अपनी जिम्मेदारी भी समझें नगर निकाय

25 साल तक प्रशासकीय राज के बाद जब पहली बार निकाय चुनाव हुए, तो एक मेयर ने विश्व बैंक की टीम को अपने शहर बुलाया. टीम ने शहर देखते ही कहा- इतना गंदा शहर? यहां कूड़ा सड़कों पर फेंका जाता है! इसके बाद विश्व बैंक की टीम ने डस्टबिन दिए. डस्टबिन लगे, लेकिन शहर की हालत जस की तस रही. इस घटना के 27 साल बाद भी हमारे शहरों की हालत बदली नहीं है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव हुए हैं. नतीजों पर गुणा-भाग और सियासी नफा-नुकसान पर चिंतन जारी है. लेकिन असल जरूरत इस गुणा-भाग पर नहीं, नगर निगमों की भूमिका पर चिंतन करने की है, ताकि ये महज बड़ी राजनीति की नर्सरी न बनकर कुछ जमीनी नतीजे दे सकें.

स्थानीय निकाय 25 साल तक प्रशासकों के अधीन रहे. 1989 में पहली बार मेयर चुने गए, तब मेयर सीधे नहीं चुने जाते थे, बल्कि पार्षद चुनते थे. खूब जोड़-तोड़ होती थी. बाद में सीधे चुनावों ने इसे राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया. कामकाज ने नजरिये से देखें, तो नगर निगमों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. इसीलिए इसे उस शहर विशेष की सरकार कहा जाता है. लेकिन सच यही है कि अफसरशाही के फेर में स्थानीय निकायों की हालत कमजोर ही होती गई है. निकायों की हालत सुधारने के लिए लाया गया 74वां संविधान संशोधन विधेयक भी अफसरशाही की भेंट चढ़ गया, वरना शायद स्थिति कुछ और ही होती.

आज हालत यह है कि निकायों के पास न विकास का कोई खाका है, और न ही अपनी संपत्ति का लेखा-जोखा. अपना काम या भूमिका तक ठीक से पता नहीं. यही आलम सफाई का है. बढ़ती आबादी के साथ समस्याएं बढ़ीं, लेकिन क्या संसाधन भी उस अनुपात में बढ़े? गंदगी बढ़ती गई, नई नियुक्ति न होने से सफाई घटते गए. निकायों की राजनीतिक तस्वीर भले ही उज्‍जवल दिखे, शहरों की तस्वीर बेहद गंदी है. जन-स्वास्थ्य और जन-सुविधा, दोनों मोर्चो पर ये फेल साबित हुए हैं.

हालांकि वित्तीय संसाधनों के मामले में अब पहले जैसा संकट नहीं है. प्रदेश और केंद्र की तमाम योजनाएं निकायों के माध्यम से ही क्रियान्वित हो रही हैं. अमृत और नमामि गंगे जैसे हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट नगर निगमों के हाथ में हैं. किसी भी अच्छे-खासे नगर निगम का सालाना बजट 250 से 400 करोड़ रुपये से कम नहीं होता. बड़े नगर निगमों में तो यह और भी ज्यादा है. यानी एक मेयर अपने कार्यकाल में एक-डेढ़ हजार करोड़ के बजट का मालिक होता है. स्मार्ट सिटी के एक हजार करोड़ और जोड़ लें, तो दो-तीन हजार करोड़ में तो कोई भी शहर चमक सकता है. याद नहीं पड़ता कि किसी नगर निगम या निकाय ने कस्बों या महानगर को कुछ सौगात दी हो. वहां विकास के नाम पर अनियोजन है. कमीशनखोरी है. राजनीति है. बैठकें या तो होती नहीं, और अगर होती भी हैं, तो हंगामे की भेंट चढ़ जाती हैं.

अब मेयर की बात करें. कहने को वह महानगर का प्रथम नागरिक होता है, लेकिन उसके पास कोई प्रशासनिक अधिकार नहीं है. डीएम-कमिश्नर उसकी सुनते नहीं, नगर आयुक्त से टकराव ही रहता है. यहां दिल्ली की तरह दो बॉस होते हैं. कर्मचारियों का बॉस नगर आयुक्त, पार्षदों का मेयर. दोनों एक-दूसरे की नहीं सुनते. मेयर कौंसिल जनता के प्रति जवाबदेही के मद्देनजर उनको भी अधिकार दिए जाने की लंबे समय से मांग कर रही है, लेकिन आज तक यह संभव नहीं हुआ. हर व्यक्ति और हर घर से जुड़े इस बड़े महकमे को सुधारने की बड़ी आवश्यकता है. जनता से मिले जनादेश का मकसद तभी पूरा समझा जा सकता है, जब स्थानीय निकाय कुछ करें. वार्ड हो या शहर एक छोटी इकाई है, लेकिन विकास की परिभाषा यहीं से तय होने लगती है.

स्थानीय निकायों के कामकाज को एक बड़े क्षितिज की आवश्यकता है, जिसमें शहरों की आबादी, समस्याएं, सुविधाएं, संसाधन आदि पर चर्चा हो. जब महाराष्ट्र, बंगाल या गुजरात में स्थानीय निकाय बेहतर कार्य कर सकते हैं, तो यूपी में क्यों नहीं? हम अपने को सुंदर रख सकते हैं, तो शहर को क्यों नहीं? मेयर-पार्षद अपनी राजनीति चमका सकते हैं, तो शहर को क्यों नहीं? उम्मीद की जानी चाहिए कि नई चुनौतियों व भारी जन-समर्थन से सत्ता में आ रही शहरों की ये सरकारें कुछ नया करेंगी.

साभार : सूर्यकांत द्विवेदी

अपने आप को गाली देते लोग

लड़ाई झगड़े के दौरान लोगों का गालीगलौज करना आम बात है. लेकिन कभीकभी लोग आदतन गाली देते हैं. ऐसे लोग गाली को गाली समझते ही नहीं. कभीकभी ऐसा भी होता है कि आदतन गाली देने वाले लोग गाली देते तो दूसरों को हैं, पर वे उलट कर उन्हीं को मिल जाती हैं.

‘उल्लू का पट्ठा’. इस का मतलब होता है उल्लू का बच्चा. इस गाली का मतलब यह है कि ‘तुम्हारे पिता उल्लू (मूर्ख) हैं, इसलिए तुम भी वैसे ही हो’. यहां तक तो ठीक है, लेकिन कुछ लोग खुद अपने बच्चे को ही ‘उल्लू का पट्ठा’ कहने लगते हैं. वे समझते हैं कि बच्चे को गाली दे रहे हैं, लेकिन इसी सोच में वे खुद अपने को ‘उल्लू’ बना डालते हैं.

दूसरी गाली है, ‘हरामी’ या हरामी का पिल्ला’. ‘हरामी’ का मतलब है नाजायज औलाद. ‘हरामी का पिल्ला’ का मतलब है ‘नाजायज औलाद की औलाद’.

कई लोगों को अपने बच्चों को ‘हरामी’ कहते सुना जाता है. कई मांएं भी अपने बच्चों को ऐसी गाली देती हैं. एक  मां से पूछा गया, ‘‘आप इसे ‘हरामी’ कह रही हैं, पर इस में इस बच्चे का क्या कुसूर है?

‘‘आप ने जब अपने पति के अलावा किसी दूसरे आदमी के साथ संबंध बनाया, तभी तो यह बच्चा ‘हरामी’ कहलाया.’’

अगर कोई औरत अपने बच्चे को ऐसी गाली देती है, तो अपने पति को ‘हरामी’ बनाती है. हम ने पढ़ेलिखे लोगों को भी अपने बच्चों को ‘साला’, ‘ससुर’, ‘ससुरा’, ‘ससुरी’ जैसी गाली देते सुना है.

अब अगर कोई अपने बच्चे को ‘साला’ कहता है, तो इस का मतलब यह हुआ कि जिसे गाली दी जा रही है, उस की बहन गाली देने वाले की बीवी हुई. अपने बच्चे को ‘साला’ कहने का मतलब हुआ, अपने लड़के की बहन यानी खुद अपनी बेटी को बीवी बनाना.

अगर कोई अपने बच्चे को ‘ससुर’ या ‘ससुरा’ की गाली देता है, तो इस का मतलब यह हुआ कि वह खुद पोती को अपनी बीवी बनाना चाहता है.

अगर कोई ऐसी गाली अपने भाई को देता है, तो इस का मतलब यह हुआ कि उस की अपनी भतीजी ही बीवी है.

एक औरत की छोटी सी बच्ची थी. वह पैदल चल सकती थी, लेकिन जिद कर के गोद से उतर ही नहीं रही थी. पहाड़ की चढ़ाई थी. अपनी बेटी की जिद से खीज कर उस की मां ने कहा, ‘‘यह ‘ससुरी’ तो एक कदम भी नहीं चलना चाहती.’’

बच्ची थोड़ी देर तक तो चुप रही, लेकिन फिर धीरेधीरे सिसकने लगी. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘मैं ‘ससुरी’ नहीं हूं.’’

उस छोटी सी बच्ची को यह अंदाजा लग गया था कि ‘ससुरी’ कोई गाली है.

लिहाजा, गाली देने से पहले सोच लेना चाहिए कि उस का मतलब क्या हो सकता है. वैसे भी गाली देना कोई अच्छी बात नहीं है.

देह धंधे की मजबूरी : एक तरफ बच्चा दूसरी तरफ ग्राहक

‘‘साहब, यह बिलकुल नई है. कभी कोठे पर नहीं आई. बच्चा होने पर पति से झगड़ा हो गया. पति ने घर से निकाल दिया. अपना और बच्चे का पेट पालने के लिए कोठे पर आ गई. इस जगह ऐसी और कोई नहीं मिलेगी.’’

मीरगंज की सड़क पर अंदर घुसते ही सुभाष को एक लड़का मिल गया. 22 साल का यह लड़का मीरगंज में देह धंधा करने वालियों के लिए ग्राहक लाने का काम करता था.

लड़के की बातों में फंस कर सुभाष उस कमरे में पहुंच गया, जहां वह थी. सीढि़यों से चढ़ कर जब सुभाष दूसरी मंजिल पर पहुंचा, तो उस ने एकजैसे कई कमरे देखे. कुछ कमरों के दरवाजे खुले थे, तो कुछ के बंद थे.

लड़के ने एक कमरे का दरवाजा खोला और सुभाष को अंदर भेज दिया. अंदर एक 20-22 साल की लड़की थी. आपसी बातचीत के बाद लड़की ने कमरे में पड़े तखत पर बैठने का इशारा किया.

सुभाष को लगा, जैसे वह लड़की वहां के माहौल से बहुत वाकिफ नहीं थी. थोड़ी देर में सुभाष ने उस लड़की के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की शुरुआत की, तो उसे एहसास हुआ कि वह शायद हाल ही में मां बनी थी.

लड़की बोली, ‘‘यह तो रोज का धंधा है. इसी से रोटी मिलती है, जिस से मेरा और बच्चे दोनों का पेट भरता है.’’

‘‘कभी ग्राहक के साथ समय बिताते समय तुम्हारा बच्चा रोता नहीं?’’ सुभाष ने ऐसे ही पूछ लिया ‘‘यह बच्चा यहीं का है. इसे यहां के हर कदम की आहट पता है. जब तक पराया मर्द यहां रहता है, तब तक यह सोता रहता है. आप इस की चिंता मत करो,’’ लड़की ने जवाब देते हुए कहा.

सुभाष के लिए यह पहला अनुभव था, पर वह लड़की तो बच्चा पैदा होने के तीसरे दिन से ही यह सब कर रही थी. उस के लिए नया कुछ नहीं था.

‘‘बच्चा देख कर ग्राहक दूर नहीं हो जाते?’’ सुभाष ने पूछा.

‘‘ग्राहक को पता होता है कि कहां जा रहा है. कई बार तो ग्राहक ऐसी औरतों के पास ही जाना चाहते हैं. उन को यह अलग तरह का अनुभव होता है.’’

दरअसल, मीरगंज जैसे वेश्या बाजारों में बहुत सारी औरतें ऐसी होती हैं, जो न चाहते हुए भी पेट से हो जाती हैं. पेट से हो जाने के बावजूद भी ये देह धंधा करती रहती हैं. 7वें से 8वें महीने तक ये सैक्स कर लेती हैं.

ऐसे ही बच्चे के साथ रह रही अनीता कहती है, ‘‘हम 1-2 महीने भी खाली नहीं बैठ सकते. बच्चा पेट में होने के समय ग्राहक कम पसंद करता है, पर जब बच्चा हो जाता है, तब उसे यह परेशानी नहीं रहती कि बच्चा छोटा है.

‘‘पेट से हो जाने के बाद सैक्स के दौरान कई बार कुछ परेशानियां आ जाती हैं. तब हमें संभल कर धंधा करना होता है. आखिरकार धंधा कर के पेट पालने ही तो यहां आए हैं.’’

मीरगंज में अप्रैल, 2016 में जब पुलिस ने छापा मार कर देह धंधा करने वाली औरतों को पकड़ा, तो पता चला कि आधी औरतें ऐसी थीं, जिन के पास 3 महीने से ले कर 3 साल तक के छोटे बच्चे थे. पुलिस ने इन को बच्चों के साथ ही जेल भेज दिया.

उस समय की बातचीत में इन बच्चे वाली औरतों ने बताया कि देह धंधे में किसी तरह की छुट्टी का रिवाज नहीं है. ऐसे में उन्हें दुधमुंहे बच्चे के साथ ही ग्राहक को भी संभालना पड़ता है.

कई औरतों ने तो अपने 5-6 साल के बच्चे को ही ग्राहक लाने का काम सौंप दिया है. इस की वजह बताते हुए सरला कहती है, ‘‘ग्राहक से मिलने वाले पैसे में दलाल और कोठा मालकिन का हिस्सा होता है. अब ग्राहक से पहले की तरह ज्यादा पैसा नहीं मिलता. अपने खुद के खर्च भी बढ़ गए हैं. ऐसे में अगर बच्चा ग्राहक ले आता है, तो उन का हिस्सा बच जाता है और हमारी आमदनी भी बढ़ जाती है.’’

मीरगंज ‘संगम की नगरी’ इलाहाबाद का एक खास इलाका है. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से महज 4 किलोमीटर दूर जानसनगंज होते हुए चौक इलाके के पास मीरगंज को रास्ता जाता है.

मीरगंज से कुछ कदम पहले ही चौक कोतवाली पड़ती है. मीरगंज खास इसलिए है, क्योंकि यहां दिन में सर्राफा बाजार लगता है और रात में देह की सुनहरी आभा तनमन को जगमग कर देती है.

इस बाजार से 50 मीटर की सिक्योरिटी के लिए एक बादशाही मंडी पुलिस चौकी भी है. मीरगंज का इतिहास बहुत पुराना है. यहां बहुत पहले मुजरा होता था. दूरदूर से लोग मनोरंजन के लिए यहां आते थे. मुजरा करने वाली बंजारन होती थीं.

बंजारन एक ऐसी निचली जाति थी, जो शहरशहर घूम कर अपना पेट पालने के लिए छोटेमोटे काम करती थी. यहीं इन के संबंध गैर मर्दों से बनते थे.

इन से पैदा होने वाली लड़कियों ने धीरेधीरे नाचगाने को अपना पेशा बना लिया. कई बार ये नाचने वालियां पैसे वालों से संबंध भी बना लेती थीं. इन से पैदा होने वाली औलादें रंगरूप से खूबसूरत होती थीं और उन को पैसा भी ज्यादा मिलता था.

समय के साथसाथ मुजरा बीते जमाने की बात हो गई. पहले मुजरे की आड़ में देह धंधा होता था. अब देह धंधा करने के लिए किसी तरह की आड़ लेने की जरूरत भी खत्म हो गई है. पुलिस और इलाके के गुंडे इस बाजार से वसूली करते हैं.

मीरगंज का यह इलाका पूरी तरह से देह धंधे की मंडी बन गया है. यहां पतली और ऊंचीऊंची 4 गलियां हैं. इन में रहने वाली ज्यादातर लड़कियां अब नेपाल से आती हैं. इस वजह से एक गली का नाम ही ‘नेपाली गली’ पड़ गया है.

इन 4 गलियों में सौ से ज्यादा कोठे हैं. एक कोठे में 5 से 6 औरतें रहती हैं. मीरगंज की इस देह मंडी में बड़ी तादाद में नाबालिग लड़कियां भी हैं.

कुछ साल पहले इस देह मंडी से नाबालिग लड़कियों को आजाद कराने के लिए गुडि़या संस्था के अजीत सिंह ने छापा मारा था. उस समय यहां से सौ नाबालिग लड़कियों को उन के घर पहुंचाया गया था. अभी भी इस मंडी में नाबालिग लड़कियों की तादाद काफी है.

इस मंडी की हर गली के करीब चाय और पान बेचने वालों की खोखे टाइप  दुकानें हैं. इन पर वेश्याओं के दलालों की भीड़ लगी रहती है. ये दलाल हर आनेजाने वाले पर पैनी नजर रखते हैं. वेश्याएं गलियों के पास बने अपने कोठों के दरवाजों और खिड़कियों के पास खड़ी रहती हैं.

कई बार पुलिस यहां पर छापेमारी भी करती है, पर उस के आने पर 2-4 लोग पकड़े जाते हैं, बाकी भाग जाते हैं.

कुछ दिन पहले रेहाना नाम की एक औरत को पुलिस ने पकड़ा था. उसे आगरा के नारी सुरक्षागृह में भेज दिया. जेल जाने से पहले वह अपनी 8 साल और 10 साल की 2 लड़कियों को अपनी गली में रहने वाली नीमा के पास छोड़ गई थी.

नीमा से उस ने कहा था कि जब तक वह जेल में है, तब तक इन लड़कियों को अपने पास रख ले. 5 महीने बाद जब वह आई, तो नीमा उस की दोनों लड़कियों को ले कर गायब हो चुकी थी.

रेहाना अब अपनी लड़कियों को तलाश रही है. उस ने पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई है, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

बादशाही मंडी पुलिस चौकी का चक्कर लगाती रेहाना अपना दर्द बताते हुए कहती है, ‘‘मैं जिसे हमदर्द समझ कर अपने बच्चों को उस के हवाले कर गई थी, वही अब बच्चों को ले कर गायब हो गई है. मुझे चिंता इस बात की है कि मेरे जैसा हाल मेरी बेटियों का भी न हो.’’

मीरगंज की सड़क पर आगे बढ़ते हुए कुछ अलग सा दिखने लगता है. यहां पर तिमंजिला इमारतें बनी हैं. इन में ही औरतें जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं.

कोठे पर ऊपर की ओर जाने वाली सीढि़यां भी पतलीपतली हैं. ये काफी सीधी बनी हुई हैं, जिन से कोई आसानी से दौड़तेभागते इन सीढि़यों से नीचे नहीं उतरचढ़ सकता है.

कोठे का ऊपर का हिस्सा भी काफी बंदबंद सा होता है. बीच में एक आंगन और बरामदा होता है. इस के चारों ओर कमरे बने होते हैं. आंगन और बरामदों का इस्तेमाल बैठने और बात करने के लिए होता है. यहां आमतौर पर कोठा मालकिनें बैठी मिल जाती हैं. कमरों का इस्तेमाल देह धंधे के लिए होता है.

मीरगंज में सब से ज्यादा रौनक ‘नेपाली गली’ में होती है. यहां धंधा करने वाली नेपाली लड़कियां होती हैं. ये ज्यादातर खुले गले का कुरता पहनती हैं. इन का यह कुरता स्लीवलैस होता है. कुरते के साथ पहनी जाने वाली सलवार को ये कमर में खोंस कर रखती हैं. ऐसे में इन के छोटेछोटे गोरेगोरे पैर घुटनों तक नंगे रहते हैं.

मीरगंज में अभी भी इक्कादुक्का ऐसे मकान हैं, जिन में देह का धंधा नहीं होता. ऐसे लोग बड़ी मजबूरी में यहां रहते हैं. आने वाले ग्राहकों से बचने के लिए ये अपने घरों के बाहर एक

बोर्ड लगा कर रखते हैं, जिस पर लिखा होता है, ‘यह फैमली क्वार्टर है’. यहां के रहने वाले लोग अपनी पहचान छिपाते हैं. कई बार तो ये अपने पहचानपत्र भी दूसरे महल्ले के नाम पर बनवाते हैं.

यह ऐसा बाजार है, जहां देह बेचने और खरीदने वाले दोनों को ही बिचौलियों के भरोसे रहना पड़ता है. यही वजह है कि इस बाजार की रौनक खत्म हो गई है. किसी बाहर वाले के अंदर दाखिल होते ही गलियों में रहने वाली वेश्याओं और उन के दलालों में होड़ लग जाती है. कई बार तो कईकई दिन तक ग्राहक के दर्शन ही नहीं होते हैं.

सुबह से ही वेश्याएं अपने कोठे में ग्राहक का इंतजार करती दिख जाती हैं. गली के कोने पर खुली चाय और पान की दुकानों के अपने बंधे ग्राहक होते हैं. वेश्या के साथ संबंध बनाने की रकम तय हो जाने के बाद भी दलाल और कोठा मालकिन ग्राहक से जोरजबरदस्ती करते हैं. कई बार तो अंदर कमरे में जाने वाली वेश्या भी ज्यादा पैसों की दरकार करने लगती है.

नए ग्राहकों के साथ तो नजारा और भी बुरा होता है. अगर ग्राहक मजबूत हो और जोरजबरदस्ती करने पर उतर आए, तो मारपीट होना आम बात है.

सोने की मोहरों से भरे घड़े

कमरे का वातावरण रहस्यमय था. लाल रंग का मद्धिम रोशनी वाला बल्ब टिमटिमा रहा था. कमरे के एक कोने में बिछी काली दरी पर एक बाबाजी बैठे थे. उन की उम्र 35 से 40 साल के बीच रही होगी. वह साधुसंन्यासियों या तांत्रिकों जैसे कपड़े पहनने के बजाय पैंटशर्ट पहने था. सिर पर गुलाबी रंग की पगड़ी बांधे उस बाबा के सामने 30-32 साल का एक युवक बैठा था. उस के पीछे 2 अन्य लोग भी बैठे थे. उन की उम्र 55-60 साल रही होगी. सामने गद्दी पर बैठे बाबा ने थोड़ी सख्त आवाज में पूछा, ‘‘आप लोग घर के आंगन की मिट्टी लाए हैं?’’

बाबाजी के सामने बैठे युवक ने झट से अपने हाथ में थामी कपड़े की छोटी सी पोटली बाबा की ओर बढ़ा दी. उस में शायद मिट्टी थी. बाबा ने पोटली से चुटकी भर मिट्टी निकाल कर अपनी हथेली पर रख कर उसे सूंघा. उस के बाद हैरानी से आंखें फाड़ कर सामने बैठे युवक को घूरते हुए कहा, ‘‘हूं…मैं ने पहले ही कहा था कि जरूर कोई बला है. अब पता चला कि वह बला नहीं, बल्कि शेषनाग बैठा है धन पर कुंडली मारे.’’

‘‘शेषनाग…धन…कुंडली..? हम कुछ समझे नहीं बाबाजी.’’ सामने बैठे युवक ने ही नहीं, उस के पीछे बैठै दोनों लोगों ने हैरानी से कहा.

‘‘अरे भाई, तुम लोग तो बड़े भाग्यशाली हो, तुम्हारे घर के अंदर बहुत बड़ा खजाना दबा है.’’ बाबा ने उन्हें समझाते हुए कहा.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बाजाजी, हम कुछ समझ नहीं पाए? हमारे घर की समस्याएं, परेशानियां..?’’

‘‘सब इसी खजाने की वजह से है.’’ बाबा ने उन की बात बीच में ही काटते हुए कहा, ‘‘वह खजाना इन समस्याओं के माध्यम से बारबार चेतावनी दे रहा है कि मुझे बाहर निकालो. लेकिन बात तुम लोगों की समझ में नहीं आ रही है. खैर, कोई बात नहीं, अब तुम मेरे पास आ गए हो तो समझ लो कि तुम्हारे भाग्य खुल गए.’’

‘‘लेकिन बाबाजी, हमें क्या पता कि हमारे घर में खजाना कहां गड़ा है?’’ युवक ने कहा.

‘‘यह काम तुम्हारा नहीं है. कहीं खजाने के चक्कर में अपने घर को मत खोद डालना. गड़ा धन ऐसे नहीं मिल जाता. उस के लिए बड़ी पूजा करनी पड़ती है. तरहतरह के उपाय और साधना करनी पड़ती है. इस के लिए काफी रुपए खर्च करने पड़ेंगे. अगर बिना पूजापाठ के धन निकालने की कोशिश की गई तो परिवार तबाह हो जाता है.

‘‘तुम्हारे घर के अंदर 16 मटके दबे हुए हैं, जिन में सोने की मोहरें भरी हैं. एक बात और ध्यान से सुन लो, मैं श्री गुरुनानक देवजी का वंशज हूं. वह बेदी थे और मैं भी बेदी हूं, इसीलिए यह काम पूरी दुनिया में सिर्फ मैं ही कर सकता हूं. दूसरा कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ, जो यह काम कर सके. समझे कि नहीं?’’

‘‘नहीं महाराज, हम खुद धन निकालने की कैसे सोच सकते हैं, क्योंकि हमें कहां पता है कि मटके कहां गड़े हैं? अब आप ही बताइए कि इस काम में कितना खर्च आएगा?’’

‘‘लगभग 3 लाख रुपए तो खर्च हो ही जाएंगे. और सुनो, अगर यह काम इसी सप्ताह शुरू नहीं हुआ तो धन तो जाएगा ही, तुम्हारा सब सत्यानाश कर के जाएगा. इसलिए यह काम 2-4 दिनों में ही शुरू करना होगा.’’ बाबा ने चेतावनी देते हुए कहा.

बाबा की बात सुन कर युवक और उस के पीछे बैठे दोनों लोगों ने एक साथ कहा, ‘‘ठीक है बाबाजी, हम 2 दिनों में रुपयों की व्यवस्था कर के आते हैं.’’

इस के बाद तीनों बाबा को प्रणाम कर के चले गए.

करतारपुर और कपूरथला के बीचोबीच कपूरथला के थाना सदर का एक गांव है कोट करार. इसी गांव में सरदार तरसेम सिंह पत्नी और 2 बेटों हरजिंदर सिंह तथा चरणजीत सिंह के साथ रहते थे. उन के पास भले ही जमीन ज्यादा नहीं थी, पर उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी.

दोनों बेटों को उन्होंने 12वीं तक पढ़ा कर समय से उन की शादियां कर दी थीं. शादी के बाद दोनों बेटे टैंपो खरीद कर चलाने लगे थे. कुछ सालों पहले तरसेम और उन की पत्नी की मौत हो गई थी.

दोनों भाइयों की कमउम्र में ही शादियां हो गई थीं, इसलिए उन्हें बच्चे भी जल्दी हो गए थे. इस समय हरजिंदर का बेटा 12वीं में पढ़ रहा है तो चरणजीत का 9वीं में. वैसे तो दोनों भाइयों को किसी चीज की कमी नहीं थी, पर इधर कुछ दिनों से उन के सारे काम उलटेपुलटे हो रहे थे.

यह इत्तफाक था या कुछ और कि पूरे परिवार को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि आखिर यह हो क्या रहा है? उन के बने काम भी एकदम से बिगड़ने लगे थे. घर का वातावरण भी नकारात्मक हो गया था. परिवार के सदस्यों को बुरे और डरावने सपने आने लगे थे.

हालांकि यह सब मात्र संयोग था, लेकिन वहम हो जाए तो उस का इलाज किसी के पास नहीं है. ऐसे में किसी ने कह दिया कि यह सब किसी ऊपरी साए की वजह से हो रहा है तो सब ने मान भी लिया. फिर तो सभी ने यही माना कि बिना किसी उपचार के यह ठीक नहीं होगा.

चरणजीत के चाचा परमजीत सिंह भी गांव में ही रहते थे. उन के एक मित्र थे जसवीर सिंह. वह काफी समझदार और अनुभवी आदमी थे. उन्होंने किसी अखबार में एक इश्तहार देखा था, जिस में लिखा था, ‘बनते काम बिगड़ते हों, ऊपरी हवा का चक्कर हो, संतान हो कर गुजर जाती हो, बीमारी या मुकदमेबाजी हो, दुश्मनों का भय या फिर काम बंद हो, हर समस्या का समाधान, हर मुसीबत से शर्तिया छुटकारा. एक बार अवश्य मिलें. नोट: कृपया आने से पहले फोन अवश्य कर लें.’

समाचारपत्र में छपा यह विज्ञापन देख कर जसवीर सिंह ने यह बात अपने मित्र परमजीत को बता कर कहा, ‘‘क्यों न तुम्हारे भतीजों को इस के यहां दिखाया जाए, शायद उन की समस्या का समाधान हो ही जाए?’’

‘‘बात तो तुम ठीक कह रहे हो. जाने में कोई हर्ज भी नहीं है.’’ परमजीत सिंह ने कहा था.

दरअसल, उन्हें भी यह बात जंच गई थी. उस समय हरजिंदर घर पर नहीं था. उन्होंने छोटे भतीजे चरणजीत से बात की और उसे साथ चलने को राजी कर लिया. हालांकि वह बड़े भाई से पूछे या सलाह किए बिना जाना नहीं चाहता था, पर चाचा की वजह से वह इनकार भी नहीं कर सका.

24 दिसंबर, 2016 को चरणजीत सिंह, जसवीर सिंह और परमजीत सिंह समाचारपत्र में दिए पते के अनुसार फ्लैट-2055 नियर बीएमसी स्कूल, चंडीगढ़ रोड, लुधियाना पहुंच गए.

चलने से पहले जसवीर ने फोन कर दिया था. वहां पहुंचने पर तीनों की मुलाकात रविंदर सिंह बेदी नामक सिख युवक से हुई. वह खुद को तंत्रमंत्र, ज्योतिष आदि का विशेषज्ञ बताता था. इन लोगों की समस्या सुन कर उस ने इन्हें अगले दिन घर की मिट्टी ले कर आने को कहा. इस तरह ये लोग 2-3 दिनों तक कपूरथला से लुधियाना आतेजाते रहे.

26 दिसंबर, 2016 को रविंदर सिंह बेदी ने चरणजीत से उस के घर में खजाना दबे होने की बात बता कर उसे निकालने के लिए पूजा के लिए 3 लाख रुपए का खर्च बताया.

चरणजीत का बड़ा भाई हरजिंदर गाड़ी ले कर बाहर गया था. उस के वापस आने का कोई निश्चित दिन नहीं था. दूसरी ओर रविंदर के कहे अनुसार, एक भी दिन देर करना उचित नहीं था. अकेले कोई फैसला लेने में चरणजीत को मुश्किल हो रही थी. दूसरी ओर चाचा और जसवीर सिंह बारबार कह रहे थे कि वह चिंता न करे, सब ठीक हो जाएगा.

दिमाग पर ज्यादा जोर न देते हुए चरणजीत ने रुपयों का इंतजाम किया और 28 दिसंबर, 2016 को चाचा परमजीत और जसवीर सिंह के साथ अपनी अल्टो कार से लुधियाना रविंदर के यहां पहुंच गया. रविंदर ने कहा, ‘‘मैं कोई भी काम गलत या कच्चा नहीं करता. हर काम लिखित और गारंटी के साथ करता हूं. इसलिए पहले कोर्ट चल कर इस काम को करने के लिए एग्रीमेंट बनवाते हैं.’’

जसवीर, परमजीत और चरणजीत ने बहुत कहा कि उन्हें उस पर पूरा विश्वास है, लेकिन रविंदर ने उन की एक नहीं सुनी. वह तीनों को लुधियाना की न्यू कोर्ट ले गया और नोटरी के माध्यम से चरणजीत की अल्टो कार अपने नाम पर यह कह कर ट्रांसफर करवा ली कि अभी उसे इस की जरूरत है. काम हो जाने के बाद वह उसे वापस कर देगा.

जिस एग्रीमेंट के लिए रविंदर उन्हें कोर्ट ले गया था, वह पीछे रह गया. कोर्ट से लौट कर चरणजीत सिंह ने 50-50 हजार कर के 2 लाख रुपए रविंदर बेदी को नकद दे दिए. इस के अलावा उस ने चरणजीत से हजारों रुपए के महंगे स्टोन, पुखराज, पन्ना, नीलम आदि मंगवाए.

रविंदर बेदी का कहना था कि पूजा के समय ये स्टोन पूजा वाले स्थान पर रखे जाएंगे. जिस जगह खजाना दबा होगा, ये स्टोन अपने आप चल कर उस जगह को बताएंगे. उस दिन के बाद चरणजीत को वे स्टोन खजाने का पता क्या बताते, रविंदर बेदी खुद ही गायब हो गया.

चरणजीत लुधियाना स्थित रविंदर बेदी के घर के चक्कर लगालगा कर थक गया, उसे न उस की कार मिली और न खजाना. उस के रुपए भी चले गए. रविंदर का कुछ अतापता नहीं था, काफी चक्कर लगाने के बाद एक दिन बेदी मिला भी तो सिवाय आश्वासन के उस ने कुछ नहीं दिया. उस ने कहा, ‘‘चिंता करने की जरूरत नहीं है. शुभ मुहूर्त आते ही वह पूजा शुरू कर के तुम्हें राजा बना देगा.’’

इस के बाद न कभी वह शुभ मुहूर्त आया और न ही चरणजीत राजा बन सका. धीरेधीरे चरणजीत की समझ में आ गया कि रविंदर बेदी ने उसे ठग लिया है. एक दिन वह अपने बड़े भाई हरजिंदर और 2 रिश्तेदारों को साथ ले कर रविंदर बेदी के घर पहुंचा. उस ने अपनी कार और 2 लाख रुपए वापस मांगे.

रविंदर ने उन्हें टका सा जवाब देते हुए कहा, ‘‘कैसे रुपए? जो रुपए तुम ने दिए थे, वे पूजापाठ की सामग्री में खर्च हो गए. रही बात कार की तो उसे खुद तुम ने मुझे बेचा था. बाबाजी की सेवा के लिए.’’

रविंदर की बात सुन कर चरणजीत सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. दुख तो उसे 2 लाख रुपयों का भी था, लेकिन कार की चिंता अधिक थी, क्योंकि कार उस ने एचडीएफसी बैंक से फाइनैंस करवाई थी, जिस की किस्तें वह अभी भी भर रहा था.

वह समझ गया कि खजाने का लालच दे कर रविंदर ने उस के साथ जबरदस्त चीटिंग की है. एक बार और उस ने बेदी से निवेदन करते हुए कहा कि उसे खजानावजाना कुछ नहीं चाहिए. वह उस की कार और 2 लाख रुपए लौटा दे. इस के बाद वह उस के द्वारा ठगी का किसी के सामने जिक्र नहीं करेगा.

चरणजीत का इतना कहना था कि रविंदर आगबबूला हो उठा. उस ने चरणजीत को धमकी देते हुए कहा, ‘‘चुपचाप शराफत से चले जाओ, वरना पुलिस को बुला कर बंद करवा दूंगा.’’

‘‘कमाल है, एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी. ठगा भी मैं ही गया हूं और तुम बंद भी मुझे ही कराओगे. बदमाशी की भी हद होती है. अब मैं पुलिस के पास जाता हूं.’’

‘‘जाओ, शौक से जाओ. पुलिस थानों में मेरी इतनी चलती है कि वहां कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा. तुम्हें पता नहीं कि मैं पुलिस को हफ्ता देता हूं.’’

सच पूछो तो उस समय रविंदर बेदी की धमकी से चरणजीत डर गया था. उस ने घर जा कर यह बात अपने बड़े भाई और रिश्तेदारों को बताई. तब सब ने यही सलाह दी कि उसे पुलिस के पास जाना चाहिए. लेकिन सब ने सोचा कि एक बार और रविंदर के पास जा कर बात कर लेनी चाहिए. पर जब वे रविंदर के फ्लैट पर पहुंचे तो उस ने कोई बात सुने बिना सभी को धमका कर भगा दिया.

पूरे 6 महीने हो गए थे चरणजीत को रविंदर के पीछे भटकते हुए. हार कर लुधियाना के थाना डिवीजन-7 में जा कर उस ने थानाप्रभारी सतवंत सिंह को अपने साथ रविंदर बेदी द्वारा की गई ठगी की पूरी कहानी सुना दी. चरणजीत की पूरी बात सुन कर सतवंत सिंह ने एएसआई सुखविंदर सिंह को बुला कर यह मामला उन के हवाले कर काररवाई करने को कहा.

सुखविंदर सिंह चरणजीत की शिकायत पर काररवाई करते हुए सिपाही बलबीर सिंह को रविंदर बेदी के घर बुलाने भेजा, ताकि आमनेसामने बैठ कर बात की जा सके.

दरअसल, ऐसे मामलों में काफी हद तक पीडि़त खुद ही दोषी होता है, जो अंधविश्वास के झूठे मायाजाल में फंस कर अपना नुकसान कर बैठता है. सोचना चरणजीत को चाहिए था कि उस के घर से लगभग 150 किलोमीटर दूर बैठा आदमी यह बात कैसे जान गया कि उस के घर में खजाना दबा है. लालच और अंधविश्वास में ही उलझ कर चरणजीत जैसे लोग रविंदर बेदी जैसे फरेबी तांत्रिकों के मायाजाल में फंस कर उल्लू बन जाते हैं.

बहरहाल, सुखविंदर सिंह के बुलवाने पर रविंदर बेदी थाने नहीं आया. वह घर से ही गायब हो गया. पुलिस उस की तलाश करती रही. पुलिस अपना काम अपने तरीके से कर रही थी. कार और 2 लाख रुपए तो चरणजीत के फंसे हुए थे, इसलिए वह और उस के रिश्तेदार गुपचुप तरीके से रविंदर के घर की निगरानी कर रहे थे.

एक दिन रविंदर बेदी कपड़े और कुछ रुपए लेने जैसे ही घर आया, चरणजीत और उस के रिश्तेदारों को देख कर ठिठका. वह शहर छोड़ कर भाग जाना चाहता था. चरणजीत और उस के रिश्तेदारों को देख कर वह गली में भागा, पर चरणजीत और उस के रिश्तेदारों ने दौड़ा कर उसे पकड़ लिया. इस में मोहल्ले वालों ने भी उन की मदद की. क्योंकि मोहल्ले वाले भी उस की ठगी के धंधे से अच्छी तरह परिचित थे. सभी रविंदर को पकड़ कर थाने ले गए.

रविंदर का साथी कमल शर्मा उर्फ ड्राइवर भी पकड़ा गया था. वह रविंदर के हर काम में उस का सहायक था. चरणजीत की कार भी रविंदर ने उसी के नाम करवाई थी. थाने पहुंच कर रविंदर ने नौटंकी शुरू कर दी. काफी देर तक उस की नौटंकी चलती रही.

कभी वह कहता कि अपनी तंत्रमंत्र की ताकत से सभी को भस्म कर देगा तो कभी कहता कि वह इन के 2 लाख रुपए किस्तों में लौटा देगा. रही बात कार की तो इसे उस ने चरणजीत से खरीदी थी, जिस के उस के पास बाकायदा कागज हैं.

लेकिन पुलिस ने न उस की बातों पर ध्यान दिया और न नौटंकी पर. 16 मई, 2017 को अपराध संख्या 109/2017 पर भादंवि की धारा 420, 406, 120बी के तहत उस के और उस के साथी कमल शर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर अदालत में पेश कर के एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

लेकिन रिमांड अवधि में पुलिस उस से ज्यादा जानकारी हासिल नहीं कर सकी. रिमांड खत्म होने पर उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया था. बाद में चरणजीत ने अपनी कोशिश से उस से कार वापस ली थी.

इस मामले में चरणजीत का कहना है कि पुलिस ने उस की बात ठीक से नहीं सुनी. लेकिन पुलिस ऐसे मामलों में कर भी क्या सकती है?

पुलिस या कानून किसी से नहीं कहता कि लालच में अपना सब कुछ लुटा दो. यहां तो हर कोई लूटने को बैठा है. लुटने वाले को भी तो कुछ सोचना चाहिए.

लुटना या बचना आदमी के अपने हाथ में है. कुदरत ने हर इंसान को बराबर दिमाग दिया है. अगर कोई फंसाने के लिए दिमाग लगाता है तो सामने वाले को बचने के लिए अपने दिमाग का उपयोग करना चाहिए. ऐसे में अगर कोई फंस जाता है तो वह भी कम दोषी नहीं है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मनमाना शासन और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था

सरकारी प्रयोगों के कारण देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ाने लगी है. पहले नोटबंदी, फिर कालेधन का हल्ला और अब जीएसटी के भूत के कारण उत्पादक शक्ति व्यापार संभालने में लग रही है. नेता और अफसर शायद खुश हो रहे होंगे कि उन्होंने आखिर जनता को नचा कर रख दिया और स्वच्छ सरकार बनाने का असली प्रसाद चखा दिया है.

हर देश में हमेशा ऐसा हुआ है कि जब किसी विशेष नीति को ले कर कोई दल या नेता सत्ता में आया तो उस ने अर्थव्यवस्था पर पहला हाथ डाला और आम जनता का जीना दूभर हो गया. ऐसा हर राजनीतिक दल या नेता कहता रहा कि कुछ दिनों के कष्ट झेल लो, फिर सब ठीक हो जाएगा.

रूस में 1917 में जब श्रमिकों और किसानों की क्रांति हुई, तो ऐसा ही हुआ. कामधंधे बंद हो गए. खेत सूख गए. व्यापार ठप हो गए, भुखमरी बढ़ गई पर कम्युनिज्म फलनेफूलने लगा. चीन में माओत्से तुंग की लाल क्रांति के बाद यही हुआ और कभी लेट हंड्रेड फ्लावर्स ब्लूम तो कभी सांस्कृतिक क्रांति के जुमले परोस कर चीन की शक्ति को नष्ट किया गया.

अफ्रीका के अधिकांश देश जो यूरोप के अधीन थे, क्रांतियों के बाद दशकों तक भुखमरी, अकाल, गृहयुद्ध, अराजकता को भोगते रहे जबकि क्रांतियों के सूत्रधार लगभग तानाशाह बने रहे या उन्हें हटा कर कोई और तानाशाह बना. ऐसा ही दक्षिण अमेरिका में हुआ.

भारत में सांस्कृतिक क्रांति लाए जाने के नाम पर भ्रष्टाचार, कालेधन व हिंदूविरोधी नीतियों के खिलाफ सरकार का बनना तब बेहद सुखद लगा था पर अब पूरा देश प्रयोगशाला बन गया है और जनता पर तरहतरह के प्रयोग किए जा रहे हैं. एक तरफ वंदेमातरम, योग, भारत माता का गुणगान थोपा जा रहा है तो दूसरी ओर जीएसटी, कठोर कंपनी कानून, नोटबंदी, आधार नंबर का बंधन जबरन गले में लटकाए जा रहे हैं. आज आम व्यापारी ही नहीं, आम आदमी भी इन खानापूर्तियों को पूरा करने में लगा है. आर्थिक मोरचे पर प्रगति के नाम पर जो भी दिखावटी टोटके किए जा रहे हैं वे देश को भारी पड़ेंगे, यह अभी से दिख रहा है.

संतोष इस बात का किया जा सकता है कि कल तक की महाशक्तियां जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और रूस के शासक भी कुछ इसी तरह के मनमाने फैसलों से अपने देशों का नाश कर रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के फैसले हमारे देश की तरह के बेसिरपैर के हैं और ब्रिटेन का यूरोपीय साझा बाजार समझौता तोड़ना घातक है. रूस के व्लादिमीर पुतिन अपने बाहुबल पर उतर रहे हैं और रूसी अर्थव्यवस्था व उद्योग सिसक रहे हैं. इन देशों की हालत देख कर भारत को अपने पैरों की पीड़ा का एहसास कम हो रहा है.

दुनिया के और बहुत से देश अपने शासकों या वोटरों के बहुमत के कारण मूर्खतापूर्ण रास्ते पर चल रहे हैं और यही हमारे देश पर छा रहे काले बादलों के बारे में संतोष की बात है.

करिश्मा की इन तस्वीरों ने सोशल मीडिया में लगाई आग

‘रागिनी MMS रिटर्न्स’ की एक्ट्रेस करिश्मा शर्मा अक्सर ही अपने बोल्डनेस का जलवा बिखेरती नजर आती रहती हैं. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. सोशल मीडिया पर करिश्मा की कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई है, जिसने इंटरनेट पर सनसनी मचा रखी है.

दरअसल हाल ही में एक वेब सीरीज ‘रागिनी एमएमस रिटर्न्स’ को एल्ट बालाजी की तरफ से औनएयर किया गया है. बालाजी प्रोडक्शन के बैनर तले बनी वेब सीरीज ‘रागिनी MMS रिटर्न्स’ के लिए करिश्मा ने फोटोशूट कराया है. इस फोटोशूट की तस्वीरें उन्होंने इंस्टाग्राम पर शेयर की है जो काफी तेजी से वायरल हो रही हैं.

‘पवित्र रिश्ता’ और ‘ये है मोहब्बतें’ से लाइमलाइट में आने वाली करिश्मा शर्मा का यह हाट और सेक्सी अवतार हर किसी को लुभा रहा है. आपको बताते चलें कि एल्ट बालाजी के प्रोडक्शन में बनी ‘रागिनी एमएमएस रिटर्न्स’ वेब सीरीज का जब पहला पोस्टर रिलीज किया गया था तब करिश्मा के बोल्ड अवतार ने पर जगह धूम मचा दी थी.

एकता कपूर के प्रोडक्शन में बनी फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ ने साल 2014 में बौक्स औफिस पर काफी धूम मचाई थी. इस फिल्म के लीड रोल में सनी लियोनी थीं. लेकिन इस बार एकता इसे वेब सीरीज के रूप में लेकर आई हैं और इसमें करिश्मा बेहद ही हाट अवतार का कहर बरसा रही हैं.

करिश्मा ‘ये है मोहब्बतें’ के अलावा ‘पवित्र रिश्ता’, ‘फियर फाइल्स: डर की सच्ची तस्वीरें’, ‘आहट’ और ‘सिलसिला प्यार का’ जैसे टीवी सीरियल्स में काम कर चुकी हैं.

1921 का ट्रेलर लौंच, मुख्य भूमिका में हैं जरीन खान-करन कुंद्रा

विक्रम भट्ट निर्देशित फिल्म 1920 की सीक्वल फिल्म 1921 का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है. ट्रेलर से साफ पता चलता है कि हौरर के मामले में फिल्म पिछली कड़ी से 4 कदम और आगे जाने को तैयार है. फिल्म में जरीन खान और करण कुंद्रा अहम भूमिकाओं में हैं.

कहानी एक ऐसे स्टूडेंट (करण कुंद्रा) की है जो म्यूजिक की पढ़ाई के लिए भारत से इंग्लैंड जाता है और इसी बीच उसका पाला कुछ ऐसी रुहानी ताकतों से पड़ जाता है जिनका सामना करना उसके लिए मुश्किल है. बुरी ताकतों से लड़ाई में करण की मदद को आगे आती हैं जरीन खान.

जरीन न सिर्फ रूहों को देख सकती हैं बल्कि उन्हें यह भी पता है कि उनसे कैसे निपटना है. पहली फिल्म ‘1920’ में अदा शर्मा और रजनीश दुग्गल लीड रोल में थे और यह फिल्म बौक्स औफिस पर सफल रही थी.

पिछली फिल्म दर्शकों को डरा पाने में कामयाब रही थी और इस फिल्म का ट्रेलर देख कर भी यही लगता है. फिल्म में कई जगहों पर पैरानौर्मल एक्टिविटीज और भूतिया सायों को दिखाया गया है. फिल्म में विक्रम भट्ट के निर्देशन का हुनर साफ दिखाई देता है और साथ ही ट्रेलर में जो चीज आकर्षित करती है वह है फिल्म का म्यूजिक.

ट्रेलर को रिलायंस एंटरटेनमेंट के यूट्यूब चैनल से अपलोड किया गया है और इसे अब तक 1 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. पिछली फिल्म के रिस्पौन्स को देखते हुए लगता है कि दर्शकों को इस फिल्म से काफी उम्मीदें होंगी. अब देखना यह होगा कि फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर किस हद तक खरी उतरती है. अगर ट्रेलर की बात कि जाए तो फिल्म का ट्रेलर काफी हद तक अच्छा लग रहा है जोकि कहीं ना कही लोगो को अपनी ओर आकर्षित करने का काम करेगा.

हालांकि बाकी भूतिया फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी कुछ इंटीमेट सीन्स है, जो कहीं ना कहीं एक तबगे  को अपनी तरफ आकर्षित करने का काम करेगा. इस फिल्म में जरीन खान बेहद खुबसूरत नजर आ रहीं हैं.

सरकार अस्पतालों के खिलाफ नहीं : केजरीवाल

मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा पर हमला बोला है. मुंडका में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी पर मैक्स अस्पताल का समर्थन करने का आरोप लगाया. इस दौरान उन्होंने कहा कि सरकार निजी अस्पतालों के खिलाफ नहीं है, लेकिन अगर कोई अस्पताल गलत हरकत करेगा तो सरकार चुप नहीं बैठेगी.

जीवित बच्चे को मृत बताकर मां-बाप को सौंपने के मामले में प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर सरकार ने एक दिन पहले ही मैक्स अस्पताल शालीमार बाग का लाइसेंस रद्द किया था. मुंडका में इस मामले पर अस्पताल का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ने मनोज तिवारी पर हमला बोला.

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार निजी अस्पतालों के खिलाफ नहीं है. मैक्स अस्पताल ने एक जीते-जागते बच्चे को मरा हुआ घोषित करके उसे मां-बाप को पकड़ा दिया. मां-बाप ने जब पैकेट में हलचल महसूस की तो उसे खोलकर देखा. उस समय बच्चे की सांसे चल रही थीं. इसके चलते अस्पताल पर कार्रवाई की गई है.

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि अस्पताल की ओर से पहले भी इस तरह की हरकतें की जाती रही हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मैक्स अस्पताल का समर्थन कर रहे हैं. हमें दुख है कि इस मुद्दे पर भाजपा मैक्स अस्पताल के साथ खड़ी है. मुख्यमंत्री केजरीवाल ने भाजपा पर जनता का हित बेचने और अस्पताल के साथ खड़ा होने का आरोप लगाया.

परिजनों को हालात की जानकारी थी : डॉ. मेहता

मैक्स अस्पताल मामले में बर्खास्त डॉ. एपी मेहता ने एक बयान जारी कर अपनी सफाई पेश की है. उन्होंने कहा कि नवजात बच्चे की स्थिति के बारे में परिजनों को पूरी जानकारी दी गई थी. साथ ही, कहा कि परिजनों ने ही बच्चे को रेसिसिटेशन (पुन: होश में लाने की प्रक्रिया) देने से मना किया था.

डॉ. मेहता का कहना है कि बच्चे की मां को अस्पताल में भर्ती कराने के बाद उनके परिजनों को प्रसव के बाद की परिस्थिति की पूरी जानकारी दी गई थी. उन्हें बताया गया था कि ऐसी परिस्थितियों में बच्चे के बच पाने की संभावना कम है. अगर बच्च बच भी गया उसका शारीरिक विकास प्रभावित हुए बिना उसके ठीक रहने की उम्मीद बहुत कम है.

डॉ. मेहता के मुताबिक, परिजनों को यह भी बताया गया था कि बच्चे को लंबे समय तक नर्सरी में रखना पड़ सकता है. इलाज के खर्च की जानकारी भी दी गई थी. उन्हें बच्चों के सामान्य होने की गारंटी भी नहीं दी गई थी. उन्होंने कहा कि अगले दिन सुबह 7:30 बजे जुड़वां बच्चों को जन्म हुआ. इसमें से एक लड़की मृत जन्म ली थी. दूसरे नवजात (लड़का) को रेसिसिटेशन देने के लिए प्रसव कराने वाले डॉक्टर ने परिजनों से पूछा, जिस पर उन्होंने इनकार कर दिया था.

घरवालों ने इनकार किया

बच्चे के परिजनों ने डॉ. एपी मेहता की सफाई को पूरी तरह से नकार दिया है. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनकी तरफ से रेसिसिटेशन देने से मना किया गया. उनका कहना है कि डॉक्टर ने इलाज के खर्च के बारे में जानकारी जरूर दी थी, पर यह नहीं बताया था कि रेसिसिटेशन देने से बच्चे पर क्या असर पड़ सकता है. बच्च चाहे जिस अवस्था में हो क्या कोई अपने बच्चे का इलाज करने से डॉक्टरों को मना कर सकता है.

साड़ी सब से सैक्सी पहनावा लगती है : अर्चना प्रजापति

मुंबई में पलीबढ़ी अर्चना प्रजापति उत्तर प्रदेश के गोरखपुर इलाके की रहने वाली हैं. मुंबई में अर्चना के पिता का अपना कारोबार है. स्कूल में पढ़ाई के समय से ही अर्चना को ऐक्टिंग अच्छी लगती थी. जब वे ग्रेजुएशन करने के लिए कालेज पहुंचीं, तो उन को एक म्यूजिक अलबम में काम करने का मौका मिला. इस के बाद वे फिल्मों की तरफ चल पड़ीं.

जल्दी ही अर्चना प्रजापति को कई भोजपुरी फिल्में मिल गईं. इन में ‘जिद्दी’ और ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ खास हैं, जो बड़े परदे पर आ चुकी हैं. अर्चना प्रजापति ने जिन म्यूजिक अलबमों में काम किया है, उन में ‘शिकवा’ और ‘नवाजिश’ खास हैं. वे एक हिंदी फिल्म भी करने जा रही हैं.

पेश हैं, अर्चना प्रजापति से हुई बातचीत के खास अंश :

ऐक्टिंग जगत में जगह बनाना कितना मुश्किल काम है?

आज के समय में हर क्षेत्र में एक से एक प्रतिभाएं मौजूद हैं. ऐसे में अपने लिए जगह बनाना बहुत ही मुश्किल काम है. जरूरत इस बात की होती है कि आप मेहनत करें, सही दिशा में कोशिश करें. इस के बाद आप में टेलैंट होगा, तो कामयाबी जरूर मिलेगी. बिना मेहनत के कुछ भी मुमकिन नहीं है.

भोजपुरी फिल्मों से ऐक्टिंग की शुरुआत करने से आप को भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन का ठप्पा लगने का डर तो नहीं था?

आज के समय में भोजपुरी सिनेमा काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है. हिंदी और दूसरी इलाकाई बोली के कलाकार भी इस में काम करने आ रहे हैं. अब भोजपुरी फिल्मों का ठप्पा जैसा कुछ नहीं है. भोजपुरी मेरी अपनी बोली है. ऐसे में यहां काम करने में जो खुशी मिलती है, वह सब से खास है.

घर से आप को किस से सब से ज्यादा सहयोग मिलता है?

 मेरे मम्मीपापा दोनों ही बहुत सहयोगी हैं. जब मेरी फिल्म ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ की चर्चा लोगों ने की, तो हमारे घर वालों को लगा कि मैं ने सही काम किया है.

भोजपुरी फिल्में अपनी बोल्डनैस के लिए ज्यादा बदनाम हैं. आप को क्या लगता है?

 जिस तरह से भोजपुरी फिल्मों की बुराई होती है, वह कुछ ज्यादा ही लगती है. चाहे किसी भी भाषा की फिल्में हों, उन में खुलापन बराबर होता है. भोजपुरी गांवदेहात की भाषा है, शायद इस वजह से इस की ज्यादा बुराई होती है. फिल्मकार वही फिल्में बनाते हैं, जिन को दर्शक देखते हैं. जब दर्शक इसे गलत नहीं मानते, तो बुराई करने से क्या होता है.

आप को इन फिल्मों में रोल करने से क्या कोई परेशानी होती है?

कहानी की मांग के मुताबिक खुलेपन से कोई एतराज नहीं है. हां, यह बात सच है कि अगर खुलेपन की मांग ऐसी हो, जो देखने वालों को पसंद न हो, तो उसे करने से क्या फायदा.

जब इन बातों को ले कर लोग भोजपुरी फिल्मों की बुराई करते हैं, तो बुरा लगता है. हम भोजपुरी फिल्मी परिवार का हिस्सा हैं. हमें खुद इन बातों का खयाल रखना चाहिए कि लोगों को ज्यादा बुराई करने का मौका ही न मिले.

भोजपुरी फिल्मों में डांस आइटम बहुत होते हैं. क्या आप ने भी डांस सीखा है?

 मुझे डांस करने का शौक है. मैं ने अभी तक डांस सीखा नहीं है. मैं जल्दी ही डांस सीखने के लिए क्लास लूंगी. वैसे, आजकल के डांस कोरियोग्राफर इतने माहिर होते हैं कि वे डांस कलाकारों से बहुत आसानी से काम करा लेते हैं, पर डांस सीखने के बाद उस का अलग ही अंदाज आता है.

आप को और क्या काम करना पसंद हैं?

मुझे खाली समय में पत्रिकाओं में छपी कहानियां पढ़ने का बहुत शौक है. ‘सरस सलिल’ मैं खूब पढ़ती हूं. इस की कहानियां और लेख मुझे पसंद आते हैं. मैं दूसरी पत्रिकाएं भी पढ़ती हूं. मुझे पहनने में साड़ी बहुत पसंद है. मुझे यह सब से सैक्सी पहनावा लगती है. घूमने और खाने का मुझे खास शौक नहीं है.

प्रदूषण बनाम प्रदूषण की है असली लड़ाई

दिल्ली व उत्तर भारत के अनेक शहरों में बढ़ते प्रदूषण के कारण इन जगहों में जिंदगी गुजारना एक आफत सा हो गया है. अफसोस यह है कि इस का नोटबंदी की तरह का कोई सरल उपाय नहीं कि मंत्र पढ़ा और कालेधन की समस्या को चुटकियों में समाप्त कर दिया. यह समस्या फिलहाल वर्तमान राजनेताओं के बस के परे है क्योंकि एक तो यह विश्वव्यापी असर का परिणाम है और दूसरा यह कि मानव जिस आधुनिक जीवनशैली का आदी हो गया है उसे वह छोड़ने वाला नहीं है.

यह कहना कि प्रदूषण केवल पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के खेतों में फसल काटे जाने के बाद बची जड़ों को जलाने या डीजल गाडि़यों व जेनरेटरों से होता है, काफीकुछ अधूरा है. इस प्रदूषण के बहुत से कारण हैं और उन के एकसाथ जुड़ जाने और वर्षा न होने व तेज हवाएं न चलने के कारण यह समस्या उग्र हो जाती है.

इन सैकड़ों कारणों का एकसाथ एक ही आदेश से निवारण करना असंभव है. इस के लिए जीवनशैली बदलनी होगी और यह देश खासतौर पर इस के लिए तैयार है ही नहीं. हमारे यहां दूसरों के दुखदर्द को देखने व महसूस करने की आदत ही नहीं है. हम तो जुगाड़ संस्कृति का ढोल पीटने वाले हैं जो 2 मिनट हाथ सेंकने के लिए एक पूरा पेड़ जला कर राख कर दें और राख का निबटान तक न करें.

हम तो वे लोग हैं जो एक तरफ गंगायमुना की सफाई के नाम पर अरबों रुपए लगाएं और फिर सफाई का बजट पास करने वाले मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री ही नदियों किनारे आरतियों, पूजा सामग्रियों, मूर्तियों को बहा कर व छठपूजा के बहाने से उसे खराब कर दें और अपनी पीठ थपथपाने भी लगें.

जैसे हमारी कुरीतियों ने हमारे समाज को टुकड़ों में बांट रखा है, जैसे हमारी सोच ने हमें देश व समाज के प्रति गैरजिम्मेदार बना रखा है वैसे ही हम ने अपनेआप को प्रकृति से खिलवाड़ करने का अधिकारी बना रखा है. हम ने प्रकृति की देखभाल करना तो मानो सीखा ही नहीं है. आधुनिक विज्ञान हमारी सहायता करने को तैयार है. ऐसे उपाय हैं जिन से कुछ हद तक प्रदूषण का मुकाबला किया जा सकता है पर हम हैं कि न सुनने को तैयार हैं न कुछ करने को.

जब दिल्ली का दम घुट रहा था तब नोटबंदी जैसी बेवकूफियों की सालगिरह ऐसे मनाई जा रही थी, मानो वह एवरेस्ट फतह हो. इस से कुछ नहीं हुआ जबकि करोड़ों नोट स्वाहा हो गए. यह प्रदूषण बढ़ाने वाला ही काम तो है.

दिल्ली का प्रदूषण अभी न कम होने वाला है न इस का हमारे पास हल है. जब बारिश होगी, हवाएं चलेंगी, यह अपनेआप कम हो जाएगा वरना प्लेग  की तरह यह जानें लेता रहेगा. अरविंद केजरीवाल सरकार बातें तो करती है पर उस के हाथों में बहुतकुछ नहीं है. केजरीवाल थोड़ाबहुत कर लें उसी से खुश हो जाएं. नरेंद्र मोदी तो अभी गुजरात में लगे हैं, उन्हें कृपया डिस्टर्ब न करें.

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