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एक युग: सुषमा और पंकज की लव मैरिज में किसने घोला जहर?- भाग 2

लेकिन अभी उन की आंख लगी ही थी कि किसी के कराहने की आवाज से उन की नींद टूट गई. वे घबरा कर उठ बैठीं. तुरंत बच्चों के कमरे में पहुंचीं. वहां उन्होंने देखा कि उन की प्यारी बहू सुषमा कराह रही है. उन्होंने तुरंत कमरे की बत्ती जलाई तो देखा, सुषमा बेहोश सी बिस्तर पर पड़ी है.

उन्होंने बहू को बहुत हिलायाडुलाया पर उस ने आंखें न खोलीं. इस के बाद जो दृश्य उन्होंने देखा तो उन के तो पैरों के नीचे से जमीन ही सरक गई. बहू के बगल में बिस्तर पर एक खाली शीशी पड़ी हुई थी और उस पर लिखा था, ‘जहर’. देखते ही पार्वती के मुंह से चीख निकल गई.

उन्होंने तुरंत बेटी को जगाया और स्वयं लगभग दौड़ती हुई जा कर अपने पड़ोसी को बुला लाईं. पड़ोसी की सहायता से वे बहू को अस्पताल ले गईं, जहां आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में उस का इलाज शुरू हो गया.

इधर पंकज को बुलाने के लिए भी सूचना भेज दी गई. कुछ घंटों में ही पंकज आ पहुंचा. पार्वती सोचसोच कर परेशान थीं कि आखिर बहू ने जहर क्यों खा लिया? पंकज भी सोच में पड़ गया कि सुषमा ने जहर क्यों खाया? क्या मां या बहनों ने कुछ कहा

लेकिन ये सब लोग तो उसे बहुत प्यार करते हैं. सुषमा को कुछ हो गया तो क्या उन पर दहेज का मामला नहीं चल जाएगा? आजकल आएदिन इस तरह के किस्से होते ही रहते हैं. कई प्रश्न पार्वती और उन के बेटे के दिलोदिमाग को मथने लगे.

डाक्टरों के उपचार के समय ही सुषमा ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘मैं ने जहर नहीं खाया, मैं ने जहर नहीं खाया…’’

पर डाक्टरों ने उस की एक न सुनी. सुषमा के पेट का सारा पानी निकाल दिया गया. पेट से निकले हुए पानी का परीक्षण करने पर पता चला कि उस के पेट में जहर की एक बूंद भी नहीं है.

पार्वती ने बहू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, आखिर यह सब क्यों किया? मेरी तो जान ही निकल गई थी.’’

‘‘सुषमा, तुम ने हमें कहीं का न छोड़ा. पूरे महल्ले और मेरे दफ्तर में हमारी कितनी बदनामी हुई है. हम किसी से निगाहें मिलाने लायक नहीं रहे. आएदिन दहेज के किस्से होते हैं. डाक्टरी परीक्षण में तनिक भी कमी रह जाती तो हम सब तो जेल में पहुंच गए होते. हमारी कौन सुनता? तुम ने तो हम सब को जेल भेजने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी. अभी भी कितने लोगों को विश्वास आएगा कि तुम ने जहर नहीं खाया था?’’

पंकज के हृदय को सुषमा के इस नाटक से बहुत बड़ी ठेस लगी. उस का हृदय चूरचूर हो गया. पार्वती ने बेटे को समझाने का बहुत प्रयास किया, पर पंकज किसी तरह न माना.

पार्वती ने कहा, ‘‘बेटे, तुम बहू को अब अपने साथ ही ले जाओ.’’

उन्होंने सोचा, बेटा और बहू साथ रहेंगे तो सबकुछ अपनेआप ठीक हो जाएगा. उन का सोचना गलत था. पंकज सुषमा के इस घिनौने नाटक को भूल न सका.

इस अचानक हुए हादसे की सूचना सुषमा के पिता कन्हैया लाल को भी दी जा चुकी थी. उस की मां तो बेटी के जहर खाने का समाचार सुनते ही बेहोश हो गईं.

पिता कहने लगे, ‘‘मैं हमेशा समझाता था कि ये छोटे घर के लोग रुपएपैसे के बड़े लालची होते हैं. अरे, जब पूछा तो कहने लगे कि हमें कुछ भी नहीं चाहिए. अब अपनी फूल सी बेटी को जहर खा लेने पर मजबूर कर दिया न?’’

‘‘वह भी तो उस लड़के की दीवानी बनी हुई थी. आखिर उस लड़के में ऐसी क्या खास बात है?’’ मां ने आंसू बहाते हुए कहा.

‘‘अरे, यह सब उस पंकज की चालाकी है, जो उस ने सुषमा को अपने जाल में फंसा लिया. मैं भी एक जज हूं. छोड़ूंगा नहीं उस नालायक को. उसे हथकडि़यां न लगवाईं तो मेरा भी नाम नहीं.’’

जब कन्हैया लाल पत्नी के साथ सुषमा की ससुराल पहुंचे तो गुस्से में भर कर पंकज ने साफ कह दिया, ‘‘आप अपनी बेटी को अपने साथ ले जाइए. हम तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

‘‘हांहां, बेटी को तो हम साथ ले ही जाएंगे पर तुम्हें भी जेल की हवा खिलाए बिना नहीं छोड़ेंगे. शुक्र है कि मेरी बेटी सहीसलामत है.’’

सुषमा ने भारी मन से अपनी प्रिय सहेली को पूरी कहानी बताते हुए कहा, ‘‘जया, इस हादसे के बाद मैं पिताजी के साथ ससुराल से यहां चली आई.’’

‘‘उस के बाद पंकज से तुम्हारी भेंट हुई या नहीं?’’

‘‘नहीं जया, इस घटना के एक सप्ताह बाद पंकज मेरे घर आए थे. पिताजी उन्हें बाहर बैठक में ही मिल गए. उन्होंने वहीं खूब उलटीसीधी सुना कर पंकज को अपमानित किया. कह दिया कि अब तुम सुषमा से कभी नहीं मिल सकते. अब तो तुम्हारे पास तलाक के कागज ही पहुंचेंगे.

‘‘तब पंकज ने मेरे पिताजी से कहा कि आप मुझ से बात नहीं करना चाहते तो न करें पर मुझे सुषमा से तो एक बार बात कर लेने का अवसर दें. पर पिताजी ने कहा कि मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहता. अब तो तुम सुषमा से कचहरी में ही मिलोगे.

‘‘इस के बाद वे भारी मन से चले गए. बाद में एक दिन उन का टैलीफोन भी आया था तो मां ने कह दिया कि आगे से टैलीफोन करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘यह सब तो तेरे मातापिता ने किया, पर तू ने इस बीच क्या किया, यह तो तू ने बताया ही नहीं?’’

‘‘जया, मैं क्या करती, मेरी तो कुछ समझ में आया ही नहीं कि कैसे यह सब कुछ हो गया. मैं तो बस एक मूकदर्शक ही बनी रही.’’

‘‘इस का मतलब यह है कि तुम ने पंकज की ओर हाथ बढ़ाने का कोई प्रयास ही नहीं किया, जबकि पंकज ने 2 बार तुम से मिलने का प्रयास किया.’’

‘‘मैं क्या करती, पिताजी ने तो सारे रास्ते ही बंद कर दिए. उन्होंने निर्णय सुना दिया कि पंकज से मिलने या बात करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘उन्होंने तो निर्णय कर लिया, पर क्या तू ने भी उन का निर्णय मान लिया? तेरी सूरत से तो ऐसा नहीं लगता?’’ जया ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं? मेरे मातापिता हर समय उठतेबैठते यही कहते रहते हैं कि अपने मन से विवाह करने का परिणाम देख लिया. कितनी बेरहमी से उस ने तुझे अपने घर से निकाल दिया. समाज में हमारी कितनी थूथू हुई है. पहले तो तू ने अपने से इतने नीचे खानदान में शादी की और फिर उस के बाद यह बेइज्जती. दो कौड़ी के उस लड़के की हिम्मत तो देखो. हम बड़ी धूमधाम से तेरी दूसरी शादी करेंगे. अभी तेरी उम्र ही कितनी है?’’

‘‘मातापिता ने कह दिया और तू ने सब कुछ ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. इसी दम पर पूरे परिवार का विरोध मोल ले कर पंकज का हाथ थामा था. क्या अब तुझे पंकज सचमुच पसंद नहीं?’’

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 2

उधर मनीष, नीलेश के प्रति अपने व्यवहार के लिए स्वयं को धिक्कार रहा था. पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई प्रोग्राम बनने से पूर्व ही अधर में लटक गया था पर वह करता भी तो क्या करता. नीलेश की बातें सुन कर उस के दिल में  शक का कीड़ा कुलबुला कर नागफनी की तरह डंक मारते हुए उसे दंशित करने लगा था.

वह जानता था कि उसे महीने में 10-12 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है. ऐसे में हो सकता है सुलेखा की किसी के साथ घनिष्ठता हो गई हो. इस में  कुछ बुरा भी नहीं है पर उसे यही विचार परेशान कर रहा था कि सुलेखा ने उस सुयश नामक व्यक्ति से उसे क्यों नहीं मिलवाया, जबकि नीलेश के अनुसार वह उस से मिलती रहती है. और तो और उस ने उस का नीलेश से अपना ममेरा भाई बता कर परिचय भी करवाया…जबकि उस की जानकारी में उस का कोई ममेरा भाई है ही नहीं…उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे पर सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी पर दोषारोपण करना उचित भी तो नहीं है.

एक दिन जब सुलेखा बाथरूम में थी तो वह उस का सैलफोन सर्च करने लगा. एक नंबर  उसे संशय में डालने लगा क्योंकि उसे बारबार डायल किया गया था. नाम था सुश…सुश. नीलेश की जानकारी में सुलेखा का कोई दोस्त नहीं है फिर उस से बारबार बातें क्यों किया करती है और अगर उस का कोई दोस्त है तो उस ने उसे बताया क्यों नहीं. मन ही मन मनीष ने सोचा तो उस के अंतर्मन ने कहा कि यह तो कोई बात नहीं कि वह हर बात तुम्हें बताए या अपने हर मित्र से तुम्हें मिलवाए.

पर जीवन में पारदर्शिता होना, सफल वैवाहिक जीवन का मूलमंत्र है. अपने अंदर उठे सवाल का वह खुद जवाब देता है कि वह तुम्हारा हर तरह से तो खयाल रखती है, फिर मन में शंका क्यों?

‘शायद जिसे हम हद से ज्यादा प्यार करते हैं, उसे खो देने का विचार ही मन में असुरक्षा  पैदा कर देता है.’

‘अगर ऐसा है तो पता लगा सकते हो, पर कैसे?’

मन तर्कवितर्क में उलझा हुआ था. अचानक सुश और सुयश में उसे कुछ संबंध नजर आने लगा और उस ने वही नंबर डायल कर दिया.

‘‘बोलो सुलेखा,’’ उधर से किसी पुरुष की आवाज आई.

पुरुष स्वर सुन कर उसे लगा कि कहीं गलत नंबर तो नहीं लग गया अत: आफ कर के पुन: लगाया, पुन: वही आवाज आई…

‘‘बोलो सुलेखा…पहले फोन क्यों काट दिया, कुछ गड़बड़ है क्या?’’

उसे लगा नीलेश ठीक ही कह रहा था. सुलेखा उस से जरूर कुछ छिपा रही है… पर क्यों, कहीं सच में तो उस के पीछे उन दोनों में… अभी वह यह सोच ही रहा था कि सुलेखा नहा कर आ गई. उस के हाथ में अपना मोबाइल देख कर बोली, ‘‘कितनी बार कहा है, मेरा मोबाइल मत छूआ करो.’’

‘‘मेरे मोबाइल से कुछ नंबर डिलीट हो गए थे, उन्हीं को तुम्हारे मोबाइल से अपने में फीड कर रहा था,’’ न जाने कैसे ये शब्द उस की जबान से फिसल गए.

अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वह ऐसा ही करने लगा जैसा उस ने कहा था. इसी बीच उस ने 2 आउटगोइंग काल, जो सुश को करे थे उन्हें भी डिलीट कर दिया, जिस से अगर वह सर्च करे तो उसे पता न चले.

अब संदेह बढ़ गया था पर जब तक सचाई की तह में नहीं पहुंच जाए तब तक वह उस से कुछ भी कह कर संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था. उस की पत्नी का किसी के साथ गलत संबंध है तथा वह उस से चोरीछिपे मिला करती है, यह बात भी वह सह नहीं पा रहा था. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि वह नामर्द तो नहीं, तभी उस की पत्नी को उस के अलावा भी किसी अन्य के साथ की आवश्यकता पड़ने लगी है.

‘तुम इतने दिन बाहर टूर पर रहते हो, अपने एकाकीपन को भरने के लिए सुलेखा किसी के साथ की चाह करने लगे तो इस में क्या बुराई है?’ अंतर्मन ने पुन: प्रश्न किया.

‘बुराई, संबंध बनाने में नहीं बल्कि छिपाने में है, अगर संबंध पाकसाफ है तो छिपाना क्यों और किस लिए?’

‘शायद इसलिए कि तुम ऐसे संबंध को स्वीकार न कर पाओ…सदा संदेह से देखते रहो.’

‘क्या मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं…नए जमाने का हूं…स्वस्थ दोस्ती में कोई बुराई नहीं है.’

‘सब कहने की बात है, अगर ऐसा होता तो तुम इतने परेशान न होते… सीधेसीधे उस से पूछ नहीं लेते?’

‘पूछने पर मन का शक सच निकल गया तो सह नहीं पाऊंगा और अगर गलत निकला तो क्या मैं उस की नजरों में गिर नहीं जाऊंगा.’

‘जल्दबाजी क्यों करते हो, शायद समय के साथ कोई रास्ता निकल ही आए.’

‘हां, यही ठीक रहेगा.’

इस सोच ने तर्कवितर्क में डूबे मन को ढाढ़स बंधाया…उन के विवाह को 10 महीने हो चले थे. वह अपने पी.एफ. में उसे नामिनी बनाना चाहता था, उस के लिए सारी औपचारिकता पूरी कर ली थी. बस, सुलेखा के साइन करवाने बाकी थे. एक एल.आई.सी. भी खुलवाने वाला था, पर इस एपीसोड ने उसे बुरी तरह हिला कर रख दिया. अब उस ने सोचसमझ कर कदम उठाने का फैसला कर लिया.

यद्यपि सुलेखा पहले की तरह सहज, सरल थी पर मनीष के मन में पिछली घटनाओं के कारण हलचल मची हुई थी. एक बार सोचा कि किसी प्राइवेट डिटेक्टर को तैनात कर सुलेखा की जासूसी करवाए, जिस से पता चल सके कि वह कहां, कब और किस से मिलती है पर जितना वह इस के बारे में सोचता, बारबार उसे यही लगता कि ऐसा कर के वह अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक कर देगा…आखिर ऐसी संदेहास्पद जिंदगी कोई कब तक बिता सकता है. अत: पता तो लगाना ही पड़ेगा, पर कैसे, समझ नहीं पा रहा था.

हफ्ते भर में ही ऐसा लगने लगा कि वह न जाने कितने दिनों से बीमार है. सुलेखा पूछती तो कह देता कि काम की अधिकता के कारण तबीयत ढीली हो रही है…वैसे भी सुलेखा का उस की चिंता करना दिखावा लगने लगा था. आखिर, जो स्त्री उस से छिप कर अपने मित्र से मिलती रही है वह भला उस के लिए चिंता क्यों करेगी?

उस दिन मनीष का मन बेहद अशांत था. आफिस से छुट्टी ले ली थी. सुलेखा ने पूछा तो कह दिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं लग रही है, अत: छुट्टी ले ली.’’

सुलेखा ने डाक्टर को दिखाने की बात कही तो वह टाल गया. आखिर बीमारी मन की थी, तन की नहीं, डाक्टर भी भला क्या कर पाएगा. रात का खाना भी नहीं खाया. सुलेखा के पूछने पर कह दिया कि बस, एक गिलास दूध दे दो, खाने का मन नहीं है. सुलेखा दूध लेने चली गई. उस के कदमों की आहट सुन कर उसे न जाने क्या सूझा कि अचानक अपनी छाती को कस कर दबा लिया तथा दर्द से कराहने लगा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कर्णफूल: क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 2

20-25 दिन की छुट्टी करने के बाद मैं ने जौब पर जाना शुरू कर दिया. मैं संभल तो गई, पर खामोशी व उदासी मेरे साथी बन गए. अम्मी मेरा बेहद खयाल रखती थीं. अलीना आपी भी आ गईं. हर तरह से मुझे ढांढस बंधातीं. वह काफी दिन रुकीं. जिंदगी अपने रूटीन से गुजरने लगी.

अलीना आपी ने इस विपत्ति से निकलने में बड़ी मदद की. मैं काफी हद तक सामान्य हो गई थी. उस दिन छुट्टी थी, अम्मी ने दो पुराने गावतकिए निकाले और कहा, ‘‘ये तकिए काफी सख्त हो गए हैं. इन में नई रुई भर देते हैं.’’

मैं ने पुरानी रुई निकाल कर नीचे डाल दी. फिर मैं ने और अलीना आपी ने रुई तख्त पर रखी. हम दोनों रुई साफ कर रहे थे और तोड़ते भी जा रहे थे. अम्मी उसी वक्त कमरे से आ कर हमारे पास बैठ गईं. उन के हाथ में एक प्यारी सी चांदी की डिबिया थी. अम्मी ने खोल कर दिखाई, उस में बेपनाह खूबसूरत एक जोड़ी जड़ाऊ कर्णफूल थे. उन पर बड़ी खूबसूरती से पन्ना और रूबी जड़े हुए थे. इतनी चमक और महीन कारीगरी थी कि हम देखते रह गए.

आलीना आपी की आंखें कर्णफूलों की तरह जगमगाने लगीं. उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘‘अम्मी ये किसके हैं?’’

अम्मी बताने लगीं, ‘‘बेटा, ये तुम्हारी दादी के हैं, उन्होंने मुझ से खुश हो कर मुझे ये कर्णफूल और माथे का जड़ाऊ झूमर दिया था. माथे का झूमर तो मैं ने अलीना की शादी पर उसे दे दिया था. अब ये कर्णफूल हैं, इन्हें मैं मलीहा को देना चाहती हूं. दादी की यादगार निशानियां तुम दोनों बहनों के पास रहेंगी, ठीक है न.’’

अलीना आपी के चेहरे का रंग एकदम फीका पड़ गया. उन्हें जेवरों का शौक जुनून की हद तक था, खास कर के एंटीक ज्वैलरी की तो जैसे वह दीवानी थीं. वह थोड़े गुस्से से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, आप ने ज्यादती की, खूबसूरत और बेमिसाल चीज आपने मलीहा के लिए रख दी. मैं बड़ी हूं, आप को कर्णफूल मुझे देने चाहिए थे. ये आप ने मेरे साथ ज्यादती की है.’’

अम्मी ने समझाया, ‘‘बेटी, तुम बड़ी हो, इसलिए तुम्हें कुंदन का सेट अलग से दिया था, साथ में दादी का झूमर और सोने का एक सेट भी दिया था. जबकि मलीहा को मैं ने सोने का एक ही सेट दिया था. इस के अलावा एक हैदराबादी मोती का सेट था. उसे मैं ने कर्णफूल भी उस वक्त नहीं दिए थे, अब दे रही हूं. तुम खुद सोच कर बताओ कि क्या गलत किया मैं ने?’’

अलीना आपी अपनी ही बात कहती रहीं. अम्मी के बहुत समझाने पर कहने लगीं,  ‘‘अच्छा, मैं दादी वाला झूमर मलीहा को दे दूंगी, तब आप ये कर्णफूल मुझे दे दीजिएगा. मैं अगली बार आऊंगी तो झूमर ले कर आऊंगी और कर्णफूल ले जाऊंगी.’’

अम्मी ने बेबसी से मेरी तरफ देखा. मेरे सामने अजीब दोराहा था, बहन की मोहब्बत या कर्णफूल. मैं ने दिल की बात मान कर कहा, ‘‘ठीक है आपी, अगली बार झूमर मुझे दे देना और आप ये कर्णफूल ले जाना.’’

अम्मी को यह बात पसंद नहीं आई, पर क्या करतीं, चुप रहीं. अभी ये बातें चल ही रहीं थीं कि घंटी बजी. अम्मी ने जल्दी से कर्णफूल और डिबिया तकिए के नीचे रख दी.

पड़ोस की आंटी कश्मीरी सूट वाले को ले कर आई थीं. सब सूट व शाल वगैरह देखने लगे. हम ने 2-3 सूट लिए. उन के जाने के बाद अम्मी ने कर्णफूल वाली चांदी की डिबिया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘जाओ मलीहा, इसे संभाल कर अलमारी में रख दो.’’

मैं डिबिया रख कर आई. उस के बाद हम ने जल्दीजल्दी तकिए के गिलाफ में रुई भर दी. फिर उन्हें सिल कर तैयार किया और कवर चढ़ा दिए. 3-4 दिनों बाद अलीना आपी चली गईं. जातेजाते वह मुझे याद करा गईं, ‘‘मलीहा, अगली बार मैं कर्णफूल ले कर जाऊंगी, भूलना मत.’’

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. चाचाचाची और उन के बच्चे एक शादी में शामिल होने आए. वे लोग 5-6 दिन रहे, घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेंफिरे. मेरी चाची अम्मी को कम ही पसंद करती थीं, क्योंकि मेरी अम्मी दादी की चहेली बहू थीं. अपनी खास चीजें भी उन्होंने अम्मी को ही दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि किसी तरह इस मसले का कोई हल निकल जाए. पर जब आत्मा और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

 

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश – भाग 2

अपने बनाए हुए प्लान में रूबी और अजय सिंह कामयाब हो रहे थे और वे ये सोच कर खुश हो रहे थे कि रणबीर को अपने गुप्त रोगी होने का एहसास होगा और अब वह रूबी के शरीर को हाथ नहीं लगा पाएगा और गुजरात जल्द वापस लौट जाएगा, जबकि दूसरी तरफ रणबीर बहुत परेशान था.

रणबीर अपनी पत्नी से भले ही महीनों दूर रहता था, पर किसी भी बाजारू औरत से कभी भी उस ने संबंध नहीं बनाए थे. ऐसे में उस के शरीर पर किसी भी प्रकार के इंफैक्शन का हो जाना उसे परेशानी और हैरत में डाल रहा था और उस पर उस की पत्नी भी उसे बारबार गुप्त रोगी होने का ताना दे रही थी, इसलिए वह सीधा शहर के एक अच्छे डाक्टर के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई.

”क्या आप ने सड़क के किनारे तंबू लगा कर दवा या तेल बेचने वालों से किसी तरह की दवा ली है?” डाक्टर ने पूछा.

”नहीं सर, नीमहकीम से तो बिलकुल नहीं, पर, एक दोस्त ने जरूर एक तेल दिया था, जिसे मैं ने ताकत बढ़ाने वाला तेल समझ कर लगा लिया है. ये घाव और जलन तब से ही हैं,” रणबीर ने अपनी पत्नी का नाम छिपा लिया, क्योंकि उस की पत्नी ने ही उस के अंग पर तेल से मसाज की है, ऐसा कहने में भी उसे शर्म लग रही थी.

उस डाक्टर ने रणबीर को हिम्मत दी और वह तेल उन्हें ला कर दिखाने को कहा, ताकि वे उस को जांच सकें.

जब रणबीर ने तेल की वह शीशी डाक्टर को ला कर दिखाई, तो तेल का शुरुआती टैस्ट करते ही डाक्टर चौंक गए. उन्होंने रणबीर को जो बताया, उसे सुन कर रणबीर के पैरों तले जमीन ही खिसक गई.

”यह एक ऐसा तेल है, जिस के पीएच का मान बहुत कम है और इतने कम पीएच का कोई भी मलहम या तेल हमारी चमड़ी को नुकसान पहुंचा सकता है. साथ ही, इस में कुछ हानिकारक कैमिकल भी मिले हुए हैं. इतना ही नहीं, बल्कि इस के रोजाना इस्तेमाल से आप नामर्द भी हो सकते हैं,” डाक्टर ने कहा.

‘रूबी तो मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती, तो क्या रूबी के साथ किसी ने नकली तेल दे कर धोखा किया है?’ इसी सोचविचार में उलझा रणबीर घर आया, तो उस ने रूबी को फोन पर किसी से बात करते हुए पाया.

रूबी उस समय अजय सिंह से ही बात कर रही थी. रणबीर को अचानक घर आया देख कर वह हड़बड़ा सी गई और उस ने फोन काट दिया.

परेशान रणबीर सोफे पर पसर गया और रूबी से एक कप चाय बना लाने को कहा. वह खुद अपनी मर्ज की दवा ढूंढऩे के लिए इंटरनैट खंगालने लगा, पर उस का मोबाइल हैंग कर रहा था, इसलिए रणबीर ने किचन में जा कर रूबी का मोबाइल मांगा, तो रूबी के चेहरे का रंग ही उतर गया.

रूबी ने मोबाइल देने में हिचकिचाहट भी दिखाई, पर भारी मन से उस ने अपना मोबाइल रणबीर को दे दिया. उस की यह परेशानी रणबीर से भी छिपी न रह सकी, इसलिए मोबाइल को अपने हाथ में लेते ही रणबीर ने मोबाइल के हाल में डायल किए गए नंबरों पर सरसरी नजर डाली, तो उस में पिछले डायल किए गए एक नंबर को ‘फ्रैंड’ नाम से सेव किया गया था.

उत्सुकतावश रणबीर ने मोबाइल के ह्वाट्सएप पर ‘फ्रैंड’ नाम की डीपी देखी, तो वह एक आदमी की तसवीर थी.

‘भला यह आदमी कौन है, जिस का नंबर रूबी के मोबाइल में ‘फ्रैंड’ के नाम से सेव है?’ यह सवाल बारबार रणबीर के मन में शक पैदा कर रहा था.

रणबीर ने घाटघाट का पानी पी रखा था. उसे कुछ शक हुआ, तो मोबाइल काल की रिकौर्डिंग सुनने लगा और ‘फ्रैंड’ नाम के आदमी से हुई कई काल की रिकौर्डिंग रणबीर ने सुन डाली और उसे सारा माजरा समझते देर नहीं लगी. उस की नसों में बहता खून बारबार उस की कनपटियों तक जोर मार रहा था. उस का मन कर रहा था कि वह जा कर रूबी की गरदन मरोड़ दे, पर कुछ सोच कर उस ने ऐसा नहीं किया.

रणबीर ने शांत भाव से मोबाइल को टेबल पर रख दिया और अपनी आंखें बंद कर के बैठ गया.

रूबी जब चाय ले कर आई, तो उस ने रणबीर को सोता हुआ देखा तो उस की जान में जान आई. उस ने अपना मोबाइल अपने कब्जे में कर लिया.

1-2 दिन तक रणबीर बहुत ही शांत रहा और अपने को खुश दिखाता रहा, फिर एक दिन उस ने रूबी से कहा, ”मैं काम के सिलसिले में 2 दिन के लिए बाहर जा रहा हूं, इस बीच तुम अपना ध्यान रखना.”

 

15 अगस्त स्पेशल: फौजी के फोल्डर से एक सैनिक की कहानी – भाग 2

‘मेरी बहन ने, जब से राखी पोस्ट की है तभी से मां के पीछे पड़ी है, भैया से पूछो न, कैसी लगी? आप तो जानते हैं एक संडे ही मिलता हैं फोन करने को, ऊपर से इतनी लंबी लाइन रहती है कि 4-5 मिनट से ज्यादा बात ही नहीं हो सकती. इसलिए सोचा कि आप की आ गई होगी तो हमारी डाक भी आ ही गई होगी. जाऊं डाक का पता कर के आ जाऊं?’

‘आज शुक्रवार है. अगर शाम तक मिल गई तो ठीक, वरना संडे को मीतू से कह देना कि राखी मिल गई, बहुत सुंदर है. तुम्हारी बहन तो अभी छोटी है. यही 10-11 साल की होगी. है न? उसे फुसलाना आसान है. मगर मेरी बहन तो मुझ से केवल 2 साल छोटी है और मुझे ही चरा देती है. पिछले साल मैं ने यही बोला था तो कहने लगी, लिफाफे का कलर बताओ, राखी पर क्या लिखा है, बताओ?’ बड़ी मुश्किल से मैं ने फोन की लंबी लाइन का बहाना बना मां को फोन देने को कहा था.

‘हां सर, ये बहनों की आदत होती है. हर बात की उन्हें पूरी डिटेल चाहिए’ मोहित और मैं दोनों ही हंस पड़े थे.

‘किस बात पर हंस रहे हो दोनों?,’ सोमेश ने कमरे में प्रवेश कर पूछा था,

‘यहां बहनों की आदतों पर चर्चा हो रही है.’

‘मेरी तो कोई भी बहन है नहीं, और न ही कोई भाई. तभी तो मां पूरे समय मेरी ही चिंता करती रहती हैं, यदि होती तो वे अपना ध्यान उन की तरफ कर लेतीं. वे तो हर समय खड़कवासला आने को, मेरा मतलब यहां आने को तैयार बैठी रहती हैं. वे तो पापा मना करते हैं कि 6 महीने में घर तो आ ही जाता है, वहां जा कर क्या करोगी? सिवा उसे डिस्टर्ब करने के, तो पता है क्या कहती हैं?’

‘क्या?’

‘यही, कि पता नहीं वहां कैसे रहता है. मनपसंद खाने को मिलता भी है कि नहीं. मैं ढेर सारा सूखा नाश्ता बना कर ले चलूंगी. उसे मेरे हाथ के बेसन की पिन्नियां बहुत पसंद हैं. वहां उस का रूम भी देखूंगी कि कैसे रहता है. पापा ने समझाबुझा कर रखा है कि अभी इतनी दूर पंजाब से जाओगी, 1-2 घंटे से ज्यादा अंदर रह भी नहीं पाओगी और वह हमारे साथ भी नहीं आ सकता. फिर क्या करोगी जा कर? मगर मां, हर 15-20 दिनों बाद अपनी तैयारियां शुरू कर देती हैं और रोधो कर शांत बैठ जाती हैं.’

‘यह हाल तो मेरी बहन का है. अभी मेरी पासिंगआउट परेड के 2 साल बाकी हैं मगर मेरी बहन की रोज ड्रैस फाइनल हो जाती है कि मुझे यह पहनना है तो कभी वह पहनना है. पापा कहते हैं भाईर् की परेड होगी या तेरी?’ मोहित की बात सुन दोनों हंस पड़े.

‘अरे भाई, हम दोनों की तो 4 महीने बाद ही पासिंगआउट परेड है. सोच रहा हूं, इस वीकैंड पुणे से एक बढि़या कैमरा खरीद लूं. जातेजाते कुछ यादगार रिकौर्डिंग और फोटो तो सहेज ही लूं. जब अपनी परेड होगी तो बहन को पकड़ा दूंगा वह पूरी रिकौर्डिंग कर ही देगी,’ राघव ने अपना प्लान बताया.

‘सर, आप लोग तो सीनियरमोस्ट बैच के हो, आप तो कैमरा रख सकते हैं. सर, मेरे भी कुछ फोटो खींच लीजिएगा और मुझे मेल कर दीजिएगा. वैसे भी सर, आप को ही सब से ज्यादा फोटोग्राफी का शौक है. आप ही हर बार फोटोग्राफर से सब से ज्यादा फोटो खरीदते हैं,’ मोहित ने कहा.

‘हां, मेरी बहन भी चिढ़ाती हुए कहती है कि भाईर् की उंगली भी अगर किसी फोटो में दिख जाए तो वे फोटो खरीद लेंगे. हर 6 महीने में इतनी फोटो जमा कर लेता हूं कि अब तक 200 फोटो तो हो ही गई होंगी. अभी मां से कैमरे के लिए पूछूंगा तो कहेंगी, घर में कैमरा है तो हम वही ले आएंगे. मगर मुझे उस पुराने कैमरे से नहीं, बल्कि लेटैस्ट मौडल के कैमरे से फोटो खींचनी है, आखिर 15 यादगार दिनों की फोटो जो सहेज कर रखनी हैं,’ राघव बोला.

‘ठीक कह रहा है यार, तेरे कैमरे से ही फोटो खीच लेंगे. बाद में तू छांट कर अच्छी वाली मेल कर देना हम सब को,’ सोमेश बोला.

‘ठीक है, यार.’

अब फोटो ही तो बची हैं केवल. मोहित और सोमेश दोनों ही शहीद हो चुके हैं. अपने फोल्डर को खोल कर राघव सोचने लगा. उस की पहली पोस्ंिटग उड़ी में हुई थी. मोहित और सोमेश की भी पहली पोस्ंिटग बौर्डर की थी. वे लगातार आतंकवादी हमले और सीजफायर उल्लंघन झेलते रहे. उन की शहादत पर वह फड़फड़ा कर रह गया था. दोनों को ताबूत में विदा कर कितना रोया था. यह साथ इतना छोटा होगा, उसे अंदाजा नहीं था. मौत यहां हरपल मंडराती रहती है. कब उस पार से बरसे मोर्टार्स किस का खून पिएंगे, कुछ पता नहीं चलता.

यहां तो नहीं, हां, देहरादून में कितने शौक से उस ने अपनी पासिंगआउट परेड के लिए कैमरा भी खरीदा और खूब रिकौर्डिंग भी की और अपनी बहन महिमा को यह कह कर पकड़ा दिया था, ‘इस का 4 जीबी मैमोरी कार्ड भर गया है. इसे संभाल कर रखना और इस 8 जीबी के नए मैमोरी कार्ड से अपनी फोटो खींचना. दोनों कार्ड की फोटो अलग भी रहेंगी और सुरक्षित भी.’ मगर उस ने वह मैमोरी कार्ड ही कहीं गुम कर दिया. आईएमए देहरादून की सारी फोटो चली गईं. लखनऊ पहुंच कर जब उसे पता चला कि मैमोरी कार्ड ही खो दिया महिमा ने, तो लगातार 2 दिनों तक अपनी बहन पर चिल्लाता रहा था और उस बेचारी की रोरो कर आंखें सूज गईं. फिर तो मां बहन के पक्ष में आ गईं.

‘क्या आफत हो गई है. कल से तेरा ड्रामा चल रहा है, क्या हो गया? अगर मैमोरी कार्ड खो भी गया तो क्या हो गया,’ मां गुस्से में बोली.

‘अरे मम्मी, मैं ने कैमरा खरीदा ही इसलिए था कि मैं अपनी परेड, अपने साथियों और सब से महत्त्वपूर्ण वह यादगार पल जब आप और पापा ने मेरे कंधे पर लैफ्टिनैंट के स्टार लगाए, की फोटो खींच सकूं. वे सभी फोटो महिमा की लापरवाही से चले गए.’

‘ठीक है. एक बार बोला, दो बार बोला और कितनी बार कहेगा उसे? उसे भी तो अपनी गलती पता है. माफी भी मांग चुकी है और तू है कि चिल्लाता ही जा रहा है.’

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

एक युग: सुषमा और पंकज की लव मैरिज में किसने घोला जहर?- भाग 1

‘‘कहो सुषमा, तुम्हारे ‘वे’ कहां हैं? दिखाई नहीं दे रहे, क्या अभी अंदर ही हैं?’’

‘‘नहीं यार, मैं अकेली ही आई हूं. उन्हें फुरसत कहां?’’

‘‘आहें क्यों भर रही है, क्या अभी से यह नौबत आ गई कि तुझे अकेले ही फिल्म देखने आना पड़ता है? क्या कोई चक्करवक्कर है? मुझे तो तेरी सूरत से दाल में काला नजर आ रहा है.’’

‘‘नहीं री, यही तो रोना है कि कोई चक्करवक्कर नहीं. वे ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘तो फिर कैसे हैं? मैं भी तो जरा सुनूं जो मेरी सहेली को अकेले ही फिल्म देखने की जरूरत पड़ गई.’’

‘‘वे कहीं अपनी मां की नब्ज पकड़े बैठे होंगे.’’

‘‘तेरी सास अस्पताल में हैं और तू यहां? पूरी बात तो बता कि क्या हुआ?’’

‘‘जया, चलो किसी पार्क में चल कर बैठते हैं. मैं तो खुद ही तेरे पास आने वाली थी. इन 3-4 महीनों में मेरे साथ जो कुछ गुजर गया, वह सब कैसे हो गया. मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आता,’’ कहते हुए सुषमा सिसक पड़ी.

‘‘अरे, तू इतनी परेशान रही और मुझे खबर तक नहीं. ब्याह के बाद तू इतनी बदल जाएगी, इस की तो मुझे आशा ही नहीं थी. जिंदगीभर दोस्ती निभाने का वादा इसी मुंह से किया करती थी?’’ सुषमा की ठोड़ी ऊपर उठाते हुए जया ने कहा, ‘‘मैं तो तेरे पास नहीं आई क्योंकि मैं समझ रही थी कि तू अपनी ससुराल जा कर मुझे भूल ही गई होगी. पर तू चिंता मत कर, मुझे पूरी बात तो बता. मैं अभी कोई न कोई हल निकालने का प्रयास करूंगी, उसी तरह जैसे मैं ने तुझे और पंकज को मिलाने का रास्ता निकाल लिया था.’’

अपनी इस प्यारी सहेली को पा कर सुषमा ने आपबीती बता कर मन का सारा बोझ हलका कर लिया.

पार्वती के पति 10 वर्ष पहले लकवा के शिकार हो कर बिस्तर से लग गए थे. इन 10 वर्षों में उस ने बड़े दुख झेले थे. उस के पति सरकारी नौकरी में थे. अत: उन्हें थोड़ी सी पैंशन मिलती थी. पार्वती ने किसी तरह स्कूल में शिक्षिका बन कर बच्चों के खानेपीने और पढ़नेलिखने का खर्च जुटाया था. 2 जोड़ी कपड़ों से अधिक कपड़े कभी किसी के लिए नहीं जुट पाए थे.

उस पर इकलौते बेटे पंकज को पार्वती इंजीनियर बनाना चाहती थी. गांव की थोड़ी सी जमीन थी, वह भी उन्हें अपनी चाह के लिए बेच देनी पड़ी. एकएक दिन कर के उन्होंने पंकज के पढ़लिख कर इंजीनियर बन जाने का इंतजार किया था. बड़ी प्रतीक्षा के बाद वह सुखद समय आया जब पंकज सरकारी नौकरी में आ गया.

पंकज के नौकरी में आते ही उस के लिए रिश्तों की भीड़ लग गई. उस भीड़ में न भटक कर उन्होंने अपने बेटे के लिए बेटे की ही पसंद की एक संपन्न घर की प्यारी सी बहू ढूंढ़ ली. सुषमा बहू बन कर उन के घर आई तो बरसों बाद घर में पहली बार खुशियों की एक बाढ़ सी आ गई.

पार्वती ने बहू को बड़े लाड़प्यार से अपने सीने से लगा लिया. छुट्टी खत्म होने पर पंकज ने सुषमा से कहा, ‘‘सुमी, मां ने बहुत दुख झेले हैं. तुम थोड़े दिन उन के पास रह कर उन का मन भर दो. मैं हर सप्ताह आता रहूंगा. घर मिलते ही तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा.’’

पंकज की बहनें दिनभर सुषमा को घेरे रहतीं. वे उसे घर का कोई भी काम न करने देतीं. सुषमा उन की प्यारी भाभी जो थी. सुषमा को प्यास भी लगती तो उस की कोई न कोई ननद उस के लिए पानी लेने दौड़ पड़ती.

पार्वती के तो कलेजे का टुकड़ा ही थी सुषमा. उस के आने से पूरा घर खुशी से जगमगा उठा. पार्वती उसे प्यार से ‘चांदनी’ कहने लगी. सुषमा के सिर में दर्द भी होता तो वे तुरंत बाम ले कर दौड़ पड़तीं.

धीरेधीरे पंकज के विवाह को 2 महीने बीत गए थे. इस बार जब पंकज घर आया तो सुषमा ने कहा, ‘‘मैं भी तुम्हारे साथ ही चलूंगी. अब मुझे यहां अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बस, अगले महीने ही तो घर मिल जाएगा, मैं ने तुम्हें बताया तो था…फिर तुम्हें यहां कौन छोड़ जाएगा?’’

‘‘तो तब तक हम लोग अपने पिताजी के घर रह लेंगे. मां और पिताजी कितने खुश होंगे. इतना बड़ा बंगला है.’’

‘‘नहीं सुषमा, मैं घरजमाई बन कर नहीं रह सकता. यह मुझ से नहीं होगा. यह मैं ने तुम से पहले भी कह दिया था कि मुझ से कभी इस तरह की जिद न करना.’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती. मैं गैस्ट हाउस में ही तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

‘‘सुमी, जिद नहीं करते. वहां सभी अकेले रहते हैं. तुम्हारा वहां साथ चलना ठीक नहीं है. बस, थोड़े ही दिनों की तो बात है. क्या मां और बहनें तुम्हें प्यार नहीं करतीं? बस, मैं यों गया और यों आया,’’ पंकज की गाड़ी का समय हो रहा था. वह सुषमा से विदा ले कर चला गया.

पंकज 4 बहनों का अकेला भाई था. आज छोटी का जन्मदिन था. पंकज को गए 3-4 दिन हो गए थे. पार्वती चौका समेट कर बिस्तर पर जो लेटीं तो लेटते ही उन्हें नींद आ गई.

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 1

मेघा सही स्थिति का आकलन कर पाने की स्थिति में नहीं है. मां को देखती है तो कलेजा कट के रह जाता है वहीं रिश्तेदारों की चाशनी में लिपटी बेतुकी सलाहें सुनती है तो कटे कलेजे को सिल कर ढाल बनाने को जी चाहता है उस का.

मेघा के लिए आने वाली परिस्थितियां आसान नहीं होंगी, इस का एहसास उसे बखूबी है. लेकिन इन से पार पाने की कोई रणनीति उस के दिमाग में अभी नहीं आ रही है. उस की मां तो साधारण घरेलू महिला रही हैं, पेट के रास्ते से पति के दिल में उतरने की कवायद से आगे कभी कुछ सोच ही नहीं पाईं. पता नहीं वे खुद नहीं सोच पाई थीं या फिर समाज ने इस से अधिक सोचने का अधिकार उन्हें कभी दिया ही नहीं था. जो कुछ भी हो, अच्छीभली गृहस्थी की गाड़ी लुढ़क रही थी. कोई भी कहां जानता था कि ऊंट कभी इस करवट भी बैठ सकता है. लेकिन अब तो बैठ ही चुका है. और यही सच है.

राहत की बात यह थी कि पिता सरकारी कर्मचारी थे और सरकार की यही अदा सब को लुभाती भी है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हो जाएं लेकिन सरकार अपने सेवारत कर्मचारी और उस के बाद उस के आश्रितों का अंतिम समय तक साथ निभाती है. लिहाजा, परिवार के किसी एक सदस्य को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल ही जाएगी. और यही नौकरी उन के आगे की लंगड़ाती राह में लकड़ी की टेक बनेगी.

15 बरस की छुटकी माला और 20 साल की मेघा. मां को चूंकि दुनियादारी की अधिक समझ नहीं थी और माला ने अभी अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं की है, इसलिए यह नौकरी मेघा ही करेगी, यह तय ही था लेकिन मेघा जानती थी कि परिवार की जिम्मेदारी लेना बिना पैरों में चप्पल पहने कच्ची सड़क पर चलने से कम नहीं होगा.

अनुकंपा की नौकरी दोधारी तलवार होती है. एक तो यह एहसास हर वक्त कचोटता है कि यह नौकरी आप को अपनी मेहनत और काबिलीयत की बदौलत नहीं, बल्कि किसी आत्मीय की मृत्यु की कीमत पर मिली है और दूसरे हर समय एक अपराधबोध सा घेरे रहता है कि जाने कर्तव्य ठीक से निभ भी रहे हैं या नहीं. खुद को अपराधबोध न भी हो, तो कुछ नातेरिश्तेदार होते ही इसलिए हैं. उन का परम कर्तव्य होता है कि समयसमय पर सूखने की कोशिश करते घाव को कुरेद कर उसे हरा बनाए रखें. और वे अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हैं.

6 महीने बीततेबीतते उतरती हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आने लगी थी. एक परिवार ने अपने मुखिया के बिना जीने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. मेघा को भी पिता की जगह उन के औफिस में नौकरी मिल गई. जिंदगी ने ढर्रा पकड़ लिया.

फ़िल्मी और किताबी बातों से परे मेघा बहुत ही व्यावहारिक लड़की है. भविष्य को ले कर उस का दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट था. वह भलीभांति जानती थी कि माला और मां उस की जिम्मेदारी हैं लेकिन इन जिम्मेदारियों के बीच भी वह खुद अपने लिए भी जीने की चाह पाले हुए थी. बीस की हवाई उम्र में उस के भी कुछ निजी सपने थे जिन्हें पूरा करने के लिए वह बरसों इंतजार नहीं करना चाहती थी. उसे पता था कि उम्र निकलने के बाद सपनों का कोई मोल नहीं रहता.

नौकरी के दरमियान ही मंगल उस की जिंदगी में आया जिसे मेघा ने आदर्शों का रोना रोते हुए जाने नहीं दिया बल्कि खुलेदिल से उस का स्वागत किया. मंगल उस का सहकर्मी. मंगल की एकएक खूबी का विस्तार से बखान करने के बजाय मेघा एक ही शब्द में कहती थी- ‘मनपसंद.’ मनपसंद यानी इस एक विशेषण के बाद उस की शेष सभी कमियां नजरअंदाज की जा सकती हैं.

इधर लोगों ने फिल्में और टैलीविजन के धारावाहिक देखदेख कर मेघा की भी त्याग की मूर्ति वाली तसवीर बना ली थी और वे उसे उसी सांचे में फिट देखने की लालसा भी रखते थे. त्याग की मूर्ति यानी पहले छुटकी को पढ़ाएलिखाए. उस का कैरियर बनाए. उस का घर बसाए. तब कहीं जा कर अपने लिए कुछ सोचे. इन सब के बीच मां की देखभाल करना तो उस का कर्त्तव्य है ही. लोगों का दिल ही टूट गया जब उस ने मंगल से शादी करने की इच्छा जताई.

“अभी कहां वह बूढी हो रही थी. पहले छोटी का बंदोबस्त कर देती, फिर अपना सोचती. अब देखना तुम, पैसेपैसे की मुहताज न हो जाओ तो कहना.” यह कह कर कइयों ने मां को भड़काया भी. मां तो नहीं भड़कीं लेकिन मेघा जरूर भड़क गई.

“आप अपना बंदोबस्त देख लीजिए, हमारा हम खुद देख लेंगे,” यह कहने के साथ ही मेघा ने हर कहने वाले मुंह को बंद कर दिया. लेकिन इस के साथ मेघा को बदतमीज और मुंहफट का तमगा मिल गया.

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 1

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 3

मैं छाया के पास आ गई. मेरे कंधे पर सिर रख कर वह सिसकने लगी. उस का हाथ अपने हाथ में ले कर मैं ने कहा, ‘‘पढ़ेलिखे मातापिता ऐसे कैसे हो सकते हैं?’’

उस ने जो कहा वह बहुत सही बात थी. वह बोली, ‘‘बच्चे को पालने के लिए दिल में प्रेम चाहिए, दिमाग के किताबी ज्ञान से कुछ नहीं होता है.’’

‘‘छाया, खुद को इतना परेशान मत कर. सुबह तरुण आ रहे हैं. तुम मुझ से एक वादा करो, वीकैंड में तुम मेरे साथ बैडमिंटन जरूर खेलोगी.’’ उस की आंखों ने मुझ से वादा किया और अगले दिन वह अपने घर चली गई.

जब साहिल को मैं ने उस के बारे में बताया तो साहिल बोले, ‘‘शैली, तुम छाया से कुछ मत पूछना. वह आज भी सदमे में है जिस दिन वह खुद बात करे उस दिन उसे समझाना.’’

रविवार की शाम छाया क्लब आई तो बोली, ‘‘आज खेलना नहीं है. चलो न, बातें करते हैं.’’

हम वहीं सीढि़यों पर बैठ गए. छाया ने सीधे ही मुझ से सवाल किया, ‘‘क्या साहिल यह सब जानते हैं? तुम ने उन्हें यह सब कब बताया?’’

‘‘शादी से पहले यह सब साहिल को मां ने बताया था. साहिल ने मुझे हमारे किसी रिश्तेदार के घर देखा था. जब साहिल अपने मातापिता के साथ आए तो उन की मां ने कहा, ‘हमें तो शैली पसंद है. आप चाहें, तो हम अभी बात पक्की कर लेते हैं.’’’

‘‘मां तैयार थीं इस के लिए. मां ने कहा, ‘पहले मैं साहिल से अकेले में बात करना चाहती हूं.’

‘‘मां साहिल को अपनेसाथ अंदर कमरे में ले गईं और उन्होंने मेरे साथ जो हुआ उन्हें सब बताया. फिर बोलीं, ‘बेटा, शादी करो या न करो पर यह बात अपने तक ही रखना. वरना हमारी बेटी की शादी होनी मुश्किल हो जाएगी.’

‘‘उस दिन साहिल ने मां के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, ‘मां, मेरी शिक्षा बेकार है, यदि मैं उस दर्द को नहीं समझ पाया. मुझे शैली से ही शादी करनी है. यह बात मेरे अलावा किसी और तक कभी नहीं जाएगी.’

‘‘साहिल मुझ से मिलने कमरे में आए. कमरे का माहौल बहुत गमगीन हो गया था. वे, बस, इतना ही कह पाए, ‘शैली, मेरा हाथ थाम कर आज से जिंदगी शुरू करना, पीछे कुछ था ही नहीं. इसलिए कभी मुड़ कर मत देखना.’’’

मेरी बात पूरी हुई और छाया बोल पड़ी, ‘‘यही तो बात है, तरुण कुछ नहीं जानते हैं. उन से सबकुछ छिपा कर शादी तो करनी पड़ी पर मेरा अपराधबोध मुझे कचोटता है.’’

‘‘पर अब देर हो चुकी है, छाया.’’ यदि तरुण ने साथ रहने से मना कर दिया तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, अपनी रिसर्च के लिए, एक जिंदगी भी कम है. मैं फिर से उसी में जुट जाऊंगी. शैली, आज बताती हूं उस दिन क्या हुआ था.’’

उस ने बहुत सहजता से कहना शुरू किया, ‘‘मैं बौटनी में रिसर्चस्कौलर थी. सब से ज्यादा फैलोशिप भी मुझे ही मिलती थी. विपिन राय, जो नंबर दो पर था, मुझ से बहुत चिढ़ता था. वह शादीशुदा था.

‘‘मुझ से पीछे रहने के अपमान का बदला उस ने मुझे चोट पहुंचा कर लिया. एक दिन उस ने मुझे फोन किया, ‘कुछ जरूरी काम है.’

‘‘छुट्टी का दिन था. वह अकेला मेरा इंतजार कर रहा था. जब मैं वहां पहुंची तो अकेलेपन का फायदा उठा कर उस ने मुझे बहुत मारा, गालियां दीं और कहा, ‘आज के बाद तू उस लैब में नहीं आ पाएगी. यहां आने की सोच भी तेरे ख्वाब में नहीं आएगी. मेरे खिलाफ पुलिस केस करने की गलती मत करना. 10 साल कोर्ट के चक्कर लगाएगी, फिर भी हो सकता है मैं यह साबित कर दूं कि तूने मेरा बलात्कार किया है.’

‘‘वह दरिंदा जीत गया. मेरे परिवार की नजर में मेरी इज्जत चली गई थी.

2 महीने के अंदर तरुण से मेरी शादी हो गई.

‘‘वह दिन, पिता की नफरत, मां का मुझ से ज्यादा समाज और छोटी बहन की चिंता करना मुझे आज तक रुलाता है. घाव पर मरहम लगाने वाला कोई तो चाहिए. यहां तो घाव नासूर बन गया जो आज तक…’’

आज हम दोनों की आंखों में आंसू नहीं थे. शैली उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘चलो, घर चलते हैं, तरुण को आज सबकुछ बताना है.’’

मुझे छाया की चिंता हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘तरुण का जवाब जो भी हो, मैं और साहिल अब तुम्हारा परिवार हैं. तुम तरुण को अपनी बात बताने से पहले मेरे और साहिल के बारे में बता देना. तुम चाहो तो साहिल भी…’’

‘‘तू चिंता मत कर. जो भी होगा उस का सामना करने की हिम्मत है मुझ में.’’

मैं घर तो आ गई पर मेरा मन बहुत बेचैन था. सुबह भी उस का फोन नहीं आया. साहिल काम पर चला गया. मैं घर में अकेली बैठी छाया के फोन का इंतजार करने लगी.

दीवाली के अगले दिन शुरू हुआ दोस्ती का यह सफर 5 महीने का रास्ता तय कर चुका था. क्या होगा? कहीं मेरे कारण छाया हमेशा के लिए अकेली न हो जाए. वह चाहे जो कहे, अब तनहा जीना आसान नहीं होगा. उसे भी तरुण के साथ की आदत पड़ चुकी थी.

शाम के 5 बज गए. फोन की घंटी बजी. देखा, तरुण का फोन है. मैं ने डरते हुए फोन उठाया. उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, शैली, तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया.’’ उस के बाद छाया से जो बात हुई उस का एक शब्द भी याद नहीं. वैसे भी, अब शब्दों का कोई महत्त्व नहीं था. एक खुशी का एहसास. लगा मेरा पूरा शरीर रोशनी से भर गया हो.

मेरे कमजोर पलों में मेरा साथ मेरे परिवार व साहिल ने दिया था. आज किसी को मैं ने हिम्मत दी और वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत गया. छाया की जीत का एहसास मेरे लिए कुछ ऐसा था जैसे मां को अपने बच्चे की जीत के लिए होता है.

अगले दिन छाया और तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं. जाते समय तरुण ने साहिल से कहा, ‘‘साहिल, मंगलवार को होली की पार्टी का इंतजाम कर लेना, पार्टी हमारे घर पर होगी.’’

साहिल ने कहा, ‘‘तुम थके हुए आओगे, पार्टी हमारे घर पर रख लेते हैं. मैं और शैली सारा इंतजाम कर लेंगे.’’

छाया ने कहा, ‘‘नहीं साहिल, इस बार पार्टी हमारे घर होने दो. दीपक की रोशनी से उस रात तुम्हारा घर जगमगाया था, इस बार रंगों को हमारे घरआंगन में छिटकने दो.’’

होली की पार्टी से घर लौटते समय मेरे और साहिल के मोबाइल पर एक संदेश आया, ‘शैली, तुम्हारे मातापिता जैसा साहस और प्रेम हर मातापिता में हो तो तुम जैसी बेटियां न जाने कितनी छाया को अंधेरों से खींच लाएंगी. और हर दर्दभरे दिल को अपना साहिल मिल ही जाएगा…’

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 2

फिल्म खत्म होने के बाद रेस्तरां में खाना खाते समय तरुण बोले, ‘‘साहिल, औफिस के बाहर, सर और आप कुछ नहीं चलेगा. यहां हम भी दोस्त हैं छाया और शैली की तरह.’’

खाना खा कर हम बाहर निकले. एकदूसरे से विदा ली. हम चारों खुश थे. हां, सब की खुशी के कारण अलगअलग थे. अब मैं और छाया एकदो दिनों में हलकीफुलकी बातें कर लिया करते थे.

तरुण ने आज एकसाथ 2 अच्छी खबरें दीं. पहली, मुझे एक क्लब की सदस्यता तरुण ने दिलवा दी जहां मेरे दोनों शौक पूरे हो जाएंगे. दूसरी, तो इस से भी बड़ी थी, तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं तो छाया हमारे साथ रहना चाहती है.

अगले दिन, तरुण को साहिल ने एयरपोर्ट छोड़ा और छाया हमारे साथ घर आ गई.

घर आते ही मैं ने छाया से पूछा, ‘‘कौफी के साथ पौपकौर्न लोगी या भेल?’’

उस ने बच्चों की तरह कहा, ‘‘दोनों.’’ उस का ऐसे बोलना मुझे बहुत अच्छा लगा. वह बोली, ‘‘रुको, मैं भी आती हूं, मिल कर बनाएंगे.’’

साहिल अपने औफिस के काम में व्यस्त थे. वे जानते थे स्वयं को हमें व्यस्त दिखाना ही सही होगा.

छाया और मेरे हाथ में कौफी थी. मैं ने टीवी चला दिया. पर मैं जानती थी यहां चलना तो कुछ और ही है.

बात मैं ने शुरू की, ‘‘क्या हुआ था?’’

‘‘पहले तुम बोलो, शैली, मुझ में बोलने की हिम्मत शायद तुम्हारे बाद ही आ पाए.’’

अपनी दोस्त को उस अंधेरे से बाहर निकालने के लिए मुझे उस गहरी खाई में फिर से जाना पड़ेगा. मन पक्का किया और मैं ने बताना शुरू किया, ‘‘उस शाम मैं हमेशा की तरह बैडमिंटन खेल कर ड्रैसिंगरूम में गई. वहां से मुझे पूल में जाना था. सबकुछ शायद पहले से ही सैट था. 2 लड़के बाहर घूम रहे थे, जिन को देख कर मैं ने अनदेखा कर दिया.

मैं रुक कर आगे बोली, ‘‘अंदर एक लड़का था जिसे ड्रैसिंगरूम में देख कर मैं चौंक गई. ‘महिलाओं के चेंजिंगरूम में लड़का कैसे?’ यह खयाल आया. मुझे देखते ही उस ने मेरे पास आ कर मुझे छूना चाहा. मैं बहुत घबरा गई, जोर से चिल्लाई और बाहर निकलने के लिए मुड़ी. उस जानवर ने मेरे मुंह में कपड़ा डाल दिया. बहुत छीनाझपटी हुई.

‘‘मैं घसीटतेघसीटते दरवाजे तक आ भी गई. काश, उस दिन दरवाजा खुल गया होता, जो बाहर से बंद था. एक को मारपीट कर मैं शायद भाग जाती मगर वक्त और इंसानियत सब शायद दरवाजे के बाहर ही छूट गए थे. बाहर वाले भी बारीबारी से अंदर आए. मेरे शरीर में संघर्ष की ताकत व होश सबकुछ खत्म हो गया था. उसी बेहोशी की हालत और रात के अंधेरे में वे मुझे मेरे घर के बाहर फेंक गए.

‘‘उन दर्दनाक पलों को मैं फिर से भुगत रही हूं किसी को जीना सिखाने के लिए. मम्मीपापा रात तक मेरे घर न आने पर और फोन बंद होने पर बहुत परेशान थे. वे दोनों मुझे ढूंढ़ने बाहर निकले तो देखा घर के दरवाजे पर मैं बेहोश पड़ी थी.

‘‘मुझे देख कर मां भी बेहोश हो गईं. 3 दिनों तक डाक्टर आंटी हमारे घर में रहीं.’’

वे 3 जानवर जिन को मैं जानती ही नहीं थी, उन्हें ढूंढ़ना, मीडिया को मसाले के साथ सबकुछ परोसना मेरे भविष्य को बरबाद करने जैसा ही था. मम्मीपापा और आंटी ने निर्णय लिया कि सबकुछ भुला कर जीना ही बेहतर है.

‘‘मगर इतना सब होने के बाद जीना इतना आसान भी नहीं, उन दर्दनाक यादों से खुद को अलग करना बहुत मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं.’’ कहते हुए मैं ने अपने आंसू पोंछे. छाया भी आंसुओं से भीग चुकी थी.

सामने देखा दरवाजे पर साहिल खड़े थे. हमें देखते हुए बोले, ‘‘अब सो जाओ, रात के 3 बज रहे हैं. सुबह काम पर जाना है.’’

उन्होंने कमरे की लाइट व टीवी बंद कर दिया.

सोतेसोते छाया बोली, ‘‘इतना समझदार पति, शैली, तुम्हारे पति की जितनी तारीफ की जाए, कम है.’’

‘‘छाया, तरुण भी बहुत अच्छे हैं. बस, इतना याद रखना कि यदि तुम उस सब से बाहर नहीं निकली तो जिंदगी का अतीत वर्तमान को भी काला कर देगा. तरुण महीने में 10 दिन बाहर रहते हैं. बहुत लोगों से मिलते भी होंगे. दोस्ती और प्रेम के बीच एक महीन सी दीवार ही होती है. पता नहीं कब वह दीवार टूट जाए, उस से पहले अपनी पीठ से अतीत की लाश को फेंक देना.’’

सुबह नींद खुली 9 बजे किचन की खटपट की आवाज से. छाया, हम तीनों के लिए नाश्ता बना रही थी और साहिल वहीं बैठे उस से बातें कर रहे थे.

छाया मुझे सहज और खुश लगी. हम तीनों अपने काम पर चले गए. रात का खाना हम दोनों ने मिल कर बनाया. खाना खा कर कमरे में आते ही छाया बोली, ‘‘इस सब के बाद तुम्हारे मातापिता ने क्या कहा?’’

‘‘मैं ने बोला तो था मां बेहोश हो गई थीं. एक दिन मैं पलंग पर सो रही थी, पापा भी मेरे पास बैठे थे. मां कुरसी पर बैठी मेरे बाल सहला रही थीं कि अचानक मैं रोने लगी और मेरे मुंह से निकला, ‘मैं मैली हो गई, सचमुच मेरी इज्जत चली गई.’

‘‘सुन कर मां को जैसे करंट लगा, ‘शरीर को अपमानित करने के लिए किसी ने तुम पर जुल्म और ज्यादती की, उस को तुम अपना गुनाह कैसे मान सकती हो? तुम पर जुल्म हुआ वह भी अनजाने में, धोखे से. औरत के मन और शरीर को तारतार करने वाले किस जालिम ने अपने गुनाह को औरत की इज्जत से जोड़ा? हम आज भी इन शब्दों को अपने पैरों की बेडि़यां बना कर जी रहे हैं.’ मां बोलतेबोलते खड़ी हो गईं. वे गुस्से से कांप रही थीं और रो रही थीं.

‘‘पापा की आंखों में भी आंसू थे. वे बोले, ‘बेटा, तुम हमारी बहादुर बेटी हो, शरीर के घाव तो भर जाएंगे पर उन को अपने मन में जगह मत देना. हम दोनों की जिंदगी और खुशी तेरे ही दिल में रहती है.’’’

कहतेकहते मेरी आंखों में भी आंसू आ गए. न जाने कितनी बार हम तीनों साथसाथ रोए थे. मैं ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘2 महीने के लिए मैं मौसी के पास गई थी. जब वापस आई तो पापा के साथ खेलने भी जाती थी. धीरेधीरे सब सामान्य हो गया.’’

गुस्से और नफरत से छाया बोली, ‘‘मेरी तो मां ने ही कहा था, यह क्या कर आई? खानदान के नाम पर कलंक. खुद की नहीं, छोटी की भी सोचो. यह रोनाधोना बंद करो. चुपचाप काम पर जाना शुरू करो. किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. तब से आज तक मेरे घाव खुले ही हैं और टीसते हैं. उन्हें भरने वाला कोई नहीं मिला. तरुण से भी यह सब छिपा कर शादी हुई जो मुझे बहुत ग्लानि से भर देती है. क्या करती, मां के आगे कुछ नहीं बोल पाई.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे पिता तो कालेज में प्रोफैसर हैं. उन की प्रतिक्रिया कैसी थी?’’

‘‘‘यह अपवित्र हो गई है,’ पापा ने मेरे सामने मां को डांटते हुए कहा, ‘इस से कह देना, आज के बाद मंदिर में हाथ न लगाए.’’’

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