं.’’

‘‘नहीं, आज मुझे स्वीकार करने दो,’’ मौसी मुझे रोकते हुए बोलीं, ‘‘प्रशांत को पालनेपोसने में भी हम से बड़ी गलती हुई. बचपन से खेलखेल में भी हम खुद हार कर उसे जीतने का मौका देते रहे. एकलौता था, जिस चीज की फरमाइश करता, फौरन हाजिर हो जाती. उस ने सदा जीत का ही स्वाद चखा. ऐसे क्षेत्र में वह जरा भी कदम न रखता जहां हारने की थोड़ी भी संभावना हो.’’ मौसी एक पल के लिए रुकीं, फिर जैसे कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘जानती हो, उस ने आत्महत्या क्यों की? उसे जिस बड़ी कंपनी में नौकरी चाहिए थी, वहां उसे नौकरी नहीं मिली. भयंकर बेरोजगारी के इस जमाने में मनचाही नौकरी मिलना आसान है क्या? अब तक सदा सकारात्मक उत्तर सुनने के आदी प्रशांत को इस मामूली असफलता ने तोड़ दिया और उस ने…’’

मौसी दोनों हाथों में मुंह छिपा कर फूटफूट कर रो पड़ीं. मैं ने उन का सिर अपनी गोद में रख लिया.

मौसी का आत्मविश्लेषण बिलकुल सही था और मेरे लिए सबक. मां के अनुशासन तले दबीसिमटी मैं हर्ष के लिए कुछ ज्यादा ही उन्मुक्तता की पक्षधर हो गई थी. उस की उचित, अनुचित, हर तरह की फरमाइशें पूरी करने में मैं धन्यता अनुभव करती. परंतु क्या यह ठीक था?

मां और पिताजी ने हमें अनुशासन में रखा. हमारी गलतियों की आलोचना की. बचपन से ही गिनती के खिलौनों से खेलने की, उन्हें संभाल कर रखने की आदत डाली. प्यार दिया पर गलतियों पर सजा भी दी. शौक पूरे किए पर बजट से बाहर जाने की कभी इजाजत नहीं दी. सबकुछ संयमित, संतुलित और सहज. शायद इस तरह से पलनेबढ़ने से ही मुझ में एक आत्मबल जगा. अब तक तो इस बात का एहसास भी नहीं हुआ था पर शायद इसी से एक संतुलित व्यक्तित्व की नींव पड़ी. शादी के समय भी कई बार नकारे जाने से मन ही मन दुख तो होता था पर इस कदर नहीं कि जीवन से आस्था ही उठ जाए.

मैं गंभीर हो कर मौसी के बाल, उन की पीठ सहलाती जा रही थी.

हर्ष विस्मय से हम दोनों की इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया को देख रहा था. उसे शायद लगा कि उस के ईमानदारी से न खेलने के कारण ही मौसी को इतना दुख पहुंचा है और उस ने चुपचाप अपनी गोटी 99 से हटा कर 6 पर रख दी और मौसी से खेलने के लिए फिर उसी उत्साह से अनुरोध करने लगा.

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