मैं एक लड़के के साथ हमबिस्तरी करती हूं. मैं पेट से भी हुई, पर बच्चा अपनेआप गिर गया मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 24 साला अनाथ हिंदू लड़की हूं और स्टेज शो करती हूं, मैं तलाकशुदा हूं. 30 साल के मुसलिम लड़के के साथ मैं डेढ़ साल से हमबिस्तरी कर रही हूं. मैं पेट से भी हुई, पर बच्चा अपनेआप गिर गया. लड़के के घर वाले उस की कहीं और शादी करना चाहते हैं, पर वह नहीं चाहता. मैं क्या करूं?

जवाब

अगर वह लड़का कहीं और शादी नहीं करना चाहता, तो फिर दिक्कत क्या है? जब वह आप के साथ डेढ़ साल से सो रहा है, तो अब तक उसे आप से शादी कर लेनी चाहिए थी. आप अपने प्रेमी को जल्दी से जल्दी शादी करने के लिए कहें. अगर वह आनाकानी करे, तो समझ जाएं कि वह आप का फायदा उठा रहा था, तब उसे पूरी तरह छोड़ दें.

बंटी को क्या 10 साल रोक पाएगी जेल

22 मई, 2017 को केरल के तिरुवनंतपुरम की एक अदालत में इसलिए भीड़ जुटी थी, क्योंकि उस रोज देश के चर्चित चोर बंटी को एक केस में सजा सुनाई जानी थी. वही बंटी, जिस की देश भर के थानों में फोटो लगी है, जो केवल दिल्ली में ही 400 से अधिक चोरी की वारदातों को अंजाम दे चुका है. बौलीवुड की सफल फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ इसी शख्स के जीवन पर आधारित थी. इतना ही नहीं, बंटी टीवी के प्रसिद्ध रियलिटी शो बिग बौस के 2010 में प्रसारित चौथे सीजन में भी हिस्सा ले चुका है. यह बात अलग थी कि नियम तोड़ने की वजह से उस की इस शो से शुरू में ही विदाई हो गई थी.

बता दें कि एक ही व्यक्ति द्वारा अपने अकेले के दम पर 300 से अधिक चोरियां करने का रिकौर्ड बनाने पर बंटी का नाम विश्व कीर्तिमान के रूप में गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज है. इस से पिछला रिकौर्ड 180 चोरियों का था, जो एक विदेशी चोर के नाम था. हालांकि इस चोर की दास्तान एकदम साधारण सी है, जबकि बंटी की जीवनगाथा इतनी रोचक है, जिस के सामने काल्पनिक रोमांच कथाएं भी फीकी पड़ जाएं.

बंटी का जन्म 28 दिसंबर, 1971 को दिल्ली के विकासपुरी निवासी किरपाल सिंह सग्गू के यहां हुआ था. उस का पूरा नाम था देविंदर सिंह सग्गू. परिवार से उसे कभी प्यार या अपनापन नहीं मिला था. जराजरा सी बात पर उस की पिटाई हो जाया करती थी.

पिता की नफरत का शिकार बंटी नौवीं क्लास की पढ़ाई बीच में ही छोड़ घर से भाग निकला था. रात गुजारने का ठिकाना उस ने पालिका बाजार की खुली छत को बनाया और पेट भरने का साधन ढूंढा गुरुद्वारा बंगला साहिब के लंगर में. 2-3 दिनों बाद ही उसे एक कार गैरेज में 10 रुपए रोजाना पर कार धोने की नौकरी मिल गई. एक दिन शाम को जब उसे मेहनताना नहीं मिला तो उस ने महावीरनगर में एक घर से 2 हजार रुपयों की चोरी कर ली. यह उस की पहली चोरी थी.

बस, यहीं से बंटी को पैसा कमाने की सरल, लेकिन गलत राह मिल गई. बंटी दिमाग का तेज था. उस ने अपना सारा दिमाग चोरी में लगा दिया. अपने तेज दिमाग के सहारे बंटी को नए चोर से नामी चोर बनते देर नहीं लगी. वह इस रफ्तार से चोरियां करने लगा कि सुनने वाले को भी विश्वास न हो. खास बात यह थी कि कुछ चोरियां वह पैसे और अपनी जरूरतों के लिए करता था और कुछ मजा लेने के लिए.

बंटी दिल्ली में लगातार चोरियां कर रहा था. इस बीच पुलिस का एक विशेष दस्ता हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया था. 12 सितंबर, 1993 को मुखबिरी के आधार पर बंटी पहली बार पुलिस के हत्थे चढ़ा, लेकिन उसी दिन वह तिकड़म भिड़ा कर हिरासत से फरार हो गया.

थाने से फरार होने के बाद उस ने पटेलनगर में एक शराबी की कमीज जबरन उतरवा कर खुद पहन ली और अपनी शर्ट उसे पहना दी. पटेलनगर की ही एक इमारत के सामने मारुति 800 और कंटेसा क्लासिक कारें खड़ी थीं. मारुति चुराना बंटी को अपने स्तर का न लगा. जबकि कंटेसा को बिना किसी औजार के खोल पाना संभव न था.

बंटी का दिमाग तेजी से घूमा तो उस ने मारुति का साइड मिरर उखाड़ फेंका और भीतर हाथ डाल कर अंदर पड़ा पेचकस निकाल लिया. उसी पेचकस से उस ने कंटेसा का लौक खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठ गया. बैठते ही उस ने कुछ पेंच खोले और फिर तारों को इधरउधर कर के गाड़ी का इंजन चालू कर लिया.

कंटेसा थोड़ी पुरानी थी. कुछ आगे जा कर एक इमारत के सामने उसे एक और कंटेसा खड़ी दिखाई दी. वह नई जैसी लग रही थी. उस ने पहले वाली कंटेसा को वहीं छोड़ा और अपनी जानीमानी तकनीक से नई कंटेसा ले उड़ा. कार की पीछे वाली सीट पर व्हिस्की की 2 बोतलें पड़ी थीं. बंटी ने एक बोतल का ढक्कन खोला और आधी बोतल पी गया. तब तक वह टैगोर गार्डन के एक रेस्तरां के सामने पहुंच गया था. गाड़ी में बैठेबैठे ही उस ने हौर्न बजा कर रेस्तरां से वेटर को बुलाया. वेटर को उस ने गाड़ी में ही खाना लाने का और्डर दिया. कार में बैठेबैठे लजीज खाना खा कर वह बिना बिल चुकाए आगे बढ़ गया.

वहां से थोड़ी दूरी पर विवेक सिनेमा के पीछे पार्किंग थी. वहां काफी गाडि़यां पार्क की हुई थीं. बंटी ने चोरी की कंटेसा उन्हीं कारों के बीच पार्क कर के उस की डिक्की में रखी तिरपाल निकाल कर कार के ऊपर डाल दी और मजे से कार में सो गया. उस की आंख खुली तो अगले दिन की शाम के 5 बज रहे थे. उस वक्त बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं था.

रात के 8 बजे तक वह गाड़ी के भीतर ही रहा, फिर कार के ऊपर से तिरपाल समेट कर डिक्की में रखी और वहां से निकल पड़ा. पहले की तरह ही उस ने एक जगह गाड़ी में बैठेबैठे ही नूडल्स खाए और बिना पेमेंट किए वहां से गाड़ी भगा दी.

राजा गार्डन जा कर उस ने एक जगह खड़ी कंटेसा कार से अपनी कार की नंबर प्लेट की अदलाबदली की. फिर थोड़ी देर बाद उस ने उसी इलाके की एक कोठी की जाली उखाड़ कर अपना काम शुरू किया. वहां से एक विदेशी वीसीआर, 35 हजार रुपए नकद और टाटा सिएरा कार की चाभी बंटी के हाथ लगी.

उस ने टाटा सिएरा कार गैराज से निकाल कर चोरी की कंटेसा वहां पार्क कर दी, साथ ही उन की नंबर प्लेटों की फिर से अदलाबदली कर ली. इस के बाद बंटी ने मुंबई की राह पकड़ ली.

वहां वह कोलाबा स्थित एक रेस्तरां के मालिक शर्मा से मिला. वह बंटी का पूर्व परिचित था. वह नाराजगी जाहिर करते हुए बंटी से बोला, ‘‘तू ने मेरा काफी नुकसान करवा दिया. चोरी की गाड़ी तो दी सो दी, बाद में पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया. तुझे पता ही होगा कि दिल्ली पुलिस गाड़ी के साथ मुझे भी पकड़ ले गई. बड़ी मुश्किल से जमानत पर छूट कर आया हूं.’’

इस पर बंटी ने उसे समझाया, ‘‘अरे यार, धंधे में यह सब तो चलता ही रहता है. तुझे क्या पता नहीं था कि वह कार चोरी की है. वैसे भी तू क्या इतना सीधा है कि पुलिस के हत्थे चढ़ जाता? मैं तो तेरे पास इसलिए आया हूं कि तेरे पास कुछ पैसे हों तो दे, 2 दिन में बढि़या चमचमाती मारुति 1000 कार ला कर तुझे दे दूंगा.’’

शर्मा ने बिना कुछ कहे 40 हजार रुपए ला कर बंटी के हाथ पर रख दिए. वादे के अनुसार अगले दिन  बंटी ने लाल रंग की एक मारुति 1000 ला कर उस के हवाले कर दी. इस के बाद वह बस से बंगलौर चला गया. वहां के कृतिका होटल में रहते हुए उस ने शहर में 4 जगह चोरियां कीं, जहां से उस के हाथ 35 लाख रुपए का सामान लगा. एयरपोर्ट के नजदीक डिफेंस कालोनी से नीले रंग की एक कार चुरा वह मद्रास के लिए रवाना हो गया.

वहां वह गोल्डन बीच के होटल यामिनी में ठहरा. पहली वारदात में उस ने फिल्म अभिनेता राज बब्बर के भाई के घर से 200 डीसीएल मर्सिडीज कार चुराई. नंबर प्लेट बदल कर इसी कार में सवार हो कर उस ने चोरी की कुछ अन्य वारदातें कीं.

एक दिन उस ने किट्स कैंप कौर्नर से 22 हजार रुपए का एक खास सूट खरीदा. फिर एक फोटोग्राफर को साथ ले कर चोरी की मर्सिडीज में घूमते हुए दर्जनों फोटो खिंचवाए. यहां तक कि कुछ फोटो उस ने स्टीमर चलाते हुए भी खिंचवाए.

दिन भर मौजमस्ती करने के बाद वह होटल की ओर लौट रहा था. फोटोग्राफर उस की बगल में बैठा था, जिसे रास्ते में उस के स्टूडियो पर ड्रौप करना था. बंटी की निगाहें हमेशा चौकस रहती थीं. अचानक उस की निगाह साइड मिरर पर गईं तो उसे लगा कि उस का पीछा किया जा रहा है. पीछे आ रही एक खुली जीप में 5-6 लोग बैठे थे. बंटी समझ गया कि वे सब पुलिस वाले हैं. उस ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी. लेकिन उन लोगों ने भी जीप को गति से दौड़ाते हुए आग्नेयास्त्र निकाल लिए. कोई और चारा न देख बंटी ने गाड़ी रोक दी.

फोटोग्राफर बाईं तरफ का दरवाजा खोल कर भाग गया. उसी की तरफ से बंटी भी भागने को हुआ, लेकिन तभी एक सनसनाता हुआ मुक्का उस की कनपटी से आ टकराया. पलभर को उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. इस के बाद पुलिस वालों ने बंटी को हथकड़ी लगाईं और उसे जीप में डाल कर वहां से रवाना हो गए. बंटी से बरामद कार को एक सिपाही चला कर ले गया.

अगले दिन बंटी को अदालत में पेश कर 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. इस अवधि में उस ने 4 मारुति 1000 सीसी कारों के अलावा 40 लाख का चोरी का सामान बरामद करवाया. पुलिस रिमांड की समाप्ति पर उसे न्यायिक हिरासत में मद्रास की वेल्लोर जेल भिजवा दिया गया. जेल में उसे एक अलग कोठरी में रखा गया.

इस जेल के अधीक्षक बहुत अच्छे आदमी थे. कैदियों के साथ उन का व्यवहार हमेशा मधुर हुआ करता था. बंटी को वह लगभग रोजाना ही बुरे धंधे छोड़ कर अच्छा आदमी बनने की नसीहत दिया करते थे.

मार्च का महीना आते ही बंटी को मद्रास की गरमी परेशान करने लगी. तब उस ने मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश के राज्यपाल और कानून मंत्री को पत्र लिख कर प्रार्थना की कि वेल्लोर जेल में उस का रह पाना बहुत कठिन हो गया है. अपने इस पत्र में बंटी ने झूठ ही लिख दिया था कि उस का जन्म हिमाचल प्रदेश के शिमला में हुआ था.

इस बीच पुलिस ने बंटी के खिलाफ चोरी के 9 केसों का चालान अदालत में पेश कर दिया था. इन सभी आरोपों को उस ने स्वीकार किया था. न्यायाधीश ने बंटी की उम्र और सच्चाई को देखते हुए उसे कुल 15 महीने की कैद की सजा सुनाई. अब तक न्यायिक हिरासत के तहत बंटी का 3 महीने का वक्त जेल में कट चुका था, जो उस की सजा की अवधि में एडजस्ट कर दिया गया था.

एक दिन जेलर ने बंटी को अपने औफिस में बुला कर समझाया, ‘‘देखो बेटे, तुम्हें यहां इतनी परेशानी है नहीं, जितनी तुम जाहिर कर रहे हो. मैं नहीं समझता कि तुम्हें यहां जैसे अच्छे लोग दूसरी जेलों में भी मिलेंगे. 3 महीने बड़े आराम से निकल गए हैं, आगे का एक साल भी निकल जाएगा. मेरी मानो तो यहीं रह कर अपने आप को बदल डालो.’’

‘‘सर, मेरे लिए आप पिता समान हैं. मैं आप की बहुत इज्जत करता हूं और आप की हर बात से सहमत हूं. लेकिन क्या करूं, सचमुच मुझे बहुत गरमी लगती है.’’

‘‘सुनो बंटी, मैं ने भी बहुत दुनिया देखी है, मैं तुम्हारी हर चाल समझता हूं. तुम यहां से बदले जाने के समय निकल भागने के मंसूबे पाल रहे हो. मगर मेरी बात कान खोल कर सुन लो, अब भागे तो जिंदगी भर भागते रहोगे.’’

‘‘नहीं सर, ऐसा कुछ नहीं है. मैं आप से सिर्फ इतना ही कहूंगा कि मुझे अगर दूसरी जेल में न भेजा गया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा.’’

उस दिन से बंटी पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी. मुख्यमंत्री औफिस से पत्र आ गया कि बंटी का मामला जायज है तो उसे प्रदेश के ठंडे स्थान की किसी जेल में स्थानांतरित कर दिया जाए.

अब तक जेल अधीक्षक का व्यवहार बदल गया था. बंटी का मामला उन्हें किसी भी तरह से जायज नहीं लग रहा था. बंटी के भाग जाने की सोच कर वह परेशान थे. वैसे उन का परेशान होना गलत नहीं था. बंटी निश्चित ही निकल भागने की योजना को कार्यरूप देने में लगा था. जेल परिसर में उगे आक के पौधे का जहरीला दूध उस ने पौलीथिन में इकट्ठा करना शुरू कर दिया था. थैली को वह पानी के मटके में छिपा कर रखता था.

एक सुबह उस ने मटके से थैली निकालते हुए कोठरी के बाहर खड़े संतरी से कहा, ‘‘मुख्यमंत्री के कह देने के बावजूद आप का जेल मुझे यहां से कहीं और भेजने को राजी नहीं है. मैं ने उन्हें आत्महत्या करने की धमकी भी दी थी, मगर उन पर कोई असर नहीं हुआ. आज मैं अपनी उस धमकी को पूरा करने जा रहा हूं. मेरे हाथ में यह ऐसा जहर है, जिसे पीते ही इस जेल से हमेशा के लिए मुक्ति पा जाऊंगा.’’

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा मत करना.’’ संतरी रोकता ही रह गया और बंटी ने थैली का सारा तरल पदार्थ अपने मुंह में उड़ेल लिया.

संतरी ने शोर मचाया तो पूरी जेल में हड़कंप मच गया. संदेश मिलते ही जेलर भी दौड़े आए. जब तक उस की सेल का दरवाजा खुला, बंटी बेहोश हो कर फर्श पर गिर चुका था. उसे तत्काल वेल्लोर अस्पताल भिजवाने का प्रबंध किया गया.

13 दिनों तक बंटी को ग्लूकोज चढ़ता रहा. इस बीच डाक्टरों से दोस्ती गांठ कर उस ने उन की हमदर्दी हासिल कर ली. जिस दिन उसे अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाना था, उस ने दोनों हाथ जोड़ते हुए एक वरिष्ठ डाक्टर से कहा, ‘‘सर, क्या आप मुझे 2 दिन और अपने अस्पताल में रख सकते हैं?’’

इस की वजह पूछने पर बंटी ने डाक्टर को अपनी मजबूरी बताई, ‘‘कल या परसों मेरी गर्लफ्रैंड मुझ से मिलने आने वाली है. जेल में तो उस से खुल कर बातचीत हो नहीं पाएगी. सर, यह सजा पूरी हो जाने के बाद मैं सब बुरे काम छोड़ कर अपनी गर्लफ्रैंड कविता से शादी कर लूंगा. वह आगरा की रहने वाली है. सर, आप हमारी शादी में जरूर आइएगा.’’

डाक्टर ने फिलहाल कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप अपने चैंबर में चले गए, साथ ही वह बंटी को 1 दिन और बिस्तर पर रह कर पूरी तरह आराम करने की लिखित नसीहत दे गए.

हालांकि जेल अधिकारियों के आदेश पर बंटी के कमरे के बाहर कड़ा पहरा था. भीतर भी 2 जवान हमेशा साए की तरह उस के साथ रहते थे. लेकिन बंटी ने अपने वाकचातुर्य से उन सब को अपने सम्मोहन जाल में फंसा लिया था. उन का मन इस बात की गवाही देने को कतई तैयार न था कि बंटी जैसा लड़का भागने की सोच भी सकता है. लेकिन यही तो बंटी का खास अंदाज था, जिस के बूते पर वह न जाने कितने लोगों को गच्चा दे चुका था.

अप्रैल, 1994 के अंतिम सप्ताह की रात थी वह. बंटी ने 9 बजे से ही सोने का नाटक शुरू कर दिया, जबकि नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. आधी रात के बाद ढाई बजे जब बंटी ने लोहे की तार से बैड से बंधी हथकड़ी अपने हाथ से उतारी, तब सभी सुरक्षाकर्मी गहरी नींद में थे. खिड़की के रास्ते पिछली तरफ उतर कर बंटी अस्पताल की दीवार फलांगता हुआ मुख्य सड़क पर आ गया. वहां से एक ट्रक वाले से लिफ्ट ले कर वह बंगलौर जा पहुंचा, जहां उस ने एक औरत के गले से सोने की मोटी चेन झपटी. उस चेन को उस ने 24 हजार रुपए में बेचा और मुंबई चला गया.

इस के बाद तो उस का पुराना सिलसिला चल निकला. बंटी देश के प्रमुख शहरों में घूमता और चोरी की वारदात पर वारदात करता रहा. वह दर्जनों बार पकड़ा गया तो कई बार हिरासत से भागा भी. उस पर अनगिनत केस चले, कुछेक केसों में मामूली सजा हुई तो अधिकांश में बरी होता गया. इस की वजह यह थी कि वह पुलिस को भले गच्चा देता रहा हो, पर अदालत में अपने गुनाह बेझिझक स्वीकार कर लेता था.

उस ने तमाम कथित बड़े लोगों के यहां चोरियां कीं. लूट का माल बेच कर वह सारा पैसा मौजमस्ती में उड़ा देता था. अभी तक उसे किसी भी केस में लंबी सजा नहीं हुई थी. लिहाजा उस का ज्यादातर समय जेल के बाहर ही गुजरा था.

मगर एक चोरी ने उस के जीवन की धारा बदल दी. सन 2013 में बंटी ने केरल के नगर तिरुवनंतपुरम में रहने वाले एक एनआरआई के घर में सेंधमारी कर के उस का बेशकीमती सामान चुरा लिया. ऐसा करते समय उस ने घर में लगा हाई सिक्योरिटी अलार्म भी तोड़ दिया था.

इस केस में वह गिरफ्तार हो गया. पुलिस ने बंटी के खिलाफ मजबूत आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश किया. इस बार बंटी जमानत पर नहीं छूट सका. 22 मई, 2017 की सुबह से ही इस केस का फैसला सुनने के लिए लोग तिरुवनंतपुरम के कोर्ट परिसर में न्यायिक मजिस्ट्रैट पी. कृष्णकुमार की अदालत के पास जुटना शुरू हो गए थे. दोपहर बाद 3 बजे फैसला सुनाया गया.

फैसले के अनुसार, बंटी ने एनआरआई के घर की सुरक्षा बेध कर सेंध लगाई थी. वहां से उस ने 28 लाख कीमत की लग्जरी कार व एक लैपटौप समेत कुछ अन्य कीमती सामान चुराए थे. इसी आरोप में देविंदर सिंह सग्गू उर्फ बंटी को 10 साल की कैद के अलावा 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई गई. फिलहाल बंटी जेल में है.

‘पद्मावती’ के लिए शाहिद को रोज इतने घंटों करना पड़ता था मेकअप.!

संजय लीला भंसाली को फिल्म ‘पद्मावती’ की वजह से शुरू से ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. फिल्म के तथ्यों के खिलवाड़ का आरोप लगाते राजपूत करणी सेना ने इसके प्रति हमेशा अपना रोष जताया है. लेकिन फिर भी संजय लीला भंसाली ने फिल्म को लेकर अपनी आस नहीं छोड़ी है.

इतनी मुसीबतों के बाद भी फिल्म के प्रमोशन में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं देखी जा रही है. इस फिल्म के प्रमोशन के लिए हाल ही में शाहिद कपूर ने एक इवेंट में पद्मावती स्टाइल में फिल्म को प्रमोट किया.

भले ही लोग माने की अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के किरदारों के बीच रावल रतन सिंह का किरदार कहीं छुप गया है, लेकिन शाहिद ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह न्याय किया है. फिल्म के प्रमोशन के लिए हाल ही में शाहिद ने एक रेडियो इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने पद्मावती से जुडी कई बातें लोगों के साथ शेयर की.

उन्होंने बताया कि ‘फिल्म के लिए मुझे दाढ़ी मूंछ बढ़ाने के लिए कहा गया था. मुझे लगा था कि डेढ़ महीने में मेरी दाढ़ी मूंछ उग जायेगी, लेकिन 3-4 महीने लग गए. वहीं फिल्म की शूटिंग से पहले तैयार होने के लिए मुझे एक-दो घंटे रोजाना देने पड़ते थे.’

वहीं पद्मावती को लेकर बात करते हुए उन्होंने बताया कि ‘मेरे लिए ये बहुत ही स्पेशल फिल्म है और इसकी रिलीज के लिए दो हफ्तों तक रुकना बहुत मुश्किल है. यह फिल्म हिन्दुस्तान के लिए बहुत खास होगी क्योंकि जिस तरह से मेवाड़ और चित्तौड़ को फिल्म में दर्शाया गया है, वो बहुत अलग है और संजय सर ने जैसे इस फिल्म को बनाया है वो देखकर आप ये बात समझ सकते हैं. हम सभी ने इस फिल्म को अपना खून और पसीना दिया है और हम सबकी कड़ी मेहनत के बाद ये जल्द ही रिलीज होने को तैयार है.’

शोहरत पाने के लिए कपिल को करना पड़ा था ऐसा काम

भारत में कौमेडी किंग के नाम से जाने जानेवाले कपिल शर्मा का शो भले ही आज औफ़ एयर हो चुका है, लेकिन जल्द ही हम अपने फेवरेट कौमेडियन को उनकी फिल्म फिरंगी में देख पाएंगे. हाल ही में कपिल बिग बौस में सलमान खान के साथ अपनी अपकमिंग फिल्म फिरंगी को प्रमोट करने पहुंचे थे.

सलमान खान को उन्होंने अपने शो पर बहुत हंसाया था और अब कपिल की बारी थी कि वे सलमान खान के शो में अपनी फिल्म प्रमोट करें. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन ऊंचाइयों को छूने से पहले कपिल शर्मा ने कितना स्ट्रगल किया है?

जी हां, कपिल को यह मुकाम हासिल करने के लिए बेहद मेहनत करनी पड़ी है. भले ही आज उनका नाम सेलेब्स की फेहरिस्त में शामिल हो, लेकिन एक समय था जब वे एक आम इंसान की तरह ही ज़िन्दगी जिया करते थे.

वैसे तो बौलीवुड के कई ऐसे सितारे हैं जो अपनी ज़िन्दगी में छोटे से छोटा काम कर चुके है और हमारे चहीते कपिल शर्मा भी उन्ही में से एक हैं. वे भी कौमेडी में अपना करियर शुरू करने से पहले पूल पार्लर और एसटीडी बूथ में काम किया करते थे.

जी हां, कपिल शर्मा, जिनके दुनियाभर में करोड़ों फैन्स हैं, उन्होंने अपने करियर के शुरूआती दिनों में पूल पार्लर और एसटीडी बूथ में बतौर कर्मचारी काम किया है. यही वजह है कि वे भले ही कितनी भी ऊंचाई तक पहुंच चुके हों, लेकिन वे आज भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना अच्छी तरह जानते हैं. इतना ही नहीं, वे अपने दर्शकों का बेहद सम्मान करते हैं और उस कामियाबी के लिए दिल से उनका शुक्रियादा करते हैं.

कपिल की ही तरह शाहरुख और सलमान खान भी अपने करियर के शुरुआती दौर में इस तरह के काम कर चुके हैं. अपने एक इंटरव्यू में शाहरुख़ ने बताया था कि वे शादियों में बतौर डांसर डांस कर चुके हैं.

धर्म के नाम पर यह कैसा पाखंड?

हमारे देश में आस्था के नाम पर धर्म का धंधा काफी फलफूल रहा है. देश में हर रोज हजारों संस्थाएं धर्म के नाम पर कोई न कोई आयोजन कर के लोगों को धर्मभीरु व निठल्ला बनाने में जुटी रहती हैं. इन में से कुछ संस्थाएं तो ऐसी होती हैं, जिन के लिए घर, परिवार और समाज कोई माने नहीं रखता है.

लगता है कि इस तरह की संस्थाओं से जुड़ कर धर्म के कामों को अमलीजामा पहना कर उन्हें मोक्ष मिल जाएगा, इसलिए वे धर्म का डर दिखा कर दूसरे कामकाजी लोगों को भी उन के रास्ते से भटका कर उन का भविष्य चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.

आज हर गलीचौराहे पर मंदिर बनाने वालों की होड़ सी लग गई है. ये धार्मिक संस्थाएं इनसानियत को बड़ी तेजी से डुबो रही हैं.

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की अगर बात की जाए, तो यहां भी पहले एक ही जागरण का आयोजन किया जाता था, जिस में न केवल शहर  बल्कि गांवों से भी लोग आते थे. पर पिछले तकरीबन 10 साल से जागरण कराने वालों की तादाद में तेजी से इजाफा हुआ है और हर साल मई महीने से शुरू हुए जागरणों का सिलसिला अक्तूबर महीने तक चलता रहता है.

इस की खास वजह यह है कि हर सैक्टर में ऐसे आयोजन करा कर दबदबे की जंग लड़ना यानी यह दिखावा होता है कि किस संस्था ने जागरण का सब से अच्छा आयोजन किया और किस संस्था ने कितनी भीड़ जुटाई.

दरअसल, देखा जाए तो एक जागरण के आयोजन में 3-4 लाख रुपए तो खर्च हो ही जाते हैं. अगर लोगों से जमा की गई इस रकम को किसी वृद्धाश्रम को बनाने, सड़क पर लाचारबीमार पशुओं का इलाज कराने या उन के लिए रैनबसेरा बना कर या फिर किसी मुसाफिरखाने को बनवा कर समाज को एक नई दिशा दी जा सकती है.

पर ऐसा हो नहीं पाता है. आज देखा जाए, तो भाखड़ा बांध से बेघर हुए इस शहर में मुसाफिरों के ठहरने के लिए कोई सराय नहीं है. धर्म के नाम पर तो रुपए दिए जा सकते हैं, पर समाजसेवा के नाम पर लोग चंदा देने से कतराते हैं.

जागरण का आयोजन करने वाली संस्थाएं भी जागरण का प्रचारप्रसार करने के लिए होर्डिंग, बोर्ड, पंपलैट्स व गाडि़यों द्वारा अनाउंसमैंट करवा कर भीड़ जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं.

कुकुरमुत्ते की तरह उग आए ये जागरण कराने वाले आयोजक गलीगली, घरघर व दुकानदारों से चंदा उगाहते हैं. जागरण में भक्ति रस के गीतों की छटा बिखेरने के लिए एक करार के तहत किसी गायक पार्टी को बुलाते हैं.

3-4 घंटे तक गायक पार्टी अपना कार्यक्रम दे कर रकम ले कर चली जाती है. यह रकम भी लाखडेढ़ लाख रुपए तक हो सकती है. फिर बिजली की सजावट पर भी खर्च होता है.

कुछ लोग दबी जबान में कहते हैं कि कुछ आयोजक इकट्ठा किए गए चंदे से ही जागरण का आयोजन करते हैं. वे अपनी जेब को जरा भी सेंक नहीं लगाते हैं यानी जनताजनार्दन से इकट्ठा किए गए रुपए पर ही वे अपनी दुकानदारी चमकाते हैं. मीडिया में इन आयोजकों की खबरें व फोटो छाए रहते हैं. बेचारा चंदा देने वाला कहीं नजर नहीं आता है.

सब से बड़ी बात तो यह है कि कुछ लोग कईकई संस्थाओं से जुड़ कर उन के लिए काम करते हैं. चाहे मंदिर में हफ्ते का आयोजन होना हो या कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व या फिर दंगल सभी के लिए चंदा उगाहने का काम इन्हीं चंद लोगों के कंधों पर टिका होता है.

सब से बड़ी दिक्कत तो उन छोटेछोटे दुकानदारों को है, जो रेहड़ी वगैरह लगा कर बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमा पाते हैं और मजबूरी में चंदा देते हैं.

हर महीने चंदा मांगने वालों से वे लोग बहुत तंग होते हैं. अगर कोई चंदा देने वालों को टरकाता भी है, तो चंदा मांगने वाले कहते हैं, ‘चंदा हम काम करवाने के लिए मांगते हैं, अपने लिए नहीं.’

बेचारा दुकानदार भी धर्म की इस चोचलेबाजी में फंस कर चंदा दे ही देता है और मन ही मन इन आयोजकों को कोसता रहता है कि अगर इन आयोजकों को यह सब प्रपंच कराने का इतना ही शौक है, तो क्यों नहीं वे अपनी जेब से हजारों रुपए खर्च कर के देखें कि ‘घर फूंक तमाशा देख’ कैसा लगता है?

आज धर्म के नाम पर लोगों को निचोड़ने का जो सिलसिला चला है, वह थमने वाला नहीं है. जब तक लोग ऐसे ही धर्मभीरु बने रहेंगे, तब तक धर्म का जाल फैलाने वालों के शिकंजे में वे यों ही फंसते रहेंगे.

निकाह के नाम पर घिनौना खेल

यों तो शादी एक पवित्र बंधन माना जाता है, लेकिन कोई धर्म का सहारा ले कर शादी को ऐयाशियों के नाम पर सही ठहराए, ऐसा हरगिज मुनासिब नहीं. अरब देशों के शेख अपनी जिस्मानी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए काफी वक्त से भारत के कई शहरों में आते रहे हैं और इस धंधे का नाम निकाह देते हैं. यह सारा काम मजहब के नाम पर होता है.

निजामों के शहर हैदराबाद में पिछले कई सालों से इस तरह के घिनौने काम को अंजाम दिया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि इन अमीर शेखों के लिए उन के मुल्कों में लड़कियों की कोई कमी है, बल्कि ये सिर्फ इसलिए यहां आ कर गलत तरीके से निकाह करते हैं, ताकि इन मासूम लड़कियों को अरब मुल्कों में ले जा कर ऐयाशी की जाए.

ये शेख कतर, ओमान, बहरीन जैसे अमीर मुल्कों से आते हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये शेख यहां आ कर बाकायदा निकाह करते हैं, लेकिन यह निकाह समाज की आंखों में धूल झोंकने के लिए किया जाता है.

इस से यह फायदा होता है कि समाज में कहा जा सके कि हम ने कानूनन निकाह किया है, लेकिन ऐसे निकाह सिर्फ छलावा हैं. बात यह है कि जो निकाह काजी करवाता है, वह महज एक कौंट्रैक्ट होता है.

कौंट्रैक्ट मैरिज क्या है

इस कौंट्रैक्ट में लड़की के मांबाप को इस बात पर राजी किया जाता है कि यह शादी समाज को दिखाने के लिए शादी है, जबकि हकीकत यह है कि आप की लड़की को एक मुद्दत तक ही शेख के यहां रहना होगा.

अगर इसलाम की बात की जाए, तो इस तरह के निकाह की इसलाम में कोई जगह नहीं है, बल्कि इसलाम में कौंट्रैक्ट कर के निकाह करना साफ हराम करार दिया गया है.

इस सब के बावजूद हैदराबाद के कई काजी इस घिनौने काम को अंजाम दे रहे हैं. धर्म के ये ठेकेदार लड़की के घर वालों से यह कह कर निकाह के लिए राजी करते हैं कि इसलाम एकसाथ 4 शादियों का हुक्म देता है, इसलिए ऐसा करना शरीअत के खिलाफ नहीं है.

मोटी रकम का लालच

आज भी मुसलिम समाज में पढ़ाईलिखाई का लैवल दूसरे धर्मों के लोगों से काफी नीचे है. यही वजह है कि इस समाज में आज भी गरीबी, अपढ़ता, बेरोजगारी, नासमझी, आधुनिक सोच की कमी जैसी तमाम बुराइयां फैली हुई हैं.

कुछ गरीब परिवारों में कईकई लड़कियां होती हैं और उन की तंगहाली की वजह से पढ़ाईलिखाई का कोई खास इंतजाम नहीं हो पाता. इन लड़कियों को जैसेतैसे पाला जाता है. जब ये 16 साल की उम्र की हो जाती हैं, तो इन की शादी का डर सताने लगता है.

चूंकि घर में कमाई का कोई जरीया नहीं होता, तो न चाहते हुए भी कुछ मांबाप अपनी मासूम बच्चियों को इस दलदल में धकेल देते हैं, जिन्हें अमीर शेख वहशी भेडि़यों की तरह नोचतेखसोटते रहते हैं. इस के एवज में लड़की के घर वालों को 5 लाख से 10 लाख रुपए तक दिए जाते हैं.

यह रकम लड़की की उम्र, शक्ल व सूरत के हिसाब से तय की जाती है. अगर लड़की कमसिन होने के साथ ही बला की खूबसूरत होती है, तो शेख उस लड़की के लिए मुंहमांगी रकम देने को भी राजी हो जाते हैं.

दलाल कराते हैं निकाह

इस काम को कराने में लोकल लैवल पर कुछ दलालों के साथ ही निकाह पढ़ाने वाले काजी भी शामिल होते हैं. इस पूरे खेल में दलाल और काजी ही ज्यादा फायदे में रहते हैं, क्योंकि वे ही शेख और लड़की के घर वालों के बीच बातचीत तय कराते हैं.

दलाल और काजी शेखों से लड़की की कीमत कई गुना ज्यादा बताते हैं, लेकिन लड़की के बाप को 5 लाख से 10 लाख रुपए के बीच बता कर खुद ही ज्यादा रुपए ऐंठ लेते हैं.

इन सब के लिए लोकल काजी परिवार के मुखिया को एक कागज पर शेख का फर्जी तलाकनामा भी दिखाता है, जिस से इस बात का सुबूत मिल जाए कि निकाह करने वाले शेख का पहली बीवी से तलाक हो चुका है, इसलिए आप की लड़की को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी. इन सब बातों के असर से शेख के साथ लड़की का निकाह कर दिया जाता है.

दिखाए जाते हैं सब्जबाग

दलाल ही गरीब लोगों को लड़की का शेख के साथ निकाह कराने पर राजी करने के लिए बड़ेबड़े सब्जबाग दिखाते हैं. जैसे कि इस बुरे वक्त में एक लड़की की शादी के लिए लाखों रुपए का खर्च आता है और आप लोगों की माली हालत इस लायक नहीं है कि आप अपनी बच्ची की शादी धूमधाम से कर सकें. अगर आप कहें, तो हम आप की बेटी के लिए एक अच्छा सा रिश्ता ला सकते हैं.

एक गरीब मांबाप के लिए इस से अच्छा और क्या हो सकता है. आज के इस दौर में लड़के वाले दहेज की मांग करते ही हैं.

आमतौर पर समाज में देखा जाता है कि कई शादियां दहेज न देने की वजह से टूट जाती हैं, तो कभी लड़के वालों की महंगी गाडि़यों की फरमाइश पर रिश्ता खत्म कर दिया जाता है.

दहेज मांगने की बुराई किसी बड़ी लाइलाज बीमारी से कम नहीं है. ताज्जुब की बात यह है कि इस बीमारी से सिर्फ गरीब तबके के लोग ही पीडि़त नहीं हैं, बल्कि समाज के उन ऊंची इमारतों तक इस बीमारी ने अपने पैर पसार लिए हैं.

किया जाता है शोषण

ऐसी लड़कियों का शोषण खाड़ी देशों में ले जा कर किया जाता है. शुरूशुरू में तो इन लड़कियों को रहनेखाने से ले कर हर तरह का अच्छा इंतजाम किया जाता है, लेकिन बाद में इन मासूमों का इस कदर शोषण होता है कि इन की रूह तक कांप जाती है. ये इस दलदल में इतने अंदर तक चली जाती हैं या यों कहें कि धकेल दी जाती हैं, जहां से वापस आना नामुमकिन होता है.

खाड़ी मुल्कों से आने वाले शेखों की उम्र और इन लड़कियों की उम्र में बापबेटी से कहीं ज्यादा, दादापोती का फासला होता है.

अभी हाल ही में ओमान का जो शेख इस घिनौनी हरकत में पकड़ा गया, उस की उम्र 70 साल थी और उस की होने वाली बीवी की उम्र महज 16 थी. अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसी लड़कियों पर किस कदर जुल्म व ज्यादती की जाती होगी.

क्या सिर्फ शेखों की गलती

ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती, इस के लिए दोनों हाथों की हथेलियों का आपस में मिलना जरूरी होता है. इस तरह के मामलों में पूरी तरह से शेखों की गलती नहीं होती, बल्कि इस गैरकानूनी काम में लड़की के मांबाप भी जिम्मेदार होते हैं.

कोई शेख खाड़ी देशों से यहां आ कर किसी लड़की से जोरजबरदस्ती निकाह कर के नहीं ले जाता, बल्कि इस जुर्म में लड़कियों के परिवार भी बराबर के भागीदार होते हैं.

इस तरह का गैरकानूनी काम हैदराबाद में कई सालों से होता आ रहा है. कुछ तो गरीबी और मुफलिसी में मजबूर हो कर ऐसे काम करते हैं, तो कुछ लोगों ने इसे कमाई का अच्छा जरीया बना लिया है, इसलिए मासूमों के गुनाहों में शेखों के साथसाथ लड़की के परिवार वाले भी बराबर के भागीदार हैं, लेकिन ऐसे घटिया कामों को किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता.

वहीं समाज के कुछ लोगों की नजरों में यह कोई गुनाह का काम नहीं है. ऐसे लोगों का यही मानना है कि जब समाज में अशिक्षा, बेरोजगारी, कुप्रथा जैसी अनेक सामाजिक बुराइयां मौजूद हैं और सब से ज्यादा दहेज के लालची शादी के लिए अपने लड़कों की खुली बोली लगाते हैं, जैसे किसी चीज की नीलामी चल रही हो. इस नीलामी में वही बाजी मारता है, जो सब से ऊंची बोली लगाता है. ऐसे में इस तरह से निकाह करने में क्या हर्ज है?

फर्जी निकाह का खुलासा

खाड़ी देशों से आने वाले शेखों ने एक लंबे अरसे से इसे धंधा बना रखा था. इनसान अपने किए गए गुनाहों से बचने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाता है. वह खुद को सब से अक्लमंद और चालाक समझ बैठता है, लेकिन यहीं पर वह गलती कर जाता है. कौंट्रैक्ट मैरिज में दलाल, काजी के साथसाथ कई लौज मालिक भी ऐसे गुनाह में शामिल थे.

इस तरह के निकाह खुलेआम तो हो नहीं सकते, इसलिए शहर के कुछ खास लौज और होटल मालिक इन कामों में शामिल हो गए.

इन फर्जी निकाहों का खुलासा तब हुआ, जब हैदराबाद के फलकनुमा इलाके की एक औरत ने शिकायत दर्ज कराई. उस ने बताया कि उस के शौहर ने कुछ दलालों से मिल कर उस की 16 साल की नाबालिग लड़की का सौदा ओमान के 70 साल के बूढ़े शेख अहमद अब्दुल्ला से कर दिया है.

मां ने पुलिस को यह भी बताया कि उस की बेटी का ओमान में जिस्मानी शोषण किया जा रहा है, इसलिए मेरी मासूम बच्ची को बचा लें. इस के बाद पुलिस हरकत में आई और खाड़ी देशों के 8 शेखों समेत 20 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इस में 5 शेख ओमान के और 3 शेख कतर के थे.

गिरफ्तार किए गए लोगों में फर्जी निकाह कराने वाले 3 काजी, शेखों को पनाह देने वाले 4 लौज मालिक और कौंट्रैक्ट मैरिज के लिए गरीब परिवारों को फंसाने वाले 5 दलाल भी शामिल थे.

हैदराबाद पुलिस आयुक्त महेंद्र रेड्डी ने मीडिया को बताया कि इस रैकेट में कुल 35 लोगों की पहचान की गई. इस रैकेट में 15 औरतें भी शामिल थीं.

खाड़ी देशों से आ कर दलालों के जरीए गरीब परिवारों की नाबालिग लड़कियों को कौंट्रैक्ट मैरिज के नाम पर उन के देश ले जा कर जिस्मानी शोषण की शिकायतें काफी समय से मिल रही थीं.

अगर पुलिस समय पर ऐक्शन नहीं लेती, तो कुछ ही समय बाद ये दलाल 20 लड़कियों को खाड़ी मुल्कों में भेजने की तैयारी कर चुके थे.

भोपाल शहर के मौलाना उमैर खान नदवी से यह जानने की कोशिश की गई, ‘क्या इसलाम कौंट्रैक्ट मैरिज की इजाजत देता है?’ इस सवाल पर उन्होंने ऐसे निकाह को सिरे से खारिज कर दिया. उन का कहना था, ‘‘कौंट्रैक्ट मैरिज का जिक्र इसलाम में कहीं नहीं है और इसलाम इस बात की तालीम देता है कि आप निकाह इस नीयत के साथ करें कि हमें पूरी जिंदगी एकसाथ शौहरबीवी बन कर रहना है. यह बात दीगर है कि जिंदगी के किसी मोड़ पर अगर आप की नहीं बन पा रही, तो आप काजी के यहां जा कर तलाक ले सकते हैं.’’

इस बात से साफ जाहिर हो जाता है कि कौंट्रैक्ट मैरिज सिर्फ ऐयाशी करने का एक जरीया है, न कि पवित्र शादी का बंधन, इसलिए समाज में इस तरह की ज्यादती बरदाश्त नहीं की जा सकती.

बेहतर यही है कि आप अपनी लड़कियों को ऊंची तालीम दें, जिस से कि वे समाज में अपना एक अलग मुकाम बना सकें और इज्जत की जिंदगी जी सकें.

पूरे मुद्दे को गौर से देखेंगे, तो पाएंगे कि शेख गुनाहगार हैं, दलाल गुनाहगार हैं, लौज मालिक गुनाहगार हैं, लेकिन इन सब के साथ ही साथ उस लड़की के मांबाप और परिवार के समझदार सदस्य भी बराबर के गुनाहगार हैं, जो उन्हें इस दलदल में धकेलते हैं.

इस पूरे मामले में धर्म को ढाल बना कर गुमराह किया जाता रहा है, लेकिन यह धर्म का मामला नहीं, बल्कि समाज का मामला है और समाज में इस तरह के काम को किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता.

ऐसे मामलों में धर्म के रहनुमाओं को आगे आ कर ढोंगियों को बेनकाब करना चाहिए और समाज के गरीब तबके की आबादी में जा कर ऐसे लोगों को जागरूक करना जरूरी है, जिस से कि भविष्य में उन्हें इस तरह की बुराई से बचाया जा सके.

जर्जर रेल और मोदी के बुलेट ट्रेन के सपने

‘लोन लो और घी पियो’, यह कहावत केवल जनता के लिए नहीं है, सरकार के लिए भी है. जापान के सस्ते लोन के चक्कर में भारत अपनी प्राथमिकताओं को भूल कर बुलेट ट्रेन चलाने में लग गया है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों के प्रभाव को देखते हुए लगता है कि झूठी शान के चक्कर में केंद्र सरकार ने बुलेट ट्रेन चलाने का फैसला ले लिया है. जापान जैसा बिजनैस समझदारी रखने वाला देश अपना नुकसान क्यों करेगा?

बुलेट ट्रेन चलाने की जल्दी में केंद्र सरकार ने प्रोजैक्ट की डिटेल्ड प्रोजैक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर के आने का इंतजार तक नहीं किया. जल्दबाजीभरे ऐसे फैसले देश के भविष्य पर असर डाल सकते हैं. जापान में मैग्नेटिक लेविटेशन से चलने वाली हाईस्पीड ट्रेन का युग आने वाला है. जिस समय भारत में 250 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड से ट्रेन चलेगी उस समय जापान 600 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलने वाली ट्रेन नई प्रणाली से चला रहा होगा, जिस में शोर काफी कम होगा.

जिस देश में रेल दुर्घटना में मरने वालों के बारे में उन का ऐसा भाग्य होना कहा व माना जाता हो वहां जर्जर रेल व्यवस्था की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है. रेल दुर्घटना का दर्द मुआवजा बंटने तक याद रहता है. इस के बाद नई दुर्घटना होने का इंतजार किया जाने लगता है.

देश में रेल की सब से अधिक जरूरत पैसेंजर रेलगाडि़यों की  है. और यह किसी सरकार के एजेंडे में नहीं होती. याद नहीं आता कि कभी किसी सरकार ने नई पैसेंजर ट्रेन शुरू की हो और उस का जोरशोर से प्रचार किया हो.  पैसेंजर ट्रेनों पर चलने वाले यात्रियों की ही तरह ऐक्सप्रैस ट्रेनों में लगने वाले जनरल कोच की तरफ रेलवे प्रशासन और सरकार का ध्यान नहीं जाता.

जनरल कोच यानी सामान्य डब्बे में यात्रा करना नरक का सफर करने जैसा होता है. जिन के पास पैसा अधिक है वे पूजापाठ के सहारे स्वर्ग का रास्ता पकड़ लेते हैं यानी सुविधाजनक डब्बों और ट्रेनों में सफर कर लेते हैं. जिन के पास गाय के दान जैसे उपाय करने की सामर्थ्य नहीं है वे नरक के सफर जैसे जनरल डब्बे में यात्रा करने को मजबूर होते हैं.

चढ़ावे की धार्मिक संस्कृति को बढ़ावा देने वालों की ही तरह सरकार भी ज्यादा पैसे ले कर सफर करने वालों के लिए सुविधा खोजती है. उन के लिए ही बुलेट टे्रन, शताब्दी ट्रेन और राजधानी ऐक्सप्रैस हैं. देश के बाकी यात्रीजर्जर रेल के हवाले हैं. पुजारी की तरह सरकार भी चढ़ावे के वजन को देख कर ही सुविधाओं का इंतजाम करती है.

मुफ्त में बुलेट ट्रेन

भारत और जापान के बीच हुए समझौते के बाद अब बुलेट ट्रेन की सवारी करने का सपना हर भारतीय देखने लगा है. सरकार 2022 में मुंबई से अहमदाबाद तक बुलेट ट्रेन चलाना शुरू कर देने का दावा व वादा कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में, ‘‘बुलेट ट्रेन का यह सफर महंगा नहीं, बल्कि मुफ्त है.’’ यह एक तरह का लौलीपौप है. प्रधानमंत्री ने 2019 के लोकसभा चुनावों के प्रचार यह लौलीपौप दिया था. बुलेट ट्रेन की परियोजना पर 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च होगा. इस का 80 फीसदी जापान देगा और 20 फीसदी खर्च भारत करेगा.

प्रधानमंत्री ने देश की जनता को बताया कि जापान ने भारत को मुफ्त में बैंकलोन दिया है. जापान ने भारत को 88 हजार करोड़ रुपया महज 0.1 प्रतिशत के ब्याज पर दिया है. इस को 50 वर्षों में चुकाना है. ऐसे में यह पूरी तरह से मुफ्त मिला है. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि बुलेट ट्रेन से केवल अमीरों को लाभ मिलेगा, यह धारणा गलत है.

इस प्रोजैक्ट का लाभ पूरे देश के रेल नैटवर्क को होगा. बुलेट ट्रेन के चलने से गरीब जनता को क्या लाभ मिलेगा, यह सरकार बताने को तैयार नहीं है. वह यह नहीं कह रही कि बुलेट ट्रेन के सफर से होने वाले लाभ से पैसेंजर ट्रेनों की हालत सुधारी जाएगी. आज देश को बडे़ पैमाने पर इस की जरूरत है कि आम लोगों के सफर को सुविधाजनक व सुरक्षित बनाया जाए.

प्रधानमंत्री ने बुलेट ट्रेन के भावी सफर से देश को तरक्की का फिर से सुनहरा सपना दिखाने का प्रयास किया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि बुलेट ट्रेन से देश की घटती आर्थिक विकास दर बढ़ेगी, हाईस्पीड रेल प्रोजैक्ट्स से विकास में तेजी आएगी. प्रधानमंत्री ने अमेरिका और जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में रेल आने और जापान में हाईस्पीड रेल आने से प्रगति का दौर शुरू हुआ. भारत में भी नैक्सट जैनरेशन ग्रोथ वहीं होगी जहां पर हाई स्पीड कौरिडोर होंगे. मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन से 500 किलोमीटर दूर बसे शहरों के लोग करीब आ जाएंगे. यह सफर 2 से 3 घंटे के बीच तय होगा. इस से लोगों का समय बचेगा, उन को सफर में कम खर्च करना होगा. इन शहरों के बीच का एरिया सिंगल इकोनौमिक जोन में बदल जाएगा. इस से हर तरह के बिजनैस को बढ़ावा भी मिलेगा.

प्रधानमंत्री ने भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर 15 अगस्त, 2022 को बुलेट ट्रेन के सफर को शुरू करने का लक्ष्य रखा है. 2022 में बुलेट ट्रेन में सफर करने का सपना देख रहे लोगों को यह पता नहीं है कि इस प्रोजैक्ट की डीपीआर अभी बनी नहीं है. यह रिपोर्ट 2018 तक पूरी तरह तैयार करने की बात हो रही है. बुलेट ट्रेन चलाने के लिए पैसा और टैक्नोलौजी जापान देगा. 88 हजार करोड़ रुपए के कर्ज के बदले भारत को केवल 90 हजार 500 करोड़ रुपए ब्याज सहित चुकाने होंगे. यह कर्ज बुलेट ट्रेन चलने के 15 वर्षों के बाद देना शुरू करना होगा.

देश की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद के बीच की 508 किलोमीटर की दूरी केवल 2 घंटे में तय करेगी. इस लाइन पर 12 स्टेशन बनाए जाएंगे. रेलवे ट्रैक का 7 किलोमीटर हिस्सा समुद्र से हो कर जाएगा. बाकी रास्ता एलिवेटेड होगा. इस का खाका जापान इंटरनैशनल कौर्पाेरेशन ने बनाया है.

ट्रेन केवल 4 स्टेशनों पर रुकेगी.  मुंबई से अहमदाबाद के बीच दूसरे स्टेशन बांद्रा, कुर्ला कौंप्लैक्स, थाणे, विरार बोईसर, वापी बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वड़ोदरा, आणंद, अहमदाबाद और साबरमती होंगे. मुंबई स्टेशन अंडरग्राउंड होगा. बाकी स्टेशन एलिवेटेड होंगे. यह पूरा रूट डबल लाइन का होगा. यह रूट महाराष्ट्र, गुजरात और दादरा नगर हवेली से हो कर गुजरेगा. महाराष्ट्र में 156 किलोमीटर, गुजरात में 351 किलोमीटर और दादरा नगर हवेली में 2 किलोमीटर होगा.

ट्रेन की अधिकतम स्पीड 350 किलोमीटर प्रतिघंटे होगी. ट्रेन सभी 12 स्टेशनों पर रुकेगी तो 3 घंटे का समय लगेगा. अगर 4 स्टेशनों पर ट्रेन रुकेगी तो 2 घंटे का समय लगेगा. जापान भारत को टैक्नोलौजी ट्रांसफर करेगा. इस प्रोजैक्ट के तहत जरूरी सामान भारत में बनाने के लिए उद्योग को बढ़ावा दिया जाएगा.  इस के संचालन के लिए 4 कौर्पोरेशन बनाए जाएंगे. ये चारों ट्रैक, सिविल रोलिंग, स्टौक इलैक्ट्रिकल और सांइस ऐंड टैक्नोलौजी संभालेंगे. जापान बुलेट ट्रेन के संचालन में सब से भरोसेमंद देश है. जापानबुलेट ट्रेन चलाने की ट्रेनिंग भी देगा. बुलेट ट्रेन प्रोजैक्ट के लिए वड़ोदरा में हाईस्पीड रेल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट स्थापित किया जाएगा. इस में 4 हजार लोगों को ट्रेनिंग दी जाएगी.

मजबूत होगा राजनीतिक सफर

भारत में ट्रेन का प्रयोग सफर करने के अलावा राजनीति में भी होता है. यही वजह है कि ट्रेन की उपयोगिता से अधिक इस बात का ध्यान रखा जाता है कि इस से क्या राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है.

मैट्रो ट्रेन से ले कर बुलेट ट्रेन तक इस का जरिया बनती रहती हैं. नेता अपने राजनीतिक सफर को ट्रेन की लोकलुभावनी घोषणाओं से पूरा करना चाहते हैं.  सस्ता और मुफ्त का लौलीपौप दे कर नरेंद्र मोदी ने 2014 का लोकसभा चुनाव जीता था. महंगाई रोकने, रोजगार बढ़ाने और कालेधन से हर किसी के खाते में 15 लाख रुपया जमा होने जैसे वादे चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी और उन की भाजपा ने किया था.

3 साल सरकार चलाने के दौरान जनता के किसी वादे पर केंद्र की मोदी सरकार खरी नहीं उतरी है. बड़े जोरशोर और वादों के साथ केंद्र सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया था. परेशान जनता से कहा गया कि 50 दिन कष्टकारी हैं, इस के बाद हर कष्ट कट जाएगा.

50 दिनों का कष्ट सहने के बाद भी सरकार यह बताने की हालत में नहीं है कि नोटबंदी का क्या लाभ हुआ? नोटबंदी के बाद अब जनता को यह पता चल रहा है कि देश की जीडीपी में 2 प्रतिशत की गिरावट आई है. नोटबंदी और बाद में उलझावभरे जीएसटी बिल ने कारोबार को बुरी तरह से प्रभावित किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब मुफ्त बुलेट ट्रेन का सपना दिखा रहे है.

प्रधानमंत्री इस बात को समझ चुके हैं कि यह देश मुफ्त के नाम पर हमेशा झांसे में फंस जाता है. ऐसे में वे अब मुफ्त में बुलेट ट्रेन का सपना बेचने की कोशिश में है. इस के जरिए वे गुजरात के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव को ठीक करना चाहते हैं.

3 नहीं, 60 साल का चाहिए हिसाब  

मोदी सरकार अपने से पहली सरकार से उस के 60 साल का हिसाब मांग रही है पर अपने 3 साल का हिसाब देने को तैयार नहीं है. आमतौर पर सरकार जनता में गरीब और कमजोर वर्ग के लिए काम करती है. मोदी सरकार के बुलेट ट्रेन चलाने से गरीब जनता का क्या भला होगा, समझ नहीं आता.

यह बात ठीक  है कि जापान बुलेट ट्रेन चलाने के लिए सस्ती ब्याजदर पर लोन दे रहा है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जब गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद में देश की पहली बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखी तो उस को ले कर पूरे देश में अलगअलग तरह के विचार सामने आने लगे.

आज के दौर में सब से ताकतवर सोशल मीडिया में भी इस को अलग तरह से देखा गया. एक मजाकिया मैसेज में कहा गया, ‘जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को अभी तक नहीं पता कि उन का इस्तेमाल बुलेट ट्रेन के लिए नहीं, गुजरात चुनाव के लिए हो रहा है.’ इस मजाकिया मैसेज के भीतर भारतीय व्यवस्था का सच छिपा हुआ है. भारत में रेल को चुनावप्रचार का सब से बड़ा माध्यम माना जाता है. रेल मंत्री के इलाके के लिए सब से अधिक ट्रेन की सुविधा पहुंचाने का प्रयास होता रहा है. कुछ ट्रेनों को उन स्टेशनों पर रोकने के लिए बाद में आदेश हुए जहां के नेता या सांसद रेल मंत्रालय में पावरफुल होते थे. अंगरेजों

ने भारत में रेलमार्ग की शुरुआत की थी, उन का मकसद अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना था. बाद में इस को जनता की सुविधाओं के हिसाब से आगे बढ़ाया गया. पैसेंजर ट्रेन की कल्पना इस की मिसाल है.

पुनर्जन्म का गणित

2014 के लोकसभा चुनावों में रेल की सुरक्षित यात्रा को ले कर बडे़बडे़ दावे किए गए. भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावप्रचार में इस बात का वादा किया कि ट्रेन की सुरक्षित यात्रा उस का सब से बड़ा संकल्प है. ट्रेन की सुरक्षित यात्रा के लिए जरूरी पैसे के इंतजाम के लिए प्लेटफौर्म टिकट से ले कर यात्री टिकट, रेलभाड़ा तो बढ़ाया ही गया, कई ऐसे छिपे उपाय भी किए गए जिन का बोझ यात्री को उठाना पड़ा. जैसे, पहले प्लेटफौर्म टिकट का समय अधिक था और दाम कम था. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्लेटफौर्म टिकट के दाम बढे़ और समय घट गया.

वेटिंग टिकट को ले कर भी ऐसे बदलाव किए गए जिन का बोझ यात्रियों की जेब पर पड़ा. रेलवे अपने सुरक्षा फंड को बढ़ाने के लिए कई तरह के प्रयोग कर रहा है. इस के बाद भी रेल दुर्घटनाओं में कमी नहीं हो पा रही है. सालदरसाल रेल दुर्घटनाओं में इजाफा होता जा रहा है. रेलवे में होने वाली दुर्घटनाओं में विभाग की लापरवाही के साथ सरकारी योजना की नाकामी साफ दिखने लगी है.

रेल दुर्घटनाओं पर कुछ दिनों तक बहुत सारा गुस्सा और क्षोभ व्यक्त होता है. मुआवजे का बंटवारा होतेहोते इस बात को लोग भूल जाते हैं. यात्री की मौत को उस के कर्मों का फल मान कर लोग चुप हो जाते हैं. मरने वाले की तथाकथित आत्मा की शांति के लिए तरहतरह के आयोजन किए जाते हैं. मरने के बाद स्वर्ग में जगह मिले, वहां कोई कष्ट न हो और पुनर्जन्म अच्छा हो, इस के लिए पिंडदान, तेरहवीं जैसे आयोजन हो जाते हैं. यात्री और बाकी लोग मरने वाले की तेरहवीं तक भी घटना को याद नहीं रखते हैं. सरकार को यह पता है कि देश में मरने वाले को दुघर्टना से नहीं, पूर्वजन्म के किए गए पापों से जोड़ा जाता है. यही वजह है कि रेलवे दुर्घटना में रेल विभाग और सरकार की जिम्मेदारी तय नहीं होती. मरने वाले के भाग्य में ही मरना लिखा था, ऐसा मान लिया जाता है.

जर्जर रेल व्यवस्था

यातायात की व्यवस्था में भारतीय ट्रेन का दुनिया में सब से बड़ा स्थान है. भारत दुनिया का ऐसा सब से बड़ा देश है जहां का प्राकृतिक  और आर्थिक दोनों की तरह के हालात ट्रेन व्यवस्था के लिए सब से अधिक अनुकूल हैं. यही वजह है कि भारत ट्रेन यातायात और परिवहन दोनों के लिए सब से अधिक सुविधाजनक है. यहां अलगअलग जरूरतों के हिसाब से ट्रेनों को तैयार किया गया था. इनको पैसेंजर ट्रेन, ऐक्सप्रैस ट्रेन और मालगाडि़यों की श्रेणी में रखा जाता है. आज के दौर में ट्रेनों को पैसेंजर की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि राजनीतिक जरूरत के हिसाब से चलाया जाता है. जिस नेता के जिम्मे ट्रेन मंत्रालय होता है, उस के चुनाव क्षेत्र के लिए अलग जरूरत बन जाती है.

आज भारत में ट्रेन का विशाल नैटवर्क है. करीब 1 लाख 15 हजार किलोमीटर लंबे रेलमार्ग पर साढे़ 7 हजार से अधिक रेलवेस्टेशन बने हुए हैं. अलगअलग जरूरतों और हालात

के हिसाब से रेलमार्ग की चौड़ाई अलगअलग है.  भारत में 3 तरह के गेज वाली पटरियां हैं. इन में चौड़ी गेज यानी बड़ी लाइन, मीटर गेज यानी छोटी लाइन और पतली गेज बहुत छोटी संकरी जगहों के लिए बनी हैं, जिस में पहाड़ी इलाके आते हैं. अब रेलवे अपनी ट्रेन संचालन व्यवस्था को सही करने के लिए एकजैसी गेज की लाइनें तैयार करने के काम में लगा है. अभी चालू पटरियों के आधे हिस्से को ही विद्युतीकरण में बदला जा सका है. हाल के कुछ वर्षों में केवल वाहवाही के नाम पर रेल को ले कर लोकलुभावनी घोषणाएं की गई हैं. रेल के क्षेत्र में जरूरत के हिसाब से काम नहीं किए जा रहे.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतौली स्टेशन पर उत्कल ऐक्सप्रैस ट्रेन पटरी से उतर गई. घटना का जो कारण सामने आया उस से पता चला कि उस जगह की पटरी टूटी हुई थी. टूटी हुई पटरी को सही करने के लिए लोहे को काट कर रख दिया गया था पर उस को वैल्ंिडग मशीन से जोड़ा नहीं गया था. उत्कल ऐक्सप्रैस हादसे के साथ 5 वर्षों में करीब 586 रेल हादसे हो चुके हैं. इन में से आधे हादसे ट्रेन के पटरी से उतरने के चलते हुए. नवंबर 2014 से अगस्त 2017 तक 20 रेल हादसे हुए हैं.

सुधार की पहल नहीं

रेल हादसों के बाद रेलवे अपनी कमी को परखने और उस को सुधारने का दावा करता है. इस के लिए समिति का गठन किया जाता है. 2012 में रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल के सुरक्षा मानकों की जांच और सुधार का सुझाव देने के लिए अनिल काकोदकर समिति का गठन किया.

समिति ने रेल सुरक्षा प्राधिकरण के निर्माण सहित 106 सुझाव दिए. इन में से 68 सुझाव रेल मंत्रालय ने माने और 19 सुझाव पूरी तरह से खारिज कर दिए. रेलवे ने सुझाव मान तो लिए पर उन पर अमल नहीं किया. समिति ने कहा था कि 2017 तक सभी लैवल क्रौसिंग को खत्म किया जाए. इस पर 50 हजार करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान था. 20 हजार करोड़ रुपए सुरक्षा संबंधी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने का सुझाव दिया गया था.

समिति ने अपनी टैक्निकल जांच में यह पाया था कि अगर रेल का सिग्नल सिस्टम एडवांस हो जाए तो बहुत सारी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. इस के लिए 20 हजार करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान लगाया गया था.  यह सिस्टम 19 हजार किलोमीटर लंबे ट्रैक पर लगना था. 10 हजार करोड़ रुपए सफर के लिए तैयार किए जाने वाले सुरक्षित एलएचबी कोच को तैयार करने पर लगाने की सिफारिश की गई थी. ज्यादातर ट्रेनों में अभी भी पुरानी तरह से बने कोच ही लगाए जाते हैं. उत्कल ऐक्सप्रैस में पुरानी तरह से बने आईसीएफ डब्बे लगे थे. इस में बोगी के ऊपर डब्बा रखा होता है. ऐसे में जब ट्रेन पटरी से उतरती है तो ये डब्बे बोगी से पूरी तरह से अलग हो जाते हैं. इन में डब्बे के पहियों समेत निचला हिस्सा अलग हो जाता है. इस से डब्बे के पलटने का खतरा रहता है. अनिल काकोदकर समिति ने इन डब्बों को बदलने का सुझाव दिया था.

सुरक्षा का ध्यान नहीं

रेलवे के पास सुरक्षा उपकरणों की भारी कमी है. रेल पटरियों के आसपास अवैध कब्जे हैं, जिन से भी पटरियों की सुरक्षा को बड़ा खतरा होता है. सामान्यतौर पर पटरियों को काटने की तमाम घटनाएं होती रहती हैं. इन की वजह से ट्रेन के पटरी से उतरने का खतरा बढ़ जाता है. इस से जानमाल का भारी नुकसान होता है. रेलवे में पटरी की खराबी का पता चलने या सिग्नल के फेल होने की सूचना ट्रेन के ड्राइवर तक देना बहुत मुश्किल काम होता है.

ऐसे में अगर रेलवे को अत्याधुनिक बनाया जाए तो हादसे कम हो सकते हैं. कई बार एक ही लाइन पर 2 ट्रेनों के आ जाने से भी बडे़ हादसे हो जाते हैं. अगर रेलवे के ट्रेन सिस्टम को ठीक कर लिया जाए तो दुर्घटनाएं कम हो सकती हैं.

रेलवे पुलों को ठीक करना, लैवल क्रौसिंग को पूरी तरह से खत्म करना और ट्रेन प्रोटैक्शन स्टाफ को बेहतर ट्रेनिंग देना भी बहुत जरूरी हो गया है. 20 नवंबर, 2016 को इंदौर-पटना ऐक्सप्रैस कानपुर के पास पटरी से उतर गई थी. यह सब से भीषण ट्रेन दुर्घटना थी. इस में 150 से अधिक लोग मारे गए और इतने ही लोग घायल हुए थे.

दुर्घटना का कारण रेल की पटरी में दरार का होना था. अगर इस तरह की कमी का पता समय से चल जाए तो हादसे रोके जा सकते हैं. परेशानी की बात यह है कि ट्रेन के हादसों के बाद कुछ रेलवे अफसरों और कर्मचारियों को सजा के तौर पर इधर से उधर कर दिया जाता है. कुछ दिनों के बाद हादसों को भूल कर लापरवाही भरा काम शुरू हो जाता है. अगर कानपुर के हादसे से सबक लिया गया होता तो उत्कल ऐक्सप्रैस ट्रेन का हादसा नहीं होता. दोनों ही मामलों में रेल की पटरी की खराबी के कारण हादसे हुए थे. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए.

सही किया जाए बुनियादी ढांचा

रेलवे के जानकारों का कहना है कि हर तरह के सुधार के लिए जरूरी है कि रेलवे का बुनियादी ढांचा सही किया जाए. ट्रेन के पटरी से उतरने के कई कारण होते हैं. कई बार पटरी पर सामने की ओर से कोई अवरोध होने से ट्रेन पटरी से उतर जाती है. कई बार ऐसा होता है कि कोई मवेशी या बड़ा जानवर पटरी पर आ जाता है जिस के कारण ट्रेन पटरी से उतर जाती है. इंजन का कोई हिस्सा या पार्ट अगर गिर जाए और उस पर ट्रेन चढ़ जाए तो इस हालत में भी ट्रेन पटरी से उतर जाती है.

सब से अधिक बार पटरी के टूटे होने से ट्रेन पटरी से उतरती है. कई बार यह होता है कि इंजन के निकल जाने के बाद पटरी के बीच का गैप बढ़ जाता है तब उस के पीछे के डब्बे पटरी से उतर जाते हैं. कई इलाकों में शरारती तत्त्वों द्वारा पटरी की तोड़फोड़ की जाती है और समय रहते स्टेशन को इस की सूचना नहीं मिलती, जिस के कारण भी ट्रेन पटरी से उतर जाती है.

रेलवे विभाग के जानकार लोगों का कहना है कि बुलेट ट्रेन के लिए पटरी बिछाने का काम बेहद खर्चीला है. ऐसे में अगर पहले से चल रही पटरियों को ठीक किया जाता तो जनता को ज्यादा राहत मिलती. बुलेट ट्रेन से कुछ लोगों को ही सुविधा मिल सकती है. अगर पहले से चल रही ट्रेनों की स्पीड को बढ़ाया जाता, ट्रेनों में होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जाता और नई पटरियों को बनाया जाता तो यह जनता के लिए ज्यादा फायदेमंद होता और जो जरूरी भी है. हमारे देश में रेल से सफर करने वालों के लिए ट्रेन से सस्ता और सुलभ कोई दूसरा रास्ता नहीं है. बस के मुकाबले ट्रेन का सफर कहीं अधिक सस्ता पड़ता है. जरूरत इस बात की है कि ट्रेन की स्पीड बढ़ा दी जाए और समय पर रेलगाडि़यां चलने लगें.

अभी भारत में जो रेल पटरियां हैं उन की सुरक्षा पर रेलवे पूरी तरह से सफल नहीं है. भारतीय रेलवे के पास बुनियादी ढांचे को सही करने के लिए फंड हो, इस का प्रयास हो. रेलवे के पास सुविधा न होने के कारण माल की ढुलाई के लिए लोग दूसरे साधनों पर निर्भर होने लगे हैं जिस से रेल को नुकसान हो रहा है. इसी तरह से रेल के समय पर न चलने से लोग हवाईयात्रा को अधिक उपयोगी समझने लगे हैं. सुविधाजनक बससेवा ने भी रेल के लाभ को कम कर दिया है. रेल के सफर को सुविधाजनक मानने के बाद भी लोग आज दूसरे साधनों की ओर रुख करने लगे हैं.

बुलेट ट्रेन बनाम हाईस्पीड ट्रेन

बुलेट ट्रेन कई देशों में सफेद हाथी बन चुकी है. भारत में बुलेट ट्रेन एक सफल प्रयास होगा, इस में कई तरह के संशय हैं. जापान ने भारत को जो लोन दिया है वह देखने में अभी सस्ता लग रहा है पर इस में कई ऐसे पेंच होंगे जिन का लाभ भारत से अधिक जापान को होगा. एक बड़ी योजना के चक्कर में भारत बडे़ लोन के जाल में फंस रहा है. जापान बहुत चतुर देश है. वह अपने नुकसान का कोई काम नहीं करेगा. यह साफ है कि भारत कम ब्याज के चक्कर में बड़ी महत्त्वाकांक्षी योजना के जाल में उलझ गया है. यह लोन इतना सरल नहीं है जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मान रहे हैं. रेल के जानकार लोगों का मानना है कि भारत में राजधानी ऐक्सप्रैस 130 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलती है. इस को सुधार कर के अगर 200 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार तक ले जाएं तो बुलेट ट्रेन की जरूरत खत्म हो जाएगी. साथ ही, रेल का ज्यादा विकास हो सकेगा.

भारत के बड़े शहरों के बीच हवाई सफर का रास्ता पहले से खुला हुआ है. इस को और सुगम बनाया जा सकता है. मुंबई और अहमदाबाद के बीच हवाईयात्रा का विकल्प पहले से खुला है. जिस से 70 मिनट में इस सफर को तय किया जा सकता है. बुलेट ट्रेन के टिकट और हवाई जहाज के टिकट में कोई खास अंतर नहीं होगा.

जानकार लोगों का कहना है कि जापान ने अपनी कंपनी के सर्वे और अनुमान के आधार पर भारत के सामने ऐसे आंकडे़ रखे हैं जिन से भारत को बुलेट ट्रेन, विकास का मार्ग लगने लगी है. जापान ने भारत के रेल विभाग के कुछ अधिकारियों को अपने आंकड़ों के शीशे में उतार लिया है. ये अफसर बुलेट ट्रेन की योजना को देश के लिए एक अवसर मानने लगे हैं. ऐसे अफसर कहते हैं कि अगर इस योजना पर अभी काम नहीं किया गया तो देश तरक्की की राह में पीछे रह जाएगा. ऐसे अफसर तर्क देते हैं कि अगर हाईस्पीड ट्रैक सही तरह से काम करने लगे तो हमारे देश कीतरक्की के लिए संसाधन खुद जुटने लगेंगे.

सबसे आगे जापान

बुलेट ट्रेन के संचालन में जापान सब से आगे है. जिस समय भारत 200 किलोमीटर या इस के आसपास की स्पीड वाली बुलेट ट्रेन का सफर शुरू कर रहा होगा उस समय जापान 600 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलने वाली ट्रेन शुरू कर रहा होगा. जापान में इस का ट्रायल 15 अप्रैल, 2015 को हो गया है. 2027 तक इस को चलाने की योजना है. यह आधुनिक चुंबकीय प्रणाली मैग्नेटिक लेविटेशन से चलेगी. इस में बिजली से चार्ज किए गए चुंबक ट्रेन को पटरी से 4 इंच ऊपर रखेंगे. इस से शोर कम और स्पीड अधिक मिलती है. बुलेट ट्रेन के संचालन में जापान के बाद चीन का नंबर आता है. चीन में विश्व की सब से तेज स्पीड से चलने वाली ट्रेन है. यह 431 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलती है. चीन में 22 हजार किलोमीटर लंबा रूट इस के लिए बना है. इटली और स्पेन दूसरे प्रमुख देश हैं जहां पर हाईस्पीड ट्रेनें चलती हैं.

केज कल्चर से आई मछलीपालन में क्रांति

केज कल्चर में पिंजरे की तरह दिखने वाले जाल का इस्तेमाल मछलीपालन में किया जाता है. कई देशों में काफी समय पहले से ही जलाशयों, नदियों और समुद्र में केज लगा कर मछलीपालन किया जाता है. आमतौर पर जीआई पाइप से केज के फ्रेम को बनाया जाता है. इस के जरीए कम क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा मछली की पैदावार की जा सकती है. मछलियां केज के भीतर ही पलती और बढ़ती हैं और उस में उन्हें आसानी से भरपूर भोजन दिया जा सकता है. कम बारिश वाले इलाकों के लिए तो केज कल्चर काफी मुफीद माना जा रहा है. जलाशयों में जिस जगह केज को लगाया जाता है, वहां कम से कम 5 मीटर गहरा पानी होना जरूरी है. मछलीपालन की दिशा में केज कल्चर ने काफी लंबी छलांग लगाई है. इस से जहां देश के कई राज्यों में मछली की कमी को पूरा किया जा सकेगा, वहीं कई बेरोजगारों को रोजगार भी मिल सकेगा.

सब से बड़ी बात यह है कि इस से सभी राज्य मछलीपालन के अपने सालाना लक्ष्य को आसानी से पूरा कर सकेंगे. झारखंड जैसे पहाड़ी राज्य में भी केज कल्चर का काफी बेहतर नतीजा सामने आया है.

हैरत की बात यह है कि देश में झारखंड ही पहला राज्य है, जहां मछलीपालन में केज कल्चर की शुरुआत की गई. कम बारिश वाले इलाकों और पहाड़ी इलाकों में केज कल्चर के जरीए मछलीपालन कर के मछली उत्पादन में काफी ज्यादा तरक्की की जा सकती है.

यह केज कल्चर (जलाशयों में लोहे का पिंजरानुमा जाल लगा कर मछली संवर्धन) के इस्तेमाल का ही नतीजा है कि 5 सालों के दौरान राज्य में मछली उत्पादन का लक्ष्य तकरीबन पूरा होने लगा है.

रांची के मछलीपालक दीनदयाल के मुताबिक इस से पहले कभी भी मछली उत्पादन का सरकारी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता था, पर केज कल्चर के अपनाने के बाद लक्ष्य से ज्यादा पैदावार होने लगी है. जलाशयों में ज्यादा से ज्यादा केज लगा कर मछली उत्पादन को कई गुना ज्यादा बढ़ाया जा सकता है. वहां के हटिया जलाशय, चांडिल डैम, तेनुघाट जलाशय में करीब 350 केज लगाए जा चुके हैं.

देश में नेशनल मिशन फौर प्रोटीन सप्लीमेंट (एनएमपीएस) के तहत झारखंड में केज कल्चर की शुरुआत की गई. झारखंड में इसे कामयाबी मिलने के बाद बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, ओडिशा व तमिलनाडु में भी केज कल्चर की शुरुआत की जा चुकी है.

बिहार के मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार सिंह के मुताबिक केज एक तरह का पिंजरे की शक्ल का जाल होत है, जिस के भीतर मछलीपालन करने से केवल 120 दिनों में ही मछलियों का औसत वजन 400 ग्राम तक हो जाता है.

खुले तालाब में इतने समय में मछलियों का औसत वजन 200 से 300 ग्राम के बीच ही होता है. जलाशय में केज लगा कर प्रति केज 5 टन मछलियों का उत्पादन किया जा सकता है.

1 केज को बनाने में करीब 80 हजार रुपए की लागत आती है और 5 टन मछली उत्पादन में करीब डेढ़ लाख रुपए का खर्च बैठता है. केज में मछलीपालन करने से मछलियां इधरउधर भटक नहीं पाती हैं और न ही बड़ी मछलियों का शिकार बन पाती हैं. इस का सब से बड़ा फायदा यह है कि मछलियों को चोरीछिपे जाल या बंशी लगा कर निकाला नहीं जा सकता है, जिस से मछलीपालक को भरपूर फयदा मिल जाता है.

यह राजनीति छोड़ कुछ करने का समय है

दो साल पहले की बात है, जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार, एमसीडी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को निर्देश दिया था कि वे देर शाम से सुबह तक दिल्ली की सीमा पर बाहर से आने वाले व्यावसायिक वाहनों की जांच करें और पता लगाएं कि प्रदूषण, वजन और फिटनेस के स्तर पर ये वाहन दिल्ली को कितना प्रदूषित करते हैं? एनजीटी ने यह भी बताया था कि विश्वसनीयता के लिए चेकिंग के वक्त किस स्तर के अधिकारियों को मौजूद रहना चाहिए. उस जांच का क्या हुआ? क्या रिपोर्ट आई? क्या कदम उठाए गए? बहस का मुद्दा यह नहीं है.

मुद्दा यह है कि आखिर एनजीटी को इतनी बारीकी में जाकर उन संस्थाओं को निर्देश क्यों देना पड़ा, जिन पर इस सब की अंतिम जिम्मेदारी थी? यह सब उन शुरुआती रिपोर्टो के बाद हुआ था, जिनमें दिल्ली की आबोहवा तेजी से खराब होने की बात थी और चेताया गया था कि समय रहते इंतजाम न हुए, तो नतीजे भयावह होंगे. आज के हालात को देखकर लगता है कि दिल्ली उस अपेक्षाकृत कम गंभीर अलार्म पर कुछ भी चेती होती, तो हालात इतने बदतर न होते. थोड़ा कुछ भी हुआ होता, तो शायद हर अक्तूबर-नवंबर में पहले स्मॉग का इंतजार और फिर इस पर हाय-तौबा की नौबत नहीं आती.

सच यही है कि हमने कुछ नहीं किया. बस साल-दर-साल स्मॉग देखने के बाद बैठकें होती रहीं. एनजीटी दिल्ली के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, यूपी, राजस्थान को भी लताड़ लगाती रही. दिल्ली सरकार से प्रदूषण या स्मॉग के आंकड़े मांगती रही और पूछती रही कि उसके पास अपने इंतजामों से स्मॉग कम करने के कौन से तथ्य मौजूद हैं? बहुत कुछ पूछा और बताया गया, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो नतीजा दिखाता.

अब जब दिल्ली और उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा एक बार फिर इस जहरीली धुंध को झेल रहा है, तो फटकार और जवाबदेही का कोरस भी फिर से गूंज रहा है. कभी इसके स्वर तेज होते हैं, तो कभी मद्धिम, लेकिन हकीकत यही है कि जनता आकाश में छाई इस काली चादर से परेशान है. नतीजा मंगलवार को एनजीटी ने एक बार फिर सरकार को लताड़ा है. पूछा है कि आखिर उसे यह कैसे महसूस कराया जाए कि हालात हेल्थ इमरजेंसी के हैं और यह कि इसके लिए वह क्या कर रही है? इस बात से असहमत होने का कोई कारण नहीं कि संकट से निपटने के मानकों में छूट की बात ही नहीं आनी चाहिए.

एनजीटी की इस चिंता से कोई कैसे असहमत हो सकता है कि ‘आप बच्चों को बीमार फेफड़ों का उपहार कैसे और क्यों दे रहे हैं?’ सच तो यही है कि हालात को देखते हुए सरकार को किसी एनजीटी का मुंह देखने की जरूरत ही नहीं थी. हालात पिछले वर्षो से ज्यादा गंभीर हैं. शिथिलता का आलम उससे भी ज्यादा गंभीर. यह सब उस प्रवृत्ति का नतीजा है, जो हमें छोटी सी मुश्किल को भयावह रूप लेने तक इंतजार करना सिखाती है. दिल्ली सरकार ने नियमों में शिथिलता का अपना आवेदन अब भले ही वापस ले लिया हो, लेकिन बेहतर होता कि वह छूट देने के तर्क की बजाय अतिरिक्त संसाधनों की बात करती. अब भी बहुत कुछ हो सकता है. टाल-मटोल और दूसरों पर जिम्मेदारी फेंकना बहुत हो चुका. अब समस्या की जटिलता को महसूस करने का समय है.

एनजीटी की नाराजगी के सकारात्मक स्वर को पहचानने की जरूरत है. ऐसा न हो कि अभी तो हम इस पर बात भी कर रहे हैं, कल शायद हम इस लायक ही न बचें. क्या जरूरी नहीं कि हम अभी से ऐसे कदम उठाने शुरू करें कि अब तक जो हुआ सो हुआ, कम से कम आने वाले समय में तो इस संकट से मुक्ति की नई राह बना सकें?

पूनम पांडे के तीन नए हौट वीडियो आपने देखे

बॉलीवुड एक्ट्रेस और मॉडल पूनम पांडे हमेशा ही अपनी तस्वीरों से चर्चा में रहती हैं. अपनी हौटनेस से लोगों का दिल जीतने वाली पूनम इन दिनों अपने दोस्तों के साथ इंजॉय कर रहीं हैं. पूनम पांडे ने बैंकॉक में अपनी फ्रेंड्स के साथ फोटोशूट भी कराया है, जिसमे वह काफी हौट नजर आ रहीं हैं. उन्होंने यह तस्वीरें अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट की हैं.

दरअसल पूनम अपनी अदाओं से फैंस का दिल जीत लेती हैं. किसी भी फेस्टिवल में वे अपने फैंस को निराश नहीं करती और हर बार कोई न कोई वीडियो और तस्वीरें पोस्ट कर अपने फैंस को विश करतीं हैं.

तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि एक्ट्रेस पूनम पांडे ट्रांसपेरेंट टॉप पहने हुए हैं, उनके साथ कुछ फ्रेंड्स भी है. ये तस्वीरें उनके फैंस का तापमान बढ़ा रहीं हैं.

आपको बता दें कि पूनम ने साल 2013 में फिल्म नशा से बॉलीवुड में डेब्यू किया था. पूनम अक्सर ही अपने हौट तस्वीरें इंसटाग्राम पर पोस्ट करतीं रहतीं हैं जहां उनके लाखों फॉलोअर्स हैं.

आपको बता दें कि पिछले दिनों गोविंदा की फिल्म आ गया हीरो में पूनम स्पेशल एपीरिएंस देतीं हुईं नजर आईं थीं. सोशल मीडिया इंस्टाग्राम अकाउंट पर उनके 10 लाख से ज्यादा फोलोअर्स हैं. पूनम पांडे ने बॉलीवुड में अपने दम पर पहचान हासिल की है.

खैर आप देखिए पूनम के ये तीन वीडियो…

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