बिहार के वैशाली जिले के विशुन रौय इंटर कालेज की रूबी राय के पिछले वर्ष 89 परसैंट नंबर लाने पर जो भंडाफोड़ हुआ था, उस का नतीजा है कि इस साल बिहार बोर्ड ने सही कदम सख्ती से उठाए और पास होने वाले 12.40 लाख में से सिर्फ 5 लाख रह गए. अब बिहार में परीक्षाएं मखौल बन गई हैं. वहां नकल, पेपर लीक होना, आंसर शीटों को बदलना और आखिरी सूची में नंबर बढ़वाना लाखों रुपयों में नहीं, बल्कि सैकड़ों में ही हो जाता है, क्योंकि नंबर बढ़वाने में इतने ज्यादा लोग लगे रहते हैं कि थोड़ेथोड़े भी दें, तो बहुत जमा हो जाते हैं.

आमतौर पर इस के लिए दोष छात्रों पर मढ़ा जाता है कि वे नकल करते हैं. असल में गुनाहगार वे पढ़ाने वाले हैं जो सरकार से वेतन पूरा लेते हैं, पर पढ़ाने के नाम पर जीरो हैं. माना कि बिहार के गांवकसबों में पढ़ने की इच्छा कम है, पर वह कम इसलिए है कि जाति की ऊंचनीच, गुंडागर्दी, बेईमानी, पाखंड, निकम्मापन, निठल्लापन बिहार की रगरग में भरा है. वही बिहारी जो बाहर जा कर हजारों कमाता है, बिहार के घुटन से भरे भ्रष्ट माहौल में न काम करना चाहता है, न पढ़नालिखना.

बिहार बोर्ड ने सख्ती कर के अच्छा किया है, पर यह सख्ती केवल छात्र ही क्यों सहें? हर फेल छात्र पर उस के मास्टरों पर 5 सौ रुपए से एक हजार रुपए का फाइन लगना चाहिए. वे मजे में पूरा वेतन लेते रहें और 12वीं की सीधीसादी पढ़ाई भी न करा सकें, तो उन का क्या फायदा?

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