सरकार परिवार का इस तरह हुआ दुखद अंत

सेना के रिटायर्ड कर्नल डा. सुकांतो सरकार के परिवार के 5 लोग 8 अक्तूबर, 2016 की दोपहर को रांची के कोकर मोहल्ले में अपने रिश्तेदार के फ्लैट पर मृत पाए गए थे. परिवार के मुखिया डा. सुकांतो ने भी खुद को चाकू मारमार कर बुरी तरह घायल कर लिया था. गंभीर हालत में उन्हें रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंस अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन की जान तो बच गई है, पर अब वह तरहतरह के आरोपों और मुकदमों में उलझ कर रह गए हैं. उन का परिवार कुछ दिनों पहले ही उत्तर प्रदेश के नोएडा से रांची आ कर अपने रिश्तेदार डा. एस. चौधरी के फ्लैट में ठहरा था. 8 अक्तूबर को डा. चौधरी किसी काम से बाहर गए थे. काम निपटा कर वह दोपहर को फ्री हुए तो उन्होंने अपने घर फोन किया. जब किसी ने फोन नहीं उठाया तो उन्हें चिंता हुई. घर पहुंचे तो दरवाजा अंदर से बंद था. डुप्लीकेट चाबी से लौक खोल कर वह अंदर पहुंचे तो कमरे का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए.

कमरे में 5 लाशें पड़ी थीं और उन्हीं के बीच डा. सुकांतो लहुलूहान हालत में पड़े थे. उन की सांसें चल रही थीं, इसलिए आननफानन में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कमरे में डा. सुकांतो सरकार की पत्नी अंजना सरकार, बेटे समीर सरकार, पोती समिता सरकार, भतीजे पार्थिव की पत्नी मौमिता सरकार और उन की बेटी सुमिता सरकार की लाशें पड़ी थीं.

कमरे से पुलिस ने एक सुसाइड नोट बरामद किया था, जिसे अंजना, समीर और सुकांतों ने लिखा था.  2-3 लाइनों के उस सुसाइड नोट में सभी ने लिखा था कि प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और संदेहों की वजह से त्रस्त हो कर वे अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं. उन के साथ जो हो रहा था, अब वह उन से सहा नहीं जा रहा था.

सुसाइड नोट के अनुसार, वे मधुमिता से परेशान थे. कई सालों से वह उन्हें परेशान कर रही थी. अब उन में टौर्चर सहन करने की हिम्मत नहीं रह गई, इसलिए अब वे जान दे रहे हैं.

रांची के सिटी एसपी कौशल किशोर के अनुसार, घटनास्थल से एक सीरिंज और कंपोज के इंजेक्शन की शीशी बरामद की गई थी. बाथरूम से खून से सना एक चाकू भी बरामद किया गया था, जिस से सुकांतो ने खुद को मारने की कोशिश की थी. सुकांतो के घर वालों की मौत कंपोज का हैवी डोज इंजेक्शन लेने से हुई थी.

जैसेजैसे कंपोज का असर शरीर के अलगअलग हिस्सों में हुआ होगा, वैसेवैसे वे निढाल हो गए होंगे. कुछ दिनों पहले ही डा. सुकांतो सरकार और उन के घर वालों ने रांची के लोअर बाजार पुलिस थाना में अपनी बहू मधुमिता के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. वह शिकायत नहीं, बल्कि पुलिस को किसी खतरे के बारे में सूचना दी गई थी.

पुलिस जांच से पता चला है कि डा. सुकांतो के बेटे समीर की अपनी पत्नी से काफी समय से अनबन चल रही थी. यह अनबन तालाक तक पहुंच गई थी. दोनों के बीच बेटी को साथ रखने को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. समीर और डा. सुकांतो बच्ची को अपने साथ रखना चाहते थे, जबकि मधुमिता बेटी को अपने साथ रखना चाहती थी.

इन बातों को ले कर विवाद इतना बढ़ गया था कि मधुमिता ने पति समेत पूरे परिवार के खिलाफ उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर दिया था, जिस से पूरा परिवार परेशान था और पुलिस के डर से भागताछिपता फिर रहा था.

दहेज उत्पीड़न के झूठे मुकदमे और बच्ची को साथ रखने की कोशिश में पूरा परिवार थाने और अदालतों के चक्कर लगातेलगाते परेशान हो चुका था.

पुलिस जांच से पता चला है कि समीर के अवैध संबंध चचेरे भाई पार्थिव की पत्नी मोमिता सरकार से थे. उन के इन संबंधों की जानकारी पूरे परिवार को हो चुकी थी. डा. सुकांतो और परिवार के अन्य लोग इस बात को ले कर काफी तनाव में रहते थे.

समीर की मां और पत्नी ने समीर को समझाने की काफी कोशिश की थी, पर भाभी के प्यार में उलझा समीर किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था. लेकिन डा. सुकांतो ने पुलिस को जो बयान दिया है, उस में इस अवैध संबंध का जिक्र नहीं किया. घटना के बाद रांची पुलिस ने नोएडा पुलिस से संपर्क कर के मधुमिता को हिरासत में लेने का अनुरोध किया है. लेकिन नोएडा पुलिस मधुमिता को हिरासत में लेने उस के घर पहुंची तो वह घर मे नहीं मिली. पड़ोसियों से पता चला कि परिवार के 5 लोगों की मौत की खबर मिलते ही वह कहीं चली गई थी.

गौरतलब है कि मधुमिता मुंहबोली छोटी बहन मौमिता के रवैये से काफी आहत थी. मामले की जांच कर रही पुलिस को मौमिता ने मैसेज के जरिए जानकारी दी थी कि उस ने अपने पति पार्थिव को बताया था कि वह अपनी बड़ी बहन के व्यवहार से काफी दुखी है, जिस की वजह से जीना नहीं चाहती.

मामले की जांच कर रही पुलिस के मुताबिक, मधुमिता ने मौमिता के म्यूजिक टीचर से कहा था कि उस का संबंध उस के पति और ससुर से है. जांच में पुलिस को इस बारे में सुराग भी मिले हैं. नोएडा पुलिस द्वारा रांची पुलिस को दी गई जानकारी के अनुसार, डा. सुकांतो के परिवार में अवैध संबंधों को ले कर काफी तनाव चल रहा था.

डा. सुकांतो के पड़ोस में रहने वालों ने पुलिस को परिवार में चल रहे अवैध संबंधों के बारे में जानकारी दी थी. राजेंद्र इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंस में भरती डा. सुकांतो की हालत में कुछ सुधार हुआ तो पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उन्होंने बताया कि उन के घर वालों ने एकदूसरे को इंजेक्शन लगाया था, जिस से उन सब की मौत हो गई थी.

उन का कहना था कि सभी मधुमिता के इमोशनल अत्याचार से इस तरह तंग आ चुके थे कि उन के पास आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. सुकांतो के बयान से ही पुलिस की समझ में आ गया था कि यह खुदकुशी का सीधासादा मामला नहीं है. इस में कई पेंच और परतें हैं. डा. सुकांतो का जिंदा बच जाना और जहरीला इंजेक्शन न लेना भी एक बड़ी पहेली बनी हुई है.

जब घर के अन्य लोगों ने जहरीला इंजेक्शन ले लिया था तो आखिर डा. सुकांतो ने खुद इंजेक्शन क्यों नहीं लिया? उन्होंने खुद को चाकू से मारने की कोशिश क्यों की? खुदकुशी करने के लिए उन्हें नोएडा से रांची आने की जरूरत क्यों पड़ी? जब मधुमिता उन्हें काफी दिनों से परेशान कर रही थी तो इस की शिकायत नोएडा के किसी थाने में करने के बजाए डा. सुकांतो ने रांची आ कर लोअर बाजार थाने में क्यों दर्ज कराई थी?

पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि यह पूर्व नियोजित हत्याकांड तो नहीं है? कहीं पुलिस को भटकाने के लिए डा. सुकांतो ने किसी तरह की चाल तो नहीं चली है? डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया है कि 8 अक्तूबर की शाम 7 बजे दोनों बच्चे सुमिता और समिता खाना खा कर सो गए तो समीर, मौमिता और अंजना ने कहा कि अब सभी को जान देनी होगी.

उन्होंने सभी को ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें जिंदा रहना है तो रहें, पर अब वे लोग जिंदा नहीं रहना चाहते. मधुमिता अब सभी को जेल भिजवा कर रहेगी. ऐसे में जिंदा रहने से फजीहत ही होगी. उन का दावा है कि उन्होंने तीनों को खुदकुशी करने से रोकने की भरपूर कोशिश की थी.

उन्हें समझाया भी था कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद भी तीनों ने उन की बात नहीं मानी और कंपोज का इंजेक्शन ले लिया. वह निराश और खामोश अपने घर वालों को मरते देखते रहे. अंजना और समीर ने सुसाइड नोट लिख कर डायनिंग टेबल पर रख दिया था.

डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया कि सुसाइड नोट लिखने के बाद रात 11-12 बजे के बीच सब से पहले समीर ने अपनी बेटी समिता को कंपोज का इंजेक्शन लगाया, उस के बाद भतीजे की पत्नी मौमिता ने अपनी बेटी सुमिता को. इस के बाद अंजना ने अपने बेटे समीर को इंजेक्शन लगाया. अंत में अंजना और मौमिता ने खुद ही इंजेक्शन लगा लिया था.

इंजेक्शन लगाने से एकएक कर सभी गहरी नींद में सोते चले गए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि सभी को कंपोज का एकएक इंजेक्शन लगाया गया था, जबकि समीर के हाथ में 9 इंजेक्शन लगाने के निशान थे. मौमिता डा. सुकांतो के परिवार के साथ ही रहती थी. पर्थिव का तबादला नोएडा से भोपाल हो गया था, इसलिए उस ने डा. सुकांतो से आग्रह किया था कि वह मौमिता और उस के बच्चे को कुछ दिनों तक अपने साथ रख लें.

मौमिता ने 7 अक्तूबर को अपने पति और पिता समेत कुछ रिश्तेदारों को भी मैसेज किया था कि दीदी (मधुमिता) ने उस के जीवन को तबाह कर दिया है. उस की प्रताड़ना से पूरा परिवार सदमे में था और खुदकुशी करने की सोच रहा था.

खुदकुशी करने से एक दिन पहले मौमिता के पति पर्थिव भोपाल से गो एयर के विमान से रांची पहुंचे थे. रांची में वह मौमिता के पास जाने के बजाए अपने रिश्तेदार डा. एस. चौधरी के घर पर चले गए थे. वह वहां क्यों गए, पुलिस के लिए यह पहेली बनी हुई है.

मौमिता के डा. सुकांतो के घर आने के कुछ दिनों के बाद ही मधुमिता शक करने लगी थी कि मौमिता का उस के पति समीर से गलत संबंध है. वह मौमिता को मानसिक रूप से परेशान भी करती थी.

नोएडा से रांची आने के सवाल पर डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया था कि मधुमिता के गलत आरोपों से नोएडा में उन की काफी बदनामी हो रही थी, इसलिए वह परिवार के साथ रांची चले आए थे. वह अपने परिवार के साथ नोएडा के सेक्टर-61 के चमत्कार होम्स के बी ब्लौक में रहते थे.

डा. सुकांतो के अनुसार, जिस रात उन का परिवार खुदकुशी कर रहा था, उस समय उन्हें लगा था कि यह पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक विसंगतियां हैं. एक शादीशुदा लड़की जो कहती है, उसे कानून और समाज सही मान लेता है. इसी के बाद उन्होंने जान देने का फैसला लिया था और खुद को चाकू से गोदगोद कर जान देने की कोशिश की थी ताकि कानून और समाज उन की स्थिति का भयानक चेहरा देख सके.

उन्होंने 6 इंच के चाकू से खुद के दिल और गले पर प्रहार किए थे. इस के बाद भी वह कैसे बच गए? उन की समझ में नहीं आ रहा था. वह हर साल दिसंबर महीने में परिवार के साथ रांची आते थे और 8-10 दिन अपने भांजे डा. एस. चौधरी यानी डा. सुब्रतो चौधरी के फ्लैट पर ठहरते थे.

अब सच उगलवाने के लिए पुलिस डा. सुकांतो का पौलीग्राफी, नार्को और लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने का विचार कर रही है. इस टेस्ट के बाद ही असली गुनहगार का चेहरा सामने आ सकेगा और उसे सजा दिलाई जा सकेगी.

दुर्गा पूजा के समय कानून व्यवस्था में उलझी पुलिस अपार्टमेंट के सीसीटीवी फुटेज को नहीं देख सकी थी और 72 घंटे के बाद फुटेज डिलीट हो थी. पुलिस अब सीसीटीवी का डीवीआर कब्जे में ले कर जांच कर रही है साइबर एक्सपर्ट की मदद से 8 और 9 अक्तूबर का डाटा रीस्टोर कराया जाएगा.

मधुमिता ने पुलिस को बताया है कि उस के पति समीर ने 6 अक्तूबर की रात उसे मैसेज किया था कि वह अपने परिवार के साथ कोलकाता जा रहे हैं. 10 अक्तूबर को वह उस के पिता से मिल कर झगड़े को खत्म करने की कोशिश करेंगे. लेकिन वह कोलकाता जाने के बजाय रांची चले गए. नोएडा की एक कंपनी में वेब डिजाइनर का काम करने वाली मधुमिता ने अपने ससुर पर सभी की हत्या का आरोप लगाया है. उस का कहना है कि अगर डा. सुकांतो को उस से नफरत थी तो वह उसे सजा देते, उस की बच्ची और पूरे परिवार को क्यों खत्म कर दिया. सभी का अंतिम संस्कार कर दिया गया और उसे खबर तक नहीं दी गई. उस का दावा है कि डा. सुकांतो ने ही सब को जहरीला इंजेक्शन लगाया है.

मधुमिता के बताए अनुसार, उस के पति समीर का चरित्र ठीक नहीं था. उस ने मौमिता के साथ गलत संबंध होने की बात से इनकार किया है. वह दिल्ली में अपने ससुर के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कराने गई थी, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करने से मना कर दिया था. दिल्ली पुलिस का कहना था कि खुदकुशी की घटना रांची में घटी थी, इसलिए यह मुकदमा वहीं दर्ज होगा. मधुमिता के बयान के बाद मामले की जांच की सुई डा. सुकांतो की ओर घूम गई है. रांची के एसएसपी कुलदीप द्विवेदी का कहना है कि डा. सुकांतो और मधुमिता के बयानों के बाद मामले की नए सिरे से जांच की जा रही है. 23 नवंबर, 2006 को समीर का विवाह मधुमिता से हुआ था. सन 2010 में मौमिता का विवाह सुकांतो के भतीजे पार्थिव सरकार से हुआ. पार्थिव बैंक औफ बड़ौदा में एचआर मैनेजर है. मधुमिता और मौमिता दोनों ही दक्षिणेश्वर के आश्रम में पलीबढ़ी है.

दरअसल, डा. सुकांतो किसी जरूरतमंद लड़की से ही बेटे की शादी करना चाहते थे, ताकि उस की जिंदगी संवर सके. लेकिन कोई जरूरी नहीं कि सोची हुई बात पूरी हो ही जाए.

युवती लगा सकती है बलात्कार का आरोप

ऋतु की अभिषेक से अच्छी बनती थी. यहां तक कि औफिस में दोनों साथ लंच करते, घूमते-फिरते, लेकिन एक दिन जब ऋतु को उस के फ्रैंड ने अभिषेक के साथ वॉशरूम में देखा तो ऋतु डर गई और हड़बड़ाहट में उस ने खुद को सब की नजरों में सही दिखाने के लिए चिल्लाचिल्ला कर अभिषेक पर बलात्कार का आरोप लगाने लगी. यह देख अभिषेक के साथसाथ उस के फ्रैंड्स भी दंग रह गए, क्योंकि जो नजारा उन्होंने देखा था उस से ऋतु की मरजी साफ जाहिर हो रही थी.

सभी जानते थे कि वह अभिषेक को फंसा रही है, लेकिन कोई कहने की हिम्मत सिर्फ इसलिए नहीं जुटा पा रहा था कि कहीं ऋतु उसे भी फंसा न दे.

अधिकांश मामलों में यही देखने को मिलता है कि जब युवतियों की मांगें पूरी नहीं होतीं या फिर वे खुद फंसती दिखती हैं तो युवकों पर बलात्कार का आरोप लगा कर उन्हें फंसाने की कोशिश करने लगती हैं. इसलिए अगर आप भी रिलेशनशिप में हैं तो पहले से सावधानी बरत कर चलें. कहीं कोई आप को भी फंसा न दे.

कब कब लगा सकती है आरोप

झगड़ा होने पर

‘आजकल तुम रिया के साथ ही ज्यादा बातें करते हो, मुझे हमेशा इग्नोर करने की तुम्हारी इतनी हिम्मत’, ‘तुम तो हमेशा अपने लिए ही जीते हो’, ‘तुम तो कभी रोमांटिक बातें ही नहीं करते’, ‘मुझ से ज्यादा तुम्हें औरों में इंट्रस्ट है’ आदि बातों को ले कर अकसर लड़ाई होने पर युवती आप को फंसाने या फिर सबक सिखाने के लिए बलात्कार का आरोप लगा सकती है.

बात नहीं मानने पर

बातबात पर जिद करना कि मुझे तो नेहा जैसा मोबाइल ही चाहिए, मैं तो तुम्हारे साथ महंगे रैस्टोरैंट में ही डिनर करूंगी, तुम मुझे यह स्कूटी दिलवाओ और जब आप की पौकेट इन चीजों के  लिए इजाजत नहीं देती या आप मना करने लगते हैं तो युवती को लगने लगता है कि मेरा बौयफ्रैंड तो कंजूस है. फिर वह आप से गलत तरीके से पैसे ऐंठने के लिए आप को फंसा सकती है.

पैसों की डिमांड पूरी न होने पर

कभी पर्स चोरी होने की बात कह कर, कभी रिचार्ज करवाने के लिए तो कभी किसी बहाने से आप से पैसों की मांग करे. 1-2 बार तो आप भी रिश्ते की खातिर उसे पैसे दे देंगे, लेकिन आदत बनती देख आप को भी यह सब खटकने लगेगा और जैसे ही आप पैसे देने बंद करेंगे वैसे ही आप फंसे, क्योंकि ऐसी युवतियां रिश्ता दिल से नहीं रखतीं.

शादी नहीं करने पर

आप दोनों काफी समय से रिलेशनशिप में थे, लेकिन घर की जिम्मेदारियों व मां के न मानने के कारण आप ने अपने पार्टनर से शादी करने से मना कर दिया जो आप के पार्टनर को बिलकुल बरदाश्त नहीं और उस ने आप को झूठे आरोप में फंसा दिया, जबकि आप ने उस के सामने यह बात पहले ही रख दी थी कि हम हमेशा सिर्फ दोस्त रहेंगे चाहे शादी हो या न हो.

ब्रेकअप होने पर

आप जान गए थे कि आप की पार्टनर आप को चीट कर रही है. एक तरफ आप से प्यार की बातें वहीं दूसरी तरफ किसी और से. ऐसे में आप ने उस से ब्रेकअप कर लिया जिसे अपना अपमान मान कर वह आप को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगी.

फ्रैंड्स के साथ ज्यादा समय बिताने पर

अधिकांश युवतियों की यह हैबिट होती है कि वे खुद की इग्नोरैंस बिलकुल बरदाश्त नहीं करतीं, खासकर तब जब उन्हें लगे कि उन का बौयफ्रैंड उन से ज्यादा दोस्तों से बात कर रहा है. ऐसे में वे औरों की नजरों में गिराने के लिए आप को बदनाम कर सकती हैं.

कैसे बचें

शारीरिक संबंध न बनाएं

रिलेशनशिप में होने पर हमारी पहली चाहत अपने पार्टनर को पाने की होती है, जिस के कारण हम जल्दबाजी में बिना सोचसमझे उस के साथ शारीरिक संबंध बना बैठते हैं, जिस के बाद में खतरनाक परिणाम भुगतने पड़ते हैं. ऐसे में जरूरी है कि जब तक रिश्ते को नाम न मिल जाए तब तक संबंध बनाने की गलती न करें.

फोटो न खींचने दें

अगर आप खुद की फीलिंग्स पर कंट्रोल न रख पाने के कारण रिलेशन बना रहे हैं तो कोशिश करें कि न खुद इस मूवमैंट के फोटो शूट करें और न ही पार्टनर को करने दें वरना यह आप के ब्लैकमेल का रास्ता बन सकता है.

अपना बैंक बैलेंस न बताएं

कई बार हम ओवर ऐक्साइटमैंट में अपने पार्टनर को अपनी सारी पर्सनल इन्फौर्मेशन जैसे बैंक बैलेंस वगैरा के बारे में बता देते हैं. एक बार आप की आर्थिक स्थिति का पता लगने के बाद वह न सिर्फ आप से पैसे ऐंठ सकती है बल्कि मोटी रकम वसूलने के लिए आप पर रेप का आरोप लगाने में भी देर नहीं लगाएगी.

ड्रिंक वगैरा न लें

आप जब भी पार्टनर के साथ हों तो ड्रिंक वगैरा न करें ताकि आप को उस की गतिविधियों का पता चलता रहे.

लिव इन में न रहें

भले ही आप लिव इन रिलेशनशिप में एकदूसरे की मरजी से रह रहे हैं, लेकिन जब भी मन भरने लगे या मजबूरीवश आप अपने पार्टनर से दूर हुए तो वह आप को सुबूतों सहित रेप के जुर्म में बंद करवा सकती है. ऐसे में आप के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं होगा इसलिए इस ओर सावधानीपूर्वक बढ़ें.

फोन, व्हाट्सऐप पर सैक्सी चैट से दूर रहें

व्हाट्सऐप पर कभी भी अपने पार्टनर से सैक्सी बातें न करें. आमनेसामने ऐसी बातें करें वरना वह फोन पर रिकौर्डिंग कर के यह टूल आप को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है, इसे आप झुठला भी नहीं पाएंगे.

पिछले सीक्रैट्स न बताएं

आप पहले किसी के साथ रिलेशनशिप में थे, किस कारण आप का उस के साथ पंगा हुआ वगैरावगैरा बातें पार्टनर से शेयर न करें वरना वह इन्हीं सीक्रैट्स से भविष्य में आप के लिए मुसीबत पैदा कर सकती है.

जब आरोप लगाए तब क्या करें

धमकी का जवाब धमकी से न दें

यदि आप की पार्टनर ने आप को गुस्से में आ कर फंसाने की धमकी दी है तो आप यह बात सुन कर गुस्से में न आएं, क्योंकि अगर दोनों ओर गरमी का माहौल होगा तो स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाएगा.

छिपें नहीं, फेस करें

इस दौरान छिपने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि ऐसा करने से लोगों को लगेगा कि आप ने सचमुच कोई अपराध किया है बल्कि जिस तरह आप पहले अपनी जिंदगी जीते थे वैसे ही जीएं. अगर वह सामने भी आ जाए तो नौर्मल रहें.

फोन अटैंड करें

डर के मारे कि कहीं फोन पर रिकौर्डिंग न कर ले इस चक्कर में अपना नंबर ही चेंज कर लें या फिर उस के फोन ही अटैंड न करें. ऐसा करने की गलती न करें बल्कि फोन पर उसे समझाएं कि हमारे बीच सिर्फ दोस्ती का रिश्ता था और अगर तुम्हें मुझ से कोई प्रौब्लम थी भी तो उसे प्यार से समझाती, न कि इस तरह आरोप लगा कर.

पेरैंट्स को लें कौन्फिडैंस में

अपनी समस्या पेरैंट्स को अवश्य बताएं कि मैं ने जिस युवती से फ्रैंडशिप की थी उस ने अब मेरी गलती न होते हुए भी मुझे फंसा दिया है. ऐसे में पेरैंट्स आप को सपोर्ट करेंगे और इस से युवती को भी लगेगा कि अब आप अकेली नहीं हैं.

‘कभी खुशी कभी गम’ का ये बच्चा अब हो गया है इतना बड़ा

शाहरुख खान की फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ तो शायद आपने देखी ही होगी. साल 2001 एक में डायरेक्टर करण जौहर की ये बेहतरीन फिल्मों में से एक थी. इस फिल्म में शाहरुख खान के अलावा अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, शाहरुख खान, काजोल, ऋतिक रोशन, करीना कपूर और गेस्ट अपीयरेंस में रानी मुखर्जी भी नजर आईं थीं.

वही फिल्म में एक क्यूट सा छोटा बच्चा भी नजर आया था, जो शाहरुख और काजोल का बच्चा बना था. इस बच्चे का नाम जिब्रान खान है. बौलीवुड के इन सभी स्टार्स के बारे में तो आप सब जानते हैं लेकिन जिब्रान के बारे में कम ही लोग जानते हैं. चलिए आज हम आपको जिब्रान खान के बारे में बताते हैं.

#hardestworkerintheroom !!

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दरअसल जिब्रान खान बतौर चाइल्ड एक्टर कई बौलीवुड फिल्मों में नजर आ चुके हैं. फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ में अपनी एक्टिंग का हुनर दिखाने के एक साल बाद छोटी सी उम्र में जिब्रान एक और बड़ी फिल्म में नजर आए थे.

हम बात कर रहे हैं अनिल कपूर स्टारर फिल्म ‘रिश्ते’ की. साल 2002 में रिलीज हुई अनिल कपूर स्टारर फिल्म ‘रिश्ते’ में जिब्रान खान ने अनिल कपूर और करिश्मा कपूर के बच्चे का रोल निभाया था. इस फिल्म में शिल्पा शेट्टी और अमरीश पुरी भी थे. फिल्म में जिब्रान को बेहद जरूरी किरदार मिला था.

Train to be fit not to look good ! #chesttothecore … #dropdead @merchantsaqib

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वही जिब्रान खान अब बड़े हो चुके हैं. 4 दिसंबर सन् 1993 को मुंबई में जन्में जिब्रान खान अब 23 साल के हो चुके हैं. जिब्रान अब क्यूट से हैंडसम और चार्मिंग हो गए हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिब्रान अपने डेब्यू को लेकर काफी मेहनत कर रहे हैं, इसके लिए वो मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग ले चुके हैं.

#happyanniversary Mom and Dad ! #35 years and counting … ❤

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इसके साथ ही खबरों की मानें तो जिब्रान खान जल्द ही धर्मा प्रोडक्शन के तहत बनने वाली फिल्म में नजर आ सकते हैं. उन्होंने शामक डावर के डांस इ्ंस्टीट्यूट से डांस भी सीखा है. जिब्रान सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहते हैं और अपनी तस्वीरें भी शेयर करते रहते हैं.

हर शो में प्रियांक लड़कियों के साथ करते हैं ऐसा

बिग बौस सीजन 11 शुरुआत से ही सुर्खियों में बना हुआ है. यहां कभी कोई किसी से झगड़ बैठता है तो कभी किसी सदस्य के बीच इतनी नजदीकियां आ जाती हैं कि उसका असर शो के अलावा उनकी निजी जिंदगी पर भी पड़ने लगता है. लोग शो में जीतने के लिए नये और दिखावटी रिश्ते बनाने की कोशिश में असल जिंदगी के कुछ रिश्तों से हाथ धो बैठते हैं.

कई दिनों से ऐसा ही कुछ बिग बौस के घर में भी देखने को मिल रहा है. यहां प्रियांक और बेनाफ्शा की नजदीकियां बढ़ती चली जा रही है. इस शो में दोनों साथ में न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताते नजर आ रहे हैं. बल्कि दोनों रात में साथ सोते हुए भी दिख रहे हैं.

टेलीविजन पर प्रियांक और बेनाफ्शा के बीच चल रही इन करीबियों को देख पिछले दिनों प्रियांक की गर्लफ्रेंड दिव्या काफी दुखी हुईं और उन्होंने उनसे रिश्ता तोड़ लिया. दिव्या कहती हैं कि अब प्रियांक और उनके बीच में कुछ नहीं बचा है. वह ये सब देख कर काफी डिस्टर्ब हो गई हैं, वह इस रिश्ते को और नहीं झेल सकतीं.

दिव्या अपने और प्रियांक के रिश्तों को लेकर कहती हैं, ‘मैंने इस चीज का हमेशा ध्यान रखा कि हम दोनों एक दूसरे को डेट कर रहे हैं. हालांकि जब वह बिग बौस के पहले हफ्ते में घर से बाहर हो गए थे तो भी मैं उनसे मिल नहीं पाई थी. दिव्या का कहना है, ‘मैं उस प्रियांक को जानती थी जिनकी फीलिंग्स दिखावटी नहीं थी, जो जेन्युअन थे. पर अब वो ऐसे नहीं है.’

वह कहती हैं, मुझे नहीं लगता कि प्रियांक सच्चे हैं. मैं पूरी तरह से उनसे अलग हो चुकी हूं. जो वो शो पर बेनाफ्शा के साथ कर रहे हैं. स्पलिट्सविला में वही चीजे वह मेरे साथ करते थे. उसे तो हर शो पर बस एक लड़की चाहिए.’

दिव्या ने आगे कहा कि अगर प्रियांक यह सब केवल गेम के लिए कर रहे हैं तो यह बहुत ही ज्यादा घटिया और गन्दा गेम है. वहां उस शो में दूसरे लोग भी खेलने वाले हैं, पर वो प्रियांक जैसी हरकते नहीं कर रहे हैं. हितेन और विकास भी तो वहां मौजूद हैं, वह भी तो खेल रहे हैं ना? लेकिन वह तो उनकी तरह लड़कियों के साथ इतने टची नहीं हो रहे हैं.

मराठी फिल्म रिव्यू : दशक्रिया

पूजा अर्चना, कर्मकांड आदि प्रथायें आम आदमी के जीवन से इस तरह से जुड़ी हैं कि मरने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ती हैं. हिन्दू धर्म में मनुष्य के मरने के बाद तीसरे, दसवें, बारहवें, तेरहवें दिन पर ब्राह्मणों के हाथ से पिंडदान करने और उन्हें दान धर्म करने की प्रथा है. लेकिन आजकल ये प्रथाएं कमाई का धंधा बन चुकी हैं. इसी धंधे पर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ‘दशक्रिया’ फिल्म के जरिये टिप्पणी की गई है. यह फिल्म उपन्यासकार बाबा भांड द्वारा लिखित ‘दशक्रिया’ नामक उपन्यास पर आधारित है.

गोदावरी नदी के तट पर बसे पैठण शहर के नाथ घाट पर दशक्रिया विधि करने के लिए महाराष्ट्र के विविध भागों से लोग आते हैं. इस शहर में रहने वाले ज्यादातर ब्राह्मणों का रोजगार दशक्रिया विधि कराना है. केशव भट्ट (मनोज जोशी) ऐसा ही एक ब्राह्मण है. वह वहां आने वाले सभी ग्राहकों को बड़े चतुराई से अपनी ओर कर लेता है और मनमानी ढंग से दक्षिणा मांगता है. नारायण (मिलिंद फाटक) एक गरीब ब्राह्मण है. शिक्षक की नौकरी छूटने के बाद वो भी दशक्रिया कराने की शुरुआत करता है. लेकिन केशव उसे एक भी ग्राहक मिलने नहीं देता है. इस वजह से केशव और नारायण के बीच विवाद शुरू हो जाता है.

इस विवाद को सुलझाने के लिए पत्रे सावकार (दिलीप प्रभावलकर) पंचायत बुलाते हैं, लेकिन पंचायत में मारामारी के अलावा कुछ नहीं होता है. सावकार केशव को मनमानी ढंग से पैसा कमाने का यह धंधा बंद करने के लिए समझाते है, जिसके वजह से केशव उससे नफरत करने लगता है.

केशव एक किरवंत ब्राह्मण है जो मृत्यु के बाद की जाने वाली सभी विधि पूरी करता है और ग्राहकों को धर्म के नाम पर लूटता है. इसलिए गुढीपाडवा के दिन सावकार केशव को पूजा नहीं करने देते है. इससे अपमानित होकर केशव सावकार को सबक सिखाने की ठान लेता है. एक किरवंत ब्राह्मण होने के नाते नारायण भी खुद को अपमानित समझता है और केशव का साथ देता है.

सावकार देव दर्शन के लिए दूसरे गांव जाते हैं, जहां केशव उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट करा देता है जिसमें उनकी मृत्यु हो जाती है. सावकार की पत्नी दशक्रिया विधि के लिए केशव के पास जाती है लेकिन वो अपमान का बदला लेने की बात पर अड़ा रहता है और विधि करने से इनकार कर देता है. साथ ही गांव के सभी किरवंत ब्राह्मणों को भी यह विधि नहीं करने की चेतावनी देता है.

दूसरी ओर, छोटी जाति का 7-8 साल का भान्या (आर्या आढाव) हर रोज स्कूल जाने के बजाय नाथघाट पर घूमता रहता है. अपने बाल मन में उठ रहे सवालों को बेझिझक पूछता है. पानी में किये गये अस्थि विसर्जन को चालनी लगाकर उसमें से छुट्टे पैसे इकठ्ठा करना उसको अच्छा लगता है. यहां से इकठ्ठा किये गए पैसे से वह अपनी मां की आर्थिक मदद करता है. दशक्रिया का विवाद और बाल्यावस्था में भान्या का जीवन फिल्म में दोनों समानांतर आगे बढ़ते हैं. लेकिन एक समय पर ये दोनों एक दूसरे से इस तरह टकराते हैं कि धर्म और जाति के नाम पर छल करने वाले समाज के ठेकेदारों को अपनी लाज बचाकर भागना पड़ता है.

जात-पांत के आधार पर आपस में भेद पैदा करके स्वयं को ज्ञानी और दूसरों को अज्ञानी साबित करने वालों के लिए यह एक तमाचा है. कर्मकांड के संस्कार में पली बढ़ी भावी पीढ़ी फिर से यही धंधा नए सिरे से ना शुरू कर दे, यह चिंता फिल्म के अंत में सताती है.

केशव की भूमिका में मनोज जोशी और भान्या की भूमिका में आर्या आढाव दोनों ने ही फिल्म में बहुत असरदार और कुशल अभिनय किया है. अन्य कलाकारों ने भी बहुत अच्छा काम किया है. संजय पाटिल का उत्कृष्ट पटकथा लेखन और संदीप पाटिल का निर्देशन कहानी के मूल भाव को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है. उपन्यास के अनुसार फिल्म का समय काल १९९४ का दिखाया गया है, परन्तु ये परिस्थिति आज भी जस की तस है.

यह फिल्म किसी भी धार्मिक प्रथा पर रोक लगाने की मांग नहीं करती है, लेकिन इसमें सच्चाई को प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है. इससे क्या सीख लेनी चाहिए, यह दर्शकों को अलग से समझाने की जरूरत नहीं है.

निर्माता – कल्पना कोठारी

निर्देशक – संदीप पाटिल

पटकथा – संजय पाटिल

कलाकार – दिलीप प्रभावलकर, मनोज जोशी, मिलिंद फाटक, आर्या आढाव और आशा शेलार

स्टार- 3 & 1/2

आम्रपाली और पवन सिंह का हौट डांस मचा रहा है धमाल

आम्रपाली दुबे जिन्होंने तीन साल पहले भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा और अब अपने शानदार अभिनय, डांस और अदाओं की वजह से फिल्म इंडस्ट्री में छा गईं हैं. इतना ही नहीं उनकी लोकप्रियता हर दिन के साथ बढ़ती ही जा रही है, जिसका इशारा यूट्यूब पर मौजूद उनके गाने के आंकड़े करते हैं. पवन और आम्रपाली के हाट डांस एक वीडियो ऐसा चल निकला है कि उसने अब तक यूट्यूब पर 10 करोड़ का आंकड़ा छू लिया है.

भोजपुरी फिल्म ‘सत्या’ के इस वीडियो को प्रोमोशनल सांग के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. फिलहाल, इस वीडियो को 100,290,671 व्यूज मिल चुके हैं. वीडियो में जिस गाने पर पवन और आम्रपाली डांस कर रहे हैं उसके बोल हैं ‘राते दिया बुता के’.

इस वीडियो को यू-ट्यूब पर वेब म्यूजिक ने आठ महीने पहले 27 मार्च 2017 को पब्लिश किया था. खास बात ये कि इससे पहले किसी भी भोजपुरी गाने को इतने व्यूज नहीं मिले हैं और अब भी इसे देखने का सिलसिला बंद नहीं हो रहा है.

आम्रपाली दुबे ने इस उपलब्धि के लिए अपने फैन्स को धन्यवाद करते हुए कहा कि उनके इस कारनामे के पीछे उनकी ही चाहत है. बता दें कि आम्रपाली दुबे ने हाल ही में खेसारी लाल यादव के साथ फिल्म ‘दुल्हन गंगा पार के’ में एक प्रमोशनल सान्ग किया है.

आपको बता दें कि बिहार के आरा जिला के रहने वाले पवन सिंह भोजपुरी फिल्मों में आने से पहले भोजपुरी सिंगर थे. फेमस भोजपुरी सान्ग ‘लालीपाप लागेलू’ से उन्हें जबर्दस्त ख्याति मिली थी. साल 2007 में उन्होंने भोजपुरी इंडस्ट्री में डेब्यू किया था. उनकी पहली फिल्म का नाम था ‘रंग ली चुनरिया तोहरे नाम’.

आम्रपाली दुबे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली हैं. इन्होंने काफी कम वक्त में भोजपुरी दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई है. एक फिल्म के लिए वे 7-9 लाख रुपए चार्ज करती हैं. 2014 में इन्होंने भोजपुरी फिल्मों में डेब्यू किया था. फिल्म का नाम था ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’.

सड़कों पर आवारा घूमती गाएं और गौशालाओं पर उठते सवाल

गाय का दूध पीने के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. आज भी गांवदेहातों में कई घर गाय का दूध और उस से बनी हुई चीजें जैसे दही, मक्खन और घी बेच कर पल रहे  हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं.

पर, आज गाय की बदहाली और अनदेखी किसी से छिपी नहीं है. गाय के नाम पर सरकारी पैसा बटोरने वाले तथाकथित गौसेवक गाय का निवाला खा रहे हैं. यही वजह है कि गाय जब तक दूध देती है, तब तक पशुपालक उस की अच्छी तरह देखभाल करते हैं और जैसे ही वह दूध देना बंद करती है, तो पशुपालक उसे सड़कों पर खुला छोड़ देते हैं.

नतीजतन, बहुत सी गाएं सड़कों पर आवारा घूमती कचरे के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की पौलीथिन तक खाती नजर आती हैं.

मध्य प्रदेश के भोपालजबलपुर नैशनल हाईवे नंबर 12 पर आवारा घूमती गायों का समूह सड़क पर हमेशा नजर आता है. इन में से कुछ गाएं आएदिन ट्रक वगैरह की चपेट में आ कर मौत का शिकार हो जाती हैं और कुछ अपाहिज भी.

सड़कों पर घायल गायों की सुध लेने के लिए कोई नहीं आता. औसतन हर 10 किलोमीटर के दायरे में सड़क किनारे मरी पड़ी गाय की बदबू लोगों का ध्यान खींचती है, पर किसी जिम्मेदार अफसर या नेता का ध्यान इस ओर नहीं जाता.

वहां के बाशिंदे बताते हैं कि गायों की खरीदफरोख्त करने वाले लोग इन गायों को साप्ताहिक लगने वाले एक बाजार से दूसरे बाजार में ट्रकों से ले जाते हैं. कई बार बाजार में मवेशी की सही कीमत न मिलने के चलते ट्रांसपोर्ट का खर्चा बचाने या तथाकथित गौरक्षकों के डर से वे उन्हें दूसरे बाजार के लिए नहीं ले जा पाते.

कुछ कारोबारी गायों के शरीर पर रंग से कोई निशान बना कर उन्हें सड़क पर छोड़ देते हैं. अगले हफ्ते वही कारोबारी आ कर उन की तलाश करते हैं और ज्यादातर गाएं उन्हें मिल भी जाती हैं, जिन्हें वे फिर से बाजार में खरीदफरोख्त के लिए ले जाते हैं.

आवारा घूमती गायों की यह हालत गाय के नाम पर हायतोबा मचाने वाले गौरक्षकों को धता बताती नजर आती है.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना है, जिस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके बाबूलाल गौर ने प्रदेश में गौशाला अनुदान का मुद्दा उठा कर सरकार पर सवाल खड़े किए थे. उन के मुताबिक, प्रदेश में गौशाला अनुदान को ले कर कोई साफ नीति नहीं है.

हो रही है चंदा वसूली

मध्य प्रदेश के कई शहरों में छोटीबड़ी दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लकें रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ पैसे डालते हैं.

एक दुकानदार से इस बारे में पूछा गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़ जाते हैं और एक निश्चित समय में उस में डाली गई रकम निकाल कर ले जाते हैं.

गौशाला चलाने के नाम पर ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े लोग होते हैं, जो स्वयंसेवी संस्थाएं बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़ करने में माहिर होते हैं.

सड़कों पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा के लिए किया जाता है?

हालांकि कुछ गौशालाएं आज भी हैं, जो बिना चंदे या सरकारी अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं.

गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़कों पर गायों को ले जाने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से जबरन वसूली करने में भी पीछे नहीं रहती है.

लाखों का घोटाला

छत्तीसगढ़ राज्य में चल रही गौशालाओं को सरकार लाखों रुपए का अनुदान दे रही है, लेकिन इन में से कई ऐसी गौशालाएं भी हैं, जहां गायों को दानापानी तक नहीं मिलता है. कई जगह हालात और भी खराब होने की खबर है.

प्रदेश की 3 गौशालाओं में हुई गायों की मौत के बाद खासा बवाल मचा. जानकारों का साफ कहना है कि अगर गौशालाओं की सही रिपोर्ट तैयार की गई, तो प्रदेश में एक बड़ा चारा घोटाला सामने आएगा.

प्रदेश का गौसेवा आयोग इस समय 67 गौशालाओं को लाखों रुपए का अनुदान दे रहा है. अनुदान देने के लिए यह नियम है कि गाय के लिए प्रतिदिन 25 रुपए की दर से गायों की तादाद के हिसाब से सालभर के लिए अनुदान दिया जाता है.

प्रदेशभर में 115 रजिस्ट्रर्ड गौशालाएं हैं, जिन्हें हर साल सरकार की ओर से करोड़ों रुपए का अनुदान दिया जाता है. इस मामले की तह तक जाने के बाद कुछ अहम दस्तावेज में दुर्ग की शगुन गौशाला में फर्जीवाड़ा होने की बात सामने आई है.

इस संस्था के रजिस्ट्रेशन की तारीख 6 अक्तूबर, 2010 दर्ज है. गौरतलब है कि 905 पशुओं की तादाद वाली इस गौशाला में सरकार की तरफ से जाने वाली अनुदान राशि साल 2014-15 में 20 लाख, साल

2015-16 में 19 लाख 62 हजार, साल 2016-17 में 10 लाख यानी 3 साल में इस गौशाला को तकरीबन 50 लाख रुपए अनुदान के रूप में मिले.

देखा जाए, तो साल 2010 के बाद इस संस्था द्वारा नियम के मुताबिक हर साल औडिट रिपोर्ट विभाग को दी जानी थी, जिस के आधार पर उसे अनुदान राशि दी जानी थी, लेकिन साल 2016 में रजिस्ट्रेशन के बाद से ही औडिट रिपोर्ट नहीं दी गई थी. इस के बावजूद सरकार की तरफ से उन्हें गैरकानूनी तौर पर पिछले 3 सालों में 49 लाख, 62 हजार की रकम दी जा चुकी है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिम है कि किस आधार पर अफसरों ने बिना औडिट किए ही उस गौशाला को अनुदान राशि दी? राशि का उपयोग गौशालाओं में किस तरह से किया जा रहा है, इस की जांच भी अब तक नहीं की गई.

बेमेतरा जिले की 2 गौशालाओं में 18 अगस्त, 2017 को 157 गायों की असमय मौत का मामला सामने आने के बाद से प्रशासन का ध्यान गौशालाओं की ओर गया है.

वहीं, दूसरी ओर भूखप्यास से मर रही गायों को बचाने के लिए उन्हें दूसरी गौशालाओं में शिफ्ट किया गया है. गंभीर रूप से बीमार गायों का वहीं पर इलाज किया जा रहा है. लेकिन गौशालाओं को करोड़ों रुपए का अनुदान मिलने के बावजूद भी गायों के लिए चारेपानी का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किया गया.

अनुदान की रकम कहां खर्च की गई और आरोपियों को किन का संरक्षण मिला हुआ है, इस दिशा में कोई जांच अब तक नहीं की गई है.

इस पूरे मामले में गौसेवा आयोग की कमजोरी उजागर हुई है. आयोग की ओर से अनुदान को ले कर अब तक हालात साफ नहीं हैं.

जानकारी के मुताबिक, गौशालाओं पर शासन द्वारा 30 करोड़ रुपए से अधिक का अनुदान जारी किए जाने की बात सामने आई है. इस के बावजूद जिले की 2 गौशालाओं में 157 गायों व साजा विधानसभा क्षेत्र के ग्राम राजपुर में 5 सौ से ज्यादा गायों की अकाल मौत होने का कलंक छत्तीसगढ़ राज्य की सरकार पर लग चुका है.

गौशाला और नया प्रयोग

मध्य प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रयोग करने के मामले में नए झंडे गाड़ रहा है. इन में सब से ताजा उदाहरण है भोपाल के पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में गौशाला खोलने का फैसला.

इस अनूठी योजना के जनक हैं यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बृजकिशोर कुठियाल. उनकी अगुआई में पिछले कुछ सालों में इस पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में नए प्रयोग के कई रिकौर्ड बने हैं.

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता व संचार यूनिवर्सिटी मध्य प्रदेश सरकार का संस्थान है. इस की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार के एक अधिनियम के तहत की गई है.

पिछले दिनों यूनिवर्सिटी ने बाकायदा एक टैंडर नोटिस छाप कर गौशाला खोलने की मंशा जाहिर की. उस से पता चला कि भोपाल में बने रहे 50 एकड़ में फैले अपने नए कैंपस का 10वां हिस्सा यूनिवर्सिटी ने गाय पालने के लिए रिजर्व कर रखा है. नक्शे के मुताबिक, कैंपस के अगले हिस्से में पढ़ाई होगी, वहीं बीच के हिस्से में शिक्षक और भावी पत्रकार रहेंगे व पीछे की तरफ पशु रहेंगे.

वाइस चांसलर की सोच है कि इस गौशाला से कैंपस में रहने वाले लोगों को असली दूध और ताजा दही मिलेगा और गोबर गैस के अलावा खाद भी मिलेगी, जो सब्जियां उगाने के काम आएंगी. दूध ज्यादा हुआ, तो बाजार में बेच कर यूनिवर्सिटी थोड़ेबहुत पैसे भी कमा लेगी. वे याद दिलाते हैं कि पुराने समय में नालंदा और तक्षशिला जैसी यूनिवर्सिटी में भी अपनी गौशाला होती थी.

वाइस चांसलर कुछ दिनों में कहने लगेंगे कि नालंदा में बिजली नहीं थी, तो बिजली कटवा दो. गाडि़यां नहीं थीं, तो घोड़े वाले रथों को रखेंगे. तरक्की तो यही है कि सुदूर पूर्व में देखा जाए, गौदान किया जाए.

वैसे, मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष नंदकिशोर सिंह चौहान ने यह कह कर इस योजना की तारीफ की है, ‘‘यह एक अनूठा आइडिया है और पहली दफा कोई शैक्षणिक संस्थान हमारी प्राचीन परंपरा का पालन कर रहा है.’’

सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान पर बवाल

फिल्म के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को चलवाने व राष्ट्रीय गान पर खड़े रहने की बाध्यता की वैधानिकता पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोग सिनेमाघरों में मनोरंजन के लिए जाते हैं, राष्ट्रभक्ति दिखाने के लिए नहीं. उस समय उन्हें जबरन खड़ा कराना अनावश्यक है. इस पर एक वकील ने कटाक्ष किया है कि ये जज ही उम्मीद करते हैं कि वे जब अदालत में आएं, तो सब लोग खड़े हो कर उन को सम्मान दें.

राष्ट्रभक्ति का गुणगान करते हुए कैसे लोग विवेक शून्य हो जाते हैं, यह अदालत के उदाहरण से स्पष्ट है. राष्ट्रगान कुछ खास अवसरों पर गाया जाना चाहिए. इसे हर पिक्चर, मदारी के तमाशे या नेता के भाषण से पहले नहीं गाया जाना चाहिए. जहां मामला देशप्रेम का हो, देश की प्रतिष्ठा का हो, वहां ही राष्ट्रगान होना चाहिए.

अंधभक्त चाहते हैं कि जैसे हर समय रामराम, टच वुड (लकड़ी के क्रौस को छूना), अल्लाह की नियामत, वाहे गुरु की कृपा बुलवाते रहना धर्म के दुकानदारों का खेल है, ताकि लोगों को इस तरह मैस्मराइज कर के रखा जाए कि वे हर समय धर्म का भरा लोटा अपने हाथ में रखें और एक बूंद पानी छलकने न दें, तभी वे धर्म के बारे में सवाल पूछने की हिम्मत न कर पाएंगे.

देशभक्ति लोगों का अपना फैसला होती है. देश की सीमाएं बढ़तीघटती रहती हैं, इस से देशभक्ति कम नहीं होती. लोग एक देश की नागरिकता छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता अपना लेते हैं, तो देशभक्ति शिफ्ट हो जाती है और कोई हल्ला नहीं मचता, जैसा धर्म परिवर्तन में मचता है, क्योंकि देशभक्ति ऐच्छिक है. इसे धर्मभक्ति के बराबर थोपने की कोशिश वही करते हैं, जो धर्मभक्ति के अंधविश्वासी होते हैं, जहां न तर्क चलता है, न सहीगलत के सवाल पूछे जाते हैं. देश के बारे में हर तरह के सवाल पूछने के तर्क रहते हैं. सरकार निकम्मी है, संविधान में संशोधन हो, कानून बदले जाएं, प्रधानमंत्री गलत हैं जैसे शब्द कहना देशद्रोह नहीं है, जबकि इसी तर्ज पर धर्म के बारे में कहा जाए, तो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच जाती है.

धर्म में संसद नहीं होती, बल्कि उस के दुकानदारों का एकतरफा निर्णय होता है. देश संसद, मंत्रिमंडल, अदालतों से चलता है, जहां हर फैसले, हर नियम पर सवाल उठते हैं. धर्म की अंधनिष्ठा को देशप्रेम पर थोपना देश की कल्पना को आमूल नष्ट करना है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह सिनेमाघरों में राष्ट्रगान चलवाने के आदेश पर पुनर्विचार करे और साथ ही कहा है कि देशप्रेम को हर समय आस्तीन पर दर्शाना जरूरी नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट बिलकुल सही है कि राष्ट्रगान का सम्मान हो पर वही राष्ट्रभक्ति का पैमाना न हो. हम राष्ट्रगान गा कर भी अंधविश्वास, रिश्वतखोर, चोर, निकम्मे, अत्याचारी, सरकारी टैंडरों से घर भरने वाले या देश का या उस की जनता का नुकसान करने वाले हो सकते हैं. जन गण मन कोई अजूबा मंत्र नहीं कि खजाने के दरवाजे खुल जाएं.

गैंगस्टरों का गढ़ बनता पंजाब

जरा नब्बे के दशक की मुंबई को याद करें. महानगर मुंबई में सक्रिय दरजनों छोटेबडे़ क्रिमिनल गैंग के खौफ ने लोगों की नींद उड़ा रखी थी. अपहरण, फिरौती, हफ्तावसूली आम बात थी. क्रिमिनल गैंग के बीच की रंजिश और अंडरवर्ल्ड में वर्चस्व की लड़ाई को ले कर खूनी गैंगवार भी अपने चरम पर था. उस समय मुंबई में इतने क्रिमिनल गैंग सक्रिय थे कि पुलिस के लिए उन्हें सूचीबद्ध करना मुश्किल हो रहा था. फिर भी अंडरवर्ल्ड में दाऊद, छोटा राजन, सुलेमान, छोटा शकील और अरुण गावली जैसे बड़े नाम थे.

इस समय पंजाब में भी नब्बे के दशक वाले मुंबई जैसी हालत बन चुके हैं, जो काफी चिंताजनक होने के साथसाथ हैरान करने वाली बात है. पंजाब ने अतीत में सिख चरमपंथियों द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का खूनी और हिंसक दौर अवश्य देखा था, लेकिन संगठित, आक्रामक और खुल्लमखुल्ला कानून एवं व्यवस्था को चुनौती देने वाले संगठित अपराध के मामले में उस का कोई इतिहास नहीं रहा है.

मादक पदार्थों के धंधे ने पंजाब में अनेक क्रिमिनल गैंग पैदा किए हैं. कल तक जो आपराधिक मानसिकता वाले नौजवान आतंकवाद की तरफ आकर्षित हो रहे थे, वे अब मादक पदार्थों के धंधे में ऊंचे मुनाफे को देखते हुए क्रिमिनल गैंग तैयार करने लगे हैं.

देखते ही देखते पंजाब में अनेक खतरनाक क्रिमिनल गैंग तैयार हो गए और पुलिस एक तरह से कुंभकर्णी नींद सोती रही. इन क्रिमिनल गैंगों को किसी न किसी रूप से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था. शायद यह भी एक बड़ी वजह थी कि पुलिस लगातार चुनौती बनते जा रहे गैंगों के विरुद्ध प्रभावी काररवाई नहीं कर सकी और ये गैंग दुस्साहसी और खतरनाक होते गए.

कुकुरमुत्तों की तरह पंजाब में क्रिमिनल गैंग पैदा हुए तो जल्दी ही जरायम की दुनिया में वर्चस्व को ले कर उन में आपसी मारकाट शुरू हो गई. यह गैंगवार पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया. खूनी गैंगवार को रोकने के लिए पुलिस पर जब दबाव पड़ा तो उस ने कुछ गैंगस्टरों को गिरफ्तार कर के जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

पर गैंगस्टरों के खिलाफ कोई भी काररवाई करने में पुलिस ने बड़ी देर कर दी. गैंगस्टर अब तक बडे़ खतरनाक और दुस्साहसी हो चुके थे. सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करने वाले गैंगस्टरों की धमक और हिम्मत का सही अंदाजा पुलिस को उस समय कुछकुछ हुआ, जब वे पुलिस पर हमला कर के हिरासत से अपने साथियों को छुड़ाने के साथ अपने विरोधियों को मारने जैसी अत्यंत दुस्साहस से भरी काररवाइयां करने लगे.

सभी गैंगस्टर कमोवेश जवान हैं और उन के काम करने का स्टाइल फिल्मों से प्रभावित लगता है. वे सोशल मीडिया पर पुलिस को खुल्लमखुल्ला चुनौती देते हुए विरोधी ग्रुप के लोगों की हत्या करने और जेल में बंद अपने साथियों को छुड़ाने जैसी बात कहने लगे हैं. पुलिस ने शुरू में ऐसी धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया. आतंकवाद जैसा गंभीर समस्या का सामना कर चुकी पंजाब पुलिस का खयाल था कि गैंगस्टरों में इतनी हिम्मत नहीं कि जेलों में बंद अपने साथियों को जेल से छुड़ा सकें.

पुलिस का उक्त खयाल उस की खुशफहमी ही साबित हुआ. गैंगस्टरों ने जैसा कहा, वैसा कर के दिखा भी दिया. आतंकवादी भी ऐसी हिम्मत कर सके थे, जैसी हिम्मत इन गैंगस्टरों ने कर दिखाई. पंजाब की नाभा जेल काफी सुरक्षित मानी जाती रही है.

नाभा जेल को सुरक्षित और अभेद्य समझते हुए खूंखार और खतरनाक अपराधियों को उसी में रखने को सुरक्षा एजेंसियां प्राय: प्राथमिकता देती रही हैं. गिरफ्तारी के बाद पंजाब के खतरनाक विक्की गौंडर गैंग के कुछ खूंखार सदस्यों को इसी जेल में रखा गया था.

27 नवंबर, 2016 को चौंकाने वाली अप्रत्याशित काररवाई करते हुए विक्की गौंडर गैंग के सदस्यों ने पूरी तैयारी के साथ बेहद सुरक्षित मानी जाने वाली नाभा जेल पर धावा बोल कर सारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए वहां बंद अपने 6 साथियों को छुड़ा कर फिल्मी अंदाज में भाग खड़े हुए. गौंडर गैंग के सारे सदस्य पुलिस की वरदी में आए थे.

नाभा जेल की इस घटना ने यह साबित कर दिया कि पंजाब में सक्रिय क्रिमिनल गैंग कितने खतरनाक हो चुके हैं और वे जैसा कहते हैं, वैसा करने में समर्थ भी हैं. नाभा जेल से अपराधियों को भगाने के मास्टरमाइंड विक्की गौंडर ने इस के बाद विरोधी गैंग के लोगों पर हमले शुरू कर के गैंगवार को और भयानक रूप दे दिया.

सारी कोशिशों के बाद भी पुलिस खतरनाक और तेजतर्रार गैंगस्टरों के सामने असहाय और फिसड्डी साबित हुई. पुलिस की सारी सावधानियां और दावों के बावजूद नाभा जेल से अपराधियों को भगाने के लिए जिम्मेदार गैंगस्टर विक्की गौंडर ने अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर 20 अप्रैल, 2017 को गुरदासपुर के गांव कोठे पराला में दुश्मन गैंग के सरगना हरप्रीत उर्फ सूबेदार और उस के 2 साथियों सुखचैन तथा हैप्पी को सरेआम मौत के घाट उतार दिया.

इतना ही नहीं, अपने खूनी कारनामे को महिमामंडित करते हुए इस घटना को फेसबुक पर भी डाला. इस वारदात के बाद पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि गैंगस्टरों को ले कर पंजाब में स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और अगर शीघ्र ही इस से निपटा नहीं गया तो पंजाब की शांति को एक बार फिर से खतरा हो सकता है. हिंसा, हिंसा है, यह आप की मर्जी है कि इस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाएं या आम अपराध का.

पंजाब में गैंगवार की स्थिति कितनी विस्फोटक और गंभीर हो रही है, इस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब सरकार मकोका की तर्ज पर पकोका कानून बनाने की तैयारी कर रही है. स्मरण रहे कि मकोका की मदद से मुंबई पुलिस को अपराधियों से निपटने में आसानी हुई थी.

पंजाब पुलिस की माने तो इस समय पंजाब में 60 के करीब छोटेबड़े गैंग सक्रिय हैं. इन गैंगों से जुड़े 35 गैंगस्टर को पुलिस बेहद खतरनाक मानती है और शीघ्र ही उन्हें जेल की सलाखों के पीछे देखना चाहती है. गैंगस्टरों को काबू किए बिना नशे के कारोबार पर अंकुश लगाना मुश्किल है.

पंजाब के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि अपराधियों के प्रति कठोर रवैया रखने वाले प्रशासक वाली रही है. हालिया चुनाव उन्होंने पंजाब के लिए नासूर बन चुके नशे के मुद्दे पर जीता है. ऐसे में नशे की समस्या के साथसाथ गैंगस्टरों से भी निपटना उन के लिए दोहरी चुनौती है.

तुम्हारी सुलु : विद्या बालन का दमदार अभिनय

फिल्म की पटकथा चाहे जितनी कमजोर हो, मगर कलाकार अपने अभिनय के दम पर उस फिल्म को काफी हद तक रोचक बना सकता है. इसका ताजातरीन उदाहरण है फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’, जो महज विद्या बालन के दमदार अभिनय के लिए देखी जा सकती है.

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता विद्या बालन ने उपनगरीय मध्यमवर्गीय परिवार की गृहिणी के साथ साथ रेडियो पर फोन करने वालों से सेक्सी बातें करने वाली आर जे तक के किरदार को जिस तरह से निभाया है, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है.

फिल्म ‘‘तुम्हारी सलु’’ की कहानी मुंबई महानगर से सटे विरार इलाके में रहने वाली सुलोचना उर्फ सुलु (विद्या बालन) के इर्द गिर्द घूमती है. सुलोचना (विद्या बालन) एक मध्यम वर्गीय गृहिणी है, जो कि अपने प्यारे पति अशोक दुबे (मानव कौल) और अपने बेटे प्रणव दुबे के साथ रहती है. उसके पास लक्जरी सुविधाओं से युक्त तीन बेडरूम का फ्लैट भले नहीं है, पर वह खुश रहती है. वह घर के आस पास कई तरह की प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनती रहती हैं. उसे ‘निंबू चमचा दौड़’ में पुरस्कार भी मिलता है.

सुलोचना के अंदर आत्म विश्वास है कि मैं कुछ भी कर सकती हूं. एक दिन सुलोचना के मन में रेडियो जाकी बनने का ख्याल आता है और वह स्थानीय रेडियो स्टेशन पर आडीशन देने जाती है. रेडियो स्टेशन की मालकिन मारिया (नेहा धूपिया) को सुलोचना के अंदर एक जोश नजर आता है. वह उन्हे देर रात प्रसारित होने वाले कार्यक्रम को करने के लिए रख लेती है. इस कार्यक्रम को नाम दिया जाता है-‘तुम्हारी सुलु’.

इस कार्यक्रम में सुलोचना को श्रोताओं के फोन करने पर उनसे बात करनी होती है, जो कि फ्लर्ट करने वाली बातें करना व सुनना चाहते हैं. पति की तरफ से पूरा सहयोग मिलते हुए भी सुलोचना खुद को एक मोड़ पर फंसी हुई पाती हैं. वास्तव में एक दिन उन्हे पता चलता है कि उनके  बेटे की कुछ गलत हरकतों की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया है. अब वह अपने सपने को पूरा करने और एक सही मां बनने के बीच खुद को फंसी हुई पाती है. अब सुलोचना को लगता है कि ‘मैं कर सकती हूं’ का उनका मंत्र महज एक भ्रम ही था. वह रेडियो की आरजे वाली नौकरी छोड़ देती हैं. पर हिम्मत नहीं हारती. बेटे की पढ़ाई का ख्याल रखते हुए टिफिन सेवा से लेकर कुछ दूसरे काम करती है और फिर एक दिन पुनः ‘आरजे’ बन जाती है.

विज्ञापन फिल्में बनाते आ रहे सुरेष त्रिवेणी की बतौर लेखक व निर्देशक यह पहली फिल्म है, जिसमें वह सफल नहीं हैं. फिल्म की कथा कथन शैली काफी सहज और वास्तविक है. पर पटकथा काफी कमजोर है. कहानी के नाम पर फिल्म में टीवी सीरियल की ही तरह कुछ घटनाक्रम हैं. फिल्म की शुरुआत धीमी गति से होती हैं, पर फिर विद्या बालन अपने अभिनय के दम पर फिल्म को संभाल लेती हैं. मगर इंटरवल के बाद फिल्म लेखक व निर्देशक के हाथ से निकलती हुई नजर आती है.

सुरेष त्रिवेणी ने पति पत्नी के बीच प्यार व झगड़े के दृश्यों व अन्य पलों को फिल्म में बड़ी खूबसूरती से पिरोया है. इंटरवल के बाद फिल्म में नाटकीयता होने के बावजूद रोचकता नहीं रह जाती है. फिल्म का क्लायमेक्स गड़बड़ है. सुलोचना के बेटे प्रणव के स्कूल से जुड़े मुद्दों को और बेहतर तरीके से पेश किया जाना चाहिए था. फिल्म देखते समय दर्शक के दिमाग में ‘‘भाबी जी घर पर हैं’’ या ‘‘रजनी’’ जैसे कई टीवी सीरियल घूमने लगते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो विद्या बालन ने एक बार फिर साबित कर दिखाया है कि वह किसी भी किरदार को अपने बलबूते पर यादगार बना सकती हैं. वह पूरी फिल्म को अपने कंधों पर बड़ी सहजता से आगे लेकर चलती हैं. उपनगर में रहने वाली, बारवहीं फेल महिला जो कि इस बात में यकीन करती है कि ‘मैं कर सकती हूं’ कई तरह की प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज करते कराते अचानक देर रात रेडियो पर सेक्सी कार्यक्रम में श्रोताओं से बात करने वाली आर जे बनने तक हर रूप में वह बहुत सहज लगती हैं. लोगों के दिलों से इस कदर जुड़ती हैं कि कमजोर कहानी व पटकथा के बावजूद दर्शक फिल्म से जुड़ा रहता है.

विद्या बालन ने कामेडी के साथ साथ हंसी, पति से अनबन, बेबसी आदि सभी भावों को जबरदस्त व अति सहज रूप में अपने अभिनय से पेश किया है. अशोक के किरदार में मानव कौल ने भी काफी बेहतरीन काम किया है. उनके फ्रस्टेशन के सीन कुछ ज्यादा ही अच्छे बन पड़े हैं. स्टूडियो मालकिन मारिया के किरदार में नेहा धूपिया ने लंबे समय बाद काफी अच्छी परफॅार्मेंस दी है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘तुम्हारी’’ सुल्लू का निर्माण ‘टी सीरीज’ के साथ मिलकर अतुल कस्बेकर और शांति शिवराम मैनी ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक सुरेश त्रिवेणी, संगीतकार गुरू रंधावा, रजत नागपाल, तनिष्क बागची, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कैमरामैन सौरभ गोस्वामी तथा कलाकार हैं-विद्या बालन, मानव कौल, नेहा धूपिया, विजय मौर्य, मलिष्का, अभिषेक शर्मा, सीमा तनेजा, शांतनु घटक व अन्य.

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