दिलजली प्रेमिका ने जब मंडप में खेला तेजाबी खेल

दुलहन के लिबास में बैठी अंजना के लिए वे पल बेहद खूबसूरत थे. जिंदगी के खूबसूरत पलों में वैसे भी चेहरे की चमक और खुशियां बढ़ जाती हैं. जबकि अंजना तो खूब सजीधजी थी, इसलिए जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता. ऊपर से उस ने जो पारंपरिक कुमाऊंनी चुनरी ओढ़ रखी थी, वह उस की सुंदरता में चार चांद लगा रही थी. थोड़ी ही देर में उस के सपनों का राजकुमार दूल्हा आने वाला था और वह जयमाला पहना कर उसे अपना जीवनसाथी चुनने वाली थी. अंजना मूलरूप से अल्मोड़ा जनपद के रहने वाले सूबेदार शंकर सिंह बोहरा की बेटी थी. बोहरा उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के छावनी इलाके में रह रहे थे. चंद महीने पहले ही उन्होंने बीटेक की पढ़ाई कर चुकी अंजना का रिश्ता चनेहटी निवासी सेना से सेवानिवृत्त मदन सिंह के बेटे राहुल से तय किया था. राहुल कुमाऊं रेजीमेंट में सिपाही था.

25 नवंबर, 2016 की रात छावनी इलाके में ही बरेली कैंट बोर्ड द्वारा संचालित युगवीणा समारोह स्थल पर अंजना और राहुल का विवाह होने वाला था. बोहरा परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ बारात के स्वागत की तैयारियों में लगा था. बारात आ चुकी थी.

मंडप परिसर के ही एक कमरे में कुरसी पर बैठी अंजना अपनी सतरंगी कल्पनाओं से भविष्य का खूबसूरत महल तैयार कर रही थी. खुशियों की महक हर तरफ फैली थी. कोई नहीं जानता था कि वहां क्या होने वाला है? किस की जिंदगी में दुख कब चुपके से दस्तक दे जाए, इस बात को कौन जानता है?

मंडप में मेहमानों की आवाजाही जारी थी. लगभग 10 बजे के करीब मेहमानों की भीड़ के बीच से होते हुए 2 लड़कियां दुलहन बनी अंजना के कमरे में आ पहुंची. अंजना उस समय कमरे में अकेली थी, क्योंकि सभी लोग बारात के स्वागत में लगे थे. अंजना पर नजर पड़ते ही दोनों लड़कियां मुसकराईं. उन लड़कियों की उम्र 20-22 साल रही होगी और उन्होंने आकर्षक सलवार सूट पहन रखे थे.

अंजना की नजर उन से मिली तो वह असमंजस में पड़ गईं, क्योंकि उस ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था. उसे लगा कि ये दोनों उस की दूर की रिश्तेदार होंगी या फिर दूल्हा पक्ष की होंगी और उस से मिलने आई होंगी. दोनों लड़कियां अंजना को देख कर मुसकराईं तो अंजना ने भी मुसकरा दिया. उन में से एक ने पूछा, ‘‘हैलो अंजना, कैसी हो?’’

‘‘अच्छी हूं, आप बताइए?’’

‘‘आज तो तुम बहुत खुश होगी और दुलहन बन कर तुम्हें बहुत अच्छा लग रहा होगा?’’

‘‘क्यों नहीं.’’ अंजना ने मुसकरा कर कहा.

लेकिन अगले ही पल उस लड़की का लहजा एकदम से बदल गया. वह गुस्से में उसे घूरते हुए बोली, ‘‘तुम्हें कितना भी अच्छा लग रहा हो, लेकिन यह सब मुझे बिलकुल नहीं अच्छा लग रहा.’’

पलभर में बदले उस के हावभाव और बातों से अंजना को झटका सा लगा. वह कुछ समझ पाती, उस से पहले ही दोनों लड़कियों ने एकदूसरे की तरफ देख कर इशारा किया तो उन में से एक ने झपट कर अंजना के हाथ पकड़ लिए तो उस की साथी लड़की ने एक बोतल निकाली और उस का ढक्कन खोल कर उस में भरा तरल अंजना पर उछाल दिया.

बचाव के लिए अंजना ने अपना चेहरा घुमा लिया. अपना काम कर के दोनों लड़कियां तेजी से कमरे के बाहर निकल गईं. जबकि तरल पड़ते ही अंजना जलन से चीखने लगी.

उस की चुनरी भी जल गई थी, क्योंकि उस पर उछाला गया तरल तेजाब था. जलन से अंजना बिलबिला उठी. वह दरवाजे की तरफ भागी, लेकिन लड़कियों ने बाहर जाते वक्त दरवाजा बाहर से बंद कर दिया था.

अंजना ने खुद को संभाल कर पिता के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन शोरशराबे में पिता को घंटी सुनाई नहीं दी. संयोग से उस की चीखें मेहमानों ने सुन ली थीं, इसलिए उन्होंने दरवाजा तोड़ दिया. थोड़ी देर में सभी वहां पहुंच गए. अंजना की हालत देख कर सभी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

खुशी के मौके पर अगर इस तरह का दुख आ जाए तो तकलीफ कई गुना बढ़ जाती है. बोहरा परिवार भी परेशान हो उठा. आननफानन में दर्द से बेहाल अंजना को गाड़ी में डाल कर अस्पताल पहुंचाया गया. डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उसे एसआरएमएस मैडिकल कालेज के लिए रैफर कर दिया.

विवाह समारोह में शामिल होने आए रिश्तेदारों और परिचित भी परेशान हो उठे थे. लोग तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे. अचानक घटी इस घटना से हर कोई परेशान था. तेजाब डालने वाली लड़कियों की तलाश की गई, लेकिन वे अपना काम कर के जा चुकी थीं.

घटना की सूचना पुलिस को दी गई. दुलहन पर तेजाब फेंकना पुलिस के लिए भी चौंकाने वाली बात थी. स्थानीय थाना कैंट के थानाप्रभारी ब्रजेश सिंह मौके पर पहुंचे. मामला गंभीर था, इसलिए उन्होंने घटना की सूचना अधिकारियों को भी दे दी थी. उन की सूचना पर एसएसपी जोगेंद्र कुमार, एसपी (सिटी) समीर सौरभ और सीओ (सिटी) सिद्धार्थ वर्मा भी आ गए थे.

पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. दुलहन के जो कपड़े पड़े थे, वे आधे जले हुए थे. वहीं प्लास्टिक की एक बोतल पड़ी थी. उसी में तेजाब लाया गया था. तेजाब के छींटे इधरउधर बिखरे पड़े थे.

तेजाब के नमूने और अन्य सामान को बतौर सबूत पुलिस ने कब्जे में ले लिया था. फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी बुला कर सबूत जुटाए गए. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर दुलहन से किसी की क्या रंजिश हो सकती थी. पुलिस अधिकारी घटनास्थल की जांच कर रहे थे, तभी उन की नजर वहां पड़े कागज के एक टुकड़े पर पड़ी.

कागज के उस टुकड़े को उठा कर देखा तो उस पर चंद लाइनें लिखी थीं, जिसे पढ़ कर पुलिस चौंकी. उसे तेजाब फेंकने वाली लड़कियों ने छोड़ा था. उस पर लिखा था, ‘प्यार मुझ से और शादी किसी और से. सब कुछ भूल गई. तू मेरी नहीं तो किसी दूसरे की भी नहीं हो सकती.’

पहली नजर में मामला प्रेमप्रसंग का नजर आ रहा था. पुलिस को लगा कि अंजना के किसी दिलजले प्रेमी ने इस वारदात को अंजाम दिया है. अब सवाल यह था कि अगर साजिश प्रेमी की थी तो उस ने लड़कियों का इस्तेमाल क्यों किया और वे इस के लिए तैयार क्यों हुईं?

पुलिस ने अंजना के पिता और अन्य लोगों से भी पूछताछ की. लेकिन कोई भी लड़कियों के बारे में कुछ नहीं बता सका. पिता ने किसी भी प्रकार की रंजिश होने से इनकार किया था. उन्होंने बेटी के किसी से प्रेमसंबंध की बात से भी इनकार किया था.

पुलिस अस्पताल पहुंची. अंजना के चेहरे, आंख और शरीर के दाहिने कंधे पर तेजाब के छींटे पड़े थे, जहां छाले उभर आए थे. लेकिन उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने उसे सांत्वना दे कर पूछा, ‘‘क्या तुम उन लड़कियों को जानती हो?’’

‘‘नहीं सर, मैं ने उन्हें पहली बार देखा था.’’ अंजना ने बताया.

‘‘तुम्हें किसी पर शक है, कभी तुम्हें किसी ने धमकी तो नहीं दी थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘नहीं सर, मैं खुद नहीं जानती कि मेरे साथ उन्होंने ऐसा क्यों किया?’’

अंजना से पूछताछ के बाद भी पुलिस को जांच की कोई दिशा नहीं मिल सकी थी. लेकिन इतना जरूर समझ में आ गया कि हमले का मकसद विवाह को किसी भी तरह रुकवाना था. पुलिस ने सीसीटीवी रिकौर्डिंग से लड़कियों तक पहुंचने की सोची, लेकिन यह जान कर हैरानी हुई कि वहां सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे.

पुलिस ने अंजना के पिता की तहरीर पर अज्ञात लड़कियों के खिलाफ अपराध संख्या 529/2016 पर धारा 326ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. बोहरा परिवार को चिंता इस बात की थी कि कहीं बेटी का रिश्ता न टूट जाए. लेकिन राहुल ने कह दिया था कि वह हर सूरत में अंजना को अपनाने को तैयार है.

दूसरी ओर अंजना को लगा कि उस के सपने चकनाचूर हो गए हैं. ऐसी घटनाएं वैसे भी इंसान को तोड़ कर रख देती हैं, लेकिन उस ने हालात का डट कर मुकाबला करने का फैसला किया. उस ने डाक्टरों से अपने मन की बात बताई, विवाह में हुए खर्च का वास्ता दिया तो डाक्टरों ने मरहमपट्टी कर के दवा दे कर उसे शादी की इजाजत दे दी.

रात करीब ढाई बजे अंजना को मंडप में लाया गया. किसी तरह दर्द को बरदाश्त कर अंजना ने विवाह की रस्मों को पूरा किया और सुबह फिर से अस्पताल जा पहुंची. दोपहर बाद वह ससुराल के लिए विदा हो गई. पुलिस ने दूल्हे राहुल से भी पूछताछ की थी, लेकिन उस ने भी किसी से अपनी रंजिश होने से इनकार किया था.

इस के बावजूद कोई तो था, जिसे इस शादी से सख्त ऐतराज था. एसिड अटैक सुनियोजित तरीके से किया गया था और एसिड अटैक करने वालों के तार किसी न किसी रूप में दुलहन या दूल्हे से जुड़े थे.

एसपी (सिटी) समीर सौरभ के निर्देशन में घटना के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में थानाप्रभारी के अलावा सर्विलांस टीम के प्रभारी गितेश कपिल, महिला थानाप्रभारी सिमरजीत कौर, एसएसआई अमर सिंह, रिसाला चौकीइंचार्ज अरविंद चौहान, हैडकांस्टेबल राजबाला यादव, कांस्टेबल गिरजेश पोसवाल, भागेश्वर, अनुज कुमार और अरशद अहमद को शामिल किया गया.

अगले दिन पुलिस ने समारोह की वीडियो रिकौर्डिंग हासिल कर के जांच शुरू की. उस में 2 लड़कियां नजर आईं, लेकिन जब भी कैमरा उन की ओर होता, वे अपना चेहरा नीचे कर लेती थीं या दुपट्टे से छिपा लेती थीं. इस से साफ हो गया था कि लड़कियां वही थीं, लेकिन उन की पहचान नहीं हो सकी थी. इस तरह उन तक पहुंचना पुलिस के लिए संभव नहीं था.

पुलिस ने अंजना और राहुल के मोबाइल नंबरों की कौल डिटेल्स निकलवाई. अंजना के नंबर की काल डिटेल्स से तो कुछ ऐसा नहीं मिला कि जांच आगे बढ़ती. लेकिन राहुल की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उस की खूब बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर साल्वेशन आर्मी गर्ल्स हौस्टल में रहने वाली अनामिका टमटा का निकला.

पुलिस के शक के सुई उसी पर जा कर ठहर गई. पुलिस ने उस नंबर की घटना वाली रात की लोकेशन हासिल की तो उस की लोकेशन विवाह मंडप के नजदीकी टावर की पाई गई. इस के बाद उस की लोकेशन दिल्ली और फिर कैंट एरिया की पाई गई.

पुलिस ने मोबाइल कंपनी में जमा आईडी से फोटो हासिल कर के अंजना को दिखाया तो उस ने बताया कि उस पर तेजाब डालने वाली यही लड़की थी.

आखिर 29 नवंबर, 2016 को पुलिस अनामिका तक पहुंच गई. पता चला कि उसी ने इस वारदात को अपनी सगी बहन शिवांगी के साथ मिल कर अंजाम दिया था. पुलिस ने दोनों बहनों को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर पूछताछ की गई तो पता चला कि अनामिका राहुल से प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी. इसीलिए वह हर हाल में इस शादी को रुकवाना चाहती थी, जिस के लिए उस ने दुलहन पर तेजाब डालने की खतरनाक योजना बनाई थी. पुलिस पूछताछ में एक दिलजली प्रेमिका की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तराखंड के रहने वाले वीरेंद्र टमटा की बेटी थी अनामिका. वह बरेली में रह कर पढ़ाई कर रही थी, जबकि उस की छोटी बहन शिवांगी एक अस्पताल में नर्स का प्रशिक्षण हासिल कर रही थी. दोनों बहनें गर्ल्स हौस्टल में रहती थीं. पुलिस को बताए अनुसार, अनामिका और राहुल एकदूसरे को 4 सालों से जानते थे. उन के बीच पहले दोस्ती हुई, उस के बाद उन में प्यार हो गया. उन का प्यार समय के साथ गहराता गया और उन्होंने साथसाथ जीनेमरने की कसमें खा लीं.

आगे चल कर अनामिका तो अपने वादे पर कायम रही, लेकिन समय के साथ राहुल का विचार बदल गया. उस की शादी अंजना से तय हो गई. जब इस की जानकारी अनामिका को हुई तो राहुल की इस बेवफाई पर वह काफी नाराज हुई. उस ने न सिर्फ राहुल को खूब खरीखोटी सुनाई, बल्कि उसे खूब समझाया भी.

लेकिन राहुल अपने इरादे पर कायम रहा. उस ने साफ कह दिया कि वह विवाह अंजना से ही करेगा. अनामिका राहुल से दिल से प्यार करती थी. उस ने भले ही उस से बेवफाई की थी, लेकिन वह उसे खोना नहीं चाहती थी. राहुल को जीवनसाथी बनाने की उस की दिली ख्वाहिश थी.

यह बात अलग थी कि राहुल ने उस से दूरी बना ली थी. लेकिन अनामिका ने तय कर लिया था कि वह हर हाल में राहुल को जीवनसाथी बना कर रहेगी. चाहे इस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े. वह राहुल को उस की बेवफाई का सबक सिखाना चाहती थी, लेकिन उस के प्यार ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.

उसे पता था कि राहुल जल्द ही विवाह कर लेगा. लेकिन विवाह की तारीख उसे पता नहीं थी. वह शातिरदिमाग लड़की थी, उस ने सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए राहुल के भाई कंचन को अपना दोस्त बनाया और उसी से राहुल के विवाह की तारीख पता कर ली.

जैसेजैसे विवाह की तारीख नजदीक आ रही थी, अनामिका के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. उसे राहुल से ज्यादा नफरत अंजना से थी. उस की रातों की नींद उड़ी हुई थी. उस ने सोचा कि उसे कुछ ऐसा करना चाहिए कि राहुल अंजना से दूर हो जाए और रिश्ता टूट जाए. वह मैसेज कर के राहुल को मनाने की कोशिश भी करती रही.

जब उसे लगा कि यह विवाह हो कर ही रहेगा तो उस ने अंजना पर तेजाब डालने की खतरनाक योजना बना डाली. अनामिका ने सोचा था कि तेजाब से अंजना का चेहरा बिगड़ जाएगा तो राहुल खुद ही उस से विवाह करने से मना कर देगा. इल्जाम उस पर न आए और राहुल अंजना को चरित्रहीन समझे, इस की भी उस ने योजना कागज पर चंद लाइनें लिख कर तैयार कर ली थी.

उस ने सोचा था कि घटना के बाद उस कागज को वह वहीं छोड़ देगी, ताकि पुलिस भटक जाए. उसे लगे कि घटना को अंजना के किसी प्रेमी ने अंजाम दिया है. नफरत की आग में सुलगती अनामिका ने अपनी योजना में शिवांगी को भी शामिल कर लिया था. योजना के तहत अनामिका ने टौयलेट साफ करने वाले एक बोतल तेजाब का इंतजाम किया और विवाह वाली रात दोनों बहनें अच्छे कपड़े पहन कर समारोह स्थल पर पहुंच गईं.

कैमरे से मुंह छिपाते हुए दोनों बहनें दुलहन के कमरे तक पहुंचीं तो उस समय वहां कई महिलाएं॒मौजूद थीं. वे मौके का इंतजार करने लगीं. जब बारात आने को हुई तो सभी बारात के स्वागत के लिए बाहर चले गए और अंजना कमरे में अकेली रह गई. मौका मिलते ही दोनों ने घटना को अंजाम दे दिया और भाग निकलीं. अगले दिन दोनों बहनें दिल्ली के पीतमपुरा में एक रिश्तेदारी में चली गईं और 2 दिनों बाद वापस आईं.

अनामिका को उम्मीद थी कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी और राहुल हमेशा के लिए उस का हो जाएगा. लेकिन पुलिस की चौखट पर पहुंचते ही अनामिका के सारे सपने टूट गए. प्यारमोहब्बत में ऐसी स्थितियां आती रहती हैं. अनामिका ने राहुल को अपनी जिंदगी मान लिया था और जबरन उसे हासिल करने की जिद कर बैठी, जिस की वजह से आज उस के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं.

अगर उस ने विवेक से काम लिया होता और उस की बहन शिवांगी ने भी गलत काम में साथ देने के बजाए उसे समझाया होता तो शायद आज यह नौबत न आती.

पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों आरोपी बहनों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट मयूर जैन की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अंजना का इलाज चल रहा है. समय के साथ उस के जख्म भर जाएंगे, लेकिन एक बात उसे सताती रहेगी कि आखिर उसे किस गुनाह की सजा मिली. राहुल का कहना था कि अनामिका से सिर्फ उस की दोस्ती थी, प्यार जैसा उस में कुछ भी नहीं था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरी जिंदगी का काला अध्याय : आयशा राउत

मेरा नाम आयशा राउत है और मैं एक गरीब परिवार से हूं. 17 साल की उम्र में मेरे साथ जो घटना घटी, मैं उसे आप सब से शेयर करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती कि मेरे साथ जो कुछ हुआ, वह किसी और के साथ हो. फरेबी और धोखेबाज लोगों से आप सावधान रहें. फरेबी लोग आप के अपने या पड़ोसी भी हो सकते हैं, जिन पर आप आंखें बंद कर के विश्वास करते हैं. मेरा परिवार उड़ीसा के जिला सुंदरगढ़ के एक छोटे से गांव रानी बगीचा में रहता है. परिवार में मांबाप के अलावा मैं और मेरी बड़ी बहन पिंकी थी. मांबाप बड़े किसानों के खेतों में दिन भर काम करते थे, उस के बदले में जो अनाज मिलता, उस से ही जैसेतैसे घर का गुजारा हो पाता था. जब घर में खाने तक के लाले पड़े हों तो ऐसे में पढ़ाई के बारे में सोचना हास्यास्पद था. गांव के जब कुछ बच्चे स्कूल जाते तो मैं भी सोचा करती थी कि काश मैं भी स्कूल जाती. पर मेरी यह इच्छा दबी रह गई.

मेरी मां और बाप दोनों ही शराबी थे. जब वे मजदूरी पर नहीं जाते तो चावल के मांड से बनाई शराब पी कर नशे में धुत पड़े रहते थे. हम दोनों बहनें उन्हें शराब पीने को मना भी करती थीं, पर हमारी बात माननी तो दूर, वे हमें डांट देते थे. हम लड़कियां थीं, इसलिए हमारी सही बात पर भी तवज्जो नहीं दी जाती थी.

बड़ी बहन जवान हुई तो उस की शादी रानी बगीचा के ही सुनील कुल्लू से कर दी. बहन के ससुराल जाने के बाद घर में मेरा मन नहीं लगता था. उस से बातचीत कर के मेरा दिन कट जाता था. मैं जब घर पर अकेली होती तो गांव के लड़के मेरे घर के आसपास जुटे रहते. मेरी उम्र यही कोई 17 साल हो चुकी थी. उन लड़कों के वहां मंडराने का मतलब मैं अच्छी तरह जान गई थी. मैं समझ गई थी कि वे मेरी गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हैं. इसलिए जब तक वे घर के बाहर खड़े रहते, मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी.

तमाम अभावों के बीच मेरा बचपन कब गुजर गया, पता नहीं चला. मेरा मन भी करता कि मैं गांव की लड़कियों के साथ गपशप करूं. शहर देखना तो दूर, मेरी जिंदगी घर में ही सिमट कर रह गई थी. हमारे घर पर औनी नाम की एक महिला आती थी. वह बहुत पैसे वाली थी. हमारा घर कच्चा था, पर उस का घर आलीशान था. उस के पास सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. औनी का हमारे यहां ही नहीं, बल्कि गांव के तमाम गरीबों के यहां आनाजाना था. वह अम्माबापू को कभी शराब पिला देती तो कभी थोड़ेबहुत पैसे खर्चे के लिए दे देती. इस तरह गांव के सभी लोग औनी का बहुत सम्मान करते थे. औनी मुझ से भी बड़े प्यार से बात करती थी. वह पढ़ाई के बारे में मुझे बताती थी कि पढ़ने से क्याक्या फायदे हैं. पढ़ाई के बाद ही लोग अच्छीअच्छी नौकरियां कर पाते हैं.

भले ही मैं घर वालों की मजबूरी की वजह से नहीं पढ़ पाई, पर पढ़ाई में मेरी रुचि थी, इसलिए औनी आंटी की बातें मुझे अच्छी लगती थीं. एक दिन औनी ने मुझ से पूछा, ‘‘आयशा, यदि तुम्हें अब पढ़ने का मौका मिले तो क्या तुम पढ़ सकती हो?’’

मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं, मैं अब भी पढ़ लूंगी.’’

तब औनी आंटी ने कहा कि जब तुम्हें पढ़ाई में इतनी रुचि है तो मैं तुम्हारे बारे में सोचती हूं. इतना कह कर वह चली गई.

इस के बाद औनी आंटी का हमारे यहां आनाजाना बढ़ गया. एक दिन उस ने मेरे अम्माबापू से कहा, ‘‘तुम अपनी बेटी आयशा को किसी काम पर क्यों नहीं लगवा देते. जब यह चार पैसे कमा कर लाएगी तो वे घर में काम आएंगे.’’

‘‘यहां की हालत तुम देख ही रही हो. यहां काम है ही कहां. बेटी सयानी हो गई है, इसलिए कहीं दूर शहर में भेजने का मन नहीं करता. अब सोच रहे हैं कि कहीं कोई लड़का मिल जाए तो इस के हाथ पीले कर दें. इस की शादी के बाद घर में हम 2 लोग रह जाएंगे. हमारी इतनी उम्र कट गई. बचीखुची भी कट जाएगी.’’ बापू ने कहा.

इस के बाद औनी आंटी बोली, ‘‘आप ने अपनी बड़ी बेटी की शादी कम उम्र में कर दी थी, इस की मत करो. अगर तुम चाहो तो मैं इस की दिल्ली वगैरह में कहीं नौकरी लगवा दूंगी. वहां से हर महीने तुम्हारे पास पैसे आ जाया करेंगे. पैसे इकट्ठे कर के इस की शादी कर देना.’’

‘‘हमारी आयशा इतनी सीधीसादी है, इसे कौन नौकरी पर रखेगा.’’ बापू ने मेरे बारे में बताया.

औनी आंटी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ दिनों में यह तेज हो जाएगी. बच्चा तभी तक भोला होता है, जब तक वह घर से न निकले. तुम इस की चिंता मत करना, मैं इस की नौकरी ऐसी जगह पर लगवा दूंगी, जहां इसे कोई परेशानी नहीं होगी.’’

यह सुन कर मैं मन ही मन खुश हो रही थी. सच में मैं गांव से बाहर कभी नहीं गई थी और आंटी मुझे दिल्ली भेजने की बात कर रही थीं. मैं ने दिल्ली का केवल नाम सुना था. मेरे दिमाग में दिल्ली की जो तसवीर बनी हुई थी, वह यह थी कि वहां बहुत ऊंचीऊंची इमारतें होंगी और ज्यादातर लोगों के पास कारें होंगी. वहां पैसे वाले लोग रहते होंगे. चमचमाती सड़कें होंगी.

बापू से बात करने के बाद औनी आंटी मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर बोली, ‘‘अब तू अपने कपड़े तैयार रखना. तुझे दिल्ली ले चलूंगी. वहीं पढ़ना और नौकरी भी करना.’’

आज के जमाने में कौन किस की भलाई के बारे में सोचता है. पर औनी आंटी मेरी पढ़ाई और नौकरी लगवाने की बात कर रही थीं, इसलिए वह मुझे किसी देवी से कम नहीं लग रही थीं. मेरे पास कुल 3 जोड़ी कपड़े थे. एक जोड़ी तो बिलकुल नए रखे थे, जिन्हें केवल किसी त्यौहार पर या किसी की शादी वगैरह के मौके पर पहनती थी.

बाकी 2 जोड़ी मेरे रोजाना के पहनने वाले थे. औनी आंटी के  कहने पर मैं ने अपने कपड़े आदि घर में रखे एक पुराने बैग में रख लिए. एक दिन आंटी हमारे यहां सुबहसुबह आईं, उन्होंने मेरे अम्माबापू को चावल के मांड से बनी शराब खूब पिलाई. ताज्जुब की एक बात यह थी कि आंटी शराब नहीं पीती थी.

कुछ ही देर में अम्माबापू नशे में धुत हो गए तो आंटी ने मुझ से कहा, ‘‘आयशा, तुम ने अपने कपड़े रख लिए हैं? हमें आज ही यहां से दिल्ली के लिए निकलना है.’’

‘‘ठीक है आंटी.’’ मैं चहक कर बोली.

‘‘मैं एक घंटे में आ रही हूं. तुझे मेरे साथ चलना है.’’ वह बोलीं.

आंटी के जाते ही मैं फटाफट नहाधो कर नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई. ठीक एक घंटे बाद औनी आंटी हमारे यहां फिर आ गई. उस के साथ गांव की 4 लड़कियां और थीं. मुझे तैयार देख कर वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आज तो बड़ी सुंदर लग रही हो.’’

जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरी तारीफ की थी, इसलिए मैं बहुत खुश हुई.

वह बोली, ‘‘चलो, अपना बैग उठाओ, जल्दी चलते हैं वरना ट्रेन निकल जाएगी.’’

‘‘अभी तो अम्माबापू इस हाल में हैं. इन से पूछे बिना…’’

‘‘इन से अब क्या पूछना. उस दिन तुम्हारे सामने ही इन्होंने तुम्हारे जाने की अनुमति दे दी थी.’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही औनी ने कहा.

मेरा मन कर रहा था कि जाने से पहले एक बार अम्माबापू से बात कर लेती तो अच्छा रहता. पर वे जितने गहरे नशे में थे, उस से लग रहा था कि शाम से पहले होश में नहीं आएंगे.

लिहाजा उन से बिना बताए ही मैं हाथ में बैग ले कर औनी आंटी के पीछेपीछे चल दी. कुछ दूर पैदल चलने के बाद एक घोड़ाबुग्गी से हम पक्की सड़क तक आए. वहां से बस पकड़ कर हम रेलवे स्टेशन पहुंचे. फिर रात को हम सब दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए.

मैं पहली बार ट्रेन में बैठी थी. आंटी से कह कर मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी. हालांकि बाहर अंधेरा था, पर जैसे ही ट्रेन चली, मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखने की कोशिश करती रही. औनी आंटी ने ट्रेन में सभी पांचों लड़कियों को खूब खिलायापिलाया. उन के साथ रहने पर हमें महसूस नहीं हो रहा था कि हम अपने मांबाप से दूर हैं.

दिल्ली पहुंचने पर स्टेशन पर औनी आंटी ने एक आदमी से बात की और 3 लड़कियों को उस के हवाले कर दिया. आंटी ने बताया कि इन तीनों की नौकरी मुंबई में लग रही है, इसलिए इन्हें मुंबई भेजा जा रहा है. तुम दोनों को दिल्ली में ही रखा जाएगा. इस के बाद वह हमें एक होटल में ले गईं. किसी होटल में मैं पहली बार गई थी. आंटी ने होटल से ही किसी को फोन किया तो एक व्यक्ति वहां आया. मेरे साथ वाली लड़की को उन्होंने उस के साथ भेज दिया.

अब मैं अकेली रह गई थी. होटल में खाना खिलाने के बाद औनी आंटी मुझे एक औफिस में ले गई. वहां बैठे आदमी ने मेरे नाम का एक फौर्म भरा. मुझे उस औफिस में बिठाने के बाद औनी मुझ से यह कह कर चली गई कि यह कहीं न कहीं तुम्हारी नौकरी लगवा देंगे. समयसमय पर मैं मिलती रहूंगी.

औनी आंटी के जाने के बाद औफिस में बैठा व्यक्ति मुझ से बातें करने लगा. उस ने मेरे परिवार के बारे में पूछा. उस ने यह भी पूछा कि मुझे क्या क्या काम आता है. मैं घर के सब काम करना जानती थी. तब उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘फिलहाल तुम्हें एक कोठी में काम करने के लिए भेजा जाएगा. तुम्हें वहां खाना बनाने से ले कर सारे काम करने होंगे. रहनाखाना फ्री होगा. अगर वहां से तुम्हारी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली तो तुम्हें दूसरी अच्छी जगह भेज दिया जाएगा.’’

उस औफिस का एक लड़का मुझे एक कोठी में छोड़ आया. वह एक आलीशान कोठी थी. वहां परिवार में केवल 4 लोग थे, लेकिन इस से ज्यादा वहां नौकर थे. कोठी की मालकिन ने मुझे घर के छोटेमोटे काम करने की जिम्मेदारी दी. अपनी जिम्मेदारी के साथ मैं कोठी के काम निपटा देती. मुझे उस कोठी में काम करते हुए 5-6 महीने बीत गए तो एक दिन मैं ने मालकिन से अपनी तनख्वाह के बारे में पूछा. उन्होंने बताया, ‘‘तुम यहां एक प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए आई हो. प्लेसमेंट एजेंसी वाला तुम्हारी सैलरी तुम्हारे घर भेजता है.’’

इस बात से मुझे भी तसल्ली हो गई कि हर महीने पैसे मेरे घर भेजे जाते हैं. कोठी में जितने नौकर थे, सब की मुझ पर गिद्ध दृष्टि रहती थी. मेरी उम्र 18 साल हो चुकी थी. मैं उन की नजरों को अच्छी तरह समझती थी. वहां के ड्राइवर और माली कभी कभी मुझ से मजाक भी करते और शारीरिक छेड़छाड़ भी. इस की शिकायत मैं ने मालकिन से इसलिए नहीं की कि कहीं वह उलटे मुझे ही नौकरी से न निकाल दें. उस कोठी में मैं ने 2-3 साल काम किया.

इस के बाद उस प्लेसमेंट एजेंसी द्वारा मुझे अलग अलग घरों में काम पर भेजा गया. मैं ने लोगों से खुद को बचाने की भरसक कोशिश की, पर मैं अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सकी. मैं असहाय थी. दिल्ली में मेरा कोई नहीं था, इसलिए न चाहते हुए भी मैं सब सहती रही. कई लोगों ने मुझे भोगा. मुझे केवल प्लेसमेंट एजेंसी का पता मालूम था. मैं कभी उस से अपने घर वालों के बारे में पूछती तो वह कह देता कि औनी तुम्हारी तनख्वाह तुम्हारे घर वालों तक पहुंचा आती है.

करीब दो-ढाई साल पहले प्लेसमेंट एजेंसी ने मुझे एक ऐसी कोठी में काम करने के लिए भेजा, जहां एक बूढ़ी बीमार महिला थी. मेरा काम उस महिला की सेवा करना था.

मेरी सेवा से सभी संतुष्ट थे. बीते साल अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में उस बूढ़ी महिला की मौत हो गई. उन की मौत के सप्ताह भर बाद ही कोठी वालों ने मुझ से कह दिया कि अब यहां तुम्हारी जरूरत नहीं है. फिर पहली नवंबर को मैं प्लेसमेंट एजेंसी पहुंची तो वहां पर ताला लटका हुआ मिला.

मैं ने सोचा कि ये लोग कहीं गए होंगे. उन के लौटने का इंतजार करने के लिए मैं वहीं बैठ गई. भूखीप्यासी मैं दोपहर तक बैठी रही. मेरे इस तरह बैठे रहने पर पड़ोसी दुकानदार ने मेरे वहां बैठने की वजह पूछी. मैं ने जब उसे बताया कि मैं प्लेसमेंट एजेंसी वालों के इंतजार में हूं, तब उस ने बताया कि वे तो औफिस खाली कर के यहां से चले गए.

यह सुन कर मेरे जैसे होश उड़ गए. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं. दिल्ली में कहां जाऊं. मन कर रहा था कि अपने मांबाप के पास ही चली जाऊं, लेकिन वहां से आए हुए मुझे 10 साल हो चुके थे. अपने घर का पता तक मुझे नहीं मालूम था. हाथ में बैग उठाए मैं वहां से एक लालबत्ती के पास आ कर बैठ गई. बाद में पता चला कि वह जनकपुरी की लालबत्ती थी.

कहीं जाने या पेट भरने के लिए मेरे पास पैसे भी नहीं थे. लिहाजा मैं दिन भर वहीं बैठी रही. गाडि़यों के रुकते ही कुछ बच्चे और महिलाएं भीख मांगने लगते थे, पर ऐसा करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मैं लाचार निगाहों से गाड़ी चलाने वालों की तरफ देखती कि शायद किसी की दयादृष्टि मुझ पर पड़ जाए. लोग मेरी तरफ देखते तो थे, पर ग्रीन लाइट होते ही निकल जाते थे. मुझे उस लालबत्ती के पास ऐसे ही भूखेप्यासे बैठे 3 दिन हो गए. वहां भी हवस के भेडि़यों की मुझ पर नजरें जमी रहीं. रात होते ही भीख मांगने वाले और आवारा किस्म के लड़के मेरे पास आ कर बैठ जाते थे.

चूंकि वहां स्ट्रीट लाइटों की पर्याप्त रोशनी थी, इसलिए मेरे साथ मनमरजी करने की उन की हिम्मत नहीं होती थी, पर वे मुझे लालच दे कर वहां से कहीं दूसरी जगह चलने को कहते थे. मैं उन का असली मकसद समझ चुकी थी, इसलिए मैं उन के साथ जाने को मना कर देती. मैं ने तय कर लिया था कि भले ही मैं भूख से मर जाऊं, पर अब ऐसे लोगों के बहकावे में नहीं आऊंगी.

4 नवंबर, 2016 को भी मैं उसी लालबत्ती के पास बैठी थी. तभी एक कार से एक खूबसूरत युवती उतरी. उन की आंखों पर चश्मा लगा हुआ था और वह जींसटौप पहने हुए थीं. मैं उन्हें टुकुर टुकुर देख रही थी. कार से उतरने के बाद वह सीधे मेरी तरफ आने लगीं. मैं सोचने लगी कि पता नहीं यह मेरे पास ही क्यों आ रही हैं. वह मेरे पास ही उकड़ूं बैठ कर बोलीं, ‘‘मैं कई दिनों से देख रही हूं कि तुम बैग लिए यहीं बैठी मिलती हो. तुम्हें भीख मांगते हुए भी नहीं देखा. तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?’’ उन की बात सुन कर मुझे लगा कि वह हमदर्द हैं. मैं ने उन्हें अपनी पूरी कहानी बता दी. मेरी कहानी सुन कर उन्होंने अपना नाम मीनाक्षी मल्होत्रा बताते हुए आगे कहा कि वह एक एनजीओ चलाती हैं, मुझे मेरे घरवालों से मिलाने में पूरी सहायता करेंगी. मैं बड़ी खुश हुई. फिर वह मुझे अपनी कार में बिठा कर अपने औफिस ले गईं.

मैं कई दिनों से नहाई नहीं थी. नहाने के बाद उन्होंने मुझे खाना खिलवाया. कई दिनों की भूखी थी, इसलिए मैं ने पेट भर कर खाना खाया. इस के बाद मेरे शरीर में जान आई. खाना खा कर मैं उन के औफिस में बैठ गई. औफिस में उस समय एक युवक और 2 युवतियां और बैठी थीं. मीनाक्षी मैडम ने उन युवतियों का परिचय शालू वर्मा और अनिता वर्मा के रूप में कराया और उन के साथ जो सज्जन बैठे थे, उन्हें वरिष्ठ पत्रकार विक्रम गोस्वामी बताया. मीनाक्षीजी ने बताया कि वे सब सभी एनजीओ में उन के साथ ही काम करते हैं.

उन्होंने मुझ से पूछा तो मैं ने बता दिया कि मैं उड़ीसा के सुंदरगढ़ की हूं. तब वे सभी मुझे मेरे घर पहुंचाने के बारे में बातें करने लगे. उन्होंने मेरे सामने ही तय किया कि वे कार से मुझे उड़ीसा ले जाएंगे. बात मेरे घर जाने की थी, इसलिए मैं ने उन के साथ जाने के लिए हां कर दी. वह अपने साथियों के साथ मुझे कार में बैठा कर 9 नवंबर की रात 12 बजे दिल्ली से चल दीं. बीचबीच में रुकतेरुकते हम तीसरे दिन उड़ीसा पहुंच गए. मैं अपने घर वालों के पास जा रही थी, इसलिए उड़ीसा पहुंचने के बाद मेरी उन से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

मुझे अपने घर के बारे में सही जानकारी नहीं थी, इसलिए वे सुंदरगढ़ में मेरे परिवार के बारे में पूछने लगे. पर सफलता नहीं मिली. तब पत्रकार विक्रम गोस्वामी ने उड़ीसा के पत्रकार मोहम्मद शब्बीर और डंबरू से संपर्क किया. ये दोनों किसी अखबार में थे. वे भी मेरे मांबाप के नाम से उन का पता नहीं लगा पाए. मैं भी परेशान हो रही थी कि अब घर वालों से कैसे मिल पाऊंगी. बातोंबातों में मेरे मुंह से निकल गया कि औनी आंटी मुझे और 4 अन्य लड़कियों को ले कर दिल्ली गई थी. यह सुन कर पत्रकार मोहम्मद शब्बीर चौंके. उन्होंने बताया कि औनी को यहां सभी जानते हैं. वह गरीब परिवार की लड़कियों को बेचने का धंधा करती है. करीब 5 साल पहले उन की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने उसे सुंदरगढ़ के बसअड्डे से कई लड़कियों के साथ गिरफ्तार किया था. औनी रानी बगीचा में रहती थी, इसलिए वे सभी मुझे रानी बगीचा ले गए. गांव के रास्ते पर पहुंचते ही मुझे अपना गांव याद आ गया. गांव पहुंचने पर पता चला कि मेरी अम्मा और बापू गांव से कहीं चले गए हैं. उसी गांव में मेरी बड़ी बहन पिंकी रहती थी. मीनाक्षी मैडम और उन के साथी लोगों से पूछताछ कर के मुझे मेरे जीजा सुनील कुल्लू के यहां ले गए. अपनी बहन और जीजा को देखते ही मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. मैं बहन के गले लग कर रोने लगी.

10 सालों बाद मैं गांव पहुंची थी. वहां बहुत कुछ बदल गया था. जीजा ने बताया कि जब आयशा कई साल बाद भी गांव नहीं आई और न ही इस का कोई समाचार मिला तो उस ने औनी से उस के बारे में पूछा था. औनी ने उन्हें बताया था कि आयशा जहां काम करती थी, वहां से किसी के साथ भाग गई है. यह जानकारी मिलने पर सुनील दिल्ली गया. अपने जानने वालों के साथ उस ने मुझे तलाशने की कोशिश की, जब कहीं पता नहीं चला तो वह निराश हो कर लौट आया.

मीनाक्षी और उन के साथियों ने एसपी निखिल कनोडिया के समक्ष आयशा राऊत को उस के जीजा सुनील कुल्लू और बहन पिंकी के सुपुर्द कर दिया. उन्होंने औनी के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग करते हुए उन 4 लड़कियों का भी पता लगाने की मांग की, जो 10 साल पहले आयशा के साथ दिल्ली गई थीं. औनी की तरह और भी अनेक माफिया उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, बिहार आदि राज्यों से लड़कियों को बहलाफुसला कर दूसरे शहरों में बेचने के धंधे में लगे हुए हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग देश में एक गंभीर समस्या बनी हुई है. सरकार को इस समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है.

संघर्ष के दिनों में गैरेज में रहता था अनिल कपूर का परिवार

झक्कास अभिनेता अनिल कपूर बौलीवुड के ऐसे हीरो हैं जिनकी बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं दिखता. 60 साल की उम्र में भी उनमें युवाओं जैसी एनर्जी है. अनिल कपूर के फिल्‍मी करियर की शुरुआत फिल्‍म ‘हमारे तुम्‍हारे’ के एक छोटे से किरदार से हुई. उनके हार्डवर्क और बेहतरीन एक्टिंग की वजह से उनका नाम बी-टाउन में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है.

युवाओं को आज भी अपनी एक्टिंग के साथ-साथ स्टाइल से चुनौती देने वाले अनिल कपूर की लाइफ हमेशा से इतनी आसान नहीं थी. क्या आप जानते हैं कि अनिल कपूर जब मुंबई आए थे तो उनका परिवार गैरेज में रहा करता था.  नहीं जानते तो कोई बात नहीं चलिए आज हम बताते हैं.

अपने 40 साल के करियर में अनिल कपूर ने 100 से भी अधिक फिल्में की हैं जिनमें ‘तेजाब’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘विरासत’, ‘पुकार’, ‘ईश्वर’, ‘स्लमडौग मिलियनेयर’ और ‘बुलंदी’ जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल हैं. लेकिन अनिल कपूर की लाइफ हमेशा से इतनी शानदार नहीं थी.

कड़ी मेहनत और लंबे संघर्ष करने के बाद उन्होंने दुनियाभर में नाम कमाया है. यहां तक कि जब अनिल कपूर पहली बार मुंबई आए थे तो उनका परिवार एक गैरेज तक में रहने को मजबूर था. जी हां, आज भले ही अनिल कपूर ने देश दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली है, लेकिन जब उनका परिवार मुंबई आया था तो वो शो मैन राज कपूर के गैरेज में रहते थे.

इसके बाद उन्होंने मिडिल क्लास इलाके में एक कमरा किराए पर ले लिया था. अनिल कपूर के पिता सुरेंद्र कपूर की लगन के चलते उनके परिवार को एक अच्छी लाइफ मिल पाई. सुरेंद्र कपूर फिल्म डायरेक्टर थे इसलिए अनिल का रुझान शुरू से फिल्मों की तरफ रहा. अनिल ने बतौर लीड एक्टर अपनी पहली डेब्यू फिल्म 1980 में तेलुगु सिनेमा में की थी.

आपको बता दें कि अनिल कपूर ने कई सारे विदेशी फिल्मों मे भी काम किया है. अनल कपूर 60 साल के हैं लेकिन उन्हें देखकर कोई भी ये नहीं कह सकता कि वो इतने बड़े हैं. अनिल कपूर खुद को लेकर काफी सतर्क रहते हैं. यही वजह है कि अनिल जहां भी जाते हैं उनसे उनके जवान बने रहने का राज पूछा जाता है. फिलहाल अनिल कपूर ‘फन्ने खां’ की शूटिंग में व्यस्त हैं.

शेफ : पिता पुत्र के रिश्ते पर बेहतरीन फिल्म

काम, प्यार और रिश्तों को रेखांकित करने वाली फिल्म ‘‘शेफ’’ मूलतः 2014 की सफलतम अमरीकन फिल्म ‘‘शेफ’’ का भारतीयकरण है. फिल्मकार ने इस फिल्म में पिता व पुत्र के रिश्ते को बेहतर तरीके से उकेरा है. इसी के साथ यह फिल्म इंसान के अंदरुनी अंतद्वंद का बेहतर चित्रण करती है.

फिल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले युवक रोशन कालरा (सैफ अली) की है, जिसे बचपन से ही खाना बनाने का शौक रहा है. उसके अपने कुछ सपने हैं. वह मषहूर शेफ बनना चाहता है, पर यह बात रोशन कालरा के पिता (रामगोपाल बजाज) को पसंद नहीं है. इसी के चलते एक दिन वह घर से भागकर चांदनी चौक में छोले भठूरे बनाने वाले राम लाल के पास जाता है, पर वह उसे समझकर घर जाने के लिए कहते हैं.

वह रामलाल चाचा को मना नहीं कर पाता, पर भागकर अमृतसर चला जाता है. वहां एक ढाबे में रहकर खाना बनाना सीखता है और फिर एक दिन वह अमरीका के गली किचन का मशहूर शेफ बन जाता हैं. इस बीच उसने एक मशहूर नृत्यांगना राधा मेनन (पद्मप्रिया जानकी रमन) से पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी की. जिससे उसका एक बेटा अरमान (मास्टर स्वर कांबले) है. पर बहुत जल्द तलाक हो जाता है. अब राधा कोचीन में रहती है.

फिल्म शुरू होती है अमरीका के न्यूयार्क शहर के गली किचन से. जहां एक ग्राहक रोशन कालरा को बुलाकर कहता है कि वह कैसा शेफ है, उसे उनका खाना पसंद नहीं आया. इसी बात पर बहस हो जाती है. गुस्से में रोशन कालरा उस ग्राहक की नाक तोड़ देते हैं. रोशन को पुलिस पकड़कर ले जाती है. गली किचन के मालिक उसे छुड़ाकर लाते हैं. पर उसे नौकरी से निकाल देते हैं.

उसी वक्त राधा, रोशन को फोन करके कहती है कि वह बेटे अरमान से बात कर ले. अरमान अपने पिता से अपने स्कूल में अपने पहले नृत्य के कार्यक्रम को देखने के लिए बुलाता है, पर व्यस्तता का बहाना कर रोशन उसे मना कर देता है. मगर गली किचन में उसकी सहायक रही विन्नी (शोभिता धुलीपाला) के समझाने पर वह प्लेन पकड़कर न्यूयार्क से कोचीन पहुंचता है. बेटा अरमान खुश हो जाता है. एक दिन अरमान के साथ वह बीजू (मिलिंद सोमण) की बोट पर पूरे दिन का आनंद लेता है और उसे अहसास होता है कि उसकी पूर्व पत्नी राधा अब बीजू से शादी करने वाली है.

उधर कुछ दिन के लिए राधा को नृत्य के शो के लिए यूरोप जाना है, तो वह चाहती है कि अरमान के साथ रोशन रहे. उस वक्त रोषन, अरमान के साथ दिल्ली और अमृतसर जाता है तथा उसे अपने बचपन की कहानी सुनाता है. यूरोप से वापस आने के बाद एक दिन बीजू, रोशन को अपने घर बुलाकर उसके सामने अपनी दो मंजिला बस में चलता फिरता होटल खोलने का प्रस्ताव रखता है, जिसे रोशन ठुकरा देता है. इस बात पर राधा से उसकी कहा सुनी होती है.

अंत में रोशन, बीजू के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है. रोशन उस बस को रंग कर होटल के अनुरूप ढालता है. इसी बीच गली किचन में उसे गुरू मानने वाला उसका दोस्त भी वापस आ जाता है. रोशन इस बस को लेकर कोचीन से गोवा होते हुए दिल्ली पहुंचते है. रोशन के साथ उनका दोस्त व बेटा अरमान भी है. दिल्ली में रामलाल चाचा के साथ रोशन के पिता भी आते हैं और रोशन को माफ कर देते हैं. दिल्ली पहुंचते ही एक तरफ अरमान को वापस कोचीन जाना है, क्योंकि उसका स्कूल खुलने वाला है, इसलिए उसे लेने राधा आती है, तो वहीं रोशन को एक अमरीकन होटल में शेफ की नौकरी का आफर आता है. पर बेटे अरमान के प्यार और अरमान के साथ सदैव रहने के लिए रोशन अमरीका की नौकरी का आफर ठुकरा देता है. फिर रोशन बेटे अरमान व पूर्व पत्नी राधा के साथ रहते हुए अपने रास्ता होटल को जारी रखते हैं.

साधारण कहानी में पिता पुत्र के रिश्ते व वैवाहिक संबंधों के बिखरने पर अच्छा संदेश भी है. रोजमर्रा की जिंदगी में काम और निजी जिंदगी को लेकर यह फिल्म सोचने पर मजबूर करती है. मगर पटकथा के स्तर पर काफी गड़बड़ियां है. फिल्म का क्लायमेक्स भी अच्छे ढंग से नहीं लिखा गया. फिल्म में आम मसाला प्रेम कहानी नहीं है. कोचीन में राधा के घर पर मजदूर यूनियन का पूरा सीन जबरन ठूंसा हुआ और बेमानी है. एडीटिंग टेबल पर फिल्म को कसने की काफी जरुरत थी.

राधा मलयाली है, इसलिए फिल्म में मलयाली संवाद भी रखे गए हैं. यदि ऐसा न होता, तो भी फिल्म की गुणवत्ता पर फर्क नहीं पड़ता. फिल्म में रोशन कालरा को महान शेफ बताया गया है, मगर इस तरह के सीन चित्रित नही हो पाए. रोशन कालरा को बार बार पास्ता या पिजा बनाते हुए ही दिखाया गया है. वैसे फिल्म में रंग, स्वाद, खाना पकाने के आनंद की संवेदनशीलता का चित्रण है. कुछ कमियों के बावजूद यह दिल को छू लेने वाली और देखने लायक फिल्म है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक 40 साल के तलाकशुदा शेफ, जो अहसास करता है कि वह अच्छा पिता नहीं बन पाया और फिर एक अच्छा पिता बनने के प्रयास वाले रोशन कालरा के किरदार में सैफ अली खान ने काफी अच्छी परफार्मेंस दी है. रोशन कालरा के बेटे के किरदार में स्वर कांबले ने भी जबरदस्त अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया है. पद्मप्रिया जानकी रमण की मुस्कान तो दर्शकों को अपना बना लेती है. वह फिल्म में काफी सुंदर और आर्गेनिक लगी हैं. छोटे से किरदार में मिलिंद सोमण और चंदन राय सान्याल भी जमे हैं.

फिल्म में केरल की खूबसूरती को भी बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया गया है. तो वहीं अमृतसर व दिल्ली की लोकेशन भी अच्छी है.

दो घंटे 12 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘शेफ’’ का निर्माण भूषण कुमार, किशन कुमार, राजा कृष्ण मेनन, विक्रम मल्होत्रा व जननी रवि चंद्रन ने किया है. फिल्म के निर्देशक राजा कृष्ण मेनन, लेखक रितेश शाह, सुरेश नायर व राजा कृष्ण मेनन, संगीतकार रघु दीक्षित व अमाल मलिक, कैमरामैन प्रिया सेठ व कलाकार हैं-सैफ अली, राम गोपाल बजाज, शोभिता धुली पाला, मास्टर स्वर कांबले, पद्मप्रिया जानकी रमन, चंदन राय सान्याल, दिनेश प्रभाकर, नेहा सक्सेना, पवन चोपड़ा व अन्य.

गुरु के गांव को भूल गए चेले

सिताब दियारा की चांद दियारा पुलिस चैकपोस्ट के बाद जयप्रकाश नारायण के गांव लाला टोला जाने के लिए कच्ची और गड्ढों से भरी सड़कों से पाला पड़ता है. हिचकोले दर हिचकोले खाती गाड़ी को देख कर पता ही नहीं चलता है कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा है.

बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों के तरक्की के दावों का वहां कहीं नामोनिशान नहीं मिलता है. गांव की हालत देख कर मुंह से बरबस यही निकल पड़ता है, ‘यहां तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां, मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा.’

11 अक्तूबर, 1902 में सिताब दियारा के ही लाला टोला गांव में जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था. उन के चेले नीतीश कुमार बिहार की सत्ता पर काबिज हैं और हर चुनाव में उन के नाम पर सियासत करते रहे हैं. इस के बाद भी वे अपने सियासी गुरु के गांव की बदहाली से बेखबर हैं.

जयप्रकाश नारायण का गांव सिताब दियारा हर साल गंगा और सरयू नदी की बाढ़ में डूब जाता है. बारिश के मौसम में हर साल सिताब दियारा के वजूद पर खतरा मंडराता रहता है.

गांव का एक किसान सिपाही राय बताता है कि बाढ़ के समय बालू के कुछ बोरे नदी के किनारे डाल कर सरकार अपना काम पूरा होना मान लेती है, पर गांव के लोग हर पल जानलेवा खतरे से जूझने के लिए मजबूर हैं.

सिताब दियारा की बदहाली की कई वजहें हैं. सब से बड़ी वजह इस का बिहार और उत्तर प्रदेश राज्यों के बीच फंसा होना है.

सिताब दियारा में कुल 37 टोले हैं. 10 टोले बिहार में और 27 टोले उत्तर प्रदेश में पड़ते हैं. इस से दोनों राज्यों की सरकारों और उन के अफसरों के बीच खींचतान चलती रहती है और अपनी जिम्मेदारियों को एकदूसरे पर डाल कर पल्ला झाड़ते रहते हैं.

लाला टोला गांव के हरि लाल गुस्से से कहते हैं कि जेपी के गांव को उन के चेलों ने ही तबाह कर दिया है. आज कई दलों और सरकारों में उन के चेले बैठे मलाई चाट रहे हैं, पर कहीं भी कोई भी जेपी का नामलेवा नहीं है.

लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान, नरेंद्र सिंह समेत कई बड़े और ताकतवर नेता जेपी की संपूर्ण क्रांति की ही उपज हैं. उन्हीं लोगों ने जेपी के गांव को ही नहीं, बल्कि उन के सपनों और संपूर्ण क्रांति के मकसद को ही मटियामेट कर के रख दिया है.

गांव में बिजली, पानी, सड़क वगैरह की हालत बदतर है. साल 2011 के बाद वहां बिजली की रोशनी कौंधी, तो गांव वालों की आंखें चुंधिया गई थीं.

बिजली इसलिए नहीं पहुंचाई गई थी, क्योंकि जेपी के चेलों को अचानक जेपी और उन के गांव की याद आ गई हो या उन्होंने अपनी गलती को सुधारने की कोशिश की हो.

गांव में बिजली गांव वालों के लिए नहीं, बल्कि भाजपा के नेता लाल कृष्ण आडवाणी के लिए पहुंची थी. उन्होंने 11 अक्तूबर, 2011 को सिताब दियारा से ही अपनी ‘जनचेतना यात्रा’ की शुरुआत की थी. उस से पहले 9 अक्तूबर को बिहार के तब के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने खुद वहां मौजूद रह कर गांव में बिजली का टांसफार्मर लगवाया था और बिजली का बल्ब जलवाया था.

बिहार बिजली बोर्ड को गांव में बिजली पहुंचाने में दिक्कतें हो रही थीं, तो उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड से करार कर के बिजली की लाइन खींची गई थी.

रामेश्वर टोले का मधु राय कहता है कि जेपी के नाम पर तो आज तक सिताब दियारा में बिजली नहीं पहुंची, पर लाल कृष्ण आडवाणी के 10 मिनट के लिए आने की वजह से ही गांव रोशन हो गया था.

वहीं हरकिशोर बताता है कि मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए उसे पड़ोसी राज्य (उत्तर प्रदेश) में जाना पड़ता है. यहां बिजली रहती है, तो उस की आंखमिचौली चलती रहती है.

गंगा और सरयू (घाघरा) नदियों के संगम से घिरे सिताब दियारा में साल 2011 में बिजली तो पहुंचा दी गई थी, पर उस के बाद से रखरखाव करने वाला कोई नहीं है.

गांव का किसान महेश कुमार कहता है कि उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड के भरोसे कितने दिनों तक बिजली मिलती? नेताजी के जाते ही बिजली भी चली गई.

जेपी के गांव तक जाने वाली सड़क का भी वही हाल है, जो संपूर्ण क्रांति का हुआ. सड़कें इतनी खराब हैं कि लाल कृष्ण आडवाणी का रथ वहां तक पहुंच ही नहीं पाया और मजबूरी में उनको अपनी यात्रा छपरा से शुरू करनी पड़ी थी.

लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार जैसे कई बड़े नेता खुद को जेपी का चेला बता कर इतराते रहते हैं, लेकिन उन्हें जेपी के गांव को बचाने की कोई ललक ही नहीं है.

जेपी के नाम पर स्मारक, लाइब्रेरी, सभागार, म्यूजियम वगैरह बनाने का ऐलान हुआ, पर सारे के सारे ऐलान कागजी बन कर ही रह गए.

विक्टोरिया एंड अब्दुल : देखने लायक फिल्म

इतिहास के पन्नों को सिनेमा के परदे पर उतारना आसान नहीं होता है. मगर ब्रिटिश फिल्मकार स्टीफन फ्रेअर्स की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इतिहास के एक अध्याय को बहुत बेहतर तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा है. कहानी 1887 से 1909 के बीच की है, जब ब्रिटिशों का भारत में शासन था.

फिल्म की कहानी भारत में आगरा से शुरू होती है. आगरा में रहने वाला एक मुस्लिम युवक अब्दुल करीम (अली फजल) ब्रिटिश शासन में आगरा की जेल में कैदियों का रजिस्टर में नाम लिखने का काम करता है. उसके काम से प्रभावित होकर लंदन में ब्रिटिश रानी विक्टोरिया (जूडी डेंच) को मोहर देने के काम के लिए भेजा जाता है. वहां अब्दुल मोहर देने के बाद रानी से कहता है, ‘‘जिंदगी कारपेट की तरह है. हम भारत में इसे बुनकर एक नया पैटर्न देते हैं.’’ इससे रानी, अब्दुल से प्रभावित होकर अपना निजी सहायक बना लेती है, फिर उसे अपना मुंशी बनाकर उससे उर्दू सीखने लगती है. इससे पूरा बैकिंघम पैलेस नाराज हो जाता है. सभी लोग अब्दुल के खिलाफ साजिश रचना शुरू करते हैं. जबकि रानी, अब्दुल की बात से प्रभावित होकर बैकिंघम पैलेस के ही अंदर एक भारतीय दरबार हाल बनवाती है. अब्दुल करीम को भारत भेजकर उसके परिवार को वहां रहने के लिए बुलाती है.

कहानी में कुछ उतार चढ़ाव भी आते हैं. एक बार रानी, अब्दुल से लंदन छोड़ने के लिए कह देती है, पैलेस के लोग खुश होते हैं, पर फिर रानी, अब्दुल को रोक लेती है. अपने बीमार होने और जीवन के अंतिम पलों में यहां तक की अब्दुल को बगल में खड़ा कर ही विक्टोरिया इस संसार से विदा लेती है. 1904 मे विक्टोरिया की मौत के साथ ही अब्दुल को लंदन से आगरा, भारत वापस आना पड़ता है ओर 1909 में अब्दुल की आगरा में मौत होती है.

फिल्म में इस बात का बेहतर तरीके से रेखांकन किया गया है कि उस वक्त विक्टोरिया रंगभेद से दूर थी. पटकथा लेखक ली हाल्स ने सत्य कथा को अच्छे ढंग से ड्रामा के रूप में पेश किया है. फिल्म में नाटकीय घटनाक्रमों के बीच कुछ हास्य के दृष्य भी पिरोए गए हैं. पर सत्य घटनाक्रमों को कहानी में ज्यादा महत्व दिया गया है, जो कि दर्शक को काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता है. 1887 से 1904 के माहौल का फिल्म में सही ढंग से चित्रण है पर निर्देशक के तौर पर कुछ जगह स्टीफन फ्रेअर्स मात खा गए हैं. जहां तक गीत संगीत का मसला है, तो कुछ भी नया नहीं है.

अभिनेत्री जुडी डेंच महान अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है. इस फिल्म में विक्टोरिया के किरदार को निभाते हुए उन्होंने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. जिस तरह से भावनात्मक अभिनय किया है, उसे देखकर दर्शक बार बार उन्हें देखने की प्यास लिए ही सिनेमा घर से बाहर निकलते हैं. अब्दुल के किरदार में बड़ा भावुक अभिनय अली फजल ने किया है. फिल्म के कई दृश्यों में सिर्फ जूडी डेंच और अली फजल होते हैं और हर दृश्य में कमाल का अभिनय अली फजल ने किया है. वह एक भी दृश्य में जूडी डेंच के सामने कमजोर नहीं पड़ते हैं. अदील अख्तर ने भी अपनी उपस्थिति अच्छे ढंग से दर्ज करायी है.

एक घंटे 52 मिनट की फिल्म ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ का निर्माण बीबीसी, ‘वर्किंग टाइटल फिल्मस’ और युनिवर्सल कंपनी ने किया है. फिल्म के निर्माता हैं बीबन क्रिडन, एरिक फेलनर, टिम बिवान और टै्सी सीर्वाड. फिल्म की कहानी श्राबनी बसु के उपन्यास ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ पर आधारित है. पटकथा लेखक ली हाल, संगीतकार थौमस न्यूमन, कैमरामैन डैनी कोहेन हैं तथा कलाकार हैं- जूडी डेंच, अली फजल, अदील अख्तर, एड्डी इजार्ड, टिम पिगौट स्मिथ, सिमौन कौलौ, मिचैल गैम्बोन, जुलियन वधम, जोनाथन हार्डेन और अन्य.

आदिवासियों को बेदखल करने की साजिश

झारखंड में रांची शहर के पास नामकुम इलाके का रहने वाला आदिवासी सुरेश उरांव गुस्से में कहता है, ‘‘आदिवासी जान दे देगा, पर जंगल और जमीन नहीं छोड़ेगा. आदिवासियों के राज्य में आदिवासियों को जंगल और जमीन से उजाड़ कर तरक्की हो ही नहीं सकती. उद्योग लगाने के नाम पर आदिवासियों को हटाया जाता है, पर न उन्हें मुआवजा मिलता है, न उद्योग ही लग पाता है.’’

सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव कर सरकार ने आदिवासियों से उन का हक छीनने की जबरदस्त साजिश रची है. आदिवासी उसे किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने देंगे.

इस मसले को ले कर एक बार फिर झारखंड में बंद, तोड़फोड़ और आगजनी का सिलसिला शुरू हो चुका है. सरकार इस मामले में यह दावा कर रही है कि इस ऐक्ट की वजह से ही राज्य और आदिवासियों की तरक्की नहीं हो पा रही थी, इसलिए उस में बदलाव करना जरूरी हो गया था.

22 नवंबर, 2016 को सीएनटी ऐक्ट (छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908) व एसपीटी ऐक्ट (संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम-1949) में बदलाव कर के रघवुर दास सरकार ने बैठेबिठाए नया झमेला मोल ले लिया है. ऐक्ट की धारा-21, धारा-49 (1), धारा-49 (2) और धारा-71 (ए) में बदलाव किया गया है.

धारा-21 में बदलाव कर गैरकृषि उपयोग के कारोबारी इस्तेमाल की इजाजत दी गई?है, पर जमीन पर रैयत का कब्जा कायम रखा गया है.

वहीं धारा 49 (1) में कहा गया है कि जमीन का मालिक सरकारी और विकास संबंधी योजनाओं के लिए जमीन को उपयोग करने के लिए दे सकता

है. स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, संचार, पंचायत, नहर, रेल वगैरह योजनाओं के लिए आदिवासी अपनी जमीन बेच सकता है. पहले ऐसा मुमकिन नहीं था.

धारा-49 (2) में सुधार कर कहा गया है कि जिस योजना के लिए आदिवासी से जमीन ली गई है, उस जमीन को उसी योजना के लिए इस्तेमाल में लाना है. दूसरे किसी काम में ऐसी जमीन का इस्तेमाल नहीं हो सकेगा.

इतना ही नहीं, अगर 5 साल तक ऐसी जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो जमीन वापस रैयत के पास चली जाएगी और रुपए भी वापस नहीं किए जाएंगे. पहले 15 साल के अंदर जमीन के इस्तेमाल करने की समय सीमा थी.

धारा-71 (ए) की उपधारा-2 में बदलाव कर यह कहा गया है कि अब आदिवासी मुआवजे के आधार पर अपनी जमीन किसी को नहीं दे सकेंगे.

मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते हैं कि सीएनटीएसपीटी ऐक्ट की वजह से राज्य में कई परियोजनाएं लटकी हुई थीं. राज्य और आदिवासियों की तरक्की की राह में रुकावट पैदा हो रही थी. किसी भी योजना को चालू करने से पहले जमीन के अधिग्रहण के लिए सीएनटीएसपीटी ऐक्ट रोड़ा बन जाता था. काफी जरूरत पड़ने पर भी आदिवासी अपनी जमीन नहीं बेच सकते थे. ऐसी जमीनों पर बैंक लोन देने से कतराते थे. ऐक्ट में बदलाव करने से आदिवासियों के साथसाथ राज्य का भी भला होगा.

विरोधी दलों ने इस बात को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया है कि सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव करने से आदिवासी की जमीन से उस का दावा खत्म हो जाएगा.

झारखंड मुक्ति मोरचा के नेता हेमंत सोरेन कहते हैं कि रघुवर सरकार आदिवासियों को जंगल और जमीन से बेदखल करने की साजिश रच रही है.

राज्य की कुल आबादी सवा 3 करोड़ है, जिस में 26 फीसदी आदिवासी हैं, जिस की चिंता सरकार को नहीं है. आदिवासियों की कब्र पर झारखंड की तरक्की का सपना देखा जा रहा है, जिसे आदिवासी हरगिज पूरा नहीं होने देंगे.

आदिवासियों की तरक्की के लिए साल 2000 में बिहार से अलग करके बने झारखंड राज्य में आज भी आदिवासियों की हालत बदतर बनी हुई है. राज्य की कोरबा जनजाति की हालत को देख कर ही आदिवासियों की बदहाली का अंदाजा लगाया जा सकता है. यह जनजाति भुखमरी में जीती है और जंगली फल और चिडि़या, चूहा, खरगोश वगैरह खा कर गुजारा करती है. साफ पानी पीने के लिए लोगों को रोज मीलों भटकना पड़ता है.

आदिवासी मजदूर जीवक बताता है कि उन लोगों का समूचा दिन खाने और पीने की चीजों की जुगाड़ में ही निकल जाता है. कोरबा जनजाति के ज्यादातर लोग महुआ की दारू और चावल खा कर गुजारा करते हैं. जंगलों में घूमघूम कर फल, फूल, लकड़ी, चूहा वगैरह ढूंढ़ना उन का काम है. कुछ लोग खेती, पशुपालन और मजदूरी करते हैं. बगैर हल, बैल, खाद, बीज और पानी की खेती कैसी होगी, इस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. महाजनों और सूदखोरों के चंगुल में फंस कर कई कोरबा बंधुआ मजदूर बन कर रह गए हैं.

आदिवासियों की जमीन के लिए पिछले कई सालों से आवाज उठा रही दयामनि बारला कहती हैं कि जनजातियों की तरक्की के लिए आजादी के बाद से ले कर अब तक की सरकारी योजनाओं का रत्तीभर भी हिस्सा उन तक नहीं पहुंच सका है. बीमार पड़ने पर कोरबा तंत्रमंत्र और ओझागुनी के चक्कर में फंस कर अपनी जनजाति को धीरेधीरे खत्म कर रहे हैं.

सुरेश कोरबा बताता है कि पहले उन के इलाके में एक डिस्पैंसरी थी, जहां दवा मिलती थी, पर 10-12 साल पहले वह भी बंद हो गई है. कोरबा इलाज के लिए ओझाओं के पास जाने को मजबूर हैं. अपनी जमीन से उजड़ने के बाद कोरबा जनजाति मिटने के कगार पर पहुंच चुकी है और सरकार कान में तेल डाल कर सो रही है.

दरअसल, झारखंड की सियासी उठापटक और लचर विस्थापन व पुनर्वास नीति की वजह से नए उद्योगों के लगने की गति में तेजी नहीं आ पा रही है, वहीं तकरीबन साढ़े 3 लाख आदिवासी विस्थापन का दर्द झेलने को मजबूर हैं.

आदिवासियों की तरक्की के नाम पर झारखंड राज्य बने 16 साल से ज्यादा हो गए हैं, पर अब तक आदिवासी अपना हक लेने के लिए दरदर भटक रहे हैं.

रांची हाईकोर्ट के वकील अभय सिन्हा कहते हैं कि अलग झारखंड राज्य बनने के बाद से अब तक तकरीबन 66 एमओयू पर दस्तखत हुए, पर एक पर भी काम चालू नहीं हो सका है.

झारखंड विस्थापन संघर्ष समिति के नेता चेतन भगत बताते हैं कि राज्य में अब तक 3 लाख से ज्यादा आदिवासी विस्थापित हो चुके हैं, इस में सब से ज्यादा विस्थापन खदानों की वजह से हुआ है. रोज नई खदानों में काम चालू होते रहे और आदिवासियों को जंगल और जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा. बड़े बांधों और सिंचाई की योजनाओं की वजह से भी विस्थापन होते रहे. कुल विस्थापितों में से 70 फीसदी आदिवासी पुनर्वास के लिए दरदर भटक रहे हैं, जिन की सुनने वाला कोई नहीं है.

आदिवासियों का रोना यह है कि उन्हें उन की जमीन से उजाड़ दिया गया और वहां कोई योजना भी शुरू नहीं हो पाती है.

रांची भूअर्जन महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, जमीन का अधिग्रहण कर महकमे को दाखिलखारिज दिला देने के बाद भी योजनाओं पर काम शुरू नहीं हो पाता है. पर महकमे ने जितनी जमीनों पर कब्जा किया है, अगर उन पर काम चालू हो जाता, तो राज्य का चेहरा ही बदल जाता.

साल 2014 तक तकरीबन 4 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर दाखिलखारिज कई महकमों को दिलाया जा चुका है, पर ज्यादातर पर काम चालू नहीं हो पाया है. इस से आदिवासियों में काफी गुस्सा है.

आदिवासी भोलन डुंगडुंग कहता है कि न तो सरकार आदिवासियों को उन की जमीन से उजाड़ कर कारखाने ही लगा सकी है और न ही आदिवासियों को मुआवजा और नई जगह पर बसाने का काम कर पाई है. इस से आदिवासियों के राज्य को दोतरफा नुकसान हो रहा है.

सरकार का दावा है कि राज्य में आदिवासियों के लिए बने छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908 और संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम-1949 जैसे कानून आज की तारीख में बेकार साबित हो रहे थे. ये कानून आदिवासियों की परेशानियों को दूर नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन के लिए रोज नई परेशानी पैदा कर रहे थे, इसलिए इस में बदलाव करना काफी जरूरी हो गया था, वहीं दूसरी ओर विरोधी दल इस मसले पर सरकार के खिलाफ गोलबंद हो गए हैं और ऐक्ट में किए गए बदलाव को वापस लेने की जिद पर अड़ गए हैं.

मुंबई में बारिश का कहर और उससे मिलते सबक

मुंबई में मूसलाधार बारिश का कहर हो, राम रहीम को ले कर पंचकूला का दंगा हो, गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों की मौतें हों, शहरों की गंदगी हो, चारों ओर अस्तव्यस्तता हो, इन सब से यह लगता है हमें शहरों में जीना न आया है और न ही हम सीख रहे हैं. नरेंद्र मोदी का शौचालय व स्वच्छ अभियान अच्छा प्रयास था पर ज्यादातर लोगों ने इसे संजय गांधी की नसबंदी का सा सरकारी कार्यक्रम मान कर फोटो खिंचवाया और इसे छोड़ दिया.

हम अभी भी शहरों में रहने लायक नहीं हुए हैं. शहरी जीवन के सामान्य तौरतरीके हमें नहीं आते. जो जमीन अपनी नहीं है वह सब की है, यह मूल सिद्घांत तक हम नहीं समझ पा रहे हैं. जो सब का है उस पर कोई भी कब्जा कर ले, कोई भी कूड़ा फेंक दे, कोई भी सामान रख दे, कोई भी आड़ीतिरछी गाडि़यां खड़ी कर दे, इसे हम अपना हक मानते हैं. कौर्पोरेशन नाम की कोई संस्था है, यह हमें मालूम ही नहीं क्योंकि वह दिखती भी नहीं है.

शहर में रहने का मतलब है कि थोड़ी सी जगह में सब हिलमिल कर रहें. अपनी सुविधाओं के साथ दूसरों की समस्याओं का भी खयाल रखना होता है. लेकिन हमें लगता है कि हमारे पास पैसे या जगह कम है तो दूसरों का फर्ज बनता है कि वे हमारे जरिए पैदा हुईं असुविधाओं को सहें.

मुंबई में इस साल बारिश में फिर कहर इसलिए बरपा क्योंकि पूरे साल मुंबई वाले इस की तैयारी करते हैं. नालियां बंद करते हैं. नालों को घर बनाते हैं. मकानों के कूड़े से नदियों को भरते हैं. सीवर साफ नहीं कराते. छतों, छज्जों पर सामान भरते हैं जो बरसात में बह कर सड़कों पर आ जाता है. सीवरों के ढक्कन चुरा लेते हैं. वे टूट जाएं तो ठीक कराने के लिए संबंधित विभाग का दरवाजा नहीं खटखटाते.

मुंबईवासी घरों में एयरकंडीशनरों की भरमार करते हैं पर बाहर वालों के लिए गरमी का इंतजाम करते हैं. बिजली के तार बिखरे पड़े रहते हैं. अच्छेभले मकानों की बालकनियों को, आड़ेतिरछे कपड़े फैला कर, भद्दा दिखाते हैं. दीवारों पर लगे पोस्टरों को साफ नहीं करते. झुग्गियों को बनने देते हैं ताकि उन्हें सस्ते कामगार मिल सकें.

इस सारी मेहनत या कहें कि लापरवाही का फल है कि वर्षारानी कभीकभार अपना प्रकोप दिखा जाती है तो फिर मुंबईवासी कलपने लगते हैं.

ऐसा सभी शहरों में होता है. कोई एक शहर नहीं जो इस से बचा हो जहां शहरी मिल कर शहर को सुखमय बनाते हों, पेड़ लगाते हों, झाडि़यों को काटते हों, पब्लिक टौयलेट बनाते हों, उन्हें साफ रखते हों. सभी शहरों में ये काम दूसरों के हैं. वे तो खुद सिर्फ बोल सकते हैं, करना कुछ नहीं है.

ऐसे में जाहिर है कभी नेचरमेड तो कभी मैनमेड प्रकोप आएंगे ही. इसे सहज ही स्वीकार कर लें. फालतू में चूंचूं करने से कोई लाभ नहीं.

मौडल सोनिका चौहान की मौत हादसा या हत्या?

फिल्म या टीवी इंडस्ट्री भले ही किसी भी भाषा से जुड़ी हुई हो, ग्लैमर इस इंडस्ट्री की पहली शर्त है. जहां ग्लैमर होता है, वहां और भी बहुत कुछ होता है. अंधेरेउजाले के दृश्य रच कर सिनेमा या टीवी के परदे पर लाने वालों के अपनी जिंदगी के असल दृश्य कभीकभी तो रंगीन न हो कर इतने काले होते हैं कि जिन्हें देख कर इंसानियत भी शरमा जाए. लेकिन पैसे का चक्कर ऐसे दृश्यों की कालिख को ढंक लेता है. यह भी कह सकते हैं कि ग्लैमर को देखने की चाह चाहे दर्शक की हो, ग्लैमर के मोहरों की हो या प्रस्तुतकर्ता की, अपना रंग तो दिखाती ही है. भले ही पीछे का परदा सफेद हो या काला. इसी चमक से पैसा बरसता है.

कभी घरघर में पहचानी जाने वाली कलर्स के सीरियल ‘बालिका वधू’ की आनंदी यानी प्रत्यूषा बनर्जी ग्लैमर के अंधेरों में खो गई. कब, कैसे, क्यों जैसे सवाल कुछ दिन तक उछलते रहे, फिर सब कुछ शांत हो गया. प्रत्यूषा का बौयफ्रैंड राहुल राज जैसे संदेह के दायरे में आया, वैसे ही निकल भी गया. बस इतना समझ लीजिए कि प्रत्यूषा को ग्लैमर के पीछे का अंधेरा निगल गया और उस प्यारी सी लड़की के लिए कोई कुछ न कर सका.

टौलीवुड यानी बंगला फिल्म एंड टीवी इंडस्ट्री का सच भी इस से जुदा नहीं है. कौन जाने इस इंडस्ट्री की खूबसूरत लड़की सोनिका सिंह चौहान की मौत के पीछे का सच भी कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि वह भी तो ग्लैमर के अंधेरों से निकल कर मौत के अंधेरे में समाई है.

धीरेधीरे सोनिका सिंह की पहचान बनती गई. सोनिका ने कोलकाता टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में बतौर मौडल, एंकर, चैनल वी की वीजे, एनडीटीवी प्राइम और स्टार स्पोर्ट्स की एंकर के रूप में काम किया. जाहिर है कुछ स्टार पुत्र या पुत्रियों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर अभिनेता, अभिनेत्री अथवा मौडल शहर या ग्रामीण क्षेत्रों के आम परिवारों से आते हैं. सोनिका सिंह भी एक मध्यमवर्गीय  परिवार से आई थी. उस के पिता विजय सिंह रौयल कलकत्ता टर्फ क्लब में सर्विस करते थे और मां शरोन सिंह घरेलू महिला थीं. विजय सिंह चौहान ने क्रिश्चियन शरोन से लवमैरिज की थी.

सोनिका सिंह ने कोलकाता में रहते हुए शुरुआती पढ़ाई ला मार्टिनियर स्कूल से की और फिर माउंट कार्मेल कालेज से आगे की पढ़ाई पूरी की. सोनिका सिंह खूबसूरत थी, इसलिए ग्लैमर की दुनिया से जुड़ना चाहती थी. यही सोच कर उस ने 2013 के मिस इंडिया कंप्टीशन में भाग लिया. इस में वह फाइनलिस्ट रही. इस के बाद उस ने मौडलिंग शुरू की.

ग्लैमर इंडस्ट्री में रहते ही उस की दोस्ती टौलीवुड के एक्टर विक्रम चटर्जी से हुई. पश्चिम बंगाल के कोलकाता का रहने वाला विक्रम चटर्जी 2012 से टौलीवुड से जुड़ा था. उस ने बंगाली फिल्मों से ले कर बांग्ला सीरियल्स तक में काम किया था. एक तरह से वह टौलीवुड का जानापहचाना चेहरा था.

उस ने जी बांग्ला के सीरियल ‘सात पाके बांधा’, स्टार जलसा के बांग्ला सीरियल ‘सोखी’, ईटीवी के बांग्ला चैनल पर 2013 में आए ‘बिगबौस’, 2014 में जी टीवी पर आए ‘इंडियाज बेस्ट सिनेस्टार की खोज’, जी टीवी के सीरियल ‘डोली अरमानों की’ और कलर्स बांग्ला के सीरियल ‘ब्योमकेश’ में काम किया.

फिल्मों की बात करें तो विक्रम चटर्जी ने मैनाक भौमिक की फिल्म ‘बैडरूम’, बाप्पादित्य बंद्योपाध्याय की फिल्म ‘इलार चार अध्याय’, अग्निदेव चटर्जी की फिल्म ‘3 कन्या’, मैनाक भौमिक की फिल्म ‘अमी आर अमार गर्लफ्रैंड’, एसके की फिल्म ‘मिस्टेक’, कौशिक चक्रवर्ती की फिल्म ‘सोनो एकती प्रीमर गाल्यो बोली’, देवार्ती गुप्ता की फिल्म ‘होई छोई’, अशोक पार्टी की फिल्म ‘अमी शुधु चेयनची टुमे’, पौंपी घोष मुखर्जी की ‘गोगोलर कीर्ती’, अंजान दास की फिल्म ‘अजाना बातास’, सुराजीत धर की ‘बिट्टू’ और प्रीतम डी. गुप्ता की फिल्म ‘साहेब बीवी गोलाम’ में काम किया था.

विक्रम चटर्जी और सोनिका सिंह की दोस्ती टौलीवुड में काम करते हुए ही हुई थी. धीरेधीरे दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए थे. घटना से 6 महीने से दोनों रिलेशनशिप में थे. 29 अप्रैल, 2017 को विक्रम और सोनिका फाइवस्टार होटल में होने वाली एक पार्टी में शामिल होने के लिए साथसाथ गए.

ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़ी पार्टियां अमूमन देर से शुरू होती हैं और देर रात तक चलती हैं. इन पार्टियों में पीना ज्यादा होता है, खाना कम. मौजमस्ती व डांस वगैरह भी खूब होता है. इस पार्टी में भी ऐसा ही हुआ. विक्रम और सोनिका सिंह घर जाने के लिए पार्टी से सुबह साढ़े 3 बजे निकले.

कोरोला एल्टीस कार विक्रम की थी, उसी ने ड्राइविंग सीट संभाली. सोनिका चौहान साथ बैठी थी. विक्रम के सिर पर शराब का नशा चढ़ा था. स्टीयरिंग संभालते ही उस ने कार को इस तरह दौड़ाना शुरू कर दिया जैसे किसी रेस में भाग ले रहा हो. नतीजतन रासबिहारी एवेन्यू के पास कार का एक्सीडेंट हो गया. इस एक्सीडेंट में सोनिका चौहान की मौत हो गई, जबकि विक्रम को भी कुछ चोटें आईं. सिर्फ इतनी चोटें कि उसे मरहमपट्टी के बाद छुट्टी दे दी गई. अस्पताल से छुट्टी मिलते ही विक्रम लापता हो गया.

पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया तो पता चला कि एक्सीडेंट के समय विक्रम ने कार सोनिका चौहान की ओर झुका दी थी, जिस की वजह से उस की ओर का एयरबैग भी नहीं खुला था.

प्राथमिक जांच के बाद कोलकाता पुलिस ने विक्रम के खिलाफ भादंवि की धारा 304ए (लापरवाही से मौत) और धारा 279 (लापरवाही से गाड़ी चलाना) के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया और उसे पूछताछ हेतु बुलाने के लिए सम्मन जारी कर दिया. लेकिन विक्रम पुलिस के पास आने के बजाय बीमारी के नाम पर एक प्राइवेट अस्पताल में भरती हो गया. उधर सोनिका सिंह को उस की मां की इच्छा पर क्रिश्चियन धर्मानुसार कब्रिस्तान में दफनाया गया.

विक्रम के सामने न आने पर इस मामले ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया. सोनिका के दोस्त सोशल साइटों पर विक्रम के खिलाफ आवाज उठाने लगे. सोनिका की खास दोस्त सतारूपा पाइने ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा— टौलीवुड के अभिनेता की नशाखोरी की वजह से एक अनमोल लड़की की मौत हो गई. वह शराब या किसी अन्य ड्रग के नशे में था. क्या मुझे इस मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल करनी चाहिए?

सोनिका की एक अन्य दोस्त फैशन डिजाइनर नवोनिल दास ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा— विक्रम, तुम्हें साथ बैठे व्यक्ति या सड़क पर चल रहे लोगों की सुरक्षा को ले कर जरा भी फिक्र नहीं थी. तुम अंधाधुंध गाड़ी चला रहे थे, जो इस एक्सीडेंट की वजह बनी. रफ्तार को आदमी खुद चुनता है, इस के लिए तुम नशे के प्रभाव को दोष नहीं दे सकते. तुम्हारे पास किसी की मौत का कारण बनने का कोई अधिकार नहीं है. जीवन के लिए तुम्हारे दिल में जरा भी सम्मान नहीं है, भले ही वह तुम्हारा अपना जीवन हो.

इस से कुछ ही दिन पहले मार्च में बांग्ला लोकगायक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य की बर्धवान जिले में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. उस समय कालिका प्रसाद की एसयूवी को ड्राइवर चला रहा था. हादसे के बाद पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया था.

ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़े इन हादसों ने कोलकाता के लोगों को स्तब्ध कर दिया था. क्योंकि ये हादसे तब हुए थे, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सड़क सुरक्षा पर जागरूकता के लिए ‘सेफ ड्राइव, सेव लाइफ’ नाम से अभियान चला रखा था.

बहरहाल, जब सोनिका चौहान की मौत के मामले में दबाव बढ़ना शुरू हुआ तो पुलिस विक्रम चटर्जी की गिरफ्तारी की कोशिश में जुट गई.

आखिरकार गरदन पर कानून की तलवार लटकती देख विक्रम ने 5 मई शुक्रवार को कोलकाता की बंकसाल कोर्ट के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट की अदालत में सरेंडर कर दिया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में वह जमानत पर बाहर आ गया.

सोनिका चौहान की मौत के मामले को ले कर चूंकि काफी हंगामा हुआ था, इसलिए पुलिस इस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है. यह भी जानने की कोशिश की जा रही है कि सोनिका चौहान की मौत का कोई अन्य एंगल तो नहीं है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मामले की जांच में कोई कोताही न बरतने का निर्देश दिया है.

उधर विक्रम चटर्जी को कई बार उस कब्रिस्तान में सोनिका सिंह की कब्र के पास देखा गया, जहां वह गुलाब के फूल ले कर जाता था. हालांकि सोनिका के घर वाले उस के इन आंसुओं को घडि़याली आंसू बताते हैं.

सोनिका सिंह के पिता विजय सिंह ने कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिख कर मांग की है कि इस मामले का गंभीरता से अन्वेषण कराएं, ताकि सच्चाई सामने आ सके. उन्हें विक्रम चटर्जी की बातों पर यकीन नहीं है.

बहरहाल, विक्रम चटर्जी की लापरवाही से हुए एक्सीडेंट की वजह से ही सही एक उभरती अदाकारा अकाल काल के गाल में समा गई.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

टटलू गिरोहों के कारनामे आपको हैरान कर देंगे

हरियाणा और राजस्थान में फैला मेवात चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के लिए मशहूर रहा है. किसी जमाने में मेवात के मेव पशुधन की चोरी किया करते थे, लेकिन पूरी ईमानदारी से. ये पशुधन चुराते थे और उस के मालिक से फिरौती ले कर उस का पशु वापस कर देते थे. इस के लिए पशु मालिक को उस के चोरी गए पशु और फिरौती के लिए बाकायदा सूचना दी जाती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. चोरियां अब भी होती हैं, लेकिन अब फिरौती ले कर माल की वापसी नहीं होती.

राजस्थान के भरतपुर, अलवर जिले और हरियाणा के नूंह, फिरोजपुर झिरका, पुनहाना, पलवल और उस के आसपास के इलाके मेवात में आते हैं. इन इलाकों में अल्पसंख्यक समुदाय के मेवों की बहुतायत है. मेवात पहले से ही पिछड़ा हुआ इलाका रहा है. हालांकि अब समय के साथ यहां हर स्तर पर बदलाव आ रहा है.

मेवात के कई युवा अब आईएएस अफसर भी बन गए हैं, साथ ही यहां के युवा अन्य विभागों में भी जा रहे हैं. खेतीबाड़ी करने वाले मेवों के रहनसहन और शिक्षादीक्षा में भी काफी सुधार हुआ है. लेकिन इस के बावजूद यहां के तमाम मेवों का पुस्तैनी धंधा अभी बंद नहीं हुआ है. अलबत्ता इस धंधे की कार्यशैली जरूर बदल गई है. अब नई पीढ़ी आधुनिक साधनों का सहारा ले कर लोगों को ठगने के नएनए हथकंडे अपनाने लगी हैं.

करीब 20-25 साल पहले मेवात के कुछ लोगों ने खुदाई में निकली सोने की ईंट के नाम पर लोगों को ठगने का धंधा शुरू किया था. देश भर में इन का यह धंधा अब भी चल रहा है. जिस तरह आजकल एटीएम नंबर पूछ कर औनलाइन साइबर ठगी की जा रही है, अब से करीब 10-15 साल पहले मेवात में उसी तरह सोने की ईंट के नाम पर ठगी का कारोबार चलता था.

शायद ही देश का कोई ऐसा राज्य और जिला हो, जहां के लोग सोने की चमक के लालच में मेवात आ कर अपनी जमापूंजी ना गंवा बैठे हों. आला अफसरों से ले कर जज, डाक्टर, व्यापारी, अभिनेता, मौडल, खिलाड़ी से ले कर आम आदमी तक इन लोगों की ठगी का शिकार बने हैं.

मेवात इलाके में सोने की ईंट के नाम पर ठगी करने वाले लोगों को टटलू और उन के गिरोह को टटलू गैंग कहते हैं. ये लोग जिसे अपना शिकार बनाते हैं, उसे टटलू काटना कहते हैं. ये लोग साइबर ठगों की तरह खुद को हरियाणा या राजस्थान का बता कर देशभर में अंजान नंबरों पर फोन कर के कहते हैं कि उन के मकान या खेत में जेसीबी से खुदाई करते समय सोने की ईंट निकली है.

ये लोग खुद को गरीब बता कर लोगों को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों में फांस कर सोने की इस ईंट को सस्ते दामों पर बेचने की बात कहते हैं, साथ ही यह भी कि पुलिस से बचने के लिए वे उस ईंट को कम दाम पर चुपचाप बेच देना चाहते हैं.

2-4 बार फोन कर के ये लोग अपने शिकार को भरोसे में ले कर अपने इलाके में बुला लेते हैं. खरीदार के मेवात इलाके में आने पर टटलूबाज उसे पहले से तैयार की गई सोने की ईंट का टुकड़ा दिखाते हैं. उस पीली धातु की चमक देख कर ग्राहक आमतौर पर उस की जांच करने की बात कहता है. इस पर टटलूबाज नमूने के तौर पर उस ईंट के एक कोने से रेती से घिस कर 100-50 मिलीग्राम बुरादा ग्राहक को दे देते हैं. ग्राहक देशभर में जहां भी सोने की जांच कराने की बात कहता है, टटलूबाज राजी हो जाते हैं और उस के साथ चले जाते हैं. जांच में सोना असली निकलता है. इस के बाद ग्राहक के मन में लालच आ जाता है. सोने की उस ईंट का सौदा होता है. टटलूबाज उस ग्राहक से उसी की हैसियत के हिसाब से सौदा कर लेते हैं.

10-20 हजार से ले कर लाख-2 लाख रुपए तक सौदा हो जाने के बाद वे ग्राहक को रकम ले कर अपने इलाके में बुलाते हैं. वह आ जाता है तो उसे 2-4 घंटे तक इधरउधर घुमाया जाता है. फिर उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर बहाने से जंगल या खेतों की तरफ ले जाया जाता है, जहां उसे नकली सोने की ईंट का टुकड़ा थमा कर उस से रकम ले ली जाती, साथ ही उस से कहा जाता कि वह जल्दी से जल्दी वहां से निकल जाए.  इस के बाद ये लोग भी वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं.

टटलूबाज कभी अकेले नहीं होते. गिरोह के 2-4 लोग साथ रहते हैं. अगर कोई ग्राहक समझदारी दिखाता है तो ये उस से मारपीट करने में भी पीछे नहीं रहते थे. मारपीट कर के उस से रकम छीन लेते हैं. जब कोई ग्राहक ईंट ले जाता है और बाद में उस की जांच कराता है तो वह पीतल की निकलती है.

ठगी के शिकार अधिकांश लोग अपनी बेवकूफी पर चुपचाप घर बैठ जाते हैं. कुछ लोग पुलिस तक पहुंचते हैं, मामला दर्ज भी होता है. पुलिस जांच भी करती है. कभीकभी कुछ टटलूबाज पकड़े भी जाते हैं. लेकिन वारदात सौ होती हैं और पकड़े जाते हैं केवल 10-20 अपराधी.

पिछले 20 सालों में राजस्थान में ऐसी हजारों वारदातें हुईर् हैं. सैकड़ों टटलूबाज पकड़े गए. कई टटलूबाज तो ऐसे हैं, जो 5-7 बार पकडे़ जा चुके हैं. छूटने के बाद ये लोग फिर नए तरीके से नए शिकार की तलाश शुरू कर देते हैं. पुलिस को इन टटलूबाजों से ठगी की रकम बरामद करने में सब से ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है. अव्वल तो रकम बरामद होती ही नहीं, होती भी है तो नाम मात्र की.

अपराधों के तौरतरीकों में आए बदलावों को देख कर अब इन टटलूबाजों ने भी अपने हथकंडे बदल दिए हैं. अब ये स्मार्ट फोन, वाट्सऐप और सोशल साइटों के माध्यम से ठगी के नये पैंतरें अपना रहे हैं. टटलूबाज अब सोने की ईंट के नाम पर लोगों को अपने झांसे में कम ही फंसाते हैं. सोशल साइटें इन के काम में मददगार बनी हुई हैं.

मेवात के एक टटलूबाज गिरोह ने चेन्नई के व्यापारी श्याम कुमार को सस्ता स्क्रैप बेचने के बहाने राजस्थान बुलाया. चेन्नई (तमिलनाडु) के जिला तिरवल्लूर के थाना तिरवर काडू के रहने वाले व्यापारी श्याम कुमार 3 मई, 2017 को हवाई जहाज से जयपुर पहुंचे. टटलूबाज गिरोह के बदमाश जयपुर के सांगानेर एयरपोर्ट पर पहले से तैयार थे.

इन बदमाशों ने श्याम कुमार को काले रंग की स्कौर्पियो में बैठा लिया. श्याम कुमार को बताया गया कि स्क्रैप का गोदाम भरतपुर में है, वहीं चलना पड़ेगा. इस के बाद ये लोग श्याम कुमार को जयपुर से स्कौर्पियो में बैठा कर भरतपुर के लिए चल दिए. भरतपुर पहुंच कर 2 बदमाश व्यापारी को घेर कर बैठ गए और स्कौर्पियो को कच्चे रास्ते पर ले गए. बाद में स्कौर्पियो कच्चे रास्ते पर चलती रही और बदमाशों ने श्याम कुमार की कनपटी पर पिस्तौल लगा कर उस के हाथपैर बांध दिए.

बदमाश श्याम कुमार को पहाड़ी (भरतपुर) थाना क्षेत्र के गांव हुजरा ले गए. वहां उन्हें एक कमरे में बंधक बना कर रखा गया. इस के साथ उन्हीं के मोबाइल से उन के घर वालों को फोन कर के उन्हें छोड़ने के एवज में 90 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई. लेकिन व्यापारी के घर वालों ने इतना पैसा होने से इनकार कर दिया. इस पर कई घंटे तक सौदेबाजी चलती रही. अंतत: 30 लाख रुपए में सौदा तय हुआ.

बदमाशों ने व्यापारी श्याम कुमार के बेटे सिंटू श्याम को खाता नंबर बता कर उस से 20 लाख रुपए बैंक खातों में डलवा लिए. इन में 4 मई को एक बैंक खाते में 10 लाख रुपए डलवाए गए. इस के बाद दूसरे बैंक खाते में एक बार 6 लाख रुपए और दूसरी बार उसी खाते में 4 लाख रुपए डलवाए गए. बदमाशों ने व्यापारी को छोड़ने के बदले उस से 10 लाख रुपए का चेक भी ले लिया. 30 लाख रुपए मिल जाने के बाद भी बदमाशों ने व्यापारी को नहीं छोड़ा और उस से मारपीट करते रहे.

इस घटना की सूचना किसी तरह अजमेर के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) बीजू जार्ज जोसफ को मिली. उन के निर्देश पर अजमेर पुलिस ने इस मामले की सूचना भरतपुर पुलिस को दी. पुलिस ने सर्विलांस के जरिए व्यापारी के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उस की तलाश शुरू कर दी. श्याम कुमार के मोबाइल की लोकेशन भरतपुर के हुजरा गांव की मिली.

इस पर भरतपुर पुलिस ने 4 मई की आधी रात को भारी पुलिस बल के साथ पहाड़ी की तलहटी में बसे हुजरा गांव की घेराबंदी कर दी. आसपास के 6 थानों की पुलिस ने घरों का तलाशी अभियान चलाया. नतीजा यह हुआ कि एक मकान में हाथपैर बांध कर रखे गए श्याम कुमार को पुलिस ने मुक्त करा लिया.

पुलिस ने इस मामले में हुजरा गांव के रहने वाले साकिर मेव की पत्नी आसी को गिरफ्तार किया. इस से पहले पुलिस ने अजमेर जिले में मकराना के रहने वाले सरवन की पत्नी सिरजो और उत्तर प्रदेश के हाथिया के रहने वाले साकिर को गिरफ्तार कर लिया था. गिरोह ने सिरजो के 2 बैंक खातों में व्यापारी के घर वालें से फिरौती की रकम डलवाई थी. पुलिस ने सिरजो से 9 लाख 60 हजार रुपए बरामद कर लिए. जबकि उस के दूसरे खाते में डलवाए गए 10 लाख रुपए की रकम को पुलिस ने फ्रीज करवा दिया.

बाद में पुलिस ने श्याम कुमार के अपहरण के मालमे में 6 मई को गिरोह के मुखिया सलामुद्दीन उर्फ सलीम उर्फ भूरा मेव और साबिर रसीद मेव को गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों बदमाश उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के बरसाना थाना अंतर्गत हाथिया गांव के रहने वाले थे. पुलिस ने वह स्कौर्पियो भी बरामद कर ली, जिस से व्यापारी का अपहरण किया था. इस के अलावा श्याम कुमार से छीने गए 2 एटीएम कार्ड भी अभियुक्तों से मिल गए.

जांच में पता चला कि हाथिया गांव का रहने वाला साकिर मुंबई में भी अपहरण कर के फिरौती लेने के मामले में वांछित चल रहा था. उस पर मुंबई पुलिस की ओर से 25 हजार रुपए का इनाम घोषित था. साकिर का भाई साकिब भी मुंबई में आर्थर रोड जेल में बंद है.

गिरोह के सदस्यों से पूछताछ में पता चला कि कुछ दिनों पहले ही 2 व्यक्तियों का अपहरण कर के फिरौती वसूली गई थी. इन में एक व्यक्ति से 10 लाख रुपए और दूसरे से 5 लाख रुपए फिरौती के रूप में वसूले गए थे.

चेन्नई के व्यापारी के अपहरण एवं पिछले कुछ समय में हुई टटलूबाजी की वारदातों में पकड़े गए अभियुक्तों से टटलूबाज गिरोह की जो कहानी उभर कर सामने आई है, वह इस प्रकार है-

सोने की ईंट के नाम पर ठगी की अनगिनत वारदातें होने के बाद लोगों के सतर्क हो जाने के कारण टटलूबाजों ने ठगी व लूट की वारदातों को अंजाम देने के लिए अब अपना ट्रैंड बदल दिया है. वे अब ई-मार्केटिंग कंपनियों और सोशल वेबसाइटों पर सस्ते दामों में वाहन, जनरेटर, प्लास्टिक दाना, स्क्रैप, सीसीटीवी, मोबाइल एवं अन्य सामान बेचने-खरीदने का विज्ञापन देते हैं.

निजी कंपनी के मालिक या कर्मचारी, व्यापारी व अन्य व्यक्तियों को तलाश कर ये लोग उन्हें अपना निशाना बनाते हैं. कई बार ये निर्माण कार्य कराने या कोई बड़ा काम कराने के नाम पर विज्ञापन देते हैं या संबंधित व्यक्ति से संपर्क करते हैं. सस्ते में सामान खरीदने या बेचने के लालच या बड़ा काम मिलने की उम्मीद में जो लोग इन से संपर्क करते हैं, उन्हें ये अपने ठिकानों पर बुला कर मारपीट करते हैं और उन से नकदी व वाहन छीन लेते हैं.

कई बार ये बदमाश उस व्यक्ति को बंधक बना कर फिरौती की रकम मांगते हैं. फिरौती की रकम वसूलने के लिए ये लोग बाकायदा बैंक खातों के नंबर देते हैं. चेन्नई के व्यापारी से फिरौती वसूलने में भी बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया था. अलवर, भरतपुर, धौलपुर व जयपुर में हाल ही में 3 महीने के दौरान ऐसी 18 वारदातें सामने आई हैं.

टटलू गिरोह के लोगों ने कुछ समय पहले फरीदाबाद (हरियाणा) की क्रेटिव पौली इंटोस्केप प्रा.लि. को जस्ट कौल डायल के जरिए फोन किया. गिरोह के सदस्यों ने कंपनी के अधिकारियों से कहा कि भरतपुर जिले में कामां के पास एक फार्महाउस में स्विमिंग पूल का निर्माण करवाना है. इस पर कंपनी के मालिक दिनेश कुमार ने कंपनी के 2 कर्मचारियों राजेश कुमार और हरिराम उपाध्याय को साइट देखने के लिए कामां (भरतपुर) भेज दिया.

ये दोनों कर्मचारी कामां पहुंचे तो गिरोह के सदस्य 2 मोटरसाइकिलों पर आए और उन्हें करीब 8 किलोमीटर दूर कामां-जुरहरा मार्ग पर ले गए और उन के मोबाइल व नकदी छीन ली. गिरोह के दोनों कर्मचारियों को छोड़ने के एवज में कंपनी के मालिक से फिरौती मांगी गई. कंपनी मालिक कामां पहुंचा और पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर दोनों कर्मचारियों की तलाश शुरू की. 4 मई को कामां पुलिस ने दोनों कर्मचारियों को तो मुक्त करा लिया, लेकिन एक भी अभियुक्त मौके पर नहीं पकड़ा जा सका.

पिछले साल अक्तूबर में हरियाणा की वेस्टर्न लिफ्ट एजेंसी के एक इंजीनियर को लिफ्ट लगवाने के बहाने टटलूबाजों ने अलवर बुला लिया. इंजीनियर को बदमाशों ने बंधक बना लिया और कंपनी के मालिक से 5 लाख रुपए की फिरौती मांगी. इस संबंध में हरियाणा में मुकदमा दर्ज हुआ.

जयपुर मंडल में ऐसे ही 3 मामले दर्ज हुए हैं. इन में जयपुर के मनोहरपुरा के रहने वाले दीपक व उस के साथी ने सोशल वेबसाइट ओएलएक्स पर स्विफ्ट कार बिकाऊ होने का विज्ञापन देखा. इस पर उन्होंने विज्ञापन में लिखे मोबाइल नंबर पर संपर्क किया. बदमाशों ने उन्हें 4 लाख रुपए ले कर भरतपुर बुलाया. दीपक और शिवशंकर इसी 3 अप्रैल को बदमाशों के बताए ठिकाने पर अलवर जिले के कठूमर इलाके में पहुंचे. वहां उन्हें 2 बाइक सवार मिले. वे उन्हें ऐसी सुनसान जगह पर ले गए, जहां पहले से उन के 4-5 साथी मौजूद थे. उन्होंने पहले तो दीपक और शिवशंकर को बंधक बना लिया. फिर मारपीट कर 4 लाख रुपए छीन लिए. जैसेतैसे दोनों युवक खुद को छुड़ा कर वहां से निकले और पुलिस को सूचना दी.

ऐसी ही एक वारदात जयपुर के निवारू रोड निवासी मनीष के साथ हुई. मनीष ने ओएलएकस पर 88 हजार रुपए में ड़्यूक बाइक बिकाऊ होने का विज्ञापन दिया. विज्ञापन देख कर नरेश नामक व्यक्ति ने मनीष से संपर्क किया. उस ने बाइक दिखाने का बहाना कर जयपुर में लोको कालोनी में बुलाया. मनीष बाइक ले कर पहुंचा तो नरेश ने उस पर चाकू से हमला कर बाइक लूटने की कोशिश की.

5 अप्रैल, 2017 को जयपुर के बनीपार्क में रहने वाले अरुण कुमार ने ओएलएक्स पर मोबाइल का विज्ञापन देख कर खरीदने के लिए उस से संपर्क किया. उस ने अरुण कुमार को जयपुर के क्रिस्टल मौल में बुलाया. वहां बदमाशों ने उसे प्लास्टिक का नकली मोबाइल दे कर 15 हजार रुपए ले लिए.

जांच में यह भी सामने आया है कि 8 नवंबर, 2016 की रात नोटबंदी के बाद इन टटलूबाजों ने कालेधन को ठिकाने लगाने के इच्छुक लोगों से काफी मोटी ठगी की थी. इन लोगों ने करोड़ों रुपए के 500 व 1000 रुपए के पुराने नोट ले कर बदले में नकली सोने की ईंट दे कर काली कमाई करने वालों को ठगा.

मेवात के लोगों ने राजस्थान के अलावा हरियाणा, पंजाब, दिल्ली व कई अन्य राज्यों में ऐसी ही वारदातें कीं. जांच में जब ईंटें नकली निकलीं तो लोग अपना सिर पीटते रह गए. अधिकांश लोग काली कमाई की जांचपड़ताल के डर से चुप बैठ गए. एकदो मामले पुलिस में गए भी तो पुलिस ने जांच की.

जांच में पता चला कि यह काम अलवरभरतपुर के टटलूबाजों का था. उसी दौरान भरतपुर पुलिस ने जुरहरा, पहाड़ी के गांव तिलकपुरी, मूंगसका, अमरूका गांवों में दविश दे कर 8 टटलूबाजों को गिरफ्तार कर उन से नकली सोने की 19 ईंटें, ईंटों पर लगने वाली मोहर की डाई सहित अन्य औजार व हथियार बरामद किए.

राजस्थान व हरियाणा सीमा पर बसे कस्बे पुनहाना और जुरहरा के अधिकांश लोग पीतल की ईंटें बना कर आसपास के गांवों में रहने वाले टटलूबाज गिरोहों के सदस्यों को सप्लाई करते हैं और खुद भी बेचने का काम करते हैं. उन्होंने अपने घरों में ही नकली ईंट बनाने की भट्टियां लगा रखी हैं. इन लोगों के पास प्राचीन काल की सोने की ईंटों पर लगाने वाली मोहरें हैं, जो ईंट बनाते समय लगा दी जाती है, ताकि लोगों को लगे कि यह सोने की ईंट बहुत पुरानी है और खुदाई में मिली है.

गामड़ी गांव में सब से ज्यादा टटलू रहते हैं. इस गांव की आबादी करीब 5 सौ है. इन में से अधिकांश लोग नकली सोने की ईंटें बेचने का काम करते हैं. इस के अलावा कुंदन का नगला, बुआपुर गढ़ी, सीमाधरा, छीछरवाड़ी, रसूलपुर आदि गांव के अधिकांश लोग भी इसी धंधे से जुड़े हैं. मेवात जिले के गांव रूपड़ाका, कोट, उटावड़ व आलीमेव में टटलूबाजों के पूरे गैंग बने हुए हैं.

टटलूबाजी में उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के बरसाना थाने का गांव हाथिया बहुत बदनाम है. लगातार बदनाम हो रहे इस गांव की साख को बचाने के लिए पिछले साल ग्रामीण खुद आगे आए थे. गांव जरैला नंगला में उन्होंने एक बैरियर लगाया है. हाथिया जाने वाले हर बाहरी व्यक्ति को रोक कर वह उस से पूछताछ करते हैं. गांव में वह किस से मिलने आया है और मिलने की वजह क्या है, साथ ही वह उस व्यक्ति को टटलूबाजों की ठगी की वारदातों की जानकारी दे कर सचेत भी करते हैं.

इन टटलूबाजों की वजह से गांव की जो बदनामी हो रही है, उस से बच्चों की शादी करने में भी परेशानी आती है. नकली सोने की ईंट बेचने के अलावा इन टटलूबाजों ने स्क्रैप बेचने के नाम पर बड़े व्यापारियों को बुला कर भी ठगा है. इस के अलावा जनरेटर लगवाने व बेचने, मोबाइल फोन टावर लगवाने के नाम पर भी इन्होंने लोगों को लूटा है. कई व्यापारियों को बुला कर उन का अपहरण कर उन के परिजनों से इन्होंने फिरौती भी वसूली है.

इस गांव में पुलिस पर भी हमले होते रहे हैं. आगरा की क्राइम ब्रांच की टीम पर यहां फायरिंग की गई थी. इस में एक कांस्टेबल सतीश परिहार की मौत भी हो गई थी. राजस्थान व हरियाणा पुलिस पर भी दबिश के दौरान हमले हुए हैं. गांव में गैंगवार भी चलती रहती है. ओएलएक्स पर सोने के बिस्कुट सस्ते दामों पर बेचने के नाम पर मैनपुरी के 3 सर्राफा व्यापारियों को मथुरा बुला कर लूट लिया गया था. बदलते समय को देखते हुए इन लोगों ने भी ठगी के अपने तरीके को बदल दिया है. अब इन्होंने इंटरनेट को ठगी का जरिया बना लिया है.

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