Hindi Story: आलू वड़ा – मामी ने दीपक के साथ क्या किया

Hindi Story: ‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई.

पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, मझले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया. मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने झट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था. Hindi Story

Hindi Family Story: लिफाफाबंद चिट्ठी – क्या था उस पत्र में

Hindi Family Story: मैंने घड़ी देखी. अभी लगभग 1 घंटा तो स्टेशन पर इंतजार करना ही पड़ेगा. कुछ मैं जल्दी आ गया था और कुछ ट्रेन देरी से आ रही थी. इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो एक बैंच खाली नजर आ गई. मैं ने तुरंत उस पर कब्जा कर लिया. सामान के नाम पर इकलौता बैग सिरहाने रख कर मैं पांव पसार कर लेट गया. अकेले यात्रा का भी अपना ही आनंद है. सामान और बच्चों को संभालने की टैंशन नहीं. आराम से इधरउधर ताकाझांकी भी कर लो.

स्टेशन पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी. पर जैसे ही कोई ट्रेन आने को होती, एकदम हलचल मच जाती. कुली, ठेले वाले एकदम चौकन्ने हो जाते. ऊंघते यात्री सामान संभालने लगते. ट्रेन के रुकते ही यात्रियों के चढ़नेउतरने का सिलसिला शुरू हो जाता. उस समय यह निश्चित करना मुश्किल हो जाता था कि ट्रेन के अंदर ज्यादा भीड़ है या बाहर? इतने इतमीनान से यात्रियों को निहारने का यह मेरा पहला अवसर था. किसी को चढ़ने की जल्दी थी, तो किसी को उतरने की. इस दौरान कौन खुश है, कौन उदास, कौन चिंतित है और कौन पीडि़त यह देखनेसमझने का वक्त किसी के पास नहीं था.

किसी का पांव दब गया, वह दर्द से कराह रहा है, पर रौंदने वाला एक सौरी कह चलता बना. ‘‘भैया जरा साइड में हो कर सहला लीजिए,’’ कह कर आसपास वाले रास्ता बना कर चढ़नेउतरने लगे. किसी को उसे या उस के सामान को चढ़ाने की सुध नहीं थी. चढ़ते वक्त एक महिला की चप्पलें प्लेटफार्म पर ही छूट गईं. वह चप्पलें पकड़ाने की गुहार करती रही. आखिर खुद ही भीड़ में रास्ता बना कर उतरी और चप्पलें पहन कर चढ़ी.

मैं लोगों की स्वार्थपरता देख हैरान था. क्या हो गया है हमारी महानगरीय संस्कृति को? प्रेम, सौहार्द और अपनेपन की जगह हर किसी की आंखों में अविश्वास, आशंका और अजनबीपन के साए मंडराते नजर आ रहे थे. मात्र शरीर एकदूसरे को छूते हुए निकल रहे थे, उन के मन के बीच का फासला अपरिमित था. मुझे सहसा कवि रामदरश मिश्र की वह उपमा याद आ गई, ‘कैसा है यह एकसाथ होना, दूसरे के साथ हंसना न रोना. क्या हम भी लैटरबौक्स की चिट्ठियां बन गए हैं?’

इस कल्पना के साथ ही स्टेशन का परिदृश्य मेरे लिए सहसा बदल गया. शोरशराबे वाला माहौल निस्तब्ध शांति में तबदील हो गया. अब वहां इंसान नहीं सुखदुख वाली अनंत चिट्ठियां अपनीअपनी मंजिल की ओर धीरेधीरे बढ़ रही थीं. लेकिन कोई किसी से नहीं बोल रही थी. मैं मानो सपनों की दुनिया में विचरण करने लगा था.

‘‘हां, यहीं रख दो,’’ एक नारी स्वर उभरा और फिर ठकठक सामान रखने की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. गोद में छोटे बच्चे को पकड़े एक संभ्रांत सी महिला कुली से सामान रखवा रही थी. बैंच पर बैठने का उस का मंतव्य समझ मैं ने पांव समेट लिए और जगह बना दी. वह धन्यवाद दे कर मुसकान बिखेरती हुई बच्चे को ले कर बैठ गई. एक बार उस ने अपने सामान का अवलोकन किया. शायद गिन रही थी पूरा आ गया है या नहीं? फिर इतमीनान से बच्चे को बिस्कुट खिलाने लगी.

यकायक उस महिला को कुछ खयाल आया. उस ने अपनी पानी की बोतल उठा कर हिलाई. फिर इधरउधर नजरें दौड़ाईं. दूर पीने के पानी का नल और कतार नजर आ रहें थे. उस की नजरें मुड़ीं और आ कर मुझ पर ठहर गईं. मैं उस का मंतव्य समझ नजरें चुराने लगा. पर उस ने मुझे पकड़ लिया, ‘‘भाई साहब, बहुत जल्दी में घर से निकलना हुआ तो बोतल नहीं भर सकी. प्लीज, आप भर लाएंगे?’’

एक तो अपने आराम में खलल की वजह से मैं वैसे ही खुंदक में था और फिर ऊपर से यह बेगार. मेरे मन के भाव शायद मेरे चेहरे पर लक्षित हो गए थे. इसलिए वह तुरंत बोल पड़ी, ‘‘अच्छा रहने दीजिए. मैं ही ले आती हूं. आप थोड़ा टिंकू को पकड़ लेंगे?’’

वह बच्चे को मेरी गोद में पकड़ाने लगी, तो मैं झटके से उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं ही ले आता हूं,’’ कह कर बोतल ले कर रवाना हुआ तो मन में एक शक का कीड़ा बुलबुलाया कि कहीं यह कोई चोरउचक्की तो नहीं? आजकल तो चोर किसी भी वेश में आ जाते हैं. पीछे से मेरा बैग ही ले कर चंपत न हो जाए? अरे नहीं, गोद में बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कहां भाग सकती है? लो, बन गए न बेवकूफ? अरे, ऐसों का पूरा गिरोह होता है. महिलाएं तो ग्राहक फंसाती हैं और मर्द सामान ले कर चंपत. मैं ठिठक कर मुड़ कर अपना सामान देखने लगा.

‘‘मैं ध्यान रख रही हूं, आप के सामान का,’’ उस ने जोर से कहा.

मैं मन ही मन बुदबुदाया कि इसी बात का तो डर है. कतार में खड़े और बोतल भरते हुए भी मेरी नजरें अपने बैग पर ही टिकी रहीं. लौट कर बोतल पकड़ाई, तो उस ने धन्यवाद कहा. फिर हंस कर बोली, ‘‘आप से कहा तो था कि मैं ध्यान रख रही हूं. फिर भी सारा वक्त आप की नजरें इसी पर टिकी रहीं.’’

अब मैं क्या कहता? ‘खैर, कर दी एक बार मदद, अब दूर रहना ही ठीक है,’ सोच कर मैं मोबाइल में मैसेज पढ़ने लगा. यह अच्छा जरिया है आजकल, भीड़ में रहते हुए भी निस्पृह बने रहने का.

‘‘आप बता सकते हैं कोच नंबर 3 कहां लगेगा?’’ उस ने मुझ से फिर संपर्कसूत्र जोड़ने की कोशिश की.

‘‘यहीं या फिर थोड़ा आगे,’’ सूखा सा जवाब देते वक्त अचानक मेरे दिमाग में कुछ चटका कि ओह, यह भी मेरे ही डब्बे में है? मेरी नजरें उस के ढेर सारे सामान पर से फिसलती हुईं अपने इकलौते बैग पर आ कर टिक गईं. अब यदि इस ने अपना सामान चढ़वाने में मदद मांगी या बच्चे को पकड़ाया तो? बच्चू, फूट ले यहां से. हालांकि ट्रेन आने में अभी 10 मिनट की देर थी. पर मैं ने अपना बैग उठाया और प्लेटफार्म पर टहलने लगा.

कुछ ही देर में ट्रेन आ पहुंची. मैं लपक कर डब्बे में चढ़ा और अपनी सीट पर जा कर पसर गया. अभी मैं पूरी तरह जम भी नहीं पाया था कि उसी महिला का स्वर सुनाई दिया, ‘‘संभाल कर चढ़ाना भैया. हां, यह सूटकेस इधर नीचे डाल दो और उसे ऊपर चढ़ा दो… अरे भाई साहब, आप की भी सीट यहीं है? चलो, अच्छा है… लो भैया, ये लो अपने पूरे 70 रुपए.’’

मैं ने देखा वही कुली था. पैसे ले कर वह चला गया. महिला मेरे सामने वाली सीट पर बच्चे को बैठा कर खुद भी बैठ गई और सुस्ताने लगी. मुझे उस से सहानुभूति हो आई कि बेचारी छोटे से बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कैसे अकेले सफर कर रही है? पर यह सहानुभूति कुछ पलों के लिए ही थी. परिस्थितियां बदलते ही मेरा रुख भी बदल गया. हुआ यों कि टी.टी. आया तो वह उस की ओर लपकी. बोली, ‘‘मेरी ऊपर वाली बर्थ है. तत्काल कोटे में यही बची थी. छोटा बच्चा साथ है, कोई नीचे वाली सीट मिल जाती तो…’’

मेरी नीचे वाली बर्थ थी. कहीं मुझे ही बलि का बकरा न बनना पड़े, सोच कर मैं ने तुरंत मोबाइल निकाला और बात करने लगा. टी.टी. ने मुझे व्यस्त देख पास बैठे दूसरे सज्जन से पूछताछ आरंभ कर दी. उन की भी नीचे की बर्थ थी. वे सीटों की अदलाबदली के लिए राजी हो गए, तो मैं ने राहत की सांस ले कर मोबाइल पर बात समाप्त की. वे सज्जन एक उपन्यास ले कर ऊपर की बर्थ पर जा कर आराम से लेट गए. महिला ने भी राहत की सांस ली.

‘‘चलो, यह समस्या तो हल हुई… मैं जरा टौयलेट हो कर आती हूं. आप टिंकू को देख लेंगे?’’ बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह उठ कर चल दी. मुझ जैसे सज्जन व्यक्ति से मानो इनकार की तो उसे उम्मीद ही नहीं थी.

मैं ने सिर थाम लिया कि इस से तो मैं सीट बदल लेता तो बेहतर था. मुझे आराम से उपन्यास पढ़ते उन सज्जन से ईर्ष्या होने लगी. उस महिला पर मुझे बेइंतहा गुस्सा आ रहा था कि क्या जरूरत थी उसे एक छोटे बच्चे के संग अकेले सफर करने की? मेरे सफर का सारा मजा किरकिरा कर दिया. मैं बैग से अखबार निकाल कर पढ़े हुए अखबार को दोबारा पढ़ने लगा. वह महिला तब तक लौट आई थी.

‘‘मैं जरा टिंकू को भी टौयलेट करा लाती हूं. सामान का ध्यान तो आप रख ही रहे हैं,’’ कहते हुए वह बच्चे को ले कर चली गई. मैं ने अखबार पटक दिया और बड़बड़ाया कि हां बिलकुल. स्टेशन से बिना पगार का नौकर साथ ले कर चढ़ी हैं मैडमजी, जो कभी इन के बच्चे का ध्यान रखेगा, कभी सामान का, तो कभी पानी भर कर लाएगा…हुंह.

तभी पैंट्रीमैन आ गया, ‘‘सर, आप खाना लेंगे?’’

‘‘हां, एक वैज थाली.’’

वह सब से पूछ कर और्डर लेने लगा. अचानक मुझे उस महिला का खयाल आया कि यदि उस ने खाना और्डर नहीं किया तो फिर स्टेशन से मुझे ही कुछ ला कर देना पड़ेगा या शायद शेयर ही करना पड़ जाए. अत: बोला, ‘‘सुनो भैया, उधर टौयलेट में एक महिला बच्चे के साथ है. उस से भी पूछ लेना.’’

कुछ ही देर में बच्चे को गोद में उठाए वह प्रकट हो गई, ‘‘धन्यवाद, आप ने हमारे खाने का ध्यान रखा. पर हमें नहीं चाहिए. हम तो घर से काफी सारा खाना ले कर चले हैं. वह रामधन है न, हमारे बाबा का रसोइया उस ने ढेर सारी सब्जी व पूरियां साथ रख दी हैं. बस, जल्दीजल्दी में पानी भरना भूल गया, बल्कि हम तो कह रहे हैं आप भी मत मंगाइए. हमारे साथ ही खा लेना.’’

मैं ने कोई जवाब न दे कर फिर से अखबार आंखों के आगे कर लिया और सोचने लगा कि या तो यह महिला निहायत भोली है या फिर जरूरत से ज्यादा शातिर. हो सकता है खाने में कुछ मिला कर लाई हो. पहले भाईचारा गांठ रही है और फिर… मुझे सावधान रहना होगा. इस का आज का शिकार निश्चितरूप से मैं ही हूं.

जबलपुर स्टेशन आने पर खाना आ गया था. मैं कनखियों से उस महिला को खाना निकालते और साथ ही बच्चे को संभालते देख रहा था. पर मैं जानबूझ कर अनजान बना अपना खाना खाता रहा.

‘‘थोड़ी सब्जीपूरी चखिए न. घर का बना खाना है,’’ उस ने इसरार किया.

‘‘बस, मेरा पेट भर गया है. मैं तो नीचे स्टेशन पर चाय पीने जा रहा हूं,’’ कह मैं फटाफट खाना खत्म करते हुए वहां से खिसक लिया कि कहीं फिर पानी या और कुछ न मंगा ले.

‘‘हांहां, आराम से जाइए. मैं आप के सामान का खयाल रख लूंगी.’’

‘ओह, बैग के बारे में तो भूल ही गया था. इस की नजर जरूर मेरे बैग पर है. पर क्या ले लेगी? 4 जोड़ी कपड़े ही तो हैं. यह अलग बात है कि सब अच्छे नए जोड़े हैं और आज के जमाने में तो वे ही बहुत महंगे पड़ते हैं. पर छोड़ो, बाहर थोड़ी आजादी तो मिलेगी. इधर तो दम घुटने लगा है,’ सोचते हुए मैं नीचे उतर गया. चाय पी तो दिमाग कुछ शांत हुआ. तभी मुझे अपना एक दोस्त नजर आ गया. वह भी उसी गाड़ी में सफर कर रहा था और चाय पीने उतरा था. बातें करते हुए मैं ने उस के संग दोबारा चाय पी. मेरा मूड अब एकदम ताजा हो गया था. हम बातों में इतना खो गए कि गाड़ी कब खिसकने लगी, हमें ध्यान ही न रहा. दोस्त की नजर गई तो हम भागते हुए जो डब्बा सामने दिखा, उसी में चढ़ गए. शुक्र है, सब डब्बे अंदर से जुड़े हुए थे. दोस्त से विदा ले कर मैं अपने डब्बे की ओर बढ़ने लगा. अभी अपने डब्बे में घुसा ही था कि एक आदमी ने टोक दिया, ‘‘क्या भाई साहब, कहां चले गए थे? आप की फैमिली परेशान हो रही है.’’

आगे बढ़ा तो एक वृद्ध ने टोक दिया, ‘‘जल्दी जाओ बेटा. बेचारी के आंसू निकलने को हैं,’’ अपनी सीट तक पहुंचतेपहुंचते लोगों की नसीहतों ने मुझे बुरी तरह खिझा दिया था.

मैं बरस पड़ा, ‘‘नहीं है वह मेरी फैमिली. हर किसी राह चलते को मेरी फैमिली बना देंगे आप?’’

‘‘भैया, वह सब से आप का हुलिया बताबता कर पूछ रही थी, चेन खींचने की बात कर रही थी. तब किसी ने बताया कि आप जल्दी में दूसरे डब्बे में चढ़ गए हैं. चेन खींचने की जरूरत नहीं है, अभी आ जाएंगे तब कहीं जा कर मानीं,’’ एक ने सफाई पेश की.

‘‘क्या चाहती हैं आप? क्यों तमाशा बना रही हैं? मैं अपना ध्यान खुद रख सकता हूं. आप अपना और अपने बच्चे का ध्यान रखिए. बहुत मेहरबानी होगी,’’ मैं ने गुस्से में उस के आगे हाथ जोड़ दिए.

इस के बाद पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला. एक दमघोंटू सी चुप्पी हमारे बीच पसरी रही. मुझे लग रहा था मैं अनावश्यक ही उत्तेजित हो गया था. पर मैं चुप रहा. मेरा स्टेशन आ गया था. मैं उस पर फटाफट एक नजर भी डाले बिना अपना बैग उठा कर नीचे उतर गया. अपना वही दोस्त मुझे फिर नजर आ गया तो मैं उस से बतियाने रुक गया. हम वहीं खड़े बातें कर रहे थे कि एक अपरिचित सज्जन मेरी ओर बढ़े. उन की गोद में उसी बच्चे को देख मैं ने अनुमान लगा लिया कि वे उस महिला के पति होंगे.

‘‘किन शब्दों में आप को धन्यवाद दूं? संजना बता रही है, आप ने पूरे रास्ते उस का और टिंकू का बहुत खयाल रखा. वह दरअसल अपने बीमार बाबा के पास पीहर गई हुई थी. मैं खुद उसे छोड़ कर आया था. यहां अचानक मेरे पापा को हार्टअटैक आ गया. उन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ा. संजना को पता चला तो आने की जिद पकड़ बैठी. मैं ने मना किया कि कुछ दिनों बाद मैं खुद लेने आ जाऊंगा पर उस से रहा नहीं गया. बस, अकेले ही चल पड़ी. मैं कितना फिक्रमंद हो रहा था…’’

‘‘मैं ने कहा था न आप को फिक्र की कोई बात नहीं है. हमें कोई परेशानी नहीं होगी. और देखो ये भाई साहब मिल ही गए. इन के संग लगा ही नहीं कि मैं अकेली सफर कर रही हूं.’’

मैं असहज सा महसूस करने लगा. मैं ने घड़ी पर नजर डाली, ‘‘ओह, 5 बज गए. मैं चलता हूं… क्लाइंट निकल जाएगा,’’ कहते हुए मैं आगे बढ़ते यात्रियों में शामिल हो गया. लिफाफाबंद चिट्ठियों की भीड़ में एक और चिट्ठी शुमार हो गई थी. Hindi Family Story

Hindi Family Story: सुबह अभी हुई नहीं थी – आखिर दीदी को क्या बताना चाहती थी मीनल

Hindi Family Story: सूरज निकलने में अभी कुछ वक्त और था. रात के कालेपन और सुबह के उजालेपन के बीच जो धूसर होता है वह अपने चरम पर चमक रहा था. चारों तरफ एक सर्द खामोशी छाई हुई थी. इस मुरदा सी खामोशी का हनन तब हुआ जब मीनल एकाएक हड़बड़ा कर उठ बैठी. वह कुछ इस तरह कांप रही थी जैसे उस के शरीर के भीतर बिजली सी कौंधी हो. उस की सांसें लगभग दौड़ रही थीं.

अपने आसपास देख उसे कुछ राहत हुई और उस ने तसल्ली जैसी किसी चीज की ठंडी आह भरी. वह एक बुरा सपना था. उसे अपने सपने पर खीज हो आई. ज्यादा खीज शायद इस बाबत कि आज भी कोई बुरा सपना आने पर वह बच्चों सी सहम जाती है. उस ने घड़ी की और देखा तो एक नई निराशा ने उसे घेर लिया. वह घंटों का जोड़भाग करती कि उसे याद हो आया की कमरे में वह अकेली नहीं है. उसे हैरत हुई कि जो कुछ सामने हो उसे कितनी आसानी से भूला जा सकता है. वह धीमे कदमों से हौल की तरफ बढ़ी. उसे यह देख राहत हुई की उस की हलचल से रजत की नींद में कोई खलल नहीं पड़ा था.

वह अपना सपना भूल एकटक रजत को निहारने लगी. जिसे आप प्रेम करते हों उसे चैन से सोते हुए देखना भी अपनेआप में एक बहुत बड़ा सुख होता है. वह खड़ी हुई और धीमे कदमों से, पूरी सावधानी बरतते हुए ताकि कोई शोर न हो, कमरे में टहलने लगी. अनायास ही कांच की लंबी खिड़की के सामने आ कर उस के कदम ठिठक गए. उस की नजर कांच की लंबी खिड़की से बाहर पड़ी तो उस की आखों में जादू भर आया.

खूब घने पाइन और देवदार के पेड़. हर जगह बर्फ और धीमी पड़ती बर्फबारी. दूर शून्य में दिखती हुई पहाड़ों की एक धुंधली सी परछाई. उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह लैंडस्केप वास्तविकता में न हो कर किसी महान चित्रकार की उस के सामने की गई कोई पेंटिंग हो. यह नायाब नजारा धीरेधीरे उस के भीतर उतरने लगा.

अब उस के और इस अद्भुत नजारे के बीच बस कांच का एक टुकड़ा था, जैसे वह अपनी पूरी ताकत लगा बाहर की दुनिया के खुलेपन को मीनल के भीतर के बंद से मैला होने से बचाने की जद्दोजेहद में हो. मीनल को लगा जैसे उस की अपनी इस दुनिया से केवल 2 कदम दूर कोई दूसरी, बहुत ही खूबसूरत दुनिया बसती है, जैसे पहली बार उस की अपनी दुनिया और वह जिस दुनिया में होना चाहती है उन के बीच एक ऐसा फासला है जिसे वह सचमुच तय कर सकती है. उस ने मन ही मन कुछ निश्चय किया और शायद वहीं कुछ एक चिट में लिख शीशे पर चिपका कर और ठंड के मुताबिक कपड़े पहन अपने कमरे से बाहर आ गई.

मीनल को इस वक्त कोई जल्दी नहीं थी. वह बर्फ की फिसलन से बचते हुए, धीमे और सधे कदमों से आगे बढ़ने लगी. उस का बस चलता तो वह वक्त की धार को रोक इसी पल में सिमट जाती. शायद वह खुद को पूरा सोख लेना चाहती थी.

चलतेचलते उसे लगा कि यह वही समय है जब सबकुछ बहुत दूर नजर आता है, हमारी पहुंच से बिलकुल बाहर. रह जाते हैं केवल हम और बच जाता है हमारा नितांत अकेलापन या मीठा एकांत. वही समय है जो हमें परत दर परत खोलते हुए खुद ही के सामने उधेड़ कर रख देता है. हम अपने भीतर झांकते हैं, साहस से या किसी मजबूरीवश और खुद को आरपार देखते हैं.

पहले घड़ी देखने के बाद जो घंटों का हिसाब करना रह गया था, वह अब सालों के हिसाब का रूप ले चुका था. शायद सच ही है, जो कुछ भी हम सोचते हैं, करते हैं वह हम तक वापस लौटता है और वह भी इसी जीवन में.

मीनल चलते हुए बहुत दूर जा पहुंची थी और अब आसपास कोई जगह देखने लगी थी. जिस जगह वह बैठी वहां से दूर की पहाड़ियां भी एकदम साफ दिख रही थीं. शायद इसलिए ही उस ने यह जगह चुनी. उसे पहाड़ों से एक लगाव हमेशा से रहा था.

दूर पहाड़ियों की चोटियों पर पड़ी बर्फ की सफेद चादर उसे इस कदर आकर्षित करने लगी कि उस ने वह बर्फ नजदीक से देखने की जगह अगले जन्म बर्फ की चादर हो जाने की कामना की. होने को तो जिस पगडंडी पर चल कर वह इस जगह तक आई थी ढेर सारा बर्फ वहां भी जमा था, लेकिन उस की सतह से वह साफ सफेद होने की जगह धूल से मटमैली हो दागदार सी प्रतीत होती थी. यही कारण रहा होगा जिस की वजह से इस बर्फ ने उसे इस कदर प्रभावित नहीं किया. न ही उस ने इस बर्फ से गोले बना हाथों से कुछ खेलने की कोशिश की और न ही इस की छुअन के ठंडेपन को महसूस तक किया. वह उस के होने को जैसे नकार कर बिना कोई दिलचस्पी दिखाए आगे बढ़ती गई थी.

शायद जब हम किसी चीज को दूर से देखते हैं तो उस अनजान के झुरमुट में भी कुछ सुखद होने की आशा ही हमें विस्मित करती है. जब तक हम उस अनजान को नहीं जानते और उस के पास नहीं पहुंच जाते हमारा यह भ्रम बना रहता है और जैसे ही हम उस अनजान के नजदीक पहुंचते हैं हमारा यह भ्रम कुछ यों बिखरता है मानों भीतर बहुत कुछ टूट गया हो, ऐसा टूट जो किसी की नजर में आने का मोहताज नहीं होता. जिस टूट को केवल हम देख सकते हैं, जिस की पीड़ा केवल और केवल हम खुद महसूस कर सकते हैं.

पहाड़ों के सौंदर्य और सुनहले पुराने दिनों के बीच जरूर कोई अदृश्य लेकिन घनिष्ठ रिश्ता होता है, एक ऐसा रिश्ता जिस में कभी गांठें नहीं पड़तीं. मीनल को भी पहाड़ों की गोद में बैठ बीते किस्से याद हो आए. जीवन भले ही गंदे पानी के तलाब की तरह ही क्यों न रहा हो, उस गंदे से गंदे कीचड़ के बीच भी कुछ हसीन यादें दिलकश कमल की तरह उग आती हैं और यादें भी वे जिन के गुजरते वक्त हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि ये हमारे जेहन का हिस्सा बन हमारे अंत तक साथ रहेंगी और जिन से लिपट कर हम अपना सारा जीवन गुजार देना चाहेंगे.

याद आए किस्से अमूमन किसी बीते हुए प्रेम के होने चाहिए थे, किसी प्रेमी के होने चाहिए थे. लेकिन बादलों में मीनल को जो आकृति दिखाई दी वह बड़की दीदी की थी. उस ने एक गहरी सांस अंदर खींची और कस कर आंखें भींच लीं लेकिन इस के बाद भी पलकों के घने अंधेरेपन में जब बड़की दीदी नजर आईं तो वह कुछ कांप गई. उस ने कुछ धीरे से आंखें खोलीं.
यों बड़की दीदी को याद करने की कोई खास वजह नहीं थी. और इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं. पर शायद हमारी जिंदगी के कुछ चुनिंदा खास लोग हमें इसी तरह याद आते हैं, बेवजह और बेवक्त.

बड़की दीदी से उस की 1 अरसे से मुलाकात नहीं हुई है. उसे अचरज हुआ कि इतना समय बीत जाने पर भी उन की छोड़ी छाप अमिट थी. बीते हुए दिन और ज्यादा पुरजोर तरीके से उस के सामने तैरने लगे थे. अतीत और वर्तमान के बीच की रेखा मद्धिम होती हुई एकदम धुंधली पड़ चुकी थी. वह बड़की दीदी को घर की कोई बात बता रही थी. जरूर कोई ऐसी बात रही होगी जिस के लिए मां ने उसे कहा होगा कि यह किसी को मत कहना. हर परिवार के अपने कुछ राज होते हैं. लेकिन बड़की दीदी भी तो उस परिवार में शामिल थीं. बड़की दीदी को वह बात कहते हुए उस की आवाज में कोई संकोच नहीं था और न ही कोई लागलपेट थी. वह बेधड़क हो धड़ल्ले से बोल रही थी.

बड़की दीदी एकमात्र इंसान थीं जिन के सामने वह अपनी हर बात रख सकती थी. जिन के सामने वह खुल कर रो सकती थी और जिंदगी में किसी ऐसे इंसान का होना जिस के सामने आप खुल कर रो सकें, किसी वरदान से कम नहीं हुआ करता

एक बार उस ने बड़की दीदी से कहा था,”काश, इंसान ने कोई ऐसी वाशिंग मशीन भी बनाई होती जिस में मैले हुए रिश्तों को चमकाया जा सकता, उस के सारे दागधब्बे साफ किए जा सकते और सारी गिरहें खोली जा सकतीं…”

बड़की दीदी उस से सहमत नहीं थीं. उन्होंने कहा था,”बिना गिरहों का रिश्ता कभी मुकम्मल नहीं होता. जब तक 2 लोग उन गिरहों को खोलने का खुद तकल्लुफ न उठाएं या उन गिरहों के साथ भी अपने रिश्तों को न सहेज पाएं वह रिश्ता मुकम्मल कैसे होगा…”

कई बार मीनल ने सोचा था कि बड़की दीदी उन के रिश्ते की गिरहें खोलने का प्रयास क्यों नहीं करतीं? पर उन के रिश्ते में दूरियां किस दिन या किस बाबत आईं इस पर ठीकठीक उंगली रखना मुमकिन नहीं है. कई बार रिश्तों में किसी की कोई गलती नहीं होती, वह रिश्ता धीरेधीरे स्वयं खोखला हो जाता है या समय की बली चढ़ जाता है. क्या प्रयास कर एक मरे हुए रिश्ते को जिंदा किया जा सकता है…

मीनल ने खुद को झंझोरा,’बड़की दीदी कहां सोचती होंगी मेरे बारे में, कहां मुझे याद करती होंगी? इतने सालों में एक फोन नहीं, एक मैसेज नहीं. क्या उन्हें कभी मेरी कमी महसूस नहीं हुई? मैं कैसी हूं यह जानने की इच्छा नहीं हुई? इतनी खट्टीमीठी स्मृतियां, साथ बिताए साल क्या सबकुछ… ‘

सवाल खुद से था, तो जवाब भी खुद ही देना था,’लेकिन मैं ने भी कहां किया उन से संपर्क? शायद उन्होंने भी कई दफा सोचा हो पर न कर सकी हों. अकसर रोजमर्रा की जिम्मेदारियां पुराने रिश्तों पर हावी हो जाया करती हैं…’ उस ने खुद ही को समझाने की कोशिश की.

उस ने अपने फोन में वह मैसेज खोला, जो वह लिख कर कई बार पढ़ चुकी है. वह मैसेज जो उस ने बड़की दीदी को लिखा तो था लेकिन कभी भेज नहीं सकी. वह यह सब सोचते हुए बर्फ में ही लेट गई. फिर अचानक लगा कि वह कुछ निश्चय करती इतने मे उसे रजत की आवाज करीब आती सुनाई दी,”मीनल, यह क्या… तुम्हारी सफेद जैकेट तो धूल में सन गई है. चलो, अब जल्दी इसे बदल लो फिर घूमने भी जाना है…” Hindi Family Story

Hindi Family Story: खडूस मकान मालकिन – क्या था आंटी का सच

Hindi Family Story: ‘‘साहबजी, आप अपने लिए मकान देख रहे हैं?’’ होटल वाला राहुल से पूछ रहा था. पिछले 2 हफ्ते से राहुल एक धर्मशाला में रह रहा था. दफ्तर से छुट्टी होने के बाद वह मकान ही देख रहा था. उस ने कई लोगों से कह रखा था. होटल वाला भी उन में से एक था. होटल का मालिक बता रहा था कि वेतन स्वीट्स के पास वाली गली में एक मकान है, 2 कमरे का. बस, एक ही कमी थी… उस की मकान मालकिन.

पर होटल वाले ने इस का एक हल निकाला था कि मकान ले लो और साथ में दूसरा मकान भी देखते रहो. उस मकान में कोई 2 महीने से ज्यादा नहीं रहा है.

‘‘आप मकान बता रहे हो या डरा रहे हो?’’ राहुल बोला, ‘‘मैं उस मकान को देख लूंगा. धर्मशाला से तो बेहतर ही रहेगा.’’

अगले दिन दफ्तर के बाद राहुल अपने एक दोस्त प्रशांत के साथ मकान देखने चला गया. मकान उसे पसंद था, पर मकान मालकिन ने यह कह कर उस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि रात को 10 बजे के बाद गेट नहीं खुलेगा.

राहुल ने सोचा, ‘मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर देर रात हो जाती है…’ वह बोला, ‘‘आंटी, मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर रात को देर हो सकती है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ आंटी बोलीं, ‘‘अगर पसंद न हो, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल कुछ देर खड़ा रहा और बोला, ‘‘आंटी, आप उस हिस्से में एक गेट और लगवा दो. उस की चाबी मैं अपने पास रख लूंगा.’’

आंटी ने अपनी मजबूरी बता दी, ‘‘मेरे पास खर्च करने के लिए एक भी पैसा नहीं है.’’

राहुल ने गेट बनाने का सारा खर्च खुद उठाने की बात की, तो आंटी राजी हो गईं. इस के साथ ही उस ने झगड़े की जड़ पानी और बिजली के कनैक्शन भी अलग करवा लिए. दोनों जगहों के बीच दीवार खड़ी करवा दी. उस में दरवाजा भी बनवा दिया, लेकिन दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ.

सारा काम पूरा हो जाने के बाद राहुल मकान में आ गया. उस ने मकान मालकिन द्वारा कही गई बातों का पालन किया. राहुल दिन में अपने मकान में कम ही रहता था. खाना भी वह होटल में ही खाता था. हां, रात में वह जरूर अपने कमरे पर आ जाता था. उस के हिस्से में ‘खटखट’ की आवाज से आंटी को पता चल जाता और वे आवाज लगा कर उस के आने की तसल्ली कर लेतीं.

उन आंटी का नाम प्रभा देवी था. वे अकेली रहती थीं. उन की 2 बेटियां थीं. दोनों शादीशुदा थीं. आंटी के पति की मौत कुछ साल पहले ही हुई थी. उन की मौत के बाद वे दोनों बेटियां उन को अपने साथ रखने को तैयार थीं, पर वे खुद ही नहीं रहना चाहती थीं. जब तक शरीर चल रहा है, तब तक क्यों उन के भरेपूरे परिवार को परेशान करें.

अपनी मां के एक फोन पर वे दोनों बेटियां दौड़ी चली आती थीं. आंटी और उन के पति ने मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पाला था. उन के पास अब केवल यह मकान ही बचा था, जिस को किराए पर उठा कर उस से मिले पैसे से उन का खर्च चल जाता था.

एक हिस्से में आंटी रहती थीं और दूसरे हिस्से को वे किराए पर उठा देती थीं. पर एक मजदूर के पास मजदूरी से इतना बड़ा मकान नहीं हो सकता. पतिपत्नी दोनों ने खूब मेहनत की और यहां जमीन खरीदी. धीरेधीरे इतना कर लिया कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा कर आमदनी का एक जरीया तैयार कर लिया था.

राहुल अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. नौकरी पर वह यहां आ गया और आंटी का किराएदार बन गया. दोनों ही अकेले थे. धीरेधीरे मांबेटे का रिश्ता बन गया.

घर के दोनों हिस्सों के बीच का दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ. हमेशा खुला रहा. राहुल को कभी ऐसा नहीं लगा कि आंटी गैर हैं. आंटी के बारे में जैसा सुना था, वैसा उस ने नहीं पाया. कभीकभी उसे लगता कि लोग बेवजह ही आंटी को बदनाम करते रहे हैं या राहुल का अपना स्वभाव अच्छा था, जिस ने कभी न करना नहीं सीखा था. आंटी जो भी कहतीं, उसे वह मान लेता.

आंटी हमेशा खुश रहने की कोशिश करतीं, पर राहुल को उन की खुशी खोखली लगती, जैसे वे जबरदस्ती खुश रहने की कोशिश कर रही हों. उसे लगता कि ऐसी जरूर कोई बात है, जो आंटी को परेशान करती है. उसे वे किसी से बताना भी नहीं चाहती हैं. उन की बेटियां भी अपनी मां की समस्या किसी से नहीं कहती थीं.

वैसे, दोनों बेटियों से भी राहुल का भाईबहन का रिश्ता बन गया था. उन के बच्चे उसे ‘मामामामा’ कहते नहीं थकते थे. फिर भी वह एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं बढ़ता था. लोग हैरान थे कि राहुल अभी तक वहां कैस टिका हुआ है.

आज रात राहुल जल्दी घर आ गया था. एक बार वह जा कर आंटी से मिल आया था, जो एक नियम सा बन गया था. जब वह देर से घर आता था, तब यह नियम टूटता था. हां, तब आंटी अपने कमरे से ही आवाज लगा देती थीं.

रात के 11 बज रहे थे. राहुल ने सुना कि आंटी चीख रही थीं, ‘मेरा बच्चा… मेरा बच्चा… वह मेरे बच्चे को मुझ से छीन नहीं सकता…’ वे चीख रही थीं और रो भी रही थीं.

पहले तो राहुल ने इसे अनदेखा करने की कोशिश की, पर आंटी की चीखें बढ़ती ही जा रही थीं. इतनी रात को आंटी के पास जाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी, भले ही उन के बीच मांबेटे का अनकहा रिश्ता बन गया था.

राहुल ने अपने दोस्त प्रशांत को फोन किया और कहा, ‘‘भाभी को लेता आ.’’

थोड़ी देर बाद प्रशांत अपनी बीवी को साथ ले कर आ गया. आंटी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. यह उन के लिए हैरानी की बात थी. तीनों अंदर घुसे. राहुल सब से आगे था. उसे देखते ही पलंग पर लेटी आंटी चीखीं, ‘‘तू आ गया… मुझे पता था कि तू एक दिन जरूर अपनी मां की चीख सुनेगा और आएगा. उन्होंने तुझे छोड़ दिया. आ जा बेटा, आ जा, मेरी गोद में आ जा.’’

राहुल आगे बढ़ा और आंटी के सिर को अपनी गोद में ले कर सहलाने लगा. आंटी को बहुत अच्छा लग रहा था. उन को लग रहा था, जैसे उन का अपना बेटा आ गया. धीरेधीरे वे नौर्मल होने लगीं.

प्रशांत और उस की बीवी भी वहीं आ कर बैठ गए. उन्होंने आंटी से पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने टाल दिया. वे राहुल की गोद में ही सो गईं. उन की नींद को डिस्टर्ब न करने की खातिर राहुल बैठा रहा.

थोड़ी देर बाद प्रशांत और उस की बीवी चले गए. राहुल रातभर वहीं बैठा रहा. सुबह जब आंटी ने राहुल की गोद में अपना सिर देखा, तो राहुल के लिए उन के मन में प्यार हिलोरें मारने लगा. उन्होंने उस को चायनाश्ता किए बिना जाने नहीं दिया.

राहुल ने दफ्तर पहुंच कर आंटी की बड़ी बेटी को फोन किया और रात में जोकुछ घटा, सब बता दिया. फोन सुनते ही बेटी शाम तक घर पहुंच गई. उस बेटी ने बताया, ‘‘जब मेरी छोटी बहन 5 साल की हुई थी, तब हमारा भाई लापता हो गया था. उस की उम्र तब 3 साल की थी. मांबाप दोनों काम पर चले गए थे.

‘‘हम दोनों बहनें अपने भाई के साथ खेलती रहतीं, लेकिन एक दिन वह खेलतेखेलते घर से बाहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया. ‘‘उस समय बच्चों को उठा ले जाने वाले बाबाओं के बारे में हल्ला मचा हुआ था. यही डर था कि उसे कोई बाबा न उठा ले गया हो.

‘‘मां कभीकभी हमारे भाई की याद में बहक जाती हैं. तभी वे परेशानी में अपने बेटे के लिए रोने लगती हैं.’’ आंटी की बड़ी बेटी कुछ दिन वहीं रही. बड़ी बेटी के जाने के बाद छोटी बेटी आ गई. आंटी को फिर कोई दौरा नहीं पड़ा.

2 दिन हो गए आंटी को. राहुल नहीं दिखा. ‘खटखट’ की आवाज से उन को यह तो अंदाजा था कि राहुल यहीं है, लेकिन वह अपनी आंटी से मिलने क्यों नहीं आया, जबकि तकरीबन रोज एक बार जरूर वह उन से मिलने आ जाता था. उस के मिलने आने से ही आंटी को तसल्ली हो जाती थी कि उन के बेटे को उन की फिक्र है. अगर वह बाहर जाता, तो कह कर जाता, पर उस के कमरे की ‘खटखट’ बता रही थी कि वह यहीं है. तो क्या वह बीमार है? यही देखने के लिए आंटी उस के कमरे पर आ गईं.

राहुल बुखार में तप रहा था. आंटी उस से नाराज हो गईं. उन की नाराजगी जायज थी. उन्होंने उसे डांटा और बोलीं, ‘‘तू ने अपनी आंटी को पराया कर दिया…’’ वे राहुल की तीमारदारी में जुट गईं. उन्होंने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारे मांबाप जब तक आएंगे, तब तक हम ही तेरे अपने हैं.’’

राहुल के ठीक होने तक आंटी ने उसे कोई भी काम करने से मना कर दिया. उसे बाजार का खाना नहीं खाने दिया. वे उस का खाना खुद ही बनाती थीं.

राहुल को वहां रहते तकरीबन 9 महीने हो गए थे. समय का पता ही नहीं चला. वह यह भी भूल गया कि उस का जन्मदिन नजदीक आ रहा है. उस की मम्मी सविता ने फोन पर बताया था, ‘हम दोनों तेरा जन्मदिन तेरे साथ मनाएंगे. इस बहाने तेरा मकान भी देख लेंगे.’

आज राहुल की मम्मी सविता और पापा रामलाल आ गए. उन को चिंता थी कि राहुल एक अनजान शहर में कैसे रह रहा है. वैसे, राहुल फोन पर अपने और आंटी के बारे में बताता रहता था और कहता था, ‘‘मम्मी, मुझे आप जैसी एक मां और मिल गई हैं.’’

फोन पर ही उस ने अपनी मम्मी को यह भी बताया था, ‘‘मकान किराए पर लेने से पहले लोगों ने मुझे बहुत डराया था कि मकान मालकिन बहुत खड़ूस हैं. ज्यादा दिन नहीं रह पाओगे. लेकिन मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं देखा.’’ तब उस की मम्मी बोली थीं, ‘बेटा, जब खुद अच्छे तो जग अच्छा होता है. हमें जग से अच्छे की उम्मीद करने से पहले खुद को अच्छा करना पड़ेगा. तेरी अच्छाइयों के चलते तेरी आंटी भी बदल गई हैं,’ अपने बेटे के मुंह से आंटी की तारीफ सुन कर वे भी उन से मिलने को बेचैन थीं.

राहुल मां को आंटी के पास बैठा कर अपने दफ्तर चला गया. दोनों के बीच की बातचीत से जो नतीजा सामने आया, वह हैरान कर देने वाला था.

राहुल के लिए तो जो सच सामने आया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था. उस की आंटी जिस बच्चे के लिए तड़प रही थीं, वह खुद राहुल था. मां ने अपने बेटे को उस की आंटी की सचाई बता दी और बोलीं, ‘‘बेटा, ये ही तेरी मां हैं. हम ने तो तुझे एक बाबा के पास देखा था. तू रो रहा था और बारबार उस के हाथ से भागने की कोशिश कर रहा था. हम ने तुझे उस से छुड़ाया. तेरे मांबाप को खोजने की कोशिश की, पर वे नहीं मिले.

‘‘हमारा खुद का कोई बच्चा नहीं था. हम ने तुझे पाला और पढ़ाया. जिस दिन तू हमें मिला, हम ने उसी दिन को तेरा जन्मदिन मान लिया. अब तू अपने ही घर में है. हमें खुशी है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया.’’ राहुल बोला, ‘‘आप भी मेरी मां हैं. मेरी अब 2-2 मांएं हैं.’’ इस के बाद घर के दोनों हिस्से के बीच की दीवार टूट गई. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: समर की रोशनी

Hindi Romantic Story, लेखक – सागर चौधरी

समर एक ऐसी मुहब्बत को जी रहा था, जो शायद बहुत पहले मर चुकी थी. वह इस रिश्ते में कब से अकेला था, बस उसे अहसास नहीं था कि रोशनी कब की, किसी और की हो चुकी थी. वह अब जो भी अपना समय उसे देती, वह सिर्फ पुरानी यादों के नाते.

यों तो एक जमाने में वे दोनों पूरापूरा दिन एकदूसरे को देखते गुजारते थे. हैदराबाद के एक माल में दोनों शोरूम सेल्स स्टाफ थे. समर मैंस वियर में कस्टमर्स को कपड़े दिखाता, तो दूसरी तरफ किड्स वियर में रोशनी मम्मियों की मदद करती.

शाम को वे दोनों 45 नंबर की बस पकड़ते और हुसैन सागर ?ाल के एक किनारे पर उतर जाते. एक घंटा दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाल कर बैठते और बातें करते. ?ाल की तरफ से आने वाली हवा रोशनी के घुंघराले बालों को रहरह कर उड़ाती रहती.

समर के लिए सबकुछ स्लो मोशन जैसा चलता था, इसलिए वह अकसर रोशनी की जुल्फों में खो जाता. वह उस की तरफ देख तो रहा होता, मगर कई बार रोशनी की आवाज उसे सुनाई न देती.

फिर वे दोनों वापस 45 नंबर की बस पकड़ते. समर मुशीराबाद उतरता तो रोशनी टोली चौकी. दोनों ही बस्तियों में रहते थे, मगर एकदूसरे से 10 किलोमीटर दूर.

यह साल 2014 था. एक शाम ऐसी बारिश में दोनों फंसे कि घंटों बाद भी 1-2 बसें ही आई थीं, सब ठसाठस भरी हुईं. 2 घंटे के बाद भी बारिश के थमने का नाम न था. रोशनी की अप्पी (बड़ी बहन) कई बार फोन कर चुकी थीं.

रोशनी ने कहा कि वह आटोरिकशा से चली जाएगी और समर को अब लौटना चाहिए, मगर उस ने कहां सुनना था.

आटोरिकशा आते ही समर एकदम से रोशनी के साथ उस में बैठ गया और आटोरिकशा वाले को कहा, ‘‘टोली चौकी ले लो.’’

रोशनी ने परेशान होते हुए उसे कहा, ‘‘तुम क्यों जा रहे हो? तुम वापसी में काफी लेट हो जाओगे.’’

समर ने जवाब दिया, ‘‘लेकिन उतने समय मैं तुम्हारे साथ भी तो रह पाऊंगा.’’

रोशनी कुछ न बोली, बस समर के कंधे पर अपना सिर रख दिया. समर ने भी अपनी बाजू पीछे से सरकाते हुए रोशनी को कमर से पकड़ लिया और दोनों यों ही टोली चौकी पहुंच गए.

पैसे रोशनी ने दिए. उसे मालूम था कि समर के आधे से ज्यादा पैसे तो किराए में खर्च हो जाते हैं.

रोशनी ने समर से कहा, ‘‘तुम इसी आटोरिकशा से लौट जाना.’’

समर ने कहा, ‘‘हां, ठीक है.’’

मगर समर को घर पहुंचने की जल्दी भी तो नहीं थी. अपनी यादों के साथ उसे बस की खिड़की पर बैठ कर जाना ज्यादा पसंद था.

बस स्टौप तक जाते हुए समर खुद ब खुद मुसकरा रहा था. कभी दौड़ता तो कभी चलने लगता. बारिश अब थम सी गई थी और रात इतनी ज्यादा कि अब बस स्टौप पर लोग भी कम थे.

5 साल गुजर गए थे, मगर वह बारिश की रात जैसे कल ही की बात हो. समर आज भी बारिश को बड़ी मुहब्बत से देखता है.

2 साल पहले समर दिल्ली आ गया था. अब वह एक बड़े होटल में स्टीवर्ड था. रोशनी ने उसे इंगलिश बोलना सिखाया था, जिस की वजह से एक दिन जब यह औफर आया था तो रोशनी ने ही जिद की थी कि वह चला जाए. माल की नौकरी में स्टाफ को मैनेजर से बहुत भलाबुरा सुनना पड़ता है. पैसे भी मुश्किल से 8,000 रुपए मिलते थे.

समर ने कहा था कि वह वहां जाते ही रोशनी के लिए भी कुछ देखेगा. उस ने सोचा था एक साल के अंदर वे दोनों फिर साथ होंगे, मगर दूसरा और तीसरा साल भी गुजर गया. समर और रोशनी अब भी एकदूसरे को देख नहीं पाए थे.

वे दोनों फोन पर कुछ कहते नहीं, मगर अंदर ही अंदर उन का प्यार एकदूसरे के लिए जहर बनता जा रहा था. न वे एकसाथ रह पा रहे थे, न एकदूसरे से दूर.

समर का अकेलापन उस के अंदर के प्यार के महासागर को कोयला बन कर सोख रहा था. उस की जरूरत अब सिर्फ रोशनी की आवाज सुन कर खत्म नहीं होती थी. वह उसे छूना चाहता था, अपनी बांहों में भरना चाहता था, उस के होंठों को चूमना चाहता था, मगर रोशनी कहीं भी नहीं होती.

दूसरी ओर, रोशनी के लिए समर का होना ही सबकुछ था. उसे फर्क नहीं पड़ता था कि समर उस के पास मौजूद था या नहीं. वह हर रोज उसे अपने दिनभर की बात अब भी वैसे ही शेयर करती, जैसे 5 साल पहले हुसैन सागर झील के किनारे पर किया करती थी. समर के अकेलेपन को खत्म करने के लिए उस ने अपनी तसवीरें भी भेजी थीं. वैसी तसवीरें जिन का हकदार सिर्फ समर ही था.

हालांकि, रोशनी ने शुरू से ही समर को कह दिया था कि उन की शादी नहीं हो सकती. जैसे वह भविष्य को देख चुकी हो. उस का परिवार और समाज कभी समर, एक हिंदू दलित, को स्वीकार नहीं करता.

मगर दिल के अंदर के फासले जिस तरह से बढ़ रहे थे, वे रोशनी को डराने लगे थे. ‘अगर समर सचमुच चला गया तो…’ रोशनी के दिल में यह सवाल अब रहरह कर उठता था.

एक समय वह भी आया जब समर 10 मिनट की फोन काल पर भी प्यार से बात नहीं कर पाता था. किसी न किसी बात पर उस का गुस्सा रोशनी पर निकल आता था.

‘‘जब तुम औफिस से घर जा रही होती हो तभी तुम फोन करती हो. मुझे बस के हौर्न के बीच में तुम्हारी आवाज सुननी पड़ती है… और जब मैट्रो लेती हो तो तुम्हारी आवाज चली जाती है. मुझे नहीं करना बात इस तरह. रखो फोन,’’ समर कहता.

रोशनी अप्पी या बच्चों के सामने घर पर बात नहीं कर पाती थी. एक दिन उस के जीजाजी ने उन के सारे मैसेज पढ़ लिए थे. उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर उसे उन के साथ रहना है तो समर को अपनी जिंदगी से निकालना पड़ेगा.

समर और रोशनी की मुहब्बत ने पिछले 5 साल में ऐसी कई दीवारों को पार किया था, मगर बरसों की दूरी ने उन के बीच एक गहरी खाई बना दी थी सबकुछ खत्म होता लग रहा था.

तभी रोशनी ने समर से कहा कि वह 2 दिन के लिए दिल्ली आएगी और उस के साथ रहेगी. खुशी के मारे समर की आंखों से आंसू निकल आए थे. वह 5 साल बाद रोशनी से मिलने वाला था.

रोशनी ने अपने घर वालों से कहा था कि कंपनी वाले उसे ट्रेनिंग के लिए भेज रहे हैं और रहनेसहने का इंतजाम भी उन्होंने ही किया है.

तब पतझड़ शुरू ही हुआ था. धूप में गरमी और छांव में हलकी सी सिहरन महसूस होती. वे 3 दिन रोशनी और समर की जिंदगी के सब से खूबसूरत पल थे. समय जैसे ठहर सा गया था. वे सब कसमेवादे, सपने जो कुछ महीने पहले टूटते नजर आ रहे थे, वे फिर से जुड़ गए थे.

रोशनी ने इन सब के बीच समर को यह नहीं बताया था कि घर पर उस की शादी की बात चल रही थी. वह उन 3 दिनों में समर को खुश देखना चाहती थी. वह सबकुछ देना चाहती थी, जो समर का था. मगर उस ने यह भी तय कर लिया था कि यह उन की आखिरी मुलाकात थी.

मानो एक कर्ज था समर के प्यार का जो रोशनी सूद समेत वापस करने आई हो. उस ने सोचा था, ‘समर अब अधूरा महसूस नहीं करेगा और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ेगा.’

मगर समर के लिए तो यह उम्मीद का नया रास्ता था. उसे लगने लगा था कि अब सबकुछ नामुमकिन है. शायद रोशनी उस के साथ भाग कर शादी करने को तैयार हो जाए. जहां रोशनी उस मुलाकात के जरीए 5 साल के मुहब्बत को दफन करने आई थी, वहीं समर की मरी मुहब्बत में एक नई जान आ गई थी.

रोशनी के वापस जाते ही समर फिर से दिनभर उसे फोन करने लगा. इंतजार करना समर का सब से खूबसूरत टाइमपास बन गया.

तभी एक दिन रोशनी ने समर का भरम थोड़ा और कहा, ‘‘मैं सलमान से मिली समर. पहली बार तुम्हें छोड़ कर कोई और आदमी मुझे अच्छा लगा है.’’

समर उस दिन नाइट शिफ्ट में था. किसी बहुत बड़े उद्योगपति ने होटल में पार्टी रखी थी. समर का काम था लोगों का मुसकरा कर स्वागत करना. उस ने रोशनी से कहा था, ‘‘मुबारक हो. अपना खयाल रखना.’’

इतना कह कर समर ने फोन रख दिया था. उस दिन समर ने सब का स्वागत किया. चेहरे पर से मुसकराहट तब तक नहीं गई, जब तक उस ने पार्टी फ्लोर नहीं छोड़ा.

शिफ्ट खत्म होते ही समर ने खुद को बाथरूम में बंद किया और फिर ऐसे रोया जैसे दुनिया खत्म हो गई हो.

एक महीने बाद रोशनी का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘समर, अभी मत जाओ प्लीज. इतनी दूर चले हो मेरे साथ, कुछ दूर और चल लो. मैं तुम्हारे बिना यह नहीं कर सकती. एक बार मेरी शादी हो जाए, फिर चले जाना.’’

समर ने रोशनी से इतना प्यार किया था कि वह अगर उसे कह देती कि जीना छोड़ दो तो शायद वह अपनी सांसें बंद कर लेता.

समर ने कहा कि वह जैसा कहेगी वैसा ही होगा. रोशनी जितना और जब चाहती, समर उस के लिए मौजूद रहता.

रोशनी ने कहा, ‘‘समर, हम कभी अलग नहीं होंगे. यह शादी सिर्फ समाज के लिए है. तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.’’

फिर एक दिन वह समय भी आया जब शादी की रस्में शुरू हुईं. रोशनी के हाथों में मेहंदी लगी थी.

समर ने उस से पूछा था, ‘‘क्या चाहिए तुम्हें मेरी जान? शादी है तुम्हारी आज, तुम जो कह दोगी वह ला देंगे हम तुम्हें.’’

रोशनी ने कहा था, ‘‘तुम मुझ से एक वादा करो…’’

समर मुसकराया और बोला, ‘‘एक और वादा… तुम जो चाहे मांग लो सब तुम्हारा है.’’

रोशनी ने कहा, ‘‘वादा करो, हम कभी अलग नहीं होंगे.’’

समर ने हामी भर दी.

रोशनी की शादी हुए कई हफ्ते बीत गए थे. समर ने उसे सैकड़ों मैसेज भेजे थे, मगर जवाब एक भी नहीं मिला था उसे.

फिर एक दिन समर ने मैसेज में लिखा, ‘आई लव यू.’

जवाब आया, ‘समर प्लीज, आगे बढ़ो अब.’

Story In Hindi: सबक

Story In Hindi, लेखक – सुनील

‘‘जरा यहां गाड़ी रोकना…’’ मीना के इतना कहते ही ड्राइवर ने झट से ब्रेक लगा दिए.

‘गांव तो अभी डेढ़ किलोमीटर दूर है. मैडम ने अभी एकदम से गाड़ी क्यों रुकवाई?’ आईएएस मीना की इस पहेली से जूझते ड्राइवर मनोहर ने सोचा.

मीना गाड़ी से बाहर निकलीं. कच्ची सड़क पर अभी भी धूल उड़ रही थी. तेज धूप में उन्होंने अपने काले चश्मे लगाए और एक खेत की पगडंडी की तरफ चल दीं. जब उन के साथ के लोग पीछेपीछे आने लगे, तो उन्होंने बिना मुड़े ही हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

उस पगडंडी पर तकरीबन 100 मीटर दूर एक ट्यूबवैल नजर आ रहा था. पानी चल रहा था. धान की फसल में पानी छोड़ा गया था. भरी दोपहर में वहां कोई नहीं था. एक पेड़ की छांव में कुत्ता ऊंघ रहा था.

जब मीना उस कुत्ते के करीब से गुजरीं, तो उस के कान खड़े हो गए. एक बार आंखें खोलीं और फिर सुस्ताने लगा. उस की सांसें धौकनी की तरह बड़ी तेज चल रही थीं.

मीना थोड़ा आगे बढ़ीं और उस ट्यूबवैल के पास जा कर खड़ी हो गईं.

दूर खड़े स्टाफ ने सोचा कि मैडम को प्यास लगी होगी, पर पानी तो गाड़ी में भी रखा था, वह भी बोतलबंद, तो इतनी दूर जाने की क्या जरूरत थी?

उधर आईएएस मीना के मन में बड़ी कशमकश थी और कुछ पुरानी यादें भी, जो आज भी नासूर बन कर उन को टीस दे रही थीं.

आज से 10 साल पहले की बात है, जब 15 साल की मीना सरकारी स्कूल में 10वीं जमात में पढ़ती थी. पढ़ाई में बड़ी होशियार, पर जाति से दलित थी, तो उस के तेज दिमाग की कोई कीमत नहीं थी.

मीना के मांबापू सरपंच के खेतों में मजदूर थे और अपने 5 जनों के परिवार को जैसेतैसे पाल रहे थे. मीना के 2 छोटे भाई आवारा थे और दिनभर यहांवहां पैर भिड़ाते घूमते रहते थे.

‘‘अरी ओ मीना, उठ जा. आज स्कूल नहीं जाना क्या?’’ जब मां की यह आवाज मीना के कानों में पड़ी तो वह झट से उठ बैठी.

मीना पढ़ाई में तो तेज थी ही, अच्छी देह की मालकिन भी थी. लंबा चेहरा, काले घने बाल, उभरी हुई बड़ी छातियां, चौड़े कूल्हे, जो उसे 20 साल की भरीपूरी लड़की दिखाते थे. यही वजह थी कि वह कई लोगों की हवसभरी निगाहों में आ चुकी थी. चूंकि दलित थी, तो ऊंची जात के लोग उसे अपने बाप का माल समझ कर हाथ साफ करना अपना जन्मजात हक समझते थे.

स्कूल के हैडमास्टर सेवकराम ऊंची जाति के थे और हमेशा मीना की ऊंची छातियों को मसलने के सपने देखते थे. उन्हें पता था कि अकेले यह काम इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि मीना दबंग लड़की थी. अकेले उस पर हावी होना सेवकराम की बूढ़ी हड्डियों के बस की बात नहीं थी.

यही वजह थी कि उन्होंने स्कूल के 2 लड़कों महेश और दीपक को अपना परम चेला बनाया हुआ था. वे जानते थे कि महेश और दीपक की लार भी मीना की देह पाने के लिए टपकती रहती है. पर चूंकि मीना उन दोनों लड़कों को पसंद नहीं करती थी, तो सेवकराम ने एक टीचर बनवारी दास को भी अपने ‘हवसी गिरोह’ में शामिल कर लिया था. वे चारों ऊंची जाति के थे.

आज जब मीना स्कूल पहुंची, तो उस की पक्की सहेली गीता ने कहा, ‘‘मीना, तू हैडमास्टर साहब से मिल लेना.

उन्होंने तो तुझे कल ही अपने पास बुलाया था, पर मैं तुझे बताना भूल गई. तू उस समय बनवारी दास सर ने नोट्स ले रही थी.’’

थोड़ी देर के बाद मीना हैडमास्टर साहब के कमरे में पहुंची. उस समय वे अकेले थे. मीना को देखते ही वे कुरसी से खड़े हो गए और उस के पास आ गए.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था?’’ मीना ने पूछा.

हैडमास्टर साहब ने मीना को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, ‘‘हां. मैं तुम्हारी पढ़ाई से बहुत खुश हूं. मुझे उम्मीद है कि तुम हमारे स्कूल का नाम रोशन करोगी.’’

‘‘सर, मैं बड़ी मेहनत कर रही हूं. आप के आशीर्वाद से अच्छा रिजल्ट आएगा,’’ मीना ने कहा.

इतने में हैडमास्टर साहब ने मीना के गाल पर चुटकी काटते हुए कहा, ‘‘यह हुई न बात. मैं शाम को 5 बजे हमारे खेत वाले ट्यूबवैल पर कुछ बच्चों को पढ़ाता हूं. आज शाम से तुम भी आ जाना. जितनी ज्यादा मेहनत करोगी, उतना ऊपर जाओगी,’’ और इतना कह कर हैडमास्टर साहब मीना की छातियों को घूरने लगे.

मीना को इस तरह हैडमास्टर का घूरना थोड़ा अखरा, पर उस ने सोचा, ‘ऐसा नहीं हो सकता. हैडमास्टर साहब बड़े अच्छे इनसान हैं. ये तो मुझे शाम को पढ़ाने की बात भी कर रहे हैं. अपने दिमाग पर काबू पा. और अगर कोई ऐसीवैसी बात हुई तो मैं संभाल लूंगी.’

‘‘जी सर, मैं शाम को आ जाऊंगी,’’ इतना कह कर मीना वहां से चली गई. मीना के जाने के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने महेश, दीपक और बनवारी दास को अपने पास बुलाया. उन के आते ही सेवकराम ने कहा,

‘‘मीना शाम को खेत पर आने के लिए मान गई है. हमारे पास आज का ही मौका है. शाम को वहां लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती है. उसे आसानी से अपने काबू में कर लेंगे.’’

‘‘बड़ी पढ़ाकू बनती है. छोटी जात की हो कर बड़ी सरकारी अफसर बनने का सपना देख रही है. आज शाम को इस का सारा नशा उतार देंगे,’’ महेश ने कहा.

‘‘कल इस का बापू मेरे पास आ कर गिड़गिड़ा रहा था और कह रहा था कि यही हमारी आखिरी आस है. पढ़ने में ठीक है, तो कोटे से सरकारी नौकरी मिल जाएगी.

‘‘इतना ही नहीं, मुझ से 500 रुपए उधार ले गया था. मुझे पता है कि वापस नहीं मिलेंगे. इस की बेटी से ही वसूल कर लेंगे,’’ हैडमास्टर सेवकराम ने कहा.

‘‘आप की चाल तो एकदम बढि़या है. बस, किसी तरह मीना आज शाम को ट्यूबवैल पर आ जाए,’’ बनवारी दास ने कहा.

‘‘तू मिल आई हैडमास्टर साहब से? वे क्या बोल रहे थे?’’ वापस क्लास में आई मीना से गीता ने पूछा.
मीना ने सारी बात बता दी. गीता भी खुश हुई कि मीना को खुद हैडमास्टर साहब कोचिंग देंगे, वह भी फ्री में.

दोपहर को घर का काम कर मीना ने खाना बनाया और अपने दोनों निकम्मे भाइयों को खिलाया. उस के मांबापू सरपंच के खेत पर गए थे.

मीना ने घर के सारे काम निबटाए और फिर स्कूल से मिला होमवर्क किया. उसे आज हैडमास्टर साहब से पढ़ने की जल्दी थी.

शाम के साढ़े 4 बजे मीना ने अपना सूटसलवार बदला और बस्ता ले कर हैडमास्टर साहब के खेतों की ओर चल दी. वहां तक जाने में आधा घंटे का समय लगना था.

हैडमास्टर साहब का ट्यूबवैल वाला खेत पगडंडी से थोड़ा अंदर था और वहां कोई नहीं आताजाता था. उस समय भी वहां सन्नाटा छाया हुआ था.

जब मीना ट्यूबवैल पर पहुंची, तो देखा कि हैडमास्टर रामसेवक के साथ वहां महेश और दीपक के अलावा बनवारी दास भी मौजूद थे. वह थोड़ा चौकन्ना हो गई, क्योंकि उसे महेश और दीपक कतई पसंद नहीं थे.

‘‘अरे, आओ मीना. तुम तो समय की बड़ी पाबंद हो,’’ हैडमास्टर रामसेवक बोले. उस समय उन्होंने बनियान और लुंगी पहनी हुई थी.

वहां एक खाट बिछी थी और 2-3 कुरसियां पड़ी हुई थीं. मीना ने हैडमास्टर रामसेवक और टीचर बनवारी दास को ‘नमस्ते’ कहा और फिर एक तरफ खड़ी हो गई.

उन चारों ने पहले ही प्लान बना लिया था कि पानी देने के बहाने मीना के गिलास में नशे की गोली मिला देंगे, फिर उस की जवानी का रस पीएंगे.

महेश ट्यूबवैल के कोठरे से 3-4 गिलास पानी के लिए आया. उस ने अपने हाथ से मीना को पानी दिया और कहा, ‘‘गरमी बहुत है. पहले पानी पी लो, फिर हम तीनों पढ़ाई करेंगे.’’

मीना ने गिलास हाथ में ले लिया, पर सारा पानी नहीं पीया, बस कुछ घूंट ही हलक के नीचे उतारा.

पता नहीं क्यों मीना को वहां अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने अपनी चुन्नी को कमर पर कस कर बांध लिया था. जब तक वह कुरसी पर बैठती, तब तक उसे लगा कि सिर घूम रहा है.

मीना ने हैडमास्टर सेवकराम से कहा कि उसे पेशाब करने जाना है. यह सुन कर उन सब की बांछें खिल गईं.

रामसेवक बोले, ‘‘हां, यहीं पीछे एक छोटी सी कोठरी और है, वहां चली जाओ.’’

मीना जल्दी से वहां से निकली. उस का सिर अब तेजी से घूम रहा था. वह उस कोठरी में गई और हलक में उंगली डाल कर उलटी कर दी. इस से नशे का असर कम हुआ और फिर उस ने मटके में रखे पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोया और फिर मन ही मन कुछ सोच कर वह ट्यूबवैल की तरफ बढ़ गई.

वहां जाते ही मीना ने कहा, ‘‘सर, मेरे सिर में दर्द हो रहा है. मुझे नींद भी बहुत आ रही है.’’

इतना सुनते ही दीपक बोला, ‘‘कोई बात नहीं, तुम खाट पर लेट जाओ. थोड़ी देर में आराम आ जाएगा.’’

मीना खाट पर लेट गई और सोने की ऐक्टिंग करने लगी. थोड़ी देर के बाद जब सब को लगा कि नशे का असर हो गया है, तो वे चारों उस पर छाने लगे.

दीपक ने मीना की चुन्नी खोलनी चाही कि तभी मीना ने कस कर एक लात उसे जमा दी. लात सीधी छाती पर पड़ी थी. दीपक दूर जा गिरा और एक ईंट उस के सिर पर लगी. उसे चक्कर आने लगे.

इस बीच उन तीनों को जैसे सांप सूंघ गया, क्योंकि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि मीना ही उन पर यह चाल चल देगी.

तभी मीना ने अपनी कुहनी महेश के जबड़े पर मारी और घायल शेरनी की तरह उठ बैठी. टीचर बनवारी दास उस का यह खतरनाक रूप देख कर वहां से चंपत हो गया. अब बचे थे हैडमास्टर सेवकराम. मीना ने उन का बनियान खींच कर फाड़ दिया और जोर से चिल्लाई, ‘‘कोई बचाओ. ये लोग मेरी इज्जत पर हाथ डाल रहे हैं.’’

इतने में वहां बैठा एक कुत्ता जोर से भौंकने लगा. कुत्ते का शोर सुन कर उस खेत से थोड़ा दूर कुछ किसान चारा काट रहे थे. वे एकदम से ट्यूबवैल की तरफ दौड़े.

हैडमास्टर सेवकराम की घिग्गी बंध गई. फटी बनियान को संभालते हुए वे वहां से भागना चाहते थे, पर मीना ने उन पर मुक्कों की बरसात कर दी और चिल्लाई, ‘‘नीच आदमी. तेरी इतनी हिम्मत. मैं गरीब घर की बेटी जरूर हूं, पर कमजोर नहीं.’’

सेवकराम हाथ जोड़ने लगे, पर तब तक बाकी लोग वहां पहुंच गए. उन्होंने वहां का सीन देखते ही सबकुछ समझ लिया और हैडमास्टर पर पिल पड़े…

आईएसएस मीना जैसे अपनी यादों से लौट आईं. उस दिन के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने वह स्कूल छोड़ दिया था. टीचर बनवारी दास को भी स्कूल से निकाल दिया गया. महेश और दीपक कहां गए, किसी को पता नहीं चला.

आईएसएस मीना ने काला चश्मा लगाया और वहां से लौटने लगीं. ऊंघ रहे कुत्ते ने उन्हें दोबारा देखा. उन्होंने बड़े प्यार से उसे पुचकारा और गाड़ी की तरफ बढ़ गईं. Story In Hindi

Hindi News Story: उपराष्ट्रपति के बहाने तीर तानों के चलाने

Hindi News Story: ‘‘यार, बहुत दिनों से मैं अपने पुराने दोस्तों से नहीं मिली हूं. सोच रही हूं कि कल उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना लूं,’’ अनामिका ने विजय से कहा.

‘‘बना लो, पर मैं नहीं चल पाऊंगा,’’ विजय बोला.

‘‘क्यों? तुम कहीं जा रहे हो क्या?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘नहीं, पर उन लोगों के साथ मैं बोरियत महसूस करता हूं. वे हर बात में राजनीति घुसेड़ देते हैं. कभी भी अपनी बातें नहीं करते हैं. और वह जो तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड है न जितेश, वह तो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता है,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मेरे दोस्तों का नाम सुन कर इतना बिदक क्यों जाते हो? मैं इतने दिनों के बाद उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना रही हूं और तुम मेरा मूड खराब कर रहे हो,’’ अनामिका थोड़ा नाराज हो कर बोली.

‘‘मैं कब मना कर रहा हूं. तुम जाओ अपने दोस्तों के पास और मजे करो,’’ विजय ने माहौल को थोड़ा हलका बनाते हुए कहा.

‘‘मैं तो जाऊंगी ही. जितेश से मेरी बात हुई थी. वह आज कन्फर्म कर देगा. फिर मैं, जितेश, राहुल, सुरजीत और सोनिया सब कल लंच पर मिलेंगे,’’ अनामिका ने अपना प्लान बता दिया.

इतने में जितेश का फोन आ गया, ‘‘हां जितेश, बोलो… कल हम सब मिल रहे हैं न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘हां, हम सब ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट पर मिलेंगे. तुम देर मत करना. कल बड़ा मजा आएगा,’ उधर से जितेश की आवाज आई.

‘‘ठीक है. मैं टाइम से पहुंच जाऊंगी,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

अगले दिन अनामिका ने अपना पसंदीदा सूटसलवार पहना और ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट जा पहुंची. उस के सारे दोस्त पहले ही वहां आ गए थे.

‘‘विजय ने परमिशन दे दी यहां आने की?’’ जितेश ने चुटकी ली.

‘‘क्या मतलब?’’ अनामिका ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘‘पहले अपनी रिजर्व्ड सीट पर बैठते हैं, लंच का और्डर करते हैं, फिर कुछ टांग खिंचाई करेंगे. क्यों, सही कहा न जितेश?’’ सोनिया ने एक आंख दबाते हुए कहा.

‘‘एकदम सही पकड़े हैं आप. आज हमारा टारगेट ही यह सूटसलवार वाली दबंग लड़की है, जो विजय के प्यार में ऐसी बावली हो गई है कि अपने दोस्तों को भी भूल गई है,’’ राहुल बोला.

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उसे भूख लगी थी. वह बोली, ‘‘विजय पुराण बाद में बांच लेना, पहले कुछ पेट पूजा कर लेते हैं.’’

‘‘जो हुक्म हमारी राजदुलारी,’’ जितेश ने रैस्टोरैंट का मेन दरवाजा खोलते हुए कहा.

दरअसल, जब से अनामिका की विजय से गहरी दोस्ती हुई थी, तब से वह अपने पुराने दोस्तों से बिलकुल कट गई थी. जब भी वे अनामिका को मिलने के लिए कहते, तब अनामिका विजय के साथ होने की मजबूरी जाहिर करती. फोन पर अपने दोस्तों को सिर्फ विजय की अच्छाइयां ही बताती थी. इस बात से अनामिका के सारे दोस्त उकता गए थे.

आज जब अनामिका लंच पर आई तो सब को मौका मिल गया उस की खिंचाई करने का. सब से पहले सुरजीत ने ताना कसा, ‘‘वैसे आज सूरज जरूर पश्चिम से निकला होगा, तभी तो अनामिका आज बिना विजय के हमारे साथ यहां बैठी है.’’

‘‘अबे यार, क्यों इसे तंग कर रहा है. अगर विजय को पता चल गया तो इसे अभी यहां से ले जाएगा,’’ सोनिया बोली.

‘‘मेरा विजय है ही ऐसा. मेरी एक आवाज पर कुछ भी कर सकता है. दुनिया में वही मेरी सब से ज्यादा केयर करता है,’’ अनामिका राहुल की प्लेट में मंचूरियन राइस सर्व करते हुए बोली.

‘‘हां, मैं ने भी देखा है विजय को अच्छी तरह, मेरे 1,000 रुपए तो आज तक वापस नहीं किए… पर तेरे लिए वह दुनिया हिला सकता है,’’ जितेश ने कहा.

‘‘यह ज्यादा हो रहा है. अगर विजय ने तुम्हारे 1,000 वापस नहीं किए, तो मैं कर देती हूं, पर उस पर इतना बड़ा इलजाम तो मत लगा,’’ अनामिका झल्ला कर बोली.

‘‘तू इलजाम की बात करती है. विजय की पैरवी करने में तू उपराष्ट्रपति रह चुके जगदीप धनखड़ से भी आगे निकल चुकी है, जिन्हें हाल ही में अपनी सेहत का हवाला दे कर पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

‘‘कभी राजग सरकार के चहेते उपराष्ट्रपति रहे जगदीप घनखड़ पर अचानक ऐसी कौन सी गाज गिरी कि वे एकदम से एकांतवास में चले गए?’’ जितेश ने कहा.

‘‘तुम्हारा मतलब क्या है? मेरे और विजय के रिश्ते के बीच ये जगदीप धनखड़ अचानक कहां से आ गए? उन का हम सब से क्या लेनादेना?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारा रवैया हमें जगदीप धनखड़ की याद दिलाता है, जिन्होंने हमेशा राजग की हां में हां मिलाई. तुम भी विजय के मामले में ऐसा ही बरताव करती हो. पर जो हाल अब जगदीप धनखड़ का हुआ है, वह किसी से छिपा नहीं है,’’ सोनिया बोली.

‘‘ऐसा क्या हुआ है जगदीप धनखड़ के साथ?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘जगदीप धनखड़ ने सत्ता पक्ष राजग का हमेशा साथ दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में ‘सैक्यूलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जैसे शब्दों को जोड़े जाने को ‘नासूर’ करार दिया था.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान साफ कहा था कि ‘संसद सब से ऊपर है’ और संविधान के मुताबिक कोई भी संस्था इस से ऊपर नहीं हो सकती है.

‘‘उन्होंने कहा था कि सब से ऊपर तो संसद ही है, उस से ऊपर कोई अथौरिटी नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि संसद में जो सांसद चुन कर आते हैं, वे आम जनता की नुमाइंदगी करते हैं. संसद ही सबकुछ होती है, इस से ऊपर कोई नहीं होता है.’’

‘‘तुम अनुच्छेद 142 वाली बात भी तो बताओ. चलो, रहने दो. मैं ही सुनाती हूं…’’ सोनिया ने कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि हम ऐसे हालात नहीं बना सकते, जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और वह भी किस आधार पर?

‘‘संविधान के तहत आप के पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है. इस के लिए 5 या उस से ज्यादा जस्टिसों की जरूरत होती है.

‘‘हाल ही में जजों ने उपराष्ट्रपति को तकरीबन आदेश दे दिया और उसे कानून की तरह माना गया, जबकि वे संविधान की ताकत को भूल गए. अनुच्छेद 142 अब लोकतांत्रिक ताकत के खिलाफ एक ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है, जो चौबीसों घंटे न्यायपालिका के पास उपलब्ध है.’’

‘‘जगदीप धनखड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान सुनियोजित धर्मांतरण का आरोप लगाया और कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. उन्होंने कहा कि सनातन कभी विष नहीं फैलाता, सनातन स्वशक्तियों का संचार करता है. एक और संकेत दिया गया है जो बहुत खतरनाक है और देश की राजनीति को भी बदलने वाला है. यह नीतिगत तरीके से हो रहा है, संस्थागत तरीके से हो रहा है, सुनियोजित साजिश के तरीके से हो रहा है और वह है धर्म परिवर्तन.

‘‘उन्होंने आगे कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. वे समाज के कमजोर वर्गों को निशाना बनाते हैं. वे हमारे आदिवासी लोगों में ज्यादा घुसपैठ करते हैं. लालच देते हैं. हम एक नीति के रूप में संरचित तरीके से बहुत दर्दनाक धार्मिक रूपांतरण देख रहे हैं और यह हमारे मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है,’’ सुरजीत ने बताया.

अनामिका उन सब की बातें बड़ी ध्यान से सुन रही थी.

राहुल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने मार्च, 2023 में शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि कुछ यूनिवर्सिटी देश विरोधी विचारधारा का अड्डा बन चुकी हैं. उन के इस बयान को जेएनयू और कुछ दूसरी केंद्रीय यूनिवर्सिटियों की ओर इशारा समझ गया था.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में रुकावट से ले कर बिना चर्चा के विधेयक पास होने के आरोपों तक, कई मुद्दों पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया था. उन्होंने खासतौर पर उन बड़े वकीलों पर निशाना साधा था, जो विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस की नुमाइंदगी करने वाले राज्यसभा सदस्य भी हैं.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की थी, जिस में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की कौलेजियम सिस्टम को पलटने की कोशिश की गई थी.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की हाजिरी में दोनों सदनों द्वारा तकरीबन सर्वसम्मति से पास कानून को रद्द करने के लिए बड़ी अदालत पर सवाल उठाया था.

उन्होंने सांसदों की भी आलोचना करते हुए कहा था कि जब कानून को रद्द किया गया, तो सांसदों की तरफ से विरोध का एक स्वर तक नहीं उभरा,’’ सुरजीत ने जैसे जगदीप धनखड़ की एकतरफा राय की बखिया उधेड़ दी.

अनामिका थोड़ी देर तक चुप रही, फिर वह बोली, ‘‘ठीक है कि किसी उपराष्ट्रपति को अपने पद की गरिमा बना कर रखनी चाहिए. उन्हें सत्ता पक्ष का राग नहीं अलापना चाहिए. उन्हें विपक्ष की बातों का भी मान रखना चाहिए.

‘‘पर अब तो देश को नया उपराष्ट्रपति भी मिल गया है. राजग के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन देश के अगले उपराष्ट्रपति चुने गए हैं. मंगलवार, 9 सितंबर, 2025 को उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में उन के हक में कुल 452 वोट पड़े. कुल 767 सांसदों ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट दिया. इन में से 752 वैलिड थे और बाकी 15 अमान्य करार दिए गए.

‘‘सीपी राधाकृष्णन के सामने विपक्षी पार्टियों के साझा उम्मीदवार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रह चुके बी. सुदर्शन रेड्डी चुनौती पेश कर रहे थे. बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 फर्स्ट प्रैफरैंस वोट मिले और सीपी राधाकृष्णन को 452 वोट,’’ बताते हुए अनामिका ने अपना ज्ञान बघारा.

‘‘इस से ज्यादा बदलाव नहीं आएगा. ये भी जगदीप धनखड़ जैसे ही साबित होंगे. जब तक सरकार की राजी में राजी रखेंगे, तब तक इन्हें अच्छा ट्रीटमैंट मिलेगा, जब बागी सुर अपनाएंगे तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दिए जाएंगे,’’ जितेश बोला.

‘‘तुम भी विजय का ऐसे ही राग अलापती हो. किसी दिन उस की खामियों पर अपनी राय देना, तब सारी असलियत सामने आ जाएगी,’’ सोनिया बोली.

‘‘यार, इतना भी शर्मिंदा मत करो. ठीक है, विजय मेरी जिंदगी में बहुत खास है, पर मैं उस की अंधी पैरवी नहीं करती. लेकिन अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो आज के बाद मैं ध्यान रखूंगी और सही को सही और गलत को गलत कहूंगी, चाहे मेरी और विजय की अनबन ही क्यों न हो जाए,’’ अनामिका बोली.

‘‘यह हुई न बात. अब आई अनामिका अपने पुराने रंग में. इसी बात पर आज के लंच का बिल अनामिका देगी,’’ राहुल बोला.

यह सुनते ही सब ने ठहाका लगा दिया. अनामिका सब को टेढ़ी निगाहों से देख रही है. उस ने अपनी हंसी रोक रखी थी. Hindi News Story

Hindi Family Story: रंग लौट आए

Hindi Family Story: इस समय गोवा के खुशनुमा मौसम को चार चांद लग रहे थे. हवाओं में खूबसूरत नमी सिमट रही थी. मानसून की पहली बारिश ने कितनी ही मटमैली हो गई चीजों से कैसीकैसी धूल की परतें मिटा कर उन की चमक वापस लौटा दी थी.

मिसाल के तौर पर गुलमोहर का दरख्त कितना चटख हरा लगने लगा था. इतना ही नहीं, रिमझिम के मधुर संगीत के साथ धरती अपनी प्यास पूरी तरह बुझा लेने को उतावली थी, मगर अभी बस रिमझिम ही चल रही थी. तेज बौछारों का आना तो अभी बाकी था.

इस रिमझिम के सुर में डूबे हुए नारियल के पेड़ तो जैसे इतराए जा रहे थे. उन के पास बशर्ते मीठा जल था, लेकिन बादलों का यह उपहार उन को दीवाना कर देता था.

नारियल के पेड़ सड़क के किनारे इतने अनुशासित खड़े थे, जैसे किसी प्राइमरी पाठशाला की सभा में सीधे खड़े विद्यार्थी. हवा और रिमझिम की संगत में नारियल के पेड़ दीवाने बन कर संगीत के दीवानों की तरह झूम रहे थे.

गोवा की राजधानी पणजी से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर कैंडोलिम बीच पर एक नौजवान इस रिम?िम में सराबोर हो कर लहरों का आनाजाना देख रहा था.

इस नौजवान का नाम रोशन है. वह साफसाफ महसूस कर रहा है कि गोवा राज्य के उत्तरी भाग में बने इस छोटे से शहर कैंडोलिम में इस बार गिनेचुने सैलानी ही आए हैं, जबकि यह गोवा के सब से लंबे समुद्री बीच में से एक है.

रोशन को इस बार यहां लगातार हो रही बरसात की वजह से कम सैलानी होने का कोई दुख नहीं हो रहा था. इस की वजह यह थी कि उस की कुछ महीने की पक्की कमाई कुछ दिन पहले ही हो गई थी. अब वह एकदम निश्चिंत था.

अब वे जमाने गए कि जब रोशन घबराया सा रहता था. रोज रात को एक रजिस्टर में अपनी कमाई का हिसाबकिताब लिखा करता था. डरता रहता था कि कल को क्या होगा. अब उसे कोई फिक्र नहीं.

मीठी रिमझिम की तो लगातार झड़ी लगी हुई थी. इस समय सुबह के 10 बजे थे और रोशन का मन सूरज की तरह खिलाखिला था. इस तरह खिले रहने की आदत बनाने में उस की पुरानी प्रेमिका झलक का बड़ा ही योगदान रहा था. वह हमेशा खुश ही रहती थी.

रिमझिम की हर रिमझिम में कमाल और धमाल था. चाहे माहवारी की वजह से पूरे बदन में भयंकर दर्द हो रहा हो, पेट और कमर पर बल पड़े हों, मगर रिमझिम भी न जाने कौन सी मिट्टी की बनी थी कि वह अपनी एक सांस से दर्द को खींच लेती, फिर दूसरी सांस से मुसकराना, खिलखिलाना शुरू कर देती.

रोशन ने ‘आल इज वैल’ का यह सूत्र झलक से ही पाया था. वह उस शाम को आज तक न भूला है. हंस कर कैसे बोली थी झलक, ‘‘ऐ रोशन, इधर देख तो. नजर मिला न. कैसी उदासी और कैसा सुबकना?

‘‘देखो, कुछ भी हो, मगर तुम मुझे भूलना मत. बस इसी तरह हमारा प्यार अमर रहेगा. शादी की दावत खा कर जाना. भूलना मत,’’ ऐसी सीख दे गई वह. उस भावुक दिन, जब अपनी शादी का कार्ड देने बुलाया था.

इसी तरह की बातें हुआ करती थीं झलक की. वह तो अपनेआप में अनोखी थी. शादी के एक महीने बाद जब मायके आई तो वह सीधा रोशन को मिलने आ गई. घबराए से रोशन की सम?ा में नहीं आ रहा था कि झलक इतनी बेखौफ हो भी कैसे सकती है.

‘‘ओहो, इस में खौफ की कौन सी बात है रोशन?’’ रोशन के दिल की बात पढ़ कर बोली थी झलक, ‘‘सुन अब, गौर से सुन, तुझे एक बढि़या सलाह देने आई हूं,’’ वह किलक कर बोली थी.

‘‘झलक, तू मुझ को सलाह देगी… ठीक है, पर शादी करने की सलाह तो बिलकुल मत ही देना मुझे,’’ रोशन ने बिदक कर कह दिया था.

‘‘अरे पगले, कभी नहीं. शादी तो बरबादी है रे. अगर मेरे बाप पर इतना कर्ज न होता तो मै भी कौन सा शादी कर के ससुराल जाने वाली थी. कतई नहीं. बिलकुल नहीं,’’ झलक की यह सच्ची और खरी सी यह बात सुन कर रोशन ने भी बस गरदन हिला दी थी. इस सच से तो वह एकदम वाकिफ था, इसीलिए तो झलक से आज भी खफा न था. उस से नफरत नहीं करता था.

रोशन को सब मालूम था कि सट्टे और जुए का शौकीन झलक का बाप कितना गलीज है. झलक का बाप इतना गिरा हुआ था कि तब भी झलक ने अपनी सोच मैली न होने दी. ऐसे बाप की इतनी समझदार औलाद थी झलक. इतना नीच और नशेड़ी कि हर किसी से रुपए उधार मांगता फिरता था. शरमलाज तो जैसे सब बेच कर खाई थी उस जानवर ने. कितनी जगह से कर्ज ले रखा था. सब से ज्यादा तो लिया था उस डोलम होटल वाले से.

डोलम होटल वाले का एक भाई था. उस ने झलक से शादी की जिद कर ली थी. डोलम होटल वाला तो ?ालक को जैसे कोई चीज समझ कर डील कर रहा था.

गरीब की बेटी सारे गांव की दिलरुबा झलक ने यह कड़वी हकीकत बहुत पहले ही निगल कर पचा ली थी, इसलिए उस को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता था. उस ने वैसे भी अपनी मनमरजी की छोटी सी जिंदगी 14 साल की उम्र से 19 साल की उम्र तक तबीयत से जी ली थी. अब 20 की उम्र में बाप के कर्ज के बदले बेटी बलिदान कर दी गई थी.

डोलम होटल वाले को लगता था कि मासूम और कोमल झलक उस के भाई की पत्नी बनने जा रही है, पर यह उस की नादानी ही थी.

दरअसल, रोशन और झलक पिछले कई महीने से एकदूजे के हो गए थे. एकदूसरे की बांहों में दोनों को सांस आती और फिर हर तरह के प्यार की प्यासी झलक तो रोशन को ही अपना सबकुछ मानती थी.

रोशन ही तो उस का मातापिता, सगा, बंधु, परिचित, रिश्तेदार था. पिछले साढ़े 5 साल से हर साल उस के साथ शादी की सालगिरह मनाती थी.

वे दोनों दुनिया के लिए भले ही कुंआरे थे, मगर उन दोनों को ही पता था कि वे एकदूजे के लिए पतिपत्नी थे. दोनों देर तक गोमती पुल के नीचे एक कोने में समोसा और जलेबी खाते हुए अपने होने वाले बेटाबेटी के नाम तय करते थे. नाटकनाटक में झगड़ा भी किया करते थे, ताकि पतिपत्नी जैसा अहसास कर सकें.

और आज वही झलक गोवा में किसी और के संग हनीमून मना कर मायके लौटी थी.

यह झलक भी गजब थी कि ‘रोशनरोशन’ करती हुई सीधा उसी से मिलने आ गई थी.

‘‘गोवा में तेरा यह सब सामान खूब बिकेगा. मैं ने देखा है वहां मछलीचावल खाते हुए. एक से बढ़ कर एक चीनी मिट्टी की प्लेट. तू तो लखनऊ से मुंबई जा और वहां से बस का किराया 520 रुपए. सीधा पणजी चला जा,’’ यही राय देने आई थी झलक.

रोशन का घर लखनऊ में था. उस के पिता चीनी मिट्टी के बरतन बनाते और बेचा करते थे. रोशन को भी इस काम में बहुत ही चाव था. वह महज 9 बरस की कच्ची उम्र में सब सीख गया था. चिकनी मिट्टी को गीला कर के कितना सुखाना है, उसे आकार देते समय कितना धीरज रखना है, कैसे पकाना है वगैरहवगैरह.

रोशन ने आगे पढ़ाई भी नहीं की. किसी तरह 10वीं कर पाया था. सबक याद ही नहीं होता था उस को.
‘‘जितनी देर में यह सबक याद होता है उतनी देर में तो मैं कितने बरतन बना लेता,’’ एक दिन रोशन ने अपने लंगोटिया यार पामू से कहा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कभी भी जल्दी नहीं. इस मिट्टी में कोई राज होता है. इसे हौलेहौले सामने आने दिया करो,’’ पामू उसे प्यार से समझाया करता.

पामू का परिवार भी चीनी मिट्टी के बरतन बनाया करता था. पामू भी तो इस काम को कुछ अलग ही ढंग से सीखने की कोशिश करता था, मगर कभी कुछ का कुछ बना देता, फिर कहता कि यह कलाकृति है. इस के पीछे एक सोच है.

मगर पामू के मातापिता को वह कलाकृति किधर से भी समझ नहीं आती थी. उसे वह एक तरफ रख कर अपने और्डर को पूरा करने लगते. उन को कप और प्लेट के बहुतायत में और्डर मिला करते थे.

पामू को कप और प्लेट के सिवा सबकुछ बनाने का मन करता. कभी मीनार, कभी टोपी, कभी गुटका तो कभी मुड़ा हुआ सांप. उस का दिमाग कुछ और ही किया करता था. खैर, वे तो पुराने दिन हो गए थे.

अब झलक की उस हौसलाअफजाई के बाद रोशन की आज की तसवीर एकदम अलहदा है.

28 साल के रोशन को अब इस जगह का सबकुछ मालूम था. वह सब जानतासमझता था. जिस गैस्ट हाउस में वह रहता था, उधर भी सब से जानपहचान हो गई थी.

गैस्ट हाउस में उस को ‘रोशन दादा’ कहने वाले कितने ही नौजवान थे. ज्यादातर तो हिमाचल प्रदेश के थे. सीधेसरल पहाड़ी नौजवान. मेहनती और सच्चे. इन के भरोसे ही यहां के ज्यादातर होटल चल पा रहे थे.

अब रोशन एक अलग ही उमंग में भरा हुआ है. वह 2 दिन बाद कार्निवाल के लिए जाने वाला है. कार्निवाल
की तैयारी का आलम इधर गजब ही रहता है. कितने तरह के तो बैंड आते हैं. देशीविदेशी पर्यटक बैंड की धुन पर खूब झूमते और नाचते हैं.

रोशन को तो कितनी बार यह भी लगता है कि कार्निवाल के चलते ही यहां की रंगत है. मगर फिर कितनी बार उस को लगता है कि इस के इतने सारे रंगबिंरगे तट हैं. इस वजह से गोवा एकदम खास है और अलग है.

रोशन के सोचने या न सोचने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, मगर कैंडोलिम बीच पर कार्निवाल की धूम ने कुछेक सैलानियों को मस्ती के सागर में तैरा दिया था.

‘अरे… अरे…’ खुशी के मारे एकाएक रोशन की आंखें चौड़ी हो गईं. कार्निवाल में रोशन ने अचानक ही पामू को देखा.

‘‘पामू… पामू… ओ पामू… पहचाना?’’ रोशन चीख कर बोला.

‘‘ओह रोशन, मैं ने एक ही बार में पहचान लिया,’’ कह कर पामू बच्चों के जैसे खिलखिला उठा.

पामू इधर कुछ नया करने का सोच कर आया था, पर इतना भी नया कर न सका. रोशन जानता था कि उस का लंगोटिया यार पामू एक सच्चा कलाकार है. उस की मदद करनी चाहिए.

रोशन ने एक उपाय सोचा. उस की जेब में 10,000 रुपए थे. इस समय उसे बारबार झलक याद आ रही थी.

‘‘पामू, इस बार इधर कम सैलानी हैं. लेकिन फिक्र मत कर, तेरी कलाकृतियां यहां बिक जाएंगी. दिखाना तो कैसा सामान लाया है?’’ रोशन उत्सुक हो कर पूछने लगा.

पामू ने अपना बक्सा खोल कर दिखाया. रोशन ने गौर से देखा. कुछ काम तो कमाल का कर रखा था पामू ने. उस ने छोटेछोटे प्रतीक बना रखे थे.

‘‘ये किस सांचे में ढाल कर बनाए?’’ रोशन कुछ पेपरवेट देखने लगा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कोई भी सांचा नहीं है. अपनी कल्पना से ढाला है इन को. मगर यह तो सब को समझ नहीं आता है न,’’ कह कर पामू किसी गहरी सोच में डूब गया था.

‘‘पामू, तू इतने दिन इधर कैसे रहा? जब कमाई नहीं तो फिर रोटीपानी कैसे किया सब?’’

‘‘वह सब हो गया था.’’

‘‘कैसे मगर?’’ रोशन ने पूछा.

‘‘वह बस्तरिया बाजार है न, उधर गिटार बजाते हैं लड़के. उन के लिए नाचता था मैं, तो रोज का 200 रुपए हो जाता था. खाना वे ही देते थे, बस सोने का किसी न किसी जगह इंतजाम हो जाता था,’’ पामू ने हंस कर कहा.

वह आगे बोला, ‘‘2 दिन पहले ही इधर आया हूं. इधर होटल में किराया कम है न,’’ मगर ऐसा उस ने अपनी मजबूरी और परेशानी छिपाने के लिए कहा था. उस का यह अंदाज पुराना था और यह तो रोशन ने खूब भांप ही लिया था.

‘‘पामू, अभी तो शुरुआत है. मगर यहां कभीकभार ऐसे टूरिस्ट मिल जाते हैं, जो कलाकार को मुंहमांगी रकम देते हैं,’’ रोशन बोला.

‘‘हांहां, ऐसा हुआ है न मेरे साथ. 2 बार हुआ है. मुझे रुपया भी दिया और सैंडविच भी खिलाया, इसलिए तो मुझे भरोसा है,’’ पामू अब भी उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं चाहता था.

‘‘कल मिलते हैं,’’ कह कर रोशन ने पामू से विदा ली.

रोशन झलक से फोन पर बात करता हुआ चला जा रहा था. ?ालक के ब्याह को अब 4 साल से भी ऊपर हो चले थे, इसलिए झलक अब एकदम बिंदास रहती थी. बच्चे उस ने पैदा किए नहीं. अपने तरीके से दिल से जिंदगी जीने लगी थी झलक.

रोशन ने बातों ही बातों में झलक को पामू की दशा का भी सच्चा हाल बयान कर दिया था. झलक ने इस बात को काफी गंभीरता से सुना.

झलक के साथ एक कमाल की बात हो गई थी. वह अब अपनी जिंदगी को खेल सम?ाने लगी थी. इसी खेलखेल में एक दिन झलक लौटरी के 50 टिकट खरीद कर ले आई. हर टिकट 500 रुपए का था. मगर कमाल की बात यह हुई कि 5 लाख का नकद इनाम झलक के नाम खुल गया. झलक की महिमा ही बढ़ गई.

मगर झलक भी ऐसी मजेदार कि उस ने एक रुपया तक न रखा. तथाकथित पति को ही सारे नोट थमा दिए. बस, उस घटना के बाद तो जैसे जादू ही हो गया था. अब ससुराल में झलक को कोई न रोकता था, न टोकता था.

झलक भी कोई बावली न थी कि पागलपंथी ही करने लगे. आचरण तो उस का संतुलित ही था, मगर अब वह अपने तरीके से बड़े फैसले लेने लग गई थी.

मिसाल के तौर पर झलक का देवर अपनी गर्लफ्रैंड को काठमांडू घुमाने ले जाना चाहता था. झलक ने उस की इस इच्छा का मान रखा. उस के पास पूरे 20 रुपए न थे, तो झलक ने उसे 20,000 रुपए दिए.

देवर झलक का मुरीद बन गया था. बात बाद में खुल गई थी. सारे परिवार को भी पता चल गया, मगर झलक पर किसी ने उंगली तक न उठाई. उस की पहली वजह यह कि झलक ने जो किया अपने परिवार के लिए किया. दूसरी और जोरदार वजह यह कि उसी गर्लफ्रैंड से देवर की सगाई और शादी भी हो गई थी.

अब देवरदेवरानी झलक की मुट्ठी में बंद थे, मगर झलक ने अपनी मुट्ठी कभी कस कर रखी ही नहीं.

इस बार रोशन की बात का मतलब महसूस कर झलक ने अपने तेज और बल का इस्तेमाल कर लिया. एक ही घंटे की चर्चा में देवरदेवरानी ने हां भर दी. गोवा जा कर और वहां का मुआयना कर के एक छोटा होटल खोलने की इच्छा बन गई उन की.

उसी रात को तीनों रवाना हो गए. झलक और देवरानी पीछे बैठे. आगे की सीट पर कार ड्राइवर और देवर. कार ड्राइवर भी इतना होशियार था कि उस ने तय समय से 4 घंटे पहले गोवा पहुंचा दिया.

कार्निवाल की धूम से सारा गोवा जवांजवां था. झलक अपने हनीमून के बाद अब आई थी, मगर कैंडोलिम
तो उस ने आज ही देखा था. रोशन से मुलाकात हो गई. खूब गपशप हुई.

इस दफा रोशन को यह वाली झलक कुछ अलगअलग सी लगी. मगर रोशन कुछ ही देर में सामान्य भी हो गया था, क्योंकि अब वह खुद भी पहले वाला रोशन तो था नहीं.

24 घंटे बाद देवरदेवरानी ने रोशन की मदद से कुछेक जगह बातचीत कर ली थी. एक बनाबनाया होटल मिल रहा था. थोड़ी मरम्मत की दर कार थी. उस की जिम्मेदारी रोशन ने उठा ली थी.

धीरेधीरे होटल की सजावट के लिए पामू को और्डर मिल गया था. पामू को तो जैसे मनचाही मुराद मिली, बिन मांगे मोती मिले.

रोशन ने पामू को ठीक से समझा दिया था. उस के लिए रहने और खाने का मुफ्त इंतजाम हो गया था. इस के अलावा टीम लगा कर कलाकृति बनाने का अलग से एडवांस मिल रहा था. इस तरह अब एक साल तक पामू को इधर ही काम करना था.

झलक ने पामू की जीवन नैया भी डगमग होने से बचा ली थी. इस डील को पक्का कर के यह तीनों अब लौट रहे थे. रोशन ने हाथ हिला कर वापस जाती झलक के चेहरे को गौर से देखा था.

रोशन को लगा जैसे उस की जन्मजन्मांतर की पत्नी झलक उस से कह रही है, ‘रोशन, तुम मुझे भी लौटा कर ले चलो. चलो, हम गोमती के पुल के नीचे बैठ कर समोसाजलेबी खाएं. अपनी वहीं बातें करें.’

रोशन का हिलता हुआ हाथ एकाएक रुक गया. उस के कान में झनझनाहट सी हुई. लगा, जैसे उस से कोई फुसफुसा कर कह रहा था. इस झलक ने रोशन की जिंदगी संवारने और अपनी बरबाद करने के लिए यह जन्म लिया है. Hindi Family Story

Hindi Funny Story: हनीमून की सनक

Hindi Funny Story: पिछले हफ्ते सब से छोटे बेटे की शादी ईएमआई पर निबटाते ही इधर मेरे मन में गंगा स्नान की भावना कुलांचें मारने लगी, तो उधर मेरी बीवी के मन में हनीमून पर जाने की.

सब से छोटे बेटे की शादी कर के लगा ज्यों गंगू तेली ने गृहस्थी का रण नहीं, बल्कि महारण जीत लिया हो. मैं अपने को सिकंदर से महान फील कर रहा था. हर शादीशुदा अपने घर में बच्चा पैदा होने पर उतना खुश नहीं होता जितना खुश वह उस का ब्याह हो जाने पर होता है.

बच्चों की शादियों से निबटीं तो एक दोपहर अचानक बीवी ने मेरे दिमाग पर भिनभिनाते हुए कहा, ‘‘सुनो जी…’’

‘‘अब क्या है?’’ मैं ने मिमियाते हुए पूछा तो वे बोलीं, ‘‘हे पतित देव, इस गृहस्थी में कदमकदम पर हम जहन्नुम तक गए, पर आज तक हनीमून पर नहीं गए. हनीमून में हुए बलिदानी कहते हैं कि शादी के बाद हनीमून पर गए बिना स्वर्ग नहीं जाया जाता.

‘‘बीतिकाल के कवि बीमारी लाल भी कह गए हैं कि हनीमून स्वर्ग का मारग है, जहां सयानप चालाकी सब सही. तहां झूठे चलै संग एक्स फ्रैंड के, जग जो कहै अब सो कही.’’

‘‘मतलब?’’ मैं दोबारा मिमियाया.

‘‘मतलब यह कि स्वर्ग का रास्ता हनीमून से हो कर जाता है. गृहस्थी में रहते बहुत नरक भोग लिया, अब…’’

अपनी पीठ पर पत्नी का सिर ढोते उस के मुख से ज्यों ही जहर से भी जहर वचन सुने तो मैं तो मैं, मेरी रूह तक कांप उठी. लगा, ज्यों उस में उस समय सोनम की आत्मा प्रवेश कर गई हो.

पर मैं राजा नहीं हूं भाई साहब… माना, मैं ने कदमकदम पर उस की हर इच्छा का खून किया है, ऐसे में अब कहीं इस ने किसी को मेरे नाम की सुपारी दे कर मेरा फाइनल खून कराने की तो नहीं सोची होगी? पर फिर सोचा कि अपनी मैरिज लव मैरिज तो है नहीं.

वैसे अंदर की बात कहूं सज्जनो, आजकल भाई लोगों से उतना डर नहीं लगता जितना डर नएनए तो छोडि़ए, 50 साल पुराने मुझ जैसे पतिपत्नियों को भी एकदूसरे से लग रहा है.

आह, क्या हनीमून जमाना आ गया भाई साहब. नहीं कहीं हनी, न कहीं मून. बस जिधर देखो, उधर खून ही खून.

मतलब, मेरा इधर का काम खत्म तो अब उधर का काम भी खत्म? आह रे गृहस्थी, तेरी यही कहानी. जिम्मेदारियां खत्म तो आत्मा हनीमूनयानी. लगता है, गृहस्थी की चक्की में पिसते मर्द की जरूरत परिवार को तभी तक रहती है जब तक उस के कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है. जैसे ही जिम्मेदारियां खत्म, वह काम का न काज का दुश्मन अनाज का.

आखिर मैं ने अपने को गुप्त हौसला देते हुए उसे समझा कर कहा, ‘‘देखो बेगम, जो अरेंज्ड मैरिज करते हैं, वे हनीमून पर नहीं जाया करते. वे हर शाम अपने से भी अपना मुंह छिपाते गलीसड़ी सब्जियां लाने सब्जी मंडी जाया करते हैं.

‘‘हनीमून जाने की तो छोड़ो, हम तो अब श्मशान घाट जाने लायक भी नहीं. अरेंज्ड मैरिज वालों के लिए हनीमून पर जाना पाप नहीं, महापाप होता है.

‘‘अरेंज्ड मैरिज वाले जो हनीमून पर जाते हैं तो वे मरने से पहले ही नरक को जाते हैं. हनीमून पर लव मैरिज करने वाले जाया करते हैं.

‘‘हनीमून पर जाना लव मैरिज वालों को ही शोभा देता है. हनीमून पर लव मैरिज करने वालों का ही एकाधिकार है. अरेंज्ड मैरिज करने वालों को ऐसी छिछोरी हरकत शोभा नहीं देती है.’’

हे मेरे समय के घोड़ी की लात खाने वाले अरेंज्ड विवाहितो, पता नहीं मैं कितना उन दिनों का बचाखुचा अरेंज्ड मैरिड खुशनसीब हूं जिन दिनों की शादियों में न फोटोग्राफर कदमकदम पर वरवधू को फेरे लगाने से रोका करता था और न ही शादी के तुरंत बाद हनीमून पर जाने के बाद मरवाए जाने की परंपरा थी.

उन दिनों शादी के तुरंत बाद हर शादीशुदा अपनी बीवी को दिल में लिए चार पैसे कमाने चुपचाप शहर चला जाया करता था और बीवी घर में बारहमासे गा कर पति की कमी को पूरा किया करती थी.

वैसे अब काबिलेगौर है यह कि मेरी जायज हरकत पर हरपल सोशल मीडिया के टच में रहने वाली मेरी परमादणीय बीवी अब मुझे हनीमून पर जाने के लिए उकसाने हेतु अगला क्या तीर चलाती है?

वैसे किसी भी वर्ग के परिवार की जिम्मेदारियां दुनियाभर के झूठ बोल, इधरउधर ठगी करने के बाद शायद ही कोई बाप होगा, जो स्वर्ग जाना नहीं चाहता होगा. Hindi Funny Story

Hindi Story: दूसरा मौका

Hindi Story: सदैव की प्रेमिका शीरी उस से उम्र में बड़ी थी और निचली जाति की भी. बड़ी मुश्किलों से उन की शादी हुई, पर ससुराल में शीरी को ज्यादा इज्जत नहीं मिली. बाद में वह औफिस में भी तरक्की करती गई, तो सदैव को यह बाद खटकने लगी. उस ने एक प्लान के तहत शीरी से शादी की थी. क्या था वह प्लान?

लखनऊ शहर के बाहरी छोर पर बना हुआ यह एक ओपन एयर रैस्टोरैंट था. ओपन एयर यानी सबकुछ खुला हुआ, यहां तक कि किचन में बनने वाली डिश को भी ग्राहक अपनी आंखों के सामने देख सकता था.

रैस्टोरैंट के बीच में अमलतास का एक पेड़ था, जिस के पीले रंग के फूल अपनी छठा बिखेर रहे थे. इस पेड़ के चारों तरफ कुरसियों और टेबलों को सजाया गया था और किनारे की क्यारियों में देशीविदेशी फूल लगे हुए थे.

एक किनारे पर आर्टिफिशियल झरना बना हुआ था, जिस से गिरता हुआ पानी आंखों को सुकून देता था. कभीकभी जब हवा का झौंका आता तो मिलेजुले फूलों की खुशबू फैल जाती. तब यहां बैठे प्रेमी जोड़ों का मन और भी रूमानी हो उठता था.

सदैव और शीरी ने किनारे वाली टेबल चुनी थी और दोनों अपने लिए मनपसंद चीजों का और्डर भी दे चुके थे. उन के यहां आने का मकसद सिर्फ टेस्टी खाना ही नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के बारे में संजीदा बातें भी करना था.

सदैव और शीरी दोनों एक ही न्यूज चैनल ‘खबर तक’ में काम करते थे. सदैव एसोसिएट प्रोड्यूसर था, जबकि शीरी न्यूज रिपोर्टर थी.

साथ काम करतेकरते कब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया पता ही नहीं चला और दोनों एकदूसरे के प्यार को 4 साल तक ईमानदारी की कसौटी पर जांचतेपरखते रहे और फिर जब दोनों ने समझ लिया कि उन के प्यार का रंग पक्का है, जिस पर पानी की कोई बौछार कोई असर नहीं डालेगी, तब उन दोनों ने शादी के बंधन में बंध जाने का फैसला कर लिया.

पर सदैव और शीरी के लिए शादी की राह इतनी आसान नहीं हो जाने वाली थी. सदैव अभी 25 साल का था और शीरी 27 साल की. उन दोनों का अलगअलग जाति से होना भी समस्या था, क्योंकि सदैव ब्राह्मण कुल से था, जबकि शीरी लोहार जाति की थी.

सदैव साधारण मिडिल क्लास परिवार का था. उस के परिवार वालों ने सदैव को पढ़ाने के लिए बैंक से
लोन लिया था, जिसे वे कई सालों तक चुकाते रहे थे, दूसरी तरफ शीरी मिर्जापुर के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थी.

शीरी के पापा एक मेकैनिकल वर्कशौप चलाते थे और तकरीबन 15 लोगों का स्टाफ था उन की वर्कशौप पर और इसी के सामने उन का आलीशान मकान बना हुआ था.

सदैव और शीरी दोनों जानते थे कि दूसरी जाति में शादी करना अब भी उतना आसान नहीं है, पर शीरी बहुत आशावादी लड़की थी. उस का मानना था कि अच्छा सोचने से अच्छा होता है, जबकि सदैव पर नैगेटिव सोच हावी रहती थी, क्योंकि जिस परिवार से वह ताल्लुक रखता था, वह परिवार भी छोटी सोच से अभी तक ऊपर नहीं उठ पाया था.

हालांकि, शीरी और सदैव ने जब शादी करने का फैसला किया था उस के बाद से शीरी अकसर ही सदैव की मां से, सदैव के दोस्त की हैसियत से फोन पर बात किया करती और उन का हालचाल लिया करती थी.

सदैव की मां भी बड़े प्यार से शीरी से बातें करती थीं, पर तब तक ही जब तक उन्हें यह नहीं पता चला कि उन का बेटा शीरी से शादी करना चाहता है.

‘‘क्या, अब उस लोहारिन से शादी करेगा तू, हमारा धर्म नष्ट कराएगा तू… नीच जाति की लड़की को घर लाएगा,’’ बम फूट गया था जैसे सदैव के घर में और कई बार बेटे और मातापिता में शादी को ले कर तीखी बहस भी हुई.

मिर्जापुर में जब शीरी ने फोन पर अपने मांबाप को उस की उम्र से छोटे और एक ब्राह्मण लड़के से शादी करने की बात बताई थी, तो उसे भी नाराजगी और गुस्सा ही झेलना पड़ा था.

शीरी के मांबाप ने खूब खरीखोटी सुनाई. उन्हें लोहार जाति का होने पर कोई अफसोस नहीं था और इसीलिए वे लोग चाहते थे कि शीरी अपनी जाति वाले किसी लड़के से ही शादी करे, ब्राह्मण जाति का लड़का उन्हें बिलकुल लुभा नहीं रहा था.

पर शीरी अपने मन और सदैव के प्यार के आगे मजबूर थी, सो उस ने अपने घर में साफ कर दिया था कि सदैव के अलावा वह किसी और से शादी नहीं करेगी.

‘‘तो क्या तुम अपनी ब्राह्मण सास से अपने लिए ‘लोहारिन’ और ‘छोटी जाति’ जैसे शब्द सुन पाओगी?’’

शीरी की मां ने कहा तो शीरी ने बदले जमाने और नई सोच का हवाला देते हुए कहा, ‘‘आप लोग अपने मन से कहानियां मत बनाओ. जहां तक सदैव के घर वालों की बात है तो सदैव उन्हें मना लेगा, पर पहले आप लोग तो मान जाओ.’’

सदैव ने भी अपने घर में अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर उस की शादी शीरी से नहीं होगी तो वह खुदकुशी कर लेगा. उस की बात सुन कर मांबाप दोनों सन्न रह गए थे और बेटे की इस बात ने उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था.

दोनों परिवार आपस में मिले. उन लोगों की मुलाकात के समय काफी तनाव का माहौल था, पर दोनों परिवार ही अपने बच्चों की जिद के आगे मजबूर थे, इसलिए तमाम जद्दोजेहद और उठापटक के बाद बड़े बेमन से दोनों तरफ से शादी के लिए हां तो कर दी गई.

लेकिन सदैव के मांबाप चाहते थे कि शादी के कार्ड पर लड़की के नाम के आगे ‘विश्वकर्मा’ की जगह ‘शर्मा’ लिखवा दिया जाता तो ठीक रहता, क्योंकि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में एक ब्राह्मण वर्ग शर्मा नामक सरनेम का इस्तेमाल करता है, जिस से ब्राह्मण परिवार की साख बनी रहती और रिश्तेदारी में लड़की के लोहार होने की बात दब जाती.

पर अपना सरनेम बदला जाना शीरी के मांबाप को कतई मंजूर नहीं हुआ और उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया.

इस बात पर सदैव ने भी नाराजगी जताई तो सदैव की शादीशुदा बहन रोमी ने बीच का रास्ता बताया कि वे लोग 2 तरह के कार्ड छपवाएं. एक पर ‘विश्वकर्मा’ सरनेम हो जो लड़की वालों का रियल सरनेम है, इसलिए वे कार्ड उन्हें दिखा दिए जाएं, जबकि जो कार्ड उन्हें अपनी रिश्तेदारी में बांटने हैं उस पर वे लोग ‘शर्मा’ सरनेम डलवा दें और इस कार्ड की भनक लड़की वालों को न दी जाए.

बहन की इस सलाह पर ही अमल किया गया और इसे बड़ी चालाकी से अंजाम दिया गया.

शादी के कर्मकांड में भी कई रुकावटें आईं, पर सदैव के पापा सब बातों को सुलझे दिमाग से संभालते गए और शीरी और सदैव की शादी हो गई.

सदैव और शीरी को शादी के बाद सदैव के पुश्तैनी घर यानी मनमीत नगर जाना था जो नोएडा से तकरीबन 550 किलोमीटर की दूरी पर तराई इलाके में बसा हुआ था.

शीरी ने कार में बैठेबैठे ही सदैव के मकान पर नजर डाली जो एक छोटा सा साधारण मकान था. अंदर जा कर देखने पर भी घर और घर के लोग सामान्य से ही लगे, पर इस से शीरी को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उसे तो कुछ दिन यहां रुकने के बाद वापस नोएडा अपने 3 बीएचके के फ्लैट में ही जाना था, जिसे सदैव ने किराए पर ले रखा है.

पहलेपहल ही शीरी का स्वागत अच्छा नहीं हुआ. उस को लंबा घूंघट न करने के लिए डांट पड़ी और किचन में घुसने को मना कर दिया गया, जबकि शीरी पहले से ही इन सब बातों के लिए तैयार थी.

शीरी किसी आदर्श बहू की तरह रोज सुबह 5 बजे जाग जाती और घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद नहाती, फिर नाश्ते की तैयारी करने लगती, जबकि घर के सभी लोग तब तक सोते ही रहते. सास के जागने के बाद वह उन्हें रात की भीगी हुई मेथी का पानी देती और ससुर को अंकुरित स्प्राउट, जबकि देवर का नाश्ता रोज बदल कर देने का फरमान था सास का, सो देवर के लिए रोज इंटरनैट से देख कर नया नाश्ता बना देती.

‘‘ये चावल किस ने पकाए हैं? जरूर शीरी भाभी ने पकाए होंगे,’’ किचन में ननद की आवाज गूंज रही थी.
पर शीरी ने बिना सब्र खोए कहा, ‘‘दीदी, अगर आप को दूसरे चावल खाने हैं, तो मैं दोबारा पका देती हूं.’’

इस बात के बदले में ननद से कुछ न बोला गया. वह किचन से बाहर पैर पटकती चली गई.

जब तक शीरी अपनी ससुराल में रही, तब तक कोई ऐसा दिन नहीं गया होगा कि उस के काम में कोई कमी नहीं निकाली गई हो.

पर फिर भी शीरी अपनी जबान को दांतों तले दबाए रही और किसी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा.

आज शीरी और सदैव को नोएडा अपने काम पर लौटना था, इसलिए शीरी किसी विजेता की तरह नोएडा वापस आ रही थी. दोनों ने वापस आ कर औफिस जौइन कर लिया था.

अपनी शादी से पहले शीरी ने कश्मीर में हुए एक आतंकी हमले के दौरान तमाम खतरों के बीच जा कर बहुत शानदार रिपोर्टिंग की थी. आज काम पर लौटते ही उस के क्रिएटिव हैड ने अपने केबिन में बुला कर उसे शादी की बधाई देने के बाद शाबाशी दी और साथ ही उस की बेहतर और बेबाक रिपोर्टिंग के लिए उसे ‘न्यूज स्टार’ नामक अवार्ड मिलने की बधाई भी दी.

शीरी ने तुरंत ही यह बात बताने के लिए सदैव को फोन लगाया तो उस ने फोन काट दिया. उस की किसी गलती पर बौस ने उसे डांटा था. शाम को भी वह अनमना सा था.

‘‘यह सब होता रहता है,’’ शीरी ने कहा तो सदैव को बुरा लग गया.

‘‘तुम्हें तो अवार्ड दिया जा रहा है, इसलिए तुम खुश हो,’’ सदैव ने झंझलाते हुए कहा.

सदैव का यह रूप देख कर शीरी ने शांत हो जाना ही ठीक समझा. अगले 2-3 दिन तक घर का माहौल काफी बोझिल सा रहा.

अगले दिन सदैव ने शीरी से अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उन के फ्लैट का किराया बहुत ज्यादा जाता है, तो क्यों न वे कोई फ्लैट खरीद लें. शीरी को इस में कोई बुराई नहीं नजर आई.

सदैव और शीरी ने अपने अपार्टमैंट्स से कुछ दूरी पर बने ‘शालीमार अपार्टमैंट्स’ में एक फ्लैट बुक कर दिया और 50 फीसदी रकम का भुगतान कर के बाकी पैसों की मासिक किस्त बनवा ली. शीरी ने अपनी सैलेरी से ईएमआई का पेमेंट करना स्वीकार कर लिया था.

कुछ दिनों के बाद ही शीरी ने अंबेडकरनगर में जा कर गरीब बच्चों के दुखदर्द को सामने लाने के लिए रिपोर्टिंग की, जिस की खूब तारीफ हुई और अब स्टाफ के लोगों को लगने लगा था कि हो न हो बहुत जल्दी ही शीरी को उस के लगातार अच्छे काम के लिए प्रमोशन दिया जाएगा.

और हुआ भी वही, शीरी को प्रमोट कर दिया गया, जबकि सदैव का साधारण सा इन्क्रीमेंट ही किया गया.
शाम को जब सदैव घर आया तो चाय पीते समय काफी गुस्से में लग रहा था और बौस और मैनेजमैंट के भेदभाव वाले रवैए के बारे में अनापशनाप बोल रहा था.

कहीं न कहीं सदैव के मुंह से यह बात भी निकल गई कि शीरी का अवार्ड और प्रमोशन उस के लड़की होने के चलते है, क्योंकि लड़कियों के लिए बहुत सारी चीजें पाना आसान हो जाता है. बौस लोग लड़कियों को पसंद करते हैं और उन्हें आगे बढ़ाने से उन का भी उल्लू सीधा होता है.

‘‘उल्लू सीधा होने से क्या मतलब है सदैव? तुम भी मेहनत करो तो तुम भी आगे बढ़ सकोगे,’’ शीरी का सब्र जवाब दे रहा था, इसलिए उस ने सवाल किया.

‘‘अरे, यह बात तुम अच्छी तरह समझती हो. अब भला उस अंबेडकरनगर वाली रिपोर्टिंग में तो ऐसी कोई खास बात नहीं थी, जिस के लिए वाहवाही की जाए.

‘‘पर आजकल तो दलित जाति के लिए दो हमदर्दी भरे शब्द बोल कर कोई भी लाइमलाइट में आ सकता है,’’ सदैव गुस्से में बक रहा था.

कितना जहर भरा था सदैव के मन और उस की बातों में, यह शीरी को अब धीरेधीरे पता चल रहा था, पर उस के पास सदैव के इस बरताव पर सिर्फ अवाक और दुखी होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

4 महीने बीत चुके थे और इन्हीं खट्टीमीठी बातों के बीच शीरी को पता चला कि वह पेट से है. तुरंत ही उस ने यह खबर सदैव को सुनाई.

बाप बनने की खबर सुन कर सदैव भी खुशी से फूला नहीं समाया और शीरी ने जल्द ही अपनी मां को फोन लगा कर यह खुशखबरी सुना दी.

मां ने ढेर सारी सावधानियां रखने की ताकीद करनी शुरू कर दी, जबकि अभी तो शीरी का पेट से होना शुरुआती दौर में था.

7 महीने हो गए और अब शीरी को औफिस से मैटरनिटी लीव ले कर घर पर ही रहना था.

एक दिन शीरी ने कहा, ‘‘सासू मां यहां आ जातीं, तो ठीक रहता.’’

इस बात पर सदैव ने भी रजामंदी जताई और अपनी मां को नोएडा आ कर रहने को कहा, पर उसे अपनी मां की तरफ से कड़वे शब्द ही सुनने को मिले, ‘‘तो तू क्या चाहता है कि अब मैं आ कर तेरी बीवी की सेवा करूं और जब उस का बच्चा हो तो नौकरानी की तरह काम करूं?’’

सदैव समझ गया था कि उस की मां नोएडा नहीं आएंगी, इसलिए उस ने शीरी से मिर्जापुर से अपनी मां को ही बुला लेने को कहा.

शीरी ने अपनी मां को बुला लिया और उस की मां ने आते ही किचन और शीरी की देखभाल का जिम्मा संभाल लिया.

समय आने पर शीरी ने एक खूबसूरत सी बेटी को जन्म दिया. सदैव बहुत खुश हुआ, पर उस की मां और पापा की तरफ से कड़वे शब्द ही आए कि ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. ऊंचे कुल की लड़की से शादी करता तो लड़का पैदा होता. इस ने तो लड़की पैदा कर के रख दी है. और करो नीची जाति की लड़की से शादी’.

सदैव को अपने मांबाप से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी, पर अब तो शीरी से शादी कर के वह भी जैसे परेशान ही हो रहा था.

औफिस में शीरी का बढ़ता हुआ कद और फिर लड़की पैदा होने पर अपने घर वालों द्वारा कोसे जाने से तो सदैव परेशान था ही कि इसी समय एक घटना और हो गई.

शीरी के चचेरे भाई हर्ष का उस की पत्नी से घरेलू विवाद के चलते तलाक हो गया, जिस के चलते शीरी परेशान थी, तो सदैव ने कहा, ‘‘तलाक के मामले हम लोगों में बहुत कम होते हैं, जबकि तुम लोगों में तो बातबात में तलाक हो जाता है.’’

सदैव की इस बात पर शीरी ने एतराज जताते हुए ‘हम लोग’ और ‘तुम लोग’ जैसे शब्दों का मतलब पूछा, जिस पर सदैव ने ‘हम लोग’ का मतलब ऊंची जाति और ‘तुम लोग’ का मतलब नीची जाति बताया.

शीरी को सम?ा में आ रहा था कि सदैव भले ही अच्छी नौकरी कर रहा था, देखने में भी अच्छा था, पर उस की सोच बहुत छोटी थी और वह उस सोच से ऊपर भी नहीं बढ़ पा रहा था.

न जाने कितनी बार शीरी ने सदैव से कहा कि अगर उसे औफिस में तरक्की नहीं मिल पा रही है, तो उसे किसी दूसरे चैनल में नौकरी करनी चाहिए, पर सदैव तो जहां था वहीं पड़े रहना चाहता था, उलटे शीरी की ये बातें उसे बुरी लग जाती थीं, तो वह उस से सीधे मुंह बात नहीं करता था.

2 दिन बाद शीरी का बर्थडे था. शीरी बहुत खुश थी, पर सदैव के चेहरे पर खुशी का कोई नामोनिशान नहीं था. हालांकि, उस ने बेमन से शीरी को विश जरूर किया और औफिस के लिए निकल गया.

शाम को सदैव जल्दी नहीं आया तो पूछने पर उस ने बताया कि वह औफिस में बिजी है. सदैव रात के 10 बजे घर आया. उस ने शराब पी हुई थी. वह सीधा अपने कमरे में चला गया. उस के इस बरताव पर शीरी का सब्र जवाब दे गया था.

शीरी ने सदैव से बात शुरू की, ‘‘मैं ने तो अपनी जाति और अपनी उम्र नहीं छिपाई थी. तुम्हारे परिवार से जो भी दर्द मिला, वह भी मैं ने सब हंस कर सहा, पर शादी के बाद तुम्हारे बरताव और प्यार में जमीनआसमान का फर्क क्यों आया?’’

शीरी आज सबकुछ साफ कर लेना चाहती थी. सदैव ने भी लड़खड़ाती जबान में उसे जवाब दिया, ‘‘दरअसल, तुम से शादी करना मेरा एक कैलकुलेशन था.

‘‘कैसा कैलकुलेशन?’’ शीरी ने पूछा, जिस के बदले में सदैव ने जो बताया उसे सुन कर शीरी चौंक गई थी.

सदैव ने नशे की झांक में शीरी को बताया कि उस ने शीरी से शादी सिर्फ इसलिए की है, क्योंकि आमतौर पर उस जैसी अमीर लड़की से उस की शादी नहीं हो पाती, वह नोएडा में कभी अपना फ्लैट नहीं खरीद पाता. मतलब, सदैव ने शीरी के परिवार के रुतबे और पैसे को देखते हुए सोचासमझा जाल बिछाया और शीरी से शादी की.

शीरी की समझ में आ रहा था कि उस ने सदैव से शादी कर के भारी भूल कर दी है. उस ने तो सदैव से प्यार किया था पर सदैव ने उसे अपना झूठा चेहरा ही दिखाया था.

लेकिन आज सदैव शराब के नशे में था, इसलिए न चाहते हुए भी उस की जबान चल रही थी, ‘‘और सच कहूं तो मुझे लगता है कि यह बच्चा मेरा नहीं है. मुझे तुम्हारे उस कलीग आशु पर शक है. आखिर वह भी तो छोटी जाति काही है.’’

सदैव ने यह बात कह कर एक हिचकी ली, पर उस के इन शब्दों ने मानो शीरी के कानों में पिघला सीसा उड़ेल दिया था. उसे लगा कि अपने गुस्से को संभालने में उस के शरीर का सारा जोर लगा जा रहा है.

शीरी के नथुने फड़कने लगे थे और पीछे खड़ी उस की मां की आंखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझ से तुम को समझने में भूल हो गई,’’ शीरी यह कहते हुए उठ खड़ी हुई थी.

अगली सुबह ही शीरी ने सदैव के खिलाफ घरेलू हिंसा और दिमागीतौर पर परेशान का केस दायर कर दिया और सदैव के पास तलाक के कागजात भिजवा दिए.

पहले तो सदैव ने इस बात को हलके में लिया, पर जब उसे लगातार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और केस और वकीलों का खर्चा उठाना पड़ा, तो उस की जेब जवाब देने लगी. अभी तो उसे शीरी का खर्चा देना था और अपनी बेटी को हर महीने तय रकम भी देनी थी… और अब तो उस के हाथ से उस का फ्लैट भी निकल जाएगा.

सदैव ने शीरी से माफी मांग कर समझौता करना चाहा, पर शीरी अपने फैसले पर अडिग थी.

‘‘मैं ने तुम्हें समझने में पहली बार तो भूल कर दी थी, पर दूसरी बार भूल नहीं करूंगी. बड़ी मुश्किल से दूसरा मौका मिला है अपनी जिंदगी को संवारने का,’’ शीरी के चेहरे पर कठोर भाव थे.

शीरी ने ठीक मौके पर सदैव को पहचान लिया था, जिस ने प्रेम का जाल सिर्फ इसलिए फैलाया ताकि शीरी जैसी अमीर लड़की को अपनी पत्नी बना कर उस के पैसे पर ऐश कर सके.

जाति और ऊंचनीच के ढेर में पड़े हुए सदैव को तलाक दे कर शीरी ने खुद की जिंदगी को दूसरा मौका दिया था. Hindi Story

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