मिलिये भोजपुरी फिल्मों की सनी लियोनी से

सनी लियोनी की तरह दिखने वाली भोजपुरी एक्ट्रेस पल्लवी सिंह ने उनके ऑनर में न सिर्फ अपना नाम बदलकर सनी रख लिया, बल्कि उनकी हर एक अदा को भी कॉपी करती हैं. भोजपुरी फिल्मों में पल्लवी उर्फ सनी की पॉपुलैरिटी का आलम ये है कि अब लोग उन्हें उनके रियल नाम नहीं बल्कि सनी सिंह कहकर ही बुलाते हैं. बता दें कि पल्लवी ने हाल ही में फ्रेंड्स के साथ अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया था.

भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली एक्ट्रेस पल्लवी सिंह को उनके फ्रेंड हमेशा ही कहते थे कि उनका फेस काफी हद तक सनी लियोनी से मिलता-जुलता है. इतना ही नहीं पल्लवी का फिगर भी सनी लियोनी जैसा ही है. सनी के मुताबिक, जब मैंने फिल्मों में काम करने का फैसला किया तो मेरे पेरेंट्स बोले- फिल्म में काम करने की जगह कोई नौकरी कर लो. हालांकि मेरी जिद के बाद दोनों झुक गए और बोले ठीक है काम करो, लेकिन जरा संभलकर रहना.

पल्लवी के मुताबिक, 2012 में उन्होंने पहली बार सनी लियोनी को टीवी पर देखा तो हैरान रह गईं कि सनी का चेहरा तो हू-ब-हू उनसे मिलता है. इसके बाद पल्लवी सनी लियोनी को रोल मॉडल मानने लगीं.

पल्लवी उर्फ सनी सिंह ने भोजपुरी फिल्म ‘लेके आजा बैंड बाजा ए पवन राजा’ में एक्टर पवन सिंह की साली का रोल प्ले किया था. फिल्म में उन्होंने अपने भाई यानी हीरो और हीरोइन को करीब लाने का काम किया था. फिल्म ‘भोजपुरिया राजा’ में पल्ल्वी को सेकेंड लीड रोल मिला.

पल्लवी का मानना है कि, स्टोरी के मुताबिक फिल्मों में आइटम डांस भी करना पड़ता है. इसके लिए कहानी की डिमांड के मुताबिक वो काम करती हैं. बता दें कि पल्लवी फिल्म ‘विधायक जी’ और उड़िया फिल्म ‘टाइगर’ में भी आइटम डांस कर चुकी हैं.

सनी उर्फ पल्लवी के मुताबिक, वो फिल्मों में काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं. फिलहाल वो बीकॉम फाइनल ईयर में हैं. पढ़ाई के दौरान ही फ्रेंड्स कहते थे कि लुक अच्छा है तुम्हें फिल्मों में कोशिश करनी चाहिए. इसके बाद मैंने ट्रॉय किया तो काम मिल गया और इस तरह मैं फिल्मों में आ गई.

पल्लवी सिंह कुछ पर्सनल कारणों के चलते करीब 1 साल तक फिल्मों से दूर रहीं. हालांकि बाद में उन्होंने वापसी की. पल्लवी सिंह जल्द ही ‘बाली उमरिया में हो गई प्यार’ और ‘तीन बुड़बक’ जैसी फिल्मों में नजर आएंगी.

कोकब कादरी ने की राहुल गांधी से मुलाकात

बिहार प्रदेश कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष कोकब कादरी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की. मुलाकात के दौरान प्रदेश में संगठन और राजनीतिक स्थिति पर चर्चा हुई. बैठक के बाद पार्टी महासचिव सी. पी. जोशी ने कहा कि यह एक शिष्टाचार मुलाकात थी. प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर भी चर्चा हुई है.

बिहार कांग्रेस में बगावत की अटकलों के बीच पार्टी ने करीब एक सप्ताह पहले अशोक चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया था. अशोक चौधरी को पद से हटाते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने कोकब कादरी को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया था. हालांकि, अशोक चौधरी को हटाए जाने के बावजूद भी पार्टी में गुटबाजी बरकरार है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि कोकब कादरी जल्द सभी विधायकों और एमएलसी की बैठक बुला सकते हैं.

दरअसल, कोकब कादरी ने जिस दिन अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी, उस दिन अधिकतर विधायक गैरहाजिर रहे थे. पार्टी नेतृत्व ने इसे गंभीरता से लिया है. इसलिए, एक बार फिर बैठक बुलाई जा सकती है. कांग्रेस रणनीतिकार मानते हैं कि पार्टी में आंतरिक संगठन चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने पर बिहार कांग्रेस के पूर्णकालिक अध्यक्ष की घोषणा कर दी जाएगी.

पार्टी में संगठन चुनाव में प्रदेश कांग्रेस सदस्यों के चयन की प्रक्रिया अंतिम दौर में है. ऐसे में माना जा रहा है कि दीपावली के आस-पास नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर दिया जाएगा.

अमेठी दौरा आज से

कांग्रेस उपाध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र के तीन दिवसीय दौरे पर बुधवार को अमेठी पहुंचेंगे. पहले दिन वे जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र के कठौरा गांव में चौपाल में शामिल होंगे. शाम को मुंशीगंज अतिथि गृह पहुंचेंगे. यहीं पर रात्रि विश्रम करेंगे. पांच अक्तूबर को सुबह 9.30 बजे से 11.30 बजे तक राहुल गांधी अतिथि गृह में जनता दर्शन कार्यक्रम में आम लोगों से समस्यायें सुनेंगे. 2 बजे गौरीगंज होते हुए तिलोई के पाकरगांव स्थित राजीव गांधी कालेज पहुंचेंगे. फिर सलोन में विधानसभा संवाद कार्यक्रम में शामिल होंगे. शाम 6 बजे राहुल गांधी भोएमऊ अतिथि गृह में रात्रि विश्रम करेंगे. छह अक्टूबर को जनता दर्शन व कार्यकर्ता सम्मेलन में शामिल होंगे.

नफरत की आंधी के बीच प्रेम के दीए

देश में जब चारों तरफ नफरत और हिंसा की आंधी चल रही हो, इस के बीच कहींकहीं प्रेम के टिमटिमाते दीए मन को खुश होने का एहसास देते हैं. ज्यादातर अखबार आजकल रिश्तों में फैल रही कड़वाहट के चलते होने वाले झगड़ों, हिंसा की खबरों से भरे रहते हैं. देखिए, रिश्तों में अपराध की कैसीकैसी अजीबो गरीब खबरें सुर्खियों में हैं.

नोएडा, उत्तर प्रदेश में औरत द्वारा औरत की घर में घुस कर गोली मार कर हत्या. वह औरत पति को छोड़ कर दूसरे मर्द के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थी.

अमेरिका में रह रहे बेटे को मुंबई पहुंचने पर फ्लैट में मां का कंकाल मिला. इंजीनियर बेटे की मां से एक साल पहले टैलीफोन पर बात हुई थी.

साइड न देने पर कार सवार नौजवान की लाठी डंडों से पीट पीट कर हत्या. खाना लगाने में देरी पर होटल मालिक और बेटे की ग्राहकों ने गोली मार कर जान ले ली.

खून की कमी के कारण पत्नी द्वारा फल मांगे जाने पर हुए झगड़े में पति ने पत्नी को मार डाला. रोहिणी में दोस्ती का प्रस्ताव ठुकराने पर युवक द्वारा सहपाठी युवती की गला दबा कर हत्या. बड़े भाई द्वारा छोटे भाई की हत्या. शराब के पैसे न देने पर बेटे द्वारा मां की हत्या. पिता द्वारा बेटे की हत्या. पत्नी द्वारा पति का कत्ल. पति द्वारा पत्नी की जान लेना जैसी वारदातें किसी भी इनसान को झकझोर सकती हैं.

ऐसी ही खबरों के बीच झारखंड के जशपुर में 75 साला रतिया राम और

70 साला जिमनी बरी के बीच पनपे प्यार और शादी व मणिपुर की नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला और उन के ब्रिटिश प्रेमी डैसमंड कोटिंहो के विवाह बंधन में बंधने की खबरें ठंडी बयार के समान हैं. इन दोनों जोड़ों की खबरें अखबारों, टैलीविज चैनलों पर फोटो और वीडियो समेत दिखाई जा रही हैं. इन्हें लोग ताज्जुब से देख रहे हैं. सचमुच यह प्रेम चारों ओर फैली नफरत के बीच हैरानी की ही बात है.

जशपुर के झग्गरपुर गांव के रहने वाले रतिया राम की पत्नी की 20 साल पहले मौत हो गई थी. उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी हो गई.

कुछ महीने पहले रतिया राम अपनी बेटी के गांव झिक्की गए, वहीं उन की मुलाकात जिमनी बरी से हुई. वे भी अकेली रह रही थीं. उन के कोई औलाद नहीं थी. उन के पति की भी 20 साल पहले मौत हो गई थी. फिर कोई सहारा नहीं रहा. कोई जमीन जायदाद भी नहीं थी. दोनों ने मुलाकात के बाद एकदूसरे का दुखदर्द सुना, तो उन की हमदर्दी दोस्ती में बदल गई.

एक महीने तक चला यह रिश्ता प्यार में बदल गया. दोनों ने एक दूसरे का अकेलापन दूर करने का फैसला लिया. दोनों को सामाजिक बंदिशों का भी ख्याल आया, पर उन्होंने समाज का सामना करने की हिम्मत जुटाई.

वे दोनों एक हफ्ते तक एक ही घर में रहे. बाद में बगडोल पंचायत के सरपंच के पास पहुंचे और अपना फैसला बता कर मदद मांगी.

पंचायत समेत समूचे गांव ने मिल कर इस बुजुर्ग जोड़े की धूमधाम से शादी करा दी. उन्हें कई तोहफे दिए गए. शादी के जोड़े में दोनों बुजुर्गों के मुसकराते चेहरे देख कर हर किसी को अलग तरह की खुशी मिल रही थी.

दूसरी घटना इरोम शर्मिला की है, जो अपने ब्रिटिश प्रेमी डैसमंड कोटिंहो के साथ 17 अगस्त, 2017 को विवाह बंधन में बंध गईं. दोनों ने सब रजिस्ट्रार दफ्तर पहुंच कर एक दूसरे को माला पहनाई और एकदूसरे के हो गए.

यह अंतर्धार्मिक विवाह था, इसलिए उन्होंने स्पैशल मैरिज ऐक्ट के तहत अर्जी दी थी.

मणिपुर की इरोम शर्मिला आर्म्ड फोर्सेस स्पैशल पावर ऐक्ट के खिलाफ 16 साल से भूख हड़ताल कर रही थीं. पिछले दिनों मणिपुर में चुनाव हारने के बाद वे तमिलनाडु के कोडईकनाल आ गई थीं. कुछ समय से वे अपने इस दोस्त के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थीं.

इन दिनों प्रेमप्यार की खबरें कम ही आ रही हैं. इस तरह का प्यार निश्छल होता है. जहां लालच, चालाकी, त्याग नहीं, वहां प्रेम नहीं है. इन दोनों जोड़ों के बीच धर्म, जाति की बात कहीं नहीं है. इस के उलट रिश्तों में लालच सब से ऊपर हो गया है. बातबात पर समाज हिंसा पर उतारू दिखता है.

किसी भी सभ्य समाज में क्या कभी ऐसा होता है? लोग वहशी बनते जा रहे हैं. रिश्तों में जरा भी गंभीरता नहीं दिखती. लगता है कि समाज सब्र खो चुका है. बातबात पर लोग घरपरिवार, सार्वजनिक जगहों पर भिड़ जाते हैं, एकदूसरे की जान ले लेते हैं. समाज कहां जा रहा है?

मीडिया में भी सामाजिक और पारिवारिक संबंधों के बिगड़ते माहौल पर कोई बहस नहीं हो रही है. राजनीति और दूसरे गैरजरूरी मुद्दे टैलीविजन चैनलों के लिए ज्यादा अहम हो गए हैं.

समाज को अगर सही दिशा नहीं मिलेगी, तो गिरावट निश्चित है. यह दिशा कौन देगा? धर्म ही समाज में शांति, प्रेम, भाईचारा, अहिंसा, माफी देने का दावा करता है.

देशभर में हजारों धर्मगुरु अच्छी सीख देते सुनाई पड़ रहे हैं, पर वह अच्छाई असल में है कहां? समाज में बेकाबू होते इस गैरइनसानी बरताव की जिम्मेदारी किस की है?

धर्म ‘कलियुग’ कह कर पल्ला झाड़ लेता है. सियासत को समाज में झांकने की फुरसत ही नहीं है. आज की सियासत तो समाज को ही नहीं, बल्कि परिवार को भी बांट कर रखने में विश्वास रखती है. आखिर में यह जिम्मेदारी समाज सुधारकों पर आती है, पर समाज सुधारक भी कहां हैं? नफरत, वहशीपन की यह आग घरघर पहुंच गई है. यह समाजशास्त्रियों, विचारकों के लिए गंभीरता से सोचने का समय है.

सरकारी अनाथालयों में खतरे में हैं अनाथ बच्चे

अनाथालयों की हालत देश में बहुत बुरी है. एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अनाथ बच्चे सरकारी अनाथालयों में ही खतरे में रहते हैं. उन से मारपीट तो होती ही है, उन्हें देशीविदेशी ग्राहकों के सैक्स के लिए भी भेजा जाता है और अनाथालयों के संचालक सरकारी ग्रांट का भी फायदा उठाते हैं और इस तरह की ऊपरी आमदनी का भी.

सरकारी अफसरों की लापरवाही और मिलीभगत के शिकार अनाथालय ही नहीं, बल्कि अनाथ, बेबस, भोले, बेगुनाह बच्चे होते हैं और वे इस तरह अपना बचपन बिताते हैं कि उन के पास अपराधी बनने के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचता. उन्हें बेचा भी जाता है और गोद देने के नाम पर मोटी वसूली भी की जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सारे पहलुओं पर तो नहीं आदेश दिया है. इस मामले में यह भी साफ हुआ है कि सरकारी विभागों का निकम्मापन इतना है कि वे तय की गई ग्रांट भी इस्तेमाल नहीं करते और 2013-14 में 65 करोड़ रुपए खर्च किए बिना रह गए. जहां जितना खर्च हुआ, उस में से कितना बच्चों के लिए गया, कितना जेबों में, यह दूसरी बात है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश दिए हैं, पर यह कहीं नहीं कहा कि अगर इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो कौन सजा पाएगा. सरकारी कानूनों में नागरिक को हर गलती के लिए जुर्माना भरना पड़ता है या फिर लंबी अदालती लड़ाई के बाद छुटकारा मिलता है. कई बार जेल भी हो जाती है.

असल में अनाथ बच्चों के बारे में समाज का रूखा बरताव इस सोच के कारण है कि वे अपने पिछले जन्मों का फल भुगत रहे हैं. पुनर्जन्म में भरोसा रखने वाले भारतीय समझते हैं कि अगर मातापिता नहीं हैं, तो यह बच्चे का दोष है और उसे भुगतना होगा. इस के लिए दूसरों को परेशान होने की क्या जरूरत है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहीं भी इस सोच पर कोई टिप्पणी नहीं की है. अगर इस मूल बात को समझा जाए कि अनाथ बच्चे सरकार और समाज की जिम्मेदारी हैं, क्योंकि उन के मातापिता के न रहने पर वही उन की जगह लेंगे, तो बात दूसरी होती. अब सरकार और समाज एक दया के रूप में टुकड़े अनाथों को फेंकते हैं, जैसे जानवरों को फेंके जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में तरहतरह की कमेटियां तो बनवाई हैं, पर अगर वे कमेटियां वर्षों से कुछ नहीं कर पाईं, तो बच्चे क्या करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट के पास यह मामला एक समाचार के सहारे 2007 में आया था, पर फैसला सुनातेसुनाते 2017 हो गया. बच्चे 10 साल वैसे ही रहे, जैसे 2007 में थे. यह कैसा न्याय है? देश का कानूनी ढांचा भी सरकारी ढांचे की तरह लचर है और समाज तो उस से भी गयागुजरा है. अनाथ बच्चों के लिए लोग अपने सप्ताह के 2 घंटे भी लगाने को तैयार नहीं होते. अनाथालयों में अगर सेवा करने वाले युवा ही मिल जाएं, तो उन का कायापलट हो जाए. फेसबुक और ह्वाट्सअप पर घंटों लगाने वाले कुछ घंटों से बहुतकुछ कर सकते हैं, पर यहां तो डारडार पर निकम्मापन है, भाग्य है.

वह नादान नहीं थी : कैसी लत का शिकार हुई वो

रात के 10 बजे राजेंद्र सिंह ने कमबाइन मशीन खेतों के बाहर बने कमरे के पास खड़ी की और ट्यूबवैल की मोटर चला कर नहाने लगा. नहा कर उस ने खाना खाया और सोने के लिए चारपाई पर लेट गया, क्योंकि उसे सुबह जल्दी उठना था.

दिन भर कमबाइन मशीन चलातेचलाते बलजिंदर इतना थक जाता था कि चारपाई पर लेटते ही उसे नींद आ जाती थी. अभी उस ने आंखें मूंदी ही थीं कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. अलसाई आंखें खोल कर उस ने मोबाइल स्क्रीन को देखा.

रात के ठीक 11 बजे थे. उस ने फोन रिसीव कर के कान से लगाया तो दूसरी ओर से उस के छोटे भाई की पत्नी सोमपाल कौर की घबराई हुई आवाज उभरी. उस ने कहा, ‘‘सत्तश्री अकाल वीरजी, क्या अभि के पापा आप के पास हैं?’’

‘‘नहीं तो. क्यों क्या बात है?’’ राजेंद्र ने चिंतित स्वर में पूछा तो सोमपाल कौर ने कहा, ‘‘बलजिंदर काम से नहीं लौटे हैं, मुझे चिंता हो रही है.’’

राजेंद्र ने सोमपाल कौर की बात सुन कर उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. वह किसी यारदोस्त के पास बैठ गया होगा, थोड़ी देर में आ जाएगा.’’

‘‘लेकिन उन का फोन…’’

‘‘मैं ने कहा न, तुम सो जाओ. मैं सुबह घर आ कर देख लूंगा. चिंता की कोई बात नहीं है.’’ कह कर राजेंद्र ने फोन काट दिया. यह रात 11 बजे की बात थी.

जिला श्रीमुक्तसर साहिब के थाना सदर मटौल का एक गांव है खुन्नण कलां. इसी गांव के रहने वाले गुरमेज सिंह के 2 बेटे थे, 32 साल का राजेंद्र सिंह और 29 साल का बलजिंदर सिंह उर्फ बिल्ला. इस गांव की अधिकांश आबादी मेहनतमजदूरी करने वाले सिखों की है.

गरीब परिवार के होने के कारण राजेंद्र और बलजिंदर जाटों के खेतों में काम कर के गुजरबसर करते थे. मेहनत की बदौलत दोनों भाई घर खर्च चलाने के साथसाथ थोड़ीबहुत बचत भी कर लेते थे.

राजेंद्र सिंह की शादी करीब 11 साल पहले हुई थी. वह अपने बीवीबच्चों के साथ गांव में ही अलग मकान में रहता था. बलजिंदर की शादी 8 साल पहले फाजिल्का के गांव महुआणा बोदला निवासी थाना सिंह की बेटी सोमपाल कौर के साथ हुई थी. दोनों का 7 साल का एक बेटा अभि सिंह था.

राजेंद्र सिंह खेतों में कमबाइन से फसल काटने का काम करता था, जबकि बलजिंदर ट्रैक्टर चलाता था. सोमपाल कौर भी मजदूरी करती थी. वह थी तो सांवले रंग की, पर उस के तीखे नैननक्श और आकर्षक शरीर किसी को भी उस की ओर देखने को मजबूर कर सकते थे.

14 अप्रैल, 2017 की सुबह बलजिंदर रोज की तरह अपने काम पर गया तो लौट कर नहीं आया. उस की पत्नी सोमपाल कौर और भाई राजेंद्र सिंह रात भर उस के नंबर पर फोन करते रहे. उस के फोन की घंटी तो बजती थी, पर कोई फोन नहीं उठा रहा था. अगले दिन सुबह राजेंद्र सिंह घर पहुंचा और सोमपाल कौर से पूरी बात सुनने के बाद भाई की तलाश में निकल पड़ा.

राजेंद्र सिंह ने आसपास के गांवों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों तथा उस के यारदोस्तों के यहां पता किया पर वह किसी के यहां नहीं गया था. बलजिंदर काफी हंसमुख और मिलनसार युवक था. वह गांव वालों के सुखदुख में काम आता था. इसलिए गांव के कई लोग और उस के दोस्त काफी परेशान थे और उस की तलाश में जुटे हुए थे.

लेकिन 3 दिनों तक ढूंढने के बाद भी बलजिंदर का कोई सुराग नहीं मिला. आखिर में ग्रामप्रधान और अन्य लोगों के कहने पर 19 अप्रैल, 2017 को राजेंद्र सिंह ने थाना सदर मलौट जा कर अपने भाई बलजिंदर सिंह की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

थाना सदर मलौट के थानाप्रभारी इंसपेक्टर परमजीत सिंह ने उसे आश्वासन दिया कि वह उस के भाई को ढूंढने की हर संभव कोशिश करेंगे. पुलिस अपना काम अपने तरीके से कर रही थी, पर राजेंद्र सिंह भी पुलिस के भरोसे नहीं बैठा था. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि शाम 6 बजे तक घर लौटने वाला उस का भाई आखिर अचानक कहां गायब हो गया.

20 अप्रैल को राजेंद्र सिंह गांव के अपने दोस्तों हरदीप, बलजिंदर और जालंधर सिंह के साथ अपने भाई की तलाश कर के राजस्थान फीडर नहर के किनारे से गांव की ओर लौट रहा था तो भुल्लर गांव के पास उन्हें भयानक दुर्गंध का सामना करना पड़ा. जिज्ञासावश सभी ने नहर में झांक कर देखा तो नहर के किनारे सिर पर बांधने वाला केसरी रंग का पटका नजर आया था.

हालांकि वहां इतनी दुर्गंध थी कि खड़ा होना मुश्किल था. राजेंद्र सिंह के दोस्त नहर की ओर जाने से मना कर रहे थे, पर राजेंद्र सिंह पटका देख कर आगे जाना चाहता था. क्योंकि उस का भाई ज्यादातर केसरी रंग का ही पटका बांधा करता था. उस जगह नहर में बांध सा बना था, इसलिए वहां पानी रुका हुआ था.

राजेंद्र सिंह ने जब नीचे पानी में झांक कर देखा तो उसे नहर में एक लाश दिखाई दी. उस ने चिल्ला कर अपने दोस्तों को आवाज दी. सभी ने पानी में उतर लाश बाहर निकाली. वह लाश बलजिंदर सिंह की थी.

अपने जवान भाई की लाश देख राजेंद्र दहाड़े मार कर रोने लगा. उस के एक दोस्त ने जा कर यह सूचना थाना सदर मलौट पुलिस को दी. सूचना मिलते ही इंसपेक्टर परमजीत सिंह, सबइंसपेक्टर श्रवण सिंह, अजमेर सिंह, हैडकांस्टेबल गुरमीत सिंह, गुरजीत सिंह और कांस्टेबल रणदीप सिंह के साथ उस जगह पहुंच गए, जहां लाश पड़ी थी.

पुलिस ने लाश और पटका कब्जे में ले कर पंचनामा तैयार कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर बलजिंदर सिंह उर्फ बिल्ला की गुमशुदगी को लाश बरामदगी दिखा कर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201/34 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

शुरुआती जांच में इंसपेक्टर परमजीत सिंह ने सोमपाल कौर और उन के पड़ोसियों के बयान लिए. मृतक बलजिंदर के खास दोस्तों से भी पूछताछ की, पर उन्हें कोई सुराग नहीं मिला. मृतक बेहद मिलनसार था, उस की ना किसी से दुश्मनी थी, न लड़ाईझगड़ा. किसी से कोई लेनदेन भी नहीं था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस के अनुसार मृतक की हत्या गला घोंट कर की गई थी.  उस के पेट में नशे के अंश भी पाए गए.

पोस्टमार्टम के बाद लाश मृतक के घर वालों को सौंप दी गई. घर वालों ने उसी दिन उस का अंतिम संस्कार कर दिया. जांच में जब कहीं कोई बात सामने नहीं आई तो इंसपेक्टर परमजीत सिंह ने गांव के मुखबिरों का सहारा लिया. मुखबिरों ने टोह लेने के बाद बताया कि गांव के ही हरबंस सिंह की पत्नी परमजीत कौर और मृतक की पत्नी सोमपाल कौर में कुछ ज्यादा ही पट रही है.

परमजीत कौर को ले कर मृतक का अपनी पत्नी से कई बार झगड़ा भी हुआ था. वजह यह थी कि गांव में कोई भी परमजीत कौर को अच्छी नहीं समझता था. उस की गिनती गलत औरतों में होती थी. मुखबिर ने यह भी बताया कि इन दिनों सोमपाल कौर रोजाना परमजीत कौर के साथ काम करने गांव के ही जाट जमींदार गुरप्रीत सिंह उर्फ पिंदा के खेतों में जाती है और काम खत्म होने के बाद सोमपाल कौर अकेली ही पिंदा के घर पर कईकई घंटे गुजारती है.

इंसपेक्टर परमजीत सिंह ने सीधे परमजीत कौर पर हाथ डालने से पहले पिंदा के बारे में पता करवाया. पता चला कि पिंदा अय्याश किस्म का जमींदार है. उस का अपनी पत्नी से तलाक का केस चल रहा है. गांव की कई जरूरतमंद खूबसूरत औरतों से उस के संबंध हैं. बहलाफुसला कर काम दिलवाने के बहने परमजीत कौर ही उन औरतों को पिंदा के यहां ले आती थी.

परमजीत कौर, गुरप्रीत कौर और पिंदा के बारे में ठोस जानकारी मिलते ही इंसपेक्टर परमजीत सिंह ने गुपचुप तरीके से पूछताछ के लिए परमजीत कौर और पिंदा को थाने बुलवा लिया. पहले उन्होंने परमजीत कौर से पूछताछ करने का फैसला लिया. पूछताछ से पहले उन्होंने लेडी कांस्टेबल जसवीर कौर को उस के कमरे में भेजा.

लेडी कांस्टेबल ने धमकाते हुए परमजीत कौर को चेतावनी दी कि साहब बडे गर्ममिजाज हैं. उन की बात का सीधासच्चा जवाब नहीं दिया तो समझो तुम्हारी फांसी पक्की है. इसलिए वह जो भी पूछें, सचसच जवाब देना.

परमजीत सिंह ने परमजीत कौर पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाल कर पूछा, ‘‘देखो, मैं जानता हूं कि बलजिंदर को तुम सब ने मिल कर क्यों और कैसे मारा है, फिर भी मैं तुम्हें इस शर्त पर बचा सकता हूं कि तुम अपने मुंह से मुझे पूरी बात बता दो. नहीं तो दूसरों के चक्कर में तुम भी फांसी…’’

‘‘नहीं…नहीं सरदार जी, मुझे फांसी नहीं चढ़ना है. मैं तो पहले ही बेवजह इस चक्कर में फंस गई.’’ परमजीत कौर ने इंसपेक्टर परमजीत सिंह की बात पूरी होने से पहले ही एक सांस में सच उगल दिया. उस का बयान लेने के बाद परमजीत सिंह ने पुलिस टीम भेज कर गांव से मृतक बलजिंदर की पत्नी सोमपाल कौर तथा कुलविंदर सिंह उर्फ भूप को थाने बुलवा लिया.

अगले दिन पुलिस ने परमजीत कौर, सोमपाल कौर, गुरप्रीत सिंह उर्फ पिंदा तथा कुलविंदर सिंह और भूप को बलजिंदर सिंह उर्फ बिल्ला की हत्या के आरोप में अदालत में पेश कर के 23 अप्रैल तक के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान चारों से पूछताछ में बलजिंदर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह दूसरों की बातों में आ कर अपना घर बरबाद करने वाली बेअक्ल औरत की जुर्म भरी कहानी थी, जिस ने दूसरों के महलों के ख्वाब देख कर अपना झोपड़ा फूंक दिया था.

शादी के बाद सोमपाल कौर बड़ी खुश थी. बलजिंदर जैसा सुंदर, हृष्टपुष्ट, नेक, कमाऊ और मेहनती पति पा कर जैसे उसे सब कुछ मिल गया था. गरीब परिवार की बेटी गरीब परिवार में ही ब्याह कर आई थी. इसलिए उस के ना कोई ऊंचे ख्वाब थे, न कोई बड़ी महत्वाकांक्षा. बस 2 वक्त की रोटी और शांति से परिवार कर गुजारा होता रहे, यही उस की कामना थी.

बलजिंदर के लाख मना करने पर भी उस ने कंधे से कंधा मिला कर उस के साथ मेहनत की और पैसा जमा कर के कच्चे घर की जगह पक्का घर बनवा लिया. संतान के रूप में बेटा पैदा हुआ तो वह निहाल हो गई. कुल मिला कर सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. करीब 2 साल पहले उस ने लोगों के यहां काम करना बंद कर दिया था.

अब उस का सारा समय बेटे अभि के लालनपालन में गुजरता था. पतिपत्नी अपने इस जीवन से संतुष्ट थे. इसी बीच अचानक बलजिंदर बीमार हो गया. बीमारी की वजह से वह 2-3 महीने तक काम पर नहीं जा पाया, जिस से घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई.

पति से पूछ कर सोमपाल कौर ने दूसरे के खेतों में काम करना शुरू कर दिया. कुछ समय बाद बलजिंदर ठीक हो गया तो उस ने सोमपाल कौर को घर पर ही रहने के लिए कहा, पर सोमपाल ने पति को समझाते हुए कहा, ‘‘इस में हर्ज क्या है, घर पर मैं सारा दिन खाली ही बैठी रहती हूं. चार पैसे जमा हो जाएंगे तो भविष्य में बेटे के काम आएंगे.’’

सोमपाल कौर की बात सही थी. बलजिंदर चुप रह गया. अब पतिपत्नी दोनों सुबह अभि को स्कूल भेज कर काम पर निकल जाते. स्कूल से लौट कर अभि अपने ताया राजेंद्र के घर चला जाता था.

लगभग एक साल पहले की बात है. सोमपाल कौर शाम को काम से घर लौट रही थी तो रास्ते में पिंदा के खेत पड़ते थे. पिंदा की नजर उस पर पड़ी तो वह पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया. उस का पिछले 2 सालों से अपनी पत्नी से तलाक का मुकदमा चल रहा था. उस की रातें रंगीन करने का इंतजाम परमजीत कौर किया करती थी.

पिंदा ने जब सोमपाल कौर को देखा तब वह नहीं जानता था कि यह कौन है. उसे परमजीत कौर के माध्यम से पता चला कि वह अपने गांव की ही है तो उस ने परमजीत कौर के सामने नोट फेंकते हुए कहा कि उसे हर हाल में सोमपाल कौर चाहिए. परमजीत कौर ऐसे कामों में माहिर थी. उस ने सोमपाल कौर को फंसाने के लिए ऐसा जाल फेंका कि ना चाहते हुए भी वह परमजीत कौर की बातों में आ कर पिंदा के बिस्तर पर जा पहुंची.

धीरेधीरे दोनों को एकदूसरे के शरीर का ऐसा चस्का लगा कि दोनों साथ रहने के सपने देखने लगे. पिंदा ने सोमपाल कौर के लिए अपनी तिजोरी का मुंह खोल दिया था. गरीब परिवार की सोमपाल कौर को लगने लगा कि अब वह जमीनदारनी बनने वाली है. लेकिन बलजिंदर के रहते यह संभव नहीं था. फिर भी यह खेल जैसे-तैसे गुपचुप तरीके से चलता रहा. लेकिन ऐसा कब तक संभव था.

आखिर एक दिन यह खबर बलजिंदर के कानों तक पहुंच ही गई. उस ने सोमपाल कौर को प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘कल से तुम बाहर काम पर जाना बंद कर दो और घर में रह कर बेटे की परवरिश पर ध्यान दो. कमाने के लिए मैं काफी हूं.’’

लेकिन सोमपाल ने बलजिंदर का कहना मानने से इनकार कर दिया. इस बात को ले कर घर में तनाव रहने लगा क्योंकि सोमपाल कौर ने खेतों में काम करना बंद नहीं किया था. लेकिन अब उसे इस बात का डर सताने लगा था कि कभी भी कुछ भी हो सकता है. इसी बात को ध्यान में रख कर एक दिन उस ने पिंदा से कहा, ‘‘जो करना है जल्दी करो, क्योंकि अब मैं ज्यादा दिनों तक घर में बगावत नहीं कर सकती. हमारे रिश्तेदारों को भी खबर लग गई है.’’

‘‘बताओ, क्या करना है.’’ पिंदा ने सोमपाल को बांहों में भर कर कहा, ‘‘कहो तो बलजिंदर का काम तमाम कर देते हैं.’’

‘‘नहीं…नहीं…’’ घबरा कर सोमपाल कौर बोली, ‘‘यह ठीक नहीं है. अगर हम फंस गए तो मेरे बेटे अभि का क्या होगा?’’

‘‘तुम चिंता मत करो, बलजिंदर को हम इस तरह से रास्ते से हटाएंगे कि किसी को हम पर शक नहीं होगा.’’

यह 2 अप्रैल की बात है. अगले दिन पिंदा के घर पर बलजिंदर की हत्या की योजना बनाई गई. इस योजना में पिंदा ने सोमपाल कौर के अलावा परमजीत कौर और गांव के ही कुलविंदर सिंह उर्फ भूप को पैसों का लालच दे कर शामिल कर लिया. योजना यह थी कि जिस दिन बलजिंदर का भाई राजेंद्र कमबाइन चलाने किसी दूसरे गांव जाए, उसी दिन यह काम कर दिया जाएगा.

गेहूं की कटाई शुरू हो चुकी थी. राजेंद्र बैसाखी वाले दिन पड़ोसी गांव लखमी रेहाणा चला गया. उसी दिन यानी 14 अप्रैल, 2017 की शाम जब बलजिंदर अपने काम से घर लौट रहा था तो रास्ते में उसे कुलविंदर सिंह और पिंदा मिल गए. बलजिंदर उन के साथ जाना नहीं चाहता था, पर बैसाखी मनाने के बहाने वे उसे जबरदस्ती घर ले गए.  परमजीत कौर और सोमपाल कौर दूसरे कमरे में मौजूद थीं.

वहां शराब का दौर चला और बलजिंदर को अधिक शराब पिला कर उसे नशे में कर दिया गया इस के बाद चारों उसे बातों में उलझा कर भुल्लर गांव के पास नहर पर ले गए. चूंकि बलजिंदर नशे का आदी नहीं था, इसलिए उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था.

बलजिंदर वही कर रहा था, जो वे कह रहे थे. नशे की अधिकता की वजह से वह सीधा खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. बहरहाल, नहर के पास पहुंच कर चारों ने उसी के सिर पर बंधे पटके को उस के गले में डाल कर कस दिया.

सोमपाल कौर ने उस के बाजू और परमजीत कौर ने उस की टांगें पकड़ीं. पिंदा और कुलविंदर ने दोनों ओर से पटका खींच कर गला कसा. इस के बाद लाश नहर में फेंक कर सभी अपनेअपने घर चले गए थे. योजनानुसार रात 11 बजे सोमपाल कौर ने राजेंद्र को फोन कर के बलजिंदर के घर न आने की जानकारी दी थी.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने चारों आरोपियों को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जनलोकपाल के लिए फिर आंदोलन करेंगे अन्ना

गांधी जयंती पर राजघाट पहुंचे अन्ना हजारे ने जनलोकपाल के लिए फिर आंदोलन का ऐलान किया. अन्ना ने एक दिवसीय सत्याग्रह के मौके पर भ्रष्टाचार और लोकायुक्त कानून को लेकर प्रधानमंत्री के नाम पत्र भी लिखा. इसमें उन्होंने अच्छे दिन के वादे से लेकर महिला सुरक्षा, किसानों की दिक्कतें, नोटबंदी और जीएसटी पर सवाल खड़े किए हैं.

सोमवार सुबह सत्याग्रह के बाद शाम तीन बजे अन्ना हजारे महाराष्ट्र सदन में पत्रकारों से रूबरू हुए. उन्होंने बताया कि नए साल के शुरू में वह जनलोकपाल आंदोलन शुरू कर देंगे.

प्रधानमंत्री को पत्र लिखा

अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हुएकहा कि देश का प्रधानमंत्री हुए आपको तीन साल हो गए. लेकिन, आप केंद्र में लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाए. भ्रष्टाचार को समाप्त करने और देश में प्रभावशाली लोकतंत्र प्रस्थापित करने के बारे में कुछ भी कोशिश नहीं हो रही है.

‘केजरीवाल दूर रहें’

अन्ना हजारे ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि आंदोलन में शामिल होने के लिए अरविंद मुझसे पूछेगा नहीं और यदि पूछेगा तो मैं उससे कहूंगा कि वह मुझसे पांच कदम दूर रहे. अन्ना हजारे ने बताया कि इस बार आंदोलन में शामिल होने वाले लोग राजनीति में नहीं जाएंगे. जो भी उनके साथ आंदोलन में आएगा, उनको सबसे पहले शपथपत्र देना होगा कि वे राजनीति में नहीं जाएंगे और यदि जाएंगे तो वे उन्हें कोर्ट में घसीटेंगे.

सबके लिए न्यूड होने को तैयार है ये एक्ट्रेस

हमेशा ही अपनी बोल्ड तस्वीरों के कारण सुर्खियों में रहने वालीं एक्ट्रेस पूनम पांडे को कौन नहीं जानता. कहना गलत नहीं होगा कि ये एक्ट्रेस बॉलीवुड की सबसे हॉट और सेक्सी एक्ट्रेस की लिस्ट में आती हैं. पूनम पांडे ‘क्रिकेट वर्ल्‍ड कप’ में भारत की जीत पर न्‍यूड होने वाले बयान के लिए मशहूर हैं. पूनम एक भारतीय मॉडल और अभिनेत्री हैं. अगर आप पूनम के इंस्टाग्राम अकाउंट पर जाएंगे तो आपको वहां उनकी बेहद हॉट तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी. चलिए नज़र डालते हैं पूनम की कुछ कॉन्ट्रोवर्सी पर..

कहा..वह नग्न हो जाएंगी

विश्व कप क्रिकेट 2011 के दौरान, पूनम पांडे ने घोषणा की कि यदि भारतीय क्रिकेट टीम विश्व कप जीतता है तो वह नग्न हो जाएंगी लकिन ऐसा हुआ नहीं. पूनम पांडे ने अपना वादा पूरा नहीं किया.

लाइमलाइट में रहने की कोशिश

पूनम पांडे हमेशा से ही खुद को सबसे आगे रखने की कोशिश में रहती हैं. कुछ दिन पहले जब शर्लिन चोपड़ा का जन्मदिन था तो उन्होंने अपना जन्मदिन मुंबई के रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर्स के साथ मनाया था. तो पूनम ने भी सोचा कि अपना जन्मदिन कुछ खास बनाया जाए. तब पूनम ने भी सोचा कि अपना जन्मदिन कुछ खास बनाया जाए. तो उन्होंने ट्वीट किया ‘लकी मेरा जन्मदिन साल के 69वें दिन आता है. शायद इसीलिये मैं इतनी नॉटी हूं.’

हर मौके पर कपड़े उतारने के लिए तैयार

कभी शाहरूख के लिए तो कभी सचिन के नाम पर, पूनम पांडे हर मौके पर कपड़े उतारने के लिए तैयार नजर आईं.

60 की उम्र में भी करेंगी बिकिनी तस्वीरें पोस्ट

पूनम पांडे ने में एक स्टेटमेंट दिया कि वो 60 की उम्र की होने के बाद भी अपनी बिकनी तस्वीरें पोस्ट करती रहेंगी और अपने फैंस को एंटरटेन करती रहेंगी.

क्रिसमस डे पर जिंगल

क्रिसमस डे पर पूनम पांडे ने जिंगल बेल..का नया और अपना सॉन्ग निकाला जो काफी अश्लील था.

पूनम का ट्वीट

मद्रास हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जो कपल शादी के पहले शादी के पहले सेक्स करते हैं, उन्हें विवाहित माना जाएगा. इस पर पूनम पांडे ने ट्विट किया था कि ‘Madras HC I am Married then 😉 Hehehehe LOL’.

सचिन के लिए भी न्यूड होने को तैयार

सचिन के लिए भी न्यूड पूनम पांडे की वह तस्वीर काफी विवादित रही थी. जिसमें एक्ट्रेस ने हाथों में सचिन तेंदुलकर की एक तस्वीर पकड़ी थी. इस तस्वीर में सचिन का चेहरा भगवान की प्रतिमा पर फोटोशॉप किया गया था. वहीं, भगवान बने सचिन के सामने एक पाकिस्तानी क्रिकेटर झुका हुआ दिखाया गया था.

”न्यूड होने से संतुष्ट नहीं हुईं”

2012 में लेखिका तसलीमा नसरीन के साथ हुए गाली गलौज को लेकर भी पूनम विवादों में रहीं. तसलीमा ने ट्वीटर पर लिखा कि ‘पूनम पांडे न्यूड हो गई, लेकिन अभी भी वह संतुष्ट नहीं है. वह ऐसी कोई गंदी हरकत करना चाहती हैं, जो कि अभी तक किसी ने नहीं की.’ वहीं पूनम ने भी जवाब दिया कि ‘लोग जो कह रहे हैं उसकी परवाह मत करो (फ*** वॉट पीपल से) और अपना काम करो.

बाढ़ के बाद कैसे हो जिंदगी आबाद

साल 2017. अगस्त का महीना. बिहार के 18 जिलों के 164 ब्लौक, 1842 पंचायतें, 6625 गांव और एक करोड़, 22 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए.

21 अगस्त, 2017 तक 202 लोगों को बाढ़ ने लील लिया था. अररिया, किशनगंज, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, शिवहर, मधुबनी, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधेपुरा, खगडि़या, दरभंगा, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जिलों में बाढ़ ने जम कर तांडव मचाया.

देश में हर 5 साल में 75 लाख हैक्टेयर जमीन बाढ़ खा जाती है और तकरीबन 16 सौ जानें लील लेती है.

हर साल जून से ले कर अगस्त महीने के बीच बिहार और नेपाल की नदियां बिहार में कहर बरपाती रही हैं. हर साल बाढ़ की चपेट में फंस कर औसतन 5 सौ से ज्यादा इन्सानी और 2 हजार से ज्यादा जानवरों की जानें जाती हैं. साथ ही, 2 लाख से ज्यादा घरों को बाढ़ बहा ले जाती है और 6 लाख हैक्टेयर जमीन में लगी फसलों को बरबाद कर डालती है.

कुल मिला कर नेपाली नदियों की उफान से हर साल बिहार को 3 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है. उत्तर बिहार की 75 फीसदी से ज्यादा आबादी बाढ़ के खतरे के बीच जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर है. राज्य की जमीन का 70 फीसदी से ज्यादा इलाका बाढ़ से प्रभावित होता है.

राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के आकलन के मुताबिक, साल 1980 से ले कर साल 2015 के बीच हर साल तकरीबन 10 लाख हैक्टेयर खेती के लायक जमीन बाढ़ के पानी में डूबती रही है, जिस वजह से 6 लाख हैक्टेयर में लगी खरीफ की फसल तो पूरी तरह से चौपट हो जाती है. बाढ़ से 17 लाख मवेशी भी प्रभावित होते हैं.

कोसी नदी की बाढ़ में हर साल तबाह होने वाले सहरसा जिले का किसान रामदेव महतो कहता है कि बाढ़ से घर के ढहने के बाद एक कच्चा घर बनाने में कम से कम 20 से 25 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. गरीब किसानों की मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो घर बनाने में ही चला जाता है.

सवाल यह उठता है कि हर साल बाढ़ राहत के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार अरबों रुपए बहाती हैं, लेकिन बाढ़ कंट्रोल के नाम पर सालभर हवाई किले ही बनाए जाते हैं. बाढ़ का पानी उतरने के बाद सरकार और प्रशासन अपने काम का खत्म होना मान लेता है, जबकि बाढ़ का पानी उतरने के बाद ही बाढ़ पीडि़तों की असली मुश्किलें शुरू होती हैं.

गौरतलब है कि उत्तर बिहार की तकरीबन 76 फीसदी आबादी बाढ़ की तबाही और खौफ के साए में जिंदगी गुजारती है. राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94 हजार, 160 वर्ग किलोमीटर है, जिस में से 73.06 फीसदी यानी 68 हजार, 8 सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हर साल बाढ़ में डूबता रहा है. समूचे भारत का कुल बाढ़ प्रभावित इलाका 4 सौ लाख हैक्टेयर है, जिस में से 17.2 फीसदी इलाका बिहार में है.

पिछले साल अगस्तसितंबर महीने में बिहार की नदियों में आई बाढ़ से तकरीबन 12 सौ करोड़ रुपए बरबाद हो गए थे. राज्य में तकरीबन 4 लाख हैक्टेयर खेती के लायक जमीन बाढ़ की चपेट में आई थी और उस में लगी फसलें पूरी तरह बरबाद हो गई थीं. प्रति हैक्टेयर 30 क्विंटल धान की पैदावार का नुकसान माना जाए, तो इस लिहाज से एक करोड़, 20 लाख क्विंटल धान की फसल चौपट हो गई थी. धान की कीमत अगर 10 रुपए प्रति किलो भी मानी जाए, तो नुकसान की रकम 12 सौ करोड़ रुपए बैठती है.

गौरतलब है कि बिहार में खरीफ के मौसम में 32 लाख हैक्टेयर जमीन में धान, 2 लाख हैक्टेयर जमीन में मक्का और 90 हजार हैक्टेयर जमीन में दलहन की फसलें लगाई जाती हैं.

कृषि वैज्ञानिक वेदनारायण सिंह कहते हैं कि बिहार के मैदानी इलाकों में नदियों का जाल बिछा हुआ है. गंगा, सोन, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला बलान, भूतही बलान, घाघरा, कोसी, बागमती, महानंदा, नून, लखदेई और अधवारा समूह की नदियां हर साल बरसात के मौसम में बिहार में कहर ढाती रही हैं. इन नदियों का तकरीबन 60 फीसदी जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और तिब्बत में व 35 फीसदी बिहार में पड़ता है.

नेपाल के 60 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जो पानी जमा होता है, उस के निकलने का रास्ता बिहार के निचले इलाकों के जरीए ही होता है. इस से बिहार के कई इलाकों में अचानक बाढ़ आ जाती है. कटिहार जिले के कुरसैला इलाके का किसान लल्लू प्रसाद बताता है कि बाढ़ के बाद खेतों में अक्तूबरनवंबर महीने तक पानी भरा रह जाता है और किसान खेती नहीं कर पाते हैं. फसलें तो बरबाद हो ही जाती हैं, ऊपर से कर्ज के पैसे का ब्याज भी बढ़ता जाता है. किसान कर्ज चुकाएं तो कैसे चुकाएं? खेत बेच कर कर्ज चुकाने के सिवा उस के सामने कोई चारा ही नहीं रह जाता है. सरकार भी मदद के नाम पर कभी कर्जमाफी, कभी मुफ्त में बीज और कभी बिजली देने का ऐलान कर अपनी जवाबदेही का खत्म होना मान लेती है.

कृषि वैज्ञानिक डाक्टर सुरेंद्र नाथ कहते हैं कि हर साल भारी बारिश और नेपाल समेत पड़ोसी राज्यों से बड़े पैमाने पर पानी छोड़े जाने की वजह से बाढ़ आती रही है. सरकार के तमाम उपायों के बाद भी जानमाल का बहुत नुकसान हो जाता है.

जुलाई से सितंबर महीने के बीच ही बाढ़ का खतरा रहता है, ऐसे में गांव वालों को बाढ़ से निबटने के लिए अपने लैवल पर कुछ उपाय करने चाहिए. अगर वे पहले से तैयार रहें, तो बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. राशन, दवा, ईंधन, पशुचारे को जमा कर के रखना बहुत जरूरी है. गांव की ऊंची जगहों की पहचान कर वहां बाढ़ के दौरान लोगों और मवेशियों को महफूज रखा जा सकता है.

यह जरूर करें बाढ़ के बाद

* बाढ़ के बाद हुए नुकसान का आकलन करने के लिए आने वाली टीम को सही आंकड़ा दें.

* बाढ़ के गंदे पानी के असर को कम करने के लिए डाक्टर से पूरी जांच और इलाज कराएं.

* बच्चों का इलाज गंभीरता से कराएं.

* महामारी से बचाव के लिए मरे मवेशियों को गड्ढा खोद कर चूना डाल कर दफनाएं.

* मवेशियों की रहने वाली जगहों पर चूने का घोल और फिनाइल का छिड़काव करें.

* जलजमाव वाले इलाके से जलीय पौधों को निकाल दें, ताकि उन में घोंघे वगैरह न पनप सकें.

* गंदा और कई दिनों से जमा पानी मवेशियों को न पिलाएं.

* जब तक खेतों में पानी जमा है, तब तक उस में मछलियों का जीरा डाल कर मछली पैदा की जा सकती है.

* बाढ़ के बाद लत्तर वाली सब्जियों मसलन कद्दू, सेम, परवल वगैरह लगा कर उन की अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

डीएम की खुदकुशी से मिलते सबक

बिहार के बक्सर जिले के डीएम (जिलाधीश) मुकेश पांडे ने सुसाइड करने से पहले सुसाइड नोट का वीडियो बनाया था. सुसाइड के लिए पारिवारिक विवाद और तनातनी को जिम्मेदार ठहराया गया.

उन्होंने वीडियो में साफ कहा है कि उन की बीवी और मातापिता के बीच के तनाव भरे रिश्ते से उन का जीना दुश्वार हो गया था. 11 अगस्त, 2017 को गाजियाबाद स्टेशन से एक किलोमीटर दूर कोटगांव के पास रेलवे ट्रैक पर उन का कटा हुआ शव बरामद हुआ था.

4 अगस्त, 2017 को ही उन की पहली बार जिलाधीश के तौर पर बक्सर में पोस्टिंग हुई थी. 2 दिन की छुट्टी ले कर और बक्सर के डीडीसी को अपना चार्ज दे कर वे बनारस होते हुए हवाईजहाज से दिल्ली आ गए थे.

वे दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके के होटल लीला पैलेस के कमरा नंबर 742 में ठहरे थे. रात 10 बजे के बाद उन की लाश मिलने की खबर आई.

बिहार के सारण जिले के दरियापुर ब्लौक के सांझा गांव के मूल निवासी मुकेश पांडे पटना के मारुति शोरूम के मालिक राकेश कुमार सिंह के दामाद थे. रेलवे ट्रैक के पास भी एक सुसाइड नोट मिला था, जिस पर लिखा था, ‘आई एम सौरी. लव यू आल. प्लीज फौरगिव मी.’

रूस के मास्को में रहने वाले मुकेश पांडे के बड़े भाई राकेश पांडे भारतीय विदेश सेवा के अफसर हैं. उन्होंने कहा कि कभीकभार मुकेश से बातचीत होती थी. हालचाल पूछने पर वह हमेशा कहता था कि वह ठीक है. काम के बारे में भी वह बात करता था. उस ने कभी किसी पारिवारिक तनाव या परेशानी की बात नहीं बताई.

मुकेश के चाचा वशिष्ठ पांडे ने भी बताया कि उस ने कभी किसी तरह के तनाव का जिक्र नहीं किया.

मुकेश के ससुर का भी यही कहना है कि उन के दांपत्य जीवन में कोई तनाव नहीं था. वे रोज उन्हें फोन करते थे. घटना के दिन भी मुकेश ने उन से पूना जाने के बारे में बताया था.

मुकेश पांडे के पिता गुवाहाटी में रहते हैं और उन के चाचा भी गुवाहाटी के एक अखबार में पत्रकार हैं. मुकेश की मैट्रिक और हायर सैकेंडरी की पढ़ाई गुवाहाटी में ही हुई थी. 2 भाइयों में वे छोटे थे.

11 अगस्त, 2017 की शाम 6 बजे मुकेश पांडे ने घर वालों को वाट्सअप पर जानकारी दी कि वे दिल्ली में एक इमारत से कूद कर सुसाइड करने जा रहे हैं. घर वालों ने फौरन इस की सूचना दिल्ली पुलिस को दी. पुलिस ने उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश की, पर मुकेश के इमारत से कूदने का इरादा बदल देने की वजह से पुलिस उन का पता नहीं लगा सकी.

मुकेश पांडे के ससुर राकेश प्रसाद सिंह ने मुकेश की दिमागी हालत पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुसाइड नोट को पढ़ कर लगता है कि उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी.  एसएमएस, वीडियो क्लिप, ह्वाट्सअप और 11 पेज का हाथ से लिखा सुसाइड नोट उन्हें मिला. लंबे समय तक इतने सुसाइड नोट कोई सामान्य आदमी कैसे लिख सकता है? क्या ये हरकतें अटपटी नहीं लगती हैं?

मुकेश की बीवी आयुषी ने भी किसी तरह के विवाद से इनकार करते हुए कहा है कि परिवार में किसी तरह की समस्या नहीं थी.

ससुर राकेश प्रसाद सिंह कहते हैं कि अगर मुकेश पांडे को किसी तरह की परेशानी थी, तो वह उन्हें बताते तो उसे दूर किया जा सकता था. मुकेश ने अच्छा नहीं किया. 2 परिवारों को बरबाद कर दिया. पता नहीं, उन्हें क्या परेशानी थी. रोज वे रात 10-11 बजे के बीच उन से फोन पर बातें करते थे. हालचाल लेते थे. पतिपत्नी के रिश्ते में कोई खटास नहीं थी. इस के बाद भी मुकेश के तनाव में रहने वाली बात किसी के पल्ले नहीं पड़ रही है.

जिस समय आयुषी को मुकेश की खुदकुशी करने की खबर मिली, उस समय वह डाक्टर के यहां थी. बच्चे की तबीयत खराब होने की वजह से वह काफी परेशान थी. मुकेश की सुसाइड की खबर सुन कर वह बदहवास सी हो गई.

रेलगाड़ी के सामने कूद कर जान देने से पहले मुकेश ने 2 बार खुदकुशी की कोशिश की, पर कामयाब नहीं हो सके. सीसीटीवी फुटेज के मुताबिक, वे सब से पहले पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सैंटर गए थे, पर वहां उन्हें मौका नहीं मिला. उस के बाद वह राजौरी गार्डन के वैस्टइन मौल पहुंचे. सुरक्षा गार्ड ने उन्हें बदहवास हालत में देख रोक दिया, तो वे वहां से निकल कर गाजियाबाद चले गए.

पुलिस की छानबीन में पता चला कि सीसीटीवी फुटेज में रिकौर्ड हुआ था कि शाम 5 बज कर 55 मिनट पर मुकेश राजौरी गार्डन मैट्रो स्टेशन की ओर जाते दिखाई दिए, पर मैट्रो स्टेशन पर लगे सीसीटीवी में वे नजर नहीं आए. इस से यह अंदाजा लगाया गया कि वे बस या टैक्सी से गाजियाबाद की ओर गए होंगे.

नवादा के डीएम और मुकेश के साथी कौशल कुमार बताते हैं कि 2012 के आईएएस बैच में कुल 180 लोग थे, जिस में 9 बिहार कैडर के थे. ट्रेनिंग के दौरान मुकेश हमेशा खुशमिजाज रहते थे. दूसरे साथियों को मोटिवेट करते रहते थे. हमेशा हंसने और हंसाने वाला इनसान इस तरह से दुखी हो कर के चला जाएगा, यह कभी सोचा भी नहीं था.

डीएम का पत्र

‘मेरा नाम मुकेश पांडे है. 2012 आईएएस बैच का अफसर हूं, बिहार कैडर का. मेरा घर गुवाहाटी, असम में पड़ता है. मेरे पिताजी का नाम सिद्धेश्वर पांडे है. मेरी माताजी का नाम गीता पांडे है. मेरे ससुर का नाम राकेश प्रसाद सिंह और सास का नाम पूनम सिंह है. मेरी वाइफ का नाम आयुषी शांडिल्य है.

‘इनकेस अगर यह मैसेज आप देख रहे हैं, तो मेरे सुसाइड और मेरी मौत के बाद का मैसेज है. मैं पहले से प्रीरिकौर्ड कर रहा हूं, बक्सर के सर्किट हाउस में. यहीं पर मैं ने डिसीजन लिया कि मैं दिल्ली जा कर अपने जीवन का अंत कर दूंगा.

‘यह डिसीजन मैं ने इसलिए लिया, क्योंकि मैं अपने जीवन से खुश नहीं हूं. मेरी वाइफ और मेरे मातापिता के बीच बहुत तनातनी है. हमेशा दोनों एकदूसरे से उलझते रहते हैं, जिस से मेरा जीना दुश्वार हो गया है. दोनों की गलती नहीं है. दोनों ही अत्यधिक प्यार करते हैं मुझ से. कभीकभी अति किसी चीज की एक आदमी को मजबूर कर देती है कि वह बहुत ही ऐक्स्ट्रीम स्टैप उठा ले. किसी भी चीज की अति होना अच्छी बात नहीं है.

‘मेरी वाइफ मुझ से बहुत प्यार करती है. मेरी एक छोटी बच्ची भी है. मेरे पास अब कोई औप्शन नहीं बचा है. और वैसे भी अब मैं जीवन से तंग आ गया हूं. मैं सिंपल और पीस लिविंग आदमी हूं. जब से मेरी शादी हुई है, तब से उन से बहुत उथल पुथल चल रही है. हमेशा हम लोग किसी न किसी बात को ले कर झगड़ते रहते हैं. दोनों की पर्सनैलिटी बिल्कुल अलग है. वे बहुत ही एग्रैसिव और ऐक्ट्रोवर्ट हैं. मेरा नेचर इंट्रोवर्ट है. किसी भी चीज में हमारा मेल नहीं खाता है. बावजूद हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं.

‘मैं अपनी मौत के लिए खुद को जिम्मेदार मानता हूं. मैं अपनी मरजी से सुसाइड कर रहा हूं. मेरे ऊपर किसी का दबाव नहीं है. यह मेरा अपना फैसला है. पहले सोचा था कि अध्यात्म की तरफ चला जाऊं. तप करूं. समाजसेवा करूं. बाद में सोचा कि यह सब बेकार है. मुझे पता है कि सुसाइड करने का फैसला कायराना और पलायन वादी सोच है, पर मेरे अंदर जीवन के लिए कोई फीलिंग बची ही नहीं है. कोई इच्छा नहीं रह गई है. जीवन से मन भर गया है.’

सरकारी अस्पतालों में लापरवाही की हद

सरकारी अस्पतालों में लापरवाही हद से ज्यादा हो रही है, सरकारी रेलों की एक के बाद एक दुर्घटनाएं हो रही हैं, सरकार का टैक्स जमा करने वाला कंप्यूटर सिस्टम रोज फेल हो रहा है, सड़कों पर लालबत्तियां अकसर काम नहीं करतीं, नालों में सफाई में सैकड़ों की मौतें होती हैं, सरकारी अदालतों में वर्षों मामले सड़ते रहते हैं, देश की नदियां नाले बनी हुई हैं, जरा सी ज्यादा बारिश होती है तो मुंबई जैसा शहर डूब जाता है, सरकारी गोदामों में अनाज चूहे खाते हैं और लोग भूखे रहते हैं और हम सरकार के गुणगान करते रहते हैं.

सरकार किसी भी पार्टी की हो, हाल सारे देश का एकजैसा है. आम आदमी सरकार के निकम्मेपन का शिकार है, रोज झटके पर झटके खाता है, पर कुछ कर नहीं सकता. वह वोट से सरकार बदल ले तो क्या, नई सरकार उसी ढर्रे पर चलना शुरू कर देती है.

सरकार अपनी कमजोरियों के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराती. कभी कोई मंत्री, कोई अफसर, कोई बाबू अपनी नौकरी नहीं खोता. सरकार कुछ गलत करे तो सब माफ, पर आम आदमी गलती से भी कुछ कर बैठे, तो जेल में बंद हो जाए.

निजी अस्पताल में मौतें हो जाएं, तो अदालतों में मामले चलने लगते हैं. सरकारी अस्पतालों में हों तो कुछ नहीं होता. निजी बस चालक को ही नहीं, मालिक को भी दुर्घटना के लिए जेल में भेज दिया जाता है. रेल दुर्घटना पर कोई जिम्मेदार नहीं.

सरकार कोई गलत कर दे तो कोई गुनाह नहीं, यह सोच असल में हमारी अफरातफरी के लिए जिम्मेदार है. अगर हर सरकारी नौकर को एहसास हो कि वह अपने वेतन व सुविधाओं के लिए नहीं, अपनी सेवा करने की काबिलीयत पर रखा गया है, तो उस का काम दूसरे ढंग का होगा.

अगर हर मंत्री को गलत काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना शुरू कर दिया जाए, तो राजनीति में आने से पहले लोग 4 बार सोचेंगे और आने के बाद पलपल होशियार रहेंगे कि उन के किसी काम से किसी को नुकसान तो नहीं हो जाए.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सारे देशों ने फैसला किया था कि किसी भी देश के प्रधान की गलत नीति से कोई अत्याचार हुआ है तो उसे सजा मिलेगी. हेग में यह अदालत काम कर रही है. इक्कादुक्का शासक जेल भी काट रहे हैं.

पर देशों ने अपने यहां यह कानून नहीं अपनाया. रिश्वतखोरी या पैसा कमाने के आरोप में लालू प्रसाद यादव, जे. जयललिता, ओम प्रकाश चौटाला जेल गए, पर जनता को उन के फैसलों से जो नुकसान हुआ, जो सहना पड़ा, उस का मामला कभी उन पर नहीं चला.

देश की बुरी हालत के लिए यह भी जिम्मेदार है. भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के बहुत से देशों में सरकार या शासक मनमानी करने का हक रखते हैं और यही आम आदमी को अपराध करना या ढीलढाल करना सिखाता है. देश ढंग से चलाना है, तो शासकों को जिम्मेदारी का सबक सीखना चाहिए, वरना जनता रोती रहेगी और शासक मौज की बंसी बजाते रहेंगे.

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