प्रियंका को 12 करोड़ और दीपिका को सिर्फ 8 करोड़, जानिये क्यों

इस समय बौलीवुड की देसी गर्ल यानी प्रियंका चोपड़ा अपने अमेरिकी टीवी शो क्वांटिको के सीजन 3 की शूटिंग में बिजी हैं. वहीं उनके भारतीय फैन उन्हें जल्द ही किसी बौलीवुड फिल्म में देखने के लिए बेताब हैं. हालांकि अच्छी बात यह है कि वो नियमित तौर पर अपनी जिंदगी और काम से जुड़े हुए अपडेट्स लोगों को देती रहती हैं. जिससे उनके फैंस खुश रहते हैं.

उनके इतने बड़े फैन बेस और उनकी हाई डिमांड को देखते हुए एक अवौर्ड शो उन्हें 30 मिनट की परफौर्मेंस के लिए 12 करोड़ रुपए देने को राजी हो गया था.

कुछ महीनों पहले एक अवौर्ड शो में उन्हें परफौर्म करने के लिए कहा गया था लेकिन उन्होंने मना कर दिया क्योंकि वो खुद को मिल रहे पैसे से खुश नहीं थीं. वो अब इंटरनेशनल स्टार हैं इसी वजह से उन्हें उसी मुताबिक पैसा मिलना चाहिए.

उन्हें उम्मीद थी कि बौलीवुड के टौप हीरो के अनुसार ही उन्हें राशि औफर की जाएगी. वहीं अगर दीपिका पादुकोण की बात करें जो ट्रिपल एक्स के जरिए हौलीवुड डेब्यू कर चुकी हैं लेकिन उन्हें पूरी फिल्म के लिए केवल 8 करोड़ रुपए मिलते हैं.

दीपिका ही नहीं बल्कि बौलीवुड के टौप एक्ट्रेसेज को पूरी फिल्म के लिए भी 12 करोड़ रुपए नहीं मिलते जितने की प्रियंका को केवल आधे घंटे की परफौर्मेंस के लिए औफर किए गए थे. इसके बाद भी उन्होंने इसे ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें सलमान और शाहरुख के बराबर की राशि चाहिए थी.

हाल ही में प्रियंका की टीम ने उनका एक वीडिया शेयर किया था. जिसमें एक्ट्रेस अपने को-स्टार रोशेल टौवे के साथ गाड़ी में मस्ती करती हुई नजर आ रही हैं. हालांकि वीडियो में उस वक्त ट्विस्ट आता है जब गाड़ी के दरवाजे से लटक रहीं प्रियंका अचानक से नीचे गिर जाती हैं और उसी बीच उनके हंसने की आवाज आती है और देखने वाले कंफ्यूज हो जाते हैं. क्योंकि वह दृश्य एक स्क्रीन के आगे फिलमाया गया होता है.

फिलहाल प्रियंका चोपड़ा अपने नए प्रोजेक्ट यानी क्वांटिको की सीक्वल में व्यस्त हैं जिसकी वजह से उनका भारत आ पाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है. प्रियंका चोपड़ा की आखिरी हिन्दी फिल्म ‘जय गंगाजल’ थी जिसका निर्देशन प्रकाश झा ने किया था.

पुलिस वहशी थी, है और रहेगी

यह शायद पहला मौका था, जब खुद सरकार ने माना था कि पुलिस वालों ने वहशीपन किया है. मामला मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के टीकमगढ़ जिले का है. यहां बीती 3 अक्तूबर को कुछ किसान कलक्टर को ज्ञापन देने गए थे कि टीकमगढ़ जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया जाए. जैसा कि आमतौर पर होता है कलक्टर साहब ने हैरानपरेशान किसानों से मिल कर उन का दुखड़ा सुनना फुजूल की बात समझी और अपने कमरे से भी बाहर नहीं आए.

इस बात पर गुस्साए किसानों ने धरनाप्रदर्शन और आंदोलन कर डाला, जो उन का हक था. इन किसानों के हाथ में कोई हथियार नहीं थे, न ही ये कोई हिंसा या तोड़फोड़ कर रहे थे, बल्कि अपनी एक जायज मांग से जिले के मुखिया को वाकिफ कराते हुए उन का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे थे, जिस से सरकारी इमदाद और राहत मिल सके.

जाने क्यों पुलिस को किसानों का प्रदर्शन करना इतना नागवार गुजरा कि उस ने गांवों की तरफ लौट रहे किसानों की ट्रौलियां रोकीं और उन्हें गिरफ्तार करना शुरू कर दिया.

इस ज्यादती पर किसानों ने विरोध दर्ज कराया, तो देखते ही देखते पुलिस वाले वहशी हो उठे. टीकमगढ़ के देहात थाने में किसानों को ले जा कर उन के बदन पर चड्डी छोड़ कर सारे कपड़े उतरवा दिए गए और उन की बेरहमी से धुनाई की गई.

दुनावर गांव के एक किसान रतिराम का कहना है, ‘हम तो घर वापस जा रहे थे, पर पुलिस वालों ने हमें रोका और कोतवाली ले जा कर खूब मारापीटा. 2 घंटे नंगधड़ंग हालत में थाने में भूखाप्यासा बिठाए रखा.

‘हमारा कुसूर इतना भर था कि हम चाह रहे थे कलक्टर साहब हमारी मांगें सुन लें. इस का खमियाजा हमें यों पीट कर और बेइज्जत हो कर भुगतना पड़ेगा, यह तो हम ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.’

थाने में किसानों को अधनंगा बिठा कर उन की धुनाई की जा रही है, यह बात फैली तो एक कांग्रेसी नेता और मंत्री रह चुके यादवेंद्र सिंह अपने समर्थकों समेत थाने गए और जैसेतैसे दहशत में आ गए थरथर कांपते किसानों को छुड़ाया.

राज्य में इस वहशीपन को ले कर हल्ला मचा, तो सरकार के कान खड़े हो गए और उस ने मामले को ठंडा करने के लिए जांच का ऐलान कर दिया.

जांच हुई और इस की रिपोर्ट राज्य के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह के पास गई, तो उन्होंने माना कि रिपोर्ट में थाने के  मुलाजिमों को कुसूरवार पाया गया है, पर कपड़े उतरवाने की बात पर उन्होंने बचकाना बयान यह दिया कि चूंकि कपड़े पहने लोग खुदकुशी कर लेते हैं, इसलिए कपड़े उतरवाए गए होंगे. कुसूरवारों को लाइन हाजिर कर दिया गया है.

जाहिर है, यह कोई सजा नहीं है, बल्कि पुलिस की बर्बरता को ढकने का रिवाज भर है. मध्य प्रदेश के ही नीमच में किसान आंदोलन में 6 किसान गोली चलने से मारे गए थे. इस गोलीकांड की जांच भी चल रही है और उम्मीद है कि तब तक चलती रहेगी, जब तक लोग इसे भूल नहीं जाएंगे.

पूरे कुएं में ही भांग है

टीकमगढ़ की घटना के दूसरे दिन ही उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के थाना रसूलपुर में एक नौजवान मुकेश राठौड़ को पुलिस ने इतनी बेरहमी से धुना था कि वह मौत के मुंह तक पहुंच गया था.

मुकेश की आसफाबाद रेलवे फाटक के नजदीक कपड़े की छोटी सी दुकान थी. हादसे के दिन उस की मामूली कहासुनी पड़ोसी दुकानदार राजाराम से बाइक खड़ी करने पर हुई थी. राजाराम ने तो मुकेश को मारा ही और पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी.

पुलिस मुकेश को उठा कर थाने ले गई और वहां उस की पिटाई जानवरों की तरह की गई. बेतहाशा पिटने पर उस की हालत बिगड़ी, तो उस के पिता रामगोपाल को खबर कर दी गई.

तकरीबन मरने की सी हालत में पुलिस उसे आगरा इलाज के लिए ले गई और अस्पताल में भरती करा कर वापस चली आई.

बाद में मुकेश के घर वाले उसे इलाज के लिए फिरोजाबाद ले आए और पुलिस के आला अफसरों से शिकायत की. इस मामले में भी कार्यवाही के नाम पर जांच का भरोसा दे कर चलता कर दिया गया.

मुकेश तो वक्त पर इलाज मिलने से बच गया, लेकिन बिहार में गोपालगंज के बाशिंदे धीरज गुप्ता को कोई डाक्टर नहीं बचा सका.

एक मामले में धीरज जेल में बंद था यानी विचाराधीन कैदी था. गोपालगंज जेल में बीती 18 अक्तूबर को पुलिस वालों ने मारमार कर उस की हत्या कर दी.

धीरज के घर वालों ने उस की मौत का जिम्मेदार पुलिस को ठहराया था, लेकिन पोस्टमार्टम के बाद जांच का राग अलाप कर पुलिस के वहशीपन पर परदा डाल दिया गया.

पुलिस वाले कितनी बेरहमी से आम लोगों पर मामूली बात या फिर बिना बात के भी कहर ढाते हैं, इस की एक मिसाल 4 अक्तूबर को ही पंजाब के मोहाली में देखने में आई थी.

दशहरे के दिन पुलिस ने चोरी के इलजाम में कुमड़ा के 6 नौजवानों को उठा कर हवालात में बंद कर दिया था.

जबरन चोरी की वारदात कबूल करवाने के लिए पुलिस ने इन नौजवानों के साथ जो सुलूक किया, उसे सुन कर किसी का भी दिल दहल सकता है. लगातार 5 दिनों तक सिकंदर, राम, हरप्रीत, अनिल, कपिल और हीरा नाम के नौजवान को बारीबारी से दिनरात मारापीटा गया.

बेतहाशा पिटाई के बाद भी ये खुद को बेगुनाह बताते रहे, तो झल्लाई और गुस्साई पुलिस ने इन्हें बिजली का करंट भी लगाया.

इधर, इन के घर वाले 5 दिनों तक थाने के चक्कर काटते रहे, पर उन की कोई सुनवाई नहीं हुई, तो वे हाईकोर्ट गए और वहां इंसाफ की गुहार लगाई. इस पर मदहोश पुलिस वालों को होश आया, क्योंकि हाईकोर्ट ने इन्हें रिहा करने का हुक्म दिया था.

बाद में पता चला कि इन नौजवानों की कार में सवार कुछ लोगों से मामूली बात पर कहासुनी हो गई थी, तो इन रसूखदारों ने उन्हें चोरी के इलजाम में फंसा दिया.

इन में से एक नौजवान सिकंदर का कहना है कि कार वालों की शिकायत पर पुलिस ने उन्हें पकड़ा और कुछ देर बेवजह इधरउधर घुमाती रही, बाद में इन्हें खरड़ के सीआईए के दफ्तर में ले जा कर चोरी की वारदात कबूल करने का दबाव बनाया गया. बात न मानने पर प्राइवेट पार्ट और छाती में करंट लगाने जैसी वहशी हरकत की गई.

गरीबों पर कहर

दरअसल, पुलिस के वहशीपन में दबंगों का भी बड़ा हाथ रहता है. इन की ज्यादती के शिकार ज्यादातर गरीब, बेबस, मजलूम और छोटी जाति के ही लोग होते हैं. इस तबके के लोगों का कोई माईबाप नहीं होता, न ही इन की सुनवाई कहीं होती, इसलिए ये पुलिस के लिए सौफ्ट टारगेट होते हैं.

जो दबंग और रसूखदार खुद सीधे गरीबों को मारने से कतराते हैं, वे घूस दे कर पुलिस का सहारा लेते हैं. कभी किसी रईस आदमी को पुलिस की ज्यादती का शिकार होते शायद ही किसी ने देखा या सुना हो.

मेरठ के गैसूपुर गांव के दबंग बाशिंदे शिवम का मोबाइल फोन चोरी हो गया था. महज शक की बिना पर शिवम और उस के साथियों ने 7 साला राजा और

11 साला अक्षय को चोरी का जुर्म कबूलवाने के लिए कुएं में उलटा लटका दिया और राजा के हाथ की उंगलियां काट कर उसे डराया गया.

इस पर भी बात नहीं बनी, तो शिवम और उस के साथी इन दोनों को आसफाबाद पुलिस चौकी ले कर पहुंच गए. हैवानियत की यह इंतिहा ही थी कि पुलिस चौकी में पुलिस वालों ने शिवम के साथ मिल कर इन दोनों को खूब मारापीटा.

खबर मिलने पर इन दोनों के घर वालों ने चौकी जा कर गुहार लगाई, तो उम्मीद के मुताबिक कोई सुनवाई नहीं हुई. बच्चों की हालत जब ज्यादा बिगड़ गई, तो उन्हें उन के घर वालों के हवाले कर दिया गया.

गरीब घर वालों ने हिम्मत जुटाते हुए एसएसपी मंजिल सैनी से शिकायत की और बच्चों के बदन के जख्म दिखाए, तो दोनों की मैडिकल जांच कराई गई. एसएसपी मंजिल सैनी की पहल पर शिवम और उस के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया.

मेरठ का ही एक और चिंताजनक मामला शास्त्रीनगर का है, जिस में पुलिसिया कहर की शिकार एक बेगुनाह दलित औरत सरोज बाई बनी.

सरोज ने इसी साल जून महीने में सोनू नाम के नौजवान को शादी के बाबत 20 हजार रुपए उधार दिए थे. तयशुदा वक्त पर सोनू ने सरोज के पैसे वापस नहीं किए, तो उस ने इस की शिकायत पुलिस में की.

गई थी इंसाफ मांगने, पर मिली यातना. पुलिस वालों ने ग्राम प्रधान बाबूराम के इशारे पर सरोज को थाने बुला कर लाठीडंडों से पीटा. इतना ही नहीं, पुलिस वालों ने उस के ही खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया.

सरोज की हालत बिगड़ी, तो पुलिस वालों ने इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया. 4 दिन तक जेल में सरोज को इतनी यातनाएं दी गईं कि वह 22 अक्तूबर तक इलाज कराती फिरी. लेकिन हिम्मत न हारते हुए उस ने पुलिस ज्यादती के खिलाफ एससीएसटी अदालत में मामला दर्ज कराया.

अदालत ने सरोज के आरोपों को सही ठहराते हुए थानेदार समेत पूरे थाने के ही खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का हुक्म दे दिया.

पैसा हो तो बच जाते हैं

भोपाल के एक सीनियर पुलिस अफसर की मानें, तो सच तो यह है कि पुलिसिया कहर से बचने का एकलौता रास्ता चढ़ावा है, जो ज्यादातर लोग देते भी हैं, फिर भले ही इस के लिए उन्हें जमीनजायदाद और जेवरात बेचने पड़ें या भारी सूद पर कर्ज लेना पड़े.

रिटायर होने जा रहे इस इंस्पैक्टर के मुताबिक, पुलिस ज्यादती के महज 10 फीसदी मामले उजागर हो पाते हैं और कोई इन मामलों पर ध्यान नहीं देता.

खबरिया चैनलों पर धर्म पर बहस होती है, राजनीति पर बहस होती है, लेकिन कभी पुलिस ज्यादती पर नहीं होती. जाहिर है, यह जागरूकता की कमी की वजह से है.

पुलिस ज्यादती के 90 फीसदी शिकार गरीब और दलित तबके के लोग ही होते हैं. 10 फीसदी लोग थोड़े पैसे वाले और अकसर ऊंची जाति के होते हैं.

ये लोग कुछ लेदे कर ठुकाई से बच जाते हैं, जबकि इन्होंने वाकई में छोटा हो या बड़ा जुर्म किया होता है, लेकिन गरीब अकसर शक की बिना पर पकड़े जाते हैं और हवालात में लातघूंसे और बिजली का करंट खाते हैं.

खौफनाक तरीके से पिटाई

सच उगलवाने के नाम पर पुलिस जिन तरीकों का इस्तेमाल करती है, बोलचाल की जबां में उन्हें थर्ड डिगरी कहते हैं. इस पिटाई के जो स्पैशल तरीके चलन में हैं, उन में पहला है गिरफ्तार किए गए कैदी को ऐसी जगह मारना, जहां निशान कम पड़ें, जिस से पेशी के वक्त अदालत में पुलिस ज्यादती न दिखे.

एक खास किस्म की स्पैशल पिटाई जिसे देशभर में ‘आन मिलो सजना’ कहा जाता है, के तहत कैदी को नंगा कर हाथपैर बांध कर पीठ के बल लिटा

दिया जाता है. अव्वल तो इतने में ही कैदी कराहने लगता है, इस पर भी भारीभरकम डीलडौल वाला कोई पुलिस वाला उस के बदन पर चढ़ कर बैठ जाता है. फिर शुरू होती है बैल्ट या डंडे से कैदी की धुनाई, जो उसे उस की नानी याद दिला देती है.

एक और तरीका हैलीकौप्टर पिटाई के नाम से मशहूर या बदनाम है, जिस में कैदी के हाथपैर बांध कर उलटा लटका दिया जाता है. ऐसी हालत में खून का बहाव सिर की तरफ ही जाता है, जिस से कैदी को बेहद तकलीफ होती है और उस के सोचनेसमझने की ताकत जाने लगती है. इसी हालत में बैंतों से उस के जिस्म पर जगहजगह पिटाई की जाती है.

तीसरी तरह की खतरनाक पिटाई में कैदी के हाथपैर बांध कर उस की उंगलियों के बीच डंडा फंसा कर लगातार उसे दबाया जाता है. यह तरीका देशभर के थानों में आमतौर पर अपनाया जाता है, जिसे पुलिसिया जबां में ‘गिल्लीडंडा’ कहा जाता है.

सच उगलवाने के नाम पर झूठा जुर्म कबूलवाने के लिए कैदियों को भूखाप्यासा रखा जाता है और उन्हें सोने नहीं दिया जाता. ऐसे में हर कोई भले ही उस ने जुर्म न किया हो, मंजूर करने में ही अपनी भलाई और सलामती समझता है.

नहीं सुधरेंगे

भोपाल की एक आला अफसर बताती हैं कि आप या किसी भी पुलिस वालों से सुधरने की उम्मीद न रखें, क्योंकि हम पर नेताओं, अफसरों और बड़े कारोबारियों का दबाव रहता है. मीडिया वाले भी पीछे नहीं रहते. अगर मुजरिम जुर्म न कबूले, तो हमारी खाल उतारने में कोई रहम नहीं करता, फिर हम क्यों किसी से हमदर्दी से पेश आएं.

किसी मामले में हल्ला ज्यादा मचता है, तो कुसूरवार पुलिस वालों को कुछ वक्त के लिए सस्पैंड या लाइन हाजिर कर दिया जाता है, जो फिर वापस नौकरी पर आ जाते हैं. इस पर हर किसी का ध्यान नहीं जाता, क्योंकि तब तक मामला ठंडा पड़ चुका होता है.

समयसमय पर पुलिस की इमेज सुधारने की हर कहीं मुहिम चलती हैं, पर वह टांयटांय फिस होे कर रह जाती है, क्योंकि खुद पुलिस वाले नहीं चाहते कि उन की इमेज सुधरे. सुधरेगी तो उन्हें घूस मिलना बंद हो जाएगी और सारा रुतबा कोने में रखा रह जाएगा.

नरेंद्र मोदी सरकार ने 2 साल पहले पुलिस की इमेज सुधारने और दूसरी सहूलियतों के लिए 25 हजार करोड़ रुपए की भारीभरकम रकम मंजूर की थी. अब न तो सुधार का कहीं कोई पता है, न ही इस रकम का कि यह कहां गई?

मध्यकालीन लंदन की गंदगी और आज का भारत

दृश्य 1 : दिल्ली के आईटीओ के पास स्थित डब्लूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन की बिल्ंिडग. कहने को तो इस बिल्डिंग में दुनियाभर के स्वास्थ्य को दुरुस्त करने का काम जोरोंशोरों से निबटाया जाता है लेकिन बिल्डिंग के ठीक पीछे बसी झुग्गीझोंपडि़यों में पसरी गंदगी और जमे कीचड़ को देख कर चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आती है.

झुग्गियों में बस रही आबादी या कहें जहरीली गंदगी के बीच सांस लेती सैकड़ों जिंदगियां मल, कीचड़ और दुर्गंधभरे नाले के किनारे बसी हैं, जिसे यमुना भी कह सकते हैं. पौलिथीन के टैंटनुमा बनीं इन झुग्गियों में न तो शौचालय की समुचित व्यवस्था है, न ही नहाने के ठिकाने हैं. हाल यह है कि जरा से परदे की ओट में खाना और पाखाना कार्यक्रम एकसाथ समाप्त किया जाता है. बदबू इतनी कि उस इलाके के पास से निकलने में ही बदन गंधा उठे. बारिश के दिनों का तो हाल ही मत पूछिए.

दृश्य 2 : उत्तर प्रदेश, हमीरपुर जिले का मौदहा कसबा. यहां के पूर्वी तारौस में साफसुथरा तालाब हुआ करता था. जहां आसपास के लोग नहाते और कभीकभार कपड़े भी धोते. कुछ ही दिनों में तालाब के आसपास आबादी बसने लगी और मकान बनने लगे. चूंकि मलनिकासी के लिए कोई सरकारी व्यवस्था मुहैया नहीं कराई गई और सीवर या ड्रेनेज सिस्टम न होने के चलते शौचालयों से निकलने वाला मल पाइपलाइन के जरिए तालाब में छोड़ दिया गया, इसलिए देखते ही देखते पूरा तालाब मानवमल और उस की दुर्गंध से भर गया. वहां नहाना तो दूर, पास से निकलना तक दूभर हो गया. लगातार बढ़ती दुर्गंध से बीमारियां फैलने लगीं. तालाब तो सूख गया लेकिन मल और कूड़ेकचरे के भंडार से पूरा इलाका हलकान है.

दृश्य 3 : कानपुर का जाजमऊ इलाका. यहां मृत जानवरों की खालें उतार कर चमड़ा बनाने का काम होता है. पूरे इलाके में बड़ेबड़े स्टोररूमनुमा हौल में ट्रक भरभर के जानवरों के मृत शरीर लाए जाते हैं. फिर इन की खालें निकाल कर बाकी बचे अवशेष को ट्रकों में भरा जाता है.

इस पूरी प्रक्रिया में बेतहाशा खून भी बहता है और बदबू की तो पूछिए ही मत. इस के बावजूद इस इलाके में न तो समुचित ड्रेनेज व्यवस्था है जिस से खून, अवशेष निकासी की जा सके और न ही दुर्गंध से निबटने के लिए वैंटीलेशन का कोई इंतजाम है.

यही है स्वच्छ भारत?

21वीं सदी और वर्ष 2017 में उपरोक्त दर्शाए गए सारे दृश्य प्रतिनिधि ने स्वयं देखे और भुगते हैं. यकीन मानिए ऐसे दृश्य देश के हर शहर, सोसाइटी, कसबे व झुग्गी बस्तियों में आम हैं. अगर देश की हवा में जहर घुल चुका है तो इस की वजह बेलगाम गंदगी के ढेर और इस से निबटने में सरकार व प्रशासन की नाकामी है.

दलितपिछड़ों की झुग्गीबस्तियों के हाल छोड़ दीजिए, महानगरों के संभ्रांत इलाके के बहुमंजिली भवनों की नालियां, सीवर और गटर सड़कों पर गंदगी बहा रहे हैं. अरबों रुपए सरकार गटर और मैला पानी साफ करने के संयंत्रों पर खर्च करती है, लेकिन उस का असर कहीं नहीं दिखता. सारा पैसा फाइलों में ही दबा रहता है. जितना बड़ा शहर उतने ही ज्यादा शौचालय व उतनी ही दूषित नदियां. दिल्ली में यमुना हो, चाहे बनारस में गंगा. जो नदियां हमारी मान्यता में पवित्र हैं वे वास्तव में गटर बन चुकी हैं.

सरकार ने दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में अरबों रुपए खर्च कर मैला पानी साफ करने के संयंत्र स्थापित किए हैं, जो सीवेज ट्रीटमैंट प्लांट कहलाते हैं. पर नदियां दूषित ही बनी हुई हैं. ये सब संयंत्र दिल्ली जैसे महानगर में गटर का पानी बिना साफ किए यमुना में उड़ेल देते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की धज्जियां उड़ाते उपरोक्त दृश्य हम सब को दिख जाते हैं लेकिन सरकार, सफाई के लिए जिम्मेदार संस्थान व विभाग आंख मूंद कर सोया करते हैं और कागजों में पूरा देश साफसुथरा नजर आता है.

सरकारी विज्ञापनों में झाड़ू मारते हुए नेता सिर्फ सड़कों पर गिरे पत्तों को साफ करते दिखते हैं. किसी नेता को गली में फैले कीचड़ या गटर से बाहर निकलते मल को साफ करते किसी ने देखा क्या? नहीं. सरकारी आंखों से देखें तो गंदगी के नाम पर देशभर में कुछेक पेड़ों से गिरे पत्ते हैं जो सरकारी लोग साफ कर चुके हैं. बाकी गंदगी देख कर न तो उन की नाक के बाल जलते हैं और न ही उबकाई आती है. आएगी भी कैसे, सरकारी अनुदान पर मिले बंगलों व एयरकंडीशंड कमरों की खिड़की से यह सब भला कहां नजर आता है.

देशभर के रिहायशी इलाके में जा कर देख लीजिए, ड्रेनेज सिस्टम ठप पड़ा है, सैक्टर की मार्केट हो या गली या लोकल बाजार, हाट सभी जगह ड्रेनेज सिस्टम ब्लौक है. गलियों में जलभराव की स्थिति बनी रहती है. मानसून का मौसम शुरू होते ही ठप ड्रेनेज सिस्टम से लोगों के घरों में गंदा पानी घुस जाता है. हालत यह है कि ड्रेनेज सिस्टम की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारी कचरा वहीं पर छोड़ कर चले जाते हैं जो आने वाले समय में सड़ कर बीमारी व दुर्गंध का कारण बनता है. जगहजगह सीवर के गटर खुले हैं, जिन से बदबू व बीमारियां फैल रही हैं. रात के अंधेरे में ये गटर नजर नहीं आते और हादसे हो जाते हैं.

तब और अब का लंदन

ऐतिहासिक मानकों में आज लंदन शहर दुनिया का सब से साफसुथरा, बेहतरीन ड्रेनेज, सीवर सिस्टम से लैस और साफसुथरी नदियों के लिए जाना जाता है. आज लंदनवासी रोज नहाते हैं, घरों से कूड़ा समय पर कलैक्ट होता है. लेकिन क्या आप को पता है कि 14-15वीं शताब्दी यानी मध्यकालीन दौर में लंदन से गंदी जगह शायद की कोई और रही हो.

गंदगी से निबटने के मामले में जो अपंगता आज भारत में दिखाई दे रही है वह कभी मध्यकालीन समय के लंदन में भी थी. आज जब लेखक डैन स्नो उस दौर के लंदन की गंदगी और दुर्गंधभरी तसवीर सामने रखते हैं तो यकीन नहीं होता कि तब का गंदा और बदबूदार लंदन आज दुनियाभर के पर्यटकों के लिए साफसुथरा मनोरम पर्यटन स्थल बन चुका है.

डैन के मुताबिक, मध्यकालीन समय में लंदनवासी दुर्गंध से भरे होते थे क्योंकि तब रोज नहाने का चलन नहीं था. पर्सनल सैनीटेशन पर ध्यान नहीं दिया जाता था. हालांकि, इस के पीछे वहां के भौगोलिक हालात भी जिम्मेदार थे. मसलन, नहाने के लिए नदियां ही एक मात्र जरिया थीं. लेकिन वे इतनी गंदगी से लबालब होती थीं कि उन में नहाना मुश्किल होता था. नदियों में मानव मल से ले कर कलकारखानों की गंदगी व रसायन जमा होते थे.

जाहिर है नदियों की हालत बेहद खराब हो जाती थी. बेहद ठंड के समय टेम्स जैसी नदी बर्फ में तबदील हो जाती थी तो नहाना और कपड़े धुलना असंभव हो जाता था ऐसे में लंदनवासी कई दिनों तक बिना नहाएधोए गंदे रहते और परफ्यूम्स से ही काम चलाते.

लंदन की गलियों का हाल तो इस से भी बुरा होता था. उस दौर में न तो सीवर व ड्रेनेज का सही सिस्टम था और नालियां भी प्रणालीबद्ध नहीं थीं. लिहाजा, घरों की गंदगी, कचरा, गोबर, मल आदि सब गलियों में पसरा रहता जिस से बीमारियां फैलतीं और राह चलना भी मुश्किल होता. हालत यह थी कि उस दौर में लोग पैटन (एक खास तरह के जूते जिन के तलों पर ऊंची लकड़ी का बेस लगा होता था ताकि सड़क की फैली गंदगी से पैर बचे रहें) इस्तेमाल करते थे.

लंदन के कसाईखानों की हालत तो इस से भी बदतर थी. जानवरों की खाल निकाल कर चमड़ा बनाने की प्रक्रिया में इतनी गंदगी और दुर्गंध फैलती कि सारा शहर दुर्गंध से पट जाता. फैक्टरियों का रसायन तो इस में उत्प्रेरक का काम करता. कई बार तो बदबू और गंदगी से पैदा होने वाली जहरीली गैसें मुंह तक जला देती थीं.

शौचालयों का हाल तो इस से भी बदतर था. अमीरवर्ग के घर से मल उठाने का काम गोंग फार्मर (मानव मल ढोने वाला तबका) करते थे. आज वही काम भारत में मैला ढोने वाले दलित करते हैं. इन्हें उस समय अच्छा मेहनताना मिलता था. रात में ये मल ढो कर कभी गड्ढों में जमा करते तो कभी नदियों में डाल देते और बारिश में कई बार यही गलियां मानव मल से भर जातीं.

कुल मिला कर उस दौर में लंदन सब से ज्यादा गंदा व बदबूदार शहर था. लेकिन ये हाल तब के हैं जब सीवर, ड्रेनेज और जलनिकासी की आधुनिक तकनीकें विकसित नहीं हुई थीं. समय बदला और अपनी मेहनत, तकनीक व कर्मण्यता के दम पर इस शहर ने अपनी गंदी और बदबूदार तसवीर को स्वच्छ लंदन में तबदील कर दिया.

लंदन बनाम भारत

अब इतनी गंदगी में जरा सोचिए कि लंदन ने किस तरह से अपना अस्तित्व बचा कर रखा होगा. सिर्फ अस्तित्व बचा कर ही नहीं रखा, बल्कि समय के साथसाथ जलमल निकासी, गटर व ड्रेनेज सिस्टम से ले कर सीवर की आधुनिक तकनीक ईजाद की. पूरे शहर को न सिर्फ गंदगी से दूर कर सफाई की सिस्टमैटिक प्रणाली स्थापित की बल्कि आज लंदन की नदियों को दुनिया की सब से स्वच्छ नदियों में शुमार किया जाता है. हर घर से कूड़ा समय पर जमा होता है. वेस्ट मैनेजमैंट की नई तकनीकें ईजाद कर उन से गैस व अन्य सार्थक उत्पादन हासिल किए जा रहे हैं. ढकी हुई नालियां और शहर के नीचे बहते गटर दुर्गंध का नामोनिशान नहीं फैलने देते.

यही वजह है जो दुनियाभर के पर्यटक इस शहर की साफ व्यवस्था की मिसाल देते हैं. पे टौयलेट से ले कर सफाई की हर उस तकनीक का इस्तेमाल आज लंदन में होता है जो लंदन को क्लीनैस्ट सिटी बनाता है. मध्यकालीन दौर के सड़े, दुर्गंधभरे लंदन से आज के नीटक्लीन लंदन तक का सफर तय करने में वहां की सरकार, सफाई विभाग और प्रशासन की सक्रियता के साथ आमजन की साफसफाई को ले कर जागरूकता ने प्रमुख भूमिका निभाई.

यहां लंदन का प्रसंग इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि आज हम लंदन के उसी मध्यकालीन और गंदे दौर में जी रहे हैं जहां सिर्फ गंदगी ही गंदगी है. सीवर, ड्रेनेज, गटर और जलमल निकासी के कोई इंतजाम नहीं हैं. तब न बिजली थी, न स्टीम इंजन. तब तकनीक का नामोनिशान न था, पंप नहीं थे. पानी के पाइप नहीं थे. सीवर का पाइप बनाने की तरकीब नहीं थी. कूड़े को ढंग से जमाने की व्यवस्था नहीं थी. वाहनों के नाम पर घोड़े थे जो लोट कर सड़कों को गंदा करते थे. आज हमारे पास सब तकनीक है पर हम आज भी 14-15वीं शताब्दी के लंदन की तरह रह रहे हैं.

राजधानी में हर कोना गंदगी व बीमारी फैलाने वाले कचरे से भरा पड़ा है. किसी घर से कूड़ा समय पर नहीं उठाया जाता. यमुना नदी सिवा जहरीले कचरे के ढेर के कुछ नहीं रह गई है. कलकारखानों का कैमिकल यमुना को जहरीले नाले में तबदील कर चुका है. सरकार व सफाई महकमा सब देख कर भी आंखें बंद किए रहते हैं.

सोचने वाली बात यह है कि हम आज दुनियाभर से हर नई तकनीक, उन्नत हथियार और यहां तक कि चीनी कूड़ा तक आयात कर रहे हैं लेकिन अपने शहरों, कसबों, गलीमहल्लों के लिए लंदन सरीखी वह तकनीक आयात नहीं कर पाए जो देश को साफ रख सके. वहां के ड्रेनेज, सीवर और गटर से जुड़ी नई व्यवस्था व नई प्रणाली समझने लायक नहीं हो पाए.

आज भी देश में पिछड़े और दलित मानव मल ढोने को मजबूर किए जाते हैं. हम आज चांद पर जाने और मेक इन इंडिया के जुमले दोहरा कर खुद को विश्वशक्ति बताते फिरते हैं. प्रधानमंत्री दुनियाभर में देश का महिमागान कर लौटते हैं लेकिन अपने गलीमहल्ले की गंदगी साफ करने की कूवत नहीं है हम में. चीन से मुकाबला करने और पाकिस्तान को नेस्तानाबूद करने की भभकियां दे सकते हैं हम लेकिन देश में गंदगी से लड़ने की क्षमता विकसित नहीं कर पाए आज तक.

शौचालय से ज्यादा स्मार्टफोन

बात भले ही मजाक में कही जाती हो लेकिन सच है कि भारत में शौचालयों से ज्यादा स्मार्टफोन हैं. सरकारें मुफ्त वाईफाई और इंटरनैट डाटा देने की बात तो करती हैं लेकिन साफसफाई करने, नदियों को पूजापाठ और कर्मकांडों के कूड़ेकचरे से बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाती हैं.

जिन प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चे देश के भविष्य के लिए तैयार हो रहे होते हैं, वहां के शौचालयों के अंदर पानी के लिए बालटी और मग भी नहीं रखा जाता. मलमूत्रभरे शौचालयों में ही बच्चे शौच करने को मजबूर होते हैं. मुंह व मलद्वार के माध्यम से संक्रमण के चलते अमीबियासिस तथा जिआरडियासिस जैसी बीमारियां हो जाती हैं. लाखों लोग शहर और कसबों में शौच जाने के लिए जगह तलाशते हैं, रेलवे के ट्रैक तो मानवमल की गंदगी से पटे पड़े हैं ही.

यही हाल अस्पतालों का है. खासकर सरकारी अस्पतालों में उतनी गंदगी पसरी होती है कि अच्छाखासा आदमी वहां से दस बीमारियां ले कर लौटता है.

कहने को मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान का शिगूफा छोड़ रखा है और फिल्मी हस्तियां खानापूर्ति के नाम पर झाड़ू लगा चुकी हैं लेकिन समूचा

देश आज भी गंदगी के भंडार पर बैठा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान के लिए 9 नामीगिरामी हस्तियों को इस अभियान का अगुआ बनाया. इस प्रोजैक्ट के तहत हजारों करोड़ रुपए का बजट रखा तो गया लेकिन उत्तर प्रदेश से खबर आई कि यहां अफसरों और पंचायतीराज विभाग का सिंडिकेट पीएम के स्वच्छ भारत अभियान पर भारी पड़ रहा है.

करीब 3 हजार करोड़ रुपए के शौचालय घोटाले के खुलासे पर जांच तो बिठाई गई लेकिन उस का कोई नतीजा आज तक नहीं निकला. इस घोटाले में पूर्व विभागीय मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य से ले कर तत्कालीन पंचायतीराज निदेशक डी एस श्रीवास्तव समेत तमाम नाम आए लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात. मध्य प्रदेश के उज्जैन में तो उज्जैन नगरनिगम के कर्मचारियों ने वृद्ध को ही मल साफ करने को विवश कर डाला. जबकि सफाई के नाम पर सरकारी वेतन यह विभाग खुद उठाता है.

ये हालात देख कर यह साफ हो जाता है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत सिर्फ स्वांग रचा गया जिस में न तो कोई ठोस सरकारी रणनीति अपनाई गई और न ही गंदगी से निबटने के लिए आमजन को इस अभियान से जोड़ने के लिए कोई खास सरकारी मशक्कत दिखी. फिर भी सरकार योजनाओं के ढेर पर बैठी खुद की पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रही है.

हम बना सकते हैं स्वच्छ भारत

वैसे तो यह काम सरकार और निगमों का है क्योंकि हमारी मेहनत की कमाई जब टैक्स के तौर पर कटती है तब सरकारी संस्थानों में वेतन बनता है और सरकारी योजनाओं का फंड भी उसी से निकाला जाता है. इस के बावजूद अगर  देश साफ नहीं होता है तो हमें मोरचा संभालना होगा.

सरकारी स्वांग योजनाओं से इतर अगर हम अपनी मानसकिता बदल कर साफसफाई को ले कर जागरूक हो जाएं, देश को गंदगीमुक्त किया जा सकता है. सब से पहले तो हमें धार्मिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होना पड़ेगा,  जहां यह बताया जाता है कि अपना कूड़ा साफ करने के लिए हमें दलित या पिछड़े वर्ग की जरूरत होगी. दक्षिण और पश्चिम एशिया के लोगों में अपने मलमूत्र के प्रति घृणा बहुत ज्यादा है. ये घृणा हमारे धार्मिक व सामाजिक संस्कारों में बस गई है.

अगर हम अपनी फैलाई गई गंदगी खुद ही साफ करने की आदत डाल लें तो इस समस्या से नजात मिल सकती है. देशविदेश में लोग अपना कूड़ा खुद साफ करते हैं. हम अपनी गली, महल्ले, सोसायटी की साफसफाई पर ध्यान रखना शुरू कर दें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें तो देश का एक बड़ा हिस्सा खुदबखुद गंदगी से मुक्त हो जाएगा.

अगर लंदन ने खुद को गंदगी के ढेर से हटा कर साफसुथरे शहर की छवि में कैद कर लिया है तो इस के पीछे की वजह है साफसफाई से जुड़ी उन्नत तकनीकों का प्रयोग. हमें इस मोरचे पर भी तैयार रहना होगा. कई देशों खासकर चीन, जापान, इंडोनेशिया में मलमूत्र को खाद बना कर खेतों में उपयोग करने की परंपरा रही है. हमारे यहां यह काम बड़े मानकों पर नहीं होता वरना हमें दोहरा लाभ होता. गंदगी से नजात मिलेगी और खाद व गैस का भी उत्पादन हो सकेगा.

इस के अलावा साफसफाई के काम से जुड़े श्रमिकों व कर्मचारियों के प्रति हमें अपने हेय दृष्टि से देखने वाले नजरिए को भी बदलना होगा. उन्हें उन के काम के एवज में सिर्फ धन देना काफी नहीं है. उन्हें उचित सम्मान भी देना होगा ताकि वे इस काम को ईमानदारी से करें.

कोई भी देश रातोंरात साफ या गंदा नहीं बनता. जैसे लंदन को मध्यकाल की गंदगी से निकलने में वक्त लगा, ठीक वैसे ही भारत को भी साफ होने में वक्त लगेगा. यह तभी संभव हो सकेगा जब हम लंदन और बाकी साफसुथरे देशों द्वारा अपनाए तरीकों, मेहनत व जागरूकता को अपना कर देश को साफ करने का संकल्प लें. वरना हम मध्यकालीन दौर के लंदन की गंदगी के जैसे ढेर पर यों ही बैठे रहेंगे और हमारी अगली पीढि़यां बीमार, सड़ेगले संक्रमित माहौल में सांस लेने को मजबूर रहेंगी.

स्वच्छता अभियान की पोल खोलते मंत्री महोदय

एक तरफ देश में स्वच्छ भारत अभियान और घरघर शौचालय का सरकारी ढोल जोरों से पीटा जा रहा है वहीं देश का एक वीआईपी मंत्री स्वच्छता के तमाम दावों की पोल खोलते हुए खुलेआम मूत्र विसर्जन करते दिखाई दे रहा है. कुछ दिनों पहले केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की एक तसवीर सोशल मीडिया में बड़ी तेजी से वायरल हुई. तसवीर में मंत्रीजी सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी में खुले में एक इमारत की दीवार पर पेशाब करते नजर आए.

तसवीर जैसे ही वायरल हुई, सफाई से जुड़े तमाम सरकारी दावों और अभियानों को ले कर आम लोगों की व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया आने लगी. कोई इस तसवीर को कृषि मंत्री के सिंचाई अभियान की शुरुआत बता रहा था  तो कोई मंत्रीजी की सादगी पर चुटकी ले रहा था.

मजाक अपनी जगह है लेकिन यह तसवीर एक तमाचा है देश के तथाकथित विकासपरक छवि पर. जरा सोचिए, अगर देश के कृषि मंत्री को एक टौयलेट ढूंढ़ने में इतनी परेशानी हो सकती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में सार्वजनिक टौयलेट की उपलब्धता कितनी कम है. बीते 70 सालों में देश में शौचालय की उपलब्धता का यही सच है.

एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक, देशभर में स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए गए लगभग 10 में से 6 शौचालयों में पानी की पर्याप्त सप्लाई ही नहीं है. यह सर्वे केंद्र की मोदी सरकार के 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के मिशन की हकीकत को बयां करता है.

आलम यह है कि कई घरों में शौचालयों में पानी की सप्लाई और ड्रेनेज की सुविधा नहीं होने की वजह से लोगों ने शौचालयों को स्टोररूम बना लिया है.

मुन्नी और मिशन दो हजार उन्नी : क्यों परेशान है मुन्नी

जब से नई सरकार बनी है, तब से पूरे देश को परेशान करने वाली मुन्नी खुद परेशान हो चली है बेचारी. जिस मुन्नी को कभी पूरा शहर आंखें फाड़फाड़ कर देखा करता था, आज वही मुन्नी अपनी बैंक की पासबुक में हर बार ऐंट्री करवाने के बाद आंखें फाड़फाड़ कर देखती रहती है कि सरकार द्वारा ऐलान किए गए पैसे आए कि नहीं. पर बेचारी को हर बार निराशा का ही सामना करना पड़ता है.

कल यही मुन्नी मिली. चंडीगढ़ के 17 सी चौक पर भुट्टे भूनती हुई. बिखरे हुए बाल, पिचके हुए गाल. हाय रे, मुन्नी की क्या दशा कर दी सरकार ने. परदे पर थिरकने वाली मुन्नी भुट्टे बेचती हुई. हाय रे, बुरे दिन न… अच्छे दिनों की पीठ पर चढ़ कर तुम कहां से आ गए? जाने कहां गए वो दिन, जो सरकार ने बताए थे. उन दिनों के बहाने मैं ने भी इस दिल को न जाने क्याक्या सब्जबाग दिखाए थे.

उस वक्त कभी पूरे देश पर राज करने वाली मुन्नी की बदहाली देख कर बेहद दुख हुआ. काश, मुन्नी के ये बुरे दिन मेरे हो जाते. अपना क्या, मैं तो आकाश से गिरा खजूर पर अटका बंदा हूं.

जिस देश में लोगों को अपनी उंगलियों के नाखूनों पर नचाने वाली मुन्नी को भुट्टे भून कर पेट भरना पड़े, लानत है उस देश के भरे पेटों पर. माना, देश बदल रहा है. देश में बदलाव की बयार के साथ मुन्नी भी ऐसे बदल जाएगी, ऐसा तो सपने में भी न सोचा था.

मैं ने अधभुना भुट्टा लेने के बहाने उस से बात करने के इरादे से पूछा, ‘‘मुन्नी, और क्या हाल हैं?’’

‘‘क्या बताएं बाबू, जब से नई सरकार आई है, मत पूछो क्या हाल है,’’ उस ने तसले में गरमाते कोयलों पर रखा भुट्टा बदलते हुए कहा, तो जले दिल से एक बार फिर आह निकली.

‘‘क्यों, क्या हो गया हाल को? गौर से देखो तो जरा, हर किसी के पैर में सरकार ने कितनी उम्दा क्वालिटी की नाल ठोंक दी है. अब तो हर गधा आधारकार्ड में गधा होने के बाद भी घोड़े की तरह दौड़ने को मजबूर है,’’ मैं ने उस से बुद्धिजीवी होते हुए कहा, तो वह तनिक तनी. उसे लगा कि देश में और सब से डरने की जरूरत होती है, पर बुद्धिजीवी से डरने की कोई जरूरत नहीं होती. बातें करने के लिए बुद्धिजीवी सब से महफूज प्राणी है, क्योंकि उस के पास व्यावहारिक कुछ नहीं होता.

‘‘क्या है न बाबू, सोचा था कि सरकार बदलेगी, तो जनता की तकदीर बदले या न बदले, पर मुन्नी की तकदीर जरूर बदलेगी. नई सरकार किसी और की तकदीर में चार चांद लगाए या न लगाए, पर मुन्नी की तकदीर में चार चांद जरूर लगाएगी,’’ अचानक उसे लगा कि वह तो बुद्धिजीवी के साथ बेकार की बहस में पड़ गई है, ऐसे में मोटा वाला 20 रुपए का भुट्टा जल गया तो…?

मुन्नी ने मोटा वाला भुट्टा दूसरी ओर से भूनने के लिए पलटा और फिर हाथ बचाते हुए बोली, ‘‘क्या बताएं बाबू, बैंक की पासबुक में हर रोज 15 लाख की ऐंट्री देखतेदेखते आंखों का सूरमा तक बह गया है. 15 लाख तो दूर, अपने ही 5 सौ रुपए पासबुक के रखरखाव के बैंक वालों ने काट लिए. उस के बाद नोटबंदी ने रहीसही कमर भी तोड़ दी बाबू.

‘‘मत पूछो बाबू, मुंह पर घूंघट डाले कितने दिन अपने ही पैसों के लिए एटीएम के सामने सिर झुकाए खड़े रहना पड़ा कि कमर की सारी लचक जाती रही. पर फिर भी कमर की लोकलाज के लिए कमर पकड़े ही खड़ी रही कि शायद काला धन निकल आए और हमारे खाते में समा जाए, पर कुछ नहीं हुआ.’’

अभी नोटबंदी से मुन्नी उबरी भी नहीं थी कि सरकार ने जीएसटी लगा दिया. अब भुट्टे पर जीएसटी कौन देगा, तो कौन लेगा? ग्राहक भुट्टा खाएगा या जीएसटी चुकाएगा?

तो शुक्र मनाओ कि मुन्नी बाहर से जवान है. सो खराब पेट वाले अभी भी जीएसटी की परवाह किए बिना मुन्नी के आगे चौबीसों घंटे दर्द से पीडि़त कमर मटकाते हुए कच्चा भुट्टा खाने चले आते हैं. अगर मुन्नी बुढ़ा गई होती, तो…

‘‘तो सावधान मुन्नी, अब आ रहा है मिशन दो हजार उन्नी. उस के स्वागत के लिए तैयार हो जा.’’

‘‘नहीं बाबू, नहीं… अब मुन्नी बसंती की तरह और नहीं नाच सकती. जनता नाचे तो नाचे, मुन्नी अब पूरी तरह से टूट चुकी है. मुन्नी से नहीं संभाली जा रही अब अपनी ही चुन्नी. ऐसे में जयरामजी की मिशन दो हजार उन्नी.

‘‘यह क्या बाबू जला दिया न मेरा 20 रुपए का भुट्टा. सरकार झूठी, सरकार का हर वादा झूठा.’’

समाज और मीडिया का यह कैसा पागलपन है

आरुषि हत्याकांड पर जिस तरह से मीडिया बौराया है वह दर्शाता है कि हमारा यह शक्तिशाली टूल केवल क्रिकेट के बैट या हौकी स्टिक की तरह मारने लायक रह गया है, कुछ स्कोर करने लायक नहीं. पतिपत्नी के घर में रहते 13 साल की इकलौती बेटी की हत्या हो जाए और उसी घर में अगले दिन एक नौकर की लाश मिले, यह आश्चर्य की बात तो है पर घंटों उस पर चैनल दर चैनल 4-5 लोग अपने खयाली पुलाव पकाते रहें और देश के खाली बैठे लोग कयास लगाते रहें कि किस ने मारा और डाक्टर दंपती निर्दोष है या दोषी, पागलपन की निशानी है.

किसी हत्या पर जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है पर उस के लिए पागलपन छा जाए और अखबारों के पन्ने भर जाएं, फिल्म बन जाए, सुप्रीम कोर्ट तक मामला जाए और फिर कभी इसे पकड़ा जाए कभी उसे, एक देश की दिमागी हालत दर्शाता है कि हम तुच्छ बातों पर इतना समय लगा देते हैं कि गंभीर मुद्दे ही रह जाते हैं.

अगर तलवार दंपती बेटी के बारे में कुछ राज नहीं बताना चाहते तो यह उन का हक है. वे समझदार हैं, अतियोग्य हैं और ऊंचनीच समझते हैं, उन्हें उन पर छोड़ दें. अगर तथ्य व सुबूत नहीं हैं, तो मामला बंद कर दें न कि मातापिता को बेबात की कैद में डाल दें. यह देश की कानून व्यवस्था से ज्यादा जनमन के थोथेपन की पोल खोलता है. आरुषि को न्याय कब मिलेगा यह सवाल उठाने वाले टीवी चैनल कौन होते हैं जब उस के मातापिता हैं और कठघरे में खड़े हैं पर उन के खिलाफ सुबूत ही नहीं हैं.

समाज के पास बहुत गंभीर मामले हैं. हमारी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है. हम 18वीं सदी के अंधविश्वासों में डूबे हैं. हमारी सरकारें निकम्मी हैं. हम गंदगी के महासागर में डूबे हैं. गाडि़यों की भरमार है पर ट्रैफिक जाम की भी मुसीबत है.

घरों का ढांचा चरमरा रहा है. बच्चे अनुशासनहीन हो रहे हैं. बूढ़े त्रस्त हैं और जनता एक हत्या को ले कर बेचैन ही नहीं, पागल भी हो रही है.

आरुषि की हत्या को इतना तूल देना हमारी भूल है और यह हमारी कमजोरी जाहिर करता है. हम अगर गुलाम रहे हैं और आज भी अगर बढ़ रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि हमारे कामगार दूसरे देशों में जा कर गुलामी का पैसा भेज रहे हैं, जो टैक्सों की मारफत छीन कर जनता में बंट रहा है. हम इन गंभीर मुद्दों को छोड़ कर निरर्थक मामले में आखिर क्यों दिमाग खराब कर रहे हैं?

हमें यह मामला एक अफसोस करने के साथ छोड़ देना चाहिए था, कब का!

दुनिया की सोच बदलना चाहती हूं : मानुषी छिल्लर

20 वर्षीय मेडिकल की छात्रा और अब ‘मिस वर्ल्ड 2017’ मानुषी छिल्लर को कभी लगा नहीं था कि उन्हें इतना बड़ा खिताब मिलेगा. मानुषी ये खिताब जीतने वाली छठी भारतीय सुंदरी हैं. स्वभाव से हंसमुख मानुषी से मिलना एक इवेंट के दौरान हुआ था, जब वह हरियाणा से ‘मिस इंडिया हरियाणा’ बनकर मुंबई आई थी.

वह अपनी उपलब्धि से बहुत खुश नजर आ रही थीं. उनसे मिलकर बातचीत में वह हमेशा हंसती ही रही.

अपने बारे में वह बताती हैं कि मैं डाक्टर परिवार से हूं. मेरे माता-पिता दिल्ली में रहते हैं और मैं हरियाणा में रहती हूं. मेरा जन्म हरियाणा में हुआ है, लेकिन शुरुआती शिक्षा दिल्ली में हुई और मेडिकल की पढाई मैं फिर से हरियाणा से कर रही हूं. मेरा बचपन से सपना था कि मैं मिस इंडिया बनूं, लेकिन कब ये कैसे असल में परिवर्तित हो गया, पता ही नहीं चला. जब ‘मिस इंडिया’ का खिताब हरियाणा से मिला, तो खुद पर यकीन नहीं हो रहा था. मैंने कुचिपुड़ी नृत्य सीखा है. नेशनल स्कूल औफ ड्रामा का भी हिस्सा रह चुकी हूं. मिस वर्ल्ड बनने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है. मेरी इस मेहनत में मेरे माता पिता ने हमेशा साथ दिया है.

वह आगे कहती हैं कि मिस इंडिया एक पर्सनलिटी कांटेस्ट है. अपनी सुंदरता से अधिक बाकी चीजों पर ध्यान देने की जरुरत होती है. जैसे अपने सामान्य ज्ञान को मजबूत करना, फिटनेस को बढ़ाना, जिसमें केवल पतला होना ही नहीं बल्कि अपनी स्ट्रेंथ को बढ़ाना है. इसके अलावा बातचीत का ढंग, सबसे मिलना आदि कई चीजें हैं, जिससे बेहतर करना जरूरी होता है.

कितना प्रेशर मानुषी पर रहा? पूछे जाने पर मानुषी बताती हैं कि इसमें मैंने अपने ऊपर कोई दबाव नहीं लिया, हालांकि परिवार और आयोजकों की मुझसे बहुत आशा थी और होना भी चाहिए, क्योंकि ये वन टाइम अचीवमेंट है और प्रतियोगिता काफी कठिन होती है. सब अच्छे है, ऐसे में मिस वर्ल्ड को जितना आसान नहीं होता. मिस इंडिया की सबसे अच्छी बात ये होती है कि वहां जिस तरह से सबकी ग्रूमिंग की जाती है, वे सबसे काफी जुड़े रहते है जिससे तनाव और डर दोनों निकल जाता है.

मिस वर्ल्ड के बाद क्या करना चाहेंगी? क्या बौलीवुड में आने की इच्छा है? इस बारे में मानुषी कहती हैं कि मैं मेडिकल की छात्रा हूं, मिस इंडिया में आने का अर्थ मेरे लिए ये नहीं कि में बौलीवुड में आना चाहती हूं. इसमें मैं दुनिया की सोच को बदलना चाहती हूं. जिसमें खास कर ‘प्रोजेक्ट शक्ति’ के साथ कर रही हूं. इसमें मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता पर अधिक महत्व देना चाहती हूं. इसके लिये मैं कई गांवों में घूमी, उन्हें स्वच्छता से परिचय करवाकर उनका इलाज भी करवाया है.

सचिवों से कम वेतन पाते हैं राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को अब भी देश के प्रमुख नौकरशाहों और तीनों सेनाओं के प्रमुखों के मुकाबले कम वेतन मिलता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि करीब दो साल पहले सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद आई विषमताओं को दूर करने के लिए कानून में अब तक संशोधन नहीं हो पाया है.

राष्ट्रपति को तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर होने के बावजूद फिलहाल सेना प्रमुखों के वेतन से भी कम वेतन मिल रहा है. वहीं, सेना प्रमुखों को कैबिनेट सचिव के बराबर वेतन मिलता है.

एक साल पहले भेजा प्रस्ताव

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और राज्यपालों के वेतन बढ़ाने का एक प्रस्ताव तैयार कर करीब एक साल पहले मंजूरी के लिए कैबिनेट सचिवालय को भेजा था. नाम जाहिर न करने की शर्त पर अधिकारी ने बताया कि इस पर हालांकि अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है.

मंत्रिमंडल की मंजूरी का इंतजार

सरकार के प्रवक्ता को जब पूछा गया कि गृह मंत्रालय के प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने में होने वाली देरी की वजह क्या है तो उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. अधिकारी ने कहा कि मंत्रालय के प्रस्ताव को मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने के बाद इस आशय का विधेयक संसद में पेश किया जाएगा.

फिलहाल राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का वेतन

राष्ट्रपति : 1,50,000

उप राष्ट्रपति : 1,25,000

राज्यपाल : 1,10,000

सातवें वेतन आयोग के बाद केंद्रीय सचिवों का वेतन

कैबिनेट सचिव : 2,50,000

सचिव : 2,25,000

ये हो सकता है वेतन

राष्ट्रपति : 5,00,000

उप राष्ट्रपति : 3,50,000

राज्यपाल : 3,00,000

(नोट : वर्ष 2008 में आखिरी बार राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और राज्यपाल के वेतन में इजाफा किया गया था.)

ये हैं भोजपुरी सिनेमा के इमरान हाशमी

बौलीवुड में इमरान हाशमी ने आनस्क्रीन इतने किसिंग सीन फिल्माएं हैं कि उन्हें सीरियल किसर के नाम से ही जाना जाने लगा. इतना ही नहीं उनके नाम आनस्क्रीन किसिंग के कई रिकार्ड हैं. लेकिन अब लगता है कि इमरान का यह रिकार्ड टूटने वाला है, क्योंकि किसिंग के मामले में भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्‍टार अरविंद अकेला कल्‍लू उन्हें टक्कर देने के लिए निकल पड़े हैं.

कल्‍लू हाल ही में रिलीज हुई अपनी फिल्‍म ‘रब्‍बा इश्‍क ना होवे’ में किस की बरसात करते नजर आ रहे हैं. जी हां, अरविंद अकेला कल्‍लू ने इस फिल्म की अभिनेत्री ऋ‍तु सिंह को 304 बार किस किया है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस फिल्‍म में कल्‍लू कई अवतार में नजर आ रहे हैं. फिल्म के शुरुआत में वे एक ब्रह्मचारी युवक का उस किरदार में दिखाई देते हैं, जो महिलाओं से दूर भागता है. मगर ऋ‍तु सिंह की एंट्री के बाद उन्‍हें धीरे धीरे प्‍यार में यकीन होने लगता है और शायद यही वजह है कि वे खुद पर काबू नहीं रख पाते हैं और ऋ‍तु को इतने किस करते हैं कि जाने अनजाने इमरान हाशमी को मात देकर किसिंग का एक अनोखा रिकार्ड बना बैठते हैं.

वहीं, समीक्षकों का मानना है कि भोजपुरी सिनेमा में अब तक किसी भी फिल्‍म में इतने ज्यादा किस देखने को नहीं मिले थे. कल्‍लू और ऋतु के बीच फिल्‍माए गए इन किसिंग सिक्‍वेंस में सबसे खास बात ये है कि ये कहीं से भी वलगर नहीं लग रहे हैं. लोगों को कल्‍लू और ऋतु की कैमेस्‍ट्री खूब पसंद आ रही है इतना ही नहीं सिनेमाघरों से बाहर आए दर्शकों ने तो उन्‍हें भोजपुरी फिल्‍मों के इमरान हाशमी का खिताब तक दे दिया है.

यौन शोषण मामले पर बोले अरबाज खान और सनी लियोनी

हौलिवुड के मशहूर प्रोड्यूसर हार्वी वीनस्टीन पर कई अभिनेत्रियों द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाने के साथ ही वर्क प्लेस पर हो रहे सेक्शुअल हैरसमेंट का मुद्दा इस समय गर्माया हुआ है. खासतौर पर हौलिवुड और बौलिवुड में इस मुद्दे पर कई सिलेब्रिटी मुखर होकर अपनी बात रख रहे हैं. इसी कड़ी में नया नाम जुड़ गया है फिल्म ‘तेरा इंतजार’ की स्टार जोड़ी का.

बौलिवुड स्टार सनी लियोनी और अरबाज खान ने यौन शोषण पर अपने विचार रखे. एक ताज़ा इंटरव्यू में सनी लियोनी ने वर्क प्लेस पर हैरसमेंट का शिकार युवाओं का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें आगे आकर इसकी खिलाफत करने के लिए कहा ‘वर्क प्लेस पर यौन शोषण आम बात है.

न केवल महिलाओं का बल्कि पुरुषों का शोषण भी आम बात है. मुझे लगता है कि उनमें अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ बोलने की ताकत है. वह अपने बूते अपनी बात रखें और गलत व्यवहार की खिलाफत करें. अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो चीजें कभी नहीं बदलेंगी.’

वहीं ‘तेरा इंतजार’ के लीड ऐक्टर अरबाज खान ने कहा ‘मैं मानता हूं कि ऐसी चीजे होती हैं और हर कोई इनसे अपने तरीके से निपटता है. फिल्म इंडस्ट्री, औफिस, वर्क प्लेस या घर, कहीं भी अगर आपके साथ ऐसा आपकी सहमति के बिना हो रहा है तो यह सही नहीं है.

आपको इसका विरोध करना चाहिए, इसके खिलाफ लड़ाई करनी चाहिए. कोई भी यह नहीं कहेगा कि ऐसा होना स्वीकार्य है या ऐसा होना चाहिए. अगर ऐसा कुछ भी होता है तो उसे एक्सपोज़ करना चाहिए और बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करना चाहिए.’

बस चुटकी बजाते ही मिल जाएगी मनचाही सुंदरता

कहा जाता है कि सुंदरता जो कुदरत की देन है, अन्य तरीकों से हासिल नहीं की जा सकती, पर अब यह बात पुरानी हो गई है. साइंस की मदद से ऐसी तकनीक का विकास हो गया है कि अगर कोई चाहे तो मनचाही सुंदरता हासिल कर सकता है.

क्या सुंदरता जरूरी है इस में संदेह नहीं कि एक सुंदर व्यक्ति किसी भी जगह अपनी उपस्थिति से पहली ही नजर में एक विशेष प्रभाव छोड़ता है.  सुंदरता कई फायदे भी दिला देती है. खासतौर से युवतियां तो सुंदरता के बल पर कई काम दूसरों से करवा लेती हैं. यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति सुंदर और आकर्षक होता है वह पैसे, रुतबे, शिक्षा और सामाजिक स्तर के मामले में दूसरों के मुकाबले काफी आगे होगा.

लिजा स्लेटरी वौकर ने अपने शोध के आधार पर कहा है कि सुंदरता से शिक्षा के क्षेत्र में कई लाभ मिल जाते हैं, जैसे स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर सुंदर दिखने वाले युवकयुवतियों को शिक्षक स्मार्ट और बुद्धिमान मानते हैं और उन्हें अच्छे नंबर दे देते हैं. इस से उन का आत्मविश्वास बढ़ता है और आगे चल कर खुद को साबित करने के ज्यादा मौके मिलते हैं.

पुरानी है चाहत

पुराने जमाने में भी स्त्रीपुरुष सुंदर दिखना चाहते थे. खासतौर से युवतियां कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक 18वीं सदी में चेहरे पर लगाने के लिए जिस पाउडर का इस्तेमाल करती थीं, उस में भारी मात्रा में गंधक और पारे का प्रयोग किया जाता था. इसी तरह 19वीं सदी की युवतियां व्हेल मछली की हड्डियों से बने जो आभूषण चेहरे पर सजाती थीं, उन से उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती थी, लेकिन सुंदर दिखने के लिए वे यह तकलीफ उठाने को तैयार रहती थीं.

इस समय दुनिया में लोग सिर्फ क्रीमपाउडर लगा कर ही सुंदर नहीं हो रहे हैं बल्कि ब्यूटी पार्लर जा कर वे अपने चेहरे और हाथपांव यानी नखशिख तक को आकर्षक बनवाने का प्रयास करते हैं. इसी तरह मेकअप का मतलब अब सिर्फ चेहरे पर क्रीमपाउडर आदि लगाना नहीं रहा बल्कि पहने या लगाए जा सकने वाले ऐसे मैडिकल पौलिमर पैच आदि जैसे तरीके ढूंढ़े जा रहे हैं जिन से चेहरे की कमियों को लंबे समय तक छिपाया जा सके. मेकअप के ऐसे सामान बनाने की कोशिश हो रही है जो न सिर्फ खूबसूरती को तुरंत बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं बल्कि त्वचा के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकते हैं. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि भविष्य में त्वचा की देखभाल करने वाले उत्पादों में पानी की भूमिका और भी बढ़ सकती है.

दवाएं बनाएंगी सुंदर

आप सुंदर और सैक्सी दिखाई दें, इसलिए अरबों डौलर खर्च कर के दुनिया में कई प्रयोग हो रहे हैं और ऐसी दवाएं व तकनीक खोजी जा रही हैं जो इस काम में मददगार साबित हो सकें. अभी जिस तरह लोग बोटोक्स के इंजैक्शन लगवा कर अपने चेहरे का आकारप्रकार बदलवाते हैं, उसी प्रकार वैज्ञानिक अब अपीरियंस मैडिसिन कहलाने वाली अन्य दवाओं की खोज में जुटे हैं ताकि लोग दवाओं की बहुत सूक्ष्म मात्रा ले कर चेहरे के दोष दूर कर नाकहोंठ जैसे अंग सुधार सकें.

वैज्ञानिक भी अपनी प्रयोगशालाओं में आम इंसान की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नुसखे तलाश रहे हैं. त्वचा की कोमलता बनाए रखने, मोटापा कम करने, कमर और पेट की चरबी पिघलाने, बाल उगाने  और अनचाहे बालों को हटाने के लिए नई दवाओं, क्रीमों और लेजर जैसी तकनीक की खोज की जा रही है. हम दिखने में सुंदर लगें, विज्ञान जगत इस के लिए ‘अपीरियंस मैडिसिन’ पर काम कर रहा है. ऐसी दवाओं का उद्देश्य चेहरे की झुर्रियां हटाना या उन्हें आने से रोकना है.

इस के अलावा त्वचा की रंगत सुधारने और होंठों की बनावट में चेहरे की सुंदरता के हिसाब से अंतर लाने वाली दवाओं और इंजैक्शन को अपीरियंस मैडिसिन की श्रेणी में गिना जाता है. कहा जा रहा है कि निकट भविष्य में क्रीमपाउडर से ज्यादा इस्तेमाल अपीरियंस मैडिसिन का होगा. खास बात यह होगी कि ऐसी दवाओं के साइड इफैक्ट्स भी न के बराबर होंगे.

ये दवाएं कौन सी होंगी, इस का एक उदाहरण फ्लोरिडा (अमेरिका) के जूपिटर में स्थित स्क्राइप्स रिसर्च इंस्टिट्यूट में वैज्ञानिकों द्वारा एसआर9009 नामक एक ऐसा तत्त्व विकसित करने से मिलता है जो व्यायाम कराने वाले सारे फायदे दिला सकता है. फिलहाल एसआर9009 का परीक्षण चूहों पर किया गया है. पाया गया है कि इस से चूहों की भोजन पचाने की क्षमता बढ़ गई और वे पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय हो गए.

इसी तरह की एक खोज न्यूयौर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी मैडिकल सैंटर में हुई है, जहां एटीएक्स101 नामक एक सिंथैटिक मौलिक्यूल बनाया गया है जो चेहरे की चरबी कम करते हुए लोगों को डबलचिन जैसी समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है. शरीर में पहुंचने पर ये मौलेक्यूल त्वचा के नीचे मौजूद वसा को पिघलाने लगते हैं और उस वसा को शरीर में पहुंचा देते हैं ताकि वह ऊर्जा में बदल कर खत्म हो जाए. इंसानों में इस मौलिक्यूल के इस्तेमाल की भी अभी मंजूरी नहीं मिली है.

डीएनए और स्पेस तकनीक का इस्तेमाल

किसी व्यक्ति के चेहरे पर झुर्रियां न आएं और वह हमेशा जवान दिखे इस के लिए विज्ञान भी कोशिशें कर रहा है. अगर व्यक्ति बूढ़ा नहीं होगा, तो उस की सुंदरता भी बरकरार रह सकती है, इसलिए यह कोशिश डीएनए टैस्टिंग के जरिए की जा रही है. आस्ट्रेलिया में एक नए तरह का स्किन डीएनए टैस्ट विकसित किया गया है, जिस में किसी व्यक्ति के मुंह की लार के माध्यम से उस की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है. इस से यह पता चल सकता है कि किसी व्यक्ति में किस उम्र में जा कर चेहरे पर झुर्रियां पड़ सकती हैं और उस की त्वचा में कब रंग (पिगमैंटेशन) की समस्याएं बढ़ सकती हैं. इन तथ्यों को जान कर वह समय से इन का इलाज कर सकेगा.

भविष्य में डीएनए टैस्टिंग जैसी आधुनिक तकनीक ही लोगों को सुंदर बनाने में मददगार नहीं होगी बल्कि जिस स्पेस टैक्नोलौजी से अभी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जा रहे हैं और बाहरी अंतरिक्ष में खोजबीन का काम हो रहा है, उसी तकनीक से लोगों को सजीलासुंदर बनाने के प्रयास भी हो रहे हैं. जैसे अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा बाह्य अंतरिक्ष में अपने सैटेलाइट्स से अंतरतारकीय धूल कण (स्टेलर डस्ट पार्टिकल्स) पकड़ने के लिए जिस लिपोफिलिप तकनीक का इस्तेमाल करती है, उसी तकनीक के जरिए, ऐसे अनोखे कंघे बनाए जा रहे हैं जो सिर का मैल खींचते हुए बालों की चमक कायम रख सकते हैं और उन के इस्तेमाल से रूखापन नहीं होता. कुछ सौंदर्य विज्ञानी व्यंग्य में कह रहे हैं कि यह खोज चंद्रमा पर इंसान के कदम पड़ने जितनी क्रांतिकारी नहीं है, लेकिन आम इंसान भी चंद्रमा जितना चमकदार कहां होता है.

मशीन का सहारा ले कर बनें आकर्षक

सुंदरता में चारचांद लगाने का काम ब्यूटी पार्लर में इंसान ही क्यों करे? अच्छा हो कि यह काम मशीनों के हवाले कर दिया जाए जिस से व्यक्ति जब चाहे, मशीन से खुद को सुंदर बनाने का आकलन करवा सके और फिर उस के मुताबिक सुधार करवा सके. इसी नजरिए से सऊदी अरब की तेल अवीव यूनिवर्सिटी के डेनियल कोहेन और उन की टीम ने एक ब्यूटी मशीन बनाई है, जो किसी व्यक्ति के चेहरे की नापतोल कर के बता सकती है कि उस के चेहरे में क्याक्या सुधार किए जाएं जिस से वह सुंदर दिख सके.

यह मशीन बनाने के लिए कोहेन ने इसराईली और जरमन लोगों के चेहरों का मिलान करते हुए 93 तरह के चेहरे बनाए. इन चेहरों की खूबियों को दर्ज करते हुए आकर्षण के बुनियादी सिद्धांत बनाए गए ताकि बेहतर और सुंदर चेहरों की एक निश्चित पहचान बनाई जा सके. मशीन से चेहरे में किए जाने वाले सुधारों की जानकारी ले कर प्लास्टिक सर्जन वैसे ही बदलाव सर्जरी के माध्यम से कर सकते हैं और कोई भी व्यक्ति सुंदर दिख सकता है.

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