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Social Story: दीया और सुमि

Social Story: “अरे दीया, चलो मुसकरा भी दो अब. इस दुनिया की सारी समस्याएं केवल तुम्हारी तो नहीं हैं,” सुमि ने कहा तो यह लाजवाब बात सुन कर दीया हंस दी और उस ने सुमि के गाल पर एक मीठी सी चपत भी लगा दी.

“अरे सुनो, हां, तो यह चाय कह रही है कि गरमगरम सुड़क लो ठंडी हो जाऊंगी तो चाय नहीं रहूंगी,” सुमि ने कहा.

“अच्छा, मेरी मां,” कह कर दीया ने कप हाथों में थामा और होंठों तक ले आई. सुमि के हाथ की गरम चाय घूंटघूंट पी कर मन सचमुच बागबाग हो गया उस का.

“चलो, अब मैं जरा हमारे दिसु बाबा को बाहर सैर करा लाती हूं. तुम अपना मन हलका करो और यह संगीत सुनो,” कह कर सुमि ने 80 के दशक के गीत लगा दिए और बेबी को ले कर बाहर निकल गई.

दीया ने दिसु के बाहर जाने से पहले उसे खूब प्यार किया…’10 महीने का दिसु कितना प्यारा है. इस को देख कर लगता है कि यह जीवन, यह संसार कितना सुंदर है,’ दीया ने मन ही मन सोचा और खयालों में डूबती चली गई.

यादों के सागर में दीया को याद आया 2 साल पहले वाला वह समय, जब मेकअप रूम में वह सुमि से टकरा गई थी. दीया तैयार हो रही थी और सुमि क्लब के मैनेजर से बहस करतेकरते मेकअप रूम तक आ गई थी. वह मैनेजर दीया को भी कुछ डांस शो देता था, पर दीया तो उस से भयंकर नफरत करती थी. दीया का मन होता कि उस के मुंह पर थूक दे, क्योंकि उस ने दीया को नशीली चीजें पिला कर जाने कितना बरबाद कर डाला था. आज वह मैनेजर सुमि को गालियां दे रहा था.

आखिरकार सुमि को हां करनी पड़ी, “हांहां, इसी बदन दिखाती ड्रैस को पहन कर नाच लूंगी.”

यह सुन कर वह धूर्त मैनेजर संतुष्ट हो कर वहां से तुरंत चला गया और जातेजाते बोलता रहा, “जल्दी तैयार हो जाना.”

“क्या तैयार होना है, यह रूमाल ही तो लपेटना है…” कह कर जब सुमि सुबक रही थी, तब दीया ने उसे खूब दिलासा दिया और कहा, “सुनो, मैं आप का नाम तो नहीं जानती, पर यही सच है कि हम को पेट भरना है और
उस कपटी मैनैजर को पैसा कमाना है. जानती हो न इस पूरी धरती की क्या बिसात, वहां स्वर्ग में भी यह दौलत ही सब से बड़ी चीज है.”

इस तरह माहौल हलका हुआ. सुमि ने अपना नाम बताया, तब उन दोनों ने एकदूसरे के मन को पढ़ा. कुछ बातें भी हुईं और उस रात क्लब में नाचने के बाद अगले दिन सुबह 10 बजे मिलने का वादा किया.

आधी रात तक खूबसूरत जवान लड़कियों से कमर मटका कर और जाम पर जाम छलका कर उन के मालिक, मैनेजर या आयोजक सब दोपहर बाद तक बेसुध ही रहने वाले थे. वे दोनों एक पार्क में मिलीं और बैंच पर बैठ गईं. दोनों कुछ पल खामोश रहीं और सुमि ने बात शुरू की थी, फिर तो एकदूसरे के शहर, कसबे, गांव, घरपरिवार और घुटन भरी जिंदगी की कितनी बातें एक के बाद एक निकल पड़ीं और लंबी सांस ले कर सुमि बोली, “कमाल है न कि यह समय भी कैसा खेल दिखाता है. जिन को हम ने अपना समझ कर अपनी हर समस्या साझा कर ली, वे ही दोस्त से देह के धंधेबाज बन गए, वह भी हमारी देह के.”

“हां सुमि, तुम सही कह रही हो. कल रात तुम को देखा तो लगा कि हम दोनों के सीने में शायद एकजैसा दर्द है,” कहते हुए दीया ने गहरी सांस ली. आज कितने दिनों के बाद वे दोनों दिल की बात कहसुन रही थीं.

सुमि को तब दीया ने बताया कि रामपुर में उस का पंडित परिवार किस तरह बस पूजा और अनुष्ठान के भरोसे ही चल रहा था, पर सारी दुनिया को कायदा सिखा रहे उस घर में तनिक भी मर्यादा नहीं थी. उस की मां को उस के सगे चाचा की गोद में नींद आती और पिता से तीसरेचौथे दिन शराब के बगैर सांस भी न ली जाती.

“तो तुम कुछ कहती नहीं थी?” सुमि ने पूछा.

“नहीं सुमि, मैं बहुत सांवली थी और हमारे परिवार मे सांवली लड़की किसी मुसीबत से कम नहीं होती, तो मैं घर पर कम रहती थी.”

“तुम कहां रहती थी?”

“सुमि, मैं न बहुत डरपोक थी और जब भी जरा फुरसत होती तो सेवा करने चली जाती. कभी कहीं किसी के बच्चों को पढ़ा देती तो किसी के कुत्तेबिल्ली की देखभाल करती बड़ी हो गई तो किसी की रसोई तक संभाल देती पर यह बात भीतर तक चुभ जाती कि कितनी सांवली है, इस को कोई पसंद नहीं करेगा,” दीया तब लगातार बोलती रही थी.

सुमि कितने गौर से सुन रही थी. अब वह एक सहेली पा कर उन यादों के अलबम पलटने लगी.

दीया बोलने लगी, “एक लड़का मेरा दोस्त बन गया. उस ने कभी नहीं कहा कि तुम सांवली हो और जब जरूरत होती वह खास सब्जैक्ट की किताबें और नोट्स आगे रखे हुए मुझे निहारता रहता.

“इस तरह मैं स्कूल से कालेज आई तो अलगअलग तरह की नईनई बातें सीख गई. मेरे कसबे के दोस्तों ने बताया था कि अगर कोई लड़का तुम से बारबार मिलना चाहे तो यही रूप सच्चे मददगार का भी रूप है और मैं ने आसानी से इस बात पर विश्वास कर लिया था.”

एक दिन इसी तरह कोई मुश्किल सब्जैक्ट समझाते हुए उस लड़के के एकाध बाल उलझ कर माथे पर आ गए थे तो दीया का मन महक गया. उस के चेहरे पर हलकीहलकी उमंग उठी थी.

हालांकि दीया की उम्र 20 साल से ज्यादा नहीं थी, पर उस के दिल पर एक स्थायी चाहत थी, जिस का रास्ता बारबार उसी अपने और करीबी से लगने वाले मददगार लड़के के पास जाता दिखाई देता था.

दीया कालेज में पढ़ने वाले उस लड़के का कोई इतिहासभूगोल जानती नहीं थी और जानना भी नहीं चाहती थी. सच्चा प्यार तो हमेशा ईमानदार होता है, वह सोचती थी. एक दिन वह अपने घर से रकम और गहने ले कर चुपचाप
रवाना हो गई. वह बेफिक्र थी, क्योंकि पूरे रास्ते उस का फरिश्ता उस को गोदी मे संभाले उस के साथ ही तो था और बहुत करीब भी था.

दीया उस लड़के के साथ बिलकुल निश्चिंत थी, क्योंकि उस को जब भी अपने मददगार यार के चेहरे पर मुसकराहट दिखाई देती थी, वह यही मान लेती थी कि भविष्य सुरक्षित है, जीवन बिलकुल मजेदार होने वाला है. आने वाले दिन तो और भी रसीले और चमकदार होंगे.

मगर दीया कहां जानती थी कि वे कोरे सपने थे, जो टूटने वाले थे. यह चांदनी 4-5 दिन में ही ढलने लगी. एक दिन वह लड़का अचानक उठ कर कहीं चला गया. दीया ने उस का इंतजार किया, पर वह लौटा नहीं, कभी नहीं.

उस के बाद दीया की जिंदगी बदल गई. वह ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जो उसे यहांवहां नाचने के लिए मजबूर किया गया. इतना ही नहीं उस को धमकी मिलती कि तुम्हारी फिल्म बना कर रिलीज कर देंगे, फिर किसी कुएं या पोखर मे कूद जाना.

दीया को कुछ ऐसा खिलाया या पिलाया जाता कि वह सुबह खुद को किसी के बैडरूम में पाती और छटपटा जाती. कई दिनों तक यों ही शहरशहर एक अनाचारी से दूसरे दुराचारी के पलंग मे कुटने और पिसने के बाद वह सुमि से मिल गई.

सुमि ने दीया को पानी की बोतल थमा दी और बताया, “मैं खुद भी अपने मातापिता के मतभेद के बीच यों ही पिसती रही जैसे चक्की के 2 पाटों में गेहूं पिस जाता है. मां को आराम पसंद था पिता को सैरसपाटा और लापरवाही भरा जीवन. घर पर बस नौकर रहते थे. हमारे दादा के बगीचे थे. पूरे साल रुपया ही बरसता रहता था. अमरूद, आम से ले कर अंगूर, अनार के बगीचे.”

“अच्छा तो इतने पैसे मिलते थे…” दीया ने हैरानी से कहा.

“हां दीया, और मेरी मां बस बेफिक्र हो कर अपने ही आलस में रहती थी. पिता के बाहर न जाने कितने अफेयर चल रहे थे. वे बाजारू औरतों पर दौलत लुटा रहे थे, पर मां मस्तमगन रहती. इस कमजोरी के तो नौकर भी खूब मजे लेते. वे मां को सजधज कर तैयार हो कर बाहर सैरसपाटा करने में मदद करते और घर पर पिता को महंगी शराब के पैग पर पैग बना कर देते.

“मां और पिता दोनों से नौकरों को खूब बख्शीश मिलती और उन की मौज ही मौज होती, लेकिन जब भी मातापिता एक दूसरे के सामने पड़ते तो कुछ पल बाद ही उन दोनों में भयंकर बहस शुरू हो जाती, कभी रुपएपैसे के हिसाब को ले कर तो कभी मुझे ले कर कि मैं किस की जिम्मेदारी हूं.

“मेरा अकेला उदास मन मेरे हमउम्र पडो़सी मदन पर आ गया था. वह हर रोज मेरी बातें सुनता, मुझे पिक्चर दिखा लाता और पढ़ाई में मेरी मदद करता. कालेज में तो मेरा एक ही सहारा था और वह था मदन.

“पर एक दिन वह मेरे घर आया और शाम को तैयार रहना कह कर मुझे एक पार्टी में ले गया जहां मुझे होश आया तो सुबह के 5 बज रहे थे. मेरे अगलबगल 2 लड़के थे, मगर मदन का कोई अतापता ही नहीं था.

“मैं समझ गई थी कि मेरे साथ क्या हुआ है. मैं वहां से भागना चाहती थी, पर मुझे किसी ने बाल पकड़ कर रोक दिया और कहा कि कार में बैठो. वे लोग मुझे किसी दूसरे शहर ले गए और शाम को एक महफिल में सजधज कर शामिल होने को कहा.

“वह किसी बड़े आदमी की दावत थी. मैं अपने मातापिता से बात करने को बेचैन थी, मगर मुझे वहां कोई गोली खिला दी गई और मेरा खुद पर कोई कंट्रोल न रहा. फिर मेरी हर शाम नाचने में ही गुजरने लगी.”

“ओह, सुमि,” कह कर दीया ने उस के हाथ पर हाथ रख दिया था. आज 2 अजनबी मिले, पर अनजान होते हुए भी कई बातें समान थीं. उन की सरलता का फायदा उठाया गया था.

“देखो सुमि, हमारे फैसले और प्राथमिकता कैसे भी हों, वे होते तो हमारे ही हैं फिर उन के कारण यह दिनचर्या कितनी भी हताशनिराश करने वाली हो, दुविधा कितना भी हैरान करे, हम सब के पास 1-2 रास्ते तो हर हाल ही में रहते ही हैं और चुनते समय हम उन में से भी सब से बेहतरीन ही चुनते हैं, पर जब नाकाम हो जाते है, तो खुद को भरम में रखते हुए कहते हैं कि और कोई रास्ता ही नही था. इस से नजात पाए बिना दोबारा रास्ता तलाशना बेमानी है,” कह कर दीया चुप हो गई थी.

अब सुमि कहने लगी, “हमारे साथ एक बात तो है कि हम ने भरोसा किया और धोखा खाया, पर आज इस बुरे वक्त में हम दोनों अब अकेले नहीं रहेंगे. हम एकदूसरे की मदद के लिए खड़े हैं.”

“हां, मैं तैयार हूं,” कह कर दीया ने योजना बनानी शुरू की. तय हुआ कि 2 दिन बाद अपना कुछ रुपया ले कर रेल पकड़ कर निकल जाएंगी. उस के बाद जो होगा देखा जाएगा, अभी इस नरक से तो निकल लें.

यह बहुत अच्छा विचार था. 2 दिन बाद इस पर अमल किया. सबकुछ आराम से हो गया. वे दोनों चंडीगढ़ आ गईं. वहां उन्होंने एक बच्चा गोद लिया.

दीया यही सोच रही थी कि कुछ आवाज सी हुई. सुमि और दिसु लौट आए थे.

सुमि ने दीया की गीली आंखें देखीं और बोली, “ओह दीया, यह अतीत में डूबनाउतरना क्या होता है, क्यों होता है, किसलिए होता है, मैं नहीं जानती, क्योंकि मैं गुजरे समय के तिलिस्म में कभी पड़ी ही नहीं. मैं वर्तमान में जीना पसंद करती हूं. बीते समय और भविष्य की चिंता में वे लोग डूबे रहते हैं, जिन के पास डूबने का और कोई साधन नहीं होता…”

“अच्छा, मेरी मां,” कह कर दीया ने सुमि को अपने गले लगा लिया.

Social Story: यह कैसा बदला

Social Story: मृदुल को अब अहसास हो रहा था कि बदले की आग ने उसे ही झुलसा कर रख दिया है… और फिर बदला भी कैसा? उस के साथ किसी और ने अपराध किया और उस ने किसी और से बदला लिया. उसे ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए था.

पुलिस मृदुल के पीछे पड़ी हुई थी और यकीनन उसे पकड़ लेगी. उस के 2 साथियों को पुलिस ने पकड़ भी लिया था. क्या करे क्या न करे, उस की समझ में नहीं आ रहा था.

तकरीबन 3 महीने पहले तक मृदुल की जिंदगी काफी अच्छी चल रही थी. वह एक एयर कंपनी में पायलट था. वह थाईलैंड में रहता था और अच्छी जिंदगी जी रहा था. वैसे तो तकरीबन हर देश में उसे जाना होता था, पर ज्यादातर वह भारत और यूरोप ही जाता था.

काफी खर्च कर के मृदुल ने पायलट का कोर्स किया था. नौकरी भी मिल गई थी. 2-3 सालों तक उस ने नौकरी की, पर कोरोना महामारी के चलते सब से ज्यादा असर अगर किसी कारोबार पर पड़ा था तो, वह थी एयर इंडस्ट्री. कई देशों ने दूसरे देशों से आवाजाही बंद कर दी थी. यहां तक कि घरेलू उड़ान भी रद्द हो गई थी. ऐसे हालात में कई पायलटों को कंपनियों ने अलविदा कह दिया था और उन में से एक वह भी था.

महामारी ने सिर्फ इतना कहर ही मृदुल के ऊपर नहीं बरपाया था. एक दिन वह थाईलैंड में अपने फ्लैट में बैठा भविष्य के बारे में सोच रहा था कि अचानक कुछ लोग उस के घर में आए. वे सरकारी वरदी में थे. उन्होंने उसे बताया कि वे कस्टम महकमे से हैं और उस के घर की तलाशी लेने आए हैं.

जब तक मृदुल कुछ समझ पाता, उस के मोबाइल फोन, लैपटॉप, पर्स वगैरह को उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया. उन में से कुछ लोग इस घटना का वीडियो भी बना रहे थे.

“पुलिस स्टेशन…” एक ने कहा और मृदुल को घसीटते हुए गाड़ी में बिठाया वे और पुलिस स्टेशन की ओर ले चले, पर कुछ दूर जाने के बाद उन लोगों ने मृदुल को एक टैक्सी में बिठाया और टैक्सी वाले को वहां की भाषा में कुछ कह कर थाईलैंड की करंसी कुछ ‘बाट’ दिए. मृदुल हक्काबक्का था. कुछ ही देर में टैक्सी वाले ने उसे उस के फ्लैट के नजदीक ही छोड़ दिया.

“पुलिस स्टेशन?” मृदुल ने ड्राइवर से पूछा.

“नो पुलिस स्टेशन…” ड्राइवर ने कहा और चलता बना.

मृदुल समझ गया कि उसे अपराधियों ने ठग लिया है. नजदीकी पुलिस स्टेशन में जा कर उस ने रिपोर्ट लिखवा दी और दुखी मन से उस ने थाईलैंड छोड़ मुंबई में रहने की योजना बना ली.

भारत सरकार हर देश से अपने नागरिकों को लाने का इंतजाम कर रही थी और उसी के तहत मृदुल भी वापस आ गया.

थाईलैंड में हुए कांड को मृदुल भूल तो नहीं पाया था, पर जख्म कुछ कम जरूर हो गए थे. एक दिन वह मुंबई में भटक रहा था कि उस की नजर यूंग नाम के एक थाई बाशिंदे पर नजर पड़ी. थाईलैंड में यूंग उस के फ्लैट के नजदीक ही रहता था और सुबह की सैर के लिए नजदीकी पार्क में आया करता था. अकसर यूंग से उस की बात होती थी.

यूंग को देख मृदुल ने टोकना चाहा, पर एकाएक उस के मन में खयाल आया कि जिस तरह उसे थाईलैंड में ठगा गया था, वैसे ही वह यूंग को ठग सकता है. पर अगर वह यूंग के पास जाएगा तो वह उसे पहचान लेगा, यह सोच उस ने दूरी बना कर उस का पीछा किया और उस का फ्लैट कहां है, इस की जानकारी ले ली.

मृदुल ने सब से पहले यूंग पर निगरानी रखना शुरू कर दिया. उस ने देखा कि वह किसी लड़की के साथ वह रहता है. लगता था कि वह यूंग की गर्लफ्रैंड है. उन के घर से आनेजाने के समय पर भी वह निगाह रख रहा था. वह चाहता था कि जब यूंग घर में अकेला हो, तभी उस के ऊपर धावा बोला जाए.

यूग की गर्लफ्रैंड अमूमन सुबह 9 बजे घर से निकलती थी और शाम 6 बजे वापस आती थी. इस बीच ही काम को अंजाम देना उचित रहेगा, मृदुल ने सोचा.

मृदुल खुद यूंग के पास जा नहीं सकता था, क्योंकि वह उसे पहचान जाता. जिस तरह यूंग के देश वालों ने उसे ठगा है उसी तरह मृदुल भी उसे अपने देश में ठगेगा. पर कैसे? कस्टम डिपार्टमैंट की ओर से कुछ अफसर यूंग के पास जाएंगे और जो समान उस के पास होगा उसे छीन लेंगे. पर कस्टम डिपार्टमैंट के आदमी वह लाए कहां से?

एकाएक मृदुल को अपने क्लब का ध्यान आया जहां कई बाउंसर रहते थे. 1-2 से उस की जानपहचान भी थी. एक दिन समय निकाल कर वह एक बाउंसर के पास गया और बोला, “भाई, एक छोटा सा काम है, पर उसे आप जैसे बाहुबली ही कर सकते हैं.”

“क्या काम है बताओ?” खुद को बाहुबली कहलाने में उस बाउंसर को फख्र महसूस हुआ.

“कस्टम डिपार्टमैंट का अफसर बन कर एक थाई बाशिंदे को लपेटना है,” मृदुल ने कहा.

“पुलिसथाने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे हम,” उस बाउंसर ने साफ माना किया.

“क्या पुलिस का चक्कर… उस थाई के समझ में कुछ आएगा तब न? वह न तो हमारा नाम जानता है, न हमें पहचानता है. क्या बताएगा पुलिस को.. और पुलिस भी आप लोगों से पंगा नहीं लेना चाहेगी. फिर जो कुछ भी मिलेगा उस में आधा हिस्सा आप लोगों का,” मृदुल ने उसे समझाया.

“आप लोगों का मतलब? और कौन रहेगा इस में?” बाउंसर ने पूछा.

“भाई, कस्टम डिपार्टमैंट की ओर से जाओगे, तो कम से कम 4-5 आदमी तो होने चाहिए,” मृदुल ने समझाया.

“अगर उस के पास एक लाख मिले भी तो 5 आदमियों में क्या मिलेगा? क्यों इतना बड़ा रिस्क लें हम?” बाउंसर ने एतराज जताया.

“कैसे जानते हो कि एक लाख ही मिलेगा… अरे, उस का मोबाइल, आईपैड, पर्स, जेवर सभी कुछ मिला कर कई लाख हो जाएंगे,” मृदुल ने समझाया.

कुछ नानुकर के बाद वह बाउंसर राजी हो गया और अपने कुछ और साथी बाउंसरों को भी राजी कर लिया.

वे सब दोपहर के 2 बजे यूंग की हाउसिंग सोसाइटी में कस्टम अफसर बन कर पहुंच गए. सरकारी अफसर समझ कर सिक्योरिटी गार्ड ने भी उन्हें नहीं रोका.

वे यूंग के फ्लैट के दरवाजे पर गए और डोरबैल का बटन दबाया. यूंग डोरबैल की आवाज सुनते ही बाहर निकाला. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाता, वे चारों उस के घर में धड़ाधड़ घुस गए. उन्होंने उस का मोबाइल फोन छीन लिया. साथ ही पास में रखे आईपैड, कंप्यूटर, पर्स वगैरह को भी छीन लिया. 2 लोग अंदर जा कर तलाशी लेने लगे और बाकी 2 वीडियो बनाने लगे.

आननफानन में सामान बटोर कर यूंग को थाने चलने को कहा गया. जैसे ही वह बाहर निकला उसे एक आटोरिकशा में बिठा दिया गया और ड्राइवर को नजदीक की किसी जगह पर छोड़ने को कह दिया.

मृदुल के प्लान के मुताबिक, जैसा उस के साथ थाईलैंड में हुआ था, सबकुछ वैसा ही हो गया. पर यूंग ने तुरंत पुलिस स्टेशन में इस की खबर कर दी और पुलिस ने वीडियो फुटेज की मदद से सभी बाउंसरों को पकड़ लिया. इस की जानकारी मृदुल को आज के अखबार से मिली थी.

अब क्या करे, मृदुल समझ ही नहीं पा रहा था. एकाएक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. स्क्रीन पर उस बाउंसर का नाम फ्लैश हो रहा था, जिसे पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी. इस का मतलब पुलिस ने बाउंसर के मोबाइल से उसे फोन किया है. उस ने कांपते हाथों से मोबाइल को स्विच औफ किया और चेहरे पर आए पसीने को पोंछा.

मृदुल जानता था कि आज नहीं तो कल पुलिस की गिरफ्त में उसे आना ही है. यह कैसा बदला लिया था उस ने यूंग से. बदले की इस आग ने तो उसे ही झुलसा दिया था. अब पछताने के सिवा उस के पास कोई चारा नहीं था.

Social Story: आखिर कब तक और क्यों

Social Story: ‘‘क्या बात है लक्ष्मी, आज तो बड़ी देर हो गई आने में?’’ सुधा ने खीज कर अपनी कामवाली से पूछा.

‘‘क्या बताऊं मेमसाहब आप को कि मुझे क्यों देरी हो गई आने में… आप तो अपने कामों में ही लगी रहती हैं. पता भी है मनोज साहब के घर में कैसी आफत आ गई है? उन की बेटी रिचा के साथ कुछ ऐसावैसा हो गया है… बड़ी शांत, बड़े अच्छे तौरतरीकों वाली है.’’

लक्ष्मी से रिचा के बारे में जान कर सुधा का मन खराब हो गया. बारबार उस का मासूम चेहरा उस के जेहन में उभर कर मन को बेधने लगा कि पता नहीं लड़की के साथ क्या हुआ? फिर भी अपनेआप पर काबू पाते हुए लक्ष्मी के धाराप्रवाह बोलने पर विराम लगाती हुई वह बोली, ‘‘अरे कुछ नहीं हुआ है. खेलते वक्त चोट लग गई होगी… दौड़ती भी तो कितनी तेज है,’’ कह कर सुधा ने लक्ष्मी को चुप करा दिया, पर उस के मन में शांति कहां थी…

कालेज से अवकाश प्राप्त कर लेने के बाद सुधा बिल्डिंग के बच्चों की मैथ्स और साइंस की कठिनाइयों को सुलझाने में मदद करती रही है. हिंदी में भी मदद कर उन्हें अचंभित कर देती है. किस के लिए कौन सी लाइन ठीक रहेगी. बच्चे ही नहीं उन के मातापिता भी उसी के निर्णय को मान्यता देते हैं. फिर रिचा तो उस की सब से होनहार विद्यार्थी है.

‘‘आंटी, मैं भी भैया लोगों की तरह कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहती हूं. उन की तरह आप मेरा मार्गदर्शन करेंगी न?’’

सुधा के हां कहते ही वह बच्चों की तरह उस के गले लग जाती थी. लक्ष्मी के जाते ही सारे कामों को जल्दी से निबटा कर वह अनामिका के पास गई. उस ने रिचा के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा कांप उठी. कल सुबह रिचा अपने सहपाठियों के साथ पिकनिक मनाने गंगा पार गई थी. खानेपीने के बाद जब सभी गानेबजाने में लग गए तो वह गंगा किनारे घूमती हुई अपने साथियों से दूर निकल गई. बड़ी देर तक जब रिचा नहीं लौटी तो उस के साथी उसे ढूंढ़ने निकले. कुछ ही दूरी पर झाडि़यों की ओट में बेहोश रिचा को देख सभी के होश गुम हो गए. किसी तरह उसे नर्सिंगहोम में भरती करा कर उस के घर वालों को खबर की. घर वाले तुरंत नर्सिंगहोम पहुंचे.

अनामिका ने जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा स्तब्ध रह गई. अब वह असमंजस में थी कि वह रिचा को देखने जाए या नहीं. फिर अनमनी सी हो कर उस ने गाड़ी निकाली और नर्सिंगहोम चल पड़ी, जहां रिचा भरती थी. वहां पहुंच तो गई पर मारे आशंका के उस के कदम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे. किसी तरह अपने पैरों को घिसटती हुई उस के वार्ड की ओर चल पड़ी. वहां पहुंचते ही रिचा के पिता से उस का सामना हुआ. इस हादसे ने रात भर में ही उन की उम्र को10 साल बढ़ा दिया था. उसे देखते ही वे रो पड़े तो सुधा भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाई. ऐसी घटनाएं पूरे परिवार को झुलसा देती हैं. बड़ी हिम्मत कर वह कमरे में अभी जा ही पाई थी कि रिचा की मां उस से लिपट कर बेतहासा रोने लगीं. पथराई आंखों से जैसे आंसू नहीं खून गिर रहा हो.

रिचा को नींद का इंजैक्शन दे कर सुला दिया गया था. उस के नुचे चेहरे को देखते ही सुधा ने आंखों से छलकते आंसुओं को पी लिया. फिर रिचा की मां अरुणा के हाथों को सहलाते हुए अपने धड़कते दिल पर काबू पाते हुए कल की दुर्घटना के बारे में पूछा, ‘‘क्या कहूं सुधा, कल घर से तो खुशीखुशी सभी के साथ निकली थी. हम ने भी नहीं रोका जब इतने बच्चे जा रहे हैं तो फिर डर किस बात का… गंगा के उस पार जाने की न जाने कब से उस की इच्छा थी. इतने बड़े सर्वनाश की कल्पना हम ने कभी नहीं की थी.’’

‘‘मैं अभी आई,’’ कह कर सुधा उस लेडी डाक्टर के पास गई, जो रिचा का इलाज कर रही थी. सुधा ने उन से आग्रह किया कि इस घटना की जानकारी वे किसी भी तरह मीडिया को न दें, क्योंकि इस से कुछ होगा नहीं, उलटे रिचा बदनाम हो जाएगी. फिर पुलिस के जो अधिकारी इस की घटना जांचपड़ताल कर रहे हैं, उन की जानकारी डाक्टर से लेते हुए सुधा उन से मिलने के लिए निकल गई. यह भी एक तरह से अच्छा संयोग रहा कि वे घर पर थे और उस से अच्छी तरह मिले. धैर्यपूर्वक उस की सारी बातें सुनीं वरना आज के समय में इतनी सज्जनता दुर्लभ है.

‘‘सर, हमारे समाज में बलात्कार पीडि़ता को बदनामी एवं जिल्लत की किनकिन गलियों से गुजरना पड़ता है, उस से तो आप वाकिफ ही होंगे… इतने बड़े शहर में किस की हैवानियत है यह, यह तो पता लगने से रहा… मान लीजिए अगर पता लग जाने पर अपराधी पकड़ा भी जाता है तो जरा सोचिए रिचा को क्या पहले वाला जीवन वापस मिल जाएगा? उसे जिल्लत और बदनामी के कटघरों में खड़ा कर के बारंबार मानसिक रूप से बलात्कार किया जाएगा, जो उस के जीवन को बद से बदतर कर देगा. कृपया इसे दुर्घटना का रूप दे कर इस केस को यहीं खारिज कर के उसे जीने का एक अवसर दीजिए.’’

सुधा की बातों की गहराई को समझते हुए पुलिस अधिकारी ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया. वहां से आश्वस्त हो कर सुधा फिर नर्सिंगहोम पहुंची और रिचा के परिवार से भी रोनाधोना बंद कर इस आघात से उबरने का आग्रह किया.

शायद रिचा को होश आ चुका था. सुधा की आवाज सुनते ही उस ने आंखें खोल दीं. किसी हलाल होते मेमने की तरह चीख कर वह सुधा से लिपट गई. सुधा ने किसी तरह स्वयं पर काबू पाते हुए रिचा को अपने सीने से लगा लिया. फिर उस की पीठ को सहलाते हुए कहा, ‘‘धैर्य रख मेरी बच्ची… जो हुआ उस से बुरा तो कुछ और हो ही नहीं सकता, लेकिन इस से जीवन समाप्त थोड़े हो जाता है? इस से उबरने के लिए तुम्हें बहुत बड़ी शक्ति की आवश्यकता है मेरी बच्ची… उसे यों बेहाल हो कर चीखने में जाया नहीं करना है… जितना रोओगी, चीखोगी, चिल्लाओगी उतना ही यह निर्दयी दुनिया तुम्हें रुलाएगी, व्यंग्यवाणों से तुझे बेध कर जीने नहीं देगी.’’

‘‘आंटी, मेरा मर जाना ठीक है… अब मैं किसी से भी नजरें नहीं मिला सकती… सारा दोष मेरा है. मैं गई ही क्यों? सभी मिल कर मुझ पर हसेंगे… मेरा शरीर इतना दूषित हो गया है कि इसे ढोते हुए मैं जिंदा नहीं रह सकती.’’

फिर चैकअप के लिए आई लेडी डाक्टर से गिड़गिड़ा कर कहने लगी, ‘‘जहर दे कर मुझे मार डालिए डाक्टर… इस गंदे शरीर के साथ मैं नहीं जी सकती. अगर आप ने मुझे मौत नहीं दी तो मैं इसे स्वयं समाप्त कर दूंगी,’’ रिचा पागल की तरह चीखती हुई बैड पर छटपटा रही थी.

‘‘ऐसा नहीं कहते… तुम ने बहुत बहादुरी से सामना किया है… मैं कहती हूं तुम्हें कुछ नहीं हुआ है,’’ डाक्टर की इस बात पर रिचा ने पथराई आंखों से उन्हें घूरा.बड़ी देर तक सुधा रिचा के पास बैठी उसे ऊंचनीच समझाते हुए दिलाशा देती रही लेकिन वह यों ही रोतीचिल्लाती रही. उसे नींद का इंजैक्शन दे कर सुलाना पड़ा. रिचा के सो जाने के बाद सुधा अरुण को हर तरह से समझाते हुए धैर्य से काम लेने को कहते हुए चली गई. किसी तरह ड्राइव कर के घर पहुंची. रास्ते भर वह रिचा के बारे में ही सोचती रही. घर पहुंचते ही वह सोफे पर ढेर हो गई. उस में इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह अपने लिए कुछ कर सके.

रिचा के साथ घटी दुर्घटना ने उसे 5 दशक पीछे धकेल दिया. अतीत की सारी खिड़कियां1-1 कर खुलती चली गईं…

12 साल की अबोध सुधा के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह तत्काल उम्र की अनगिनत दहलीजें फांद गई थी. कितनी उमंग एवं उत्साह के साथ वह अपनी मौसेरी बहन की शादी में गई थी. तब शादी की रस्मों में सारी रात गुजर जाती थी. उसे नींद आ रही थी तो उस की मां ने उसे कमरे में ले जा कर सुला दिया. अचानक नींद में ही उस का दम घुटने लगा तो उस की आंखें खुल गईं. अपने ऊपर किसी को देख उस ने चीखना चाहा पर चीख नहीं सकी. वह वहशी अपनी हथेली से उस के मुंह को दबा कर बड़ी निर्ममता से उसे क्षतविक्षत करता रहा.

अर्धबेहोशी की हालत में न जाने वह कितनी देर तक कराहती रही और फिर बेहोश हो गई. जब होश आया तो दर्द से सारा बदन टूट रहा था. बगल में बैठी मां पर उस की नजर पड़ी तो पिछले दिन आए उस तूफान को याद कर किसी तरह उठ कर मां से लिपट कर चीख पड़ी. मां ने उस के मुंह पर हाथ रख कर गले के अंदर ही उस की आवाज को रोक दिया और आंसुओं के समंदर को पीती रही. बेटी की बिदाई के बाद ही उस की मौसी उस के सर्वनाश की गाथा से अवगत हुई तो अपने माथे को पीट लिया. जब शक की उंगली उन की ननद के 18 वर्षीय बेटे की ओर उठी तो उन्होंने घबरा कर मां के पैर पकड़ लिए. उन्होंने भी मां को यही समझाया कि चुप रहना ही उस के भविष्य के लिए हितकर होगा.

हफ्ते भर बाद जब वह अपने घर लौटी तो बाबूजी के बारबार पूछने के बावजूद भी अपनी उदासी एवं डर का कारण उन्हें बताने का साहस नहीं कर सकी. हर पल नाचने, गाने, चहकने वाली सुधा कहीं खो गई थी. हमेशा डरीसहमी रहती थी.

आखिर उस की बड़ी बहन ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘बताओ न मां, वहां सुधा के साथ हुआ क्या जो इस की ऐसी हालत हो गई है? आप हम से कुछ छिपा रही हैं?’’

सुधा उस समय बाथरूम में थी. अत: मां उस रात की हैवानियत की सारी व्यथा बताते हुए फूट पड़ी. बाहर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. बाबूजी भैया के साथ बाजार से लौट आए थे. मां को इस का आभास तक नहीं हुआ. सारी वारदात से बाबूजी और भैया दोनों अवगत हो चुके थे और मारे क्रोध के दोनों लाल हो रहे थे. सब कुछ अपने तक छिपा कर रख लेने के लिए बाबूजी ने मां को बहुत धिक्कारा. सुधा बाथरूम से निकली तो बाबूजी ने उसे सीने से लगा लिया.

बलात्कार किसी एक के साथ होता है पर मानसिक रूप से इस जघन्य कुकृत्य का शिकार पूरा परिवार होता है. अपनी तेजस्विनी बेटी की बरबादी पर वे अंदर से टूट चुके थे, लेकिन उस के मनोबल को बनाए रखने का प्रयास करते रहे.

सुधा ने बाहर वालों से मिलना या कहीं जाना एकदम छोड़ दिया था. लेकिन पढ़ाई को अपना जनून बना लिया था. भौतिकशास्त्र में बीएसी औनर्स में टौप करने के 2 साल बाद एमएससी में जब उस ने टौप किया तो मारे खुशी के बाबूजी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. 2 महीने बाद उसी यूनिवर्सिटी में लैक्चरर बन गई. सभी कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन शादी से उस के इनकार ने बाबूजी को तोड़ दिया था. एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे, लेकिन सुधा शादी न करने के फैसले पर अटल रही. भैया और दीदी की शादी किसी तरह देख सकी अन्यथा किसी की बारात जाते देख कर उसे कंपकंपी होने लगती थी.

सुधा के लिए जैसा घरवर बाबूजी सोच रहे थे वे सारी बातें उन के परम दोस्त के बेटे रवि में थी. उस से शादी कर लेने में अपनी इच्छा जाहिर करते हुए वे गिड़गिड़ा उठे तो फिर सुधा मना नहीं कर सकी. खूब धूमधाम से उस की शादी हुई पर वह कई वर्षों बाद भी बच्चे का सुख रवि को दे सकी. वह तो रवि की महानता थी कि इतने दिनों तक उसे सहन करते रहे अन्यथा उन की जगह कोई और होता तो कब का खोटे सिक्के की तरह उसे मायके फेंक आया होता.

रवि के जरा सा स्पर्श करते ही मारे डर के उस का सारा बदन कांपने लगता था. उस की ऐसी हालत का सबब जब कहीं से भी नहीं जान सके तो मनोचिकित्सकों के पास उस का लंबा इलाज चला. तब कहीं जा कर वह सामान्य हो सकी थी. रवि कोई वेवकूफ नहीं थे जो कुछ नहीं समझते. बिना बताए ही उस के अतीत को वे जान चुके थे. यह बात और थी कि उन्होंने उस के जख्म को कुरेदने की कभी कोशिश नहीं की.

2 बेटों की मां बनी सुधा ने उन्हें इस तरह संस्कारित किया कि बड़े हो कर वे सदा ही मर्यादित रहे. अपने ढंग से उन की शादी की और समय के साथ 2 पोते एवं 2 पोतियों की दादी बनी.

जीवन से गुजरा वह दर्दनाक मोड़ भूले नहीं भूलता. अतीत भयावह समंदर में डूबतेउतराते वह 12 वर्षीय सुधा बन कर विलख उठी. मन ही मन उस ने एक निर्णय लिया, लेकिन आंसुओं को बहने दिया. दूसरे दिन रिचा की पसंद का खाना ले कर कुछ जल्दी ही नर्सिंगहोम जा पहुंची. समझाबुझा कर मनोज दंपती को घर भेज दिया. 2 दिन से वहीं बैठे बेटी की दशा देख कर पागल हो रहे थे. किसी से भी कुछ नहीं कहने को सुधा ने उन्हें हिदायत भी दे दी. फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ रिचा के सिरहाने जा बैठी.

सुधा को देखते ही रिचा का प्रलाप शुरू हो गया, ‘‘अब मैं जीना नहीं चाहती. किसी को कैसे मुंह दिखाऊंगी?’’

सुधा ने उसे पुचकारते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ वह कोई नई बात नहीं है. सदियों से स्त्रियां पुरुषों की आदम भूख की शिकार होती रही हैं और होती रहेंगी. कोई स्त्री दावे से कह तो दे कि जिंदगी में वह कभी यौनिक छेड़छाड़ की शिकार नहीं हुई है. अगर कोई कहती है तो वह झूठ होगा. यह पुरुष नाम का भयानक जीव तो अपनी आंखों से ही बलात्कार कर देता है. आज तुम्हें मैं अपने जीवन के उस भयानक सत्य से अवगत कराने जा रही हूं, जिस से आज तक मेरा परिवार अनजान है, जिसे सुन कर शायद तुम्हारी जिजिविषा जाग उठे,’’ कहते हुए सुधा ने रिचा के समक्ष अपने काले अतीत को खोल दिया. रिचा अवाक टकटकी बांधे सुधा को निहारती रह गई. उस के चेहरे पर अनेक रंग बिखर गए, बोली, ‘‘तो क्या आंटी मैं पहले जैसा जी सकूंगी?’’

‘‘एकदम मेरी बच्ची… ऐसी घटनाओं से हमारे सारे धार्मिक ग्रंथ भरे पड़े हैं… पुरुषों की बात कौन करे… अपना वंश चलाने के लिए स्वयं स्त्रियों ने स्त्रियों का बलात्कार करवाया है. कोई शरीर गंदा नहीं होता. जब इन सारे कुकर्मों के बाद भी पुरुषों का कौमार्य अक्षत रह जाता है तो फिर स्त्रियां क्यों जूठी हो जाती हैं.

‘‘इस दोहरी मानसिकता के बल पर ही तो धर्म और समाज स्त्रियों पर हर तरह का अत्याचार करता है. सारी वर्जनाएं केवल लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़के छुट्टे सांड़ की तरह होेंगे तो ऐसी वारदातें होती रहेंगी. अगर हर मां अपने बेटों को संस्कारी बना कर रखे तो ऐसी घटनाएं समाज में घटित ही न हों. पापपुण्य के लेखेजोखे को छोड़ते हुए हमें आगे बढ़ कर समाज को ऐसी घृणित सोच को बदलने के लिए बाध्य करना है. जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ और कल तुम यहां से अपने घर जा रही हो. सभी की नजरों का सामना इस तरह से करना है मानो कुछ भी अनिष्ट घटित नहीं हुआ है. देखो मैं ने कितनी खूबसूरती से जीवन जीया है.’’

रिचा के चेहरे पर जीवन की लाली बिखरते देख सुधा संतुष्ट हो उठी. उस के अंतर्मन में जमा वर्षों की असीम वेदना का हिम रिचा के चेहरे की लाली के ताप से पिघल कर आंखों में मचल रहा था. अतीत के गरल को उलीच कर वह भी तो फूल सी हलकी हो गई थी.

Social Story: खुल गई पोल

Social Story, लेखक-  अनूप कुमार सिंह

किशना जब बलजीत प्रधान की चौपाल से उठ कर घर की ओर आ रहा था, तो उस के डगमगाते कदम भी मानो उस का साथ नहीं दे रहे थे, लेकिन वह अपनेआप को दुनिया का सब से खुशनसीब इनसान और बलजीत प्रधान को बड़ा दानदाता समझता था, जो किशना जैसे लोगों को मुफ्त में दारू पिलाता है.

घर पहुंच कर दुलारी को जागती देख कर किशना बोला, ‘‘तू अभी तक सोई नहीं है?’’

‘‘अब तो तेरा इंतजार करने की आदत सी पड़ गई है,’’ दुलारी ने सहज भाव से कहा, ‘‘खाना लगाऊं या खा कर आए हो?’’

‘‘अरे मेरी दुलारो, बलजीत प्रधान इतना खिलापिला देता है कि उस के बाद जरूरत ही नहीं पड़ती. एकदम हीरा आदमी है,’’ किशना ने तारीफ के अंदाज में कहा.

‘‘वह तुझे दारू नहीं जहर पिला रहा है. उस की नजर अपने खेत पर है,’’ तीखी लेकिन दबी आवाज में दुलारी  ने कहा.

‘‘अरे, अगर उसे खेत ही चाहिए तो आज किसी और का नहीं खरीद  सकता है. उस के पास कौन सा पैसे की कमी है,’’ किशना ने दुलारी को डांटते हुए कहा.

‘‘वह हमारा खेत इसलिए चाहता है, क्योंकि वह उस के ट्यूबवैल के पास है. तू इतनी सी बात नहीं समझता… एक न एक दिन मैं उस की नीयत की पोल खोल कर रहूंगी, तब देखना.’’

इस के बाद किशना और दुलारी की कोई बातचीत नहीं हुई. किशना पास बिछी चारपाई पर खर्राटे मारने लगा और दुलारी अतीत की उन यादों में खो गई, जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी.

तब कितनी खुशियां थीं यहां. सभी लोग खेतिहर मजदूर थे, पर इतना कमा लेते थे कि किसी के आगे हाथ फैलाने की कभी नौबत नहीं आती थी.

सुहागरात पर जब सभी दारू के नशे में मस्त थे, तब दुलारी ने शरमा कर किशना से पूछा था, ‘क्या तू भी इन लोगों की तरह दारू पिएगा?’

तब किशना ने दुलारी को अपनी बांहों में भर कर कहा था, ‘जब तुझ में ही इतना नशा है, तो मुझे पीने की क्या जरूरत.’

समय बीतने के साथ खुशी के रूप में जब उन की बेटी बन्नो इस दुनिया में आई, तो किशना को दुलारी की जगह दारू ज्यादा अच्छी लगने लगी, भले ही इस में बलदेव प्रधान का हाथ बहुत ज्यादा था.

भोर की सुबह जब दुलारी अपने खेत पर गई, तो गेहूं की फसल में पानी की जरूरत को देखते हुए वह बलदेव प्रधान के ट्यूबवैल पर चली गई.

उस समय बलदेव प्रधान चारपाई पर लेटा हुआ था और उस का चमचा शंभू उस के पैर दबा रहा था.

दुलारी ने पास पहुंच कर घूंघट की ओट से धीरे से पूछा, ‘‘प्रधानजी, पानी कब मिलेगा?’’

‘‘अरे दुलारी, पानी क्या पूरा ट्यूबवैल तेरा है… बस एक बार मेरी बात मान ले, कसम से तेरी जिंदगी बना दूंगा,’’ अंगड़ाई लेते हुए बलदेव प्रधान  ने कहा.

‘‘क्या ऐसी बातें सब के सामने की जाती हैं…’’ इठलाते हुए दुलारी ने कहा.

‘‘तू इस शंभू की चिंता मत कर. यह तो अपना ही आदमी है,’’ हवस में अधलेटा होते हुए बलदेव प्रधान ने कहा.

‘‘तो ठीक है, आज गहरी रात घर आ जाओ,’’ इतना कह कर हंसते हुए दुलारी वहां से जाने लगी.

‘‘सुनसुन… और तेरा मरद घर पर होगा,’’ बलदेव प्रधान का चमचा  शंभू होशयारी दिखाते हुए बीच में  बोल पड़ा.

इसी के साथ बलदेव प्रधान ने शंभू के सिर पर हलकी सी चपत जमाई और बोला, ‘‘तू इतने दिनों से हमारे साथ है. और इतना भी नहीं जानता कि किशना तो दारू का गुलाम है… दे देंगे दारू की बोतल तो पड़ा रहेगा कहीं भी.’’

घर आ कर दुलारी ने पूरी बात किशना को बताई और बोली, ‘‘मैं कहती थी न कि प्रधान बुरा आदमी है.’’

‘‘अगर ऐसी बात है दुलारी, तो मैं कभी उस के पास नहीं जाऊंगा और न ही दारू को हाथ लगाऊंगा,’’ पछताते हुए किशना ने कहा.

दुलारी चुप रही.

‘‘ठीक है दुलारी, उसे रात में आने दे, अगर लाठी मारमार कर उस को अधमरा न कर दिया तो कहना?’’

‘‘आज तू उस की चौपाल पर जरूर जाना, नहीं तो उस को शक हो जाएगा, लेकिन दारू कम पीना,’’ दुलारी ने समझाते हुए कहा.

आज बलदेव प्रधान किशना का ही इंतजार कर रहा था. उस को आया देख कर दारू की बोतल उस की ओर उछाल कर बोला, ‘‘ले किशना, आज जम कर ऐश कर.’’

पर, आज किशना से दारू गले के नीचे नहीं उतारी गई. वह बोला, ‘‘मैं घर जा कर पिऊंगा.’’

घर आ कर किशना ने बोतल एक ओर रख दी. आज उस के मन में दारू पीने की कोई कसक नहीं हो रही थी.

आज की रात गहराइयों में जा रही थी, लेकिन किशना और दुलारी की आंखों में नींद नहीं थी. तभी उन के मिट्टी से बने घर से ‘धपाक’ की आवाज आई. शायद दीवार की कुछ मिट्टी नीचे गिरी थी.

किशना आवाज की तरफ ‘चोरचोर’ की आवाज लगाता हुआ भागा और कंबल डाले हुए एक साए को कई डंडे धर दिए.

अचानक हुए हमले से साए को भी संभलने का मौका नहीं मिला. इधर दुलारी और किशना की आवाज सुन कर आसपास के लोग भी वहां आ गए.

कंबल डाले वह साया गली में भाग रहा था. किशना और महल्ले के लोग उसे खदेड़ रहे थे, तभी गली के उस छोर से बलदेव प्रधान का चमचा शंभू दारू के नशे में लड़खड़ाता हुआ चला आ रहा था. अपनी ओर आ रहे साए को देख कर वह बोला, ‘‘अरे प्रधानजी आप…’’

अब बलदेव प्रधान ने कंबल  एक ओर फेंक कर शंभू से कहा, ‘‘बुड़बक, तू ने तो सारी पोल खोल कर ही रख दी…’’

Social Story: नो गिल्ट ट्रिप प्लीज

Social Story: नेहा औफिस से निकली तो कपिल बाइक पर उस का इंतज़ार कर रहा था. वह इठलाती हुई उस की कमर में हाथ डाल कर उस के पीछे बैठ गई फिर मुंह पर स्कार्फ बांध लिया.

कपिल ने मुसकराते हुए बाइक स्टार्ट की. सड़क के ट्रैफिक से दूर बाइक पर जब कुछ खाली रोड पर निकली तो नेहा ने कपिल की गरदन पर किस कर दिया. कपिल ने सुनसान जगह देख कर बाइक एक किनारे लगा दी. नेहा हंसती हुई बाइक से उतरी और  कपिल ने जैसे ही हैलमेट उतार कर रखा, नेहा ने कपिल के गले में बांहें डाल दीं. कपिल ने भी उस की कमर में हाथ डाल उसे अपने से और सटा लिया. दोनों काफी देर तक एकदूसरे में खोए रहे.

उतरतीचढ़ती सांसों को काबू में करते हुए नेहा बोली,” सुनो, अभी मेरे घर चलना चाहोगे?”

”क्या?” कपिल हैरान हो गया.

”हां, घर पर कोई नहीं है, चलो न.”

”तुम्हारे मम्मीपापा कहां गए?”

”किसी की डैथ पर अफसोस करने गए हैं, रात तक आएंगे.”

”तो चलो, फिर हम देर क्यों कर रहे हैं? मैं तो अभी से सोच कर मरा जा रहा हूं कि क्या हम सचमुच अभी वही करने जा रहे हैं जो हम 15 दिनों से नहीं कर पाए. यार, रूड़की में जगह ही नहीं मिलती. पिछली बार मेरे घर पर कोई नहीं था, तब मौका मिला था.”

”चलो अब, बातें नहीं कुछ और करने का मूड है अभी.”

कपिल ने बड़े उत्साह से बाइक नेहा के घर की तरफ दौड़ा दी. रास्ते भर मुंह पर स्कार्फ बांधे नेहा कपिल की कमर में बाहें डाल उस से लिपटी रही. दोनों युवा प्रेमी अपनीअपनी धुन में खोए हुए थे.

दोनों का अफेयर 2 साल से चल रहा था. दोनों का औफिस एक ही बिल्डिंग में था. इसी बिल्डिंग में कभी कैफेटैरिया में, तो कभी लिफ्ट में मिलते रहने से दोनों की जानपहचान हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को देखते ही पसंद कर लिया था.

नेहा की बोल्डनैस पर कपिल फिदा था तो कपिल के शांत व सौम्य स्वभाव पर नेहा मुग्ध हो गई थी. इन 2 सालों में दोनों पता नहीं कितनी बार शारीरिक रूप से भी पास आ गए थे. नेहा लाइफ को खुल कर जीना चाहती थी. कई बार तो कपिल उस के जीने के ढंग को देख कर हैरान रह जाता.

नेहा के घर में उसके पेरैंट्स थे. दोनों कामकाजी थे. छोटा भाई कालेज में पढ़ रहा था. कपिल अपने पेरैंट्स की इकलौती संतान था. उस की मम्मी हाउसवाइफ थी. कपिल के पिता रवि एक बिल्डर थे. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी.

कपिल ने अपने घर में नेहा के बारे में बता दिया था. नेहा को बहू बनाने में कपिल के पेरैंट्स को कोई आपत्ति  नहीं थी. नेहा कपिल के घर भी आतीजाती रहती पर नेहा के घर में कपिल के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था.

हमेशा की तरह कपिल ने नेहा की बिल्डिंग से कुछ दूर एक शौपिंग कौंप्लैक्स की पार्किंग में बाइक खड़ी की. पहले नेहा अपने घर गई. थोड़ी देर बाद कपिल उस के घर पहुंचा. पहले भी घर पर किसी के न होने का  दोनों ने भरपूर फायदा उठाया था.

घर में अंदर जाते ही कपिल ने अपना बैग एक तरफ रख नेहा को बांहों में भर लिया. उस पर अपने प्यार की बरसात कर दी. नेहा ने उस बरसात में अपनेआप को पूरी तरह भीग जाने दिया. प्यार की यह बरसात नेहा के बैड पर कुछ देर बाद ही रुकी.

कपिल ने कहा,”यार, अब तुम्हारे बिना रहा नहीं जाता, चलो न, शादी कर लेते हैं. देर क्यों कर रही हो?”

नेहा ने अपने बोल्ड अंदाज में कहा,”शादी के लिए क्यों परेशान हो?, जो बाद में करना है अभी कर ही रहे हैं न.”

‘अरे ,ऐसे नहीं, अब चोरीचोरी नहीं, खुल कर अपने घर में तुम्हारे साथ रहना है.”

”पर मेरा मूड शादी का नहीं है, कपिल.”

”कब तक इंतजार करवाओगी?”

”पर मैं ने तो यह कभी नहीं कहा कि मैं तुम से शादी जल्दी ही करूंगी.”

”पर मैं तो तुम से ही करूंगा, मैं तुम्हारे बिना जी ही नहीं सकता, नेहा. मैं ने सिर्फ तुम से ही प्यार किया है.”

”ओह, कपिल,” कहते हुए नेहा ने फिर कपिल के गले में बांहें डाल दीं, कहा, ”चलो, अब तुम्हे फिर कौफी पिलाती हूं.”

दोनों ने कौफी भी काफी रोमांस करते हुए पी. कपिल थोड़ी देर बाद चला गया. हर समय टच में रहने के लिए व्हाट्सऐप था ही.

यह दोनों का रोज का नियम था कि कपिल ही नेहा को उस के घर छोड़ कर जाता. कपिल ने घर जा कर साफसाफ बताया कि वह नेहा के साथ था.

उस की मम्मी सुधा ने कहा,” बेटा, तुम दोनों शादी क्यों नहीं कर रहे हो? अब दोनों ही अच्छी नौकरी भी कर रहे हो, तो देर किस बात की है?”

”मम्मी, अभी नेहा शादी नहीं करना चाहती.”

”फिर कब तक करेगी ?उस के पेरैंट्स क्या कहते हैं?”

”कुछ नहीं,मम्मी. अभी तो उस ने अपने घर में हमारे बारे में बताया ही नहीं.”

”यह क्या बात हुई ?”

”छोड़ो मम्मी, जैसा नेहा को ठीक लगे. वह शायद और टाइम लेना चाहती है.”

”बेटा, एक बात और मेरे मन में है. क्या तुम उस से निभा लोगे? वह काफी बोल्ड लड़की है, तुम ठहरे सीधेसादे.”

”मम्मी, वह आज की लड़की है. आज की लड़कियां आप के टाइम से थोड़ी अलग होती हैं. नेहा बोल्ड है मगर गलत नहीं. आप चिंता न करो वह शायद कुछ और रुकना चाहती है.”

“पर मुझे लगता है अब तुम सीरियसली शादी के बारे में सोचो.”

”अच्छा ठीक है मम्मी, उस से बात करता हूं.”

2 दिन बाद ही नेहा ने कपिल से कहा,”यार, लौटरी लग गई, मेरा भाई दोस्तों के साथ पिकनिक पर जा रहा है और मेरे चाचा की तबीयत खराब हो गई है. मेरे मम्मीपापा उन्हें देखने दिल्ली जा रहे हैं. चलो, अब तुम भी अपने घर बोल दो कि तुम भी टूर पर जा रहे हो. दोनों औफिस से छुट्टी ले कर जम कर घर पर ऐश करेंगे.”

”सच?”

”लाइफ ऐंजौय करेंगे, यार. आ जाओ, खाना बाहर से और्डर करेंगे. बस सिर्फ ऐश ही ऐश.”

कपिल नेहा को दिलोजान से चाहता था. जैसा उस ने कहा था कपिल ने वैसा ही किया. वह अपने घर पर टूर पर जाने की बात बता कर नेहा के घर रात गुजारने के लिए अपने कपङे वगैरह ले कर आ गया. दोनों ने जीभर कर रोमांस किया. जब मन हुआ पास आए, एकदूसरे में खोए रहे.

कपिल ने कहा,”यार, तुम्हारे साथ ये पल ही मेरा जीवन हैं. अब तुम हमेशा के लिए मेरी लाइफ में जल्दी आ जाओ. अब मैं नहीं रुक सकता बोलो, कब मिला रही हो अपने पेरैंट्स से?”

नेहा ने प्यार से झिड़का,”तुम क्या यह शादीशादी करते रहते हो? शादी की क्या आफत आई है? और मैं तुम्हें कितनी बार बता चुकी हूं कि मेरा मूड शादी करने का नहीं है.”

अब कपिल गंभीर हुआ,”नेहा, यह क्या कहती रहती हो? मेरी मम्मी बारबार मुझे शादी करने के लिए कह रही हैं और हम रूक क्यों रहे हैं ?”

नेहा ने अब शांत पर गंभीर स्वर में कहा ,”देखो, मैं अभी काफी साल शादी के बंधन में नहीं बंधने वाली. अभी मैं सिर्फ 26 साल की हूं और लाइफ ऐंजौय कर रही हूं.”

”पर मैं 30 का हो रहा हूं. आज नहीं तो कल हमें शादी करनी ही है. एकदूसरे के इतने करीब हैं तो चोरीचोरी कब तक क्यों मिलें?”

”यह मैं ने कब कहा कि आज नहीं तो कल हम शादी कर ही रहे हैं?”

”मतलब ?”

”देखो, कपिल अब तक मैं ने तुम्हें अपने पेरैंट्स से इसलिए नहीं मिलवाया क्योंकि अरैंज्ड मैरिज तो हमारी होगी नहीं क्योंकि हम अलगअलग जाति के हैं. मेरे पेरैंट्स ठहरे पक्के पंडित और तुम हम से नीची जाति के. अभी इस उम्र में जाति को ले कर मुझे टैंशन चाहिए ही नहीं. हम प्यार, रोमांस सैक्स सब कुछ तो ऐंजौय कर रहे हैं, तुम शादी के पीछे क्यों पड़े हो? शादी तो अभी दूरदूर तक मैं नहीं करने वाली.”

”क्या तुम मुझे प्यार नहीं करतीं?”

”करती तो हूं.”

”फिर तुम्हारा मन नहीं करता कि हम दोनों एकसाथ रहने के लिए शादी कर लें?”

‘नहीं, यह मन तो नहीं करता मेरा.”

”अच्छा बताओ, कितने दिन रुकना चाहती हो, मैं तुम्हारा इंतजिर करूंगा.”

”मुझे नहीं पता.”

कपिल कुछ गंभीर सा बैठ गया तो नेहा ने शरारती अंदाज में मस्ती शुरू कर दी. कहा,”मैं तुम्हें फिर कहती हूं कि शादी की रट छोड़ो, लाइफ को ऐंजौय करो.”

”मतलब तुम मुझ से शादी नहीं करोगी?”

”नहीं.”

”मैं समझ ही नहीं पा रहा, नेहा यह सब क्या है? तुम 2 साल से मेरे साथ रिलैशनशिप में हो, पता नहीं कितनी बार हम ने सैक्स किया होगा और तुम कह रही हो कि मुझ से शादी नहीं करोगी?”

“सैक्स कर लिया तो कौन सा गुनाह कर लिया? हम एकदूसरे को पसंद करते थे और करीब आ गए. अच्छा लगा. इस में शादी कहां से आ गई?”

”तो शादी कब और किस से करने वाली हो ?”

”अभी तो कुछ भी नहीं पता. मैं यह सोच कर तुम से सैक्स थोड़े ही कर रही थी कि तुम से ही शादी करूंगी. कपिल, अब वह जमाना गया जब कोई लड़की किसी लङके को इसलिए अपने पास आने देती थी कि उसी से शादी करेगी. ऐसा कुछ नहीं है अब. कम से कम मैं ऐसा नहीं सोचती. अभी मैं लाइफ ऐंजौय करने के मूड में हूं. अभी गृहस्थी संभालने का मेरा कोई मूड नहीं. तुम भी अब यह शादी शादी की रट छोड़ दो और ऐंजौय करो.”

”नहीं… नेहा मैं इस रिश्ते को कोई नाम देना चाहता हूं.”

नेहा अब झुंझला गई,” तो कोई ऐसी लड़की ढूंढ़ लो जो तुम से अभी शादी कर ले.”

कपिल ने भावुक हो कर उस का हाथ पकड़ लिया,”ऐसा कभी न कहना नेहा. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता.”

”अरे, सब कहने की बातें हैं. रोज हजारों दिल जुड़ते हैं और हजारों टूटते हैं. सब चलता रहता है.”

कपिल की आंखों में सचमुच नमी आ गई. यह नमी गालों पर भी बह गई  तो नेहा हंस पड़ी,” यह क्या कपिल, इतना इमोशनल क्यों हो यार… रिलैक्स.”

”कभी मुझ से दूर मत होना, नेहा. आई रियली लव यू , कहतेकहते कपिल ने उसे बांहों में भर कर किस कर दिया. नेहा भी उस के पास सिमट आई. थोड़ी देर रोमांस चलता रहा.

काफी समय दोनों ने साथ बिता लिया था. अगले दिन कपिल घर जाने लगा तो नेहा ने कहा,”कपिल, बी प्रैक्टिकल.”

कपिल ने उसे घूरा तो वह हंस पड़ी और कहा ,”प्रैक्टिकल होने में ही समझदारी है. इमोशनल हो कर मुझे गिल्ट ट्रिप पर भेजने की कोशिश मत करो.”

कुछ दिन तो सामान्य से कटे , फिर कपिल ने महसूस किया कि नेहा उस से कटने लगी है. कभी फोन पर कह देती,”तुम जाओ, मेरी कुछ जरूरी मीटिंग्स हैं, देर लगेगी. कभी मिलती तो जल्दी में होती. बाइक पर कभी साथ भी होती तो चुप ही रहती. पहले की तरह बाइक पर शरारतों भरा रोमांस खत्म होने लगा. दूरदूर अजनबी सी बैठी रहती. कपिल के पूछने पर औफिस का स्ट्रैस कह देती.कपिल को साफ समझ आ रहा था कि वह उस से दूर हो रही है. फोन भी अकसर नहीं उठाती और कुछ भी बहाना कर देती.

एक दिन कपिल ने बाइक रास्ते में एक सुनसान जगह पर रोक दी और पूछा,”नेहा, मुझे साफसाफ बताओ कि तुम मुझ से दूर क्यों भाग रही हो ? मुझे तुम्हारा यह अजनबी जैसा व्यवहार बरदाश्त नहीं हो रहा है.”

नेहा ने भी अपने मन की बात उस दिन साफसाफ बता दी,” कपिल, तुम बहुत इमोशनल हो. हमारे अभी तक के संबंधों को शादी के रूप में देखने लगे हो. मेरा अभी दूरदूर तक शादी का इरादा नहीं है. अभी तो मुझे अपने कैरियर पर ध्यान देना है. मैं शादी के झमेले में अभी नहीं फंसना चाहती. तुम्हारी शादी की चाहत से मैं बोर होने लगी हूं और शायद तुम जैसे इमोशनल इंसान के साथ मेरी ज्यादा निभे भी न, तो समझो कि मैं तुम से ब्रैकअप कर रही हूं.”

कपिल का स्वर भर्रा गया,”ऐसा मत कहो, नेहा. मैं तुम्हारे बिना जीने की सोच भी नहीं सकता.”

”अरे ,यह सब डायलाग फिल्मों के लिए रहने दो. कोई किसी के बिना नहीं मरता. चलो, आज लास्ट टाइम घर छोड़ दो अब ऐंड औल द बैस्ट फौर योर फ्यूचर. एक अच्छी लड़की ढूंढ़ कर शादी कर लो. और हां, मुझे भी बुला लेना, मैं भी आउंगी. मुझे कोई गिल्ट नहीं है और मैं उन में से भी नहीं जो अपने प्रेमी को किसी और का होते न देख सकूं, ”कह कर नेहा जोर से हंसी.

कपिल ने उसे किसी रोबोट की तरह उस के घर तक छोड़ दिया.

“बाय, कपिल कह कर इठ लाती हुई नेहा अपने घर की तरफ चली गई. नेहा ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा. कपिल नेहा को तब तक देखता रहा जब तक वह उस की आंखों से ओझल न हो गई.

कपिल वापसी में रोता हुआ बाइक चलाता रहा. वह सचमुच नेहा से प्यार करता था. उस के बिना जीने की वह कल्पना ही नहीं कर पा रहा था.

लुटापिटा, हारा सा घर पहुंचा. उस की शक्ल देख कर उस की मम्मीपापा घबरा गए. वह खराब तबीयत का बहाना बता कर अपने कमरे में 2 दिन पड़ा रहा तो सब को चिंता हुई. न कुछ खापी रहा था और न ही कुछ बोल रहा था.

उस की मम्मी सुधा ने उस के एक दोस्त सुदीप को बुलाया. सुदीप उस के और नेहा के संबंधों के बारे में जानता था. सुदीप ने काफी समय कपिल के पास बैठ कर बिताया. कपिल कुछ बोल ही नहीं रहा था, पत्थर सा हो गया था. दीवानों सी हालत थी. बहुत देर बाद सुदीप के कुछ सवालों का जवाब उस ने रोते हुए दे कर बता दिया कि नेहा ने उसे छोड़ दिया है. सुदीप देर तक उसे समझाता रहा.

अगले दिन की सुबह घर में मातम ले कर आई. कपिल ने रात में हाथ की नस काट कर आत्महत्या कर ली थी. एक पेपर पर लिख गया था ,”सौरी मम्मी, मुझे माफ कर देना. नेहा ने मुझे छोड़ दिया है. मैं उस के बिना नहीं जी पाउंगा. पापा, मुझे माफ कर देना.”

मातापिता बिलखते रहे. सुदीप पता चलने पर बदहवास सा भागा आया. जोरजोर से रोने लगा. बड़ी मुश्किल घङी थी. सुधा बारबार गश खाती और कहती कि क्या एक लड़की के प्यार में हमें भी भूल गया? हमारा अब कौन है? पडोसी, रिश्तेदार सब इकठ्ठा होते रहे. सब ने रमेश और सुधा को बहुत मुश्किल से संभाला. दोनों को कहां चैन आने वाला था. सुदीप को नेहा पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

एक शाम वह नेहा के औफिस की बिल्डिंग के नीचे खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. वह निकली तो उस ने अपना परिचय देते हुए उसे कपिल की आत्महत्या के बारे में बताया तो नेहा ने एक ठंडी सांस ले कर कहा ,”दुख जरूर हुआ मुझे पर गिल्ट फील करवाने की जरूरत नहीं है. वह कमजोर था , मेरी सचाई के साथ कही बात को सहन नहीं कर पाया तो मेरी गलती नहीं है. उस की आत्महत्या के लिए मैं खुद को दोषी बिलकुल नहीं समझूंगी. मुझे गिल्ट ट्रिप मत भेजो, ओके…” कहते हुए वह सधे कदमों से आगे बढ़ गई. सुदीप हैरानी से उसे देखता रह गया.

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