Addiction : मैं नशे की लत को छोड़ना चाहता हूं पर छोड़ नहीं पा रहा.

Addiction : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं पंजाब के फगवाड़ा शहर का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 22 साल है. मेरे परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं है. पर पिछले कुछ समय से मुझे नशा करने की लत लग गई है. इस में शराब, सिगरेट और दूसरे नशे भी शामिल हैं. यह लत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि मेरा सारा जेबखर्च इसी में खत्म हो जाता है. परिवार वालों को भी मेरी इस लत का पता चल चुका है और वे मुझे किसी भी तरह से विदेश भेजना चाहते हैं, लेकिन मैं यहीं पंजाब में रहना चाहता हूं. लेकिन यहां समस्या वही नशे की है. मैं नशा छोड़ना चाहता हूं, पर छोड़ नहीं पा रहा हूं. इस बात से मैं बहुत परेशान रहता हूं. मैं क्या करूं?

जवाब –

आप एक बार तय कर लें कि नशा छोड़ना ही है, तो दुनिया की कोई ताकत आप के संकल्प को डिगा नहीं सकती. आप की इच्छाशक्ति यानी विल पावर ही आप को इस लत से छुटकारा दिला सकती है और यह आप के लिए आसान भी है, क्योंकि आप नशे के नुकसान समझते हैं.

नशे की लत से सेहत और इज्जत दोनों चले जाते हैं. किसी स्पैशलिस्ट डाक्टर से मिल कर इलाज शुरू करें और नशेडि़यों की संगत से दूर रहें. नशे के आदी लोग रोज इसे छोड़ने की कसम खाते हैं, जो तलब लगते ही टूट जाती है. इस से उन की विल पावर कमजोर होती है. वे खुद पर ही खीजने लगते हैं और गिल्ट से भरने लगते हैं. आप इस से बचें.

विदेश जाना इस समस्या का हल नहीं है, क्योंकि नशे का सामान पूरी दुनिया में आसानी से मिल जाता है. इस मामले में कोई दूसरा मसलन डाक्टर और नशा मुक्ति केंद्र वगैरह एक हद तक ही आप की मदद कर सकते हैं, इस के बाद जिम्मेदारी आप की ही बनती है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

Hindi Story : एक थी मालती

Hindi Story : यकीन करना मुश्किल था कि बीस साल पहले मैं उस कमरे में रहता था. पर बात तो सच थी. सन 1990 से 1993 तक छपरा में पढ़ाई के दौरान मैने रहने के कई ठिकाने बदले पर जो लगाव शिव शंकर पंडित के मकान से हुआ वो बहुत हद तक आज भी कायम है. छोटे छोटे आठ दस खपरैल कमरों का वो लाॅज था. उन्हीं में से एक में मैं रहता था. किराया 70 रूपये से शुरू होकर मेरे वहां से हटते हटते 110 तक पहुंचा था. यह बात दीगर है कि मैने कभी समय पर किराया दिया नहीं. पंडित का वश चले तो आज भी सूद समेत मुझसे कुछ उगाही कर लें. एक बार तो पंडित ने मेरे कुछ मित्रों से आग्रह किया था कि भाई उनसे कहिए कि उल्टा हमसे दो महीने का किराया ले लें और हमारा मकान खाली कर दें.

पंडित का होटल भी था जहां पांच रुपये में भर पेट खाने का प्रावधान था. मेरा खाना भी अक्सर वहीं होता था. पंडिताइन लगभग आधा दिन गोबर और मिट्टी में ही लगी रहती. कभी उपले बनाती कभी मिट्टी के बर्तन. जब खाने जाओ, झट से हाथ धोती और चावल परोसने लगती. सच कहूं उस वक्त बिल्कुल घृणा नहीं होती थी. बल्कि गोबर और मिट्टी की खुशबु से खाने में और स्वाद आ जाता.

उनकी एक बेटी थी.. मालती.

1993 उधर उसकी शादी हुई, इधर मैने उसका मकान खाली किया. वैसे मालती से मेरा कोई खास अंतरंग रिश्ता नहीं था. मगर उसके जाने के बाद एक अजीब सा सूनापन नजर आ रहा था. मन उचट सा गया था. इसलिए मैंने वहां से हटने का निश्चय किया. इसके पहले कि दुसरा ठिकाना खोजता, नौकरी लग गई और मैंने छपरा को अलविदा कह दिया.

बीस साल बाद छपरा में एक दिन मैं बारिश में घिर गया और मेरी मोटरसाइकिल बंद हो गई. सोचा क्यों न बाइक को पंडित के घर रख दें। कल फिर आकर ले जाएंगे.

मै बाइक को धकेलते और बारिश में भीगते वहां पहुंचा. पंडित का होटल अब मिठाई की दुकान में तब्दील हो गया था.

पंडिताइन मुझे देखते ही पहचान गयी. चाय बनाने लगी. मैंने उनसे कहा- भौजी आप चाय बनाइए तब तक मैं अपना कमरा देखकर आता हूँ जहाँ मैं रहता था.

पीछे लाॅज की ओर गया. सारे कमरे लगभग गिर चुके थे. अपने कमरे के दरवाजे को मैं आत्मीयता से सहलाने लगा. तभी मेरी नजर एक चित्र पर गयी. दिल का रेखाचित्र और बीच में अंग्रेजी का एम. यादें ताजी हो गयी. एक दिन मैंने मालती से कहा था- अबे वो बौनी, नकचढी, नाक से बोलने वाली लडकी, तेरा ये मकान मैं तभी खाली करूंगा जब तू ससुराल चली जाएगी.

इसपर वो बनावटी गुस्से में बोली- ये मेरा मकान है। जब चाहें तब निकाल दे तुम्हे, ये लो, और उसने खुरपी से दरवाजे पर दिल का रेखाचित्र बनाया और बीच में एम लिख दिया.

मालती का कद काफी छोटा था. लाॅज के सारे लडके उसे बौनी कहते थे मगर उसके पीछे. वो जानते थे कि मालती खूंखार है, सुन लेगी तो खूरपी चला देगी. ये हिम्मत मैने की. एक दिन उससे कहा- ऐ तीनफुटिया, जरा अपनी दुकान से चाय लाकर तो दे.

उसने कहा –  चाय नहीं, जहर लाकर दूंगी भालू.

नहाने का कार्यक्रम खुले में होता था नल के नीचे और मालती ने बालों से भरा मेरा बदन देख लिया था, इसलिए मुझे वो भालू कहती थी.

मैं समझ गया कि उसे बुरा नहीं लगा था. कुछ मस्ती मै कर रहा था, कुछ वो। फिर तो मस्ती का सिलसिला चल पड़ा.

पंडित के घर के पिछले हिस्से में लाॅज था. अगले हिस्से में वो रहते थे। बीच में एक पतली गली थी.

मालती हम लोगों के लिए अलार्म का काम भी करती थी.

सुबह सुबह गाय लेकर उस गली से  गुजरती तो जोर से आवाज लगाती.. कौन कौन जिन्दा है? जो जिन्दा है, वो उठ जाए, जो मर गया उसका राम नाम सत्य.

मै जानता था कि मरने वाली बात वो मेरे लिए बोलती थी क्योंकि मैं सुबह देर तक सोता था. खैर उसके इसी डायलॉग से मेरी नींद खुलती थी। फिर भी कभी अगर नींद नहीं खुलती तो मारटन टाफी चलाकर मारती.

उन दिनों बिहार में मारटन टाफी का खूब प्रचलन था. उनका एक राशन दुकान भी था जहां उनका बेटा यानि मालती का बड़ा भाई बैठता था. उस समय मैं महज उन्नीस का था. इतनी मैच्योरिटी नहीं थी. मैंने मालती के राशन दुकान का भरपूर फायदा उठाया. जब कभी वो गली से गुजरती में अपने आप से ही जोर जोर से कहता.. यार कोलगेट खत्म हो गया, पैसे भी नहीं, मालती बहुत अच्छी लडकी है, उससे कह दो तो कोलगेट क्या पूरी दुकान लाकर दे दे. फिर क्या थोड़ी देर बाद दरवाजे पर कोलगेट पड़ा मिलता. फिर तो कभी साबुन कभी कभी चीनी कभी कुछ मै अपनी जुगत से हासिल करने लगा.

एक दिन वो गली में टकरा गयी. बोली- तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो? दिन रात जो तारीफ करते हो. क्या सचमुच मैं उतनी अच्छी और सुंदर हूँ?

मैने उससे मुस्करा कर कहा-  तुम तो बहुत सुंदर हो. सिर्फ थोड़ा कद छोटा है, नाक थोड़ी टेढ़ी है, दांत खुरपी जैसे हैं और गर्दन कबूतर जैसी. बाकी कोई कमी नहीं. सर्वांग सुंदरी हो.

वह लपकी.. तुम किसी दिन मेरी खुरपी से कटोगे. अब खा लेना मारटन टाफी.

शरारतों का सिलसिला यूंही चलता रहा. एक दिन उसका रिश्ता आया. बाद में पता चला कि लडके वालों ने उसे नापसंद कर दिया.

यह मालती के लिए सदमे जैसा था. कई दिनों तक वो घर से निकली नहीं और जब निकली तो बदल चुकी थी. वो वाचाल और चंचल लडकी अब मूक गुडिया बन चुकी थी।. उसका ये शांत रूप मुझे विचलित करने लगा. एक दिन मैंने उसे गली में घेर लिया। पूछा-  तू आजकल इतनी शांत कैसे हो गई?

वो बोली-  तुम झूठे हो। कहते थे कि मालती सुंदरी है. लडके वाले रिजेक्ट करके चले गये.

मैने उसे समझाया- धत पगली वो लडका ही तेरे लायक नहीं था। तेरे नसीब में तो कोई राजकुमार है.

वो भोली भाली मालती फिर से मेरी बातों का यकीन कर बैठी. अब फिर वो पहले की तरह चहकने लगी और कुछ दिनों बाद सचमुच उसकी शादी तय हो गई.

उसने मुझसे पूछा- तुम मेरी शादी में आओगे न?

मैने चिर परिचित अंदाज में जवाब दिया- चाहे धरती इधर की उधर हो जाये, मैं तेरी शादी जरूर अटेंड करूंगा.

उसकी शादी हो गई. संयोग देखिए, जिस दिन शादी थी उसी दिन मेरा पटना में इम्तिहान था. मैं अटेंड नहीं कर सका. मालती चली गई थी अपने साथ समस्त उर्जा लेकर.

मालती के जाने के बाद, कुछ खाली खाली सा लगने लगा था. समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है. कहां चली गई उर्जा. ऐसा कबतक चल सकता था?

कुछ दिनों बाद मैने भी वो कमरा खाली कर दिया.

भौजी की चाय तैयार थी. मै चाय पी ही रहा था कि पंडित जी भी आ गए. बातों बातों में मैंने उनसे पूछा.. मालती कैसी है? कहां है आजकल?

तब पंडिताइन ने बताया-  मालती…. वो अब दुनिया में नहीं.

मेरे पैर तले जमीन खिसक गई. कांपते स्वर में पूछा-  कब हुआ ये सब?

पंडिताइन ने आंखें पोंछते हुए कहा-  शादी के दो साल बाद ही. डिलीवरी के दौरान जच्चा बच्चा दोनों.

ओह…… तब मैंने सोचा कितना बदनसीब हूँ मैं. एक लड़की जो मुझे बेइंतहा चाहती थी, न मैं उसकी शादी में शामिल हो सका न जनाजे में.

और तो और उसकी मौत की खबर भी मिली उसके मरने के 15 साल बाद.

लेखक- दीपक कुमार

Short Story : जीने की राह

Short Story : मैंचांद साधारण घर से थी. मुझे याद है कि मेरे पापा के पास हम 6 बहनभाई को अच्छा खिलाने और पहनाने के बाद कोई खास पूंजी नहीं बचती थी. जैसे ही मैं ने कालेज किया, लोगों ने मेरी शादी के बारे में बात करना शुरू कर दिया. मैं इस के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थी. मुझे अभी भी पढ़ना था और मेरा परिवार भी अभी शादी करने के बारे में ज्यादा नहीं सोच रहा था. वजह न जाने क्या थी, पर वे लोग तैयार नहीं थे.

मेरी जिंदगी गुजरती जा रही थी. मैं ट्यूशन क्लास दे कर जो भी कमाती थी, सब खानेपहनने पर ही खर्च कर देती थी. नौकरी करने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि मुसलिम लड़कियां नौकरी नहीं करतीं.

मैं देखने में कोई ज्यादा खूबसूरत नहीं थी. मेरा रंग थोड़ा गहरा था. वैसे भी मैं दुबलीपतली थी और सोने पर सुहागा यह कि मेरे दांत भी थोड़े आगे निकले हुए थे. सब लोग मुझे ‘काली’, ‘दांतों’ और न जाने क्याक्या कह कर बुलाते. किसी को कभी मेरी ऐजूकेशनल क्वालिटी नजर न आती.

इन बातों को सुन कर कभी मैं भावुक हो कर रोती, तो कभी गुस्से में आ कर बहस करती, ‘‘जाओ, ऊपर वाले से जा कर लड़ो, जिस ने मुझे ऐसा बनाया.’’

मैं अपनी मां से कहती, ‘‘मां, मुझे काली क्यों पैदा किया? मुझे भी खूबसूरत पैदा करती…’’

मेरी मां कभी मुझे शांत हो कर देखती रह जातीं और कभी समझातीं. मैं ने 26 साल का आंकड़ा पार कर लिया था. इन सालों में मैं ने डबल सब्जैक्ट्स में मास्टर्स की डिगरी हासिल की थी.

मैं ने अपनी ऐजूकेशन के लिए सब गहने बेच दिए, क्योंकि मेरा परिवार नहीं चाहता था कि मैं प्रोफैशनल कोर्स करूं, तो उन्होंने कोई सपोर्ट नहीं किया. मुझे नौकरी की इजाजत नहीं मिली. हर कोई पूछा करता था कि शादी नहीं हुई? रिश्ता नहीं हुआ? मैं थक गई थी सुनसुन कर. अब और नहीं. शादी करने के लिए ही मजबूर हो गई.

रिश्तों के आने का एक सिलसिला शुरू हुआ. रिश्ते एक तो आते बहुत मुश्किल से थे और अगर आते भी थे  तो वे मुझे नापसंद कर जाते.

पहली बार में मुझे बहुत गुस्सा आया, लेकिन फिर आदत हो गई. वजह, मेरे नैननक्श से ज्यादा हमारी माली हालत थी. मेरा परिवार लड़की दे सकता था, पर कार कैसे देता? और वह एक गोरी बहू भी नहीं दे सकता था.

मां और मेरी छोटी बहन बिलकुल टूट चुकी थीं. मुझे मेरी मां की उदासी अंदर तक तोड़ देती थी. जब कोई परिवार आता और बिना कोई जवाब दिए उठ कर चला जाता, तो मेरी हिम्मत नहीं होती थी उन का चेहरा देखने की.

अब मैं ने सोच लिया था कि बस बहुत हुआ, अब यह सब अब और नहीं. मैं ने रूढि़वाद को खत्म करने की सोच ली. मैं ने अच्छा कोर्स किया. मैं ने टीचर बन कर पढ़ाना शुरू किया. साथ में पढ़ाई भी करती रही. दिनभर पढ़ाना और रात को पढ़ना मेरा रूटीन बन गया.

मैं ने सब की मरजी न होते हुए भी आईसीएस एग्जाम दिया और टौप किया. बस, अब मेरे खराब दिन खत्म हुए और ऐसी रोशनी आई, जिस ने सब तरफ का अंधेरा मिटा दिया. सब लोग मेरे बारे में अच्छे तरीके से बात कर रहे थे. हर कोई मेरी काबिलीयत को सलाम कर रहा था. कई लोग मुझ से शादी करना चाहते थे, लेकिन अब मुझे शादी नहीं करनी थी.

मैं ने अपने मांबाप को सपोर्ट किया. अपनी 4 बहनों की शादी की. खुद के बारे में भी सोचना था मुझे और मैं ने सोचा भी. एक प्यारी सी बेटी को गोद लिया और उस का नाम रखा ‘चांदनी’.

अब मेरी जिंदगी में कुछ बुरा नहीं है. मैं खुश हूं. मैं अगर बुरे वक्त में जिंदगी से हार कर खुदकुशी कर लेती तो क्या होता? कुछ नहीं, इसलिए निराश न हों परेशानी से, बल्कि प्रेरणा बनें दूसरों की.

लेखक- इरफना परवीन

Short Story : बीरा ने बढ़ाया अपने गांव का मान-सम्मान

Short Story : आज भी बीरा के मांबाप को भजन सिंह चेताने आए थे, ‘‘तुम अपनी बेटी को संभाल कर रखो, नहीं तो मैं उस के हाथपैर तोड़ दूंगा.’’

हर रोज बीरा किसी न किसी लड़के से झगड़ा कर लेती थी. गांव के लड़के बीरा को हमेशा छेड़ा करते थे, ‘तुम लड़के जैसी लगती हो, लेकिन तुम्हारी आवाज लड़की जैसी है. एक पप्पी नहीं दोगी…’

कोई लड़का बीरा के गाल को पकड़ लेता तो कोई मौका मिलते ही उस की छाती को भी. बीरा कभी बरदाश्त नहीं करती और मारपीट पर उतारू हो जाती. स्कूल, गलीमहल्ले, खेतखलिहान, खेल के मैदान, बीरा को हर रोज इन समस्याओं से जूझना पड़ता था.

धीरेधीरे पूरे गांव में यह प्रचार होने लगा कि बीरा किन्नर है.

इसी बीच बीरा की मां की मौत हो गई. अब तो बीरा की परेशानियों को दुनिया में समझने वाला भी कोई नहीं रहा. बीरा की मां उसे एक लड़की की तरह जिंदगी जीने का सलीका सिखाने आई थी. खाना बनाना, बरतन धोना, लड़की की तरह सिंगार करना, सबकुछ उस ने अपनी मां से सीखा था.

बीरा के पिता को लोग चिढ़ाने लगे. खुलेआम मजाक उड़ाने लगे, ‘तेरी बेटी किन्नर है. इस ने तो गांव की नाक कटवा दी है. आज तक इस गांव में कोई किन्नर पैदा नहीं हुआ है.’

बीरा के पिता का भी बरताव बदलने लगा. जैसेजैसे बीरा के कदम जवानी की तरफ बढ़ने लगे, गांव के लड़के उस की तरफ खिंचने लगे और मौका मिलते ही और ज्यादा छेड़ने लगे. बीरा इन हरकतों से तंग आ चुकी थी.

एक दिन बीरा के पिता ने कहा, ‘‘तुम घर से निकल जाओ. रोजरोज के झगड़ों से मैं तंग आ चुका हूं.’’

बीरा भी अपने परिवार वालों का रुख देख कर घर से निकल गई और बिना मंजिल के एक ट्रेन पकड़ ली. उसे मालूम नहीं था कि कहां जाना है.

बीरा आसनसोल स्टेशन पहुंची, जहां किन्नरों की हैड से उस की मुलाकात हुई. उस ने खाना खिलाया, प्यार से बातें कीं और ट्रेन में ही गाने गा कर लोगों से पैसा वसूलने का हुनर सिखाया.

बीरा अब पैसा तो कमाती थी, लेकिन उस का सुख नहीं भोगती थी, क्योंकि सारा पैसा किन्नर की हैड ले लेती. वह 4 महीने तक आसनसोल में रही. वह वहां की जिंदगी से भी तंग आ चुकी थी.

एक दिन किसी को बिना बताए बीरा पटना चली आई. वहां उस की रेशमा नामक समाजसेवी किन्नर से मुलाकात हुई. रेशमा ने बीरा के दर्द को समझने की कोशिश की.

बीरा पढ़ना चाहती थी. रेशमा ने उस का बीए में दाखिला करा दिया. वह मन लगा कर पढ़ने लगी. अपना खर्च निकालने के लिए वह शादीब्याह और पर्वत्योहार के मौके पर आरकैस्ट्रा में नाचगाने का काम भी करने लगी.

बीए करने के बाद बीरा ने कोचिंग की और बीपीएससी की तैयारी करने लगी. पहली बार में वह नाकाम हुई, पर दूसरी बार बीपीएससी पास कर गई. उस की बहाली बीडीओ के पद पर हुई. उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपने साथियों को जम कर पार्टी दी.

बीरा के पिता को जब गांव वालों से मालूम हुआ तो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिसे वे और गांव वाले हिकारत की नजर से देखते थे, वह बीरा पढ़लिख कर अफसर बन जाएगी.

गांव वालों द्वारा यह सूचना भी उन्हें चिढ़ाने जैसी ही लगी. पर उन के गांव का ही एक लड़का बीरा से मिलवाने के लिए उन्हें ब्लौक दफ्तर ले गया. पिता को गलती का एहसास हुआ.

बीरा ने अपने पिता से गांव का हालचाल पूछा और यह भी बोली, ‘‘पिताजी, अब आप को गांव के लोग यह कह कर नीचा नहीं दिखाएंगे कि आप की बेटी किन्नर है.’’

बीरा ने यह भी पूछा कि गांव की मुख्य समस्या क्या है? पिता ने कहा, ‘‘गांव में स्कूल नहीं है.’’

बीरा ने अपने पैसे से गांव में स्कूल खुलवाने का वादा किया. 6 महीने के अंदर बीरा ने बच्चों को पढ़ने के लिए अपने पैसे से गांव में स्कूल खुलवाया, जहां गांव के बच्चे मुफ्त में पढ़ने लगे.

गांव वालों ने बीरा से माफी मांगते हुए उसे सम्मानित किया. सम्मान समारोह में लोगों ने यही कहा कि उन के गांव में आज तक कोई ऐसा लड़का या लड़की नहीं पैदा हुई, जो हमारे गांव का नाम रोशन कर सके. बीरा ने इस गांव का मानसम्मान बढ़ाया है.

Short Story : कोठा – उस लड़की ने धंधा करने से क्यों मना कर दिया

Short Story : ‘‘अरे  रामू, क्या हुआ?’’ चनकू बाई ने पूछा.

‘‘यह लड़की धंधा करने को तैयार नहीं हो रही है,’’ रामू ने कहा.

रामू की बात सुन कर चनकू बाई कुछ सोचने लगी. कुछ याद आते ही वह बोली, ‘‘रामू, फौरन डीडी को बुलाओ, वही चुटकियों में ऐसे केस हल कर देता है.’’

डीडी उर्फ दामोदर गांव का एक सीधासादा नौजवान था. गांव के ऊंचे घराने की लड़की से उसे इश्क हो गया था. वह लड़की भी उसे बहुत प्यार करती थी. लेकिन उन दोनों के प्यार के बीच दौलत की दीवार थी, जिसे दामोदर तोड़ न सका.

दामोदर के सामने ही उस की प्रेमिका किसी और की हो गई. उस दिन दामोदर बहुत रोया था. उसे एहसास हो गया था कि दौलत के बिना इनसान अधूरा है. उस के पास दौलत होती, तो शायद उस का प्यार नहीं बिछुड़ता.

अपने प्यार का घरौंदा उजड़ते देख कर दामोदर ने फैसला किया कि वह बहुत दौलत कमाएगा, चाहे यह दौलत पाप की कमाई ही क्यों न हो.

इश्क में हारा दामोदर घर में अपने मांबाप से बगावत कर के शहर में

दौलत कमाने का सपना ले कर मुंबई आ गया.

मुंबई में दामोदर बिलकुल अकेला था. काम की तलाश में वह बहुत भटका, मगर उसे काम नहीं मिला.

एक दिन दामोदर की मुलाकात रामू से हो गई. दामोदर ने उसे अपनी आपबीती सुनाई, तो रामू को अपनापन महसूस हुआ.

वह बोला, ‘‘मैं तुम्हें काम दिला सकता हूं, पर उस काम में जोखिम बहुत है और पुलिस का डर भी है.’’

‘‘मो सिर्फ पैसा चाहिए, काम चाहे कितना भी खतरनाक ही क्यों न हो.’’

दामोदर की बात सुन कर रामू ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा. वह समा चुका था कि दामोदर के सिर पर दौलत कमाने का भूत सवार है. इस से कुछ भी काम कराया जा सकता है.

रामू दामोदर को ले कर चनकू बाई के कोठे पर पहुंचा.

चनकू बाई ने दामोदर से बात की, फिर उसे एक वैन दे दी, जिस से वह लड़कियां सप्लाई करने लग पड़ा.

इस काम में दामोदर को अच्छीखासी रकम मिलती थी. अब रामू व दामोदर एकसाथ रहने लगे थे. उन दोनों में गहरी दोस्ती भी हो गई थी.

कुछ ही दिनों में दामोदर ने अपनी मेहनत से चनकू बाई के दिल में अच्छीखासी जगह बना ली थी. अब चनकू बाई दामोदर को डीडी के नाम से पुकारती थी.

डीडी उर्फ दामोदर को चनकू बाई का संदेश मिला और वह फौरन कोठे पर पहुंचा.

रामू ने लड़की के बारे में दामोदर को सबकुछ बता दिया.

दामोदर दरवाजा खोल कर कमरे में आया. उस ने फर्श पर पड़ी लड़की को उठाना चाहा, मगर वह बेहोशी की हालत में थी. उस का जिस्म किसी गरम भट्ठी की तरह तप रहा था.

‘‘बाई, इस लड़की को तो काफी

तेज बुखार है. किसी डाक्टर को दिखाना होगा,’’ दामोदर ने कहा.

‘‘इस कोठे पर कौन डाक्टर आएगा…’’ चनकू बाई परेशान होते हुए बोली.

‘‘फिर?’’ रामू ने पूछा.

‘‘ठीक है बाई, मैं इस लड़की को घर ले जाता हूं, वहां किसी डाक्टर को दिखा लूंगा. जब यह ठीक हो जाएगी, तो कोठे पर ले आऊंगा,’’ दामोदर बोला.

दामोदर की बात से रामू और चनकू बाई दोनों राजी थे.

दामोदर लड़की को अपने घर ले आया. उस का घर बहुत छोटा था.

उस के साथ लड़की देख कर महल्ले वाले यह समो कि शायद यह उस की बीवी है.

डाक्टर ने आ कर लड़की को दवाएं दे दीं. बुखार उतर नहीं रहा था.

दामोदर पूरी रात उस लड़की के माथे पर पट्टियां रखता रहा.

दामोदर की मेहनत रंग लाई. सुबह लड़की को होश आ गया. दामोदर ने उसे कुछ दवाएं खाने को दीं. नानुकर के बाद लड़की ने दवा खा ली.

दोपहर तक लड़की पूरी तरह से होश में आ चुकी थी. उस ने अपना नाम रजनी बताया. बचपन में ही उस के पिता की मौत हो चुकी थी.

रजनी की मां ने बेटी को पालने के लिए दूसरी शादी कर ली. शादी के कुछ साल बाद ही रजनी की मां की मौत हो गई.

मां की मौत के बाद से ही रजनी के सौतेले बाप ने उसे तंग करना शुरू कर दिया था. पिता से आजिज हो चुकी रजनी गांव के एक नौजवान को दिल दे बैठी.

उस नौजवान ने रजनी को शहर की चमकदमक के सुनहरे सब्जबाग दिखाए. वह रजनी को बहलाफुसला कर शहर ले आया और धोखे से कोठे पर बेच दिया था.

दामोदर ने रजनी की कहानी बड़े गौर से सुनी. आज तक उस ने जितनी भी लड़कियों को धंधे में उतारा था, उन में से किसी की भी कहानी नहीं सुनी थी.

थोड़ी देर के बाद दामोदर दरवाजे पर बाहर से ताला लगा कर खाना लेने होटल चला गया.

कुछ देर बाद ही दामोदर खाना ले कर लौटा. रजनी ने खाना खाया. उस के बाद वह तख्त पर लेट गई. दामोदर भी फर्श पर चटाई बिछा कर पुराना सा कंबल ले कर लेट गया.

रजनी की सेहत दिन ब दिन सुधरने लगी थी. दामोदर रोज घर के बाहर ताला लगाने के बाद कोठे पर जा कर चनकू बाई को रजनी की सेहत के बारे में बताता था.

एक दिन दामोदर जल्दी में बाहर से ताला लगाना भूल गया. जब वह शाम को घर लौटा, तो उस ने खुला दरवाजा देखा. उस के मानो होश उड़ गए. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. लेकिन रजनी घर पर ही थी.

‘‘रजनी, आज तो भागने का मौका था. तुम भागी क्यों नहीं?’’

दामोदर की बात सुन कर रजनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘भाग कर जाती भी तो कहां? अब तो दुनिया के सभी दरवाजे मेरे लिए बंद हो गए हैं.’’

रजनी के ये शब्द दामोदर के दिल में तीर की तरह चुभ गए थे.

‘‘लो, खाना खा लो,’’ दामोदर ने खाने का पैकेट रजनी को देते हुए कहा.

‘‘नहीं, आज मैं ने घर पर ही खाना बना लिया था. आप हाथमुंह धो लीजिए. मैं खाना परोसती हूं,’’ रजनी बोली.

दामोदर ने रजनी के हाथ का बना खाना खाया. आज पहली बार मां के बाद उस ने किसी दूसरी औरत के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना खाया था.

खाना खाने के बाद दामोदर पुराना कंबल ले कर जमीन पर लेट गया. रजनी भी तख्त पर लेट गई. पर उन दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे दोनों अपनीअपनी जगह पर करवटें बदलते रहे.

सर्दी भरी रात में दामोदर ठंड से सिकुड़ता जा रहा था, लेकिन रजनी जाग रही थी.

रजनी लेटे हुए ही दामोदर को देख रही थी, शायद दामोदर सो चुका था.

रजनी ने अपनी रजाई उठाई और वह भी दामोदर के साथ सो गई.

सुबह जब दामोदर की आंख खुली, तब तक काफी देर हो चुकी थी. रजनी ने अपना सबकुछ दामोदर को सौंप दिया था. दामोदर अपनी इस गलती के लिए शर्मिंदा था.

दामोदर तैयार हो कर जैसे ही कोठे पर जाने के लिए निकला, सामने रामू अपने गुरगे ले कर पहुंच गया. वह रजनी को लेने आया था, पर दामोदर ने रजनी के बीमार होने की बात कही और उन के साथ कोठे पर चला गया.

अब दामोदर रजनी को कोठे पर नहीं लाना चाहता था. शायद उसे रजनी से प्यार हो गया था.

दामोदर ने अपने प्यार वाली बात रामू को बताई. रामू ने दामोदर को चनकू बाई के कहर का वास्ता दिया और आगे से ऐसी गलती न करने की राय भी दी.

दूसरे दिन रामू जीप ले कर रजनी को लेने दामोदर की खोली में पहुंचा, तो दामोदर वहां नहीं था. उस के कमरे के बाहर ताला लटका देखा. रामू तो समा गया कि दामोदर रजनी को ले कर कहीं भाग गया है.

जब यह खबर चनकू बाई को मिली, तो वह गुस्से से तिलमिला उठी. उस ने फौरन शहर में गुंडे फैला दिए थे, ताकि दामोदर और रजनी शहर से बाहर न जाने पाएं.

अब सारे शहर में चनकू बाई के आदमी घूम रहे थे, पर दामोदर और रजनी का कहीं अतापता नहीं था.

रामू भी कुछ आदमियों को ले कर रेलवे स्टेशन पर तलाश कर रहा था. हथियारों से लैस चनकू बाई के आदमी टे्रन के हर डब्बे की तलाशी ले रहे थे.

रामू जैसे ही डब्बे में घुसा, सामने दामोदर और रजनी को देख कर ठिठक गया था. रजनी किसी अमरबेल की तरह दामोदर से चिपकी थी.

रामू को देख कर वह कांप उठी. दामोदर भी रामू की आंखों में आंखें डाले देख रहा था. उधर ट्रेन चलने के लिए हौर्न दे रही थी.

‘‘रामू, वे इस डब्बे में हैं क्या?’’ चनकू बाई के किसी आदमी ने चिल्ला कर पूछा.

‘‘नहीं, इस डब्बे में कोई नहीं है. चलो, कहीं दूसरी जगह ढूंढें़.’’

रामू की यह बात सुन कर दामोदर और रजनी की जान में जान आई.

रामू ट्रेन से नीचे उतर गया था. वह खिड़की के पास से गुजरते हुए बोला, ‘‘जाओ मेरे दोस्त, तुम्हें नई जिंदगी मुबारक हो. तुम दोनों हमेशा खुश रहो. इस दलदल से निकल कर एक नई जिंदगी जीओ.’’

ट्रेन चल चुकी थी. दामोदर ने खिड़की से बाहर देखा. रामू जीप स्टार्ट कर के चनकू बाई के आदमियों के साथ दूर जा चुका था.

Social Story : गांव की गोरियां

Social Story : सोशल मीडिया भी गजब ही है भैया. यहां कबाड़ भरा है तो जुगाड़ भी भरा है. अब टिक टौक और लाइक को ही ले लो. एक अलग ही दुनिया. कुछ सैकंड का धमाल, दुनिया में कर दो कमाल. अब तो बड़ेबड़े नामचीन भी इस के असर से अछूते नहीं हैं. शहर की गोरीचिट्टी छोरियां इंगलिश में गिटपिट बोलें, लड़कों के मजे लें और अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर खूब लाइक बटोरें.

पर गांवदेहात की लड़कियों को भी कम मत सम?ाना. टिक टौक और लाइक पर छाई हुई हैं ये कसे बदन की तितलियां. कभी गौर किया है इन बिजली सी चमकती ठेठ गोरियों पर. सपना चौधरी के ‘तेरी आंख्यां का यू काजल…’ गीत पर ठुमके लगा कर सपना चौधरी को ही पानी भरवा दें. सब से बड़ी बात तो यह कि ऐसी लड़कियां ज्यादा अमीर घरों की नहीं होती हैं. उन के कच्चेपक्के घरों, बिना ओट की छतों से अंदाजा लगा सकते हैं कि वे किसी अगड़े समाज से नहीं आती हैं, पर उन में अपना हुनर दिखाने की ललक होती है.

हां, एक बात जरूर है कि कैमरे के सामने आने से पहले वे अपना होमवर्क बड़े अच्छे ढंग से करती हैं. कैसे अपनी फिगर का इस्तेमाल करना है, कैसे कपड़े पहनने हैं कि बदन उतना ही दिखे कि आह निकल जाए. वे मेकअप पर भी खूब ध्यान देती हैं और जो भी पेश करती हैं, उस में उन की मेहनत दिखाई देती है.

इस सब में फिल्मी गानों, संवादों और चुटकुलों का भी बड़ा अहम रोल होता है. देशी बोली के तड़कतेभड़कते गाने और लड़कियों का कूल्हे मटकाना जबरदस्त जुगलबंदी बन जाता है. इस में बहुत सी लड़कियां अपने डांस को और मस्त बनाने के लिए कपड़े भी इतने बदनदिखाऊ पहन लेती हैं कि मनचलों की आहें निकल जाती हैं. फिर कुछ लड़कियां तो एडल्ट चुटकुले भी अपने दिलकश अंदाज में सुना देती हैं.इस से उन के चाहने वालों की लिस्ट लंबी हो जाती है.

सपना चौधरी के गाने पहले सस्ते वीडियो कैसेट पर बजते थे, फिर जब उन की देखादेखी बहुत सी लड़कियों ने ऐसे छोटेछोटे वीडियो बना कर टिक टौक वगैरह पर डालने शुरू कर दिए तो उन के भी फैन बनते चले गए.

हरियाणा की सोनाली फोगाट तो इतनी मशहूर हो गईं कि उन को हरियाणा विधानसभा की टिकट तक मिल गई. उन के वीडियो भी कम दिलचस्प नहीं हैं. पूजा जैन से ढिंचक पूजा बन चुकी यह लड़की अब इंटरनैट की सनसनी है.

Family Story : रामलाल की घर वापसी

Family Story : तकरीबन 7-8 घंटे के सफर के बाद बस ने गांव के बाहर ही उतार दिया था. रामलाल ने कमला को भी अपने साथ बस से उतार लिया था.

‘‘देखो कमला, तुम्हारा पति जब तुम्हारे साथ इतनी मारपीट करता है, तो तुम उस के साथ क्यों रहना चाहती हो?’’

कमला थोड़ी देर तक खामोश बनी रही. उस ने कातर भाव से रामलाल की ओर देखा.

‘‘पर…’’

‘‘परवर कुछ नहीं, तुम मेरे साथ चलो.’’

‘‘तुम्हारे घर के लोग मेरे बारे में पूछेंगे, तो क्या कहोगे?’’

‘‘कह दूंगा कि तुम मेरी घरवाली हो, जल्दबाजी में ब्याह करना पड़ा.’’

कमला कुछ नहीं बोली. दोनों के कदम गांव की ओर बढ़ गए.

रामलाल के सामने पिछले एक महीने में घटी एकएक बात किसी फिल्म की तरह सामने आ रही थी.

रामलाल शहर में मजदूरी करता था. ब्याह नहीं हुआ था, इसलिए जो मजदूरी मिलती उस में उस का खर्च आराम से चल जाता. थोड़ेबहुत पैसे जोड़ कर वह गांव में अपनी मां को भी भेज देता. गांव में एक बहन और मां ही रहते हैं. एक बीघा जमीन है, पर उस से सभी की गुजरबसर होना मुमकिन नहीं था. गांव में मजदूरी मिलना मुश्किल था, इसलिए उसे शहर आना पड़ा.

‘शहर गांव से तो बहुत दूर था, ऊपर उसे कौन रोजरोज गांव आना है…’ सोच कर रामलाल यहीं काम करने भी लगा था. एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया था. एक स्टोव और कुछ बरतन. शाम को जब काम से लौटता तो 2 रोटी बना लेता और खा कर सो जाता. दिनभर का थका होता, इसलिए नींद भी अच्छी आती.

रामलाल ईमानदारी से काम करता था, इस वजह से सेठ भी उस से खुश रहता था. वह अपनी मजदूरी से थोड़े पैसे सेठ के पास ही जमा कर देता.

सालभर हो गया था रामलाल को शहर में रहते हुए. इस एक साल में वह अपने गांव भी नहीं जा पाया था. उस दिन उस ने देर तक काम किया था. वह अपने कमरे पर देर से पहुंचा था. जल्दबाजी में उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वह सेठ से कुछ पैसे ले ले. उस ने अपनी जेब टटोली 10 का सिक्का उस के हाथ में आ गया.

‘चलो आज का खर्चा तो चल जाएगा, कल सेठ से पैसे मिल ही जाएंगे.’ रामलाल ने गहरी सांस ली. 2 रोटी बनाई और खा कर सो गया.

सुबह जब रामलाल नहा कर काम पर जाने के लिए निकला, तो पता चला कि पुलिस वाले किसी को घर से निकलने ही नहीं दे रहे हैं. सरकार ने लौकडाउन लगा दिया है. बहुत देर तक तो वह इस का मतलब ही नहीं सम झ पाया. केवल यही सम झ में आया कि वह आज काम पर नहीं जा पाएगा. वह उदास कदमों से अपने कमरे पर लौट आया. मकान मालिक उस के कमरे के सामने ही मिल गया था.

‘देखो रामलाल, महीनेभर का लौकडाउन है. कोई वायरस फैल रहा है. तुम एक काम करो कि जल्दी से जल्दी कमरा खाली कर दो.’

रामलाल वैसे ही लौकडाउन का मतलब नहीं सम झ पाया था, उस पर वायरस की बात तो उसे बिलकुल भी सम झ में नहीं आई.

‘कमरा खाली कर दो… मु झ से कोई गलती हो गई क्या?’

‘नहीं, पर तुम काम पर जा नहीं पाओगे, तो कमरे का किराया कैसे दोगे?’

‘क्या महीनेभर काम बंद रहेगा?’

‘हां, घर से निकलोगे तो पुलिस वाले डंडा मारेंगे.’

रामलाल के सामने अंधेरा छाने लगा. उस के पास तो केवल 10 का सिक्का ही है. वह कुछ नहीं बोला, उदास कदमों से अपने कमरे में आ कर जमीन पर बिछी दरी पर लेट गया.

जब रामलाल की नींद खुली तब तक शाम का अंधेरा फैलने लगा था. उस ने बाहर निकल कर देखा. बाहर सुनसान था. उसे पैसों की चिंता सता रही थी अगर वह कल ही सेठ से पैसे ले लेता तो कम से कम खाने का जुगाड़ तो हो जाता.

अगर वह सेठ के पास चला जाए तो सेठ उसे पैसे जरूर दे सकते हैं. उस ने कमरे से फिर बाहर की ओर झांका. बहुत सारे पुलिस वाले खड़े थे. उस की हिम्मत बाहर निकलने की नहीं हुई. वह फिर से दरी पर लेट गया. उस की नींद जब खुली, उस समय रात के 2 बज रहे थे. भूख के चलते उस के पेट में दर्द सा हो रहा था.

वह उठा और स्टोव जला लिया, पर आटा रखने वाले डब्बे को खोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वह जानता था कि उस में थोड़ा सा ही आटा बचा है. अगर अभी रोटी बना ली तो कल के लिए कुछ नहीं बचेगा. उस ने निराशा के साथ डब्बा खोला और सारे आटे को थाली में डाल लिया. 2 छोटीछोटी रोटियां ही बन पाईं. एक रोटी खा ली और दूसरी रोटी को डब्बे में रख दिया.

सुबह हो गई थी. रामलाल ने बाहर झांक कर देखा. पुलिस कहीं दिखाई नहीं दी. वह कमरे से बाहर निकल आया. उस के कदम सेठ के घर की ओर बढ़ लिए.

सेठ का घर बहुत दूर था. छिपतेछिपाते वह उन के घर के सामने पहुंच गया था. दिन पूरा निकल आया था. यह सोच कर कि सेठ जाग गए होंगे, उस के हाथ बाहर लगी घंटी पर पहुंच गए थे. उन के नौकर ने दरवाजा खोला था.

‘जी मैं रामलाल हूं, सेठजी के यहां ठेके पर काम करता हूं.’

‘हां तो…’

‘मुझे कुछ पैसे चाहिए.’

‘हां तो ठेके पर जाना वहीं मिलेंगे. सेठजी घर पर नौकरों से नहीं मिलते.’

‘पर, वह लौकडाउन लग गया है, न तो काम तो महीनेभर बंद रहेगा.’

‘तभी आना…’

‘तुम एक बार उन से बोलो तो सही, वे मु झे बहुत चाहते हैं.’

‘अच्छा रुको, मैं पूछता हूं,’ नौकर को शायद दया आ गई थी उस पर.

नौकर के साथ सेठ भी बाहर आ गए थे. उन के चेहरे पर झुं झलाहट के भाव साफ झलक रहे थे, जिन्हें रामलाल नहीं पढ़ पाया.

सेठजी को देखते ही उस ने झुक कर पैर पड़ने चाहे थे, पर सेठ ने उसे दूर से ही झटक दिया.

‘अब तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई कि घर चले आए…’

‘सेठजी कल आप से पैसे ले नहीं पाया था. मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं, ऊपर से लौकडाउन हो गया है. इसलिए आना पड़ा,’ रामलाल ने सकपकाते हुए कहा.

‘चल यहां से… बड़ा पैसे लेने आया है. मैं घर पर लेनदेन नहीं करता.’

सेठ ने उसे गुस्साई निगाहों से घूरा तो रामलाल घबरा गया. उस ने सेठजी के पैर पकड़ लिए, ‘मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं. थोड़े से पैसे मिल जाते हुजूर.’

सेठ उसे ठोकर मारते हुए अंदर चले गए. हक्काबक्का रामलाल थोड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी पुलिस की गाडि़यों के आने की आवाज गूंजने लगी. वह डर गया और भागने लगा. छिपतेछिपाते वह अपने कमरे के नजदीक तक तो पहुंच गया, पर यहीं गली में उसे पुलिस वालों ने पकड़ लिया. वह कुछ बोल पाता, इस के पहले ही उस के ऊपर डंडे बरसाए जाने लगे थे.

रामलाल दर्द से कराह उठा. पुलिस वालों ने गंदीगंदी गालियां देनी शुरू कर दी थीं. तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार कुछ नौजवान आ कर रुक गए. उन्होंने पुलिस वालों से कुछ बात की. पुलिस ने उन्हें जाने दिया. रामलाल भी इसी का फायदा उठा कर वहां से खिसक लिया. वह हांफते हुए अपने कमरे
की दरी पर लेट गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन्हें पोंछने वाला कोई नहीं था. उसे अपनी मां की याद सताने लगी.

मां की याद आते ही उस के आंसुओं की रफ्तार बढ़ गई थी. रोतेरोते वह सो गया था. दोपहर का समय ही रहता होगा, जब उस की आंख खुली. उस का सारा बदन दुख रहा था. पुलिस वालों ने उसे बेदर्दी से मारा था. वह कराहता हुआ उठा. बहुत जोर की भूख लगी थी. वह जानता था कि डब्बे में अभी एक रोटी रखी हुई है.

सूखी और कड़ी रोटी खाने में समय लगा. वह अब क्या करे? उस के सामने अनेक सवाल थे. मकान मालिक ने दरवाजा भी नहीं खटखटाया था, सीधे अंदर घुस आया था, ‘तुम कमरा कब खाली कर रहे हो?
वह सकपका गया.

‘मैं इस समय कहां जाऊंगा, आप कुछ दिन रुक जाओ, माहौल शांत हो जाने दो, ताकि मैं दूसरा कमरा ढूंढ़ सकूं.’

रामलाल हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया था.

‘नहीं, माहौल तो मालूम नहीं कब ठीक होगा. तुम तो कमरा कल तक खाली कर दो… नहीं तो मु झे जबरदस्ती करनी पड़ेगी,’ कहता हुआ वह चला गया.

रामलाल को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह चुपचाप बैठा रहा. अभी तो उसे शाम के खाने की भी फिक्र थी.

सूरज ढलने को था. रामलाल अभी भी वैसे ही बैठा था, खामोश. और वह करता भी क्या? उस ने कमरे का दरवाजा जरा सा खोल कर देखा. बाहर पुलिस नहीं थी. वह बाहर निकल आया. थोड़ी दूर पर उसे कुछ भीड़ दिखाई दी.

वह लड़खड़ाते हुए वहां पहुंच गया. कुछ लोग खाने का पैकेट बांट रहे थे. वह भी लाइन में लग गया. हर पैकेट को देते हुए वो फोटो खींच रहे थे, इसलिए समय लग रहा था. उस का नंबर आया. एक आदमी ने उस के हाथ में खाने का पैकेट रखा, साथ में और लोग भी उस के चारों ओर खड़े हो गए. कैमरे का फ्लैश चमकने लगा. फोटो खिंचवा कर वे लोग जा चुके थे.

रामलाल भी अपने कमरे की ओर लौट पड़ा, ‘चलो, आज के खाने का इंतजाम तो हो गया. इसी में से कुछ बचा लेंगे तो सुबह खा लेंगे.’

उसे बहुत जोरों से भूख लगी थी, इसलिए कमरे में आते ही उस ने पैकेट खोल लिया था. पैकेट में केवल 2 मोटी सी पूरी थी और जरा सी सब्जी. सब्जी बदबू मार रही थी, शायद वह खराब हो गई थी.

हक्काबक्का रामलाल पूरी को कुछ देर तक यों ही देखता रहा, फिर उस ने मोटी पूरी को चबाना शुरू कर दिया. दरी पर लेट कर वह भविष्य के बारे में सोचने लगा. वह अब क्या करे. कमरा भी खाली करना है.

अपने गांव भी नहीं लौट सकता, क्योंकि ट्रेनें और बसें बंद हो चुकी हैं, पैसे भी नहीं हैं. रामलाल समझ नहीं पा रहा था कि वह करे तो क्या करे.

रामलाल ने सुबह ही पता लगा लिया था कि सरकार की ओर से खाने का इंतजाम किया गया है, इसलिए वह ढ़ूंढ़ते हुए यहां आ गया था. उस के जैसे यहां बहुत सारे लोग लाइन में लगे थे. वे लोग भी मजदूरी करने दूसरी जगह से आए थे. यहीं उस की मुलाकात मदन से हुई थी, जो उस के पास वाले जिले का था. उस से ही उसे पता चला कि बहुत सारे मजदूर शाम को पैदल ही अपने अपनेअपने गांव लौट रहे हैं. मदन भी उन के साथ जा रहा है.

रामलाल को लगा कि यही अच्छा मौका है. उसे भी इन के साथ गांव चले जाना चाहिए. पर क्या इतनी दूर पैदल चल पाएगा? पर, अब उस के पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं. अगर मकान मालिक ने जबरन उसे कमरे से निकाल दिया तो वह क्या करेगा. गहरी सांस ले कर उस ने सभी के साथ गांव लौटने का मन बना लिया.

शाम को वह अपना सामान बोरे में भर कर तय जगह पर पहुंच गया, जहां मदन उस का इंतजार कर रहा था. सैकड़ों की तादाद में उस के जैसे लोग थे, जो अपनाअपना सामान सिर पर रख कर पैदल चल रहे थे. इन में बच्चे भी थे और औरतें भी.

रात का अंधकार फैलता जा रहा था, पर चलने वालों के कदम नहीं रुक रहे थे. कुछ अखबार वाले और कैमरा वाले सैकड़ों की इस भीड़ का फोटो खींच रहे थे. इसी वजह से पुलिस वालों ने उन्हें घेर लिया था. वे गालियां बक रहे थे और लौट जाने को कह रहे थे. भीड़ उन की बात सुन नहीं रही थी. पुलिस ने जबरन उन्हें रोक लिया था.

‘आप सभी की जांच की जाएगी और रुकने का इंतजाम किया जाएगा, कोई आगे नहीं बढ़ेगा,’ लाउडस्पीकर से बोला जा रहा था.

सारे लोग रुक गए थे. एकएक कर सभी की जांच की गई. फिर सभी को इकट्ठा कर आग बु झाने वाली मशीन से दवा छिड़क दी गई. दवा की बूंदें पड़ते ही रामलाल की आंखों में जलन होने लगी थी. मदन भी आंख बंद किए

कराह रहा था. और भी लोगों को परेशानी हो रही थी, पर कोई सुनने को तैयार ही नहीं था.

दवा छिड़कने वाले कर्मचारी उलटासीधा बोल रहे थे. सारे लोगों को एक स्कूल में रोक दिया गया था. सैकड़ों लोग और कमरे कम. बिछाने के लिए केवल दरी थी. पानी के लिए हैंडपंप था. औरतों के लिए ज्यादा परेशानी थी. 2 रोटी और अचार खाने को दे दिया गया था.

‘हरामखोरों ने परेशान कर दिया,’ बड़बड़ाता हुआ एक कर्मचारी जैसे ही निकला, एक औरत ने उसे रोक लिया, ‘क्या बोला… हरामखोर… अरे, हम तो अच्छेभले जा रहे थे, हमें जबरन रोक लिया और अब गाली दे रहे हैं.’

उस औरत की आवाज सुन कर और भी लोग इकट्ठा हो गए थे.

‘भूखों को जमाई जैसी सुविधाएं चाहिए…’ वह फिर बड़बड़या.

‘रोकने का इंतजाम नहीं था तो क्यों रोका… 2 सूखी रोटी दे कर अहसान जता रहे हैं,’ किसी ने जोर से बोला था, ताकि सभी सुन लें. पर, साहब को यह पसंद नहीं आया. उन्होंने हाथ में डंडा उठा लिया था, ‘कौन बोला… जरा सामने तो आओ… यहां मेरी बेटी की बरात लग रही है क्या… जो तुम्हें छप्पन व्यंजन बनवा कर खिलवाएं.’

सारे सकपका गए. वे सम झ चुके थे कि उन्हें कुछ दिन ऐसे ही काटने पड़ेंगे. छोटे से कमरे में बहुत सारे लोग जैसेतैसे रात को सो लेते और दिन में बाहर बैठे रहते. बाथरूम तक का इंतजाम नहीं था. औरतें बहुत परेशान हो रहीं थीं.

कोई नेताजी आए थे उन से मिलने. वहां के कर्मचारियों ने पहले ही बता दिया था कि कोई नेताजी से शिकायत नहीं करेगा, इसलिए बाकी सारे लोग तो खामोश रहे, पर एक बूढ़ी औरत खामोश नहीं रह पाई.

जैसे ही नेताजी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘कैसे हो आप लोग… हम ने आप के लिए बहुत सारा इंतजाम किया है उम्मीद है कि आप अच्छे से होंगे.’

बुजुर्ग औरत यह सुन कर भड़क गई, ‘दो सूखी रोटी और सड़ी दाल दे कर अहसान जता रहे हो.’

किसी को उम्मीद नहीं थी. सभी लोग सकपका गए. एक कर्मचारी उस औरत की ओर दौड़ा, पर वह खामोश नहीं हुई, ‘हुजूर, यहां कोई इंतजाम नहीं है. हम लोग एक कमरे में भेड़बकरियों की तरह रह रहे हैं.’

नेताजी कुछ नहीं बोले. वे लौट चुके थे. उन के जाने के बाद सारे लोगों पर कहर टूट पड़ा था.

फिर सरकार ने बस भिजवाई थी, ताकि सभी लोग अपनेअपने गांव लौट सकें. मदन और रामलाल एक ही बस में बैठ रहे थे, तभी किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी थी.

रामलाल उधर पहुंच गया था. एक आदमी एक औरत के बाल पकड़ कर पीठ पर मुक्के मार रहा था. वह औरत दर्द से बिलबिला रही थी.

‘इसे क्यों मार रहे हो भाई?’ रामलाल से सहन नहीं हो रहा था.

‘तू बीच में मत पड़. यह मेरी घरवाली है. सम झ गया तू,’ उस ने अकड़ कर कहा.

‘घरवाली है तो ऐसे मारोगे.’

‘तुझे क्या, जा अपना काम कर.’

रामलाल का खून खौलने लगा था, ‘पर बता तो सही, इस ने किया क्या है?’

‘यह औरत मनहूस है. इस के चलते ही मैं परेशान हो रहा हूं,’ कहते हुए उस ने जोर से औरत के बाल खींचे. वह दर्द से रो पड़ी. रामलाल सहन नहीं कर सका. उस ने औरत का हाथ पकड़ा और अपनी बस में ले आया.

‘तुम मेरे साथ बैठो. देखता हूं, कौन माई का लाल है, जो तुम्हें हाथ लगाएगा?’

औरत बहुत देर तक सुबकती रही थी. उस ने अपना नाम कमला बताया था. उस ने तो केवल यह सोचा था कि उस के आदमी का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तो वह ही उसे ले जाएगा. पर, वह उसे लेने नहीं आया.

‘अच्छा ही हुआ. उस ने इस की जिंदगी खराब कर रखी थी, पर अब यह जाएगी कहां?’ सवाल तो रामलाल के मन में था, पर जवाब उस के पास नहीं था. बस से उतर कर उस ने उसे साथ ले जाने का फैसला कर लिया था.

रामलाल के साथ कमला भी सोचती हुई कदम बढ़ा रही थी. उसे नहीं मालूम था कि उस का भविष्य क्या है, पर रामलाल उसे अच्छा लगा था. वह जिन यातनाओं से हो कर गुजरी है, शायद उसे उन से छुटकारा मिल जाए.

मां बाहर आंगन में बैठी ही मिल गई थीं.

रामलाल उन से लिपट पड़ा, ‘‘मां…’’ उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. रो तो मां भी रही थी, जब से लौकडाउन लगा था, तब से ही मां उस के लिए बेचैन थीं. उन्होंने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया था. दोनों रो रहे थे, कमला चुपचाप मां बेटे को रोता हुआ देख रही थी.

अपने आंसू पोछ कर उस ने कमला की ओर इशारा किया. ‘‘मां, आप की बहू…’’

यह सुन कर चौंक गईं मां, ‘‘बहू… तू ने बगैर मु झ से पूछे ब्याह रचा लिया…?’’

‘‘मां, मजबूरी थी, लौकडाउन के चलते… गांव आना था इसे कहां छोड़ता… बेसहारा है न मां.’’

मां ने नजर भर कर कमला को देखा.

‘‘चल, अच्छा किया.’’ कह कर मां ने कमला का माथा चूम लिया.

ब्राह्मण बनते Upper Cast OBC

Upper Cast OBC : रविवार, 8 दिसंबर, 2024 को विश्व हिंदू परिषद के विधि प्रकोष्ठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के लाइब्रेरी हाल में ‘विधि कार्यशाला’ नामक कार्यक्रम कराया था. इस कार्यक्रम में जस्टिस शेखर कुमार यादव के अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक और मौजूदा जस्टिस दिनेश पाठक भी शामिल हुए थे.

इस कार्यक्रम में ‘वक्फ बोर्ड अधिनियम’, ‘धर्मांतरण कारण एवं निवारण’ और ‘समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता’ जैसे विषयों पर अलगअलग लोगों ने अपनी बात रखी थी.

इस दौरान जस्टिस शेखर कुमार यादव ने ‘समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता’ विषय पर बोलते हुए कहा था कि देश एक है, संविधान एक है, तो कानून एक क्यों नहीं है?

तकरीबन 34 मिनट के इस भाषण के दौरान जस्टिस शेखर कुमार यादव ने कहा कि ‘हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यकों के अनुसार ही देश चलेगा. यही कानून है. आप यह भी नहीं कह सकते कि हाईकोर्ट के जज हो कर ऐसा बोल रहे हैं. कानून तो भैया बहुसंख्यक से ही चलता है’.

अपने इसी भाषण में जस्टिस शेखर यादव यह भी कह गए कि ‘कठमुल्ले’ देश के लिए घातक हैं. वे यह सम?ाते हैं कि ‘कठमुल्ला’ शब्द गलत है. इस के बाद भी कहते हैं, ‘जो कठमुल्ला है, शब्द गलत है, लेकिन कहने में गुरेज नहीं है, क्योंकि वे देश के लिए घातक हैं. जनता को बहकाने वाले लोग हैं. देश आगे न बढ़े, इस प्रकार के लोग हैं. उन से सावधान रहने की जरूरत है’.

‘कठमुल्ला’ का शाब्दिक अर्थ ‘कट्टरपंथी मौलवी’, ‘मत या सिद्धांत’ के प्रति अत्यंत आग्रहशील या दुराग्रही व्यक्ति होता है. इस का मतलब कट्टर मौलवी होता है, जो काठ के मनकों की माला फेरता हो. अब यही ‘कठमुल्ला’ शब्द विवाद का विषय बन गया है.

जस्टिस शेखर कुमार यादव की दूसरी उस बात पर विवाद है, जिस में यह कहा कि ‘कानून तो बहुसंख्यक से ही चलता है’. इस देश में कठमुल्ला, बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक जैसे शब्द राजनीतिक दलों को बहुत लुभाते हैं’.

जस्टिस शेखर कुमार यादव जैसे ओबीसी समाज के तमाम ऐसे लोग हैं, जिन को लगता है कि देश से वर्ण व्यवस्था खत्म हो गई है. ऐसे ही लोगों में एक बड़ा नाम है बाबा रामदेव का, जिन्होंने धर्म का इस्तेमाल अपनेआप को स्थापित करने में किया.

साल 2012-13 में बाबा रामदेव अन्ना हजारे के आंदोलन का हिस्सा बने थे. उस समय केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार थी. साल 2014 में जैसे ही सरकार बदली, वैसे ही बाबा रामदेव धर्म के प्रचारक हो गए. योग के साथसाथ उन्होंने अपने जो सामान बेचने शुरू किए, उन का आधार धर्म को बनाया.

दक्षिणपंथ से अलग थी समाजवादी विचारधारा

धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर बाबा रामदेव का कारोबार भले ही बढ़ गया हो, पर इस से वर्ण व्यवस्था पर कोई असर नहीं हुआ. ऐसे ओबीसी नेताओं की लिस्ट लंबी है, जो ओबीसी के नाम पर आगे तो बढ़ गए, लेकिन वे खुद को ब्राह्मण जैसा समझने लगे.

ओबीसी के जो नेता आगे बढ़े, वे धर्म की आलोचना कर के ही आगे बढ़े थे. उन की विचारधारा दक्षिणपंथी पंडावाद की नहीं थी.

वे सब समाजवादी विचारधारा के थे, जिस में औरतों और रूढि़वादी विचारों को काफी जगह दी गई थी. समाजवादी राजनीति उस पक्ष या विचारधारा को कहते हैं, जो वर्ण व्यवस्था वाले समाज को बदल कर उस में और ज्यादा माली और जातीय समानता लाना चाहते हैं. इस विचारधारा में समाज के उन लोगों के लिए हमदर्दी जताई जाती है, जो किसी भी वजह से दूसरे लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों या कमजोर रह गए हों.

समाजवादी विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की बात करती है. यह वर्ण व्यवस्था के ठीक उलट विचारों को ले कर चलती है. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कहा कि ‘हम शूद्र हैं’. समाजवादी पार्टी के दफ्तर पर इस का प्रचार करता होर्डिंग भी लगाया गया था.

उत्तर प्रदेश में ‘रामचरितमानस’ पर विवादित बयान देने वाले नेता स्वामी प्रसाद मौर्य उस समय समाजवादी पार्टी में थे. इस को ले कर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सवाल उठ रहे थे. अखिलेश यादव को हिंदू संगठनों ने काले झंडे दिखाए और उन के खिलाफ नारेबाजी की.

इसे ले कर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि ‘मैं मुख्यमंत्रीजी से सदन में पूछूंगा कि मैं शूद्र हूं कि नहीं हूं? भाजपा और आरएसएस के लोग दलितों और पिछड़ों को शूद्र समझते हैं’. यह वर्ण व्यवस्था की देन थी.

क्या है वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था का सब से पहले जिक्र ऋग्वेद के 10वें मंडल में पाया जाता है. यही बाद में जातीय व्यवस्था बन गई. जातीय व्यवस्था में 4 जातियां प्रमुख रूप से रखी गईं. ये वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं. शूद्र का मतलब दलित वर्ग से नहीं था. वर्ण व्यवस्था में उन को तो चर्चा के लायक भी नहीं समझ जाता था.

वर्ण व्यवस्था 1500 ईसा पूर्व आर्यों के आने के साथ ही भारत में आ गई थी. वे मध्य एशिया से भारत आए थे. वे गोरे रंग वाले लोग थे. अपनी नस्लीय श्रेष्ठता को बनाए रखने की कोशिश में उन्होंने देश के मूल निवासियों यानी काली चमड़ी वाले लोगों से खुद को अलग रखा था.

आर्यों के आने के बाद समाज में 2 वर्ग हो गए. मूल वर्ग काले रंग का था, जिस को दास कहा गया. ऋग्वैदिक काल में ही समाज का बंटवारा हो गया था. आर्यों के एक समूह ने बौद्धिक नेतृत्व के लिए खुद को दूसरों से अलग रखा.

इस समूह को ‘पुजारी’ कहा जाता था. दूसरे समूह ने समाज की रक्षा के लिए दावा किया, जिसे ‘राजन्या’ यानी राजा से पैदा कहा जाता था. यही आगे चल कर क्षत्रिय वर्ग बन गया. तीसरे वर्ग ने कारोबार करना शुरू किया, यही वैश्य कहलाया.

उत्तर वैदिक काल में शूद्र नामक एक नए वर्ण का उदय हुआ. इस की जानकारी ‘ऋग्वेद’ के 10वें मंडल में मिलती है. ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को द्विज का दर्जा दिया गया था, जबकि शूद्रों को द्विज के दायरे से बाहर रखा गया था और उन्हें ऊपरी 3 वर्णों की सेवा के लिए बनाया गया था.

वर्ण व्यवस्था के तहत लोगों को उन के सामाजिक और माली हालात के आधार पर दर्जा दिया जाता था. वर्ण व्यवस्था के तहत समाज को 4 अलगअलग वर्णों में बांटा गया था. इस के आधार पर जातीय भेदभाव भी खूब होता है.

वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सब से ऊपर था. एक ब्राह्मण औरत एक ब्राह्मण मर्द से ही शादी कर सकती थी. इस के बाद दूसरे नंबर पर क्षत्रिय वर्ग आता था. इन का मुख्य काम युद्धभूमि में लड़ना था. एक क्षत्रिय को सभी वर्णों की औरत से विवाह करने की इजाजत थी. हालांकि, एक ब्राह्मण या क्षत्रिय महिला को प्राथमिकता दी जाती थी.

इस व्यवस्था में तीसरा नंबर वैश्य का था. इस वर्ण की औरतें पशुपालन, कृषि और व्यवसाय में अपने पति का साथ देती थीं. वैश्य औरतों को किसी भी वर्ण के मर्द से शादी करने की आजादी दी गई थी. शूद्र मर्द से शादी करने की कोशिश नहीं की जाती थी.

शूद्र वर्ण व्यवस्था में सब से निचले स्थान पर थे. इन को किसी भी तरह के अनुष्ठान करने से रोक दिया गया था. कुछ शूद्रों को किसानों और व्यापारियों के रूप में काम करने की इजाजत थी. शूद्र औरतें किसी भी वर्ण के मर्द से विवाह कर सकती थीं, जबकि एक शूद्र मर्द केवल शूद्र वर्ण की औरत से ही विवाह कर सकता था.

बौद्ध और जैन धर्म में वर्ण व्यवस्था में जातीय भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की गई, लेकिन यह खत्म नहीं हो सका. आजादी के बाद भी इस का असर कायम है.

संविधान से मिली आरक्षण की ताकत से शूद्र वर्ग के लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गए. पैसा आने से यह खुद को ब्राह्मणों जैसा समझने लगे हैं.

असल में, ये अपने वर्ग में श्रेष्ठ हो सकते हैं, लेकिन वर्ण व्यवस्था में इन की जगह जहां पहले थी, आज भी वहीं है. इस की सब से बड़ी मिसाल समाचारपत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में देखी जा सकती है.

वैवाहिक विज्ञापनों में वर्ण व्यवस्था

‘ब्राह्मण, 29 वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट बिजनैसमैन युवक के लिए सर्वगुण, सुंदर, स्लिम, संस्कारी, गृहकार्य में दक्ष, विश्वसनीय, ईमानदार व शाकाहारी वधू चाहिए. नौकरी केवल सरकारी टीचर और केवल ब्राह्मण परिवार ही स्वीकार्य. कुंडली मिलान और 36 गुणयोग, बायोडाटा फोटो सहित संपर्क करें.’

ऐसे वैवाहिक विज्ञापनों में पूरी जातीय और वर्ण व्यवस्था दिखती है. हर जाति के लिए अलग कौलम बने हैं, जहां अंतर्जातीय विवाह की बात होती है. उस का मतलब है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपस में विवाह कर सकते हैं. शूद्र के साथ ये लोग अंतर्जातीय विवाह नहीं करते हैं. ये विज्ञापन आज भी उतने ही रूढि़वादी और जातिवादी हैं, जितने पहले थे.

हाल के 10-15 सालों में विज्ञापन और ज्यादा पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त हो गए हैं. इन विज्ञापनों में यह भी दिखता है कि कैसे हमारे समाज में विवाह की मूल सोच को नकारते हुए इसे वैवाहिक सौदा बनाया गया है, जिस में जाति, धर्म, गोत्र का ध्यान रखना सब से पहले जरूरी है.

कुछ विज्ञापनों में बिना दहेज और कोई जाति बाधा न होने जैसी बातें भले ही लिखी जा रही हैं, लेकिन विज्ञापन देने वाले अपनी जाति का जिक्र करना नहीं भूलते हैं.

असलियत में अपनी जाति से हट कर शादी करना कितना मुश्किल होता है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़े को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है.

शादी के नाम पर पहले भी मातापिता की रजामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता रहा है. मैट्रिमोनियल साइटें इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यवसाय जैसे वर्गों में बंटी हुई हैं. वैवाहिक विज्ञापनों और साइटों की भाषा समाज की उसी सोच को दिखाती है, जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की सोच है.

वैवाहिक विज्ञापनों की शुरुआत के पहले कौलम में ‘ब्राह्मण’ वैसे ही लिखा होता है, जैसे वर्ण व्यवस्था में उस का नाम पहले आता है. वर चाहिए या वधू… इस के अलगअलग कौलम होते हैं. इस के बाद क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, जाट, जाटव, मुसलिम, यादव, बंगाली, पंजाबी, सिख होते हैं.

एक कौलम अन्य का होता है. इस में पासी, विश्वकर्मा, पाल, गडरिया, प्रजापति जैसी जातियों के लिए वर या वधू का जिक्र होता है.

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के विज्ञापनों में सजातीय शब्द के वर या वधू की चाहत ज्यादा होती है. बहुत कम में जाति बंधन नहीं लिखा मिलता है. पासी, विश्वकर्मा, पाल, गडरिया, प्रजापति, जाटव जैसी जातियों के वर्ग में जाति बंधन नहीं लिखा होता है.

सोशल मीडिया पर वैवाहिक साइटों की मैंबरशिप लेने से पहले वर या वधू की पूरी जानकारी बायोडाटा के रूप में ली जाती है. अब इस में लड़का, लड़की और उस के मातापिता की जानकारी के अलावा भाई, बहन, चाचा और चाची की जानकारी भी ली जाती है.

इस के साथ ही यह भी लड़की शाकाहारी है और अल्कोहल का सेवन नहीं करती, लिखा जाता है. एक नया कौलम और जुड़ गया है, जिस में पूछा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर रील तो नहीं बनाती. समाचारपत्रों के वैवाहिक विज्ञापनों में कम बातों का जिक्र किया जाता है.

वैवाहिक साइटों में तमाम तरह की गोपनीय जानकारी ली जाती है, जिस में माली हालत, लोन, ईएमआई जैसे सवाल होते हैं. कुछ बातें फार्म में भरी नहीं जाती हैं, जो अपने परिचय में बताई जाती हैं.

वैवाहिक साइट चलाने वालों का दावा है कि इन जानकारियों के जरीए ही वे परफैक्ट मैच तलाश करते हैं. इन के जरीए लोगों की गोपनीय जानकारियां कहीं की कहीं पहुंचने का खतरा रहता है.

इस तरह से आजादी के 77 साल बाद यह वर्ण व्यवस्था आज भी कायम है. आज भी शादी का वहीं ढांचा चल रहा है, जो मनु के समय में था. ऐसे में कुछ ओबीसी और एससी के ब्राह्मण जैसा बनने से पूरे समाज में बदलाव नहीं माना जा सकता.

Bollywood Life : उर्वशी रौतेला की अनोखी चाहत

Bollywood Life : अमीषा को शादी के लिए नहीं मिल रहा लड़का

‘कहो न प्यार है’ और ‘गदर : एक प्रेमकथा’ जैसी फिल्मों में रितिक रोशन और सनी देओल को अपने प्यार में गिरफ्तार करने वाली खूबसूरत हीरोइन अमीषा पटेल को निजी जिंदगी में शादी करने के लिए एक अदद लड़का नहीं मिल रहा है.

हाल ही में अमीषा पटेल की फिल्म ‘गदर 2’ भी सुपरहिट रही थी, पर दूल्हे की तलाश कर रही अमीषा पटेल का कहना है कि वे शादी के लिए लंबे समय से तैयार हैं, लेकिन उन्हें लड़का नहीं मिल रहा है.

दरअसल, अमीषा पटेल के एक फैन ने उन से कहा था कि वे सलमान खान के साथ शादी कर के खूबसूरत बच्चे पैदा करें. तब अमीषा पटेल ने मजाक करते हुए पूछा भी था, ‘‘न सलमान ने शादी की है और न मैं ने, तो क्या आप को यह लगता है कि हमें शादी कर लेनी चाहिए? शादी के बारे में कहने का आप का मकसद क्या है, शादी या फिल्म प्रोजैक्ट?’’

उर्वशी रौतेला की अनोखी चाहत

हिंदी फिल्मों में आइटम डांसर बन कर नाम कमा चुकी उर्वशी रौतेला ने हाल ही में अपनी एक ऐसी चाहत बताई है, जिसे सुन कर लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली.

दरअसल, उर्वशी रौतेला ने एक इंटरव्यू में कहा कि वे हमेशा नंबर वन रहती हैं, चाहे कहीं भी हों. उन के मांबाप ने उन्हें कभी फर्स्ट न आने की सलाह दी थी, लेकिन नंबर वन खुद उन के पास चल कर आता है.

उर्वशी रौतेला का कहना है, ‘‘आप खुद ही सोचिए कि किन के मांबाप बोलेंगे कि बेटा आप सैकंड या थर्ड आ जाओ, लेकिन फर्स्ट मत आओ. तो मु?ो लगता है कि फर्स्ट ऐसा है, जो मेरे पास खुद आता है, मैं नहीं जाती फर्स्ट के पास.’’

वैसे, हाल ही में उर्वशी रौतेला की फिल्म ‘डाकू महाराज’ सिनेमाघरों में आई है.

ठाकरे का पोता फिल्मों में

महाराष्ट्र में सियासी दल शिव सेना बनाने वाले दिवंगत बाला साहब ठाकरे के पोते ऐश्वर्य ठाकरे राजनीति से अलग फिल्मों में अपना हाथ आजमाना चाहते हैं और अनुराग कश्यप की फिल्म से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख रहे हैं.

ऐश्वर्य ठाकरे ने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ में असिस्टैंट डायरैक्टर के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की थी और अब उन की पहली फिल्म की शूटिंग लखनऊ में पूरी हो चुकी है.

ऐसा माना जाता है कि ऐश्वर्य ठाकरे एक अच्छे डांसर भी हैं और वे माइकल जैक्सन को डांस में अपना आदर्श मानते हैं.

सना ने खोला काला राज

मशहूर फिल्म ‘दंगल’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने वाली हीरोइन फातिमा सना शेख ने एक खुलासा किया है कि उन्हें भी कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा था.

एक मीडिया एजेंसी को इंटरव्यू देते हुए फातिमा सना शेख ने बताया, ‘‘मुझे साउथ इंडस्ट्री से एक फिल्म के लिए औफर आया था, जिस के लिए मैं ने अपना पोर्टफोलियो भेजा था. ऐसे में कास्टिंग एजेंट ने मुझे फोन पर पूछा था कि तुम सबकुछ करने के लिए तैयार रहोगी न?’’

इस का जवाब देते हुए फातिमा सना शेख ने कहा था, ‘‘मैं मेहनत करूंगी और रोल के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करूंगी.’’

फातिमा सना शेख ने एक और खुलासा करते हुए बताया कि कास्टिंग एजेंट्स नए कलाकारों को मौका देने के लिए उन से उन की कमाई का एक हिस्सा भी मांगते हैं और कई बार तो वे पहले ही अपना हिस्सा ले लेते हैं.

गहरी पैठ : Cyber Fraud से सावधान!

Cyber Fraud : दिल्ली के एक अखबार में एक ही दिन एक पेज पर 6 खबरें छपीं जिन में औनलाइन फ्राडों का जिक्र था. 2 मामले डिजिटल अरैस्ट के थे. एक मामले में तो शिकार खुद पढ़ीलिखी डाक्टर थी जिसे घंटों तक शातिरों ने ‘डिजिटल अरैस्ट’ कर रखा था. डिजिटल अरैस्ट में कुछ अरैस्ट नहीं होता. बस शिकार को कहा जाता है कि अपना ह्वाट्सएप वीडियो औन रखो और वहीं उस के सामने बैठे रहो. दूसरी तरफ एक पुलिस अफसर के वेश में बैठा शख्स होता है जो कहता है कि किसी औनलाइन ट्रांजैक्शन की वजह से कोई जुर्म हुआ है.

धमकी दी जाती है कि अगर डिजिटल अरैस्ट की शर्तें नहीं मानी गईं तो असल में पुलिस कई गाडि़यों में आ कर गिरफ्तार कर लेगी और पूरे समाज में बदनाम हो जाओगे. इस दौरान रिश्वत के नाम पर मामले को रफादफा करने के लिए 27 लाख रुपए ट्रांसफर भी करवा लिए गए. शर्तों में एक शर्त यह भी होती है कि कोई दूसरा उस कमरे में न हो. बारबार धमकी दी जाती है कि पुलिस वाले घर के आसपास ही हैं और कभी भी धावा बोल कर असली अरैस्ट कर सकते हैं.

दूसरे मामले में 48 घंटे तक डिजिटल अरैस्ट कर के रखा गया और 5 लाख वसूल कर लिए गए. तीसरे में एक ग्राफिक डिजाइनर को 4 घंटे तक डिजिटल अरैस्ट कर के 2 लाख ठगे.

एक और मामले में मुनाफा दिलाने का लालच दे कर एक लैफ्टिनैंट कमांडर से 25 लाख रुपए झटक लिए गए. एक मामले में पुलिस ने नोएडा में काल सैंटर चलाते शख्स को पकड़ा जो देशविदेश में कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों को सौफ्टवेयर अपग्रेड करने का झांसा दे कर कंप्यूटर का पूरा डाटा इकट्ठा कर लेता था और फिर उस में से जरूरत की चीजें खंगाल कर या तो अकाउंट साफ करता या ब्लैकमेल करता था.

ये सब क्या लोगों की गलती से अपराध हो रहे हैं? नहीं, इन के लिए सरकार और सिर्फ सरकार जिम्मेदार है. मोबाइल की पहुंच लोगों की बातचीत के लिए थी पर सरकार ने बैंकों, जीएसटी, इनकम टैक्स, रिटर्नों, म्यूनिसिपल टैक्सों के लिए मोबाइल को पहचानपत्र, आईडैंटिटी कार्ड बना दिया. अब यह मोबाइल तो लोगों के हाथों में है पर इस के अंदर क्या तकनीक है यह लोगों को क्या पता. जिन्हें पता है वे सरकारी घोड़ों पर चढ़ कर अब लूटमार कर रहे हैं.

सरकार हर चीज के लिए पहले औनलाइन एप्लाई करने को कहती है, फिर ओटीपी आता है, फिर उसे औनलाइन डालना पड़ता है तो सरकारी काम होता है. सरकार ने अपने दफ्तरों के दरवाजों पर ताला डाल दिया है, वहां सिर्फ कंप्यूटर वायर जा रहे हैं तो जनता को कंप्यूटरों और मोबाइलों पर भरोसा तो करना ही पड़ेगा न.

टैलीकौम कंपनियों, इंटरनैट कंपनियों, मोबाइल कंपनियों ने दुनियाभर के बैंकों, सरकारों, कंपनियों, इंश्योरैंस कंपनियों को फांस लिया कि हर काम मोबाइल पर कराओ ताकि उन के मोबाइल बिकें, डाटा बिके और साथ ही हर नागरिक को पूरी तरह गिरफ्त में रखा जा सके. शातिर इसी का फायदा उठा रहे हैं.

मोबाइल इस्तेमाल कराने की जबरदस्ती सरकार ने की है, सरकार के बैंकों ने की है. सारे अपराधों की जमीन उस ने ही तैयार की है. सरकार 4 अखबारों में इश्तिहार दे कर बच नहीं सकती कि उस ने तो जनता को बता दिया था.

जिस दिन एक पेज में 6 घटनाएं छपीं, उस दिन देश के अलगअलग हिस्सों में सैकड़ों मामले हुए होंगे. गरीब लोगों को भी लूटा गया होगा, अमीरों को भी. अभी जैसे एक नंबर पर एक काल आई +245311151.

यह पक्के तौर पर फ्राड काल थी और अगर फोन उठा लिया जाता तो कोई बुरी बात ही होती. यह नंबर गुआना, कांगो, अंगोला कहीं का भी हो सकता है. फोन कहीं और से भी किया जा सकता है.

आम आदमी जिसे सरकार ने धकेला है कि हर फोन को उठाओ क्योंकि यह बैंक से हो सकता, टैक्स वालों का हो सकता है, पुलिस वालों का हो सकता है, कौरपोरेशन का हो सकता है कैसे पता करे कि वह जाल में फंसेगा नहीं. जिम्मेदार वह सरकार है जो मोबाइल को जबरन थोप रही है.

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शादीशुदाओं के प्यार में पड़ने और किसी पराए के साथ सोने के किस्से कभी भी कम नहीं होते थे. हमारी स्मृतियों में, जिन में हिंदू कानूनों को लिखा गया, ऐसी बहुत सी सजाओं के बारे में लिखा गया है जो उन मर्दों और औरतों को दी जाती थीं जो शादी के बाहर के बंधन बनाते थे. सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग भी जब उन से भरा हो तो किस संस्कार, किस संस्कृति, किस पुराने काल के अच्छे होने की बात की जा सकती है.

अभी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में अदालत ने एक औरत को अपने मर्द को गोली से मारने की सजा सुनाई क्योंकि मर्द उस के एक लड़के के सैक्स संबंध पर एतराज कर रहा था और झगड़ रहा था. मजेदार बात यह है कि औरत के प्रेमी, पिता और भाई को भी सजा दी गई क्योंकि हत्या में तीनों का भी हाथ था. मर्द को सिर में गोली मारी गई थी.

इस मामले में औरत के 6 साल के बच्चे ने सच उगल दिया वरना तो पुलिस के पास सुबूत भी नहीं थे.

अपने मर्द से नाराज हो कर दूसरे के साथ सोना कोई नई बात नहीं है और अमेरिका में ऐसे बहुत से मामले नेताओं और चर्चों के पुजारियों के भी खूब सामने आते हैं. वहां के चुने गए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तो लंपट माना गया है फिर भी उन को वहां की जनता ने जीत का सेहरा बांध दिया.

असल में मर्द अभी भी यह नहीं भूले हैं कि औरतें तो उन के लिए खिलौना हैं. बस फर्क यह हुआ?है कि अब औरतें अपनी मरजी कुछ ज्यादा चलाने लगी हैं और कुछ कानून पिछले 60-70 सालों में बने हैं जिन में औरतों की बात को पहला सच माना जाता है. जहां पहले औरतें समाज के डर की वजह से मुंह छिपाती थीं और किसी की ज्यादती या अपना प्यार छिपाती थीं, अब वे खुल कर सामने आने को तैयार हैं.

आज की औरत अपनी मेहनत, अपनी अक्ल के साथसाथ अपने बदन की भी पूरीपूरी कीमत वसूलना सीख रही है. वह न पिता की गुलाम रह गई है, न पति की या किसी और मर्द की. प्रेमी भी धोखा दे तो उसे भी थानेकचहरी में घसीटने में वह हिचकती नहीं है.

आदमी अभी भी पुरानी सोच वाले हैं कि औरत पैर की जूती है, उसे जैसे मरजी फेंको. अब औरतें अपनी दमदार हैसियत रखने वाली हैं. मुंबई में एक ऐक्टर ने एक लड़की को फेसबुक पर उस का लिखा देख कर बुलाया और फिर उस से जोरजबरदस्ती करने लगा. लड़की ने तुरंत शिकायत कर दी और अब ऐक्टर बंधाबंधा बरसों घूमेगा. वह कचहरियों से बच जाए शायद पर जिसे जूती समझ रहा था वह उस के सिर पर पड़ने लगी है.

गांवदेहातों की लड़कियां तो शहरी लड़कियों से आगे हैं. वे दमखम में कम नहीं हैं और उन के साथ 4 जने आसानी से खड़े हो जाते हैं. यह बदलाव धर्म के बावजूद आया है. अगर औरतों ने धर्म का पल्लू छोड़ दिया होता तो वे कब की आजाद हो चुकी होतीं. धर्म उन्हें असल में गुलाम बने रहने की पट्टी रोजाना 4 बार पढ़ाता है. उस के बावजूद अगर यह सब हो रहा है तो खुशी की ही बात है.

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