इन बॉलीवुड सितारों की आदते हैं अजीबोगरीब

बॉलीवुड के सितारों की लाइफस्टाइल और निजी जीवन से जुड़ी बातों को लेकर उनके प्रशंसक हमेशा ही उत्सुक रहते हैं. ये सितारे दुनिया भर में अपने प्रशंसकों के लिए रोल मॉडल तो हैं, पर अब सेलेब्रिटीज भी होते तो इंसान ही हैं और सामान्य इंसानों की तरह ही ये सितारे भी कई चीजों को लेकर पैशेनेट होते हैं. क्या आप जानते हैं कि कुछ चीजो को लेकर स्टार्स की आदतें भी बड़ी अजीबोगरीब होती हैं.

  1. सनी लियॉन

अभिनेत्री सनी लियॉन सफाई को लेकर बहुत पागल हैं. उन्हें हर 15 मिनट में अपने पैर धोने की आदत है. वो कई बार अपनी इस आदत के चलते अपने शूट्स के लिए भी लेट हो जाती हैं.

  1. करीना कपूर

करीना कपूर की इस आदत से शायद कई लोग खुद को जोड़ कर देख पाएंगे. करीना को अपने नाखूनों को बड़ा करने में बड़ा संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें नाखून चबाने की पुरानी आदत है और इस वजह से वे उन्हें कभी बड़ा ही नहीं होने देती.

  1. दीपिका पादुकोण

दीपिका की ये आदत बेहद अजीबोगरीब कही जा सकती है. दरअसल खाली समय में दीपिका कई बार लोगों को देखते हुए उनके बारे में मन ही मन कहानियां गढ़ने लगती हैं और ऐसा अक्सर वे फ्लाइट लेने के दौरान करती हैं.

  1. प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा अपनी निजी जिंदगी में काफी अनुशासित रहती हैं और वे कभी नियमों का उल्लंघन करना पसंद नहीं करती हैं. उनके बारे में ये बात खास है कि उन्हें जूतों से बेहद लगाव है. उनके पास 80 से ज्यादा डिजाइनर शूज हैं, जो अलग-अलग ब्रांड्स और अलग अलग रंगो के हैं.

  1. सैफ अली खान

बॉलीवुड के नवाब सैफ अली खान के शौक भी नवाबी हैं. उनके बाथरूम में एक लाइब्रेरी और फोन एक्सटेंशन भी मौजूद है. दरअसल सैफ के लिए उनका बाथरूम एक घर की तरह ही है. वे यहां घंटो बिता सकते हैं.

  1. अमिताभ बच्चन

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन दो घड़ियां पहनते हैं. वे ऐसा खास कर तब करते हैं, जब अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय विदेश में यात्रा कर रहे होते हैं और उन्हें अलग-अलग टाइम जोन का ध्यान रखना पड़ता है.

  1. विद्या बालन

सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के युग में विद्या बालन एक अपवाद हैं. उन्हें अपना फोन इस्तेमाल करना पसंद नहीं है. वे इसे कई-कई दिनों तक चेक नहीं करती हैं और इस वजह से उनके कई इवेंट्स भी मिस हुए हैं.

  1. सलमान खान

दबंग सलमान खान के पास साबुनों का एक बड़ा कलेक्शन है. उनके पास डिजाइनर साबुनों से लेकर हर्बल, एरोमैटिक जैसे अलग-अलग प्रकार के साबुन मिल जाएंगे. भई, अजब है पर शौक है.

  1. शाहरुख खान

शाहरुख खान को जींस और फुटवियर बेहद पसंद आते हैं. वे खुद कह चुके हैं कि वे कई बार अपने जूतों को पहने हुए ही सो जाते हैं. क्या आप जानकते हैं कि उनके पास 1500 से ज्यादा जींस का भी कलेक्शन है.

गुरमेहर कौर का आखिर क्या है गुनाह

आखिरकार दिल्ली विश्वविद्यालय में मचे घमासान के चलते गुरमेहर कौर दिल्ली से बाहर चली गई. उस के परिवार का कहना है कि वह अब दिल्ली में नहीं है. गुरमेहर आइसा के पब्लिक प्रोटैस्ट मार्च से भी अलग हो गई है. 27 फरवरी को गुरमेहर ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल से मुलाकात की थी. उन्होंने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों की ओर से दुष्कर्म की धमकी मिलने की शिकायत की थी. दिल्ली पुलिस ने कारगिल युद्ध में शहीद की बेटी गुरमेहर की शिकायत पर आईटी ऐक्ट के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. पुलिस की साइबर सैल इस मामले की जांच कर रही है. उधर, एबीवीपी की ओर से भी पुलिस को एक आवेदन दिया गया है, जिस में कहा गया है कि उस का कोई सदस्य रेप की धमकी देने वालों में शामिल नहीं है. कुल मिला कर यही कह सकते हैं कि यह बेहद शर्मनाक प्रकरण है. एक युवती, जिस के पिता ने देश के लिए शहादत दी, के साथ इस प्रकार का व्यवहार न सिर्फ अशोभनीय और अनैतिक है बल्कि अत्यंत निंदनीय भी है. आखिरकार, यह समझ से परे है कि छात्रा गुरमेहर कौर का गुनाह क्या है, जो उसे इस तरह घटिया स्तर तक जा कर मानसिक रूप से उत्पीडि़त करने की कोशिश की गई है?

इस मामले पर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने अपने बयान में कहा कि गुरमेहर पर कोई विवाद सही नहीं है. यह उन वामपंथियों की सोच है जो जवानों के शहीद होने पर जश्न मनाते हैं. उन्होंने कहा है कि भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के दौरान भी वामपंथियों ने चीन का समर्थन किया था. वे युवाओं को गुमराह करते हैं. गृह राज्यमंत्री को अपने ही देश के वामपंथी संगठनों को राष्ट्रविरोधी बताने में थोड़ा भी संकोच नहीं हुआ. इसे कितना जायज ठहराया जाए, यह कोर्टकचहरी का मामला है, पर सिर्फ इसलिए किसी छात्रा को रेप की धमकी दी जाए कि उस ने उस की विचारधारा का विरोध क्यों किया, तो यह मेरे खयाल से शर्मनाक है.

बता दें कि कारगिल युद्ध में शहीद कैप्टन मनदीप सिंह की बेटी ने दिल्ली के रामजस कालेज में हुई हिंसा के बाद आई एम नौट अफ्रेड औफ एबीवीपी अभियान शुरू किया था. यह वायरल हुआ और देशभर के छात्रों ने इस का समर्थन किया. दुनिया के सब से बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में अभिव्यक्ति की आजादी की बात कही जाती है. पर सवाल है कि क्या इसे ही अभिव्यक्ति की आजादी कहेंगे? जिस देश की भाजपा यानी नरेंद्र मोदी सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नामक अभियान चला रही है. उस भाजपा के आनुषंगिक संगठन एबीवीपी की कार्यशैली को किस श्रेणी में रखा जाए?

सवाल यह भी है कि आखिर उन्हें ये सब करने की छूट किस ने दी. बीते वर्ष का जेएनयू प्रकरण सब को याद है. जेएनयू के मुद्दे पर एबीवीपी व दिल्ली पुलिस गठजोड़ वाली पूरी फिल्म ही फ्लौप हो गई. अब रामजस कालेज मसले पर जेएनयू प्रकरण दोहराने की कोशिश हुई, लेकिन वह भी फ्लौप हो गया. जाहिर है कि गुरमेहर के प्रति एबीवीपी का जो रवैया सामने आया है, वह अपने फ्लौप अभियानों की कुंठा की वजह से है.

जानकार बताते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर ने एबीवीपी के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपना अभियान अब वापस ले लिया है. ऐसा कहा जा रहा है कि गुरमेहर ने एबीवीपी की ओर से कथित तौर पर धमकियां मिलने और भाजपा के नेताओं द्वारा ट्रोल किए जाने पर अभियान वापस लिया. गुरमेहर को उस के कालेज लेडी श्रीराम कालेज ने समर्थन देते हुए साहसपूर्ण कदम बताया.

इस बाबत गुरमेहर ने ट्वीट किया कि मैं अभियान से हट रहीं हूं. मुझे जो कहना था, वह मैं कह चुकी हूं. गुरमेहर ने कहा कि उसे काफी कुछ झेलना पड़ा. 20 साल की उम्र में मैं इतना ही बरदाश्त कर सकती हूं. अभियान वापस लेने के बाद डीयू की यह छात्रा अब एबीवीपी के सदस्यों के खिलाफ किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेगी. मतलब यह कि गुरमेहर के साथ बदतमीजी करने की धमकी दे कर उसे डराया गया और एबीवीपी के खिलाफ अभियान में शामिल न होने के लिए दबाव डाला गया. किसी मसले पर लोगों में मतभेद हो सकता है, पर जिस तरह रामजस कालेज की घटना पर कुछ लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं, उसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कह सकते. इस के बाद देशभर के विद्यार्थियों में रोष है.

एबीवीपी के छात्रों ने विरोध के लिए जिस तरह का हिंसक रास्ता चुना, उस की निंदा हो रही है. इसी क्रम में छात्रा गुरमेहर कौर ने फेसबुक पर एबीवीपी की निंदा की, जिसे ले कर निहायत अश्लील और धमकी भरे संदेश आने लगे. जब यह मामला गूंजने लगा तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से लिखा गया, ‘तानाशाही के खिलाफ हम अपने छात्रों के साथ हैं. गुस्से व असहिष्णुता में उठी हर आवाज के लिए एक गुरमेहर कौर होगी.’

उल्लेखनीय है कि गुरमेहर ने प्रतिक्रिया में कहा कि उसे खुद को देशभक्त साबित करने के लिए प्रमाण की जरूरत नहीं, क्योंकि उस के पिता देश की रक्षा करते हुए मारे गए. अब इस मामले ने पूरी तरह से राजनीतिक मोड़ ले लिया है. इस मुद्दे पर भाजपा सांसद प्रताप सिन्हा ने ट्विटर पर गुरमेहर और दाऊद की तसवीर पोस्ट करते हुए लिखा कि दाऊद ने अपने राष्ट्रविरोधी रवैए को सही ठहराने के लिए अपने पिता के नाम का इस्तेमाल नहीं किया.

तसवीर में गुरमेहर की तख्ती पर लिखे ‘पाकिस्तान ने नहीं, मेरे पिता को जंग ने मारा’ के जवाब में दाऊद के हाथ में थमाई तख्ती में लिखा, ‘मैं ने 1993 में लोगों को नहीं मारा, बमों ने मारा.’ क्रिकेटर विरेंद्र सहवाग ने ट्विटर पर हाथ में तख्ती लिए एक तसवीर पोस्ट की है, जिस पर लिखा था, मैं ने 2 तिहरे शतक नहीं बनाए, मेरे बैट ने बनाए. सहवाग के ट्वीट का अभिनेता रणदीप हुड्डा ने समर्थन किया.

जब आरोपप्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ तो कांग्रेसी विचारधारा के तहसीन पूनावाला ने सहवाग और हुड्डा के ट्वीट पर जम कर फटकार लगाई. तहसीन ने कहा कि ये सैलिब्रिटी एक लड़की की मर्यादा को नहीं समझ पा रहे हैं. यह राष्ट्रहित में नहीं है. इतना ही नहीं, रौबर्ट वाड्रा ने भी गुरमेहर कौर के साहस की तारीफ की. दिल्ली कांग्रेस आईटी सैल के संयोजक विशाल कुंद्रा ने राहुल गांधी के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए पूछा है, ‘आखिर गुरमेहर का गुनाह क्या है?’

दरअसल, रामजस कालेज में कथित तौर पर एबीवीपी छात्रों की हिंसा के बाद कैंपेन के लिए कौर ने एक तख्ती पकड़ी हुई तसवीर फेसबुक पर प्रोफाइल फोटो के तौर पर लगाई है. तख्ती पर लिखा है, मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती हूं. मैं एबीवीपी से नहीं डरती. हैशटैग स्टूडैंट्स अगेंस्ट एबीवीपी.

ये सबकुछ जिस भाषा में और जिस तरीके से हो रहा है, वह किसी जिम्मेदार समाज की निशानी नहीं है. पिछले कुछ वर्षों से छात्र राजनीति मुख्यधारा की राजनीति से संचालितपोषित होती आ रही है. परिणामस्वरूप कैंपस में वैचारिक असहिष्णुता का माहौल है. यही वजह है कि छात्र राजनीति में स्वस्थ परंपरा के विकास पर कम ध्यान दिया जा रहा है. मगर जब भी विद्यार्थियों में हिंसक भिड़ंत होती है तो मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपने छात्र संगठनों के बचाव में उतर आते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह देशभक्ति के नाम पर एबीवीपी उग्र तेवर अख्तियार कर रही है और उस के बचाव में अलोकतांत्रिक ढंग से भाजपा और उस के समर्थक बयान दे रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ. गुरमेहर के विरोध पर समाज, राजनीति खेल और सिनेमा के कुछ लोगों के मैदान में उतरने और भाषा की शालीनता का खयाल न रखने के मामले की हकीकत पर परदा नहीं डाला जा सकता, बेशक लोकतांत्रिक मर्यादा भंग हो रही है. शील, मर्यादा और अनुशासन का घोष करने वाली एबीवीपी ने परिसर में अभिव्यक्ति की आजादी को जगह न देते हुए हिंसक बरताव किया, उस पर कोई बात करने के बजाय उस का विरोध करने वाली छात्रा पर अश्लील टिप्पणियां करना कहां की नैतिकता है?

चित नरेंद्र मोदी की और पट भाजपा की

वे लोग वाकई अति दूरदर्शी और ज्ञानी हैं जो यह कह रहे हैं कि लाल कृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन सहित 13 लोगों पर साजिश का मुकदमा चलाने का फैसला दिया है. इनमे एक और अहम नाम साध्वी उमा भारती का भी है, जिन्होंने उम्मीद के मुताबिक बड़ी मासूमियत से कहा कि जो था खुल्लम खुल्ला था, कोई साजिश नहीं थी. अव्वल तो उमा का सार्वजनिक रूप से दिया गया यह बयान ही यह जताने काफी है कि सचमुच उस दिन अयोध्या में कोई साजिश नहीं हुई थी, अब यह तो अदालत की दरियादिली या मजबूरी है कि वह किसी फैसले पर पहुंचने के लिए चार्ज शीट, गवाह और सबूतों वाला नाटक खेले और इस ऐतिहासिक मुकदमे का अंत करे.

आमतौर पर भाजपाई जब खुश होते हैं तो आतिशबाजी जरूर चलाते हैं, जो इस फैसले पर नहीं चलाई गईं तो आम लोगों को लगा कि ऐसा होना भाजपा अफोर्ड नहीं कर सकती जबकि हकीकत यह है कि केसरिया मनों में लड्डू फूट रहे हैं.  2019 की इन्हीं गर्मियों तक फैसला आ पाया तो चित नरेंद्र मोदी की और पट भाजपा की होगी. अगर मुलजिम साहेबान बरी हुये और न हुये तो भी एक और मंदिर निर्माण की पटकथा तो लिखाना शुरू हो ही गई है.

बकौल विनय कटियार और उमा भारती जान देना पड़े या फांसी हो मंदिर तो वहीं बनाएंगे. देश का माहौल धार्मिक कट्टरवाद की इतनी गिरफ्त में शायद 90 के दशक में भी नहीं था, जब भज भज मंडली राम के नाम पर घर घर से चंदा इकट्ठा करते मंदिर निर्माण के लिए इसी आस्था के की दुहाई देते प्राणों की आहुति देने आमादा थी. अब तस्वीर यह है कि मुसलमानों का टेंटुआ हिंदुवादियों के पंजे में है, अजान से किसी गवैये की नींद खुलती है तो वह झट से ट्वीट कर देता है और देखते ही देखते हल्ला मच जाता है. मोदी, योगी को मुस्लिम महिलाओं पर दया आ रही है, क्योंकि उन्हे झट से तलाक मिल जाता है, हिन्दू दंपत्तियों की तरह सालों साल अदालत की चौखट पर नाक रगड़ते एक उम्र जाया नहीं करना पड़ती.

इस पर भी मिसाल द्रौपदी के चीर हरण की दी जाती है सीता की अग्नि परीक्षा की नहीं. सार ये कि अपने दामन के दाग नहीं देखना है बस जैसे भी हो 2 साल इसी तरह गुजार देना है. इसके बाद आएगा अदालती फैसला जो भाजपा का अगला मुद्दा हो जाएगा कि बस अब बहुत हो गया, बात आस्था और करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की है, इसलिए सारे झंझटे और मुद्दे ( अगर कोई बचें तो ) डालो डस्टबिन में और चलो अयोध्या नहीं तो विश्व गुरु बनने का सपना मिट्टी में मिल जाएगा.

लोग तो धर्म के अंधे हमेशा से ही हैं, लिहाजा भगवा ध्वज लेकर कूच करते रेडी मेड पुण्य कमाने से चूकेंगे ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. भाजपा ने कभी नहीं  कहा कि आडवाणी या जोशी राष्ट्रपति होंगे, न ही कभी ऐसा कहेगी, ये तो बलि के बकरे बन गए हैं जो 2 साल तक रोज अपनी ईद मनते देखने विवश हैं. कर्म फल के सिद्धांतो की बात करें तो अपने किए की सजा भुगतेंगे. यह राजनीति में ही हो सकता है कि प्यादे वजीर और वजीर प्यादे बन जाएं, इस बिसात के दोनों तरफ से चालें चलने वाला आरएसएस तय करेगा कि राष्ट्रपति किसे बनाया जाये.

मुमकिन है इस दफा मंदिर निर्माण के लिए दलितों का सहयोग बाकायदा घोषित तौर पर लिया जाये और उन्हे मौजूदा लोकतान्त्रिक वर्ण व्यवस्था में हनुमान और जामवंत बनाकर चतुर्थ श्रेणी का हिन्दू घोषित कर दिया जाये. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लग यह रहा है कि अब मोदी सरकार के पांच साल का काम काज मुद्दा नहीं होगा बल्कि कोई रथ यात्रा निकाली जा सकती है, कोई भी मुहिम मंदिर के नाम पर  छेड़ी जा सकती है, जिससे नए नए आडवाणी, जोशी, उमा, विनय, कल्याण और ऋतंभरा पैदा किए जा सकें इससे लोगों को अपनी परेशानियां और दुख भुलाने में सहूलियत रहेगी. एक बार मंदिर बन भर पाये, फिर तो सारे कष्ट राम जी हर ही लेंगे, जिन्होंने अपने भक्तों को इस फैसले की शक्ल में  संजीवनी दिला दी है.

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं, पर अब अचानक उस ने बात करना बंद कर दिया है. क्या करूं.

सवाल
मैं 21 साल की हूं और 22 साल के लड़के से प्यार करती हूं, पर अब अचानक उस ने बात करना बंद कर दिया है. क्या करूं?

जवाब

किसी भी हमउम्र लड़के से थोड़ी बातचीत को नादान लड़कियां प्यार मान बैठती हैं, आप के साथ भी यही हुआ है. अगर वह आप से नहीं बोलता, तो आप भी उस से कतई न बोलें. हो सकता है कि वह आप से फायदा उठाना चाह रहा होगा, पर बात न बनने पर अलग हो गया होगा.

लोकगीत भोजपुरी फिल्मों का दिल है : रितु सिंह

फिल्मों में काम करने का सपना तो सभी का होता है, पर इस के लिए जरूरी है कि सही दिशा में पूरी मेहनत की जाए. बक्सर, बिहार की रहने वाली रितु सिंह के पिता अपनी नौकरी के चलते उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में रहे. ऐसे में रितु की पढ़ाई गोरखपुर में हुई. सब से अच्छी बात यह रही कि वे दोनों ही जगह भोजपुरी बोली के करीब रहीं. रितु सिंह को बचपन से ही डांस करने का शौक था. डांस के दौरान उन्हें ऐक्टिंग का शौक हुआ. उन्होंने ऐक्टिंग सीखने के लिए लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी में पढ़ाई की. इस बीच उन को भोजपुरी की पहली फिल्म ‘दिलदार सांवरिया’ में काम करने का मौका मिला. इस फिल्म में उन के काम की खूब तारीफ की गई. इस के बाद रितु सिंह का भोजपुरी फिल्मों में काम करने का सिलसिला चल निकला.

3 साल पहले रितु सिंह सपनों की नगरी मुंबई आ गईं. अब तक 11 फिल्में कर चुकी रितु सिंह को हिंदी टैलीविजन सीरियलों में काम करना पसंद है. पेश हैं, उन के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

आप के पिताजी पुलिस में हैं. आप परिवार की एकलौती लड़की हैं. फिल्मों में कैरियर बनाने को ले कर आप के सामने किसी तरह की कोई परेशानी तो नहीं आई?

 जी नहीं. मुझे बचपन से ही डांस करना बहुत पसंद है. यह बात मेरे मातापिता को पता थी. जब फिल्मों में काम करने का औफर मिला, तो मैं ने अपने घर वालों को बताया. वे तुरंत ही राजी हो गए.

भोजपुरी फिल्मों में डांस और गीतों की बड़ी अहमियत है. इन फिल्मों में कहानी से ज्यादा समय डांस और गीतों को दिया जाता है. कोई खास वजह?

 यह बात तो सही है. भोजपुरी फिल्मों में गीत ज्यादा होते हैं. वैसे, अब पहले के मुकाबले काफी कुछ कम हो गए हैं. पहले जहां भोजपुरी फिल्मों में 11 से 12 गीत होते थे, अब 6 से 7 गीत होते हैं.

इस की वजह यही है कि लोकगीत भोजपुरी फिल्मों का दिल है. दर्शक लोकगीतों को सब से ज्यादा पसंद करते हैं. वैसे, अब इन फिल्मों में कहानी को ज्यादा अहमियत दी जाने लगी है.

बहुत से भोजपुरी गीतों को बेहूदा कहा जाता है. आप इस की क्या वजह मानती हैं?

 लोकधुनों पर बने गीत कई बार दो मतलब के होते हैं. इस को बेहूदा मान लिया जाता है. वैसे देखा जाए तो लोकगीतों का यही रंग सुनने वालों को पसंद भी आता है. दर्शक इस को बेहूदा भी नहीं मानते हैं.

लेकिन यह भी सच है कि भोजपुरी फिल्मों से ज्यादा खुलापन हिंदी फिल्मों में होता है. भोजपुरी फिल्मों के ज्यादातर दर्शक गंवई समाज से होते हैं. उन को यही सब पसंद आता है.

आज के समय में जो नईनवेली लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन बनने के लिए आ रही हैं, उन को कैसे तैयारी करनी चाहिए?

 फिल्मों में काम करने का कोई शौर्टकट रास्ता नहीं है. अब वक्त बदल गया है. फिल्म हो या टैलीविजन शो, सभी अपने कलाकारों का आडिशन करते हैं. बिना आडिशन दिए किसी को नहीं चुनते.

नए लोगों को चाहिए कि वे पूरी तैयारी से आएं. अपना सब्र न खोएं और आडिशन देते रहें. खुद से अच्छाबुरा परखें. अपने परिवार को सच जरूर बताते रहें.

अब ऐक्टिंग में पहले से ज्यादा स्कोप है. फिल्मों के अलावा एंकरिंग, टैलीविजन सीरियल भी हैं. मैं ने भी खाली समय में कई टैलीविजन शो में एंकरिंग की है, जिन से मेरी अलग पहचान भी बनी.

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों की जीरो साइज फिगर पसंद नहीं की जाती है. आप की नजर में इस की कोई खास वजह है क्या?

 पहले एक दौर था, जब भोजपुरी या कहें तो बाकी बोलियों की फिल्मों में भी भरेपूरे बदन की हीरोइनें पसंद की जाती थीं, पर अब हर जगह फिट हीरोइन को ही लोग पसंद कर रहे हैं.

इस की अहम वजह यह भी है कि अब भोजपुरी फिल्मों के दर्शक बदल रहे हैं. दर्शकों के साथसाथ फिल्मों में भी तमाम तरह के बदलाव हो रहे हैं.

अब कहानी के साथसाथ हीरोइन के पहनावे, उस के बोलने के तरीके, उस की फिगर वगैरह पर खासा ध्यान दिया जाता है.

आप को और क्याक्या काम करने पसंद हैं?

 मुझे मोटरसाइकिल चलाना काफी पसंद है. फिल्म ‘धूम’ की तरह मैं भी किसी फिल्म में मोटरसाइकिल चलाना चाहती हूं.

मुझे ड्रैस डिजाइनिंग का भी शौक है. मुझे खाने में भिंडी की सब्जी, रोटी और दही बहुत पसंद है.

इस के अलावा मैं पत्रिकाएं भी पढ़ती हूं. ‘सरस सलिल’ पत्रिका मैं ने बहुत पढ़ी है. इस के लेख व कहानियां मुझे रोचक लगते हैं.

कंगना तू तो बहुत ही बड़बोली है…

कंगना राणावत अब बिलकुल भी चुप रहने को तैयार नहीं हैं. मगर उन के मुंहफट होने, बड़बोलेपन और सच बोलने का खमियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ रहा है. कंगना राणावत व रितिक रोशन का झगड़ा एक तरफ जहां अभी तक खत्म नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ कंगना ने फिल्म ‘रंगून’ के हीरो शाहिद कपूर के खिलाफ भी जंग छेड़ रखी है. इस बारे में कंगना राणावत ने खुद ही शाहिद कपूर को ले कर कई तरह के बयान दिए थे, जिन का शाहिद कपूर ने बड़े शांत मन से यह कर जवाब दिया कि फिल्म के प्रमोशन के लिए इस तरह की बयानबाजी ठीक नहीं है.

मगर कंगना राणावत खुद को बड़ी हीरोइन साबित करने पर तुली हुई हैं. वे बारबार दावा करती हैं कि अब वे सिर्फ नारी प्रधान व उन फिल्मों में काम करती हैं, जिन की कहानियां उन के किरदार के इर्दगिर्द घूमती हों. कंगना का दावा है कि अब उन के लिए खासतौर पर किरदार लिखे जा रहे हैं.

मजेदार बात यह है कि कंगना राणावत को अब अपने बयानों की वजह से ही फिल्मों से हाथ धोना पड़ रहा है.

साल 2016 में मशहूर फिल्म डायरैक्टर संजय लीला भंसाली ने कंगना राणावत से बात की थी और यह तय हुआ था कि उन के डायरैक्शन में बनने वाली एक फिल्म में शाहरुख खान और कंगना राणावत की जोड़ी होगी. इस बात की तसदीक कंगना राणावत और शाहरुख खान ने भी गैरसीधे तौर पर खुद की थी. उस वक्त कंगना व रितिक के झगड़े में भी शाहरुख का उन्हें साथ मिल रहा था.

लेकिन फिल्म ‘रंगून’ के प्रमोशन के दौरान जब पत्रकारों ने कंगना राणावत से पूछा कि क्या वे बौलीवुड के 3 खान कलाकारों के साथ फिल्म नहीं करना चाहतीं? इस सवाल पर कंगना ने कहा कि इन 3 खान कलाकारों की फिल्में हमेशा ही इन के इर्दगिर्द होती हैं. उन में मेरे लिए कोई जगह नहीं हो सकती. मेरी फिल्में जनता के एक बड़े तबके तक पहुंचने लगी हैं, इसलिए मुझे बड़े स्टूडियो या बड़े डायरैक्टर या फिर बड़े हीरो के साथ काम करने की जरूरत कभी महसूस नहीं होती.

सूत्रों का दावा है कि कंगना राणावत के इस बयान से शाहरुख खान नाराज हो गए हैं. सुनने में यह भी आ रहा है कि इसी के चलते अब शाहरुख खान ने डायरैक्टर संजय लीला भंसाली की फिल्म में कंगना के साथ काम करने से मना कर दिया है.

संजय लीला भंसाली के सूत्रों की मानें, तो वे कुछ समय पहले 2 फिल्मों की कहानी ले कर शाहरुख खान से मिलने गए थे. इन में से एक फिल्म की कहानी वह थी, जिस में शाहरुख खान के साथ कंगना राणावत हीरोइन बनने वाली थीं.

कंगना ने शाहरुख खान के साथ वाली फिल्म को करने से मना करते हुए दूसरी कहानी वाली फिल्म के लिए हामी भर दी यानी सच बोलने या बड़बोलेपन की वजह से कंगना को शाहरुख खान के साथ वाली फिल्म से हाथ धोना पड़ा.

दूसरी तरफ जब से कंगना राणावत ने विशाल भारद्वाज के साथ उन की फिल्म ‘रंगून’ में काम करना शुरू किया था, तभी से वे चिल्लाती आ रही हैं कि फिल्म ‘रंगून’ की असली हीरो वे ही हैं.

याद रहे कि इस फिल्म में कंगना राणावत के साथ सैफ अली खान व शाहिद कपूर भी काम कर रहे थे. जब इस फिल्म का प्रमोशन शुरू हुआ, तो कंगना ने फिर से दोहराना शुरू किया कि वे ही इस फिल्म की हीरो हैं, तो दूसरी तरफ शाहिद कपूर दावा कर रहे थे कि फिल्म ‘रंगून’ में उन का किरदार हीरोटिक है.

शाहिद कपूर की इस तरह की बातें सुनने के बाद कंगना ने शाहिद कपूर को मूडी कहना शुरू कर दिया. नतीजतन, शाहिद कपूर ने कंगना राणावत के साथ फिल्म ‘रंगून’ का प्रमोशन करने से इनकार कर दिया.

वैसे, अपने मुंहफट स्वभाव वाले सवाल पर कंगना राणावत कह चुकी हैं, ‘‘अगर ऐसा हुआ, तो लोग मुझे जिंदा चबा जाएंगे. 2 मिनट में मेरी बोटी नोच कर फेंक देंगे. जो मुझ पर हमला करते हैं, उन पर पलटवार करना जरूरी है.

‘‘लोग यहां मेरे कैरियर, मेरी पसंदनापसंद को चुनौती देते हैं. अगर आप मेरे खिलाफ बातें करें, मुझे बेइज्जत करें, तो मैं खुद को डिप्रैशन में जाने का इंतजार करूं या खुदकुशी कर लूं? मैं यह सब करने से तो रही.

‘‘मेरी पहली प्राथमिकता खुद को महफूज व सेहतमंद रखना है. माना कि औरत का जन्म दूसरों की देखभाल करने व दूसरों को पालने के लिए होता है, पर इस का मतलब यह तो कतई नहीं है कि वह अपना खयाल रखना छोड़ दे. मैं अपने वजूद के लिए हमेशा लड़ती रहूंगी.’’

पिछले जन्म और आज, अब भगवान ही भला करेगा

पिछले जन्म के पापों के हिसाब से ही आदमी का आज तय होता है और आज अगर खराब है, तो गलती सरकार की नहीं है, पिछले जन्म की है, यह बात अब खूब चमकेगी. हिंदू धर्म की जातिवादी सोच के पीछे पाप और पुण्य बहुत ज्यादा हावी हैं. हर रोज समझाया जाता है कि पिछले जन्म के कामों के हिसाब से आज का भाग्य लिख दिया जाता है और सरकार व समाज को गलत ठहराने की कोशिश न करना.

जब से राजाओं का राज गया और लोकतंत्र मजबूत हुआ, तब से धर्म की यह अफीम भरी चाशनी कि भाग्य और भगवान पर ही भरोसा करो, कम हो गया. लोगों को पता चलने लगा कि शासकों के फैसले ही उन के सुखों की चाबी है. अगर सरकार अच्छी है, तो जनता फलेगीफूलेगी और खराब, तो न कानून चलेगा, न सड़कें होंगी और न जनता को सुख मिलेगा.

भारतीय जनता पार्टी ने दशकों तक यह कह कर सत्ता में आना चाहा कि वह हिंदू धर्म की रक्षक है और हर हिंदू का फर्ज है कि धर्म को बचाने के लिए उसे वोट दे, पर धीरेधीरे अहसास हो गया कि जनता को लोकतंत्र में सरकार से कुछ और ज्यादा उम्मीदें हैं. इंदिरा गांधी 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर जीती थीं. उस से पहले तो उन्हें अंगरेजों से छुटकारा दिलाने का इनाम नाम मिलता था. पश्चिम बंगाल और केरल में कम्यूनिस्ट गरीबों व मजदूरों के मसीहा बन कर राज कर सके.

दूसरे राज्यों में पार्टियों ने सदियों से सताई, दबाई व कुचली जमातों के दर्द और बेबसी को भुनाया और जीत हासिल की. जब भाजपा को अहसास हो गया कि गरीब, लाचार की आवाज सुनना जरूरी है, तो उस ने विकास की बात करनी शुरू की और 2014 के लोकसभा व 2017 के विधानसभा चुनावों में वह बाजी मार ले गई.

हर युग में धर्म ने पैसा जमा भी किया है और खर्च भी किया है. जब तक कांग्रेस धन्ना सेठों को बहलाफुसला कर लाइसैंस कोटे दे कर या धमका कर पैसा वसूलती रही, वह जीतती रही. पर जब पार्टी कमजोर हो गई, तो पैसा कांगे्रसी नेता अपने घरों में भरने लगे, पार्टी को नहीं दे पाए और गरीबों की मसीहा होने की बात कहने तक को कांग्रेस के पास शायद पैसा नहीं बचा. दूसरी तरफ धर्म के नाम पर खूब पैसा जमा हुआ. बड़ी मेहनत से गांवगांव में मंदिर, आश्रम, मठ, मेले, मंत्र होने लगे, जिन में पैसा बना.

आम आदमी को लगा कि इसी से उस का भाग्य बदलेगा. आखिर यही तो वह सदियों से सुनता आया है. उसे यह भी अहसास है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में धर्म की दुकानदारी चमक रही है, क्योंकि वे पैसा जमा भी कर सकते हैं और प्रचार में खर्च भी कर सकते हैं.

अब मजबूत और कट्टर होती सरकार ने विकास को दूसरे दर्जे पर डाल दिया है. अब फिर भाग्य और भगवान की छाया दिखने लगी है. पूजापाठ, शुद्धीकरण, दंडवत प्रणाम, विधर्मी को कमजोर करना शुरू हो गया है. इस का नतीजा वही होगा, जो मुसलिम देशों में हो रहा है. जहां न लोकतंत्र है, न सरकार. अगर है तो बंदूक की नोक पर गुंडागर्दी. यही तो भाग्य है. अब भगवान ही भला करेगा.

जानकारी : सिक्की घास से सुधारी जिंदगी

सिक्की घास से भी जिंदगी में मुकाम पाया जा सकता है. सुनने और पढ़ने में यह भले ही अजीब लग सकता है, लेकिन सच है. सिक्की घास से बिहार के गांवदेहात के इलाके की बहुत सी औरतें अपनी कला का आकर्षक नमूना तो पेश कर ही रही हैं, साथ ही वे अपना व अपने परिवार का पेट भी पाल रही हैं. सालों पुरानी गांव की इस परंपरा के दम पर मधुबनी की औरतें दूसरों को भी अपने पैरों पर खड़ा होने का संदेश दे रही हैं.

मुन्ना देवी की पहल

सिक्की घास से बनी कलाकृतियों को गांव से निकल कर शहर में पहुंचाने में मुन्नी देवी का अनोखा रोल है.

इस कला की शुरुआत कैसे हुई? सवाल पूछने पर मुन्नी देवी बताती हैं, ‘‘यह तकरीबन 18 साल पहले की बात है. शादी के बाद जब मैं ससुराल आई, तब मैं ने देखा कि वहां सिक्की घास की कई तरह की कलाकृतियां बनाई जा रही हैं.

‘‘मन में थोड़ी उत्सुकता हुई कि घास से कैसे कोई सामान बनाया जा सकता है? मेरे मायके में इस तरह की कोई चीज नहीं होती थी. घर में सास, ननद सभी इस काम को कर रही थीं. उत्सुकता में आ कर मैं ने भी इसे सीखना शुरू किया. धीरेधीरे शुरू हुआ यह काम अब रफ्तार पकड़ चुका है.’’

इस कला में अपना एक अलग मुकाम बना चुकी मुन्नी देवी बताती हैं कि सिक्की घास से कई तरह के सामान बनते हैं. जैसे चंगेरी, रोटी का डब्बा, कछुआ, चाबी रिंग, कलम सैट, चेन, चिडि़या, गले का हार, चूड़ी, पायल, कान की बाली वगैरह.

मुन्नी देवी बताती हैं, ‘‘इन में से कुछ सामान तो हमेशा बनते रहते हैं, लेकिन कुछ सामान के आर्डर मिलने पर बनाया जाता है. सामान के दाम भी अलगअलग होते हैं.

‘‘वैसे तो यह काम पहले भी होता रहा है, लेकिन कोई पूरी तरह सिक्की का काम नहीं करता था. जिस के घर में अगर यह काम हो रहा था, तो वह इसे बाजार तक लाने के लिए नहीं सोचता था. गुजरते वक्त के साथ जब सिक्की के बने सामान की धूम गांव से बाहर निकल कर मैट्रो शहर तक पहुंची, तब लोगों में जागरूकता आई.

‘‘आज सिक्की की कला में

37 औरतें जुड़ी हुई हैं. इस में 27 औरतें और 10 लड़कियां हैं. उन्होंने इस काम में खुद को ढाल लिया है. लड़कियां पढ़ाई करने के बाद सिक्की के सामान बनाने में हाथ बंटाती हैं.

‘‘इन औरतों ने सिक्की के काम में इस्तेमाल होने वाले सारे सामान की खरीदारी से ले कर इस की मार्केटिंग और सप्लाई सब अपने हाथ में ले रखी है. अपने बलबूते वे इस काम को करती हैं. घर के मर्द भी अब इन कामों में थोड़ाबहुत हाथ बंटाते हैं, लेकिन सारे जरूरी काम औरतें खुद ही करती हैं.’’

मुन्नी देवी आगे बताती हैं कि दिल्ली के एक कारोबारी राजीव सेठी ने जब उन के काम को देखा और खुद ही इन से माल बनाने का आर्डर दिया, तब इन की कला को बाहर के लोगों ने पहचाना.

विदेशों में मिली पहचान

मुन्नी देवी बताती हैं कि इस कला के कद्रदान बड़े शहरों और विदेशों में बहुत हैं. जो सामान यहां औनेपौने दाम पर बिकता था, वही सामान बड़े शहरों और विदेशों में हजारोंलाखों रुपए में बिकता है. वैसे तो इस की कीमत 50 रुपए से ले कर 2 हजार रुपए तक होती है, लेकिन इसी सिक्की की बनी कुछ कृतियां हैं, जो बड़े शहरों में 60 हजार रुपए और विदेशों में ढाई लाख रुपए तक में बिकती हैं. बिक्री के लिहाज से बिहार में गया और देश में दिल्ली सब से अच्छा बाजार है.

कई इनाम भी मिले

सिक्की जैसी कला के क्षेत्र में अलग पहचान बनाने वाली मुन्नी देवी बताती हैं कि देश के कई बड़े शहरों जैसे दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई के अलावा बिहार के पटना, गया, राजगीर जैसी जगहों पर इन के स्टौल लग चुके हैं. वे सिक्की कला में इनाम भी ले चुकी हैं. बिहार सरकार ने मुन्नी देवी को सिक्की कला में 22 हजार रुपए दे कर ‘प्रथम पुरस्कार’ से नवाजा था.

सिक्की कला में अपना लोहा मनवाने के बाद ये औरतें अब अपनी माली जरूरतों को पूरा करने के लिए बचत पर ध्यान दे रही हैं. इन्होंने ‘मिथिला कला संघ’ के नाम से एक संस्था भी बनाई है. इस संस्था से जुड़ी हर सदस्य 10 रुपए की बचत करती है. इन पैसों का उपयोग घरेलू कामों के साथसाथ दूसरी जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है. इन औरतों ने अब कंप्यूटर की ट्रेनिंग लेना भी शुरू कर दिया है.

मुन्नी देवी बताती हैं कि उन के जैसी कई औरतों का रास्ता तब और आसान हो गया, जब दिल्ली के एक कारोबारी की नजर उन के काम पर पड़ी.

वे कहती हैं कि उन लोगों के द्वारा किए जा रहे काम की जानकारी किसी के जरीए दिल्ली के कारोबारी राजीव सेठी तक पहुंची. उन्होंने अपने ट्रेनर और डिजाइनर को गांव में भेजा. उन लोगों ने गांव के लोगों के काम को देखा. उस के बाद कागज पर एक डिजाइन को ड्राइंग कर के सिक्की घास का काम करने वाली इन औरतों को दिया. उन्होंने उस डिजाइन को 3 भाग में कर के सिक्की के ढांचे में डाल दिया. बस, तभी से कामयाबी का रास्ता खुल गया. आज राजीव सेठी हर लैवल पर इन औरतों की मदद करते हैं.

रवींद्र गायकवाड़ और उड़ने पर रोक

शिव सेना के एक सांसद रवींद्र गायकवाड़ ने इंडियन एयरलाइंस की एक उड़ान में वही किया, जो सफेद खादीपोश नेता लोग अकसर बसों और बाजारों में करते हैं. उन्होंने बिजनेस क्लास में बैठना चाहा था, जबकि हवाईजहाज में बिजनेस क्लास ही नहीं था. इस पर वे बिफर गए और तूतूमैंमैं मारपीट पर उतर आई. उन्होंने इंडियन एयरलाइंस के एक अफसर को पकड़ कर कपड़े फाड़ डाले और चप्पल उतार कर उस की पिटाई कर डाली.

बाद में भी उन्हें कोई अफसोस नहीं हुआ. वे यह कहते रहे कि वे कोई भारतीय जनता पार्टी के सांसद थोडे़ ही हैं कि किसी से डर कर दुबक कर रहें. वे टीवी स्क्रीनों पर चमक कर आते रहे. उन के खिलाफ रिपोर्टें तो दर्ज हो गई हैं, पर सवाल उठता है कि हमारे नेता, जो जनता से हाथ जोड़ कर वोट मांगने के आदी हैं, कैसे व क्यों इस तरह बेकाबू हो जाते हैं?

आमतौर पर हिंसा हमारी नसनस में भरी होती है. बचपन से ही आम घरों में मांएं अपने बच्चों को पीटती रहती हैं. हर बच्चा अपने पिता से अपनी मां को पिटते देखता है और मां को भाईबहनों को पीटते. वह अपने भाइयों को पीटने लगता है. जिन घरों में शिक्षा कम होती है, वहां तो हर बात पर मारपीट का सहारा लिया जाता है. बड़े होने पर दोस्तों को दुश्मन बनते देखना और मारपीट पर उतरना हर गलीगांव में देखा जा सकता है. जीवन मारपीट के इर्दगिर्द ही घूमता नजर आता है.

इसी मारपीट की ताकत पर नेतागीरी मिलती है और इसी के बल पर लोग पंच, सरपंच, विधायक, सांसद बनते हैं. दूसरे पक्ष वालों को मारपीट कर चुप कराना जीवन का हिस्सा होता है. इस के बिना नेता रह ही नहीं सकता. हमारे राजाओं और जमींदारों ने ही नहीं, थानेदारों, बाबुओं दुकानदारों, महाजनों, सूदखोरों ने मारपीट को ही धंधे का हिस्सा बना रखा है.

रवींद्र गायकवाड़ ने यदि किसी बस में या अपनी ही गाड़ी के ड्राइवर के साथ ऐसा किया होता, तो खबर तक नहीं बनती, क्योंकि यह तो हर रोज होता रहता है. चमचमाते एयरपोर्टों पर, जहां सफेदपोश लोग आते हैं, वहां ये नजारे नहीं दिखते, क्योंकि वहां के लोग सही बात कर के अपनी मांग रखना जानते हैं. देश के बड़े हिस्से में बातबात पर ‘देख लूंगा’ वाली भाषा ही चलती है.

यहां तो ‘समरथ को नहीं दोष गुंसाईं’ वाली बात इस तरह मन में बैठी हुई है कि जरा सा सामने वाला ताकतवर हुआ नहीं कि सब लोग उस की चरणवंदना करने लगते हैं. जब देशभर में इस को मानसम्मान मिल रहा हो, गौरक्षा के नाम पर सड़क पर ट्रक वालों को पीटा जा रहा हो, हाथ में हाथ डाले चल रहे लड़केलड़की को पीटने का लाइसैंस दे दिया गया हो, इंटरनैट पर मांबहन की गंदी गाली देशभक्ति के नाम पर दी जा सकती हो, वहां रवींद्र गायकवाड़ ने क्या गलत किया है?

आलू की सरकारी खरीद से कितने खुशहाल होंगे किसान

गेहूं और धान की सरकारी खरीद के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार आलू की सरकारी खरीद करने की घोषणा कर चुकी है. उत्तर प्रदेश सरकार किसानों से 4 रुपये 87 पैसे प्रति किलो की दर से आलू खरीदेगी. इस आलू का साइज तय है. जिससे किसानों का आधा आलू तो इस साइज के मापदंड पर ही खरा नहीं उतर पायेगा. सरकार की घोषणा के 10 दिन बाद तक सरकारी अमला इस खरीद को अमली जामा नहीं पहना सका है. किसानों के पास रखा आलू उमस से सड़ने लगा है. शासन स्तर पर अभी तक न तो कोई क्रय एजेंसी तय हो पाई है और न ही यह पता चला है कि सरकारी खरीदे गये आलू का कहीं भंडारण करेगी या उसे सीधे बाजार में बेच देगी. किसानों में इस योजना को लेकर भ्रम के हालात है.

उत्तर प्रदेश में इसके पहले भी धान और गेहूं की सरकारी खरीद बड़े पैमाने पर होती है. इसका समर्थन मूल्य भी बढ़ता रहता है. इसके बाद भी धान और गेहूं के किसानों का न तो मुनाफा बढ़ा है और न ही किसान पूरी तरह से सरकारी खरीद से खुश हो सका है. सरकारी क्रय केन्द्र में तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. गेहूं क्रय केन्द्र बहुत ही धीमी गति से खरीद करते हैं. किसानों के बजाय अपने आंकड़ों को पूरा करने के लिये बिचौलियों से भी खरीद की जाती है. उत्तर प्रदेश में आज के समय में गन्ना ही सबसे बड़ी कैश क्राप्स के रूप में किसानों की पसंद है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि किसान को चीनी मिलों से गन्ना क्रय का मूल्य मिल जाता है.

गन्ना से चीनी बनाने के लिये कारखाने खुले हुये हैं. जिससे किसान को गन्ने की फसल का पूरा पैसा मिल जाता है. अगर आलू और टमाटर को खराब होने से बचाना है तो केवल सरकारी खरीद से काम नहीं चलेगा. सरकार के पास भंडारण का कोई इंतजाम नहीं है. ऐसे में वह आलू खरीद कर कहां रखेगी? खरीदे गये आलू का वह क्या करेगी? आलू गरमी में सड़ने लगेगा, इससे उसको कैसे रोका जा सकेगा.

जरूरत इस बात की है कि आलू किसानों को लाभ देने के लिये अलग अलग जिलों में आलू से तैयार होने वाले फूड प्रोडक्टस तैयार करने के लिये यूनिट लगाई जाये. वह लोग सीधे किसानों से आलू की खरीद करे. तब किसान को गन्ने के जैसा लाभ आलू की खेती में मिलने लगेगा. जब तक इस तरह की व्यवस्था नहीं होगी केवल सरकारी खरीद से किसानों को लाभ नहीं होने वाला. जानकारी के अनुसार सरकार हर तरह का आलू 487 रूपये कुंतल में नहीं लेगी. इसके लिये आलू का साइज 33 एमएस से 55 एमसएम के बीच होना चाहिये. इस मानक को पूरा करने में ही 30 से 40 फीसदी आलू छंट जायेगा. ऐसे में किसानों का मुनाफा फिर घट जायेगा.

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