बात स्वच्छ भारत अभियान के साथसाथ सरकारी भूमिपूजनों की भी पोल खोलती हुई है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुछ माह पहले भोपाल के कोलार इलाके में सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए समारोहपूर्वक एक और भूमिपूजन कर डाला था. इस का मतलब आम लोगों ने यही लगाया था कि अब जल्द या देरसवेर ही सही, सीवेज नैटवर्क का काम शुरू हो जाएगा. पर हैरत तब हुई जब यह उजागर हुआ कि 115 करोड़ रुपए का सीवेज नैटवर्क बिछाने के बाबत किसी कंपनी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई यानी टैंडर ही नहीं हुआ.
फिर मुख्यमंत्री ने किस बाबत भूमिपूजन किया था, इस सवाल का जवाब अब कभी शायद ही मिले लेकिन यह बात भी इस हास्यास्पद वाकिए के बाद उभर कर आई कि शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रियों और विधायकों को निर्देश दे दिए हैं कि चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में भूमिपूजनों, शिलान्यासों और लोकार्पणों का सिलसिला रुकना नहीं चाहिए. दरअसल, इस से लगता है कि काम हो रहे हैं और सरकार को मुफ्त का प्रचारप्रसार भी मिलता है.
भूमिपूजन नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक धार्मिक कृत्य या कर्मकांड है जिसे देशभर के नेता बड़ी श्रद्धा व आस्था से करते हैं सिर्फ इसलिए कि इस से उन की इमेज चमकी हुई दिखती है और सरकारी पैसे से पूजापाठ, पाखंडों का माहौल परवान चढ़ता होता है. जनप्रतिनिधियों को जनता को लुभाने का सब से आसान रास्ता पूजापाठ का ही लगता है. यही वह विकास है जो आजादी के बाद से उत्तरोत्तर हो रहा है. फर्क इतनाभर आया है कि पहले इसे कांग्रेस करती थी, अब भाजपा कर रही है.
एक से बढ़ कर एक भूमिपूजन
शिवराज सिंह चौहान औसतन हफ्तेभर में एक भूमिपूजन जरूर करते हैं लेकिन उन के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री उमाशंकर गुप्ता तो भूमिपूजन मंत्री के नाम से ही पहचाने जाने लगे हैं जो हर दूसरे दिन कोई न कोई भूमिपूजन करते हैं.
उमाशंकर गुप्ता जैसे दर्जनभर मंत्री भूमिपूजन के लिए कुख्यात हो चले हैं अब तक ये कितने भूमिपूजन कर चुके हैं, यह तो शायद ये भी न बता पाएं लेकिन क्रिकेट की तरह रिकौर्डों के नजरिए से देखें तो शिवराज सिंह मंत्रिमंडल के ही एकदूसरे वरिष्ठ सदस्य गोपाल भार्गव ने तो पिछले विधानसभा चुनाव में भूमिपूजन का रिकौर्ड ही बना डाला था.
सागर के नजदीक अपने विधानसभा क्षेत्र रहली में गोपाल भार्गव ने एक ही दिन में 2,551 भूमिपूजनों का रिकौर्ड बना कर सब को चौंका दिया था. तब इस रिकौर्ड को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड में शामिल करने के बाबत भी हंसीमजाक हुआ था. अब गंगा उलटी बह रही है, कहा यह जा रहा है कि 5 वर्षों के शासनकाल में 2,551 भूमिपूजनों और शिलान्यासों में से 30 फीसदी काम भी पूरे नहीं हुए हैं जबकि इन की लागत 300 करोड़ रुपए से भी ज्यादा आई थी.
उमाशंकर गुप्ता और गोपाल भार्गव जैसे मंत्रियों ने हालांकि अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जिस किसी ने विकास कार्यों या निर्माण कार्यों के भूमिपूजन किए हैं, वे निर्धारित समयसीमा में किए जाएं. लेकिन यह कहनेभर की बात है. ऐसा होना क्यों संभव नहीं है, यह शिवराज सिंह के कोलार वाले भूमिपूजन की हकीकत से समझा जा सकता है कि सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए कोई कंपनी आगे आई ही नहीं थी, लेकिन फिर भी हड़बड़ाहट में उन्होंने भूमिपूजन कर डाला था.
जाहिर है भूमिपूजन एक धार्मिक लत है जिस में कोई अहम और बड़ा प्रोजैक्ट हो तो केंद्रीय मंत्री बुला लिए जाते हैं और बात जब अरबों की परियोजनाओं की हो तो फिर प्रधानमंत्री इस के लिए उपयुक्त माने जाते हैं.
राजस्थान के उदयपुर में भी कुछ माह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का शुभारंभ किया था. इस में दिलचस्प बात नरेंद्र मोदी द्वारा डिजिटल भूमिपूजन किया जाना थी.
सरकारी भूमिपूजनों का अपना अलग स्लैब होता है, उसी के हिसाब से नेता बुलाए जाते हैं. बड़े भूमिपूजनों में पंडित भी बड़ा बुलाया जाता है. चूंकि बड़े पंडे की दक्षिणा भी ज्यादा होती है, इसलिए यह खर्च अब ठेकेदारों से कराया जाने लगा है. पूजन सामग्री भी इन्हीं से मंगाई जाने लगी है, जिन का मकसद पूजा के बहाने अधिकारियों व नेताओं की निगाह में चढ़ना होता है.
बाद में यही ठेकेदार भूमिपूजन के अपने खर्च में पांचगुना पैसा किसी भी मद में बिल में लगा देते हैं, जो सहर्ष पास हो जाता है. यानी अगर एक भूमिपूजन में ठेकेदार ने 20 हजार रुपए खर्च किए हैं तो काम मिल जाने पर वह उस का मुनाफा 80 हजार रुपए और वसूलता है.
जाहिर है भूमिपूजन एक तरह से भ्रष्टाचार और हेरफेर की एक स्वीकृत वजह और बुनियाद है जिस पर धर्म का ठप्पा लगा होने से कोई एतराज नहीं जताता. संविधान में कहीं नहीं लिखा कि सरकारी विकास कार्यों का भूमिपूजन किया जाए और उस का खर्च संबंधित विभाग या फिर ठेकेदार या फिर दोनों संयुक्त रूप से उठाएं.
सरकारी कार्यक्रमों में भूमिपूजनों पर खुलेआम जिन करोड़ों रुपयों की बरबादी होती है, वह जनता का पैसा है.
भगवान भरोसे विकास कार्य
भूमिपूजन को धर्म के नजरिए से देखें तो मान्यता यह है कि इस के करने से निर्माण कार्य में कोई दैवीय विघ्न यानी बाधा नहीं आती. भूमिपूजन की शुरुआत और कलश स्थापना पान के पत्तों व गणेश पूजा से होती है. पंडे के मंत्रोच्चार के बाद आमंत्रित नेता प्रतीकात्मक रूप से 1-2 बार फावड़ा या कुदाल जमीन पर चला देता है. इस के बाद नारियल फोड़ा जाता है फिर मावे से बनी मिठाई का प्रसाद वितरण किया जाता है. पूजन का अंत भगवान की जय से ही होता है.
यानी विकास कार्य योजनाओं से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा और इच्छा से होते हैं. इस अलोकतांत्रिक परंपरा को क्यों ढोया जा रहा है, इस सवाल का जवाब कोई स्पष्ट रूप से देने को तैयार नहीं होता. सिवा इस के, चूंकि ऐसा होता आ रहा है, इसलिए हर्ज क्या है.
हर्ज यह है कि इस में जनता के पैसे की इफरात से बरबादी होती है और सरकारी तौर पर अंधविश्वासों व पंडावाद को बढ़ावा मिलता है.
भूमिपूजन में अगर कोई दम होता तो पुलियाएं गिरती नहीं, हैंडपंप खराब नहीं पड़े होते और सरकारी इमारतों से पानी नहीं टपक रहा होता. ऐसे वाकिए और हादसे जब होते हैं तो हर कोई सरकार और ठेकेदार को घटिया निर्माण के बाबत कोसता है लेकिन भूमिपूजन को दोष कोई नहीं देता. इसी धार्मिक मानसिकता का फायदा नेता और जनप्रतिनिधि खूब उठाते हैं.
कोई उन्नीस नहीं
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के के मिश्रा की मानें तो भूमिपूजन जनता से टैक्स की शक्ल में वसूले गए पैसों की बरबादी है. सरकार सस्ती वाहवाही भूमिपूजन के जरिए लूटती है. सरकार को इस फुजूलखर्ची पर रोक लगानी चाहिए.
के के मिश्रा जैसे तेजतर्रार नेता इस सवाल पर बगलें झांकते नजर आते हैं कि यह रिवाज तो कांग्रेस के शासनकाल के दौरान भी था और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह भी सरकारी तौर पर खूब भूमिपूजन करते थे.
भूमिपूजन अगर एक तरह से धर्म या राजनीति का हिस्सा है तो कांग्रेस भी इस में कभी पीछे नहीं रही. गुजरात चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी वहां के मंदिरों में गए थे तो इस पर खूब हायहाय मची थी. मुद्दा तिलक या जनेऊ भी था पर सच यह भी था कि इस से राहुल गांधी और कांग्रेस की कमजोरी ही उजागर हुई थी.
जरूरत इस बात की है कि अब आम लोग ही सरकारी भूमिपूजनों पर एतराज जताएं कि विकास कार्य हों पर उन का धार्मिकीकरण न किया जाए क्योंकि इस में सिर्फ पैसे की बरबादी होती है और किसी को कुछ हासिल नहीं होता.
खिलाड़ियों की दुर्घटनाओं में फंसने की आशंकाएं कुछ ज्यादा ही होती हैं. अभी कुछ दिनों पहले वर्ल्ड चैंपियन पावरलिफ्टर सक्षम यादव व उस के साथी 5 खिलाड़ियों की दिल्ली के पास गाड़ी के बहुत तेज चलने के कारण मौत हो गई. कोहरे में भी गाड़ी को बहुत तेज स्पीड पर चलाया जा रहा था और जैसी खिलाड़ियों की आदत होती है, वे गाड़ी और मौसम पर भी अपना जोर आजमा रहे थे.
खिलाड़ियों का दुर्घटनाओं में फंसना, अपराधों में उलझना, औफिस वालों से मारपीट कर लेना आम बात होने लगी है. खिलाड़ियों का बदन तो मजबूत होता ही है, उन पर सामने वाले को हरा देने का भी भूत हर पल सवार रहता है और यह खेलों के बाद भी चलता रहता है. दुनियाभर के खिलाड़ियों के गलत कांडों में फंसने की खबरें आम हैं और कितनी ही बार इस की शिकार उन की अपनी गर्लफ्रैंड या पत्नी होती हैं.
खेल जहां शरीर को मजबूत बनाते हैं वहां वे खिलाड़ी में हर हाल में जीतने की कोशिश करने की आदत भी डाल देते हैं. कुछ खेलों में तो सामने वाले को घायल तक कर दिया जाता है. फैंसिंग, मुक्केबाजी, कुश्ती, फुटबौल, हौकी में यह बहुत आसान होता है और अकसर मैदान पर ही दुर्घटनाएं हो जाती हैं. बाद के जीवन में भी प्रतिस्पर्धा की यह आदत छूटे नहीं छूटती.
खिलाड़ियों से वास्ता रखने वाले अकसर उन्हें खुद से चार हाथ दूर रखते हैं और न उलझने की कोशिश करते हैं. घर वाले तक कई बार उन से परेशान रहते हैं. खेलों के मैडल घर वालों, दोस्तों और सहयोगियों को यही याद दिलाते हैं कि सामने वाला अगर तुल जाए तो अपनी मनवा कर छोड़ेगा क्योंकि उसे यह मौका इसी कारण मिला था कि वह दिमागी तौर पर मशीन बन चुका था.
खेलों में जीतने पर देश चाहे तालियां बजाए पर उन खिलाड़ियों को बाद के सामान्य जीवन में ढलने में काफी कठिनाइयां आती हैं. पुलिस और सेना के अवकाशप्राप्त अफसर व सामान्य जवानों से निबटना हंसीखेल नहीं होता. अमेरिका में अफगानिस्तान, इराक व मध्य एशिया से लौटे सैनिक, जिन्हें वैटरन कहते हैं, एक बड़ी समस्या बने हुए हैं क्योंकि वे मानसिक रूप से आम लोगों के साथ घुलमिल नहीं पा रहे.
खिलाड़ियों को कैरियर की समाप्ति के बाद मानसिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे अपना प्रतिस्पर्धा वाला चोला उतार सकें. यह आसान नहीं क्योंकि खिलाड़ी 10 से 12 साल की आयु से 20 से 30 वर्षों तक जीतने की होड़ में लगे रहते हैं. उन्हें हर हाल में जीतना होता है और इसी पर तालियां पिटती हैं. बाद में बीवियां इन खिलाड़ियों के हाथों अकसर पिटती हैं चाहे अपने पतियों के साथ उन्हें सुरक्षा का गहरा एहसास खुश क्यों न रखता हो.
खेलों में मैडल मौत के या मौत सी दुर्घटनाओं के बीज भी बो जाते हैं, यह न भूलें.
यह कहना बिलकुल गलत होगा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली का 1 फरवरी, 2018 का बजट 2019 में होने वाले आम चुनावों की दृष्टि से बनाया गया है. पिछले 3 सालों की तरह यह बजट भी अधकचरा अफसरशाही के हाथ मजबूत करने वाला और देश की भूखी, मूढ़, मूर्ख व मेहनतकश जनता को लूटने का सरकारी फरमान है और कहीं से सुशासन, स्वच्छ भारत, भ्रष्टाचाररहित, स्पष्ट कर नीति का दर्शन नहीं देता.
आज देश का गरीब महंगाई, जीएसटी और नोटबंदी की मार तो सह ही रहा है, वह मंदी, बढ़ते कर्ज, बढ़ते सरकारी दखल, नौकरियों की कमी, व्यापार के घटते अवसरों आदि से भी परेशान है. वेतनभोगी वर्ग भी परेशान है क्योंकि शिक्षा व स्वास्थ्य का खर्च बेइंतहा बढ़ रहा है जबकि सरकारी कर्मचारियों, सांसदों, जजों, राष्ट्रपति के अतिरिक्त किसी की आय नहीं बढ़ रही है.
बजट में ऐसा कुछ नहीं है जो नई दृष्टि दे. यह बजट हमेशा की तरह फीका है, चाहे इस काम को टीवी चैनल महान, चुनावी घोषणा आदि का नाम दे कर सनसनी फैलाते रहें या समाचारपत्र अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति साफगोई से बचते हुए उन्हें अनूठे अर्थशास्त्री, विचारक, भविष्योन्मुखी सिद्ध करने में लगे रहें.
सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह देश को ऐसा बजट दे जिस से आम जनता से बंदूक की नोंक से वसूले गए पैसे जनता के काम आएं, सरकारी मालिकों, शासकों और धन्ना सेठों के ही काम नहीं. पूरे बजट में कहीं ऐसा कुछ नहीं है कि बड़े व्यापारियों, जो बैकों के पैसों से निजी हवाई जहाज खरीदते हैं, पर कोई अंकुश लगा है. कोई ऐसा सुझाव नहीं है जिस में सड़ते आलू के कारण कराहते किसान पर मरहम लगाया गया हो.
सरकार अपने काम में कहीं कार्यकुशलता नहीं ला रही है. सरकार को तो केवल कर देने वालों का दायरा बढ़ाने की लगी है, करों का लाभ पाने वालों का दायरा बढ़ाने की चिंता नहीं. बजट में जो मैडिकल इंश्योरैंस की बात कही गई है वह सूखे में यज्ञ में पानीअन्न डालने जैसा है क्योंकि उस के प्रबंध में ही हजारोंकरोड़ लगेंगे पर लाभ न होगा, क्योंकि अस्पताल हैं ही कहां जहां मैडिकल इंश्योरैंस का लाभ उठाया जा सके, दवाइयां हैं ही कहां जो इंश्योरैंसधारकों को दी जा सकें.
यह सरकार सामाजिक विघटन कर रही है और आर्थिक उथलपुथल मचा कर अपने को शिव के तीसरे नेत्र संहारक का रूप मान रही है व देश को 60 साल तक कांग्रेस सरकार को चुनने के पाप का दंड दे रही है. इस की प्रशासनिक व आर्थिक नीतियों से लाभ किसी को नहीं होगा, सिर्फ हानि होगी. यह बजट गायों के उस झुंड की तरह है जो मंडी में सब्जियों को आराम से खाती हैं और अब इन्हें पता है कि जो कोई डंडा मारेगा, जला कर राख कर दिया जाएगा.
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बौलीवुड मे इवेंट कंपनी के रूप में अपनी कंपनी ‘विज क्राफ्ट’ की शुरुआत करने वाले सब्बास जोसेफ ने बौलीवुड को पूरे विश्व में पहुंचाने के मकसद से हर वर्ष अलग अलग देशों में‘आइफा अवार्ड’ आयोजित करने का सिलसिला शुरू किया था. 2017 में 18वें आइफा अवार्ड के दौरान उन्होंने ‘आइफा अवार्ड’ को केंद्र में रखकर ‘आइफा अवार्ड’ में ही फिल्मकार चक्री तोलेटी के निर्देशन में जो कुछ फिल्माया, उसे फिल्म ‘‘वेलकम टू न्यूयार्क’’ के नाम से दर्शकों को परोस दिया है. फिल्म देखकर लगता है कि यह ‘आइफा अवार्ड’ पर बनायी गयी अति नीरस डाक्यूमेंट्री मात्र है.
फिल्म ‘‘वेलकम टू न्यूयार्क’’ की कहानी के केंद्र में मूलतः दो पात्र पंजाब के तेजी (दिलजीत दोसांज) और गुजरात की जीनल पटेल (सोनाक्षी सिन्हा) हैं. तेजी रिकवरी एजेंट हैं, पर उसकी चाहत सफल अभिनेता बनने की है. जबकि जीनल पटेल मशहूर फैशन डिजायनर बनना चाहती है. दोनों एक प्रतियोगिता का हिस्सा बनते हैं और उन्हे न्यूयार्क में आयोजित एक अवार्ड समारोह का हिस्सा बनने का अवसर मिलता है.
उधर न्यूयार्क में अवार्ड समारोह के आयोजक गेरी (बोमन ईरानी) के साथ लंबे समय से काम करती आ रही सोफी (लारा दत्ता) भागीदार बनना चाहती है. जब गेरी मना कर देते हैं, तो वह तेजी व जीनल को गेरी से बदला लेने के काम में लगा देती है. पर सब कुछ गड़बड़ा जाता है, क्योंकि शो के संचालक करण जोहर (करण जोहर) का अपहरण हो जाता है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेजी व जीनल के सपनों पर सोफी की जीत होगी?
बेसिर पैर की इस फिल्म के निर्देशक चक्री तोलेटी का दावा है कि वह मनोरंजन परोसने में माहिर हैं, इसीलिए वह बौलीवुड से जुड़े हैं. मगर फिल्म देखकर अहसास होता है कि वह कितना अपरिपक्व फिल्मकार हैं. फिल्म के सभी किरदार काफी उथले हैं, पर और मजाकिया भी नहीं है. उपर से करण जोहर की दोहरी भूमिका और अधिक तकलीफ देती है. इस फिल्म में वह ‘बांबे वेल्वेट’ से भी बदतर हैं.
करण जोहर एक कार्यक्रम संचालक और गैंगस्टर के दोहरे चरित्र को जिस तरह से निर्देशक ने निस्पादित किया है, वह मनोरंजन या खुशी की बजाय कष्ट व गम ही देता है. फिल्मकार तेजी व जीनल पटेल के बीच भी हास्य क्षणों को ठीक से नहीं पेश कर पाए. दोनों की परदे पर केमिस्ट्री जबरन थोपी हुई लगती है.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो दिलजीत दोसांज पंजाब के सुपर स्टार हैं. मगर बौलीवुड में वह कुछ खास प्रतिभा नहीं दिखा पा रहे हैं. इस फिल्म में उनका अभिनय काफी औसत दर्जे का है. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी हैं सोनाक्षी सिन्हा. वह गुजराती लड़की के किरदार में महज कैरीकेचर बनकर रह गयी हैं. उनके पास अपनी प्रतिभा को दिखाने का समय व पूरा अवसर था, मगर वह बुरी तरह से असफल रही हैं. जीनल पटेल का सपने वाला गीत जिसमें वह सलमान खान की नाप लेती हैं, यह बड़ा ही हास्यास्पद है. ह्यूमर के लिए गढ़ा गया यह गीत ह्यूमर नहीं लाता.
बोमन ईरानी ठीक ठाक हैं. ग्रे किरदार में लारा दत्ता जरुर दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करती हैं. रितेश देशमुख, सलमान खान, सुशांत सिंह राजपूत, राणा डगुबट्टी, आदित्य राय कपूर व कटरीना कैफ जैसे बड़े नाम महज खानापूर्ति करते हैं.
फिल्म खत्म होने पर दर्शक सोचने पर मजबूर होता है कि उसने अपनी गाढ़ी कमाई इस फिल्म को देखने के लिए क्यों बर्बाद की. फिल्म का पार्श्व संगीत महज शोरगुल के कुछ नहीं है. गीत संगीत भी सतही है.
लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘वेलकम टू न्यूयार्क’’ का निर्माण वासु भगनानी और सब्बास जोसेफ ने किया है. लेखक धीरज रतन, निर्देशक चक्री तोलेटी, संगीतकार साजिद वाजिद, मीत ब्रदर्स व समीर टंडन, कैमरामैन संतोष थुडिईल व नेहा परती तथा कलाकार हैं- दिलजीत दोसांज, सोनाक्षी सिन्हा, करण जोहर, बोमन ईरानी, लारा दत्ता, रितेश देशमुख,सलमान खान, सुशांत सिंह राजपूत, राणा डगुबट्टी, आदित्य राय कपूर व कटरीना कैफ व अन्य.
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मीता आज बेहद परेशान थी. इस की वजह थी उस की ननद. मीता की ननद जबतब घर आ जाती, तरहतरह की फरमाइशें करती, कभी कपड़े उठा ले जाती. मीता के अपने भी बच्चे हैं. वह कब तक सब की फरमाइशें पूरी करती रहती. एक दिन मीता ने यह बात अपनी मां को बताई.
मां ने मीता से कहा कि तू आज और अभी से अपनी ननद को इग्नोर करना शुरू कर दे. मीता ने यही किया. इस का असर यह हुआ कि कुछ दिनों बाद ही उस की ननद ने आनाजाना कम कर दिया. साथ ही, मीता के कपड़ों में हाथ मारना भी बंद कर दिया. बात छोटी सी है लेकिन बड़े काम की है. अकसर हम कई लोगों से परेशान होते हैं. इस की असल वजह हम ही होते हैं. अगर हम इग्नोर करना शुरू कर दें तो काफी समस्याओं का हल निकल आएगा.
एक कहावत है कि जो आप के साथ जैसा करे आप उस के साथ वैसा ही व्यवहार करें. कई बार यह जरूरी भी हो जाता है. सामने वाला जिस तरह का व्यवहार करे, यह भी जरूरी नहीं कि आप उस की तरह ही नीचे गिर जाएं. कई बार हमें न चाहते हुए भी कुछ लोगों को इग्नोर करना पड़ता है. इन में से कुछ रिश्ते अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे. कुछ खट्टे होते हैं तो कुछ मीठे.
जरूरी है नजरअंदाज करना
कुछ लोग बिना बात के ही सिर पर बैठ जाते हैं. बातबात पर या तो रोकटोक करेंगे या कुछ न कुछ ऐसा करेंगे जिस से हमें कोफ्त होती है. अगर आप की जिंदगी में भी ऐसा कोई है जिस से आप बेहद परेशान हैं तो उसे आज से ही इग्नोर करना शुरू कर दें. अगर आप नजरअंदाज कर देंगे तो सामने वाला
भी धीरेधीरे समझ जाएगा. नतीजा यह होगा कि वह आप से कन्नी काटना शुरू कर देगा जिस से आप को नजात मिल जाएगी.
जिंदगी में हम रोज कई लोगों से मिलते हैं. कुछ लोग हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं तो कुछ नहीं बन पाते. लेकिन कई बार हिस्सा बन चुके ये लोग ही हमारी जिंदगी को नासूर बना देते हैं. अगर आप ऐसी ही किसी परेशानी से दोचार हो रहे हैं तो आप यह काम कर सकते हैं. अगर आप को बारबार फोन कर के सामने वाला परेशान कर रहा है तो आप फोन न उठाएं. लेकिन बात हद से ज्यादा हो जाए तो आप पुलिस का सहारा भी ले सकते हैं.
अगर बात इग्नोर करने से बन जाती है तो इस से अच्छी कोई बात हो ही नहीं सकती. अगर आप सामने वाले को फोन या फिर किसी तरह का कोई जवाब नहीं देंगे तो वह जल्दी ही समझ जाएगा और अगर वह शर्मदार हुआ तो आप से खुदबखुद किनारा कर लेगा.
आप को लग रहा है कि सामने वाला हद से ज्यादा नीचे गिर रहा है. बातबात पर आप को नीचा दिखा रहा है. बेमतलब आप को खरीखोटी सुना रहा है. तो, आप उस की तरह व्यवहार बिलकुल न करें. जरूरी नहीं है कि जैसा वह करे वैसा ही आप भी करें. आप में और उस में कुछ न कुछ फर्क तो रहना ही चाहिए. सामने वाला आप से गलत शब्दों में बात कर रहा है तो आप कतई वैसा न करें. उस को इग्नोर करना ही बेहतर होगा. कहते हैं फालतू की बातों और फालतू के लोगों पर ध्यान न देना खुद के लिए अच्छा होता है.
इग्नोर करने से बात नहीं बन रही है तो आप सामने वाले को सख्ती से समझा दें. आप को कोई बात चुभ गई है या कोईर् हरकत पसंद नहीं है तो आप सख्ती से भी बता सकती हैं. आप के सख्ती दिखाने की देर है, वह शख्स अगली बार से आप के सामने फटकेगा ही नहीं.
यह सख्ती सिर्फ किसी शख्स पर ही लागू नहीं होती. कई बार हमारे आसपास के रिश्ते भी हमें परेशान कर देते हैं. कई बार घर के ही किसी व्यक्ति से हम परेशान हो जाते हैं. औफिस में साथ में काम करने वाले लोग कई बार हमारी परेशानी को बढ़ा देते हैं. रिश्तेदार बिना मतलब खून पीना शुरू कर देते हैं. समाज में असमाजिक तत्त्व जान लेने को उतारू रहते हैं. ऐसे में व्यवहार में इग्नोर करने की प्रवृत्ति के साथसाथ सख्ती जरूरी हो जाती है.
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वैसे तो हिंदुओं के बहुत से देवता हैं पर इन में ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रमुख हैं. इन्हीं के नाम से धर्म के धंधेबाज अपनी दुकानदारी चलाते हैं. ब्रह्मा की स्थिति घर के उस दाऊ जैसी है जिस के पैर तो सब पड़ते हैं पर महत्त्व कोई नहीं देता है. इस के पुत्रों की लिस्ट बहुत लंबी है. विष्णु प्रमुख देव है. इसी को भगवान, ईश्वर, परमात्मा, परमेश्वर, ब्रह्मा आदि नामों से पुकारा जाता है. इसी ने भारत में राम, कृष्ण व अन्य अवतार ले कर अनेक लीलाएं की हैं.
कार्तिक माह में इसी की पूजा की जाती है. कार्तिक व्रत स्त्रीपुरुष दोनों कर सकते हैं. पर व्यवहार में हम केवल हिंदू नारियों को ही कार्तिक स्नान व व्रत करते देखते हैं. कार्तिक माह का व्रत करने वालों को धन, संपत्ति, सौभाग्य, संतान सुख के साथ अंत में सब पापों से मुक्त हो कर बैकुंठ में राज करने की गारंटी दी गई है.
कार्तिक माह की कथा बहुत लंबी है. इस में कई अध्याय हैं. प्रत्येक अध्याय में काल्पनिक कथाएं जोड़ कर व्रत का महत्त्व अंधविश्वासियों के दिमाग में ठूंसठूंस कर भरा गया है. अंधविश्वास को पुष्ट करने के लिए शाप और वरदान का सहारा लिया गया है. पापपुण्य को ले कर पुनर्जन्म के काल्पनिक किस्से गढ़े गए हैं ताकि पंडेपुजारियों को मुफ्त का माल और चढ़ावा मिलता रहे. चढ़ावे से ही तो पिछले जन्मों के पाप धुलेंगे और अगला जन्म खुशहाल होगा.
कार्तिक व्रत की महिमा ब्रह्मा ने अपने पुत्र नारद को सुनाई है. नारद ने सूतजी को और सूतजी से अन्य ऋषिमुनियों ने सुनी है. बाद में इस कथा को धर्म के धंधेबाज पंडेपुजारियों ने लिखी है. जिस में गपें और बेसिरपैर के किस्से भरे हुए हैं. यहां कथा का संक्षिप्त रूप प्रस्तुत है.
कथा के अनुसार, एक दिन सत्यभाभा ने कृष्ण (विष्णु) से पूछा, ‘‘हे प्रभु, मैं ने पिछले जन्म में कौन से पुण्य कार्य किए हैं जिन से मैं आप की अर्द्धांगिनी बनी.’’ इस पर कृष्ण ने कहा, ‘‘पूर्व जन्म में तुम देवशर्मा नामक ब्राह्मण की पुत्री और चंद्र शर्मा की पत्नी थीं. तुम्हारा नाम गुणवती था. पिता और पति की अकाल मृत्यु होने से तुम अनाथ हो गईं. विधवा होने पर घर की समस्त संपत्ति ब्राह्मणों को दान दे कर तुम एकादशी और कार्तिक का व्रत करने लगीं. कार्तिक व्रत मुझे बहुत प्रिय है. यही कारण है कि इस जन्म में तुम मेरी अर्द्धांगिनी बनी हो.’’
दान का महिमामंडन
पुनर्जन्म को ले कर पंडितजी का दिमाग कमाल का है. कृष्ण स्वयं विष्णु (भगवान) के अवतार हैं. जब भगवान कहेगा तो मानना ही पड़ेगा. इसीलिए कुंआरी कन्याएं इस जन्म में और विवाहिताएं अगले जन्म में कृष्ण जैसा वर पाने की लालसा से कार्तिक व्रत का टोटका करती हैं. पर यह टोटका तब सफल होता है जब गुणवती की तरह पंडेपुजारियों को दान दिया जावे.
कार्तिक व्रत अश्विनी माह की पूर्णिमा से शुरू किया जाता है. प्रात:काल स्नान कर व्रत रखने का संकल्प किया जाता है. कथा के अनुसार, संध्या के समय ब्रह्मा की सोने/चांदी अथवा मिट्टी की मूर्ति बना कर उस का पूजन किया जाए. पूजन करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तथा आभूषण, अन्न, वस्त्र, गाय आदि दानदक्षिणा दे कर उन को ससम्मान विदा किया जाए. चूंकि ब्राह्मण के दाहिने पैर में सब तीर्थ, मुंह में वेद व अंगों में देवताओं का निवास होता है इसलिए व्रती पूरे कार्तिक माह ब्राह्मणों को भोजन कराएं और बाद में स्वयं करें.
यह है कथा का केंद्रीय भाव. कार्तिक व्रत के बहाने एक माह तक ब्राह्मणों को भोजन और दानदक्षिणा मिलने का इंतजाम हो गया. लेकिन जब ब्राह्मणों के अंगों में ही सब तीर्थ व देवता निवास करते हैं तो वे लोग मूर्ख हैं जो देवताओं की पूजा करते हैं. उन्हें तो केवल ब्राह्मणों की ही पूजा करते रहना चाहिए.
जब किसी गप को बारबार और विविध प्रकार से कहा जाए तो अंधविश्वासी उसे सही मान लेते हैं. कार्तिक व्रत करने से अगले जन्म में बैकुंठ प्राप्ति के लिए कथा में कई बेसिरपैर के किस्से गढ़े गए हैं. यहां कुछ किस्सों का संक्षेप में उल्लेख करना ही संभव है.
कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में करतीपुर नामक नगरी में धर्मदत्त नामक ब्राह्मण रहता था. वह विष्णु की भक्ति के साथ कार्तिक व्रत करता था. एक बार उसे कलहा नामक एक कुरूप राक्षसी मिली. धर्मदत्त को उस पर दया आ गई. इसलिए उस ने कलहा पर तुलसीदल का पानी छिड़क दिया और अपना आधा पुण्य उसे दे दिया. तुलसीदल के छींटे और आधा पुण्य देने से वह सुंदर स्त्री बन गई और उसे पूर्व जन्मों की याद आ गई. पूर्वजन्म में उस ने बहुत पाप किए थे, इसलिए वह सूअरी, बिल्ली, प्रेतनी बनने के बाद राक्षसी बनी. तब उस ने (सुंदर स्त्री ने) पूर्वजन्मों के पाप नष्ट होने की विधि धर्मदत्त से पूछी. धर्मदत्त ने उस से एकादशी और कार्तिक व्रत करने को कहा. उस ने वैसा ही किया. अगले जन्म में धर्मदत्त राजा दशरथ बने और कलहा उन की पत्नी बनी. भक्ति के वशीभूत विष्णु ने राम के रूप में दशरथ के घर में जन्म लिया.
पंडितों का गोरखधंधा तो भगवान भी नहीं समझ सकता है. कहीं वृंदा के शाप से विष्णु ने रामावतार लिया और कहीं नारद के शाप से. यहां कार्तिक व्रत के कारण धर्मदत्त अगले जन्म में दशरथ बनते हैं और विष्णु राम के रूप में उन के पुत्र. सही क्या है, इसे पंडित और व्रती जानें. तुलसीदल छिड़कने और आधा पुण्य देने से सुंदर स्त्री बनना कोरा चमत्कार है. अगर पंडित पुण्य ट्रांसफर होने की विधि भी लिख देते तो आज के भक्तों को अवश्य लाभ होता. आजकल के शंकराचार्य, महंत, कथावाचक व पंडेपुजारी भी ‘पुण्यात्मा’ माने जाते हैं. परंतु किसी ने भी अपने पुण्य का अंश किसी पापी को ट्रांसफर नहीं किया. अगर कर दे, तो कथा की असलियत का पता चल जाए.
एक कथा कहती है कि पुराने समय में उज्जैन में चमड़े का व्यापार करने वाला धनेश्वर नामक एक व्यभिचारी ब्राह्मण रहता था. वह चोर, शराबी व वेश्यागामी था. उस ने कभी भी शुभकर्म नहीं किए. वह पापकर्म करता हुआ सदैव इधरउधर आवारा घूमता रहता था. घूमतेघूमते एक दिन वह कार्तिक माह में नर्मदा नदी के तट पर बसी महिष्मती नगरी में पहुंचा. वहां कार्तिक व्रत करने वाले यात्री भी ठहरे हुए थे. वे स्नान करने के बाद नित्य विष्णु भगवान की कथाएं कहते व कीर्तन करते थे. धनेश्वर भी कुछ दिनों के लिए वहीं ठहर गया और उन के बीच में रह कर उस ने भी कीर्तन व कथाएं सुनीं.
जब वह मरा तो यम के दूत उसे पाश में जकड़ कर यमपुर ले गए. चूंकि उस ने जीवनभर पाप कमाया था, इसलिए यमपुर के मुख्य न्यायाधीश चित्रगुप्त उसे घोर नरक में डालने का आदेश देते हैं. इतने में वहां नारद आ जाते हैं. वे चित्रगुप्त से कहते हैं कि यह नरक में डालने योग्य नहीं है क्योंकि इस ने कुछ दिन कार्तिकव्रतियों की संगत की है तथा विष्णु भगवान की कथा सुनी है. फिर क्या था, यमराज ने उसे यक्षलोक का राजा बना दिया जो बाद में यक्षपति कहलाया.
पापमुक्ति का नुसखा
क्या जोरदार कथा है? कुछ दिन कार्तिकव्रतियों की संगत करने और विष्णु भगवान का कीर्तन सुनने से जब जीवनभर के पाप हवा हो जाते हैं तब बुरे कर्मों से क्या डर? पापों को नष्ट करने का इस से सस्ता नुसखा क्या हो सकता है.
तभी तो हिंदू कुकर्म करने से संकोच नहीं करते हैं. यहां कई प्रश्न भी उठते हैं. क्या यमदूतों को पता नहीं था कि धनेश्वर ने विष्णु भगवान का कीर्तन सुना है और कार्तिकव्रतियों की संगत की है? यदि था, तो वे उसे यमपुर क्यों ले गए? क्या यमपुर के न्यायाधीश चित्रगुप्त आंख मूंद कर न्याय करते हैं? यदि नहीं, तो उन्होंने नारद के कहने से अपना पूर्व का फैसला क्यों बदला?
कार्तिक व्रत में तुलसी (पौधा विशेष) और शालिगराम की भी पूजा कीजाती है. इन दोनों का संबंध जलंधर नामक दैत्य से है. कथा के अनुसार, इन तीनों (तुलसी, शालिगराम व जलंधर) की उत्पत्ति अविश्वसनीय, अवैज्ञानिक व अप्राकृतिक है.
कथा कहती है कि एक बार इंद्र और देवताओं के गुरु बृहस्पति कैलास पर्वत पर भगवान शंकर से मिलने जाते हैं. भगवान शंकर इन दोनों भक्तों की परीक्षा लेने के लिए जटाधारी दिगंबर का रूप धारण कर एक स्थान पर बैठ जाते हैं. इंद्र और बृहस्पति की दिगंबर से भेंट होती है. इंद्र ने दिगंबर का नाम व परिचय जानना चाहा और पूछा कि शंकर भगवान कहां हैं. दिगंबर ने कुछ जवाब नहीं दिया. इंद्र ने उस से बारबार यह प्रश्न किया पर दिगंबर चुपचाप बैठा रहा.
इस पर क्रोधित हो कर इंद्र उस पर वज्र का प्रहार करने के लिए तत्पर हो जाते हैं. इंद्र ने ज्यों ही वज्र मारने के लिए अपना हाथ उठाया त्यों ही दिगंबर ने उस का हाथ पकड़ लिया और नेत्रों में से ज्वाला (तेज) निकलने लगी. देवगुरु बृहस्पति ने शंकर भगवान को पहचान लिया और इंद्र को क्षमा कर देने की प्रार्थना की. इस पर शंकर भगवान ने कहा कि मैं अपने तेज का क्या करूं? बृहस्पति के कहने पर शंकरजी अपना तेज क्षीर सागर में डाल देते हैं.
अविश्वासी कथाएं
यहां प्रश्न उठते हैं कि भगवान शंकर तो अंतर्यामी हैं. क्या उन्हें पता नहीं था कि इंद्र और बृहस्पति उन के भक्त हैं? इंद्र देवताओं के राजा हैं. देवता भी अंतर्यामी और करामाती होते हैं. फिर वे यह क्यों नहीं जान सके कि दिगंबर के रूप में शंकर भगवान ही हैं? आंखों से निकला तेज (ज्वाला) कोई वस्तु तो नहीं होती जिस को पकड़ कर कहीं भी डाला जा सकता है? उस तेज का क्या करना है, यह शंकर भगवान क्यों नहीं जान सके. कुल मिला कर कथा कोरी गप है. समझ में नहीं आता कि इन ऊलजलूल गपों पर लोग वर्षों से कैसे विश्वास करते आ रहे हैं?
शंकर भगवान ने जैसे ही अपना तेज क्षीर सागर में डाला, वैसे ही सागर में से निकल कर एक बालक भयंकर आवाज में रुदन करने लगता है. कथा के अनुसार, उस के रुदन से पृथ्वी कांप उठी और समस्त देवता भयभीत हो गए. डर के कारण सब देवता ब्रह्मा के पास जा कर उन से रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. ब्रह्मा सागर तट पर प्रकट हो कर सागर से पूछते हैं कि यह बालक कौन है. उत्तर में सागर उस बालक को ब्रह्माजी को सौंपते हुए कहता है कि मैं कुछ नहीं जानता हूं. आप ही इस का संस्कार कीजिए.
सागर का इतना कहना था कि बालक ने ब्रह्माजी का गला इतनी जोर से दबाया कि उन की आंखों में से जल निकलने लगा. इस पर ब्रह्मा ने सागर से कहा कि मेरे नेत्रों से जल निकलने के कारण इस का नाम जलंधर होगा. यह विष्णु भगवान को जीतने वाला दैत्यों का प्रतापी राजा बनेगा. इस की पत्नी बड़ी पतिव्रता होगी, जिस के बल से, शंकर को छोड़ कर, इसे कोई नहीं मार सकता है. समय बीतने पर जलंधर की शादी कालनेमी दैत्य की पुत्री वृंदा से हो जाती है.
हमारे वैज्ञानिक ने चांद पर पहुंच कर पानी की खोज तो कर ली, परंतु क्षीर सागर की खोज अभी तक नहीं कर सके. अगर कर लें तो बच्चों को दूध का डब्बाबंद पाउडर विदेशों से नहीं मंगाना पड़ेगा. क्षीर सागर में शिवजी का तेज डालना, उस में से बालक निकलना, उस के रुदन से पृथ्वी का कांपना कोरे चमत्कार हैं. हमारे देवता भी कितने पिलपिले हैं जो बालक के रुदन से ही भयभीत हो जाते हैं.
कथा आगे कहती है कि एक बार समुद्र मंथन के अमृत को ले कर जलंधर के नेतृत्व में दैत्यों और देवों में युद्घ होता है, जो देवासुर संग्राम के नाम से प्रसिद्घ है. युद्घ में देवता हार जाते हैं. वे अपनी रक्षा के लिए विष्णु भगवान से गुहार करते हैं. देवताओं की गुहार पर विष्णु जब जलंधर से लड़ने जाते हैं तब लक्ष्मी कहती है कि मैं और जलंधर समुद्र से पैदा हुए हैं, इसलिए हम दोनों भाईबहन हैं. आप जलंधर को मारेंगे तो मैं सदैव दुखी रहूंगी. विष्णु जानते थे कि ब्रह्मा के वरदान से मैं जलंधर को नहीं मार सकता हूं, इसलिए वे लक्ष्मी से कहते हैं कि मैं लड़ने तो जा रहा हूं पर उसे मारूंगा नहीं.
गरुड़ पर सवार हो कर विष्णु भगवान दैत्यराज जलंधर से लड़ने पहुंचते हैं. कई दिनों तक भयंकर युद्घ होता है. युद्घ में दोनों ने नाना प्रकार के दांवपेंच खेले. पर अंत में जलंधर से विष्णु हार जाते हैं. शर्त के अनुसार, विष्णु परिवार सहित जलंधर की नगरी में ही उस के मेहमान बन कर रहते हैं.
विष्णु को हरा कर जलंधर निर्भयहो कर राज्य करने लगा. उस के वैभव को देख कर देवताओं को जलन हुई. देवताओं में देव ऋषि नारद सब से चालाक है. उस का काम केवल लड़ाना है. वह देवताओं का पक्षपाती और दैत्यों का शत्रु है. एक बार वह घूमताघूमता जलंधर के पास जाता है और उस से कहता है कि आप के पास सब वैभव हैं परंतु पार्वती जैसा स्त्रीरत्न नहीं है. अगर पार्वती जैसा रत्न मिल जाए तो आप के वैभव में चारचांद लग जाएं.
अतार्किक प्रसंग
नारद का यह कथन सुन कर जलंधर कैलास पर्वत पर पार्वती को लेने पहुंच जाता है. वहां उस का शंकर के गणों से युद्घ होता है. शंकर के गण हार जाते हैं. फिर शंकर स्वयं उस से युद्घ करते हैं. पर जलंधर अपनी माया से अप्सराओं को पैदा कर देता है. अप्सराओं को देख कर शिवजी उन पर मोहित हो जाते हैं और कुछ समय के लिए युद्घ बंद कर देते हैं. इस बीच, शिव का रूप धारण कर जलंधर पार्वती के पास पहुंच कर बलात्कार करने का प्रयास करता है. पार्वती उस का कपट पहचान कर अंतर्ध्यान हो जाती है. तब जलंधर निराश हो कर वापस लौट आता है.
इधर, शिवजी फिर जलंधर से युद्घ करने जाते हैं. दोनों ओर से भयानक युद्घ होता है. परंतु जलंधर नहीं मारा जाता है. पार्वती जानती थी कि जब तक जलंधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व नष्ट नहीं होता तब तक शिवजी उसे नहीं मार सकते. इसलिए, वह विष्णु से वृंदा का सतीत्व भंग करने को कहती है. विष्णु भगवान जलंधर का रूप धारण कर उस का सतीत्व नष्ट कर देते हैं. वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही शिवजी सुदर्शन से जलंधर के सिर को धड़ से अलग कर देते हैं.
वृंदा को जब ज्ञात होता है कि विष्णु के कपट से उस का पतिव्रतधर्म नष्ट किया है तब वह धिक्कारते हुए विष्णु को पत्थर होने का शाप दे कर स्वयं अग्नि में प्रवेश कर जाती है. कथा के अनुसार, वृंदा के शाप के वशीभूत हो कर विष्णु शालिगराम (पत्थर) बन जाते हैं और वृंदा की चिता की भस्म तुलसी (पौधा विशेष) बन जाती है. पंडेपुजारी अपने भगवान (विष्णु) को बलात्कारी होने के कलंक से बचाने के लिए ही शालिगराम और तुलसी के विवाह का ढोंग प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को रचते हैं.
कथा के अनुसार, क्या हम देवताओं का आचरण नैतिक व अनुकरणीय कह सकते हैं? चूंकि जलंधर शिवजी के तेज से पैदा हुआ है, इसलिए दोनों का संबंध पितापुत्र का हुआ. इस दृष्टि से शिवजी ने अपने पुत्र की ही हत्या की है. जलंधर की पत्नी वृंदा भी रिश्ते में पार्वती की पुत्रवधू हुई. फिर पुत्रवधू के साथ बलात्कार करना कौन सी नैतिकता हुई? पार्वती और जलंधर का रिश्ता भी मांबेटे का हुआ. नारद, जो स्वयं देवता कहलाता है, मां को ही पत्नी बनाने के लिए पुत्र को उकसाता है. अगर वह पार्वती जैसा ‘रत्न’ लाने को जलंधर से न कहता तो वह पार्वती के पास क्यों जाता? फिर पितापुत्र का युद्घ क्यों होता और क्यों जलंधर मारा जाता? सब से अधिक तरस तो विष्णु पर आता है. वह हिंदुओं का ईश्वर है. क्या वह जलंधर की पत्नी का सतीत्व नष्ट करे बिना उसे नहीं मार सकता था? जलंधर दुष्ट था, तो ब्रह्मा ने उसे वरदान क्यों दिया? हिंदुओं के साधुसंत व मठाधीश बलात्कार करते सुने जाते हैं. ऐसे में अन्य लोग यदि बलात्कार करें तो उन्हें अपराधी कहना कहां तक उचित है? वे तो अपने भगवान का ही अनुकरण कर रहे हैं.
कथा में नदियों और वृक्षों की उत्पत्ति पढ़ कर हंसी आती है. प्राचीनकाल में एक समय ब्रह्माजी सह्य पर्वत पर यज्ञ कर रहे थे. उस में सब देवगण उपस्थित हुए. स्वयं विष्णु भगवान और शिवजी ने यज्ञ की समस्त सामग्री एकत्रित की. महर्षि भृगु व अन्य ऋषि यज्ञ संपन्न कराने आए. यज्ञ की तैयारी होने के बाद देवों ने ब्रह्मा की पत्नी स्वरा को बुलावा भेजा. स्वरा देर तक नहीं आई. तब देवताओं ने ब्रह्मा की दूसरी पत्नी गायत्री को ही उन के दायीं ओर बैठा दिया. इतने में स्वरा भी वहां आ जाती है.
गायत्री को ब्रह्मा के पास बैठी देख कर ईर्ष्या से स्वरा जल उठी. वह गायत्री को अदृश्य बहने वाली नदी और सभी देवताओं को अन्य नदियां होने का शाप दे देती है. इस पर गायत्री स्वरा से कहती है कि ब्रह्मा, जैसे तुम्हारे पति हैं वैसे ही मेरे भी पति हैं, इसलिए तुम भी नदी होगी.
कथा कहती है कि स्वरा और गायत्री दोनों सरस्वती नदी के नाम से बहने लगीं. स्वरा के शाप से विष्णु के अंश से कृष्णा नदी, शिव के अंश से वेणी व ब्रह्मा के अंश से काकू नदी उत्पन्न हो गईं. फिर अन्य देवताओं के अंश अलगअलग नदियों के रूप में बहने लगे.
आम अंधविश्वासी यदि शांति, कल्याण या वर्षा के लिए यज्ञ करे तो बात समझ में आती है. ब्रह्मा तो देवताओं की कैबिनेट में प्रथम स्थान रखते हैं. वही इस विश्व के स्वामिता और भाग्यविधाता हैं. फिर वे यज्ञ किसलिए कर रहे थे? विष्णु और शिव क्रमश: इस जगत के पालक और रक्षक हैं. वे भी यज्ञ के लिए बेगार क्यों कर रहे थे? ऐसा कौन सा कार्य है जिसे ये तीनों देवता नहीं कर सकते हैं?
कथा के अनुसार, स्वरा के शाप ने तो भूगोल ही बदल डाला. भूगोल कहता है कि पहाड़ों या झरनों से नदियां निकली हैं और जिन्हें लोगों ने प्रत्यक्ष देखा भी है. देवता तो अमर हैं. यदि देवताओं के अंशों से नदियां निकली हैं तो वे गरमी में सूख क्यों जाती हैं? क्या गरमी में देवताओं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है?
कथा के अनुसार, वृक्षों की उत्पत्ति भी हास्यास्पद और ऊलजलूल है. कथा कहती है कि एक समय भगवान शंकर और पार्वती एकांत में रतिक्रीड़ा में मग्न थे. उसी समय ब्राह्मण का रूप धारण कर वहां अग्नि देव आ जाते हैं, जिस से रतिक्रीड़ा का मजा किरकिरा हो जाता है. इस पर नाराज हो कर पार्वती शाप देते हुए कहती है, ‘‘हे देवताओ, विषय सुख को तो कीटपतंगे भी जानते हैं. आप लोगों ने देवता हो कर उस में विघ्न डाला है. इसलिए आप सब देवता वृक्ष हो जाओ.’’
पार्वती के शाप से शंकर वट वृक्ष, विष्णु भगवान पीपल वृक्ष बन गए व अन्य देवों से विभिन्न वृक्षों की उत्पत्ति हुई.
मूर्खता की हद
यहां शाप ने बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया. रतिक्रीड़ा में विघ्न तो केवल अग्निदेव ने डाला था, फिर अन्य देवताओं को शाप क्यों दिया? भगवान शंकर तो पार्वती के साथ ही रतिक्रीड़ा में मग्न थे. वे वट वृक्ष क्यों बने.
इस के पूर्व ब्रह्मा की पत्नी स्वरा सब देवताओं को नदी होने का शाप दे चुकी है. सही क्या है, यह कथा लेखक और कथावाचक पंडेपुजारी या व्रती जानें. इतना अवश्य है कि कथा सुनने वाली व्रती स्त्रियां अवश्य बेवकूफ बन रही हैं.
व्रत का पुण्य तभी मिलेगा जब उस का विधिविधान से उद्यापन किया जाए. उद्यापन के लिए व्रती कार्तिक पूर्णमा को अर्द्घरात्रि के पश्चात स्नान कर किसी जलाशय में 11, 21 या इस से अधिक दीपदान करे. फिर सोने का शालिगराम और चांदी की तुलसी बनवा कर दोनों का विवाह किसी पंडित से संपन्न कराए. तुलसी का पाणिग्रहण संस्कार होने के बाद 31 ब्राह्मणों को सपत्नीक भोजन कराया जाए. भोजन कराने के बाद पंडित को गो, शय्या, आभूषण, वस्त्र, अन्न दान के साथ दक्षिणा दे कर विदा किया जाए. तत्पश्चात, प्रसाद वितरण के बाद स्वयं भोजन करे.
यह है विधिविधान और व्रत का रहस्य. कार्तिक व्रतियों को स्वर्ग मिले या न मिले, पर पंडितों का भला अवश्य हो गया. यहां यह कथन कितना सटीक बैठता है कि जब तक मूर्ख हैं तब तक चतुर लोगों की नित्य दीवाली है.
सौभाग्य, संतान, धन व स्वर्ग के झूठे झांसे में आ कर शिक्षित औरतें तक लुट रही हैं. अगर ये कथाएं सही होतीं तो हिंदुओं में एक भी गरीब और संतानहीन होता. स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य के लिए ही अधिक व्रत करती हैं, परंतु आप को समाज में विधुर कम और विधवाएं अधिक मिलेंगी. स्त्रियां सोचें कि क्या इन व्रतों का यही पुण्य लाभ है?
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अमृता आचार्य भोजपुरी फिल्मों की उभरती अदाकारा हैं. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत भोजपुरी फिल्म ‘ससुराल’ से की थी जो सिनेमाघरों में खूब चली थी. मध्य प्रदेश के इटारसी की रहने वाली अमृता आचार्य ने वकालत की डिगरी ले रखी है. छरहरे बदन की मालकिन अमृता आचार्य इस होली के मौके पर भोजपुरी फिल्म ‘वांटेड’ में हीरो पवन सिंह के साथ नजर आएंगी.
पेश हैं, अमृता आचार्य से की गई बातचीत के खास अंश:
आप ने वकालत की पढ़ाई की, इस के बावजूद ऐक्टिंग को अपना कैरियर बनाया. ऐसा क्यों?
मैं कालेज के समय से ही रंगमंच से जुड़ी रही हूं और मैं ने कई स्टेज प्रोग्राम किए हैं. मेरे इसी शौक ने मुझे फिल्मों की तरफ खींचा. इसी दौरान हीरो प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’ के साथ मुझे फिल्म ‘ससुराल’ में काम करने का औफर मिला. यह मेरे लिए गोल्डन चांस था. यह फिल्म सुपरहिट रही थी.
आप मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं. ऐसे में आप को भोजपुरी बोलने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी?
फिल्म ‘ससुराल’ के दौरान भोजपुरी में बोलना मुझे राई से पहाड़ तोड़ने के बराबर लगा था. लेकिन अब मुझे भोजपुरी बोलने में कोई परेशानी नहीं होती है. मुझे लगता है कि भोजपुरी सब से मीठी बोलियों में से एक है.
क्या आप ने तेलुगु भाषा में भी फिल्में की हैं?
जी हां, बिलकुल. मैं ने तेलुगु में ‘समीरम’ नाम की फिल्म की थी, जिस में मेरी ऐक्टिंग को बेहद सराहा गया था.
आप बड़े बजट की फिल्म ‘वांटेड’ में हीरो पवन सिंह के साथ काम कर के कैसा महसूस कर रही हैं?
यह मेरे लिए सपने के सच होने जैसा है. पवन सिंह सैट पर मेरी बहुत मदद करते हैं. उन के साथ काम कर के मुझे ऐक्टिंग की बारीकियों को सीखने का मौका मिला है. वे बहुत ही अच्छे इनसान हैं.
जहां तक ‘वांटेड’ जैसी बड़े बजट की फिल्म में काम करने का सवाल है तो मुझे उम्मीद है कि दर्शक मेरी ऐक्टिंग से निराश नहीं होंगे.
‘वांटेड’ कैसी फिल्म है?
फिल्म ‘वांटेड’ में ऐक्शन के अलावा रोमांस का तड़का भोजपुरिया स्टाइल में देखने को मिलेगा. यह फिल्म काफी अलग और दमदार कहानी पर बनी है, जिस में देशभक्ति, ऐक्शन, इमोशन को बेहतरीन ढंग से फिल्माया गया है.
आप रंगमंच से जुड़ी रही हैं. ऐसे में फिल्मों में काम करने का आप को कितना फायदा मिला?
देखिए, फिल्मों में आप जब तक सब से शानदार शौट नहीं दे देते हैं तबतक आप को मौका मिलता रहता है, जबकि रंगमंच में ऐसा नहीं है. आप एकबार मंच पर परफौर्मेंस कर रहे हों तो वहां गलतियां सुधारने का मौका नहीं होता है, इसलिए रंगमंच में की गई ऐक्टिंग से फिल्मों में गलतियां होने का खतरा कम हो जाता है. इस का फायदा मुझे भी मिला है.
आप को फिल्मों में काम कर खुद की ऐक्टिंग में कुछ बदलाव नजर आया?
मुझे तो भोजपुरी फिल्मों में काम करने के दौरान हर छोटीछोटी गलती को सुधारने का मौका मिला. मुझे लगता है कि फिल्में आप को ऐक्टिंग में माहिर बनाती हैं.
आप ने फिल्म ‘वांटेड’ में किस तरह का रोल किया है?
मैं ने इस फिल्म में एक शहरी लड़की का रोल किया है. इस की कहानी आप फिल्म के सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद खुद जान जाएंगे.
क्या आप की कोई हिंदी फिल्म भी आने वाली है?
हां, मेरी एक हिंदी फिल्म भी आ रही है, जो जल्द ही सिनेमाघरों में होगी.
खुद को फिट रखने के लिए आप क्या करती हैं?
अगर आप को ग्लैमर की दुनिया में मुकाम बनाना है, तो अपनी सेहत और फिटनैस पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है.
मैं खुद के खानपान और ऐक्सरसाइज पर खास ध्यान देती हूं, तभी मैं खुद को फिट रख पाने में कामयाब हूं.
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देश में बेरोजगारी बुरी तरह बढ़ रही है. मोदी सरकार ने करोड़ों नौकरियां देने का वादा किया था पर नौकरियां कैबिनैट के फैसलों से नहीं निकलतीं. नई नौकरियां तब निकलती हैं जब देश का वास्तविक आर्थिक विकास हो रहा हो. सरकार कछुए की चाल चल रही हो तो वह 6-7 प्रतिशत की वृद्धि से बढ़ रहे देश के लिए भी ठीक नहीं है.
बेरोजगारी का परिणाम है कि देश में इंजीनियरिंग कालेज खाली होने लगे हैं, क्योंकि मातापिता इतना पैसा नहीं खर्च कर सकते कि भारी फीस दे कर पढ़े बच्चे घर बैठे नजर आएं. सरकारी नौकरियों के लालच में युवा सालदरसाल बरबाद कर रहे हैं. पहले तो केवल मध्यवर्ग के युवा ही पढ़ कर नौकरियों के लिए आते थे पर अब पिछड़े व दलित वर्गों के ढेरों युवा भी नौकरियों की कतारों में खड़े हैं.
भीड़ इतनी अधिक हो गई है कि किसी भी सरकार के लिए यह वादा करना कठिन हो गया है कि वह नौकरी दिला देगी. कुछ राज्य सरकारें वादे निभाने के नाम पर बड़ेबड़े विज्ञापन छपवा रही हैं कि नौकरियां मिल रही हैं पर असल में ये बनावटी चुनावी वादे हैं, कुछ महीनों में इन की भी पोल खुल जाएगी.
बेरोजगारी के बढ़ने की एक वजह यह है कि हमारे युवा आलसी और निकम्मे होते जा रहे हैं. इंगलिश मीडियम स्कूल उन की पढ़ाईलिखाई की क्षमता छीन रहे हैं और मोबाइल संस्कृति उन्हें स्क्रीन में कैद कर पंगु बना रही है. कुछ करने की आदत कम हो रही है और निठल्लापन उन की नसों में घुस रहा है.
एक जमाना था जब अपनी मेहनत पर भरोसा कर बहुत से युवा जोखिमभरा काम, व्यवसाय शुरू कर सकते थे. आज जीएसटी, इनकम टैक्स, कंपनी कानून के हेरफेर इतने पेचीदा हो गए हैं कि इन क्षेत्रों में भी उन का घुसना कठिन होता जा रहा है. एक तरफ खर्चे बढ़ रहे हैं जबकि दूसरी ओर आय के साधन कम हो रहे हैं. बेरोजगारी एक आफत सी बन कर सिर पर मंडरा रही है और उस युवाशक्ति को घुन लगा रही है जिस पर देश को गर्व होना चाहिए.
सरकारी नीतियां इस में बहुत हद तक जिम्मेदार हैं क्योंकि इन्हीं ने युवाओं को एक तरफ ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरियों के मोहजाल में फंसा रखा है तो दूसरी ओर उन को अपने काम करने से रोकने के जाल पर जाल बिछा रखे हैं. युवाओं के सामने या तो पहाड़ हैं या पथरीली जमीन. उन के लिए उन पर न चढ़ना आसान है न कुछ उगाना.
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बिजनैस क्लास में सफर कर रही 17 वर्षीय ‘दंगल’ फिल्म की ऐक्ट्रैस जायरा वसीम का आरोप कि पीछे की सीट पर बैठे एक व्यक्ति विकास सचदेव ने उसे पैर से छेड़खानी कर तंग किया था, कुछ अति लगता है. बिजनैस क्लास में 2-3 गुना महंगा किराया देने वाले आमतौर पर इतने छिछोरे नहीं होते कि वे सिर्फ पैर से किसी को छेड़ने की कोशिश करें.
यह स्वाभाविक है कि ऐक्ट्रैस अपनी सुरक्षा के प्रति कुछ ज्यादा ही सतर्क होती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि लोग उन्हें पहचान कर अपनी जानपहचान बढ़ाना चाहते हैं पर इस का अर्थ यह नहीं है कि हर कोई उन की इज्जत लूटने की कोशिश करेगा.
लड़कियों के प्रति सहज आकर्षण तो हर पुरुष का होता है पर यह सोचना कि लड़कों या आदमियों के सिर पर हर समय सैक्स का भूत सवार रहता है, अति होगा. कुछ लोग ऐसे मामलों में पेशेवर से हो सकते हैं पर वे सरकारी बसों या लोकल ट्रेनों में सवार होते हैं, हवाई जहाजों के बिजनैस क्लास में नहीं जहां उन्हें अपनी इज्जत का भी खयाल होता है और एटिकेट्स का भी.
लड़कियों को टच कर के आनंद लेने वालों की कमी नहीं है पर हरेक को इसी विचार का समझना भूल भी होगी. किसी जानीअनजानी लड़की से हैंडशेक करते हुए उस का हाथ दबा देना या कुछ ज्यादा देर तक पकड़े रहना, सट कर बैठने की कोशिश करना या बेमतलब की स्माइल फेंकना संभव है पर उसे फालतू समझ कर छोड़ देना ठीक है, उस पर किसी महिला द्वारा हंगामा खड़ा करना निरर्थक सा है. स्त्रीपुरुष का प्राकृतिक आकर्षण तो रहेगा ही, उसे नकारा नहीं जा सकता.
सभ्य समाज ने पुरुषों के स्त्रियों के साथ रहने के नए ढंग सिखाए हैं और वे समाज की आवश्यकता व उस के स्थायित्व के लिए जरूरी भी हैं. आदमियों को भी समझना होगा कि अब औरतें उन के इशारों पर नाचेंगी नहीं और अति करने पर उन्हें बख्शेंगी नहीं. आज की कर्मठ लड़की अपनी सुरक्षा के उपायों को जानती है और तभी इस मामले में इस युवा को अपनी लापरवाही की सजा भुगतनी पड़ रही है.
इस प्रकार के हंगामों का दुष्प्रभाव यह हो सकता है कि आदमी औरतों की किसी भी हालत में कभी भी कोई सहायता करने को न आएं कि न जाने कब पासा पलट जाए और एक साधारण शिष्टाचार मौलेस्टेशन न समझा जाने लगे. अगर ऐसी छुईमुई लड़कियां सब जगह दिखने लगेंगी तो लड़के प्रेमनिवेदन करने से कतराएंगे और प्रेम कर भी लिया तो थोड़ा दूरदूर रहेंगे. स्त्रीपुरुष प्रगाढ़ता में जो निकटता आवश्यक है उस के बीच नारी स्वतंत्रता और कानून की दीवारें न खड़ी हो जाएं.
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हाल ही में बौलीवुड एक्टर मोहित मारवाह ने अपनी लौन्ग टाइम गर्लफ्रेंड अंतरा मोटवानी से शादी रचाई है. ये शादी यूएई में की गई, इस शादी में बौलीवुड के बड़े-बड़े सितारों ने भी शिरकत की. शादी में मोहित मारवाह के कजिन अर्जुन कपूर, सोनम कपूर, रेहा कपूर, जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर भी मौजूद थे. मोहित की शादी में अनिल कपूर, बोनी कपूर, श्रीदेवी और संजय कपूर भी नजर आए. वहीं इस शादी में संजय कपूर की बेटी शनाया कपूर भी मौजूद थीं.
शनाया का टशन सोनम और जाह्नवी कपूर से कम नहीं है. जी हां, शादी के फंक्शन के मौके पर शनाया बेहद खूबसूरत लग रही थीं. शनाया ने इस दौरान सीमा खान का डिजाइन किया हुआ लहंगा पहना हुआ था. गोल्डन क्रौप चोली और रेड शाइनिंग लहंगे में शनाया गजब ढा रही थीं. वहीं शनाया ने अपने कजिन मोहित की शादी के मौके पर जबरदस्त डांस परफौर्मेंस भी दिया. शनाया इस दौरान कई सारे रीति रिवाज निभाती हुई भी नजर आईं.
बता दें, शनाया के अलावा कजिन अर्जुन कपूर ने भी अपने भाई की शादी में खूब डांस किया. अर्जुन और अनिल कपूर मोहित की बारात में अनिल कपूर स्टाइल में डांस करते दिखाई दिए. तो कभी अर्जुन दूल्हे की बग्घी में खड़े होकर डांस करते हुए नजर आए.
सोनम कपूर ने भी कजिन मोहित की शादी में खूब एंज्वौय किया. इस शादी में सोनम के साथ उनके बौयफ्रेंड आनंद आहुजा भी नजर आए. इसके अलावा मोहित और अंतरा की शादी में करण जौहर, श्वेता बच्चन, अथिया शेट्टी, अधर जैन, सीमा खान भी मौजूद रहे.