फोटोशूट में दिखा दिशा पटानी का बोल्ड अंदाज

फिल्‍म ‘एम एस धोनी: द अनटोल्‍ड स्‍टोरी में अपने छोटे से किरदार के बाद भी इंडस्‍ट्री में नाम कमा चुकी दिशा पटानी फिल्मों से कहीं ज्यादा अपने लुक्स, फैशन स्टेटमेंट और अफेयर की खबरों में बनी रहती हैं.

अपने इसी बोल्ड और ब्यूटीफुल अंदाज को लेकर जानी जाने वाली एक्ट्रेस दिशा पटानी एक बार फिर से सुर्खियों में हैं. इसकी वजह है, हाल ही में सामने आया उनका एक और बोल्ड फोटोशूट.

फोटोशूट की तस्वीरें उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. इस फोटो शूट में दिशा पटानी का ग्लैमर अंदाज देखते ही बन रहा है. सोशल मीडिया पर बेहद हाट अंदाज में दिखने की वजह से दिशा एक बार फिर से ट्रोलिंग का शिकार हो गई हैं.

दिशा के इस हाट फोटो को देख खुछ ने उन्हें साड़ी पहनने की सलाह दी तो किसी ने शिल्पा शेट्टी का करियर खराब करने का तंज कसा.

एक्ट्रेस दिशा पटानी की भले ही ज्यादा फिल्में ना आईं हो, लेकिन उनकी पापुलैरिटी में कोई कमी नहीं है. हालीवुड सुपरस्टार जैकी चैन के साथ ‘कुंग फू योगा’ में नजर आ चुकीं दिशा इन दिनों कथित ब्वायफ्रेंड टाइगर श्राफ के साथ ‘बागी 2’ की शूटिंग में बिजी हैं.

आपको बता दें कि इसी बीच दिशा पटानी ने अपनी आने वाली एक और फिल्म की घोषणा की हैं. उन्होंने हाल ही में बताया कि वह तामिल ऐतिहासिक फिल्म ‘संघमित्रा’ में मुख्य किरदार निभाएंगी. इस फिल्म के लिए पहले श्रुति हसन को चुना गया था, लेकिन किसी वजह से उन्हें ये फिल्म छोड़नी पड़ी जिसके कारण अब फिल्म ‘संघमित्रा’ दिशा पटानी के हाथ लग गया है.

देह धंधे में डूबी लड़कियों का हैरान कर देने वाला सच

नेहा पैसा कमाने के लिए देहधंधा कर रही थी, लेकिन उस ने देहधंधे से जिस तरह की कमाई के बारे में सोचा था, उस तरह उस की कमाई हो नहीं रही थी. ज्यादा कमाई के लिए उस ने पूनम आंटी से बात की तो उस ने नेहा को ऐसी जगह पहुंचा दिया, जहां की चमकदमक देख कर उस की आंखें फैल गईं. पूनम ने नेहा को पूरी बात समझा दी थी. वह पहले तो वहां झिझक रही थी, लेकिन बाद में पूनम की बात मान कर उस के बताए रास्ते पर चल पड़ी थी. आखिर उसे देहधंधा तो करना ही था. पूनम के संपर्क में आने के बाद नेहा ने देखा कि केवल लड़कियां ही नहीं, शादीशुदा औरतें भी इस धंधे में लगी हैं.

नेहा ने कई लड़कियों से बात की तो पता चला कि ज्यादातर लड़कियां या औरतें अपने घरों से नौकरी करने के नाम पर निकलती हैं और वहां आ कर देहधंधा करती थीं. तमाम ऐसी लड़कियां थीं, जिन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था. होटल में आते समय वे अपने चेहरे को कवर किए रहती थीं. बाहर निकलते समय भी वे चेहरा ढके रहती थीं.

पुलिस ने रामपुर के संधू होटल पर छापा मार कर 5 कालगर्ल्स सहित 7 लोगों को पकड़ा था. पकड़े गए लोगों के पास से आपत्तिजनक चीजें और नकदी बरामद की गई थी. पुलिस पहले भी इस होटल से सैक्स के कारोबार में शामिल लोगों को पकड़ कर जेल भेज चुकी थी. वहां पकड़ी गई ज्यादातर लड़कियां उत्तराखंड की थीं.

रामपुर के थाना स्वार पुलिस को सूचना मिली थी कि होटल संधू में सैक्स का कारोबार चल रहा है. पुलिस ने होटल पर छापा मारा तो वहां 5 कालगर्ल्स सहित 7 लोगों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया. पकड़ी गई ज्यादातर लड़कियां उत्तराखंड की रहने वाली थीं. पकड़े गए लोगों में संधू होटल का मैनेजर भी था.

आसपास के लोग कई बार इस होटल के बारे में पुलिस से शिकायत कर चुके थे, लेकिन होटल संचालक और पुलिस की मिलीभगत की वजह से पुलिस ने काररवाई नहीं की थी. इसी साल अप्रैल महीने में होटल से 2 कालगर्ल्स सहित 4 लोगों को पकड़ा गया था. पूछताछ में इन लड़कियों से पता चला था कि काम की तलाश में भटक रही लड़कियों को देहधंधा कराने वाले लोग आसानी से उन्हें अपनी ओर मोड़ लेते थे.

देहधंधे का संचालन करने वाला इस बात का पूरा खयाल रखता था कि एक ग्राहक के पास एक ही लड़की बारबार न जाए. लड़कियों को भी इस बात की खास हिदायत दी जाती थी कि वे ग्राहक से बाहर संबंध न रखें. कई संचालक तो लड़कियों और ग्राहकों के मोबाइल फोन अपने पास रख लेते थे, जिस से किसी तरह के फोटो या वीडियो के बनने की संभावना न रहे.

इस तरह के चलन में लड़कियों के लिए अच्छी बात यह होती है कि ये पुराने दकियानूसी चकलाघर से अलग होते हैं. यहां साफसुथरे कमरों और अच्छे ग्राहकों से संपर्क होता है. किसी तरह के शोषण की संभावना नहीं होती. संचालक इस बात का खयाल रखता है कि किसी लड़की से जबरन कुछ न कराया जाए. इस से किसी तरह के विवाद की संभावना नहीं रहती.

इस तरह के ज्यादातर मामले दूसरे लोगों के विवादों की वजह से ही पुलिस के सामने आते हैं. ज्यादातर मामलों में होटलों के आसपास रहने वाले लोग ही पुलिस से शिकायत करते हैं. कई बार विरोधी होटल वाले भी शिकायत कर देते हैं. पुलिस को ये बातें पहले से ही पता होती हैं. इस तरह की शिकायतों के बाद कुछ दिनों तक होटल यह धंधा बंद कर देते हैं.

धीरेधीरे वे फिर धंधा शुरू कर देते हैं. इस तरह की शिकायतों से पुलिस को मिलने वाली रिश्वत बढ़ जाती है. पहली बार जब नेहा पुलिस छापे में पकड़ी गई थी तो उसे इस बात का डर सता रहा था कि उस के घर वालों को सच्चाई का पता चल जाएगा. लेकिन पकड़े जाने पर संचालकों ने नेहा के घर वालों को बताया था कि वह टूर पर गई है. 3 दिन उस का मोबाइल बंद रहेगा. यही नहीं, संचालकों ने अदालत में जमानत के समय नेहा का नाम और पता सब फरजी लिखवाया था. इस से किसी को नेहा के सच का पता नहीं चला.

संचालक कोर्ट और पुलिस के कामों में होने वाले खर्च की रकम को लड़कियों से ही वसूल करते हैं. लड़कियों को यह पैसा किस्तों में अदा करना होता है. असल में ये लड़कियां किसी रोजगार से जुड़ी नहीं होतीं. घर के लोग रोजगार या कामधंधे से बाहर जाते हैं. वे इतना पैसा नहीं कमा पाते कि परिवार चला सकें. ऐसे में लड़कियां रोजगार के लिए देहधंधे का सरल रास्ता चुनती हैं.

उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में रोजगार के साधन उस तरह से नहीं बन पाए, जैसी उम्मीद की जा रही थी. ऐसे में गरीबी में परेशान लोग कई तरह के बुरे कामों में फंस गए हैं. गांवों और शहरों में रहने वाली लड़कियां मैदानी इलाकों के बड़े शहरों में नौकरी के लिए जाती हैं. जाती तो वे नौकरी के लिए हैं, पर उन में से तमाम देहधंधे में फंस जाती हैं.

वहां से आने वाली लड़कियां रामपुर, बरेली और दिल्ली तक जाती हैं. एक साल में केवल रामपुर में ही ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन में वहां से आई लड़कियां देह धंधा करती पकड़ी गई हैं. लेकिन ये किसी बड़े रैकेट का हिस्सा नहीं होतीं. होटल के संचालकों से ये सीधा संपर्क रखती हैं. जरूरत पड़ने पर होटल के संचालक इन्हें बुला लेते हैं.

ये लड़कियां 6 से 8 के ग्रुप में होती हैं. कई बार 3 से 4 लड़कियां भी अपना ग्रुप बना लेती हैं. ऐसी लड़कियां ज्यादातर दिन में देह कारोबार करती हैं. प्रति ग्राहक ये 5 सौ रुपए लेती हैं. होटल मालिक ग्राहक से कमरे के हिसाब से पैसा वसूल करता है, जो आमतौर पर डेढ़ से 2 हजार रुपए के बीच होता है.

अगर लड़की को रात में रोकना होता है तो उस का रेट अलग होता है. मैदानी इलाकों के मुकाबले पहाड़ी इलाकों के शहरों और होटलों में देहधंधा कम होता है. क्योंकि वहां के होटलों में इस तरह के काम करना आसान नहीं है.

ऐसे में पहाड़ घूमने आने वाले पर्यटक पहाड़ से लगे मैदानी इलाकों में रुकते हैं. यहां उन्हें कई तरह की सुविधाएं मिल जाती हैं. कई पर्यटक तो मैदानी इलाकों के शहरों में ही रुकते हैं और वहां से कार से पहाड़ घूमने जाते हैं. यहां के होटल पहाड़ के होटलों के मुकाबले सस्ते होते हैं और यहां इस तरह की सुविधाएं भी मिल जाती हैं.

मैदानी इलाकों के होटलों में पुलिस का खतरा कम होता है. मैदानी इलाकों में देहधंधा करने वाली लड़कियां पहाड़ों से आती हैं. पहाड़ पर एक तो ऐसे काम मुश्किल से होते हैं, दूसरे वहां पहचान होने का खतरा होता है. ऐसे में मैदानी इलाकों के होटल इन के लिए ज्यादा सुरक्षित होते हैं. पहाड़ों की ये लड़कियां अपने शहरों से बहुत दूर नहीं जाती हैं.

यों आम खाएगा आम आदमी

‘अब की बार आम आम आदमी की पहुंच के अंदर,’ किराने की दुकान से नूनतेल लेते हुए अचानक नजर अखबार की इस सुर्खी पर पड़ी, तो एकाएक भरोसा नहीं हुआ. लेकिन अखबार वाले झूठी खबर भला क्यों छापेंगे, यह सोचते हुए उस ने हिम्मत जुटाई और आम के भाव पूछे.

कीमत बहुत ज्यादा नहीं थी, तो कम भी नहीं थी. हफ्ताभर चायबीड़ी वगैरह की तलब छोड़ कर आखिरकार उस ने आधा दर्जन आम खरीद ही लिए. मियांबीवी और 3 बच्चे. कुल 5 जनों के लिए एकएक आम. 6ठा आम वह कहीं अकेले में बैठ कर गुपचुप खाना चाहता था.

सड़क पर किसी जानपहचान वाले से टकराने का खतरा था, इसलिए वह पास के एक पार्क में घुस गया, जहां ज्यादातर बड़े आदमी ही टहला करते थे. वह झाड़ी की ओट ले कर बचपन के दिनों को याद करते हुए तबीयत से आम चूसने का इरादा कर के बैठ गया.

‘‘कौन है तू? थैली में क्या है?’’ वह आम निकालता, इस से पहले ही किसी ने कड़क कर उस से पूछा. सकपकाते हुए उस ने सिर उठाया. सामने डंडा लिए हवलदार खड़ा था.

‘‘जी, आम हैं,’’ कहते हुए उस ने बेहिचक थैली का मुंह खोल दिया. उस के हिचकने का कोई कारण भी तो नहीं था. ‘आम आदमी आम खाते हुए पकड़ा गया’ ऐसी कोई खबर बनने की उम्मीद थोड़े ही थी.

‘‘अरे, इतने सारे आम. कहां से लाया है और यहां क्या कर रहा है?’’ हवलदार जोर से बोला.

‘‘जी, ये आम मैं ने सड़क पर ठेले वाले से लिए हैं… बच्चों के लिए. शांति के साथ बैठ कर एक आम खाने के लिए यहां आ गया.’’

यह सुन कर हवलदार की आंखें चमकीं, ‘‘तू जब पार्क में घुस रहा था, तभी तेरी चाल देख कर मैं समझ गया था कि जरूर कुछ गड़बड़ है. हम पुलिस वाले मामला फौरन ताड़ लेते हैं. अच्छा बता, किधर है शांति?’’

‘‘जी, शांति से मेरा मतलब यहां आराम से बैठ कर आम खाने से है,’’ वह थोड़ा हड़बड़ाया.

हलवदार खिसियाते हुए बोला, ‘‘पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करता है. चल बता, यहां कितने दिनों से यों छिप कर आम खा रहा था?’’

‘‘जी, मैं तो यहां पहली बार आया हूं. और आम तो मैं ने पिछले 2 साल से नहीं खाया. इस महंगाई में आम आदमी भला रोजरोज कैसे आम खा सकता है?’’ हवलदार सोच में पड़ गया.

‘‘आम आदमी को आम खाना भी नहीं चाहिए. क्या तुझे मालूम नहीं है कि आम फलों का राजा है और आम आदमी जनतंत्र का राजा है. एक राजा दूसरे राजा को खाए, यह थोड़े ही शोभा देता है. फिर हम सेवक किसलिए हैं. खानेपीने का तगड़ा अभ्यास है हमें,’’ कहते हुए हवलदार ने आमों पर नजर डाली.

उस ने थैली का मुंह बंद कर लिया और हिम्मत की, ‘‘सेवक नहीं, आप तो सरकार हैं. अब जाने की इजाजत दीजिए.’’

हवलदार डपटते हुए बोला, ‘‘ऐसे कैसे जाने देंगे. हम कानून के रखवाले हैं. पैनी नजर रखते हैं. दूर की सोचनी पड़ती है हमें, नहीं तो देश कैसे चलेगा.’’

‘‘लेकिन इस में देश और कानून का क्या सवाल?’’ न चाहते हुए भी उस का मुंह बिगड़ गया.

‘‘अरे वाह, सवाल क्यों नहीं है? तुम और तुम्हारे बच्चे आम खाएंगे. छिलके गली में फेंकेंगे. इस से गंदगी होगी. हैजा भी फैल सकता है,’’ हवलदार तुनका.

‘‘लेकिन साहब, हम लोग छिलके फेंकते ही नहीं, खा लेते हैं,’’ उस ने सफाई दी.

‘‘क्या कहा? छिलके तक खा लेते हो. लेकिन यह तो सेहत के लिए हानिकारक है. जो हानिकारक है, वह जुर्म है,’’ हवलदार ने दूर की हांकी.

‘‘छिलके समेत आम खाना जुर्म कैसे हो सकता है साहब? छिलके में तो तमाम तरह के विटामिन होते हैं. मेरे बेटे की किताब में लिखा है,’’ आम आदमी जानकार निकला.

पर हवलदार कहां हार मानने वाला था, ‘‘अच्छा किताब में लिखा है, तो चलो मान लेते हैं. लेकिन गुठली तो जरूर तुम सड़क पर फेंकोगे. इस से हादसा तक हो सकता है. तब तो जुर्म होगा कि नहीं?’’

इस बाबत आम आदमी गांधीवादी था, ‘‘नहीं जनाब, हम तो गुठली भी नहीं फेंकते. उसे सुखाते हैं, फिर भून कर या उबाल कर खा लेते हैं. गुठली के कड़े खोल को चूल्हा जलाने के काम में लाते हैं,’’ अपनी तरफ से उस ने एकदम सधा हुआ जवाब दिया था. उस के हिसाब से अब के पकड़ में आने की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘ओ… हो… तो यह बात है,’’ कहते हुए हवलदार गंभीर हो गया. अब हवलदार को भी अपने बच्चे की किताब टटोलने का फायदा मिल रहा था.

‘‘यह तो तुम बड़ा खतरनाक जुर्म कर रहे हो. सरकार बेचारी अपील करकर के हार गई है कि पेड़ लगाओ, धरती को खूबसूरत बनाओ, लेकिन इस अपील का कोई असर ही नहीं हो रहा है. अब जा कर पता चला कि आखिर पेड़ बेचारे उगें तो कैसे उगें. सारी गुठलियां तो तुम लोग खा जाते हो. इस गुनाह का तो तुम्हें भारी दंड मिलना चाहिए.’’

यह सुन कर उस की घिग्घी बंध गई. वाकई वह कितना भारी अपराध करता आ रहा है. यहां तक कि उस के बच्चे तो आसपड़ोस वालों की गुठलियां भी चट कर जाते हैं. हर गुठली से आम का एक पेड़ तैयार हो सकता था यानी अब तक उस ने देश के कितने पेड़ों का नुकसान कर दिया है. कहीं हवलदार ने हिसाब लगा लिया, तो गजब हो जाएगा. तब कितना जुर्माना भरना पड़ेगा. वह ढीला पड़ गया, ‘‘माफ करें साहब. आगे से गुठली नहीं खाऊंगा.’’

‘‘माना कि नहीं खाएगा, लेकिन गुठलियां खाखा कर अब तक जो देश का कबाड़ा किया है, उस का हर्जाना कौन भरेगा?

‘‘ऐसा करते हैं कि 6 में से बस 3 आम हम ले लेते हैं,’’ कहते हुए हवलदार ने थैली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो वह एकदम बिदका.

‘‘अरे साहब, मुझ गरीब को क्यों घेरते हो? आम तो आप उस ठेले वाले से ले लेना. वह आप को मना थोड़े ही करेगा.’’

‘‘चुप बे, हमें ही सिखाता है. भला ठेले से हम आम कैसे ले सकते हैं. उस से तो हम हफ्ता लेते हैं. नियम की बात है यह,’’ हवलदार ने घुड़का, तो उस ने चुपचाप 3 आम हवलदार के हवाले कर दिए.

हवलदार का मूड ठीक हुआ, तो उस ने हौसला किया, ‘‘हुजूर, हम छोटे लोगों को तो आप जब चाहो कानून के डंडे से दबा देते हो, लेकिन सुना है कि ये बड़े लोग तो आप की बिलकुल परवाह नहीं करते हैं. फिर भी आप हम से तूतड़ाक और उन से बड़ी तमीज से पेश आते हो.’’

ह आरोप सुन कर हवलदार तिलमिलाया, ‘‘नहीं, एकदम गलत बात है यह. कानून की नजर में सब बराबर हैं. भेदभाव हम बिलकुल नहीं रखते. कानून का जो भी हक बनता है, सब से वसूलते हैं. किसी को नहीं छोड़ते. बस, आदमी देख कर जरा तरीका बदल देते हैं. ट्रेनिंग में हम ने यही सीखा है.

‘‘देखो, वह जो अभीअभी सामने सड़क पर सेठ ने गलत जगह पर कार खड़ी की है, मैं उस से भी हर्जाना लूंगा. जाते ही एक सलाम ठोकूंगा. देखना, तपाक से 50 का नोट देगा मुझे. छुट्टा नहीं हुआ, तो सौ भी दे सकता है.

‘‘चल, तू कहता है, तो तमीज की खातिर मैं तुझे भी एक सलाम झाड़ देता हूं. तू 50 का नहीं, सिर्फ 10 का ही नोट देना. पर इस से कम में सलाम वाली तमीज खर्च करना मेरे कानून के खिलाफ है.’’

यह सुनते ही वह पुलिस वाले की सलामी की मार से बचने के लिए भाग खड़ा हुआ. सड़क पर आतेआते उस ने बड़ी सरलता से यह जटिल हिसाब लगाया कि 3 बच्चों में 2 आम बांट देगा और एक आम वह बीवी के साथ मिल कर खाएगा. अकेले एक पूरा आम खाने के अपराध  से बचने का संतोष सुख भी अब उस के खाते में था.

इस तरह रणवीर के फैन्स ने लिया शाहिद से बदला..!

फिल्म ‘पद्मावती’ के ट्रेलर रिलीज के बाद लोगों से इस ब्लौकबस्टर फिल्म को देखने का सब्र नहीं हो पा रहा. वजह यह है कि सोशल मीडिया पर दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर और रणवीर सिंह की अदाकारी का डंका बज रहा है, जो लोगों को अपना दीवाना बना रहा है.

सिर्फ रानी पद्मावती की खूबसूरती और ग्रेस ही नहीं, बल्कि महाराज रावल रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के किरदार भी आन स्क्रीन लोगों को लुभा रहे हैं.

अगर आपसे इस फिल्म का इंतजार नहीं हो रहा, तो इससे जुडी खबरों को ही पढ़कर अपना जी बहला लीजिये, क्योंकि अब आन स्क्रीन नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ही अलाउद्दीन और रतन सिंह के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है. खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि पद्मावती के ट्रेलर के बाद से ही शाहिद कपूर निर्माताओं से नाराज हैं. उन्हें लगता है कि रणवीर सिंह और दीपिका की तुलना में उन्हें ट्रेलर में कम समय दिया गया है.

इसी वजह से दीपिका के ‘घूमर’ के बाद शाहिद का गाना रिलीज किया गया. जैसा कि आप जानते हैं, दीपिका और शाहिद का रोमेंटिक गाना ‘एक दिल एक जान’ रिलीज के बाद से ही सोशल मीडिया पर धमाल मचा रहा है.

लेकिन लगता है रणवीर सिंह के फैंस इस बात से नाराज हो गए हैं. असल में इस फिल्म के आफिशियल पोस्टर के रूप में दीपिका और शाहिद की तस्वीरों के बीच रणवीर सिंह के लुक को बड़ी चतुराई से लाया गया है. हाल ही में गल्फ में पद्मावती के पोस्टर रिलीज के बाद शाहिद का गाना रिलीज किया गया, लेकिन इसके तुरंत बाद ही रणवीर के फैन क्लब अकाउंट से रणवीर सिंह का अलाउद्दीन खिलजी पोस्टर रिलीज कर दिया गया, जो उनके पास पहले से ही मौजूद था.

हालांकि इस पोस्टर के सोशल मीडिया पर आने के 5 घंटों बाद रणवीर सिंह ने इसे अपने आफिशियल अकाउंट से पोस्ट किया, लेकिन तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. क्योंकि शाहिद के रोमेंटिक गाने पर रणवीर का एक छोटा सा लुक पहाड़ बनकर टूटा.

बता दें की इस रोल के लिए निर्माता पाकिस्तानी एक्टर फवाद खान और शाहरुख खान के पास गए थे. लेकिन शाहरुख खान ने इस रोल के लिए मना कर दिया था, जिसके बाद इस रोल को शाहिद कपूर की हामी मिली.

अमेरिका और अपराध : गंदे पानी में डूब रहा समाज

अमेरिकी समाज को जोड़ने वाला गोंद अब पिघल चुका है. यह लास वेगास में 59 साल के स्टीफन पैडोक द्वारा एक होटल की 32वीं मंजिल से एक संगीत कंसर्ट में आए निहत्थे लोगों पर सैकड़ों गोलियां बरसाने से साबित हो रहा है.

स्टीफन पैडोक पिछले हत्यारों की तरह न गरीब था, न सिरफिरा युवा, वह करोड़पति था और लाखों रुपयों की बंदूकें उस के पास से मिली हैं. वह हाल में मुसलमान बना पर अब तक यह सुबूत नहीं मिला कि उसे किसी ने उकसाया. उस का भाई, जो उस का बिजनैस पार्टनर भी था, अचंभित है कि स्टीफन ने ऐसा, इतने सुनियोजित ढंग से क्यों किया.

स्टीफन ने अपने कृत्य के लिए न केवल मनपसंद होटल चुना, उस ने कौर्नर का रूम भी लिया और वह एकएक कर के कई बंदूकें कमरे में ले आया. उस ने बंदूकों को मशीनगनों में तबदील किया. वह तकनीक में दक्ष था और उस के 2 हवाईर्जहाज थे. वह दक्ष पायलट भी था. उस के मन में किसी के प्रति घृणा थी, यह जांच करने वाले अभी पता नहीं कर पाए हैं.

अमेरिकी समाज अब गहरे, गंदले पानी में डूब रहा है. अमेरिका अपराध का साम्राज्य तो था पर वहां की स्वतंत्रता, नागरिक भावना, कर्तव्यनिष्ठा, मेहनत, अद्भुत खोजी प्रवृत्ति के आगे अपराधी तत्त्व वहां के समाज पर हावी न हो पाए. अमेरिका में अपने समाज के दुर्गुणों को जगजाहिर करने की अद्भुत प्रतिभा थी जिस से वह गलतियों को ठीक कर सकता था.

लगता है, समाज को तोड़ने में मोबाइल क्रांति ने नया काम किया है. पिछले दशकों में जिस तरह से अमेरिका ने साइंस फिक्शन के नाम पर हत्याअपराध को अपनाया है, साहित्य के नाम पर झूठे चमत्कारों से पटी हैरी पौटर शृंखला को अपनाया है, आमजन ने गंभीर समाचारपत्रों को नकारा है, प्लेबौय से भद्दे पौर्न को अपनाया है उस से यह लग रहा है कि अमेरिका भटक रहा है.

अभी भी अमेरिका दुनिया का सब से अमीर देश है. पर जो नैराश्य अमेरिका में है, जिस का नतीजा डोनाल्ड ट्रंप जैसा महामूर्ख खब्ती राष्ट्रपति है, वह शायद किसी और बड़े देश में नहीं है. अमेरिका में इसलामी आतंकवादियों ने वह नहीं किया जो उस के खुद के लोग कर रहे हैं. वहां हिंसा और मनमानी रोज की आदत बन रही है.

अमेरिकियों ने उसी तरह से इंटरनैट का दुरुपयोग किया है जैसा आणविक शक्ति का नागासाकी और हीरोशिमा पर बम फेंक कर किया था. आम आदमी अमेरिका में आज अकेले पड़ रहे हैं, कुढ़ रहे हैं, मानसिक बीमार हैं और उन में से कुछ स्टीफन पैडोक बन रहे हैं. अमेरिका की आत्मआलोचना और स्वयंउपचार की कला भी लुप्त हो रही है. जो लास वेगास में हुआ, वह दुनियाभर के लिए खतरे का सूचक है.

पुणे का नैना पुजारी हत्याकांड

9 मई, 2017 को पुणे के सैशन कोर्ट के जज श्री एल.एल. येनकर की अदालत में कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. इस की वजह यह थी कि वह 8 साल पुराने एक बहुत ज्यादा चर्चित नैना पुजारी के अपहरण, गैंगरेप, लूट और मर्डर के मुकदमे का फैसला सुनाने वाले थे. चूंकि यह बहुत ही चर्चित मामला था, इसलिए मीडिया वालों के अलावा अन्य लोगों को इस मामले में काफी रुचि थी.

अभियुक्तों को एक दिन पहले यानी 8 मई को सरकारी वकील और बचाव पक्ष के वकीलों की लंबी बहस के बाद दोषी करार दे दिया गया था, इसलिए निश्चित हो चुका था कि उन्हें इस मामले में सजा होनी ही होनी है. अब लोग यह जानना चाहते थे कि इंसान के रूप में हैवान कहे जाने वाले उन दरिंदों को क्या सजा मिलती है.

ठीक समय पर जज श्री एल.एल. येनकर अदालत में आ कर बैठे तो अदालत में सजा को ले कर चल रही खुसुरफुसुर बंद हो गई थी. जज के बैठते ही पेशकार ने फैसले की फाइल उन के आगे खिसका दी थी. जज साहब ने एक नजर फाइल पर डाली. उस के बाद अदालत में उपस्थित वकीलों, आम लोगों और अभियुक्तों को गौर से देखा. इस के बाद उन्होंने फाइल का पेज पलटा. जज साहब ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया, यह जानने से पहले आइए हम पहले इस पूरे मामले को जान लें कि नैना पुजारी के साथ कैसे और क्या हुआ था?

7 अक्तूबर, 2009 की शाम पुणे के खराड़ी स्थित सौफ्टवेयर कंपनी सिनकोन में काम करने वाली नैना पुजारी ड्यूटी खत्म कर के शाम 8 बजे घर जाने के लिए बाहर निकलीं तो अंधेरा हो चुका था. वैसे तो वह शाम 7 बजे तक निकल जाती थीं लेकिन उस दिन काम की वजह से उन्हें थोड़ी देर हो गई थी. शायद इसीलिए कंपनी से निकलते समय उन्होंने पति अभिजीत को फोन कर के बता दिया था कि वह कंपनी से निकल चुकी हैं.

महिला कर्मचारियों को कंपनी से निकलने में देर हो जाती थी तो घर पहुंचाने की व्यवस्था कंपनी करती थी. इस के लिए कंपनी ने कैब और बसें लगा रखी थीं. लेकिन उस दिन कोई कैब नहीं थी, इसलिए नैना घर जाने के लिए बस का इंतजार करने लगीं. बस आती, उस के पहले ही उन के सामने एक कार आ खड़ी हुई.

वह कार योगेश राऊत की थी. वह कंपनी में ड्राइवर की नौकरी करता था. नैना उसे पहचानती थीं, इसलिए जब योगेश ने बैठने के लिए कहा तो नैना उस में बैठ गईं. वह कार में बैठीं तो योगेश के अलावा उस में 2 लोग और बैठे थे. उन के नाम थे महेश ठाकुर और विश्वास कदम. ये दोनों भी कंपनी के ही कर्मचारी थे. महेश ठाकुर जरूरत पड़ने पर यानी बदली पर कंपनी की गाड़ी चलाता था तो विश्वास कदम सुरक्षागार्ड था.

ये दोनों भी कंपनी के ही कर्मचारी थे, इसलिए नैना ने कोई ऐतराज नहीं किया. लेकिन जब कार चली तो योगेश उन्हें उन के घर की ओर ले जाने के बजाय राजगुरुनगर, बाघोली की ओर ले जाने लगा. उन्होंने उसे टोका तो योगेश ने उन की बात पर पहले तो ध्यान ही नहीं दिया. जब तक ध्यान दिया, तब तक कार काफी आगे निकल चुकी थी.

नैना ने जब उस से पूछा कि वह कार इधर क्यों लाया है तो उस ने कहा कि इधर से वह अपने एक साथी को ले कर उसे उस के घर पहुंचा देगा. उस ने वहीं से फोन कर के अपने साथी राजेश चौधरी को बुलाया और उसे बैठा कर कार खेड़ की ओर मोड़ दी तो नैना को शंका हुई.

नैना ने योगेश को डांटते हुए वापस चलने को कहा तो योगेश के साथियों ने उन्हें दबोच कर चाकू की नोक पर चुप बैठी रहने को कहा. नैना ने उन के इरादों को भांप लिया. वह छोड़ देने के लिए रोनेगिड़गिड़ाने लगीं. लेकिन भला वे उसे क्यों छोड़ते. वे तो न जाने कब से दांव लगाए बैठे थे. उस दिन उन्हें मौका मिल गया था. चाकू की नोक पर सभी ने चलती कार में ही बारीबारी से उन के साथ दुष्कर्म किया.

इस के बाद एक सुनसान जगह पर कार रोक कर नैना का एटीएम कार्ड छीन कर उस से 61 हजार रुपए निकाले. पिन उन्होंने चाकू की नोक पर उन से पूछ ली थी.

नैना इन पापियों के सामने खूब रोईंगिड़गिड़ाईं, पर उन्हें उस पर जरा भी दया नहीं आई. उन लोगों ने उन के साथ जो किया था, किसी भी हालत में जिंदा नहीं छोड़ सकते थे. क्योंकि उन के जिंदा रहने पर सभी पकड़े जाते. पकड़े जाने के डर से उन्होंने स्कार्फ से गला घोंट कर उन की हत्या तो की ही, लाश की पहचान न हो सके, इस के लिए पत्थर से उन के सिर को बुरी तरह कुचल दिया. इस के बाद जंगल में लाश फेंक कर सभी भाग खड़े हुए.

दूसरी ओर समय पर नैना घर नहीं पहुंचीं तो उन के पति अभिजीत को चिंता हुई. इस की वजह यह थी कि कंपनी से निकलते समय उन्होंने फोन कर के बता दिया था कि वह कंपनी से निकल चुकी हैं. पति ने नैना के मोबाइल पर फोन किया. फोन बंद था, इसलिए उन की बात नैना से नहीं हो सकी.

फोन बंद होने से अभिजीत परेशान हो गए. इस के बाद उन्होंने औफिस फोन किया. वहां से तो वह निकल चुकी थीं, इसलिए वहां से कहा गया कि नैना तो यहां से कब की जा चुकी हैं.

इस के बाद अभिजीत ने वहांवहां फोन कर के नैना के बारे में पता किया, जहांजहां उन के जाने की संभावना हो सकती थी. जैसेजैसे रात बढ़ती जा रही थी, उन की चिंता और परेशानी बढ़ती जा रही थी. सब जगह उन्होंने फोन कर लिए थे. कहीं से भी नैना के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

अभिजीत की समझ में नहीं आ रहा था कि नैना ने सीधे घर आने को कहा था तो बिना बताए रास्ते से कहां चली गईं. उन्हें किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. अब तक उन के कई रिश्तेदार भी आ गए थे. रात साढ़े 9 बजे कुछ रिश्तेदारों के साथ थाना यरवदा जा कर थानाप्रभारी से मिल कर उन्होंने पत्नी नैना के घर न आने की बात बता कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

थाना यरवदा पुलिस ने उसी समय नैना का हुलिया बता कर पुणे के सभी थानों को उन की गुमशुदगी की सूचना दे दी. 9 अक्तूबर, 2009 को किसी व्यक्ति ने पुणे के थाना खेड़ पुलिस को सूचना दी कि राजगुरुनगर के वनविभाग परिसर में जारेवाड़ी फाटे के पास गंदे नाले में एक महिला की लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थाना खेड़ पुलिस मौके पर पहुंच गई थी. लाश देख कर पुलिस को यह अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि यरवदा पुलिस ने जिस युवती की गुमशुदगी की सूचना दी है, यह लाश उसी की हो सकती है.

थाना खेड़ पुलिस ने इस बात की जानकारी थाना यरवदा पुलिस को दी तो थाना यरवदा पुलिस अभिजीत को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गई. अभिजीत के साथ उस के कुछ रिश्तेदार भी थे.

लाश का चेहरा भले ही बुरी तरह कुचला था, लेकिन लाश देखते ही अभिजीत ही नहीं, उन के साथ आए रिश्तेदार भी फूटफूट कर रोने लगे. इस का मतलब वह लाश नैना की ही थी. लाश की शिनाख्त हो गई तो पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. लेकिन वहां से ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से पुलिस नैना के हत्यारों तक पहुंच पाती. इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

नौकरी करने वाली हर लड़की बैग और मोबाइल रखती है. बैग में छोटीमोटी जरूरत की चीजों के अलावा डेबिटक्रेडिट कार्ड भी होते हैं. पूछताछ में पता चला कि इस सब के अलावा नैना सोने की चूडि़यां, बाली और मंगलसूत्र पहने थी. उस का मोबाइल और बैग तो गायब ही था, वह जो गहने पहने थी, वे सब भी गायब थे. इस से पुलिस को यही लगा कि किसी ने लूट के लिए उस की हत्या कर दी है.

लेकिन जब नैना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो मामला ही उलट गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, नैना के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ था. अब पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि नैना की हत्या लूट के लिए नहीं, बल्कि दुष्कर्म के बाद की गई थी, जिस से दुष्कर्मियों का अपराध उजागर न हो.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद नैना पुजारी के अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और लूट का मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने अभियुक्तों की तलाश शुरू कर दी. यह ऐसी घटना थी, जिस ने सब को झकझोर कर रख दिया था. दूसरी ओर उन महिलाओं के मन में भी डर समा गया था, जो नौकरी करती हैं. क्योंकि किसी के साथ भी ऐसा हो सकता था.

पुलिस ने नैना के हत्यारों तक पहुंचने के लिए जांच उन की कंपनी से शुरू की. पूछताछ में पता चला कि उस दिन नैना बस से घर नहीं गई थीं. पुलिस को यह भी पता चला कि नैना के एटीएम कार्ड से पैसे निकाले गए थे. पुलिस ने वहां की सीसीटीवी फुटेज निकलवाई तो उस में जो फोटो मिले, उस के आधार पर पुलिस योगेश से पूछताछ करने उस के घर पहुंची तो वह घर से गायब मिला. आखिर पुलिस ने 16 अक्तूबर, 2009 को उसे गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर पूछताछ की गई तो उस ने साथियों के नाम भी बता दिए. इस के बाद पुलिस ने महेश ठाकुर, राजेश चौधरी और विश्वास कदम को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में चारों ने नैना का अपहरण कर उस के साथ दुष्कर्म और लूट के बाद उस की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पुलिस ने नैना का सारा सामान चारों से बरामद कर लिया. इस मामले के खुलासे के बाद कंपनी में ही काम करने वालों द्वारा इस तरह का अपराध करने से लड़कियों और महिलाओं के मन में डर समा गया कि जब साथ काम करने वाले ही इस तरह का काम कर सकते हैं तो वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं.

इस दर्दनाक घटना ने पूरे देश में खलबली मचा दी थी. नौकरी करने वाली हर महिला को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी थी. इस बात को ले कर धरनाप्रदर्शन भी शुरू हो गए. एक ओर धरनाप्रदर्शन हो रहे थे तो दूसरी ओर पुलिस अपना काम कर रही थी. पूछताछ कर के सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने जांच पूरी कर के 12 जनवरी, 2010 को चारों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी. इस के बाद न्यायाधीश श्री एस.एम. पोडिलिकार ने चारों का नारको टेस्ट कराया और इस केस को लड़ने के लिए हर्षद निंबालकर को सरकारी वकील नियुक्त किया. पुलिस को अपना पक्ष मजबूत करने के लिए एक चश्मदीद गवाह की जरूरत थी. पुलिस ने राजेश चौधरी से बात की तो वह वादामाफ गवाह बनने को तैयार हो गया. इस तरह 4 लोगों में राजेश चौधरी वादामाफ गवाह बन गया तो 3 अभियुक्त ही बचे.

इस केस की सुनवाई चल रही थी, तभी एक घटना घट गई. इस मामले का मुख्य अभियुक्त योगेश राऊत 30 अप्रैल, 2011 को फरार हो गया. हुआ यह कि उस ने जेल प्रशासन से शिकायत की कि उस के शरीर में खुजली हो रही है. उसे जेल के अस्पताल में दिखाया गया, लेकिन वहां उसे कोई फायदा नहीं हुआ. इस के बाद उसे पुणे के ससून अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे भरती करा दिया. उसी बीच टायलेट जाने के बहाने वह पुलिस को चकमा दे कर अस्पताल से भाग निकला.

पैसे उस के पास थे ही, इसलिए जब वह अस्पताल से बाहर आया तो उसे भाग कर जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई. दरअसल, उस ने यह काम योजना बना कर किया था. इसलिए जब वह अस्पताल में इलाज के लिए भरती हुआ तो उस का भाई उस से मिलने आया.

उसी दौरान उस ने योगेश को खर्च के लिए 4 हजार रुपए दे दिए थे. इसलिए अस्पताल से निकलते ही योगेश ने औटो पकड़ा और दौड़ कर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से टे्रन पकड़ कर वह गुजरात के सूरत शहर चला गया. उसे यह शहर छिपने के लिए ठीक नहीं लगा तो वह वहां से दिल्ली चला गया.

दिल्ली पहुंचतेपहुंचते उस के पैसे किराए और खानेपीने में खर्च हो गए थे. पैसों के लिए उस ने दिल्ली में काम की तलाश की, लेकिन बिना जानपहचान के उसे वहां कोई ढंग का काम नहीं मिला.

नौबत भूखों मरने की आई तो वह अमृतसर चला गया. क्योंकि उसे पता था कि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लंगर चलता है, इसलिए उसे वहां खाने की चिंता नहीं रहेगी. अमृतसर में उसे खाने की चिंता नहीं थी. लंगर में खाने की व्यवस्था हो ही जाती थी. खाना खा कर वह दिनभर इधरउधर घूमता रहता था.

इसी घूमनेफिरने में उस की दोस्ती उत्तर प्रदेश से वहां काम करने आए लोगों से हो गई. उन की जानपहचान का फायदा योगेश को यह मिला कि उसे एक होटल में नौकरी मिल गई. इस तरह खानेपीने और रहने की व्यवस्था तो हो ही गई थी, 4 पैसे भी हाथ में आने लगे थे.

लेकिन जल्दी की उस का मन वहां से उचट गया. दरअसल उसे अपने घर वालों की याद सताने लगी थी. सब से ज्यादा उसे पत्नी की याद आ रही थी. जब उस का मन नहीं माना तो कुछ दिनों की छुट्टी ले कर वह अपने घर पहुंचा. घर पहुंच कर पता चला कि पत्नी तो मायके में है. वह घर में रुकने के बजाय ससुराल चला गया. वह वहां 3 दिनों तक रहा, लेकिन किसी को कानोंकान खबर नहीं लगने दी कि इस बीच वह कहां था. 3 दिन ससुराल में रह कर वह फिर अमृतसर चला गया.

कुछ दिनों अमृतसर में रह कर एक बार फिर वह ससुराल गया. इस बार वह पत्नी को ले कर शिरडी के साईं बाबा के दर्शन करने भी गया. पत्नी को ससुराल में छोड़ कर अमृतसर आ गया. इस बार उस ने होटल की नौकरी छोड़ दी और लौंड्री में नौकरी करने लगा. उस ने यहां अपना नाम अशोक कुमार भल्ला रख लिया था. इसी नाम से उस ने अपना राशन कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसैंस भी बनवा लिया था.

इस तरह योगेश ने अपनी पूरी पहचान बदल ली थी. ड्राइविंग लाइसैंस बन जाने के बाद वह किसी कंपनी की गाड़ी चलाने लगा था. खुद को बचाने के लिए योगेश ने काफी प्रयास किया, लेकिन पुणे पुलिस भी उस के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी. किसी तरह पुलिस को उस के पुणे आ क र शिरडी जाने का पता चल गया. इस के बाद पुलिस ने घर वालों पर नजर रखनी शुरू कर दी. इस का नतीजा यह निकला कि 2 सालों बाद एक बार फिर योगेश शिरडी से पुणे पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया.

योगेश के पकड़े जाने का फायदा यह हुआ कि नैना पुजारी हत्याकांड की सुनवाई विधिवत शुरू हो गई. क्योंकि उस के फरार होने से इस मामले की सुनवाई एक तरह से रुक सी गई थी. शायद इसीलिए इस मुकदमे का फैसला आने में 8 साल का लंबा समय लग गया. योगेश की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर विधिवत सुनवाई शुरू हुई. कोई अभियुक्त फिर से फरार न हो जाए, इस के लिए सुनवाई वीडियो कौन्फ्रेंसिंग द्वारा कराई जाने लगी.

सुनवाई पूरी होने पर बहस में सरकारी वकील हर्षद निंबालकर ने तर्क दिए कि नैना तो इस विश्वास के साथ जा कर कार में बैठी थी कि कंपनी में काम करने वाले साथ हैं तो किसी बात का डर नहीं है. लेकिन उसे जिन पर विश्वास था, उन्हीं लोगों ने उस के साथ विश्वासघात किया. एक औरत की मजबूरी का फायदा उठा कर इन लोगों ने उस के साथ मनमानी तो की ही, बेरहमी से उस की हत्या भी कर दी.

इस घटना से घर से बाहर जा कर काम करने वाली महिलाओं में असुरक्षा की भावना भर गई है. महिलाओं का साथ काम करने वालों पर से विश्वास उठ गया है. महिलाओं में व्याप्त भय दूर करने के लिए जरूरी है कि इन अपराधियों को मौत की सजा दी जाए, जिस से आगे कोई इस तरह का अपराध करने की हिम्मत न कर सके.

सरकारी वकील हर्षद निंबालकर ने अपनी बात कहते हुए इस मामले को दुर्लभतम करार देते हुए नैना के साथ की गई बर्बरता का हवाला देते हुए दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की. उन का कहना था कि पीडि़ता के साथ जिस तरह सामूहिक दुष्कर्म कर के उस की हत्या की गई, उसे देखते हुए यह एक दुर्लभतम मामला है. इसलिए दोषियों को फांसी की सजा होनी चाहिए.

वहीं बचाव पक्ष के वकील बी.ए. अलूर ने अपनी दलीलें दीं, लेकिन अपराध संगीन था, इसलिए माननीय जज श्री एल.एल. येनकर ने अभियुक्तों पर जरा भी दया नहीं दिखाई और अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म, लूट और हत्या के अपराध में 3 अभियुक्तों योगेश राऊत, महेश ठाकुर और विश्वास कदम को फांसी की सजा सुनाई. इस के अलावा अलगअलग मामलों में अलगअलग सजाएं और जुरमाना भी लगाया गया है.

चूंकि राजेश चौधरी वादामाफ गवाह बन चुका था, इसलिए उसे दोषमुक्त कर दिया गया. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी के वादामाफ गवाह बन जाने से उस का अपराध खत्म हो जाता है. आखिर अपराध में तो वह भी शामिल था. यहां यह देखा जाना जरूरी है कि वादामाफ गवाह का अपराध कैसा था, वह अपराध में किस हद तक शामिल था?

अदालत के इस फैसले से मृतका नैना पुजारी के पति अभिजीत पुजारी संतुष्ट हैं. उन का कहना है कि फिर इस तरह के अपराध करने की कोई हिम्मत न कर सके, इस के लिए अपराधियों को इसी तरह की सख्त से सख्त सजा की जरूरत थी. पत्नी की हत्या के बाद अभिजीत ने एक संस्था शुरू की है, जो पीडि़त महिलाओं को न्याय दिलाने का काम करती है.

(लेखक : रविंद्र शिवाजी दुपारगुड़े/ के. रवि)

जिगरी दोस्त ने रची ‘दृश्यम’ की कहानी

उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी का रहने वाला मुनव्वर हसन काफी दबंग आदमी था. वह अपने दोस्त शाहिद उर्फ बंटी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. इसी धंधे से उस ने करोड़ों की संपत्ति जुटा रखी थी. चूंकि उस के पास अच्छाखासा पैसा था और इलाके में अच्छी जानपहचान थी, इसलिए वह राजनीति में कूद गया.

देखा जाए तो राजनीति में दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग सफल हैं. यही सोच कर मुनव्वर हसन ने सन 2014 में दिल्ली के बादली विधानसभा क्षेत्र से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. चुनाव तो वह नहीं जीत सका, पर उस की तमाम नेताओं से अच्छी जानपहचान हो गई, जिस का फायदा वह अपने कारोबार में उठाने लगा.

मुनव्वर का कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था, पर सन 2017 उस के और उस के परिवार के लिए परेशानी ही परेशानी ले कर आया. 19 जनवरी, 2017 को रेप के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा. उस की पत्नी सोनिया उर्फ इशरत ने सोचा भी नहीं था कि उसे यह दिन भी देखना पड़ेगा. वैसे मुनव्वर हसन ने हिंदू लड़की से लवमैरिज की थी. सोनिया उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर की रहने वाली थी. शादी के बाद सोनिया ने अपना नाम इशरत रख लिया.

सोनिया उर्फ इशरत की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी. सोनिया मुनव्वर की 2 बेटियों आरजू और अर्शिता उर्फ अर्शी तथा 2 बेटों आकिब व शाकिब की मां थी. चूंकि मुनव्वर के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए सभी बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे.

मुनव्वर हसन के जेल जाने के बाद सोनिया उर्फ इशरत और उस के बच्चे परेशान हो गए. लेकिन उन की परेशानी की इस घड़ी में मुनव्वर के दोस्त साहिब खान उर्फ बंटी ने भरपूर साथ दिया. वह हर तरह से उन के परिवार की देखरेख कर रहा था. इतना ही नहीं, वह मुनव्वर के केस की पैरवी भी कर रहा था. वह उस से जेल में मिलने खुद तो जाता ही था, साथ ही उस की बीवीबच्चों को भी मिलवाने के लिए ले जाता था.

बंटी का संतनगर के कमल विहार में प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस था. वह अपने औफिस पर रोजाना बैठता था. 24 अप्रैल को बंटी मुनव्वर के घर पहुंचा तो उस की बीवी और बच्चे गायब मिले. उस ने उस की बीवी इशरत को फोन किया तो वह भी बंद मिला. उस ने पड़ोसियों से पूछा कि दीदी दरवाजा खोल कर कहां चली गई. वह इशरत को दीदी कहता था. पड़ोसियों ने भी अनभिज्ञता जताई तो बंटी ने उस के दरवाजे पर ताला लगाया और अपने औफिस आ गया.

बंटी शाम को फिर इशरत के घर पहुंचा तो दरवाजे पर उसे वही ताला लटका मिला, जो वह लगा गया था. वह 3-4 दिनों तक लगातार मुनव्वर के घर गया, हर रोज उसे वही ताला लगा मिला. बंटी ने इशरत और उस के बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की जानकारी जेल में बंद मुनव्वर हसन को दी. मुनव्वर ने शंका व्यक्त की कि इशरत बच्चों को ले कर कहीं अपने मायके तो नहीं चली गई?

उस का मायका सहारनपुर में था. लेकिन यहां यह सवाल भी था कि यदि वह मायके जाती, घर को इस तरह खुला छोड़ कर क्यों जाती? बीवी और चारों बच्चों के गायब होने की बात सुन कर मुनव्वर परेशान हो उठा. पर उस समय वह जेल में था. बाहर होता तो अपने स्तर से उन की तलाश भी करता.

मुनव्वर का मन कर रहा था कि वह उसी समय जेल की चारदीवारी फांद कर बाहर निकल जाए और बीवीबच्चों को तलाशे. उस ने अपने दोस्त बंटी से कह दिया कि वह किसी भी तरह उसे अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर निकलवाने की कोशिश करे. बंटी उस का जिगरी दोस्त था. वह वकील से मिल कर मुनव्वर को अंतरिम जमानत पर जेल से निकलवाने की कोशिश में लग गया.

बंटी की मेहनत रंग लाई और पत्नी तथा बच्चों को ढूंढने के लिए माननीय न्यायालय ने मुनव्वर को अंतरिम जमानत दे दी.

17 मई को मुनव्वर अपने दोस्त बंटी और दीपक के साथ घर पहुंचा तो उस समय रात के 11 बज रहे थे. अपना सूना घर देख कर उस की आंखों से आंसू टपक पड़े. बंटी और दीपक ने समझा कर भरोसा दिलाया कि वह दीदी और बच्चों को हर जगह ढूंढने की कोशिश करेंगे.

उस रात मुनव्वर को अपने ही घर में नींद नहीं आई. बीवीबच्चों को ले कर तरहतरह के खयाल उस के दिमाग में रात भर आते रहे. सुबह होने पर उस ने उस इलाके में रहने वाले अपने सभी जानने वालों से बीवीबच्चों के बारे में पूछा, पर कोई कुछ नहीं बता सका.

अचानक सभी के एक साथ गायब होने से मोहल्ले वाले भी हैरान थे. जब बीवीबच्चों की कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो मुनव्वर हसन अपने दोस्त बंटी को ले कर 18 मई को थाना बुराड़ी पहुंचा और थानाप्रभारी को अपने पूरे परिवार के अचानक गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी ने उस की पत्नी और बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करा कर उन की तलाश कराने का भरोसा दिया.

थाने से लौट कर मुनव्वर अपने औफिस गया. वह अपने खास जानपहचान वालों से भी मिला. उस की पत्नी हिंदू थी. पत्नी के घर वाले उस से शादी करने को तैयार नहीं थे. मुनव्वर को इस बात की भी आशंका हो रही थी कि कहीं पत्नी के मायके वालों ने ही तो नहीं सब को गायब करा दिया?

उस की पत्नी सोनिया उर्फ इशरत का मायका सहारनपुर में था. मुनव्वर ने अपने विश्वासपात्र लोगों से इस बात का पता कराया तो जानकारी मिली कि मायके वालों को तो इशरत और बच्चों के गायब होने की जानकारी ही नहीं है.19 मई को पूरे दिन बंटी के साथ रह कर वह बीवीबच्चों की खोजता रहा.

अगले दिन यानी 21 मई की शाम को बंटी अपने औफिस में बैठा था. उस समय मुनव्वर उस के साथ नहीं था. उस ने मुनव्वर को फोन किया. फोन पर घंटी तो बज रही थी, पर मुनव्वर फोन उठा नहीं रहा था. बंटी ने थोड़ी देर बाद फिर उसे फोन किया. इस बार भी घंटी तो बजी, पर उस ने फोन नहीं उठाया. कई बार फोन करने के बाद भी जब उस ने फोन रिसीव नहीं किया तो वह उस के घर पहुंच गया. वह उस के कमरे में पहुंचा तो चीखता हुआ तुरंत बाहर आ गया.

मुनव्वर की किसी ने हत्या कर दी थी. वह लहूलुहान कमरे में पड़ा था. बंटी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस के लोग आ गए. मुनव्वर की हत्या पर सभी हैरान थे कि इतने दबंग आदमी की हत्या किस ने कर दी? बंटी ने इस की खबर पुलिस कंट्रोल रूम को दी. कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की वैन आ पहुंची. सूचना पा कर थाना बुराड़ी के अतिरिक्त थानाप्रभारी नरेश कुमार भी पुलिस बल के साथ आ पहुंचे.

पुलिस ने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया था. टीम ने मौके से सबूत जुटा लिए. पुलिस ने काररवाई शुरू की. मुनव्वर को 3 गोलियां मारी गई थीं. उस के घर का सारा सामान यथावत था, इसलिए लूट की आशंका का कोई सवाल ही नहीं था. जिस तरह से उस पर गोलियां चलाई गई थीं, उस से यही लग रहा था कि हत्यारों का मकसद सिर्फ उस की हत्या करना था. उस की हत्या कर के वे वहां से चले गए थे.

उस बिल्डिंग में रहने वाले अन्य लोगों से बात की गई तो किसी ने भी गोली चलने की आवाज सुनने से इनकार कर दिया था. सूचना पा कर उत्तरी जिले के डीसीपी जतिन नरवाल भी आ गए थे. मौकामुआयना करने के बाद उन्होंने भी लोगों से मुनव्वर के बारे में जानकारी हासिल की.

मुनव्वर के बीवीबच्चे पहले से ही गायब थे. अब उसे भी ठिकाने लगा दिया गया था. कहीं यह परिवार किसी की साजिश का शिकार तो नहीं हो गया, पुलिस अधिकारी आपस में इस बात पर चर्चा करने लगे. पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. डीसीपी जतिन नरवाल ने इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी सिविल लाइंस इंद्रावती के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. यह टीम अलगअलग दृष्टिकोण से केस की जांच करने में जुट गई.

चूंकि मुनव्वर दबंग प्रवृत्ति का आदमी था और ज्यादातर वह विवादित संपत्ति का सौदा करता था. इतना ही नहीं, वह अपनी दबंगई के बूते विवादित संपत्ति पर कब्जा भी कर लेता था.

उस पर जमीन पर कब्जा करने, अपहरण, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, आर्म्स एक्ट आदि के दरजन भर से ज्यादा मुकदमे चल रहे थे. अपनी दबंगई के बूते उस ने बुराड़ी, करावल नगर, स्वरूपनगर आदि में करीब 2 करोड़ की संपत्ति अर्जित कर रखी थी. पुलिस इस बात को ले कर भी चल रही थी कि कहीं दूसरे धर्म की लड़की से शादी करना तो उसे नहीं ले डूबा. इन के अलावा पुलिस पैसे के लेनदेन के ऐंगल को भी ध्यान में रख कर जांच कर रही थी.

हत्यारे ने मुनव्वर को उस के घर में ही मार दिया. उस की पत्नी और बच्चे महीने भर से गायब थे. यह दिमाग में आने लगा था कि कहीं उन्हें भी तो ठिकाने नहीं लगा दिया गया? मुनव्वर का सब से ज्यादा विश्वसनीय और करीबी दोस्त बंटी उर्फ साहिब खान ही था. वह उस का कारोबारी पार्टनर ही नहीं था, बल्कि उस के सुखदुख का साथी भी था. इस के अलावा उस का एक और दोस्त था दीपक.

पुलिस ने इन दोनों से यह जानने की कोशिश की कि मुनव्वर का किसी से कोई झगड़ा या रंजिश तो नहीं थी. बंटी ने बताया कि कई प्रौपर्टियों को ले कर झगड़े तो हुए, लेकिन उन में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं कि वे मुनव्वर से ऊंची आवाज में भी बात कर सकें. उस ने बताया कि फूल सिंह के जिस मकान में वह रह रहा था, वह हिस्सा भी कब्जाया हुआ था.

पुलिस ने संतनगर की भगत सिंह कालोनी की गली नंबर-4 में रहने वाले मकान मालिक फूल सिंह से पूछताछ की. फूल सिंह ने बताया कि उस ने अपने दोस्त जगदीश के साथ मिल कर यह मकान बनाया था. मकान के फ्लोर उस ने अलगअलग बेच दिए थे. 5 लाख रुपए न देने पर जगदीश ने सैकेंड फ्लोर पर कब्जा कर लिया था. छत को ले कर दोनों के बीच विवाद चल रहा था.

बाद में जगदीश ने अपना हिस्सा एक वकील को बेच दिया था. वह वकील मुनव्वर का मामा था. मुनव्वर झगड़ालू और दबंग था. वकील मुनव्वर और बंटी से उसे धमकी दिलवा कर पूरे मकान पर कब्जा करने की कोशिश करने लगा. बाद में मुनव्वर ने ही अपने मामा के खरीदे मकान पर कब्जा कर लिया था.

फूल सिंह ने पुलिस को यह भी बताया कि मुनव्वर के पैरोल पर आने के बाद बंटी का उस के यहां बारबार आनाजाना लगा रहा. गेट खोलने को ले कर उस का बंटी से विवाद भी हुआ था. तब बंटी ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी. उस ने बताया कि 20 मई, 2017 की सुबह करीब पौने 7 बजे 3 लोग आए. उन्होंने दरवाजा खटखटाया.

तब मुनव्वर ने आ कर गेट खोला. वे तीनों मुनव्वर के साथ ही ऊपर चले गए थे. बंटी उन तीनों से पहले मुनव्वर के पास आ चुका था. उसी समय वह तैयार हो कर तीसहजारी कोर्ट के लिए निकल गया था. शाम को जब वह घर लौटा तो घर के सामने पुलिस की गाडि़यां देख कर हैरान रह गया.

पुलिस को फूल सिंह निर्दोष लगा तो उसे घर भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने बंटी और दीपक से अलगअलग पूछताछ की. बंटी ने इस बात से मना कर दिया कि वह 20 मई को सुबह मुनव्वर से मिलने उस के घर गया था. बंटी और दीपक के बयानों में काफी विरोधाभास था.

चूंकि बंटी ही मुनव्वर के बीवीबच्चों को ढूंढने की ज्यादा पैरवी कर रहा था और उस के बयान भी विरोधाभासी थे, इसलिए पुलिस को उसी पर शक होने लगा. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस के फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन किया तो पता चला कि अप्रैल, 2017 में बंटी का सहारनपुर और मेरठ जाना हुआ था. इस के अलावा उस की मेरठ के कुछ नंबरों पर खूब बातें हुई थीं.

जिन नंबरों पर उस की बातें हुई थीं, पुलिस ने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो वे फोन नंबर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के पाए गए. इस के बाद पुलिस को बंटी पर ही संदेह हुआ. काल डिटेल्स के आधार पर बंटी से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने ऐसा राज उगला, जिस के लिए पुलिस परेशान हो रही थी.

बंटी ने स्वीकार कर लिया कि उस ने न केवल मुनव्वर की हत्या कराई है, बल्कि उस की पत्नी और बच्चों को भी जमींदोज कर दिया है. यानी मुनव्वर और उस के पूरे परिवार की हत्या कराने वाला कोई और नहीं, साहिब खान उर्फ बंटी ही निकला.

सच्चाई जान कर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए. क्योंकि बंटी मुनव्वर का दोस्त ही नहीं, बल्कि बिजनैस पार्टनर भी था. डीसीपी जतिन नरवाल को जब पता चला कि बुराड़ी का मुनव्वर वाला मामला खुल गया है तो वह थाने आ पहुंचे. एसीपी इंद्रावती उन से पहले ही वहां पहुंच चुकी थीं.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में साहिब खान उर्फ बंटी से पूछताछ की गई तो मुनव्वर के परिवार के 6 लोगों की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

मुनव्वर हसन मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर का रहने वाला था. वह पिछले 15 सालों से उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रह रहा था. उस का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा अच्छाखासा चल रहा था. अकसर वह विवादित और झगड़े वाली प्रौपर्टी ही खरीदता था. इस तरह की प्रौपर्टी में उसे अच्छा मुनाफा होता था. साहिब खान उर्फ बंटी से उस की लगभग 8 साल पहले मुलाकात हुई थी. उस ने 8 साल पहले मुनव्वर की मार्फत बुराड़ी में एक प्लौट खरीदा था. इस के बाद बंटी का मुनव्वर के साथ उठनाबैठना हो गया था.

बंटी मूलरूप से मेरठ का रहने वाला था और वह थोड़ा धाकड़ किस्म का आदमी था. चूंकि दोनों एक ही इलाके के रहने वाले थे, इसलिए जल्द ही दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. मुनव्वर को लगा कि अगर बंटी को अपना पार्टनर बना ले तो धंधा अच्छा चल सकता है. इस संबंध में मुनव्वर ने बंटी के पिता से बात की तो उन्होंने बंटी को उस के साथ पार्टनरशिप में प्रौपर्टी का काम करने की इजाजत दे दी. इस के बाद मुनव्वर और बंटी पार्टनरशिप में धंधा करने लगे. कुछ ही दिनों में बंटी मुनव्वर का विश्वासपात्र बन गया.

बुराड़ी के कई प्लौटों, अपार्टमेंट और मकानों पर अवैध कब्जा करने में बंटी ने मुनव्वर का साथ दिया. इस काम के लिए वह कई बार अपने इलाके के बदमाशों को भी लाया. दबंग भूमाफिया छवि के कारण मुनव्वर का पूरे इलाके में खौफ था. लोग उस से डरते थे. कोई भी भला आदमी उस से पंगा नहीं लेना चाहता था. मुनव्वर ने अपनी इसी दबंगई के चलते करोड़ों रुपए की संपत्ति अर्जित कर ली थी.

अपनी दबंगई को भुनाने के लिए उस ने सन 2009 में दिल्ली के बादली विधानसभा क्षेत्र से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ा. वह चुनाव तो नहीं जीत सका, पर उस की राजनैतिक गलियारे में पैठ बन गई.  अब उस का रुतबा और ज्यादा बढ़ गया. बंटी उस का ऐसा दोस्त था, जो साए की तरह उस के साथ रहता था. इलाके में दोनों की जोड़ी मशहूर थी.

कभीकभी आदमी को उन्हीं लोगों से मात मिल जाती है, जिन पर वे आंख मूंद कर विश्वास करते हैं. उसी तरह बंटी भी आस्तीन का सांप निकला. लेकिन इस की शुरुआत मुनव्वर ने ही की थी. दरअसल एक बार मुनव्वर ने बंटी से 20 लाख रुपए लिए. बारबार मांगने के बावजूद मुनव्वर उस के पैसे नहीं लौटा रहा था. इस के अलावा मुनव्वर ने बंटी के एक प्लौट पर भी कब्जा कर लिया था.

बंटी जब भी उस से अपने पैसे मांगता, वह उसे अंजाम भुगतने की धमकी दे कर चुप करा देता था. मुनव्वर के इस व्यवहार से बंटी परेशान हो चुका था. 20 लाख रुपए कोई छोटी रकम नहीं होती, जो वह छोड़ देता. वह अकसर यही सोचता कि मुनव्वर से अपने पैसे कैसे वसूल करे? मुनव्वर की इन्हीं हरकतों से बंटी के मन में उस के लिए नफरत पैदा हो गई, पर वह दिखावे के तौर पर उस का और उस के परिवार का वफादार बना रहा.

उसी बीच 19 जनवरी, 2017 को मुनव्वर दुष्कर्म के आरोप में जेल चला गया. इस के बाद बंटी ही उस के परिवार की देखरेख करता रहा. वह भी पत्नी और एक बच्चे के साथ बुराड़ी में ही रहता था. वह अपने परिवार के साथसाथ मुनव्वर की बीवी और 4 बच्चों का हर तरह से खयाल रख रहा था. यही नहीं, वह मुनव्वर के केस की पैरवी भी कर रहा था.

एक दिन बंटी अपने औफिस में अकेला बैठा था, तभी उस के दिमाग में आया कि उस ने तो मुनव्वर को बड़ा भाई मानते हुए पूरी ईमानदारी से उस का साथ दिया, पर मुनव्वर ने उस की वफा का ऐसा सिला दिया, जिसे वह भुला नहीं पा रहा है.

उसे पता ही था कि मुनव्वर के पास दो, ढाई करोड़ रुपए की संपत्ति है. उसी समय उस के मन में लालच आ गया कि अगर मुनव्वर और उस के बीवीबच्चों को ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की सारी संपत्ति पर उस का कब्जा हो सकता है. उस ने तय कर लिया कि वह उस धोखेबाज के साथ ऐसा ही करेगा.

मुनव्वर जेल में था. उस के बाहर आने से पहले ही वह उस की पत्नी और बच्चों को इस तरह ठिकाने लगाना चाहता था कि किसी को भी उस पर शक न हो. बंटी ने मल्टीप्लेक्स में फिल्म ‘दृश्यम’ देखी थी. अचानक उस फिल्म की कहानी याद आ गई. इसी फिल्म की कहानी के आधार पर उस ने मुनव्वर के परिवार की हत्या कर शवों को ठिकाने लगाने का विचार किया.

इस के बाद बंटी ने यह फिल्म कई बार देखी. औफिस में जब भी वह अकेला होता, यही फिल्म देखता. वह एक खौफनाक साजिश रचने लगा. आखिर उस ने एक फूलप्रूफ योजना बना डाली. योजना में उस ने अपने दोस्त दीपक और 5 पेशेवर हत्यारों फिरोज, जुल्फिकार, जावेद, उस के भाई वाहिद और जसवंत को शामिल किया. ये सारे बदमाश मेरठ के रहने वाले थे.

बंटी के पिता की मेरठ में लोहा और स्टील के गेट वगैरह बनाने का कारखाना है. मेरठ के समोली गांव का जुल्फिकार उस के पिता के यहां वेल्डिंग का काम करता था. वह पेशेवर शूटर था. उस के काम छोड़ने पर उसी के गांव का रहने वाला फिरोज वहां वेल्डिंग का काम करने लगा था. वह भी बदमाश था. इन्हीं दोनों के जरिए बंटी की अन्य बदमाशों से जानपहचान हुई थी. बंटी कई बार इन्हें प्रौपर्टी पर कब्जा करने के लिए दिल्ली भी लाया था. 3 लाख रुपए में बंटी ने उन से डील फाइनल कर दी.

योजना को कैसे अंजाम देना है, यह बात बंटी ने पहले ही उन्हें बता दी थी. 20 अप्रैल, 2017 को मुनव्वर के बच्चों की परीक्षाएं समाप्त हुईं. सोनिया ने जब से मुनव्वर से लवमैरिज की थी, तब से उस के घर वाले उस से खफा थे. कभीकभार वह अपनी बहन और मां से फोन पर बातें कर लेती थी.

21 अप्रैल को बंटी अपनी एसएक्स-4 कार से सोनिया उर्फ इशरत को उस की बहन से मिलाने सहारनपुर ले गया. इशरत अपनी जवान बेटियों अर्शिता उर्फ अर्शी और आरजू को घर पर नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए दोनों बेटियों को भी साथ ले गई थी.

बहन से मिलने के बाद इशरत 22 अप्रैल को दिल्ली लौट रही थी, तभी रास्ते में बंटी को दीपक मिला. बंटी ने उसे भी कार में बैठा लिया. रात साढ़े 11 बजे के करीब सभी दौराला के समोली गांव पहुंचे. वहीं से वह कार को अख्तियारपुर के जंगल में 3 किलोमीटर अंदर ले गया.

वैसे तो इशरत और उस के बच्चे बंटी पर विश्वास करते थे. इस के बावजूद इशरत ने जब कार को जंगल में ले जाने की वजह पूछी तो बंटी ने कहा कि इस समय हाईवे पर बहुत जाम मिलता है, इसलिए शौर्टकट से चल रहा है. इस पर इशरत चुप हो गई.

काली नदी के किनारे बंटी ने कार रोक दी. कार के रुकते ही जुल्फिकार, फिरोज, जावेद और वाहिद वहां आ गए. फिरोज ने कार का दरवाजा खोल कर इशरत की बेटी अर्शी को बाहर निकाला. अर्शी अपनी मां और बहन के साथ पिछली सीट पर बैठी थी. इशरत ने पूछा कि वे बेटी को कहां ले जा रहे हैं तो बदमाशों ने हथियार दिखा कर उसे चुप करा दिया.

इशरत बंटी के आगे गिड़गिड़ाने लगी कि बेटी को छुड़वा दे, लेकिन बंटी चुपचाप खड़ा रहा. कुछ दूर ले जा कर फिरोज ने अर्शी के सिर में गोली मार दी. गोली की आवाज सुन कर इशरत ने भागने की कोशिश की तो जुल्फिकार ने उस के सिर में गोली मार दी. इस के बाद उन्होंने आरजू की भी गोली मार कर हत्या कर दी.

नदी के किनारे बदमाशों ने 10 फुट गहरा गड्ढा पहले से ही खोद रखा था. तीनों के गहने उतार कर उन्हें उसी गड्ढे में दफना दिया गया. जहां पर तीनों लाशें दफनाई गई थीं, उस के ऊपर उन्होंने घास डाल दी थी. मांबेटियों को ठिकाने लगा कर सभी दिल्ली आ गए.

घर पर मौजूद मुनव्वर के दोनों बेटे आकिब और शाकिब अपनी अम्मी और बहनों के लौटने का इंतजार कर रहे थे. वह मां को बारबार फोन कर रहे थे, पर फोन नहीं लग रहा था. 23 अप्रैल को छोटा बेटा शाकिब मां के बारे में पता करने कमल विहार स्थित बंटी के औफिस पहुंचा.

वहां पर दीपक, फिरोज, जुल्फिकार आदि बैठे थे. उन्होंने शाकिब के मुंह में कपड़ा ठूंस कर उस के हाथपैर बांध कर औफिस में ही डाल दिया.

इस के बाद बंटी ने मुनव्वर के दूसरे बेटे आकिब को फोन कर के अपने औफिस बुला लिया. वह पहुंचा तो उस के भी मुंह में कपड़ा ठूंस कर उस के हाथपैर बांध कर शाकिब के पास डाल दिया. कई घंटे बंधे रहने के कारण दम घुटने से दोनों भाइयों की मौत हो गई. दोनों लाशों को ठिकाने लगाने के लिए बंटी ने अपने औफिस का फर्श खुदवा कर 3-4 फुट गहरा गड्ढा खोद कर दोनों भाइयों को भी दफना दिया.

लाशें जल्द गल जाएं, इस के लिए दोनों लाशों के ऊपर काफी मात्रा में नमक डाल दिया. बदबू न आए इस के लिए परफ्यूम भी डाला गया. इस के बाद दोनों लाशों के ऊपर आरसीसी लिंटर डलवा दिया.

चूंकि बंटी ही मुनव्वर के परिवार का नजदीकी और वफादार था, इसलिए वह इशरत और उस के बच्चों को खोजने का नाटक करता रहा. उन के रहस्यमय ढंग से गायब होने की खबर उस ने तिहाड़ जेल में बंद मुनव्वर को भी दे दी थी. बीवीबच्चों के गायब होने की खबर सुन कर मुनव्वर परेशान हो उठा. बंटी ही मुनव्वर को जेल से पैरोल पर बाहर निकलवाने की कोशिश में लग गया. पत्नी और बच्चों को ढूंढने के लिए कोर्ट ने 17 मई, 2017 को मुनव्वर की अंतरिम जमानत स्वीकार कर ली.

तिहाड़ जेल से पैरोल पर रिहा होने के बाद मुनव्वर अपने खासमखास दोस्त बंटी और दीपक के साथ घर पहुंचा. अगले दिन वह बंटी के साथ उसी औफिस में बैठ कर पत्नी और बच्चों को ढूंढने की योजना बनाता रहा, जहां उस के दोनों बेटे दफन थे. 18 मई को वह बंटी को ले कर बुराड़ी थाने पहुंचा. बंटी उस के साथ इस तरह से लगा था कि जैसे उस से ज्यादा उस का हमदर्द कोई और नहीं है.

19 मई को भी वह मुनव्वर के साथ इधरउधर घूमता रहा. पेशेवर बदमाश बुराड़ी में ही ठहरे थे. बंटी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि काम को कब अंजाम देना है. योजना के अनुसार, 20 मई, 2017 को बंटी मुनव्वर के घर सुबह ही पहुंच गया. थोड़ी देर बाद फिरोज, जुल्फिकार और जावेद भी पहुंच गए.

इन के लिए गेट मुनव्वर ने ही खोला था, क्योंकि वह पहले से इन सब को जानता था. मौका मिलते ही उन्होंने उस की गोली मार कर हत्या कर दी. वह जीवित न बच जाए, इस के लिए उसे 3 गोलियां मारी गई थीं. अपना काम कर के सभी चले गए. मुनव्वर और उस के बीवीबच्चों का नामोनिशान मिटा कर बंटी उस की प्रौपर्टी के कागजात अपने नाम कराने की कोशिश में जुट गया.

बंटी ने जानबूझ कर शाम के समय मुनव्वर के मोबाइल पर कई बार काल की थीं. शाम को वह उस के घर पहुंचा और उस की हत्या का शोर मचा दिया. बंटी ने योजना तो ऐसी फूलप्रूफ बनाई थी कि किसी को भी उस पर शक न हो, पर अपराध कभी किसी का छिपा है जो उस का छिपता. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

बंटी और दीपक से पूछताछ के बाद पुलिस ने 22 मई को ही कमल विहार स्थित बंटी के औफिस के फर्श की खुदाई शुरू करा दी. चूंकि उस ने फर्श पर लिंटर डलवा दिया था, इसलिए उस लिंटर को तोड़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. करीब 4 घंटे की खुदाई के बाद पुलिस ने आकिब और शाकिब की गली हुई लाशें गड्ढे से निकालीं.

मोहल्ले वालों को पता चला कि मुनव्वर के जिगरी दोस्त बंटी ने ही उस के पूरे परिवार को मार दिया है तो लोगों में आक्रोश भर गया. सैकड़ों की संख्या में लोग वहां जमा हो गए. इस से पहले कि लोग गुस्से में कोई कदम उठाते, डीसीपी ने जिले के अन्य थानों की पुलिस बुला ली. जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने दोनों भाइयों की लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं.

अब पुलिस को इशरत और उस की दोनों बेटियों की लाशें बरामद करनी थीं, जो अख्तियारपुर में काली नदी के किनारे दफन थीं. थाना दौराला पुलिस को सूचित करने के बाद दिल्ली पुलिस 23 मई, 2017 को सुबह 10 बजे काली नदी के किनारे पहुंची. उस समय फोरैंसिक टीम और सरधना तहसील के नायब तहसीलदार, दौराला के सीओ भी वहां मौजूद थे.

करीब 3 घंटे की खुदाई के बाद पुलिस ने 10 फुट गहरे गड्ढे से इशरत और उस की दोनों बेटियों आरजू एवं अर्शिता उर्फ अर्शी की लाशें बरामद कीं. खुदाई के दौरान आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग वहां जमा हो गए थे. तीनों लाशें देख कर वे आक्रोशित हो गए. बंटी और दीपक पुलिस कस्टडी में थे. गांव वाले नारेबाजी करते हुए मांग करने लगे कि क्रूर हत्यारों को पब्लिक के हवाले किया जाए. पब्लिक उन्हें खुद सजा देगी.

पुलिस अधिकारियों ने बड़ी मुश्किल से गांव वालों को समझाबुझा कर शांत किया. पुलिस ने इन तीनों लाशों को भी पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम किया तो आरजू की खोपड़ी में गोली फंसी हुई मिली. जबकि अर्शिता के सीने पर गोली चलाई गई थी, जो आरपार निकल गई थी. इशरत के सिर में गोली मारी गई थी.

सभी लाशें बरामद होने के बाद पुलिस ने हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए दौराला थाने के समौली गांव में छापा मार कर फिरोज और जुल्फिकार को हिरासत में ले लिया. इस के बाद जावेद भी गिरफ्तार हो गया पर उस का भाई वाहिद दीवार फांद कर भाग गया. लेकिन 28 मई को उस ने थाना बुराड़ी में आत्मसमर्पण कर दिया. कथा लिखे जाने तक एक अभियुक्त जसवंत गिरफ्तार नहीं हो सका था. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

बंटी ने अपने खास दोस्त मुनव्वर की करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए उस के पूरे परिवार को दफन कर दिया. ऐसा कर के उस ने ‘दोस्ती’ नाम के शब्द को कलंकित किया है. अब उसे वह प्रौपर्टी मिलेगी या नहीं, यह तो समय बताएगा. पर उसे अपने अपराध की सजा जरूर मिलेगी.

एक ही परिवार के 6 लोगों की हत्या के इस केस की जांच के लिए डीसीपी जतिन नरवाल ने एक विशेष जांच टीम गठित कर दी है, जिस में एसीपी सिविल लाइंस इंद्रावती, प्रशिक्षु आईपीएस विक्रम सिंह, थाना बाड़ा हिंदूराव के इंसपेक्टर रविकांत, थाना बुराड़ी के अतिरिक्त थानाप्रभारी नरेश कुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) नरेंद्र कुमार, स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर वी.एन. झा, थाना मौरिस नगर के अतिरिक्त थानाप्रभारी वेदप्रकाश, थाना रूपनगर के अतिरिक्त थानाप्रभारी पी.सी. यादव, चौकीइंचार्ज अमित कुमार, मजनूं का टीला के चौकीप्रभारी भारत, चर्च मिशन के चौकीप्रभारी पंकज तोमर को शामिल किया गया था. यह संयुक्त टीम गंभीरता से पूरे केस की जांच में जुट चुकी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मध्य गुजरात में भाजपा और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला

सहकारी संस्थाओं और दुग्ध उत्पादन के लिए मशहूर मध्य गुजरात में इस बार भाजपा किला बचाने तो कांग्रेस सेंध लगाने में जुटी है. मध्य गुजरात का शहरी इलाका परंपरागत तौर पर लंबे समय से भाजपा के साथ जुड़ा रहा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में आदिवासियों के बीच पैठ बनाकर उसने यहां पिछले चुनावों में बढ़त हासिल की थी. जातिगत समीकरणों को दोनों दल किस तरह साधने में लगे हुए हैं, उसका पता चलता है कि श्री खोदालधाम ट्रस्ट के अध्यक्ष नरेश पटेल, जो हाल के दिनों में लेउवा पटेलों बड़े नेता बनकर उभरे हैं, उन्हें दोनों दल साधने में जुटे हैं.

पिछले दो दशकों से पटेलों का ज्यादातर समर्थन भाजपा के साथ रहा है. लेकिन इस बार पाटीदार आरक्षण आंदोलन के मुद्दे का यहां के नतीजों पर प्रभाव दिखाई देगा. पाटीदारों की नाराजगी दूर करने के साथ भाजपा पिछड़ी जाति के ठाकोर और कोली समुदाय को भी रिझाने में लगी है. पटेलों के बीच भाजपा को पहले भी चुनौती मिली है, जब 2012 में पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने बगावत का झंडा बुलंद किया था. लेकिन मोदी मैजिक के आगे वह टिक नहीं सके.

कांग्रेस इस बार शहरी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करने पर जोर दे रही है. ग्रामीण इलाकों में तो उसे सीटें मिलती रही हैं, लेकिन सत्ता में वापसी के लिए उसकी इस बार शहरी मतदाताओं पर नजर है. प्रचार के दौरान बेरोजगारी, जीएसटी और नोटबंदी के प्रभावों जैसे मुद्दों को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य नेता प्रमुखता से उठा रहे हैं. यहां पार्टी वोट प्रतिशत बढ़ाने में पसीना बहा रही है.

घूंघट में सरपंच : तरक्की की राह नहीं आसान

कुछ समय पहले एक गांव में हुए एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला. उस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि महिला सरपंच थीं. मंच पर 5 लोग बैठे थे, लेकिन उन में कोई भी औरत नहीं थी.

मैं ने एक गांव वाले से पूछा, ‘‘क्या आप की सरपंच बाहर गई हुई हैं?’’

वह बोला, ‘‘जी नहीं, वह तो यहीं बैठी है.’’

मैं ने कहा, ‘‘कहां हैं?’’

उस ने भीड़ में इशारे से कहा, ‘‘जो औरत घूंघट में बैठी है, वही सरपंच है.’’

मुझे हैरानी हुई और पूछा, ‘‘जब वे सरपंच हैं, तो मंच पर क्यों नहीं बैठीं? जमीन पर क्यों बैठी हैं?’’

गांव वाले ने बताया, ‘‘मंच पर सरपंचपति बैठे हैं. हर बार वे ही अपनी पत्नी की जगह शामिल होते हैं.’’

मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने वह कार्यक्रम करा रहे लोगों से उस महिला सरपंच को मंच पर बिठाने को कहा.

इस पर उन में से एक आदमी ने कहा, ‘‘यह गांव है, शहर नहीं. यहां की औरतें चाहे सरपंच क्यों न बन जाएं, वे रहती घूंघट में ही हैं. वे तो नाममात्र की सरपंच होती हैं. असल में तो उन का पति ही सारा काम देखता है.

‘‘कई सरपंच तो 5वीं जमात पास भी नहीं होतीं. यहां तक कि उन्हें दस्तखत करने तक नहीं आते. ऐसे में वे मंच पर कैसे बैठेंगी? वे घूंघट में ही रहती हैं.

‘‘जो औरत अनपढ़ हो, वह भला भाषण कैसे देगी? यही वजह है कि ज्यादातर महिला सरपंच घर में ही बैठी रहती हैं और गांव वाले उन के पति को ही सरपंच मानते हैं. गांव में तो सरपंचपति की ही चलती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘जो औरत परदे में रहती हो, किसी से बातचीत तक नहीं करती हो, उसे सरपंच बनाने का क्या मतलब है? क्या इन की जगह किसी पढ़ीलिखी, जागरूक औरत को गांव वाले सरपंच नहीं चुन सकते?’’

‘‘क्या करें, सरपंच का पद औरत के लिए रिजर्व किया गया है. गांव के माहौल को तो आप जानते ही हैं.

यहां की औरतें तो कुएं की मेढक होती हैं. उन्होंने बाहर की दुनिया देखी ही नहीं होती है.’’

यह बात सुन कर मैं ने कहा, ‘‘जब वे अपने हकों और फर्ज तक को नहीं जानतीं, तो गांव की दूसरी औरतों के हक के लिए लड़ाई कैसे लड़ेंगी?’’

वे जनाब इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाए. कार्यक्रम खत्म होने के बाद मैं ने सरपंचपति से भी मुलाकात की और उसे नारी सशक्तीकरण की अहमियत समझाई, लेकिन उस के आगे मर्द होने का अहम आड़े आ गया.

मालूम पड़ा कि वह खुद भी पढ़ालिखा नहीं था और दकियानूसी खयालों का था. वह खुद नहीं चाहता था कि उस की पत्नी का घूंघट उठे. वह तो बस पत्नी की सत्ता हथियाना चाहता था.

यह कहानी किसी एक गांव या किसी एक महिला सरपंच की नहीं है, बल्कि ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जिन में सरपंच भले ही पत्नी हो, लेकिन उस की चाबी पति के हाथों में होती है. सरपंच होने के बावजूद उसे दुनियादारी की कोई खबर नहीं होती. पति जैसी पट्टी पढ़ाता है, वह उसे मान लेती है. पति जहां दस्तखत करने या अंगूठा लगाने को कहता है, वह वैसा ही कर देती है.

दरअसल, घूंघट में रहने वाली महिला सरपंच अपने पति के हाथ की कठपुतली बन कर रह जाती है.

हर गांव में तकरीबन आधी आबादी औरतों की होती है. आज भले ही औरतें थोड़ाबहुत पढ़लिख लेती हों, लेकिन गांव का माहौल होने की वजह से उन के चेहरे से घूंघट नहीं हटा है. ऐसे में सरपंच होते हुए भी उन की अपनी कोई पहचान नहीं होती.

वे अपने पति के नाम से ही जानी जाती हैं. कैसी अजीब बात है कि सरपंच के चुनाव में मतदाता बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और उसे अपना वोट देते हैं, जिस का चेहरा तक उन्होंने नहीं देखा होता. ऐसे में उसे पहचानने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

ज्यादातर घूंघट में रहने वाली महिला सरपंच को मतदाता उस के पति को देख कर वोट देते हैं. घूंघट में रहने वाली सरपंच अपने मतदाताओं को पहचानती तक नहीं है.

घूंघट में रहना लोकतंत्र और औरत जाति के लिए एक चुनौती है. समय के साथ बहुतकुछ बदल गया है और आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन नहीं बदली है तो गांव के लोगों की सोच. घूंघट में जीना यहां की औरतों की जिंदगीभर की कहानी है. औरतें भले ही इस बात को न मानें कि वे घूंघट में घुटनभरी जिंदगी जी रही हैं, लेकिन इस कड़वी सचाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.

राजनीति घूंघट में रह कर नहीं हो सकती. इस के लिए बेबाक होना पड़ता है, तभी उस का असर पड़ता है. जब औरतें घूंघट में होंगी, किसी कार्यक्रम में मंच पर बैठेंगी ही नहीं या घूंघट निकाल कर बैठेंगी, तो वहां के हालात बड़े अजीबोगरीब हो जाते हैं.

गांवों में तरक्की हुई है, बराबरी बढ़ी है, लेकिन नहीं बदली है तो वहां के लोगों की सोच. औरतों को अपने से कमतर मानने की सोच के चलते ही उन के चेहरे से परदा नहीं हट पा रहा है.

औरतों के सिर से घूंघट हटाने के लिए एक सजग क्रांति की जरूरत है. इस के लिए लड़कियों के मातापिता को आगे आना होगा. उन्हें अपनी बेटियों की शादी उसी परिवार में करानी चाहिए, जहां घूंघट का बंधन नहीं हो और वे आसानी से सांस ले सकें.

घूंघट में रह कर औरतें अपनी जिंदगी के तानेबाने को कैसे बुन सकती हैं? घूंघट में रह कर राजनीति या समाजसेवा नहीं की जा सकती. गांव की तरक्की न केवल औरतों के पढ़ेलिखे होने पर टिकी है, बल्कि घूंघट मुक्त समाज पर भी निर्भर करती है.

बोल्ड रोल पंसद नहीं : सिमरन आहूजा

रेडियो जौकी से अपना कैरियर शुरू करने वाली सिमरन आहूजा बहुत सुंदर और ग्लैमरस लुक वाली है.

यही वजह है कि उनको फिल्मों में जो रोल औफर हुये वह बोल्ड किरदार के थे. सिमरन को ऐसे बोल्ड रोल पंसद नहीं थे इस कारण वह फिल्मों में नहीं गई.

सिमरन ने ब्यूटी प्रेजेंट में सफलता हासिल की. मिस इंडिया 2013, ज्वेलरी क्वीन 2015, गोल्डन फोनिक्स अवार्ड 2015 जैसे टाइटिल जीते. इसके बाद बडे कार्यक्रम में एंकरिंग करने लगी. सिमरन ने डांस में अपना एक अलग मुकाम बनाया. जिसके चलते विदेशो में उसके डांस शो भी होते हैं. डांस में सिमरन राज गरबा, राजस्थानी और पंजाबी डांस करती हैं. सिमरन कहती हैं विदेशों में भारत के फोक डांस खासकर गुजराती गरबा, राजस्थानी झूमर, पंजाबी भांगडा बहुत पंसद किया जाता है. वह लोग इस फेाक में किसी भी तरह का फ्यूजन पसंद नहीं करते. विदेशों में ऐसे शो बहुत होते हैं.

पेरिस और दुबई में इंडियन फेस्टिवल के समय सिमरन कल्चरल एम्बेसडर बनी. विदेशों में होने वाले डांस शो के जजमेंट पैनल में सिमरन को जज बनने का मौका मिला. एंकर के रूप में सिमरन ने हौलीवुड के कई शो किये. उद्योग इंडिया फेस्टिवल के समय भी वह ब्रांड एम्बेसडर बनी. बोल्ड सीन क्यों नही पंसद? इस पर सिमरन ने कहा कि मुझे किसी भी तरह की बोल्ड पोशाक पहनने से कोई परहेज नहीं. मुझे बेडरूम सीन, रेप सीन, सेक्सी किस जैसे सीन पसंद नहीं. इस वजह से मैंने फिल्मो में काम नहीं किया.

मुझे अपनी पर्सनल बातें भी ज्यादा शेयर करने की आदत नहीं है. यही वजह है कि मैं अपनी प्राइवेट लाइफ और सोशल लाइफ को अलग रखती हूं. परिवार के साथ मेरी कोई फोटो या दूसरी जानकारी सोशल मीडिया पर जाये यह पंसद नहीं.

सिमरन को गाने का शौक है. उसकी मां खुद मुम्बई में मैराथान विजेता रही हैं. सिमरन को फिट रहना पसंद है. वह अपने विदेशी शो में व्यस्त हैं. ऐसे में वह दूसरी तरफ अभी नहीं बढना चाहती. सिमरन कहती हैं मेरी लाइफ का एक ही फंडा है कि जो पसंद हो वहीं करो. प्रियंका चोपडा और माधुरी दीक्षित सिमरन की पसंदीदा हीरोइन है.

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