कहीं भ्रष्ट न हो जाए बचपन

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक नामी विद्दालय में विज्ञान की परीक्षा चल रही थी. विद्दार्थियों के निरीक्षण करने के कार्य पर तैनात वरिष्ठ अध्यापिका ने देखा कि एक छात्रा पांव की तरफ पड़े अपने कुरते का सिरा बारबार उठाती है और फिर ठीक कर देती है. पीछे से उस के करीब जा कर अनुभवी अध्यापिका ने तिरछी नजर से देखा, तो पाया कि सफेद कुरते के उस सिरे के पीछे कुछ फार्मूले लिखे थे.

अध्यापिका ने चपरासी से कैंची मंगवाई और कुरते के उस सिरे को काट कर अपने पास रख लिया और छात्रा से कहा कि कल अपने अभिभावक को लेकर स्कूल आना, तभी परीक्षा में बैठने दिया जाएगा.

हालांकि अध्यापिका चाहती तो परीक्षा में नकल करते हुए उस लड़की को रंगेहाथों पकड़ कर रस्टीकेट करने यानी परीक्षा कक्ष से निकालने की प्रक्रिया अपना सकती थी, लेकिन छात्रा के भविष्य और उसकी कोमल भावनाओं को देखते हुए उन्होंने ऐसा नहीं किया.

परीक्षा क्यों

परीक्षा प्रणाली का अर्थ है कि छात्र अपने अध्ययन के प्रति संजीदा हों. वर्षभर जो पाठ्यक्रम उन्हें पढ़ाया गया है, उससे उन्होंने कितना सीखा है, परीक्षा से इसका आकलन हो जाता है. छात्र कठिन परिश्रम व अपनी कुक्षाग्रता के आधार पर परीक्षा में अंक प्राप्त कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करें, न कि नकल करके.

‘योर स्कूल एज चाइल्ड’ के लेखक लारेंस कुटनर अमेरिका में एक सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि तकरीबन 70 प्रतिशत छात्रों ने माना है कि उन्होंने अपने हाईस्कूल तक के स्कूली सफर में कभी न कभी नकल की है.

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नकल क्यों करते हैं बच्चे

गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस युग में जो बच्चे आगे दौड़ते हैं वे ही जीवन के शिखर तक पहुंच सकते हैं, जबकि प्रतिस्पर्धा में फिसड्डी रहने वाले बच्चों का कैरियर अनिश्चित रहता है. इसलिए आज का छात्र आरंभ से ही यह समझता है कि यदि उसे जीवन में ऊंचाई प्राप्त करनी है तो प्रतिस्पर्धा में सबसे, आगे रहना है. ये बातें घर में सोतेबैठते व खाते हर समय मातापिता द्वारा उस से दोहराई जाती हैं.

छात्र जीवन उम्र का ऐसा पड़ाव होता है जहां एकाग्रता केवल लक्ष्य प्राप्त करने की ही होती है. ऐसे में नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी आदि पढ़ाए गए पाठ गौण हो जाते हैं. छात्र लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कोई भी मार्ग अपना सकता है फिर चाहे वह नकल करना हो या कोई और.

किसी भी तरह से ज्यादा अंक हासिल करने की होड़ से एक खामोश संदेश यह मिल रहा है कि नकल ऐसे की जाए कि पकड़े न जा सकें और जो न पकड़ा गया वह औरों से आगे निकल गया. अनेक छात्रों में यह धारणा बनी हुई है कि इस खामोश संदेश के विरुद्ध जाना यानी नकल न करने में नंबर कम हो जाएंगे और तब पछतावा होगा. वहीं जो मातापिता इस का विरोध करते हैं उन्हें दाकियानूसी करार दिया जाता है.

बच्चे देश के भविष्य हैं

देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है. जिस को जहां मौका मिल रहा है अपना घर भरने की सोच रहा है. लालची लोगों ने देश के विकास में बाधाएं डाली हैं.

ऐसे माहौल में स्कूलों और अभिभावकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे बच्चों को आरंभ से ही नैतिक और राष्ट्र को सर्वोपरि मान कर कार्य करने का पाठ पढ़ाएं. परीक्षा में जो बच्चे नकल करते हैं या शौर्टकट अपनाते है उन पर विशेष ध्यान दें और उन के प्रति सुधार के कार्य करें. क्योंकि जो आज स्कूल जा रहे हैं, कल वे ही देश को चलाएंगे.

बालमन पढ़ें अभिभावक

बच्चों की सबसे बड़ी पाठशाला उस का घर होती है. मातापिता का दायित्व है कि वे कारण ढूंढ़ें कि बच्चे ने नकल करने का अपराध क्यों किया. ऐसा हो सकता है कि कुछ और समस्याएं रही हों जिनके कारण बच्चे पर मानसिक दबाव पड़ रहा है और वह स्वतंत्र मानस से अध्ययन नहीं कर पा रहा है. यदि ऐसा है तो मातापिता उस दबाव को दूर करने का प्रयास करें ताकि विद्दार्थी स्वतंत्र मानस से अध्ययन के प्रति निष्ठावान हो जाए और परीक्षा में नकल करने की नौबत न आए.

बच्चे पर कभी भी दबाव न डालें कि वह अमुक बच्चे की तरह अच्छे ग्रेड लाए या अपनी कक्षा या स्कूल में टौप करे. कई बार परीक्षा में नकल करने का कारण अच्छा ग्रेड लाना या अमुक बच्चे से अधिक अंक लाना या टौप करना भी होता है, जिसके लिए बच्चे के मातापिता उस पर जोर डालते रहते हैं. अभिभावकों को चाहिए कि विद्दार्थी को मानसिक दबाव से मुक्ति दिलाने के लिए उसे ऐसे खेल खेलने की सलाह दें जिन में प्रतिस्पर्धा का दबाव न हो.

अनैतिक आचरण न अपनाएं

अभिभावक बच्चों के समक्ष सदैव आदर्श प्रस्तुत करें, क्योंकि मातापिता द्वारा किए जा रहे कार्यों का बच्चों की कोमल मानसिकता पर सीधा प्र्रभाव पड़ता है और वे उस का अनुसरण करने लगते हैं. यदि माता या पिता टैक्स बचा कर परिवार में यह कहते हैं कि सरकार को फालतू पैसा देने का क्या फायदा है, तो उन के इस प्रकार के आचरण का छात्र पर बुरा असर पड़ता है, जबकि अभिभावक को परिवार में यही कहना चाहिए कि टैक्स बचाना एक चोरी है और इसे कभी नहीं करना चाहिए.

अभिभावकों की जिम्मेदारी

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सीनियर सैकंडरी स्कूल के प्रिंसिपल बताते हैं कि नकल करते पकड़े गए छात्रों के अभिभावकों को बुलाया जाता है और उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अपने बच्चों को घर में अच्छी नैतिक व आदर्श शिक्षा दें ताकि बच्चा जीवन में कभी भी गलत हथकंडा न अपनाए. वे बताते हैं कि अभिभावक बहुत शर्मिंदा होते हैं. और दुखी हो कर बच्चे को भविष्य में इस तरह उन्हें बुलाने की नौबत न आने के लिए बच्चे को समझाते हैं.

कभीकभी अभिभावक इतने क्रोधित हो जाते हैं कि बच्चों पर वहीं हाथ छोड़ देते हैं या फिर घर जाकर उस की बुरी तरह पिटाई करते हैं.

बच्चा इतना तेज होता है कि वह पहले से ही अपनी मां को समझा कर आता है कि फलां अध्यापक मुझ से जलता है और मेरे बगल की सीट में बैठा बच्चा नकल कर रहा था उसे छोड़ दिया जबकि मैं नकल नहीं कर रहा था मुझे पकड़ लिया. ऐसे अभिभावक अपने बच्चे का खुल कर पक्ष लेते हैं और अध्यापक को आड़े हाथों लेते हैं. अभिभावक घर में बच्चे को पढ़ाई का माहौल दें, यदि जरूरत है तो ट्यूटर या कोचिंग उपलब्ध कराएं.

भारत में ज्यादा गरीबी क्यों

हमारा देश प्राचीन काल से गरीब है. गुलामी बाद में आई, गरीबी तो सनातन है. भारत एक ही सनातन धर्म को जानता है, वह है गरीबी. हम लोग जो कहानियां सुनते आ रहे हैं कि भारत सोने की चिडि़या था, उन कहानियों में विश्वास मत करो क्योंकि जिनके लिए भारत एक सोने की चिडि़या था, उनके लिए आज भी सोने की चिडि़या है. वे थोड़े से लोग हैं लेकिन अधिकतर लोगों के लिए कहां सोना, कैसी सोने की चिडि़या? ज्यादातर लोग गरीब और सदा से भूखे रहे. इसलिए कुछ लोग सोने के महल खड़े कर सके.

वास्तव में गरीबों का नाजायज फायदा उठा कर कुछ लोग अमीर बन गए. हम हमेशा से ही भयानक हीनता की भावना से पीडि़त रहे हैं, इसलिए गरीब हैं. हम क्या कर सकते हैं?

हम अवश हैं, विवश हैं. हम किसी न किसी के पीछे भेड़ की तरह चलेंगे, पंडितपुरोहितों का अंधानुकरण करेंगे क्योंकि हीन व्यक्ति कर ही क्या सकता है. उस की सामर्थ्य कितनी? वह हमेशा किसी का पल्लू पकड़ कर ही चलेगा. वह तो भेड़ है, आदमी नहीं. ऐसा आदमी कभी उन्नति नहीं करेगा, हमेशा गरीब ही रहेगा.

हर मानव के जीवन में जन्म और मृत्यु निश्चित है, बाकी कुछ भी निश्चित नहीं है. मानव के जन्म के बाद उसे जीने का अधिकार है चाहे वह गरीब के घर या अमीर के घर में पैदा हो. अगर परिवार के पास रहने के लिए अपना मकान, पेट भर खाना और पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं तो हम उसे गरीब परिवार कहेंगे और उस परिवार के सदस्यों को हम गरीब कहेंगे.

इस दुनिया में साधारणतया 3 प्रकार के लोग हैं. एक, गरीब श्रेणी के लोग जिन के पास 3 मूलभूत चीजें रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है. दूसरे, मध्य श्रेणी के लोग जिन के पास उपरोक्त 3 आवश्यकताओं में से 2 या 1 आवश्यकता की कमी है और तीसरे, संपन्न लोग जिन के पास तीनों चीजें हैं. कुछ लोग जन्म से ही गरीब परिवार में पैदा होते हैं और कुछ परिस्थितिवश गरीब हो जाते हैं.

गरीबी की यह भौतिकवादी परिभाषा है. कुछ लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं लेकिन मानसिक या शारीरिक दृष्टि से गरीब हैं. लेकिन साधारणतया ऐसे लोगों को गरीब नहीं कहते, क्योंकि उनके पास इलाज करवाने के लिए पर्याप्त धन है.

हमारे देश में 65 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवनयापन कर रहे हैं. खासकर गांवों में 72 प्रतिशत अधिक गरीब लोग रहते हैं क्योंकि ये लोग थोड़ी सी जमीन पर खेती कर के अपना जीवनयापन करते हैं और बिना पानी के खेती मानसून पर निर्भर है. ये लोग खेती से केवल खाने के लिए सालभर का अनाज पैदा कर पाते हैं. गांवों में मजदूरी का काम भी कम मिलता है. इतना ही नहीं, गांव में अधिकतर लोग शादियों में खर्च, मृतक पर खर्च और अन्य धार्मिक कार्यों पर खर्च करते हैं जिस से वे कर्ज में डूबे रहते हैं और हमेशा गरीब ही बने रहते हैं.

कुछ मिस्त्री, कारीगर और मजदूर इतना कमाते हैं कि वे अपने छोटे परिवार का जीवनयापन कर सकते हैं, लेकिन वे हमेशा शाम को नशा करते हैं और व्यसनी हो जाते हैं. नशा चाहे शराब का हो या तंबाकू का या नशीली जड़ीबूटियों का हो, सभी नशे मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और इन में पैसा खर्च होता है व उनके परिवार गरीबी में दिन काटते हैं. कुछ व्यसनी शरीर से इतने कमजोर हो जाते हैं कि वे अपना काम करने में असमर्थ हो जाते हैं और उन की औरतें घरों में झाड़ूपोंछा व बरतन साफ कर के पैसा कमाती हैं. जब तक लोग नशीली वस्तुओं का सेवन नहीं छोड़ेंगे तब तक गरीबी उन का पीछा नहीं छोड़ेगी.

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धर्म की घुट्टी

बचपन से ही सभी भारतवासियों के घरों में धर्म की घुट्टी पिलाई जाती है. जीवन में कुछ अजीब घटनाओं के डर और कुछ सवालों के जवाब न मिलने पर हम इन रहस्यों को अंधविश्वास का रूप दे देते हैं. देश में धर्मगुरुओं की समृद्ध परंपरा रही है. धर्मगुरुओं के भाषणों द्वारा लोगों को दान करने के लिए प्रेरित किया जाता है, क्योंकि दान करने को सब से बड़ा पुण्य माना जाता है. भोलेभाले गरीब लोग केवल मंदिरों में अपनी हैसियत से ज्यादा दान दे कर ही नहीं लुटते आए हैं, बल्कि वे ढोंगी बाबाओं के जगहजगह आश्रमों के जाल में फंसते रहे हैं.

छोटीबड़ी समस्याएं हरेक के जीवन में आती हैं लेकिन ये लोग इन्हीं समस्याओं का हल ढोंगी बाबाओं के आश्रमों में दान दे कर ढूंढ़ने लगते हैं. लाइलाज बीमारी से ग्रस्त लोग, निसंतान दंपती, परिवार में कलह से दुखी, गरीब और बेरोजगार लोग ढोंगी बाबाओं के चंगुल में फंस कर लुटते नजर आते हैं. यह सबसे बड़ा कारण है कि हमारे देश में गरीबी बढ़ रही है.

हमारे देश में अधिकतर गरीब लोग धार्मिक हैं और सरकार द्वारा समझाए नारे- ‘हम दो हमारे दो’ को अस्वीकार करके 2 से अधिक संतानों में विश्वास रखते हैं क्योंकि घर में जितने हाथ बढ़ेंगे उतने लोग मजदूरी करके पैसा कमाएंगे और घर का खर्च चलाने में सहायक होंगे. लेकिन घर में अधिक सदस्यों के कारण जीवनयापन मुश्किल से हो पाता है. वास्तव में जनसंख्या में वृद्धि हमारे समाज और देश के लिए घातक है. इस से भी गरीबी बढ़ती जा रही है.

डा. मारथा फरहा (प्रोफैसर, विश्वविद्यालय, पैन्सिलवेनिया) के मुताबिक गरीबी में पलने वाले बच्चों की कार्य करने में स्मरणशक्ति की क्षमताएं मध्यम श्रेणी में पलने वाले बच्चों से कम होती है. काम करने में स्मरणशक्ति का अर्थ है रोजाना के कामों को करने की क्षमता, जैसे फोन नंबरों को याद रखना. यहां तक भाषाओं को समझने का काम, पढ़ना और प्रतिदिन की समस्याओं को हल करना भी उनके लिए दुसाध्य कार्य है. उन लोगों को प्रसिद्ध युद्ध की तारीख याद रखना और यहां तक कि साइकिल चलाना भी दुसाध्य लगता है.

डा. फरहा के बाद मेरी इवांस और माइकल स्केम्बर्ग (कोर्नेल विश्वविद्यालय) ने इस विषय पर विस्तृत रूप से अध्ययन किया. उन्होंने नैशनल साइंस एकेडमी के साप्ताहिक जर्नल को बताया कि गरीब बच्चों में तनाव के कारण स्मरणशक्ति की क्षमता कम हो जाती है, जो उनके विकसित हो रहे दिमाग पर असर करती है. बच्चे के पैदा होने पर उसका भार, बच्चे की माता की उम्र, माता की शिक्षा और शादी के बाद पति से संबंध का बच्चों पर कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन बच्चों की तनावपूर्ण जिंदगी उन को शिक्षाग्रहण करने नहीं देती. गरीब आदमी भी तनावग्रस्त हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अपना भविष्य निश्चित नजर नहीं आता.

माइकल मारमोट ने पता लगाया है कि गरीबी से तनावयुक्त लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. सरकार को इन गरीब बच्चों के तनाव को कम करने की कोशिश करनी चाहिए जिस से शिक्षा हासिल करने में वे दिलचस्पी लें अन्यथा गरीबों के तनावयुक्त बच्चे शिक्षा ग्रहण नहीं करते और गरीब ही रहते हैं.

हमारी सरकार पैट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाती है तो सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं. महंगाई लोगों के जीवन स्तर को नीचे धकेल रही है. महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है और मध्यम श्रेणी वाले भी गरीबी में दिन गुजारने लगे हैं.

आत्मकेंद्रित संपन्न वर्ग

देश के लोग बुद्धिमान तो हैं किंतु बुद्धि का उपयोग किस दिशा में होना चाहिए, यह नहीं जानते. धनी लोग निर्बल, कमजोर व गरीब लोगों के साथ आत्मीयता से जुड़ें क्योंकि उन से कट कर किसी का भला होने वाला नहीं है. अंबानी बंधुओं में अपनी बीवियों को तोहफे देने की होड़ मची है. मुकेश अंबानी ने अपनी पत्नी के लिए 242 करोड़ रुपए का जेट विमान खरीद कर दिया तो अनिल अंबानी ने अपनी पत्नी को 400 करोड़ रुपए का लग्जरी फ्लैट तोहफे में दे डाला. इन धनी लोगों के पास देश की गरीब जनता के कल्याण के बारे में सोचने तक का समय नहीं है.

बौलीवुड के चमकते सितारे अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और अन्य सितारों ने इतना पैसा कमाया है कि वे करोड़ों रुपए अनावश्यक वस्तुएं खरीदने में खर्च करते हैं लेकिन वे देश के भूखे, गरीब व सड़कों पर सोने वाली जनता के कल्याण के बारे में नहीं सोचते. धनी आदमी आत्मकेंद्रित और स्वार्थी होते हैं जो अपने देश की गरीब जनता के कल्याण के बारे में नहीं सोचते. देश के लोगों में मन की एकाग्रता, संकल्पशीलता और प्रशिक्षण का अभाव है, इसलिए धनी आदमी धनी होता जा रहा है और गरीबी बढ़ती जा रही है.

देश को आजाद हुए 69 वर्ष हो गए. सभी राजनीतिक पार्टियां देश से गरीबी को हटाने का वादा करती रही हैं, लेकिन गरीबी तो नहीं हटी. हां, गरीब नेता रातोंरात अमीर जरूर बन रहे हैं. देश में भ्रष्टाचार और हर स्तर पर रिश्वत लेने का बोलबाला है. नेता मस्त है, जनता त्रस्त है. दुनिया की कुल गरीब जनसंख्या की 32.5 प्रतिशत गरीब जनता भारत में है.

सरकारी टैक्स वसूली

सरकार जनता की गाढ़ी कमाई से विभिन्न प्रकार के टैक्स वसूल कर सरकारी खर्चों में व्यर्थ बरबाद करती है जिस के कारण भी देश में गरीबी बढ़ रही है.

दुनिया के सभी देश अपनेअपने विकास में लगे हुए हैं. दुनिया में हर दिशा में विकास हो रहा है. मनुष्य भी निरंतर विकास करता जा रहा है. विकास के आधार पर हम विश्व के देशों को 3 भागों में बांट सकते हैं,  विकासशील राष्ट्र और विकसित राष्ट्र, अविकसित राष्ट्र. जहां अधिक कलकारखाने हैं वे उन्नतिशील यानी विकासशील राष्ट्र हो गए. विकसित राष्ट्रों में मानव जाति के लिए अनावश्यक बातें ज्यादा हैं. मनुष्य के लिए सब से आवश्यक है, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि. वे राष्ट्र जिन के करोड़ों नागरिक दो वक्त खाने को तरसते हैं, वे अविकसित राष्ट्र हैं. विकसित राष्ट्र अरबों रुपयों के हथियार खरीद रहे हैं और ऐसे भवनों का निर्माण कर रहे हैं जिन की मानव को आवश्यकता नहीं है.

विदेशों में अपेक्षाकृत गरीबी कम है. बैल्जियम में रहने वाले युवक से पता चला कि बैल्जियम की धरती पर कोई पहुंचे और वह रोटी, कपड़ा व मकान जैसी जरूरतों से वंचित रहे, यह वहां की सरकार को मंजूर नहीं. हमारी भारत सरकार भी ऐसी व्यवस्था करदे तो कितनी अच्छी बात होगी. हमारी सरकार चांद पर पहुंचने की योजना बना रही है लेकिन मूलभूत समस्या गरीबी की है, उसे मिटाने की बात कम करती है.

सरकारी प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे कुछ अफसरों और नेताओं में संकल्पशक्ति का अभाव है और वे अनैतिक कार्य कर के अरबों रुपयों का गबन कर के रातोंरात अमीर बन गए हैं. लेकिन वे गरीब जनता के बारे में बिलकुल नहीं सोचते.

उदाहरण के लिए बिहार में नए कुओं की खुदाई की योजना बनी थी. इस योजना के अंतर्गत एक हजार कुएं खोदे गए लेकिन वास्तव में एक भी कुआं नहीं खोदा गया, लेकिन पता चला कि सरकारी फाइलों में कुओं की खुदाई और खुदाई में लगे खर्च की रकम दर्ज हो चुकी है. यह अनैतिकता की पराकाष्ठा है. हमारी सरकार के प्रशासन में अफसर और नेता मानसिक एकाग्रता (नैतिकता) का प्रशिक्षण ले कर कार्यक्षेत्र में काम करें तो 5 क्या, 3 वर्षों में ही देश की गरीबी समाप्त हो सकती है.

यह गरीबी की पराकाष्ठा नहीं तो क्या है, जहां एक इंसान दूसरे इंसान का बोझ पशुओं की तरह खींचने को मजबूर है. देश की एक बड़ी आबादी के पास दो जून की रोटी और सिर ढकने के लिए छत नहीं है जबकि संपन्न वर्ग के पास जरूरत से अधिक साधन हैं. यह असमानता ही गरीबी की जड़ है.

धर्म की दुकानदारी को गैरकानूनी करना ही होगा

वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे बाबा कैसे लड़कियों को बहकाते हैं कि वे अपने मातापिता को भी भुला देती हैं, एक चमत्कार ही है. मध्य प्रदेश के सतना के राजेश प्रताप सिंह ने 7 साल पहले अपनी 16 वर्षीय बेटी को किस मोह में या किस अंधविश्वास में बाबा के द्वारका आश्रम में भेज दिया यह आश्चर्य है.

लोग खुले हाथ अपनी मेहनत की मोटी कमाई इन बाबाओं को देते रहते हैं जो कोई नई बात नहीं है पर बच्चों को भी आज के युग में उपहार की तरह बाकायदा स्टांप पेपर पर अनुबंध लिख कर दे दिया जाए यह गंभीर मामला है.

धर्म के नाम पर अनाचार सदियों से होता रहा है और पीडि़ताएं खुदबखुद इस अनाचार को ठीक उसी तरह नियति मान कर स्वीकार करती रही हैं जैसे वेश्याएं चकलों में जिंदगी को सहन करने लगती हैं और सैनिक गोलियों की बौछारों को. इन सब मामलों में निरंतर तर्क और सत्य के स्थान पर अंधभक्ति इस प्रकार दिमाग में प्रत्यारोपित कर दी जाती है कि लड़कियां व उन के मातापिता इसी को भाग्य मान कर संतुष्ट ही नहीं हो जाते, इस बात पर समाज में गर्व भी करने लगते हैं.

वैसे दुनिया के सभी समाजों में पिता अपनी बेटियों को उन के लिए ढूंढ़े गए वर के हाथ में सौंपते हुए भी यही कहते हैं कि बेटी, अब जो कुछ तुम्हारे साथ होगा, वह पति करेगा यानी कि वे बेटी को जीवन से पूरी तरह बाहर निकाल देते हैं. कई समाजों में तो विवाह बाद बेटियों की शक्ल ही नहीं देखी जाती. अन्य उदार समाजों में भी पिता के घर के दरवाजे लगभग बंद ही हो जाते हैं.

बेटियों के प्रति यही सोच आश्रमों के बाबाओं को मालामाल बनाती है. बेटी का भार ग्रहण करते हुए आश्रमों के बाबा मातापिता से मोटा दान भी दहेज की तरह ले लेते हैं और फिर उन का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. 2-4 महीनों में बेटियां आश्रम के जीवन की आदी हो जाती हैं और मरजी से अपनी जगह वहीं बनाना शुरू कर देती हैं. सैकड़ों बाबाओं ने इसी का लाभ उठाया है. वे बेटियां भी ग्रहण करते हैं, पत्नियां भी. बहुत सी औरतें पतियों को जानबूझ कर छोड़ कर आश्रमों में बस जाती हैं तो कुछ घर में सेंध लगा कर आश्रम की अपने तन और पति के धन दोनों से सेवा करती हैं.

जब कभी हल्ला मचता है तो लोग ऐसे हायहाय करते हैं मानों राम रहीम या वीरेंद्र देव दीक्षित कई अपवाद और अपराधी हैं जबकि ये औरतें अपनी या मातापिता की मरजी से ही इन आश्रमों में आती हैं.

अगर इस दुर्दांत कथा का अंत करना है तो धर्म की दुकानदारी को गैरकानूनी करना होगा, जो भारत हो या अमेरिका कहीं भी संभव नहीं लगता. जब तक यह नहीं होगा राम रहीम, वीरेंद्र देव दीक्षित और अमेरिका के अपने ही ऐसे बाबा पनपते रहेंगे.

एकतरफा निर्णय से कानून भी कठघरे में होगा

सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाहों को ले कर एक मामले में कहा है कि चाहे बाल विवाह मानव अधिकारों के खिलाफ हों और कितने ही घृणित हों, जिस संख्या में ये देश में हो रहे हैं इन का अपराधीकरण नहीं करा जाना चाहिए. यह ठीक है. देश में हर काम को अपराध घोषित करने की परंपरा सी चालू हो गई है.

पहले जियो और जीने दो का जो सिद्धांत कानून बनाने वाले दिमाग में रखते थे अब धर्मों के अनुयायी बन गए हैं कि जो भी कुछ करोगे, पाप करोगे और प्रायश्चित्त करोगे ही.

सुप्रीम कोर्ट के पास मामला गया था कि क्या सहमति से 15 व 17 वर्ष के लड़कीलड़के के यौन संबंध जायज हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, सहमति हो अथवा न हो, अपराध घोषित करा है. 15 से 18 साल की विवाहित लड़की से पति के यौन संबंध अब तक अपराध नहीं थे.

पर असल बात तो यह है कि लड़कियों के यौन संबंध 13-14 साल की उम्र से सहमति से शुरू हो जाते हैं और इस कदर होते हैं कि अगर सभी को कानूनी दायरे में लाया गया तो अदालतों में सैकड़ों लड़के अपराधी बने दिखेंगे और सैकड़ों लड़कियां पीडि़ता के रूप में गवाह. यह नकारना कि 17-18 वर्ष की लड़कियों में यौन संबंध अपवाद हैं गलत होगा.

ये संबंध गलत हैं, इस में शक नहीं है पर इन्हें सामान्य अपराधों की गिनती में डालना भी सही नहीं होगा. हमउम्र नाबालिगों के यौन संबंधों को अपराध मान लिया गया तो दोनों के ऊपर जीवन भर का धब्बा लग जाएगा. लड़के को बालगृह की यातनाओं को भुगतने के लिए भेजना होगा और उस का कैरियर चौपट हो जाएगा तो लड़की पर धब्बा लग जाएगा कि वह चालू है. उस की भी पढ़ाईलिखाई चौपट हो जाएगी.

अगर नाबालिग स्कूली यौन संबंध सहमति से हों तो बहुत सावधानी से हैंडल होने चाहिए. हमारी पुलिस और अदालतें इस तरह की नाजुक स्थिति को संभालने लायक नहीं हैं. पुलिस ऐसे मामले में मातापिताओं को लूटने में लग जाती है और अदालतें तारीख पर तारीख डालने में. दोनों की सहज प्राकृतिक क्रिया उन्हें एक अंधेरे कुएं में डाल देती है.

यह भयावह स्थिति आज दिखती नहीं है, क्योंकि अपराध होते हुए भी कोई कानून का दरवाजा नहीं खटखटाता और मामला दबा कर रखा जाता है. लड़कों को डांटडपट दिया जाता है और लड़कियों को घरों में बंद कर दिया जाता है. अगर पुलिस को भनक लगने लगे और जैसा सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि सहमति से नाबालिगों के बीच बना यौन संबंध बलात्कार है, जिस में दोषी केवल लड़का है तो हर चौथा घर लपेटे में आ जाए तो बड़ी बात नहीं.

इस तरह के संवेदनशील पर प्राकृतिक मामलों को सुप्रीम कोर्ट, दूसरी अदालतें और पुलिस खाप पंचायतों की तरह सुलझाने की कोशिश कर रही हैं कि हर मामले में बिना अगरमगर सुने अपराधी घोषित कर दिया जाए और सजा दे दी जाए. पुलिस की कैद खाप पंचायतों की सजा से भी बदतर होती है.

समंदर किनारे बिकिनी में नजर आईं राधिका आप्टे

अपनी हौट और सेक्सी तस्वीरों के चलते अक्सर ही बौलीवुड की कोई ना कोई अभिनेत्री सोशल मीडिया पर ट्रोल की जाती है. अब इस ट्रोलिंग लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है, इस बार अपनी हौट तस्वीरों के चलते ट्रोल होने वाली अभिनेत्री कोई और नहीं बल्कि राधिका आप्टे है. जी हां, फिल्म ‘पैडमैन’ में सिंपल सी दिखने वाली और अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने वाली अभिनेत्री राधिका आप्टे इन दिनों अपनी एक हौट फोटो के कारण चर्चा में हैं.

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बता दें कि फिल्म ‘पैडमैन’ की शानदार सफलता के बाद राधिका इन दिनों गोवा में फुरसत के पल बीता रही हैं. गोवा में होने की जानकारी खुद राधिका ने इंस्टाग्राम पर शेयर की है. राधिका ने फोटो शेयर कर कैप्शन लिखा हैशटैक के साथ होलीडे, टाइमऔफ, गोवा, समुद्र, दोस्त.

इस तस्वीर में राधिका ने बिकनी पहन रखा है और उनके हाथ में बियर का ग्लास है. फोटो में राधिका अपने दोस्त के साथ नजर आ रही हैं. उनकी इस फोटो को काफी लोग पसंद कर रहे हैं. इस फोटो पर कई लोगों ने लाइक किया तो कई लोगों ने उसकी इस फोटो पर कमेंट भी किए हैं

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कुछ ने कमेंट में राधिका की तारीफ की तो कुछ ने उन्हें भद्दे कमेंट भी कर दिए. कुछ लोगों ने उनकी बिक‌िनी फोटो को फिल्म ‘पैडमैन’ में उनके किरदार से जोड़कर भद्दे कमेंट भी किए तो वहीं कुछ ने उनके दोस्त को लेकर कमेंट किए.

‘पैडमैन’ में अपने अभिनय का लोहा मनवाने के बाद राधिका आप्टे अब एक वेब सीरीज करते हुए नजर आएंगी. वेब सीरीज में राधिका अभिनेता सैफ अली खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए नजर आएंगी. इस वेबसीरीज को नेटफ्लेक्स लेकर आ रहा है. जिसका नाम है, ‘सिक्रेड गेम. यह 8 एपिसोड की सीरीज होगी और इसका फर्स्ट लुक भी रिलीज हो चुका है.

उर्वशी रौतेला ने जूतों और मसाज में उड़ाई अपनी पूरी फीस

Hate Story 4 में उर्वशी रौतेला अपने बोल्ड अंदाज की वजह से सुर्खियां बटोर रही हैं. ‘आशिक बनाया आपने’ सौन्ग में उनका अंदाज काफी पसंद किया जा रहा है. ‘काबिल’ फिल्म के ‘हसीनों का दीवाना’ आइटम सौन्ग से उर्वशी को काफी लोकप्रियता मिली थी.

लेकिन अब ‘हेट स्टोरी-4’ की शूटिंग के दौरान उनसे जुड़ा जबरदस्त खुलासा हुआ है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे. जी हां, ‘हेट स्टोरी-4’ से जुड़े सूत्रों की मानें तो इस फिल्म के लिए उन्हें 25 लाख रु. की फीस मिली है. बेशक, बड़ी हीरोइनों के सामने यह फीस काफी मामूली लग सकती है.

लेकिन दिलचस्प तो उनका खर्च है. जी हां, ‘हेट स्टोरी 4’ की शूटिंग महीने भर के लिए लंदन में हुई थी. उर्वशी रौतेला की फीस सिर्फ 25 लाख रु. थी लेकिन उनका खर्च सुनकर आपके होश फाख्ता हो जाएंगे.

Excited for #birthdaycake 🦋

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फिल्म से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जब लंदन में शूटिंग चल रही थी तो उर्वशी हर हफ्ते मसाज करवाने जाती थीं, और मसाज का एक टाइम का खर्च ढाई लाख रुपये आता था. यही नहीं, उर्वशी रौतेला ने शूटिंग के दौरान 85 जूते भी खरीदे. जब उर्वशी भारत आने के लिए पैकिंग कर रहे थे तो उनके जूतों को पैक करना किसी चुनौती से कम साबित नहीं हुआ था.

दिलचस्प तो यह है कि उर्वशी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि उनके पास लगभग आठ आईफोन एक्स हैं. अब इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उर्वशी रौतेला किस तरह की लग्जरियस लाइफ जीती हैं. वे ऐसा कर भी सकती हैं क्योंकि वे बड़ी मौडल हैं और उनके पास इनकम के लिए फिल्म की फीस के अलावा भी कई स्रोत हैं. जिसमें मौडलिंग, ब्रांड एंडोर्समेंट जैसे एसाइनमेंट प्रमुख हैं. उर्वशी सलमान खान की ‘रेस 3’ में स्पेशल अपियरेंस में भी नजर आएंगी. ‘हेट स्टोरी-4’ 9 मार्च को रिलीज हो रही है.

खाने में हरा जहर और मिलावट की पहचान

जुलाई 2017 : पंजाब में मोगा शहर के नजदीकी गांव में भिंडी की जहरीली सब्जी खा लेने से एक ही परिवार के 4 सदस्यों की हालत बिगड़ गई. घर के मुखिया रणजीत सिंह की मौत हो गई.

सितंबर 2016 : बटाला के कसबा कलानौर में मशरूम की सब्जी खाने से एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि एक दंपती की हालत गंभीर हो जाने के कारण इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा.

दिसंबर 2015 : उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के चुडि़याला क्षेत्र के खेलपुर गांव में जहरीली सब्जी खाने से 2 सगी बहनों की मौत हो गई.

नवंबर 2014 : मध्य प्रदेश के बेताल जिले के भीमपुर ब्लौक के आकी रैय्यत गांव में जहरीला खाना खाने से एक परिवार के 2 बच्चों की मौत हो गई और 4 लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए.

जनवरी 2013 : बिहार के भागलपुर जिले के सनोखर थाना क्षेत्र में जहरीली सब्जी खाने से एक ही परिवार के 3 लोगों की मौत हो गई.

बिहार, पंजाब और मध्य प्रदेश में रासायनिक व जहरीली सब्जियों से हुई ये मौतें महज बानगी हैं, असल में देश में हरी सब्जी के नाम पर जहर खा कर मरने वालों की संख्या न जाने कितनी होगी. हर दूसरे दिन अस्पताल में कोई न कोई ऐसा मामला जरूर आता है जिस में रोगी की हालत कैमिकलयुक्त सब्जी खाने से बिगड़ती है. इन में कुछ रोगी तो इलाज के बावजूद रासायनिक सब्जियों का जहर बरदाश्त नहीं कर पाते और मौत की नींद सो जाते हैं. पहले तो दूध, घी, आटा, सरसों तेल आदि में मिलावट की बात सामने आती थी पर अब कुदरती उपज यानी हरी सब्जियों में जो जहर की मिलावट की जा रही है, उस के खतरनाक परिणाम देखने को मिल रहे हैं.

आम आदमी आज ताजा सब्जियों की चाह में बीमारी और मौत खरीद रहा है. जबकि मुनाफाखोर व्यापारी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में सब्जियों में इतने कैमिकल्स मिला देते हैं कि खाने वाले की जान पर बन आती है. ये मुनाफाखोर आम आदमी की थाली में हरा जहर परोस रहे हैं.

दिल्ली पुलिस सब्जी की कई मंडियों में छापा मार कर ऐसे दर्जनों लोगों को पकड़ चुकी है जो सब्जियों में रसायन डाल कर हरी सब्जियों को फ्रैश दिखा कर बेच रहे थे.

एक गैर सरकारी संगठन वायस ने विभिन्न सब्जियों के सैंपल ले सरकारी प्रयोगशालाओं में परीक्षण करवाया तो सामने आया कि जिन तथाकथित दवाओं को बेचने पर प्रतिबंध लगा है वे भी सब्जियों में भारी मात्रा में मौजूद हैं.

इस के अलावा यह बात भी सामने आई कि मंडी में फल या सब्जी की गुणवत्ता पर किसी तरह का सरकारी नियंत्रण लागू न होने के चलते मात्र आढ़ती या फिर दवा विक्रेता की सलाह पर पैस्टीसाइड-इंसैक्टीसाइड का छिड़काव कर सब्जियों को खाने के नाम पर जहर में तबदील किया जा रहा है.

आम आदमी द्वारा खाए जाने वाले आलू से ले कर टमाटर, खीरा, ककड़ी जैसे कच्चे खाए जाने वाले सलाद और बैगन पर जहर का असर न मिटने वाला और ज्यादा खतरनाक पाया गया.

कहने के लिए देश में फूड सैफ्टी स्टैंडर्ड अथौरिटी बनी हुई है पर फलसब्जियों में कीटनाशकों के अवशेष की कितनी इजाजत है, इस का पिछले

3 दशकों में सीमा का पुनर्निर्धारण नहीं किया गया है, जबकि पैस्टीसाइड की मात्रा, जहरीलापन और संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में खेती की जगह कम और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसान सब्जियों में कैमिकल्स व कीटनाशक धड़ल्ले से डाल रहे हैं.

कैसे बनता है हरा जहर

सब से पहले तो यह जानना जरूरी है कि मुनाफाखोर और मौत के सौदागर कुदरती उपज यानी हरी सब्जियों को जहरीला कैसे बनाते हैं. स्थानीय क्षेत्रों में सब्जी कारोबारी वजन बढ़ाने और अधिक पैसा कमाने के लालच में केला, लौकी, बैगन, करेला आदि में प्रतिबंधित औक्सीटोसीन का इंजैक्शन लगा कर सब्जी को रातोंरात बड़ा और वजनी कर देते हैं. इस से इन के वजन में बढ़ोतरी हो जाती है.

इस के अलावा दुकानदार भी परवल, तुरई, लौकी, भिंडी आदि को ताजा बनाए रखने के लिए इन्हें रासायन युक्त पानी से धोते हैं. इस से सब्जी दिखने में अधिक ताजी और हरीभरी दिखाई देती है. कुछ लोग तो कैमिकल रंग भी इस्तेमाल करते हैं. टमाटर में जीएथ्री रसायन तो वहीं अन्य सब्जियों को चमकदार बनाने के लिए मोम का उपयोग किया जाता है. केले एवं पपीते को कैमिकल में डुबो कर पकाया जाता है जो जहर बन कर सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है.

तालाब एवं डबरों में सिंघाड़ों की खेती के लिए भी खतरनाक कैमिकल व दवाएं पानी में डाली जाती हैं. भिंडी, करेला, परवल, मटर आदि रंगों व कैमिकल के प्रयोग के बिना इतने चमकदार नहीं दिख सकते, इसलिए ज्यादातर कारोबारी कैल्शियम कार्बाइड को पुडि़यों में डाल कर फलों के ढेर के बीच में रख देते हैं. उस पर बर्फ रख दी जाती है.

इस से कैल्शियम कार्बाइड की पुडि़यों पर बूंदबूंद पानी गिरता रहता है. इस से फल तो जल्दी पक जाता है लेकिन कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया यह फल सेहत को नुकसान पहुंचाता है. ज्यादातर रसायनों का इस्तेमाल मंडी में व्यापार के स्तर पर यह देख कर किया जाता है कि बाजार में किन सब्जियों की डिमांड ज्यादा है. उसी आधार पर सब्जियों में रसायन मिलाया जाता है.

सिर्फ पैस्टीसाइड और रसायन ही सब्जियों को जहरीला नहीं बना रहे, बल्कि पानी भी है, जो हरी सब्जियों को जहरीला बना रहा है. असल में गंदा और रसायनयुक्त सिंचाई जल आज जहर बन कर अनाज, सब्जियों और फलों में शामिल हो चुका है.

देश के उत्तरपूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से सब्जियों को जहरीला बनाया जा रहा है. यहां भूजल से सिंचित खेतों में पैदा होने वाले धान में आर्सेनिक की इतनी मात्रा पाई गई है जो मानव शरीर को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है.

इतना ही नहीं, देश में नदियों के किनारे उगाई जाने वाली फसलों में भी जहरीले रसायन पाए गए हैं. कारखानों से निकला जहरीला जल जब सब्जियों को सींचने के लिए प्रयोग में लाया जाता है तो वह सब्जियों को मौत के सामान में तबदील कर देता है.

इंडियन काउंसिल औफ एग्रीकल्चर रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नदियों के किनारे उगाई गई फसलों में से 50 फीसदी में विषैले तत्त्व पाए जाने की आशंका रहती है.

मिलावट की पहचान

आमतौर पर रसायनयुक्त सब्जियों की सही पहचान तो प्रयोगशालाओं में ही होती है लेकिन फिर भी कुछ ऐसी तकनीकें होती हैं जिन से प्राथमिक स्तर पर पहचाना जा सकता है कि किन सब्जियों में कैमिकल का प्रयोग किया गया है और कौन सी सब्जियां ताजी हैं.

सब से पहले तो उन सब्जियों को परखें जिन में कैमिकल कलर यानी रासायनिक रंगों का इस्तेमाल कर उन्हें हराभरा कर दिया जाता है. इस के लिए जो सब्जी आप खरीद रहे हैं उसे गुनगुने पानी में धो कर देखें, अगर उस में कैमिकल कलर होंगे तो पानी रंगीन हो जाएगा.

इस के अलावा जिन सब्जियों में मोम का इस्तेमाल हुआ हो उन्हें ब्लेड या चाकू से खुरच कर देखा जा सकता है. छुरी से खुरचने से या डंडी के किनारे वाले भाग पर उजली परत को गौर से देखने पर मोम को पहचाना जा सकता है. इस के अलावा कैमिकल से फुलाई या पकाई गई सब्जियों का पता काटने के दौरान लगाया जा सकता है. बहुत ज्यादा हरीभरी और चमकीली सब्जियों में रसायन पाए जाने की संभावना  ज्यादा होती है, इसलिए मौसमी और प्राकृतिक दिखने वाली सब्जियों को  ही खरीदें.

हरे जहर की बीमारियां

रसायनयुक्त सब्जियों को खाने से फेफड़ों में इंफैक्शन, अल्सर, कैंसर और एलर्जी जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं. क्रोमियम से चर्मरोग व श्वास संबंधी बीमारियों के साथ शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता खत्म होने की समस्या रहती है. कौपर से एलर्जी, चर्मरोग, आंखों के कार्निया का प्रभावित होना, उल्टीदस्त, लिवर डैमेज, हाइपरटैंशन की शिकायत मिलती है. मात्रा बढ़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है. हीमोग्लोबिन के साथ जुड़ कर यह उसे कम कर देता है.

फिजीशियन डा. सी एस भार्गव का कहना है, ‘‘टौक्सिन बनने और जैनेटिक बदलाव के कारण सब्जियां कड़वी होती हैं. इन्हें कूकर ब्यूटेन भी कहते हैं. उस कड़वी सब्जी से बचें जो प्राकृतिक रूप से कड़वी नहीं होती. कड़वी सब्जी से उलटी, डायरिया और यूरीन से संबंधित समस्याएं होती हैं.’’

वहीं, डा. वीरेंद्र नाथ गर्ग बताते हैं, ‘‘रूटीन में कैमिकल वाली सब्जियां खाते रहने से लोगों में चिड़चिड़ापन आता है, उन को नींद न आने की शिकायत रहती है. कई बार फेफड़ों में भी खराबी आ जाती है.’’ उन्होंने बताया कि इस तरह की शिकायत मैट्रो सिटीज में ज्यादा देखने को मिलती है.

प्राथमिक उपचार

रसायनयुक्त सब्जी खा कर आप अपनी तबीयत नासाज महसूस करें तो कुछ प्राथमिक सावधानियां हैं जिन्हें अपना कर हानिकारक परिणाम से बचा जा सकता है.

तबीयत खराब होते देख सब से पहले तो डाक्टर से संपर्क करें और उसे अपनी तत्कालीन स्थिति से अवगत कराएं. जरूरत पड़े तो तुरंत अस्पताल भी जा सकते हैं. कड़वे जूस से यदि जी मिचले और उलटी आती है तो उसे रोकें नहीं, उलटी करने से सारी खराबी पेट से बाहर निकल जाएगी. यदि उलटी जैसा लग रहा हो या घबराहट हो रही हो तो खूब सारा पानी पिएं. इस से उल्टी आसानी से हो जाएगी और आराम मिलेगा.

एक गिलास गुनगुने पानी में 2 चम्मच नमक डाल कर पीने से भी जल्दी उलटी आएगी और राहत मिलेगी. खून की उलटी होने, बेहोशी आने या स्थिति बिगड़ने की दशा में फौरन अस्पताल जाना ही बेहतर होगा. इस तरह कुछ प्राथमिक तरीकों को अपना कर काफी हद तक आप अपनी मदद स्वयं कर सकते हैं.

कितने कैमिकल्सतकनीकी तौर पर सब्जियों को उगाने से ले कर बाजार तक आने में कई तरह के पैस्टीसाइड और जहरीले रसायनों से गुजरना पड़ता है.

सब्जियों में पाए जाने वाले पैस्टीसाइड और मैटल्स पर अलगअलग शोध किया गया. शोध के अनुसार, सब्जियों के साथ हम कई प्रकार के पैस्टीसाइड और मेटल्स खा रहे हैं. इन में केडमियम, सीसा, कौपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं और एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे घातक पैस्टीसाइड शामिल हैं. रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पैस्टीसाइड का उपयोग आम है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े शहरों की सब्जीमंडियों में अलगअलग सब्जियों का परीक्षण किया गया. इस में टमाटरों के 28 नमूनों का निरीक्षण किया, जिन में से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पैस्टीसाइड ज्यादा पाया गया. भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए. फूलगोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई जिस के 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था.

यह जिम्मेदारी तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग की होनी चाहिए कि वे सुनिश्चित करें कि आम आदमी की थाली में यह जहर न पहुंचे. लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं है. उदाहरण के तौर पर पिछले 3 दशकों से कीटनाशकों के इस्तेमाल को ले कर समीक्षा तक नहीं की गई. बाजार में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री भी बदस्तूर जारी है.

यह सच है कि मौजूदा दौर में कीटनाशकों पर पूरी तरह पाबंदी लगानी मुमकिन नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि इन का इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए. सरकार और प्रशासन के अलावा आम लोगों को भी थोड़ा जागरूक होने की जरूरत है क्योंकि आखिरकार हरी सब्जियों के नाम पर जहर तो हमारी ही थाली में परोसा जा रहा है.

सब्जियों को ले कर सावधानी बरतें

  • सब्जियों को 2 से 3 बार धोने से पैस्टीसाइड्स और इंसैक्टिसाइड्स हट जाते हैं. डिटर्जैंट की कुछ बूंदें पानी में मिला कर गुनगुने पानी में धोने से सब्जियों का वैक्स और कलर हट जाता है.
  • फल और सब्जियों को छील कर ही खाएं.
  • बंदगोभी के ऊपरी हिस्से के पत्ते जरूर उतार दें.
  • मौसमी सब्जियों को ही खरीदें.
  • चमकदार सब्जियों के इस्तेमाल से बचें.
  • और्गेनिक तरीके से उगाई गई सब्जियां ही इस्तेमाल करें.

उपरोक्त सावधानियों और परीक्षण से हमें रासायनिक सब्जियों की पहचान तो हो जाएगी लेकिन समस्या यह है कि आज की भागदौड़भरी जिंदगी में इतना समय किस के पास है जो सब्जियों की जांच के लिए इतनी कसरत करे.

प्रियंका चोपड़ा का ये वायरल वीडियो देखा आपने

प्रियंका चोपड़ा बौलीवुड की हिट एक्ट्रेस में से एक हैं. वहीं हौलीवुड में भी वह अब अपना सिक्का जमाने में लगी हुई हैं. इस बीच प्रियंका लगातार अपने काम और शूटिंग में व्यस्त रहती हैं. प्रियंका चोपड़ा इन दिनों न्यूयार्क में हैं और अपनी सीरीज ‘क्वांटिको’ के सीजन 3 की शूटिंग कर रही हैं. बौलीवुड से हौलीवुड तक का सफर तय करने वालीं प्रियंका चोपड़ा का मूड इन दिनों कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है और लगता है कि वह अब किसी वजह से काफी परेशान हैं. ऐसा हम नहीं बल्कि प्रियंका की कुछ हरकते कह रही हैं. जी हां, प्रियंका का एक वीडियो इस दिनों सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है, इस वीडियो में प्रियंका अपने सिर पर वाइन का गिलास फोड़ते नजर आ रही हैं, जो बड़ा ही हैरतअंगेज कारनामा करती हैं.

प्रियंका ने खुद अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर ऐसा वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में वे गिलास के साथ नजर आ रही हैं. पहले वे गिलास में वाइन का सिप लेती हैं और फिर थोड़ी देर बाद उसी गिलास को अपने सिर पर दे मारती हैं. वाकई ये वीडियो काफी अजीब है लेकिन प्रियंका चोपड़ा ने इस वीडियो के साथ दिए कैप्शन में यह बात समझाई है कि आखिर उन्हें ऐसा करने पर क्यों मजबूर होना पड़ा है.

प्रियंका ने इस वीडियो को कैप्शन देते हुए लिखा, ‘यह तब होता है जब आप लगातार काम करते हैं 9 से वाइन तक. आप इसे घर पर ट्राइ न करें. बहुत बुरा दिन बीतने के बाद मैंने ये करने का फैसला लिया. Lol अच्छा अब बस.’ इस वीडियो के सामने आने के बाद प्रियंका के कई फैंस ने उन्हें कहा कि क्या वह परेशान हैं? वहीं कुछ फैंस उन्हें दिलासा देते हुए कहते हैं कि प्रियंका लाइफ में ये सब चलता रहता है. लेकिन जिंदगी सबसे जरूरी है. याद रखो तुम बेस्ट हो.

हालांकि ये ब्रेकअवे ग्लास है जिसे शुगर ग्लास भी कहा जाता है. माना जाता है कि असली कांच की अपेक्षा इससे चोट लगने की संभावना कम रहती है और इस ग्लास का इस्तेमाल अकसर फिल्मों में किया जाता है. हालांकि प्रियंका चोपड़ा ने बतौर सेलेब्रिटी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने फैन्स को इसे आजमाने से आगाह भी कर दिया है.

अरविंद केजरीवाल रहें विपक्ष से सावधान

राजनेता अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी प्रारंभिक दिनों को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की ही आंखों का कांटा बनी रही है. अब जब उस के 20 विधायकों को सरकार में लाभ का पद पाने के आरोप में विधानसभा की सदस्यता खोनी पड़ी तो इन दोनों पार्टियों को असीम सुख मिला.

लाभ का पद देने का विषय पेचीदा है और एक तरह से यह मंत्री का सा पद आम विधायक को देना है जहां सरकार से वेतन व सुविधाएं मिलती रहें. कानून के अनुसार, लाभ का पद कोई विधायक या सांसद नहीं ले सकता. यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि अफसरशाही अपने प्रतिनिधि विधानमंडलों में न भेज सकें.

तकनीकी तौर पर चाहे वह नियुक्ति गलत थी पर मोटेतौर पर भ्रष्टाचार नहीं है. नौसिखिया अरविंद केजरीवाल कानूनी बारीकियों को समझ नहीं पाए, सो फंस गए हैं. हो सकता है कि अब उन्हें 20 सीटों पर फिर चुनाव लड़ना पड़े और कुछ सीटें हार भी जाएं पर यह पक्का है कि अरविंद केजरीवाल को जो भारी बहुमत मिला था उस की वजह से वे, नगरनिगमों की हार के बावजूद, तब तक सत्ता में बने रहेंगे जब तक कोई उन की पार्टी को तुड़वा न दे. यह बहुत संभव भी है क्योंकि देश में तोड़फोड़ की राजनीति जम कर चल रही है.

अरविंद केजरीवाल की अब तक की सफलता का राज यह है कि वे और उन की पार्टी जाति व धर्म के ऊपर हैं. उन की पार्टी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप न के बराबर हैं. अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस की जगह लेनी चाही थी पर वे अपने व्यक्तित्व, महत्त्वाकांक्षाओं और जिद के चलते विवादों में ज्यादा घिरे रहे हैं.

भारत के तत्कालीन महालेखा नियंत्रक यानी सीएजी विनोद राय ने पिछले आम चुनावों से पहले कांग्रेस की छवि खराब की थी और उस का सुख भाजपा को मिला था. अब वैसा ही सुख भाजपा को चुनाव आयोग ने दिया है. राजनीतिक सफलता पर काला रंग पोतने में ये स्वतंत्र संस्थाएं आजकल राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए कि सत्ता सैकड़ों समीकरणों के सहारे मिलती है, केवल वादों व निष्ठा से नहीं.

दिल्ली नगर निगम की पार्किंग वसूली

घरों के बाहर पार्किंग की समस्या का हल खोजने के बजाय दिल्ली नगर निगम उस पर शुल्क लगाने का विचार कर रहा है. आज अगर दिल्ली इस में सफल होती है तो कल दूसरे शहर भी ऐसा करेंगे. आज कारों पर शुल्क लगाया गया तो कल बाइकों और फिर साइकिलों पर भी लगेगा. सरकार छोटे टैक्स से शुरुआत करती है और फिर उसे भारीभरकम बनाती जाती है.

घर के बाहर की सड़क सार्वजनिक है और इस का उपयोग एक घर के लोग अपनी गाडि़यों के लिए करें, यह अटपटा लग सकता है पर वास्तविकता यह है कि जब शहर की कालोनियों के नक्शे बनते हैं तभी सड़कों के किनारे की जगह की कीमत अलौट की गई जमीन के दाम में जोड़ ली जाती है. 200 गज के प्लौट के सामने 3 फुट जगह सड़क के किनारे प्लौट मालिक की होती है उस के सार्वजनिक उपयोग के लिए.

घरों के आगे गाडि़यों की समस्याएं उग्र अगर हो रही हैं तो इसलिए कि सरकारों, निगमों ने सड़कों को दुहना तो शुरू कर दिया है पर, हिंदुओं की गायों की तरह, उन्हें संवारना उन का काम नहीं है. शहरभर में सड़कों के किनारे पटरियों पर जमे सीवर, मलबा, दुकानें, दुकानों का सामान, बिजली के आड़ेतिरछे खंभे, बोर्ड, होर्डिंग्स लगे रहते हैं. अगर इन्हीं को दुरुस्त कर दिया जाए तो दिल्ली जैसे शहर की पार्किंग की व्यवस्था सुधर जाए.

लोगों के लिए गाड़ी अब लक्जरी नहीं, निसेसिटी है. हर घर में हर गाड़ी पर 5 से 25 लाख रुपए तक खर्च यों ही दिखावे के लिए नहीं किया जाता. शहर बड़े हो गए हैं, कालोनियां भी बड़ी हो गई हैं. उन पर अकेले रातबिरात चलना सरकार सुरक्षित नहीं कर सकती. ऐसे में लोगों को गाड़ी की सुरक्षा का सहारा लेना पड़ता है.

हर गाड़ी पर और गाड़ी के लिए इस्तेमाल होने वाले हर लिटर पैट्रोल व डीजल पर सरकार टैक्स वसूल कर रही है. पार्किंग के नाम पर एक और टैक्स की वसूली किए जाने की योजना असल में तानाशाही है और यह तैमूरी टैक्स होगा. अफसोस यह है कि आज देश की जनता ने अपने अधिकारों के प्रति इस कदर बेरुखी अख्तियार कर ली है कि धर्म व जाति के नाम पर दिए गए अपने वोट के लिहाज में वह अपने सब दुखदर्द भुला रही है. वह हिंदू धर्म को बचाने के चक्कर में सरकार की हर मनमानी सह रही है जो उसे बुरी तरह निचोड़ रही है और उस से उस की हर आजादी-बोलने की आजादी, पैसा रखने की आजादी व गाड़ी रखने की आजादी छीन रही है.

पार्किंग शुल्क, खासतौर पर अपने घर के सामने खड़ी कार का, अन्याय की पराकाष्ठा है. इसे हरगिज सफल नहीं होने देना चाहिए. लोगों को सांसदों, विधायकों, पार्षदों और अफसरों को तुरंत ईमेल, व्हाट्सऐप, पत्र भेजने चाहिए कि उन के बचेखुचे हक छीने न जाएं.

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