श्रीलंका में चुनाव सुधार का महत्वपूर्ण कदम

श्रीलंका में सब कुछ ठीक रहा, तो चुनाव अभियान में वित्तीय अनुशासन कायम किया जा सकेगा. सरकार इसके लिए चुनाव खर्च सीमा तय करने वाला विधेयक लाने जा रही है, जिसके मसौदे के प्रस्ताव पर कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने वाला यह कानून स्थानीय से लेकर संसदीय चुनावों तक पर लागू होगा. यह पैसे के दम पर वोट खरीदने की प्रवृत्ति के साथ ही चुनावी हिंसा व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी मददगार साबित होगा.

चुनाव खर्च सीमित करने की मांग हमेशा होती रही है, पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में कोई सकारात्मक पहल कभी सामने नहीं आई. अंतिम बार 2016 में इस मुद्दे पर बहस हुई थी और सभी दलों व निर्वाचन आयोग के बीच सहमति भी बन गई थी, मगर फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

खबरों के अनुसार, नया कानून निर्वाचन आयोग को उम्मीदवारों के आर्थिक स्नेतों और उनके आय-व्यय की जांच का अधिकार तो देगा, पर देखना होगा कि यह चुनाव खर्च पर वाकई नियंत्रण लगा पाता है या कि महज एक और कानून बनकर रह जाता है.

सवाल यह भी है कि आयोग उम्मीदवारों के अघोषित खर्चो, तस्करी की दुनिया से सीधे चुनावी बाजार में लगने वाले पैसे, छोटे-छोटे स्तरों पर होने वाले बड़े खर्चो पर कैसे निगरानी रखता है? बड़ी जरूरत तो नेताओं के आत्मानुशासन की है जिसके बिना हर पहल बेमानी है. छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि चुनाव फंड सिर्फ नकद के रूप में नहीं आता है. यह कैसे तय होगा कि कोई माफिया या फंड फाइनेंसर नकद के स्थान पर किसी और रूप में सीधे मतदाता तक कुछ ऐसी चीज नहीं पहुंचा देगा जो उसे प्रभावित कर सके.

ऐसे तमाम मामले हैं, जब सारे उपाय बेकार साबित हुए और नई-नई तरकीबें आती रहीं. यही सबसे बड़ी चुनौती है और सफलता का सबसे बड़ा मंत्र भी. दरअसल कानून तो ऐसा होना चाहिए, जो तत्काल असर दिखाए और गड़बड़ करने वालों की उम्मीदवारी चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही रद्द की जाए. एक बार चुने जाने के बाद शिकायतों के निस्तारण की लंबी प्रक्रिया में जाने का कोई मतलब नहीं रह जाता.

अपनों से बचाएं बच्चियों को वरना…

10 साल की सोनी रोज की तरह तैयार हो कर स्कूल पहुंची. उस की क्लास के मौनीटर ने उस से कहा कि उस के हाथ का नाखून काफी बढ़ा हुआ है, इसलिए डायरैक्टर साहब ने उसे अपने चैंबर में बुलाया है.

सोनी के साथ उस की एक सहेली भी डायरैक्टर के चैंबर में पहुंची. डायरैक्टर ने सोनी की सहेली को क्लास में भेज दिया और उस के साथ जबरन अपना मुंह काला किया.

स्कूल की छुट्टी होने पर सोनी को स्कूल की गाड़ी से उस के घर पहुंचा दिया गया. सोनी की मां को बताया गया कि वह स्कूल में बेहोश हो गई थी.

जब सोनी को होश आया, तो उस ने अपनी मां को सारी बातें बताईं. इस के बाद सोनी के परिवार वाले और आसपास के लोग स्कूल पहुंच गए और जम कर तोड़फोड़ की. डायरैक्टर को गिरफ्तार करने की मांग को ले कर सड़क जाम कर दी गई.

पटना के पुराने इलाके पटना सिटी के पटना सिटी सैंट्रल स्कूल, दर्शन विहार के डायरैक्टर पवन कुमार दर्शन की इस घिनौनी करतूत ने जहां एक ओर टीचर और स्टूडैंट के रिश्तों पर कालिख पोत दी है, वहीं दूसरी ओर मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

सच तो यह है कि मासूम बच्चियां स्कूल टीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चपरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की घटिया सोच की शिकार हो रही हैं.

फिरौती के लिए मामा ने किया भांजी को अगवा, घरेलू विवाद में चाचा ने किया मासूम भतीजी का कत्ल, स्कूल टीचर ने किया 9 साल की लड़की के साथ बलात्कार, किराएदारों ने की 11 साल की लड़की के साथ छेड़छाड़, रुपयों के लालच में पड़ोसी ने किया 6 साल की बच्ची का अपहरण जैसी वारदातों की खबरें अकसर सुनने को मिलती रहती हैं. पिछले कुछ समय से इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

सच तो यह है कि मासूम बच्चियां स्कूल टीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चपरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की घटिया सोच की शिकार हो रही हैं.

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि पहले लोग करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों के पास अपने बच्चों को छोड़ कर किसी काम से बाहर चले जाते थे, पर आज ऐसा नहीं के बराबर हो रहा है. अपनों द्वारा भरोसा तोड़ने के बढ़ते मामलों की वजह से लोग पासपड़ोस में बच्चियों को छोड़ने से कतराने लगे हैं.

पुलिस अफसर राकेश दुबे कहते हैं कि अपने आसपास खेलतीकूदती, स्कूल आतीजाती और छोटीमोटी चीज खरीदने महल्ले की दुकानों पर जाने वाली बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करना काफी आसान होता है. परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच और साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं, कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और वह किसी मासूम को अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले.

ऐसे में हर मांबाप को अपने बच्चों पर खास ध्यान देने की जरूरत है. मासूम बच्चियों की हिफाजत को ले कर तो मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

समाजशास्त्री अजय मिश्र बताते हैं कि समाज की टूटती मर्यादाओं और घटिया सोच की वजह से ही बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है. अब इनसान अपने भाई, चाचा, मामा, दोस्तों समेत अपनों से लगने वाले पड़ोसियों पर भरोसा न करें, तो फिर किस पर करें?

आज के हालात तो ये हैं कि लोगों की नीयत बदलते देर नहीं लगती है. अपने ही अपनों के भरोसे का खून कर रहे हैं. यह सब रिश्तों और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक बन चुका है.

प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि बच्चियों के कोचिंग जाने, खेलनेकूदने पर या बाजारस्कूल जाने पर हर समय हर जगह उन पर नजर रखना मांबाप के लिए मुमकिन नहीं है.

मासूम बच्चियों की हिफाजत को ले कर तो मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

अकसर ऐसा होता है कि पति दफ्तर में और पत्नी बाजार में है. इस बीच बच्चा स्कूल से आ जाता है, तो वह पड़ोस के ही अंकल या आंटी के पास मजे में रहता है. लेकिन अब कुछ शैतानी सोच वाले लोगों की वजह से यह भरोसा ही कठघरे में खड़ा हो चुका है.

करीबी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, नौकरों और ड्राइवरों द्वारा बच्चियों से छेड़छाड़ करने और उन के साथ जबरन सैक्स संबंध बनाने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसी वारदातों के बढ़ने की सब से बड़ी वजह पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों और मर्यादाओं का तेजी से टूटना है.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि पहले परिवार के करीबी रिश्तेदारों के बीच कुछ सीमाएं और लिहाज होता था, जो आज की भागदौड़ की जिंदगी में खत्म होता जा रहा है. यही वजह है कि करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गंदी नजरों की शिकार मासूम बच्चियां बन रही हैं.

ऐसे मांबाप को अपनी बच्चियों को ऐसे अनजान खतरों से आगाह करते रहना चाहिए. साथ ही, वे खुद भी सतर्क रहें.

अरबाज खान के साथ लिपलौक करती दिखीं सनी लियोनी

अजय देवगन की फिल्म बादशाहो और संजय दत्त की फिल्म भूमि में आइटम नम्बर से सबका दिल जीतने वाली सनी लियोनी जल्द ही अपनी आने वाली फिल्म ‘तेरा इंतजार’ में सलमान खान के भाई और मशहूर एक्टर अरबाज खान के साथ रोमांस करती नजर आएंगी.

हाल ही में बौलीवुड की हाट एक्ट्रेस सनी लियोनी और अरबाज खान की फिल्म ‘तेरा इंतजार’ का टीजर रिलीज किया गया है, जिसमें सनी अपने प्यार यानि अरबाज खान की खोज करती हुए नजर आ रही हैं.

फिल्म के इस टीजर को सनी लियोनी ने अपने ट्विटर और इंस्टाग्राम पेज पर भी शेयर किया है. इसे शेयर करते हुए सनी ने लिखा है इंतजार हुआ खत्म…

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फिल्म ‘तेरा इंतजार’ का टीजर सस्पेंस और थ्रिलर से भरपूर है. इसमें सनी लियोनी बोल्ड अदाओं के जलवे बिखेरने के साथ ही समंदर में अपनी कातिलाना अदाओं से आग लगाती दिख रही हैं.

इसके अलावा लगभग 40 सेकेंड के इस वीडियो में सनी लियोनी अरबाज के साथ लिपलौक करती और बोल्ड सीन्स देतीं नजर आ रही हैं.

बता दें कि राजीव वालिया के निर्देशन में बनी फिल्म तेरा इंतजार तेरा इंतजार 24 नवंबर को रिलीज होगी. जिसमें सनी लियोनी और अरबाज खान मुख्य भूमिका में नजर आएंगे. इस फिल्म में गौहर खान और अभिनेता आर्य बब्बर भी मौजूद हैं.

ओम पुरी को मौत से नहीं बीमारी से लगता था डर

बौलीवुड के दिग्गज अभिनेताओं में से एक ओम पुरी एक ऐसे शख्सियत थे, जो अनजानों से भी यूं गले मिलते थे, जैसे वह उनका कोई अपना अजीज हो. किरदार यूं निभाए कि मानों हकीकत हो. इसी साल जनवरी में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था.

कहते हैं मौत भी उन्हें वही मिली जिसकी उन्होंने कामना की थी. उनके बारे में कहा जाता है कि वह मौत से नहीं, बीमारी से डरते थे. मार्च 2015 में उन्होंने छत्तीसगढ़ में बीबीसी के लिए एक साक्षात्कार में वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल से कहा था, “मृत्यु का भय नहीं होता, बीमारी का भय होता है.

जब हम देखते हैं कि लोग लाचार हो जाते हैं, बीमारी की वजह से दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं. ऐसी हालत से डर लगता है. मृत्यु से डर नहीं लगता. मृत्यु का तो आपको पता भी नहीं चलेगा. सोए-सोए चल देंगे. (मेरे निधन के बारे में) आपको पता चलेगा कि ओम पुरी का कल सुबह 7 बजकर 22 मिनट पर निधन हो गया.” यह वाकई सच हो गया.

उन्होंने मृत्यु की पूर्व संध्या पर अपने बेटे ईशांत को भी फोन किया और कहा कि मिलना चाहते हैं. अफसोस! सुबह हुई कि वह जा चुके थे. घर पर अकेले थे, न किसी सेवक को मौका दिया और न किसी की मदद का इंतजार.

बिस्तर पर बेजान शरीर और पीछे बस यादें ही यादें. उन्होंने खुद को उस दौर में फिल्मों में स्थापित किया, जब सफलता के लिए सुंदर चेहरों का बोलबाला था. साफ और सीधा कहें तो बदशक्ल सूरत की भी धाक, जिसने मंच से लेकर बड़े और छोटे पर्दे पर जमाकर न जाने कितनों को प्रेरित किया, मौका दिया, जिंदगी बदल दी, कहां से कहां पहुंचा दिया, खुद उनको भी नहीं पता होगा.

ओम पुरी ने फिल्मी अभिनय की शुरुआत मराठी फिल्म ‘घासीराम कोतवाल’ से की. विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक पर बनी इस फिल्म का निर्देशन के. हरिहरन और मनी कौल ने किया था. मजेदार बात यह है कि फिल्म एफटीटीआई के 16 छात्रों के सहयोग से बनी थी और बेहतरीन काम के लिए एक्टर को मूंगफली दी गई.

पद्मश्री सम्मान, बेस्ट एक्टर अवार्ड सहित तमाम पुरस्कारों, सम्मानों से सम्मानित ओम पुरी एक जिंदा दिल और भावुक इंसान थे. उनके चाहने वाले और फिल्म इंडस्ट्री के सहयोगी, मित्र इस शख्सियत को मिले सम्मानों और पुरस्कारों को ऐसी प्रतिभा के लिए नाकाफी मानते हैं.

उनके प्रशंसकों का मानना है कि ओम पुरी सम्मानों से कहीं आगे थे. बहुत-सी फिल्मों में ओमपुरी ने पाकिस्तानी किरदार की भूमिका भी निभाई है. ओम पुरी अपने आप में एक संपूर्ण अभिनेता थे. उन्होंने हर वो अभिनय किया, जो उन्हें पसंद आया. चरित्र अभिनेता से लेकर खलनायक और कौमेडियन की भूमिका को भी उन्होंने इस कदर निभाया कि एक दौर वो भी आया कि ये भेद कर पाना भी मुश्किल होने लगा कि उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए.

ओम पुरी ने ब्रिटेन और अमेरिका की फिल्मों में भी बेहतरीन अभिनय किया है. वह अपने अभिनय के हर रोल की बड़ी ईमानदारी और समर्पण से एकदम जीवंत सा जीते थे. चाहे रिचर्ड एटनबरो की चर्चित फिल्म गांधी में छोटी सी भूमिका हो या अर्धसत्य में पुलिस इंस्पेक्टर का दमदार किरदार रहा हो. टेलीविजन की दुनिया में भी वो हमेशा दमदार अभिनय में नजर आए, चाहे भारत एक खोज, यात्रा, मिस्टर योगी, कक्काजी कहिन, सी हौक्स रहा हो या तमस और आहट. उनकी काबिलियत का सभी ने लोहा माना.

कलात्मक फिल्मों में भी उनका कोई सानी नहीं रहा. उन्होंने 300 फिल्मों में काम किया, जिनमें कई बेहद सफल और चर्चित रहीं. अर्धसत्य, आक्रोश, माचिस, चाची 420, जाने भी दो यारो’, मकबूल, नरसिम्हा, घायल, बिल्लू, चोर मचाए शोर, मालामाल और जंगल बुक में भला ओम पुरी का किरदार किसे याद न होगा. सनी देओल की घायल रिटर्न्‍स उनकी आखिरी फिल्म थी.

यह भी सच है कि इस बेहद सजग और संजीदा कलाकार की निजी जिंदगी बेहद खामोश थी. 1993 में विवाह नंदिता से हुआ था, लेकिन 2013 में तलाक हो गया. उनका एक बेटा ईशान है. निश्चित रूप से अभिनय के हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाले ओम पुरी ने जो भी काम किया, बेहद ईमानदारी से और यही संदेश भी दिया.

भले ही वो आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के समर्थन का मौका हो या सरहद पर दिए बयान के बाद माफी मांगना हो या फिर भारत-पाकिस्तान के 95 प्रतिशत लोगों को धर्मनिरपेक्ष कहना.

आमिर खान की पत्नी के देश छोड़ने की बात पर लताड़ हो, बीफ मसले पर लाखों डौलर कमाने और पाखंड से जोड़ने की बात हो, ‘नक्सलियों का फाइटर’ कहने जैसी बातें, यह सब एक दमदार और काबिल इंसान ही कह सकता है. ऐसी शख्सियत को भूल पाना नामुमकिन है.

हौट और सेक्सी लुक के साथ सुर्खियों में आईं त्रिशाला

वैसे तो संजय दत्त की बेटी त्रिशाला दत्त फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहती हैं, पर उनकी गिनती बौलीवुड की सबसे चर्चित स्टार डाटर में होती है.

बता दें कि फैशन इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आजमा रही त्रिशाला ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपनी एक तस्वीर साझा की है, जिसमें वे काफी बदली हुई सी नजर आ रही हैं.

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सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही इस तस्वीर में त्रिशाला ने लाल कलर के टाप के साथ काले रंग का प्लाजो पहना है और उनके हाथ में एक बैग है. जिसमें वह काफी हाट और सेक्सी लुक में नजर आ रही हैं. यह नया और ग्लैमरस लुक उनपर काफी जंच रहा है.

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शेयर किये गये फोटो में हैशटैग के जरिए त्रिशाला ने अपना फिटनेस सीक्रेट फैन्स के साथ सांझा करते हुए बताया है कि हफ्ते के सातों दिन वह जिम में वर्कआउट करती हैं. वर्कआउट और कार्डियो, नींबू पानी की मदद से उन्हें ऐसी बौडी मिल पाई है.

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आखिरी बार फिल्म ‘भूमि’ में नजर आए संजय दत्त ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वो नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी कभी फिल्मों में आए. वह चाहते थे कि त्रिशाला अच्छे स्कूल-कालेज में पढ़े और अपना करियर किसी दूसरी फील्ड में बनाएं. उनका कहना है कि फिल्मों में आने के लिए इंडस्ट्री की भाषा आनी चाहिए, ये ग्लैमर की दुनिया है, लेकिन यहां पर काम करना आसान नहीं है.

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मालूम हो कि, त्रिशाला संजय दत्त और उनकी पहली पत्नी ऋचा शर्मा की बेटी हैं. संजय दत्त और रिचा शर्मा ने 1987 में शादी की थी. रिचा को ब्रेन ट्यूमर था, जिसकी वजह से 10 दिसंबर, 1996 को उनकी मौत हो गई थी.

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मां की मौत के बाद से ही त्रिशाला न्यूयार्क में अपनी मौसी एना के साथ रहती हैं. उन्होंने 2014 में अपनी पहली ड्रीम ट्रेसेज हेयर एक्सटेंशन लाइन शुरू की थी. वे न्यूयार्क के जान जे कालेज आफ क्रिमिनल जस्टिस से ला में ग्रैजुएशन भी कर चुकी हैं.

मौताणा : मौत से मुआवजे का शर्मनाक खेल

राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आज भी एक प्रथा है ‘मौताणा’, जिस ने अब तक हजारों परिवारों को तबाह कर दिया है. राजस्थान की अरावली पहाडि़यों से सटे उदयपुर, बांसवाड़ा, सिरोही व पाली के आदिवासी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों में इस प्रथा का सब से ज्यादा चलन है. इस प्रथा की शुरुआत तो सामाजिक इंसाफ के मकसद से हुई थी, जिस में अगर किसी ने किसी शख्स की हत्या कर दी, तो कुसूरवार को सजा के तौर पर हर्जाना देना पड़ता था, लेकिन अब दूसरी वजहों से हुई मौतों पर भी आदिवासी ‘मौताणा’ मांग लेते हैं.

पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि किसी भी वजह से हुई अपनों की मौत का कुसूर दूसरों पर मढ़ कर जबरन ‘मौताणा’ वसूल किया जाने लगा है. दरअसल, जब मरने वाले का परिवार किसी को कुसूरवार मान कर उसे ‘मौताणा’ चुकाने के लिए मजबूर करता है, तो आदिवासियों की अपनी अदालत लगती है. वहां पंच कुसूरवार को सफाई का मौका दिए बिना ही ‘मौताणा’ चुकाने का फरमान जारी कर देते हैं. भुखमरी की मार झेल रहे आदिवासी परिवारों को लाखों रुपए का ‘मौताणा’ चुकाना पड़ता है, जिस से वे बरबाद हो जाते हैं.

‘मौताणा’ नहीं चुकाने पर मृतक का परिवार कुसूरवार परिवार के सदस्य की जान तक ले सकता है. रकम नहीं चुकाने पर यह रिवाज हिंसक रूप ले लेता है. चूंकि ‘मौताणा’ की रकम काफी ज्यादा होती है, इसलिए कभीकभार सारी जमीनजायदाद दांव पर लगानी पड़ जाती है. ऐसे में कई परिवार या तो डर कर घर छोड़ देते हैं या फिर बरबाद हो जाते हैं.

उदयपुर के गल्दर इलाके में मोटरसाइकिल से हादसा हुआ, तो उसे बिठाने वाले को 80 हजार रुपए देने पड़े. कुएं में लाश मिली, तो मालिक ने ‘मौताणा’ मांगा. नवंबर, 2016 में ढेडमारिया के भैरूलाल डामोर की बीमारी से मौत हुई. चचेरे भाई से ‘मौताणा’ लेने के लिए लाश को 35 दिनों तक घर पर ही रखा गया. परिवार वाले ‘मौताणा’ ले कर ही माने.

कउचा गांव में एक औरत को सांप ने डस लिया. मायके वालों ने ‘मौताणा’ मांगते हुए कहा कि सांप ससुराल का था. महादेव नेत्रावला गांव में कुत्ते के काटने पर मालिकों से ‘मौताणा’ लिया गया. इसी तरह नालीगांव में साल 1995 में हत्या के मामले में ‘मौताणा’ न चुकाने पर 30 परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा था. 30 साल बाद ये लोग घर वापस लौट सके. राजस्थान गुजरात बौर्डर के आंजणी गांव में ‘मौताणा’ की रकम नहीं मिलने पर अजमेरी की लाश सवा साल तक पेड़ से लटकी रही.

कोटड़ा में 14 साल पहले हामीरा की दास्तान तो और भी अलग है. उस के घर के बाहर कोई लाश फेंक गया. हामीरा के परिवार पर हत्या का आरोप लगा. लिहाजा, उन्हें खेत छोड़ कर दूसरों के रहमोकरम पर जिंदगी बसर करनी पड़ रही है.

राजस्थान गुजरात के बौर्डर वाले इलाके में एक सड़क हादसे में 6 साल के एक छात्र रमेश की मौत होने पर उस की लाश ‘मौताणा’ की मांग को ले कर 11 दिन से बड़ली गांव में पेड़ से लटकती एक खाट पर रखी रही.

इसी दौरान हादसे में घायल उस की मां अमीया हिम्मतनगर के अस्पताल में भरती रही, वहीं पिता मोहन की उदयपुर के अस्पताल में हालत नाजुक बनी रही. इसी तरह जोगीवड़ में अप्रैल, 2016 में परथा देवा गरासिया की हत्या के बाद दूसरे पक्ष को ‘झाल’ यानी अंतिम संस्कार की रकम 90 हजार रुपए  भरनी थी. इस के लिए 6 बीघा जमीन गिरवी रखी. बाकी रकम न देने पर तकरीबन 30 परिवारों को इलाका छोड़ना पड़ा. साल 2015 में सुबरी गांव के दिनेश की हत्या पर 7 लाख रुपए ‘मौताणा’ चुकाने के लिए एक पक्ष के झालिया ने 70, परथा ने 40, लक्ष्मण ने 20, रूंडा ने 45 हजार रुपए में जमीन गिरवी रखी और मवेशी बेचे.

राजस्थान का एक ताजा वाकिआ बेचैन करने वाला है. उदयपुर जिले के कड़नवा गांव के रहने वाले 40 साला वेहता गमार की मौत हो गई थी. उस की मौत के 10 दिन बाद भी लाश को सिर्फ इसलिए चिता मयस्सर नहीं हुई, क्योंकि उस के गांव के पंचों को मौत का मुआवजा चाहिए था.

एक घटना उदयपुर के आदिवासी इलाके झाड़ोल के चतरपुरा गांव की है, जहां एक 20 साल की निरमा ने शादी के बाद खुदकुशी कर ली थी. इस घटना में भी निरमा के मायके पक्ष का आरोप था कि उस की ससुराल वालों ने निरमा की हत्या की है, इसलिए अपना अपराध मानते हुए उन्हें ‘मौताणा’ की रकम देनी चाहिए. ससुराल पक्ष पर दबाव बनाने के लिए निरमा के मायके वाले तीरकमान, लाठियों और सरियों से लैस हो कर चढ़ाई करने चतरपुरा गांव पहुंचे थे.

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई, लेकिन ‘मौताणा’ प्रथा की वजह से लाश को उतारा नहीं गया, बल्कि पहले मायके पक्ष को खबर भिजवाई गई, बाद में पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया गया, फिर लाश का पोस्टमार्टम हुआ और उस के बाद अंतिम संस्कार.

उदयपुर के एएसपी हनुमान प्रसाद ने बताया कि पहली नजर में यह आत्महत्या का मामला लगता है, क्योंकि विवाहिता के पति और ससुर घर पर नहीं थे. चूंकि निरमा और शांतिलाल पारगी की शादी हुए बहुत ज्यादा समय नहीं बीता था, इसलिए मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच की जाएगी. ऐसा भी देखने में आया है कि पुलिस अगर ज्यादा सख्ती करती है, तो आदिवासी उस समय भले ही राजी हो जाएं, पर अपने मन में दुश्मनी पाले रहते हैं और देरसवेरे अपने विरोधी आदिवासी समूह से बदला जरूर लेते हैं.

राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद से जुड़ी डाक्टर राधिका लड्ढा का कहना है कि आदिवासियों में प्रचलित यह प्रथा एक सामाजिक बुराई है, जो शिक्षा के प्रचार और जागरूकता से धीरेधीरे कम तो हो रही है, लेकिन अभी भी ‘मौताणा’ के रूप में रकम वसूलने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है.

आस्था संस्थान के अश्विनी पालीवाल के मुताबिक, राजस्थान में ‘पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996’ के तहत आदिवासियों को छोटेमोटे झगड़े पारंपरिक तरीके से निबटाने की छूट है, लेकिन इस प्रथा के नाम पर हिंसा सही नहीं है.

बहुत से मामलों में पीडि़त को तो कुछ मिलता भी नहीं है और कई बार तो पीडि़त ‘मौताणा’ की मांग करना भी नहीं चाहते, पर वे भी अपनी जाति के पंचों के आगे कुछ नहीं कर पाते. ‘मौताणा’ विवाहिता या मर्द की अकाल मौत तक ही सीमित नहीं है. अब सड़क हादसों में पशुओं के मारे जाने या अस्पताल में बीमारी से मौत होने जैसे मामलों में भी वसूली करने की कोशिश की जाती है.

देश में फैला हुआ है गंदगी का आलम

गंदगी हमारे देश में लोगों के जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बनी हुई है कि यहां साफसफाई को जीवन में दखल मान लिया जाता है. दिल्ली की जामिया कालोनी के पास के एक रिहायशी कौंप्लैक्स की औरतों ने खुद पैसा जमा कर, खुद मजदूरों के साथ मिल कर एक गली की सफाई कराई, तो वहां खड़ी होने वाली गाडि़यों के मालिकों और वहां रोज कूड़ा फेंकने वालों ने साफसफाई करने पर न सिर्फ झगड़ा किया, 2 सौ लोगों को जमा कर साफ की गई जगह को गंदा कर डाला.

गरीबी और गंदगी आमतौर पर साथ चलती हैं. दुनिया के सभी गरीब देश या अमीर देशों के गरीब इलाके गंदे ही रहते हैं. सड़कों गलियों पर कूड़ा, टूटे शीशे, मैले मकान, बिखरे डब्बे, गंदभरी नालियां, बदबूदार माहौल आंखों को ही नहीं सुहाता, बल्कि वह बीमारियां भी पैदा करता है और लोग आमतौर पर आधाअधूरा काम करते हैं.

अब गंदगी गरीबी को पैदा करती है या इस का उलटा होती है, इस चकरघिन्नी में न पड़ कर समझा जाना चाहिए कि गरीबी हटाना आसान नहीं है, पर गंदगी हटाना बेहद आसान है. हमारे हिंदू धर्म में गंदगी को ही जाति के भेदभाव का तरीका बताया गया है, पर आज जब नीची जातियां, जिन में गरीब पिछड़े, दलित, गरीब मुसलिम व ईसाई शामिल हैं, गंदगी के खिलाफ मुहिम अपनी ओर से शुरू करें. सरकार ने तो 2 साल पहले स्वच्छ भारत का नाटक कर के छोड़ दिया था और अब नोटबंदी कर के गरीबों पर और गरीबी थोप दी है, पर सरकार या ऊंची जातियां और धर्म की जाति व्यवस्था का इस्तेमाल गंदगी थोपने के लिए नहीं कर सकतीं. गंदगी हटा कर गरीबी में शान से जीने लायक बनाया जा सकता है.

गंदगी हटाने के लिए बहुतकुछ नहीं करना होता. यह ठीक है कि हमारे देश में गंदगी फेंकने की जगहें आसानी से नहीं मिलतीं. गलियों और महल्लों से कूड़ा हटा कर ले जाना आसान नहीं है. पहले घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी मिल जाते थे, जो सस्ते में कूड़े को हटा देते थे. अब ट्रक लगाने पड़ते हैं, पर उन का इंतजाम करना और उन्हें चलाना मुश्किल है. शहरी निकायों, पंचायतों के पास ये हों तो भी मुश्किल से मिलते हैं, क्योंकि या तो खराब रहते हैं या चलाने वाले निकम्मे बने रहते हैं.

यह एक तरह से साजिश का हिस्सा है. शहरों की बात हो या कसबोंगांवों की, अमीर लोगों की इच्छा रहती है कि साफसफाई और गंदगी एक लाइन की तरह इस्तेमाल हो–जाति दिखाने की. गंदगी का मतलब है नीची जाति. अफसोस यह है कि बराबरी की मांग करने वाली नीची जातियां महात्मा गांधी की शुरू की गई सफाई का मतलब नहीं समझीं. महात्मा गांधी सफाई से जाति की खाई को पाटना चाहते थे, पर गंदगी में रहने को आदी हो गए नीची जातियों के लोगों ने गंदगी को तमगा बना कर सीने से लगा लिया, इसीलिए दिल्ली की मुसलिम गरीब बस्ती में सफाई को जाति व्यवस्था पर हमला समझ लिया.

समाज का पिछड़ों का ही एक वर्ग नहीं चाहता कि उन से निचले सफाई को अपनाने की जुर्रत करें.

जब मौत बन गया साध्वी का शौक

हरियाणा के जिला करनाल के ब्रास गांव  स्थित एक बड़ी इमारत के बीच बने उस हाल की भव्यता देखते ही बनती थी. उस में डिजाइन वाले महंगे कालीन बिछे थे तो दोनों तरफ आरामदायक सोफे और बीच में मेजें लगी थीं. नीचे बैठने के लिए भी गद्दे बिछे थे. उस हाल में कुछ खास था तो वह थी एक सिंहासननुमा रखी ऊंची कुरसी, जिस के सामने एक छोटी सी मेज थी, जिस पर पारदर्शी शीशा लगा था.

रोज की तरह 15 नवंबर, 2016 की भी रात करीब 9 बजे कई लोग सोफे पर बैठे थे. उसी बीच हथियारों से लैस कुछ युवक पिछले दरवाजे से हौल में दाखिल हुए. उन के पीछे एक महिला भी आई, जिस पर नजर पड़ते ही सभी लोग हाथ जोड़ कर उस के सम्मान में खड़े हो गए. महिला ऊपर से नीचे तक गेरुआ वस्त्र पहने थी और सिर पर वैसे ही रंग की पगड़ी भी बांधे थी. उस के गले में बेशकीमती सोने की मोटी चेन झूल रही थी. इस के अलावा हाथों में रत्नजडि़त सोने के कंगन और अंगुलियों में हीरेजडि़त अंगूठियां अपनी चमक बिखेर रही थीं.

महिला के माथे पर लाल तिलक लगा था और चेहरे पर गर्वपूर्ण मुसकान तैर रही थी. वह सधे कदमों से चलते हुए सिंहासननुमा कुरसी पर जा कर बैठ गई तो उस की चरणवंदना करने वालों की कतार लग गई. लोग झुकते तो वह उन के सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देती. बीचबीच में वह लोगों से बातें भी कर रही थी. करीब एक घंटे तक यही सिलसिला चलता रहा. लगभग रोज ही ऐसा नजारा उस हाल में होता था.

वह कोई मामूली शख्सियत नहीं थी. वह खुद को धर्मरक्षक बताती थी. अपने राष्ट्रवादी होने का गुणगान करती थी. लोग उसे अनोखी शक्तियों की वारिस और ज्योतिष विद्या की बाजीगर समझ कर पूजते थे.

कट्टरपंथी विचारधारा की उस महिला का नाम था साध्वी देवा ठाकुर. ब्रास गांव स्थित जिस इमारत में वह रहती थी, उसे लोग श्रीमाता बालासुंदरी देवाजी धाम के नाम से जानते थे. उसे डेरा भी कहा जाता था. साध्वी का इलाके में खासा रसूख था. तमाम लोग उस के मुरीद थे. उस के पास न धनदौलत की कमी थी और न ही शोहरत की. भगवा चोले में सोने के बेशकीमती आभूषणों से लद कर देवा जब चेलों के साथ शान से चलती थी तो उस का रुतबा देखते ही बनता था.

धर्म के नाम पर उस की तीखी बयानबाजियां सुर्खियां बन जाती थीं. उस रात कुछ और लोग उस से मिलने के लिए आए तो एक शख्स ने उन्हें रोक दिया, ‘‘माफ कीजिएगा, साध्वीजी से अब आप कल मिल सकते हैं. अभी वह कहीं और के लिए प्रस्थान करेंगी.’’

उसी बीच एक आदमी ने देवा के सामने जा कर कहा, ‘‘साध्वीजी, आप को समारोह में भी जाना है.’’

‘‘हां, चलते हैं.’’ कह कर देवा ने हाथ उठा कर सामूहिक आशीर्वाद दिया और हाल से बाहर आ गई. उस के बाहर आते ही कुछ और हथियारधारी वहां आ गए. यह सब देख कर कोई चौंका नहीं, क्योंकि यह रोज की बात थी. साध्वी को हथियारधारी चेलों को अपने साथ रखने का बहुत पहले से शौक था. हालांकि न उन की जान को खतरा था और न ही किसी से रंजिश. बावजूद इस के वह राइफल, बंदूक, पिस्टलधारी युवकों के घेरे में रहती थी.

इतना ही नहीं, देवा ने खुद भी एक पिस्तौल का लाइसैंस लिया हुआ था, जिसे वह कभी होलेस्टर के साथ गले में लटकाती थी तो कभी पर्स में रखती थी. सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर वह बेहद सक्रिय रहती थी और हथियारों के साथ के अलावा विभिन्न क्रियाकलापों के फोटो व वीडियो पोस्ट करती रहती थी.

हौल के बाहर एक लग्जरी फौर्च्युनर कार नंबर एचआर 54डी 0021 खड़ी थी, जो उसी के नाम से रजिस्टर्ड थी. देवा उस कार में सवार हो गई. कार ने फर्राटे भरे और कुछ देर बाद करनाल शहर के रेलवे स्टेशन के नजदीक बने सावित्री मैरिज लौन के बाहर जा कर रुकी.

देवा के पहुंचते ही वहां मौजूद लोग उस की आवभगत में जुट गए. कोई झुक कर पैर छू रहा था तो कोई हाथ जोड़ रहा था. देवा के चेहरे पर भी अनोखी मुसकान थी. दरअसल यह सैक्टर-6 निवासी विक्की मेहता का सगाई समारोह था. मेहता परिवार भी देवा का भक्त था, इसलिए विशेष आग्रह कर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित किया गया था.

लौन में अनेक लोग मौजूद थे. खानापीना चल रहा था, साथ ही एक मंच सजा हुआ था. मंच पर व उस के सामने डीजे की धुनों पर लोग नृत्य कर रहे थे. दरजनों लोग सामने पड़ी कुरसियों पर बैठ कर पार्टी का आनंद ले रहे थे. कई लोगों से मिलतेमिलाते देवा अपने चेलों के साथ मंच के सामने पहुंच कर रुक गई. इसी बीच उस का चेला डीजे का संचालन कर रहे युवक के पास पहुंच कर बोला, ‘‘यह सब बंद कर के हमारी पसंद का गाना बजा.’’

‘‘कौन सा सर?’’ युवक ने पूछा.

‘‘मितरां नू शौक गोलियां चलाउण दा…’’ उस ने बताया.

हथियारधारी के इतना कहते ही चंद सेकेंड बाद मनचाहा गाना बज गया. इस गाने पर देवा के चेले हथियार लहरा कर नाचने लगे. गाने के बोलों की तर्ज पर उन्होंने हवाई फायरिंग शुरू कर दी. इन में 2-3 लोग मंच पर चढ़ कर गोलियां चलाने लगे तो कुछ नीचे ही रहे. पलक झपकते ही गोलियों की तड़तड़ाहट से वातावरण गूंज उठा.

देवा को भी उन के एक चेले ने दोनाली बंदूक लोड कर के दी तो उस ने भी गोलियां दाग दीं. देवा ने अपनी पिस्तौल से भी कई फायर किए. यह खुशी थी या शान दिखाने की कुंठित मानसिकता, यह तो कोई नहीं जानता था, पर कानून की नजर में यह सब करना अपराध की श्रेणी में आता था. लेकिन कानून को ठेंगा दिखा कर वहां जम कर फायरिंग की जा रही थी.

देवा और उन के चेले इतने जोश में थे कि हथियारों को बारबार लोड कर के हवाई फायर कर रहे थे. अचानक पैदा हुए ऐसे माहौल से वहां मौजूद लोग सकते में आ गए. हर कोई फटी नजरों से नजारा देख रहा था. बच्चों में भी दहशत कायम हो गई. मंच पर व उस के सामने अब देवा व उस के चेलों का कब्जा था. दृश्य ऐसा फिल्मी हो गया था, जैसे डाकू हथियारों के साथ बेखौफ हो कर जश्न मना रहे हों. दरजनों राउंड फायर हो चुके थे.

इसी बीच एक बंदूक से फायर मिस होने पर बंदूक की नाल कुरसी पर बैठे लोगों की तरफ घूम गई. बंदूक की एक गोली सुखविंदर सिंह नामक व्यक्ति के कंधे पर जा लगी, दूसरी गोली ने 50 वर्षीय महिला सुनीता का सीना भेद दिया. गोली लगते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह नीचे गिर पड़ी.

इन के अलावा गोली के छर्रे लगने से अमरजीत सिंह, अनिल, विनोद व 11 वर्षीया बच्ची मनस्वी घायल हो गई. पलक झपकते ही वहां की खुशियां मातम में तब्दील हो गईं. किसी को भी ऐसी अप्रत्याशित घटना की उम्मीद नहीं थी. लोगों में चीखपुकार मच गई और अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया. वहां के माहौल व खतरे को भांप कर देवा हथियारों के शौक के चक्कर में मातम का आशीर्वाद दे कर चेलों के साथ रफूचक्कर हो गई.

आननफानन में सभी घायलों को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने सुनीता को मृत घोषित कर दिया. कइयों के अंधविश्वास को भी झटका लगा, क्योंकि ज्योतिष की जानकार जो देवा लोगों का भविष्य बताती थी, वह इतनी बड़ी घटना का आकलन आखिर कैसे नहीं कर सकी.

इस सनसनीखेज घटना की सूचना पुलिस को मिली तो वह हरकत में आ गई. कुछ ही देर में सिटी थानाप्रभारी मोहनलाल मय पुलिस बल के वहां पहुंच गए. वारदात बड़ी थी लिहाजा एसपी पंकज नैन भी मौकाएवारदात पर आ गए. पुलिस ने लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने देवा व उस के चेलों का कारनामा बयान कर दिया. कुछ लोगों ने देवा व उस के साथियों की गोलियां चलाते हुए बनाई गई वीडियो भी पुलिस को दे दी. पुलिस ने मुआयना किया तो कारतूस के दरजनों खोखे वहां से बरामद हुए. पुलिस ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने साध्वी व उस के साथियों के खिलाफ भादंवि की धारा-302 हत्या, 307 हत्या के प्रयास व आर्म्स एक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मामला गंभीर था. एसपी पंकज नैन ने देवा के खिलाफ सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए. उधर मृतका सुनीता के परिवार के लोगों में कोहराम मचा था. सुनीता सैक्टर-6 की रहने वाली थी और भावी दूल्हे विक्की की मौसी थी. घायलों का उपचार किया जा रहा था. पुलिस ने सुनीता के शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु कल्पना चावला मैडिकल कालेज भेज दिया.

देवा व उस के चेलों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया गया. अगली सुबह पुलिस बल आरोपी देवा के डेरे पर पहुंचा, लेकिन वह फरार हो चुकी थी. पुलिस ने वहां की तलाशी ली. डेरे की भव्यता देख कर पुलिस भी हैरान रह गई. देवा भले ही साध्वी थी, लेकिन डेरे में वे तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं थीं, जिन के आम आदमी सिर्फ ख्वाब देखता है.

पुलिस ने संभावित ठिकानों पर छापेमारी शुरू कर दी, साथ ही देवा का इतिहास खंगाला तो पता चला कि वह एक मामूली लड़की थी. एक मामूली लड़की किस तरह लोगों के लिए देखते ही देखते देवी बन गई.  दरअसल जिसे लोग साध्वी देवा ठाकुर के नाम से जानते थे. उस का बचपन का नाम ममता था.

कई सालों पहले प्रचारित होना शुरू हुआ कि ममता का व्यवहार आम बच्चों से अलग है. वह दूसरों के मन की बात जान लेती है और बैठेबैठे ध्यान मुद्रा में चली जाती है. बाद में कहा जाने लगा कि ममता के पास अपार शक्तियां हैं और उस का साक्षात्कार सीधे ईश्वर से होता है. यह चर्चाएं कुछ ऐसी फैलीं कि लोग उसे देवी मानने लगे.

लोग उस के पास अपनी समस्याएं ले कर आने लगे. इस के बाद ममता ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए और नाम भी बदल कर साध्वी देवा ठाकुर रख लिया. 11 जनवरी, 1998 को माला बालासुंदरी देवा धाम से डेरे का शिलान्यास कर के वहां पूजास्थल भी बना दिया गया. धीरेधीरे देवा के मुरीदों की संख्या बढ़ती गई.

देवा महत्त्वाकांक्षी थी. शाही अंदाज में जीना अच्छा लगता था. कमाई हुई तो उस ने डेरे को आलीशान तरीके से विस्तार दे दिया. देवा ने सन 2010 में देवा इंडिया फाउंडेशन नाम से एक संस्था रजिस्टर्ड करा ली और खुद उस की चेयरपरसन बन गई. डेरे पर आने वाले लोग खुल कर दान देते थे. ऐसे भक्तों के दान ने ही देवा को राजसी ठाठबाट वाली महिला बना दिया.

देवा को हथियारों से प्रेम था, इसलिए उस ने अपने साथ हथियारबंद लोग रखे. इस से रौब भी जमता था और शौक भी पूरा होता था. कुछ ही सालों में देवा ने अपनी अलग पहचान बना ली. देवा ने अपने प्रचार के लिए सोशल साइट्स को भी जरिया बनाया. हथियारों के लाइसैंस देने की वह पैरवी करती थी.

एक बार वह तब सुर्खियों में आई, जब उस ने बयान जारी कर के कहा कि देश को आधार कार्ड से ज्यादा जरूरत हथियारों के लाइसैंस की है. अगर सरकार देश के नागरिकों की हत्या आतंकवादियों के हाथों होने से नहीं रोक सकती तो सभी भारतीयों को हथियारों के लाइसैंस दे दिए जाएं, ताकि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें.

कुछ महीने पहले देवा ने एक जनसभा में यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि गैरहिंदुओं की जबरन नसबंदी की जाए, ताकि उन की आबादी को बढ़ने से रोका जा सके. इस मामले में जम्मूकश्मीर के श्रीनगर में एक याचिका के बाद अदालत ने देवा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे. इस सब के बीच फायरिंग से हुई मौत का मामला देवा पर भारी पड़ गया.

पुलिस उस की तलाश में जुटी रही. उस की तलाश में अन्य जनपदों के अलावा राजस्थान जा कर भी छापेमारी की गई, पर वह नहीं मिली. लोगों में देवा को ले कर गुस्सा था. एक संगठन के पदाधिकारी ललित भारद्वाज ने बयान जारी किया कि धर्म की आड़ में देवा को ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करनी चाहिए थी.

देवा की फायरिंग की वीडियो वायरल हो रही थी. पुलिस को इस वारदात से पहले की भी एक वीडियो मिली, जिस में पानीपत जिले में आयोजित एक समारोह में देवा व उस के चेलों ने जम कर फायरिंग की थी.

2 दिन बीत चुके थे, लेकिन देवा का कोई सुराग नहीं लग रहा था. घटना के बाद से ही उस के दोनों मोबाइल बंद थे. पुलिस उस तक पहुंच पाती कि इसी बीच 18 नवंबर को उस ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. इस दौरान देवा का हुलिया ही बदला हुआ था. न उस के बदन पर कोई आभूषण था और न ही भगवा वस्त्र. वह गुलाबी छींटदार सलवारसूट पहन कर आई थी.

पता चलते ही पुलिस वहां पहुंच गई और माननीय न्यायाधीश हरीश सब्बरवाल की अदालत में देवा को पेश कर के हथियारों की बरामदगी और उस के साथियों की गिरफ्तारी का हवाला दे कर रिमांड मांगा. अदालत ने उसे 5 दिनों के रिमांड पर पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस देवा का कस्टडी रिमांड ले कर बाहर निकली तो उस ने मीडिया के सामने कोरे झूठ का हास्यास्पद जाल फेंका कि वह निर्दोष है और उसे षडयंत्र के तहत फंसाया जा रहा है. वह इस बात को भी झुठला गई कि उस ने गोलियां चलाई थीं. देवा के चेहरे पर मायूसी का डेरा था. उस ने खुद को बीमार भी बताया.

इस दौरान अदालत के बाहर गहमागहमी का माहौल रहा. देवा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे साथ ले कर कई स्थानों पर दबिशें दीं. उस रात उसे महिला थाने की हवालात में रखा गया तो उसे नींद नहीं आई. रात में वह कई बार रोई. अगले दिन पुलिस उसे ले कर राजस्थान रवाना हो गई. वहां उस की निशानदेही पर न तो हथियार मिल सके और न उस के चेले. पुलिस खाली हाथ लौट आई.

23 नवंबर को पुलिस ने देवा के 3 आरोपी चेलों शुभम, देवेंद्र व मलकीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया. इन के कब्जे से फायरिंग में इस्तेमाल की गई 2 बंदूकें व 2 माउजरों के साथ 4 दरजन से अधिक कारतूस बरामद किए गए.

पुलिस ने नीलोखेड़ी से देवा की फौर्च्युनर कार भी बरामद कर ली. पुलिस ने चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस देवा के फरार अन्य 3 साथियों राजीव, बलजीत व महमल की सरगरमी से तलाश कर रही थी. देवा ने धर्म की आड़ में हथियारों का शौक रख कर उन के प्रदर्शन का जानलेवा खेल नहीं खेला होता तो शायद ऐसी नौबत कभी न आती.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अजय देवगन की नजर में वह गलत नही

आम तौर पर कहा जाता है कि अपनी गलती को स्वीकार करने वाला इंसान ही सफलता की सीढ़ियां तय कर सकता है. मगर बौलीवुड का नियम है कि अपनी गलती को स्वीकार करने की बजाय दूसरों पर दोष मढ़ देना. यही अब अजय देवगन कर रहे हैं.

फिल्म ‘‘गोलमाल अगेन’’ के प्रमोशन के दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए अजय देवगन ने अपनी पिछली फिल्म बादशाहो की असफलता का सारा ठीकरा फिल्म के निर्देशक मिलन लूथरिया पर फोड़ते हुए उन्हें काफी बुरा भला कहा है. जबकि पूरा बौलीवुड मानता है कि फिल्म बादशाहो की असफलता में अजय देवगन का सबसे बड़ा हाथ है.

ज्ञातब्य है कि मिलन लूथरिया के निर्देशन में अजय देवगन कच्चे धागे, चोरी चोरी, वंस अपौन ए टाइम इन मुंबई जैसी सफल फिल्में कर चुके हैं. बादशाहो मिलन लूथरिया के साथ अजय देवगन की चौथी फिल्म थी. मगर इस फिल्म के प्रमोशन के लिए अजय देवगन ने कोई समय नहीं दिया था. जब अजय देवगन को फिल्म बादशाहो को प्रमोट करना था, तब वह मुंबई से दूर हैदराबाद में अपनी फिल्म गोलमाल अगेन की शूटिंग में व्यस्त रहे.

बौलीवुड के सूत्रों का मानना है कि जब से अजय देवगन ने अपने आस पास चंद लोगों की एक फौज खड़ी कर, इसी फौज के इशारे पर सारे निर्णय लेने लगे हैं, तब से उनकी असफलता का दौर शुरू हुआ है. ‘एक्शन जैक्शन’, ‘दृश्मय’,  ‘शिवाय’, ‘गेस्ट इन लंदन’, ‘बादशाहो’ सहित अजय देवगन की लगातार असफल फिल्में हैं. फिल्म ‘‘शिवाय’’ में अभिनय करने के साथ ही अजय देवगन ने इस फिल्म का निर्माण व निर्देशन भी किया था. ऐसे में इस असफल फिल्म के लिए वह किसे दोष देंगे.

बौलीवुड से जुड़े कुछ सूत्र मानते हैं कि कलाकार के तौर पर अजय देवगन को अपनी हर असफल फिल्म के बाद आत्म मंथन करना चाहिए कि उन्होने जिनकी सलाह पर निर्णय लिया, वह निर्णय कितना सही या गलत रहा. कहां उनसे चूक हुई, चूक तो हर इंसान से हो सकती है.

बहरहाल, अजय देवगन ने बड़ी मासूमियत के साथ फिल्म ‘‘बादशाहो’’ की असफलता के लिए फिल्म के निर्देशक मिलन लूथरिया पर कटु बाण छोड़ते हुए बड़ी मासूमियत के साथ अजय देवगन ने कहा है ‘‘मैं खुद फिल्म के क्लाईमेक्स से खुश नहीं था. मुझे फिल्म का अंत पसंद नहीं था. इस बात को लेकर मैंने निर्देशक से झगड़ा भी किया था. हमने कुछ और ही दृश्य फिल्माया था, पर अंत में उस दृश्य की बजाय यह दृश्य कैसे फिल्म में जोड़ा गया, यह मैं भी नहीं समझ पाया. इतना ही नही फिल्म का प्रमोशन भी बहुत भयानक रूप से गलत रहा.’’

मगर बौलीवुड के अंदरूनी सूत्र इसे अजय देवगन के मगरमच्छी आंसूं की संज्ञा दे रहे हैं.

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