Love Story :खूबसूरत लम्हे

शेखर इस नए शहर में जिंदगी की नई शुरुआत करने आ पहुंचा था. आईएएस पूरी करने के बाद उस की पत्नी की पोस्टिंग इसी शहर में हुई. वैसे भी अमृतसर आ कर वह काफी खुश था. इस शहर में वह पहली बार आया था, पर उसे ऐसा लगता कि वह अरसे से इस शहर को जानता है. आज वह बाजार की तरफ निकला ताकि अपनी जरूरत का सामान खरीद सके. अचानक एक डिपार्टमैंटल स्टोर में शेखर को एक जानापहचाना चेहरा नजर आया. हां, वह संगीता थी और साथ में था शायद उस का पति. शेखर गौर से उसे देखता रहा. संगीता शायद उसे देख नहीं पाई या फिर जानबूझ कर उस ने देख कर भी अनदेखी कर दी. वह जब तक संगीता के करीब पहुंचा, संगीता स्टोर से निकल कर अपनी कार में जा बैठी और चली गई. शेखर उसे देख कर अतीत में खो गया.

नयानया शहर, नया कालेज, शेखर के लिए सबकुछ अपरिचित और अजनबी था. वह क्लास में पीछे वाली बैंच पर बैठ गया. कालेज की चहलपहल उसे काफी अच्छी लगी. यहां तो पुस्तकें ही उस की साथी थीं. वह बस, मन में उठे भावों को कागज पर उतारता और स्वयं ही उन्हें पढ़ कर काफी खुश होता. कालेज के वार्षिक सम्मेलन में जब उस की कविता को प्रथम पुरस्कार मिला तो वह सब का चहेता बन गया. प्रोग्राम खत्म होते ही एक लड़की उस से आ कर बोली, ‘‘बधाई हो, तुम तो छिपे रुस्तम निकले… इतना अच्छा लिख लेते हो. तुम्हारी रचना काफी अच्छी लगी… इस की एक कौपी दोगे.’’

शेखर तब उस के आग्रह को टाल न सका. उस ने पहली बार गौर से उस की खूबसूरती को निहारा. गोरा रंग, गुलाबी गाल, मदभरे तथा मुसकराते अधर और सब से खूबसूरत लगीं उस की आंखें. उस की आंखें बिना काजल के ही कजरारी लगीं. आंखें शोख और शरारत भरी थीं. शेखर ने तो उस की खूबसूरती को शब्दों में कैद कर गीत का रूप दे डाला और संगीता की खिलखिलाहट ने उस के गीत को संगीत का रूप दे डाला, पर ये सब तो कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा था. संगीता के स्वर में एक अजीब सी कशिश, एक अजीब सा जादू दिखा.

शेखर जीवन में हमेशा बहुत बड़े और सुनहरे सपने देखता रहता. पढ़ाई और लेखन बस 2 ही तो उस के साथी हैं. मध्यवर्गीय परिवार में पलाबढ़ा शेखर हमेशा यही सोचता कि खूब पढ़लिख कर एक काबिल इंसान बनूं और सब की झोली खुशियों से भर दूं. शेखर कालेज की लाइब्रेरी में बैठा अध्ययन कर रहा था. तभी संगीता उस के सामने आ कर बैठ गई. शेखर को यह ठीक नहीं लगा. उसे पढ़ाई के दौरान किसी का डिस्टर्ब करना अच्छा नहीं लगता था. संगीता का धीरेधीरे गुनगुनाना उसे अच्छा नहीं लगा. वह गुस्से से उठा और जोर से पुस्तक बंद कर चल पड़ा. तभी एक मधुर खिलखिलाहट उसे सुनाई पड़ी. पीछे मुड़ कर देखा तो संगीता शरारत भरी मुसकान हंस रही थी. गुस्सा तो कम हो गया पर अपने अहंकार में डूबा शेखर चला गया.

दूसरे दिन भी वह लाइब्रेरी में बैठा अपनी पढ़ाई कर रहा था, पर आज उस के मन में अजीब हलचल मची थी. उसे बारबार ऐसा आभास होता कि संगीता आ कर बैठेगी, बारबार उस की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ जातीं. थोड़ी देर बाद संगीता आती दिखाई पड़ी पर आज वह किसी और टेबल पर बैठी. तब शेखर चाह कर भी कुछ न कर पाया, पर आज उस का मन पढ़ने में नहीं लगा. फिर उस ने उठ कर गुस्से में पुस्तक बंद कर दी.

वह लाइबे्ररी से उठ कर जाने लगा, लेकिन तभी संगीता उठ कर सामने आ गई और उसे घूरघूर कर ऊपर से नीचे तक निहारती रही और मुसकराती रही. यह देख कर शेखर का पारा चढ़ने लगा. संगीता तब बहुत ही सहज भाव से बोली, ‘‘सरस्वती का अपमान करना ठीक नहीं. जब पुस्तक की कद्र करोगे तभी तो मंजिल मिलेगी. मैं ईर्ष्या से नहीं मुसकराई बल्कि तुम्हारी नादानी पर मुझे हंसी आ जाती है. वैसे सदा मुसकराते रहना ही मेरी फितरत है.’’

फिर थोड़ा सीरियस हो कर उस ने आंखों में आंखें डाल कर इस कदर देखा कि शेखर चुपचाप पीछे खिसकता चला गया और संगीता आगे बढ़ती रही.

अंतत: शेखर दोबारा उसी बैंच पर बैठ गया और संगीता भी सामने बैठ गई. दोनों बस खामोश रहे. शेखर संगीता के इशारे पर पुस्तक खोल कर पढ़ने लगा और संगीता पुस्तक खोल कर मुसकराने लगी.

शेखर संगीता की समीपता भी चाहता और उसे उस से बात करने में घबराहट भी होती. कालेज के कुछ लोग संगीता की सुंदरता के इस कदर दीवाने थे कि शेखर उन्हें खटकने लगा. शेखर को उन की नफरत भरी नजरों से डर लगने लगा. वह कभीकभी सोचता कि क्या वह संगीता को कभी पा सकेगा या नहीं.

शेखर कालेज के गार्डन में अकेला बैठा विचारों में खोया था, तभी वहां संगीता आ पहुंची. वह एकदम करीब बैठ गई और उलाहने भरे स्वर में बोली, ‘‘मैं लाइबे्ररी का चक्कर लगा कर आ रही हूं, लगता है आज पढ़ने का नहीं लिखने का मूड है तभी गार्डन में आ कर बैठे हो.’’

शेखर जिस की याद में खोया था. उस का करीब आना उसे अच्छा लगा. संगीता ने तब बैग खोल कर टिफिन बौक्स निकाला और शरारती अंदाज में बोली, ‘‘आ मुंडे, आलू दे परांठे खाएं, तेरी तबीयत चंगी हो जाएगी.’’

जब मूड होता तो संगीता अपनी मातृभाषा पंजाबी बोलती. तब शेखर वाकई में खुल कर हंस पड़ा. उस के सामने जब संगीता ने टिफिन बौक्स खोला तो परांठों की महक सूंघ कर ही शेखर खुश हो गया.

दोनों ने जी भर कर परांठे खाए. परांठे खाने के बाद संगीता बोली, ‘‘चलो, अब लस्सी पिलाओ.’’

शेखर सकुचाते हुए बोला, ‘‘अभी क्लास शुरू होने वाली है, लस्सी कल पी लेंगे.’’

संगीता बेधड़क बोली, ‘‘बड़े कंजूस बाप के बेटे हो यार, लस्सी पीने का मन आज है और तुम अगले जन्म में पिलाने की बात करते हो. मेरी कुछ कद्र है कि नहीं. अभी यदि एक आवाज दूं तो लस्सी की दुकान से ले कर यहां तक लस्सी लिए लड़कों की लाइन लग जाए.’’

शेखर फिर मुसकरा कर रह गया. संगीता टिफिन बौक्स समेटती हुई बोली, ‘‘ठीक है, चलो मैं ही पिलाती हूं. मेरा बाप बड़े दिल वाला है. मिलिट्री औफिसर है. एक बार पर्स में हाथ डालते हैं और जितने नोट निकल आते हैं, वे मुझे दे देते हैं. किसी की इच्छा पूरी करना सीखो शेखर, बस किताबी कीड़ा बने रहते हो. लाइफ औलवेज नीड्स सम चेंज.’’

‘‘ठीक है, चलो पिलाता हूं लस्सी, अब भाषण देना बंद करो,’’ शेखर आग्रह भरे स्वर में बोला.

‘‘मुझे नहीं पीनी है अब लस्सी,’’ संगीता मुसकराते हुए बोली, ‘‘जिस ने पी तेरी लस्सी वह समझो फंसी, मैं तो नहीं ऐसी.’’

फिर कालेज कंपाउंड से निकल कर दोनों बाजार की ओर चल पड़े. चौक पर ही लस्सी की दुकान थी. कुरसी पर बैठते ही संगीता ने एक लस्सी का और्डर दिया. शेखर तब कुतुहल भरी दृष्टि से संगीता को निहारने लगा. संगीता ने टेबल पर सर्व किए गए लस्सी के गिलास को देख कर शेखर की तरफ देखा और जोर से हंस पड़ी.

शेखर धीरेधीरे उस की शोखी और शरारत से वाकिफ हो गया था. अत: वह लस्सी के गिलास को न देख कर दुकान की छत की ओर निहारने लगा. संगीता ने उस से चुटकी बजाते हुए कहा, ‘‘शेखर, लस्सी इधर टेबल पर है आसमान में नहीं है, ऊपर क्या देख रहे हो.’’

उस ने आवाज दे कर मैनेजर को बुलाया. उस के करीब आते ही वह उस पर बरस पड़ी, ‘‘इस टेबल पर कितने लोग बैठे हैं?’’

‘‘2,’’ मैनेजर ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘‘फिर लस्सी एक ही क्यों भेजी, तुम्हारे आदमी को समझ में नहीं आता है,’’ संगीता के तेवर गरम हो गए.

मैनेजर गरजते हुए बोला, ‘‘अरे, ओ मंजीते, तेरा ध्यान किधर है, कुड़ी द खयाल कर और एक लस्सी ला.’’

मंजीत कहना चाहता था कि मैडम ने एक ही और्डर दिया था, पर कह न सका और उसे काफी डांट पड़ी.

जब मूड होता तो संगीता अपनी मातृभाषा पंजाबी बोलती. तब शेखर वाकई में खुल कर हंस पड़ा. उस के सामने जब संगीता ने टिफिन बौक्स खोला तो परांठों की महक सूंघ कर ही शेखर खुश हो गया.

दोनों ने जी भर कर परांठे खाए. परांठे खाने के बाद संगीता बोली, ‘‘चलो, अब लस्सी पिलाओ.’’

शेखर सकुचाते हुए बोला, ‘‘अभी क्लास शुरू होने वाली है, लस्सी कल पी लेंगे.’’

संगीता बेधड़क बोली, ‘‘बड़े कंजूस बाप के बेटे हो यार, लस्सी पीने का मन आज है और तुम अगले जन्म में पिलाने की बात करते हो. मेरी कुछ कद्र है कि नहीं. अभी यदि एक आवाज दूं तो लस्सी की दुकान से ले कर यहां तक लस्सी लिए लड़कों की लाइन लग जाए.’’

शेखर फिर मुसकरा कर रह गया. संगीता टिफिन बौक्स समेटती हुई बोली, ‘‘ठीक है, चलो मैं ही पिलाती हूं. मेरा बाप बड़े दिल वाला है. मिलिट्री औफिसर है. एक बार पर्स में हाथ डालते हैं और जितने नोट निकल आते हैं, वे मुझे दे देते हैं. किसी की इच्छा पूरी करना सीखो शेखर, बस किताबी कीड़ा बने रहते हो. लाइफ औलवेज नीड्स सम चेंज.’’

‘‘ठीक है, चलो पिलाता हूं लस्सी, अब भाषण देना बंद करो,’’ शेखर आग्रह भरे स्वर में बोला.

‘‘मुझे नहीं पीनी है अब लस्सी,’’ संगीता मुसकराते हुए बोली, ‘‘जिस ने पी तेरी लस्सी वह समझो फंसी, मैं तो नहीं ऐसी.’’

फिर कालेज कंपाउंड से निकल कर दोनों बाजार की ओर चल पड़े. चौक पर ही लस्सी की दुकान थी. कुरसी पर बैठते ही संगीता ने एक लस्सी का और्डर दिया. शेखर तब कुतुहल भरी दृष्टि से संगीता को निहारने लगा. संगीता ने टेबल पर सर्व किए गए लस्सी के गिलास को देख कर शेखर की तरफ देखा और जोर से हंस पड़ी.

शेखर धीरेधीरे उस की शोखी और शरारत से वाकिफ हो गया था. अत: वह लस्सी के गिलास को न देख कर दुकान की छत की ओर निहारने लगा. संगीता ने उस से चुटकी बजाते हुए कहा, ‘‘शेखर, लस्सी इधर टेबल पर है आसमान में नहीं है, ऊपर क्या देख रहे हो.’’

उस ने आवाज दे कर मैनेजर को बुलाया. उस के करीब आते ही वह उस पर बरस पड़ी, ‘‘इस टेबल पर कितने लोग बैठे हैं?’’

‘‘2,’’ मैनेजर ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘‘फिर लस्सी एक ही क्यों भेजी, तुम्हारे आदमी को समझ में नहीं आता है,’’ संगीता के तेवर गरम हो गए.

मैनेजर गरजते हुए बोला, ‘‘अरे, ओ मंजीते, तेरा ध्यान किधर है, कुड़ी द खयाल कर और एक लस्सी ला.’’

मंजीत कहना चाहता था कि मैडम ने एक ही और्डर दिया था, पर कह न सका और उसे काफी डांट पड़ी.

शेखर को यह सब पसंद नहीं आया. वह संगीता से नाराजगी भरे लहजे में बोला, ‘‘तुम ने और्डर तो एक ही लस्सी का दिया था फिर उसे डांट क्यों खिलवाई?’’

संगीता शरारती लहजे में बोली, ‘‘तुम्हें इतना बुरा क्यों लगा. वह तुम्हारा सगा है क्या? तुम को मालूम है, मैं जब भी अकेले लस्सी पीने आती हूं तो वह मुझे घूरघूर कर देखता है, लस्सी देर से देता है या फिर स्पर्श के लिए लस्सी हाथ में पकड़वाने की कोशिश करता है. आज उसे सबक मिला. अब लस्सी पीओ और दिमाग बिलकुल कूल करो.’’

शेखर ने लस्सी पीते हुए कहा, ‘‘तुम हो ही इतनी खूबसूरत कि लोग तुम्हें निहारे बिना रह नहीं सकते.’’

‘‘फिर चौराहे पर खड़ा कर के नोच डालो न मुझे, यह समाज तो मर्दों का है न, खूबसूरत होना क्या गुनाह है,’’ संगीता गुस्से में बोली. शेखर तब उसे बहलाने के खयाल से बोला, ‘‘अरे, लस्सी पी कर लोग कूल होते हैं, पर तुम तो गरम हो रही हो.’’

फिर शांत मन से संगीता लस्सी पीते हुए बोली, ‘‘अगर मेरा वश चले तो तुम्हें सिर्फ एक दिन के लिए लड़की बना दूं. तब तुम सब की नजरों को अपने पर देखो, उन के चेहरे के भाव समझो, उन की नीयत पहचानो, क्योंकि अभी तो तुम्हें सिर्फ कजरारे नयन और मधुर मुसकान नजर आती है.’’

शेखर एक कड़वी सचाई को सुन कर एकदम चुप हो गया.

कई दिन से संगीता कालेज में नजर नहीं आई. शेखर काफी परेशान हो गया. न कालेज में, न घर में, न अकेले में, कहीं भी उस का दिल न लगता. किसी तरह उस की एक सहेली से पता चला कि वह बीमार है और नर्सिंगहोम में भरती है. वह दौड़ पड़ा नर्सिंगहोम की ओर, काफी रात हो चुकी थी. संगीता बैड पर लेटी थी. नर्स से पता चला कि वह अभी दवा खा कर सोई है. कई रात से वह सो न सकी, नर्स शेखर की बदहवासी देख पूछ बैठी, ‘‘जगा दूं क्या?’’

पर शेखर का अंतर्मन बोला, ‘सोने दो मेरी जान को, कितनी हसीन लग रही है,’ नींद में भी चेहरे पर मुसकान थी. उस ने नर्स को एक गुलदस्ता और एक छोटी डायरी दे कर कहा, ‘‘जब संगीता नींद से जागे तो उसे दे देना.’’

‘‘आप का नाम?’’ नर्स ने पूछा.

‘‘कहना तुम्हारा मीत आया था,’’ कल फिर आऊंगा.

वह दूसरे दिन भी गया. पता चला कि संगीता को एक्सरे रूम में ले जाया गया है. वहां उस के मम्मीपापा और काफी रिश्तेदार आ गए. अब शेखर को रुकना उचित नहीं लगा. उस ने दोबारा फल, रजनीगंधा के फूल और मैगजीन सब नर्स को सौंपते हुए कहा, ‘‘मेरा कालेज का वक्त हो गया है, ये सब उसे दे दीजिएगा और…’’

‘‘और कह दूंगी तुम्हारे मीत ने दिया है,’’ नर्स ने मुसकराते हुए वाक्य पूरा किया और शेखर भी मुसकराते हुए लौट गया.

2 दिन बाद शेखर दोबारा हौस्पिटल आया. संगीता अपने बैड पर बैठी थी. शेखर को देखते ही उस के चेहरे पर मुसकान खिल उठी. शेखर बैड के करीब आ कर बोला, ‘‘सौरी, मैं 2-3 बार आया पर…’’

संगीता बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘मुझे सब मालूम है, यह डायरी, यह फल, रजनीगंधा के फूल सब मेरे मीत के ही हैं. वैसे भी मैं तुम से सदा अकेले में ही मिलना चाहती हूं, भीड़ में गर तुम न ही मिलो तो अच्छा है.’’

वैसे भी मम्मीडैडी तुम्हें लाइक नहीं करते, वे धर्म के पक्के अनुयायी हैं.

शेखर उस की खैरियत जानना चाहता था. संगीता मुसकराते हुए बोली, ‘‘अरे, मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं बिलकुल ठीक हूं, थोड़ा फीवर हुआ था. तुम्हें बहुत परेशान करती रहती हूं न, इसीलिए भुगतना पड़ा.’’

‘‘पर तुम्हारी बीमारी की खबर सुन कर तो मेरी नींद ही उड़ गई,’’ शेखर चिंता भरे लहजे में बोला.

संगीता तब इठलाती हुई बोली, ‘‘नींद के मामले में मैं बहुत लक्की हूं, जहां भी रहूं, सोने से पहले जिस आखिरी इंसान से मेरी मुलाकात होती है वह हो तुम, बस, आंखें बंद कर लेती हूं और सो जाती हूं,’’ इतना कह कर उस ने अपनी मस्त नजरों से मुझे निहारा.

शेखर ने भी तब भावुकता में बहते हुए कहा, ‘‘मैं सुबह उठ कर सब से पहले बंद आंखों से जिस का चेहरा देखता हूं, वह हो सिर्फ तुम.’’

बातों ही बातों में संगीता ने बताया, ‘‘आज सुबह ही मम्मीपापा आए थे, डाक्टर ने डिस्चार्ज करने को कहा. दरअसल, वे लोग किसी रिश्तेदार के यहां फंक्शन में गए हैं सुबह मुझे लेने आएंगे.’’

‘‘मतलब एक रात और तुम्हें मरीज बन कर यहां रहना पड़ेगा,’’ शेखर ने कहा.

‘‘नहीं, अब तुम आ गए हो न. अब डाक्टर से इजाजत ले लेती हूं, पेपर वगैरा सब तैयार हैं.’’

‘‘पर डाक्टर पूछेगा कि कौन लेने आया है तो क्या बोलोगी?’’ शेखर ने जिज्ञासा प्रकट की.

‘‘हां, बोलूंगी कि मेरी सगी बहन के सगे भाई के जीजाजी आए हैं?’’

‘‘मतलब?’’ शेखर ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा.

‘‘मतलब तुम समझो, मैं चली डाक्टर से मिलने.’’

संगीता फौरन डाक्टर से इजाजत ले कर आ गई और अपना सब सामान समेटने लगी. फिर शेखर ने बैग उठाया और दोनों हौस्पिटल से बाहर निकल पड़े.

रिकशा बुलाने से पहले ही संगीता ने पूछा, ‘‘कहां चल रहे हैं?’’

‘‘तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूंगा और मैं उसी रिकशे से वापस आ जाऊंगा,’’ शेखर ने सहज भाव से कहा.

‘‘नहीं, कहीं घूमने चलो न,’’ संगीता का आग्रह भरा स्वर था.

‘‘अभी तुम्हारी तबीयत नाजुक है. चुपचाप घर चलो,’’ शेखर ने समझाते हुए कहा.

‘‘अच्छा, चलो लस्सी पिला दो,’’ संगीता बच्चे की तरह जिद करती हुई बोली.

शेखर तब भड़क गया, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न, अभी फीवर से उठी हो और ठंडा?’’

संगीता तपाक से बोली, ‘‘जब तक तुम नहीं मिलते दिमाग ठीक रहता है.’’

‘‘अगर मैं कभी न मिलूं तब तो तुम बिलकुल ठीक रहोगी?’’ शेखर ने जानबूझ कर ऐसा सवाल किया.

तब संगीता घबराते हुए बोली, ‘‘अरे, ऐसा सोचना भी मत वरना तुम आगरा में मुमताज का ताजमहल निहारते रहोगे और मैं आगरा के पागलखाने में रहूंगी. वैसे भी आजीवन साथ रहना मुश्किल है, मेरे डैडी बहुत ही सख्त हैं, कुछ लमहे तो जी लूं.’’

शेखर उस की बकबक से तंग आ कर बोला, ‘‘प्लीज, अब रिकशे में बैठो. रास्ते में थोड़ी देर जूली पार्क में बैठेंगे फिर तुम्हें घर छोड़ दूंगा.’’

थोड़ी देर बाद दोनों जूली पार्क में थे. शाम गहरा गई थी. सूरज की लालिमा अंतिम चरण में थी, अत: अंधकार गहराता जा रहा था. शेखर पेड़ से टिक कर बैठा और संगीता उस की गोद में सिर रख लेट गई.

शेखर की उंगलियां संगीता की कालीघनी जुल्फों से अठखेलियां करने लगीं. शेखर बिना बोले अपनी नई रचना सुनाता रहा और संगीता उस की गोद में सुकून से सोती रही. वह वाकई में सो जाती लेकिन शेखर ने उसे जगाते हुए चलने को कहा.

दोनों दोबारा रिकशे में बैठ गए. आज संगीता काफी खुश थी. उस का सारा रोग ही काफूर हो गया था. शेखर भी संगीता से मिलने के बाद खुद को काफी तरोताजा महसूस करने लगा था.

शेखर ने संगीता को उस के घर के सामने ड्रौप करने के लिए रिकशा रुकवाया. उसे सामने संगीता के मम्मीपापा दिखे. उन की आंखों में उसे भरपूर आक्रोश और नफरत दिखी. कुछ कहने से पहले ही संगीता के पापा आगे बढ़ने लगे, पर उस की मां ने उन्हें रोक लिया. संगीता भी माहौल को देखते हुए बिलकुल खामोश रही और रिकशे से उतर कर चुपचाप घर के अंदर चली गई.

शेखर का रिकशा आगे बढ़ गया. रास्ते में मजाक में कही संगीता की बात शेखर को बारबार कचोटती रही कि कहीं दोनों का प्यार धर्म की भेंट न चढ़ जाए?

दूसरे दिन शेखर डरतेडरते संगीता के घर के सामने गया. संगीता के पड़ोसियों से पता चला कि सभी लोग पंजाब चले गए हैं. शेखर बस ठगा सा रह गया.

शेखर उन्हीं खूबसूरत लमहों के सहारे जी रहा था, पर आज अचानक संगीता से मुलाकात, उस के पति का सामीप्य, उस की उपेक्षा. थोड़ी देर के लिए वह उदास हो गया, लेकिन गुजरे हुए खूबसूरत लमहों के संग जीने की उस की चाह कम न हुई. उस के पास अब रह गई थीं बस, संगीता की यादें और कुछ खूबसूरत लमहे.

अच्छे शेर की तलाश : नेताओं के पालने के शौक

मैं कुछ सम झ नहीं पाया. मु झे लगा कि वे वन्य पशु संरक्षण बिल के खिलाफ जा कर अपने बंगले में शेर बांधना चाहते हैं. मैं ने उन्हें याद दिलाना चाहा  झ्कि वन्य प्राणी संरक्षा बिल के चलते वे शेर नहीं पाल सकते. लेकिन नेताओं का क्या, कुछ भी कर सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के एक नेता ने तो अपने बंगले में मगरमच्छ पाल रखे थे. नेता हैं तो अपने आलीशान बंगले में शेर, हाथी, गैंडा, हिरन, कछुआ कुछ भी रख सकते हैं. मु झे उन की शेर मंगवाने की वजह सम झ में नहीं आ रही थी. नेता तो कुछ भी पाल सकते हैं. गुंडे तो पालते ही हैं.

‘‘वह कवि सम्मेलनों या ऐसे ही किसी साहित्यिकफाहित्यिक कार्यक्रम में गा कर पढ़ते हैं न, उस वाले शेर की बात कर रहा हूं. लगता है कि तुम कवि सम्मेलनों में नहीं जाते?’’ उन्होंने मेरी जानकारी पर तरस खाते हुए कहा.

मु झे उन की इस 180 डिगरी की छलांग पर हैरानी हुई. बातबात में संस्कृत के श्लोक पढ़ने वाला आज उर्दू के शेर की बात कर रहा है. दल बदल तो नहीं कर लिया? वैसे भी अच्छे दिनों का सपना देखतेदेखते दोपहर हो गई है.

‘‘कहीं से भी लाओ, जल्दी लाओ. लाते रहो. काम आते जाएंगे. मु झे भाषण देना है. अब मैं घिसेपिटे भाषण देने

के बजाय शेर के जरीए अपनी बात कहूंगा,’’ उन्होंने कहा.

मैं शेर का मतलब सम झ तो गया था, लेकिन भाषण और शेर का नाता नहीं जोड़ पाया. मैं ने कलैंडर देखा. बजट या उस का संशोधन भी नहीं आया, जो वित्त मंत्री जातेजाते परंपरा के मुताबिक कोई शेर पढ़ें और ये भी उस का शेर में ही जवाब दें.

अपना तो शेरोशायरी से नाता कभी का टूट चुका था. कालेज के दिनों में तो जरूर मौकेबेमौके शेर ठूंस दिया करता था. साथ में पढ़ने वाली किसी लड़की की भी शादी हो गई तो उदासी का शेर गुनगुना लेता था. किसी लड़की ने खुद बात कर ली तो दिनभर रोमांटिक शेर जबान पर खेलता रहता था.

शादी के बाद जिंदगी से रोमांटिसिज्म विदा हो जाता है और उस की जगह रियलिज्म ले लेता है. अब तो ‘मेक इन इंडिया’ का नशा उतरने के बाद शेर की याद भी डराती है. बस याद आता है तो ‘अप्लाई अप्लाई बट नो रिप्लाई’.

अखबारों में बढ़ती रोजगारी और जमीन चूमने को बेचैन जीडीपी खबरों के चलते कोई शेर कैसे कह सकता है. सुनने की ही ताकत नहीं रही. फिर भी मैं ने उन्हें यकीन दिलाया कि जल्द ही शेर ढूंढ़ लाऊंगा.

‘‘कैसा शेर चाहिए आप को? खुशी का चाहिए या गम का? स्पिरिचुअल या रिवौलूशनल?’’ मैं ने जानना चाहा.

सच ही तो है. उन्हें गुस्से का शेर चाहिए हो और मैं मजाक का शेर पकड़ा दूं. खुशी का शेर चाहिए और मैं गम का ले आऊं तो बेइज्जती मेरी पढ़ाईलिखाई की होगी. उन का क्या, उन की शैक्षणिक योग्यता का पता तो उन्हें खुद को नहीं है.

‘‘सिचुएशनल… मु झे सिचुएशनल शेर चाहिए. आज की मांग सिचुएशनल शेर की है. कल तक जो अपने थे, वे आज बेगाने हो गए,’’ उन्होंने हताशा से शायराना अंदाज में कहा.

उन की बात में दम तो था. आजकल सामने वाले की खिल्ली उड़ाने के लिए शेरोशायरी का इस्तेमाल होने लगा है.

उन की फरमाइश पूरी करने के लिए मैं ने दोस्तों के घर जा कर शायरी की किताबें इकट्ठा कीं. सभी को हैरानी हो रही थी कि जो आदमी खर्चे कैसे कम करें, कम आमदनी में घर कैसे चलाएं, अखबार की रद्दी का सब से अच्छा भाव पाएं जैसे विषयों पर किताबें ढूंढ़ता रहता था, वह आज शेरोशायरी की किताबें मांग रहा है. उसे अब शायरी में फिर से कैसे दिलचस्पी हो आई. कहीं कोई ऐसावैसा चक्करवक्कर तो नहीं है.

लेकिन मैं ने सही बात नहीं बताई. मेरा ज्यादातर समय नौकरी ढूंढ़ने के साथसाथ शायरी की किताबें पढ़ने में जाने लगा. गालिब, मोमिन, अकबर इलाहाबादी से लगा कर साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, जां निसार, जावेद अख्तर, सरदार जाफरी, राहत इंदौरी, मुनव्वर राना तक को खंगाल डाला. कुछ शेर इस के लिए चुरा लिए तो कुछ उस के और 2 अलगअलग शेरों को जोड़ कर नया शेर बनाने की तिकड़म भी भिड़ाई.

सच कहूं तो खुद भी कुछ शेर लिख मारे. काफिया नहीं मिला तो क्या, भाषण देने वालों का शायरी से कोई मतलब नहीं होता. कभी सुना या देखा है नेता लोगों से मुशायरों में जाते हुए.

सब महाराष्ट्र के चलते हो रहा है, 2 हफ्ते बाद नेताजी ने मेरे चुने हुए सारे शेर खारिज कर दिए.

‘‘बयानों में शायरी का चलन वहीं से शुरू हुआ है. न वहां के नेता अपने अखबार में शेर पर शेर लिख कर सामने वाली पार्टी को ललकारते और न ही सामने वाले उस का जवाब शेर में देते. वह क्या, किसी ने कहा है कि मैं लहर हूं, लौट कर आऊंगा या ऐसा ही कुछ. अब तो इधर से एक शेर गया नहीं कि उधर से एक शेर दौड़ा चला आता है.

‘‘लगता है कि जिंदाबादमुरदाबाद के नारे घिस गए हैं जो शेर पर शेर चले आ रहे हैं. मेरे पास कोई शेर नहीं होता मौके पर. ऐसे में मैं खुद को पिछड़ा सम झने लगता हूं. तुम्हारी किताबों का एक भी शेर आज के हालात पर हो तो लगी शर्त.’’

वे बोले, ‘‘पढ़ाई के नाम पर फिल्में देखने या लड़कियों के साथ होटल में गुजारने के बजाय 2-4 शेर ही रट लेते, तो आज यह शर्मनाक नौबत नहीं आती. लगता है कि खुद ही शेर लिखना होगा.’’

मैं ने तो अपना काम कर दिया. रोज अखबार तो खरीदता ही था कि नौकरी का कोई इश्तिहार दिख जाए, लेकिन इस बार उन का कोई दहाड़ता शेर पढ़ने को मिल जाए, इस पर भी नजर दौड़ाने लगा हूं.

बहुत दिन हो गए, लेकिन उन का शेर मांद में ही रहा. उन्हें भी बिना शेर के चैन नहीं था. एक दिन मेरे घर आए और डांटने लगे कि मैं ने कोई नया शेर नहीं सु झाया. बड़ी देर तक वे हमारी दोस्ती का वास्ता देते रहे. मुसीबत के समय दोस्त ही काम आता है जैसी किताबी बातें करते रहे.

मैं सम झ गया कि अब मामला आईसीयू में ले जाने जितना गंभीर हो गया है. मैं उन्हें हाईवे के टोल नाके पर ले गया.

मैं ने उन से अदब से कहा, ‘‘कुछ पल गुजारिए टोल नाके पर, शेरों की बरात निकलेगी. इस रास्ते से दिनरात कई ट्रक गुजरते हैं. उन के पीछे देखते रहिए. नएनए शेर मिल जाएंगे.’’

हयात : जज्बातों का समंदर

‘‘कल जल्दी आ जाना.’’

‘‘क्यों?’’ हयात ने पूछा.

‘‘कल से रेहान सर आने वाले हैं और हमारे मिर्जा सर रिटायर हो रहे हैं.’’

‘‘कोशिश करूंगी,’’ हयात ने जवाब तो दिया लेकिन उसे खुद पता नहीं था कि वह वक्त पर आ पाएगी या नहीं.

दूसरे दिन रेहान सर ठीक 10 बजे औफिस में पहुंचे. हयात अपनी सीट पर नहीं थी. रेहान सर के आते ही सब लोगों ने खड़े हो कर गुडमौर्निंग कहा. रेहान सर की नजरों से एक खाली चेयर छूटी नहीं.

‘‘यहां कौन बैठता है?’’

‘‘मिस हयात, आप की असिस्टैंट, सर,’’ क्षितिज ने जवाब दिया.

‘‘ओके, वह जैसे ही आए उन्हें अंदर भेजो.’’

रेहान लैपटौप खोल कर बैठा था. कंपनी के रिकौर्ड्स चैक कर रहा था. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘में आय कम इन, सर?’’

‘‘यस प्लीज, आप की तारीफ?’’

‘‘जी, मैं हयात हूं. आप की असिस्टैंट?’’

‘‘मुझे उम्मीद है कल सुबह मैं जब आऊंगा तो आप की चेयर खाली नहीं होगी. आप जा सकती हैं.’’

हयात नजरें झुका कर केबिन से बाहर निकल आई. रेहान सर के सामने ज्यादा बात करना ठीक नहीं होगा, यह बात हयात को समझे में आ गई थी. थोड़ी ही देर में रेहान ने औफिस के स्टाफ की एक मीटिंग ली.

‘‘गुडआफ्टरनून टू औल औफ यू. मुझे आप सब से बस इतना कहना है कि कल से कंपनी के सभी कर्मचारी वक्त पर आएंगे और वक्त पर जाएंगे. औफिस में अपनी पर्सनल लाइफ को छोड़ कर कंपनी के काम को प्रायोरिटी देंगे. उम्मीद है कि आप में से कोई मुझे शिकायत का मौका नहीं देगा. बस, इतना ही, अब आप लोग जा सकते हैं.’’

‘कितना खड़ूस है. एकदो लाइंस ज्यादा बोलता तो क्या आसमान नीचे आ जाता या धरती फट जाती,’ हयात मन ही मन रेहान को कोस रही थी.

नए बौस का मूड देख कर हर कोई कंपनी में अपने काम के प्रति सजग हो गया. दूसरे दिन फिर से रेहान औफिस में ठीक 10 बजे दाखिल हुआ और आज फिर हयात की चेयर खाली थी. रेहान ने फिर से क्षितिज से मिस हयात को आते ही केबिन में भेजने को कहा. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘मे आय कम इन, सर?’’

‘‘जी, जरूर, मुझे आप का ही इंतजार था. अभी हमें एक होटल में मीटिंग में जाना है. क्या आप तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, कब निकलना है?’’

‘‘उस मीटिंग में आप को क्या करना है, यह पता है आप को?’’

‘‘जी, आप मुझे कल बता देते तो मैं तैयारी कर के आती.’’

‘‘मैं आप को अभी बताने वाला था. लेकिन शायद वक्त पर आना आप की आदत नहीं. आप की सैलरी कितनी है?’’

‘‘जी, 30 हजार.’’

‘‘अगर आप के पास कंपनी के लिए टाइम नहीं है तो आप घर जा सकती हैं और आप के लिए यह आखिरी चेतावनी है. ये फाइल्स उठाएं और अब हम निकल रहे हैं.’’

हयात रेहान के साथ होटल में पहुंच गई. आज एक हैदराबादी कंपनी के साथ मीटिंग थी. रेहान और हयात दोनों ही टाइम पर पहुंच गए. लेकिन सामने वाली पार्टी ने बुके और वो आज आएंगे नहीं, यह मैसेज अपने कर्मचारी के साथ भेज दिया. उस कर्मचारी के जाते ही रेहान ने वो फूल उठा कर होटल के गार्डन में गुस्से में फेंक दिए. ‘‘आज का तो दिन ही खराब है,’’ यह बात कहतेकहते वह अपनी गाड़ी में जा कर बैठ गया.

रेहान का गुस्सा देख कर हयात थोड़ी परेशान हो गई और सहमीसहमी सी गाड़ी में बैठ गई. औफिस में पहुंचते ही रेहान ने हैदराबादी कंपनी के साथ पहले किए हुए कौंट्रैक्ट के डिटेल्स मांगे. इस कंपनी के साथ 3 साल पहले एक कौंट्रैक्ट हुआ था लेकिन तब हयात यहां काम नहीं करती थी, इसलिए उसे वह फाइल मिल नहीं रही थी.

‘‘मिस हयात, क्या आप शाम को फाइल देंगी मुझे’’ रेहान केबिन से बाहर आ कर हयात पर चिल्ला रहा था.

‘‘जी…सर, वह फाइल मिल नहीं रही.’’

‘‘जब तक मुझे फाइल नहीं मिलेगी, आप घर नहीं जाएंगी.’’

यह बात सुन कर तो हयात का चेहरा ही उतर गया. वैसे भी औफिस में सब के सामने डांटने से हयात को बहुत ही इनसल्टिंग फील हो रहा था. शाम के 6 बज चुके थे. फाइल मिली नहीं थी.

‘‘सर, फाइल मिल नहीं रही है.’’

रेहान कुछ बोल नहीं रहा था. वह अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था. रेहान की खामोशी हयात को बेचैन कर रही थी. रेहान का रवैया देख कर वह केबिन से निकल आईर् और अपना पर्स उठा कर घर निकल गई. दूसरे दिन हयात रेहान से पहले औफिस में हाजिर थी. हयात को देखते ही रेहान ने कहा, ‘‘मिस हयात, आज आप गोडाउन में जाएं. हमें आज माल भेजना है. आई होप, आप यह काम तो ठीक से कर ही लेंगी.’’

हयात बिना कुछ बोले ही नजर झुका कर चली गई. 3 बजे तक कंटेनर आए ही नहीं. 3 बजने के बाद कंटेनर में कंपनी का माल भरना शुरू हुआ. रात के 8 बजे तक काम चलता रहा. हयात की बस छूट गई. रेहान और उस के पापा कंपनी से बाहर निकल ही रहे थे कि कंटेनर को देख कर वे गोडाउन की तरफ मुड़ गए. हयात एक टेबल पर बैठी थी और रजिस्टर में कुछ लिख रही थी.

तभी मिर्जा साहब के साथ रेहान गोडाउन में आया. हयात को वहां देख कर रेहान को, कुछ गलत हो गया, इस बात का एहसास हुआ.

‘‘हयात, तुम अभी तक घर नहीं गईं,’’ मिर्जा सर ने पूछा.

‘‘नहीं सर, बस अब जा ही रही थी.’’

‘‘चलो, जाने दो, कोई बात नहीं. आओ, हम तुम्हें छोड़ देते हैं.’’

अपने पापा का हयात के प्रति इतना प्यारभरा रवैया देख कर रेहान हैरान हो रहा था, लेकिन वह कुछ बोल भी नहीं रहा था. रेहान का मुंह देख कर हयात ने ‘नहीं सर, मैं चली जाऊंगी’ कह कर उन्हें टाल दिया. हयात बसस्टौप पर खड़ी थी. मिर्जा सर ने फिर से हयात को गाड़ी में बैठने की गुजारिश की. इस बार हयात न नहीं कह सकी.

‘‘हम तुम्हें कहां छोड़ें?’’

‘‘जी, मुझे सिटी हौस्पिटल जाना है.’’

‘‘सिटी हौस्पिटल क्यों? सबकुछ ठीक तो है?’’

‘‘मेरे पापा को कैंसर है, उन्हें वहां ऐडमिट किया है.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे पापा से हम भी एक मुलाकात करना चाहेंगे.’’

कुछ ही देर में हयात अपने मिर्जा सर और रेहान के साथ अपने पापा के कमरे में आई.

‘‘आओआओ, मेरी नन्ही सी जान. कितना काम करती हो और आज इतनी देर क्यों कर दी आने में. तुम्हारे उस नए बौस ने आज फिर से तुम्हें परेशान किया क्या?’’

हयात के पापा की यह बात सुन कर तो हयात और रेहान दोनों के ही चेहरे के रंग उड़ गए.

‘‘बस अब्बू, कितना बोलते हैं आप. आज आप से मिलने मेरे कंपनी के बौस आए हैं. ये हैं मिर्जा सर और ये इन के बेटे रेहान सर.’’

‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई सुलतान मियां. अब कैसी तबीयत है आप की?’’ मिर्जा सर ने कहा.

‘‘हयात की वजह से मेरी सांस चल रही है. बस, अब जल्दी से किसी अच्छे खानदान में इस का रिश्ता हो जाए तो मैं गहरी नींद सो सकूं.’’

‘‘सुलतान मियां, परेशान न हों. हयात को अपनी बहू बनाना किसी भी खानदान के लिए गर्व की ही बात होगी. अच्छा, अब हम चलते हैं.’’

इस रात के बाद रेहान का हयात के प्रति रवैया थोड़ा सा दोस्ताना हो गया. हयात भी अब रेहान के बारे में सोचती रहती थी. रेहान को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सजनेसंवरने लगी थी.

‘‘क्या बात है? आज बहुत खूबसूरत लग रही हो,’’ रेहान का छोटा भाई आमिर हयात के सामने आ कर बैठ गया. हयात ने एकबार उस की तरफ देखा और फिर से अपनी फाइल को पढ़ने लगी. आमिर उस की टेबल के सामने वाली चेयर पर बैठ कर उसे घूर रहा था. आखिरकार हयात ने परेशान हो कर फाइल बंद कर आमिर के उठने का इंतजार करने लगी. तभी रेहान आ गया. हयात को आमिर के सामने इस तरह से देख कर रेहान परेशान तो हुआ लेकिन उस ने देख कर भी अनदेखा कर दिया.

दूसरे दिन रेहान ने अपने केबिन में एक मीटिंग रखी थी. उस मीटिंग में आमिर को रेहान के साथ बैठना था. लेकिन वह जानबूझ कर हयात के बाजू में आ कर बैठ गया. हयात को परेशान करने का कोई मौका वह छोड़ नहीं रहा था. लेकिन हयात हर बार उसे देख कर अनदेखा कर देती थी. एक दिन तो हद ही हो गई. आमिर औफिस में ही हयात के रास्ते में खड़ा हो गया.

‘‘रेहान तुम्हें महीने के 30 हजार रुपए देता है. मैं एक रात के दूंगा. अब तो मान जाओ.’’

यह बात सुनते ही हयात ने आमिर के गाल पर एक जोरदार चांटा जड़ दिया. औफिस में सब के सामने हयात इस तरह रिऐक्ट करेगी, इस बात का आमिर को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था. हयात ने तमाचा तो लगा दिया लेकिन अब उस की नौकरी चली जाएगी, यह उसे पता था. सबकुछ रेहान के सामने ही हुआ.

बस, आमिर ने ऐसा क्या कर दिया कि हयात ने उसे चाटा मार दिया, यह बात कोई समझ नहीं पाया. हयात और आमिर दोनों ही औफिस से निकल गए.

दूसरे दिन सुबह आमिर ने आते ही रेहान के केबिन में अपना रुख किया.

‘‘भाईजान, मैं इस लड़की को एक दिन भी यहां बरदाश्त नहीं करूंगा. आप अभी और इसी वक्त उसे यहां से निकाल दें.’’

‘‘मुझे क्या करना है, मुझे पता है. अगर गलती तुम्हारी हुई तो मैं तुम्हें भी इस कंपनी से बाहर कर दूंगा. यह बात याद रहे.’’

‘‘उस लड़की के लिए आप मुझे निकालेंगे?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘यह तो हद ही हो गई. ठीक है, फिर मैं ही चला जाता हूं.’’

रेहान कब उसे अंदर बुलाए हयात इस का इंतजार कर रही थी. आखिरकार, रेहान ने उसे बुला ही लिया. रेहान अपने कंप्यूटर पर कुछ देख रहा था. हयात को उस के सामने खड़े हुए 2 मिनट हुए. आखिरकार हयात ने ही बात करना शुरू कर दिया.

‘‘मैं जानती हूं आप ने मुझे यहां बाहर करने के लिए बुलाया है. वैसे भी आप तो मेरे काम से कभी खुश थे ही नहीं. आप का काम तो आसान हो गया. लेकिन मेरी कोई गलती नहीं है. फिर भी आप मुझे निकाल रहे हैं, यह बात याद रहे.’’

रेहान अचानक से खड़ा हो कर उस के करीब आ गया, ‘‘और कुछ?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘वैसे, आमिर ने किया क्या था?’’

‘‘कह रहे थे एक रात के 30 हजार रुपए देंगे.’’

आमिर की यह सोच जान कर रेहान खुद सदमे में आ गया.

‘‘तो मैं जाऊं?’’

‘‘जी नहीं, आप ने जो किया, बिलकुल ठीक किया. जब भी कोई लड़का अपनी मर्यादा भूल जाए, लड़की की न को सम?ा न पाए, फिर चाहे वह बौस हो, पिता हो, बौयफ्रैंड हो उस के साथ ऐसा ही होना चाहिए. लड़कियों को छेड़खानी के खिलाफ जरूर आवाज उठानी चाहिए. मिस हयात, आप को नौकरी से नहीं निकाला जा रहा है.’’

‘‘शुक्रिया.’’

अब हयात की जान में जान आ गई. रेहान उस के करीब आ रहा था और हयात पीछेपीछे जा रही थी. हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी.

रेहान ने हयात का हाथ अपने हाथ में ले लिया और आंखों में आंखें डालते हुए बोला, ‘‘मिस हयात, आप बहुत सुंदर हैं. जिम्मेदारियां भी अच्छी तरह से संभालती हैं और एक सशक्त महिला हैं. इसलिए मैं तुम्हें अपनी जीवनसाथी बनाना चाहता हूं.’’

हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी. क्या बोले, क्या न बोले. बस, शरमा कर हामी भर दी.

वो वाली दोस्त: क्या मुकेश मीनू को अपना बना पाया?

कोरोना की महामारी ने बड़ेबड़े परदेशी को गांव में आने को मजबूर किया है. आज पूरे 4 साल बाद मुकेश अपने गांव आया है या कहें मजबूरी में आया है. मुकेश बहुत ही गरीबी की जिंदगी बचपन से जिया है और अपने सपनों और घर की हालत सुधारने के लिए 10 वीं पढ़ कर मुंबई भाग गया. वहां उस ने मोटर बनाने का काम सीखा और आज अच्छा पैसा कमा रहा है.

मुकेश की उम्र अभी 24 साल है. उस पर मुंबई का सुरूर देखा जा सकता है. रंगे हुए बाल, गोरा शरीर, अच्छे कपड़े उस की शोभा बढ़ा रहे थे.

मुकेश अपने घर के बाहर बरामदे में बैठा था, तभी उस की नजर सामने लगे नल पर पड़ी, जहां एक 17 साल की नई यौवन को पाई हुई खूबसूरत गोरी सी लड़की बालटी में पानी भर रही थी.

मुकेश की नजरों को मानो कोई जादू सा लग गया हो. वह एकटक उसी को देखे जा रहा था. वह सोच रहा था कि आखिर ये लड़की, जो बिलकुल साधारण कपड़ों और बिना फैशन के ही सुंदर लग रही है. हमारे शहर में लड़कियां तो मेकअप का सहारा लेती हैं, लेकिन इतनी सुंदर और मनमोहक नहीं लगतीं. मुकेश की नजर उस का तब तक पीछा करती रही, जब तक वह पानी ले कर ओझल नहीं हुई.

मुकेश ने अपनी भाभी से पूछा, ‘‘भाभी, यह लड़की कौन है? मैं तो इसे पहचान नहीं पाया.‘‘

भाभी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे मुकेश, यह तो अपनी बगल के तिवारीजी की बिटिया मीनू है. तुम इसे भूल गए. शायद वह बड़ी हो गई है, इसीलिए इसे पहचान नहीं पाए.‘‘

मुकेश को उस का नाम जान कर न जाने क्या खुशी मिल रही थी, वह मन ही मन उस को अपना बनाने की सोचने लगा. मीनू की जवानी और खूबसूरती ने उस का दिल भेद दिया था.

अगले दिन फिर मुकेश बरामदे में बैठा उस का इंतजार करने लगा कि कब वह पानी भरने आएगी और कब वह उस का दीदार कर सकेगा.

तभी उस की नजर पीले सूट में चमकती हुई मीनू पर पड़ी और मुकेश की आंखें देखती रह गईं. पीले सूट में मीनू की खूबसूरती अलग ही इमेज बना रही थी, मानो कनेर का खूबसूरत फूल उतर आया हो.

मुकेश ने बड़ी हिम्मत की और नल तक पहुंच गया. वह मासूम बनते हुए बोला, ‘‘तुम मीनू हो न…‘‘

मीनू ने पलटते हुए जवाब दिया, ‘‘तुम्हें मेरा नाम मालूम है… हां, मैं ही मीनू हूं, और तुम मुकेश हो न. तुम तो मुंबई क्या गए, हम सब को भूल ही गए. अपने सभी दोस्तों और घर वालों को लगता है कि शहर की लड़कियां ज्यादा खूबसूरत लगती हैं.‘‘

अचानक मुकेश के मुंह से निकल गया, ‘‘नहीं मीनू, तुम से खूबसूरत कोई नहीं.’’

मीनू शरमा कर बालटी ले कर भागी और मुकेश को होश आया कि उस ने क्या कह दिया?

अगले दिन फिर वह बात करने पहुंच गया और बोला, ‘‘मीनू, मुझे माफ कर दो. मैं ने न जाने क्या बोल दिया, जो तुम भाग गई.‘‘

मीनू ने शरमाते हुए कहा, ‘‘अरे पागल, ऐसी कोई बात नहीं है.”

मुकेश ने कहा, ‘‘मुझ से दोस्ती करोगी?‘‘

मीनू ने कहा, ‘‘लेकिन, मैं और तुम तो पहले के ही दोस्त हैं बचपन से. बस, तुम्हीं भूल गए हो.‘‘

मुकेश को लगा कि आग दोनों तरफ है. उस ने बड़े प्यार से इशारों वाली बात में कहा, ‘‘वो वाली दोस्त बनोगी, गर्लफ्रैंड वाली.‘‘

मीनू ने कहा, ‘‘तुम परेशान करोगे लेकिन मैं ने देखा है फिल्मों में.‘‘

मुकेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं, प्यार करूंगा बस, परेशान कभी नहीं. तुम इतनी खूबसूरत हो, भला कौन तुम्हें परेशान करेगा.‘‘

इसी तरह दोनों की मेलमुलाकात और बातें बढ़ती गईं. कभीकभी प्यार से मीनू का हाथ मुकेश छू लेता, तब उस के शरीर मे अजब सी सिहरन दौड़ पड़ती.

मीनू मन ही मन उसे अपना दिल दे चुकी थी, बस होंठों पर इजहार लाने की देरी थी. लेकिन हर लड़की की तरह वह भी चाहती थी कि मुकेश ही इजहार करे.

एक दिन मुकेश ने बड़ी हिम्मत से अपने दिल की बात बताई

यह सुन कर मीनू खुशी से उछल पड़ी और उसे गले से लगा लिया.

गले लगते ही मुकेश को मानो क्या मिल गया, वह उस के प्यार में अधीर हो गया और पाने की ललक में व्याकुल भी.

उस के शरीर की बनावट, उस की सादगी उसे अपनी पसंद पर गुरूर दे रही थी, मानो उसे दुनिया का सब से अनमोल उपहार मिला हो.

अगले दिन मीनू उस के घर आई, तब उस की भाभी नहाने और मां बगल वाले ताऊ के यहां गई थीं. मुकेश बिस्तर पर सो रहा था. मीनू उस के समीप पहुंची और अपने होंठों से उस के गालों पर एक चुम्मा दे दी.

अचानक स्पर्श से मुकेश पलटा और दोनों के होंठ छू गए.

मुकेश उसे चूमने लगा, तभी मीनू की भी सासें गरम चलने लगीं, लेकिन खुद को संभालते हुए वह उस से झिटक कर दूर हुई और बोली, ‘‘धत्त, तुम बड़े बदमाश हो. अब कभी तुम्हें चुम्मा नहीं करूंगी.’’ लेकिन तभी मुकेश ने उठ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया, फिर मीनू ने भी खुद को समर्पित कर दिया और अपने कोमल होंठों से उस का साथ देने लगी.

मुकेश की गरम सांसें मीनू के बदन में आग डाल रही थीं और उस का यौवन पूरे उफान पर आ चुका था. मुकेश भी अपने सीने पर उसे महसूस कर रहा था.

दोनों ही बिना कुछ बोले प्यार की आग में आहुति बन रहे थे और एकदूसरे को पूरा किए दे रहे थे.

मुकेश और मीनू का प्यार था या सिर्फ खिंचाव या फिर बचपन में हुई गलती, ये समय सिद्ध करेगा. लौकबंदी के 4 महीनों में मुकेश और मीनू ने न जाने कितनी दफा आगोश में लिपटे अपने जिस्म की गरमियों से एकदूसरे को पिघलाया.

मीनू का भरता यौवन अपनी चरमसीमा पर पहुंचने पर पूर्ण तृप्ति को पाया और मुकेश ने भी अपनी बांहों में न जाने कितनी दफा मीनू को जगह दी.

अचानक कुछ ही दिनों के बाद मुकेश को शहर से फोन आ गया. वह अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार था. घर की गृहस्थी चलाना और अब प्यार दोनों में कोई एक चुनना था. अभी उम्र कम थी और काम ज्यादा करना था. अभी तो उसे कामयाबी मिलनी शुरू हुई थी.

एक रात उस ने बाग में मीनू को बुलाया और मिलते ही मीनू ने उसे गले से लगा लिया और उस के गालों पर अपने होंठों से चूमते हुए कहा, ‘‘ मुकेश तुम से बिलकुल दूर नहीं रहा जाता. मुझे हर जगह बस तुम्हीं दिखते हो. मन करता है कि तुम्हारी बांहों में रहूं और उम्र गुजर जाए.‘‘

मीनू की प्यार भरी बातें मुकेश सुनता रहा, परंतु वो तो मीनू से आज विदा लेने आया था कि उसे फिर शहर वापस जाना है.

मुकेश ने कहा, ‘‘मीनू, मैं भी तुम से प्यार करता हूं और तुम जानती हो कि आज के जमाने में प्रेम के साथ पैसों की भी जरूरत पड़ती है. बिना पैसों के घर नहीं चलता, इसीलिए आज तुम्हें यहां बुलाया है. मुझे कल शहर जाना है, क्योंकि आज वापसी के लिए फोन आया था.”

इतना सुनते ही मीनू के सिर पर मानो गमों का पहाड़ टूट पड़ा. यह सुन कर वह रोने लगी और फिर मुकेश की बांहों में खुद को समर्पित कर दिया.

मुकेश ने उसे प्यार से चूमा और दोनों के होंठ और हाथ एकदूसरे के बदन से खेलने लगे. मुकेश ने उस को वहीं जमीन पर लिटा दिया और चूमने लगा. मीनू भी उस का बराबर साथ दे रही थी. रात के ढलते हुए पहर में वे दोनों एकदूसरे में खोते गए. न जाने कब दोनों एकदूसरे के जिस्म में समा गए और अपनी चरमसीमा के उपरांत दोनों अलग हुए.

मुकेश ने मीनू से वादा किया, ‘‘तुम जरा भी चिंता न करो. मैं जल्दी ही वापस आऊंगा और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाऊंगा.‘‘

सुबह हुई, मुकेश तैयार हुआ और शहर जाने के लिए निकल पड़ा. मीनू छत से उसे जाते देख रही थी, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया.

मीनू बहुत रोई और फिर खुद को ही समझाया, परंतु रोकने की हिम्मत न हुई क्योंकि प्रेम में आप साथी को खुद से नहीं बांध सकते उस की खुशी जब तक न हो.

आज इस घटना को पूरे 3 साल हो गए. मुकेश एक बार भी शहर से न आया. पहले एक या डेढ़ साल तक उस का फोन आता था, लेकिन तब से वह भी बंद है.

मीनू अब और बड़ी हो गई और सुंदर भी. उस का यौवन अब पूरी तरह से विकसित और ज्यादा खूबसूरत हो गया, उभार और कमर की खूबसूरती लड़कों को आकर्षित करती. उस के कालेज के न जाने कितने लड़कों ने उसे प्यार के लिए मनाया, परंतु उस के मन में मुकेश के सिवा कोई नहीं. वह बस उसी का इंतजार करती रही.

एक दिन उसे खबर मिली कि मुकेश इस हफ्ते गांव आ रहा है. उस की खुशी का ठिकाना न था. उस को लग रहा था कि वह सातवें आसमान पर है.

आज वह दिन भी आ गया और मुकेश वापस आया. मीनू कालेज से वापस आते ही भागती हुई मुकेश के घर उस से मिलने पहुंची और वहां पहुंचते ही वह हैरान हो गई.

मुकेश अकेले नहीं आया था, बल्कि एक लड़की के साथ आया था, जो उस की पत्नी थी. मुकेश ने शहर में ही शादी कर ली थी.

मीनू को देखते ही मुकेश ने उसे बुलाया और अपनी पत्नी से मिलाते हुए कहा, ‘‘सुनो, ये मेरी वो वाली दोस्त है, जिस के बारे में मैं ने तुम्हें बताया था.‘‘

मीनू ने भी उस की पत्नी को गले लगाया और कहा, ‘‘तुम बहुत तकदीर वाली हो, तुम्हें सब से अच्छा लड़का मिला, जो मेरा दोस्त था.‘‘

मीनू वहां से भागती हुई आई और फूटफूट कर रोई. वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी कि वह सिर्फ वो वाली दोस्त थी.

News Kahani – आदमखोर : किन जानवरों में घिरी थी बेला

शाम के साढ़े 6 बज रहे थे. रेलगाड़ी अभी प्लेटफार्म पर आ कर रुकी ही थी. रामपुर गांव की इक्कादुक्का सवारियां ही थीं. 21 साल की बेला शहर से गांव आई थी. उस के पास ज्यादा सामान नहीं था. रेलवे स्टेशन से घर की दूरी यों तो पैदल 20-25 मिनट की ही थी, पर बेला ने रिकशे से घर जाना सही समझ. लेकिन रेलवे स्टेशन के बाहर सन्नाटा पसरा था.

एक बार को बेला ने अपने बड़े भाई मनोज को फोन कर के रेलवे स्टेशन आने को कहने की सोची, पर उसे लगा कि परिवार वालों को सरप्राइज देगी, तो बड़ा मजा आएगा. फिर उसे गांव का चप्पाचप्पा पता है, अभी कच्ची सड़क से गांव की ओर हो लेगी, तो 15-20 मिनट में ही घर पहुंच जाएगी.

कच्ची सड़क पर अंधेरा रहता था और चूंकि यह गांव जंगल से घिरा था, तो रास्ता सुनसान भी था. जंगली जानवरों का भी डर बना रहता था. लेकिन बेला बेफिक्र हो कर घर के लिए चल दी.

पर, अभी बेला कुछ ही दूर गई थी कि उसे किसी की आहट हुई. पहले तो उसे लगा कि यह उस का वहम है, पर बाद में कोई साया अचानक से बेला पर झपटा और उसे घसीटता हुआ जंगल के भीतर ले गया.

इधर बेला के साथ हुई घटना से अनजान उस के परिवार वाले दीवाली की तैयारियों में लगे हुए थे.

‘‘मनोज, बेला किसी भी दिन आ सकती है. उस के आने से पहले घर में सफेदी हो जानी चाहिए. थोड़े दीए और बिजली की झलर भी सजावट के लिए ले आना. यह तेरी बहन की इस घर में शायद आखिरी दीवाली है. फिर तो अगले साल हम उस की शादी करा देंगे. कब तक बेटी को घर पर बिठा कर रखेंगे.’’

‘‘अरे मां, तुम भी कहां बेला की शादी के पीछे पड़ गई हो. अभी 21 साल की ही तो है. करा देना 2-4 साल में उस की शादी. तुम्हारा बेटा 24 साल का हो गया है, उस की कोई फिक्र नहीं,’’ मनोज ने अपनी मां शांति देवी के गले में हाथ डालते हुए चुहलबाजी की.

‘‘तुझे बड़ा शादी करने का शौक चढ़ा है. चिंता मत कर, तेरे भी हाथ जल्दी पीले कर देंगे,’’ पड़ोस की रीता भाभी ने अचानक से घर आ कर कहा, तो मनोज शरमा गया.

‘‘भाभी, यह चीटिंग है. तुम ने छिप कर हम मांबेटे की बात सुन ली,’’ मनोज ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘अरे, छिप कर कहां सुन रही थी. तेरी पसंद की कढ़ी बनाई थी, वही देने आई थी. अगर कल तेरे भैया बताते कि आज रात को मैं ने कढ़ी बनाई थी और तु?ो नहीं दी, तो तू मेरी नाक में दम नहीं कर देता,’’ रीता भाभी ने कढ़ी का एक कटोरा मनोज को थमाते हुए कहा.

‘‘भाभी हो तो आप जैसी. काश, बेला भी यहां होती, तो हम दोनों कढ़ी खाते,’’ मनोज ने कहा.

‘‘कब आ रही है हमारी लाड़ो?’’ रीता भाभी ने पूछा.

‘‘शायद, परसों तक वह आ जाएगी. अभी पूछ लेता हूं उस से,’’ मनोज ने कहा.

मनोज ने बेला को फोन किया, पर वह आउट औफ नैटवर्क एरिया बता रहा था. ऐसा तो कभी नहीं हुआ था. मनोज के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं.

पर रीता भाभी ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं देवरजी, बाद में बेला खुद ही फोन कर लेगी,’’ इतना कह कर वह अपने घर चली गई.

पर जब देर रात तक मनोज की बेला से फोन पर बात नहीं हुई, तो उस ने बेला की सहेली प्रिया को फोन किया. प्रिया ने बताया कि बेला तो आज ही शाम की रेलगाड़ी से गांव आने वाली थी, तो मनोज के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

मनोज ने यह बात जब अपने पिताजी सूरजभान को बताई, तो वे भी चिंतित हो गए और वे दोनों शांति देवी को बिना बताए घर से बाहर चले गए.

घर से थोड़ी ही दूरी पर सूरजभान ने गांव के 4-5 पक्के दोस्तों को अपने साथ लिया और रात को ही रेलवे स्टेशन की तरफ निकल गए. मनोज के साथ उस का जिगरी दोस्त दिनेश भी था. सब के पास लाठी और टौर्च थीं.

मोटरसाइकल से उन्हें रेलवे स्टेशन पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगी. वहां के चौकीदार बनवारी ने बताया कि बेला शाम की रेलगाड़ी से आई थी और शायद कच्ची सड़क से घर की तरफ गई थी.

यह सुन कर सब के कान खड़े हो गए. दरअसल, पिछले कुछ समय से उस इलाके में किसी ऐसे अनजान हिंसक जानवर का खौफ था, जो मवेशियों के साथसाथ इनसानों पर भी हमला कर सकता था. कहीं बेला भी उसी जानवर का शिकार तो नहीं हो गई है?

‘‘मनोज बेटा, एक बार फिर से बेला का मोबाइल नंबर लगा. क्या पता, इस बार घंटी बज जाए,’’ सूरजभान ने कच्ची सड़क पर आगे बढ़ते हुए कहा.

मनोज ने तुरंत ही जेब से फोन निकाला और बेला का नंबर मिला दिया. इस बार घंटी की आवाज आई, जो नजदीक ही जंगल की ओर से आ रही थी.

वे सब घंटी की आवाज की तरफ दौड़े. सड़क के बाएं ओर जंगल के कुछ भीतर बेला का बैग पड़ा मिला. फोन उसी बैग में बज रहा था.

‘‘पापा, यह तो बेला का बैग है. मैं ने जन्मदिन पर उसे दिया था. बेला भी यहीं आसपास होगी,’’ मनोज ने कहा.

इधर बेला के घर में मनोज की मां शांति देवी को भनक लग गई थी कि उन की बेटी आज गांव आ रही थी, पर घर नहीं पहुंची. उन का रोरो कर बुरा हाल था. आसपास की औरतें उन्हें दिलासा दे रही थीं और दबी जबान में आदमखोर जानवर का जिक्र भी कर रही थीं.

‘‘दिन ढले अकेले घर आने की क्या तुक थी. अपने भाई को ही फोन कर लेती. मोटरसाइकिल से तुरंत घर ले आता,’’ पड़ोस की माया ताई ने कहा.

‘‘अब तो ऐसी बातें करने का कोई मतलब नहीं है. बच्ची सहीसलामत हो,’’ पड़ोस की रीता भाभी ने कहा.

‘‘बस, एक बार मेरी बेटी घर आ जाए और मुझे कुछ नहीं चाहिए. एक बार मनोज को फोन मिला कर देखो कोई…’’ शांति देवी रोते हुए बोलीं.

वहां जंगल के कुछ भीतर जाते ही बेला बेहोशी की हालत में पड़ी मिली. उस पर किसी के द्वारा खरोंचे जाने के निशान थे. उसे बुरी तरह घसीटा गया था.

सूरजभान अपनी बेटी बेला की ऐसी हालत देख कर आंसू नहीं रोक पाए. मनोज ने पाया कि बेला की सांसें बड़ी धीमी थीं. लगता है, जानवर उसे घसीट कर जंगल के भीतर तो ले गया था, पर बिना खाए ही भाग गया.

इतने में थोड़ी दूर से दिनेश की डरी हुई सी आवाज आई, ‘‘सब लोग इधर आओ. बृजभान पहलवान के बिगड़ैल बेटे सनी की लाश यहां पड़ी है. किसी जंगली जानवर ने बड़ी बेरहमी से इस का शिकार किया है.

‘‘मुझे लगता है कि बेला को जंगली जानवर से बचाने के लिए यह उस से भिड़ गया और अपनी जान गंवा बैठा.’’

सनी की गांव में इमेज अच्छी नहीं थी. वह हर किसी से पंगा लेता था और चूंकि गांव में उस के बाप का दबदबा था, तो हर कोई उस से बचता था. पर आज तो सनी ने अपनी जान पर खेल कर बेला की इज्जत बचाई थी.

आननफानन ही वहां पुलिस बुलाई गई. सनी की लाश का पंचनामा किया गया. बेहोश बेला और सनी की लाश को जल्दी से शहर के सरकारी अस्पताल में भेजा गया.

कुछ पुलिस वालों ने गांव के लोगों के साथ आदमखोर जंगली जानवर की तलाश की, पर निराशा ही हाथ लगी. अब तो बेला के होश में आने पर ही इस कांड की हकीकत पता लग सकती थी.

अगली सुबह इस मामले को ले कर पंचायत बैठी. पूरा गांव जुटा हुआ था. बेला और सनी के साथ हुए इस कांड ने सब को चिंतित कर दिया था. बेला को किसी भी समय होश आ सकता था, पर गांव की हिफाजत के लिए पंचायत को भी कोई कठोर फैसला लेना था.

हड्डियों का ढांचा हो गए भीखू ने खड़े हो कर पंचों को नमस्कार किया और चिंता जताई, ‘‘क्या कहें भैया, हर जगह जंगली जानवरों ने आतंक मचा रखा है. उत्तर प्रदेश में भेडि़ए के हमले की खबरें आने के बाद अलगअलग राज्यों से अलगअलग जानवरों के हमले के मामले सामने आ रहे हैं.

‘‘गुजरात में तेंदुए, तो छत्तीसगढ़ में हाथी का आतंक है. ओडिशा में सियार के हमले की खबरें सामने आई हैं. गंजाम जिले के पोलासारा इलाके के 3 गांवों

में सितंबर महीने के आखिरी दिनों में सियारों के हमले में 20 से ज्यादा लोग घायल हो गए, जिस के बाद इलाके में ‘हाई अलर्ट’ जारी कर दिया गया.’’

‘‘भीखू सही कह रहा है. सरकारी अफसरों ने बताया कि ओडिशा में सियारों के हमले में हटियोटा, जेमादेईपुर और चंद्रमादेईपुर गांवों के कई बुजुर्गों के साथसाथ औरतें भी घायल हुई हैं,’’ रामदीन ने कहा.

‘‘उत्तर प्रदेश के बहराइच इलाके में जंगली भेडि़यों ने तो लोगों की नाक में दम कर रखा था, जिस ने कई बच्चों को अपना शिकार बना लिया था. वहीं, हमीरपुर जनपद में भी जंगली जानवरों का आतंक देखने को मिला था.

‘‘वहां के मौदहा इलाके में लोमड़ी ने एक औरत और बच्ची को हमला कर के घायल कर दिया था, जबकि बिवांर थाना क्षेत्र के पाटनपुर गांव में लकड़बग्घों के झंडू ने पशुबाड़े में हमला कर के 25 भेड़ें मार डाली थीं,’’ एक लड़के राजवीर ने जोश में आ कर कहा.

‘‘बरेली के नगर बहेड़ी इलाके में एक भेडि़ए ने खेत में काम कर रहे 3 लोगों पर अचानक हमला कर दिया. उन में एक औरत और 2 मर्द थे. भेडि़ए ने उन्हें घायल कर दिया. औरत को जिला अस्पताल रैफर कर दिया गया.

‘‘इस से पहले एक भेडि़ए ने मंसूरपुर इलाके में 2 औरतों पर इसी तरह हमला कर दोनों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. मैनपुरी के जरामई गांव में

23 साल के नौजवान पर भेडि़ए ने हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया. बहराइच में 18 साल की लड़की पर भेडि़ए ने हमला कर दिया. लड़की खेत जा रही थी और भेडि़ए के हमले में घायल हो गई.

‘‘हरदोई में एक शाम को सियार ने 2 लोगों पर हमला कर दिया. हालांकि, गांव वालों ने उसे पीटपीट कर मार डाला,’’ सरपंच चेतराम ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए जंगली जानवरों के हमलों की खबरों का हवाला दिया.

‘‘अरे भाई, अब तो बाघ और तेंदुए भी आदमखोर हो रहे हैं. पीलीभीत में बाघ ने एक किसान पर हमला कर दिया. किसान की लाश गन्ने के खेत में मिली. उस की गरदन का हिस्सा गायब था. इस के अलावा मेरठ में चलती बाइक पर तेंदुए ने हमला कर दिया. वह नौजवान खेत के पास से गुजर ही रहा था कि तभी अचानक तेंदुए ने छलांग लगा दी. हालांकि, वह नौजवान बच गया.

‘‘अमरोहा के मंडी के कुआखेड़ा गांव में तेंदुए ने बकरियों को अपना निवाला बना लिया. एक रात को 2 तेंदुए रजबपुर के भी एक गांव में देखे गए.

इस के अलावा लखीमपुर में भी एक जगह पेड़ पर बैठा तेंदुआ देखा गया.’’

‘‘इन जानवरों के बढ़ते हमलों को देखते हुए जंगल महकमे ने इस को ले कर अलर्ट जारी किया है और लोगों को सचेत करते हुए कहा है कि कोई भी खेतों में अकेले किसी भी काम के लिए न निकले. निकले तो ग्रुप के साथ निकले और खेतों में काम करते समय भी लगातार आवाज करते रहे,’’ एक पंच रमेश ने अपनी बात रखी.

इसी बीच किसी ने खबर दी कि बेला को होश आ गया है और पुलिस उस का बयान दर्ज कराने के लिए जल्दी ही अस्पताल जाने वाली है.

यह सुन कर गांव के सारे पंच और कुछ खास लोग बिना देरी किए शहर के सरकारी अस्पताल की तरफ रवाना हो गए.

अस्पताल में बेला के कमरे के बाहर भीड़ जमा थी. लोकल मीडिया वाले भी वहां आए हुए थे. पुलिस बेला के घर वालों की मौजूदगी में उस का बयान दर्ज कराना चाहती थी. सनी का परिवार भी वहां मौजूद था.

बेला सहमी हुई थी और अपने घर वालों को सामने देख कर उस की रुलाई फूट पड़ी थी. कल से आज तक जोकुछ उस की जिंदगी में घटा था, वह बड़ा ही डरावना था.

‘‘बेला, कल शाम को तुम पर किस जानवर ने हमला किया था?’’ पुलिस इंस्पैक्टर राधेश्याम ने पूछा.

‘‘सर, वह कोई जानवर नहीं था, बल्कि ऐसे आदमखोर दरिंदे थे, जो मुझे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे.’’

बेला के मुंह से यह सुन कर हर कोई हैरान रह गया था. लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई थी. यह किसी इनसान का कियाधरा था. तो क्या सनी ने अपने ही गांव की लड़की की आबरू पर हाथ डाला था? पर वह खुद कैसे मारा गया?

‘‘हमें हर बात को सिरे से बताओ कि तुम्हारे साथ कल क्या हुआ था?’’ पुलिस इंस्पैक्टर राधेश्याम ने बेला को पानी का गिलास देते हुए पूछा.

‘‘सर, कल शाम को जब मैं कच्ची सड़क से अपने गांव की तरफ जा रही थी, तो कुछ अनजान सायों ने मुझे दबोच लिया था और वे मुझे जंगल में घसीट कर ले गए थे. शायद, वे 4 लोग थे और शराब के नशे में चूर थे. अंधेरा हो गया था, तो मैं उन के चेहरे ठीक से नहीं देख पाई, पर शायद वे यहीं आसपास के ही थे.

‘‘वे चारों मेरा रेप करना चाहते थे और कामयाब भी हो जाते, पर इसी बीच एक और साया उन पर टूट पड़ा. वह सनी था और मेरा शोर सुन कर जंगल के भीतर चला आया था. पहलवान का बेटा था, तो कैसे अपने गांव की आबरू को यों लूटते देख सकता था.’’

इतना सुनते ही पहलवान बृजभान की आंखों में नमी आ गई. वह इतना ज्यादा भावुक हो गया कि उस के नथुने फूलने लगे. उस की छाती भारी हो गई.

‘‘आगे और क्या हुआ तुम्हारे साथ?’’ पुलिस इंस्पैक्टर राधेश्याम ने पूछा.

‘‘सनी के इस हमले से वे चारों बौखला गए और उन्होंने भी उस पर चौतरफा हमला कर दिया, पर सनी ने बड़ी हिम्मत से उन सब का मुकाबला किया और चारों की खूब धुनाई की. मैं घायल हालत में वहीं पड़ीपड़ी यह सब देखती रही.

‘‘सनी ने 2 लोगों को तो तुरंत वहां से भागने पर मजबूर कर दिया, पर बाकी बचे दोनों लोगों ने उस पर डंडों से वार किए और वह अकेला पड़ गया. बाद में एक डंडा उस के सिर पर पड़ा, तो वह वहीं ढेर हो गया.

‘‘इतने में किसी मोटरसाइकिल की आवाज आई, तो मैं पूरे दम से चिल्लाई. यह सुन कर वे दोनों दरिंदे वहां से भाग गए. इस के बाद मैं भी बेहोश हो गई,’’ इतना कह कर बेला रोने लगी.’’

न कोई जानवर निकला और न ही सनी ने यह कांड किया था, वे तो अनजान आदमखोर थे, जो एक अकेली लड़की को देख कर उस पर टूट पड़े थे. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में यही साबित हुआ कि सनी की मौत इनसानी हमले में घायल होने से हुई थी.

मीडिया ने सनी की इस साहसिक मौत को बड़ी संवेदना से लोगों के सामने पेश किया. पुलिस उन चारों दरिंदों की तलाश में जुट गई. प्रदेश सरकार ने सनी की इस बहादुरी पर ऐलान किया कि रेलवे स्टेशन से रामपुर गांव तक जाने वाली इस कच्ची सड़क को पक्का किया जाएगा, खंभों पर लाइटें लगाई जाएंगी और उस नई सड़क को ‘बहादुर सनी मार्ग’ के नाम से जाना जाएगा.

सबक : कैसा था सरकारी बाबू

सरकारी बाबू अपने नीचे काम करने वाले मुलाजिमों से अपने घरेलू काम कराने में शान समझते हैं. सरकारी बाबू जनता का काम बगैर घूस लिए नहीं करते और औफिस के सामान को अपनी निजी जागीर समझते हैं. झांसी के रेलवे वैगन मरम्मत कारखाने में तो यह बीमारी खतरनाक लैवल तक पहुंच चुकी थी. कारखाने के डायरैक्टर, रामसेवक (आरएस) उर्फ पांडेयजी, कहने को एक कर्मकांडी ब्राह्मण थे और जो गीता और उपनिषदों की बातें करते थे, लेकिन गरीब मुलाजिमों का खून पीने में उन का धर्म भ्रष्ट नहीं होता था. वैगन मरम्मत कारखाने में वैगनों को आगेपीछे करने (शंटिंग) के दौरान हुए हादसे में मनिपाल नाम के एक दलित मुलाजिम की मौत हो गई. जिस तरह किसी जानवर की मौत से गिद्धों को भोज मिलता है, वे जश्न मनाते हैं, उसी तरह कारखाने के बाबुओं की खुशी का ठिकाना नहीं था.

बीमा के पैसे और फंड निकलवाने के बदले उन्होंने मनिपाल की विधवा पत्नी राजश्री से तगड़ी रिश्वत वसूल की.  इस घटना के 2 साल बाद, 18 साल का होते ही, मनिपाल के बेटे मोहित को अपने पिताजी की जगह चपरासी की नौकरी मिल गई. पांडेयजी को मानो इसी दिन का इंतजार था.

किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई और उन्होंने मोहित को औफिस में जौइन कराने के साथ ही उसे अपने बंगले पर हमेशा के लिए बंधुआ मजदूर की तरह अपनी पत्नी और बच्चों की खुशामद में लगा दिया. वैसे, पांडेयजी ‘मनुस्मृति’ में विश्वास करते थे, वे दलित को अपने पैर की जूती समझते थे, लेकिन घरेलू काम कराने की मजबूरी में उन्होंने मोहित का उपनयन संस्कार कर, अपने मतलब भर के लिए उसे अछूत से सामान्य बना लिया. पांडेयजी की बड़ी बेटी श्वेता बहुत ही अक्खड़ थी और मोहित से गुलामों की तरह बरताव करने में उसे जातीय मजा आता था.

मोहित बेचारा हाथ जोड़े श्वेता की सेवा में खड़ा रहता था. जरा भी गड़बड़ हो जाए तो वह उस बेचारे की बहुत डांट लगाती थी. कभीकभार छड़ी से पिटाई कर देती थी. एक बार तो श्वेता ने अपने सभी दोस्तों के सामने मोहित को चांटा जड़ दिया था. पांडेयजी को अपनी परी जैसी बेटी की ऐसी हरकतें बहुत ही नादान और नटखट लगती थीं. उन्हें श्वेता के राजकुमारियों जैसे बरताव पर बहुत गर्व होता था. श्वेता के उकसाने पर पांडेयजी भी मोहित के कान तान देते थे.

मोहित के साथ श्वेता के गैरइनसानी बरताव के चलते किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि श्वेता एक दिन इसी गरीब, निचली जाति के गंवार लड़के से प्यार कर बैठेगी. मोहित भी केवल इसलिए श्वेता की गुस्ताखियों को सह रहा था, क्योंकि उसे श्वेता के निजी काम करने में अलग सा मजा आने लगा था. कोई नहीं समझ सका कि मोहित और श्वेता दोनों ही जवानी की दहलीज पर खड़े हैं, उन्हें एकदूसरे की खुशबू खींच सकती है. मोहित बगैर कहे श्वेता के कपड़ों को साफ करता, उन को प्रैस करता, उस के जूते साफ कर देता और अपने हाथों से पहना देता.

एक दिन मोहित ने किसी बात पर श्वेता को जवाब दे दिया. इस बात पर नाराज हो कर श्वेता ने अपने बड़ेबड़े नाखूनों से मोहित को लहूलुहान कर दिया. पर कहते हैं न कि नफरत बहुत जल्दी प्यार में भी बदल जाती है, लिहाजा मोहित की मालकिन भक्ति और बगैर जवाब दिए, हंसते हुए सब सह जाने के चलते श्वेता का दिल पहले ही मोहित के प्रति नरम पड़ चुका था. जब श्वेता ने मोहित का खून निकलते देखा तो उसे भी रोना आ गया. अपने हाथों से उस ने मोहित के जख्मों पर दवा लगाई. श्वेता अब मोहित को अपने दोस्त की तरह रखने लगी थी.

वह मोहित से सिर्फ 2 साल छोटी थी और कच्ची उम्र का प्यार बहुत ही मजबूत फीलिंग पैदा कर देता है. एक सर्द दोपहर को श्वेता कंबल लपेटे हुए टैलीविजन देख रही थी. श्वेता के लिए मैगी बनाने के बाद मोहित भी उस के पास बैठ कर टैलीविजन देखने लगा. ठंड से ठिठुर रहे मोहित को श्वेता ने कंबल के अंदर बुला लिया. मोहित की पहली छुअन उसे दिल की गहराइयों तक हिला गई. श्वेता ने मोहित से उस के हाथपैरों की मालिश करने को कहा और अपने सारे कपड़े उस के सामने ढीले कर दिए.

श्वेता, जो अपनी मां के सामने कपड़े बदलने में भी हिचकिचाती थी, उसे अपने गुलाम मोहित के आगे कपड़े उतारने में जरा भी शर्म नहीं आई. श्वेता की इस अनकही हां पर मोहित उस के शरीर के नाजुक हिस्सों को सहलाने लगा. इस से श्वेता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. श्वेता को मस्ती में देख कर मोहित ने उस की ब्रा के हुक खोल दिए और उस के उभारों को सहलाता हुआ उन्हें चूमना शुरू कर दिया. अपने स्वभाव के उलट श्वेता ने इस बार मोहित को परे नहीं धकेला और न ही उस की इस हिम्मत के लिए उसे कोई सजा दी. जोश में आए मोहित को अपने पास खींच कर श्वेता ने उस पर चुमनों की बरसात कर दी. उस दिन के बाद से मोहित पांडेयजी के बंगले पर उन का सरकारी दामाद बन कर ठाठ से रहने लगा था और उधर पांडेयजी औफिस में मोहित की नौकरी की चिंता कर रहे थे.

मोहित के खाते में महीने के पहले दिन उस की सैलरी भी आ जाती थी. मोहित ने आज श्वेता बेबी की पसंद का पास्ता बनाया था. बेबी को मोबाइल फोन पर वीडियो गेम खेलने में दिक्कत न हो, इसलिए वह अपने हाथों से उसे खिला रहा था. पास्ता खत्म कर श्वेता ने अपना सिर मोहित की गोद में रख लिया, तो मोहित ने धीरे से श्वेता के उभारों को सहलाना शुरू कर दिया. आईने में अपने उभारों की गोलाइयों को देख कर इतराते हुए श्वेता सोच रही थी कि कालेज में आने के बाद उस की सहेलियां जहां अभी तक एक अदद बौयफ्रैंड नहीं ढूंढ़ पाईं, वहीं उस ने मोहित की बदौलत सैक्स में पीएचडी करना शुरू कर दी थी. श्वेता ने मोहित को ब्यूटीपार्लर का कोर्स सिखा दिया था.

मोहित घर पर ही श्वेता की वैक्सिंग, पैडीक्योर, थ्रैडिंग कर देता था. मौका मिलने पर मोहित बाथटब में श्वेता की पीठ साफ करने की नौकरी भी कर देता था. प्यारमुहब्बत से रहतेरहते बहुत जल्दी वे सारी मर्यादा तोड़ चुके थे. श्वेता को जब एक महीने का पेट ठहर गया, तब उसे गलती का अहसास हुआ. उस ने डरतेडरते मोहित को जब यह बात बताई, तब तक 2 महीने हो गए थे. परिवार वालों को जब तक पता लगा, तीसरा महीना पूरा हो गया था.  अब किसी भी तरह पेट गिराना मुमकिन नहीं था.

पांडेयजी को यकीन नहीं हो रहा था कि उन की इंगलिश स्कूल में पढ़ीलिखी बेटी को निचली जाति के गरीब लड़के से प्यार हो गया था. पांडेयजी को मनुस्मृति का मंत्र याद आ गया : अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च, वंचनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत. यानी अपने अपमान, आर्थिक नुकसान के साथ ही साथ घर के दुश्चरित्र की बाहर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं होता, व्यक्ति का मजाक ही बनता है. इस मंत्र को दोहराते हुए पांडेयजी ने खून का घूंट पी कर मजबूरी के चलते इस बात को छिपा दिया और श्वेता और मोहित की शादी कराने का फैसला किया. मोहित आज उन के बंगले पर कानूनी दामाद बन कर रह रहा है. समाजवादियों ने पांडेयजी को उन के इस क्रांतिकारी फैसले के चलते दलित समाज के आदमी को गले लगाने की वजह से उन्हें सम्मानित किया. मंच से दलितों की बदहाली पर बोलते हुए पांडेयजी की आंखों में आंसू आ गए.

अकेलापन : क्या मोनिका दूर कर पाई नरेश की उदासी

57  साल की उम्र में भले ही नरेश की जिंदगी में अकेलापन था, पर दिल में एक गुमान भी था कि वह शरीफ है. उस ने सोच रखा था कि अकेलापन दूर करने के लिए वह किसी के साथ संबंध नहीं बनाएगा और जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी के साथ पैसे दे कर सैक्स नहीं करेगा, क्योंकि उस का मानना है कि सैक्स सिर्फ 2 जिस्मों का मिलन नहीं है, बल्कि यह तो भावनाओं से जुड़ा होता है.

रात में नरेश का अकेलापन और भी ज्यादा बढ़ जाता था. सोशल मीडिया जैसे ह्वाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम को देखतेदेखते जब मन ऊब जाता, तो उसे मोनिका का गदराया बदन याद आ जाता और मन करता कि आज वह साथ होती.

हालांकि, उन दोनों की दूसरी शादी थी, लेकिन साथ में तकरीबन 8 साल ही बिताए थे. मोनिका नरेश से 10 साल छोटी थी, लेकिन जिस्मानीतौर पर मैच्योर थी, इसलिए बिस्तर पर दोनों की बौंडिंग बहुत अच्छी थी. बिस्तर के अलावा उन दोनों ने अजनबियों की तरह 8 साल गुजार दिए थे.

शाम को जब मन में बेचैनी होती, तो नरेश शराब के 3 पैग पेट में उड़ेल देता. शराब की एकएक घूंट का मजा लेता और ह्विस्की को मुंह में भर कर पूरे मुंह में घुमाता, फिर धीरेधीरे उसे अपने गले तक उतारता.

नरेश का ह्विस्की के साथ ऐसे अठखेलियां करना भी उसे मोनिका के मांसल बदन के साथ की गई मस्ती को याद दिलाता था. उस ने मोनिका के साथ भी बिस्तर पर ह्विस्की के साथ ही अनेक प्रयोग किए थे. कभी मोनिका शराब का घूंट मुंह में ले कर नरेश के ऊपर उड़ेल देती और फिर अपनी जीभ से उस के पूरे बदन पर पड़ी शराब को साफ करती थी, तो कभी वह मोनिका की थुलथुली जांघों पर वाइन की एक घूंट डाल कर अपनी जीभ से शराब और जांघों का मजा लेता था.

हालांकि, नरेश शराब के साथ कुछ खाता नहीं था, जैसे लोग काजू, सलाद, नमकीन चखना के रूप में लेते हैं. कुछ तो सोड़ा या कोलड्रिंक के साथ शराब पीते हैं, पर नरेश सिर्फ पानी के साथ शराब लेता है. लेकिन आज शराब के पैग बनाते हुए न जाने क्यों उसे मोनिका क्यों याद आ रही है.

शादी के बंधन में बंधने के समय नरेश और मोनिका ने यह तय किया था कि वे बच्चे नहीं करेंगे… सिर्फ साथ में रहेंगे और अपने अकेलेपन को दूर करेंगे.

मोनिका को जो कहना होता, वह खुल कर कहती, ‘मु?ो भरपूर सैक्स चाहिए और तुम्हारा साथ भी. हम दोनों कभी अलग नहीं होंगे और जिंदगीभर साथ रहेंगे…’

मोनिका के जिंदगी से चले जाने के बाद नरेश की जिंदगी में 2-3 औरतें आईं भी और चली भी गईं… वह तो हर औरत में मोनिका को ढूंढ़ता रहा. कभीकभार मन करता और दोस्त भी कहा करते थे कि चाहो तो तुम रोज मोनिका जैसी औरत के साथ रात बिता सकते हो, लेकिन वह मोनिका की यादों से कभी बाहर निकल ही नहीं पाया.

अकेले आदमी की सब से बड़ी परेशानी तो यही है कि अकेले खाना बनाना, अकेले खाना. खाने के लिए खुशामद करने वाला कोई नहीं होता है. मन करता है कि काश, सुबह एक कप चाय मिल जाती. लेकिन, सुबह चाय भी खुद ही बनानी पड़ती है.

एक दिन कंप्यूटर पर काम करतेकरते अचानक नरेश की कमर में दर्द शुरू हो गया. अस्पताल जा कर डाक्टर को दिखाया. सीटी स्कैन किया तो पता चला कि किसी नस में दिक्कत है. दर्द से नजात पाने के लिए नरेश के मन में आता कि अगर मोनिका होती, तो उस की मालिश कर देती.

फिजियोथैरेपिस्ट ने ऐक्सरसाइज भी कराई, लेकिन आराम नहीं हो रहा था. ऐसे में नरेश का मन करता कि किसी मसाज सैंटर में जा कर पूरे शरीर की फुल

मसाज करा कर मजा लिया जाए. मसाज आजकल ज्यादा प्रचलित शब्द है, क्योंकि मालिश शब्द अब देहाती हो गया है. सोशल मीडिया पर मसाजपार्लर के इश्तिहार आते रहते हैं.

एक दिन नरेश ने बड़ी हिम्मत कर के एक मसाजपार्लर में फोन कर दिया.

सामने से एक लड़की की आवाज आई, ‘‘हैलो, फिटनैस मसाज सैंटर में आप का स्वागत है. मैं आप की क्या हैल्प कर सकती हूं?’’

फोन पर सारी बातचीत होने के

बाद तय हुआ कि नरेश को अगली दोपहर 12 बजे मसाज सैंटर जाना है.

अगले दिन नरेश ठीक 12 बजे मसाज सैंटर चला गया. वहां उसे एक कम रोशनी वाले कमरे में ले जाया गया. कुछ देर बाद चेहरे पर मास्क पहने एक लड़की कमरे में आई और अपनी अदाएं दिखाते हुए उस से बोली, ‘‘आप घबराइए नहीं, फुल मजा दूंगी. बौडी टू बौडी मसाज करूंगी.’’

नरेश घबराया, क्योंकि मोनिका भी बौडी से बौडी मसाज करती थी. उस लड़की ने मिनी स्कर्ट पहनी थी, जो अब वह उतार चुकी थी और नरेश के जिस्म के साथ हरकत करने लगी थी.

नरेश ने कहा, ‘‘मु?ो सिर्फ मसाज करानी है, यह सब नहीं…’’

पर वह लड़की नहीं रुकी. कुछ देर में अचानक वह लड़की खड़ी हो कर कपड़े पहनने लगी और बोली, ‘‘जल्दी से कपड़े पहनो, क्योंकि पुलिस की रेड पड़ चुकी है.’’

पुलिस आई और सब को थाने में ले गई. थाने में उस लड़की के चेहरे से नकाब हटाने पर मोनिका की नजर नरेश पर गई और रोने लगी.

नरेश ने कहा, ‘‘आखिर बेवफा कौन? तुम या मैं…? मैं तो मसाज कराने आया था. दर्द है मेरी कमर में, लेकिन तुम तो यह सब…’’

मोनिका ने अपनी आपबीती बताई और कहा, ‘‘मैं तुम से ऊब कर ऐसे आदमी के साथ चली गई थी, जिस ने वफा के सपने दिखा कर मु?ो बेवफा बनने पर मजबूर कर दिया.’’

काली कोठी : राजप्रताप सिंह की सुनसान हवेली

राजघराने भी उन गगनचुंबी इमारतों की तरह होते हैं, जिन के बनने में लाखों लोगों की खूनपसीने की कमाई ही नहीं, बल्कि उन की जिंदगी भी लगी होती है.

ये राजघराने न जाने कितने मासूमों का खून पीपी कर राक्षसों जैसे विकराल हुए हैं. इन के इतिहास के पन्नों पर जुल्मोसितम ढहाने की ढेरों कहानियां बिखरी पड़ी हैं.

इन की काली करतूतों को बड़ी होशियारी के साथ परदे के पीछे दफन कर दिया गया है और सामने रंगमंच पर सिर्फ और सिर्फ शोहरत नाच रही होती है.

आदमी कपड़े बदल सकता है, पर तन नहीं बदल सकता. ठीक ऐसे ही व्यवस्थाओं को बदला जा सकता है, लेकिन मन और सोच को नहीं.

जटपुर के राजघराने के साथ भी कुछ ऐसा ही चल रहा था. सदियां गुजर गईं, मगर राजघराने न बदले. आजादी के बाद नई व्यवस्था में राजघरानों के पास उन के महल और हवेलियां तो रह गईं, लेकिन उन की हजारोंहजारों बीघा जमीनों को सरकार ने ले लिया. फिर भी राजघरानों के वारिसों ने अपने परिवार के सदस्यों, नातेरिश्तेदारों के नाम जोत की जमीनें लिखा कर चालबाजी से अपने पास सैकड़ों बीघा जमीनें रख लीं.

जटपुर इलाके के रियासतदार राजा राजप्रताप सिंह के पास आजादी के 75 साल बाद भी राजमहल और हवेलियों के अलावा भी 300 बीघा जोत की जमीन थी. कितने ही आलीशान बंगले और तमाम प्रोपर्टी उन्होंने दिल्ली, देहरादून, शिमला, चंडीगढ़ और नैनीताल में इकट्ठी कर रखी थीं.

राजा राजप्रताप सिंह ने हरिद्वार में भी बड़ी महंगी जमीन पर एक आश्रम खोल रखा था. कितने ही बागबगीचे उन के नाम थे.

आजादी के बाद सरकारी फरमान से भले ही राजशाही का खात्मा सरकारी पन्नों में हो गया हो, लेकिन हकीकत में राजशाही न केवल जिंदा है, बल्कि बड़ी बेशर्मी के साथ वह दिन दूनी रात चौगुनी फलफूल रही है.

कितने ही नवाब और राजेरजवाड़े आज भी मूंछों पर ताव देते घूम रहे हैं. अंगरेजों के पिट्ठू ये ज्यादातर राजेरजवाड़े आज भी ऐसे ही राज कर रहे हैं जैसे पहले कर रहे थे, बल्कि और मजबूती से बेदाग हो कर, विधानसभाओं और संसद में जनता के नुमाइंदे बन कर. सरकारें भी इन से थर्राती थीं, इसलिए उन की भी हिम्मत इन से इन के महल छीनने की नहीं हुई.

राजा राजप्रताप सिंह के पुरखे भी आजादी के बाद से लोकशाही में भी कभी संसद, तो कभी विधानसभाओं में जनता की नुमाइंदगी करते आ रहे थे. उन्होंने जता दिया था कि शहंशाह तो शहंशाह ही रहता है और जनता जनता

ही रहती है. उन के खिलाफ किसी ने सिर उठाने की हिमाकत नहीं की और जिस ने की, उन के सिर कुचल दिए गए. सिर कुचलने की उन की आदत पुरानी थी.

एक बार आजादी के बाद लोकशाही के जोश में कोई जनता का रहनुमा बन कर राजा राजप्रताप सिंह के इलाके से विधायक बन गया था, तब उन के दादा वंशप्रताप ने उस विधायक को अपनी घुड़साल में उलटा लटका कर उस पर खूब हंटरों की बरसात कराई थी. बेचारे उस विधायक ने अगले ही दिन अपनी विधायकी से इस्तीफा दे दिया था.

इस मामले में शासनप्रशासन ऐसे चुप रहा था, जैसे जटपुर राजघराने का गुलाम हो. अखबारों की कलम चिल्लाई, लेकिन कब तक चिल्लाती, उसे भी चुप कर दिया गया.

राजा राजप्रताप सिंह हमेशा सत्ता के साथ रहते थे. कभी विपक्ष में भी रहना पड़ा, तो उन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता था. जनप्रतिनिधि होने के नाते जिले के डीएम और एसपी सब उन के दरबार में हाजिरी लगाते थे. वजह, राजा राजप्रताप सिंह उन्हें कीमती तोहफे देते रहते थे.

अफसर भी राजमहल में अपनी हाजिरी लगाने के लिए ऐसे ही उतावले रहते थे, जैसे नईनवेली दुलहन अपने पिया के पास जाने के लिए बेताब रहती है.

ऐसे राजघरानों को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि देश में राजशाही का खात्मा हो गया है और अब लोकशाही का दौर है. वे राजशाही में तो राजा थे ही, लेकिन लोकशाही में भी उन का वजूद राजा से कम नहीं था.

सभी राजा राजप्रताप सिंह को ‘राजा साहब’ और उन के 23 साल के बेटे सूर्यप्रताप को ‘कुंवरजी’ कह कर पुकारते थे.

राजा राजप्रताप सिंह की सुनसान जंगल में एक हवेली थी, जिसे ‘काली कोठी’ के नाम से जाना जाता था. वहां पर सभी तरह की काली करतूतों को अंजाम दिया जाता था. इस कोठी पर राजा राजप्रताप सिंह के कुछ विश्वासपात्र मुस्टंडे तैनात थे. इन में भी दिलावर और शौकीन खास थे.

काली कोठी की रातें हमेशा रंगीन हुआ करती थीं. विदेशी शराब से ले कर विदेशी हसीनाएं यहां बड़े लोगों को बड़ी शिद्दत के साथ परोसी जाती थीं.

इसी काली कोठी के पास एक बड़ी झाल थी और इस झाल में राजा राजप्रताप सिंह ने खतरनाक मगरमच्छ पाल रखे थे. अगर कोई राजा राजप्रताप सिंह के इलाके में उन के खिलाफ बोलने लगता था या फिर उन के गहरे राज जान जाता था, तो उस आदमी को ठिकाने कैसे लगाना है, इस के लिए राजा राजप्रताप सिंह के कारिंदों को बस इशारा भर चाहिए होता था.

हां, कुछ खतरनाक विरोधियों को झाल के मगरमच्छों के हवाले भी कर दिया जाता था, जिस से उन की लाश भी नहीं मिलती थी. ऐसे केस कम होते थे.

एक तरह से काली कोठी राजा राजप्रताप सिंह का हरम था. वहां वेश्याओं को पाला जाता था. सब को इस की जानकारी थी, लेकिन किसी की क्या मजाल, जो काली कोठी पर उंगली भी उठा दे. लेकिन कभीकभी एक छोटी सी चिनगारी भी बड़े जंगल को खाक कर देती है.

राजो अपनी मां विमला के साथ बचपन से ही इस काली कोठी पर आती रहती थी. वह इस के चप्पेचप्पे से वाकिफ थी. सब जानते थे कि राजो के बाप कलवा ने अपनी नईनवेली दुलहन विमला को काली कोठी पर भेजने से मना कर दिया था.

राजा राजप्रताप सिंह में उस समय जवानी का जोश था, नाफरमानी उन्हें पसंद नहीं थी.

इस नाफरमानी पर कलवा को झाल में मगरमच्छों के सामने फिंकवा दिया था. उस की लाश कभी नहीं मिली. वह पुलिस की फाइलों में आज भी लापता है. लेकिन सब जानते थे कि कलवा के साथ क्या हुआ था.

विमला राजो को हमेशा उस के बाप के बारे में बताती आई थी, ‘‘राजो, तेरा बापू झूले में गिर गया था और ?ाल के मगरमच्छों ने उसे अपना निवाला बना लिया था. उस समय तू मेरे पेट में थी. तब ‘राजा साहब’ ने ही मु?ो सहारा दिया था और काली कोठी की रसोई में मुझे काम पर लगाया था.’’

लेकिन विमला ने राजो से वह सच छिपा लिया था कि कलवा के मरने के बाद उस के साथ काली कोठी पर

क्या हुआ था. काली कोठी के हरम में राजा राजप्रताप सिंह की प्यास बुझाने के साथ उस ने कितनों की प्यास बुझाई थी और अब भी 37 साल की विमला को कभी भी काली कोठी बुला लिया जाता है.

अब राजो भी 17 साल की हो गई थी और ‘राजा साहब’ को बता दिया गया था कि उन के चखने के लिए एक कली तैयार हो रही है.

लेकिन, जैसा बाप वैसा ही बेटा भी. राजा राजप्रताप सिंह का बेटा कुंवर सूर्यप्रताप भरी जवानी में था. वह तो ऐसे मामलों में अपने बाप से भी एक कदम आगे था. उस की उम्र के हिसाब से उसे तकरीबन हर रात शराब और शबाब दोनों चाहिए होता था. वह कुछ नए खयालों का था और अपना ज्यादातर समय वह  अलगअलग शहरों में बने अपने बंगलों में गुजारता था.

कुंवर सूर्यप्रताप गोरी चमड़ी का गुलाम था और विदेशी औरतें उसे ज्यादा लुभाती थीं. रूसी औरतों का तो वह रसिया था और वे उसे आसानी से मिल भी जाती थीं.

राजो खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन जवानी की दहलीज पर हर लड़की हवस के भेडि़यों को हूर की परी ही नजर आती है. उस ने अपनी मां को सजधज कर वक्तबेवक्त काली कोठी जाते देखा था.

मां से पूछने पर उसे हमेशा यही जवाब मिलता था, ‘‘राजो, महल या काली कोठी पर सजधज कर ही जाना पड़ता है, नहीं तो ‘राजा साहब’ नाराज हो जाते हैं.’’

लेकिन अब राजो कोई छोटी बच्ची तो रह नहीं गई थी. वह इन सब बातों को खूब समझती थी और अब वह मां को रात को कहीं भी जाने से रोकती थी.

इस बात से तंग आ कर एक दिन विमला ने राजा राजप्रताप सिंह से हाथ जोड़ कर गुजारिश की, ‘‘राजा साहब, अब मुझे बख्श दो. मेरी बेटी राजो बड़ी हो गई है. अब वह रात को मुझे कहीं भी जाने से रोकती है.’’

यह सुन कर राजा राजप्रताप सिंह चहक उठे. उन्होंने सिगरेट का धुआं विमला के चेहरे पर उड़ाते हुए कहा, ‘‘वाह विमला वाह, तुम ने तो बड़ी अच्छी खुशखबरी सुनाई. तुम्हारे घर में घोड़ी जवान हो रही है और हम बूढ़ी होती घोड़ी की ही सवारी किए जा रहे हैं. आगे से तुम अपनी जगह उसे भेज दिया करना.’’

यह सुन कर विमला के तनबदन में आग लग गई. इस समय उस के हाथ में दरांती होती, तो वह राजा राजप्रताप सिंह के सीने में घोंप देती, लेकिन वह उन के स्वभाव को अच्छे से जानती थी. वह अपने पति को तो बहुत पहले खो चुकी थी, अब उस ने जरा सी भी गलती की तो बेटी को खोने का भी पूरा डर था और वह राजो को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. वह तो जी ही उस के लिए रही थी.

विमला संभल कर बोली, ‘‘अभी मेरी बेटी इतनी भी बड़ी नहीं हुई है कि वह आप को खुश कर सके. जैसे भी होगा, अभी तो मैं ही आप की सेवा में आती रहूंगी,’’ कह कर विमला राजा राजप्रताप सिंह के कमरे से बाहर आ गई.

विमला राजा राजप्रताप सिंह का न तो मुकाबला कर सकती है और न ही कुछ बोल सकती है. उस की रूह यह याद कर के ही कांप गई कि कैसे उस के आदमी कलवा को राजा राजप्रताप सिंह ने मगरमच्छों के सामने झल में फेंक दिया था.

उस दिन से विमला बहुत निराश और परेशान रहने लगी. अपनी मां की यह हालत देख कर राजो ने पूछा, ‘‘मां, क्या बात है? तुम आजकल इतनी परेशान क्यों रहती हो?’’

बेटी के मुंह से ये शब्द सुनते ही विमला फफकफफक कर रो पड़ी, फिर उस ने राजो को सारी बात बता दी.

‘‘इस का मतलब यह है कि मां, यह मेरे पिता का हत्यारा है और तुम सजधज कर उस के पास जाती हो…’’

‘‘बेटी, मैं क्या करती? तू मेरे पेट में थी. मैं तुझे बचाना चाहती थी. लेकिन, जब कोई औरत एक बार इस दलदल में गिर जाती है, तो उस का बाहर आना नामुमकिन सा हो जाता है. समाज उसे स्वीकार नहीं करता. मैं तब भी मजबूर थी और अब भी…’’

‘‘नहीं मां, हम ने अपनी कमजोरी को मजबूरी बना रखा है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.’’

राजो के तेवर देख कर विमला डर गई. वह तो सोचती थी कि पूरी कहानी सुन कर राजो डर जाएगी, लेकिन राजो तो पूरा लाल अंगारा बन गई थी.

‘‘मां देखना कि कैसे मैं राजप्रताप सिंह से अपने पिता की हत्या का बदला लेती हूं. और मां, तुम तो मजबूरी के चलते कुछ न कर सकीं, लेकिन मैं तुम्हारी बेइज्जती का बदला लूंगी. वह होगा राजा अपने घर का, लेकिन मेरी जूती की नोक पर.’’

‘‘शांत हो जा राजो, शांत हो जा. दीवारों के भी कान होते हैं. मुझे तुझे ये सब बातें नहीं बतानी चाहिए थीं.’’

‘‘मां, अगर तुम मुझे ये सब बातें नहीं बतातीं, तो मैं भी एक दिन तुम्हारी तरह काली कोठी पहुंच जाती और सारी जिंदगी के लिए उसी दलदल में फंस जाती. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. देखना, अब मैं क्या करती हूं.’’

राजो की बातें सुन कर विमला के अंदर डर और हिम्मत की भावना एकसाथ जागी. उसे लगा कि अगर इस समय राजा राजप्रताप सिंह उस के सामने होता, तो अपने पति की हत्या का बदला लेने के लिए वह अभी दरांती से उस का गला उड़ा देती. वह सोचने लगी कि उस के अंदर यह हिम्मत अभी तक क्यों नहीं आई थी?

आज की रात मांबेटी के लिए तूफानी रात थी. बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन विमला और राजो के मन में तूफान उमड़घुमड़ रहा था.

कुछ दिन बाद कुंवर सूर्यप्रताप शिमला से जटपुर के महल में अपना जन्मदिन मनाने के लिए आया. शाम को वह काली कोठी पहुंच गया और दिलावर से बोला, ‘‘दिलावर, मेरे जन्मदिन पर क्या गिफ्ट दे रहे हो?’’

‘‘आप आदेश तो कीजिए…’’ कुंवर सूर्यप्रताप की मंशा भांपते हुए दिलावर ने कहा.

‘‘आज हमारा जन्मदिन है तो उपहार भी कुछ स्पैशल ही होना चाहिए,’’ कुंवर सूर्यप्रताप ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘बिलकुल कुंवरजी, आप चिंता न करें,’’ दिलावर ने राजो को अपने ध्यान में लाते हुए कहा.

कुंवर सूर्यप्रताप सिंह इन बातों को खूब समझता था. दिलावर को सब बता दिया गया कि उपहार किस समय पेश करना है.

दिलावर रात के अंधेरे में अपने साथियों के साथ जीप में बैठ कर विमला के घर गया. वह तो यह सोच रहा था कि विमला से बात कर के ही आसानी से सब काम बन जाएगा, लेकिन आज तो विमला का दूसरा ही रूप था.

दिलावर के इरादे जान कर विमला दरांती ले कर उस पर ?ापटी. लेकिन इस से पहले कि वह उस पर वार करती, दिलावर के साथ आए शौकीन ने विमला के सिर पर लाठी का वार कर दिया. इस से विमला नीचे गिर पड़ी.

राजो अपनी मां की मदद के लिए आई, तो दिलावर के आदमियों ने उसे पकड़ लिया. शिकारियों को शिकार मिल चुका था. वे बेसुध विमला को वहीं छोड़ कर राजो को उठा ले गए. रात के अंधेरे में दिलावर ने जीप काली कोठी की ओर दौड़ा दी.

राजो ने होशियारी से काम लिया. वह यह बात जान गई थी कि ताकत दिखाने और विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला. उस ने कहा, ‘‘दिलावर चाचा, हमारा तो पेशा ही यही है. पहले मां करती थीं, अब मुझे करना है. फिर इतनी जोरजबरदस्ती भी क्यों?’’

दिलावर को यकीन ही नहीं था कि राजो इतनी आसानी से मान जाएगी. उस ने कहा, ‘‘हम ने कहां जोरजबरदस्ती की राजो, तुम ने देखा नहीं कि तुम्हारी मां कैसे मेरी तरफ दरांती ले कर दौड़ी थी?’’

‘‘दिलावर चाचा, बुरा मत मानना. तुम्हारी बेटी के साथ अगर ऐसा ही होता तो तुम क्या करते?’’

‘‘मैं तो उसे गोली से उड़ा देता,’’ दिलावर ने राजो की बात सुनते ही गुस्से में कहा.

‘‘तो फिर मेरी मां ने क्या गलत किया चाचा? अपनी बेटी के लिए इतना गुस्सा और दूसरों की बेटियों को कोठे पर ले जाने में जरा भी शर्म नहीं.’’

यह सुन कर दिलावर का चेहरा फक पड़ गया.

इस पर राजो ने कहा, ‘‘छोड़ो चाचा, इन सब बातों को और अब यह बताओ कि मुझे क्या करना है?’’

दिलावर ने राजो को सारी बातें समझ दीं और राजो को मेकअप करने के लिए काली कोठी के मेकअप रूम में भेज दिया. वहां उसे तैयार करने के लिए एक औरत पहले से ही थी. उस ने राजो को दुलहन की तरह सजाया और पहनने के लिए एक झना सा गुलाबी नाइट गाउन दिया.

तब तक कुंवर सूर्यप्रताप नशे में चूर हो चुका था. राजो को देख कर वह उतावला हो गया, लेकिन तभी राजो ने डरने का नाटक करते हुए कांपते हुए कहा, ‘‘कुंवरजी, हमें तो घबराहट हो रही है. हम ने ऐसा काम पहले कभी नहीं किया है.’’

‘‘ओह, इन नई लड़कियों के साथ यही परेशानी होती है. पहले इन्हें तैयार करना पड़ता है, नहीं तो सारा मूड खराब कर देती हैं.’’

इसी बीच राजो ने सोच लिया था कि उसे क्या करना है. उस की नजर कांच की बोतलों पर थी. उस ने मन बना लिया था कि कुंवर के नंगा होते ही वह एक बोतल को तोड़ कर उसे उस के पेट में घुसेड़ देगी और माचिस से आग लगा कर यहां से भाग जाएगी.

लेकिन तभी कुंवर सूर्यप्रताप ने कहा, ‘‘राजो, 10 मिनट मेरे साथ झील के किनारे घूमो, तुम्हारा सारा डर छूमंतर हो जाएगा.’’

‘‘जैसी आप की मरजी, हम आज आप को अपनी जिंदगी की सब से बेशकीमती चीज सौंपने जा रहे हैं. हमारा डर दूर करना आप की जिम्मेदारी है.’’

‘‘ओह, तुम तो बातें भी बहुत बनाती हो. आओ, झील के किनारे घूमने में तुम्हारे साथ खूब मजा आएगा,’’ कुंवर सूर्यप्रताप ने राजो के गले में हाथ डालते हुए कहा.

काली कोठी से नीचे उतरते ही जब वे दोनों किसी प्रेमी जोड़े की तरह आगे बढ़े, तो दिलावर और शौकीन कुंवर सूर्यप्रताप की सुरक्षा के लिए उन के पीछे चले. तभी राजो ने कहा, ‘‘कुंवरजी, ये कबाब में 2-2 हड्डी…’’

राजो का इशारा सम?ाते ही कुंवर सूर्यप्रताप ने दिलावर और शौकीन को वहीं रुकने के लिए कहा. फिर कुंवर सूर्यप्रताप और राजो एकदूसरे के हाथों में हाथ डाले झील के किनारे पहुंच गए.

माहौल पूरा रूमानी था. कुंवर के पैर नशे में लड़खड़ा रहे थे और जबान फिसल रही थी.

‘‘राजो, मन तो मेरा भी यह कर रहा है कि इसी रूमानी माहौल में सबकुछ कर डालें.’’

‘‘कुंवरजी, अभी इतनी जल्दी भी क्या है?’’ राजो ने कहा.

झील के गहरे पानी को देख राजो का मन बदलने लगा. उसे अपने पिता की याद आ गई, जिन्हें कुंवर के पिता राजप्रताप सिंह ने इसी झील में मगरमच्छों के सामने फिंकवा दिया था. राजो के मन में आया कि क्यों न कुंवर सूर्यप्रताप का भी वही अंजाम किया जाए, जो उस के पिता के साथ हुआ था. इस से बेहतरीन बदला तो कोई और हो नहीं सकता.

यही सोच कर राजो कुंवर सूर्यप्रताप को बिलकुल झील के किनारे ले गई और मौका पाते ही पिछवाड़े पर लात मार कर उसे झील में मगरमच्छों के हवाले कर दिया. ‘छपाक’ की आवाज के साथ ही मगरमच्छ कुंवर सूर्यप्रताप पर टूट पड़े.

राजो ने अपने पिता की मौत का बदला ले लिया था. अब उसे अपनी मां की बेइज्जती का बदला लेना था.

राजो चिल्लाते हुए काली कोठी की ओर दौड़ी, ‘‘कुंवरजी झील में गिर गए, कुंवरजी झील में गिर गए…’’

राजो की आवाज सुन कर दिलावर और शौकीन समेत काली कोठी का पहरेदार और दूसरे लोग भी झील की तरफ दौड़े, लेकिन राजो अपने इरादों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए काली कोठी के अंदर गई. उस ने अपना नाइट गाउन उतार फेंका और अपने कपड़े पहने.

राजो काली कोठी के रसोईघर में गई, गैस को औन किया, माचिस की जलती तीली फेंकी. ‘भक’ से आग लगी और राजो वहां से चलती बनी. उस ने उस बदनाम काली कोठी को ही आग के हवाले कर दिया था, जहां आएदिन उस की मां की अस्मत को रौंदा जाता था.

काली कोठी ‘धूंधूं’ कर जलने लगी. झील पर पहुंचे कारिंदे अब काली कोठी की ओर दौड़े, लेकिन सिलैंडर फटने के तेज धमाकों ने उन के कदम पीछे ही रोक दिए.

तब तक विमला भी होश में आ चुकी थी. काली कोठी से उठती आग की लपटें देख वह समझ गई कि उस की बहादुर बेटी ने अपने इरादों को अंजाम तक पहुंचा दिया है.

कुंवर सूर्यप्रताप के खात्मे के साथ ही राजा राजप्रताप सिंह के वंश का आखिरी चिराग बुझ गया.

राजा राजप्रताप सिंह इस सदमे को बरदाश्त न कर सके. पागलपन के एक दौरे में 3 दिन बाद उन्होंने उसी

झील में कूद कर खुदकुशी कर ली. वे अपने ही पाले हुए मगरमच्छों का शिकार बन गए.

राजो 17 साल की नाबालिग थी. उस का मामला जुवैनाइल कोर्ट में चला. उस के खिलाफ कोई सुबूत तो नहीं था, लेकिन रसूखदार की जड़ें उखाड़ने की सजा तो उसे मिलनी ही थी.

शातिर वकीलों की फौज ने जैसेतैसे उसे काली कोठी को आग लगाने के इलजाम में फंसा दिया. उसे 3 साल के लिए बाल सुधारगृह भेज दिया गया, जहां राजो ने सिलाईकढ़ाई, पढ़ाई के साथसाथ कंप्यूटर चलाना भी सीख लिया.

जेल से छूटने के समय तक राजो इस काबिल बन गई थी कि वह अपना और अपनी मां का पेट आसानी से पाल सकती थी.

इंग्लिश रोज: क्या सच्चा था विधि के लिए जौन का प्यार

Story in hinवह आज भी वहीं खड़ी है. जैसे वक्त थम गया है. 10 वर्ष कैसे बीत जाते हैं…? वही गांव, वही शहर, वही लोग…यहां तक कि फूल और पत्तियां तक नहीं बदले. ट्यूलिप्स, सफेद डेजी, जरेनियम, लाल और पीले गुलाब सभी उस की तरफ ठीक वैसे ही देखते हैं जैसे उस की निगाह को पहचानते हों. चौश्चर काउंटी के एक छोटे से गांव नैनटविच तक सिमट कर रह गई उस की जिंदगी. अपनी आरामकुरसी पर बैठ वह उन फूलों का पूरा जीवन अपनी आंखों से जी लेती है. वसंत से पतझड़ तक पूरी यात्रा. हर ऋतु के साथ उस के चेहरे के भाव भी बदल जाते हैं, कभी उदासी, कभी मुसकराहट. उदासी अपने प्यार को खोने की, मुसकराहट उस के साथ समय व्यतीत करने की. उसे पूरी तरह से यकीन हो गया था कि सभी के जीवन का लेखाजोखा प्रकृति के हाथ में ही है. समय के साथसाथ वह सब के जीवन की गुत्थियां सुलझाती जाती है. वह संतुष्ट थी. बेशक, प्रकृति ने उसे, क्वान्टिटी औफ लाइफ न दी हो किंतु क्वालिटी औफ लाइफ तो दी ही थी, जिस के हर लमहे का आनंद वह जीवनभर उठा सकेगी.

यह भी तो संयोग की ही बात थी, तलाक के बाद जब वह बुरे वक्त से निकल रही थी, उस की बड़ी बहन ने उसे छुट्टियों में लंदन बुला लिया था. उस की दुखदाई यादों से दूर नए वातावरण में, जहां उस का मन दूसरी ओर चला जाए. 2 महीने बाद लंदन से वापसी के वक्त हवाईजहाज में उस के साथ वाली कुरसी पर बैठे जौन से उस की मुलाकात हुई. बातोंबातों में जौन ने बताया कि रिटायरमैंट के बाद वे भारत घूमने जा रहे हैं. वहां उन का बचपन गुजरा था. उन के पिता ब्रिटिश आर्मी में थे. 10 वर्ष पहले उन की पत्नी का देहांत हो गया. तीनों बच्चे शादीशुदा हैं. अब उन के पास समय ही समय है. भारत से उन का आत्मीय संबंध है. मरने से पहले वे अपना जन्मस्थान देखना चाहते हैं, यह उन की हार्दिक इच्छा है. उन्होंने फिर उस से पूछा, ‘‘और तुम?’’

‘‘मैं भारत में ही रहती हूं. छुट्टियों में लंदन आई थी.’’

‘‘मैं भारत घूमना चाहता हूं. अगर किसी गाइड का प्रबंध हो जाए तो मैं आप का आभारी रहूंगा,’’ जौन ने निवेदन करते कहा.

‘‘भाइयों से पूछ कर फोन कर दूंगी,’’ विधि ने आश्वासन दिया. बातोंबातों में 8 घंटे का सफर न जाने कैसे बीत गया. एकदूसरे से विदा लेते समय दोनों ने टैलीफोन नंबर का आदानप्रदान किया. दूसरे दिन अचानक जौन सीधे विधि के घर पहुंच गए. 6 फुट लंबी देह, कायदे से पहनी गई विदेशी वेशभूषा, काला ब्लेजर और दर्पण से चमकते जूते पहने अंगरेज को देख कर सभी चकित रह गए. विधि ने भाइयों से उस का परिचय करवाते कहा, ‘‘भैया, ये जौन हैं, जिन्हें भारत में घूमने के लिए गाइड चाहिए.’’

‘‘गाइड? गाइड तो कोई है नहीं ध्यान में.’’

‘‘विधि, तुम क्यों नहीं चल पड़ती?’’ जौन ने सुझाव दिया. प्रश्न बहुत कठिन था. विधि सोच में पड़ गई. इतने में विधि का छोटा भाई सन्नी बोला, ‘‘हांहां, दीदी, हर्ज की क्या बात है.’’

‘‘थैंक्यू सन्नी, वंडरफुल आइडिया. विधि से अधिक बुद्धिमान गाइड कहां मिल सकता है,’’ जौन ने कहा. 2 सप्ताह तक दक्षिण भारत के सभी पर्यटन स्थलों को देखने के बाद दोनों दिल्ली पहुंचे. उस के एक सप्ताह बाद जौन की वापसी थी. जाने से पहले तकरीबन रोज मुलाकात हो जाती. किसी कारणवश जौन की विधि से बात न हो पाती तो वह अधीर हो उठता. उस की बहुमुखी प्रतिभा पर जौन मरमिटा था. वह गुणवान, स्वाभिमानी, साहसी और खरा सोना थी. विधि भी जौन के रंगीले, सजीले, जिंदादिल व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई. उस की उम्र के बारे में सोच कर रह जाती. जौन 60 वर्ष पार कर चुका था. विधि ने अभी 35 वर्ष ही पूरे किए थे. लंदन लौटने से 2 दिन पहले, शाम को टहलतेटहलते भरे बाजार में घुटनों के बल बैठ कर जौन ने अपने मन की बात विधि से कह डाली, ‘‘विधि, जब से तुम से मिला हूं, मेरा चैन खो गया है. न जाने तुम में ऐसा कौन सा आकर्षण है कि मैं इस उम्र में भी बरबस तुम्हारी ओर खिंचा आया हूं.’’ इस के बाद जौन ने विधि की ओर अंगूठी बढ़ाते हुए प्रस्ताव रखा, ‘‘विधि, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

विधि निशब्द और स्तब्ध सी रह गई. यह तो उस ने कभी नहीं सोचा था. कहते हैं न, जो कभी खयालों में हमें छू कर भी नहीं गुजरता, वो, पल में सामने आ खड़ा होता है. कुछ पल ठहर कर विधि ने एक ही सांस में कह डाला, ‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता. हम एकदूसरे के बारे में जानते ही कितना हैं, और तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो?’’ ‘‘हांहां, भली प्रकार से जानता हूं, क्या कह रहा हूं. तुम बताओ, बात क्या है? मैं तुम्हारे संग जीवन बिताना चाहता हूं.’’ विधि चुप रही.

जौन ने परिस्थिति को भांपते कहा, ‘‘यू टेक योर टाइम, कोई जल्दी नहीं है.’’ 2 दिनों बाद जौन तो चला गया किंतु उस के इस दुर्लभ प्रश्न से विधि दुविधा में थी. मन में उठते तरहतरह के सवालों से जूझती रही, ‘कब तक रहेगी भाईभाभियों की छत्रछाया में? तलाकशुदा की तख्ती के साथ क्या समाज तुझे चैन से जीने देगा? कौन होगा तेरे दुखसुख का साथी? क्या होगा तेरा अस्तित्व? क्या उत्तर देगी जब लोग पूछेंगे इतने बूढ़े से शादी की है? कोई और नहीं मिला क्या?’ इन्हीं उलझनों में समय निकलता गया. समय थोड़े ही ठहर पाया है किसी के लिए. दोनों की कभीकभी फोन पर बात हो जाती थी एक दोस्त की तरह. कालेज में भी खोईखोई रहती. एक दिन उस की सहेली रेणु ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘विधि, जौन के जाने के बाद तू तो गुमसुम ही हो गई. बात क्या है?’’

‘‘जाने से पहले जौन ने मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था.’’

‘‘पगली…बात तो गंभीर है पर गौर करने वाली है. भारतीय पुरुषों की मनोवृत्ति तो तू जान ही चुकी है. अगर यहां कोई मिला तो उम्रभर उस के एहसानों के नीचे दबी रहेगी. उस के बच्चे भी तुझे स्वीकार नहीं करेंगे.

जौन की आंखों में मैं ने तेरे लिए प्यार देखा है. तुझे चाहता है. उस ने खुद अपना हाथ आगे बढ़ाया है. अपना ले उसे. हटा दे जीवन से यह तलाक की तख्ती. तू कर सकती है. हम सब जानते हैं कि बड़ी हिम्मत से तू ने समाज की छींटाकशी की परवा न करते हुए अपने पंथ से जरा भी विचलित नहीं हुई. समाज में अपना एक स्थान बनाया है. अब नए रिश्ते को जोड़ने से क्यों हिचकिचा रही है. आगे बढ़. खुशियों ने तुझे आमंत्रण दिया है. ठुकरा मत, औरत को भी हक है अपनी जिंदगी बदलने का. बदल दे अपनी जिंदगी की दिशा और दशा,’’ रेणु ने समझाते हुए कहा. ‘‘क्या करूं, अपनी दुविधाओं के क्रौसरोड पर खड़ी हूं. वैसे भी, मैं ने तो ‘न’ कर दी है,’’ विधि ने कहा. ‘‘न कर दी है, तो हां भी की जा सकती है. तेरा भी कुछ समझ में नहीं आता. एक तरफ कहती है, जौन बड़ा अलग सा है. मेरी बेमानी जरूरतों का भी खयाल रखता है. बड़ी ललक से बात करता है. छोटीछोटी शरारतों से दिल को उमंगों से भर देता है. मुझे चहकती देख कर खुशी से बेहाल हो जाता है. मेरे रंगों को पहचानने लगा है. तो फिर झिझक क्यों रही है?’’

‘‘उम्र देखी है? 60 वर्ष पार कर चुका है. सोच कर डर लगता है, क्या वह वैवाहिक सुख दे पाएगा मुझे?’’ ‘‘आजमा कर देख लेती? मजाक कर रही हूं. यह समय पर छोड़ दे. यह सोच कि तेरी आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. तेरा अपना घर होगा जहां तू राज करेगी. ठंडे दिमाग से सोचना…’’ ‘‘डर लगता है कहीं विदेशी चेहरों की भीड़ में खो तो नहीं जाऊंगी. धर्म, सोच, संस्कृति, सभ्यता, कुछ भी तो नहीं है एकजैसा हमारा. फिर इतनी दूर…’’ ‘‘प्रेम उम्र, धर्म, भाषा, रंग और जाति सभी दीवारों को गिराने की शक्ति रखता है. मेरी प्यारी सखी, प्यार में दूरियां भी नजदीकियां हो जाती हैं. अभी ईमेल कर उसे, वरना मैं कर देती हूं.’’

‘‘नहींनहीं, मैं खुद ही कर लूंगी,’’ विधि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘डियर जौन,di

मैं ने आप के प्रस्ताव पर विचार किया. कोई भी नया रिश्ता जोड़ने से पहले एकदूसरे के बीते जीवन के बारे में जानना बहुत जरूरी है. ऐसी मेरी सोच है. 10 वर्ष पहले मेरा विवाह एक बहुत रईस घर में संपन्न हुआ. मेरी ससुराल का मेरे रहनसहन, सोचविचार और संस्कारों से कोई मेल नहीं था. वहां के तौरतरीकों के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. वहां मुझे लगा कि मैं चूहेदानी में फंस गई हूं. मेरे पति शराब और ऐयाशी में डूबे रहते थे. शराब पी कर वे बेलगाम घुड़साल के घोड़े की तरह हो जाते थे, जिस का मकसद सवार को चोट पहुंचाना था. ऐसा हर रोज का सिलसिला था. हर रात अलगअलग औरतों से रंगरेलियां मनाते थे.

धीरेधीरे बात यहां तक पहुंच गई कि वे ग्रुपसैक्स की क्रियाओं में भाग लेने लगे. जबरदस्ती मुझ से भी औरों के साथ हमबिस्तर होने की अपेक्षा करने लगे. उन के अनुकूल उन की बात मानते जाओ तो ठीक था वरना कहते, ‘हम मर्द अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे औरतों को अपने हिसाब से रखा जाए.’ ‘‘एक साधारण सी लड़की के लिए कितना कठिन था यह. एक दिन जब मैं ने किसी और के साथ हमबिस्तर होने से इनकार किया तो मुझे घसीट कर सामने बिठा कर सबकुछ देखने को मजबूर कर दिया. उस दिन मैं ने बरदाश्त की सभी सीमाएं लांघ कर उन के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया और सामान उठा कर भाई के घर चली आई. पैसे और मनगढ़ंत कहानियों के बल पर मेरा बेटा उन्होंने अपने पास रख लिया. उस दिन के बाद आज तक मैं अपने बेटे को देख नहीं पाई. अब सबकुछ जानते हुए भी आप तैयार हैं तो आप मेरे बड़े भाईसाहब अजय से बात करें.’’

‘‘आप की विधि’’

विधि का ईमेल पढ़ कर जौन नाचने लगा. तुरंत ही उस ने उत्तर दिया,

‘‘मेरी प्यारी विधि,

बस, इतनी सी बात से परेशान हो. जीवन में हादसे सभी के साथ होते हैं. मैं ने तो तुम से पूछा तक नहीं. तुम ने बता दिया तो मेरे मन में तुम्हारे लिए इज्जत और बढ़ गई. मेरी जान, मैं ने तुम्हें चाहा है. मैं स्त्री और पुरुष की समानता में विश्वास रखता हूं. तुम मेरी जीवनसाथी ही नहीं, पगसाथी भी होगी. जिन खुशियों से तुम वंचित रही हो, मैं उन की भरपाई की पूरी कोशिश करूंगा. मैं अगली फ्लाइट से दिल्ली पहुंच रहा हूं.

‘‘प्यार सहित

‘‘तुम्हारा जौन.’’

वह दिल्ली आ पहुंचा. होटल में विधि के बड़े भाईसाहब को बुला कर ईमेल दिखाते हुए उन से विधि का हाथ मांगा. भाईसाहब ने कहा, ‘‘शाम को तुम घर आ जाना.’’ पूरा परिवार बैठक में उस की प्रतीक्षा कर रहा था. जौन का प्रस्ताव सामने रखा गया. सभी हैरान थे. सन्नी तैश में आ कर बोला, ‘‘इतने बूढ़े से…? दिमाग खराब हो गया है क्या. जाहिर है विधि की उम्र के उस के बच्चे होंगे. अंगरेजों का कोई भरोसा नहीं.’’ बाकी बहनभाई भी सन्नी की बात से सहमत थे.

‘‘तुम ने क्या सोचा?’’ बड़े भाई अजय ने विधि से पूछा.

‘‘मुझे कोई एतराज नहीं,’’ उस ने कहा.

‘‘दीदी, होश में तो हो, क्या सचमुच सठियाए से शादी…?’’ विधि के हां करते ही अजय ने जौन को बुला कर कहा, ‘‘शादी तय करने से पहले हमारी कुछ शर्तें हैं. शादी हिंदू रीतिरिवाजों से होगी. उस के लिए तुम्हें हिंदू बनना होगा. हिंदू नाम रखना होगा. विवाह के बाद विधि को लंदन ले जाना होगा.’’ जौन को सब शर्तें मंजूर थीं. वह उत्तेजना से ‘आई विल, आई विल’ कहता नाचने लगा. पुरुष चहेती स्त्री को पाने का हर संभव प्रयास करता है. उस में साम, दाम, दंड, भेद सभी भाव जायज हैं. अच्छा सा मुहूर्त देख कर उन का विवाह संपन्न हआ. जौन लंदन से इमीग्रेशन के लिए जरूरी कागजात ले कर आया था. विधि का पासपोर्ट तैयार ही हो रहा था कि अचानक जौन के बेटे मार्क का ऐक्सिडैंट होने के कारण, जौन को विधि के बिना ही लंदन जाना पड़ा. जौन तो चला गया. विधि का मन बेईमान होने लगा. उसे घबराहट होने लगी. मन में अनेक प्रश्न उठने लगे. किसी से शिकायत भी तो नहीं कर सकती थी. 6 महीने से ऊपर हो गए. उधर जौन बहुत बेचैन था, चिंतित था. वह बारबार रेणु को ईमेल कर के पूछता. एक दिन हार कर रेणु विधि के घर आ ही पहुंची और उसे बहुत डांटा, ‘‘विधि, क्या मजाक बना रखा है, क्यों उस बेचारे को परेशान कर रही हो? तुम्हें पता भी है कितनी मेल डाल चुका है. कहतेकहते थक गया है कि आप विधि को समझाएं और कहें ‘डर की कोई बात नहीं है. मैं उसे पलकों पर बिठा कर रखूंगा.’ ‘‘अब गुमसुम क्यों बैठी हो. कुछ तो बोलो. यह तुम्हारा ही फैसला था. अब तुम्हीं बताओ, क्या जवाब दूं उसे?’’

‘‘मैं बहुत उलझन में हूं. परेशान हूं. खानापीना, उठनाबैठना बिलकुल अलग होगा. फिर उस के बच्चे…? क्या वे स्वीकार करेंगे मुझे…?’’

‘‘विधि, तुम बेकार में भावनाओं के द्वंद्व में डूबतीउतरती रहती हो. यह तो तुम्हें वहीं जा कर पता लगेगा. हम सब जानते हैं, तुम हर स्थिति को आसानी से हैंडल कर सकती हो. ऐसा भी होता है  कभीकभी सबकुछ सही होते हुए भी, लगता है कुछ गलत है. तू बिना कोशिश किए पीछे नहीं मुड़ सकती. चिंता मत कर. अभी जौन को मेल करती हूं कि तुझे आ कर ले जाए.’’ जौन को मेल करते ही एक हफ्ते में वह दिल्ली आ पहुंचा. 2 हफ्ते में विधि को लंदन भी ले गया. लंदन में घर पहुंचते ही जौन ने अंगरेजी रिवाजों के अनुसार विधि को गोद में उठा कर घर की दहलीज पार की. अंदर पहुंचते ही वह हतप्रभ रह गई. अकेले होते हुए भी जौन ने घर बहुत तरतीब और सलीके से रखा था. सुरुचिपूर्ण सजाया था. घर में सभी सुविधाएं थीं, जैसे कपड़े धोने की मशीन, ड्रायर, स्टोव, डिशवाशर और औवन…काटेज के पीछे एक छोटा सा गार्डन था जो जौन का प्राइड ऐंड जौय था. पहली ही रात को जौन ने विधि को एक अनमोल उपहार देते हुए कहा, ‘‘विधि, मैं तुम्हें क्रूर संसार की कोलाहल से दूर, दुनिया के कटाक्षों से हटा कर अपने हृदय में रखने के लिए लाया हूं. तुम से मिलने के बाद तुम्हारी मुसकान और चिरपरिचित अदा ही तो मुझे चुंबक की तरह बारबार खींचती रही है और मरते दम तक खींचती रहेगी. मैं तुम्हें इतना प्यार दूंगा कि तुम अपने अतीत को भूल जाओगी. मैं तुम्हारा तुम्हारे घर में स्वागत करता हूं.’’ इतना कह कर जौन ने उसे सीने से लगा लिया और यह सब सुन कर विधि की आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे.

ऐसे प्रेम का एहसास उसे पहली बार हुआ था. धीरेधीरे वह जान पाई कि जौन केवल गोराचिट्टा, ऊंचे कद का ही नहीं, वह रोमांटिक, सलोना, जिंदादिल, शरारती और मस्त इंसान है जो बातबात में किसी को भी अपना बनाने का हुनर जानता है. उस का हृदय जीवन की आकांक्षाओं से धड़क उठा. जौन ने उसे इतना प्यार दिया कि जल्दी ही उस की सब शंकाएं दूर हो गईं. विधि उसे मन से चाहने लगी थी. दोनों बेहद खुश थे. वीकेंड में जौन के तीनों बच्चों ने खुली बांहों से विधि का स्वागत किया और अपने पिता के विवाह पर एक भव्य पार्टी दी. विधि अपने फैसले पर प्रसन्न थी. अब उस का अपना घर था. अलग परिवार था. असीम प्यार देने वाला पति. जौन ने घर की बागडोर उसी के हाथ में थमा दी थी. उसे प्यार करना सिखाया, उस का आत्मविश्वास जगाया यहां तक कि उसे पोस्टग्रेजुएशन भी करवा दिया. क्योंकि भीतर से वह जानता था कि उस के जाने के बाद विधि अपने समय का सदुपयोग कर सकेगी.

गरमी का मौसम था. चारों ओर सतरंगी फूल लहलहा रहे थे. दोपहर के खाने के बाद दोनों कुरसियां डाल कर गार्डन में धूप सेंकने लगे. बाहर बच्चे खेल रहे थे. बच्चों को देखते विधि की ममता उमड़ने लगी. जौन की पैनी नजरों से यह बात छिपी नहीं. जौन ने पूछ ही लिया, ‘‘विधि, हमारा बच्चा चाहिए…? हो सकता है. मैं ने पता कर लिया है. पूरे 9 महीने डाक्टर की निगरानी में रह कर. मैं तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, हमारे हैं तो सही, वो 3, और उन के बच्चे. मैं ने तो जीवन के सभी अनुभवों को भोगा है. मां बन कर भी, अब नानीदादी का सुख भोग रही हूं,’’ विधि ने हंसतेहंसते कहा. ‘‘मैं तो समझा था कि तुम्हें मेरी निशानी चाहिए?’’ जौन ने विधि को छेड़ते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगर बच्चा नहीं तो एक सुझाव देता हूं. बच्चों से कहेंगे मेरे नाम का एक (लाल गुलाब) इंग्लिश रोज और तुम्हारे नाम का (पीला गुलाब) इंडियन समर हमारे गार्डन में साथसाथ लगा दें. फिर हम दोनों सदा एकदूसरे को प्यार से देखते रहेंगे.’’ इतना कह कर जौन ने प्यार से उस के गाल पर चुंबन दे दिया.

विधि भी होंठों पर मुसकान, आंखों में मोती जैसे खुशी के आंसू, और प्यार की पूरी कशिश लिए जौन के आगोश में आ गई. जौन विधि की छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखता. धीरेधीरे विधि के पूरे जीवन को उस ने अपने प्यार के आंचल से ढक लिया. सामाजिक बैठकों में उसे अदब और शिष्टाचार से संबोधित करता. उसे जीजी करते उस की जबान न थकती. कुछ ही वर्षों में जौन ने उसे आधी दुनिया की सैर करा दी थी. अब विधि के जीवन में सुख ही सुख थे. हंसीखुशी 10 साल बीत गए. इधर, कई महीनों से जौन सुस्त था. विधि को भीतर ही भीतर चिंता होने लगी, सोचने लगी, ‘कहां गई इस की चंचलता, चपलता, यह कभी टिक कर न बैठने वाला, यहांवहां चुपचाप क्यों बैठा रहता है? डाक्टर के पास जाने को कहो तो टालते हुए कहता है, ‘‘मेरा शरीर है, मैं जानता हूं क्या करना है.’’ भीतर से वह खुद भी चिंतित था. एक दिन बिना बताए ही वह डाक्टर के पास गया. कई टैस्ट हुए. डाक्टर ने जो बताया, उसे उस का मन मानने को तैयार नहीं था. वह जीना चाहता था. उस ने डाक्टर से कहा, ‘‘वह नहीं चाहता कि उस की यह बीमारी उस के और उस की पत्नी की खुशी में आड़े आए. समय कम है, मैं अब अपनी पत्नी के लिए वह सबकुछ करना चाहता हूं, जो अभी तक नहीं कर पाया. मैं नहीं चाहता मेरे परिवार को मेरी बीमारी का पता चले. समय आने पर मैं खुद ही उन्हें बता दूंगा.’’

अचानक एक दिन जौन वर्ल्ड क्रूज के टिकट विधि के हाथ में थमाते बोला, ‘‘यह लो तुम्हारा शादी की 10वीं वर्षगांठ का तोहफा.’’ उस की जीहुजूरी ही खत्म नहीं होती थी. विधि का जीवन उस ने उत्सव सा बना दिया था. वर्ल्ड क्रूज से लौटने के बाद दोनों ने शादी की 10वीं वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई. घर की रजिस्ट्री के कागज और एफडीज उस ने विधि के नाम करवा कर उसे तोहफे में दे दिए. उस रात वह बहुत बेचैन था. उसे बारबार उलटी हो रही थी और चक्कर आते रहे. जल्दी से उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे भरती कर लिया गया. जौन की दशा दिनबदिन बिगड़ती गई. डाक्टर ने बताया, ‘‘उस का कैंसर फैल चुका है. कुछ ही समय की बात है.’’

‘‘कैंसर…?’’ कैंसर शब्द सुन कर सभी निशब्द थे. ‘‘तुम्हारे डैड, जाने से पहले, तुम्हारी मां को उम्रभर की खुशियां देना चाहते थे. तुम्हें बताने के लिए मना किया था,’’ डाक्टर ने बताया. बच्चे तो घर चले गए. विधि नाराज सी बैठी रही. जौन ने उस का हाथ पकड़ कर बड़े प्यार से समझाया, ‘‘जो समय मेरे पास रह गया था, मैं उसे बरबाद नहीं करना चाहता था, भोगना चाहता था तुम्हारे साथ. तुम्हारे आने से पहले मैं जीवन बिता रहा था. तुम ने जीना सिखा दिया है. अब मैं जिंदगी से रिश्ता चैन से तोड़ सकता हूं. जाना तो एक दिन सभी को है.’’ एक वर्ष तक इलाज चलता रहा. कैंसर इतना फैल चुका था कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता था. अपनी शादी की 11वीं वर्षगांठ से पहले ही जौन चल बसा. अंतिम संस्कार के बाद उस के बेटे ने जौन की इच्छानुसार उस की राख को गार्डन में बिखरा दिया. एक इंग्लिश रोज और एक इंडियन समर (पीला गुलाब) साथसाथ लगा दिए. उन्हें देखते ही विधि को जौन की बात याद आई, ‘कम से कम तुम्हें हर वक्त देखता तो रहूंगा?’ इस सदमे को सहना कठिन था. विधि को लगा मानो किसी ने उस के शरीर के 2 टुकड़े कर दिए हों. एक बार वह फिर अकेली हो गई. एक दिन उस के अंतकरण से आवाज आई, ‘उठ विधि, संभाल खुद को, तेरे पास जौन का प्यार है, स्मृतियां हैं. वह तुझे थोड़े समय में जहानभर की खुशियां दे गया है.’ धीरेधीरे वह संभलने लगी. जौन के बच्चों के सहयोग और प्यार ने उसे फिर खड़ा कर दिया. कालेज में उसे नौकरी भी मिल गई. बाकी समय में वह गार्डन की देखभाल करती. इंग्लिश रोज और इंडियन समर की कटाईछंटाई करने की उस की हिम्मत न पड़ती. उस के लिए माली को बुला लेती. गार्डन जौन की निशानी था. एक दिन भी ऐसा न जाता, विधि अपने गार्डन को न निहारती, पौधों को न सहलाती. अकसर उन से बातें करती. बर्फ पड़े, कोहरा पड़े या फिर कड़कती सर्दी, वह अपने फ्रंट डोर से जौन के लगाए पौधों को निहारती रहती. उदासी में इंग्लिश रोज से शिकवेशिकायतें भी करती, ‘खुद तो अपने लगाए परिवार में लहलहा रहे हो और मैं? नहीं, नहीं, मैं शिकायत नहीं कर रही. मुझे याद है आप ने ही कहा था, ‘यह मेरा परिवार है डार्लिंग. मुझे इन से अलग मत करना.’

उस दिन सोचतेसोचते अंधेरा सा होने लगा. उस ने घड़ी देखी, अभी शाम के 4 ही बजे थे. मरियल सी धूप भी चोरीचोरी दीवारों से खिसकती जा रही थी. वह जानती थी यह गरमी के जाने और पतझड़ के आने का संदेशा था. वह आंखें मूंद कर घास पर बिछे रंगबिरंगों पत्तों की कुरमुराहट का आनंद ले रही थी. अचानक तेज हवा के झरोखे से एक सूखा पत्ता उलटतापलटता उस के आंचल में आ अटका. पलभर को उसे लगा, कोई उसे छू कर कह रहा हो… ‘डार्लिंग, उदास क्यों होती हो, मैं यही हूं तुम्हारे चारों ओर, देखो वहीं हूं, जहां फूल खिलते हैं…क्यों खिलते हैं? यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जरूर जानता हूं, फूल खिलता है, झड़ जाता है. क्यों? यह कोई नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं इंग्लिश रोज जिस के लिए खिलता है उसी के लिए मर जाता है. खिले फूल की सार्थकता और मरे फूल की व्यथा एक को ही अर्पित है.’

उस दिन वह झड़ते फूलों को तब तक निहारती रही जब तक अंधेरे के कारण उसे दिखाई देना न बंद हो गया. हवा के झोंके से उसे लगा, मानो जौन पल्लू पकड़ कर कह रहा हो, ‘आई लव यू माई इंडियन समर.’ ‘‘मी टू, माई इंग्लिश रोज. तुम और तुम्हारा शरारतीपन अभी तक गया नहीं.’’ उस ने मुसकरा कर कहा.

भटका हुआ आदमी : अजंता देवी की मनकही

आटा सने हाथों से ही अजंता देवी ने दरवाजा खोला. तब तक डाकिया एक नीला लिफाफा दरवाजे की दरार से गिरा चुका था. लिफाफे पर किए गए टेढ़ेमेढ़े हस्ताक्षर को एक क्षण वह अपनी उदास निगाहों से घूरती रही. पहचान की एक क्षीण रेखा उभरी, पर कोई आधार न मिलने के कारण उस लिखावट में ही उलझ कर रह गई. लिफाफे को वहीं पास रखी मेज पर छोड़ कर वह चपातियां बनाने रसोईघर में चली गई.

अब 1-2 घंटे में राहुल और रत्ना दोनों आते ही होंगे. कालिज से आते ही दोनों को भूख लगी होगी और ‘मांमां’ कर के वे उस का आंचल पकड़ कर घूमते ही रह जाएंगे. मातृत्व की एक सुखद तृप्ति से उस का मन सराबोर हो गया. चपाती डब्बे में बंद कर, वह जल्दीजल्दी हाथ धो कर चिट्ठी पढ़ने के लिए आ खड़ी हुई.

पत्र उस के ही नाम का था, जिस के कारण वह और भी परेशान हो उठी. उसे पत्र कौन लिखता? भूलेभटके रिश्तेदार कभी हालचाल पूछ लेते. नहीं तो राहुल के बड़े हो जाने के बाद रोजाना की समस्याओं से संबंधित पत्र उसी के नाम से आते हैं, लेदे कर पुरुष के नाम पर वही तो एक है.

मर्द का साया तो वर्षों पहले उस के सिर पर से हट गया था. खैर, ये सब बातें सोच कर भी क्या होगा? फिर से उस ने लिफाफे को उठा लिया और डरतेडरते उस का किनारा फाड़ा. पत्र के खुलते ही काले अक्षरों में लिखे गए शब्द रेतीली मिट्टी की तरह उस की आंखों के आगे बिखर गए. इतने वर्षों के बाद यह आमंत्रण. ‘‘मेरे पास कोई भी नहीं है, तुम आ जाओ.’’ और भी कितनी सारी बातें. अचानक रुलाई को रोकने के लिए उस ने मुंह में कपड़ा ठूंस लिया, पर आंसू थे कि बरसों रुके बांध को तोड़ कर उन्मुक्त प्रवाहित होते जा रहे थे. उस खारे जल की कुछ बूंदें उस के मुख पर पड़ रही थीं, जिस के मध्य वह बिखरी हुई यादों के मनके पिरो रही थी. उसे लग रहा था कि वह नदी में सूख कर उभर आए किसी रेतीले टीले पर खड़ी है. किसी भी क्षण नदी का बहाव आएगा और वह बेसहारा तिनके की तरह बह जाएगी.

चिट्ठी कब उस के हाथ से छूट गई, उसे पता ही नहीं चला और वह जाल में फंसी घायल हिरनी की तरह हांफती रही. अभी राहुल, रत्ना भी तो नहीं आएंगे. डेढ़ घंटे की देर है. घड़ी की सूइयां भी उस की जिंदगी सी ठहर गई हैं. चलतेचलते घिस गई हैं. एक दमघोंटू चुप्पी पूरे कमरे में सिसक रही थी. मात्र उसे यदाकदा अपनी धड़कनों की आवाज सुनाई दे जाती थी, जिन में विलीन कितनी ही यादें उस के दिल के टुकड़े कर जाती थीं.

जब वह इस घर में दुलहन बन कर आई थी, सास ने बलैया ली थीं. ननदों और देवरों की हंसीठिठोली से घरआंगन महक उठा था. वह निहाल थी अपने गृहस्थ जीवन पर. शादी के बाद 3 ही वर्षों में राहुल और रत्ना से उस का घर खिलखिला उठा था. उसे मायके गए 2 वर्ष हो गए थे. मां की आंखें इंतजार में पथरा गईं. कभी राहुल का जन्मदिन है तो कभी रत्ना की पढ़ाई. कभी सास की बीमारी है, तो कभी देवर की पढ़ाई. सच पूछो तो उसे अपने पति को छोड़ कर जाने की इच्छा ही नहीं होती. उन की बलवान बांहों में आ कर उसे अनिर्वचनीय आनंद मिलता. उस का तनमन मोगरे के फूलों की तरह महक उठता.

भाभी ही कभी ठिठोली भरा पत्र लिखतीं, ‘क्यों दीदी, अब क्या ननदोई के बिना एक रात भी नहीं सो सकतीं.’ वह होंठों के कोनों में हंस कर रह जाती.

सास कभीकभी मीठी झिड़की देतीं, ‘एक बार मायके हो आओ बहू, नहीं तो तुम्हारी मां कहेगी कि बूढ़ी अपनी सेवा कराने के लिए हमारी बेटी को भेज नहीं रही है.’

वह हंस कर कहती, ‘अम्मां, चली तो जाऊं पर तुम्हें कौन देखेगा? देवरजी का ब्याह कर दो तब साल भर मायके रह कर एक ही बार में मां का हौसला पूरा कर दूंगी.’

रात को राहुल के पिताजी ने भावभीने कंठ से कहा, ‘अंजु, साल भर मायके रहोगी तो मेरा क्या होगा? मैं तो नौकरी छोड़ कर तुम्हारे ही साथ चला चलूंगा.’

उन के मधुर हास्य में पति प्रेम का अभिमान भी मिला होता. पर उसे क्या पता था कि एक दिन यह सबकुछ रेतीली मिट्टी की तरह बिखर जाएगा. राहुल के पिताजी के तबादले की सूचना दूसरे ही दिन मिल गई थी. उन्होंने बहुत कोशिश की कि उन का तबादला रुक जाए पर कुछ भी नहीं हो सका. आखिर उन्हें कोलकाता जाना ही पड़ा.

जाने के बाद कुछ दिनों तक लगातार उन के पत्र आते रहे. सप्ताह में 2-2, 3-3. मां ने कई बार लिखा, अब तो जंवाई भी नहीं हैं, इधर ही आजा, अकेली का कैसे दिल लगेगा? वह लिखती, ‘अम्मां अकेली कहां हूं, सास हैं, देवर हैं. अब तो मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है. मेरे सिवा कौन देखेगा इन्हें,’ फिर भरोसा था कि राहुल के पिताजी शीघ्र ही बुला लेंगे.

धीरेधीरे सबकुछ खंडित हो गया, उन के विश्वास की तरह. लिफाफे से अंतर्देशीय, फिर पोस्टकार्ड और तब एक लंबा अंतराल. पत्र भी बाजार भाव की तरह महंगे हो गए थे. बच गए थे मात्र उस के सुलगते हुए अरमान. सास, देवर का रवैया भी अब सहानुभूतिपूर्ण नहीं रह गया था.

बीच में यह खबर भी लावे की तरह भभकी थी कि राहुल के पिताजी ने किसी बंगालिन को रख लिया है. पहले उसे यकीन नहीं आया था, पर देवर के साथ जा कर उस ने जब अपनी आंखों से देख लिया तो बरसों से ठंडी पड़ी भावनाएं राख में छिपी चिनगारी की तरह सुलग कर धुआं देने लगीं. भावावेश में उस का कंठ अवरुद्ध हो गया. हाथपैर कांप उठे. उस ने राहुल के पिता के आगे हाथ जोड़ दिए.

‘मेरी छोड़ो, इन बच्चों की तो सोचो, जिन्हें तुम ने जन्म दिया है. कहां ले कर जाऊंगी मैं इन्हें,’ आगे की बात उस की रुलाई में ही डूब गई.

जवाब उस के पति ने नहीं, उस सौत ने ही दिया था, ‘एई हियां पर काय को रोनाधोना कोरता है. जब मरद को सुखमौज नहीं दे सोकता तो काहे को बीवी. खली बच्चा पोइदा कोरने से कुछ नहीं होता, समझी. अब जाओ हियां से, जियादे नखरे नहीं देखाओ.’

वह एक क्षण उसे नजर भर कर देखती रही. सांवले से चेहरे पर बड़ा गोल टीका, पूरी मांग में सिंदूर, पैरों में आलता और उंगलियों में बिछुआ…उस में कौन सी कमी है. वह भी तो पूरी सुहागिन है. मगर वह भूल गई कि उस के पास एक चीज नहीं है, पति का प्यार. पर कहां कमी रह गई उस के प्यार में, पूरे घर को संभाल कर रखा उस ने. उसी का यह प्रतिफल है.

हताश सी उस की आत्मा ने फिर से संघर्ष चालू किया, ‘मैं तुम से नहीं अपने पति से पूछ रही हूं.’

‘ओय होय, कौन सा पति, वो हमारा होय. पाहीले तो बांध के रखा नहीं, अभी उस को ढूंढ़ने को आया. खाली बिहाय करने से नाहीं होता, मालूम होना चाहिए कि मरद क्या मांगता है. अब जाओ भी,’ कहतेकहते उस ने धक्का दे दिया.

रत्ना भी गिर कर चिल्लाने लगी. उसे अपनेआप पर क्षोभ हुआ. काश, वह इतनी बड़ी होती कि पति को छोड़ कर चल देती या वह इतने निम्न स्तर की होती कि इस औरत को गालियां दे कर उस का मुंह बंद कर देती और उस की चुटिया पकड़ कर घर से बाहर कर देती, पर अब तो बाजी किसी और के हाथ थी.

लेकिन उस के देवर से नहीं रहा गया. बच्चों को पकड़ कर उस ने कहा, ‘बोलो भैया, क्या कहते हो? अगर भाभी से नाता तोड़ा तो समझ लो हम से भी नाता टूट जाएगा. तुम्हें हम से संबंध रखना है कि नहीं? भैया, चलो हमारे साथ.’

‘मेरा किसी से कोई संबंध नहीं.’

दिसंबर की ठिठुरती सांझ सा वह संवेदनशील वाक्य उस की पूरी छाती बींध गया था. अचेत हो गई थी वह. होश आया तो देवर उस के सिरहाने बैठा था और दोनों बच्चे निरीह गौरैया से सहमे हुए उसे देख रहे थे.

‘अब चलो, भाभी, यहां रह कर क्या करोगी? तुम जरा भी चिंता मत करो, हम लोग हैं न तुम्हारे साथ. और फिर देखना, कुछ ही दिनों में भैया वापस आएंगे.’

बिना किसी प्रतिक्रिया के वह लौट आई. पर इसी एक घटना से उस की पूरी जिंदगी में बदलाव आ गया. कुछ दिनों तक तो घर वालों का रवैया अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रहा. सास कुछ ज्यादा ही लाड़ दिखाने लगी थीं, पर एक कमाऊ पूत का बिछोह उन को साले जा रहा था.

देवर की नौकरी लगते ही देवर की भी आंखें बदलने लगी थीं. न तो सास के हाथों में दुलार ही रह गया था और न देवर की बोली में प्यार. बच्चे उपेक्षित होने लगे थे. देवर की शादी के बाद वह भी घर की नौकरानी बन कर रह गई थी. अपनी उपेक्षा तो वह सह भी लेती पर दिन पर दिन बिगड़ते हुए बच्चों को देख कर उस का मन ग्लानि से भर उठता. आखिर कब तक वह इन बातों को सह सकती थी. मां के ढेर सारे पत्रों के उत्तर में वह एक दिन बच्चों के साथ स्वयं ही वहां पहुंच गई.

वर्षों से बंधा धीरज का बांध टूट कर रह गया और दोनों उस अविरल बहती अजस्र धारा में बहुत देर तक डूबतीउतराती रही थीं. मां ने कुम्हलाए हुए चेहरे पर एक नजर डाल कर कहा था, ‘जो हो गया उसे भूल जा, अब इन बच्चों का मुंह देख.’

पर मां के यहां भी वह बात नहीं रह गई थी. पिताजी की पेंशन से तो गुजारा होने से रहा. भैयाभाभी मुंह से तो कुछ नहीं बोलते पर उसे लगता कि उस सीमित आय में उस का भार उन्हें पसंद नहीं. तब उस ने ही मां के सामने प्रस्ताव रखा था कि वह कहीं नौकरी कर लेगी.

मां पहले तो नहीं मानी थीं, ‘लोग क्या कहेंगे, बेटी क्या मायके में भारी पड़ गई?’

पर उस ने ही उन्हें समझाया था, ‘मां, छोटीछोटी आवश्यकताओं के लिए भैया पर निर्भर रहना अच्छा नहीं लगता. कल बच्चे बड़े होंगे तो क्या उन्हें भैया के दरवाजे का भिखारी बना कर रखूंगी.’

मां ने बेमन से ही उसे अनुमति दी थी. कहांकहां उस ने पापड़ नहीं बेले. कभी नगरपालिका में क्लर्क बनी, तो कभी किसी की छुट्टी की जगह काम किया. अंत में जा कर मिडिल स्कूल में अध्यापिका की नौकरी मिली. छोेटे बच्चों को पढ़ातेपढ़ाते बच्चे कब बडे़ हो गए, उसे पता ही नहीं चला. और आज तो इस स्थिति में आ गई है कि अब राहुल चार पैसे का आदमी हो जाएगा तो वह नौकरी छोड़ कर निश्चिंत हो जाएगी. हालांकि आज भी वह आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं हो सकी है, लेकिन किसी का सहारा भी तो नहीं लेना पड़ा.

पर आज यह पत्र, वह क्या जा पाएगी वहां? इतने वर्षों का अंतराल?

राहुल के आने के बाद ही उस की तंद्रा टूटी. वह पत्थर की मूर्ति की तरह थी. उसे झकझोरते हुए राहुल ने चिट्ठी लपक ली.

‘‘मां, तुम्हें क्या हो गया है?’’

‘‘बेटे,’’ और वह राहुल का कंधा पकड़ कर रोने लगी, ‘‘मैं क्या करूं?’’

‘‘मां, तुम वहां नहीं जाओगी.’’

‘‘राहुल.’’

‘‘हां मां, उस आदमी के पास जिस ने आज तक यह जानने की जुर्रत नहीं की कि हम लोग कैसे जीते हैं. तुम ने कितनी मेहनत से हमें पाला है. तुम्हें न सही पर हमें क्यों छोड़ दिया? मां, तुम अगर समझती हो कि हम लोग बुढ़ापे में तुम्हारा साथ छोड़ देंगे तो विश्वास रखो, ऐसा कभी नहीं होगा. मैं शादी ही नहीं करूंगा. मां, तुम उन्हें बर्दाश्त कर सकती हो, क्योंकि वे तुम्हारे पति हैं पर हम कैसे बर्दाश्त कर लेंगे उसे, जो सिर्फ नाम का हमारा पिता है? कभी उस ने दायित्व निभाने का सोचा भी नहीं. तुम अगर जाना ही चाहती हो तो जाओ, पर याद रखो, मैं साथ नहीं रह पाऊंगा.’’

उस की आंखों से अनवरत बहते आंसुओं ने पत्र के अक्षरों को धो दिया और वह राहुल का सहारा ले कर उठ खड़ी हुई.

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