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हवस की मारी : रेशमा और विजय की कहानी – भाग 3

‘‘मेरे पिता मेरी मां को बहुत प्यार करते थे. मां की अचानक मौत से वे इतने दुखी हुए कि उन्होंने खूब शराब पीनी शुरू कर दी. मैं बड़ी होने लगी थी, मुझ में अच्छेबुरे की समझ भी आने लगी थी.

‘‘पिता ने एक के बाद एक 4 शादियां कर डालीं. पहली 2 बीवियों को वे अपने दोस्तों को सौंपते रहे, जिस से तंग आ कर उन्होंने नदी में डूब कर जिंदगी खत्म कर ली.

‘‘तीसरी से शादी रचा कर उस के साथ भी वही बुरा काम वे करते रहे. उस ने बहुत समझाया, पर पिता नहीं माने. ‘‘एक दिन उस ने भी अपने मायके में जा कर खुदकुशी कर ली.

‘‘मेरे पिता पर उन की खुदकुशी करने का कोई असर नहीं पड़ा. पैसे के बल पर उन के खिलाफ कोई केस नहीं बन पाया.

‘‘चौथी औरत इतनी खूबसूरत थी कि अपने प्रेमभाव से मेरे पिता को वश में करते हुए उन की बुरी आदतें कई महीने तक छुड़ा दीं. तब मैं 15 साल की उम्र पार कर चुकी थी.

‘‘चौथी मां भी मुझे अपनी सगी बेटी की तरह प्यार करती थी. 3 साल तक वह मुझे पालती रही, लेकिन उसे कोई ऐसी खतरनाक बीमारी लगी कि मर गई.

‘‘मेरे जल्लाद पिता फिर से शराब पीने लगे, बाजारू औरतों को घर में बुला कर ऐयाशी करने लगे. मैं अकसर देखती, तो आंखें बंद कर लेती.

‘‘उन के दोस्त भी अकसर घर पर आ कर शराब पीते और औरतों से ऐश करते. उन की गिद्ध जैसी नजरें मुझे भी देखतीं, मानो मौका पाते ही वे मुझे भी नहीं छोड़ेंगे.

‘‘मैं उन से दूर रहती थी. उन से बचने के लिए अकसर रात को अपनी सहेलियों के यहां सो जाती थी.

‘‘एक दिन मेरे पिता नशे में चूर किसी नाचगाने वाली के यहां से लौटे थे. उन की निगाह मुझ पर पड़ी. मैं मैक्सी पहने सो रही थी. शायद मेरा कपड़ा कुछ ज्यादा ही ऊपर तक खिसक गया था.

‘‘नशे में चूर वे अपने खून की ममता भूल गए और मेरे पलंग पर आ बैठे. छेड़ते हुए मेरे जिस्म को सहलाने लगे.

‘‘मेरी नींद खुली, तो वे बोले, ‘लेटी रहो. बिलकुल अपनी मां की सूरत पाई है तुम ने, कोई फर्क नहीं. उस की याद आ गई, तो तुम्हें गौर से देखने लगा.’

‘‘उस के बाद मैं ने बहुत हाथपैर पटके, पर वे नहीं माने. उन्होंने मुझे अपनी हवस का शिकार बना डाला. मैं बहुत रोई, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा.

‘‘उस दिन के बाद से वे अकसर मेरे साथ वही कुकर्म करते रहे. मैं उन के खिलाफ किस से क्या फरियाद करती. 2 बार खुदकुशी करने की कोशिश की, पर बचा ली गई.’’

इतना कह कर रेशमा रोने लगी. विजय चाहता था कि उस के रो लेने से उस का मन शांत हो जाएगा. सालों की आग जो दिल में छिपाए उसे तपा रही थी, आंसू बन कर निकल जाएगी.

‘‘मेरी शादी आप के यहां इसलिए खूब दहेज दे कर कर दी गई, जिस से सब का मुंह बंद रहेगा. मुझे शादी के चौथे दिन बाद उस पिता ने बुलवा लिया. उस का पाप मेरी कोख में पलने लगा था. अगर उजागर हो जाता, तो उस की बदनामी होती. मेरा पेट गिरवा दिया गया.

डेढ़ महीने बाद ठीक हुई, तो मुझ फिर यहां पटका गया, ताकि जिंदगीभर उस कलंक को छिपा कर रखूं. ‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरे इस पाप की छाया आप जैसे अच्छे इनसान पर पड़े. आप मुझे दासी समझ कर यहां पड़ी रहने दीजिए.

‘‘अगर आप ने मुझे घर से निकाल दिया, तो मेरे पिता आप को और आप के घर वालों पर मुकदमा चला कर परेशान कर डालेंगे. आप चुपचाप दूसरी शादी कर लें, मेरे पिता आप लोगों के खिलाफ कुछ नहीं कर पाएंगे. जब मैं चुप रहूंगी, तो कोई कोर्ट मेरे पिता की आवाज नहीं सुनेगा,’’

इतना कह कर रेशमा विजय के पैरों पर गिर पड़ी. ‘‘तुम ने अपनी आपबीती बता कर अपने मन को हलका कर लिया. समझ लो कि तुम्हारे साथ अनजाने में जो हुआ, वह एक डरावना सपना था.

‘‘मैं तुम्हारे दर्द को महसूस करता हूं. उठो, रेशमा उठो, तुम ने कोई पाप नहीं किया. तुम्हारी जगह मेरे दिल में है. तुम्हारी चुनरी का दाग मिट गया. ‘‘आज से तुम्हारी जिंदगी का नया सवेरा शुरू हुआ, जो अंत तक सुखी रखेगा,’’ कहते हुए विजय ने उसे उठाया, उस की आंखें पोंछीं और सीने से लगा लिया.

रेशमा भी विजय का प्यार पा कर निहाल हो गई.

घर का न घाट का: क्या धोखेबाज निकला सुरेश -भाग 3

रात के 12 बज रहे थे. रास्ता ठीक तरह मालूम नहीं था, फिर भी वह झील की तरफ चली जा रही थी. तभी एक टैक्सी पास से निकली और आगे जा कर रुक गई. सुदेश के प्राण सूख गए. आकाश से गिरी, खजूर में अटकी. जाने अब क्या हो. कौन हो? कहीं सुरेश ही तो नहीं? सुरेश नहीं था. पर जो अजनबी था वह बहुत अपना सा लग रहा था. चेहरा दाढ़ीमूंछ में छिपा था, पर ईमानदारी, भोलापन, सच्चरित्रता आंखों से छलकी पड़ रही थी. वह सरदार सतवंत सिंह टैक्सी ड्राइवर था. सुदेश ने परदेश में पहली बार किसी सरदार को देखा था. उसे लगा जैसे वह पंजाब में कहीं अपने गांव में खड़ी है. भारतीय स्त्री को देख कर सतवंत सिंह भी चौंका. वह उसे बेहद डरी हुई दिख रही थी.

सतवंत ने अनुमान लगाया कि वह झील में डूब कर आत्महत्या करने जा रही है. उस ने अधिक पूछताछ न कर के टैक्सी का पीछे का द्वार खोल कर एक प्रकार से जबरन सुदेश को भीतर ढकेल दिया. अपने डेरे पर पहुंच कर सुदेश को सब तरह से तसल्ली दे कर उस की आपबीती सुनी. सुदेश ने जब कहना बंद किया तो सतवंत सिंह की आंखें नम हो चुकी थीं. 3 साल पहले उस की अपनी सगी बहन सुरेंद्र कौर को भी कोई डाक्टर इसी प्रकार ब्याह कर ले आया था. बहुत दिनों बाद बहन ने जैसेतैसे किसी प्रकार फोन किया थी. पर जब तक सतवंत यहां तक पहुंचने का जुगाड़ कर पाया, वह जीवन से तंग आ कर आत्महत्या कर चुकी थी. उस ने ऐसे कितने ही किस्से सुनाए कि किस प्रकार प्रवासी भारतीय छुट्टियों में देश जाने पर विवाहित होते हुए भी दूसरी शादी कर लेते हैं. कोईकोई तो मोटा दहेज भी समेट लेते हैं. उस लड़की को फिर रखैल की तरह रख लेते हैं. पतिव्रता भारतीय स्त्री पति को सबकुछ मानने वाली, रोधो कर जिंदगी से समझौता कर लेती है. जिस हाल में पति रखे, उसी में खुश रहने की कोशिश करती है. कुछ तो इतने नीच होते हैं कि अपनी पत्नी को बेच तक डालते हैं.

अकसर ऐसी शादियां चटपट हो जाती हैं. लड़के की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का स्वदेश में किसी को पता नहीं रहता. जैसा कह दिया वैसा मान लिया. लड़कियों को भी विदेश घूमने का चाव रहता है. इस से अभिभावक का बोझ सहज ही हलका हो जाता है. कन्या के साथ क्या बीत रही है, कौन देखने आता है, किस को खबर मिलती है? सतवंत ने सुदेश के आंसू पोंछे. वह सतवंत से भारत पहुंचा दिए जाने की जल्दी कर रही थी, पर सतवंत ने कहा कि अपराधी को भी तो कुछ दंड मिलना चाहिए. उस ने अपने जानपहचान के एक वकील से सलाह की. तदानुसार उस ने सुदेश के घर फोन कर शादी पर छपे निमंत्रणपत्र की तथा शादी में खिंचे सभी फोटोग्राफों की प्रतियां मंगाईं. वकील के माध्यम से ये सब चीजें सूजेन के पिता को दिखाई गईं. वह करोड़पति एकदम भड़क गया.

सुरेश से बात करने से पहले उस ने सुरेश और सुदेश के कुछ युगल चित्र सूजेन को दिखाए. शादी के फोटो सूजेन गंभीरता से देखती रही. शायद वह उसे कोई धार्मिक रीतिरिवाज समझ रही थी. वरवधू के वेश में सुरेश व सुदेश ठीक से पहचाने भी नहीं जा रहे थे. पर नैनीताल के फोटो देख कर तो सूजेन एकदम बिदक गई. कहीं झील में नाव पर, कहीं पहाड़ी की चोटी पर, कहीं जुल्फें संवारते हुए, कहीं शरारत से मुसकराते हुए, चित्रों से दिलों की धड़कनें साफ सुनाई पड़ रही थीं. इन चित्रों में सुदेश को सूजेन ने पहचान लिया. घर पहुंचते ही उस ने सुरेश की खबर ली, ‘‘तुम तो उसे नौकरानी बताते थे. क्या तुम ने उस से शादी नहीं की है? तुम ने ऐसा क्यों किया? आखिर मुझ में क्या कमी थी? क्या मैं सुंदर नहीं थी? क्या मुझे सलीका नहीं आता था? क्या मैं कम पढ़ीलिखी थी? क्या नहीं था मुझ में? तुम्हें नौकरी दिलाई. फ्लैट का मालिक बनवाया. गाड़ी दिलाई. क्या नहीं दिया? लेकिन तुम…तुम…’’ और उस ने गुस्से में गालियां बकनी आरंभ कर दीं.

सुरेश ने समझाने की बहुत कोशिश की, पर उस रात सूजेन ने शयनकक्ष के दरवाजे नहीं खोले. स्टोर में जहां सुदेश रात काटती थी, वहीं उसे भी करवटें बदलनी पड़ीं. वह बहुत परेशान था. सुदेश गायब हो चुकी थी. वह अब कहां है, उसे इस बारे में कोई पता नहीं. हवाईअड्डे पर उस ने हुलिया लिखा दिया. यह तो वह जान चुका था कि अभी वह वहीं अमेरिका में है. वैसे उस का जाना भी मुश्किल था. उस के पास किराए के पैसे कहां थे. न ही वह कुछ तौरतरीका जानती है. पर आखिर सूजेन को किस ने भड़का दिया? वह कुछ तालमेल नहीं बैठा पा रहा था. सुदेश के गायब हो जाने की उसे इतनी चिंता नहीं थी जितनी सूजेन के ऐंठ जाने की. सोने का अंडा देने वाली मुरगी यदि किनारा कर गई तो? सुदेश के बारे में उसे लगता था कि वह रेल या ट्रक से कहीं मरकट गई होगी या उस ने किसी प्रकार से आत्महत्या कर ली होगी. उसे तो सूजेन की चिंता थी. अगले दिन कंपनी के डायरैक्टर और सूजेन के पिता ने उसे अपने कक्ष में बुलाया और स्पष्टीकरण देने के लिए कहा. सुरेश के चिंतित चेहरे को देख कर कोई भी सचाई का सहज अनुमान लगा सकता था. उस ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि इस सारे कांड के पीछे कोई ऐसा आदमी है जो डराधमका कर अपना काम निकालना चाहता है. व्यवहारकुशल डायरैक्टर ने सुरेश को एक सप्ताह का समय दिया.

सुदेश का मन अमेरिका में बिलकुल नहीं लग रहा था. पर प्रश्न यह था कि वह घर जाने का साधन कैसे जुटाए. किस के साथ जाए? सहमतेसहमते उस ने सतवंत से अपना मंतव्य प्रकट किया. सतवंत को कोई आपत्ति नहीं थी. यहां का काम तो उस का वकील संभाल लेगा. उस की कोई विशेष आवश्यकता भी नहीं थी. केवल ठीक से पलीता लगाने की बात थी. वह काम हो ही चुका था. अब तो विस्फोट की प्रतीक्षा थी. पर सवाल यह था कि वह स्वदेश लौटे तो कैसे. सतवंत भी कोई धन्ना सेठ नहीं था. 3 साल में टैक्सी चला कर यहां जो कमाया था उस से टैक्सी खरीद ली थी. फक्कड़ आदमी था, मस्त रहता था. सुदेश ने जब अपने जेवर उस के सामने रखे तो वह उस की समझदारी का कायल हो गया, बोला, ‘‘देशी, तू ने तो पढ़ेलिखों के भी कान काट दिए.’’ वह सुदेश को ‘देशी’ कह कर पुकारता था. उसी प्रकार जैसे सूजेन सुरेश को ‘रेशी’ कह कर पुकारती थी. वहां ऐसी ही प्रथा थी. अधिक लाड़ में किसी को संबोधित करना होता था तो अंतिम 2 शब्दों पर ‘ई’ की मात्रा लगा दी जाती थी. सतवंत ने भी वतन लौटने का प्रोग्राम बना लिया. न्यूयौर्क में उस के कुछ जानकार लोग थे. टैक्सी और जेवर का ठीकठाक सौदा हो गया.

बिना पूर्वसूचना के एक शाम सुदेश सतवंत के साथ सात समंदर पार कर अंबाला में अपने घर के द्वार पर खड़ी थी. घर वाले हैरान थे. उस से भी बड़ी हैरानी की बात थी सतवंत का साथ होना. सुदेश के छोटे भाईबहन खुसुरफुसुर कर रहे थे, ‘‘शादी पर तो जीजाजी की दाढ़ीमूछ नहीं थी?’’ सब से छोटी बेबी बोली, ‘‘मैं बताऊं, नकली होगी.’’ बच्चों के सो जाने के बाद सुदेश ने अपनी करुण कहानी घर वालों को सुनाई. पीठ उघाड़ कर मार के निशान दिखाए. उन्हें बताया कि घर से भागते समय उसे यह आशा नहीं थी कि अब वह कभी मातापिता से मिल भी सकेगी. सतवंत का वह लाखलाख शुक्रिया कर रही थी. वह नहीं मिलता तो पता नहीं आज वह कहां होती.

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा – भाग 3

अब इंसपेक्टर शर्मा को गार्ड से उस की शिनाख्त करानी थी. वह गार्ड को अपनी कार में बैठा कर उसी जगह खड़े हो गए, जहां एक दिन पहले ऐश्वर्या कार पर सवार हुई थी. थोड़ी देर में वह कार आई तो गार्ड ने सलीम की पहचान कर दी. अगले दिन इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पहुंचे. जब उन्होंने उस से सलीम के बारे में पूछा तो वह सकते में आ गई. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘सलीम मेरा भाई है.’’

‘‘कहां रहता है?’’

‘‘भदोही में.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

ऐश्वर्या इस बात की सूचना सलीम को दे सकती थी, इसलिए इंसपेक्टर शर्मा ने पहले ही अपनी एक टीम वहां भेज दी थी. वह ऐश्वर्या के घर से सीधे निकले और सलीम के घर की ओर चल पड़े. पता उन के पास था ही. भदोही पहुंच कर उस की आलीशान कोठी देख कर वह दंग रह गए. उन्होंने गार्ड से सलीम के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह तो औफिस में है. पता ले कर इंसपेक्टर औफिस पहुंचे तो वहां वह मिल गया. उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से आप का क्या संबंध है?’’

‘‘रुखसाना मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी. 2 साल मेरे यहां काम करने के बाद उस ने किसी नरेश नाम के व्यक्ति से कोर्टमैरिज कर ली थी.’’

‘‘शादी के बाद वह कहां गई?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘थोड़ा कोशिश कीजिए, शायद याद आ जाए.’’

‘‘वह मेरे लिए एक कर्मचारी से ज्यादा कुछ नहीं थी, इसलिए मैं उस के बारे में पता कर के क्या करूंगा?’’ कह कर सलीम ने पल्ला झाड़ना चाहा. तभी एक कर्मचारी ने अंदर आ कर उस के सामने एक पर्ची रख दी. पर्ची पढ़ कर सलीम ने कहा, ‘‘माफ कीजिए इंसपेक्टर साहब, एक जरूरी काम आ गया है, मैं अभी आता हूं.’’

कर्मचारी से चाय लाने को कह कर सलीम बाहर आया. इंसपेक्टर ने उस कंप्यूटर की स्क्रीन अपनी ओर मोड़ ली, जो सीसीटीवी कैमरे से जुड़ा था. स्क्रीन पर ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना का चेहरा दिख रहा था. हालांकि वह बुरके में थी, लेकिन अंदर आ कर उस ने चेहरा खोल लिया था. उसे देख कर इंसपेक्टर शर्मा हैरान रह गए. उन्हें पक्का यकीन हो गया कि नरेश की हत्या के पीछे इन्हीं दोनों का हाथ है.

ऐश्वर्या ने पूछा, ‘‘इंसपेक्टर तो नहीं आया था?’’

‘‘वह अंदर बैठा है.’’ सलीम ने कहा, ‘‘उसे यहां का पता कैसे मिला?’’

‘‘मैं ने बताया है. उस से तुम्हें अपना भाई बताया है.’’

‘‘बेवकूफ, तुम ने तो सारा खेल बिगाड़ दिया.’’ सलीम फुसफुसाते हुए चीखा.

‘‘मैं ने कैसे खेल बिगाड़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह कहने की क्या जरूरत थी कि मैं तुम्हारा भाई हूं.’’

‘‘और क्या कहती?’’

‘‘मैं ने उसे सचसच बता दिया है कि तुम मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी.’’

‘‘अब क्या होगा?’’ ऐश्वर्या बेचैनी से बोली.

‘‘अब जो भी होगा, हम दोनों झेलेंगे. फिलहाल तुम जिस तरह आई हो, वैसे ही लौट जाओ.’’ सलीम ने कहा और औफिस में आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘आप रुखसाना को पहचान तो सकते हैं? इस के लिए आप को मेरे साथ वाराणसी चलना होगा.’’

‘‘मेरे पास समय नहीं है.’’

‘‘समय निकालना होगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने घुड़का तो वह साथ चल पड़ा. पहले तो वह कहता रहा कि वह रुखसाना के बारे में कुछ नहीं जानता. लेकिन जब इंसपेक्टर शर्मा ने कहा कि उन के पास इस बात के सबूत हैं कि उस का रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से अवैध संबंध था तो वह सन्न रह गया.

थाने पहुंच कर इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना, सलीम और गार्ड को आमनेसामने किया तो सारा रहस्य उजागर हो गया. गार्ड ने सलीम की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘यही साहब अकसर ऐश्वर्या मैडम से मिलने देर शाम को आया करते थे.’’

अब सिवाय अपना अपराध स्वीकार करने के उन दोनों के पास कोई उपाय नहीं बचा था. सलीम और ऐश्वर्या फंस चुके थे. अब इंसपेक्टर शर्मा यह जानना चाहते थे कि ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना ने सलीम के साथ मिल कर नरेश की हत्या क्यों की थी?

पूछताछ शुरू हुई तो रुखसाना ने सिसकते हुए कहा, ‘‘सलीम के यहां नौकरी करते हुए उन से मेरे नाजायज संबंध बन गए थे. मैं इन से निकाह करना चाहती थी, लेकिन इन्होंने मना कर दिया. यह मुझे बीवी नहीं, रखैल बना कर रखना चाहते थे, जो मुझे मंजूर नहीं था. इन की बेवफाई से मैं हताश हो उठी. तभी नरेश से मेरी मुलाकात हुई. फिर मैं ने उन्हें पाने में देर नहीं की.’’

‘‘आप ने नरेश को धोखा क्यों दिया, जबकि उस ने तुम्हारे लिए अपने खून के रिश्ते तक को छोड़ दिया था?’’

‘‘वह सुबह निकलते थे तो देर रात को ही घर आते थे. उन पर काम का बोझ इतना अधिक था कि आते ही खापी कर सो जाते थे. जबकि मैं चाहती थी कि वह मुझे समय दें, मुझ से बातें करें, घुमानेफिराने ले जाएं. लेकिन उन्हें अपने काम के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था, जिस से मैं चिढ़ जाती थी.’’

‘‘वह तुम्हारी हर सुखसुविधा का खयाल रखते थे, क्या यह कम था?’’

‘‘एक औरत को सिर्फ सुखसुविधा ही नहीं चाहिए. उस की और भी ख्वाहिशें होती हैं. अगर उन के पास मेरे लिए समय नहीं था तो वह मुझ से शादी ही न करते.’’ सिसकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘इस का मतलब यह तो नहीं कि किसी और से संबंध बना लिया जाए.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘चलो संबंध बना लिया, ठीक था, लेकिन नरेश को मार क्यों दिया?’’

‘‘नरेश की बेरुखी की वजह से मैं ने सलीम से दोबारा जुड़ने का मन बनाया. इत्तफाक से उसी बीच एक मौल में मेरी मुलाकात सलीम से हो गई. यह खरीदारी करने आए थे. इन्होंने मुझ से फोन नंबर मांगा तो मैं ने दे दिया. उस के बाद बातचीत तो होने ही लगी, मिलनाजुलना भी शुरू हो गया. सलीम मेरी हर ख्वाहिश पूरी करते थे. यह अकसर देर शाम को मेरे घर आते और सुबह जल्दी चले जाते.’’

‘‘तुम्हारे पति ऐतराज नहीं करते थे?’’

‘‘मैं उन्हें रात की कौफी में ज्यादा मात्रा में नींद की गोलियां मिला कर दे देती थी, जिस से वह गहरी नींद सो जाते थे. एक रात उन की नींद खुल गई. मुझे अपने पास न पा कर जब वह उठे तो दूसरे कमरे में लाइट जलती देख कर वहां आ गए. सलीम को मेरे साथ देख कर वह कुछ पूछते, उस के पहले ही हम दोनों ने उन्हें कस कर पकड़ लिया. सलीम ने उन के हाथ पकड़ लिए तो मैं ने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. इस के बाद जमीन पर गिरा कर सलीम तब तक उन का गला दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. उस के बाद रात में लाश को ले जा कर कुएं में डाल दिया.’’

पूछताछ के बाद इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना और सलीम को वाराणसी की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. इन दोनों का क्या होगा, यह तो समय बताएगा, पर नरेश को तो ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना की खूबसूरती पर मरमिटने की सजा मिल गई. आज की नई पीढ़ी सीरत पर नहीं, सूरत पर मर रही है, जिस का वह खामियाजा भी भुगत रही है.

तेजतर्रार तिजोरी : रघुवीर ने अपनी बेटी का नाम तिजोरी क्यों रखा – भाग 3

सुनील उस आंख पर हाथ रखता हुआ जोर से चिल्लाया, ‘‘हाय, मेरी आंख गई,’’ कह कर वह खेत की मिट्टी में गिरने लगा, तो पीछे खड़ी तिजोरी ने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया और उस का सिर अपनी गोद में ले कर वहीं खेत में बैठ गई.

तिजोरी ने गौर किया कि सुनील की आंख के पास से खून तेजी से बह रहा है. आसपास काम करते मजदूर भी वहां आ गए. उन में से एक मजदूर बोल पड़ा, ‘‘कहीं आंख की पुतली में तो चोट नहीं लगी है? तिजोरी बिटिया, इसे तुरंत आंखों के अस्पताल ले जाओ.’’

सुनील की आंखों से खून लगातार बहा जा रहा था. कुछ देर चीखने के बाद सुनील एकदम सा निढाल हो गया. उसे यह सुकून था कि इस समय उस का सिर तिजोरी की गोद में था और उस की एक हथेली उस के बालों को सहला रही थी.

तिजोरी ने महेश को श्रीकांत के पास यह सूचना देने के लिए भेजा और एक ट्रैक्टर चलाने वाले मजदूर को आदेश दे कर खेत में खड़े ट्रैक्टर में ट्रौली लगवा कर उस में पुआल का गद्दा बिछवा कर सुनील को ले कर अस्पताल आ गई.

यह अच्छी बात थी कि उस गांव में आंखों का अस्पताल था, जिस में एक अनुभवी डाक्टर तैनात था. तिजोरी की मां के मोतियाबिंद का आपरेशन उसी डाक्टर ने किया था.

तिजोरी ने सुनील को वहां दाखिल कराया और डाक्टर से आंख में चोट लगने की वजह बताते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब, इस की आंख को कुछ हो गया, तो मैं अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘तू चिंता न कर, मुझे चैक तो करने दे,’’ कह कर डाक्टर ने स्टै्रचर पर लेटे सुनील को अपने जांच कमरे में ले कर नर्स से दरवाजा बंद करने को कह दिया.

तिजोरी घबरा तो नहीं रही थी, पर लगातार वह अपने दिल में सुनील की आंख में गंभीर चोट न निकलने की दुआ कर रही थी. महेश के साथ श्रीकांत भी वहां पहुंच गया था.

अस्पताल के गलियारे में इधर से उधर टहलते हुए तिजोरी लगातार वहां लगी बड़े अक्षरों वाली घड़ी को देखे जा रही थी. तकरीबन 50 मिनट के बाद डाक्टर ने बाहर आ कर बताया, ‘‘बेटी, बड़ी गनीमत रही कि गुल्ली भोंहों के ऊपर लगी. थोड़ी सी भी नीचे लगी होती, तो आंख की रोशनी जा सकती थी.’’

‘‘डाक्टर साहब, क्या मैं सुनील से मिल सकती हूं?’’

‘‘हां, ड्रैसिंग कंप्लीट कर के नर्स बाहर आ जाए तो तुम अकेली जा सकती हो. पेशेंट के पास अभी ज्यादा लोगों का होना ठीक नहीं है,’’ डाक्टर ने कहा.

नर्स के बाहर आते ही तिजोरी लपक कर अंदर पहुंची. सुनील की चोट वाली आंख की ड्रैसिंग के बाद पट्टी से ढक दिया गया था, दूसरी आंख खुली थी.

तिजोरी सुनील के पास पहुंची. उस ने अपनी दोनों हथेलियों में बहुत हौले से सुनील का चेहरा लिया और बोली, ‘‘बहुत तकलीफ हो रही है न. सारा कुसूर मेरा है. न मैं तुम्हें गुल्लीडंडा खिलाने ले जाती और न तुम्हें चोट लगती.’’

तिजोरी को उदास देख कर सुनील अपने गालों पर रखे उस के हाथ पर अपनी हथेलियां रखता हुआ बोला, ‘‘तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है तिजोरी, मैं ही उस समय असावधान था. तुम्हारे बारे में सोचने लगा था… इतने अच्छे स्वभाव की लड़की मैं ने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखी,’’ कहतेकहते सुनील चुप हो गया.

तिजोरी समझ गई और बोली, ‘‘चुप क्यों हो गए… मन में आई हुई बात कह देनी चाहिए…’’

‘‘लेकिन, न जाने क्यों मुझे डर लग रहा है. मेरी बात सुन कर कहीं तुम नाराज न हो जाओ.’’

‘‘नहीं, मैं नाराज नहीं होती. मुझे कोई बात बुरी लगती है, तो तुरंत कह देती हूं. तुम बताओ कि क्या कहना चाह रहे हो.’’

‘‘दरअसल, मैं ही तुम को चाहने लगा हूं और चाहता हूं कि तुम से ही शादी करूं.’’

तिजोरी ने सुनील के गालों से अपने हाथ हटा लिए और उठ कर खड़े होते हुए बोली, ‘‘मुझ से शादी करने के लिए अभी तुम्हें 2 साल और इंतजार करना होगा. ठीक होने के बाद तुम्हें मेरे पिताजी से मिलना होगा.’’

इतना कह कर तिजोरी बाहर चली आई. श्रीकांत और महेश तो वहां इंतजार कर ही रहे थे, लेकिन अपने पिता को उन के पास देख कर वह चौंक पड़ी. उन के पास पहुंच कर वह सीने से लिपट पड़ी, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

‘‘मेरे खेतों में कोई घटना घटे, और मुझे पता न चले, ऐसा कभी हुआ है? मैं तो बस उस लड़के को देखने चला आया और अंदर भी आ रहा था, पर तुम दोनों की बातें सुन कर रुक गया. अब तू यह बता कि तू क्या चाहती है?’’

‘‘मैं ने तो उस से कह दिया है कि…’’ तिजोरी अपनी बात पूरी नहीं कर पाई थी कि रघुवीर यादव ने बात पूरी की…  ‘‘2 साल और इंतजार करना होगा.’’

अपने पिता के मुंह से अपने ही कहे शब्द सुन कर तिजोरी के चेहरे पर शर्म के भाव उमड़ आए और उस ने अपने पिता की चौड़ी छाती में अपना चेहरा छिपा लिया.

रघुवीर यादव अपनी बेटी की पीठ थपथपाने के बाद उस के बालों पर हाथ फेरने लगे. उन्होंने अपनी जेब से 10,000 रुपए निकाल कर श्रीकांत को दिए और बोले, ‘‘बेटा, यह सुनील के इलाज के लिए रख लो. कम पड़ें तो खेत में काम कर रहे किसी मजदूर से कह देना. खबर मिलते ही मैं और रुपए पहुंचा दूंगा,’’ इतना कह कर वे तिजोरी और महेश को ले कर घर की तरफ बढ़ गए.

अगले दिन तिजोरी अपने भाई महेश रोज की तरह के साथ खेत पर गई. आज उस का मन खेत पर नहीं लग रहा था. पानी पीने के लिए वह गोदाम की तरफ गई, तो उस ने किनारे जा कर बिजली महकमे के स्टोर की तरफ झांका.

तभी सामने वाली सड़क पर एक मोटरसाइकिल रुकी. उस पर बैठा लड़का सिर पर गमछा लपेटे और आंखों में चश्मा लगाए था. तिजोरी को देखते ही उस ने मोटरसाइकिल पर बैठेबैठे ही हाथ हिलाया, पर तिजोरी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह उसे पहचानने की कोशिश करने लगी, पर दूरी होने के चलते पहचान न सकी.

तभी जब स्टोर में काम करते श्रीकांत की नजर तिजोरी पर पड़ी, तो श्रीकांत उसे वहां खड़ा देख उस के करीब चल कर जैसे ही आया, वह बाइक सवार अपनी बाइक स्टार्ट कर के चला गया.

तिजोरी के करीब आ कर श्रीकांत बोला, ‘‘हैलो तिजोरी, कैसी हो?’’

उस बाइक सवार को ले कर तिजोरी अपने दिमाग पर जोर देते हुए उसे पहचानने की कोशिश रही थी, लेकिन श्रीकांत की आवाज सुन कर वहां से ध्यान हटाती हुई बोली, ‘‘मैं ठीक हूं. यहां से खाली हो कर तुम्हारे बौस को देखने अस्पताल जाऊंगी. वैसे, कैसी तबीयत है उन की?’’

‘‘आज शाम तक उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी. डाक्टर का कहना है कि चूंकि आंख के बाहर का घाव है, इसलिए वे एक आंख पर पट्टी बांधे काम कर सकते हैं. मैं शाम को उन्हें ले कर सरकारी गैस्ट हाउस में आ जाऊंगा.’’

‘‘लेकिन, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जब वे पूरी तरह से ठीक हो जाएं, तब काम करना शुरू करें?’’

‘‘चोट गंभीर होती तो वैसे भी वे काम नहीं कर पाते, पर जब डाक्टर कह रहा है कि चिंता की कोई बात नहीं, तो दौड़भाग का काम मैं देख लूंगा और इस स्टोर को वे संभाल लेंगे. फिर हमें समय से ही काम पूरा कर के देना है, तभी अगला कौंट्रैक्ट मिलेगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे कल भी खेत पर आना ही है. यहीं पर कल उस से मिल लूंगी. तुम्हें अगर प्यास लग रही हो, तो मैं फ्रिज से पानी की बोतलें निकाल कर देती जाऊं?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘ठीक है, मैं चलती हूं. कल मिलूंगी,’’ कह कर तिजोरी उस खेत की तरफ चली गई जहां बालियों से गेहूं और भूसा अलग कर के बोरियों में भरा जा रहा था.

अगले दिन पिताजी के हिसाबकिताब का बराबर मिलान करने के चलते तिजोरी को देर होने लगी. जैसे ही हिसाब मिला, तो वह उसे फेयर कर के लिखने का काम महेश को सौंप कर अकेले ही खेत की तरफ आ गई.

चूंकि तिजोरी तेज चलती हुई आई थी और उसे प्यास भी लग रही थी, इसलिए उस ने सोचा कि पहले गोदाम में जा कर घड़े से पानी पी ले और फिर सुनील का हालचाल लेने चली जाएगी.

तिजोरी ने गोदाम के शटर के दोनों ताले खोले और अंदर घुस कर घड़े की तरफ बढ़ ही रही थी कि अचानक शटर गिरने की आवाज सुन कर वह पलटी. कल जो बाइक पर सवार लड़का था, उसे वह पहचान गई, फिर उस के बढ़ते कदमों के साथ इरादे भांपते हुए वह बोली, ‘‘ओह तो तुम शंभू हो. मुझे लग रहा है कि उस दिन मैं ने तुम्हारी नीयत को सही पहचान लिया था… लगता है, उसी दिन से तुम मेरी फिराक में हो.’’

‘‘ऐसा है तिजोरी, शंभू जिसे चाहता है, उसे अपना बना कर ही रहता है. उस दिन तो मैं तुम्हें देखते ही पागल हो गया था. आज मौका मिल ही गया. अब तुम्हारे सामने 2 ही रास्ते हैं… या तो सीधी तरह मेरी बांहों में आ जाओ, नहीं तो…’’ कह कर वे उसे पकड़ने के लिए लपका.

तिजोरी ने गोदाम के ऊपर बने रोशनदानों की ओर देखा और ऊपर मुंह कर के पूरी ताकत से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘बचाओ… बचाओ…’’

तिजोरी को चिल्लाता देख शंभू तकरीबन छलांग लगाता उस तक पहुंच गया. तिजोरी की एक बांह उस की हथेली में आई, लेकिन तिजोरी सावधान थी, इसलिए पकड़ मजबूत होने से पहले उस ने अपने को छुड़ा कर शटर की तरफ ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाते हुए दौड़ लगानी चाही, पर इस बार शंभू ने उसे तकरीबन जकड़ लिया.

तभी शटर के तेजी से उठने की आवाज आई. जैसे ही शंभू का ध्यान शटर खुलने पर एक आंख में पट्टी बांधे इनसान की तरफ गया, तिजोरी ने उस की नाक पर एक झन्नाटेदार घूंसा जड़ दिया. और जब तक शंभू संभलता, सुनील ने उसे फिर संभलने का मौका नहीं दिया. अपनी आंख की चोट की परवाह न करते हुए उस ने अपने घूंसों की जोरदार चोटों से उस का जबड़ा तोड़ डाला.

तभी हालात की गंभीरता को देखते हुए श्रीकांत के भी आ जाने से शंभू ने भाग जाना चाहा, पर शटर के बाहर खेतिहर मजदूरों की भीड़ के साथ रघुवीर यादव को खड़ा देख कर सुनील की पीठ से चिपकी तिजोरी अपने पिता की तरफ दौड़ पड़ी.

उस को सांत्वना देते हुए रघुवीर यादव बोले, ‘‘2 साल तू इंतजार करने को राजी है, तो मैं इतना तो कर ही सकता हूं कि तेरी शादी सुनील से पक्की कर दूं…’’

उन्होंने सुनील को अपने पास बुला कर उसे भी अपने सीने से लगा लिया.

खेतिहर मजदूर शंभू को पकड़ कर कहीं दूर ले जा रहे थे.

सम्मान की जीत- भाग 3

लिहाजा रूबी को पंचायत की बात माननी पड़ी. उस ने खेत में पड़ा गेहूं बोरियों में भरना शुरू किया और बोरी को लादलाद कर प्रधान के घर में रखना शुरू कर दिया, सूरज ऊपर तप रहा था, रूबी की आंखों में आंसू थे, पर वह अपने को किसी जाल में फंसा हुआ महसूस कर रही थी.

वह अभी कुछ ही बोरे रख पाई थी कि उस के पैर कांपने लगे. उस की जांघें छलनी हो गई थीं. उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह और नहीं सह सकी और वहीं बेहोश हो गई.

रूबी की आंख जब खुली, तो उस ने अपने आसपास सभी साथियों को पाया, जो समाजसेवा के काम में रूबी के साथ ईरिकशे पर बैठ कर जाती थीं, उन लोगों ने ही रूबी को अस्पताल में भरती कराया और उस से बिलकुल भी चिंता न करने की सलाह दी.

जब अस्पताल से रूबी को छुट्टी मिली, तो वह वहां से अपनी साथियों की मदद से महिला आयोग पहुंची, जहां उस ने अपने ऊपर हुए जुल्म की दास्तां बताई और यह भी बताया कि किस तरह से उस का पति एक दूसरी औरत के साथ जिस्मानी संबंध रखे हुए है, जबकि उन दोनों ने आपसी सहमति से प्रेम विवाह किया था.

महिला आयोग ने रूबी से हमदर्दी तो दिखाई, पर यह भी कहा कि आप पढ़ीलिखी लगती हैं… और जब तक आप के पास अपने पति के खिलाफ दूसरी महिला के साथ संबंध होने का कोई सुबूत नहीं होगा. तब तक हम

चाह कर भी आप की कोई मदद नहीं कर पाएंगे.

रूबी निराश हो कर वहां से लौट आई और यह सोचने लगी कि सुबूत कैसे जुटाया जाए.

फिर कुछ दिन बीतने के बाद रूबी एक दिन दोपहर में चोरीछुपे अपने गांव के घर में पहुंची और दरवाजा खटखटाया.

दरवाजा करन ने खोला और रूबी को देखते ही बिफर गया, ‘‘तू फिर यहां आ गई अपनी शक्ल दिखाने के लिए.’’

‘‘करन… एक मिनट मेरी बात तो सुनो… हम ने तो प्रेम विवाह किया था, फिर मुझ से इतनी नफरत क्यों?’’ रूबी ने पूछा.

‘‘प्रेम विवाह… हुंह… क्या तुम नहीं जानती कि हम दोनों अलगअलग जाति से संबंध रखते हैं… और हमारे गांव में किसी भी छोटी जाति वाली लड़की से शादी करने वाले को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता… पूरे गांव ने मेरा बहिष्कार कर दिया… मैं अब और नहीं सह सकता… और फिर तुम्हारे अंदर भी मैं ने एक कमाऊ औरत होने का अहंकार देखा… तुम काम से आ कर मुझ पर अहसान दिखाती थी और अकसर ही मेरा बिस्तर बिना गरम किए ही सो जाती थी. और मैं रातभर करवट बदलता रहता था… और फिर तुम्हारे भी तो बाहर और भी कई मर्दों के साथ संबंध हैं, इसीलिए मैं ने भी इस औरत के साथ संबंध बना लिया है और आगे भी मैं इसी के साथ रहूंगा,’’ करन ने सब स्वीकार कर लिया.

‘‘पर, मैं ने तुम से प्रेम…’’ रूबी का स्वर बीच में ही रुक गया.

‘‘हट साली… गड़रिया की जाति… चली है एक ब्राह्मण से इश्क लड़ाने… भाग जा यहां से और दोबारा इस दरवाजे पर मत आना,’’ दहाड़ उठा था करन.

रूबी पीछे चल दी, आगे चल कर उस ने अपने हैंडबैग में छुपा खुफिया कैमरा निकाला और उस में होने वाली रिकौर्डिंग बंद की और अब उस के चेहरे पर विजयी मुसकान थी.

ये वीडियो रिकौर्डिंग उस ने कोर्ट में पेश की, जहां पर करन को अपने पत्नी को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के लिए और दूसरी महिला से संबंध रखने के आरोप में सजा सुनाई गई.

यही नहीं, पंचायत द्वारा एक स्त्री पर अमानवीय व्यवहार करने के जुर्म में पंचायत के सभी सदस्यों को भी सजा दी गई और प्रधान को तत्काल प्रभाव से उस के पद से भी हटा दिया गया.

ये एक औरत की जीत थी, उस के सम्मान की जीत…

पीछा करता डर : पीठ में छुरा भाग-3

‘‘मुझ से फोटो डिलीट करने को कह रहे हो और खुद 2 पैग ह्विस्की नहीं पिला सकते.’’

‘‘2 क्या 4 पैग पिलाऊंगा. पहले फोटो डिलीट कर दो.’’

‘‘ठीक है, डिलीट कर दूंगा, लेकिन 2 पैग पीने के बाद. रूम सर्विस को फोन कर के गिलास, सोडा और रोस्ट चिकन का आर्डर दो.’’

मजबूरी थी, नंदन ने रूम सर्विस को फोन कर के भानु के मनमुताबिक आर्डर दे दिया.

कमरा वातानुकूलित था. अंदर ज्यादा ठंड नहीं थी. बाथरूम के बाहर आ कर युवती को काफी राहत मिली थी.

जब तक वेटर सामान ले कर आया, तब तक नंदन और भानु के बीच कोई बात नहीं हुई. इस बीच भानु बैठा हुआ फिल्मी गीत गुनगुनाता रहा. ‘आज की रात… वेटर सामान दे गया, तो भानु ने पहले अपना पैग बनाया, फिर मेज के नीचे से दोनों गिलास निकाल कर उन में ह्विस्की डाली. उसे तीसरे गिलास में ह्विस्की डालते देख नंदन ने पूछा, ‘‘तीसरा पैग क्यों बना रहे हो?’’

‘‘उस के लिए.’’ भानु ने लड़की की ओर इशारा कर के कहा.

‘‘वो नहीं पिएगी.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता? यह तो उस की इच्छा पर निर्भर है. सामने आ कर बैठेगी तो खुद ब खुद इच्छा हो जाएगी.’’

‘‘मैं ने कहा न, नहीं पिएगी.’’ नंदन तीखी आवाज में बोले, तो भानु ने उन की आंखों में झांकते हुए व्यंग्य से कहा, ‘‘वो तुम्हारी बीवी है, जो तुम्हारे इशारों पर नाचेगी.’’

नंदन का मन कर रहा था अपने बाल नोच लेने का. उन का वश चलता तो वह एक पल में भानु को कमरे के बाहर कर देते. लेकिन मजबूरी थी. अत: गिड़गिड़ा कर दयनीय स्वर में बोले, ‘‘भानु प्लीज, तुम दो पैग पियो और जाओ.’’

‘‘जाने को तो मैं बिना पिए भी चला जाऊंगा. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘सो नहीं पाओगे रातभर. जिस मकसद से आए हो, वह भी अधूरा रह जाएगा.’’

‘‘तो तुम ही बताओ, मैं क्या करूं?’’

‘‘कुछ नहीं, उसे बुला लो और प्यार से 2 पैग पिला दो. यकीन मानो, उस के बाद कतई डिस्टर्ब नहीं करूंगा.’’

नंदन सिर पकड़ कर बैठ गए. सोचने लगे, क्या करें?

भानु बोला, ‘‘क्या नाम है मोहतरमा का? मैं खुद ही बुला लेता हूं.’’

‘‘जी का जंजाल.’’ नंदन ने माथा पीटते हुए चिढ़ कर कहा, तो भानु खड़े होते हुए हंस कर बोला, ‘‘नाम अच्छा है. एकदम मौर्डन. चलो, इसी नाम से बुला लेते हैं.’’

युवती ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी बाल सुखा रही थी. भानु कुछ देर तक स्लीवलैस नाइटी से बाहर झांकती उस की गोरीगोरी बाहों को देखता रहा, फिर उस की नंगी बाहों को पकड़ कर उसे उठाने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘उठो जी के जंजाल. दो पैग ह्विस्की हमारे साथ भी पी लो.’’

युवती ने खड़े हो कर तीखी नजरों से भानु की ओर देखा, फिर बांह छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘ये क्या बद्तमीजी है?’’

‘‘बद्तमीजी तब होती है डियर जान के जंजाल, जब सड़क चलती किसी अनजान लड़की का हाथ इस तरह पकड़ा जाए. होटल के बंद कमरे में किसी गैर मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ा रही औरत का उसी कमरे में हाथ पकड़ लेना बद्तमीजी नहीं है. वैसे भी मैं ने हाथ ही तो पकड़ा है, और कुछ नहीं.’’

क्षणमात्र में युवती का ठंडा बदन गरम हो गया. चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. आंखों में बेबसी के भाव साफ झलक रहे थे. पलभर रूक कर भानु उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीरे से बोला, ‘‘तुम्हारे बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं, पर थोड़ा बहुत जानता हूं. कुंवारी नहीं, शादीशुदा हो तुम.

‘‘बात पति और ससुराल तक पहुंच गई, तो घर की रहोगी, न घाट की. चल कर चुपचाप ह्विस्की पियो. उतने ही प्यार से जितने प्यार से नंदन के साथ पी रही थीं.’’

युवती का चेहरा पीला पड़ गया. वह बिना कुछ बोले मेज की ओर बढ़ गई. भानु की इस हरकत को देख कर नंदन खून का घूंट पी कर रह गए. भानु युवती को नंदन के पास वाली कुर्सी पर बैठाते हुए बोला, ‘‘देखो, बुरा आदमी नहीं हूं मैं. तुम लोगों का बुरा कतई नहीं चाहूंगा. जानता हूं. कपड़ों के नीचे सब नंगे होते हैं. जैसे तुम. वैसा मैं. अकेला था, सो चला आया. चलो उठाओ अपनेअपने पैग. मैं 2 पैग पी कर चला जाऊंगा.’’

नंदन गिलास उठाता या कुछ बोलता, इस से पहले ही भानु का इशारा पा कर युवती ने कंपकपाते हाथों से गिलास उठा लिया. नंदन अभी सोच में डूबा बैठा था. भानु उस की ओर देख कर व्यंग्य में बोला, ‘‘नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली. ज्यादा संयासी न बनो उठाओ गिलास.’’

भूल किसकी: रीता की बहन ने उसके पति के साथ क्या किया? – भाग 3

पापाजी सभी मेहमानों का स्वागत उत्साहपूर्वक कर रहे थे. बीचबीच में शाम के प्रोग्राम की भी जानकारी ले रहे थे.

बहुत ही शानदार आयोजन था. लाइटें इतनी कि आंखें चौंधिया जाएं. कई व्यंजन, लजीज खाना… सभी तारीफ कर रहे थे.

तुषार भी शादी के दिन इतना सुंदर नहीं लगा था जितना आज लग रहा था. कहते हैं जब व्यक्ति खुश होता है तो चेहरे पर चमक आ ही जाती है. रीमा को तो तुषार का साथ वैसे भी अच्छा लगता था और आज उस की नजरें तुषार के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं.

पापाजी ने सभी मेहमानों का आभार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने सुना भर था कि बिन घरनी घर भूत का डेरा पर अब उस का अनुभव भी कर लिया. मेरा घर भूत के डेरे के समान ही था पर रीता ने आ कर उसे एक खूबसूरत और खुशहाल घर बना दिया. रीता ने घर ही नहीं घर में रहने वालों की भी काया पलट दी. मैं बहुत खुश हूं जो रीता जैसी बहू हमारे घर आई.’’

‘‘मेरे लिए भी घर एक सराय जैसा था जहां मैं रात गुजारने आता पर उस सराय को एक घर बनाने का श्रेय रीता को जाता है,’’ कहते हुए तुषार ने रीता का हाथ अपने हाथों में ले लिया.

सभी ने रीता की खूब तारीफ की. तभी अचानक रीता को चक्कर आ गया. वह गिरती उस के पहले ही तुषार ने संभाल लिया. सभी घबरा गए. डाक्टर को बुलाया गया. जितने लोग उतनी बातें. कोई बोला काम की अधिकता की वजह से चक्कर आया तो किसी ने कहा नींद पूरी नहीं हुई होगी, कोई कह रहा था ठीक से खाना नहीं खाया होगा. महिलाओं में एक अलग ही खुसरफुसर थी. सब से ज्यादा चिंता पापाजी और तुषार के चेहरे पर थी.

डाक्टर ने जैसे ही रीता के पैर भारी होने की सूचना दी मुर झाए चेहरे खिल उठे. पापाजी तो इतने खुश हुए जैसे खजाना हाथ लग गया हो. रीमा, रीता की खुशी में खुश नहीं थी वरन उसे इस बात की जलन हो रही थी कि तुषार जैसा जीवनसाथी उसे क्यों नहीं मिला. वह तुषार की ओर खिंचाव सा महसूस करने लगी थी. वह तुषार के करीब आने का कोई न कोई बहाने ढूंढ़ती रहती थी. रीता की तबीयत के बहाने उस घर में उस का आनाजाना बढ़ गया था. घर का माहौल पूरी तरह पलट गया था. अभी तक रीता तुषार और पापाजी का खयाल रखती थी. अब ये दोनों मिल कर रीता का खयाल रख रहे थे. कभीकभी मजाक में रीता पापाजी से बोल भी देती थी कि आप तो ससुर से सासूमां बन गए.

जैसेजैसे समय नजदीक आ रहा था पापाजी की चिंता बढ़ती जा रही थी. अब तो वे रीता की हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे.

उस दिन सुबह से रीता अनमनी सी थी. बारबार लेट जाती थी. पापाजी ने तुषार को औफिस जाने से मना किया. ऐसा पहले भी हुआ जब पापाजी ने उसे औफिस जाने से मना किया और उस ने हर बार उन की बात मानी.

दोपहर होतेहोते रीता को दर्द शुरू हो गया. हालांकि डाक्टरों ने जो तारीख दी थी उस में अभी 7 दिन बाकी थे. मगर वे कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे, इसलिए तुरंत अस्पताल पहुंचे.

रीता डिलिवरीरूम में थी. बाहर पापाजी और तुषार चहलकदमी कर रहे थे.

नर्स ने कई बार टोका, ‘‘आप लोग आराम से बैठ जाएं डिलिवरी में अभी टाइम है.’’

वे 2 मिनट बैठते फिर चहलकदमी शुरू कर देते. जितनी बार नर्स बाहर आती उतनी ही बार पापाजी उस से पूछते कि रीता तो ठीक है न और वह हर बार मुसकरा कर जवाब देती, ‘‘सब ठीक है.’’

आखिर वह घड़ी आ ही गई जिस का उन्हें बेसब्री से इंतजार था. नर्स ने जैसे ही खबर दी पापाजी ने उस से पूछा, ‘‘रीता तो ठीक है न?’’

‘‘हां बिलकुल ठीक है पर आप ने यह नहीं पूछा कि बेटा हुआ या बेटी…’

‘‘उस से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. बस दोनों स्वस्थ होने चाहिए.’’

नर्स ने उन्हें अचरज से देखा और फिर अंदर चली गई.

अब चहलकदमी बंद हो गई थी. थोड़ी ही देर में नर्स कपड़े में लिपटे नवजात को ले कर बाहर आई. फिर तुषार को देते हुए बोली, ‘‘बेटा हुआ है.’’

तुषार ने पापाजी की ओर इशारा कर कहा कि पहला हक इन का है.

जैसे ही पापाजी ने उसे हाथों में लिया एकटक देखते रहे. उन्होंने कोशिश तो बहुत की, पर आंसुओं को न रोक पाए.

‘‘पापाजी क्या हुआ?’’ तुषार परेशान हो उठा.

बच्चे को तुषार को सौंपते हुए बोले, ‘‘कुछ नहीं आंखों से कुछ नहीं छिपा सकते… ये आंसू खुशी के हैं. मैं इतना खुश तो तेरे पैदा होने पर भी नहीं हुआ था जितना आज हूं. कभीकभी डर भी लगता है कहीं इन खुशियों पर किसी की नजर न लग जाए.’’

‘‘मूल से ब्याज जो प्यारा होता है,’’ तुषार ने हंस कर जवाब दिया.

‘‘अब बेबी मु झे दीजिए वैक्सिनेशन करना है.’’

‘‘सिस्टर, हम रीता से कब मिल सकते हैं?’’

‘‘थोड़ी देर बाद हम उसे रूम में शिफ्ट कर देंगे. तब मिल लेना.’’

‘‘8 नंबर रूम में जा कर आप लोग रीता से मिल सकते हैं,’’ थोड़ी देर बाद आ कर नर्स बोली.

पापाजी ने सम झदारी दिखाते हुए पहले तुषार को रीता से मिलने भेजा.

रीता का हाथ अपने हाथ में लेते तुषार ने कहा, ‘‘कैसी हो? थैंक्स मु झे इतना प्यारा गिफ्ट देने के लिए.’’

रीता ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘पापाजी कहां हैं?’’

‘‘बाहर हैं, अभी बुलाता हूं.’’

अंदर आते ही पापाजी ने रीता के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘ठीक तो हो न?’’

आज घर को फूलों से सजाया गया था. दरवाजे पर सुंदर सी रंगोली भी बनाई

गई थी. रीता अस्पताल से घर जो आने वाली थी. रीता और बच्चे का स्वागत पापाजी ने थाली बजा कर किया. पापाजी ने तो उस का नामकरण भी कर दिया ‘प्रिंस.’

रीता को देखभाल की जरूरत थी. सुचित्रा ने कुछ दिन यहीं रुकने का निश्चय किया तो रीमा की तो मन की मुराद ही पूरी हो गई. तुषार के साथ रहने का मौका जो मिल गया. ऐसा नहीं कि तुषार कुछ सम झता नहीं था. वह हमेशा कोशिश करता कि रीमा से दूर रहे. किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकता था. वह जितना दूर होता रीमा उतना ही उस के करीब आने की कोशिश करती. उस की तो जिद थी कि तुषार को पाना है. पर तुषार तो रीता से खुश और संतुष्ट था. वह किसी भी कीमत पर उसे धोखा नहीं देना चाहता था.

प्रिंस के आने से पापाजी का बचपना लौट आया था. उन्हें तो मानो एक खिलौना मिल गया था, जिसे वे अपनी आंखों से एक पल के लिए भी ओ झल नहीं होना देना चाहते थे. नैपी बदलना, पौटी साफ करने जैसे कामों में भी कोई हिचक नहीं थी.

समय बीतते देर नहीं लगती. प्रिंस 1 साल का हो गया था. अब तो वह चलने भी लगा था. प्रिंस को खेलाने के बहाने रीमा का आना जारी था. दिनभर प्रिंस के पीछेपीछे पापाजी भागते रहते. रीता ने कई बार टोका भी कि पापाजी आप थक जाएंगे, आप के घुटनों का दर्द बढ़ जाएगा पर उन की दुनिया तो प्रिंस के इर्दगिर्द ही थी. वे पहले से ज्यादा खुश और स्वस्थ नजर आते थे.

आखिर जिस की उम्मीद नहीं थी वही हुआ. रीमा अपने मकसद में कामयाब हो गई. उस का छुट्टी के दिन आना और घंटों बतियाना, कभीकभी एक ही थाली में खाना खाना पापाजी की अनुभवी आंखों से छिप न सका. उन्हें आने वाले तूफान का आभास होने लगा था. उन्होंने इशारेइशारे में रीता को कई बार सम झाने की कोशिश की पर रीता को तो तुषार और रीमा पर इतना विश्वास था कि वह इसे पापाजी का वहम मानती.

आज फिर पापाजी ने रीता से बात की.

‘‘पापाजी, जीजासाली में तो मजाक चलता है. आप बेकार में परेशान होते हैं. ऐसा कुछ भी नहीं है उन दोनों के बीच.’’

चिड़िया चुग गईं खेत: शादीशुदा मनोज के साथ थाईलैंड में क्या हुआ था – भाग 3

‘‘लेकिन यहां पार्लरों में जिस तरह के लोग आते हैं तुम कब तक अपनेआप को बचा कर रख पाओगी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘हां, कभीकभी बहुत परेशानी में पड़ जाती हूं, बहुत डर लगता है. पर अब तक बची हुई हूं. इसीलिए जल्द से जल्द यहां से वापस जाना चाहती हूं क्योंकि आप जैसे शरीफ और सच्चे लोग हर रोज नहीं मिलते,’’ जूली ने एक बार फिर से मनोज की तारीफ की तो वह और अधिक खिल उठा.

‘‘पर तुम वापस जा कर करोगी क्या?’’ मनोज ने सवाल किया.

‘‘मैं एक गिफ्ट शौप खोलना चाहती हूं. मेरे छोटे से शहर में ज्यादा दुकानें नहीं हैं. अगर मैं शौप खोल पाई तो अपने परिवार का पालनपोषण करने के लायक अच्छा काम कर सकूंगी और फिर मुझे रेड जोन की जिल्लतभरी जिंदगी जीने की कोई जरूरत नहीं रहेगी,’’ जूली आशाभरी आवाज में बोली.

‘‘कितनी रकम की जरूरत है तुम्हें शौप खोलने के लिए?’’ मनोज के मुंह से न चाहते हुए भी जाने कैसे यह सवाल निकल गया.

‘‘2 हजार डौलर में एक अच्छी शौप गांव में खुल सकेगी,’’ जूली ने उत्साहित स्वर में जवाब दिया.

मनोज के गले में जैसे अचानक ही कुछ अटक गया. जूली उस की मनोदशा समझ कर गंभीर मगर रोंआसे स्वर में बोली, ‘‘मैं जानती हूं, यह बहुत बड़ी रकम है. और आज के युग में इतना बड़ा दिल किसी का नहीं होता कि बिना लड़की का इस्तेमाल कर के उसे एक तिनका भी दे दे. आजकल तो सब मर्द शरीर के लोलुप होते हैं. लड़की का जीभर कर इस्तेमाल किया और फिर उस के हाथ में चंद नोट पकड़ा दिए. बिना स्वार्थपूर्ति के महज इंसानियत के नाते लड़की की मदद करने वाले बड़े दिल के स्वार्थरहित सच्चे मर्द आजकल बचे ही कहां हैं.’’

जूली ने एक तीखी चुभती हुई नजर से मनोज को देखा. जूली के आक्षेप से मनोज के अंदर का मर्द तिलमिला गया. उसी क्षण उस के अहं ने सिर उठाया, ‘क्या तुम सच्चे और शरीफ मर्द नहीं हो?’

‘‘नहींनहीं, जूली, मर्दों के बारे में तुम्हारी यह धारणा सही नहीं है. सारे मर्द ऐसे शरीर लोलुप नहीं होते,’’ मनोज ने हड़बड़ा कर उत्तर दिया.

‘‘अरे जाने दीजिए, मनोजजी, मेरा तो रातदिन मर्दों से ही वास्ता पड़ता रहता है. मैं अच्छे से समझ चुकी हूं मर्दों की फितरत और नियत को,’’ जूली कड़वे स्वर में बोली.

‘‘नहीं जूली, तुम्हें मर्दों के बारे में गलत धारणा बना कर नहीं रखनी चाहिए. सारे मर्द एक जैसे नहीं होते,’’ मनोज गंभीर स्वर में बोला.

‘‘मेरा पाला तो आज तक कामुक पुरुषों से ही पड़ा है. मसाज करवाते समय ऐसीऐसी हरकतें करते हैं कि अपनेआप से ही घृणा होने लगती है,’’ जूली की आंखें छलछला आईं.

क्षणभर को मनोज को उस अनजान विदेशी लड़की से सच्ची सहानुभूति हो आई पर उस ने जल्द ही अपनेआप को संभाल लिया. कहीं सहानुभूति जताते ही यह पैसा न मांगने लगे. पर तभी मन के एक कोने में एक धिक्कार सी उठी कि उस से मसाज करवाने में बातें करने में उस के साथ रैस्टोरेंट में मिलने आने में उसे कोई एतराज नहीं है पर उस की मदद के नाम से वह कतरा रहा है. आखिर कहीं न कहीं वह एक कम उम्र खूबसूरत जवान लड़की के प्रति किसी प्रकार का तीव्र आकर्षण अपने मन में महसूस तो कर ही रहा है न.

शाम ढलने लगी थी.

‘‘अब आप कहां जाएंगे?’’ जूली उस से पूछ रही थी.

‘‘मैं सोच रहा हूं कि आज फ्री हूं तो पत्नी और बेटों के लिए कुछ शौपिंग कर लूं,’’ मनोज ने कहा, ‘‘यहां आसपास कोई मौल है क्या?’’

‘‘मौल में तो आप को सबकुछ बहुत महंगा मिलेगा. यहां से पास में ही एक लोकल मार्केट है. वहां क्वालिटी भी अच्छी मिलेगी और कीमतें भी मौल की अपेक्षा काफी कम हैं. यदि आप चाहें तो मैं आप को वहां ले जा सकती हूं. शाम को मैं फ्री हूं,’’ जूली ने प्रस्ताव रखा.

‘‘हांहां, क्यों नहीं. चलो, चलते हैं. अच्छा है मुझे एक खूबसूरत और अनुभवी गाइड मिल जाएगी,’’ अब की बार जूली का मन हलका करने के लिए मनोज ने उस की तारीफ कर दी. जूली का चेहरा खिल गया.

दोनों मार्केट की ओर निकल गए. मार्केट जाने वाली स्ट्रीट पर चारों ओर का वातावरण बड़ा ही उन्मुक्त था. हर ओर लड़केलड़कियां, औरतआदमी छोटेछोटे कपड़ों में एकदूसरे की कमर में हाथ डाले मस्ती में चूर दीनदुनिया से बेखबर अपने ही रंग में झूमते हुए घूम रहे थे. मनोज ने अपने जीवन में पहली बार ऐसी उन्मुक्तता देखी थी. उस का दिल यह सब रंगीनियां देख कर फड़कने लगा.

जूली उस के दिल की हालत समझ गई. उस ने मनोज की कमर में हाथ डाला और उस का हाथ अपने कंधे पर रख लिया और हंस पड़ी. फिर वह भी मनोज के साथ मस्त हो कर घूमने लगी. जूली के स्पर्श से मनोज का रोमरोम सुलगने लगा पर उस ने अपनेआप पर नियंत्रण रखा. हां, उस पर एक मीठी रूमानियत छाने लगी थी. एक लड़की के साथ इस तरह से घूमने का उस का पहला अनुभव था.

जूली ने सही कहा था. यहां पर सुंदर विदेशी वस्तुओं की भरमार थी और काफी सस्ती भी थीं. मनोज ने पत्नी और बच्चों के लिए ढेर सारी शौपिंग कर ली. जूली की आंखों में भी कुछ वस्तुओं को देख कर चमक उभर आई थी जिसे मनोज ने भांप लिया. उस ने जूली को भी वे चीजें खरीद दीं जिन्हें जूली ने बड़े उत्साह और खुशी से स्वीकार कर लिया.

उस रात मनोज ने एक रैस्टोरेंट में जूली के साथ कैंडललाइट डिनर किया. देर रात वह अपने होटल में वापस आया तब तक सब सो चुके थे. उस ने राहत की सांस ली. वरना भावेश और सुरेश व्यर्थ ही प्रश्नों की झड़ी लगा देते.

पलंग पर लेट कर भी मनोज की आंखों में नींद नहीं थी. बचपन से ही वह बौयज स्कूल और कालेज में पढ़ा था, इसलिए कभी लड़कियों से उस का संपर्क और दोस्ती नहीं रही. पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर घर की जिम्मेदारियों के चलते मातापिता की मरजी की लड़की से शादी. यही घिसीपिटी कहानी रही उस के जीवन की. विवाह के बाद की जिंदगी भी बहुत ही आम और साधारण रही उस की. कोई नयापन नहीं, कोई रोमांच नहीं.

अपहरण नहीं हरण : भाग 3- क्या हरीराम के जुल्मों से छूट पाई मुनिया?

अपनी सीट पर बैठ कर देवा ने पानी भरी प्लास्टिक की बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पिया, फिर मुनिया की तरफ बोतल बढ़ा दी, ‘‘लो प्यास लग आई होगी, पानी पी लो.’’ वाकई बड़ी देर से मुनिया की इच्छा पानी पीने की हो रही थी. उस ने बोतल में मुंह लगाया और बचा हुआ सारा पानी गटक गई.

खाली बोतल को उस ने देवा की तरफ बढ़ाया, फिर बोली, ‘‘क्या तुम वाकई मेरे बारे में जानना चाहते हो?’’ जब देवा ने हां में सिर हिलाया, तो वह बोली, ‘‘मेरी पूरी दास्तां सुनने के बाद तुम्हें मेरे उद्धार का रास्ता ढूंढ़ना होगा, क्योंकि मैं कैसे भी इस हरीराम से पिंड़ छुड़ाना चाहती हूं. बोलो, कर पाओगे मेरा उद्धार?’’ देवा ने विश्वास दिलाने के लिए मुनिया का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया. मुनिया ने अपनी आपबीती सुनानी शुरू की और जब आपबीती खत्म हुई तो रात के 11 बज चुके थे और जाने कब देवा ने मुनिया को अपनी एक बांह के घेरे में ले लिया था.

बस के अंदर की लाइटें भी बंद थीं. थकान से भरे होने के चलते ज्यादातर लोगों ने अपनीअपनी सीट पर ऊंघ कर एकएक नींद पूरी कर ली थी. देवा ने अपना हाथ मुनिया के कंधों से हटाया. उस ने महसूस किया कि अपनी आपबीती सुनाते हुए वह जितनी बार भी सुबक कर रोई है, उतनी बार उस की कमीज का सीने वाला हिस्सा गीला हुआ है और अभी भी गीला है.

कुछ सोच कर देवा अपनी सीट से उठा और ड्राइवर और उस के पास बैठे कंडक्टर से उस ने पूछा, ‘‘कहीं गाड़ी रोकोगे भी या यों ही चलते जाओगे?’’ ‘‘हम 10 मिनट बाद चाय पीने के लिए रुकेंगे. वहीं जिसे फ्रैश होना होगा, हो लेगा, फिर आगे जब राजस्थान बौर्डर पार कर के मध्य प्रदेश की तरफ बढ़ेंगे, तब खाना खाने के लिए एक ढाबे पर रुकेंगे.

वहीं अलगअलग प्रदेश से आनेजाने वाली बसें तकरीबन एक घंटे के लिए रुकती हैं, फिर अपनेअपने रूट पर निकल जाती हैं,’’ कंडक्टर बोला. ‘‘अच्छा, यह बताओ कि कब तक भोपाल पहुंचा दोगे?’’ ‘‘कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि इस महामारी का प्रकोप हर इलाके में तेजी से फैल रहा है. सुन रहे हैं कि चीन से यह बीमारी पूरी दुनिया में फैल रही है. भारत भी इस की चपेट में आ चुका है.

बस की कहीं भी रोक कर चैकिंग की जा सकती है, इसलिए कह नहीं सकते कि हम अपनी मंजिल पर कब पहुंचेंगे.’’ देवा जानकारी ले कर वापस अपनी सीट पर लौट आया था. उस की आहट पा कर झपकी लेती मुनिया सीधी हो कर बैठ गई. लगातार देवा को चुप देख कर मुनिया थोड़ा घबराई और बोली, ‘‘क्या हमारी किसी बात से नाराज हो गए?’’ ‘‘नहीं, तुम से हम नाराज क्यों होंगे. हम तो तुम्हें चाहने लगे हैं. हमारे दिमाग में अभीअभी एक विचार आया है.

बस यही सोच रहे हैं कि तुम्हारी खुशी की खातिर उस विचार को अंजाम दें या नहीं. फिर तुम पूरी तरह साथ दोगी, तभी वह मुमकिन होगा.’’ ‘‘तुम हमारी खुशी की सोचो और हम साथ न दें, ऐसा नहीं हो सकता. तुम बताओ तो सही, क्या करना है?’’ मुनिया ने पूछा. देवा ने इस बार अपने होंठ मुनिया के कानों से लगा दिए और अपनी योजना उस के कानों में बताने लगा, फिर बात पूरी कर के उस ने अंधेरे का फायदा उठा कर मुनिया के गालों को चूम लिया.

तभी बस झटका खा कर रुक गई. चाय पीने और फ्रैश होने की जगह आ गई थी. बस के अंदर की लाइटें जगमगा उठी थीं. बस का इंजन बंद कर के ड्राइवर भी उतर गया और कंडक्टर ने गुहार लगाई ‘‘बस यहां 20 मिनट रुकेगी, चाय पी लो, फ्रैश हो लो…’’ बस के रुकते ही देवा अपनी सीट से उठ कर खड़ा हो गया. मुनिया से पूछा, ‘‘नीचे उतरने का मन है?’’ मुनिया ने इशारे से कहा, कि तुम उतरो मैं आती हूं.

इतना कह कर उस ने पलट कर हरीराम वाली सीट की तरफ देखा. हरीराम के साथ जग्गू दादा भी हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए थे. वे दोनों जैसेतैसे खड़े हुए, फिर नीचे उतरने के लिए बस के गेट की तरफ बढ़े. उन को अपनी सीट के पास से गुजरते हुए मुनिया ने महसूस किया और कुछ इस अंदाज में अपना सिर पीछे की तरफ लुढ़का लिया मानो बड़ी देर से गहरी नींद में सो रही हो.

पास से गुजरता हुआ हरीराम दो पल को ठिठक कर रुका. उस का मन हुआ कि इतनी चैन से सोती हुई मुनिया को तेजी से झकझोर कर उठाए, पर पीछे से जग्गू दादा की आवाज सुन कर आगे बढ़ गया, ‘‘अरे, उसे सोने दो. चलो, चाय पी कर आते हैं. बस ज्यादा देर नहीं रुकेगी.’’ उन के उतरते ही तकरीबन खाली हो चुकी बस के अंदर देवा तेजी से मुनिया के पास आया और बोला, ‘‘टौयलैट आ रही हो तो उतर कर जल्दी से कर आओ. बाईं तरफ चली जाना. उधर ही लेडीज टौयलैट है.

उन दोनों के चाय पी कर लौटने से पहले आ जाना.’’ मुनिया नीचे उतरी और उस के आने तक देवा अपनी सीट पर ही बैठा रहा. उस के वापस आते ही वह फिर नीचे उतर गया. फिर जब दोबारा सब सवारियां बैठ गईं और बस स्टार्ट हुई तो 2 पानी की बोतलें और गरमागरम भुजिया ले कर देवा भी वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. बस फिर चल दी. मुनिया और देवा एकदूसरे के प्रति जिस अपनेपन के भाव से भरते जा रहे थे, उस से खुद भी हैरान थे.

उन के एकदूसरे के करीब बैठने का अंदाज भी बदल चुका था. दोनों बड़े मजे से भुजिया खाने में जुटे हुए थे. बस अपनी रफ्तार से आगे बढ़ी चली जा रही थी. तकरीबन 2 बजे के आसपास बस उस जगह रुकी, जहां और भी बसें पहले से ही अलगअलग दिशाओं से आ कर रुकी हुई थीं. देवा ने बस से उतर कर यह जानकारी हासिल कर ली कि कौन सी बस देवास की तरफ इस से पहले निकलेगी.

उधर मुनिया ने अपनी सीट से उठ कर खाने की पोटली और पानी की बोतल हरिया को पीछे जा कर दे दी और बोली, ‘‘लो, खाना खा लो. इस में जग्गू दादा के लायक भी रोटियां हैं.’’ इधर जग्गू दादा बैठे थे, इसलिए पोटली उन्होंने ही पकड़ी और दोनों खाना खाने में जुट गए. खाना खाने के बाद उन्होंने भांग की एकएक गोली पानी में घोल कर पी और पीछे सिर टिका कर आंखें बंद कर लीं. कुछ ही देर में मुनिया ने खिड़की के बाहर देखा. देवा उसे बाहर आने का इशारा कर रहा था.

वह अपना बैग पहले से ही बाहर उठा कर ले जा चुका था.  मुनिया ने बस से नीचे उतरने से पहले हरिया की सीट की तरफ देखा. पलभर को एक खिंचाव सा हुआ. आखिर 2 साल तो वह हरिया के साथ रही ही थी, फिर मन को कड़ा कर के वह बस से नीचे उतर गई. देवा बोला, ‘‘तुम कंडक्टर को बताओ कि कौन सी अटैची तुम्हारी है.’’  बस के पीछे सामान चढ़ानेउतारने वाली लटकती सीढ़ी के कुछ डंडों पर चढ़ने के बाद मुनिया ने इशारे से बता कर अपनी अटैची उतरवाई.

अटैची उतरते ही देवा ने एक हाथ में मुनिया का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ में उस की अटैची उठा कर उस बस की तरफ दौड़ पड़ा, जो स्टार्ट हो कर देवास की तरफ जाने को तैयार थी. पहले उस ने मुनिया को चढ़ाया, फिर खुद चढ़ गया. मुनिया ने इस बस की खिड़की से उस बस की तरफ देखा जिस में हरिया रह गया था. एक बार उस ने मन में विचार आया कि कहीं देवा किसी मोड़ पर धोखा न दे जाए और वह कहीं की न रहे. मर्द औरत से ज्यादा उस के शरीर को चाहता है.

देवा भी कहीं उस के शरीर से खेलने के बाद उसे छोड़ न दे.  तभी देवा की आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘‘मुनिया, हम सवेरेसवेरे ही देवास पहुंच जाएंगे. बड़े पापा का घर वहीं है.’’ ‘‘वह तो ठीक है, पर अपने घर पहुंच कर मेरा क्या परिचय दोगे? पता नहीं क्यों मेरा मन एक अजीब से डर से घबरा रहा?है. लगता है, कोई अनहोनी न हो जाए,’’ मुनिया बोली. ‘‘तुम ने मुझ पर विश्वास किया है न? बस, मैं इतना ही कहूंगा कि अगर मैं तुम्हारे विश्वास पर खरा न उतरूं, तो तुम अपने हरीराम के पास चली जाना,’’ कहतेकहते देवा रुका, फिर मुनिया का हाथ अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम यह क्यों नहीं सोच रही हो कि मेरी तो किसी भी लड़की से शादी हो सकती थी, पर मैं ने तुम्हीं को क्यों चुना?

‘‘अपनी बात याद करो. तुम ने कहा था कि देवा क्या तुम मेरा उद्धार कर पाओगे? यों समझ लो कि तुम्हारी जिंदगी के उद्धार की बात ही है, इस समय मेरे मन में.’’ देवा की बातों से थोड़ा निश्चिंत हो कर मुनिया ने उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और कुछ ही पलों में तेज दौड़ती बस के हिचकोलों ने उसे नींद में सुला दिया. सवेरे जब आंख खुली तो मुनिया देवास में थी.

बस से उतर कर देवा उसे ले कर सीधा अपने बड़े पापा के घर  आ गया.  मुनिया को देख कर बड़ी अम्मां और बड़े पापा ने हैरान होते हुए सवालिया निगाहों से देवा को देखते हुए पूछा कि यह कौन है? ‘‘बड़े पापा, यह मुनिया है. मेरी दुलहन. हम ने शहर में ही शादी कर ली थी, पर आप को बताना भूल गए थे, फिर वह मुनिया की तरफ घूमा और बोला, ‘‘अरे घबराओ नहीं… बड़े पापा और बड़ी अम्मां दोनों के पैर छुओ न झुक कर.’’ ‘‘ओह, तो तुम भी हमारी तरह अपनी पसंद की दुलहन ले कर घर में घुसे हो. अरे, हमें तो अपना समय याद आ गया जब…’’ कहतेकहते बड़े पापा अपना समय याद कर के हंस पड़े. तभी मुनिया उन दोनों के पैरों में झुक गई, हालांकि उस की आंखें भी छलक आई थीं, पर बूंदों को जमीन पर गिरने से वह बचा ले गई.

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