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Hindi Story: बैंगन नहीं टैंगन – इशिता और मधु का क्या रिश्ता था

Hindi Story: मधु को देख इशिता चौंक गई. अभी बमुश्किल 6 महीने ही हुए होंगे, जब वह पहली बार उस से मिली थी. झारखंड के एक छोटी सी जगह गुमला से सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वह जिद कर के घर से आई थी. चेहरे से टपकते भोलेपन ने उस का मन मोह लिया था. पढ़ाई के प्रति उस की लगन और जज्बे ने सोने पर सुहागे का काम किया था, उस की इमेज को इशिता के दिल में जगह बनाने में.

काश, ये भोलापन और मासूमियत महानगर की भीड़ में अपना चेहरा न बदल ले. पर, उस की शंका निर्मूल साबित नहीं हुई. मधु की बदली वेशभूषा और नई बोली उस का नया परिचय दे रही थी.

इशिता को आज उस के बैच की कक्षा लेनी थी. उन्होंने देखा कि पढ़ाई के मामले में वह अब भी गंभीर ही थी… और यह बात उसे सुकून दे रही थी.

वर्षों से वह कोचिंग सैंटर में पढ़ा रही थी और उसे दुख होता था उन लड़कियों को देख कर, जो अपनेअपने गांवकसबे या शहरों से यहां आ कर यहां की चकाचौंध में खो जाती थीं.

ऊंचे ख्वाबों की गठरी कुछ ही दिनों के बाद, यहां की जिंदगी को अपनाने के चक्कर में बिखर जाते थे, अपनी हीनभावना से लड़ते हुए, अपने को पिछड़ेपन की तथाकथित गर्त से निकालने के फेर में वे और गहरी डूबती चली जातीं.
नकल में अक्ल पर बेअक्ल का परदा डाल ये कसबाई लड़कियां वो सब करने को तैयार हो जाती थीं, जो उन्हें गंवार के टैग से आजादी दे.

इशिता ने मधु को अपने पास बुलाया और उस का हालचाल लेने लगी. बातों ही बातों में पता चला कि अब वह अपने गर्ल्स पीजी से आजाद हो कर एक फ्लैट में किसी लड़के के साथ रहने लगी है, जो उस की तरह ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है.

“मैडम अपूर्व बहुत तेज है पढ़ने में, उस के साथ रही तो जरूर कंपीटिशन निकाल लूंगी. फिर इस महानगर में कोई तो ऐसा हो, जिस के साथ सुरक्षित महसूस हो.”

मधु की बातों से उस का नवजागृत आत्मविश्वास छलका जा रहा था.

‘सचमुच बहुत तरक्की कर ली है इस ने,‘ मैडम इशिता ने समझ लिया. उन्हें याद आया, उन की नानी कहती थीं कि गरीब घर की लड़की की जब बड़े घरों में शादी हो जाती है, तो उन में एक ऐंठन आ जाती है और हर चीज में अपनी अधजल गगरी छलकाएंगी.

“ओह, आप इसे बैंगन कहती हैं. हमारे यहां इसे टैंगन कहते हैं.‘‘

मधु की बातें इशिता मैडम को कुछ ऐसी ही लग रही थीं, जो अब बेशर्मी से लिव इन की वकालत कर रही थी यानी बैंगन टैंगन हो ही चुका था.

देश के दूरदराज के गांवकसबों से कभी पढ़ाई तो कभी अच्छे मौकों की तलाश में युवा महानगरों का रुख करते हैं. इस में कई बार सिर्फ कसबाई माहौल से पलायन भी कारण होता है. बड़े शहरों में भले अब तक नहीं रही हों, पर उन्हें अपनी इच्छाओं और हकों की पूरी जानकारी होती है. वहां की बंदिशों से आजाद होने की कसमसाहट उन्हें महानगरों की तरफ उन्मुख करती है.

विभिन्न संस्थानों से पढ़ाई के पश्चात भी युवाओं की एक बड़ी तादाद शहरों में नौकरी करने आती है, जो शुरुआती संकोच के बाद बेहिचक यहां के रंगढंग में ढल जाती है. घरपरिवार, कालेजों की हजारों बंदिशों के बाद यहां की आजादी में वे कुछ ज्यादा ही रम जाते हैं. छोटी जगहों के विपरीत महानगरों में कोई किसी की निजी जिंदगी में टोकाटोकी नहीं करता है और न ही कोई जानपहचान या खास रिश्तेदारी की कोई जासूसी.

सो, शहर की ओर उन्मुख करते वो सारी वर्जनाएं टूटने लगती हैं, जो अब तक संकुचन में जी रहे थे. यों भी भोलेपन या सीधेपन पर गांवदेहात या कसबे का अब एकाधिकार नहीं रहा है. इस इंटरनेट और ओटीटी के युग
में सभी समय पूर्व ही परिपक्व हो रहे हैं, फिर वह गांव हो या शहर.

मधुरा पढ़ने में अच्छी थी, उस ने कैम्पस में रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. उस की पहली पोस्टिंग बेंगलुरू हुई. बिहार के एक छोटे से शहर सिवान से उस के पिता उसे बेंगलुरू में कुछ दिन रह कर उस की अन्य सहेलियों के साथ रहने का इंतजाम कर वापस चले आए. पर, पिता के वापस लौटते ही मधुरा अपने कैम्पस के एक दोस्त अंगद के साथ रहने लगी. दोनों के दोस्तों को उन के लिव इन रिलेशन का हमेशा पता रहा. दिखावे के लिए शेयरिंग फ्लैट को उस ने हमेशा रखा, पर रहती रही अंगद के संग. दोस्तों के आश्चर्य की सीमा नहीं रही थी, जब 5 साल के बाद एक दिन मधुरा ने बताया कि उस की शादी एक सजातीय एनआरआई से हो रही है. मेरे पिता बहुत ही संकीर्ण हैं. वे अंगद से मेरी शादी कभी नहीं करेंगे.

यह सुन कर अंगद के पैरों तले जमीन खिसक गई उस की इस बेवफाई से. हद तो तब हो गई, जब उस ने अपनी शादी में अंगद को स्पेशल न्योता दे कर बुलाया और अपने पति से बेहद सहजता से परिचय भी कराया. शायद उसे ये हमेशा से पता था, पर वह अंगद के संग प्रेम कर जीवन को एक अलग अंदाज में जीती रही.

गांवदेहात की सारी लड़कियां पाबंदी या बंदिशों में नहीं जीती हैं अब, बल्कि वे भी शहरी लड़कियों की ही तरह अपने खास अंदाज में अपनी आजादी का लुत्फ उठाती हैं. शहरी उच्छृंखलता सिर्फ महानगरों तक अब सीमित
नहीं हैं, उन की पैठ अंदरूनी दूरदराज जगहों तक हो गई है. विचारों, संस्कारों की बेड़ियां टूटती दिख रहीं हैं. बदलाव ही एकमात्र स्थायी चरित्र होता है, पर ध्यान रहे कि ये बदलाव देश, समाज और परिवार के हित में ही रहे.

स्त्री आजादी आर्थिक स्वावलंबन पर ही टिकी होती है, ये भान रहे. आधुनिक होने का मतलब सिर्फ स्थापित धारणाओं का खंडन ही नहीं होता है, अपितु समाज, परिवार में संतुलन बना रहे और विचारों का उन्नयन होता रहे, ये आवश्यक है.

ऊपर वर्णित उदाहरण सिर्फ खुदगर्जी ही प्रस्तुत कर रहे हैं, जहां अपनी जड़ों से कटने की बेताबी झलक रही है. ये चंद उदाहरण ये भी इंगित कर रहे हैं कि वो जमाना बीत गया, जब सिर्फ लड़कियां ही शोषित होती थीं. हां, अब भी ऐसे उदाहरण कम ही हैं और 90 फीसदी केस में अब भी लड़कियां ही शिकार बनती हैं.

विदेशी संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाते हुए अपनी संस्कृति की उच्च परंपरागत सोच की निरंतरता को भी बनाए रखना जरूरी है. Hindi Story

Story In Hindi: छाया – वृंदा और विनय जब बन गए प्रेम दीवाने

Story In Hindi: ‘‘तुम में इतना धैर्य कहां से आ गया. 2 दिन हो गए एक फोन भी नहीं किया,’’ विनय झल्लाहट दबा कर बोला.‘‘नारी का धैर्य तुम ने अभी देखा ही कहां है. वैसे भी मैं तुम्हारे साथ थी भी कहां. बस, एक भीड़ का हिस्सा थी,’’ वृंदा का स्वर शांत था.

‘‘क्या मतलब है. ऐसे कैसे कह सकती हो. परसों मिले थे तो कोई लड़ाईझगड़ा नहीं हुआ था. मैं ने तुम्हें कुछ कहा भी नहीं जिस से तुम्हें गुस्सा आए.’’

‘‘कहने की जरूरत नहीं होती. पिछले 6 महीने से तुम लगातार मुझे अनदेखा करते आ रहे हो और मैं हमेशा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचती रहती हूं. परसों भी अपनी किसी न किसी महिला मित्र से तुम फोन पर बात करते रहे, मानो मैं तुम्हारे साथ थी ही नहीं.’’

‘‘वह तो मेरी लाइन ही ऐसी है.’’‘‘पर मैं तो पूरी तरह तुम्हारे सुखदुख में भागीदार बन कर समर्पित रही. जब भी तुम्हें कोई काम पड़ा तुम मुझे कह देते और तुम्हारा वह काम करते हुए मुझे लगता कि मैं प्यार के लिए अपना फर्ज निभा रही हूं.’’

‘‘यार, ऐसा कुछ भी नहीं है. अच्छा तुम कल मिलो. ये बेकार की बातें हैं, इन्हें दिमाग से निकालो. कुछ भी नहीं बदला है.’’‘‘अभी आफिस में काम है, फिर बात करेंगे,’’ कह कर वृंदा मोबाइल औफ करती हुई दफ्तर में लौट आई.

अपनी कुरसी पर बैठी वृंदा सोचने लगी कि इसी विनय ने 2 साल पहले शुरुआती दौर में कितनी कोशिश कर के उस से संपर्क बढ़ाया था. नौकरी लगने के बाद जब वृंदा ने अपनी कहानी छपवाई तो उस को लगा था कि वह हवा में उड़ रही है. पहली ही कहानी किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छप जाए और प्रशंसा के सैकड़ों पत्र मिलें तो मन तो उड़ेगा ही.

बाद में उस की कुछ और कहानियां छपीं तो कुछ पाठकों के फोन भी आने लगे. कुछ तो प्रशंसा के बहाने अपनी रचना पढ़ने का अनुरोध कर देते. कुछ छपी कहानी की समीक्षा विस्तार से करते.उन्हीं प्रशंसकों में से एक विनय भी था. किसी भी अखबार में वृंदा का कुछ छप जाता तो सब से पहले उस का फोन आता.

एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘आप क्या हर महिला लेखिका को फोन करते हैं? मेरे अलावा दूसरे लेखकों को भी पढ़ते हैं क्या?’‘मैडम, मैं पत्रकार हूं. साहित्यिक पृष्ठ मैं ही तैयार करता हूं. बाकी पत्रपत्रिकाओं में क्या जा रहा है उस की पूरी जानकारी मुझे रहती है.’

‘क्या आप मेरी कहानियों को संभाल कर रखते हैं?’ वृंदा ने झिझकते हुए पूछा.‘मैं आप का जबरदस्त प्रशंसक हूं. बताइए, क्या सेवा है.’‘आप के यहां से प्रकाशित पत्रिका के पिछले अंक में मेरी एक कहानी छपी है. उस की एक भी प्रति मेरे पास नहीं है. क्या आप एक प्रति भिजवा देंगे. शायद पोस्टमैन ने रख ली होगी.’

और अगले दिन विनय मेरे आफिस के रिसेप्शन पर बैठा था. हम दोनों चाय पीने के लिए पास के रेस्तरां में बैठे तो विनय का फोन बारबार बज उठता.‘किसी मित्र का फोन है क्या? सुन लो.’

‘नहीं, बड़ी मुश्किल से आप से मिलना हो पाया है. बाद में फोन सुन लूंगा. मुझे आप की कहानियां सच में बहुत अच्छी लगती हैं और प्रभावित भी करती हैं. बाकी लेखिकाएं नारी विमर्श के नाम पर मीडिया से जुड़ा जो कुछ लिख रही हैं वह पढ़ा नहीं जाता है.’

‘मुझे भी लगता है कि नारी आंदोलन को व्यवसाय बना लिया गया है. ऐसी औरतें नारी मुक्ति का झंडा उठाए हुए हैं जो खुद कब की आजाद हो चुकी हैं.’

‘आप समाज के सभी पात्रों को लेती हैं. हमारे परिवार के ढांचे को तोड़ने वाले साहित्य का क्या फायदा. कुछ लेखिकाएं ‘लिव इन रिलेशन’ को मुद्दा बना कर लिख रही हैं तो कुछ कई पुरुषों के साथ यौन संबंधों पर. हम कह सकते हैं कि आपस में वादा और विश्वास होने की बातें कहीं खोती जा रही हैं.’

‘ये तथाकथित लेखिकाएं महिलाओं के किस वर्ग को चित्रित कर रही हैं. इन की चकाचौंध में समस्याओं का सामना करने वाली निम्न और मध्यम वर्ग की महिलाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता,’ वृंदा जोश में बहती जा रही थी.

‘मैडम, आज मेरा इंटरव्यू है. अब निकलता हूं. अब तो आप से मिलना- जुलना होता ही रहेगा,’ यह कह कर विनय फटाफट चला गया.फिर तो वृंदा को मानो बात करने के लिए बेहद सुलझा हुआ अपनी तरह की सोच वाला साथी मिल गया. घर और आफिस के बंधेबंधाए ढांचे में सामाजिक चर्चाओं के लिए कोई भी नहीं था. पर विनय के साथ चर्चाओं का दायरा जल्दी ही टूट गया. बौद्धिक चर्चाएं स्त्रीपुरुष के परस्पर आकर्षण पर आ कर रुक गईं. साहित्य जीवन से ही तो बना है. मगर विनय फ्रीलांसर था. इसलिए उस ने साफ कह दिया कि कहीं पक्की नौकरी लगने तक उसे शादी के लिए रुकना होगा.

विनय ने भी हिंदी और अंगरेजी साहित्य पढ़ा था. पर उसे सरकारी नौकरी से चिढ़ थी. पत्रकार को जो आजादी है, वह और किस को है. फिर पावर भी तो है. सत्ता के साए में रहने वाले बड़ेबड़े लोगों से मिलने और बात करने का मौका जिस सहजता से एक पत्रकार को मिलता है वह दूसरों को कहां मिलता है. विनय को एक न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो उस का व्यक्तित्व निखर गया और उसी के साथ उस के संपर्क बढ़ते जा रहे थे.

उस दिन लंच में वे दोनों पार्क में बैठे थे तो विनय फोन सुनने लगा. ग्रुप के मित्रों की आपसी खटपट को ले कर वह नीता से 20 मिनट तक बात करता रहा. धीरेधीरे अलगअलग नामों के फोन आने लगे. विनय फोन काटता तो तुरंत एसएमएस आ जाता. वृंदा के साथ होने पर भी विनय का ध्यान दूर जाने लगा था.

वृंदा को विनय अपने कामों में उलझाए रखता. कभी समीक्षा के लिए लाइब्रेरी से किताब मंगाता तो कभी कोलकाता में अपने घर जाने के लिए रेल का आरक्षण कराने के लिए वृंदा को कह देता. वह लंच में आधाआधा घंटा उस का इंतजार करती रहती और जब विनय आता तो फोन पर कोई न कोई डिस्टर्ब करता रहता.

धीरेधीरे वृंदा को लगने लगा कि वह प्यार किसे करती है विनय को या प्यार की धारणा को. जो आदमी अभी से कई लोगों में बंटा है, शादी के बाद उस से कैसे निष्ठा की उम्मीद की जा सकती है. फिर तो पूरा परिवार और समाज बीच में आ जाएगा. कभी वह विनय को टोकती तो कह देता, ‘तुम्हारा वहम है. वह मेरी महिला मित्र है. सब से काम पड़ता है. फिर हमारा दायरा ऐसा है जिस में पीनेपिलाने के लिए पार्टीज चलती ही रहती हैं.’

‘मुझे इन्हीं से चिढ़ है. जहां तक शराब की बात है तो हमारे यहां इसे कोई पसंद नहीं करता. फिर औरतों का शराब पीना तो हम सोच भी नहीं सकते.’

‘तुम अपनी मध्यवर्गीय सोच से बाहर निकलो. सब की अपनीअपनी जिंदगी है. मैं तो कम ही पीता हूं पर ग्रुप में कुछ लोग मुफ्त की देख कर इतनी पी लेते हैं कि उन के लिए घर लौटना मुश्किल हो जाता है.’

‘देखो विनय, अगर तुम शराब नहीं छोड़ोगे तो हम शादी भी नहीं कर सकते हैं.’

‘रहना तो मुझे पत्रकारिता की दुनिया में ही है. तुम अपने मातापिता को समझाओ न कि शायद पीने वाला हर आदमी बुरा नहीं होता है.’

‘मुझे मत समझाओ. मैं ने शादियों में शराब पी कर लोगों को हुड़दंग करते देखा है. बीवी को पीटते लोग भी देखे हैं. हमारे एक रिश्तेदार की मौत शराब पीने के बाद छत से गिर कर हो गई थी. जब मैं ही तुम से कनविंस नहीं हो पा रही हूं तो मम्मीपापा को कैसे करूं. हम दोनों की जिंदगी और हमारे मूल्यांकन का तौर- तरीका बिलकुल अलग है. जो चीज तुम्हें सामान्य लगती है वह मेरे लिए अजीब हो जाती है. फिर तुम सिर्फ मेरे नहीं हो बल्कि नीता, पिंकी, श्वेता यानी एकसाथ कितनी लड़कियों से दोस्ती की हुई है, जो तुम्हारे करीब आने के लिए एकदूसरे को पछाड़ने में लगी हुई हैं.’

‘उन के साथ काम के सिलसिले में बाहर जाना होता है. फिर मैं हूं ही इतना हैंडसम और वैलबिहेव्ड कि सभी मुझे पसंद करती हैं. पर मैं शादी तो तुम से ही करूंगा.’

वृंदा का फ्रस्ट्रैशन बढ़ने लगा था. विनय का फोन अकसर व्यस्त मिलने लगा. कहीं उस की सरकारी नौकरी के कारण ही तो उस से वह शादी करने के लिए जिद पर अड़ा हुआ है. फिर वृंदा की कहानियों और व्यक्तित्व की जो तारीफ शुरू में होती थी वह क्या था? शायद फ्लर्ट करने का तरीका. जिन सामाजिक महिला कार्यकर्ताओं, लेखिकाओं की शुरू में विनय आलोचना करता था, हमेशा उन्हीं के बीच तो रहता है. वह रिश्ता शायद दोनों के लिए अपरिचित संसार का आकर्षण था. वृंदा मुलाकातों में खुद के लिए विनय के मन में जगह ढूंढ़ती मगर वहां उसे भीड़ नजर आती.

शाम को विनय का फोन फिर आया, ‘‘कल लंच में मिलो न, नाराज क्यों हो?’’

‘‘नाराज नहीं हूं पर मुझे नहीं लगता कि हमें शादी करनी चाहिए. ऐसी जिंदगी का क्या फायदा जिस में मैं तुम्हारे लाइफस्टाइल की आलोचना करती रहूं और तुम मेरे. अपनी लाइफ स्टाइल की ही किसी लड़की से शादी कर लो. मैं भी अपने रिश्ते के बारे में सोचतेसोचते थक गई हूं. कोई रास्ता तो निकलेगा ही.’’

‘‘ध्यान से सोचो. जल्दबाजी में कोई फैसला मत लो.’’

‘‘नहीं, मैं तुम से जितना प्यार करती हूं उतना तुम मुझ से कभी भी नहीं कर पाओगे. हमेशा मैं ही समझौता करती हूं और तुम पूरा ध्यान न दो, ऐसा कब तक चलेगा,’’ कह कर वृंदा ने फोन काट दिया.

अचानक उस ने राहत की सांस ली. रुलाई फूट रही थी मगर प्यार या रिश्ते की छाया के पीछे कब तक भागा जा सकता है. एक कविता की पंक्ति मन में उभरी :

‘मेरा तेरा रिश्ता तू तू मैं मैं का रहा. मैं तू तू करती रही, तू मैं मैं करता रहा.’ Story In Hindi

Story In Hindi: दूर से सलाम – मानवी को देखकर शशांक को कैसा लगा

Story In Hindi: जबमैं शौपिंग कर के बाहर निकली तो गरमी से बेहाल थी. इसलिए सामने के शौपिंग मौल की कौफी शौप में घुस गई. बच्चे आज देर से लौटने वाले थे, क्योंकि पिकनिक पर गए थे. इसीलिए मैं ने सोचा कि क्यों न कोल्ड कौफी के साथ वैज सैंडविच का मजा उठाया जाए.

वैसे मेरा सारा दिन बच्चों के साथ ही गुजर जाता. पति शशांक भी अपने नए बिजनैस में व्यस्त रहते. ऐसे में कई बार मन करता है कि अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा वक्त अपने लिए भी निकालूं, पर चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाती. पर आज मौका मिला तो लगा कि इस टाइम का भरपूर फायदा उठाऊं.

अभी मैं और्डर दे कर सुस्ता ही रही थी कि मेरा फोन बज उठा. फोन पर शशांक थे.

‘‘कहां हो?’’ वे शायद जल्दी में थे.

‘‘बस थोड़ी देर में घर पहुंच जाऊंगी,’’ मैं अटकते हुए बोली.

‘‘अच्छा, ऐसा करना कि करीब 4 बजे रामदीन आएगा, उसे वह फाइल दे देना, जिसे मैं गलती से टेबल पर भूल आया हूं,’’ और शशांक ने फोन काट दिया.

शशांक की यह बेरुखी मुझे अखरी तो सही पर फिर मैं ने तुरंत ही खुद को संभाल लिया. मैं मानती हूं कि काम भी जरूरी है पर इतनी भी क्या व्यस्तता कि कभी अपनी पत्नी से प्यार के दो बोल भी न बोल पाओ?

फिर मुझे वह समय याद आने लगा जब शशांक एक दिलफेंक आशिक की तरह मेरे आगेपीछे घूमा करते थे और अब काम की आपाधापी ने उन्हें लगभग खुश्क सा बना दिया है. पर दूसरे ही पल तब मेरी यह नीरसता झट से दूर हो गई जब मेरे सामने कौफी और सैंडविच रखा गया.

अभी मैं ने कौफी का पहला घूंट भरा ही था कि मेरे कानों में एक जानीपहचानी सी हंसी सुनाई दी. जब मैं ने पलट कर देखा तो हैरान रह गई. एक अधेड़ उम्र के पुरुष के साथ जो महिला बैठी थी, वह मेरे कालेज में मेरे साथ पढ़ती थी. उस महिला का नाम मानवी है.

जब मानवी को देखा तो मेरा मन एक अजीब से उल्लास से भर उठा. कालेज का बीता समय अचानक मेरी आंखों के आगे घूम गया…

सच, वह भी क्या समय था? बेखौफ, बिना किसी टैंशन के मैं और मेरी सहेलियां कालेज में घूमा करती थीं, पर मुझ में और मानवी में एक बुनियादी फर्क था.

जहां मैं पढ़ाई के साथसाथ मौजमस्ती को भी तवज्जो देती थी, वहीं मानवी सिर्फ मौजमस्ती और घूमनेफिरने का ही शौक रखती थी.

कालेज से बंक कर के वह सैरसपाटे पर निकल जाती थी, जिसे मैं ठीक नहीं मानती थी. अपनी बेबाकी के लिए मशहूर मानवी लड़कों पर जादू चलाना खूब जानती थी, शायद इसीलिए मैं उस से एक दूरी बना कर चलती थी.

मैं जब भी उस के घर जाती वह मुझे अपने चेहरे पर फेसपैक लगाए ही मिलती.

‘‘परीक्षा नजदीक है और तुझे फेसपैक लगाने की पड़ी है,’’ मैं उस से चुहल करती.

‘‘अरे मैडम, यही तो अंतर है तुम्हारी और मेरी सोच में,’’ फिर वह जोर से हंस देती, ‘‘तू तो आती है कालेज में पढ़ने के लिए पर अपनु तो आता है लड़कों को पटाने के लिए.

अरे भई, अपना तो सीधा फंडा है कि अगर माया चाहिए तो अपनी काया का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.’’

उस की ये बातें जब मेरी समझ से बाहर हो जातीं तब मैं नोट्स बनाने के लिए लाईब्रेरी का रुख करती और ये मैडम कैंटीन में पहुंच जातीं, कोई नया मुरगा हलाल करने के लिए.

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. इस बीच मानवी के कई प्रेमप्रसंग परवान चढ़े और कई बीच में ही दम तोड़ गए. पर बहती नदी सी मानवी इस सब से न कभी रुकी और न ही कोई उसे रोक पाया. आखिर अमीर परिवार की इकलौती बेटी की उड़ान भी तो ऊंची थी. उस का अमीर लड़कों को पटाना, उन से अपना उल्लू सीधा करना लगातार जारी रहा.

कई बार तो ऐसा भी होता था कि मानवी की बदौलत उस की कुछ मनचली सहेलियों को भी मुफ्त में पिक्चर देखने को मिल जाती थी या उस के आशिक की कार में घर तक लिफ्ट मिल जाती थी. तब सभी उस की प्रशंसा करते नहीं थकती थीं. अपनी प्रशंसा सुन मैडम मानवी का हौसला और बुलंद हो जाता.

इस बीच हमारी पढ़ाई पूरी हो गई और हमारा साथ छूट गया. पर मानवी के प्रेम के किस्से जबतब मुझे सुनने को मिलते रहे.

जब मानवी की शादी की खबर कानों में पड़ी तो लगा कि शायद अब उस की जिंदगी में एक स्थिरता आएगी, जिस का अभाव उस की जिंदगी में शुरू से ही रहा है.

बीतते समय के साथ मैं उसे पूरी तरह भूल गई, पर आज अचानक उसे देख कर लगा कि अब उन सहेलियों के संपर्कसूत्र मिल जाएंगे, जिन से मिलने की कब से तमन्ना थी.

मैं हमेशा यही सोचती थी कि हमारी कुछ सहेलियों में से कुछ तो जरूर ऐसी होंगी जिन का मायका और ससुराल यहीं दिल्ली शहर में होगी. अब मानवी मिली है तो शायद उन सहेलियों को ढूंढ़ने में आसानी होगी, जिन्हें मैं अकेली शायद ही ढूंढ़ पाती.

तभी मेरी नजर उस पुरुष पर पड़ी जो अब उठ चुका था और बाहर चलने की तैयारी में था. उस आदमी के जाते ही मानवी भी उठ खड़ी हुई. इस से पहले कि वह मेरी आवाज सुन कर मेरे पास आती, वह खुद ही मेरे पास आ गई.

‘‘अरे सुमिता, तू यहां कैसे?’’ वह मेरी तरफ आते हुए बोली.

‘‘बस, शौपिंग करने आई थी,’’ मैं पास पड़ी कुरसी उस की तरफ खिसकाते हुए बोली.

‘‘तू इतनी मोटी कैसे हो गई,’’ वह हंसते हुए मुझ से पूछ बैठी.

‘‘अब 2 बच्चों के बाद तो ऐसा ही होगा,’’ मैं थोड़ा झेंपते हुए बोली, ‘‘और तू सुना?’’

‘‘भई, अभी तक तो अपनी लाइफ ही सैट नहीं हुई है, बच्चे तो बहुत दूर की बात है.’’

‘‘पर तेरी शादी तो…’’

‘‘अरे, नाम मत ले उस शादी का. वह

शादी नहीं हादसा था मेरे लिए,’’ कह कर मानवी सुबक पड़ी.

‘‘पर हुआ क्या है? बता तो सही?’’ उसे परेशान देख कर मैं उस से पूछ बैठी.

‘‘शादी से पहले तो मेरा पति विरेन बहुत बड़ीबड़ी बातें करता था, पर शादी के बाद उस का व्यवहार बदलने लगा. तुझे तो पता है कि मैं शुरू से ही आजाद जिंदगी जीने की शौकीन रही हूं… अब क्लब जा कर ताश खेलूंगी तो हारूंगी भी… बस, धीरेधीरे यही कहने लगा कि मानवी तुम क्लब जाना छोड़ दो, क्योंकि मेरा बिजनैस घाटे में चल रहा है. अब उस का बिजनैस घाटे में चले या मुनाफे में, मुझे क्या? मुझे तो अपने खर्च के लिए एक तयशुदा रकम चाहिए ही, जिसे मैं चाहे ताश में उड़ाऊं या ब्यूटीपार्लर में फूंकूं,’’ कह व मेज पर रखे पानी के गिलास को झट से उठा कर पी गई.

पानी पी कर जब वह थोड़ी नौर्मल हुई तब बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और वह मुझ से कहने लगी, ‘‘पर जब उस की हर बात में टोकाटाकी बढ़ने लगी तब माथा ठनक गया मेरा. बस, तब मैं ने अपने वकील दोस्त के साथ मिल कर पूरे 50 लाख का दहेज उत्पीड़न का केस कर दिया पति पर.

‘‘बच्चू को अब आटेदाल का भाव मालूम पड़ेगा. मैं ने अपनी याचिका दायर करते समय ऐसीऐसी धाराएं लगाई हैं कि अब बेचारा सारी उम्र कोर्ट के चक्कर लगाता रहेगा,’’ कहतेकहते मानवी के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैर गई.

मानवी की ये बातें सुन कर मैं हैरान थी. पर उन मैडम के चेहरे पर तो शिकन तक नहीं थी. मानवी अपनी पूरी कहानी एक विजयगाथा की तरह बयान कर रही थी.

‘‘पर मानवी, क्लब जाना बुरा नहीं है, पर अगर घर की आर्थिक हालत बिगड़ रही हो तो ऐसे खर्चों पर रोक लगानी ही पड़ती है और फिर पत्नी के बेलगाम खर्च पर पति ही रोक लगाएगा न,’’ मैं उसे समझाते हुए बोली.

‘‘बस, जो भी मिलता है, तेरी तरह मुझे समझाने लगता है. यह मेरी लाइफ है और इस के साथ अच्छा या बुरा करना, इस का हक सिर्फ मुझे है,’’ मानवी अचानक आक्रामक हो उठी, ‘‘जब मेरी ममा ही मुझे नहीं समझ सकीं तो औरों की क्या बात करूं? मुझे तो यह बात समझ नहीं आती कि एक तरफ तो हम नारी सशक्तीकरण की बातें करते हैं और दूसरी तरफ अगर महिलाएं अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने की कोशिश करें तो उन के पांवों में पारिवारिक रिश्तों की दुहाई दे कर बेडि़यां डालने की कोशिश करते हैं,’’ मानवी अपनी रौ में बोले जा रही थी और मैं चुपचाप सुन रही थी.

अब यह बात मैं समझ चुकी थी कि जो लड़की अपनी मां की बात नहीं समझ पाई, वह मेरी बात क्या समझेगी? अत: मैं ने बातचीत का रुख बदलते हुए उस के लिए 1 कप कौफी का और्डर दे डाला

कौफी पी कर जब उस का दिमाग तरोताजा हुआ तब वह कहने लगी, ‘‘पता है, जो मेरे पास बैठा था, वह निकुंज है, हमारे शहर का जानामाना वकील. पता है वह बावला मेरे एक इशारे पर करोड़ों रुपए लुटाने को तैयार है.

‘‘बस, जब उसे पता चला कि मेरा पति मुझे तंग कर रहा है तो झट से बोला कि मानवी डार्लिंग, तुम्हें अपने पति की बेवजह की तानाशाही सहने की कोई जरूरत नहीं है.

अरे, तुम तो ऐसी बहती नदी हो, जिसे कोई नहीं बांध सकता, तो फिर तुम्हारे पति की क्या बिसात है?

‘‘वैसे तो मैं अपने तलाक के सिलसिले में ही निकुंज से मिली थी, पर मेरी व्यथा सुन कर दिल पिघल गया था बेचारे का. वह खुद ही मुझ से बोला था कि तुम्हारे पति को यों सस्ते में छोड़ देना ठीक नहीं होगा. जब बच्चू को कानूनी दांवपेंच में उलझाऊंगा तब जा कर उस के होश ठिकाने आएंगे.

‘‘बस, फिर उसी के कहने पर मैं ने अपने पति व सास पर दहेज उत्पीड़न का केस बनाया है. मेरी वही सास जो पहले मेरे क्लब जाने पर ऐतराज करती थी, वही सास आज मेरे आगे केस वापस लेने के लिए गिड़गिड़ाती है, पर मैं ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं. मैडम को मुझ पर हाथ उठाने के झूठे आरोप में ऐसा उलझाया है कि शायद अब उसे आत्महत्या ही करनी पड़े. पर मुझे क्या? मुझे तो अपना बदला चाहिए और वह मैं ले कर ही रहूंगी,’’ इतना कह कर वह चुप हो गई.

यह सुन कर मेरा मन खिन्न हो उठा. रहरह कर मैं मानवी के पति व सास के लिए हमदर्दी महसूस कर रही थी.

‘‘अच्छा, मैं चलती हूं, बच्चे आने वाले होंगे,’’ मैं उठते हुए बोली.

‘‘मैं अभी ब्यूटीपार्लर जा रही हूं. रात को डिनर फिक्स है मेरा निकुंज के साथ,’’ कह उस ने अपनी एक आंख शरारत से दबा दी, ‘‘भई, आज रात के लिए निकुंज ने फाइवस्टार होटल का आलीशान कमरा बुक किया है. अब कुछ पाना है तो यू नो, कुछ करना ही पड़ेगा… पर हां, मैं परसों फ्री हूं. अपना नंबर दे, मैं तेरे घर आऊंगी, तेरे बच्चों से मिलने और फिर तेरे बच्चों की तो मौसी हूं मैं,’’ वह अपना मोबाइल फोन निकालते हुए बोली.

‘‘मेरा फोन तो खो गया था. उस का मिसयूज न हो, इसलिए मेरे पति ने उस नंबर को ब्लौक करा दिया है. अब नया फोन और नया नंबर ही लेना पड़ेगा,’’ मैं ने झूठा बहाना बनाया और तेजी से बाहर निकल आई.

आज के बाद मैं मानवी से नहीं मिलूंगी. यह मैं ने पक्का तय कर लिया था. ऐसे लोगों को दूर से सलाम जो अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. तभी सामने से आते औटोरिकशा को रोक मैं उस में बैठ कर घर लौट आई. Story In Hindi

Family Story In Hindi: समाज से हारी विधवा

Family Story In Hindi: ‘भारत माता की जय’, ‘शहीद अमर जिंदाबाद’… कुछ ऐसे ही देशभक्ति के नारों से आकाश गूंज रहा था और लोगों की जोश भरी आवाज से दीवारें तक थर्रा रही थीं, पर तिरंगे में लिपटा हुआ अमर का शरीर तो बेजान पड़ा हुआ था. दुश्मन की एक गोली ने उस के शरीर से प्राण खींच लिए थे.

अमर की बटालियन के साथी बताते हैं कि वह अपने मोरचे पर बहुत बहादुरी से लड़ा था और मरने से पहले उस ने पाकिस्तान के कई सैनिक मार गिराए थे.

पर वही वीर अमर अब बेजान था. आसपड़ोस और सगेसंबंधियों के रोनेधोने के बीच पूरे राजकीय सम्मान
के साथ उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

सरकार के कई नेता भी अमर के घर आए और मीडिया के कैमरे पर आ कर दुश्मन देश से अमर की मौत का बदला लेने की बात कह कर चले गए.

अगले दिन सरकार ने अमर के कसबे के एक चौराहे का नाम बदल कर ‘शहीद अमर चौक’ रखने का फरमान जारी कर दिया.

इस बीच सरकार की तरफ से शहीद अमर के लिए 10 लाख रुपए का मुआवजा घोषित किया गया, तो अमर के मांबाप को अपने बेटे पर और भी नाज हो उठा.

पर इन सब के बीच अमर की 25 साल की विधवा निधि भी थी, जिसे न तो सरकारी अनुदान से कुछ लेनादेना था और न तो देशभक्ति के नारों से. वह तो भरी जवानी में ही अपना जीवनसाथी खो चुकी थी.

अमर ने न जाने कितने वादे किए थे निधि से. कितनी जगह दोनों को साथ घूमने जाना था, पर अफसोस कि अमर सिंह की मौत के बाद सबकुछ खत्म हो गया था.

रात में निधि जब बिस्तर पर लेटती, तो उसे अपने बगल में अमर के न होने का दुख सालता था. निधि के तनमन को एक साथी की जरूरत तो थी ही और अब उस के सामने पहाड़ सी जिंदगी भी पड़ी थी. भरी जवानी में विधवा हो जाने का इतना भारी दुख सहना भी उस के लिए मुश्किल था.

हालांकि, निधि मानसिक रूप से काफी मजबूत थी, फिर भी साथी के असमय चले जाने का दुख काफी गहरा होता है और इस दर्द से निकलने में निधि को पूरा एक साल लग गया था.

निधि भी जानती थी कि दुख को ओढ़ कर बैठने से दुख चार गुना बढ़ जाता है. दुख को कम करने के लिए उसे भूलना ही बेहतर होता है.

एक दिन निधि ने अपना मोबाइल उठाया, तो देखा कि उस की बैटरी सिर्फ एक फीसदी रह गई थी. उस ने अनमने ढंग से उसे चार्जिंग पर लगा दिया और बुदबुदा उठी, ‘‘इस मोबाइल की बैटरी की तरह मेरी जिंदगी भी क्यों खत्म नहीं हो जाती?’’

निधि की इस बुदबुदाहट में घोर पीड़ा थी, पर वह अब तक समझ चुकी थी कि उसे आगे की जिंदगी इसी पीड़ा के साथ काटनी होगी.

निधि ने गमले में लगे सूखे पौधों को पानी दिया. किचन की सिंक साफ की और घर की बाकी साफसफाई करने की शुरुआत कर दी.

निधि ने ध्यान दिया कि उस के सासससुर अब भी अपने बेटे के गम को पाले हुए हैं. बेटे की मौत का गम तो असहनीय तो होता है, पर जब बेटे की शहादत का फायदा अपने अहंकार और रुतबे को पोषित करने के लिए होने लगे, तब यह बात उचित नहीं लगती.

महल्ले के लोग अब भी निधि के सासससुर से अमर और उस की शहादत की बातें करते रहते और उस के सासससुर मुग्ध भाव से सुनते. शायद वे एक वीर बेटे के मांबाप होने पर गर्व महसूस करते थे, पर ऐसी बातों से निधि को सिर्फ दुख ही पहुंचता था.

निधि ने घर पर ध्यान दिया तो पाया कि बहुत सारा सामान खत्म हो चुका था. अब तो उसे खुद ही बाजार जाना होगा.

आईने के सामने खड़े हो कर निधि ने अपने चेहरे को देखा. उस की आंखें सूजी हुई थीं और चेहरा भी उतरा हुआ लग रहा था.

निधि ने बेपरवाही से बालों का जूड़ा बनाया और अपना मोबाइल चार्जिंग पौइंट से अलग किया. मोबाइल 82 फीसदी चार्ज हो चुका था.

अपने हाथों में मोबाइल की गरमी को महसूस करते हुए निधि ने थैला उठाया और अपनी सास से बाजार जाने की बात कह कर बाहर निकलने लगी.

निधि ने महसूस किया कि उस की सास नहीं चाहती हैं कि वह बाजार खुद जाए और बाहर लोगों से बातचीत करे. और तो और एक बार जब निधि ने गुलाबी रंग का सूट पहन लिया था, तब उस की सास ने कितना डांटा था उसे और अहसास कराया था कि विधवा को सिर्फ सफेद कपड़े ही पहनने चाहिए.

निधि ने अपने मोबाइल पर आए हुए ह्वाट्सएप मैसेज चैक करने शुरू किए.

वीरेश के कई मैसेज पड़े हुए थे और उस की कई काल्स भी आई थीं, जिन का जवाब वह नहीं दे पाई थी.

घर के माहौल में निधि भला वीरेश से बात भी क्या करती? वैसे भी अपने और वीरेश के बीच के प्यार को निधि ने दुनियाभर से छिपा रखा था. लोग क्या कहेंगे? समाज क्या सोचेगा? एक शादीशुदा औरत का एक गैरमर्द के साथ प्रेम संबंध समाज के लोगों को बिलकुल मंजूर नहीं और फिर निधि सवर्ण परिवार थी, जबकि वीरेश दलित जाति से था. पर प्यार तो प्यार है, वह न जाति देखता है और न ही शादी का बंधन.

अभी निधि अजीब सी उलझन में ही थी कि उस का मोबाइल बज उठा. यह वीरेश का ही फोन था. उस ने फोन को रिसीव करने की बजाय हड़बड़ाहट में काट दिया.

थोड़ी देर बाद फिर से वीरेश का फोन आया. इस बार निधि ने फोन रिसीव कर लिया, ‘‘देखो वीरेश, मैं गहरे दुख से उबरने की कोशिश कर रही हूं. तुम से शादी से पहले पहले प्यार था, पर अब मैं एक विधवा हूं और तुम से कोई मेलजोल ठीक नहीं होगा…’’

निधि एक सांस में बहुतकुछ कह देना चाहती थी, पर वीरेश ने उसे रोकते हुए कहा, ‘तो क्या तुम्हारे विधवा हो जाने से मेरे लिए प्यार खत्म हो गया है?’

वीरेश के इस सवाल का निधि को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था. वह खामोश थी. सच तो यह था कि अमर के जाने के बाद वह वीरेश के कंधे पर सिर रख कर रो लेना चाहती थी, उस से लिपट कर अपना दुख हलका कर लेना चाहती थी, पर समाज उसे इस की इजाजत नहीं देता.

कुछ सोचते हुए एक बार फिर से निधि ने फोन काट दिया था.

निधि की शादी उस की मरजी के बिना ही तय कर दी गई थी और जब निधि ने दबे शब्दों में मां से बताया था कि वह एक लड़के वीरेश से प्यार करती है और उसी से शादी करना चाहती है, तो मां ने लड़के के बारे में, उस के कामधंधे, उस की जाति के बारे में पूछा और यह जान कर वे बुरी तरह बिफर गईं कि लड़का एक दलित जाति का है.

मां ने आंखें तरेर कर निधि को फटकार लगाई थी और उसे चेताया था कि वह चुपचाप अपने प्यार का गला घोंट दे. उस के पिता अपनी ऊंची जाति के अहंकार के आगे किसी दलित लड़के को पसंद नहीं करेंगे.

निधि अपने मां के अनकहे शब्दों को भी अच्छी तरह समझ गई थी और उस ने अपने अरमानों का गला घोंटते हुए शादी के लिए हां कह दिया था.

निधि ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपने होने वाले पति अमर सिंह से कोई धोखा नहीं करेगी, इसलिए अपने शादी से पहले के प्रेम संबंध और एक दलित प्रेमी के बारे में सबकुछ बता दिया था.

अमर ने सबकुछ बहुत शांति से सुन लिया था. उस के चेहरे का रंग भी फक्क पड़ चुका था, पर उस ने अपनेआप को संभाला और एक लंबी सांस छोड़ते हुए निधि की तारीफ की, ‘‘अच्छा किया जो तुम ने मुझे यह राज बताया, इसीलिए तो मैं यह बात जान सका. कहीं तुम यह बात मुझे न बताती तो भला मैं कैसे जानता?’’

इस के बाद अमर ने निधि से कहा कि उसे निधि के पुराने समय से कोई लेनादेना नहीं है. अब निधि और अमर पतिपत्नी हैं, वह इसी बात का ध्यान रखे और कोई गलत कदम न उठाए. तभी से निधि ने वीरेश से किनारा कर लिया था.

निधि ने एक मैसेज लिख कर वीरेश से माफी मांग ली और उसे हर जगह से ब्लौक भी कर दिया था. पर पहला प्यार किसी को भूले नहीं भूलता. निधि भी वीरेश को भूल नहीं पाई. उस के मन में वीरेश के लिए कोई कोना तो था ही और इस कोने में उस दिन एक मधुर संगीत बज उठा जब एक नए नंबर से फोन आया, जिसे रिसीव करते ही निधि जान गई कि वीरेश ने फोन किया है.

‘‘तुम्हें तो मैं ने ब्लौक कर दिया था वीरेश…’’

‘निधि, मैं तुम से यह कहना चाहता हूं कि एक प्रेमी की तरह नहीं, पर हम एक अच्छे दोस्त की तरह तो रह ही सकते हैं न.’

वीरेश की इस बात को निधि मना नहीं कर सकी और तब से एक बार फिर वीरेश और निधि के बीच बातचीत शुरू हो गई थी.

अमर की मौत के बाद वीरेश का कोई फोन नहीं आया था. उस दिन सुबह जब निधि ने मोबाइल उठाया तो उस ने देखा कि मोबाइल पर वीरेश का एक लंबा सा मैसेज आया हुआ था :

‘अमर के जाने का मुझे भी दुख है और मैं इसे अपने लिए कोई मौका नहीं समझ रहा, पर यह तो मेरे प्रेम की सूखी डाल पर दोबारा हरियाली आने जैसी बात है. तुम ने अपने घर वालों की बात रख कर ब्याह कर लिया था, पर अब क्या तुम्हारे सासससुर और मांबाप तुम्हारी दोबारा शादी करेंगे?

‘अगर नहीं तो क्यों और अगर हां तो फिर मेरे साथ क्यों नहीं? क्योंकि मैं दलित हूं, पर किसी से कम तो नहीं. अच्छा दिखता हूं, अच्छी नौकरी है मेरे पास. तुम को खुश रख सकता हूं.

‘और अगर तुम अपने सासससुर को नहीं छोड़ना चाहती तो मैं उन का बेटा बन कर उन के साथ रहने और उन्हें अपने साथ रखने तक को तैयार हूं. अब बताओ, हमारे प्रेम संबंध को शादी के बंधन में बदलने के लिए तैयार हो? तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा.’

यह पढ़ कर निधि की आंखें छलछला उठी थीं. उसे इस मैसेज का कुछ भी जवाब समझ नहीं आया. वह उठी और चाय बना कर बालकनी में चली लगी.

आज निधि को कुछ सामान लेने बाजार जाना था. शोरूम में निधि ने शैंपू पर नजर डाली, तो वीरेश की यादें ताजा हो गईं.

निधि जब भी अपने बालों को शैंपू करती थी, तो वीरेश उसे कहता था कि बालों को ऐसे ही खुला छोड़ दो. ऐसा कर के तुम बहुत खूबसूरत दिखती हो.

निधि घर का सामान खरीद कर घर लौट आई. उस के मांबाप आए हुए थे.

मां को देख कर निधि उन से लिपट गई थी. होंठों पर मुसकराहट थी, पर आंखों में नमी आने से नहीं रोक सकी.

पापा से गले लगते ही आंखों से मोती ढुलक ही पड़े.

निधि की दोबारा शादी किए जाने पर विचार हो रहा था.

‘‘मां, वीरेश का फोन आया था. वह मुझ से अब भी शादी करना चाहता है,’’ निधि ने अकेले में अपनी मां से सकुचाते हुए कहा.

मां ने गुस्से से निधि को घूरा और कोसने लगीं कि भले ही विधवा हो गई है, पर अब भी उस दलित लड़के के फेर में पड़ी हुई है. उस की शादी एक दलित से कतई नहीं हो सकती.

‘‘हमारा बेटा चला गया है और अब तो बहू को मिलने वाली पैंशन का सहारा रहेगा. हमारा बुढ़ापा तो बेटे की पैंशन पर ही कटेगा. और देखा जाए तो उस की पैंशन पर हमारा हक भी तो है.

आखिर बेटे को पढ़ानेलिखाने और अफसर बनाने में हम ने भी तो मोटा इंवैस्ट किया था और हम निधि की दोबारा शादी नहीं करेंगे. वह हमारे खानदान की शान है और हमारी शान हमारे पास ही रहेगी,’’ निधि के मांबाप को ससुर का टका सा जवाब मिल गया था.

उस रात निधि ठीक ढंग से सो नहीं पाई थी. यह बात ठीक है कि उस के पति ने सेना में अपना फर्ज निभाते हुए जान दी थी, जिस बात पर उसे गर्व है, पर अपने पिछले प्रेम के बारे में उस ने अमर से कुछ छिपाया भी तो नहीं था.

और आज जब अमर दुनिया में नहीं है, तो उसे वीरेश के साथ जिंदगी बिताने में कोई बुराई नजर नहीं आती, पर उस के मांबाप अपनी जाति के दंभ में अपनी बेटी के अरमानों को ताक पर रख रहे हैं और सासससुर उसे मिलने वाली पैंशन के लालच में उस का दूसरा ब्याह नहीं करना चाहते.

अगले दिन निधि ने वीरेश को फोन मिलाया और कहा कि वह उस से मिलना चाहती है. वे दोनों एक कैफे में सुबह के 11 बजे मिले. वीरेश ने मीठी कौफी ली, जबकि निधि ने हमेशा की तरह बिना चीनी वाली कौफी ही ली.

निधि ने पूरी बात बताई तो वीरेश ने कहा, ‘‘नीची जाति के उलाहने के नाम पर मैं ने बहुतकुछ झेला है. मेरी हर कामयाबी को इसीलिए कमतर आंका गया, क्योंकि मैं छोटी जाति का हूं. पर क्या केवल जाति से हमारी अचीवमैंट छोटी या बड़ी हो जाती है?’’ वीरेश की आवाज में गुस्सा था.

वीरेश ने आगे कहा, ‘‘आज जब मेरी जिंदगी में प्यार दोबारा दस्तक दे रहा है, तो यह समाज जाति के नाम पर फिर से मुझे दुखी कर रहा है.’’

‘‘और समाज मुझे शहीद की विधवा कह कर महिमामंडित तो कर रहा है, पर साथ ही यह भी चाहता है कि मैं इसी दर्द के सहारे झूठी मुसकराहट चिपकाए फिरूं और अपनी पूरी जिंदगी अकेले ही काट दूं,’’ निधि बोल पड़ी.

वे दोनों बारबार एकदूसरे को देख रहे थे. उन की समस्या का समाधान तो यह हो सकता था कि निधि सबकुछ छोड़ कर वीरेश के पास चली आए और अपने प्रेम को शादी में बदल ले, पर वह अपने सासससुर और समाज के डर से ऐसा नहीं कर पा रही थी. कहीं न कहीं जाति के दंभ ने 2 प्रेमियों को एक बार
फिर मिलने से पहले ही अलग कर दिया था.

वीरेश ने अपने कौफी खत्म कर दी थी और निधि ने आधी कप कौफी बिना पिए ही छोड़ दी थी. बिल वीरेश ने नहीं, बल्कि निधि ने चुकता किया था और बाहर निकल कर दोनों ने भारी मन से फीकी मुसकराहट के साथ एकदूसरे को अलविदा कहा और अपनेअपने रास्ते पर चल दिए. Family Story In Hindi

Hindi Crime Story: अपराध – क्या थी नीलकंठ की गलती

Hindi Crime Story: ऐलिस का साथ पाने के लिए नीलकंठ ने अपनी दम तोड़ती पत्नी सुरमा को बचाने की कोई कोशिश नहीं की.

एंबुलैंस का सायरन बज रहा था. लोग घबरा कर इधरउधर भाग रहे थे. छुट्टी का दिन होने से अस्पताल का आपातकालीन सेवा विभाग ही खुला था, शोरशराबे से डाक्टर नीलकंठ की तंद्रा भंग हो गई.

घड़ी पर निगाह डाली, रात के 10 बज कर 20 मिनट हो रहे थे. उसे ऐलिस के लिए चिंता हो रही थी और उस पर क्रोध भी आ रहा था. 9 बजे वह उस के लिए कौफी बना कर लाती थी. वैसे, उस ने फोन पर बताया था कि वह 1-2 घंटे देर से आएगी.

‘‘सर,’’ वार्ड बौय ने आ कर कहा, ‘‘एक गंभीर केस है, औपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया है.’’

‘‘आदमी है या औरत?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘औरत है,’’ वार्ड बौय ने उत्तर दिया, ‘‘कहते हैं कि आत्महत्या का मामला है.’’

‘‘पुलिस को बुलाना होगा,’’ नीलकंठ ने पूछा, ‘‘साथ में कौन है?’’

‘‘2-3 पड़ोसी हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ औपरेशन की तैयारी करने को कहो. मैं आ रहा हूं. और हां, सिस्टर ऐलिस आई हैं?’’

‘‘जी, अभीअभी आई हैं. उस घायल औरत के साथ ही ओटी में हैं,’’ वार्ड बौय ने जाते हुए कहा.

राहत की सांस लेते हुए नीलकंठ ने कहा, ‘‘तब तो ठीक है.’’

वह जल्दी से ओटी की ओर चल पड़ा. दरअसल, मन में ऐलिस से मिलने की जल्दी थी, घायल की ओर ध्यान कम ही था.

ऐलिस को देखते ही वह बोला, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी? मैं तो चिंता में पड़ गया था.’’

‘‘सर, जल्दी कीजिए,’’ ऐलिस ने उत्तर दिया, ‘‘मरीज की हालत बहुत खराब है. और…’’

‘‘और क्या?’’ नीलकंठ ने एप्रन पहनते हुए पूछा, ‘‘सारी तैयारी कर दी है न?’’

‘‘जी, सब तैयार है,’’ ऐलिस ने गंभीरता से कहा, ‘‘घायल औरत और कोई नहीं, आप की पत्नी सुरमा है.’’

‘‘सुरमा,’’ वह लगभग चीख उठा.

सुबह ही नीलकंठ का सुरमा से खूब झगड़ा हुआ था. झगड़े का कारण ऐलिस थी. नीलकंठ और ऐलिस का प्रणय प्रसंग उन के विवाहित जीवन में विष घोल रहा था. सुबह सुरमा बहुत अधिक तनाव में थी, क्योंकि नीलकंठ के कोट पर 2-4 सुनहरे बाल चमक रहे थे और रूमाल पर लिपस्टिक का रंग लगा था. सुरमा को पूरा विश्वास था कि ये दोनों चिह्न ऐलिस के ही हैं. कुछ कहने को रह ही क्या गया था? पूरी कहानी परदे पर चलती फिल्म की तरह साफ थी.

झुंझला कर क्रोध से पैर पटकता हुआ नीलकंठ बाहर निकल गया.

जातेजाते सुरमा के चीखते शब्द कानों में पड़े, ‘आज तुम मेरा मरा मुंह देखोगे.’

ऐसी धमकियां सुरमा कई बार दे

चुकी थी. एक बार नीलकंठ ने

उसे ताना भी दिया था, ‘जानेमन, जीना जितना आसान है, मरना उतना ही मुश्किल है. मरने के लिए बहुत बड़ा दिल और हिम्मत चाहिए.’

‘मर कर भी दिखा दूंगी,’ सुरमा ने तड़प कर कहा था, ‘तुम्हारी तरह नाटकबाज नहीं हूं.’

‘देख लूंगा, देख लूंगा,’ नीलकंठ ने विषैली मुसकराहट के साथ कहा था, ‘वह शुभ घड़ी आने तो दो.’

आखिर सुरमा ने अपनी धमकी को हकीकत में बदल दिया था. उन का घर 5वीं मंजिल पर था. वह बालकनी से नीचे कूद पड़ी थी. इतनी ऊंचाई से गिर कर बचना बहुत मुश्किल था. नीचे हरीहरी घास का लौन था. उस दिन घास की कटाई हो रही थी. सो, कटी घास के ढेर लगे थे. सुरमा उसी एक ढेर पर जा कर गिरी. उस समय मरी तो नहीं, पर चोट बहुत गहरी आई थी.

शोर मचते ही कुछ लोग जमा हो गए, उन्होंने सुरमा को पहचाना और यही ठीक समझा कि उसे नीलकंठ के पास उसी के अस्पताल में पहुंचा दिया जाए.

काफी खून बह चुका था. नब्ज बड़ी मुश्किल से पकड़ में आ रही थी. शरीर का रंग फीका पड़ रहा था. नीलकंठ के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे, ‘सुरमा से पीछा छुड़ाने का बहुत अच्छा अवसर है. इस के साथ जीवन काटना बहुत दूभर हो रहा है. हमेशा की किटकिट से परेशान हो चुका हूं. एक डाक्टर को समझना हर औरत के वश की बात नहीं, कितना तनावपूर्ण जीवन होता है. अगर चंद पल किसी के साथ मन बहला लिया तो क्या हुआ? पत्नी को इतना तो समझना ही चाहिए कि हर पेशे का अपनाअपना अंदाज होता है.’

सहसा चलतेचलते नीलकंठ रुक गया.

‘‘क्या हुआ, सर?’’ ऐलिस ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं यह औपरेशन नहीं कर सकता,’’ नीलकंठ ने लड़खड़ाते स्वर में कहा, ‘‘कोई डाक्टर अपनी पत्नी या सगेसंबंधी का औपरेशन नहीं करता, क्योंकि वह उन से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. उस के हाथ कांपने लगते हैं.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं?’’ ऐलिस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जल्दी से डाक्टर जतिन को बुला लो,’’ नीलकंठ ने वापस मुड़ते हुए कहा. वह सोच रहा था कि औपरेशन में जितनी देर लगेगी, उतनी जल्दी ही सुरमा इस दुनिया से दूर चली जाएगी.

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ ऐलिस ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर जतिन को आतेआते एक घंटा तो लगेगा ही. लेकिन इतना समय कहां है? मैं मानती हूं कि आप के लिए पत्नी को इस दशा में देखना बड़ा कठिन होगा और औपरेशन करना उस से भी अधिक मुश्किल, पर यह तो आपातस्थिति है.’’

‘‘नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘यह डाक्टरी नियमों के विरुद्ध होगा और यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो.’’

‘‘ठीक है, कम से कम आप कुछ देखभाल तो करें,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘मैं अभी डाक्टर जतिन को संदेश भेजती हूं.’’

डाक्टर नीलकंठ जब ओटी में घुसा तो आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था, कितने ही उद्गार मन में उठते और फिर बादलों की तरह गायब हो जाते थे.

सामने सुरमा का खून से लथपथ शरीर पड़ा था, जिस से कभी उस ने प्यार किया था. वे क्षण कितने मधुर थे. इस समय सुरमा की आंखें बंद थीं, एकदम बेहोश और दीनदुनिया से बेखबर. इतना बड़ा कदम उठाने से पहले उस के मन में कितना तूफान उठा होगा? एक क्षण अपराधभावना से नीलकंठ का हृदय कांप उठा, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उस के शरीर को झंझोड़ रही हो.

नीलकंठ ने कांपते हाथों से सुरमा के बदन से खून साफ किया. उस का सिर फट गया था. वह कितने ही ऐसे घायल व्यक्ति देख चुका था, पर कभी मन इतना विचलित नहीं हुआ था. वह सोचने लगा, क्या सुरमा की जान बचा सकना उस के वश में है?

लेकिन डाक्टर जतिन के आने से पहले ही सुरमा मर चुकी थी. नीलकंठ सूनी आंखों से उसे देख रहा था, वह जड़वत खड़ा था.

जतिन ने शव की परीक्षा की और धीरे से नीलकंठ के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे दुख है, सुरमा अब इस दुनिया में नहीं है. ऐलिस, नीलकंठ को केबिन में ले जाओ, इसे कौफी की जरूरत है.’’

ऐलिस ने आहिस्ता से नीलकंठ का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए ओटी से बाहर ले गई. कमरे में ले जा कर उसे कुरसी पर बैठाया.

‘‘सर, मुझे दुख है,’’ ऐलिस ने आहत स्वर में कहा, ‘‘सुरमा के ऐसे अंत की मैं ने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. मैं अपने को कभी माफ नहीं कर सकूंगी.’’

नीलकंठ ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं, कुसूर मेरा है.’’

नीलकंठ आंखें बंद किए सोच रहा था, ‘शायद सुरमा को बचा पाना मेरे वश से बाहर था, पर कोशिश तो कर ही सकता था. लेकिन मैं टालता रहा, क्योंकि सुरमा से छुटकारा पाने का यह सुनहरा अवसर था. मैं कलह से मुक्ति पाना चाहता था. अब शायद ऐलिस मेरे और करीब आ जाएगी.’

ऐलिस सामने कौफी का प्याला लिए खड़ी थी. वह आकर्षक लग रही थी.

पुलिस सूचना पा कर आ गई थी. औपचारिक रूप से पूछताछ की गई. यह स्पष्ट था कि दुर्घटना के पीछे पतिपत्नी के बिगड़ते संबंध थे, परंतु नीलकंठ का इस दुर्घटना में कोईर् हाथ नहीं था. नैतिक जिम्मेदारी रही हो, पर कानूनी निगाह से वह निर्दोष था. पोस्टमार्टम के बाद शव नीलकंठ को सौंप दिया गया. दोनों ओर के रिश्तेदार सांत्वना देने और घर संभालने आ गए थे. दाहसंस्कार के बाद सब के चले जाने पर एक सूनापन सा छा गया.

नीलकंठ को सामान्य होने में सहायता दी तो केवल ऐलिस ने. अस्पताल में ड्यूटी के समय तो वह उस की देखभाल करती ही थी, पर समय पा कर अपनी छोटी बहन अनीषा के साथ उस के घर भी चली जाती थी. चाय, नाश्ता, भोजन, जैसा भी समय हो, अपने हाथों से बना कर देती थी. धीरेधीरे नीलकंठ के जीवन में शून्य का स्थान एक प्रश्न ने ले लिया.

कई महीनों के बाद नीलकंठ ने एक दिन ऐलिस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जैसी पत्नी ही पाना चाहता था. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं. यह सोच कर कभीकभी आश्चर्य होता है.’’

‘‘सर,’’ ऐलिस बोली, ‘‘सर.’’

नीलकंठ ने टोकते हुए कहा, ‘‘मैं ने कितनी बार कहा है कि मुझे ‘सर’ मत कहा करो. अब तो हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. यह औपचारिकता मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘क्या करूं,’’ ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘सर, आदत सी पड़ गई है, वैसे कोशिश करूंगी.’’

‘‘तुम मुझे नील कहा करो,’’ उस ने ऐलिस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा लगेगा.’’

ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘कोशिश करूंगी, वैसे है जरा मुश्किल.’’

‘‘कोई मुश्किल नहीं,’’ नीलकंठ हंसा, ‘‘आखिर मैं भी तो तुम्हें ऐलिस कह कर बुलाता हूं.’’

‘‘आप की बात और है,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘आप किसी भी संबंध से मुझे मेरे नाम से पुकार सकते हैं.’’

‘‘तो फिर किस संबंध से तुम मेरा नाम ले कर मुझे बुलाओगी?’’ नीलकंठ के स्वर में शरारत थी.

‘‘पता नहीं,’’ ऐलिस ने निगाहें फेर लीं.

‘‘तुम जानती हो, मेरे मन में तुम्हारे लिए क्या भावना है,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मेरे सूने जीवन में बहार बन कर प्रवेश करो.’’

‘‘यह तो अभी मुमकिन नहीं,’’ ऐलिस ने छत की ओर देखा.

‘‘अभी नहीं तो कोई बात नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘पर वादा तो कर सकती हो?’’ नीलकंठ को विश्वास था कि ऐलिस इनकार नहीं करेगी, शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘यह कहना भी मुश्किल है,’’ ऐलिस ने मेज पर पड़े चम्मच से खेलते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ नीलकंठ ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘आखिर हम अच्छे दोस्त हैं?’’

‘‘बस, दोस्त ही बने रहें तो अच्छा है,’’ ऐलिस ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘यही कि अगर शादी कर ली तो इस बात की क्या गारंटी है,’’ ऐलिस ने एकएक शब्द तोलते हुए कहा, ‘‘कि मेरा भी वही हश्र नहीं होगा, जो सुरमा का हुआ? आखिर दुर्घटना तो सभी के साथ घट सकती है?’’

यह सुनते ही नीलकंठ को मानो सांप सूंघ गया. उस ने कुछ कहना चाहा, पर जबान पर मानो ताला पड़ गया था. ऐलिस ने साथ देने से इनकार जो कर दिया था. Hindi Crime Story

Hindi Story: दलदल

Hindi Story: मोहनलाल की जब बैंक में नौकरी लगी, तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसे बैंक की शेखपुर ग्रामीण ब्रांच में पहली पोस्टिंग मिली. शहर में पलेबढ़े मोहनलाल को शेखपुर गांव की जिंदगी रास नहीं आई, पर गांव से शहर की किसी ब्रांच में तबादला कराना आसान नहीं था, इसलिए वह न चाहते हुए भी गांव में रहने के लिए मजबूर था, जहां बिजली, सड़कें, अच्छे घर और दूसरी बुनियादी जरूरतों की कमी थी. बैंक में नौकरी मिलने के एक साल बाद ही मोहनलाल की शादी मोनिका से हो गई. मोनिका बहुत खूबसूरत थी और उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी.

शादी के बाद वह 2 महीने तक मोहनलाल के मातापिता के साथ रही और फिर उस के साथ शेखपुर गांव चली गई. मोनिका को शेखपुर गांव में रहना सजा काटने के बराबर लगा, पर बिना पति के साथ के रात काट पाना भी उस के लिए आसान नहीं था. वह मजबूर हो कर गांव में एकएक दिन काट रही थी और पति से अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराने की जिद कर रही थी. मोहनलाल ने उसे समझाया कि बैंक के जितने मुलाजिम गांव की ब्रांचों में काम करते हैं, उन में से आधे से ज्यादा लोग अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराना चाहते हैं, इसलिए तबादले के लिए दी गई अर्जियों पर बैंक कोई ध्यान नहीं देता और यूनियन के नेता भी ऐसे तबादलों के केस अपने हाथ में नहीं लेते.

मोहनलाल ने मोनिका को यह भी बताया कि उस की तो अभी 2 साल की ही नौकरी हुई है, यहां तो 10-12 साल से लोग लगे हैं और अभी तक उन की अर्जियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. मोनिका के बारबार पूछने पर मोहनलाल ने बताया कि अगर जोनल मैनेजर चाहें, तो उस का तबादला शहर में हो सकता है. मोनिका जिद कर के मोहनलाल के साथ जोनल मैनेजर से मिलने उन के घर पहुंच गई. जोनल मैनेजर नरेश को जब मालूम हुआ कि मोहनलाल बैंक की शेखपुर ब्रांच में क्लर्क है, तो उन्हें उस का बिना इजाजत के घर आना बुरा लगा, पर मोनिका ने लपक कर उन के पैर छू लिए. जोनल मैनेजर नरेश ने एक निगाह मोनिका पर डाली, तो उस के तीखे नाकनक्श और कसी हुईर् देह देख कर उन के तेवर ढीले पड़ गए.

मोनिका को आशीर्वाद देने के बहाने वे देर तक उस की नंगी पीठ सहलाते रहे. मोनिका भी निगाह नीची किए उन से सटी मुसकराती रही. नरेश उन दोनों को घर के अंदर ले गए और नौकर से चाय लाने के लिए कहा. इस बीच मोनिका ने मोहनलाल के तबादले के लिए उन से गुजारिश की, जिसे नरेश ने उस की खूबसूरत देह को ललचाई नजर से घूरते हुए मान लिया. मोहनलाल चुपचाप जमीन पर नजर गड़ाए बैठा रहा. जब वे लोग लौटने लगे, तो मोनिका ने जबरन नरेश के फिर से पैर छू लिए. इस घटना के 15 दिन बाद जोनल मैनेजर नरेश शेखपुर ब्रांच का दौरा करने आए और रात को शेखपुर के डाक बंगले में रुकने का इंतजाम करने के लिए ब्रांच मैनेजर को निर्देश दिया. बैंक मैनेजर ने उन के रुकने का सारा इंतजाम करा दिया.

शाम को मोहनलाल बैंक से घर आया, तो उस ने नरेश के शेखपुर गांव आने की बात मोनिका को बताई. मोनिका ने मोहनलाल से कहा कि नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुला लो. मोहनलाल ने ऐसा ही किया, जिसे नरेश ने बिना किसी नानुकर के मान लिया. साथ ही शराब पीने का इंतजाम रखने का इशारा भी किया. उन्होंने उस से यह भी कहा कि वे रात को 9 बजे डाक बंगले पर पहुंच जाए. रात के 9 बजे मोहनलाल जब डाक बंगले पर पहुंचा, तो नरेशजी उस का इंतजार कर रहे थे. उन्हें ले कर मोहनलाल घर पहुंचा, तो सजीधजी मोनिका ने दरवाजे पर उन का स्वागत किया. फिर शराब का दौर चला. शुरू में
तो मोहनलाल झिझका, मगर 2 पैग पीने के बाद ही वह खुल गया. इस के बाद नरेशजी के इशारा करने पर
उस ने मोनिका को भी जबरदस्ती पैग पिला दिया.

जब नरेशजी मस्ती में आ गए, तो डिनर हुआ. इस के बाद नरेशजी ने सिगरेट पीने की फरमाइश की. मोहनलाल सिगरेट लेने बाजार की ओर भागा. इस बीच नरेशजी ने मोनिका की कमर में हाथ डाल दिया और उस की मांसल देह को सहलाने लगे. जब मोनिका ने उन की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया, तो उन की हिम्मत बढ़ गई. उन्होंने उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और उन के हाथ तेजी से मोनिका की देह पर फिसलने लगे. कुछ ही देर में मोनिका के हाथ भी नरेशजी की देह में कुछ खोजने लगे.
जल्दी ही नरेशजी ने उसे उठा कर पलंग पर लिटा दिया. जब तक मोहनलाल लौटा, तब तक वे हलके हो कर कुरसी पर बैठ चुके थे. पर उन की तेज चल रही सांसों और मोनिका के गालों पर दांत के हलके निशान बीती हुई घटना की चुगली मोहनलाल से कर रहे थे.

मोहनलाल कुछ उदास हो गया, पर चलते समय जब नरेशजी ने उसे छाती से लगा कर कहा कि आज से तुम मेरे भाई जैसे हो, तो उस का दिल बल्लियों उछलने लगा. नरेशजी ने जाते ही मोहनलाल के तबादले का आदेश जारी कर दिया. मोहनलाल और मोनिका अपने शहर के तबादले पर बेहद खुश थे. अब नरेशजी अकसर उस के घर आने लगे. शहर में मोहनलाल को बहुतकुछ मिला. उन के घर बेटी पैदा हुई और प्रमोशन में अफसर का पद भी मिल गया. हां, प्रमोशन के लिए मोहनलाल को कई बार नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुलाना पड़ा था और डिनर के बाद घर में सिगरेट होते हुए भी मोनिका के इशारे पर सिगरेट लाने के लिए उसे रात के 10-11 बजे के बाद बाजार जाना पड़ा था. एक चतुर खिलाड़ी की तरह
मोनिका ने मोहनलाल और नरेशजी दोनों को अपने इशारों पर नचाना शुरू कर दिया.

कुछ ही महीने बाद नरेशजी की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई, पर मोनिका लगातार उन से मिलती रही और अपने पति के प्रमोशन और शहरी ब्रांचों में नियुक्ति का इंतजाम कराती रही. बदले में वह नरेशजी की खुल कर सेवा करती रही. मोहनलाल ने भी हालात से समझौता कर लिया था. 4 साल बाद नरेशजी दोबारा तबादला हो कर मोहनलाल के शहर में आ गए. अब उन की मेहरबानियां खुल कर मोनिका पर बरस रही थीं. यहां तक कि उन्होंने कई बड़े कर्ज भी उन के लिए मंजूर किए थे. मोहनलाल के पास शहर में 2-2 मकान, बढि़या गाड़ी, नौकरचाकर सबकुछ था. उस के पुराने साथी अब भी बैंक में बाबू और बड़े बाबू के पद पर थे, जबकि वह मैनेजर बन गया था. मोहनलाल की बेटी चेतना ने 12वीं जमात का इम्तिहान सैकंड डिविजन में पास किया, तो कालेज में दाखिला लेने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में बात नहीं बनी.

मजबूरन मोनिका को नरेशजी का सहारा लेना पड़ा और देखते ही देखते उस की बेटी को शहर के अच्छे कालेज में दाखिला मिल गया. मोनिका के कहने पर नरेशजी ने दोपहर में उस के घर आना शुरू कर दिया.
ऐसे ही एक दिन जब नरेशजी मोनिका के घर में थे, तो कालेज में एक लड़की की मौत होने की वजह से जल्दी छुट्टी हो गई और मोनिका की बेटी चेतना 12 बजे ही घर पहुंच गई. घर का बाहरी दरवाजा खुला था.
चेतना ने बैग ड्राइंगरूम में रखा और फ्रिज से पानी की बोतल निकालने लगी, तभी उसे अपनी मां की चीख सुनाई दी. उस ने खिड़की से छिप कर देखा, तो दंग रह गई. कुछ देर बाद मोनिका और नरेशजी जब कमरे से बाहर निकले, तो चेतना को ड्राइंगरूम में देख कर सकपका गए. नरेशजी बिना कुछ बोले ही बाहर निकल गए और मोनिका ने खुद को घरेलू कामों में मसरूफ कर लिया.

एक दिन मोहनलाल घर लौट रहा था. रास्ते में उस ने देखा कि एक अधेड़ शख्स स्कूटर चला रहा था और चेतना उस के पीछे बैठी थी. वह अपने दोनों हाथों से उस अधेड़ शख्स को जकड़े हुए थी. शाम को घर आ कर मोहनलाल ने यह बात मोनिका को बताई. मोनिका ने अकेले में चेतना से पूछा, ‘‘आज तुम दोपहर में किस के साथ स्कूटर पर जा रही थीं?’’ चेतना ने बताया कि वह बायोलौजी पढ़ाने वाले सर के साथ थी.
इस पर मोनिका ने पूछा, ‘‘तुम उन के साथ कहां गई थीं?’’
‘‘फिल्म देखने.’’
‘‘क्यों? तुम टीचर के साथ फिल्म देखने क्यों गई थीं?’’
‘‘अरे मां, 30 नंबर का प्रैक्टिकल होता है. अगर सर खुश हो गए, तो 30 में से पूरे 30 नंबर भी दे सकते

हैं. अगर वे चाहें, तो कैमिस्ट्री और फिजिक्स के टीचरों से भी प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर दिला सकते हैं.’’
‘‘तो प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर पाने के लिए तुम अपनी इज्जत लुटा दोगी?’’ मोनिका ने चीखते हुए कहा.
‘‘क्यों मां, इस में बुराई क्या है? आखिर आप भी तो मनचाही चीजें पाने के लिए यही करती हैं,’’ चेतना ने मां को घूरते हुए कहा.
यह सुन कर मोनिका के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उस का मुंह खुला का खुला रह गया.
बैडरूम में चुपचाप बैठे मांबेटी की बात सुन रहे मोहनलाल का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वे दोनों अपने ही
बनाए गए दलदल में छटपटाने के लिए मजबूर थे.                             

डा. जीके शर्मा

Hindi Story: कफन – कैसे हटा रफीक मियां के सर से कफन सीने वाले दर्जी का लेबल

Hindi Story: ‘‘आजकल कितने कफन सी लेते हो?’’ रहमत अली ने रफीक मियां से पूछा.

‘‘आजकल धंधा काफी मंदा है,’’ रफीक मियां ने ठहरे स्वर में कहा.

‘‘क्यों, लोग मरते नहीं हैं क्या?’’

इस बेवकूफाना सवाल का जवाब वह भला रहमत अली को क्या दे सकता था. मौतें तो आमतौर पर होती ही रहती हैं. मगर सब लोग अपनी आई मौत ही मर रहे थे. आतंकवादियों द्वारा कत्लेआम का सिलसिला पिछले कई महीनों से कम सा हो गया था.

कश्मीर घाटी में अमनचैन की हवा फिर से बहने लगी थी. हर समय दहशत, गोलीबारी, बम विस्फोट भला कौन चाहता है. बीच में भारी भूकंप आ गया था. हजारों आदमी एकदम से मुर्दों में बदल गए थे.

सरकारी सप्लाई के महकमे में रफीक का नाम भी बतौर सप्लायर रजिस्टर्ड था. एकदम से बड़ा आर्डर आ गया था. दर्जनों अस्थायी दर्जियों का इंतजाम कर उसे आर्डर पूरा करना पड़ा था.

आर्डर से कहीं ज्यादा बड़े बिल और वाउचर पर उस को अपनी फर्म की नामपते वाली मुहर लगा कर दस्तखत करने पड़े थे. खुशी का मौका हो या गम का, सरकारी अमला सरकार को चूना लगाने से नहीं चूकता.

रफीक पुश्तैनी दर्जी था. उस के पिता, दादा, परदादा सभी दर्जी थे. कफन सीना दोयम दर्जे का काम था. कभी सिलाई मशीन का चलन नहीं था. हाथ से कपड़े सीए जाते थे. दर्जी का काम कपड़े सीना मात्र था. कफन कपड़े में नहीं गिना जाता था. कपड़े जिंदा आदमी या औरतें पहनती हैं न कि मुर्दे.

घर में मौत हो जाने पर संस्कार या जनाजे के समय ही कफन सीआ जाता था. कोई भी दुकानदार या व्यापारी सिलासिलाया कफन नहीं बेचता था और न ही तैयार कफन बेचने के लिए रखता था.

मगर बदलते जमाने के साथ आदमी ज्यादा पैदा होने लगे और ज्यादा मरने भी लगे. लिहाजा, तैयारशुदा कफनों की जरूरत भी पड़ने लगी थी. मगर अभी तक कफन सीने का काम बहुत बड़े व्यवसाय का रूप धारण नहीं कर पाया था.

फिर आतंकवाद का काला साया घाटी और आसपास के इलाकों पर छा गया तो अमनचैन की फिजा मौत की फिजा में बदल गई थी.

कामधंधा और व्यापार सब चौपट हो गया था. सैलानियों के आने के सीजन में भी बाजार, गलियां, चौक सब में सन्नाटा छा गया था. कभी कश्मीरी फैंसी डे्रसें, चोंगे, चूड़ीदार पायजामा, अचकन, लहंगा चोली, फैंसी जाकेट, शेरवानी, कुरतापायजामा, गरम कोट सीने वाले दर्जी व कारीगर सभी खाली हो भुखमरी का शिकार हो गए थे.

फिर जिस कफन को हिकारत या मजबूरी की वस्तु समझा जाता था वही सब से ज्यादा मांग वाली चीज बन गई थी. यानी थोक में कफनों की मांग बढ़ने लगी थी.

ढेरों आतंकी या दहशतगर्द मारे जाने लगे थे. उतने ही फौजी भी. आम आदमियों की कितनी तादाद थी कोई अंदाजा नहीं था. बस, इतना अंदाजा था कि कफन सिलाई का धंधा एक कमाई का धंधा बन गया था.

सफेद कपड़े से पायजामाकुरता भी बनता था. रजाइयों के खोल भी बनते थे और कभीकभार कफन भी बनता था. कपड़े की मांग तो बराबर पहले जैसी थी. मगर कपड़ा अब जिंदों के बजाय मुर्दों के काम ज्यादा आने लगा था. आखिर खुदा के घर भेजने से पहले मुर्दे को कपड़े से ढांकना भी जरूरी था. नंगा होने का लिहाज हर जगह करना ही पड़ता है…चाहे लोक हो या परलोक.

विडंबना की बात थी, आदमी नंगा ही पैदा होता है. दुनिया में कदम रखते ही उस को चंद मिनटों में ही कपड़े से ढांप दिया जाता और मरने के बाद भी कपड़े से ही ढका जाता है.

जिंदों के बजाय मुर्दों के कपड़ों का काम करना या सीना हिकारत का काम था. मगर रोजीरोटी के लिए सब करना पड़ता है. वक्त का क्या पता, कैसे हालात से सामना करा दे?

अलगअलग तरह के कपड़ों के लिए अलगअलग माप लेना पड़ता था. डिजाइन बनाने पड़ते थे. मोटा और बारीक दोनों तरह का काम करना पड़ता था. मगर, कफन का कपड़ा काटना और सीना बिना झंझट का काम था. लट््ठे के कपड़ों की तह तरतीब से जमा कर उस पर गत्ते का बना पैटर्न रख निशान लगा वह बड़ी कैंची से कपड़ा काट लेता था. फिर वह खुद और उस के लड़के सिलाई कर के सैकड़ों कफन एक दिन में सी डालते थे.

आतंकवाद के जनून के दौरान मरने वाले काफी होते थे. लिहाजा, धंधा अच्छा चल निकला था. दहशतगर्दी ने जहां साफसुथरा सिलाई का धंधा चौपट कर दिया था वहीं कफन सीने का काम दिला उस जैसे पुश्तैनी कारीगरों को काम से मालामाल भी कर दिया था.

जैसेजैसे काम बढ़ता गया वैसेवैसे मशीनों की और कारीगरों की तादाद भी बढ़ती गई. मगर जैसा काम होता है वैसा ही मानसिक संतुलन बनता है.

सिलाई का बारीक और डिजाइनदार काम करने वाले कारीगरों का दिमाग जहां नएनए डिजाइनों, खूबसूरत नक्काशियों और अन्य कल्पनाओं में विचरता था वहां सारा दिन कफन सीने वाले कारीगरों का दिमाग और मिजाज हर समय उदासीन और बुझाबुझा सा रहता था. उन्हें ऐसा महसूस होता था मानो वे भी मौत के सौदागरों के साथी हों और हर मुर्दा उन के सीए कफन में लपेटे जाते समय कोई मूक सवाल कर रहा हो.

दर्जीखाने का माहौल भी सारा दिन गमजदा और अनजाने अपराध से भरा रहता था. सभी कारीगरों को लगता था कि इतनी ज्यादा तादाद में रोजाना कफन सी कर क्या वे सब मौत के सौदागरों का साथ नहीं दे रहे. क्या वे सब भी गुनाहगार नहीं हैं?

दर्जीखाने में कोई भी खातापीता नहीं था. दोपहर का खाना हो या जलपान, सब बाहर ही जाते थे. रफीक के पास रुपया तो काफी आ गया था मगर वह भी खोयाखोया सा ही रहता था. कफन आखिर कफन ही था.

जैसे बुरे वक्त का दौर शुरू हुआ था वैसे ही अच्छे वक्त का दौर भी आने लगा. हुकूमत और आवाम ने दहशतगर्दी के खिलाफ कमर कस ली थी. हालात काबू में आने लगे थे.

फिर मौत का सिलसिला थम सा गया तो कफन की मांग कम हो गई. एक मशीन बंद हुई, एक कारीगर चला गया, फिर दूसरी, तीसरी और अगली मशीन बंद हो गई, फिर पहले के समान दुकान में 2 ही मशीनें चालू रह पाईं. बाकी सब बंद हो गईं.

उन बंद पड़ी मशीनों को कोई औनेपौने में भी खरीदने को तैयार नहीं था क्योंकि हर किसी को लगता था, कफन सीने में इस्तेमाल हुई मशीनों से मुर्दों की झलक आती है. तंग आ कर रफीक ने सभी मशीनों को कबाड़ी को बेच दिया.

कफन सीना कम हो गया या कहें लगभग बंद हो गया मगर थोड़े समय तक किया गया हिकारत वाला काम रफीक के माथे पर ठप्पा सा लगा गया. उस को सभी ‘कफन सीने वाला दर्जी’ कहने लगे.

धरती का स्वर्ग कही जाने वाली घाटी में दहशतगर्दी खत्म होते ही सैलानियों का आना फिर से शुरू हो गया था. ‘मौत की घाटी’ फिर से ‘धरती का स्वर्ग’ कहलाने लगी थी. मगर रफीक फिर से आम कपड़े का दर्जी या आम कपड़े सीने वाला दर्जी न कहला कर ‘कफन सीने वाला दर्जी’ ही कहलाया जा रहा था.

इस ‘ठप्पे’ का दंश अब रफीक को ‘चुभ’ रहा था. सारा रुपया जो उस ने दहशतगर्दी के दौरान कमाया था बेकार, बेमानी लगने लगा था. उस का मकान कभी पुराने ढंग का साधारण सा था मगर किसी को चुभता न था. आम आदमी के आम मकान जैसा दिखता था.

मगर अंधाधुंध कमाई से बना कोठी जैसा मकान अब एक ऐसे आलीशान ‘मकबरे’ के समान नजर आता था जिस के आधे हिस्से में कब्रिस्तान होता है. मगर जिस में कोई भी संजीदा इनसान रहने को राजी नहीं हो सकता.

रफीक मियां और उस के कुनबे को इस हालात में आने से पहले हर पड़ोसी, जानपहचान वाला, ग्राहक सभी अपने जैसा ही समझते थे. सभी उस से बतियाते थे. मिलतेजुलते थे. मगर एक दफा कफन सीने वाला दर्जी मशहूर हो जाने के बाद सभी उस से ऐसे कतराते थे मानो वह अछूत हो.

पिछली कई पीढि़यों से दर्जी चले आ रहे खानदानी दर्जी के कई पीढि़यों के खानदानी ग्राहक भी थे. कफन सीने का काम थोक में करने के कारण या मोटी रकम आने के कारण रफीक उन की तरफ कम देखने या कम ध्यान देने लगा था. धीरेधीरे वे भी उस को छोड़ गए थे.

दहशतगर्दी खत्म हो जाने के बाद हालात आम हो चले थे. मगर रफीक के पुराने और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे ग्राहक वापस नहीं लौटे थे.

कफन सीना बंद हो चला था, लिहाजा, कमाई बंद हो गई थी. सैलानियों से काम ले कर देने वाले या सैलानियों को आम कश्मीरी पोशाकें, कढ़ाईदार कपड़े बेचने वाले दुकानदारों ने उस पर लगे ठप्पे की वजह से उसे काम नहीं दिया था.

जिस तरह झंझावात, अंधड़, आंधी या मूसलाधार बरसात में कुछ नहीं सूझता उसी तरह दहशतगर्दी की आंधी में बहते आ रहे आवाम को वास्तविक जिंदगी का एहसास माहौल शांत होने पर ही होता था.

यही हालात अब रफीक के थे. आतंकवाद से पहले इलाके में दोनों समुदाय के लोग थे. एक समुदाय थोड़ा बड़ा था दूसरा थोड़ा छोटा. जान की खैर के लिए एक समुदाय बड़ी तादाद में पलायन कर गया था.

अब घाटी में मुसलमान ही थे. हिंदू बराबर मात्रा में होते और वे भी काम न देते तो रफीक को मलाल न होता मगर अब जब सारी घाटी में मुसलमान ही मुसलमान थे और जब उसी के भाईबंदों ने उसे काम नहीं दिया तो महसूस होना ही था.

कफन सिर्फ कफन होता है. उस को हिंदू, मुसलमान, सिख या अन्य श्रेणी में नहीं रखा जा सकता मगर उस को आम हालात में कौन छूना पसंद करता है?

एक कारीगर दर्जी से कफन सीने वाला दर्जी कहलाने पर रफीक को महसूस होना स्वाभाविक था. उसी तरह क्या उस की कौम भी दुनिया की नजरों में आने वाले समय या इतिहास में दहशतगर्दी फैलाने या मौत की सौदागरी करने वाली कहलाएगी?

रफीक से भी ज्यादा मलाल उस के परिवार की महिला सदस्यों को होता था कि उन का अपना ही मुसलिम समाज उन को अछूत मानने लगा था.

रफीक को खानापीना नहीं सुहाता. शरीर सूखने लगा था. हरदम चेहरे पर शर्मिंदगी छाई रहती थी.

शुक्रवार की नमाज का दिन था. जुम्मा होने की वजह से आज छुट्टी भी थी. नमाज पढ़ी जा चुकी थी. वह मसजिद के दालान में अभी तक बैठा था तभी वहां बड़े मौलवी साहब आ पहुंचे. दुआसलाम हुई.

‘‘क्या हाल है, रफीक मियां? क्या तबीयत नासाज है?’’

‘‘नहीं जनाब, तबीयत तो ठीक है मगर…’’ रफीक से आगे बोला न गया.

‘‘क्या कोई परेशानी है?’’ मौलवी साहब उस के समीप आ कर बैठ गए.

‘‘आजकल काम ही नहीं आता.’’

‘‘क्यों…अब तो माहौल ठीक हो चुका है. सैलानी तफरीह करने खूब आ रहे हैं. बाजारों में रश है.’’

‘‘मगर मुझ पर हकीर काम करने वाले का ठप्पा लग गया है.’’

‘‘तो क्या?’’

रफीक की समस्या सुन कर मौलवी साहब भी सोच में पड़ गए. क्या कल की तारीख या इतिहास में उन की कौम भी आतंकवादियों का समुदाय कहलाएगी?

रफीक की परेशानी तो फौरी ही थी. काम आ ही जाएगा, नहीं आया तो पेशा बदल लेगा. मगर जिस पर उस का अपना समुदाय चलता आ रहा था उस का नतीजा क्या होगा?

‘‘अब्बाजान, हमारा धंधा अब नहीं जम सकता. क्यों न कोई और काम कर लें?’’ बड़े लड़के अहमद मियां ने कहा.

रफीक खामोश था. पीढि़यों से सिलाई की थी. अब क्या नया धंधा करें?

‘‘क्या काम करें?’’

‘‘अब्बाजान, दर्जी के काम के सिवा क्या कोई और काम नहीं है?’’

‘‘वह तो ठीक है, मगर कुछ तो तजवीज करो कि क्या नया काम करें?’’ रफीक के इस सीधे सवाल का जवाब बेटे के पास नहीं था. वह खामोश हो गया.

रफीक दुकान पर काम हो न हो बदस्तूर बैठता था. दुकान की सफाई भी नियमित होती थी. बेटा अपने दोस्तों में चला गया था. पेट भरा हो तो भला काम करने की क्या जरूरत थी? बाप की कमाई काफी थी. खाली बातें करने या बोलने में क्या जाता था?

हुक्के का कश लगा कर रफीक कुनकुनी धूप में सुस्ता रहा था कि उस की दुकान के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.

पुलिस? पुलिस क्या करने आई थी? रफीक हुक्का छोड़ उठ खड़ा हुआ. तभी उस का चेहरा अपने पुराने ग्राहक सिन्हा साहब को देख कर चमक उठा.

एक दशक पहले 3 सितारे वाले सदर थाने में एस.एच.ओ. होते थे. अब शायद बड़े अफसर बन गए थे.

‘‘आदाब अर्ज है, साहब,’’ रफीक ने तनिक झुक कर सलाम किया.

‘‘क्या हाल है, रफीक मियां?’’ पुलिस कप्तान सिन्हा साहब ने पूछा.

‘‘सब खैरियत है, साहब.’’

‘‘क्या बात है, बाहर बैठे हो…क्या आजकल काम मंदा है?’’

‘‘बस हुजूर, थोड़ा हालात का असर है.’’

‘‘ओह, समझा, जरा हमारी नई वरदी सी दोगे?’’

‘‘क्यों नहीं, हुजूर, हमारा काम ही सिलाई करना है.’’

एस.एच.ओ. साहब एस.पी. बन गए थे. कई साल वहां रहे थे. ट्रांसफर हो कर कई जगह रहे थे. अब यहां बड़े अफसर बन कर आए थे.

रफीक मियां की उदासी, निरुत्साह सब काफूर हो गया था. वह आग्रहपूर्वक कप्तान साहब को पिस्तेबादाम वाली बरफी खिला रहा था, साथ ही मसाले वाली चाय लाने का आर्डर दे रहा था. आखिर उस के माथे से कफन सीने वाले दर्जी का लेबल हट रहा था.

कप्तान साहब नाप और कपड़ा दे कर चले गए थे. रफीक मियां जवानी के जोश के समान उन की वरदी तैयार करने में जुट गए थे.

कप्तान साहब की भी वही हालत थी जो रफीक की थी. 2 परेशान जने हाथ मिला कर चलें तो सफर आसान हो जाता है. Hindi Story

Hindi Family Story: क्या मैं गलत हूं – शादीशुदा मयंक को क्या अपना बना पाई मायरा?

Hindi Family Story: पियाबालकनी में आ कर खड़ी हो गई. खुली हवा में सांस ले कर ऐसा लगा जैसे घुटन से बाहर आ गई हो. आसपास का शांत वातावरण, हलकीहलकी हवा से धीरेधीरे लहराते पेड़पौधे, डूबता सूरज सबकुछ सुकून मन को सुकून सा दे रहा था. सामने रखी चेयर पर बैठ कर आंखें मूंद लीं. भरसक प्रयास कर रही थी अपने को भीतर से शांत करने का. लेकिन दिमाग शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. एक के बाद एक बात दिमाग में आती जा रही थी…

मैं पिया इस साल 46 की हुई हूं. जानपहचान वाले अगर मेरा, मेरे परिवार का खाका खींचेंगे तो सब यही कहेंगे, वाह ऐश है पिया की, अच्छाखासा खातापीता परिवार, लाखों कमाता पति, होशियार कामयाब बच्चे, नौकरचाकर और क्या चाहिए किसी को लाइफ में खुद भी ऐसी कि 4 लोगों के बीच खड़ी हो जाए तो अलग ही नजर आती है. खूबसूरती प्रकृति ने दोनों हाथों से है. ऊपर से उच्च शिक्षा ने उस में चारचांद लगा दिए. तभी तो मयंक को वह एक नजर में भा गई थी.

‘नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी, बेंगलुरु’ से मास्टर डिगरी ली थी उस ने.

जौब के बहुत मौके थे. मयंक का गारमैंट्स का बिजनैस देशविदेश में फैला था. फैशन इलस्टेटर की जौब के लिए उस ने अप्लाई किया था. उस के डिजाइन्स किए गारमैंट्स के कंपनी को काफी बड़ेबड़े और्डर मिले. मयंक की अभी तक उस से मुलाकात नहीं हुई, बस नाम ही

सुना था.

पिया के काम की तारीफ और स्पैशल इंसैंटिव के लिए मयंक ने उसे स्पैशल अपने कैबिन में बुलाया. कंपनी के सीईओ से मिलना पिया के लिए फक्र की बात थी.

मयंक को देखा तो देखती रह गई. किसी फिल्मी हीरो जैसी पर्सनैलिटी थी उस की. लेकिन पिया कौन सी कम थी. मयंक के दिल में उसी दिन से उतर गई थी. पिया कंपनी के सीईओ के लिए कुछ ऐसावैसा सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन मयंक ने तो बहुत कुछ सोच लिया था पिया को देख कर. अब तो वह नित नए बहाने बना कर पिया को डिस्कस करने के लिए कैबिन में बुला लेता. पिया बेवकूफ तो थी नहीं कि कुछ सम?ा न पाती. मयंक ने उस से जब बातों ही बातों में शादी का प्रस्ताव रखा तो पिया को लगा कि कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रही. सपनों का राजकुमार उसे मिल गया था.

शादी के बाद पिया का हर दिन सोना और रात चांदी थी. 1 साल के अंदर ही पिया बेटे अनुज की मां बन गई और डेढ़ साल बाद ही स्वीटी की किलकारियों से घर फिर से गुलजार हो गया.

कहते हैं न जब प्रकृति देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है. दोनों बच्चे एक से बढ़ कर एक होशियार. अनुज 12वीं के बाद ही आस्ट्रेलिया चला गया और वहां से बीबीए करने के बाद उस ने मयंक के साथ बिजनैस संभाल लिया. बापबेटे की देखरेख में बिजनैस खूब फूलफल रहा था. स्वीटी का एमबीबीएस करते हुए शशांक के साथ अफेयर हो गया तो दोनों की पढ़ाई खत्म होते हुए उन की शादी कर दी. आज दोनों मिल कर अपना बड़ा सा क्लीनिक चला रहे हैं.

पिया की यह कहानी सुन कर यह लगेगा न वाऊ क्या लाइफ है. पिया को भी ऐसा लगता है. लेकिन लाइफ यों ही मजे से गुजरती रहे ऐसा भला होता है? बस पिया की जिंदगी में भी ट्विस्ट आना बाकी था.

मयंक का अपने बिजनैस के सिलसिले में दुबई काफी आनाजाना था. मायरा जरीवाला गुजरात से थी. गारमैंट्स स्टार्टअप से शुरुआत की थी उस ने और आज उस की गुजराती टचअप लिए क्लासिक और मौडर्न ड्रैसेज की खूब डिमांड हो रही थी. बहुत महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. मयंक की गारमैंट इंडस्ट्री के साथ टाइअप कर के वह अपने और पांव पसारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने दुबई में मयंक के साथ एक मीटिंग रखी थी.

मयंक 48 वर्ष का हो चुका था. कहते हैं कि पुरुष इस उम्र में अपने अनुभव, अपने धीरगंभीर व्यक्तित्व और पैसे वाला हो तो उस की पर्सनैलिटी में गजब की रौनक आ जाती है. माएरा मयंक के इस रोबीले व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. उस की कंपनी के साथ टाइअप के साथसाथ उस की जिंदगी के साथ भी टाइअप करने की उस ने ठान ली.

पता नहीं क्यों पत्नी चाहे कितनी ही खूबसूरत, प्यार करने वाली हो, हर तरह से खयाल रखने वाली हो, लेकिन जहां कोई दूसरी औरत, ऊपर से खूबसूरत लाइन देने लगे तो पुरुष को उस की तरफ खिंचते हुए ज्यादा देर नहीं लगती. मयंक भी पुरुष था. मायरा एक बिजनैस वूमन थी. ऊपर से पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी 35 साल की खूबसूरत औरत.

मयंक धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होता गया. मायरा नए दौर की औरत थी, जिस के लिए पुरुष के साथ रिलेशनशिप बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. अपनी खुशी उस के लिए सब से ज्यादा माने रखती थी. मयंक और वह अब अकसर दुबई में ही मिलते और हफ्ता साथ बिता कर अपनेअपने बिजनैस में लग जाते. दोनों बिजनैस वर्ल्ड में अपनी रैपो बना कर रखना चाहते थे.

‘‘मयंक डियर, मु?ो बुरा लगता है कि मेरे कारण तुम पिया के साथ धोखा कर रहे हो. लेकिन मैं क्या करूं. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. अब मेरी खुशी तुम से जुड़ी है,’’ मायरा मयंक को अपनी बांहों के घेरे में घेरती हुई बोली.

‘‘मायरा, मैं तुम से ?ाठ नहीं बोलूंगा. पिया से मैं भी प्यार करता हूं. लेकिन अब जब भी तुम्हारे साथ होता हूं मु?ो अजीब सा सुकून मिलता है. मैं उसे कोई दुख नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन तुम्हें अब छोड़ भी नहीं सकता. वह मेरी जिंदगी है तो तुम मेरी सांस हो. मायरा, अब मैं तुम्हें जीवनभर यों ही प्यार करना चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब तक पिया की जगह एक तरफ

है और तुम्हारी दूसरी तरफ. मैं दोनों को ही शिकायत का मौका नहीं देना चाहता,’’ मयंक ने मायरा को एक भरपूर किस करते हुए अपने आगोश में ले लिया.

मयंक ने पूरी कोशिश की थी कि पिया को मायरा के बारे में कुछ पता न चले.

वह मायरा के साथ अपनी सारी चैट साथ ही

साथ डिलीट कर देता था. मोबाइल में अपना फिंगर पासवर्ड लगा रखा था. पिया खुद भी मयंक का मोबाइल कभी चैक नहीं करती थी, पूरा विश्वास जो था उस पर, लेकिन उस दिन मयंक नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम में गया मायरा के 2-3 व्हाट्सऐप मैसेज आ गए.

पिया की नजर मोबाइल पर पड़ी. मोबाइल पर 2-3 बार बीप की आवाज हुई. नोटीफिकेशन में माई डियर लिखा दिख गया.

पिया का माथा ठनक गया. अब उसे मयंक की हरकतों पर शक होना शुरू हो गया. मयंक का बिजनैस ट्रिप की बात कह कर जल्दीजल्दी दुबई जाना, मोबाइल चैट पढ़ते हुए मंदमंद मुसकान, उस पर जरूरत से ज्यादा प्यार लुटाना, बातवेबात उसे गिफ्ट दे कर खुश रखना.

अपनी बौडी फिटनैस के लिए जिम एक दिन भी मिस न करना, डाइट पर पूरापूरा ध्यान देना जिस के लिए वह कहतेकहते थक जाती थी, लेकिन वह लापरवाही करता था. पिया को एक के बाद एक सब बातें जुड़ती नजर आने लगीं.

मयंक की जिंदगी में आजकल क्या चल रहा है उस का पता लगाना उस के लिए मुश्किल नहीं था. मयंक का ऐग्जीक्यूटिव असिस्टैंट समीर को एक तरह से पिया ने ही जौब पर रखा था. वह उस की फ्रैंड सीमा का कजिन था. समीर पिया की बहुत इज्जत करता था और अपनी बड़ी बहन मानता था.

पिया ने जब समीर से मयंक के प्रेमप्रसंग के बारे में पूछा तो उस ने अपना नाम बीच में न आने की बात कह पिया को मायरा के बारे में सबकुछ बता दिया.

समीर उसे मायरा और मयंक के बीच के बारे में बताता जा रहा था और पिया को लग रहा था जैसे उस के सपनों का महल जिसे उस ने प्यार से मजबूत बना दिया था आज रेत की तरह ढह गया है.

कहां कमी छोड़ दी थी उस ने. सबकुछ तो मयंक के कहे अनुसार करती रही थी. उस ने कहा नौकरी छोड़ दो, उस ने छोड़ दी. अपने कैरियर के पीक पर थी वह लेकिन मयंक के प्यार के आगे सब फीका लगा. उस ने कहा कि पिया बच्चों की देखभाल तुम्हारी जिम्मेदारी है, मैं अपने काम में बिजी हूं, तो यह बात भी उस ने मयंक की चुपचाप मान ली थी.

बच्चों की हर जिम्मेदारी उस ने खुद पर ले ली थी. अड़ोसपड़ोस, नातेरिश्तेदार, घरबाहर की सब व्यवस्था उस ने संभाल ली थी. किस के लिए, मयंक के लिए न, क्योंकि मयंक ही उस की दुनिया था. सबकुछ उस से ही तो जुड़ा था और उस ने कितनी आसानी से मायरा को उस के हिस्से का प्यार दे दिया. यह भी नहीं सोचा कि उस पर क्या बीतेगी, जब उसे पता चलेगा.

पिया को ऐसा लग रहा था जैसे उस की नसों में गरम खून दौड़ रहा है. तनमन दहक रहा है. मन कर रहा था कि मयंक को सब के सामने शर्मसार कर दे.

पिया यह सब तू क्या सोच रही है’, अचानक पिया को अपने मन की आवाज सुनाई दी, ‘पिया, यह तो तु?ो मयंक के बारे में अचानक शक हो गया तो तू ने सच पता कर लिया. अगर उस दिन फोन नहीं देखती तो? सबकुछ वैसा ही चलता रहता जैसे पिछले कई बरसों से चलता आ रहा है.’

पिया की सोच जैसे तसवीर का दूसरा पहलू देखने लगी थी. आज समाज में मयंक का एक रुतबा है. बेटे की बिजनैस टाइकून की इमेज बनी हुई. बेटी स्वीटी अपनी ससुराल में सिरआंखों पर बैठाई जाती है, क्योंकि उस का मायका रुसूखदार है. खुद का सोसाइटी में हाई प्रोफोइल स्टेट्स रखती है. आज अगर वह मुंह खोलती है तो मयंक के इस अफेयर को ले कर मीडिया वाले मिर्चमसाला लगा कर जगजाहिर कर देंगे. उन के बिजनैस पर इस का बहुत फर्क पड़ेगा.

बरसों से कमाई गई शोहरत पर ऐसा धब्बा लगेगा जिस का खमियाजा अनुज को भुगतना पड़ेगा, बेटा जो है. अभी तो उस का पूरा भविष्य पड़ा है आगे अपनी शोहरत बटोरने के लिए. स्वीटी के लिए मयंक उस के आइडियल पापा हैं. समाज में कितना रुतबा है उन के खानदान का. ऊफ, सब मिट्टी में मिल जाएगा. सोचतेसोचते पिया का सिर चकराने लगा था.

‘‘पिया मैडम, जरा संभल कर. आप ठीक तो हैं न, आप यहां आराम से बैठिए,’’ समीर ने पिया को कुरसी पर बैठाते हुए कहा.

पिया को पानी का गिलास दिया तो वह एक सांस में पी गई. उस की चुप्पी सबकुछ वैसा ही चलते रहने देगी जैसे चलता आ रहा है और अपने साथ हो रही बेवफाई को सरेआम करती है तो सच बिखर जाएगा. दिल और दिमाग में टकराव चल रहा था.

अचानक पिया कुरसी से उठ खड़ी हुई. पर्स से मोबाइल निकाला और

मयंक को फोन मिलाया, ‘‘मयंक, कहां हो तुम.’’

‘‘डार्लिंग, मीटिंग के लिए बाहर आया था. क्यों क्या बात है?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘वह मैं तुम्हारे औफिस आई थी कि साथ लंच करते हैं.’’

‘‘ओह, यह बात है. नो प्रौब्लम, ऐसा करो तुम शंगरिला होटल पहुंचो, मैं सीधा तुम्हें वहां

15 मिनट में मिलता हूं. साथ लंच करते हैं वहां,’’ मयंक ?ाट से बोला.

‘‘ठीक है मैं पहुंचती हूं,’’ बोल कर पिया ने फोन काट दिया.

पिया जब होटल पहुंची तो मयंक उसे उस का इंतजार करता मिला.

पिया को लगा जैसे मयंक वही तो है जैसे पहले था. उस का खयाल रखने वाला. उसे इंतजार न करना पड़े इसलिए खुद पहले पहुंच जाना. मयंक के प्यार में कमी तो उसे कहीं दिख नहीं रही.

दोनों ने साथ लंच किया और मयंक ने उसे घर छोड़ा और औफिस चला गया, क्योंकि 4 बजे उस की क्लाइंट के साथ फिर मीटिंग थी.

घर आ कर पिया बालकनी में बैठ गई थी. उस ने निर्णय ले लिया. मयंक का सबकुछ बिखेर कर रख देगा. जो कुछ वह देख पा रही है शायद मयंक ने उस बारे में सोचा तक नहीं है. उस का सबकुछ तबाह हो जाएगा.

मयंक ने शायद सोचा ही नहीं कि मायरा के साथ उस की खुशी बस तभी तक है जब तक सब परदे के पीछे है. सच सामने आ गया तो सब खत्म हो जाएगा. न प्यार का यह नशा रहेगा, न परिवार में इज्जत, न समाज में मानप्रतिष्ठा.

‘उस की तो दोनों तरफ हार है. मयंक की तबाही से उसे क्या हासिल होगा. खुशी तो मिलने से रही. फिर यह ?ाठ ही क्यों नहीं अपना लिया जाए,’ पिया दिल को एक तरफ रख दिमाग से सोचने लगी, ‘मयंक उस से मायरा का सच छिपाने के लिए उस से बेइंतहा प्यार करने लगा है. प्यार तो कर रहा है न.

‘उस के प्यार के बिना वह नहीं रह सकती. नहीं जी पाएगी वह उस के बिना. मयंक इस भुलावे में रहे कि वह उस की सचाई जानती तो अच्छा ही है. सब अच्छी तरह तो चल रहा है.

‘पत्नी हूं मैं उस की, मेरा हक कोई और छीन नहीं सकता. पतिपत्नी के रिश्ते में सचाई होनी चाहिए. यह बात मानती है वह लेकिन अगर आज वह मयंक को उस के सच के साथ नंगा कर देगी तो क्या उन के बीच वह पहले जैसा प्यार रह पाएगा? नहीं, कई बार झूठ को ही अपनाना पड़ता है. दवा कड़वी होती है, लेकिन इलाज के लिए खानी ही पड़ती है.’

पिया ने अब निर्णय ले लिया और एक नई पहल शुरू करने के लिए वह कमरे के भीतर गई. लाइट औन की. पूरा कमरा लाइट से जगमगा उठा. अब अंधेरा नहीं था. मयंक के सामने जाहिर नहीं होने देगी कि वह सब जान चुकी है. शायद यही सब के लिए ठीक है. गलत तो नहीं है वह कहीं? Hindi Family Story

Story In Hindi: औरों से जुदा – निशा ने जब खुद को रवि को सौंपने का फैसला किया

Story In Hindi: अपनीसहेली महक का गुस्से से लाल हो रहा चेहरा देख कर निशा मुसकराने से खुद को रोक नहीं सकी. बोली, ‘‘मयंक की बर्थडे पार्टी में तेरे बजाय रवि प्रिया को क्यों ले जा रहा है?’’ निशा की मुसकराहट ने महक का गुस्सा और ज्यादा भड़का दिया.

निशा ने प्यार से महक का हाथ थामा और फिर शांत स्वर में जवाब दिया, ‘‘परसों रविवार को मेरा जापानी भाषा का एक महत्त्वपूर्ण इम्तिहान है, इसलिए मैं ने रवि को सौरी बोल दिया था. रही बात प्रिया की, तो वह रवि की अच्छी फ्रैंड है. दोनों का पार्टी में साथ जाना तुझे क्यों परेशान कर रहा है?’’ ‘‘क्योंकि मैं प्रिया को अच्छी तरह जानती हूं. वह तेरा पत्ता साफ रवि को हथियाना चाहती है.’’

‘‘देख एक सुंदर, स्मार्ट और अमीर लड़के को जीवनसाथी बनाने की चाह हर लड़की की तरह प्रिया भी अपने मन में रखती है, तो क्या बुरा कर रही है?’’ ‘‘तू रवि को खो देगी, इस बात को सोच कर क्या तेरा मन जरा भी चिंतित या परेशान नहीं होता है?’’

‘‘नहीं, क्योंकि रवि की जिंदगी में मुझ से बेहतर लड़की और कोई नहीं है,’’ निशा का स्वर आत्मविश्वास से लबालब था. ‘‘उस ने पहले मुझ से ही पार्टी में चलने को कहा था, यह क्यों भूल रही है तू?’’

‘‘प्रिया को रवि के साथ जाने का मौका दे कर तू ने गलती करी है, निशा. तुम जैसी मेहनती लड़की को इम्तिहान में पास होने की चिंता करनी ही नहीं चाहिए थी. रवि के साथ पार्टी में तुझे ही जाना चाहिए था, बेवकूफ.’’ ‘‘सच बात तो यह है कि मेरा मन भी नहीं लगता है रवि के अमीर दोस्तों के द्वारा दी जाने वाली पार्टियों में, महक. लंबीलंबी कारों में आने वाले मेहमानों की तड़कभड़क मुझे नकली और खोखली लगती है. न वे लोग मेरे साथ सहज हो पाते हैं और न मैं उन सब के साथ. तब रवि भी पार्टी का मजा नहीं ले पाता है. इन सब कारणों से भी मैं ऐसी पार्टियों में रवि के साथ जाने से बचती हूं,’’ निशा ने बड़ी सहजता से अपने मन की बात महक से कह दी.

‘‘तू मेरी एक बात का सचसच जवाब देगी?’’ ‘‘हां, दूंगी.’’

‘‘क्या तू रवि से शादी करने की इच्छुक नहीं है?’’

कुछ पलों के सोचविचार के बाद निशा ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘यह सच है कि रवि मेरे दिल के बेहद करीब है…उस का साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है, लेकिन हमारी शादी जरूर हो, ऐसी उलझन मैं अपने मन में नहीं पालती हूं. भविष्य में जो भी हो मुझे स्वीकार होगा.’’ ‘‘अजीब लड़की है तू,’’ महक हैरानपरेशान हो उठी, देख, ‘‘अमीर खानदान की बहू बन कर तू अपने सारे सपने पूरे कर सकेगी. तुझे रवि को अपना बना कर रखने की कोशिशें बढ़ा देनी चाहिए. इस मामले में जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वासी होना गलत और नुकसानदायक साबित होगा, निशा.’’

‘‘रवि को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए मेरा उस के पीछे भागना मूर्खतापूर्ण और बेहूदा लगेगा, महक. अच्छे जीवनसाथी साथसाथ चलते हैं न कि आगेपीछे.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘अब लेकिनवेकिन छोड़ और मेरे साथ जिम चल. कुछ देर वहां पसीना बहा कर मैं तरोताजा होना चाहती हूं,’’ निशा ने एक हाथ में अपना बैग उठाया और दूसरे हाथ से महक का हाथ पकड़ कर बाहर चल पड़ी. निशा ने अपनी मां को जिम जाने की बात बताई और फिर दोनों सहेलियां फ्लैट से बाहर आ गईं.

जिम में अच्छीखासी भीड़ इस बात की सूचक थी कि लोगों में स्वस्थ रहने व स्मार्ट दिखने की इच्छा बढ़ती जा रही है. निशा वहां की पुरानी सदस्य थी, इसलिए ज्यादातर लोग उसे जानते थे. उन सब से हायहैलो करते हुए वह पसीना बहाने में दिल से लग गई. लेकिन महक की दिलचस्पी तो उस से बातें करने में कहीं ज्यादा थी.

खुद को फिट रखने की आदत ने निशा की फिगर को बहुत आकर्षक बना दिया था. उस का पसीने में भीगा बदन वहां मौजूद हर पुरुष की प्रशंसाभरी नजरों का केंद्र बना हुआ था. उन नजरों में अश्लीलता का भाव नहीं था, क्योंकि अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वह उन सभी की दोस्ती, स्नेह व आदरसम्मान की पात्रता हासिल कर चुकी थी. लगभग 1 घंटा जिम में बिताने के बाद दोनों घर चल पड़ीं.

‘‘यू आर द बैस्ट, निशा,’’ अचानक महक के मुंह से निकले इन प्रशंसाभरे शब्दों को सुन कर निशा खुश होने के साथसाथ हैरान भी हो उठी. ‘‘थैंकयू, स्वीटहार्ट, लेकिन अचानक यों प्यार क्यों दर्शा रही है?’’ निशा ने भौंहें मटकाते हुए पूछा.

‘‘मैं सच कह रही हूं, सहेली. तेरे पास क्या नहीं है? सुंदर नैननक्श, गोरा रंग, लंबा कद… एमकौम, एमबीए और जापानी भाषा की जानकारी…बहुराष्ट्रीय कंपनी में शानदार नौकरी…एक साधारण से स्कूल मास्टर की बेटी के लिए ऐसे ऊंचे मुकाम पर पहुंचना सचमुच काबिलेतारीफ है.’’ ‘‘जो गुण और परिस्थितियां कुदरत ने दिए हैं, मैं न उन पर घमंड करती हूं और न ही कोई शिकायत है मेरे मन में. अपने व्यक्तित्व को निखारने व कड़ी मेहनत के बल पर अच्छा कैरियर बनाने के प्रयास दिल से करते रहना मेरे लिए हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है. अपनी गरीबी और सुखसुविधाओं की कमी का बहाना बना कर जिंदगी में तरक्की करने का अपना इरादा कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया. मेरे इसी गुण ने मुझे इन ऊंचाइयों तक पहुंचाया है,’’ अपने मन की बातें बताते हुए निशा की आवाज में उस का आत्मविश्वास साफ झलक रहा था.

‘‘अब रवि से तेरी शादी भी हो जाए तो फिर तेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं रहेगी,’’ महक ने भावुक लहजे में अपने मन की इच्छा दर्शाई. कुछ पल खामोश रह कर निशा ने किसी दार्शनिक के से अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने अपनी खुशियों को रवि के साथ शादी होने से बिलकुल नहीं जोड़ रखा है. कुछ खास पा कर अपनी खुशियां हमेशा के लिए तय कर लेना मुमकिन भी नहीं होता है, सहेली. जीवनधारा निरंतर गतिमान है और मैं अपनी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर बनाने को निरंतर गतिशील रहना चाहती हूं. मेरे लिए यह जीवन यात्रा महत्त्वपूर्ण है, मंजिलें नहीं. रवि से मेरी शादी हो गई, तो मैं खुश हूंगी और नहीं हुई तो दुखी नहीं हूंगी.’’

‘‘तुम दूसरी लड़कियों से कितनी अलग हो.’’ ‘‘सहेली, हम सब ही इस दुनिया में अनूठे और भिन्न हैं. दूसरों से अपनी तुलना करते रहना अपने समय व ताकत को बेकार में नष्टकरना है. मैं अपनी जिंदगी को खुशहाल अपने बलबूते पर बनाना चाहती हूं. इस यात्रा में रवि मेरा साथी बनता है, तो उस का स्वागत है. ऐसा नहीं होता है, तो भी कोई गम नहीं क्योंकि कोई दूसरा उपयुक्त हमराही मुझे जरूर मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

‘‘शायद तेरे इस अनूठेपन के कारण ही रवि तेरा दीवाना है… तेरा आत्मविश्वास, तेरी आत्मनिर्भरता ही तेरी ताकत और अनूठी पहचान है.’’ महक के मुंह से निकले इन वाक्यों को सुन कर निशा बड़े रहस्यमयी अंदाज में मुसकराने लगी थी.

महक और निशा ने घर का आधा रास्ता ही तय किया होगा जब रवि की कार उन की बगल में आ कर रुकी. उसे अचानक सामने देख कर निशा का चेहरा गुलाब के फूल सा खिल उठा. ‘‘हाय, तुम यहां कैसे?’’ निशा ने रवि से प्रसन्न अंदाज में हाथ मिलाया और फिर छोड़ा

ही नहीं. ‘‘पार्टी में जाने का मन नहीं किया,’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए जवाब दिया, ‘‘कुछ समय तुम्हारे साथ बिताने के बाद पार्टी में जाऊंगा.’’

‘‘क्या? प्रिया को भी साथ ले जाओगे?’’ महक चुभते से लहजे में यह पूछने से खुद को नहीं रोक पाई. ‘‘नहीं, वह अमित के साथ जा चुकी है. चलो, आइसक्रीम खाने चलते हैं,’’ रवि ने महक के सवाल का जवाब लापरवाही से देने के बाद अपना ध्यान फिर से निशा पर केंद्रित कर लिया.

‘‘पहले मुझे घर छोड़ दो,’’ महक का मूड उखड़ा सा हो गया. ‘‘ओके,’’ रवि ने साथ चलने के लिए महक पर जरा भी जोर नहीं डाला.

निशा रवि की बगल में और महक पीछे की सीट पर बैठ गई तो रवि ने कार आगे बढ़ा दी. ‘‘पहले तुम दोनों मेरे घर चलो,’’ निशा ने मुसकराते हुए माहौल को सहज करने की कोशिश करी. ‘‘नहीं, यार. मैं कुछ वक्त सिर्फ तुम्हारे साथ गुजारना चाहता हूं,’’ रवि ने उस के प्रस्ताव का फौरन विरोध किया.

‘‘पहले घर चलो, प्लीज,’’ निशा ने प्यार से रवि का कंधा दबाया, ‘‘मां के हाथ की बनी एक खास चीज तुम्हें खाने को मिलेगी.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘वह सीक्रेट है.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘प्लीज, बड़े प्यार से करी गई प्रार्थना को रवि अस्वीकार नहीं कर सका और फिर कार निशा के घर की तरफ मोड़ दी.’’

महक अपने घर की तरफ जाना चाहती थी, पर निशा ने उसे प्यार से डपट कर खामोश कर दिया. वह समझती थी कि उस की सहेली रवि को उस के प्रेमी के रूप में उचित प्रत्याशी नहीं मानती है. महक को डर था कि रवि उसे प्रेम में जरूर धोखा देगा. काफी समझाने के बाद भी निशा उस के इस डर को दूर करने में सफल नहीं रही थी. इसीलिए जब ये दोनों उस के साथ होती थीं, तब उसे माहौल खुश बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास हमेशा करना पड़ता था.

रवि मीठा खाने का शौकीन था. निशा की मां के हाथों के बने शाही टोस्ट खा कर उस की तबीयत खुश हो गई. मीठा खा कर महक अपने घर चली गई. निशा ने रवि को खाना खिला कर ही भेजा. हंसतेबोलते हुए 2 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला.

‘‘लंबी ड्राइव पर जाने का मौसम हो रहा है,’’ ताजी ठंडी हवा को चेहरे पर महसूस करते हुए रवि ने कार में बैठने से पहले अपने मन की इच्छा व्यक्त करी. ‘‘आज के लिए माफी दो. फिर किसी दिन कार्यक्रम…’’

‘‘परसों चलने का वादा करो…, इम्तिहान के बाद?’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए पूछा. ‘‘श्योर,’’ निशा ने फौरन रजामंदी जाहिर

कर दी. ‘‘इम्तिहान खत्म होते ही निकल लेंगे.’’

‘‘ओके.’’ ‘‘पूछोगी नहीं कि कहां चलेंगे?’’

‘‘तुम्हारा साथ है, तो हर जगह खूबसूरत बन जाएगी.’’

‘‘आई लव यू.’’ ‘‘मी टू.’’

रवि ने निशा के हाथ को कई बार प्यार से चूमा और फिर कार आगे बढ़ा दी. रवि के चुंबनों के प्रभाव से निशा के रोमरोम में अजीब सी मादक सिहरन पैदा हो गई थी. दिल में अजीब सी गुदगुदी महसूस करते हुए वह अपने कमरे में लौटी और तकिए को छाती से लगा कर पलंग पर लेट गई. रवि के बारे में सोचते हुए उस का तनमन अजीब सी खुमारी में डूबता जा रहा था. उस के होंठों की मुसकान साफ जाहिर कर रही थी कि उस वक्त उस के सपनों की दुनिया बड़ी रंगीन बनी हुई थी.

रविवार को दोपहर 12 बजे निशा की जापानी भाषा की परीक्षा समाप्त हो गई. वह हौल से बाहर आई तो उस ने रवि को अपना इंतजार करते पाया. सिर्फ 1/2 घंटे बाद रवि की कार दिल्ली से आगरा जाने वाले राजमार्ग पर दौड़ रही थी. दोनों का साथसाथ किसी दूसरे शहर की यात्रा करने का यह पहला मौका था.

मौसम बहुत सुहावना था. ठंडी हवा अपने चेहरों पर महसूस करते हुए दोनों प्रसन्न अंदाज में हसंबोल रहे थे. कुछ देर बाद निशा आंखें बंद कर के मीठे, प्यार भरे गाने गुनगुनाने लगी. रवि रहरह कर उस के सुंदर, शांत चेहरे को देख मुसकराने लगा.

‘‘तुम संसार की सब से सुंदर स्त्री हो,’’ रवि के मुंह से अचानक यह शब्द निकले, तो निशा ने झटके से अपनी आंखें खोल दीं.

रवि की आंखों में अपने लिए गहरे प्यार के भावों को पढ़ कर उस के गौरे गाल गुलाबी हो उठे और फिर शरमाए से अंदाज में वह सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘झूठे.’’

रवि ने कार की गति धीमी करते हुए उसे एक पेड़ की छाया के नीचे रोक दिया. फिर उस ने झटके से निशा को अपनी तरफ खींचा और उस के गुलाबीि होंठों पर प्यारा सा चुंबन अंकित कर दिया. निशा की तेज सांसों और खुले होंठों ने उसे फिर से वैसा करने को आमंत्रित किया, तो रवि के होंठ फिर से निशा के होंठों से जुड़ गए.

इस बार का चुंबन लंबा और गहन तृप्ति देने वाला था. उस की समाप्ति पर दोनों ने एकदूसरे की आंखों में गहन प्यार से झांका. ‘‘तुम एक जादूगरनी हो,’’ निशा की पलक को चूमते हुए रवि ने उस की तारीफ करी.

‘‘वह तो मैं हूं,’’ निशा हंस पड़ी. ‘‘मेरा दिल इस वक्त मेरे काबू में नहीं है.’’

‘‘मेरा भी.’’ ‘‘मैं तुम्हें जी भर कर प्यार करना चाहता हूं.’’

‘‘मैं भी.’’ ‘‘सच?’’

निशा ने बेहिचक ‘हां’ में सिर ऊपरनीचे हिलाया, तो रवि की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. ‘‘क्या तुम्हें अपनी बदनामी का, अपनी छवि खराब होने का डर नहीं है?’’

‘‘क्या करना है और क्या नहीं, इसे मैं दूसरों की नजरों से नहीं तोलती हूं, रवि.’’ ‘‘फिर भी शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने को समाज गलत मानता है, खासकर लड़कियों के लिए.’’

निशा ने आगे झुक कर रवि के गाल को चूमा और फिर सहज अंदाज में बोली, ‘‘स्वीटहार्ट, पुरानी मान्यताओं को जबरदस्ती ओढ़े रखने में मेरा विश्वास नहीं है. मैं इतना जानती हूं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूं और तुम्हारा स्पर्श मेरे रोमरोम में मादक झनझनाहट पैदा कर देता है.’’ ‘‘तुम्हारे साथ सैक्स संबंध बनाने का फैसला मैं तुम्हारी और अपनी खुशियों को ध्यान में रख कर करूंगी. वैसा करने के लिए तुम मुझ से शादी करने का झूठासच्चा वादा करो, यह कतई जरूरी नहीं है.’’

‘‘तो क्या तुम मेरे साथ सोने को तैयार हो?’’ ‘‘बड़ी खुशी से,’’ निशा का ऐसा जवाब सुन कर रवि जोर से चौंका, तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘तुम्हें समझना मेरे बस की बात नहीं है. साधारण से घर में पैदा हुई लड़की इतनी असाधारण… इतनी अनूठी… इतनी आत्मविश्वास से भरी कैसे हो गई है?’’ कार को फिर से आगे बढ़ाते हुए हैरान रवि ने यह सवाल मानो खुद से ही पूछा हो. ‘‘जिस के पास अपने सपनों को पूरा करने के लिए हिम्मत, लगन और कठिन मेहनत करने जैसे गुण हों, वह इंसान साधारण घर में पैदा होने के बावजूद असाधारण ऊंचाइयां ही छू सकती है,’’ होंठों से बुदबुदा कर निशा ने रवि के सवाल का जवाब खुद को दिया और फिर रवि के हाथ को प्यार से पकड़ कर शांत अंदाज में आंखें मूंद लीं.

आत्मविश्वासी निशा अपने भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थी. मस्त अंदाज में सीटी बजा रहे रवि ने भी भविष्य को ले कर एक फैसला उसी समय कर लिया. ताजमहल के सामने निशा के सामने शादी करने का प्रस्ताव रखने का निर्णय लेते हुए उस का दिल अजीब खुशी और गुदगुदी से भर उठा था, साधारण बगीचे में उगे इस असाधारण फूल की महक से वह अपना भावी जीवन भर लेने को और इंतजार नहीं करना चाहता था. Story In Hindi

Internship Opportunity: इंटर्नशिप

Internship Opportunity: घर की मुरगी दाल बराबर नहीं, न से ‘नौकरी’. कितना सुखद और शानदार शब्द है… हर उस बेरोजगार के लिए जो हर लिहाज से काबिल तो है, पर बेचारे को मिल नहीं पा रही है. यह बात अलग है कि आजकल जो नौजवान सोशल मीडिया पर रील स्क्रौलिंग में अपना अंगूठा घिसते रहते हैं, उन्हें तो यही नौकरी पाने के लिए न जाने कितनी तरह के पापड़ बेलने पड़ सकते हैं.
देश में बढ़ती बेरोजगारी और नौकरियों की कमी से अब इन पापड़ों का भी कोई मोल नहीं रह गया है, क्योंकि सरकारी हो या प्राइवेट, नौकरी पाना खाला के घर जाने जितना आसान तो बिलकुल भी नहीं है. पर जिस तरह से कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट एजूकेशनल इंस्टीट्यूट खुल गए हैं, उम्मीद की एक किरण यह नजर आती है कि बहुत सी प्राइवेट कंपनियां नौकरी देने से पहले बहुत बार छात्रों को इंटर्नशिप दे देती हैं.
अब यह इंटर्नशिप क्या बला है?
इंटर्नशिप एक ऐसा टैम्परेरी काम होता है, जो किसी छात्र या नए ग्रेजुएट को किसी फील्ड में प्रैक्टिकल नौलेज और एक्सपीरियंस हासिल करने के लिए दिया जाता है. यह आमतौर पर कुछ महीनों से एक साल तक चलता है और कभीकभी पैसे के साथ या बिना पैसे के भी हो सकता है.
इसी के साथ दूसरा सवाल भी मन में उठ सकता है कि इंटर्नशिप करना क्यों जरूरी है? वैसे, इंटर्नशिप करने का फायदा यह हो सकता है :
– छात्र को थ्योरी के साथसाथ रिएल वर्क एनवायरनमैंट का एक्सपीरिंयस मिलता है.
– नई स्किल्स सीखने और मौजूदा स्किल्स को बेहतर बनाने का मौका मिलता है.
– इंडस्ट्री के प्रोफैशनल्स से जुड़ने और कनैक्शन बनाने का मौका हासिल होता है.
– जो इंटर्न अच्छा काम करते हैं, उन्हें कई बार कंपनियां अपने यहां फुलटाइम जौब औफर करती हैं.
– इंटर्नशिप से इंटर्न का रेज्यूमे (बायोडाटा) ज्यादा मजबूत बनता है.
इतना सब होने के बावजूद बहुत से इंटर्न अपनी इंटर्नशिप को सीरियसली नहीं लेते हैं. उन्हें यह बोरिंग काम लगता है. पर ऐसा होने की वजह क्या है?

इंटर्न अपनी इंटर्नशिप को सीरियसली क्यों नहीं लेते?
दिल्ली कालेज औफ आर्ट्स एंड कौमर्स, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक छात्र आदिब खान, जो फिलहाल इंटर्न हैं, का मानना है, ‘‘इंटर्नशिप एक दिलचस्प दौर होता है. जब मैं ने नईनई इंटर्नशिप शुरू की थी, तब मैं काफी जोश में था कि अपने से सीनियर और ज्यादा अनुभवी लोगों के साथ काम करने का मौका मिलेगा.
‘‘लेकिन कुछ दिनों बाद ऐसा महसूस होने लगा कि वे अपना ज्यादातर काम  ही करवा रहे हैं. कभीकभी यह भी लगता था कि जब उन से कम पैसे मिल रहे हैं, तो मैं उन के जितना काम क्यों करूं?
‘‘लेकिन धीरेधीरे यह एहसास हुआ कि मैं ऐसा बहुतकुछ सीख रहा हूं, जो मेरे कैरियर और जिंदगी में आगे चल कर काम आएगा. आज के समय में, जब प्रतियोगिता इतनी ज्यादा बढ़ गई है, तो बिना इंटर्नशिप के अनुभव के कार्पोरेट दुनिया में अपनी अच्छी जगह बनाना बहुत मुश्किल हो गया है.’’
आदिब खान ने बहुत अच्छी बात कही. लेकिन यहां पर सब से बड़ी कमी इंटर्न की से जुड़ी होती है, क्योंकि वे इंटर्नशिप को टैम्परेरी और कम इम्पोर्टेंस देते हैं. साथ ही, अगर इंटर्नशिप अनपेड या कम पैसे वाली हो तो इंटर्न का मोटिवेशन कम हो सकता है.

कच्ची उम्र का भी बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. इस वजह से इंटर्न के अपनी इंटर्नशिप के मकसद और एक्सपेक्टेशन क्लियर नहीं हो पाते हैं. अमूमन कोई इंटर्नशिप ऐसे समय में होती है जब छात्र अपनी पढ़ाई के आखिरी साल में होता है. इस के चलते छात्र को पढ़ाई और दूसरी एक्टिविटीज के साथ बैलेंस करना मुश्किल लगता है. बहुत बार इंटर्नशिप देने वाली कंपनी भी इंटर्न को सपोर्ट नहीं करती है और उस में मैंटौरशिप की भारी कमी दिखाई देती है. इस से इंटर्न कभीकभार निराशा के घेरे में चला जाता है.
पर हमेशा ऐसा नहीं होता. कालेज औफ वोकेशनल स्टडीज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में दूसरे साल के एक छात्र ईशान शर्मा ने बताया, ‘‘इंटर्नशिप जौइन करने का मेरा खास मकसद यह है कि मैं अपने खर्चों को खुद संभाल सकूं और जिंदगी में ज्यादा इंडिपैंडैंस महसूस कर सकूं.
‘‘यह मेरी पहली इंटर्नशिप है, इसलिए मेरे लिए यह एक नया और सीखने का भरपूर अनुभव है. मेरे कलीग्स बहुत सहयोगी हैं और हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं. खासतौर पर मेरे मैनेजर नईनई चीजें सिखाते हैं और हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन करते हैं, जिस से मेरा कौन्फिडैंस बढ़ता है. मैं इसी तरह सीखते हुए अपने कौशल को बेहतर बनाना चाहता हूं और भविष्य में और ज्यादा कामयाब बनना चाहता हूं.’’

याद रखिए कि जब भी कोई कंपनी किसी को अपने यहां इंटर्न रखती है, तो वह उस पर बहुत खर्चा करती है. उस पर अपना बेशकीमती समय देती है. इंटर्न को यह बात कभी भी महसूस नहीं होती है. वे अनगढ़ पत्थर की तरह होते हैं और इंटर्नशिप उन्हें कीमती और चमकदार बनाने की पहली पौलिश होती है.
इस बात को ध्रुव कालिया के विचार सच साबित करते हैं. नैशनल यूनिवर्सिटी औफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज (एनयूएएलएस), कोच्चि के आखिरी साल में पढ़ाई कर रहे इस छात्र ने बताया, ‘‘टाटा एआईए में मेरी इंटर्नशिप ने किसी पेशेवर की तरह सीखने की समझ दी.
‘‘इस से यह भी समझआया कि बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में कानून के नियम कैसे काम करते हैं और मुझे कालेज की किताबों से परे कानून की असली दुनिया में उन के लागू होने की जानकारी दी. इंटर्नशिप ने मेरी पेशेवर कुशलता को भी बढ़ाया और कार्पोरेट प्रैक्टिस में अपनी जवाबदेही की अहमियत को समझने में मदद मिली.
‘‘कुलमिला कर, इस एक्सपीरिंयस ने मेरे कानूनी विकास में अहम योगदान दिया और कार्पोरेट कानूनी ढांचे के भीतर अपनी उम्मीदों और जिम्मेदारियों को निखारने में मदद की.’’
लिहाजा, जब भी कोई छात्र कहीं इंटर्नशिप करता है, तो वहां टाइमपास करने के लिए न जाए वरना उस की आगे की जिंदगी टाइमपास बनते देर नहीं करेगी. जो भी काम करें, उस में जीजान लगा दें. कंपनी ने आप में विश्वास जताया है, तो आप की भी जिम्मेदारी बनती है कि उस विश्वास पर सौ फीसदी खरे उतरें.                           

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