सिरकटी लाश ने पुलिस को कर दिया हैरान

अंबाला छावनी के रेलवे पुलिस स्टेशन में तैनात महिला हवलदार मनजीत कौर को सुबह सुबह खबर मिली कि अंबाला और छावनी रेलवे स्टेशनों के बीच खंभा नंबर 267/15 के पास अपलाइन पर एक सिरकटी लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुंच कर अपनी काररवाई में जुट गईं. धड़ रेलवे लाइन के बीचोबीच उत्तरदक्षिण दिशा में पड़ा था. धड़ पर हल्के बादामी रंग का पठानी सूट था. उस से ठीक 8 कदम की दूरी पर उत्तर दिशा में शरीर से अलग हुआ सिर पड़ा था. उस से 2 कदम की दूरी पर लाइन के बीचोबीच बायां हाथ और 5 कदम की दूरी पर सफेद रंग की पंजाबी जूतियां पड़ी थीं.

मरने वाला 35 से 40 साल के बीच था. उस की पहचान के लिए मनजीत कौर ने पठानी सूट की जेबें खंगाली, लेकिन उन में ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से उस की पहचान हो पाती. मनजीत कौर को यह मामला दुर्घटना का नहीं, आत्महत्या का लगा. लिहाजा अपने हिसाब से वह काररवाई करने लगीं. उस दिन थानाप्रभारी सतीश मेहता छुट्टी पर थे, इसलिए थाने का चार्ज इंसपेक्टर सोमदत्त के पास था.

निरीक्षण के बाद सोमदत्त ने मनजीत कौर के पास जा कर कहा, ‘‘यह आत्महत्या नहीं हो सकती. आत्महत्या करने वाला आदमी कहीं रेलवे लाइन पर इस तरह लेटता है?’’

‘‘जी सर, आप सही कह रहे हैं. यह मामला आत्महत्या का नहीं है.’’

‘‘जरूर यह हत्या का मामला है और हत्या कहीं दूसरी जगह कर के लाश यहां फेंकी गई है. इस के पीछे का षड्यंत्र तो जांच के बाद ही पता चलेगा.’’

‘‘ठीक है, कानूनी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाइए.’’ सोमदत्त ने एएसआई ओमवीर से कहा.

औपचारिक कानूनी काररवाई पूरी कर के ओमवीर और मनजीत कौर ने लाश को अंबाला के कमांड अस्पताल भिजवा दिया, जहां से लाश को पोस्टमार्टम के लिए रोहतक के पीजीआई अस्पताल भेज दिया.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद मृतक का विसरा रासायनिक परीक्षण के लिए मधुबन लैबोरेटरी भिजवा दिया गया. डाक्टरों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण श्वासनली कटना बताया था. रेल के पहियों से वैसे ही उस की गरदन कट गई थी. डाक्टरों के अनुसार यह रेल दुर्घटना का मामला था.

उन दिनों रेलवे पुलिस की अंबाला डिवीजन के एसपी थे आर.पी. जोवल. यह मामला उन के संज्ञान में आया तो वह भी इस की जांच में रुचि लेने लगे.

उन के लिए यह मामला दुर्घटना या आत्महत्या का नहीं था. उन्होंने इसे हत्या ही माना, लेकिन जांच तभी आगे बढ़ सकती थी, जब लाश की शिनाख्त हो जाती. हालांकि सिरकटी लाश मिलने का समाचार सभी अखबारों में छपवा दिया गया था. इस के अलावा लाश की शिनाख्त के लिए पुलिस ने भी समाचार पत्रों में अपील छपवाई थी. जिस में लाश का हुलिया और कपड़ों वगैरह का विवरण दिया गया था.

2 दिनों बाद इंसपेक्टर सतीश मेहता छुट्टी से लौटे तो उसी दिन दोपहर बाद अखबार हाथ में लिए एक आदमी उन से मिलने आया. उस ने आते ही कहा, ‘‘जिस आदमी की शिनाख्त के बारे में आप ने अखबार में विज्ञापन दिया है, मैं उस के कपड़े वगैरह देखना चाहता हूं. आप लोगों ने लाश के फोटो तो करवाए ही होंगे, आप उन्हें भी दिखा दें.’’

इंसपेक्टर मेहता ने उस का परिचय पूछा तो वह बोला, ‘‘मेरा नाम मोहनलाल मेहता है. मैं भी एक रिटायर्ड पुलिस इंसपेक्टर हूं, महेशनगर में रहता हूं,’’ कहते हुए उन्होंने हाथ में थामा अखबार खोल कर उस में छपा विज्ञापन सतीश मेहता को दिखाते हुए कहा, ‘‘आप लोगों की ओर से आज के अखबार में यह जो विज्ञापन छपवाया गया है, इस में मरने वाले का हुलिया और कपड़े वगैरह मेरे बेटे से मेल खा रहे हैं.’’

सतीश मेहता ने अखबार ले कर उस में छपी अपील को देखते हुए पूछा, ‘‘आप के बेटे का क्या नाम है?’’

‘‘उस का नाम जोगेंद्र मेहता है, मगर सभी उसे जग्गी मेहता कहते थे.’’

‘‘काम क्या करता था आप का बेटा?’’

‘‘पंजाब नैशनल बैंक में क्लर्क था. उस की पोस्टिंग मेन बाजार शाखा में थी. 14 जुलाई की रात वह अपने बैंक के चपरासी के साथ स्कूटर से कहीं गया था, उस के बाद लौट कर नहीं आया. आज 4 दिन हो चुके हैं.’’

‘‘आप ने चपरासी से नहीं पूछा?’’

‘‘मैं ने अगले दिन ही उसे बैंक में फोन कर के पूछा था. उस ने बताया था कि वह किसी जरूरी काम से अंबाला से बाहर गया है. 2-4 दिनों में लौट आएगा. स्कूटर के बारे में उस ने बताया था कि वह उसी के पास है.’’

‘‘चपरासी का क्या नाम है?’’

‘‘जी मुन्ना.’’

‘‘वह कहां रहता है?’’

‘‘वह हिसार रोड पर कहीं रहता है. अगर आप को उस से कुछ पूछना है तो वह बैंक में ही मिल जाएगा. लेकिन आप मुझे कपड़े और फोटो तो दिखा दीजिए.’’

‘‘आप परेशान मत होइए. आप को सभी चीजें दिखा दी जाएंगी. लेकिन पहले आप मेरे साथ मुन्ना चपरासी के यहां चलिए. हो सकता है, हमारे पास जो कपड़े और फोटो हैं, वे आप के बेटे के न हों. फिर भी आप मेरे साथ चलिए.’’ सतीश मेहता मोहनलाल को साथ ले कर बैंक पहुंचे.

लेकिन तब तक मुन्ना घर जा चुका था. पूछने पर पता चला कि वह अंबाला शहर के हिसार रोड पर दुर्गा नर्सिंगहोम के पास किराए पर रहता है. सतीश मेहता वहां पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया. उस का नाम मनजीत कुमार था. पूछने पर उस ने वही सब बताया, जो वह मोहनलाल को बता चुका था.

लेकिन सतीश मेहता को उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. उन्होंने उसे डांटा तो उस ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘सर, 14 जुलाई की शाम मैं बैंक से जग्गी साहब के साथ उन के घर गया था. उस रात उन्होंने मुझे पार्टी देने का वादा किया था. खानेपीने के बाद आधी रात को मैं चलने लगा तो उन्होंने कहा, ‘‘मैं उन के साथ चलूं. इस के बाद वह मुझे अपने स्कूटर पर बैठा कर विश्वासनगर ले गए. वहां एक घर के सामने उन्होंने स्कूटर रोक दी.’’

‘‘जहां स्कूटर रोका, वह घर किस का था?’’ सतीश मेहता ने मुन्ना से पूछा.

‘‘यह मुझे नहीं मालूम. उस घर की ओर इशारा कर के उन्होंने कहा था कि रात में वह वहीं रुकेंगे. इस के बाद मैं उन का स्कूटर ले कर चला आया था.’’ मुन्ना ने कहा.

‘‘तुम ने उन से पूछा नहीं कि वह मकान किस का है? उतनी रात को वह उस मकान में क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘पूछा था सर.’’

‘‘क्या कहा था उन्होंने?’’

‘‘सर, जग्गी साहब ने मुझ से सिर्फ यही कहा था कि रात में वह वहीं रुकेंगे. उन्होंने मुझे उस घर का फोन नंबर दे कर यह भी कहा था कि जरूरत हो तो मैं फोन कर लूं. लेकिन फोन एक लड़की उठाएगी. इस के बाद उन्होंने मुझे सुरजीत सिंह का फोन नंबर भी दिया और कहा कि कोई ऐसीवैसी बात हो जाए तो मैं सुरजीत सिंह को फोन कर लूं.’’

‘‘यह सुरजीत कौन है?’’

‘‘सुरजीत सिंह जग्गी साहब के दोस्त हैं. वह भी विश्वासनगर में रहते हैं. घूमने के लिए जग्गी साहब अकसर उन्हीं की कार मांग कर लाया करते थे.’’

‘‘टैक्सी वगैरह का धंधा करते हैं क्या?’’

‘‘यह तो मुझे नहीं मालूम. लेकिन इतना जरूर पता है कि किसी औफिस में नौकरी करते हैं.’’

‘‘अभी उन्हें छोड़ो, यह बताओ कि उस रात और क्या हुआ था?’’

‘‘सर, जब मैं जग्गी साहब को छोड़ कर घर आया तो लेटते ही सो गया. सुबह तक जग्गी साहब नहीं आए तो मैं ने पड़ोस के पीसीओ से उन के बताए नंबर पर फोन किया. फोन सचमुच लड़की ने उठाया. मैं ने उस से जग्गी साहब के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि इस नाम का कोई आदमी वहां नहीं रहता. इस पर मैं ने उसे समझाते हुए कहा कि उन का पूरा नाम जोगेंद्रलाल मेहता है और वह पंजाब नैशनल बैंक में नौकरी करते हैं. इस पर भी उस ने मना कर दिया कि वह इस नाम के आदमी को नहीं जानती.’’

‘‘ठीक है, तुम हमारे साथ वहां चलो, जहां रात में जग्गी साहब को छोड़ कर गए थे.’’

मुन्ना सतीश मेहता को उस जगह ले गया, जहां उस ने जग्गी को छोड़ा था. वह विश्वासनगर का एक पुराना सा मकान था. मुन्ना ने उस मकान की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘हम इसी मकान के आगे रुके थे और इसी दरवाजे से जग्गी साहब अंदर गए थे.’’

उस मकान में ताला लटक रहा था. सतीश मेहता ने पड़ोसियों से उस मकान में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस घर में हरीश विरमानी अपनी पत्नी कांता और 2 जवान बेटियों यवनिका तथा शामला के साथ रहते थे.

विरमानी के दिमाग की नस फट गई थी, जिस की वजह से उन दिनों इस परिवार को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही थी. विरमानी चंडीगढ़ के पीजीआई में भरती थे. परिवार के लोग अकसर चंडीगढ़ में ही रहते थे. संभव था कि उस समय भी घर पर ताला लगा कर वहीं गए हों.

वहां काम की कोई जानकारी नहीं मिल सकी. इस पर सतीश सुरजीत सिंह के घर की ओर बढ़ गए. उन का घर भी विश्वासनगर में ही था. वह स्थानीय इलैक्ट्रिसिटी बोर्ड में काम करते थे. सुरजीत घर पर ही मिल गए.

उन से जग्गी मेहता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि जग्गी उन का दोस्त था और उन से हर तरह की बातें शेयर करता था. एक बार उस ने मुझे बताया था कि हरीश विरमानी की लड़कियां बदचलन हैं.

पलभर बाद सुरजीत ने दिमाग पर जोर देते हुए कहा, ‘‘डेढ़, 2 महीने पहले की बात है. विरमानी अपनी बीमारी की वजह से चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में भरती था. जग्गी ने उस का हालचाल लेने की बात कही तो मैं उसे अपनी कार से चंडीगढ़ ले गया. उस समय जग्गी के साथ विरमानी की बड़ी बेटी यवनिका भी थी. वापसी में जीरकपुर के एक होटल में जग्गी ने गाड़ी रुकवा कर मुझे बीयर पिलाई और खुद भी पी. उस के बाद मुझे बाहर बैठा कर वह खुद यवनिका को ले कर होटल के कमरे में चला गया. वहां से वह करीब पौन घंटे बाद लौटा.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि जग्गी और यवनिका के बीच गलत संबंध थे?’’ सतीश मेहता ने पूछा.

‘‘इस बारे में पक्के तौर पर तो कुछ नहीं कह सकता, लेकिन जब हम चंडीगढ़ से लौट रहे थे तो पिछली सीट पर बैठा जग्गी लगातार यवनिका के साथ अश्लील हरकतें करता रहा था.’’ सुरजीत ने कहा.

उस की इस बात पर मोहनलाल मेहता भड़क उठे. ‘‘ऐसा नहीं हो सकता. मेरा बेटा 40 साल का हो चुका है और बालबच्चेदार है. उस की खूबसूरत पढ़ीलिखी बीवी है.’’

सतीश मेहता ने उन्हें समझाया कि इस तरह की बातों पर भावुक होने की जरूरत नहीं है. हमें हर बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ानी है.

इस पर मोहनलाल कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘हरीश विरमानी की लड़कियों के पास कुछ लड़के आया करते थे. इस बारे में मेरे बेटे ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिल कर पुलिस से शिकायत भी की थी.’’

‘‘क्या हुआ था शिकायत वाले मामले में?’’

‘‘दोनों पार्टियों में समझौता करा दिया गया था. उस के बाद लड़कियों के पास फालतू लोगों का आना बंद हो गया था.’’

‘‘यह तो आप के बेटे ने अच्छा काम किया था. लेकिन अभी मुझे सुरजीत से कुछ और पूछना है.’’

‘‘आप के कुछ पूछने से पहले मैं एक बात जानना चाहता हूं. आप जिस जग्गी मेहता के बारे में पूछ रहे हैं, उस ने कुछ कर दिया है क्या?’’

‘‘वह गायब है और हम उस की तलाश में लगे हैं.’’

सुरजीत का घर दूर नहीं था. इंसपेक्टर सतीश मेहता मोहनलाल को ले कर उस के घर पहुंचे. वह घर पर ही था. मेहता ने उस से पूछा, ‘‘14 जुलाई की रात जग्गी मेहता से तुम्हारी कोई बातचीत हुई थी?’’

‘‘जी सर, उस रात वह मेरे पास आया था. आते ही उस ने यवनिका को फोन किया था. उस के प्रोग्राम के अनुसार उस रात उसे यवनिका के साथ रहना था. उस ने मुझ से 2 हजार रुपए मांगते हुए कहा था कि अगर उसे कार की जरूरत पड़ी तो वह मेरी कार ले जाएगा. लेकिन मैं ने उसे कार देने से इनकार कर दिया था. इस की वजह यह थी कि वह मेरा दोस्त जरूर था, लेकिन वह बालबच्चेदार था, इसलिए मुझे यह ठीक नहीं लगा.’’

‘‘तुम्हारे पास वह अकेला ही आया था?’’

‘‘जी, वह अकेला ही आया था.’’

‘‘उस का चपरासी मुन्ना साथ नहीं था?’’

‘‘जी नहीं, वह साथ में नहीं था. जग्गी ने मुझे बताया कि उसे अपने घर पर बैठा कर वह शराब लेने आया था.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘वह मुझ से 2 हजार रुपए ले कर चला गया था. आधी रात के बाद उस का फोन आया था. तब उस ने कहा था कि वह यवनिका के घर से बोल रहा है. उस ने एक बार फिर कार मांगी थी, लेकिन मैं ने मना कर दिया था.’’

‘‘उस के बाद क्या किया था उस ने?’’

‘‘क्या किया, पता नहीं. शायद टैक्सी ले कर अंबाला से कहीं बाहर चला गया होगा?’’

इस के बाद सतीश मेहता मोहनलाल के घर जा पहुंचे. जग्गी मेहता की पत्नी का नाम संतोष था. वह पब्लिक स्कूल में टीचर थीं. सतीश मेहता ने शालीनता के साथ पतिपत्नी के रिश्तों के अलावा जग्गी के बारे में कुछ बातें पूछीं और मोहनलाल के साथ थाने लौट आए.

वापस लौट कर उन्होंने थाने में रखे लाश के कपड़े और फोटो मोहनलाल को दिखाए तो उन्होंने रोते हुए कहा, ‘‘ये कपड़े और फोटो मेरे बेटे के हैं.’’

सतीश मेहता ने उन्हें सांत्वना दी और समझा कर कहा, ‘‘आप एक अरजी लिख कर दे दें ताकि हम रिपोर्ट लिख कर आगे की काररवाई शुरू करें.’’

‘‘क्या आप इस अभागे बाप को बेटे की लाश दिखा देंगे?’’

लेकिन एक दिन पहले ही लाश को लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया था, यह बात सतीश मेहता ने उन्हें बता दी.

दुखी मन से मोहनलाल मेहता उठे और धीरेधीरे चलते हुए थाने से बाहर निकल गए. उन की मानसिक दशा देख कर सतीश मेहता ने कुछ कहना उचित नहीं समझा. मोहनलाल मेहता दोबारा थाने नहीं आए तो उन्हें बुलाने के लिए सिपाही भेजे गए, लेकिन वह टालते रहे. इस से पुलिस को लगा कि शायद वह बेटे की बदनामी से डर गए हैं.

लेकिन 2 अगस्त की सुबह मोहनलाल मेहता बेटे की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराने आ पहुंचे. उन की तहरीर के आधार पर यवनिका, शामला, अमित और सुनील को संदिग्ध मानते हुए नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद सतीश मेहता ने एसपी आर.सी. जोवल से संपर्क किया तो उन्होंने काररवाई का आदेश दे दिया. सतीश मेहता ने अपनी एक टीम गठित की, जिस में एसआई सोमदत्त, एएसआई गुरमेल सिंह, हवलदार आनंद किशोर, अश्विनी कुमार, राधेश्याम के अलावा कुछ महिला पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

जब यह टीम काररवाई के लिए मौडल टाउन की ओर जा रही थी तो रास्ते में उन्हें स्थानीय नेता दिलीप चावला मिल गए. औपचारिक बातचीत के बाद सतीश मेहता ने उन्हें जग्गी की सिरकटी लाश मिलने वाली बात बताई तो उन्होंने कहा, ‘‘जग्गी मेहता का कत्ल 2 लड़कियों यवनिका, शामला और 2 लड़कों अमित और सुनील ने किया है.’’

‘‘आप को कैसे पता चला?’’

‘‘कुछ देर पहले वे चारों मेरे पास मदद के लिए आए थे. लेकिन मुझे उन की मदद करना उचित नहीं लगा. इसलिए मैं ने मना कर के उन्हें अपने घर से भगा दिया.’’

‘‘आप को पुलिस को बताना चाहिए था. खैर, इस समय वे कहां होंगे?’’

‘‘मेरे पास जाते वक्त उन्होंने अपनेअपने घर लौट जाने की बात कही थी. मैं समझता हूं कि इस समय वे अपनेअपने घरों में ही होंगे.’’

सतीश मेहता ने यह बात एसपी आर.सी. जोवल को बताई तो उन्होंने सीआईए इंसपेक्टर खुशहाल सिंह के नेतृत्व में एएसआई हरबंस लाल, हवलदार ललित कुमार, सिपाही रणबीर सिंह, बलबीर सिंह और सोहनलाल की एक टीम बना कर उन की मदद के लिए भेज दी.

अब तक सतीश मेहता के बुलाने पर थाने की महिला एएसआई सुदर्शना देवी, हवलदार संगीता, मनजीत कौर, सिपाही धर्मपाल कौर भी तैयार हो कर आ पहुंची थीं. सतीश मेहता अपनी टीम के साथ विश्वासनगर की ओर चल पड़े. ये पुलिस टीम हरीश विरमानी के घर पहुंची तो यवनिका और शामला घर पर ही मिल गईं. पुलिस वालों को देख कर उन लड़कियों को घबरा जाना चाहिए था, लेकिन घबराने के बजाय उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया.

इस के बाद खुशहाल सिंह दिलीप चावला को साथ ले कर अमित और सुनील को गिरफ्तार करने चले गए. संयोग से वे दोनों भी अपनेअपने घरों पर मिल गए. उन्होंने भी जग्गी मेहता के कत्ल का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

चारों अभियुक्तों को अगले दिन स्पैशल रेलवे दंडाधिकारी संतप्रकाश की अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. यह तब की बात है, जब जुवैनाइल एक्ट अस्तित्व में नहीं आया था. लिहाजा नाबालिग शामला के साथ भी अन्य अभियुक्तों जैसा ही व्यवहार किया जा रहा था.

रिमांड अवधि के दौरान की गई पूछताछ में चारों ने पुलिस को जो कुछ बताया, उस से जोगेंद्र कुमार मेहता उर्फ जग्गी मेहता की हत्या की कहानी सामने आ गई.

अंबाला के विश्वासनगर के रहने वाले टेलर मास्टर लेखराज के परिवार में पत्नी सुमित्रा देवी के अलावा 3 बेटे थे. जिन में सब से बड़ा था अमित, जिस ने आठवीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. कुछ दिन उस ने मिक्सी बनाने का काम सीखा. जल्दी ही उस का इस काम से जी भर गया तो वह पिता के साथ टेलरिंग का काम करने लगा. अमित से दोनों छोटे भाई अभी पढ़ रहे थे.

विश्वासनगर के ही एक मंदिर में एक दिन शाम को अमित कुमार दर्शन करने गया तो प्रसाद खरीदते समय उस की नजर एक लड़की से टकरा गई. वह पहली ही नजर में उस की ओर आकर्षित हो गया. इस के बाद वह रोजाना वहां जाने लगा. आंखों ही आंखों में उस ने उस से प्रणय निवेदन किया तो लड़की ने मौन स्वीकृति दे दी.

वह लड़की यवनिका थी. जल्दी ही दोनों की मुलाकातें अंबाला के विभिन्न स्थानों पर होने लगीं. मांबाप के घर न होने पर यवनिका उसे अपने घर भी बुलाने लगी.

हरीश विरमानी के बीमार पड़ जाने के बाद दोनों की मौज आ गई. यवनिका रात में अमित को अपने घर बुलाने लगी तो दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए.

एक दिन अमित यवनिका घर पर थे, तभी जग्गी मेहता अचानक आ पहुंचा. हरीश विरमानी से उस का अच्छा परिचय था. उसी की हालचाल लेने वह वहां आया था. मांबाप की अनुपस्थिति में अमित को देख कर जग्गी ने कहा, ‘‘विरमानी साहब तो अस्पताल में हैं. तुम्हारी मां और बहन भी शायद वहीं गई होंगी. ऐसे में तुम इस लड़के के साथ अकेली क्या कर रही हो?’’

जग्गी मेहता ने यह बात यवनिका से कही थी, लेकिन उस के बजाय जवाब अमित ने दिया, ‘‘तुम्हें क्या ऐतराज है?’’

‘‘मुझे इस में क्या ऐतराज हो सकता है. मेरे कहने का मतलब यह है कि तुम भी ऐश करो और कभीकभी मुझे भी करवा दिया करो.’’

जग्गी यवनिका के पिता का दोस्त था. उम्र में भी लगभग उन के बराबर था. पिता के दोस्त की बातें सुन कर उसे बड़ा अजीब लगा. लेकिन उस के मन में चोर था, इसलिए वह चुप रही.

जबकि अमित से यह बात बरदाश्त नहीं हुई. वह जग्गी को हड़काते हुए बोला, ‘‘तुम हमारे लिए पहले भी मुसीबत बनते रहे हो. उस दिन पुलिस बुला कर तुम हमारे ऊपर इस तरह रौब डाल रहे थे, जैसे तुम कहीं के मजिस्ट्रेट हो. ध्यान से सुन लो, यवनिका मेरी है, हम दोनों एकदूसरे को जीजान से चाहते हैं और जल्दी ही शादी भी करने वाले हैं.’’

‘‘भई, जब तुम्हें शादी करनी हो, कर लेना. मैं इस से कहां शादी करने जा रहा हूं.’’

‘‘तुम शादीशुदा हो और तुम्हारे बच्चे भी हैं, इसलिए तुम्हें यह सब शोभा नहीं देता. तुम हमारे रास्ते में मत आओ.’’

‘‘वाह! तुम तो बड़े अकड़ रहे हो भाई. एक बात याद रखना, मेरा नाम जग्गी मेहता है. मैं तुम्हें ऐसा सबक सिखाऊंगा कि जिंदगी भर याद रखोगे.’’ कह कर जग्गी पैर पटकता चला आया.

विश्वासनगर में ही शिंगाराराम रहते थे. लेकिन कुछ समय पहले ही उन की मौत हो गई थी. उन के परिवार में पत्नी दुलारी देवी के अलावा 3 बेटे थे. उन का बीच वाला बेटा सुनील कुमार था, जो दसवीं पास कर के सेल्समैनी करने लगा था.

अमित और सुनील एक ही कालोनी में आगेपीछे के मकानों में रहते थे. इसी वजह से दोनों में परिचय था. अमित का जिन दिनों यवनिका के साथ इश्क परवान चढ़ा था, एक दिन उस ने यवनिका को अपनी गर्लफ्रैंड बता कर सुनील से मिलवाया. इस के बाद अमित ने सुनील का परिचय यवनिका की छोटी बहन शामला से करवा दिया तो उन के बीच दोस्ती हो गई.

बड़ी बहन की देखादेखी किसी की बांहों में समाने को वह भी मचल रही थी. सुनील से दोस्ती हुई तो वह भी उस से संबंध बना बैठी. इस के बाद दोनों बहनें जब घर में अकेली होतीं, सुनील और अमित को बुला कर रासलीला रचातीं.

17 जून को जग्गी मेहता सुरजीत सिंह की कार में हरीश विरमानी का हालचाल लेने चंडीगढ़ जा रहा था. जाने से पहले उस ने फोन कर के यवनिका को भी साथ चलने को कहा. उस ने जाने से मना किया तो जग्गी ने कहा कि उस के साथ एक परिवार जा रहा है. इस के बाद यवनिका उस के साथ चंडीगढ़ चलने को तैयार हो गई.

उस दिन शाम को अंबाला लौटने पर अमित यवनिका से मिला तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘अमित आज जग्गी मेहता ने मेरे साथ बहुत गलत किया, वह बहुत गंदा आदमी है.’’

‘‘क्या किया उस ने तुम्हारे साथ…?’’

‘‘जाते वक्त तो सब ठीक रहा, लेकिन लौटते समय जीरकपुर पहुंचे तो वहां के एक होटल के सामने जग्गी ने कार रुकवा दी. अंदर जा कर दोनों ने बीयर पी. इस के बाद जग्गी मुझे होटल के कमरे में ले गया. सुरजीत बाहर ही बैठा रहा. जग्गी ने कमरे में ले जा कर मेरे साथ जबरन मुंह काला किया.’’

‘‘क्याऽऽ? उस ने तुम्हारे साथ जबरदस्ती की और तुम ने शोर भी नहीं मचाया?’’

‘‘मैं अकेली लड़की क्या कर सकती थी? डर के मारे मेरे मुंह से आवाज तक नहीं निकली. लेकिन अब मैं उसे जिंदा नहीं रहने दूंगी. बस, तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’ यवनिका ने गुस्से में कहा.

इस के बाद दोनों ने जग्गी मेहता की हत्या की योजना बनाने के साथ शामला और सुनील से बात की. चारों ने इस मुद्दे पर एक अनूठी योजना तैयार की. उसी योजना के तहत लोहे का एक बड़ा ट्रंक खाली कर लिया गया. करंट लगा कर मारने के लिए बिजली के तार की भी व्यवस्था कर ली गई. लेकिन यवनिका को यह योजना पसंद नहीं आई.

इस के बाद खूब सोचसमझ कर जो योजना तैयार की गई, उस के अनुसार 14 जुलाई की दोपहर यवनिका ने जग्गी के घर फोन कर के बैंक का नंबर ले लिया. इस के बाद बैंक फोन किया. जिस आदमी ने फोन उठाया, उस ने लड़की की आवाज सुन कर कहा, ‘‘जग्गी का रोज का यही हाल है, कभी सविता का फोन आता है तो कभी किसी और का.’’

इस के बाद उस ने जग्गी मेहता को आवाज लगाई. जग्गी मेहता ने पहले यवनिका के पिता का हालचाल पूछा. इस के बाद जीरकपुर वाली घटना का जिक्र कर के उसे उकसाने की कोशिश करने लगा. इस के बाद यवनिका ने उसे रात में अपने घर आने को कह दिया. जग्गी ने किसी होटल में चलने को कहा तो यवनिका ने घर में ही रात बिताने को कहा.

उसी रात साढ़े 10 बजे जग्गी मेहता ने यवनिका को फोन किया. एक बार फिर उस ने रात कहीं बाहर बिताने को कहा तो यवनिका ने साफसाफ कहा, ‘‘आना हो तो घर आ जाओ. मैं बाहर नहीं जाऊंगी. घर में कोई खतरा नहीं है. घर में शामला और मैं ही हूं.’’

‘‘ठीक है. मैं रात 12, साढ़े 12 बजे के बीच आ जाऊंगा.’’

इस के बाद योजना के अनुसार, सुनील बाजार से शराब ले आया. अमित ने नशे की गोलियों का इंतजाम किया. जिस कमरे में जग्गी मेहता को जाना था, वहां पड़े बैड पर सुनील चादर ओढ़ कर लेट गया. घर का दरवाजा खुला छोड़ दिया गया.

एकदम सही समय पर जग्गी पहुंच गया. अमित रसोई में छिप गया. शामला और यवनिका जग्गी को प्यार से अंदर ले आईं. जग्गी अपने भाग्य पर इतराते हुए शहंशाहों की तरह आया. कमरे में पहुंच कर बैड पर किसी को लेटा देख कर पूछा, ‘‘यह कौन लेटा है?’’

‘‘दादी अम्मा हैं. अभी कुछ देर पहले अचानक आ गईं. लेकिन तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. अफीम खा कर आराम से पड़ी रहती हैं. फिर तुम जरा धीरे बोलना.’’ यवनिका ने कहा.

इस के बाद वहीं से सुरजीत सिंह को फोन किया. फोन करने के बाद यवनिका ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, उधर दीवान पर चलो. अगर कपड़े उतारना चाहो तो उतार लो.’’

जग्गी अपनी जगह से उठ कर दीवान पर इत्मीनान से बैठ गया. शराब की बोतल पहले ही वहां रखी गई थी. बोतल देख कर उस ने यवनिका से गिलास लाने को कहा. नशे की गोलियां पीस कर यवनिका ने पहले से ही स्टील के गिलास में डाल रखी थीं. जग्गी के पास आ कर उस ने खुद ही गिलास में शराब डाली और उसे हिलाते हुए जग्गी की ओर बढ़ा दिया.

जग्गी पहले ही शराब पी कर आया था. यवनिका के हाथों उस ने 2 पैग और चढ़ा लिए. वह भी नशीली दवा के साथ. थोड़ी ही देर में वह नशे में झूमने लगा. उस के बाद यवनिका और शामला से बोला, ‘‘तुम दोनों भी मेरे साथ थोड़ी पियो.’’

यवनिका रसोई में गई और 2 गिलासों में थम्सअप ले आई. रसोई में जाते समय वह शराब की बोतल साथ ले गई थी. इसलिए उन्हें थम्सअप पीते देख कर जग्गी को लगा कि वे भी शराब पी रही हैं. अब तब झूमते हुए उस ने अपने कपड़े उतार दिए.

जग्गी मेहता ने जैसे ही कपड़े उतारे सुनील ने जल्दी से सामने आ कर उस की फोटो खींच ली. ठीक उसी समय अमित भी वहां आ गया. कैमरे की फ्लैश से जग्गी की आंखें चुंधिया गईं. अमित और सुनील को सामने पा कर वह आंखें मलते हुए चिल्लाया, ‘‘कबाब में हड्डी बनने के लिए तुम लोग यहां क्यों आए हो? दिनरात तुम लोग ऐश करते हो, मैं ने कभी अड़ंगा डाला है?’’

अमित ने उस के दोनों हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘तुम ने मेरी यवनिका को पीजीआई ले जाने के बहाने रास्ते में होटल में दुष्कर्म किया था न?’’

‘‘नहीं तो. मैं ने कब इस से दुष्कर्म किया?’’

‘‘जीरकपुर के ब्रिस्टल होटल के कमरे में यवनिका को ले जा कर तुम ने इस के साथ क्या किया था?’’

‘‘जो भी किया, उस से क्या हो गया? तुम उस के साथ क्या करते हो? मैं ने तो कभी कुछ नहीं पूछा. और तुम लोग मेरा यह फोटो खींच कर क्या करोगे?’’

‘‘उस का क्या होगा, यह बाद की बात है.’’ यवनिका ने उस के सामने आ कर कहा, ‘‘अभी तो मुझ से आंख मिला कर बताओ कि ब्रिस्टल होटल में तुम ने मेरे साथ जबरदस्ती की थी या नहीं?’’

यवनिका के यह कहते ही जग्गी उस के पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा. शायद उसे इस बात का आभास हो गया था कि उसे वहां मौजमस्ती के लिए नहीं, किसी साजिश के तहत बुलाया गया है.

जग्गी माफी मांग ही रहा था कि अमित ने जग्गी के मुंह पर हाथ रख कर दूसरे हाथ से उस की गरदन में चाकू घुसेड़ दिया. ठीक उसी समय सुनील ने दूसरा चाकू भी उस की गरदन में दूसरी ओर से घुसेड़ दिया.

2 चाकुओं के वार से बिना चीखेचिल्लाए जग्गी छटपटाने लगा. फिर तो उन्होंने उस पर और भी कई वार किए. कुछ देर बाद जब उन्हें लगा कि जग्गी मर गया है तो उसे कपड़े और जूते पहना कर दीवान पर बिछे गद्दे में लपेट कर घर में रखी साइकिल पर लाद कर रेलवे लाइन पर फेंक आए. संयोग से उस समय तेज बारिश हो रही थी, इसलिए रेलवे लाइन तक लाश ले जाते समय उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई.

इस के बाद उन्होंने गद्दा और चाकू पास के गंदे नाले में फेंक दिया. वहीं साइकिल भी छिपा दी. घर लौट कर खून के छींटे और धब्बे साफ कर दिए गए.

दीवार पर खून साफ करने से जो धब्बे बन गए थे, उसे सहज बनाने के लिए यवनिका ने वहां सरसों का तेल गिरा दिया ताकि देख कर लगे कि किसी से तेल की शीशी गिर गई है.

यह सब करतेकरते 5 बज गए. इस के बाद यवनिका और शामला पहले चंडीगढ़ स्थित पीजीआई गईं और मातापिता से मिल कर हरिद्वार चली गईं. जबकि मातापिता से बताया था कि अंबाला जा रही हैं.

पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर खून लगा गद्दा, साइकिल और हत्या में प्रयुक्त दोनों चाकू बरामद कर लिए गए. रिमांड अवधि समाप्त होने पर उन्हें फिर से अदालत में पेश कर सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

विवेचक सतीश मेहता ने निर्धारित अवधि में इन के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर निचली अदालत में पेश कर दिया. अंबाला की जिला अदालत में 3 साल तक केस चला. बाद में सेशन से चारों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तकनीक का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हम लोग

मोबाइल हाथ में हो तो हाथों से कुछ और करने की उम्मीद करना बेकार ही है. यही आज की संस्कृति का मूल नियम है. अब लोग मौका ढूंढ़ते रहते हैं कि कहीं कुछ बुरा हो ताकि वे उस का वीडियो बना कर दुनिया भर को दिखा सकें. आप को सैकड़ों दुर्घटनाओं के वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब  पर दिख जाएंगे जिन में दुर्घटना हो रही होगी पर वीडियो बनाने वाला अपनी जगह खड़ा लगातार फिल्मिंग कर रहा होगा.

मुंबई के हाईवे पर 2 मोटरसाइकिलों की टक्कर हो गई और एक में आग लग गई. जिस ने वीडियो बनाया उस ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की और वीडियो में दिख रहा है कि कई लोग अपने मोबाइल निकाले खड़े हैं पर आगे बढ़ कर उन्हें बचाने कोई नहीं आ रहा.

मोबाइल ने लोगों को इस कदर निष्ठुर और उदासीन बना दिया है कि चार लोगों की वाहवाही पाने के लिए वे मानवता के मुश्किल से जमा हुए भावों को मारने को तैयार हैं. मानव सभ्यता का राज ही यह है कि एक आदमी मुश्किल में दौड़ कर दूसरे की सहायता करे. उसी से समाज के कानून बने, इसीलिए लोग शहरों में रहने आए कि समुचित सुरक्षा का एहसास बना रहे.

अब मोबाइलों ने यह नष्ट करना शुरू कर दिया है. सोशल मीडिया इस कदर बेरहम और बेजान हो गया है कि उसे दूसरे के दुखों में मजा आता है. खराब खबर फटाफट शेयर होती है. लोग किसी दुर्घटना के फोटो और वीडियो को भी ‘लाइक’ करते हैं, क्योंकि फेसबुक और यूट्यूब में ‘हेट’ का औप्शन अभी तक नहीं है. कुछ लोग मांग कर रहे हैं पर शायद कंपनी को लगता है गैरमानवीय भावनाओं से खेलने का मजा ही कुछ और है.

परपीड़न सुख की भावना कम ही जीवों में होती है. पशु खुद को जिंदा रखने के लिए दूसरे पशु को मार कर खा जाते हैं पर दूसरे के दुख पर वे मजा लेते हों, ऐसा नहीं है. दुर्घटना का तमाशा देखने के लिए लोग गाड़ी, स्कूटरबाइक रोक कर सड़क के बीच खड़े हो जाते हैं. पहले सिर्फ देखते थे अब फिल्माने लगे हैं ताकि उसे यूट्यूब पर डाल कर महानता का लाभ उठाया जा सके.

नई तकनीक का विरोध करना गलत है पर उस का दुरुपयोग हो रहा हो तो चिंता तो होगी ही. कारों, बाइकों में कितने ही सेफ्टी फीचर हों, सब से बड़ा सेफ्टी फीचर साथ चल रहा अनजाना यात्री है जिस पर पहले भरोसा किया जा सकता था, अब क्या मालूम आप की मुसीबत उस के लिए मोबाइल पर वीडियो बनाने के काम आए.

ब्वॉयफ्रेंड के साथ स्पेन में ये क्या कर रही है टीवी की सबसे चर्चित बहू

मशहूर टीवी सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता’ है की अक्षरा यानि कि टेलीविजन स्टार हिना खान इन दिनों सीरियल ‘खतरों के खिलाड़ी 8’ की शूटिंग के लिए स्पेन में हैं.

खास बात यह है कि उनके साथ, उनके ब्वॉयफ्रेंड रॉकी जायसवाल भी वहां उनके साथ मौजूद हैं. इस ट्रिप की कुछ बेहद रोमांटिक और हॉट फोटोज हिना ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड की हैं. इन तस्वीरों में वे बेहद खूबसूरत और बोल्ड नजर आ रही हैं. लगता है कि टीवी पर ट्रेडिशनल लुक में नजर आने वाली हिना का यह बोल्ड अंदाज फैंस को काफी पसंद आ रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर अपलोड करने के कुछ ही समय बाद उनकी ये तस्वीरें वायरल हो गईं.

इन तस्वीरों में हिना और उनके बॉयफ्रैंड रॉकी की क्लोजनेस साफ नजर आ रही है. दोनों एक-दूसरे के साथ काफी खुश दिखाई दे रहे हैं. हम आपको बता दें कि हिना और रॉकी जायसवाल की मुलाकात टीवी शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के सेट पर ही हुई थीं. और फिर दोने को आपस में प्यार हो गया.

अभी कुछ दिन पहले ही हिना ने अपने ब्वॉयफ्रेंड के लिए इंस्टाग्राम पर एक फोटो शेयर कर लंबा पोस्ट लिखा था, कि वो रॉकी को बेहद मिस कर रही हैं. अब इन दोंनो का प्यार तो उनके जीवन और सोशल मीडिया लेकर पूरी दुनिया में फैल ही चुका है, तो आप भी देखें इनकी ये तस्वीरें…

This breezzzzz

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#Barcelona #lovelovelove

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Love this weather #Barcelona

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#Barcelona #lasagradafamilia

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Hola from Ferrari land #Barcelona

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Inspired by the very famous bullfight in Spain😜 #Barcelona here we come..

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#Barcelona #loveloevlove Outfit by @materialgirlbyprishakritika @stylist_hemu

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♥️

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योगी सरकार की नजर में ‘गूलर’ धार्मिक नहीं

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जो धार्मिक नहीं वो स्वीकार नहीं की तर्ज पर चल रही है. यही वजह लगती है कि प्रदेश की सरकार पर्यटन से विकास तक में धर्म से जुडे शहरों को प्राथमिकता दे रही है. हद तो तब हो गई जब प्रदेश सरकार ने कहा कि कांवरियों के बीच अपवित्र माने जाने वाले गूलर के पेड की भी कटाई छंटाई कर दी जायेगी. वैसे तो गूलर का पेड अपवित्र क्यों है इस बात का जबाव प्रदेश सरकार के पास नहीं है. गूलर के पेड़ की कटाई छंटाई के बयान को लेकर शुरू हुई आलोचना के बाद प्रदेश सरकार ने कोई सफाई नहीं दी है. गूलर के पेड़ को अधार्मिक बताकर उसकी कटाई छंटाई के आदेश का विरोध पर्यावरण के समर्थक भी कर रहे हैं. धार्मिक प्रवृत्ति के लोग भी इसका कोई तर्क नहीं तलाश पा रहे हैं.

आयुर्वेद का समर्थन करने वाले गूलर के गुणों का महत्व बताते हैं. गूलर के फल का महत्व आम जनता के बीच ऐसा है कि इसके कच्चे फल से सब्जी और अचार बनता है तो पके हुये फल को खाया भी जाता है. केवल इंसान की नहीं चिडियां भी गूलर के फल से अपना भोजन तलाशते हैं. गांव में बड़ी संख्या में गूलर के पेड पाये जाते हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने आदेश दिया है कि कांवरियों के मार्ग में पड़ने वाले गूलर के पेड को काट कर छोटा किया जायेगा क्योकि कांवर ले जाने वाले लोग गूलर को पवित्र नहीं मानते हैं. प्रदेश सरकार ने कांवर यात्रा को महत्व देते हुये लंबे चौडे आदेश जारी किये हैं जिससे कांवर यात्रा करने वालों को रास्ते में कहीं कोई परेशानी न हो.

प्रदेश सरकार ने जिस तरह से कांवर यात्रा को महत्व दिया है उससे लगता है कि कांवर यात्रा के समय केवल सरकार ही नहीं भाजपा का संगठन भी जगह जगह कांवर यात्रा के प्रचार प्रसार में लग जायेगा. उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने हर काम को धार्मिक महत्व से जोड़ना शुरू कर दिया है. पर्यटन विकास के लिये जो नीतियां बन रही हैं उसमें धार्मिक महत्व वाले शहरों का ही ध्यान रखा जा रहा है. अभी सरकार प्रदेश में शहरों के बीच हेलीकौप्टर से हवाई सेवा शुरू करने जा रही है. उसमें भी सबसे पहले 15 धार्मिक महत्व के शहरों का नाम लिया जा रहा है. असल में भाजपा ने धर्म को ही आगे रखकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली है, जिससे अब उसके हर काम में धर्म के महत्व को अंडरलाइन करके दिखाया जा रहा है.

कौन हैं दुनिया के हॉटेस्ट दादाजी?

क्या फैशन की दुनिया के हॉटेस्ट ग्रांडफादर को जानते हैं आप? चीन के शेनयांग प्रांत के रहने वाले देशुन वांग को लोग अब ‘Worlds hottest Grandpa’ कहकर बुलाने लगे हैं. 80 साल के देशुन वांग आज चीन के सोशल मीडिया पर काफी पॉपुलर हैं, क्या आप जानते हैं क्या है इसके पीछे की कहानी?

देशुन वांग बताते हैं कि उन्हें 60 साल की मेहनत के बाद आज ये मुकाम हासिल हुआ है. देशुन ने 24 साल की उम्र में बतौर एक थियेटर एक्टर काम करना शुरू किया था. आगे जानकर आप हैरान होंगे कि इसके बहुत सालों बाद 44 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी सीखना शुरू किया था. 49 साल की उम्र में उन्होंने अपना खुद का माइम ग्रुप शुरू किया. पर बाद में वे बीजिंग आ गए और उनके ग्रुप का नाम बीजिंग ड्रिफ्टर हो गया.

अब यहां से उनकी कहानी असल में शुरू होती है. 50 साल की उम्र में देशुन पहली बार जिम गए और 57 साल की उम्र में उन्होंने फिर से स्टेज पर वापसी की. उन्होंने ‘लिविंग स्कल्पचर परफोर्मेंस’ नाम के एक नए आर्ट फॉर्म की शुरुआत की. 70 की उम्र में उन्होंने मॉडलिंग के लिए वर्कआउट करना शुरू किया. शायद आपको भरोसा न हो लेकिन 79 की उम्र में उन्होंने पहली बार रैम्प पर कैटवॉक किया. इसी कैटवॉक वीडियो ने उन्हें आज इंटरनेट की दुनिया और माडलिंग की दुनिया में संसेशन बना दिया है.

पिछले कुछ एक साल में देशुन की एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही थी, जिसमें उन्होंने बताया है कि जब आपको कोई नहीं जानता और जब आपको सब जानने लगते हैं, तो इस बात में कितना फर्क है. दरअसल इस वीडियो के माध्यम से देशुन वांग ने अपनी लाइफ की पूरी जर्नी बताई है. उनका कहना है कि सफलता पाने के लिए किसी उम्र की कोई जरुरत नहीं होती. सफलता पाने में कभी किसी की उम्र बाधा नहीं बन सकती है.

वे अभी तक कई रैंप शो कर चुके हैं. इसके साथ ही वे चीन के कई क्लोथ कपंनियों के मॉडल भी हैं. वांग मॉडलिंग करने के साथ-साथ एक्टिंग भी करते हैं.

मॉम : श्रीदेवी और नवाजुद्दीन की जबरदस्त एक्टिंग

बलात्कार के मुद्दे पर कई फिल्में लगातार बन रही हैं. कुछ माह पहले बलात्कार के मुद्दे पर ही प्रदर्शित फिल्म ‘‘मातृ’’ और श्रीदेवी के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘मॉम’’की कहानी में अंतर नही है. गैंगरेप और फिर बदला लेने की दास्तान है. ‘मॉम’ में मां के किरदार को बहुत ही सशक्त रूप में पेश किया गया है. मगर फिल्म ‘मॉम’का प्रस्तुतिकरण काफी बेहतर है.

इस रोमांचक कहानी के केंद्र में दिल्ली विश्वविद्यालय में बायोलॉजी (जीवविज्ञान) की प्रोफेसर देवकी (श्रीदेवी) और उनकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) और अपनी बेटी प्रिया है. देवकी अपनी दोनों बेटियों व पति आनंद (अदनान सिद्दिकी) के साथ, खुशहाल जिंदगी जी रही है. देवकी जिस स्कूल में शिक्षक है, उसी स्कूल में प्रिया व आर्या दोनों पढ़ते हैं. मोहित एक लड़की को अश्लील संदेश भेजता है, जिसकी वजह से देवकी, मोहित को सजा देती है. आर्या अपनी सौतेली मां देवकी से प्यार नहीं करती, बल्कि ‘मैडम’ कह कर बुलाती है. जबकि देवकी उसे बहुत प्यार करती है.

देवकी व आनंद की मर्जी के विपरीत आर्या उन्हें मजबूर करती है कि वह उन्हें वेलेनटाइन डे की पार्टी में जाने की इजाजत दे. वेलेनटाइन डे की पार्टी में मोहित, उसका चचेरा भाई, जगन (अभिमन्यू सिंह) व एक अन्य दोस्त मिलकर गाड़ी के अंदर आर्या के साथ बलात्कार कर उसे सड़क किनारे एक गटर में फेंक देते हैं. बहुत बुरी हालत में आर्या अस्पताल पहुंचायी जाती है. एक कड़क मिजाज पुलिस ऑफिसर फ्रांसिस (अक्षय खन्ना) अपने काम को ईमानदारी के साथ अंजाम देने में जुटा हुआ है. मामला अदालत में पहुंचता है, मगर सभी आरोपी बरी हो जाते हैं.

देवकी के पति आनंद उदार स्वभाव के इंसान हैं. वह दूसरे वकील के माध्यम से हाई कोर्ट जाने की बात सोचता है. मगर देवकी चुप बैठने वाली मां नहीं है. वह उनमें से नहीं है, जो कि कानून के सहारे हाथ पर हाथ बांध कर बैठी रहे. अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है. देवकी बदला लेने के अपने मिशन पर निकल पड़ती है. वह दिल्ली के एक प्राइवेट डिटेक्टिव डी के (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की सेवाएं लेती है. फिर कहानी में कई मोड़ आते हैं. अंततः देवकी अपनी बेटी आर्या के अपराधियों को सजा देने में सफल हो जाती है और आर्या उन्हें ‘मॉम’ कहकर पुकारती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो श्रीदेवी ने जबरदस्त अभिनय क्षमता का परिचय दिया है. खुशी, गम, बेबसी, प्रतिशोध व जीत के भाव बड़ी आसानी से उनके चेहरे पर पढ़े जा सकते हैं. श्रीदेवी अनुकरणीय कलाकार के रूप में उभरती हैं. सौतेली बेटी द्वारा स्वीकार न किए जाने का दर्द भी उनके चेहरे पर बड़ी साफगोई के साथ उभरता है. काश एक बेहतरीन कहानी व पटकथा उन्हें मिली होती. बलात्कार पीड़िता के दर्द को बयां करने में सजल अली ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सजल अली व श्रीदेवी के बीच के कई दृश्य दर्शकों को भावुक करते हैं. सजल अली का संजीदा अभिनय तारीफ के काबिल है. नवाजुद्दीन सिद्दिकी और अक्षय खन्ना ने भी जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है. नवाजुद्दीन सिद्दिकी लगातार साबित करते जा रहे हैं कि अभिनय में उनका कोई सानी नहीं है. नवाजुद्दीन सिद्दिकी की खामोशी और एक वाक्य के संवाद भी बहुत कुछ कह जाते हैं. अभिमन्यू सिंह के हिस्से करने को है ही नहीं. परफॉर्मेंस के लिए अदनान सिद्दिकी के हिस्से भी खास दृश्य नहीं रहे.

कहानी व पटकथा के स्तर पर फिल्म काफी कमजोर है. कहानी के अलावा रात, बलात्कार, पुलिस कार्यवाही, मां द्वारा बदला लेना, वगैरह सब कुछ हम अब तक कई फिल्मों में इसी तरह से देखते आए हैं. इसमें कुछ भी नयापन नहीं है. मगर प्रस्तुतिकरण व कलाकारों की अति उत्कृष्ट परफॉर्मेंस के चलते फिल्म एक अलग मुकाम पर पहुंचती है. इंटरवल के बाद पटकथा में कसावट की बहुत जरुरत है. यदि कहानी व पटकथा पर और काम किया जाता तो फिल्म ज्यादा बेहतर बन सकती थी. संवाद प्रभावी नहीं है. क्लायमेक्स तक पहुंचते पहुंचते निर्देशक के हाथ से फिल्म फिसल जाती है. जॉर्जिया में देवकी, जगन व पुलिस अफसर फ्रांसिस के बीच का दृश्य जरुरत से ज्यादा मेलोड्रामैटिक हो गया है.

संगीतकार ए आर रहमान का पार्श्व संगीत साधारण है. फिल्म का एक भी गाना जमता नहीं है. इंटरवल के बाद का गाना तो कहानी को बहुत ही ज्यादा शिथिल करता है. कैमरामैन ऐना गोस्वामी ने कुछ अच्छे दृश्य फिल्माए हैं. जॉर्जिया की खूबसूरती अच्छे ढंग से कैद हुई है.

दो घंटे 27 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मॉम’’ का निर्माण बोनी कपूर, सुनील मनचंदा, नेरश अग्रवाल, मुकेश तलरेजा, गोतम जैन, निर्देशक रवि उद्यावर, कहानी लेखक रवि उद्यावर, गिरीश कोहली व कोना वेंकट, संगीतकार ए आर रहमान, कैमरामैन ऐना गोस्वामी, पटकथा लेखक गिरीश कोहली तथा कलाकार हैं- श्रीदेवी, अदनान सिद्दिकी, साजल अली, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अक्षय खन्ना, अभिमन्यू सिंह व अन्य.

कम कपड़ों में इस लड़की ने डांस कर बढ़ा दी है गर्मी, आपने देखा ये वीडियो

डांस एक बेहद आकर्षक कला है. इसमें भी खास कर महिलाओं का डांस बहुत आकर्षक होता है. वह जहां भी डांस करने लगती हैं वहां लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो जाती है. यह एक ऐसी क्रिया है जो मन को प्रसन्न रखती है और साथ सेहत पर भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिलता है.

डांस कई तरह के होते हैं. कुछ डांस परंपरा और संस्कृति से जुड़े होते हैं, इसमें आप शास्त्रीय संगीत को जोड़ सकते हैं. कुछ डांस बहुत साधारण और दिल बहलाने के लिए किये जाते हैं, इस तरह के डांस अक्सर शादियों में देखने को मिलते हैं. इसके अलावा बार-बालाओं का डांस भी लोगों के बीच खासा लोकप्रिय होता है.

आज हम आपको जिस महिला का डांस दिखाने जा रहे हैं वैसा डांस पहले आपने कभी नहीं देखा होगा. इस महिला का डांस सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस डांसर ने बॉलीवुड के सुपरहिट गाने पर जिस तरह डांस किया उसे देखकर तो आप भी यही कहेंगे कि डांसर ने पानी में आग लगाने का काम किया है.

आप भी देखिए ये वीडियो

बहुरुपिया किन्नर निकला बच्चा चोर

रुखसाना पिछले एक हफ्ते से आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ देखने की जिद पति सोनू से कर रही थी, लेकिन सोनू अपने काम में व्यस्त था इसलिए वह पत्नी को फिल्म दिखाने के लिए टाइम नहीं निकाल पा रहा था. पत्नी के काफी कहने के बाद उस ने 2 जनवरी, 2017 को उसे फिल्म दिखाने का वादा कर दिया. इतना ही नहीं, उस ने 2 जनवरी को शाम के शो की 2 टिकटें भी बुक करा दीं. टिकट बुक हो जाने पर रुखसाना बहुत खुश हुई. 2 जनवरी, 2017 को रुखसाना और उस के पति सोनू को शाम के शो में पिक्चर देखने जाना था, इसलिए रुखसाना अपराह्न 3 बजे ही तैयार हो गई. वह पति से भी तैयार होने के लिए बारबार कह रही थी पर वह वाट्सऐप पर किसी से चैटिंग करने में लगा हुआ था. रुखसाना के कहने पर फोन टेबल पर रख कर वह नहाने के लिए बाथरूम में घुस गया. इस के बाद रुखसाना अपनी ढाई साल की बेटी सोनी को भी तैयार करने लगी.

उसी समय उस के दरवाजे पर हलकी सी दस्तक के साथ किसी की आवाज आई, ‘‘भाभी, घर में हो क्या?’’

‘‘कौन?’’ रुखसाना ने पूछा.

‘‘मैं हूं इच्छा.’’ एक दुबलेपतले से युवक ने अंदर प्रवेश करते हुए कहा.

‘‘इच्छा, तुम कहां थे, 2 दिन से दिखे नहीं.’’ रुखसाना ने अपना दुपट्टा सीने पर ठीक करते हुए पूछा.

‘‘एक बड़ा प्रोग्राम था भाभी, अपनी मंडली के साथ मैं उसी में गया था. इधर आने का वक्त ही नहीं मिला.’’ कह कर इच्छा उर्फ राकेश रुखसाना की बेटी सोनी के पास बैठ कर उसे प्यार करने लगा.

‘‘पानी लोगे तुम?’’ रुखसाना ने पूछा.

‘‘नहीं भाभी, पानी नहीं, बस एक कप चाय पिला दो.’’ वह बोला.

‘‘चाय का समय भी है और तुम्हारे भाई को नहाने के बाद चाय पीने की आदत है. तब तक तुम सोनी से खेलो, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’ कह कर रुखसाना किचन में चली गई.

‘‘क्या भाई घर पर ही हैं?’’ इच्छा ने चौंक कर पूछा तो रुखसाना ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, बाथरूम में नहा रहे हैं. आज हम लोग पिक्चर देखने जा रहे हैं.’’

रुखसाना ने अभी चाय का पानी गैस पर चढ़ाया ही था कि इच्छा की आवाज उस के कान में पड़ी, ‘‘भाभी, मैं सोनी बेटी को चौकलेट दिलवाने के लिए दुकान पर ले जा रहा हूं.’’

‘‘अच्छा.’’ रुखसाना ने अंदर से ही कहा और चाय बनाने में व्यस्त हो गई.

चाय बनी तब तक सोनू भी नहा कर कमरे में आ गया. उसे सोनी नजर नहीं आई तो उस ने रुखसाना से पूछा, ‘‘सोनी कहां है?’’

‘‘इच्छा आया है, वही उसे चौकलेट दिलाने दुकान पर ले गया है. चाय भी उसी ने बनवाई है.’’ चाय की ट्रे टेबल पर रखते हुए रुखसाना बोली.

तैयार होने के बाद सोनू ने चाय पी ली लेकिन इच्छा सोनी को ले कर नहीं लौटा था. तब सोनू ने पत्नी से झल्ला कर पूछा, ‘‘चाय ठंडी हो रही है, कहां चला गया यह इच्छा?’’

‘‘चौकलेट लेने को कह कर गया है. अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था.’’ रुखसाना के स्वर में परेशानी उभर आई, ‘‘दुकान भी ज्यादा दूर नहीं है.’’

‘‘तुम देख आओ रुखसाना, हमें फिल्म के लिए देर हो जाएगी.’’ सोनू ने कहा तो रुखसाना घर से निकल कर मोहल्ले की परचून वाली दुकान पर पहुंच गई. वह जब भी आता था, उसी दुकान से सोनी को चौकलेट दिलाता था.

उस दुकान पर इच्छा और उस की बेटी नहीं दिखी तो उस ने दुकानदार से पूछा. दुकानदार रुखसाना की बेटी सोनी को जानता था. वह दुकान पर आई नहीं थी, इसलिए उस ने मना कर दिया.

‘आखिर वह सोनी को ले कर किस दुकान पर गया है’, बुदबुदाते हुए वह दूसरी दुकान पर गई.

इस तरह एकएक कर के उस ने मोहल्ले की सारी दुकानें देख डालीं, पर इच्छा कहीं भी नजर नहीं आया. बाद में थकहार कर वह उदास चेहरा ले कर घर लौट आई. उस ने पति को बताया, ‘‘इच्छा मोहल्ले की किसी दुकान पर नहीं है. पता नहीं वह बेटी को ले कर कहां गया है.’’

इतना सुनते ही सोनू झल्ला उठा, ‘‘यह आज हमारा प्रोग्राम चौपट करवा देगा. तुम्हें उस के साथ बेटी को भेजना ही नहीं चाहिए था.’’

‘‘वह जब भी आता था तो सोनी को चौकलेट दिलाने दुकान पर ले जाता था. मैं ने सोचा 5-10 मिनट में आ ही जाएगा, इसलिए उसे जाने दिया.’’ वह बोली, ‘‘आप देख आइए, कहीं किसी परिचित से खड़ा बतिया तो नहीं रहा.’’

‘‘देख कर आता हूं.’’ कह कर सोनू इच्छा की तलाश में निकल गया. सोनू ने भी मोहल्ले की सभी दुकानें देख डालीं. इस के अलावा उस ने लोगों से इच्छा और अपनी बेटी सोनी के बारे में मालूम किया पर उन का कहीं पता नहीं लगा. बेटी को ले कर उस की घबराहट बढ़ने लगी. घर से निकले हुए आधा घंटा बीत चुका था. उसे अब अहसास होने लगा था कि इच्छा कुछ गड़बड़ कर गया है. परेशान हालत में वह घर लौटा तो रुखसाना भी घबरा कर रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास की औरतें भी उस के यहां आ गईं.

सोनू की आंखें भी बारबार नम हो रही थीं. इच्छा को मोहल्ले के सभी लोग जानते थे क्योंकि वह था तो लड़का पर हावभाव और स्वभाव लड़कियों की तरह था. और तो और वह जनाने कपड़े पहन कर किन्नरों के साथ रहता था. वह सोनी को क्यों ले गया, इस बात को कोई भी नहीं समझ पा रहा था. मोहल्ले के लड़के भी इच्छा को ढूंढने के लिए इधरउधर निकल पड़े. 2 घंटे बीतने के बाद भी जब वह नहीं मिला तो यह विश्वास हो गया कि इच्छा ने किसी योजना के तहत ही सोनी को गायब किया है. वह योजना फिरौती या फिर गलत नीयत में से कोई एक हो सकती थी.

सोनू की हैसियत फिरौती की रकम देने की नहीं थी, इसलिए सभी को यह शंका थी कि इच्छा ढाई साल की मासूम के साथ कुछ गलत हरकत न कर बैठे. जमाना है भी बहुत खराब. हवस की आग में जल रहे दुराचारियों के लिए क्या बुजुर्ग और क्या मासूम. हवस का कीड़ा उन्हें अंधा जो बना देता है.

रुखसाना और सोनू की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, क्या न करें. आखिर तय हुआ कि उन्हें पुलिस थाने में जा कर इस घटना की जानकारी दे देनी चाहिए. अभी यह विचार बना ही था कि किसी परिचित ने 100 नंबर पर फोन कर के इस घटना की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. सोनू अपनी पत्नी रुखसाना और ढाई साल की बेटी सोनी के साथ दिल्ली के मध्य जिला के पहाड़गंज क्षेत्र के  पानदरीबा में किराए पर रहता था. करीब 4 साल पहले वह यहां आया था. गुजरबसर के लिए उस ने यहीं पर पटरी लगानी शुरू कर दी थी. रुखसाना भी घर का काम निपटा कर उस के काम में हाथ बंटाती थी. इसी किराए के मकान में रुखसाना ने सोनी को जन्म दिया था. 20 साल का इच्छा उर्फ राकेश उर्फ फलक मूलरूप से राजस्थान के जोधपुर जिले का रहने वाला था. दिल्ली में वह कई सालों से रह रहा था. यहां वह किन्नरों के साथ लड़की की वेशभूषा में घूमता रहता था. किन्नर जहां भी नेग लेने जाते, वह उन के साथ जाता.

पहाड़गंज की पानदरीबा बस्ती में रहने वाले किन्नरों के पास भी उस का आनाजाना था. यहीं उस की पहचान सोनू और रुखसाना से हुई थी. बाद में वह उन का घनिष्ठ बन गया था. इच्छा जब भी रुखसाना के घर जाता तो उस की बेटी सोनी को चौकलेट दिलवाने के लिए पास की दुकान पर ले जाता था. यही कारण था कि आज जब शाम को इच्छा आया तो रुखसाना ने उसे सोनी को ले जाने से इनकार नहीं किया. रुखसाना को क्या मालूम था कि इच्छा आज उन के विश्वास को तारतार कर देगा.

रुखसाना का रोरो कर बुरा हाल था. जब उन की गली के सामने पुलिस वैन आ कर रुकी, रुखसाना विलाप ही कर रही थी. संग तराशान चौकीइंचार्ज एसआई देवेंद्र प्रणव 2 कांस्टेबलों के साथ रुखसाना के कमरे पर पहुंचे. सोनू भी वहीं मौजूद था. सोनू और उस की पत्नी ने एसआई देवेंद्र प्रणव को बेटी के गायब होने की बात विस्तार से बता दी.

‘‘इच्छा कहां रहता है?’’ एसआई ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने उस का घर नहीं देखा.’’ सोनू बोला.

‘‘रुखसाना, क्या तुम ने इच्छा का घर देखा है?’’ एसआई प्रणव ने रोती हुई रुखसाना से पूछा.

‘‘नहीं जी, वह कहां रहता है, मैं नहीं जानती.’’ रुखसाना रोते हुए बोली.

‘‘तुम लोग कब से जानते हो उसे?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘यही कोई 3-4 साल से साहब. वह इसी मोहल्ले में रहता होगा. क्योंकि 2-3 दिन में उस की हम से मुलाकात होती रहती थी.’’ सोनू ने बताया.

इस के बाद उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछा, ‘‘क्या तुम में से किसी ने इच्छा का घर देखा है?’’

इस प्रश्न पर सभी एकदूसरे का मुंह देखने लगे. इस से जाहिर हो रहा था कि उन में से कोई भी इच्छा के घर के बारे में नहीं जानता था. पुलिस के लिए यह एक हैरान कर देने वाली बात थी. इच्छा अगर इसी बस्ती में रहता है तो कोई उस के घर का पता क्यों नहीं जानता. एसआई प्रणव ने साथ आए एक कांस्टेबल को इच्छा के घर का पता लगाने के लिए भेज दिया और सोनू से इच्छा के हुलिए तथा अन्य जानकारी जुटाने में लग गए.

सोनू ने उन्हें इच्छा का हुलिया बताने के बाद यह जानकारी दी कि वह ज्यादातर किन्नरों के साथ रहता है. उन के साथ ही घूमता है. एसआई देवेंद्र प्रणव सोनू और रुखसाना को ले कर थाने लौट आए. देवेंद्र प्रणव उन दोनों को थानाप्रभारी इंद्रकुमार झा के कक्ष में ले गए. रुखसाना और सोनू से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने सोनू की तरफ से इच्छा के खिलाफ भादंवि की धारा 363 के तहत रिपोर्ट दर्ज करवा दी. फिर तसल्ली दे कर रुखसाना और सोनू को घर भेज दिया.

उन के जाने के बाद थानाप्रभारी ने एसआई देवेंद्र से इस बारे में कुछ विचारविमर्श किया और मामले की जानकारी डीसीपी संदीप सिंह रंधावा को दे दी. चूंकि मामला अपहरण का था, इसलिए डीसीपी रंधावा ने उसी समय श्री झा को आवश्यक निर्देश दे कर इस मामले को जल्द से जल्द निपटाने का आदेश दिया. थानाप्रभारी ने एसआई देवेंद्र के साथ इस केस पर काम करना शुरू कर दिया तो पता चला कि इच्छा के पास कोई मोबाइल फोन नहीं है. यदि होता तो उस के सहारे उस तक पहुंचा जा सकता था. अब दूसरा रास्ता था किन्नरों से पूछताछ कर के. चूंकि वह किन्नरों के साथ रहता था इसलिए किन्नरों द्वारा ही उस के बारे में जानकारी मिलने की उम्मीद थी.

देवेंद्र पुन: पानदरीबा पहुंच गए. उन्होंने लोगों से बातचीत कर यह पता लगा लिया कि उस इलाके में किन्नर कहां रहते हैं. उन्होंने किन्नरों से इच्छा के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश शुरू कर दी. उन्हें उन में से ऐसा कोई किन्नर नहीं मिला जो इच्छा के निवास स्थान के बारे में जानता हो. आधी रात हो चुकी थी. इतनी सर्द रात में लोगों से पूछताछ करना उचित नहीं लगा इसलिए वह थाने लौट आए. अगले दिन तैयार हो कर वह थाने पहुंचे. थानाप्रभारी इंद्रकुमार झा थाने में ही रुके हुए थे. एसआई देवेंद्र ने उन्हें अपनी जांच की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने आगे की जांच के लिए 4 कांस्टेबलों की एक टीम बनाई. थानाप्रभारी से दिशानिर्देश ले कर एसआई देवेंद्र टीम के साथ पानदरीबा पहुंच गए. उन्होंने अपनी पूछताछ उसी जगह से शुरू की, जहां पर छोड़ी थी.

2 घंटे की मेहनत के बाद उन्हें कुछ कामयाबी मिली. एक कांस्टेबल को चांदनी नाम का एक किन्नर मिला जो इच्छा को पहचानता था. चांदनी किन्नर मूलरूप से कानपुर का रहने वाला था. उस ने बताया कि इच्छा उर्फ राकेश त्रिलोकपुरी की झुग्गियों में रहता है. उस ने इच्छा का एक रंगीन फोटो भी पुलिस को दे दिया. एसआई देवेंद्र प्रणव टीम के साथ चांदनी किन्नर को ले कर त्रिलोकपुरी पहुंच गए. पर वह अपनी झुग्गी में नहीं मिला. तब पुलिस ने उस की आसपास तलाश की. काफी भागदौड़ के बाद आखिर शाम को इच्छा पकड़ में आ गया. उस समय वह अपना हुलिया बदल कर बाजार में घूम रहा था. पर उस के साथ सोनी नहीं थी. पूछने पर उस ने बताया कि वह सोनी को बेचने की फिराक में था. फिलहाल उस ने उसे त्रिलोकपुरी में ही अपनी मौसी के घर में रखा है. पुलिस उसे ले कर उस की मौसी के यहां पहुंची. सोनी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने सब से पहले सोनी को अपने कब्जे में लिया. उस की मौसी ने बताया कि इच्छा इस बच्ची को अपने दोस्त की बेटी बता कर यहां कुछ समय के लिए छोड़ गया था. इच्छा का इरादा क्या था, वह नहीं जानती.

पुलिस इच्छा को हिरासत में ले कर पहाड़गंज थाने लौट आई. यहां इच्छा से सख्ती से पूछताछ शुरू हुई तो चौंकाने वाली जानकारी मिली. उस ने बताया कि वह इस से पहले किन्नर वेश में 3 और बच्चों का अपहरण कर के उन्हें बेच चुका है. किन्नर तो वह दिखावे के लिए बना था. इस की वजह यह थी कि किन्नरों के साथ उसे मोहल्ले में घूमने में दिक्कत नहीं होती थी और कोई उस पर शक भी नहीं करता था. किन्नर होने की सहानुभूति बटोर कर वह छोटी बच्ची के मांबाप से दोस्ती गांठता फिर उन का विश्वास जीतने के बाद मौका पा कर उन की बच्ची ले उड़ता.

थानाप्रभारी इंद्रकुमार झा ने रुखसाना और सोनू को थाने बुला कर उन की बेटी सोनी उन के हवाले कर दी. बेटी को सुरक्षित पा कर दोनों खुश हो गए. 24 घंटे के अंदर इस केस को हल करने वाली टीम को डीसीपी संदीप सिंह रंधावा ने सराहना की. बच्ची का अपहरण करने वाले बहरूपिए से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उस ने कितने बच्चों का अपहरण किया और उन्हें कहां बेचा था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित और सोनी काल्पनिक नाम है.

अमरनाथ यात्रा : गारंटी किसी बात की नहीं

पूरी तरह आतंक की गिरफ्त में आ चुकी कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों के चलते हालात कतई ऐसे नहीं हैं कि कोई सामान्य पर्यटक भी वहां जाए. लेकिन 29 जून से 7 अगस्त तक होने वाली अमरनाथ यात्रा में देशभर से लगभग 7 लाख श्रद्धालुओं के अमरनाथ पहुंचने के अनुमान ने जता दिया है कि धर्मांधता इन दिनों सिर चढ़ कर बोल रही है.

क्यों लाखों लोग धर्म के नाम पर मौत के मुंह में जानबूझ कर जा रहे हैं, इस सवाल का जवाब अब बेहद साफ है कि अमरनाथ यात्रा का उद्देश्य अब कुछकुछ बदल रहा है. कहने को तो यह कहा जाता है यहां शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था लेकिन अब यहां मरण की आशंका ज्यादा है. अधिकांश श्रद्धालु अब चमत्कारिक किस्सेकहानियों के फेर में पड़ कर ही नहीं, बल्कि मुसलिम आतंकवादियों को यह बतानेजताने भी जा रहे हैं कि हिंदू किसी गोलाबारूद या मौत से नहीं डरता. कश्यप ऋषि की तपोस्थली कश्मीर घाटी हमारी है, बर्फानी बाबा का पुण्य कोई हम से छीन नहीं सकता.

आस्था और कट्टरवाद में फर्क कर पाना हमेशा से ही मुश्किल काम रहा है. अमरनाथ यात्रा के मामले में तो हालत बेहद चिंताजनक और हास्यास्पद हो गई है कि देशभर में एक करंट सा फैल रहा है कि जितनी ज्यादा से ज्यादा संख्या में श्रद्धालु अमरनाथ पहुंचेंगे, उतनी ही तादाद में पुण्य मिलेगा और हिंदुओं की ताकत दिखेगी.

आस्था का करंट फैला कर पैसा बनाने वाले लोग खुश हैं कि इस साल कारोबार अच्छा चलेगा. पिछले साल कश्मीर के कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में बारबार कर्फ्यू लगा था,

जिस से अमरनाथ यात्रा बाधित हुई थी. उस से धर्म के धंधेबाजों को वहां पहली दफा घाटा उठाना पड़ा था. उन लोगों को अंदाजा था कि साल 2017 में भी ऐसा दोहराव हो सकता है, इसलिए भीड़ बढ़ाने की तैयारियां तभी से शुरू कर दी गई थीं.

ऐसे उमड़ती है भीड़

देशदुनिया के राजनीतिक व सामाजिक सरोकारों से दूर अधिकांश श्रद्धालुओं की मंशा बेहद साफ रहती है कि जैसे भी हो, पापों व कष्टों से मुक्ति मिले. इस के लिए खूनपसीने की कमाई चढ़ाना सोचने की बात नहीं और अगर कर्ज भी लेना पड़े तो कोई हर्ज नहीं. एक बार वहां हो आएं, फिर तो तमाम कर्जे सूद के साथ उतारना ऊपर वाले की जिम्मेदारी हो जाएगी.

देश में तीर्थयात्राओं का इतना जबरदस्त क्रेज बेवजह नहीं है कि लोग परेशानियों, अभावों, मौसम की मार, पैसों और जान तक की चिंता नहीं करते. दरअसल तीर्थयात्राओं के कारोबारियों ने कोनेकोने में ऐसा जाल फैला रखा है कि इस से किसी का बच कर निकलना बहुत मुश्किल है. चारों दिशाओं में तीर्थस्थल हैं जिन के अलगअलग चमत्कारी किस्सेकहानियां प्रचलित हैं. इन्हें सुन धर्मांधों की बुद्धि बौरा जाती है कि अगर जिंदगी में एक बार तीर्थ नहीं किया तो सब व्यर्थ और नश्वर है.

धर्म के धंधे की सहायक शाखा तीर्थयात्रा का व्यापार धर्म जितना ही प्राचीन है, जिस का मकसद भी आम लोगों से पैसा कमाना रहा है. हर एक धर्मग्रंथ तीर्थ माहात्म्य से भरा पड़ा है जिस का प्रचार पंडेपुजारी हर धार्मिक आयोजन में करते रहते हैं. सार यही है कि तीर्थयात्रा जरूर करो, बगैर इस के जीवन निरर्थक, पशुवत है.

कृषि प्रधान इस देश के संस्कार और मानसिकता अभी भी देहाती हैं. लोग भले ही बड़े शहरों में जा कर बसने लगे हों, सुविधाजनक जिंदगी जीने लगे हों पर तीर्थयात्रा का भूत उन के घरों और दिमाग में सालों पहले जैसा लटका हुआ है.

70 के दशक में सड़कें नहीं थीं, गांवों में आवागमन के साधन नहीं थे जबकि लोगों की आमदनी ज्यादा थी. दूसरे शब्दों में कहें तो खर्च सीमित थे. तब बड़े पैमाने पर पंडेपुजारियों और बनियों ने लोगों को तीर्थयात्रा के बाबत उकसाना शुरू किया.

ब्राह्मणबनिया गठजोड़ ने श्रद्धालुओं को बताया कि तीर्थयात्रा दुर्लभ है और भाग्य वाले ही इसे कर सकते हैं. इस सोए भाग्य को जगाने के लिए तीर्थस्थलों से संबंध रखते चमत्कारिक किस्से हैंडबिलों के जरिए बताए जाने लगे. लोग आसानी से जेबें ढीली करें, इस बाबत इन पर्चों में बताया जाता था कि फलां ने चारधाम की यात्रा की तो उसे खेत में सोने का घड़ा मिला. फलां ने जा कर वैष्णो देवी के दर्शन किए तो उस के बेटे की नौकरी लग गई और बेटी की शादी धनाढ्य परिवार में हो गई.

देखते ही देखते तीर्थयात्रा से बेऔलादों को औलादें मिलने लगीं, असाध्य बीमारियों से ग्रस्त मरीज भलेचंगे हो कर घूमने लगे, पति ने पत्नी को मारनापीटना छोड़ दिया, क्योंकि उस की पत्नी ने तिरुपति और रामेश्वरम जा कर पूजापाठ किया था. रामलाल का व्यापार दिन दोगुना रात चौगुना चल निकला क्योंकि उस ने शिर्डी जा कर सांईंबाबा के दरबार में गुहार लगाई थी.

यह वह वक्त था जब लोगों के पास अचल संपत्तियां ज्यादा होती थीं, नकदी कम. लिहाजा हर गांवशहर में रातोंरात फाइनैंसर पैदा हो गए जो जमीन, गहने, खेत और मकान गिरवी रख कर ब्याज पर तीर्थयात्रा के लिए नकदी देने लगे. लोगों की लालची मानसिकता को भुनाने को हर स्तर पर कोशिशें हुईं.

तीर्थयात्रा के दलाल गांवगांव घूम कर बताने लगे कि चलो हमारे साथ, हम ने आप की सहूलियत के लिए सारे इंतजाम किए हुए हैं. दुर्गम तीर्थस्थल तक ले जाना हमारी जिम्मेदारी है, आप को तो बस पैसे देने हैं.

तीर्थयात्रा के कारोबार की गहरी जड़ें गमलों के जरिए शहरों तक आ गईं और आज सोशल मीडिया के दौर में हालत यह है कि चमत्कारों का प्रचार फेसबुक, इंटरनैट और व्हाट्सऐप के जरिए हो रहा है. लोग शिक्षित तो हुए पर जागरूक नहीं हो पाए. तीर्थयात्रा के फलों और फायदों का लालच बरकरार है और दलालों, पंडों का गिरोह उम्मीद से ज्यादा बड़ा हो चुका है.

अमरनाथ यात्रा का सच

अमरनाथ गुफा में बर्फ का शिवलिंग बनता है, श्रद्धालु जिसे बर्फानी बाबा कहते हैं. इस के चमत्कारिक किस्से दूसरे तीर्थस्थलों की तरह किसी सुबूत के मुहताज नहीं. सालभर कंजूसी और किफायत से पैसे खर्च करने वाले लोग अमरनाथ यात्रा के नाम पर बड़ी दरियादिली से पैसे फूंकते हैं जिस का नजारा हर गांव और शहर में देखा जा सकता है.

पिछले साल के घाटे से उबरने के लिए अमरनाथ यात्रा के व्यापारियों ने साल की शुरुआत में ही जाल बिछाना शुरू कर दिया था. 21 मई को दिल्ली के जंतरमंतर पर अमरनाथ यात्रा बचाओ मुहिम में हिस्सा लेने देशभर से पंडेपुजारी, लंगर संचालक और ट्रैवल एजेंट वगैरा पहुंचे थे. इन लोगों की मांग थी कि अमरनाथ यात्रा निर्विघ्न संपन्न कराने को सरकार लोगों को आश्वस्त करे.

इस राष्ट्रीय अभियान से एक बात यह स्पष्ट हुई थी कि बर्फानी बाबा भक्तों की सलामती की गारंटी नहीं लेता. वह न तो आतंकियों को तीसरी आंख खोल कर भस्म कर सकता है और न ही भक्तों की सहूलियत के लिए रास्तों में जमी बर्फ हटा सकता, क्योंकि उस का काम परीक्षा लेना है, परिणाम देना नहीं.

शिवलिंग को तो दूसरों की हिफाजत करनी चाहिए पर यहां तो उलटे उस की ही हिफाजत के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर सेना तैनात करनी पड़ती है.

प्रचार यह किया जा रहा है कि बाबा कड़ा इम्तिहान ले रहा है, इसलिए तमाम बाधाओं को नजरअंदाज करते जो अमरनाथ पहुंच कर बर्फानी बाबा के दर्शन 7 अगस्त तक कर लेगा वह तर जाएगा.

ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालु अमरनाथ आएं, इस बाबत इस से संबंध रखती तमाम धार्मिक समितियों व संगठनों ने साल की शुरुआत में ही प्रचार शुरू कर दिया था. भोपाल के पौश इलाके शिवाजीनगर के 6 नंबर मार्केट में पान की गुमटी चलाने वाले एक सज्जन, जिन्हें लोग सिर्फ पंडितजी के नाम से जानते हैं, के पास जम्मू की एक संस्था की रसीदों की एक बुक और दूसरा प्रचार साहित्य पहुंच गया था.

इस संस्था का नारा है, भोले की फौज करेगी मौज. प्रचार सामग्री पा कर पंडितजी धन्य हो गए. वे पिछले साल एक जत्थे के साथ अमरनाथ गए थे. उन के हिसाब से यात्रा रोमांचक थी पर रास्तेभर जान का डर सताता रहा था. जम्मू में जिस संस्था में उन्होंने नामपता लिखाया था, उस ने उन्हें रसीदें और साहित्य भेजा था जिन्हें वे अपने ग्राहकों को बांटते रहे.

एक रसीद बुक से लगभग ढाई हजार रुपए का चंदा इकट्ठा हुआ जो उन्होंने डिमांड ड्राफ्ट के जरिए संस्था को भेज दिया. जवाब में जय भोलेनाथ और धन्यवाद सहित दूसरी रसीद बुक आ गई जिसे उन्होंने फिर काउंटर पर रख दिया. पंडितजी किसी से चंदा नहीं मांगते. दुकान पर आए ग्राहक श्रद्धानुसार जो दे जाते हैं, वह राशि वे एक अलग डब्बे में रखते जा रहे हैं. ऐसे देशभर में लाखों लोग इन समितियों और संस्थाओं के लिए चंदा इकट्ठा कर भेज रहे हैं.

रोजाना मुश्किल से 3-4 सौ रुपए कमाने वाले इस पान विक्रेता का कहना है कि पिछले साल उन्हें अमरनाथ यात्रा के दौरान 12 हजार रुपए उधार लेने पड़े थे जिन्हें धीरेधीरे वे चुका चुके हैं. अब बैठेबिठाए उन्हें धर्मकार्य सौंप दिया गया है. अगर कहीं से पैसा बरस पड़ा तो वे फिर इस साल, नहीं तो अगले साल तो जाएंगे ही.

शहरशहर में अमरनाथ यात्रा कराने वाली समितियां हैं जो अमरनाथ यात्रियों के रजिस्ट्रेशन से ले कर उन की हर मुमकिन मदद करती हैं. अधिकांश समितियों के कर्ताधर्ता हिंदूवादी संगठनों से जुड़े हैं और अकसर जम्मूकश्मीर जाते रहते हैं. इन रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड समितियों के पदाधिकारियों की सक्रियता यात्रा के दिनों में देखते ही बनती है.

जिस दिन जत्था रवाना होता है उस दिन ट्रेन पर ये लोग ढोलबाजों और फूलमाला ले कर पहुंच जाते हैं. समिति के नाम के बैनर स्टेशन पर फहराते रहते हैं, ट्रेन के डब्बों में भी बैनरों को लटकाया जाता है. अमरनाथ यात्रियों से पहले स्टेशन के पास मंदिर में पूजापाठ कराया जाता है, फिर उन के गले में माला पहना कर उन का समारोहपूर्वक सम्मान किया जाता है.

दरअसल, ये श्रद्धालु उन के ग्राहक होते हैं जो अमरनाथ यात्रा का भुगतान तो करते ही हैं, साथ ही चंदा भी खूब देते हैं. बदले में इन्हें यह गारंटी मिलती है कि आप को कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी. कहा जाता है कि जम्मू के भगवतीनगर में या पहलगाम में और बालटाल में भी समिति के डाक्टर और लंगर हैं जहां सबकुछ फ्री है. शिवसेवक आप की सेवा में मौजूद रहेंगे.

कहने और बताने को सेवा व पुण्य के इस काम में बैठेबिठाए पैसा बरसता है. इस कारोबार में लागत न के बराबर है जिस में भक्त किराया व दूसरे शुल्क एडवांस में दे चुका होता है और जाते व लौटते वक्त समिति को सहायता राशि यानी चंदा भी देता है. एवज में उसे मिलती है एक समूह यानी जत्थे में रहने की सुरक्षा क्योंकि जम्मू से अमरनाथ तक की पैदल यात्रा वाकई दुरूह और जोखिम भरी है. बालटाल और पहलगाम दोनों रास्तों पर लंगरों की भरमार रहती है.

महंगे भोजनालय – लंगर

जम्मू के भगवतीनगर इलाके में लंगरों की रौनक देखते ही बनती है. श्रद्धालुओं की आमधारणा यह है कि इन लंगरों में खाना मुफ्त में मिलता है जबकि हकीकत यह है कि ये लंगर दुनिया के सब से महंगे भोजनालय साबित होते हैं.

कैसे होते हैं, इसे भोपाल के पान विक्रेता पंडितजी के शब्दों में समझें. उन्होंने जम्मू के एक लंगर में एक दिन दोनों वक्त का खाना खाया था. खाने का मीनू हरेक लंगर में लगभग फिक्स है राजमा, चावल, पूरी, सब्जी और एक मीठा जो आमतौर पर हलवा होता है.

पंडितजी ने एक दिन खाना खा कर लंगर के नीचे बने अस्थायी मंदिर, जहां बर्फानी बाबा की तसवीर लगी थी, के पास रखी दानपेटी में श्रद्धापूर्वक 500 रुपए डाले यानी दान दिए.

निसंदेह यही खाना वे जम्मू के किसी होटल में खाते तो वह 60 रुपए में मिल जाता पर चूंकि जत्थे के साथ गए थे और सारा टूर प्रोग्राम पहले से तय था, इसलिए लंगर में खाना बाध्यता हो गई थी. लाखों श्रद्धालु इसी तरह ठगे जाते हैं जो मानते हैं कि अमरनाथ गए हैं तो दानपुण्य तो करें, खासतौर से उन लोगों को दें जो देश के विभिन्न सूबों से आ कर जम्मू, पहलगाम और बालटाल में लंगर लगा कर सेवा का काम कर रहे हैं.

धर्म और आस्था के अंधे ही तीर्थ के इस कारोबार को सेवा और धर्म का काम कह सकते हैं, वरना यह करोड़ों के मुनाफे वाला धंधा है जिसे 8-10 लोग अमरनाथ यात्रा की समाप्ति के बाद बांट लेते हैं.

इन तीनों जगहों में विभिन्न प्रांतों के लंगर देखे जा सकते हैं. हिंदीभाषी राज्यों के लंगर तो हैं ही, अब दक्षिणी राज्यों के लंगर भी लगने लगे हैं जिन के होर्डिंग्स और हैंडबिल वगैरा जम्मू स्टेशन पर उतरते ही भक्तों को मिल जाते हैं.

उत्तर प्रदेश के बदायूं के रहने वाले युवा संजय जोशी बीते 4 सालों से भगवतीनगर इलाके में लंगर लगा रहे हैं. जब उन से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हर साल वे यात्रा के 15-20 दिनों पहले ट्रकों में सामान भर कर भगवतीनगर में डेरा डाल लेते हैं. यही दूसरे राज्यों से आ कर लंगर लगाने वाले करते हैं. उन की भी कोई न कोई समिति या संस्था होती है.

बकौल संजय, डेढ़दो महीने का राशन वे बदायूं से ले कर आते हैं जो वहां के किसानों व व्यापारियों से चंदे की शक्ल में लिया जाता है. पहले लंगर लगाने का कोई शुल्क नहीं था पर पिछले साल से 20 हजार रुपए स्थान आवंटन के लिए जम्मूकश्मीर सरकार लेने लगी है, जिस से लंगर संचालकों में खासा गुस्सा है.

संजय तंबू खींच कर बैठ जाते हैं और समिति के साथ आए दूसरे सदस्य खाना बनाने व परोसने लगते हैं. लंगर बिलकुल फ्री है, संजय बताते हैं, पर सभी यात्री कुछ न कुछ पैसा चढ़ाते हैं जिस से लंगर का खर्च चलता है.

कुल कितना चंदा होता है और कितना चढ़ावा आता है, और एक लंगर लगाने में खर्च कितना आता है, इस सवाल पर चौकन्ने हो कर वे यह कहते बात को टाल जाते हैं कि भगवान के काम में कोई हिसाबकिताब नहीं होता.

दूसरे तमाम लंगर वाले भी यही कहते हैं जिन के स्टालों से दक्षिणा के मुताबिक खाने की महक बढ़ती रहती है. लंगर का धंधा चोखा इस लिहाज से भी है कि अनाज, आटा, तेल, घी, किराना सामान वगैरा सब दान का होता है. नकदी भी लाखों में आती है जिस का बमुश्किल 20-25 फीसदी ही खर्च होता है यानी यह 75 फीसदी मुनाफे का धंधा है. कुख्यात संत आशाराम बापू भले ही बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हो पर उस की संस्था अमरनाथ यात्रियों से लाखों रुपए बना रही है.

इस पर भी हास्यास्पद या तरस खाने वाली बात भक्तों और श्रद्धालुओं का यह प्रचार है कि अमरनाथ यात्रा में लंगर मुफ्त मिलते हैं जहां एक से बढ़ कर एक पकवान खाने को मिलता है. इन भोलेभाले, भोले भक्तों को शायद ही कभी यह बात समझ आएगी कि वे 20-25 रुपए के खाने के सौ से ले कर 1 हजार रुपए तक अदा करते हैं.

भोपाल के नजदीक सीहोर के  एक अग्रणी युवा किसान हर साल 2 क्ंिवटल गेहूं और 1 क्ंिवटल अरहर की दाल अमरनाथ के लंगर के लिए एक स्थानीय समिति को दान में देते हैं. इस किसान का कहना है कि सब भगवान ही तो देता है, अब उस में से ही कुछ हिस्सा धर्म के काम में लगा दिया तो क्या हुआ.

अक्ल के मारे ऐसे किसानों पर तरस ही आता है जो बातबात पर सरकार की हायहाय करने का कोई मौका नहीं चूकते पर तीर्थयात्रा के लंगर के लिए 10 हजार रुपए की उपज दरियादिली से दे देते हैं. इन दानी किसानों को क्या किसान आत्महत्या पर किसी को कोसने का हक है, जिन्होंने कभी अपने ही गांव या शहर के किसी गरीब की मदद नहीं की होगी.

यही काम व्यापारी करते हैं शक्कर, दाल, चावल और किराने के दूसरे सामान ये लोग ऐसे दान करते हैं मानो इन के और इन के पूर्वजों के जहाज चलते रहे हों. इन्हीं व्यापारियों, किसानों और नौकरीपेशा लोगों की दान की मानसिकता के चलते केवल अमरनाथ ही नहीं, बल्कि देशभर में लंगरों का कारोबार खूब फलफूल रहा है.

अब तो बातबात पर लंगर हर कहीं लगने लगे हैं रामनवमी, हनुमान जयंती, जन्माष्टमी, नवदुर्गा तो दूर की बात है, बुद्ध और अंबेडकर जयंती पर भी लंगर, दूसरे तरीकों से ही सही, लगना शुरू हो गए हैं. यहां भी लोग दान करते हैं जो मुफ्तखोरों की जेबों में जाता है.

ज्यों की त्यों क्यों बदहाली

जम्मू के भगवतीनगर इलाके में लगने वाले लंगरों के ठीक नीचे एक झुग्गी बस्ती है जिस की आबादी लगभग 20 हजार है. इस बस्ती में झांक कर देखें तो यहां गंदगी और गरीबी के साक्षात दर्शन हो जाते हैं. ये झुग्गी वाले छोटेमोटे काम करते हैं और बच्चे दिनभर श्रद्धालुओं की फेंकी पानी की बोतलें और पौलिथीन बीनते रहते हैं.

इन दरिद्रनारायणों को लंगर में जा कर खाना खाने की इजाजत नहीं है. अगर कोई बच्चा या बड़ा कोशिश भी करे तो उसे लंगर के कार्यकर्ता दुत्कार कर भगा देते हैं. ये वही धार्मिक लोग हैं जो यह प्रचार करते हैं कि भगवान की नजर में सब बराबर हैं.

यह बराबरी हर तीर्थस्थल में देखी जा सकती है. पुरी के जगन्नाथ मंदिर के बाहर लूलेलंगडे़ भिखारियों की फौज खड़ी रहती है. मंदिर परिसर में प्रसाद यानी भोग की इफरात से दुकानें लगी रहती हैं. इसे दुनिया की सब से बड़ी फूड मार्केट कहा जाता है. जहां थोड़े से चावल खाने के एवज में भक्त हजारों रुपए दान में दे आते हैं.

भिखारी क्यों हैं, यह सवाल एक अलग बहस का विषय है. पर भिखारियों के हुजूम तीर्थ और धार्मिक स्थलों पर ही क्यों ज्यादा नजर आते हैं, इस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं. दरअसल, यहां भिखारियों को जानबूझ कर जगह दी जाती है जिस से लोग उन्हें देख सबक ले लें कि वे अगर धर्म और दान नहीं करेंगे तो अगली बार या इसी जन्म में वे भी इसी जगह, इसी भीड़ में कहीं खड़े नजर आएंगे.

अगर धर्म खुशहाली लाता होता तो किसी को भीख मांगने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी, इस सवाल का जवाब धर्म के कारोबारियों के पास सालों और सदियों पुराना है कि ये भिखारी अपने पिछले जन्मों के पापों की सजा भुगत रहे हैं, ये नास्तिक और अनीश्वरवादी थे. इसलिए इस हालत से बचने के लिए धर्म और दान करते रहो.

कभी कोई यह नहीं सोचता कि अगर दान देना बंद हो जाए तो भगवान के मंदिरों में दुकानें चला रही पंडों की फौज जरूर इसी भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाएगी जो दानदक्षिणा के दम पर पूरी, हलवा, खीर पीढि़यों से सूत रही है.

अमरनाथ की गुफा तक सहूलियत से हैलीकौप्टर के जरिए जाने वाले यात्री 8 हजार रुपए हवा में उड़ा देते हैं और इस से 5 गुना ज्यादा लंगरों, जम्मू के वैष्णो देवी और रघुनाथ मंदिर में दान में दे आते हैं.

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

एक वक्त में अमरनाथ जैसे दुर्गम तीर्थस्थलों पर केवल पुरुष ही जाते थे, लेकिन अब अमरनाथ जाने वाले जत्थों में महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है. महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा धर्मभीरू होती हैं, महज इसलिए ही उन की भागीदारी तीर्थयात्रा में नहीं बढ़ रही, बल्कि सच यह है कि उन की पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक परेशानियां पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं, इसलिए वे भी बढ़चढ़ कर तीर्थयात्राएं करने लगी हैं. शिर्डी और तिरुपति में तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा दिखती हैं.

अमरनाथ का माहात्म्य सुन अब महिलाओं को अपनी परेशानियां का हल बर्फानी बाबा में भी दिखने लगा है, तो बात कतई हैरत की नहीं. भोपाल की एक प्रोफैसर 2 साल पहले अमरनाथ एक जत्थे के साथ गई थीं. उन का मकसद था राह भटक चुकी बेटी रास्ते पर आ जाए, यह प्रार्थना करना या मन्नत मांगना.

आज 2 वर्षों बाद भी बेटी हरकतों से बाज नहीं आ रही, तो उन का भरोसा भगवानों से ही उठने लगा है. वे बताती हैं कि बेटी की आजादखयाली के चलते कोई ढंग का लड़का उस से शादी करने को तैयार नहीं. अब तो नौबत यहां तक आ गई है कि बेटी बेशर्मी से कहने लगी है कि जब सारी जरूरतें बगैर शादी के ही पूरी हो जाती हैं तो शादी क्यों करूं.

ये प्रोफैसर केवल अमरनाथ ही नहीं, बल्कि कई तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुकी हैं पर समस्या हल नहीं हो रही. बेटी को रास्ते पर लाने के टोनेटोटके और तंत्रमंत्र तक, अनिच्छापूर्वक ही सही, वे कर चुकी हैं.

कोई भारतीय महिला विधवा नहीं होना चाहती. वे केवल सधवा रहने के लिए भी तीर्थयात्राएं करने लगी हैं. जाहिर है विधवा जीवन की दुश्वारियों का एहसास उन्हें है और सामाजिक असुरक्षा सिर चढ़ कर बोलती है. इसलिए वे पति की दीर्घायु के लिए मन्नतें मांगने चारों दिशाओं में घूमने लगी हैं बावजूद यह जाननेसमझने के कि, कोई भगवान या देवीदेवता इस की गारंटी नहीं देता.

तीर्थयात्रा के कारोबारी भी महिलाओं को प्राथमिकता में लेने लगे हैं और लेडीज के लिए अलग से व्यवस्था का प्रचार करते नजर आते हैं. तो इस की अहम वजह महिलाओं की दानप्रवृत्ति या उदार होना है. जो महिलाएं अपने दरवाजे पर आए साधु को खाली हाथ जाने देना भी अधर्म समझती हों, वे तीर्थस्थलों पर जा कर कितनी दरियादिली से पैसा लुटाती होंगी, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

हैरत की बात अब खुद महिलाओं का तीर्थयात्रा के कारोबार में शामिल हो जाना है. मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर की एक भाजपा नेत्री का तो यह फुलटाइम कारोबार बन गया है. उन के संपर्क ईश्वर की तरह व्यापक हैं, इसलिए साल में 4 बार वे बस में लोगों को भर कर तीर्थयात्रा कराती हैं.

हालत यह है कि एक तीर्थ करवा कर आती हैं और हिसाबकिताब कर दूसरे की तैयारी शुरू कर देती हैं. जबलपुर के ग्वारी घाट में रोज नर्मदा आरती में शामिल होने वाली इस नेत्री ने पुण्य के इस कारोबार से खासी जायदाद बना ली है और लोकप्रियता भी हासिल कर ली है. अब वे वार्ड मैंबरी के चुनाव की तैयारी कर रही हैं. चूंकि महिला हैं, इसलिए महिलाओं के अलावा पुरुषों का भी सहज विश्वास उन्हें मिला हुआ है कि वे कोई बेईमानी या हेराफेरी दूसरे तीर्थ कारोबारियों की तरह नहीं करेंगी.

महिलाएं व तीर्थयात्रा

इस साल ये नेत्री अमरनाथ जत्था ले कर जा रही हैं. पूछने पर वे बातती हैं कि औरतों में आस्था (धर्मभीरुता नहीं) ज्यादा होती है. ईश्वर उन की गुहार सुनता भी जल्दी है, इसलिए वे अब बढ़चढ़ कर सिद्ध और तीर्थस्थलों की यात्रा करने लगी हैं.

तीर्थयात्रा के मामले में महिलाओं से कोई धार्मिक भेदभाव नहीं होता है तो जाहिर है कारोबारियों को ग्राहक और पैसा चाहिए और उस के लिए कोई शर्त वे नहीं थोपते. धर्म में सुकून ढूंढ़ती महिलाओं की संख्या 90 फीसदी के लगभग आंकी जाती हैं जो तीर्थस्थलों पर शौपिंग भी खूब करती हैं.

जम्मू के रघुनाथ मंदिर परिसर के अंदर लगी कपड़ों की सरकारी दुकान की एक सेल्सगर्ल की मानें तो, ‘‘औरतें खूब बढ़चढ़ कर साडि़यां और सूट खरीदती हैं हालांकि हम से मोलभाव करती हैं पर पंडों से नहीं कर पातीं जो तरहतरह की मनोकामनाओं के लिए मंत्र फूंकते दक्षिणा वसूलते हैं.’’

असमंजस भी कम नहीं

ऐसा भी नहीं है कि लोग अब तीर्थयात्रा का फल नहीं मिलने पर संतुष्ट हो जाते हों या तीर्थयात्रा के दौरान खर्च किए पैसे के मुताबिक सुविधाएं न मिलने पर किलपते न हों.

भोपाल के एक इंजीनियर भी पिछले साल अमरनाथ गए थे पर उन की हिम्मत जम्मू से आगे जाने की नहीं हुई, इसलिए जिस जत्थे के साथ गए थे उसे उन्होंने जाने दिया और खुद जम्मू के एक होटल में पड़े रहे. इस इंजीनियर का कहना है कि घाटी के हालात देख मैं अपनी जान और सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं था. रास्ते में कभी भी बर्फ जम जाती है या हिंसा होने लगती है, इसलिए मुझे बेहतर लगा कि मैं वहां न जाऊं जहां सुरक्षा भगवान भी नहीं कर पाते.

कुछ तीर्थयात्रियों के असमंजस सहज हैं और बरकरार हैं जो खर्च किए गए पैसे को निवेश मानते हैं पर गारंटेड रिटर्न नहीं मिलता तो तर्क करने लगे हैं. लेकिन सुधर नहीं रहे तो यह उस जाल की देन है जो सदियों से लोगों के दिलोदिमाग पर बुना जा रहा है.

क्या तीर्थयात्रा से मन्नतें पूरी हो जाती हैं, इस सवाल के जवाब में एक युवती निधि दुबे दोटूक कहती है कि नहीं होतीं. निधि मैडिकल कालेज में दाखिला चाहती थी और इस बाबत वह शिर्डी, तिरुपति और वैष्णोदेवी तक जा चुकी थी पर लगातार 3 साल तक प्रीमैडिकल टैस्ट देने के बाद भी चयन नहीं हुआ तो उसे तीर्थयात्रा की दुकानदारी समझ आने लगी है.

बात सिर्फ असमंजस या अधकचरी दलीलों की भी नहीं है, बल्कि उन अव्यवस्थाओं और परेशानियों को भोगने की भी है जिन का सामना तीर्थयात्रा के दौरान लोगों को होता है. बनारस, पुरी, इलाहाबाद, मथुरा या गया के पंडों की लूटपाट कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही. इन और दूसरे तीर्थस्थलों की गंदगी देख भी भक्तों का मन वितृष्णा से भरने लगता है.

अमरनाथ जाने वाले श्रद्धालु पूरे रास्ते सहमे रहते हैं कि जाने कब, क्या अनहोनी हो जाए यानी आस्था की जगह आशंका लेने लगी है जो जयभोले, और हरहर महादेव का मंत्र रटते रहने और जयकारा करते रहने से दूर नहीं हो जाती. हां, अस्थायी रूप से दब जरूर जाती है.

पिछले साल उज्जैन में हुए सिंहस्थ कुंभ के मेले में पसरी गंदगी देख भक्ति का भाव छू होने लगा था तो इस में गलती श्रद्धालुओं ही होती थी. जो दलालों के जरिए भगवान के बुलावे पर दौड़ तो जाते हैं लेकिन परेशानियों से समझौता नहीं कर पाते. हर तरफ भीड़ है, धक्कामुक्की है, भेदभाव है, लूटपाट है. नहीं है तो मन्नत पूरी होने की गारंटी जिस के लिए लोग पैसे लुटाते हैं.

छोटे नोटों की कमी के चक्कर में

मैं ने घड़ी में समय देखा. उस समय सवा 8 बज रहे थे. 9 बजे की ट्रेन थी.

मैं ने एकदम बैग उठाया और घर से बाहर निकल पड़ा. सड़क पर पहुंचते ही मैं ने एक रिकशे वाले को स्टेशन चलने को कहा. वह 10 रुपए मांग रहा था, लेकिन मैं ने

8 रुपए में तय कर लिया. स्टेशन पहुंचते ही मैं रिकशे से उतरा. मैं ने रिकशे वाले को 10 रुपए का नोट दिया.

‘‘बाबूजी, मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं हैं…’’ रिकशे वाला बोला, ‘‘आप 8 रुपए खुले दे दीजिए.’’

‘‘मैं खुले 8 रुपए कहां से लाऊंगा? कमाल है यार, तेरे पास 2 रुपए भी नहीं हैं, तो मेरे पास 8 कहां से आएंगे?’’

‘‘इस में कमाल की क्या बात है बाबूजी? आजकल छुट्टे पैसे कहां मिल रहे हैं. आप 10 का नोट छुट्टा करवा लो… 2 रुपए का गुटका वगैरह ले लो.’’

‘‘मैं यह सब नहीं खाता… तुम ही ले लो कुछ…’’

‘‘बाबूजी, मुझे कुछ नहीं चाहिए. मुझे तो 8 रुपए दे दो.’’

‘‘ठहर जरा, मैं कोशिश करता हूं,’’ मैं ने कहा और एक परचून वाले की दुकान पर पहुंच कर बोला, ‘‘भाई साहब, 10 रुपए के छुट्टे हैं?’’

दुकानदार ने मेरी तरफ इस तरह घूर कर देखा मानो मैं ने उस से गलत बात कह दी हो. वह बोला, ‘‘आप कहीं बाहर से आए हैं?’’

‘‘नहीं भाई साहब, मैं तो यहीं रहता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘अच्छा. मैं ने समझा कि आप इंगलैंड या अमेरिका से आए हैं, तभी तो आप को मालूम नहीं है.’’

‘‘क्या मालूम नहीं है?’’ मैं ने दुकानदार की ओर गौर से देखते हुए पूछा.

‘‘यही कि इस देश में छोटे नोटों की कितनी जबरदस्त कमी हो रही है.’’

‘‘वह तो मुझे भी मालूम है.’’

‘‘मालूम है, तो फिर मुझे क्या बेवकूफ समझा है? आजकल कहां हैं छोटे नोट?’’

‘‘चलो भाई साहब, 2 रुपए की टौफी दे दो. मुझे रिकशे वाले को 8 रुपए देने हैं,’’ मैं ने अपनी मजबूरी बताई.

दुकानदार ने बुरा सा मुंह बना कर मेरे हाथ से नोट झपटा और 2 रुपए की 2 टौफियां देते हुए गल्ले में से 5, 2 व एक रुपए के ऐसे नोट निकाल कर मेरे हाथ पर रखे कि मैं उन नोटों की तरफ देखता रह गया.

तीनों नोट इतने खस्ता हाल, पुराने व चिप्पी वाले थे कि लग रहा था मानो किसी मुरदे की जान खतरे में हो. मैं ने उन नोटों को उलटपलट कर देखा और कहा, ‘‘भाई साहब, ये नोट तो बिलकुल बेकार हैं. इन में तो जरा भी जान नहीं है.’’

‘‘अगर आप के पास इन से भी खराब हों तो दे जाना, सब चल जाएंगे. आजकल 1, 2 व 5 के नोट देखता ही कौन है?’’

‘‘ये बदल दो…’’ मैं ने कहा, ‘‘रिकशे वाला इन्हें नहीं लेगा.’’

‘‘अभी 10 बजे बैंक खुलेगा. आप के लिए नए नोट ले कर आऊंगा. यहां तो ऐसे भी नहीं मिल रहे हैं. इन को नए दो…’’ बड़बड़ाते हुए दुकानदार ने 10 रुपए का नोट वापस कर दिया. मेरे पास रिकशे वाले को 10 रुपए का नोट देने के अलावा और कोई चारा न था. जब मैं ने 10 रुपए का नोट रिकशे वाले को दिया, तो उस की आंखों में जीत की मुसकान थी, मानो वह कह रहा हो, ‘बाबूजी, बहुत सयाने बन रहे थे. 2 रुपए बचा रहे थे. बचा लिए 2 रुपए?’

मैं तेजी से टिकट खिड़की की ओर बढ़ा. वहां पर लंबी लाइन लगी हुई थी. 15 मिनट के बाद मेरा नंबर आया. तभी गाड़ी के आने का ऐलान होने लगा.

‘‘एक टिकट, नई दिल्ली का,’’ मैं ने सौ रुपए का नोट देते हुए कहा.

‘‘3 रुपए खुले देना,’’ टिकट बाबू बोला.

‘‘खुले तो नहीं हैं…’’

‘‘घर से खुले ले कर चला करो.’’

‘‘चला करूंगा, पर अभी तो टिकट व बाकी पैसे दे दो…’’

‘‘होते तो दे न देता.’’

मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए.

‘‘जल्दी बोलो…’’ टिकट बाबू ने कहा और सौ रुपए का नोट मेरे हाथ में वापस थमा दिया.

मैं ने कहा, ‘‘आप के पास जितने टूटे हैं, उतने ही दे दो.’’

टिकट बाबू ने मुझे टिकट व 30 रुपए दे दिए यानी छुट्टे के चक्कर में 7 रुपए हजम. पर यह सब सोचने व देखने का समय किस के पास था. ट्रेन बिलकुल सही समय पर प्लेटफार्म पर पहुंच गई. मैं एक डब्बे में घुस कर एक सीट पर बैठ गया. मेरी इच्छा चाय पीने की हुई, तो मैं ने एक चाय वाले से कहा, ‘‘एक चाय दे देना.’’

‘‘बाबूजी, 7 रुपए खुले देना.’’

‘‘मेरे पास तो 10 रुपए का नोट है. खुले होते तो वही देता.’’

‘‘मेरे पास भी खुले नहीं हैं.’’

‘‘तुम्हें खुले पैसे रखने चाहिए.’’

‘‘जितने थे खत्म हो गए. सभी 10, 20 या 50 का नोट देते हैं.’’

‘‘जब लोगों के पास नहीं हैं, तो कहां से देंगे?’’ मैं ने कहा, पर मेरी बात को अनसुना कर के चाय वाला ‘चाय गरम… चाय गरम’ कहता हुआ आगे बढ़ गया.

मैं मन मसोस कर रह गया कि क्या जमाना आ गया है. आजकल नोटों का अकाल सा पड़ गया है देश में. जहां भी जाओ, खुले रुपए दो. तभी मेरे बगल में बैठे एक आदमी ने कहा, ‘‘आजकल छोटे नोटों की इतनी कमी चल रही है कि जनता बहुत परेशान है. सरकार के मंत्री कहते हैं कि देश में छोटे नोटों की जरूरत नहीं है, तभी तो छोटे नोट छापने बंद कर दिए हैं.’’

सामने बैठे एक सरदारजी बोल उठे, ‘‘नेताओं को नोट की नहीं, वोट की फिक्र है. देश में चाहें नोट भले ही कितने भी कम हो जाएं, पर उन के वोट न कम हों.’’

एक मोटा आदमी कहने लगा, ‘‘भाई साहब, इन नेताओं और मंत्रियों को बाजार से सामान तो खरीदना नहीं है. इन्हें क्या पता कि जनता छोटे नोटों की इस कमी को किस तरह झेल रही है.’ मैं भी बोल उठा, ‘‘जनता तो परेशान है छोटे नोटों की कमी से और सरकार छाप रही है 5 सौ व 2 हजार रुपए के नोट. बस थोड़े से सिक्के बनवा कर सरकार ने ऊंट के मुंह में जीरा डाल दिया है.’’

‘‘हमारे ये नेता अपने खर्चे तो घटा नहीं सकते, बस जनता को परेशान करने में लगे रहते हैं. ऐसी बात नहीं है कि इन मंत्रियों को इस समस्या का पता न हो. पर ये तो अपनी कुरसी बचाने के चक्कर में लगे रहते हैं और जनता परेशान होती रहती है,’’ मेरे पास बैठा आदमी बोला.

‘‘पता नहीं इस देश का क्या होगा? देश को सरकार थोड़े ही चला रही है. यह तो अपनेआप चल रहा है जैसेतैसे,’’ मैं ने कहा.

तभी एक भिखारी उधर से निकला, ‘‘मिलेगा बाबा कुछ… इस गरीब की मदद करो.’’

उस भिखारी ने जैसे ही मेरे सामने हाथ फैलाया, तो मैं ने कहा, ‘‘टूटे पैसे नहीं हैं.’’

‘‘लाओ बाबूजी, मैं तुड़ा देता हूं.’’

‘‘ठीक है, एक रुपया काट लेना…’’ कहते हुए मैं ने 10 का नोट भिखारी को दे दिया.

‘‘एक रुपया नहीं बाबूजी, एक रुपए का आता ही क्या है आजकल…’’ ‘‘तो क्या 10 रुपए का ही नोट रखना चाहता है?’’

‘‘बाबूजी, 2 रुपए तो दे दो…’’ कहते हुए उस ने जेब में हाथ डाला और 8 रुपए मेरी हथेली पर रख दिए.

मैं उस की ओर देखता रह गया कि यह भी छोटे नोटों की कमी का भरपूर फायदा उठा रहा है. इस से पहले कि मैं कुछ कहता, वह आगे बढ़ कर अपने धंधे में लग चुका था. नई दिल्ली पहुंचने तक ट्रेन में व स्टेशन पर मुझे जो नहीं खाना था, वह भी खरीदना या खाना पड़ा, छोटे नोटों की कमी के चक्कर में.

नई दिल्ली स्टेशन पर टे्रन रुकी. स्टेशन से बाहर निकल कर मैं ने एक थ्रीव्हीलर किया और मोती नगर चलने को कहा. वहां एक दफ्तर में मुझे कुछ काम था. मोती नगर पहुंचते ही मैं ने ड्राइवर से पूछा, ‘‘कितने पैसे बने?’’

ड्राइवर ने मीटर देखा और किराया सूची का एक कागज निकाला. हिसाब लगा कर कहा, ‘‘66 रुपए साहब.’’

मैं ने सौ का नोट उसे दे दिया.

उस ने 30 रुपए वापस देते हुए कहा, ‘‘साहब, 6 रुपए खुले देना.’’

‘‘मेरे पास नहीं हैं.’’

‘‘मेरे पास भी नहीं हैं, साहबजी…’’ वह बोला, ‘‘आप तुड़ा कर दे दो.’’

मैं जानता था कि कहीं खुले नहीं मिलेंगे, तो कुढ़ कर रह गया और चुपचाप 30 रुपए जेब में रख कर आगे बढ़ गया. मैं 2 दिन नई दिल्ली में रहा. इन 2 दिनों में छोटे नोटों की कमी मैं ने कैसे झेली, बस मुझे ही मालूम है. दुकानदारों ने तो अपनी दुकानों पर ‘कृपया खुले पैसे दीजिए’ लिख कर अपनी सिरदर्दी कम कर के हम ग्राहकों की परेशानी बढ़ा दी है. इन छोटे नोटों की कमी के चक्कर में दुकानदार खुले रुपए ग्राहक से झपटता है और ग्राहक दुकानदार से. जैसा मौका जिस को लगता है, वही झपट लेता है.

2 दिनों के बाद जब मैं लौट के बुद्धू की तरह वापस घर आया, तो मैं ने हिसाब लगाया कि इन छोटे नोटों की कमी के चक्कर में मेरे करीब सौ रुपए बरबाद हो गए. क्योंकि मैं इतने रुपए यों ही लोगों के पास छोड़ चुका था. अब मैं ने पक्का इरादा कर लिया है कि आइंदा जब भी मैं बाहर जाऊंगा, तो छोटे नोट व सिक्के जरूर ले कर जाऊंगा, ताकि फिर कभी इस तरह की सैकड़ों रुपए की चपत न लगे.

मैं सोच रहा था कि जो सरकार छोटे नोटों व सिक्कों का इंतजाम नहीं कर सकती, क्या वह गरीबी दूर कर सकती है या दुश्मन से लड़ाई में जीत सकती है?

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